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श्री दिगम्बर जैन कुन्थु विजय ग्रंथमाला समिति
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तेरहवाँ पुष्प श्री गोम्मट प्रश्नोत्तर चिंतामणि
संग्रह कत्ता : परम पूज्य श्री १०८ गपधराचार्य कुन्थुसागरजी महाराज
अंगाशन गंगाजल :
शान्ति कुमार गंगवाल
प्रामा श्री दिगम्बर जैन कुन्थु विजय ग्रन्थमाला समिति
कामाला १९३६, जौहरी बाजार धो बालों का रास्ता, कसेरों की गली, .
जयपुर-३०२००३ (राजस्थान)
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परमपूज्य श्री १०८ गराधराचार्य वात्सल्य रत्नाकर श्रमरणरत्न स्याद्वाद केशरी कुत्थुसागर जी महाराज व उनके विशाल संघ सानिध्य में माह दिसम्बर १६८८ में प्रारा नगर (बिहार) में आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव के शुभावसर पर
प्रकाशित
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सर्वाधिकार सुरक्षित मूल्य : स्वाध्याय/२०१) रुपये. मुद्रक : मूनलाइट प्रिन्टर्स, जयपुर-३
ग्रंथ प्राप्ति स्थान:: श्री दिगम्बर जैन कुन्य विजय त्याला समिति
३६, जौहरी बाजार भी गानों का रता,
करे को गली, जयपुर-, (राज,
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.. (मंगलमय शुभाशीर्वाद)
मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि श्री दिगम्बर जैन कुन्थु विजय ग्रन्थमाला समिति :जयपुर (राजस्थान) से तेरहवें पुष्प के रूप में श्री गोम्मट प्रश्नोत्तर चिंतामणि ग्रन्थ का प्रकाशन हो रहा है। इस ग्रन्य का संग्रह गरमधराचार्य कुन्थु सागर जी महाराज ने किया है। गाधराचार्य महाराज का ज्ञान ध्यान अच्छा हैं. उनको हमारा पूर्ण
आशीर्वाद है. । ग्रन्थमाला समिति ने अल्प समय में अच्छे से अच्छे ...। प्रकाशनों के माध्यम से साधुवर्ग व समाज में अच्छि प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली है 1. इसके लिये ग्रन्थमाला के प्रकाशन संयोजक श्री शान्ति .. कुमार जी गंगवाल व उनके सहयोगियों को हमारा पूर्ण प्राशीर्वाद है कि आगे भी इसी प्रकार से और भी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का प्रकाशन करवाकर, जिनवाणी का प्रचार-प्रसार करते रहे । यह ग्रन्थः साधुवर्ग व गृहस्थियों के लिए बहुत ही उपयोगी व महत्त्वपूर्ण है, इसलिये सभी स्वाध्याय करके इससे लाभ उठावेंगे।
-प्राचार्य विमल सागर
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अध्यात्म बालयोगी १०८ प्राचार्यरत्न श्री सन्मतिसागर जी
. .. महाराज
(मंगलमय शुभाशीर्वाद.) ... हमें यह जानकर बहुत प्रसन्नता हुई है कि श्री दिगम्बर जैन . कुन्थु विजय ग्रंथमाला समिति जयपुर (राजस्थान) से एक वृहद् ग्रंथ ... गोम्मट प्रश्नोत्तर चिंतामरिण ग्रंथ का प्रकाशन हो रहा है। जिसका : संकलन गणधराचार्य कुन्थु सांगरजी महाराज ने बहुत कठिन परिश्रम
से किया । इसके लिये हमारा पूर्ण आशीर्वाद हैं। .. .. . ग्रंथमाला समिति से १३वें पुष्प के रूप में इस ग्रंथ का प्रकाशन
हो रहा है। अब तक इस ग्रंथमाला से जितने भी ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं, सभी श्रेष्ठता को लिए हुए हैं और आगे भी यह ग्रंथमाला उत्तम ग्रंथों का प्रकाशन करती रहे, इसके लिए इस ग्रंथमाला के प्रकाशन संयोजक श्री शान्ति कुमार जी गंगवाल व ग्रंथमाला के अंगरूप सभी श्रेष्ठियों को हमारा मंगलमयपूर्ण प्राशीर्वाद है । : :
-प्राचार्य सन्मति सागर
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ग्रन्थ के संग्रहकर्ता परमपूज्य, वात्सल्य रत्नाकर श्रमरणरत्न स्यावाद केशरी श्री १०८ गरगधराचार्य कन्यसागर जी महाराज के प्रकाशित ग्रन्थ के बारे में विचार एवं
... मंगलमय शुभाशीर्वाद
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- अनादि संसार का विच्छेदन होने के लिये भव्यात्मानों को कुछ धर्म ध्यान का साधन होना चाहिये, आर्त ध्यान और रौद्र ध्यान से बचने के लिये और शुक्ल ध्यान की प्राप्ति के लिए धर्म ध्यान ही साधनः .... मुख्य माना है। जैनाचार्यों ने कहा 'जीव धर्म ध्यान में तत्पर नहीं रहता है तो पात ध्यान और रौद्र ध्यान से नहीं बच सकता है, पात . ध्यान, रौद्र ध्यान नरक और तिर्यञ्चगति का कारण हो जायेगा,
गुबल ध्यान की प्राप्ति का मुख्य कारण धर्म ध्यान ही है, धर्म ध्यान ..... ... साधन है और शुबल ध्यान उसका कार्य है, दोनों ध्यानों .का फ़ल ..
मोक्ष सुख है, आत्मिक सुख है। हम लोग अनादिकाल से संसार में : .. - परिभ्रमण कर रहे हैं, सुख को प्राप्ति का उपाय भी खोज रहे हैं .
लेकिन निराशा ही हाथ लगी, क्या कारण हुमा ? इसमें कारण हुआ . . .
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ज्ञान का प्रभाव, ज्ञान के बिना जीव को एक क्षण भी शांति नहीं मिल सकती है। ज्ञान भी होना चाहिये । भेद विज्ञान-प्रात्मा शरीर जड़ अलग हैं इस प्रकार का ज्ञान ही भेदविज्ञान है, हमारे · चैतन्य स्वरूप से द्रव्य कर्म, भाव कर्म, नो कर्मों को अलग बताने वाला मात्र भेद विज्ञान ही है ।' ... . ........ ...भेदविज्ञान के अभाव में जीव ने द्रव्य कर्मों नो कर्मों को ही
अपना माना और उसी का फल है तो यहीं एक संसार और संसार . . हो दुःख का कारण है। हमारी आत्मा अनादि से शुद्ध स्वरूप द्रव्यापेक्षा है टंकोत्कीर्ण ज्ञायक स्वभाव यह है, व्यक्त अमर अविनाशी है, चैतन्य स्वरूप होने पर भी कर्मों के संयोग से संसार में जन्म-मरण के दुःखों को उठा रहा है, जन्म, मरण पर्याय हमारी नहीं है, ये तो . संयोगज हैं। कर्म संयोग से होने वाली अवस्था हमारे ग्रात्मा की कभी नहीं हो सकती है, हमें भेद विज्ञान से केवल कर्म से होने वाली पर्यायों को दूर करना है नष्ट करना हैं, हमें अपने स्वरूप में माना है, यही भेद विज्ञान का सार है, भद विज्ञानी इस
कार्य को कर सकता है । मोही, रागी, द्वेषी नहीं, मोह, राग, द्वेष _____ अनन्त: संसार का कारण हैं। हमने इन्हीं को अनादि से नहीं छोड़ा ...
है। फल मिला दुःख, अनादि संसार, हमें प्रथमतः द्रव्य कम, भाव कर्म, नो कर्मों का स्वरूप और ज्ञानधन स्वभाव वाला प्रात्मा का स्वरूप अवश्य जानना चाहिए; उसको जानने का साधन मात्र जिनागम का स्वाध्याय, स्वाध्याय करने से वस्तु स्वरूप का ज्ञान होता है और . यह ज्ञान भेद-विज्ञान होने में सहायक बनता है। इसी भेद-विज्ञान की प्राप्ति के लिये बात ध्यान रौद्र ध्यान से बचने के लिये स्वाध्याय
रूप धर्म ध्यान का प्राचार्यों ने ज्ञानी पुरुषों ने सहारा लिया है । धर्म । ध्यान में स्थिर रहने के लिये, आगम ग्रन्थों की रचना, पठन पाठना
दिक का सहारा लिया, और धर्म ध्यान की सिद्धि की, हम लोग
छदमस्थ चंचल चित्त हैं। हम लोगों को भी धर्म ध्यान की सिद्धि के । लिये पूर्वाचार्यों की रचना का पठन-पाठनादि क्रिया को अवश्य करना.
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चाहिये और ज्ञान रूपी अमृत का मास्वादन करना चाहिये । यही मनुष्य भर का सार हैं।
इस हुंडावसापिणी पंचमकाल में हमें · शुक्ल ध्यान की प्राप्ति नहीं हो सकती है. मात्र धर्म ध्यान की ही सिद्धि के लिये जिनागमों का पठन-पाठन, स्वाध्याय ग्रादि करना चाहिये । ये ही हमारे पास....... मात्र उपाय हैं इसी उपाय से हम शांति का अनुभव कर सकते हैं और कोई दूसरा साधन नहीं, स्वाध्याय से जितना मन एकाग्र हो . . सकता है उतना दूसरे अन्य साधनों से नहीं, इसी को ध्यान में रखते .... हुए हमने इस गोम्मट प्रश्नोत्तर चिन्तामणि ग्रन्थ का प्रश्न उत्तर रूप में संग्रह किया है। भगवान गोम्मटेश्वर का सहस्त्राब्दि महामस्तकाभिषेक .. महोत्सव के समय हमारी भावना. हई कि गोम्मटेश्वर की यादगारी में रचना कार्य होना चाहिये, नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती ने तो सिद्धान्त ग्रंथों का मंथन करके सार रूपं गोम्मट सार जीव काण्ड, कर्म काण्ड की रचना की, लेकिन हमने सोचा हमारी तो इतनी बुद्धि नहीं कि स्वतंत्र कोई ग्रंथ की रचना करें, कई दिनों तक विचारों में ही रहे, आम्बिर निर्णय किया कि प्रश्न उत्तर रूप में कुछ सैद्धान्तिक विषयों का वर्णन किया जाय । अक्षय तृतिया की शुभवेला में मंगलाचरण रूप ग्रंथ का प्रारम्भ किया गया और लग गये पूर्ण पुरुषार्थ में । एक . वर्ष में ग्रंथ की पूर्ति का समय भी आ गया, इस ग्रन्थ का नाम गोम्मट . प्रश्नोत्तर चिन्तामरिण रखा, यह ग्रन्थ संग्रह रूप है। इसमें मैंने अपनी ओर से कुछ भी नहीं लिखा, पूर्वाचार्यों के वचनानुसार ग्रंथ का संग्रह किया गया है । सो पूर्वाचार्य ही इस ग्रंथ के प्रमाण हैं, मैंने लो अपने को धर्म ध्यान में लगाने के लिये ही कार्य किया है, ग्रंथ में करणानु योग, द्रव्यानुयोग आदि सभी प्रकार की चर्चाएं संग्नहित की गई है और आधार लिया गया है जिनागम का, मैं समझता हूं कि स्वाध्याय : प्रेमियों को इस एक ही गंथ के स्वाध्याय करने से जिनागम का बहुत कुछ ज्ञान हो सकता है, इस ग्रंथ में गुणस्थानानुसार श्राधक धर्म, मुनि वर्म, यात्म ध्यान, पींडस्थ. रूपातीत आदि ध्यान और उनके
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।... चित्रों सहित वर्णन किया गया है, और भी अनेक सामग्री संकलित की
गई. है । यह ग्रंथ अपने आप में एक नया ही संग्रहित हुया है, इस गंथ में सभी ग्रंथों से लेकर २१७८ श्लोकों का संग्रह है। ..इस ग्रंथ में पूर्वाचार्यकृत गोम्मटसार जीवकोड, त्रिलोकसार, मलाचार, ज्ञानार्गव, समयसार, प्रवचनसार, नियमसार, रत्नकरंड, श्रावकाचार, तत्वार्थ सूत्र, राज वार्तिक, प्राचारसार, अष्टपाहुड, हरिवंश पुराण, आदि पुराण, वसु नन्दी श्रावकाचार, परमात्म प्रकाश, . पुरुषार्थ सिद्ध युपाय, समयसार कलश, श्रवलादि, उमा स्वामी का श्रावका . चार,ौन सिद्धान्त प्र., दशभक्त्यादि संग्रह, चर्चाशतक , चर्चा समाधान स्याद्वाद चक्र, चर्चासागर, सिद्धान्त सार प्रदीप, मोक्ष मार्ग प्रकाशक, . त्रिकालवी महापुरुष्णादि . दा. संभों को लेकर संग्रह किया गया है, इन ग्रंथों के रचनाकार बड़े-बड़े ग्राचार्य हैं और उन ग्रंथों की हिन्दी टीका करने वाले गणमान्य पण्डित लोग और साधु
जन हैं, वो ही इस ग्रंथ के रचनाकार हैं, मैं तो मात्र संग्रहकर्ता हूं। : एक धागे में मोति के समान हारवत हूं मोति भी अलग हैं और धागड ..
भी अलग है इसी प्रकार. ग्रंथ का सारा श्रेय उन्हीं पूर्वाचार्यो को . व उनके हिन्दी टीका कारों को है, मैंने तो मात्र प्रयास किया है कहाँ. . तक सफल हुश्रा ये में नहीं कह सकता हूं। ज्ञानी जन ही कर सकते .. हैं। इस ग्रंथ में जो-जो वस्तु जिस-जिस ग्रंश्च से ली गयी उस-उस ग्रंथ का मैं में प्रकरण समाप्त होने के बाद नाम दे दिया है और ... : . कत्तानों का भी नाम मूल में दे दिये हैं सो जिस किसी को भी कोई शंका हो तो इस ग्रंथ को देख लें, वो ही प्रमाण है मैं नहीं । मैं तो महान् अल्पज हूँ मुझे इतना ज्ञान कहां, मैंने तो मात्र श्रवण बेल गोला ..: चातुर्मास होने के समय का सद्उपयोग किया है, स्वयं ज्ञानार्थ इसमें किसी प्रकार की त्रुटि रही हो तो ज्ञानी जन मुझे अल्पज्ञ समझ कर क्षमा करेंगे। ....
इस ग्रंथ की प्रेस प्रति तैयार करने का कार्य पूर्ण रूप से श्री । १०८ मुनि पद्मनन्दी जी महाराज ने किया है और प्रेस प्रति के चित्र
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बनाने का कार्य श्री १०५ प्रा. कुलभूषण श्री माताजी ने किया है. और अन्य महानुभावों ने जिन्होंने किसी भी रूप में सहयोग किया है, सबको मेरा आशीर्वाद है। ..
इस ग्रंथ में सभी प्रकार का विषय प्रतिपादित किया गया है । इस ग्रंथ के प्रकाशन हेतु जिन-जिन दातारों ने गुप्त रूप से सहयोग देकर अपने धन का सद्उपयोग किया है उनको मेरा पूर्ण आशीर्वाद
... ग्रंथ प्रकाशन कार्य बहुत कठिन होता है । हमारे ग्रंथमाला के कर्मट कार्यकर्ता प्रकाशन संयोजक श्री शांतिकमार जी गंगवाल हैं। जो बहुत ही प्रयत्नशील हैं, तथा सच्चे पुरुषार्थी हैं। इनके सुपुत्र प्रदीपकुमार भी ग्राप जैसे हैं। इन्हीं के कारण यह् . ग्रंथमाला बहुत ही वृद्धि कर रही है और इन्हीं के कठिन परिश्रम से इस ग्रन्थमाला अब तक १२ ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। और यह १३वा - ग्रंथ प्रकाशित हुया है। इसके लिये श्री शांतिकुमार जी, प्रदीप कुमार जी
गंगवाल व ग्रंथमाला के सभी कार्यकर्ताओं को मेरा बहुत-बहुत ___ शुभाशीर्वाद है। . . . . .
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.. श्री १०५ गरिगनी गायिका विदुषीरत्न सम्यग्ज्ञान शिरोमरिण - सिद्धांत विशारद जिनधर्म प्रचारिका विजयामती माताजी
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(मंगलमय शुभाशीर्वाद) श्री शान्तिकुमारजी गंगवाल के पत्र द्वारा विदित हुआ कि श्री दि. जै. कुन्थु विजय ग्रंथमाला से "गो. प्र. चितामग्गि" अन्य प्रकाशित होने जा रहा है। यह विशिष्ट ग्रंथ होगा। इसका संकलन.८१ में श्री श्रवणबेलगोल महान् क्षेत्र पर परम पूज्य आचार्य रत्न श्री १०८ वात्सल्य रत्नाकर श्री कुन्थु सागर जी महाराज द्वारा किया था। लम्बे अरसे के बाद यह अन्य प्रकाशित हो रहा है इससे भव्य जनों का विशेष उपकार होगा। इसका संकलन अनेक महान् ग्रंथों को आधार लेकर किया गया है। पाठकों को एक ही ग्रंथ का स्वाध्याय अनेक मंथित अर्थी को प्रदान करेगा। गोमट्सारादि का निचोड-रसायन के सदृशं उपलब्ध है । प्राचार्य श्री पठन-पाठन एवं अध्ययन-अध्यापन में अति । पटु हैं । संग्रह करने की कला उनका बृहद् संघ प्रत्यक्ष है। अस्तु गंभीर..
अध्ययन कर गूढ़ और क्लिष्ट विषयों को सरल रूप में इसमें संयोजित किया .. । है, जिससे यह सरलता के साथ अति रोचक भी हो सकेगा। गहन तत्त्व
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विवेचना उत्तर- प्रत्युत्तरों द्वारा यत्र तत्र अत्यन्त आकर्षक रूप में निरूपित है । स्वाध्याय प्रेमियों के मस्तिष्क को पुष्ट और स्वस्थ बनाने में यह ग्रन्थ सक्षम होगा । स्वाध्याय परम तप । तप से निर्जरा होती है। निर्जरा का फल मुक्ति है ।
मुक्ति का सार सुख है । शाश्वतिक यानन्द ! ग्रात्मानन्द में स्थित, यह ग्रंथ अविनश्वर सुख का साधन सिद्ध होगा इस प्रकार के विशाल और उत्तम ग्रन्थ का संग्रह करना जितना कठिन है, उतना ही सम्पादन - प्रकाशन भी । जो भी सम्पादक मण्डल, संशोधक जब इस कार्य में अपना अमूल्य समय सानन्द, भक्ति और ज्ञान विनय पूर्वक दे रहे हैं, यह परम हर्ष का विषय है, हमारा इसके लिये प्रकाशन संयोजक श्री शान्ति कुमार जी. गंगवाल व उनके सहयोगियों को पूर्ण आशीर्वाद है, वे देव, -शास्त्र, गुरु के अकाट्य श्रद्धालु बने। इस कार्य में पूर्ण सफल हों । ज्ञानी बनकर स्वयं इस प्रकार के ग्रन्थों के निर्माण की योग्यता प्राप्त करें। जिनवाणी का प्रचार-प्रसार करते हुए ज्ञानावरणी कर्म को जीर्ण बना यथार्थ - जानी, स्याद्वादी बने ।
अनेकान्त सिद्धान्त का घर-घर और जन-जन में प्रचार हो यहीं हमारी सभावना है । ग्रन्थमाला भी उन्नतिशील हो और सत्त श्री जिनवाणी का प्रकाशन करती रहे ।
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श्री १०५ क्षुल्लक चैत्य सागरजी महाराज
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(मंगलमय शुभाशीर्वाद) " मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि श्री दिगम्बर जैन कुन्थु विजय' ग्रंथमाला समिति जयपुर ( राजस्थान.) से परम पूज्य श्री १०८
गाधराचार्य कुन्थुसागर जी महाराज द्वारा संग्रहित श्री गोम्मट. . प्रश्नोत्तर चिंतामरिण ग्रंथ का प्रकाशन हो रहा है । इस ग्रंथ में गणधराचार्य महाराज ने अनेक ग्रंथों के माध्यम से अनेक सैद्धान्तिक. विषयों का संकलन किया है। जिससे यह ग्रंथ साधुवर्ग एवं समाज के . . . मुमुक्षुओं के लिये बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगा। इस ग्रंथमाला से । अब तक १२ पुष्प प्रकाशित हो चुके हैं, यह १३वां पुष्प हैं। जितने ग्रन्थ इस ग्रन्थमाला से प्रकाशित हुए हैं। वे साधुवर्ग एवं सभी के .लिए बहुत ही उपयोगी हैं। .
ग्रन्थ प्रकाशन कार्यों में ग्रन्थमाला के प्रकाशन संयोजक श्री शांति कुमार जी गंगवाल बहुत ही परिश्रम करते हैं उनके अथक परिश्रम । से यह ग्रन्थमाला सुचारु रूप से चल रही है। मेरी गणधराचार्य महाराज से प्रार्थना है कि ग्रन्थमाला से इसी प्रकार ग्रन्थ प्रकाशित करवाते रहे और इसी शुभकामना के साथ ग्रन्धमाला के प्रकाशन संयोजकजी को व उनके सभी सहयोगियों को मेरा आशीर्वाद हैं। .
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प्रतिष्ठाचार्य प्रदीपकुमार जैन (शास्त्री) के प्रकाशित ग्रन्थ के बारे में उद्गार
प्रस्तुत ग्रंथ परम पूज्य श्रमणरत्न, वात्सल्य रत्नाकर, स्याद्वाद केशरी, श्री १०८ गणधराचार्य कुन्थुसागरजी महाराज ने बाहुबलि सहस्त्राभिषेक के शुभावसर पर उनके बाहुबलि वर्षायोग के समय पर ही वर्ष १६८१ में संग्रह करके लिखा था । इस ग्रंथ के माध्यम से गणधराचार्य महाराज ने वर्तमान में जो भी जैनागम में मिलावट द्वारा श्रागम प्रदूषण किया जा रहा है, उसको रोकने के लिए उनके प्रश्नों का, शंकाओं का आचार्यों के प्रमाण देकर बहुत ही सुलभ एवं सुन्दर ढंग से समाधान किया है । भोले-भाले स्वाध्याय प्रेमी मुमुक्षुओं को ग्रागम का सही ज्ञान कराने की अद्भुत चेष्टा की है । बर्तमान में एकान्तवादी, झूठ, अत्याचारी, पंथवादी, कूटनीतिवाले, राजनीति वाले, सुधारवादी, मायाबारी, ग्रात्म-प्रशंसक, धर्मघातक, कुणास्त्र प्रचारक, पथ भ्रष्ट, पद भ्रष्ट, एवं धर्मद्रोही लोग, आगम . दुति करने का प्रयास कर रहे हैं, उनके ऊपर निष्पक्षता से पुरजोर शब्दों मैं स्याद्वाद एवं अनेकता के माध्यम से अच्छा भावात किया है। सभी जगह पूर्वाचार्यो के शब्दों में उनकी गाथा एवं सूत्रों का प्रसारण देकर स्पष्टीकरण किया है। प्रस्तुत ग्रंथ में महाराज ने अपने स्वयं के कुछ भी विचार नहीं लिखे, यह प्रमुख विशेषता रही है । मैं डंके की चोट यह कह सकता हूँ वर्तमान में परम पूज्य श्री १०८ गणधराचार्य कुन्थुसागरजी महाराज जैसे प्रोजस्वी एवं निष्पक्ष सहस्त लेखक की परम आवश्यकता है, क्योंकि श्राप श्री किन्हीं धनवानो के, पंथ वादियों के धार्मिक, सामाजिक यादि संस्थानों के प्रभाव में आकर अपने प्रापको परतन्त्र बनाये हुए नहीं है । आप के संघ में लगभग ४० साधु विद्यमान हैं । वे सभी स्वतन्त्र हैं एवं सही प्रागम के प्रचार एवं प्रसार के
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लिए उन्होंने जो भी मार्ग अपनाया है, वह निश्चय ही प्रभावकारी हुया है, हो रहा है, और होगा, इसमें किसी प्रकार की अतिशयोक्ति नहीं है। सभी गुरु भक्त एवं समाज इस बात को जानता है। ...... श्री दिगम्बर जैन कुन्थु विजय ग्रंथमाला समिति जयपुर (राज.) से १३वें पुष्प के रूप में इस ग्रंथ का प्रकाशन हुआ है। यह बहुत ही प्रसन्नता की बात है । इस ग्रंथमाला से सभी ग्रंथों का प्रकाशन बहुत ही लाभकारी रहा है। इसके लिए. मैं ग्रंथमाला के प्रकाशन संयोजक महोदय, एवं ग्रंथ- . माला के सभी सहयोगी कार्यकर्ताओं को .. धन्यवाद देता हूँ कि जिन्होंने कितना कठिन परिश्रम करके जिनवाणी के प्रचार एवं प्रसार. में अपनी निःस्वार्थ सेवायें अर्पित कर रहे हैं। .
... मुझे आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि इस ग्रंथराज के .. माध्यम से धर्म प्रेमी बन्धु स्वाध्याय करके लाभ उठावेंगे एवं गुरुवर्य ..
गरगधराचार्य महाराज मिथ्यात्व तिमिर का नाश करने के लिए सूर्य से . तेजस्वी, प्रकाशमान, ज्योति के समान, हम सभी को प्राप्त हुए हैं, उनसे .
हम सभी लोग लाभ उठाते रहेंगे। ऐसे गुरुदेव के चरणों मैं में अल्पज्ञः कोटि - __. कोटि वार नमन करते हुए नमोस्तु अर्पित करता हूँ। . . ......
. .. प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप कुमार जैन . बी. कॉम. शास्त्री क्रुसम्बा (महाराष्ट्र) .
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परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती श्री १०८ प्राचार्य आदिसागरजी महाराज
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जीवन परिचय
[ले० परम पूज्य १०८ गणधराचार्य कुन्थुसागर जी महाराज के परम fron युवक सट श्री १०८ सुनि कुमुदनन्दिजी महाराज ] आदि सागराचार्य वर्य, गुरू पद महावीर कीर्ति बंदू त्रिकाल । सन्मति सिंधू को नमन कर वरण जीवन की जयमाल ||
परम पुज्य प्रातः स्मरणीय अध्यात्म योगी, चारित्र चक्रवर्ती, धर्म दिवाकर, जगदवंद्य, महर्षि योगीन्द्र चूडामणि द्वितीय सन्त श्रादिसागरजी का परिचय जितना हमने पढ़ा और सुना है उसे संक्षिप्त में लिख रहा हूँ ।
महाराष्ट्र प्रान्त में एक "अंकली" नाम का छोटा किन्तु मनोहर गांव है | वहां पर १००८ श्री श्रादिनाथ जिनालय है, जिसमें सतत् वर्षण होता रहता है। इसी गांव में जिन भक्त स्वधर्मनिष्ठ, सदाचारी, धर्मात्मा, श्री सिद्धगीडा पाटील अपनी ध. प. अक्काबाई के साथ निवास करते थे । शिवगौडा जिनका जन्म १८६६ में शुभ स्वप्न पूर्वक हुंग्रा जो हमारे धर्म नेता हुए। एक दिन बच्चों ने मिलकर खेल में इन्हें कमरे में बन्द कर दिया । कुछ क्षणों में मुक्कों से किवाड तोडकर हँसते हुए बाहर निकल गये । बड़े-बड़े कद्दू (काशीफल ) को हाथ की चपेट से फोड़कर कच्चा ही खा लेना, पचा लेना . साधारण बात श्री नाश्ते में एक सेर गुड व एक सेर मूंगफली पानसुपारी के समान थी। अपनी गृहस्थी में उपवासादिपूर्वक ही रहते थे ।
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अचानक एक दिन अधिक प्यास लगी। इन्होंने चने के पानी को छाछ . समझकर पी लिया। कुछ ही क्षगण बाद पेट से सर्प निकल भागा। यह
देखकर घर वाले. दंग रह गये । सं. १८०६ में नांदजी गांव में जिनप्पा. स्वामी के पास क्षुल्लक दीक्षा धारण की और प्रादि सागर नाम से ..... विख्यात हुए। उस समय मुनिमार्ग व्यवस्थित नहीं था, अतः तीन महिने बाद में जिनेन्द्र प्रभु की साक्षी में ऐलक हो गये। और तीन-तीन उपवास के बाद प्राहार करने लगे और ५ प्रकार के स्वाध्याय में .. तल्लीन हो गये । सं. १८१४ मंगसर शुक्ल र मुक नक्षत्र मंगलवार को दस बजे सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरि जी में श्री देशंभूषण, कुलभूषण भगवान
के सानिध्य में स्वयं (आत्मप्रबोध) बल से . निर्ग्रन्थ मुनि दीक्षा . वारा की । .. . . ...
. .... ... - मुनि दीक्षा धारण करने के बाद आप प्राचार्य पद से सुशोभित हुए। आपकी तपस्या बहुत अद्भुत एवं कठोर थी । आप सात-सात उपवास पर अाहार 'लते थे। और बाहार में भी एक ही वस्तु का आहार लेते थे। आपने समाधि से पूर्व अपना प्राचार्य पद मुनिः .. श्री १०८ महावीर कीति जी महाराज को प्रदान किया । आपकी समाधि संवत् १६६E में फाल्गुन कृष्णा तेरस को अवगांव (कुजवन) में हुई । आप अंकली गांव के रहने वाले थे, अतः आप परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती श्री १०८ प्राचार्य प्रादिसागरजी महाराज (अंकली कर) के नाम से प्रसिद्ध हुए।
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‘परम पूज्य श्री १०८ प्राचार्य महावीर कीतिजी महाराज
परमपूज्य श्री १०८ प्राचार्य महावीर कीति जी महाराज अपने गुरू के समान ही उच्च कोटि के महान् विद्वान् एवं तपस्वी सिंद्ध हुए। प्रापका जन्म फिरोजाबाद नगर में हुआ और आपके पिता का नाम रतनलाल व माता का नाम बूंदादेवी जी था । आपका नाम श्री महेन्द्रकुमार था । दिगम्बरीय दीक्षा धारण कर प्राचार्य पद से
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बिपित होकर आपते भारतवर्ष के नगर-नगर और ग्राम-ग्राम में वहार कर जिनधर्म का प्रचार किया और अनेक भव्यात्मानों को वैराग्य की अोर बढ़ने का सदोपदेश देकर दिगम्बरीय दीक्षायें प्रदान को । आज आप ही के परम शिष्यों में परम पूज्य श्री १०८ सन्मार्ग . दिवाकार निमित्तज्ञान शिरोमणि खण्डविद्या धुरन्धर आचार्य विमलसागरजी महाराज, महान् तपस्वी प. पू. श्री १०८ प्राचार्य सन्मति सागरजी महाराज, ...भी. रणधराचार्य कुन्थुसागरजी महाराज, प. पू. श्री १०८ प्राचार्य संभवसागरजी महाराज हमारे बीच विद्यमान है । इन सभी प्राचार्यों के द्वारा कितनी धर्म प्रभावना.. हो रही है और कितना लाभ भव्यात्माओं को पहुँच रहा है, यह शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। .. ...
परम पूज्य १०८ प्राचार्य सन्मति सागरजी महाराज :
. परंमपूज्य आचार्य महावीर की तिजी महाराज ने समाधि के पूर्व अपना प्राचार्य पद · . संघस्थ परम तपस्वी श्री १०८ मुनि ... - सन्मतिसागरजी महाराज को प्रदान किया। आप भी परम तपस्वी,
जानी, श्यानी प्राचार्य हैं । भारतवर्ष देशके नगर-नगर और गांव-: । । गांव में विहार कर भव्यजनों को धर्मामृत. पान करा रहे हैं । ...
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श्री कन्थ-विजय ग्रन्थमाला
[ रचयिता-बिहारीलाल मोदी शास्त्री.] - श्री कुन्थुविजय ग्रंथमाला ने अब तक, ग्रंथ प्रकाशित किये विशाल ।
द्वादश अनुपम पुष्पों से, ग्रन्थित कीनी उत्तम माल ।। साहित्य प्रकाशन के जग में, हुमा समुन्नत इसका भाल ।
अत्यल्प समय में इसने दिये विश्व को अनुपम लाल !! प्रथम पुष्प लघुविद्यानुवाद है, वरिणत यन्त्रतन्त्र अरु मन्त्र । . दुतिय चतुर्विशति तीर्थकर, विधी अनाहत मन्त्ररु यन्त्र ।। तजो मान करो ध्यान तोसरा, विधि सिखाता धरना ध्यान ! हुम्बज श्रममा सिद्धान्त पाठावलि, प्रातः पठन करे. कल्याण ।।२।। पुनर्मिलन में सती अंजना, अरु पवनञ्जय का आख्यान । प्रतिदिन पूजन . करते प्राणी, पूजा सीतलनाथ. विधान ।।
वर्षायोग स्मारिका जयपुर, · रहा अनोखा वर्षायोग । श्री सो शिर मालाम्य को पढ़कर, क्रम से मिटता भव का रोग ।।३।।
कथा रात्रि भोजन त्याग की, सुरभित करता नवमा फूल । .. दशम पुष्प को पढ़कर प्राणी, पा जाता है भव का कूल ।।. भैरव पद्मावती कल्प एकादश, तन्त्र मन्त्र सम्बन्धी ग्रन्थ । . सच्चा कवच कहानी सन्ग्रह, बतलाता है सचा. पंथ 11४1 • गोम्मट प्रश्नोत्तर चितामगि, तेरहवाँ यह ग्रंथ महान् । सार सैकड़ों ग्रंथों का गुम्फित कीना प्राचार्य सुजान ।। ... चारों - अनुयोगों का अनुपग, भरा हुआ है इसमें सार । इसका अध्ययन करके प्राणी, कर सकताः प्रातम उद्धार ।।५।। श्री शान्तिकुमार के संयोजन में मिली सफलता इसको प्राज। निष्ठा लगन और श्रम उनका, शीघ्र सफल करता सब काज ।।. ज्ञान ज्योति यह जले भरखा गिडत, मिथ्यातम का करै विनाश । . करें कामना लाल बिहारी, अखिल विश्व में करै प्रकाश ।।६।।
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Hama rapalo
प्रस्तावना
जैन धर्म निवृत्ति-प्रधान धर्म है। निवृत्ति की महत्ता प्रवृत्तियों के वातावरण में अधिक निखरती है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार परिसह के वातावरण में त्याग की. उज्ज्वलता प्रगट होती है। जैन धर्म के प्राव तीर्थकर भगवान् ऋषभदेव असि, मसि मादि लौकिक प्रवृत्तियों के स्वयं सूत्रधार थे, अपार राज्य वैभव के स्वामी थे, किन्तु उन्होंने वैराध्य धारमा कर त्याग व निवृत्ति का मार्ग अपनाया, और तप व साधना से परमात्मा पद प्राप्त किया। (मोह- .. नीय) कर्मावरण के हटने पर उनके स्वच्छ व निर्मल 'ज्ञान' के प्रकाश में समस्त लोकालोक प्रतिविम्बित हो उठा था। इस ज्ञानसूर्य . को किरणे 'दिव्य ध्वनि' के रूप में प्रस्फुटित हुई और जनता को उपदेश सुनने का सोभाग्य प्राप्त हुआ । अनेक भव्य जनों को प्रतिबोधित. होकर आत्मकल्याण करने का सुअवसर प्राप्त हुआ । जनता . को भवसागर से तिरने का मार्ग प्रशस्त हुप्रा, अतः वे प्रथम तीर्थंकर कहलाए। समस्त कर्मों का क्षय कर वे सिद्ध-बुद्ध, मुक्त हुए ।
. ऋषभदेव के अनन्तर कालक्रम से २३ तीर्थकर और हुए. जिनमें अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर थे। सभी प्रहन्तों व तीर्थकरों की तरह के भी जनता को भवसागर से मुक्ति का मार्ग दिखाकर स्वयं मुक्त हुए। पूर्व हीर्थकरों की तरह ही उनकी अर्थवागी को उनके निकटस्थ विशिष्ट प्रतिमाधारी गणधरों (गणेशों) ने शब्दरूप
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से ग्रथिन कर समस्त तात्त्विक विवेचना (तत्त्वार्थ) से परिपूर्ण सुव्यवस्थित शास्त्र भागम' का रूप प्रदान किया (प्रव. १/८.२, मूत्र प्रा.१, नियम ८, राज वा. ६/१३/२) ।
.... आगम, प्रवचन, जिनाज्ञा, जिनशासन; सिद्धान्त, श्रुत सूत्र ग्रादि शब्द एकार्थक हैं । परवर्ती प्राचार्यों ने भी पर कल्याण के उद्देश्य से उपदेश दिया (प्रत्र. ३/४८}; और. जैत शासन की ज्ञानधारा को अनवरत रुप से प्रवाहित किए रखा । इन प्राचार्यों मेंपुष्पदन्त, भूतवलि, गुणधर, कुन्दकुन्द; बट्टकेर, शिवकोटि, उमास्वामी, समन्तभद्र, पूज्यपाद, योगेन्दु, यतिवृषभ, अकलंक, जिनसेन, विद्यानन्दि, वीरसेन, गुणभद्र, अमृतः चन्द्र, सोमदेव, शुभचन्द्र स्वामी, कातिकोये, पयनन्दि नेमीचन्द्र बीरनन्दि आदि प्रमुख हैं। : ... ... ... .
.. तंटस्थ एवं प्रामाणिक पूर्वोक्त प्राचार्य-गुरुओं की परम्परा से प्राप्त समस्त साहित्य प्रमाण भूत माना जाता है (धवला पु. १३, पृ. ३८२, पुः १, पु. १६७-१९८) । प्राचार्य-परम्परा के माध्यम से . प्राप्त जिनवाणी का अध्ययन प्रत्येक जैन मुमुक्ष का कर्त्तव्य है, .. क्योंकि इसके अध्ययन द्वारा ही भव्य जीव मोक्ष मार्ग का पथिक होता है (सूत्र प्रा. २)। शास्त्ररुपी पालोक के बिना विशाल ज्ञानरुपी आँखें भी मोहान्धकार से व्याप्त कल्याणरूपी मार्ग को देख नहीं पाती. (अनगार-१/१५) जिनवाणी को समस्त दुःखों का क्षय करने वाली अमोघ औषधि माना गया है. (दर्शन प्रा. १७) । इसका अनुशीलन करने वाला अपने : संसार-चक्र का नाश करता है (सूत्र प्रा. ३) । जिनवाणी के माध्यम से जीव-अजीब आदि पदार्थों के स्वरूपादि का निश्चय तथा उनके परस्पर--भेद का यथार्थ बोध होता है, और फल- ..... स्वरुप मोह नष्ट होकर सम्बग्ज्ञान की प्राप्ति होती है (मोक्ष प्रा.४१, ...
३८, प्रव. १/८६ सम्यग्ज्ञान से हेय-उपादेय का ज्ञान होता है फलस्वरुप : .: एकाग्रता, शील सम्पन्नता व संयमवृत्ति के साथ निर्धारण का मार्ग .
प्रशस्त होता है । तस्यज्ञानी की प्रवृत्ति या अप्रवृत्ति-दोनों मोक्षगा-. . मिनी होती हैं (आत्मानु पृ. १८०) 1 तत्वज्ञान प्राप्ति का प्रमुख साधन . . . . 'स्वाध्याय' है, जिसे विशिष्ट तप बाहर गया है (अनगार ३/२३).!.. :
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स्वाध्याय का स्वरूप स्वाध्याय के स्वरूप के सम्बन्ध में विविध निरूपण प्राप्त होते हैं, जो इस प्रकार हैं--- ( 3 ) सु+-पान-अध्याय : स्वाध्याय । 'सु' यानी भली भांति (गुष्ठु)
'या' यानी मर्यादा के साथ, 'अध्ययन'-श्रुत का विशेषतः अनुशीलन 'स्वाध्याय' है । . निष्कर्षतः जिनेन्द्र-प्ररूपित शास्त्र का एकाग्र चित्त से अध्ययन-पढ़ना 'स्वाध्याय' हैं (तत्त्वानुशासन, ८०) । अध्ययन से तात्पर्य उन शास्त्रों के पठन-पाठन से है, जिनसे चित्त निर्मल होता है या जिससे तत्वबोध, संथम व मोक्ष की प्राप्ति होती है या जिसले । तत्त्वबोध, संयम व मोक्ष की प्राप्ति होती है (विशेषावश्यक
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(11) शास्त्रादि का स्व + अध्याय । यानी अपने लिए-अपनी . यात्मा के लिए-हितकारी अध्ययन करना 'स्वाध्याय है
(सर्वार्थ सिद्धि, १.२०) । HIस्व + अध्याय । यानो 'स्व' का प्रात्मा-का, अध्ययन (जिन-..
दास रिंग, दशदै. ८.८५) । प्रात्मा के प्राशय को पढ़ना, .
आत्मा के मुग्गों की खोज करना, उन्हें जीवन में उतारना, . . इस प्रकार प्रात्मा के स्वाभाविक गुणों की (मननादि .
द्वारा) प्रामिही वास्तविक स्वाध्याय है। (IV) सालस्य त्याग कर ज्ञान की प्राचावना को 'स्वाध्याय' कहते
हैं (सर्वार्थसिद्धि, ६.२०)।
यहाँ 'जान' पद से 'संच्छास्य', 'आराधना' पद से अध्ययनमनन आदि अभिप्रेत है; अतः भगवान् जिनेन्द्र द्वारा निरूपित जीवअजीवादि तत्त्वों के निरूपण करने वाले (बारह अंग, चौदह पूर्व) सन्छास्त्रों का मनन हीब्यवहार दृष्टि से--(मलावार, ५११) स्वाध्याय है। 'ज्ञान' पद से नात्मा भी अभिप्रेत होला है (प्रव. ... १.२७) । ऐसी स्थिति में आत्माराधना ही, परमार्थ दृष्टि से, . स्वाध्याय है। .
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जैन शास्त्रों में स्वाध्याय के पांच अंग बताए गए हैं । तत्त्वार्थसुव.. के अनुसार १. वाचना, २.. पृच्छना, ३. प्रति... पृच्छना (अनुप्रेक्षा), ४. अाम्नाय, ५.. धर्मोपदेश ये पांच अंग हैं .
(तत्यार्थस्त्र ६.२५) । व्याख्याप्रशस्ति (भगवतीसूत्र), मूलाचार आदि के अनुसार १: वाचना, २. पृच्छना, ३ परिवर्तना, ४. अनुप्रेक्षा, ५. धर्म कथा--ये ५. अंग है (व्याख्या प्रज्ञप्ति, २५.७.८०१) मूला- . चार, ३६३, उत्तराध्ययन, ३०.३४, प्रौपपा.. १६) । (१) वाचना---
निर्दोष ग्रन्थ तथा तत्प्रतिपादित अर्थ-इन दोनों के उपदेश का योग्य पात्र को प्रदान करना वाचना' है (सर्वार्थसिद्धि ६.२५) । गुरु शिष्य को मूत्रादि को 'वाचना' प्रदान करता है, भव्य जीव को मास्त्र पढ़ाता है, ग्रन्थ के अर्थ की प्ररूपणा करता है (धवला पु. ६,
पृ २५२, २६२, जै. सि. को.. ३.५३६), शिष्य उसका ग्रहण करता . ... . . . . है । वह शिष्य भी योग्य पात्रों को वाचना दे सकता है। सामान्यतः
सद्गुरु से सूत्रपाठ की शिक्षा लेकर शास्त्रों का वाचन, प्रात्मकल्याएं
हेतु निर्दोष ग्रन्थों को स्वयं पड़ना, दसरों को समझाने हेतु सुधानु.. योगी व्याख्यान करना या बाचन करना-ये सब कार्य 'वाचना' के .. अन्तर्गत हैं।
.. सूत्र-व्याख्यान के ६ भेद शास्त्रों में बताए गए हैं(१) संहिता (पद का अस्खलित, शुद्ध उच्चारण), (२) पद (वाक्य के प्रत्येक पदं का शुद्ध पृथक्-पृथक् उन्चारण) (३) पदार्थ (पद का अर्थ ); (४) पद-विग्रह, (५) पदच्छेद (चालना, शंका आदि उठाना) (६) प्रसिद्धि (उठाई गई शंकाओं का समुचित समाधान) (उदृत-सुत्तागमें [ भाग, पृ० ५८-५९) . ... सूत्रों का उच्चारणा इस तरह सांगोपांग व परिपूर्ण रूप से किया जाए कि अक्षरादि की स्खलना न हो, पदों को पृथक-पृथक कर पड़ा जाए, अपनी ओर से कोई अक्षर, पद यादि का न तो .. योग किया जाए, और न ही कमी की जाए, वर्गों का यथास्थान (उदात्तादिघोष-नियमानुरूप), सुस्पष्ट उच्चारण हो, प्रत्येक पद. :: अपनी माला में गूथे हुए फूल जैसा सुशोभित हो (अनुयोग द्वार सू० १३-१४, विशेषावश्यक भाष्य, ६५१, ८५.४-८५५.) ।
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दिगम्बर ग्रन्थों में वाचना के चार प्रकार इस प्रकार बताए गाए हैं.---(१) नन्दा (२) भद्रा (३) जया (४) सौम्या (धवला पु० ६, पु० २५२) ।
___ नन्दा--सम्यग्दर्शनों को पूर्व पक्ष के रूप में उपस्थापित कारा (जैन) मनमो सिद्धान्त रूप में उगस्थापित करने की वाचना 'नन्दा' है (धवला पु० ६, २५२) ! .
.. जया-पूर्वापर--विरोध-परिहार के बिना सिद्धान्त--अर्थों का कथन 'जया' वाचना है (उत्त० १.५८ नियुक्ति, शांतिरिवृत्ति ।
भद्रा- युक्तिपूर्वक समाधान कर पर्वापर-विरोध को हटाते हये समस्त पदार्थों की व्याख्या 'भद्रा वाचना' है। सूत्रार्थ का पूर्वापर--संगति के साथ अपने लिए ज्ञान से, तथा दूसरों के लिए वचनों से.. निर्गमना (निर्यापना=अर्थ-निरूपणा) वाचना-सम्पद कहो जाती है (उत्तराध्ययन १.५८ नियुक्ति शांतिसूरि वृत्ति । .
___ सौम्या-~-कहीं-कहीं स्खलन बृत्ति से, (थोड़ा-थोड़ा भाग छते हए) की जाने वाली याचना 'सौभ्या' है (उत्तराध्ययन .१.५८ नियुक्ति शांतिसूरि वृत्ति)।
. याचना की - स्थिति में शिष्य को मान, क्रोध, प्रमाद, ग्रालस्य आदि से रहितं होना चाहिए (उत्तरा ११.३) । (२) पृच्छना
संशय का उच्छेद करने या निश्चित बल (महत्त्व) को पुष्ट करने हेतु प्रश्न करना 'पृच्छना' है (सर्वार्थसिद्धि, ६.२५, रा. बार्तिक १.२५.२, अनगार धर्मामत, ७.८४, धवला पु.. १४ पृ. ६)। शास्त्रों के संदिग्ध प्रर्थ को किसी दूसरे से पूछना, सत्पथ की और ..... बढ़ने हेतुं मोक्षादिमार्ग का स्वरूप निश्चित करता, संशय-निवारणार्थ । प्रश्न या जिज्ञासा करना । पढ़ते समय या पढ़ने के बाद, शिक्षा के मन में जहाँ कोई शंका उठे ऐसी स्थिति में, अथवा कोई बात आगम में स्पष्ट न हो सकी हो, उसके सम्बन्ध में गुरुजनों से समाधान पाने . . . . . . का प्रयत्न करना 'पृच्छना' है. (धवला पुः ६. पृ. २६२, धवला पु. १४, पृ. ६)। ये प्रश्न एक प्रकार से विषय की सुस्पष्टता के लिए प्रारम्भिक कदम है। इसीलिए शास्त्रों में प्राचार्यादि बहुश्रुत के
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समक्ष अर्थ - विनिश्चय हेतु जिज्ञासा रखने की प्रेरणा दी गई है (ला.पु. पू. २०५१
(३) परिवर्तन ( या श्राम्नाय )
गृहीत ज्ञान को स्थायी बनाने हेतु किसी सूत्र का या पठित शास्त्र का, श्राचारविद व्रती द्वारा स्वयं किया गया बार-बार शुद्ध (पाट-दोषों से रहित ) पाठ 'परिवर्तना' है ( तत्त्वार्थं ६.२५ श्रुत• सागरीय वृत्ति) । परिचित श्रुत का मर्म समझने तथा स्मृति में पूर्णता स्थिर करने हेतु यह एक प्रकार का परिशीलन या पर्यालोचन भी है (बला पु. ८, पृ० २६२ ) । पटित ग्रन्थ का शुद्ध-शुद्ध उच्चारा करते हुए बार-बार पाठ से तत्सम्बद्ध ग्रंथ मन में दृढता से बैठता जाता है ।
(४) अनुप्रक्षा
सन्देह की स्थिति में विगत शास्त्रों में प्रतिपादित पदार्थ तात्त्विक दृष्टि से, पुनः पुनः (सर्वार्थसिद्धि ९२५) तत्त्वा ९ ), मन की स्थिरता पूर्ण रूप से हृदयंगत
'का, सुते हुए अर्थ का श्रतानुसार मन में खास गम्भीर चिन्तन-मनन ६. २५ भाप्यानुसारी टीका; घयला पु. १४, पृ. हेतु वस्तु स्वभाव एवं पदार्थ स्वरूप का या श्रुतज्ञान का परिशीलन पर्यालोचन 'अनुक्षा'
(६ धवला पु. ६,
पू. २६२ तत्त्वा श्रुतसागरीय वृत्ति ६.२५ तत्त्वार्थ राजवार्तिक ६.२५.३६ चारित्रसार, पृ. ६७० श्रनुयोगद्वार हरिभद्रीय वृत्ति ७, पृ० १० तस्वार्थसार ७२० श्राचारसार, ४.६१; धर्मशर्मास्वोपजवृत्ति, ३.५४) (५) धर्मोपदेश
सर्वज्ञप्रणीत ग्रहिसादि लक्षण रूप धर्म का कथन ( अनुयोग ) धर्मकथा या थर्मोपदेश है ( सर्वार्थसिद्धि २.२५) । इसके अन्तर्गत स श्लाका पुरुषों का चरित्र पढ़ना चित्त को विषयों से रोक कर शान्तिदायी पाठों का अभ्यास तथा उन्हें कंठस्थ करनाचिन्तन-मनन के बाद तत्त्व रहस्य जब स्वयं को उपलब्ध हो जाए तव विचारामृत को जन-जन के समक्ष प्रस्तुत करना, दूसरों को सत्य के अन्वेषण हेतु मार्ग बताना, तथा सन्देह-निवृत्ति हेतु पदार्थ का स्वरूप
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वताना, न शादि धर्म की व्याख्या करना, तथा श्रोतानों मैं रत्नत्रय . को प्राप्ति हेतु प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करने के लिए स्वतन्त्र रूप से श्रामिक उपदेशादि द्वारा बढ़ाना आदि परिगरिंगत हैं ।
प्रमुखतः दिगम्बर मतानुसार प्रथभानुयोग रूप, श्वेताम्बरमतानुसार धर्मकथानुयोग रूप शास्त्र धर्मकथा या धर्मपिदेश' में परिगणित हैं (महापुराण १.१२०) ।
धर्मोपदेश, अर्थोपदेश, व्याख्यान, अनुयोग-वर्णन--ये सब पर्यायवाची शब्द हैं तत्त्वा ६.२५ भाप्य टीका । ...... स्वाध्याय को महसा
. . शास्त्रों में श्रावक (जैन) के ६ आवश्यक दैनिक क्रम वताए गए हैं, उनमें स्वाध्याय (तस्वाभ्यास आदि) की भी परिगणना की गयी है (पचनन्दि पंच ६.७; १.१३; चारित्रसार पृ. ४३.; जै. सि. को. ४.५१ । ..
साधु के लिए जो यावश्यक ६ क्रियाए निर्धारित है, उनमें स्वाध्याय भी एक है । केवल चार घड़ी सोने के अलावा मुनि अपना समय अावश्यक धर्मक्रियायों में ही लगाता है। उनमें भी स्वाध्याय में मुनि, को आठ प्रहर के पूरे दिन-रात में, चार प्रहर का समय (यानी प्राधा समय व्यतीत करना होता है। प्रथम प्रहर में सूत्र स्वाध्याय, द्वितीय प्रहर में (भूत्रार्थ-चिन्तन) ध्यान, तृतीय में भिक्षाचर्या, चतुर्थ में पुनः स्वाध्याय करने की मुनिचर्या शास्त्रों में निहित है (उत्तरा- ध्ययन मुत्र. २६.११ १२, २६.१७-१८, २६.४३) । इस विधि--.. विधान में युटि पाने पर 'प्रतिक्रमण' में उक्त भूल का प्रायश्चित्त . करता है (सामायिक अावश्यक प्रतिक्रमण. सूत्र; आवश्यक सूत्र; सावयावस्मय सुत्त-प्रतिक्रमण सूत्र-ज्ञानातिचार पाठ) : ... प्रस्तुत ग्रन्थ
... आज का युग व्यस्ततानों से भरा हैं, ऐसी स्थिति में विशालकाय व अनेक जैन आगमों का स्वाध्याय कर पाना कठिन है। . बड़ी प्रसन्नता की बात है कि स्वाध्यायं तपोमूर्ति परम पूज्य १०६ गरणधराचार्य कुन्थुनागर जी महाराज ने अपने जीवन के स्वाध्याय
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का सार प्रस्तुत ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया है, जिससे बहुत कम समय में समस्त जिनवाणी का संक्षिप्त सार ज्ञात हो सकता है। 'गोम्मट प्रश्नोत्तर चिन्तामणि' नामक इस ग्रन्थ में अनेक महत्त्वपूर्ण. ग्रन्थों का सार समाहित हुअा है । इन ग्रन्थों में 'गोम्भटसार'
त्रिलोकसार', 'मूलाचार', 'ज्ञानार्णव', 'समयसार', प्रवचनसार', • 'नियमसार', 'रत्नकरंड श्रावकाचार', 'तत्त्वार्थसूत्र', 'अाचारसार', 'राजवार्तिक', 'परमात्मप्रकाश', 'पुरुषार्थसिद्धियुपाय', 'मोक्षमार्गप्रकाशक' आदि महत्वपूर्ण हैं ।
- इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ का प्रकाशन. श्री दिगम्बर जैन कुन्थु ..विजय ग्रन्थ माला समिति की ओर से १३३. पुरण के रूप में किया ....... - जा रहा है । यह ग्रन्थ श्रावको एवं साधुवों दोनों के लिए ही लाभ
दायक बन गया है। ........ ग्रन्थ के मुद्रण व प्रकाशन व्यवस्था के प्रमुख स्तम्भ ग्रन्थमाला.
के प्रकाशन संयोजक :श्री शांतिकुमारजी गंगवाल को अपना धन्यवाद ज्ञापित करता है। इस ग्रन्थमाला के मुख्य प्रेरणा स्तम्भ परम पूज्य श्री १०८ गए धराचार्य स्याद्वादकेशरी, श्रमरणरत्न, वात्सल्य रत्नाकर कुन्थुनागर जी महाराज एवं श्री १०५ गणिनी प्रायिका सिद्धान्त विशारद, सम्यग्ज्ञान शिरोमणि विदुपीरत्न जिनधर्म प्रचारिका विजयामती माताजी के पावन चरणों में मेरा शत शत 'नमोस्तु अपित करता हूँ।
डॉ० दामोदर शास्त्री प्राचार्य (राडर) एवं अध्यक्ष :
(जैन दर्शन विभाग) :. श्री.ला. या शास्त्री केन्द्रिय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली
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... भारत वर्ष में बिहार प्रांत की भूमि सर्व श्रेष्ठ पावन पवित्र भूमि है, क्योंकि यहां पर हमारे २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने जन्म लिया और २२ तीर्थकर अनेक भव्यात्माओं के साथ मोक्ष पधारें। इसी प्रांत में स्थित प्रारा नगर में महान तपोनिधि स्याद्वाद केशरी, वात्सल्य रत्नाकर, श्रमरा रत्न श्री १०८ गगांधराचार्य कुंथसागरजी महाराज व उनके विशाल संघ सानिध्य में यह पंच कल्याणक महीं. त्सव विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों के साथ सम्पन्न हो रहा है। . - मुझे हार्दिक प्रसन्नता है कि ऐसे शुभावसर पर "श्री दि. जै. कुंथु विजय ग्रन्थमाला समिति" जयपुर (राज.) द्वारा १३वे पुष्प के रूप में प्रकाशित "श्री गोम्मट प्रश्नोत्तर चितामरिण" ग्रंथ का विमोचन परम पूज्य श्री १०८ गभराचार्य कुंथुसागरजी महाराज के करकमलों द्वारा करवाने का परम सौभाग्य प्राप्त हो रहा है।... ... श्री गोम्मट प्रश्नोत्तर चितामणि ग्रंथ एक गागर में सागर के समान ग्रंथराज है । इस. अन्य राज में लगभग. ४० मूलभूत ग्रन्थों को लक्ष्य में रखकर २,१७८ श्लोकों में संग्रह किया गया है। इसका संग्रह परम पूज्य श्री १०८ गणधराचार्य कथसागरजी महाराज ने अपने बाहुबलि वर्षायोग के समय · वहुत ही कठिन परिश्रम से वर्ष १९८१ में किया था।
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ग्रंथ में प्रत्येक विषय को समझाने के लिये कितना कठिन । परिश्रम महाराज ने किया है. यह तो आप स्वयं ही ग्रंथ को पढ़कर . के जानकारी प्राप्त कर लेगे। मैं तो मात्र इतना ही बता सकता हूं : कि इस एक ही ग्रंथ के स्वाध्याय करने से धर्म प्रेमी बंधुओं को अनेकों ग्रंथों का स्वाध्याय हो जावेगा । जिससे सभी ग्रंथों के विषयों की हानकारी प्रष्ट हो जोगी ! इस प्रकार यह ग्रंथ "ग्रंथरत्न". के . रूप में सिद्ध होगा। .. परम पूज्य श्री १०८ गावराचार्य महाराज प्रार्ष परम्परा के . दृढ़ स्तम्भ हैं। समता, वात्सल्य, निम्रन्थता, आपके विशेष गुण हैं, जो भी आपके एक बार दर्शन प्राप्त कर लेता है, वह अपने आपको धन्य भानता है। .. ... स्वकल्याण के साथ-साथ अापके भाव हमेंशा पर कल्याण के भी बने रहते हैं । जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रापका विशाल संघ हैं । आपने अनेकों दीक्षायें दी हैं। वर्तमान में आपके संव में लगभग ३१ साधु हैं। जिनमें आप.ही के दीक्षित मुनियों की संख्या ही २२ है । जो भारत वर्ष में विद्यमान किसी भी श्रमगा संघ में नहीं है । यह हमारे लिए बहुत ही गौरव व प्रसन्नता की बात है कि ऐसा विशाल संथ हमारे मध्य विद्यमान है। .
परम पूज्य श्री १०८ प्राचार्य रत्न धर्म सागरजी महाराज के प्रादेशानुसार आपने देश के नगर-नगर और गाँव-गाँव में विहार कर सोनगढ़ साहित्य का बहिष्कार करने व जिन मन्दिरों से उसं साहित्य को हटाने के लिए पुर-जोर अभियान चलाया। जिसके फल स्वरूप आपने कितने उपसर्ग सहन किये ? कितने प्राणघातक हमले प्राप पर हुए ? लेकिन धर्म की रक्षा के लिए आपने-अपने प्राणों की भी तनिक चिन्ता नहीं की और जो कार्य इस दिशा में गरगधराचार्य महाराज ने किया है, उस पर हम सभी को गौरव हैं। आप सदैव ही.. निडर होकर के पूर्वाचार्यों द्वारा लिखित ग्रंथों का ही स्वाध्याय करने
की प्रेरणा देते रहे हैं। और इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु आपने इस ..विशाल ग्रंथ "गोम्मट प्रश्नोत्तर चितामरिंग" का संकलन कर प्रकाशन
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करवाया है । इसके अलावा भी प्रापने कई ग्रंथ लिखे हैं। जो ग्रंथ . । अन्य भाषाओं में थे; उनकी टीकायें भी की, और उन ग्रंथों का प्रकाशन भी हुना, जिनसे अनेक लोग स्वाध्याय करके लाभ प्राप्त . कर रहे हैं।
इस प्रकार गरगधराचार्य महाराज के गुणों के बारे में जितना लिखा जावे उतना ही कम है । मात्र मैं तो इतना कह सकता हूँ कि .. |
आज के युग में परम पूज्य श्री १०८ गणधराचार्य महाराज पार्ष परम्परा के दृढ़ स्तम्भ होने के साथ साथ त्याग व तपस्या की साक्षात् . मुर्ति हैं। ..
. : - गंगाधराचार्य महाराज ने जितने कठिन परिश्रम से इस ग्रंथ का संग्रह किया था, उतना ही इसको प्रकाशन करने का कार्य भी . बहुत कठिन था। क्योंकि ग्रंथ प्रकाशन का कार्य बहुत मुश्किल होता है, कितनी ही बाँधायें इसमें पाती हैं. यह तो करने वाले व कराने वाले ही जानते हैं, लेकिन गुरु आशीर्वाद से सब कार्य आसान हो जाते हैं, जिनको दृढ़ श्रद्धान होता है। पूज्य आचार्यों ब गराधराचार्य महाराज के शुभाशीर्वाद पर दृढ़ श्रदान करके हमने ग्रंथ का प्रकाशान का कार्य प्रारम्भ करवाया और अनेकों बाँधायें आने के बावजूद भी हमने इस ग्रंथ को समय पर प्रकाशन करवाने में पूर्ण सफलता प्राप्त की है। - इस ग्रंथ के प्रकाशन में कलकत्ता दि. जैन समाज एवं अन्य महानुभावों का गुप्त सहयोग हुया है। वास्तव में उन सभी दानवीरों ने शानदान के महत्त्व को समझकर पूर्ण लाभ प्राप्त किया है । ग्रंथमाला के लिए यह बहुत ही गौरव ब प्रसन्नता की बात है कि इतने विशाल ग्रंथ का प्रकाशन इस प्रकार गुप्तदान के सहयोग से करा सकी है। ग्रंथमाला की ओर से मैं उन सभी दातारों का बहुत-बहुत प्राभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद देता हूँ और पाशा करता हूँ कि भविष्य में भी उनका सहयोग इसी प्रकार से मिलता रहेगा।'
परम पूज्य श्री १०८ प्राचार्य रत्न विमलसागर जी महाराज के शिष्य पूज्य श्री १०५ क्षुल्लक चैत्यसागरजी महाराज का इस ग्रंथ !
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के प्रकाशन कार्य को सम्पन्न करवाने में बहुत सह्योग रहा है । क्षुल्लक महाराज इस समय गगाधराचार्य महाराज के संघ के साथ ही वर्षायोग कर रहे हैं। प्राशा है आपका सहयोग, मार्ग दर्शन इस ग्रंथमाला को ग्रंथ प्रकाशन कार्यों में सदैव प्राप्त होता रहेगा। .
कलकत्ता निवासी परम गुरु भक्त श्रीमान् एस. एल. बगड़ा साहब का मैं बहुत-बहुत अाभारी हूँ कि उन्होंने भो समय-समय पर हमें मार्ग दर्शन देकर प्रकाशन कार्यों को सुचारू रूप से सम्पन्न करवाने में अपना महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया है।
ग्रंथमाला के प्रकाशन कार्यों में सभी सहयोगी कार्यकर्ताओं का बहत-बहत अाभारी है कि आप सभी ने समय पर कार्य पूरा करवाने में मुझे सहयोग प्रदान किया है। श्री प्रदीपकुमार गंगवाल . में गणधराचार्य कथसागरजी महाराज के शुभाशीर्वाद से इस कार्य में बहुत ही परिश्रम किया है। अन्य सहयोगी गगा सर्व श्री मोती . लालजी हाड़ा, श्री लिखमीचन्द जी बक्षी, श्री लल्लूलाल जी गोधा, श्री रविकुमार गंगवाल, · जैन संगीत कोकिला रानी बहिन श्रीमति कनकप्रभाजी हाड़ा, श्रीमति मेमदेवी गंगवाल, ब. वहिन चन्द्ररेखाजी
आदि का भी विशेष सहयोग रहा है। ग्रंथमाला समिति द्वारा प्रकाशन कार्य को बहुत ही सावधानी पूर्वक देखा गया है, फिर भी इतने विशाल कार्य में त्रुटियों का रहना स्वाभाविक है। प्रकाशन सामग्री मेरे सामान्य ज्ञान की परिधि के बाहर हैं। मैंने तो मात्र परम पूज्य श्री १०.८ गगाधराचार्य ऋथुसागरजी महाराज की प्राज्ञा को शिरो धार्य करके यह कार्य किया है । अतः साधुवर्ग, विद्वतजन, व अन्य पाठकों से निवेदन है कि ब्रुटियों के लिए क्षमा करें।
अन्त में पंचकल्याणक महोत्सव के पावन पवित्र शुभावसर पर परम पूज्य श्री १०८ गंगधराचार्य कुंथुसागरजी महाराज को विबार नमोस्तु अर्पित कर यह ग्रंथराज उनके करकमलों में भेंट कर प्रार्थना करता हूँ कि वह इस महत्वपूर्ण ग्रंथ का विमोचन करने की कृपा करें।
गणधराचार्य महाराज के चरणकमलों का
परम गुरु भक्त . संगीताचार्य प्रकागान संयोजक
शान्तिकुमार गंगवाल . . . . . . . . (बी. कॉम.)
जयपुर (राजस्थान)
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जिनवाणी का माहात्म्य
जिनवाणी का एकाग्रचित्त होकर सेवन करने का फल श्रात्मा की उन्नति करना है । यह उन्नति तभी सम्भव है जबकि ससाहित्य को
ढ़कर धर्म के मर्म को समझने की जिसमें जिज्ञासा या ग्राकांक्षा हो। सम्यग्ज्ञान के महत्व को जिन्होंने समझा है, उन्होंने स्वाध्याय . को अपना कर ससाहित्यों का अध्ययन किया है । वह अपनी आत्मा . के जिन स्वभाव में रत रहते हैं । ज्ञानासंना एक तपश्चर्या हूँ ।
अतः कहा गया है : "स्वाध्याय परम तपः" अर्थात् स्वाध्याय ही परम तप है । क्योंकि स्वाध्याय के बिना कर्मों की निर्जरा नहीं हो सकती है। ज्ञान के द्वारा ही प्रत्येक जीव अमृतपान कर सकता है । जिनवाणी का रसास्वादन शान्ति श्रीर सुख को प्रदान करने वाला है जैसा सुख जिनवाणी के अध्ययन करने से होता है, वैसा सुख अन्य किसी वस्तु के सेवन करने से प्राप्त नहीं होता है।
ज्ञान की महिमा को निम्न पंक्तियों द्वारा भी जाना जा सकता
ज्ञान समान न ग्राम जगत में सुख को काराः । यह परमामृत जन्म जरामृत रोग निवारण |
यतः पूर्वाचार्यों द्वारा लिखित सद्साहित्य को प्राप्त कर जिनवाणी का रसास्वादन कर शान्ति च मुख को प्राप्त करते हुए मोक्ष पथ की ओर बढ़ने का प्रयत्न करें ।
प्रकाशन संयोजक
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* भजन *
कुंथु सागर, गुरुवर हमारे, हमको दर्शन दे रहियो । मन मन्दिर में आ जइयो || टेक || रेवाचन्द के राज दुलारे, सोहनी देवी के प्रारण पियारे । हमको दर्शन दे रहियो, मन मन्दिर में या जइयों ॥१॥ बीस वर्ष में दीक्षा धारी छोड़ी हैं धन दौलत सारी शरण हमें स्वामी ले रहियो, मन मन्दिर में श्रा जइयो ॥ २ ॥ भेष दिगम्वर तुमने बारा, सकल भेद विज्ञान संवारा । भेद ज्ञान दरशा जइयो मन मन्दिर में आ जइयो || ३ ||
मंडल को है शरण तिहारी, पूरी करना आश हमारी । मोक्षमार्ग बतला जइयो, मन मन्दिर में श्राजइयो ||४||
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संकलनकर्ता शान्तिकुमार गंगवाल
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श्री दिगम्बर जैन कुन्थु-विजय ग्रंथमाला समिति : एक परिचय (स्थापना एवं किये गये प्रकाशन संबंधी संक्षिप्त जानकारी)
-स्थापनाश्री दिगम्बर जैन कुन्थ-विजय ग्रन्थमाला समिति जयपुर (राजस्थान) की स्थापना परम पूज्य श्री १०८ गणधराचार्य कुन्थु सागरजी महाराज व श्री १०५ गणिनी प्रायिका रत्न विजयामती माताजी के नाम से वर्ष १९८१ में की गई थी। लधुविद्यानुवाद
सर्वप्रथम इस ग्रन्थमाला से पहले पुष्प के रूप में लघुविद्यानुवाद(यन्त्र, मन्त्र, नन्न, विद्या का एक मात्र संदर्भ ग्रन्थ) का प्रकाशन करवाकर इसका विमोचन .. श्री बाहुबलि सहस्त्राभिषेक के शुभावसर पर चामुण्डराय मण्डप में दिनांक २४-२-८१ को परमपूज्य सन्मार्ग दिवाकर निमित्त ज्ञान शिरोमणि श्री १०८ प्राचार्य रत्न विमल सागरजी महाराज के कर कमलों द्वारा करवाया गया था। .
." इस समारोह में देश के विभिन्न प्रान्तों से पधारे हुये लाखों नरनारियों के अलावा काफी संख्या में मंच पर दिगम्बर जैनाचार्य मुनिगण वं अन्य साधुवर्ग उपस्थित थे समाज के गणमान्य व्यक्तियों में सर्वश्री भागचन्दजी सोनी, साह श्रेयांस प्रसादजी जैन, श्री निर्मल कुमारजी सेठी, श्री त्रिलोकचन्दजी कोठयारी, : श्री पूनमचन्दजी गंगवाल (झरिया वाले) आदि उपस्थित थे । समारोह की अध्यक्षता श्री पन्नालालजी सेठी (डीमापुर) वालों ने की थी। समारोह में मूडबद्री व कोल्हापुर के भट्टारक महास्वामी जी भी उपस्थित थे। श्री चतुर्विशति तीर्थकर अनाहत यंत्र मंत्र विधि----
· ग्रन्थमाला समिति ने द्वितीय पुष्प "श्री चतुर्विणति तीर्थकर अनाहत" (यन्त्रमन्त्र विधि पुस्तक) कन्नड से हिन्दी में अनुवादित करवाकर इसका प्रकाशन दिनांक
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६-५-८२ को श्री पार्श्वनाथ चलगिरि अतिशय क्षेत्र जयपुर (राजस्थान) में न्यायोजित ...
पंचकल्याणक महोत्सव के शुभावसर पर भारत गौरव श्री १०८ प्राचार्यरत्न देश... भूषणजी महाराज के करकमलों द्वारा विमोचन करवाया गया। इस समारोह में भी , . देश के विभिन्न प्रान्तों से गाये दुये काफी संख्या में लोगों ने भाग लिया और समारोह बहुत ही सुन्दर रहा। समारोह की अध्यक्षता श्री सुरेशचन्दजी जैन दिल्ली वालों .. ने की। तजो मान करो ध्यान
भारत गौरव प्राचार्यरत्न श्री १०८ देशभूषरणजी महाराज का चातुर्मास । वर्ष १९८२ में जयपुर में हश्रा. और इसी वर्ष दशलक्षण पर्व के · शुभावसर पर समिति ने अपने तृतीय पुष्प "तजो मान करो ध्यान" का प्रकाशन करवाकर प्राचार्य श्री के ही करकमलों द्वारा दिनांक २६-८-८२ को महावीर पार्क जयपुर (राजस्थान) में हजारों नर-नारियों के बीच इस पुस्तक का विमोचन करवाया । यह समारोह भी बहुत ही सुन्दर था । . हुम्बुज श्रमण सिद्धांत पाठावलि---
ग्रन्थमाला समिति ने चतुर्थ पुष्प "हुम्बुज श्रमण सिद्धान्त पाठावलि" ग्रन्थ का प्रकाशन करवाकर इसका विमोचन परमपूज्य श्री १०८ गणधराचार्य कुन्थुसागरजी : महाराज के हासन (कर्नाटक) चातुर्मास में आयोजित इन्द्रध्वज विधान के विर्सजन
के शुभावसर पर दिनांक २-१२-८२ को हजारों जनसमुदाय के बीच बड़ी धूमधाम से इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रन्थ राज का विमोचन करवाया । इस समारोह में मूडबद्री व जैनबद्री के भट्टारक महास्वामीजी भी उपस्थित थे ।
हुम्बुज श्रमग सिद्धान्त पाठावलि एक महत्वपूर्ण ग्रन्थरत्न है। यह पत्थ लगभग ७५ ग्रन्थों का. १००० पृष्ठों का गुटका है। इसमें साधुनों के पाठ करने के सभी आवश्यक स्तोत्रों का संकलन कर प्रकाशन करवाया है । इस ग्रंथ के प्रकाशन से साधुनों को अनेक ग्रन्थ साथ में नहीं रखने पड़ेंगे। साधु संघ के विहार के समय अनेक ग्रन्थों को मार्ग में ले जाने में जो दिक्कत होती थी, वो अब नहीं होगी और साथ ही जिनवाणी का भी अविनय नहीं होगा । मात्र एक ही ग्र'थराज (हुम्बुज श्रमण
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ग्रंथमाला समिति ने पंचम पुष्प. "पुनर्मिलन" (अंजना का चरित्र) पुस्तक ... का प्रकाशन करवाकर श्री पार्श्वनाथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव (श्री. दिगम्बर । जन प्रादर्श महिला विद्यालय श्री महावीरजी अतिशय क्षेत्र) के जन्म कल्याणक के . भावसर पर दिनांक १२-२-८४ को थी १०८ प्राचार्य सन्मतिसागरजी महाराज अजमेर) के करकमलों द्वारा हजारों की संख्या में उपस्थित जनसमुदाय के बीच करवाया। समारोह में साधु संघ के अलावा श्रीमान निर्मलकुमारजी जैन (सेठी), . श्री माणकचन्दजी पालीवाल, श्री मदनलाल जी चांदवाड, श्री त्रिलोकचन्दजी गोलमारी, श्री रामचन्दनी पाड़या आदि श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा .. के पदाधिकारी उपस्थित थे । समारोह में स्व० अादरणीय पण्डित साहब श्री बाबूलालजी जमादार, श्री भरतकुमारजी काला, श्री काका हाथरसी आदि महानुभावों ने भी भाग लिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री माणकचन्दजी पालीवाल ने की। इस प्रकार समिति के द्वारा पंचम पुष्प 'पुनर्मिलन' पुस्तक का विमोचन भी बहुत ही सुन्दर
श्री शीतलनाथ पूजाविधान
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ग्रन्थमाला समिति ने षष्ठम पुष्प "श्री शीतलनाथ पूजा विधान" कन्नड से संस्कृत भाषा में अनुवादित करवाकर अलवर (राजस्थान) में प्रायोजित पंचकल्याणक. र में जन्म कल्याणक के शुभावसर पर श्री १०८ प्राचार्य सन्मति सागरजी महाराज के
करकमलों द्वारा ५-३.८४ को बड़ी धूमधाम से इसका विमोचन करवाया श्री शांति- . विधान के समान ही यह शीतलनाथ विधान है। इस विधान की पुस्तक के प्रकाशन
से उत्तर भारत के लोग भी अब इससे लाभ उठा सके, जो कि कन्नड भाषा नहीं तक जानते हैं . .
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वर्षायोग स्मारिका
श्री १०८ प्राचार्य सन्मतिसागरजी महाराज (अजमेर) ने वर्ष १९८४ का चातुर्मास जयपुर में किया । ग्रन्थमाला समिति ने. इस गुभावसर पर एक बहुत ही सुन्दर बायोग स्मारिका का प्रकाशन करवाकर बुलियन विल्डिंग, जयपुर (राजस्थान) में विशाल जन-समुदाय के बीच दिनांक २८-१०-८४ को श्री १०८ प्राचार्य सन्मति सागरजी महाराज के करकमलों द्वारा विमोचन करवाया। इस स्मारिका में वर्षायोग : में आयोजित कार्यक्रमों के चित्रों की झलक प्रस्तुत की गई है और अलग-अलग विषयों पर ही ज्ञानोपयोगी साधुओं द्वारा लिखित लेख प्रकाशित किये गये हैं। समारोह की र अध्यक्षता श्रीमान् ज्ञानचन्दजी जैन (जयपुर) ने की थी। सम्मेदशिखर माहात्म्यम
... परम पूज्य श्री १०८ प्राचार्यरत्न धर्मसागरजी महाराज ने विशाल संघ सहित अपना १९८५ का वर्षायोग श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र लगायां (राजस्थान) में किया। समिति ने इस अवसर पर अष्टमः पुष्प के रूप में “सम्मेदशिखर माहात्म्यम" ग्रन्थ का प्रकाशन करवाकर प्राचार्य श्री के करकमलों द्वारा दिनांक १४-७-८५. को विशाल जन-समुदाय के बीच विमोचन किया ।
.: श्री सम्मेदशिखर माहात्म्यम. ग्रन्थ एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है । श्री सम्मेदशिखर जी के महत्व पर प्रकाश डालने वाला इस प्रकार के ग्रन्ध का प्रकाशन अाज तक नहीं हुआ है। इस ग्रन्थ में २४ तीर्थंकरों के चित्र, प्रत्येक कूट का चित्र, अर्थ व उसका. फल प्रकाशित किया गया है 1 संसार में सम्मेदशिखरजी सिद्धक्षेत्र जैसा कोई क्षेत्र नहीं है । क्योंकि यह तीर्थराज अनादिकाल का है और इस सिद्धक्षेत्र से हमारे २४ तीर्शकरों में से २० तीर्थकर मोक्ष पधारें है और उनके साथ-साथ असंख्यात्त मुनिराज मोक्ष पधारे हैं । इसलिये इस क्षेत्र की कगा-कण पूजनीय व बंदनीय है । इस क्षेत्र की. वंदना
करने से मनुष्य के जन्म-जन्म. के पापों का क्षय हो जाता है और उसके लिए मोक्षमार्ग .. ग्रासान हो जाता है तथा उसे नरक व पशुगति में जन्म नहीं लेना पड़ता . और वह ४६ भव में निश्चय ही मोक्ष की प्राप्ति करता है । कहा भी है. :
भाव सहित वंदे जो कोई। ताहि नरक पशुगति नहीं होई ।।
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इस प्रकार इस ग्रन्थ के प्रकाशित होने से अनेक भव्यात्मानों ने इस ग्रन्थ को प्रकार सम्मेद शिखरजी सिद्धक्षेत्र की यात्रा कर धर्मलाभ प्राप्त किया है और कर
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रात्रिभोजन त्याग
. : परमपूज्य श्री १०८ प्राचार्यरत्न निमित्तज्ञान शिरोमरिण विमलसागरजी महाराज विशाल संघ सहित राणाजी की नसियां खानियां जयपुर (राजस्थान) में वर्षाप्रयोग करने हेतु दिनांक ३-७-८७ को पधारे । ग्रन्थमाला समिति ने दिनांक ५-७-८७ को
ही अपना नवम् पुष्प रात्रिभोजन त्याग कथा-- पुस्तक का प्रकाशन करवाकर इसका विमोचन आचार्य श्री के करकमलों से करवाया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री भारतवर्षीय . दिगम्बर जैन महासभा के महामंत्री श्री त्रिलोकचन्दजी कोठयारी ने की। मुख्य . अतिथी श्री पूनम चन्दजी गंगवाल (झरिया वाले) व श्री सोहनलालजी सेठी ने की । . . . केशलुञ्चन क्या और क्यों ?
परमपूज्य श्री १०८ प्राचार्य विमलसागरजी महाराज के जयपुर (राजस्थान) में वर्षायोग के समय. प्राचार्य श्री की प्रारति, जिनवाणी स्तुति, वर्षायोग करने वाले माधुनों की सूची का प्लास्टिक कवरयुक्त काई प्रकाशित करबाकर निःशुल्क वितरण किये गये । प्राचार्य श्री, उपाध्याय श्री, संघस्थ साधुनों के केशलुचन समारोह के अवसर पर एक लघु पुस्तिका केशलुचन क्या और क्यों ? का प्रकाशन करवाकर निःशुल्क वितरण किया गया। . । जन्म जयन्ति पर्व क्यो ? .. .
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.......... .. दिनांक १४-७-८७ को प्राचार्य श्री की ७२वीं जन्मजयन्ति के शुभावसर पर जन्म-जयन्ति पर्व क्यों ? एक लघु-पुस्तिका का प्रकाशन करवाकर निःशुल्क वितरण किया। इससे जन-समुदाय को जन्म-जयन्ति पर्व मनाने की जानकारी सुलभ
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हो गई। .
वर्षायोग समाप्ति पर परमपूज्य श्री १०८ प्राचार्यरत्न विमलसागरजी. महाराज विशाल संघ (४३) पिच्छी सहित दिनांक २७-११-८४ को 'ग्रंथमाला के म कार्यालय पर पधारे। इतने विशाल संघः का समिति के कार्यालय पर पधारना ग्रंथमाला . के इतिहास में स्वर्ण अवसर था । इस शुभावसर पर प्राचार्य श्री के करकमलों से
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श्री १००८ धर्मनाथ भगवान की मूर्ति विराजमान को गई । ग्रन्थमाला का कार्यालय हमारे निवास स्थान पर है और हमारे निजी खर्च से यह कार्यक्रम सम्पन्न करवाया । तत्पश्चात् समिति द्वारा प्रकाशित दशम् पुष्प श्री शीतलनाथ पूजा विधान (हिन्दी) का विमोचन आचार्य श्री के करकमलों द्वारा करवाया गया ।
भैरवं पद्मावती कल्यः --
परमपूज्य श्री १०८ गणधराचार्य कुन्थुसागरजी महाराज विशाल संघ सहित • वर्ष १६८७ का वर्षायोग अकलूज ( महाराष्ट्र) में पूर्णा धर्म प्रभावना के साथ समाप्त करके चतुविध संघ के साथ तीर्थराज श्री सम्मेदशिखरजी पहुंचे । ग्रन्थमाला समिति . ने इस उपलक्ष्य में ११वां पुष्प श्री भैरव पद्मावती कल्पः ग्रन्थ का प्रकाशन करवाकर इस महत्वपूर्ण ग्राम का विमोचन परमपूज्य श्री १०८ प्राचार्य सन्मार्ग दिवाकर. निमित्तज्ञान शिरोमरिंग खण्ड विद्या धुरन्धर विमल सागरजी महाराज के करकमलों द्वारा दिनांक १३०३८८ को विशाल जन समूह के मध्य प्रवचन हाल में ( श्री महावीरजी अतिशय क्षेत्र) पर ग्राहिका पर्व पर करवाया। यह समारोह बहुत ही सुन्दर रहा ।
सच्चा कवच ---
: परमपूज्य श्री १०८ प्राचार्य विमलसागरजी महाराज विशाल संघ सहित कुछ दिनों तक श्री महावीरजी प्रतिशय क्षेत्र पर ही विराजे । इसी बीच दिनांक - ३१-३-८८ को श्री महावीर जयन्ति का शुभावसर भाया और ग्रन्थमाला समिति ने इस शुभावसर पर १२वां पुष्प "सच्चा कवच का" प्रकाशन करवाकर श्री शांतिवीर नगर, सन्मति भवन में कार्यक्रम प्रायोजित करके परमपूज्य श्री १०८ ग्राचार्य विमलसागरजी महाराज के करकमलों द्वारा इस पुस्तक का विमोचन करवाया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता परमगुरूभक्त श्री ज्ञानचंदजी जैन बम्बई वालों ने की, और हजारों की संख्या. . में इस समारोह में लोगों ने भाग लेकर धर्म लाभ प्राप्त किया । फोटो प्रकाशन एवं निःशुल्क वितरण --
माह फरवरी ८७ में बोरीवली बम्बई में आयोजित मानस्तम्भ पंचकल्याणक महोत्सव के शुभावसर पर जन्म कल्याणक महोत्सव के दिनांक ६-२-८७ को परमपूज्य श्री १०८ गणधराचार्य कुन्थु सागरजी महाराज व श्री १०५ गणिनी
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की बिजयामति माताजी के फोटो प्रकाशित कर इसका विमोचन न्यूयार्क निवासी स्नेही गुम्म भक्त श्री महेन्द्र कुमारजी पाण्ड्या व उनकी धर्म पत्नि श्रीमति श्राशा- . देवीजी पाण्डया के करकमलों द्वारा करवाया। दोनों फोटो बहुत ही सुन्दर ब.
मोहक हैं। विशिष्ट गुरूभक्तों को निःशुल्क वितरण की गई है। इसके साथ-- .. मार्थ जिन मन्दिरों व क्षेत्रों पर समिति द्वारा फ्रेम में. जड़वाकर फोटो लगवाये माये है। गोम्मट प्रश्नोत्तर चितामरिण" ..
- इस ग्रन्थमाला की अनुपम भेट तेरहवां पुष्प 'गोम्मट प्रश्नोत्तर चितामरिख है। इस ग्रन्थ के संकलन कर्ता परम पूज्य श्री १०८ गणधराचार्य कुंथुसागरजी.
महाराज हैं। पुस्तक के संबंध में परम पूज्य श्री १०८ गरगंधराचार्य कुंथु सागर जी कर महाराज के विचार निम्न रूप से हैं ।
ग्रंथ में करणानुयोग, द्रव्यानुयोग प्रादि सभी प्रकार का पचाएं संग्रहित की की गई है और साधार लिया गया है जिनांगम का, मैं समझता हूं कि स्वाध्याय प्रेमियों को इस एक ही ग्रंथ के स्वाध्याय करने से जिनागम का बहुत कुछ ज्ञान हो सकता है, इस ग्रंथ में गुणस्थानानुसार श्रावक धर्म; मुनि धर्म, आत्म ध्यान, पौंडस्थ, रूपातीत ग्रादि ध्यान और उनके चित्रों सहित वर्णन किया गया है, और भी अनेक सामग्नी मकलित की गई है। यह ग्रंथ अपने आप में एक नया ही संग्रहित हुआ है, इस ग्रंथ में सभी ग्रंथों से लेकर २१७८ पलोकों का संग्रह है। . .
. इस ग्रंथ में पूर्वाचार्यकृतः गोम्मटसार, जीवक्रांड, त्रिलोकसार, मूलाचार, जानाणंच, समयसार, प्रवचनसार, नियमसार, रत्नकरंड, श्रावकाचार, तत्त्वार्थ सूत्र, .. राजवातिक, प्राचारंसार, अष्टपाहुङ, हरिवंश पुराण, आदि पुराण, बसु नन्दी श्रावकाचार, परमात्म प्रकाश, पुरुषार्थ सिद्धयुपाय, समयसार कलश, धवलादि, उमा स्वामी का श्रावकाचार, जैन सिद्धान्त प्र., दशभवत्यादि संग्रह, चर्चाशतक, चर्चा समाधान, स्याद्वाद चन, चर्चासागर, सिद्धान्त सार प्रदीप, मोक्ष मार्ग प्रकाशक, त्रिकाल वर्ती महापुरुष प्रादि बड़े-बड़े ग्रंथों का आधार लेकर संग्रह किया गया है।"
- इस प्रकार पाठकगरण अंवलोकन करे कि ग्रन्थमाला समिति के सीमित आर्थिक ... साधन होते हुए भी इतने कम समय में उपरोक्त महत्वपूर्ण ग्रन्थों के प्रकाशन करवाने में ...
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सफलता प्राप्त की है। सभी ग्रन्थ एक से बढ़कर एक है और सभी ज्ञानोपार्जन के लिये विशेष लाभकारी सिद्ध हुये है। ऐसे सभी प्राचार्यों साधुओं विद्वानों के विचार हमें । समय-समय पर प्राप्त होते रहे हैं, यह सभी सफलता परमपूज्य सभी प्राचार्यों व साधुओं के शुभाशीर्वाद के साथ-साथ परमपूज्य श्री १०८ गणधराचार्य कुन्थुसागरजी महाराज व श्री १०५ गणिनी आर्यिका विजयामती माताजी के शुभाशीर्वाद से हो सका है । इसके लिये हम सभी कृतज्ञ हैं और उनके चरणों में नतमस्तक होकर शत-शत बार । मोस्तु शापित करते हैं। ..
.: ग्रन्थमाला समिति के कार्यों में यह बात विशेष उल्लेखनीय है कि यह ग्रन्थ__.. माला समिति सभी प्राचार्यों, साधुओं विशिष्ट विद्वानों, पत्रों के प्रकाशकों, प्रकाशन खर्च '. में सहयोग करने वाले सभी दातारों को सभी प्रकाशन व्यक्तिगत रूप से भेंट करती है या मात्र डाक खर्च पर भिजवाती है ।
मुझे आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि पाठकगण ग्रंथमाला समिति द्वारा प्रकाशित ग्रंथों का स्वाध्याय करके पूर्ण नानोपार्जन कर रहे हैं और आगे भी। इस ग्रन्थमाला से जिन महत्वपूर्ण ग्रन्थों का प्रकाशन होगा उनसे लाभ उठा सकेंगे। पूर्ण लाभ उठावेंगे और त्रुटियों के लिये क्षमा करेंगे।
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शांतिकुमार गंगवाल
... प्रकाशन संयोजक ... श्री दि. जैन कुन्थु विजय ग्रन्थमाला समिति, को
..: भयपुर (राज.)
.....-.:
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. * अनुक्रम * श्री गोम्मट प्रश्नोत्तर चितामणि..
- पृष्ठ संख्या
क्रमांक
(१)
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-
अध्याय : पहलाकर्म स्वरुप वर्णन –.. ....१-५८ सच्चे मुखं का स्वरूप-१, द्रनाको के मुख्य . भेद-उत्तरभेद-१-६, : चारित्र मोहनीय के. रुपायवेदनीय कापायबेदनीय दो भेदों की. अपेक्षा भेद-प्रभेद-६-११, नामकर्म का स्वरुप भेद-प्रभेद-११-२४, गोत्रकर्म का स्वरूप व भेद-२४, अन्तराम का स्वरूप व भेद-२४२५,बंध का स्वरूप व भेद-२५-२६.पाठ . कर्मों को उत्कृष्ट तथा जघन्य स्थिति-२६, पुण्य-पाप की अपेक्षा कर्मों के भेद--२६-२७, जीवविपाकी, पुद्गलाविपाकी, भवविपाको व क्षेत्रविपाकी कर्मों का स्वरूप व भेद-२८-२६, .. चौदह गुरणस्थानों में कर्मो की बंध, सत्त्व, . .. उदय की संख्या-२६-३७, संहननों का . . स्वरूप व संहननों की अपेक्षा जीवो का उत्पत्तिस्थान--३७.३६, दश प्रकार का बंध--- . ३६-४०, अायुकर्म का बंध व बंधत्रिभंगी-४०,
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[ २ ]
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क्रमांक .
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पृष्ठ संख्या .
atharamatanABAD
गुरणस्थानों का गमनागमन-४१-४२, आठ कर्मों के स्वरूपपरक दृष्टान्त-४२-४४, कर्म .. प्रकृतियों का बंध-उदय हो पा गुणस्थान-- ४४-४७, चौदह गुणस्थानों में मरण से होने वाला गतिबंध-४७-४८, चौदह गुरणस्थानों में कर्मों का प्राश्रय, श्रायुबंध और उदय४८-४६, गुणस्थानों की अपेक्षा लेश्याओं का : स्वरूप-४६-५०, लेश्यामों से गतिप्राप्ति का स्वरूप-५२-५४, गुणस्थान का स्वरूप-भेद-: . निमित्त-५४-५६, मिथ्यात्व के भेद ब स्वरूप -५७, सांसादन-मिश्र-अविरत गुरंगस्थान
स्वरूप-५७-५८.] (२) अध्याय : दूसरा-सम्यग्दर्शन
[सम्यग्दर्शन का लक्षण-५६-६२, सम्यग्दर्शन के पाँच लक्षण-६२-६४, सम्यग्दर्शन की योग्यता-६४, सम्यग्दर्शन के भेद-६५-६६, . लब्धियों का स्वरूप-६७-७०, सम्यग्दर्शन के बहिरंग कारण व उत्पत्ति की अपेक्षा भेद -७२-७५, सम्यग्दर्शन का निर्देश आदि की । अपेक्षा से वर्णन-७५-८२, सम्यग्दर्शन को. .. .. घातने वाली प्रकृतियों की अन्तर्दशा-८३-४, सम्यग्दर्शनमहिमा-८५-८७, सम्यग्दर्शन और.
अनेकान्त-७-८८, सम्यग्दृष्टि की अन्त.. . र्दशा-८८.] : .....
..... "" 1.1
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[ ३ ]
क्रमांक
( ३ ) श्रध्याय: तीसरा- सम्यग्ज्ञान
(४)
ज्ञान का उभेत २४.
अध्याय चौथा--प्रमाप-नय
[ प्रमाण, नय का स्वरूप, भेद-प्रभेद - ६५, परोक्षप्रमाण के भेद व स्वरूप - ६५-६६ साधन, सा-य, हेतु हेत्वाभासादिका स्वरूप६६-१००; नय के मुख्य भेद-उपभेद १००१०२, व्यवहार नय व उपनय - १०२, नय व निक्षेप का स्वरूप १०३-१०४.]
( ५ ) श्रध्याय: पांचवां-चारित्र
पृष्ठ संख्या
चारित्र का स्वरूप व भेद - १०५ - १०६, प्रतिमाओं के नाम, दर्शन व व्रत प्रतिमा का स्वरूप १०६-१०७, प्रणव्रत का स्वरुप व भेद१०७ - १२४, गृहस्थों के भ्रष्ट मूलगुरण - १९२४. १२५. गुरंग व्रत का स्वरूप व भेद - १२५-१४०, व्रती को छोडने योग्य पदार्थ - १४०-१४५, शिक्षाव्रत स्वरूप व भेद - १४५ - १४६, देशाव काशिक का स्वरूप - १४६-१५०, सामायिक का स्वरूप और विधि- १५०-१५८, प्रोषधोपवास का स्वरूप व भेद- १५८-१६४, वैयावृत्य का स्वरूप और भेद- १६४--१६६, दान का स्वरूप व भेदादि - १६६ - १७३, वैयावृत्य के अतिचार- १७३ - १७४, सामायिक
८६६४
६५ -- १०४
१०५ -- ४६२ .
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क्रमांक.
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[
- प्रतिमा को १७४७ प्रोषधोपबास प्रतिमा का स्वरूप- १७५-१७६, सचित्त त्यांग प्रतिमा का स्वरूप - १७६-१७७, रात्रि भुक्ति त्याग प्रतिमा का स्वरूप - १७७ - १७८, ब्रह्मचर्य प्रतिमा का स्वरूप-१७८०१७६, श्रारम्भत्यागः प्रतिमा का स्वरूप - १७९ - १८१ परिग्रहत्याग प्रतिमा का स्वरूप १८१--१८२, अनुमति त्याग प्रतिमा का स्वरूप - १८२१८३, उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा का स्वरूप१८३१८८) शायिकाओं के समाचार का वर्णन-१५८-१६२, सकल चारित्र का स्वरूप - १६२, मूलगुणों का स्वरूप, पांच महाव्रतों का स्वरूप - १६२ - १९४, पांच समितियों का स्वरूप - १६४-१६७ इन्द्रिय निरोध का स्वरूप - १६७ - २००, छह आवश्यकों का तथा . सामायिक व ध्यान का स्वरूप - २००-२०१, ध्यान के प्रकार - २०१ - २०६ श्रुतज्ञान की महिमा - २०६-२०७, संस्थान विचय धर्म ध्यान का विशेष स्वरूप- २०७-२४८, लोक का स्वरूप - २१८-२१६, अधोलोक का स्वरूप - २१६-२३१, मध्यलोक का वर्णन२३१-२३३, उर्ध्व लोक का वर्णन - २३३० २४५, ध्यान के चार प्रकार और उनकी धारणाओं के स्वरूप (सचित्र) - २४६ - २५६..
पृष्ठ संख्या
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पृष्ठ संस्या .
पदस्थ ध्यान का स्वरूप-२५३-२६३, पंचपर- ... मेष्ठी महामंत्र का चितवन-२६३-२६७, मंगलोत्तम शरण पदों का ध्यान-२६७, विद्यानों के ध्यान-२६५-२७६, अन्य विद्याओं के ध्यान २७६-२८० रूपस्थध्यान का स्वरूप२८०-२८.८, रूपातीत ध्यान का वर्णन२८८-२६५, धर्म ध्यान का फल व वर्णन२६५-३०२, अट्ठाईस मूलगुणों का वर्णन३०२-३१२, अन्तरायों का स्वरूप-३१२-- ३१५, चौदह मलों का वर्णन-३१५-३१६, . . . पिण्डशुद्धि प्रादि का वर्णन-३१६-३१७, उद्गम दोषों का नाम निर्देश-३१७-३२८, उत्पादन दोषों का प्रतिपादन-३२८-३४१. श्राहार ग्रहण व त्यागने के कारणों का वर्णन--३४२-३४४, मुनि कौनसा आहार ग्रहण करते हैं-३४४-३४.६, भिक्षा के लिए ......
गगमन की प्रवृत्ति-३४६, दश प्रकार के साधु.:३४६-३५०, प्राचार्य का स्वरूप--३५०-३५१,
प्रायिकाओं के प्राचार्य-३५१-३५२, तपो का स्वरूप व भेद--३.५२, . प्रायश्चित का :: स्वरूप व भेद--३५-३६६, विनय तप- . . .. ३६६-३७४, स्वाध्याय तंप -४७४-३७५, .. .. ध्यान-३७५, दशलक्षण धर्म--३७५३७६, . . पंचाचार-३५७, गुप्ति-३७७-३७८, उपा- ...
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क्रमांक
[4]
ध्याय परमेष्ठी - ३७५ श्रुतज्ञान व द्वादशांग के २० भेद - ३७६- ३८१, द्वाशांग के नाम व इन बारह अंगों की पद संख्या और स्वरूप३०१-३०५, पूर्वगत के भेद और लक्षण३८६- ३६०, अंगबाह्य के अनेक भेद- ३२०३२२, तपस्वी के लक्षण और भेद- ३६२३६३, मुनियों की समाचार निति - ३६३३६६, एकाकी विहार- ३६६ -४०१, पांच, प्रकार के मुनियों का शाश्रय क्यों करें ?४०१-४०२, आगन्तुक मुनि के साथ व्यवहार-४०२-४०३, छोड़ने योग्य श्रोता - ४०३ - ४०५, विस्तार समाचार विधि-४०४४०५-४११, आर्यिकाओं का वर्णन-४११४१४, परिषद् - ४१४-४२२, परिषह विजय का फल - ४२२-४२६, संक्षेप से ध्यान का लक्षणभेद व फल - ४२६-४३२, बारह अनुप्रेक्षा वर्णन - ४३२-४३७, शुक्लध्यान का स्परूप व भेद-४३७-४५०, सिद्ध भगवान-४५०-४५८, १० मुनि भेदों का स्वरूप-४५८-४६२. ]
(८) अध्याय छठा - शेष गुणस्थानों का वर्णन [ सातवें गुणस्थान से चौदहवें गुणस्थानों तक परिभाषा सहित स्वरूप - ४६३-४६६, समवशरण का वर्णन -- ४६६-४७९.]
पृष्ठ संख्या
४६३--४७६
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क्रमांक
[ ७ ]
-दो वरन
[नरकों का वर्णन - ४८० - ४८४ मध्य लोक का वर्णन ४८४ - ४८६, जम्बू द्वीप आदि की रचना व विस्तार - ४८६ - ५०५, मनुष्य क्षेत्र . की सीमा व भेदादि -- ५०५ - ५०७, तप ऋद्धि के सात भेद - ५०७ - ५०६, रससिद्धि - ५०६५१०, म्लेच्छों के दो भेद-५१० ५१२, कर्म भूमियों का वर्णन - ५१२ - ५१३, मनुष्यों की तिर्यञ्चों की आयु का वर्णन - ५१३ - ५१४, उर्ध्व लोक वन – ५१५ - ५३४ तक देवों के भेदादि का वर्णन - ५१५-५१७, भवन वासियों के भेद - ५१७ - ५१८, व्यंतर देवों के भेद - ५१, ज्योतिषी देवों के भेद गति आदि -५१८-५२०, व्यवहार काल का हेतु-५२० वैमानिक देवों का वर्णन --५२० ५२८, स्वर्ग के देवों की श्रायु वर्णन --- ५२८ -५३३, सिद्ध लोक व सिद्ध शिला का वन – ५३३ - ५३४]
(5) अध्याय : प्राठवां-द्रव्य वन----
[ जीवत तत्त्व का वर्णन - ५३५ - ५६१, जीव वर्णन --- ५६१-५६७, महापुरुषों का वर्णन - ५६८-६१७, तीर्थंकर महापुरुष - ६१७-६३१, पंचकल्याणक --- ६३१-७४० ]
पृष्ठ संख्या
४८०-५३४
५३५-७४०
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क्रमांक.
पृष्ठ संख्या
.
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. ७४१
(६) अध्याय : नौवां-वर्तमान तीर्थकरादि संबंधी :
कई ज्ञातव्य तथ्य---. .. . ७४ [वर्तमान व आगामी तीर्थकरादि संबंधी .. वर्णन-७४१-७७६, भरत चक्रवर्ती संबंधी वर्णन-७८०-७.६३, नारायणादिक का
वर्णन-७६३-८०१.]. (१०) - अध्याय : दसवां-कामदेव महापुरुष और ..:.
fasr क्षेत्र का वर्णन
....८०२-१०
(११) अध्याय : म्यारहवां-- सम्यग्ज्ञान और .. ... अनेकान्त
.
... १००२-१०३३
।
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NAHAT. ... '
.......
......
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चतुविशति तीर्थङ्करेभ्यो नमो नमः
नेमिनाथ स्वामिनं नत्वा, नत्वा बाहुबलीश्वरं, तत्व गौतम पखे च तथैव श्री जिनागमम् । महावोरकोति सूरि tear विमल सन्मतिसागरं, गोम्मट प्रश्नोत्तरं वक्ष्ये पूर्वाचार्यानुसारतः ॥
अर्थ -- में नेमीनाथ स्वामी, बाहुबली स्वामी, गौतम गणधर जिनवाणी, आचार्य गुरुवर महावीरकीर्तिजी महाराज, याचार्य विमलसागरजी महाराज व प्राचार्य • सम्मत्तिसागरजी महाराज की वन्दना करता हु पूर्वाचार्यों के कहे अनुसार गोम्मट प्रश्नोत्तर चिन्तामणि ग्रंथ को कहूँगा ।
प्रश्न :- सच्चा सुख क्या है ?
उत्तर :- -ग्रात्मा के द्रव्यकर्म, भावकर्म और नो कर्मों का सर्वथा छुट जाना ही सच्चा सुख है |
प्रश्न :- द्रव्यकर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, प्रायु, नाम, गोत्र और अन्तराय इन ग्राठ कर्मों को द्रव्यकर्म कहते हैं ।
प्रश्न :-- उक्त कर्मों के उत्तर-भेद कितने हैं ?
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उत्तर :- ज्ञानावरण के ५ भेद, दर्शनावरण के भेद, वेदनीय के २ भेद, मोहनीय के २८ भेद, ( चारित्र मोहनीय के २५ भेद और दर्शन मोहनीय के ३ भेद, इस प्रकार मोहनीय के २८ भेद हुए ) ग्रायु के ४ भेद, नाम के ६३ भेद, गोत्र के २ भेद और अन्तराय के 2 भेद - इस प्रकार द्रव्यकर्मों के उत्तरभेद १४८ हैं ।
प्रश्न :- ज्ञानावरण के ५ भेद कौनसे हैं ?
उत्तर :-- -१ मतिज्ञानावरण, २ श्रुतंज्ञानावरण, ज्ञानावरण, ५ केवलज्ञानावरण
-
३ अवधिज्ञानावरण, ४ मन:पर्यय
इस प्रकार ज्ञानावरण के पांच भेद हैं ।
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[ मो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :--दर्शनावरण के ६ भेद कौनसे हैं ? उत्तर :-१ चक्षुदर्शनावरण, २ अचक्षुदर्शनावरण, ३ अवधिदर्शनावरा, ४ केवल.: . दर्शनावरण, ५ निद्रा, ६ निद्रानिद्रा, ७ प्रचला, ८ प्रचलानचला, ६ स्त्यान
__ गद्धि इस प्रकार दर्शनावरण के. ६ भेद हैं। प्रश्न :-वेदनीय कर्म के दो भेद कौनसे हैं ? उत्तर :-- साता वेदनीय और असाता वेदनीय, ये दो भेद वेदनीय कर्म के हैं। . प्रश्न :--मोहनीय कर्म के २८ भेद कौनसे हैं ? उत्तर :-- मुख्य रूप से महिनीय क के दो भेद हैं -एक दर्शनमोहनीय और दूसरा :
चारित्रमोहनीय । दर्शनमोहनीय के ३ और चारित्रमोहनीय के २५ उत्तरभेद हैं 1 दर्शन मोहनीय के तीन भेद इस प्रकार हैं- सस्यवत्व, मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व । जैसा कि तत्वार्थसार में कहा गया है
"त्रयः सम्यक्त्वमिथ्यात्वसम्यग्मिथ्यात्वभेदतः ।"१ इसी प्रकार चारित्रमोहनीय के २५ भेद निम्न प्रकार से हैं१ अनन्तानुबन्धी क्रोध, २ अनन्तानुबन्धी मान, ३ अनन्तानुबन्धी माया, ४ अनन्तानुबन्धी लोभ, ५ अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, ६ अप्रत्याख्यानावरण मान, ७ अप्र० माया, ८ अप० लोभ, ६ प्रत्याख्यानावरण क्रोध, १० प्रत्या मान, ११ प्रत्य० माया, १२ प्रत्य० लोभ, १३ संज्वलन क्रोध, १४ सं० मान, १५ सं० माया, १६ सं० लोभ, ( किंचित् कषाय ) १७ हास्य,
१८ रति, १६ अरति, २० शोक, २१ भय, २२ जुगुप्सा, २३ स्त्रीवेद, . २४ पुरुषवेद, २५ नपुंसकवेदः । प्रश्न :-आयुर्म के. ४ भेद कौनसे हैं ? उत्तर :--नरक आयु, तियंचायु, मनुष्यायु, देवायु ये चार भेद गायु कर्म के हैं। इसी
को तत्वार्थसार में इस प्रकार मूत्र रूप में बताया है......
"वाझतिर्यग्नदेवायु दादायुश्चतुर्विधम् ।"३. . प्रश्न :- नाम कर्म के ६३ भेद कौनसे हैं ? . उत्तर :-गति ४, जाति ५, शरीर ५, अंगोपांग ३, निर्माण १, बन्धन ५, संघात ५,.
.. संस्थान ६, संहनन ६, स्पर्श ८, रस ५, गन्ध २, वर्ण ५, आनुपूर्वी ४, १. तत्वार्थसारः अध्याय ५; श्लोक-२८ । २. तत्वार्थसारः अध्याय ५; श्लोक-२० ।
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अध्याय : पहला . .... ...
[३ उपघात, परघात, गुरुलघु, उच्छवास, प्रातप, उद्योत, प्रशस्तविहायो गति, प्रत्येक, बस, पर्याप्त, बादर, शुभ, स्थिर, सुस्वर, सुभग, मादेय, यशःकीति, अप्रशस्त विहायोगति, साधारण, स्थावर, अपर्याप्त, सूक्ष्म, अशुभ, अस्थिर, दुःस्वर, दुर्भग, अनादेय, अयश:क्रीति, तीर्थकर, इस प्रकार १३ प्रकृति
नाम कर्म की होती हैं। प्रश्न :-गोत्रकर्म के दो भेद कौनसे हैं ? उत्तर :—गोत्रकर्म के दो भेद हैं-१ उच्चगोत्र, २. नीचगोत्र । प्रश्न :- अन्तरायकर्म के ५ भेद कौनसे हैं ? उत्तर :-१ दानान्तराय, २ लाभान्तराय, ३ भोगान्तराय, ४ उपभोगान्त राय,
५ बीर्यान्तराय । इस प्रकार ५. भेद अन्तराय कर्म के हैं । कर्मों के भेद-प्रभेदों के पश्चात् उनके स्वरूप बताते हैं । :-ज्ञानावरण कर्म किसे कहते है ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से प्रात्मा के ज्ञान गुण का घात होता है और ज्ञान
प्रगट नहीं होता, मात्मा के ज्ञान गुरण पर जिसका अवगुण्ठन होता है, उसे ज्ञानावरण कम कहते हैं । ज्ञानावरण के ५ प्रभेदों का स्वरूप निम्न प्रकार
से है । प्रश्न :- मतिज्ञानावरण कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :-~जो कर्म मतिज्ञान न होने दे अथवा जिस कर्म के उदय से मतिज्ञान की
प्राप्ति न हो, उसे मतिज्ञानावरण कर्म कहते हैं। प्रश्न :--श्र तज्ञानाचरण कर्म किसे कहते हैं. ?. . उत्तर :--जिस कर्म के उदय से श्रुतज्ञान की प्राप्ति न हो, उसे श्रुतज्ञानावरण कर्म
कहते हैं । प्रश्न :--प्रवधिज्ञानावररय कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :-इस कर्म के उदय से जीव को अबधिज्ञान नहीं होता है अर्थात् जो कर्म
. अवधिज्ञान को नहीं होने दे, उसको अवधिज्ञानावरण कर्म कहते हैं। :--मनःपर्ययज्ञानावरण कर्म किसे कहते हैं ?
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।
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पपनस
है।
.
. .
[ गो. प्र. चिन्तामणि .. उत्तर :--जिस कर्म के उदय से जीव को मनःपर्यय शान नहीं होता, उसको मनःपर्यय
ज्ञानावरण कर्म कहते हैं। प्रश्न :- केवलज्ञानावरण कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :-जिस कर्म के उदय से केवलज्ञान न हो, उसको केवलज्ञानावरण कहते हैं । के प्रश्न :-दर्शनावरण कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से प्रात्मा के दर्शन गुण का घात होता है, दर्शन होने में :
वाधक जो कर्म हैं, उसे दर्शनावरण कर्म कहते हैं । अब इसके ६ प्रभेदों का
स्वरूप वर्णन करते हैं। प्रश्न :- चक्षुदर्शनावरण कर्म किसे कहते हैं ? . . उत्तर:-जो कर्म चक्षु इन्द्रिय से होने वाले सामान्य अवलोकन को नहीं होने दे, उसे
चक्षुदर्शनावरण कर्म कहते हैं। प्रश्न :--प्रचक्षुदर्शनावरण कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :--जो कर्म चक्षु इन्द्रिय को छोड़कर शेष इन्द्रियों से तथा मन से होने वाले . . सामान्य अवलोकन को नहीं होने देता, उसे अचक्षुदर्शनावरण कर्म कहते हैं। प्रश्न :----अवधिदर्शनावरण कर्म का स्वरूप क्या है ? उत्तर :-जो कर्म अवधि ज्ञान से पहले होने वाले सामान्य अवलोकन को न होने दे,
उसे अवधिदर्शनावरण कर्म कहते हैं । प्रश्न :... केवलदर्शनावरण कर्म का स्वरूप क्या है ? उत्तर :---जो कर्म केवल ज्ञान के साथ होने वाले सामान्य अवलोकन को नहीं होने दे,
. उसे केवलदर्शनावरण कर्म कहते हैं । प्रश्न. :-निद्रादर्शनावरण कर्म का स्वरूप क्या है ? .. उत्तर :--जिस कर्म के उदय से नींद आती है. उस कर्म को निद्रादर्शनावरण कर्म
कहते हैं। . . . प्रश्न :--निद्रा-निद्रा दर्शनावरण कर्म का स्वरूप क्या है ? . . . उत्तर :-जिस कर्म के उदय से नींद ही नींद आती हो, उस कर्म को निंद्रा-निद्रा
__ दर्शनावरण कर्म कहते हैं।
..
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अध्याय: पहला ]
प्रश्न :- प्रचला दर्शनावरण कर्म का क्या स्वरूप है ?
- जिस कर्म के उदय से जीव कुछ जागता हो और कुछ सोता हो, उस कर्म को प्रचला दर्शनावरण कर्म कहते हैं ।
उत्तर :--
[ ५.
प्रश्न :- प्रचलाप्रचला दर्शनावरण का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से सोते समय मुंह से लार वहे और कुछ
भी
चलते रहें और सुई यादि चुभोने पर भी चेत न हो, उसे प्रचला प्रचला array कर्म कहते हैं ।
प्रश्न : स्त्यानगृद्धि दर्शनावरण कर्म का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से प्राणी सोते समय नाना प्रकार के भयंकर कार्य कर डालता हो और जागने पर उसे कुछ मालूम ही नहीं होता कि मैंने क्या किया है, उस कर्म को स्त्यानगृद्धि दर्शनावरण कर्म कहते हैं ।
प्रश्न
- वैवनीय कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर:- जिस कर्म के उदय से जीव के प्रत्यन्त आकुलता रूप परिणाम हो अथवा जिससे आत्मा के श्रन्याबाध गुरण का घात होता है, उसे वेदनीय कर्म कहते हैं । वेदनीय कर्म के प्रभेदों का स्वरूप निम्न रूप से है ।
प्रश्न: - सांता वेदनीय कर्म का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-- जिस कर्म के उदय से शारीरिक तथा मानसिक सुख प्राप्त होता है, उस कर्म को साता वेदनीय कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- असाता बेदनीय कर्म का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से आत्मा को नाना तरह के दुःख प्राप्त होते हैं, उस कर्म को सातावेदनीय कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- मोहनीय कर्म का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से आत्मा के सम्यक्त्व गुण और चारित्र गुण का घात • होता हो, उस कर्म को मोहनीय कर्म कहते हैं। उसके प्रभेदों का स्वरूप निम्न प्रकार से है ।
प्रश्न :- दर्शन मोहनीय कर्म का क्या स्वरूप है.
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६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से आत्मा के सम्यक्त्व गुण का घात होता है, उसे दर्शन मोहनीय कहते हैं । इसके तीन प्रभेदों का स्वरूप प्रागे दर्शाते हैं ।
प्रश्न : - - मिथ्यात्व प्रकृति का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :----जिसके उदय से तत्वों का यथार्थ श्रद्धान नहीं होता है, उसे मिथ्यात्व प्रकृति कहते हैं ।
प्रश्न : सम्यक्त्व प्रकृति का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- -जिसके उदय से सम्यग्दर्शन में दोष उत्पन्न होता है, उसे सम्यक्त्व प्रकृति कहते हैं ।
प्रश्न :- सम्यक् - मिथ्यात्व प्रकृति का क्या स्वरूप है ?
- जिस कर्म के उदय से ( वस्तु के ) यथार्थ और यथार्थ मिश्रित परिणाम होते हैं, उसे सम्यक् मिथ्यात्व प्रकृति कहते हैं |
उत्तर :
प्रश्न : - चारित्र मोहनीय का क्या स्वरूप है ?
-जो आत्मा के चारित्र गुरु का घात करता हो, उसे चारित्र मोहनीय कहते हैं । चारित्र मोहनीय के उत्तर-भेदों का स्वरूप बताते हैं । मूलत: चारित्र मोहनीय के दो भेद हैं- कषाय बेंदनीय और कषाय वेदनीय |
उत्तर :
प्रश्न :- कषाय वेदनीय का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-- -जो श्रात्मा के गुण, शुद्ध भाव और धर्म को नहीं होने दे अर्थात् नष्ट करें, उसे कषाय वेदनीय कहते हैं ।
प्रश्न : --- कषाय वेदनीय का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-- जो क्रोधादिक की तरह श्रात्मा के गुणों का घात नहीं करता अथवा जो कषाय के साथ-साथ अपना कार्य या फल दिखलाता है, उसे प्रकषाय वेदनीय कहते हैं ।
प्रश्न :- ग्रनन्तानुबन्धी क्रोध का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- जो क्रोध-काय सम्यक्त्व होने में बावक हो अर्थात् सम्यवत्वी न होने दे, उसे अनन्तानुबन्धी क्रोध-कपाय कहते हैं । यह शिला रेखा के समान
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Parve
अध्यायः पहला ]
[७ होती है। जिस प्रकार शिला के ऊपर बनाई गई रेखा जल्दी नहीं मिटती, उसी प्रकार इस अनन्तानुबन्धी कषाय का स्वभाव है। यह कषाय जीव के .
साथ भव-भवान्तर में जाती है और पीड़ा देती है। प्रश्न :--अनन्तानुबन्धी मान का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- इस कषाय का स्वभाव पाषाण के समान होता है। जिस मान की मात्रा
..: अनन्त के साथ अनुबन्ध करने की हो, वह मान अनन्तानुवन्धी-मान कहलाता ...... है । यह अनन्तानुबन्धी मान जल्दी नहीं मिटता । प्रश्न :---अनन्तानुबन्धी माया का क्या स्वरूप है ? उत्तर :--जिम माया की मात्रा प्रानन्द के साथ अनुबन्ध करने की हो, वह माया
अनन्तानुबन्धी माया कहलाती है। इसका स्वभाव बांस की जड़ के समान
होता है । यह कषाय भी भवान्तरों तक चलती है । प्रश्न :--अनन्तानुबन्धी लोभ का क्या स्वरूप है ? उत्तर :--यह कषाय सम्यक्त्व का घात करती ही है और कृमि रंग के समान
होतो है । जो लोभ अनन्त के साथ अनुबन्ध करने की शक्ति रखता है, वह
अनन्तानुबन्धी लोभ कहलाता है। प्रश्न :---अप्रत्याख्यानावरण कषाय का क्या स्वरूप है ? - उत्तर :---जो कषाय देशचारित्र धारण करने में बाधक बनती हो, उसे अप्रत्याख्याना
..... वरण कषाय कहते हैं। प्रश्न :--अप्रत्याख्यानावर क्रोध का क्या स्वरूप है ? उत्तर :--जिस क्रोध की मात्रा इतनी हो कि जिससे जीव देशचारित्र धारण न कर
सके, वह अप्रत्याख्यानावरण क्रोध कषाय है । प्रश्न :--अप्रत्याख्यानावरण मान कषाय का स्वरूप दृष्टान्त सहित बताइये ? उत्तर :---अप्रत्याख्यानावरण मान बह हैं, जो जीव को देशचारित्र धारण करने में बाधक
होता हो और हड्डी के समान नहीं झुकनेवाला होता है । प्रश्न :--अप्रत्यानावरण माया कषाय का क्या स्वरूप है ?
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८]
[ गो. प्र. चिन्तामणि उत्तर :- इस कषाय के उदय से जीव संयम धारण नहीं कर सकता और इसका।
. स्वभाव मेढ़े के सींग के समान होता है । प्रश्न :--अप्रत्याख्यानावरग लोभ कषाय का क्या स्वरूप है ? उत्तर :--अप्रत्याख्यानावरण लोभ के उदय होने पर संयमभाव कभी नहीं होता, और
- इसका स्वभाव बैलगाड़ी के ओंगन (Oil) की तरह होता है । प्रश्न :...-प्रत्याख्यानावरण कषाय का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-जिस कषाय का उदय होने पर जीव सकल चारित्र धारण न कर सके या
सकल चारित्र के भाव ही जीव को न हो, वह प्रत्याख्यानावरण कषाय है। प्रश्न :-प्रत्याख्यानावरण क्रोध का क्या स्वभाव है? उत्तर :---जिस क्रोध का उदय होने पर जीत हाच शयर ग्रहण न कर सके उसे प्रत्या
ख्यानावरण क्रोध कहते हैं । यह धूल की रेखा के समान होती है । ये कषाय
जल्दी मिटती है, फिर भी कुछ समय लगता है । प्रश्न : प्रत्याख्यानावरण मान-कषाय का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- जो मान कषाय सकल' संयमी नहीं होने दे, वह प्रत्याख्यानावरण मानकषाय
है । इसका स्वभाव काष्ठ के समान होता है। प्रश्न :-प्रत्याख्यानावरण माया कषाय का क्या स्वरूप हैं ? उत्तर :- जो माया कषाय जीव को सकलसंयम धारण नहीं करने दे, उसे प्रत्याख्या
वरण माया कषाय कहते हैं। इसका स्वभाब गोमुत्र के समान होता है । प्रश्न :--प्रत्याख्यानावरण लोभ कषाय का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- जिस लोभ कषाय के उदय होने पर प्रात्मा कभी सकलसंयमी न हो; उसे
प्रत्याख्यानावरण लोभ कहते हैं । यह शरीर के मल के समान होता है। प्रश्न :--संज्वलन कषाय किसे कहते हैं. ? . . उत्तर :--जिस कवाय के उदय होने से जीव यथाख्यात चारित्र धारणा न कर सके।
जो यथाख्यात चारित्र होने में वाधक हो, वह संज्वलन कपाय है। प्रश्न :--संज्वलन कोध का क्या स्वरूप है ?
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अध्याय: पहला ] उत्तर :--जिस क्रोध कषाय के उदय से जीव यथाख्यात चारित्र धारण नहीं कर सके,
वह संज्वलन क्रोध कपाग्य है । जल रेखा के समान होती है। जल (पानी) . में रेग्या. खींचने पर जल्दी मिट जाती है, उसी प्रकार ये कपाय जल्दी मिट
.. जाती है । इस कषाय वाला जीव भी यथाख्यात चारित्री नहीं हो सकता। प्रश्न :-संज्वलन मान कषाय का क्या स्वरूप है ? उत्तर:-जिस मान कयाय के उदय से जीव यथाख्यात चारित्र धारणा नहीं कर सकता।
उसे संज्वलन मान कषाय कहते हैं । यह बैंत के समान शीनं नमने वाली
· होती है। प्रश्न :-संन्वलन माया कषाय का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-जिस माया कयाय के. उदय से यथाख्यात संयम न हो सके, वह संज्वलन
..माया कषाय है । यह संज्वलन माया खुरपे के समान टेढी होती है । प्रश्न :--संज्वलन लोभ कषाय का क्या स्वरूप है ? । उत्तर :--जिस लोभकषाय के उदय से जीव यथाण्यात चारित्रन धारण कर सके, वह संज्वलन लोभ कषाय है । यह हल्दी के समान शीत्र छुटने वाली कषाय है ।
कोष्टक . ..
HERE:
दृष्टान्त
पाय .
इप्टान्न
.. काय
अष्टान्न ।
कपाय
इप्टान्त
.
अनतानुबंधी
नीलाभेद अनंतानुबंधी
मान
| पत्थरभेद
अनंतानुबंधी | यांस की जड़ अनंतानुयंधी माया
.. . लोमा
क्रिमीरंग .
परमात्मान
पृथवी
नागन
.
| अप्रत्याख्यान
মাল
अप्रत्याख्यान मेढासींग अप्रत्याध्यान माया
1. लोभ
प्रत्याख्यान शोध...
बुलिरेखा।
काठ
प्रत्यारुपान. | मान
प्रत्याश्यान माया
| प्रत्याश्यान । शरीरमल
लोभ
संज्वलन
जल
बत
संज्वलन मान
संज्वलन माया
नुरपा
संज्वलन सीमा ।
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shradha dont stor
१० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
प्रश्न :- इस अनन्तानुबंधी कषाय की चौकडी का वासना काल कितना है ? उत्तर :- कर्म प्रकृतियों का वासना काल शास्त्रों में उत्कृष्ट ( अधिक से अधिक ) और जघन्य ( न्यूनतम) दो प्रकार से बताया गया है। अनन्तानुबंधी चौकडी का उत्कृष्ट वासना-काल अनन्त भवों तक चलता है और जघन्य - काल, ग्रन्तमुहूर्त है ।
प्रश्न :- प्रप्रत्याख्यानावरण कषाय की चौकडी का वासना-काल कितना है ? उत्तर :-- प्रप्रत्याख्यानावरण - कषाय की चौकडी का उत्कृष्ट वासना-काल छह महिना और जधन्य अन्तर्मुहूर्त है ।
प्रश्न : - - प्रत्याख्यानावरण कषाय की चौकडी का वासना-काल कितना है ?
उत्तर :----प्रत्याख्यानावरण कराय की चौकडी का उत्कृष्ट वासना-कांल पंद्रह दिन और जघन्यन्तमुहूर्त है ।
प्रश्न :-- संज्वलन - कषाय की चौकडी का वासना काल कितना है ?
उत्तर :--संज्वलन कपाय की चौकडी का उत्कृष्ट वासना काल अन्तमुहूर्त और जवन्य मुहूर्त ही हैं ।
भी
नौ भेदवाली प्रकषाय वेदनीय कर्मप्रकृति का वर्णन करते हैं ।
प्रश्न :-- हास्य कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से हास्य प्रगट हो, वह हास्य कर्म है ।
प्रश्न : - - रति कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव को धन-पुत्रादि में विशेष प्रीति हो, उसे रति कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- अरति कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :--- जिस कर्म के उदय से जीव को धन-पुत्रादि में विशेष-प्रीति न हो उसे अरति) कर्म कहते हैं ।
चोंडी का न्तानुबंधी से सम्बन्धित - क्रोध, मान, माया और लोभ यै: चार कषाय जानना ।
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।
अध्याय : पहला ]
[ ११ . प्रश्न :---शोक कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :---जिस कर्म के उदय से जीव को इष्ट वियोग होने पर गोकं हो, उसे शोक ... कर्म कहते हैं । प्रश्न :----भय कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से जीव को भय या उद्वेग होता हो, उसे भय कर्म कहते हैं,
इस कर्म के कारण जीव नित्य ही भयभीत रहता है। प्रश्न :---जुगुप्सा कर्म का क्या स्वरूप है ? . उत्तर :---जिस कर्म के उदय से जीव को दुसरों से ग्लानि या घृणा उत्पन्न होती हो,.
. उसे जुगुप्सा कर्म कहते हैं। प्रश्न :---प्रायु कर्म का स्वरूप क्या है ? उत्तर:--जो आत्मा के अवगाहन गुरग को रोकता है और जिस से जीव नारकी,
तिर्यञ्च, मनुष्य, देव के शरीरों में रुका रहता है, उसे आयु कर्म कहते हैं । प्रश्न :--नरकायु का क्या स्वरूप है ? उत्तर :---जिस कर्म के उदय से जीव नारकी के शरीर में रुका रहता है, उसे नरकायु
कहते हैं । प्रश्न :--तिर्यञ्चायु का क्या स्वरूप है ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से जीव तियंच के शरीर में रुका रहता है, उसे तिर्यञ्चायु .. कहते हैं।
प्रश्न :--मनुष्यायु का क्या स्वरूप है ? .. उत्तर :--जिस कर्म के उदय से जीब मनुष्य के शरीर में रुका रहता है, उसे मनुष्यायु
...... कहते हैं । प्रश्न :-देवायु का क्या स्वरूप हैं ?
उत्तर :--जिस कर्म के उदय से जीव देव के शरीर में रुका रहता है, उसे देवायु :: .. कहते हैं । प्रश्न :--नाम कर्म का क्या स्वरूप है ? ..
.
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१२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव गत्यादि के नाना रूप से परिमित होता है । अथवा शरीरादिक बनते हैं, उसे नाम कर्म कहते हैं । इस नाम कर्म के उदय से आत्मा के सूक्ष्मत्व गुण का घात होता है ।
प्रश्न :- गति नाम कर्म किसे कहते हैं ?.
उत्तर :-- जिस कर्म के उदय से जीव का साकार नारकी, तिर्यञ्च मनुष्य देव के समान हो, उसे गति नाम कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :-- गति नाम कर्म के कितने भेद है ?
उत्तर :--तरक गति, तिर्यञ्च गति, मनुष्य गति, देव गति ये चार भेद हैं ।
प्रश्न :-- मनुष्य गति नाम कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव को मनुष्य पर्याय प्राप्त होती है, उसे मनुष्य गति नाम कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :--नरक गति नाम कम किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से नरक पर्याय प्राप्त होती है, उसे नरक गति नाम कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- तिर्यञ्च गति नाम कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :-- जिस कर्म के उदय से जीव को तिर्यञ्च गति प्राप्त हो, उसे तिर्यञ्च गति नाम कर्म कहते हैं |
प्रश्न :- देव गति नाम कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से देव गति की प्राप्ति होती हो, उसे देवगति नाम
*
कर्म कहते हैं ।
प्रश्न : --- इन चारों गतियों में मुख्य रूप से किस-किस कषाय का उदय रहता है, ( जन्मते समय ) ?
उत्तर :- -जीव को नरक गति में क्रोध का उदय रहता है, तिर्यञ्च गति में माया का उदय रहता है, मनुष्य गति में मान का उदय होता है और देवगति में लोभ का उदय रहता है ।
प्रश्न :- जाति नाम कर्म किसे कहते हैं ?
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[ १३
- जिस कर्म के उदय से अनेक प्राणियों में श्रविरोधी समान अवस्था प्राप्त होती है, उसे जाति नाम कर्म कहते हैं ।
अध्याय: पहला ]
उत्तर
प्रश्न
- जाति नाम कर्म के कितने भेद हैं ?
उत्तर :--पांच भेद हैं- एकेन्द्रिय जाति, द्वीन्द्रिय-जाति, श्रीन्द्रिय जाति, चतुरिन्द्रिय• जाति और पञ्चेन्द्रिय-जाति ।
प्रश्न :- - एकेन्द्रिय जाति नामक किसे कहते हैं. ?.
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव एकेन्द्रिय-जाति में पैदा होता है, उसे एकेन्द्रियजाति नाम कर्म कहते हैं ।
प्रश्न : -वीन्द्रिय जाति नाम कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव द्वीन्द्रिय जाति में पैदा होता है, उसे द्वीन्द्रियजाति नाम कर्म कहते हैं ।
- त्रीन्द्रिय जाति नाम कमें किसे कहते हैं।
?
प्रश्न
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से श्रीन्द्रिय-जाति में जोव का जन्म होता है, उसे श्रीन्द्रिय जाति नाम कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- चतुरिन्द्रिय-जाति नाम कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव का चतुरिन्द्रिय-जाति में जन्म होता है, उसे चतुरिन्द्रिय-जाति नाम कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- पंचेन्द्रिय-जाति नाम कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव का पंचोन्द्रिय-जाति में जन्म होता है, उसे पंचेन्द्रिय-जाति नाम कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- शरीर नाम कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :--- जिस कर्म के उदय से जीव के शरीर की रचना होती है, उसे शरीर नाम कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- शरीर नाम कर्म के कितने भेद हैं ?
उत्तर :--
शरीर नाम कर्म के ५ (पांच) भेद है। श्रदारिका वैकियक, आहारक, . तेजस श्री कार्मारण ये ५ शरीर नाम कर्म के भेद हैं 1.
प्रश्न : श्रदारिक शरीर नाम कर्म किसे कहते हैं ?
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
कर्म
उदय से जीव को प्रौदारिक शरीर प्राप्त होता है । उसे श्रदारिक शरीर नाम कर्म कहते हैं । यह शरीर मनुष्य और तिर्यों के, होता है ।
१४ ]
उत्तर :----
-- जिस
प्रश्न : - वैक्रियक- शरीर नाम कर्म किसे कहते हैं ?
-- जिस कर्म के उदय से जीव को वैक्रियक शरीर प्राप्त होता है, उसे वैक्रियक शरीर नाम कर्म कहते हैं। यह शरीर देव और नारकी के होता है । छोटा बड़ा नाना रूपों को बनाने में समर्थ होता है । वैक्रियक शरीर लब्धितिमितक भी होता है तथा वह तपस्या विशेष से भी प्राप्त होता है । -ग्राहारक शरीर नाम कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :----
प्रश्न :
उत्तर :- कुठे गुणस्थानवर्ती मुनि के तत्त्वों में कुछ शंका होने पर अथवा तीर्थक्षेत्र की वंदना के लिये, उनके मस्तक से जो एक हाथ का, शुभ्र वर्ण का त्यंत सूक्ष्म पुतला निकलता है और केवली, श्रुतकेवी के पाद मूल में जाकर शंका समाधान होने पर पुनः वापस आ जाता है, उसे आहारक- शरीर कहते हैं ।
प्रश्न : --- तंजस शरीर नाम कर्म किसे कहते हैं ?.
उत्तर :- चौदारिक आदि शरीरों में तेज (कान्ति) उत्पन्न करने वाले शरीर को तेजस शरीर कहते हैं । यह सभी संसारी जीवों के होता है ।
प्रश्न :--- - कार्मा शरीर नाम कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :- ज्ञानावरणादि आठ कर्मों के समूह को काम
शरीर कहते हैं। यह शरीर उपभोग रहित होता है । समस्त संसारी जीवों के होता है । प्रश्न : एक जीव के एक साथ कितने शरीर हो सकते हैं ?
उत्तर :- एक जीव के एक साथ ४ शरीर हो सकते हैं। अगर दो शरीर हो तो. तेजस और कार्मारण, तीन शरीर हो तो तेजस, कार्मारण और श्रीदारिक अथवा तैजस कारण और वैक्रियक, चार पारीर हो तो तंजस, कर्माण श्रदारिक और श्राहारक, अथवा तैजस कामरण, औदारिक और वैक्रियक शरीर होते हैं ।
प्रश्न :
- तेजस शरीर के कितने प्रकार हैं ?
उत्तर :- शुभ- तैजस और अशुभ- तेजस -- इस प्रकार तेजस शरीर दो प्रकार का है । प्रश्न : --- शुभ तेजस का क्या स्वरुप है ?
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अध्याय : पहला ]
[ १५ उत्तर :---शुभ-तेजस शरीर पप्ठम गुणस्थानवी वीतरागी साधु के होता है। जब मुनि
राज प्रसन्नचित्त हो गये हो तो सीधी (दाहिनी) भुजा से निकलकर १२ योजन
तक सुभिक्ष कर देता है, शुभ्र वर्ण का होता है और सूक्ष्म होता है । प्रश्न :--अशुभ-तैजस किसे कहते हैं ? उत्तर :-यह भी निर्गन्थ साधु के होता है, लाल वर्मा का होता है, महाभयंकर होना
है। जब मुनिराज पूर्व पापकर्म के उदय से क्रोधित हो जाते हैं और अपने . स्वरूप से च्युत होते हैं, तब उनके उल्टी (बायों) भुजा से अशुभ-तैजस
निकलता है और १२ योजन तक सबको जलाकर भस्म कर देता है और अन्त में मुनिराज को भी अला देता है। ये दोनों शरीर लब्धि-विशेष साधु
के होते हैं। प्रश्न :--पांचों शरीरों को सूक्ष्मता बताइये ? उत्तर :--. उक्त पांचों ही शरीर एक की अपेक्षा एक सूक्ष्म हैं । प्रौदारिक की अपेक्षा
वैक्रियक सूक्ष्म, वैक्रियक की अपेक्षा आहारक सूक्ष्म, आहारक की अपेक्षा ... तेजस सूक्ष्म और तैजस की अपेक्षा कार्माण सूक्ष्म होता है । . प्रश्न :--प्रदेशों की अपेक्षा ये पांचों ही शरीर कैसे हैं ? उत्तर :---ौदारिक शरीर की अपेक्षा असंख्यात गुगो प्रदेश (परमाणु) बैंक्रियक शरीर
में और वैक्रियक की अपेक्षा असंख्यात गुने प्रदेश याहारक शरीर में और
आहारक शरीर की अपेक्षा अनन्तगुणे परमाणु तैजस शरीर में और तेजस . शरीर की अपेक्षा कार्मारा शरीर में अनन्तगुरणे परमाणु होते हैं । प्रश्न :-अङ्गोपाङ्ग नामकर्म किसे कहते हैं ?.. उत्तर :---जिस कर्म के उदय से अंग और उपांगों की रचना होती है, उसे अंगोपांग
- नामकर्म कहते हैं। प्रश्न :- इसके कितने भेद हैं ? उत्तर --ौदारिक शरीरांगोपांग, वैक्रियक शरीरांगोपांग और आहारक शरीरांगो
. पांग--ये तीन भेद हैं । प्रश्न : अङ्ग और उपाङ्ग कितने प्रकार के हैं ? ... . उत्तर :--दो हाथ, दो पांव, नितम्ब, पीठ, वक्षःस्थल और मस्तकं ये ८ प्रकार के अंग :-.. , इनको छोड़कर बाकी सब उपांग हैं। .
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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :-ौदारिक शरीरंगोपांग किसे कहते हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से श्रीदारिक शरीर के अंगों की और उपांगों की रचना
होली है, उसे सौताकि गरी गोमांग कहते हैं। प्रश्न :--वैक्रियक शरीरांगोपांग किसे कहते हैं ? . उत्तर :--जिस कर्म के उदय से वैक्रियक शरीरांगोपांगों की रचना होती है, उसे
___ वैक्रियक शरीरांगोपांग कहते हैं। प्रश्न :--ग्राहारक शरीरांगोपांग किसे कहते हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से आहारक शरीरांगोपांगों की रचना होती है, उसे र
श्राहारक शरीरांगोपांग कहते हैं । .. प्रश्न :-~निर्माण नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से अंगोपांग की यथास्थान और यथाप्रमारप रचना होती.
है, उसे निर्माण नामकर्म कहते हैं । प्रश्न :--बन्धन नामकर्म किसे कहते हैं. ?. उत्तर :---शरीर-नामकर्म के उदय से ग्रहण किए हुए पुद्गल स्कंधों का परस्पर मिलन ।
जिस कर्म के उदय से होता है, उसे बन्धन-नामकर्म कहते हैं । प्रश्न :--इस बन्धन-नामकर्म के कितने भेद हैं ? उत्तर :--बन्धन नामकम के ५. पांच भेद हैं । औदारिकबन्धन नामकर्म, वैक्रियकबंधन
नामकर्म, आहारकवन्धन नामकर्म, तेजसबन्धन नामकर्म और कार्माणबन्धनः
नामकर्म । प्रश्न :---ौदारिक बन्धन नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :- जिस कर्म के उदय से औदारिक शरीर के परमाणु दीवार में लगे इंट और
गारे की तरह छिद्र सहित परस्पर सम्बन्ध को प्राप्त होते हैं, वह औदारिक
बन्धन नामकर्म है। इसी प्रकार अन्य भेदों का लक्षगा जानता। प्रश्न :-संघातनामकर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :--जिस कर्म के उदय से. औदारिकांदि शरीरों के प्रदेश. परस्पर छिद्र रहित . . . . . एकमेक होते हैं, उसे संघात नामकर्म कहते हैं। इसके पांच भेद हैं।
औदारिक संघात नामकर्म आदि ।
ह
.
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अध्याय: पहला ]
प्रश्न :- - संस्थान नामकर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से शरीर का आकार बनता है, उसे संस्थान नामकर्म कहते हैं ।
प्रश्न : - इस संस्थान नामकर्म के कितने भेद हैं ?
उत्तर :- समचतुरस्त्र संस्थान, न्यग्रोधपरिमंडल संस्थान, स्वातिसंस्थान, कुब्जक संस्थान, वामनसंस्थान और हुंडकसंस्थान - ये छह भेद हैं ।
प्रश्न :- समवतुरस्त्र संस्थान नामकर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर : --- जिस कर्म के उदय से शरीर का आकार ऊपर, नीचे तथा बीच में समान " विभाग से जैसे सांचे में ढला हो, वैसे होता है, उसे समचतुरस्त्र संस्थान नामकर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- न्यग्रोधपरिमंडलसंस्थान नामकर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से शरीर का ग्राकार सर्प की बामि ( बील) की तरह ऊपर पतला और नीचे मोटा होता है, उसे स्वातिसंस्थान नामकर्म कहते हैं ।
प्रश्न :-- कुब्जक संस्थान नामकर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :
- जिस कर्म के उदय से शरीर के बीच के भाग में बहुत से पुद्गलों का समूह इकट्ठा होता है अर्थात् पीठ कुछ उटी रहती है, उसे कुब्जक संस्थान नामकर्म कहते हैं ।
[ १७
प्रश्न : - - वामनसंस्थान नामकर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से शरीर बोना होता है, उसे वामनसंस्थान नामकर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- हुंडकसंस्थान नामकर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :---
- जिस कर्म के उदय से शरीर के अङ्गोपाङ्ग किसी खास प्रकार के न होकर बेडौल होते हैं, उसे हुडकसंस्थान नामकर्म कहते हैं ।
प्रश्न :---
- संहनन नामकर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से हड्डियों के बन्धन में विशेषता होती है, उसे संहनन
नामकर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- इस संहनन नामकर्म के कितने भेद हैं ? ..
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१८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि उत्तर :-इस संहनन नामकर्म के छह भेद हैं । ववर्षभनाराचसंहनन, वज्रनाराच
संहनन, नारायसंगन, अर्द्धनाराचसंहनन, कोलितसंहनन और असंप्राप्ता
सृपाटिकासंहनन - ये छह भेद हैं । प्रश्न :-बजर्षभनाराचसंहनन किसे कहते हैं ? उत्तर :---जिस कर्म के उदय से ऋषभ (वेष्ठन), नाराच, (कील) और संहनन
(हड्डियां) वज्र के समान अभेद्य होती हैं, उसे वज्रर्षभनाराच संहनन कहते हैं । । प्रश्न :-वज्रनाराचसंहनन का क्या स्वरूप हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से कोलें वा हड्डियां तो वन के समान होती हैं, परन्तु
वेष्ठन वन के समान नहीं होता है, उसे वज्रनाराच संहनन कहते हैं । प्रश्न :-नाराचसंहनन किसे कहते हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से सामान्य वेष्ठन और कीलिसहित हड्डियों होती है, उसे
नाराचसंहनन कहते हैं। . प्रश्न :--अर्धनाराचसंहनन किसे कहते हैं ? उत्तर :---जिस कर्म के उदय से हड्डियों की संधियां अर्धकीलित होती है, उसे अर्ध
नाराचसंहनन कहते हैं । प्रश्न :-कीलितसंहनन किसे कहते हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से हड्डियां परस्पर कीलित होती है, उसे कीलितसंहनन
___ कहते हैं। प्रश्न :-असंप्राप्तासृपाटिका संहनन किसे कहते हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से अलग-अलग हड्डियां नसों से बंधी होती हैं, परस्पर में
कीलित नहीं होती; उसे असंप्राप्तासृपाटिका संहनन कहते हैं। प्रश्न :-स्पर्श नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से शरीर में स्पर्श होता है, उसे स्पर्श नामकर्म कहते हैं।
इसके पाठ भेद है-हल्का, भारी, रूखा, चिकना, कडा, नरम, ठंडा, गरम
इन सवका अनुभब स्पर्श नामकर्म के द्वारा होता है । प्रश्न :- रस नामकर्म किसे कहते हैं ?
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अध्याय : पहला ]
।
उत्तर :-जिस कर्म के उदय से शरीर में रस (का ज्ञान) उत्पन्न होता है, उसे रस
नामकर्म कहते हैं । इस रस के ५ पांच भेद हैं - खट्टा, खारा, मीठा, कडवा,
कपायला। प्रश्न :--गंध नामकर्म किसे कहते हैं ? और उसके कितने भेद हैं ? उत्तर :-~-जिस कर्म के उदय से शरीर में गंध का ज्ञान प्रगट होता है, उसे गंध
नामकर्म कहते हैं । इसके दो भेद हैं -- सुगन्ध और दुर्गन्ध । प्रश्न :---दर्ण नामकर्म किसे कहते हैं ? उतर:-जिस कर्म के उदय से शरीर में (रूप) वर्ग होता है, उसे वर्ण नामकर्म
कहते हैं । इसके ५ पांच भेद हैं - काला, पीला, नीला, लाल और सफेद । ET :- नाक शिले कहते हैं और उसके कितने भेद हैं ? उत्तर ---जिस कर्म के उदय से विग्रहगति में (मरण से) पूर्व के शरीर के आकार में
प्रात्मा के प्रदेश रहते हैं, उसे पानुपूर्ण नामकर्म कहते हैं । इसके चार भेद हैंनरकगत्यानुपूर्व्य, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्व्य, मनुष्य गत्यानुपूर्य और देवगत्यानुपूर्व्य, जिस समय मनुष्य या तिर्यच्च मरकर नरफगति की ओर जाता है, उस समय उसके आत्मा के प्रदेशों का आकार वैसा ही बना रहता है, जैसा उसके पूर्व शरीर का प्राकार था, जिसे यह छोडकर आया है, उस आकार को
नरकगत्यादिनुपूर्दी कहते हैं । इसी तरह अन्य जान लेना । प्रश्न :-अगुरूलघु नामकर्म किसे कहते हैं ? '. उत्तर :--जिस नामकर्म के उदय से जीव का शरीर लोहे के गोले की तरह भारी
और पाक की रूई की तरह हल्का नहीं होता, उसे अगुरूलघु नामकर्म
कहते हैं। प्रश्न :-उपघात नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से अपने ही घातक (अपना ही घात करने वाले) .. प्रांगोपांग होते हैं, उसे उपवात नामकर्म कहते हैं । प्रश्न :-परघात नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से दूसरे के घातक (धात करने वाले) प्रांगोपांग होते
है, उसे परमात नामकर्म कहते हैं।
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।
२० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :--पातप नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से आतापकारी शरीर होता है, उसे आतप नामकर्म
कहते हैं । इसका उदय सूर्य के विमान में स्थित बादर पर्याप्त पृथ्वीकायिक .. जीवों में होता है ।.. ........ : .
प्रश्न :-उद्योत नामकर्म किसे कहते हैं ? । उत्तर :--जिस कर्म के उदय से उद्योतरूप शरीर होता है, उसे उद्योत नामकर्म कहते
हैं। इसका उदय चन्द्रमा के विमान में स्थित पृथ्वीकायिक जीवों के तथा
- खद्योत (जुगनू) अादि जीवों के होता है। प्रश्न :-उच्छवास नामकर्म किसे कहते हैं ?.. उत्तर :--जिस कर्म के उदय से शरीर में उच्छवास होता है, उसे उच्छवास नामकर्म
कहते हैं । प्रश्न : --विहायोगति नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से प्राकाश में गमन होता है, उसे विहायोगति नामकर्म
कहते हैं । इसके दो भेद हैं-प्रशस्त विहायोगति और अप्रशस्त विहायोगति। प्रश्न :-.-.प्रत्येक शरीर नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से एक शरीर का स्वामी एक ही जीव हों, उसे प्रत्येक
शरीर नामकर्म कहते हैं। प्रश्न :-साधारण नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से एक शरीर के अनेक जीव स्वामी होते हैं, उसे साधारण
नामकर्म कहते हैं। प्रश्न :---वस नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से जीय का द्वीन्द्रय आदि पर्यायों में जन्म होता है, उसे
बस नामकर्म कहते हैं। प्रश्न :--स्थावर नामकर्म किसे कहते हैं ? . .. उत्तर :--जिस कर्म के उदय से एकेन्द्रिय जाति में जीय का जन्म होता है, उसे स्थावर
. नामकर्म कहते हैं।
काम
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अध्याय : पहला ।
[ २१ प्रश्न :-सुभग नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :---जिस कर्म के उदय से अन्य जीवों को अपने से प्रीति होने योग्य शरीर
होता है, उसे सुभग नामकर्म कहते हैं। प्रश्न :-दुर्भग नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदयं से रूपादि गुराणों से युक्त होने पर भी दूसरे जीवों को
अपने से प्रीति नहीं होती है, उसे दुर्भग नामकर्म कहते हैं । प्रश्न :--सुस्वर नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तह :--जिस कर्म के उदय से स्वर (अावाज) सुरीला होता है, उसे सुस्वर नामकर्म - कहते हैं। प्रश्न :----दुस्वर नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :---जिस कर्म के उदय से स्वर अच्छा नहीं होता है, उसे दुस्वर नामकर्म
कहते हैं। प्रश्न :-शुभ नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से मस्तक प्रादि अवयव सुन्दर हो, उसे शुभ नामकर्म
कहते हैं। प्रश्न :--अशुभ नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :---जिस कर्म के उदय से शरीर के अवयव देखने में सुन्दर नहीं होते हैं, उसे .... शुभ नामकर्म कहते हैं। प्रश्न :--सूक्ष्म नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :----जिस कर्म के उदय से दूसरों को नहीं रोकने वाला और दूसरों से नहीं रुकने
. बाला शरीर प्राप्त होता है, उसे सूक्ष्मशरीर नामकर्म कहते हैं। प्रश्न :- बादरनाम कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से दूसरों को रोकने वाला तथा दूसरों से रुकने वाला
__ स्थूल शरीर प्राप्त होता है, उसे बादर नामकर्म कहते हैं । प्रश्न :---पर्याप्ति नामकर्म किसे कहते हैं ? ... . उत्तर :--जिस कर्म के उदय से अपने योग्य पर्याप्तियां पूर्ण होती हैं, उसे पर्याप्ति
नामकर्म कहते हैं।
RAMB २२rior
S
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संत ज
[ गो. प्र. चिन्तामणि
२२ ]
प्रश्न : --- पर्याप्ति किसे कहते हैं ?
उत्तर :-- जिस कर्म के उदय से जीव के एक भी पर्याप्ति पूर्ण नहीं होती, उसे अपर्याप्त नामकर्म कहते हैं ।
प्रश्न : --- पर्याप्ति किसे कहते हैं ?
उत्तर : -- ग्राहारवर्गरणा, भाषावर्गणा और मनोवगंगा के परमाणुओं के शरीर तथा इन्द्रियादि रूप परिमाने की शक्ति की पूर्णता को पर्याप्त कहते हैं । पर्याप्ति के छह भेद हैं- १. आहारपर्याप्ति २. शरीरपर्याप्ति, ३. इन्द्रियपर्याप्ति, ४. श्वासोच्छवासपर्याप्ति ५. भाषापर्याप्ति, ६ मनः पर्याप्ति । प्रश्न :-- पर्यातक के कितने भेद हैं ?
उत्तर :-- निवृत्यपर्याप्तक और लब्ध्यपर्याप्तक - ऐसे दो भेद हैं ।
प्रश्न :-- निवृत्यपर्याप्तक किसे कहते हैं ?
उत्तर:- ग्रपने-अपने योग्य पर्याप्तियों का प्रारम्भ तो साथ-साथ होता है, किन्तु ताक्रम से होती है । किसी जोव की जब तक शरीर पर्याप्तिपूर्ण नहीं होती; किन्तु नियम से पूर्ण होने वाली होती है, तब तक उस जीव की fretreator कहते हैं ।
प्रश्न :- लब्ध्यपर्याप्तक किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिसकी शरीर पर्याप्त पूर्ण हो जाती है, उसे पर्याप्तक कहते हैं । और जिसकी एक भी पर्याप्ति पूर्ण नहीं होतीं तथा श्वास के ग्रठारहवें भाग में मरण हो जाता है, उसे लब्ध्यपर्याप्तक कहते हैं ।
प्रश्न :- प्राहारपर्याप्ति किसे कहते हैं ?
उत्तर :- प्राहार वर्णना के परमाणुओं को खल वा रस भागरूप परिणामावने को कारभूत जीव की शक्ति की पूर्णता को ग्राहारपर्याप्त कहते हैं । प्रश्न : - शरीरपर्याप्ति किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिन परमाणुओंों को खलरूप परिणामवाया था, उनको हड्डि वगैरह कटिन श्रवयवरूप और जिनको सरूप परिणमवाया था, उनको रुचिरादिक स्वरूप परिणामावने के कारणभूत जीव की शक्ति की पूर्णता को शरीरपर्याप्ति: कहते हैं ।
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अध्याय: पहला
प्रश्न :-- इन्द्रियपर्याप्ति किसे कहते हैं ?
उत्तर :- श्राहार वर्गगा के परमाणुत्रों को इन्द्रिय के ग्राकाररूप परिणामावने को तथा इन्द्रिय द्वारा ग्रहण करने के कारणभूत जीव की शक्ति की पूर्णता को इंन्द्रिय पर्याप्त कहते हैं ।
[ २३
प्रश्न :-- श्वासोच्छवासपर्याप्ति किसे कहते हैं ?
उत्तर :- आहार वर्गमा के परमाणुत्रों को श्वासोच्छवासरूप परिणामावने के कारण• भूत जीव की शक्ति को पूरांता को श्वासोच्छवासपर्याप्ति कहते हैं ।
प्रश्न :-- भाषापर्याप्ति किसे कहते है ?
उत्तर :- भाषावर्गणा के परमाणुत्रों को वचनरूप परिणामावने के कारणभूत जीव की शक्ति की पूर्णता को भाषापर्याप्ति कहते हैं ।
प्रश्न : --- मनःपर्याप्ति किसे कहते हैं ?
उत्तर :- मनोवगंगा के परमाणुओं को हृदय स्थान में साठ पंखुड़ी के कमलाकार मनरूप परिमाने की तथा उसके द्वारा यथावत विचार करने की कारणभूत जीव की शक्ति की पूर्णता को मनःपर्याप्त कहते हैं ।
प्रश्न :- कितने इन्द्रिय वाले जीवों को कितनी पर्याप्तियाँ होती हैं ?
उत्तर :---
- एकेन्द्रियं के भाषा और मन के बिना चार पर्याप्तियां होती है । हीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञी पंचेन्द्रिय के मन के बिना पनि पर्याप्तियां होती हैं । संज्ञीपंचेन्द्रिय के छहों पर्याप्तियां होती हैं। इन सब पर्याप्तियों के पूर्ण होने का काल अन्तर्मुहूर्त है और एक-एक पर्याप्ति का काल भी अन्तर्मुहूर्त हैं । तथा सबका मिलाकर भी श्रन्तमुहूर्त ही है । और पहले से दूसरे, तीसरे का इसी तरह हट्ट तक का काल क्रम से बडा बडा प्रन्मुहूर्त है । प्रश्न :- स्थिर नामकर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से शरीर की धातुएँ ( रस, रुधिर, गांस, मेद, हाड,
मज्जा और शुक्र ) तथा उपधातुएं (वात, पित्त, कफ, शिरा, स्नायु, चाभ और जठराग्नि ) अपने-अपने स्थान में स्थिरता को प्राप्त होती है, उसे स्थिर नामकर्म कहते हैं ।
- अस्थिर नामकर्म किसे कहते हैं ?
प्रश्न :--
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२४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि उत्तर :-जिस कर्म के उदय से शरीर की धातुएँ तथा उपधातुएँ अपने स्थान में स्थिर
नहीं रहती, उसे अस्थिर नामकर्म कहते हैं । प्रश्न : प्रादेय नामकर्म किसे कहते है ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से शरीर में कान्ति होती है, उसे प्रादेय नामकर्म
कहते हैं। प्रश्न :-अनादेय नामकर्म किसे कहते हैं ? .. उत्तर :----जिस कर्म के उदय से शरीर में कान्ति नहीं होती, उसे अनादेय नामकम
कहते हैं। प्रश्न :- यशःकीति नामकर्म कहते हैं ? उत्तर :----जिस कर्म के उदय से संसार में जीव की प्रशंसा होती है, उसे वशःकीर्ति
नामकर्म कहते हैं । प्रश्न :-अयश कीर्ति नामकर्म किसे कहते हैं ? ..... उत्तर :-जिस कर्म के उदय से लोक में जीव की निन्दा होती है, उसे अयश कीति
नामकर्म कहते हैं। प्रश्न :-तीर्थकरत्व कम किसे कहते हैं ?
उत्तर :-जिस कर्म के उदय से तीर्थकरपद की प्राप्ति होती है, उसे तीर्थङ्कर नामकर्म ... कहते हैं । प्रश्न :-गोत्रकर्म किसे कहते हैं ? उसके कितने भेद हैं ?
उत्तर :---जिस कर्म के उदय से जीव का, उच्च या नीच गोत्र में जन्म होता हैं, जो ... गोत्रकर्म कहते हैं । इसके दो भेद हैं- १. उच्चगोत्र, २. नीचगोत्र। ..
प्रश्न :-उच्चगोत्र कर्म किसे कहते हैं ? ...... उत्तर :-जिस कर्म के उदय से उच्चगोत्र में जन्म होता है, उसे उच्चगोत्र कर्म कहते
. . हैं। इससे लोकमान्य पूज्य गोत्र मिलता है । प्रश्न :-नीचगीन कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :---जिस कम के उदय से प्रारगी का लोक निन्द्य नीच कुल में जन्म होता है,
- उसे नीचगोत्र कर्म कहते हैं। प्रश्न :--अन्तराम कर्म किसे कहते हैं ?
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अध्याय: पहला ]
[ २५
- जिस कर्म के उदय से दानादिक में विघ्न होता है, उसे अन्तराय कर्म कहते हैं । इसके पांच भेद हैं- १. दानाय २. लाभान्तराय, ३. भोगांन्तराय, ४. उपभोगान्तराय और ५. बीर्यान्तराय |
उत्तर :
प्रश्न :- दानान्तराय किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से दान देने की इच्छा होते हुए भी प्राणी दान नहीं कर सुकता, उसे दानान्तराय कहते हैं । इसी प्रकार और भी अन्तरायों का स्वरूप जान लेना ।
प्रश्न :-बंध कितने प्रकार का है और बंध का लक्षण क्या है ?
- यंत्र चार प्रकार का है। प्रकृति बंध, प्रदेश बंध, स्थिति बंध और अनुभाग बंध । अव बंध का लक्षण बताते हैं । कार्मणवर्गगारूप पुग्दले सम्पूर्ण लोक में ठसाठस भरे हुए हैं, कषाय के निमित से आत्मा के साथ, उनका सम्बन्ध हो जाता है | यही बन्ध कहलाता है । जैसे तत्वार्थ सूत्र में परिभाषा दी हैसकषायत्वाज्जीव: कर्मगो योगान्पुद्गलानादत्ते स बन्धः । १
उत्तर :
प्रश्न :-- कौनसा बंध किससे होता है ?
उत्तर
- प्रकृतिबंध और प्रदेशबंध योग से होते हैं। स्थितिबंध और अनुभागयंव कषाय से होते हैं ।
प्रश्न :- प्रकृति बंध किसे कहते हैं ?
उत्तर :- कर्मों में ज्ञानादिक के ढ़कने का स्वभाव प्रकृति बन्ध है ।
प्रश्न :-- प्रदेश बंध किसे कहते हैं ?
उत्तर :- आत्मा के योग-विशेषों द्वारा त्रिकाल में बंधनवाने, ज्ञानावरगादि कर्म प्रकृतियों के कारणभूत श्रात्मा के प्रदेशों में व्याप्त होकर कर्मरूप परिणम ने योग्य, सूक्ष्म, आत्मा के प्रदेशों में क्षीरनीर की तरह एक होकर स्थिर रहने वाले तथा अनन्तानन्त प्रदेशों का प्रभाग लिये प्रदेश बन्धरूप पुग्दल को प्रदेशवन्ध कहते हैं । कहा गया है
"नाम प्रत्ययाः सर्वतो योग विशेषात् सूक्ष्मक क्षेत्रावगाहस्थिताः सर्वात्म प्रदेशेश्वनन्तानन्त प्रदेशाः ।"२
तत्वार्थ सूत्र - अध्याय ८ सूत्रः २ । २. तत्वार्थ सूत्र ः अध्यायः ८, सूत्रः २४ ।
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२६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :--स्थिति बंध किसे कहते हैं ? उत्तर :-जानावरणादि कमी का अपने स्वभाव से चुत नहीं होने वाला स्थिति
बंध है। प्रश्न :-- अनुभाग बंध किसे कहते है ? उत्तर :--ज्ञानावरादि कर्मों में तोछ या मंद आदि फल देने की शक्ति को अनुभाग
बंध कहते हैं। प्रश्न :--ज्ञानावरमादि कर्मों को उत्कृष्ट स्थिति कितनी है ? उत्तर :-ज्ञानाबरण, दर्शनावरण, बेदनीय और अन्तराय इन चार कर्मों की उत्कृष्ट.
स्थिति तीस कोड़ाकोंडी सागर है। इस उत्कष्ट स्थिति का बन्ध संजी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।
मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोडाकोड़ी सागर की है। नाम, गोत्र की उत्कृष्ट स्थिति बीस कोडाकोड़ी सागर की है। प्रायु कर्म
की उत्कृष्ट स्थिति तैतीस कोड़ा कोड़ी सागर है ! प्रश्न :-ज्ञानावरमादि कर्मों की जघन्य स्थिति कितनी है ? उत्तर :-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय और आयु इन पांच कर्मों की
जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है । वेदनीय कर्म की जयन्य स्थिति बारह मुहूर्त
है । नाम व गोत्र की जघन्य स्थिति पाठ मुहूर्त है । प्रश्न :-पुण्यप्रकृतियां कौन-कौनसी हैं ? उत्तर :--देवायु, मनुष्यायु, तिर्यंचायु, सातावेदनीय, उच्चगोत्र, प्रशस्तगति, देवगति,
मनुय्यगति, देवगत्यानुपूर्वी, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, निर्मामा, श्वासोच्छ्वास, बंधन ५, संघात ५, देह ५, वर्ण ५, रस. ५, (स) तीन ग्रांगोपांग, शुभ, गन्ध २, आठ स्पर्श, अगुरुलघु, पंचेन्द्रिय, समचतुरस्र संस्थान, वज्रर्षभनाराचसंहनन, बादर, प्रत्येक, स्थिर, पर्याप्त, यसकोति, आतप, उद्योत, परघात, मुस्वर, सुभग, प्रादेय और तीर्थंकर ये ६८ पुण्यप्रकृतियां हैं । कर्मकाण्ड में इसे इस प्रकार गाथाबद्ध किया है.----.
"सादं तिरणेबाऊ उच्च गगर सुर दुगं च पंचिदी । देहा बन्धासंघा - देगो वंगाई · वगंगा चनो ।
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जघन्य मा
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अध्याय: पहला ]
समचउरबज्जरिसहं उवघा गुरू छक्क सग्गमरणं । तसवारसठुसठ्ठी, बादालम
भेददो
सस्था || १
प्रश्न :- पापप्रकृतियां कौन-कौनसी हैं ?
उत्तर:-- चारों घातिया कर्म की सैंतालीस प्रकृतियां, असातावेदनीय, नीचगोत्र, नरक आयु, समचतुरस्त्र संस्थान विना पांच संस्थान वज्वर्षभनाराच संहनन बिना, पांच संहनन, पांच वर्ण, पांच रस, नरक गत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगत्या नुपूर्वी, नरकगति, तिर्यंचगति, याठ स्पर्श, गंध दो, पंचेन्द्री, बिना चारों इंन्द्रियां 'वस्था, स्तविहायोगति, अस्थिर, अपर्याप्त सुक्ष्म, साधारण. उपवान, स्थावर, अशुभ, दुर्भग, दुस्वर, श्रनादेय, अयमकीति इन सब को मिलाकर सौ पाप प्रकृतियां हैं ।
इको गोम्मटसर में इस प्रकार गाथा बद्ध किया है—
"वादी गोवप्रसाद गिरयाऊ गिरयतिरियदुग जादी संठासंहृदां चदुपपरागं च बगायो ॥ उवषादमग्गमं थावरस्यं च अप्पसत्था हु । बंधुदयं पडि भेदे उदि सयं दुचदुरखीदिदरे ॥२ प्रश्न :- घातिया कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिसके उदय से जीव के ज्ञानादिक अनुजीवी गुणों का घात होता है, उसे घातिया कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :-- घातिया कर्म के कितने भेद हैं ?
उत्तर :- ज्ञानावरण के ५, दर्शनावरण के
[ २७
मोहनीय के २८ औ अन्तराय के ५ कुल मिलाकर घातिया कर्म के सैंतालिस भेद होते हैं ।
प्रश्न :-- प्रघातिया कर्म किसे कहते हैं ? और उसके किसने भेद हैं.
?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव के ज्ञानादि अनुजीवी गुणों का घात नहीं होता,
उसे अघातिया कर्म कहते हैं ।
गोम्मटसार: कर्मकाण्ड : गाथा ४१-४२ Tracer: कर्मकाण्ड : गाथा ४३, ४४ ।
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..
घातिका
[ गो. प्र. चिन्तामणि वेदनोग्र के २, आयु के ४, नाम ९३ और गोत्र के २ कुल मिलाकर प्राथा
शिया कर्म के १०१ भेद होते हैं। प्रश्न :--सर्वघाति कर्म किसे कहते हैं और उसके कितने भेद हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से अनुजीवी गुणों का पूर्ण रूप से घात होता हो, उसे सर्व
घाति कर्म कहते हैं। केवलज्ञानावरण एक, केवल दर्शनावरण एक, नीद्रा ५, अनन्तानुबन्धि की ४, अप्रत्याख्यानावरण की ४, प्रत्याख्यानावरण की ४,
मिथ्यात्व १ और सम्याड्.िमथ्यात्व १ कुल मिलाकर २१ प्रकृति सर्वघाति हैं। प्रश्न :--देशधाति कर्म किसे कहते हैं ? और उसके कितने भेद हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से जीव के अनुजीवी गुरंगों का एक देश घात होता है,
उसे देशवाति कर्म कहते हैं। मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञाना. वरा, मनः पर्यज्ञानावरण, चक्षुदर्शनाबरण, अचक्षुदर्शनावरगा, अवधि दर्शनावरगा, संज्वलन ४, नोकपाय है, एक सम्यकत्व, पांच अन्तराय ग्रे-संव
मिलाकर छदिवस देशघाति कर्म हैं। प्रश्न :---जीव विपाकी कर्म किसे कहते हैं ? और उसके कितने भेद हैं ? .. उत्तर :--जिस कर्म का फल जीव में होता है उसको जीव विपाकी कर्म कहते हैं।
इसके अठहत्तर भेद हैं । वातिया के ४७, गोत्र के २, वेदनीय के २, तीर्थकर प्रकृति, उच्छवास, बादर, सूक्ष्म, पर्याप्ति, अपर्याप्ति, सुस्वर, दुस्वर, आदेय, अनादेय, यश: कीति, अयशः कीर्ति, बस. स्थावर, प्रशस्तविहायोगति, अप्रशस्तविहायोगति, सुभग, दुर्भग, गति ४, जाति ५ सब मिलकर
अठहत्तर भेद होते हैं। . प्रश्न :--पुद्गल विपाकी कर्म किसे कहते हैं ? और उसके कितने भेद है ? . उत्तर :-जिस कर्म का फल पुद्गल में होता है, उसे पुद्गल विपाकी कहते हैं। इसके
बासठ भेद हैं। कुल कम 'प्रकृतियां १४८ हैं, उनमें से क्षेत्र विपाकी ४, भवविपाकी ४, जीवविपाकी ७८ इस प्रकार ८६ प्रकृतियां घटाने से जप
६२ प्रकृतियां पुद्गल विपाकी हैं । प्रश्न :-भबविपाको कर्म किसे कहते हैं ? भवबिपाको प्रकृतियां कितनी हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के फल से ‘जीवपर्याय में रहता है, इसकी चार प्रकृतियां हैं
PrastriANJA
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अध्याय: पहला ]
नरकायु, तिर्यञ्चायु, मनुष्यायु और देवायु 1
[ २
कर्म किसे कहते हैं ? और उसकी कितनी प्रकृतियां हैं ?
प्रश्नः
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव का आकार विग्रहगति में पूर्वपर्याय जैसा बना रहता है, उसे क्षेत्रविपाको कर्म कहते हैं, उसके चार भेद हैं- चारों गत्यानुपूर्वी । प्रश्न :- मिथ्यात्व गुणस्थाने में कौन-कौनसी प्रकृति का बन्ध होता है ? उत्तर :- कर्म की १४८ प्रकृतियों में स्पर्शादिक २० प्रकृतियों का अभेदविवक्षा से स्पर्शादिक चार में तथा बन्धन ५ और संघात ५ का, प्रभेद विवक्षा से पांच शरीरों में अन्तर्भाव होता है । इस कारण भेदविवक्षा से सर्व १४८ और भेदविवक्षा से १२२ प्रकृतियां बंध योग्य हैं ।
सम्यङिमथ्यात्व और सम्यक्प्रकृति इन दो प्रकृतियों का बंध नहीं होता ? क्योंकि इन दोनों प्रकृतियों की सत्ता सम्यक्त्व परिणामों से मिथ्यात्व प्रकृति के तीन खण्ड करने से होती है, इस कारण अनादि मिथ्यादृष्टि जीव की यन्ध योग्य प्रकृतियां १२० श्रीर सवयोग प्रकृतियां १४६ हैं ।
मिथ्यात्व गुणस्थान में तीर्थंकर प्रकृति, ग्राहारक शरीर और श्राहारकांगोपांग इन तीन प्रकृतियों का बन्धन नहीं होता, क्योंकि इन तीन प्रकृतियों का बन्ध सम्यग्दृष्टि के ही होता है । इसलिये मिथ्यात्व गुरणस्थान में ( १२० में ) ३ घटाने पर ११७ प्रकृतियों का बन्धे होता है । प्रश्न :- मिथ्यात्व गुरुस्थान में कितनी प्रकृतियों का उदय होता है ?.
उत्तर : सम्यक् प्रकृति, सम्यक् मिथ्यात्व आहारक शरीर, ग्राहारकागोपांग और तीर्थकर प्रकृति इन पांच प्रकृतियों का मिथ्यात्व गुरुणस्थान में उदय नहीं 'होता, इसलिये १२२ में पांच घटाने पर ११७ का प्रकृतियों उदय होता है । प्रश्न :- मिथ्यात्व गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों की सत्ता (सत्त्व) रहती है ? - मिथ्यात्व गुणस्थान में १४८ प्रकृतियों का सत्ता ( सत्त्व) रहती है । - दूसरे गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का बंध होता है ?
उत्तर :---- प्रश्न : --
जैन दर्शन में मिथ्यात्वादि १४ गुणास्थानों की चर्चा की गई हैं। प्रत्येक गुणस्थान में प्रकृतियों के बन्ध, उदय, सत्यं की चर्चा यहां से आगे करते हैं ।
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३० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
उत्तर :-- दूसरे गुणस्थान में १०१ प्रकृतियो का बंध होता है । क्योंकि सोलह प्रकृतियां कम हो जाती हैं । १७ प्रकृतियों का बंध पहले गुणस्थान में होता था, इसमें से १६ प्रकृतियों की व्युच्छिति हो जाती है, सो १६ घटाने पर १०१ रह जाती है, इन्हीं का इस गुणस्थान में बंध होता है । - व्युच्छित्ति किसे कहते हैं ?.
प्रश्न
उत्तर :- जिस गुम्पस्थान में जिन कर्म प्रकृतियों का बन्ध, उदय अथवा सत्य की व्युच्छित्ति कही है। उस गुणस्थान तक ही उन प्रकृतियों का बन्ध, उदय, अथवा सत्त्व पाया जाता है। यागे के किसी भी गुणस्थान में उन प्रकृतियों का वन्ध, उदय अथवा सत्त्व, नहीं होता है, इसी को व्युच्छित्ति कहते है । - द्वितीय गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का उदय होता है ?
प्रश्न -----
उत्तर :- पहिले गुणस्थान में जो ११७ प्रकृतियों का उदय होता है उनमें से मिथ्यात्व आतप, सूक्ष्म, पर्याप्त और साधारण इन पांच को मिथ्यात्व गुणस्थान की व्युच्छिन्न प्रकृतियों से घटाने पर १९२ रही । परन्तु नरकगत्यानुपूर्वी का इस गुगुणस्थान में उदय नहीं होता, इसलिये इस गुणस्थान में १११ प्रकृतियों का उदय होता हैं ।
प्रश्न :- द्वितीय गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का सत्त्व रहता है ?
उत्तर :- इस द्वितीय गुणस्थान में तीर्थंकर, ग्राहारक शरीर और आहारक गोपांग ये तीन नहीं रहती हैं, इसलिये इस गुगा स्थान में एक सौ पैतालिस का सत्व रहता है ।
प्रश्न :--- - तृतीय गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का बंध होता है ?
उत्तर :- तृतीय गुणस्थान में बन्धयोग्य प्रकृतियां १०१ थीं, उनमें से व्युच्छित प्रकृतियां पच्चीस, (अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ, स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, दुर्भग, दुःस्वर, प्रनादेय, न्यग्रोध परिमंडल संस्थान, स्वातिसंस्थान, कुब्जक संस्थान, वामनसंस्थान, अजूनाराचसंहनन, नाराच संहनन, श्रद्ध नाराचसंहनन, कोलित संहनन, अप्रशस्त विहायोगति, स्त्री वेद, नीचगोत्र, तिर्यगति तिर्यचगत्यानुपूर्वी, तिर्यगायु, उद्योत ) घटाने पर शेष रही ७६ प्रकृतियां । परन्तु इस गुणस्थान में किसी भी प्रयुकर्म का बन्ध
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अध्यायः : पहला ]
[ ३१ नहीं होता है, इसलिये छिहतर में से मनुष्यायु और देवायु इन दो के घटाने . पर तृतीय मिश्र गुणस्थान में ७४ प्रकृतियों का बन्ध होता है । नरकाबु
की पहले गुणस्थान में और तिर्यञ्चायु की दूसरे गुणस्थान में ही व्युच्छित्ति
हो जाती है।
.....
प्रश्न :- पृतीय पुराना किसानी गतियों का उदय होता है ? उत्तर :---दूसरे गुणस्थान में १११ प्रकृतियों का उदय होता है । इनमें से व्युच्छिन्न
प्रकृतियों ६ को (अनन्तानुबंधी ४, एकेन्द्रियादिक ४, स्थावर १ को) घटाने पर शेष १०२ में से नरकगत्यानुपूर्वी के बिना (क्योंकि यह दूसरे गुरणस्थान में घटाई जा चुकी है)। शेष की तीन आनुपूर्व घटाने पर (क्योंकि तीसरे गुरणस्थान में मरणा न होने से किसी भी प्रानुपूर्वी का उदय नहीं होता) शेर ६६ प्रकृतियां और एक सम्यक् मिथ्यात्व प्रकृति का उदय यहां होता है, इस कारण इस गुणस्थान में १०० प्रकृतियों का उदय
होता है। प्रश्न :--- तृतीय गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का सत्य रहता है ? उत्तर :- तृतीय गुस्थान में तीर्थङ्कर प्रकृति के बिना १४.७ प्रकृतियों का सत्व
रहता है। प्रश्न :----अविरत चतुर्थ गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का बंध होता है ? उत्तर :-तृतीय (मिश्र) गुणस्थान में ७४ प्रकृतियों का वन्ध होता है । उसमें
मनुष्यायु, देवायु और तीर्थंकर प्रकृति मिलाने पर ७७ प्रकृतियों का बन्ध
होता है। प्रश्न :---चतुर्थ गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का उदय होता है ? . उत्तर :--तृतीय गुणस्थान में १०० प्रकृतियों का उदय होता है, उसमें से व्युच्छिन्न
प्रकृति सम्यक् मिथ्यात्व को घटाने पर रही ६६ इनमें चार आनुपूर्वी और एक सम्यकप्रकृति मिथ्यात्व इन पांच प्रकृतियों की मिलाने पर चौधे
गुणस्थान में १०४ प्रकृतियों का उदय होता है । प्रश्न - चौथे गुरणस्थान में कितनी प्रकृतियों का सत्व रहता है ? तर:-सवका अर्थात् १४८ प्रकृतियों का, किन्तु क्षायिक सम्यग्दृष्टि के १४१ का
ही सत्व रहता है।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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प्रश्न :--पंचम गुणस्थान में कितने प्रतियों का बंध होता है ? । उत्तर :- चौथे गुरणस्थान में जिन ७७ प्रकृतियों का बन्ध कहा है, उनमें से व्युच्छिन्न
दस के अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ, मनुष्यर्गात, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, मनुष्यायु, औदारिकशरीर, औदारिकांगोपांग वर्षभनाराचसंहनन के ) घटाने पर शेष ६७ प्रकृतियों का देशविरत नामक पंचम गुणस्थान
में बन्ध होता है । प्रश्न :-पंचम गुणस्थान में कितनो प्रकृतियों का उदय रहता है ? उत्तर :- चौथे गुणस्थान में जिन १०४ प्रकृतियों का उदय' कहा है, उनमें से व्युच्छिन्न:
सत्रह प्रकृतियों के (अप्रत्याख्यानावर क्रोध, मान, माया, लोभ, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, देवायु, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, नरकायु, वैक्रियक शरीर, वैक्रियकांगोपांग, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, दुभंग अनादेय, अयशस्कीति के) घटाने पर शेप रही ८५ प्रकृतियों का पञ्चम गुरगस्थान में
उदय होता है। प्रश्न :-पंचम गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का सत्व रहता है ? उत्तर :--चौथे मुरगस्थान में जिन १४८ प्रकृतियों का सत्व कहा है, उनमें से व्युच्छिन्न
प्रकृति एक नरकायु के बिना १४७ का सत्त्व रहता है, किन्तु क्षायिक .
सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा से १४० का ही सत्व रहता है। प्रश्न :-छठवे गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का बन्ध होता है ? उत्तर :- पंचम गुणस्थान में जिन ६७ प्रकृत्तियों का बंध होता है, उनमें से प्रत्याख्याना
वरण क्रोध, मान, माया, लोभ इन ४ ब्युच्छिन्न प्रकृतियों को घटाने पर ।
शेष ६३ प्रकृतियों का प्रमतविरत नामक छठव में बन्ध होता है । . प्रश्न :- छठ गुणस्थान में कितनी प्रकलियों का उदय होता है ? उत्तर :--पंचम. गुणास्थान में जिन ८७ प्रकृतियों का. उदय रहता है, उनमें से
व्युच्छिन्न ग्रांठ प्रकृतियों के (प्रत्याख्यानावरमा क्रोध, मान, माया, लोभ, तिर्यञ्चगति, तिर्यग्गायु, उद्योत और नीचगोन के) घटाने पर शेष ७९.. प्रकृतियों में प्राहारक शरीर और ग्राहारक. प्रांगोपांग इन दो प्रकृतियों को। मिलाने से ८१ प्रकृतियों का इस गुणस्थान में उदय होता है।
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अध्याय : पहला ]
[ ३३ प्रश्न :-छठवें गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का सत्व रहता है ? उत्तर :--पंचम गुणस्थान में १४७ प्रकृतियों की सत्ता कही है, उनमें से व्युच्छिन्न
प्रकृति एक तिर्यञ्चगति को घटाने पर. १४६ प्रकृतियों का छठवें गुणस्थान में । सत्त्व रहता है। किन्तु क्षायिक सम्यग्दृष्टि में १३६ का ही सत्त्व कहा है । प्रश्न :--सातवें गुणस्थान में बन्ध कितनो प्रकृतियों का होता है ? उत्तर :-छठे गुणस्थान में जिन ६३ प्रकृतियों का बंध कहा है, उनमें से व्युच्छिन्न
प्रकृति छह के (अस्थिर, अशुभ, असाता, अयशस्कीति, अरति, शोक को) घटाने पर शेष रही ५७ में साहारक शरीर और ग्राहार प्रांगोपांग इन दो प्रकृतियों को मिलाने से सप्तम गुणस्थान में ५६ प्रकृतियों का वध
होता है। प्रश्न :- सप्तम गुणस्थान में उदय कितनी प्रकृतियों का होता है ? .. उत्तर :- छठे ग्रामस्थान में जो ८१ प्रक नियों का उदय कहा है, उनमें से ट्युछिन्न
प्रकृति पांच (आहारकशरीर, आहारकांगोपांग, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला,
और स्त्यानगृद्धि) के घटाने पर शेष रही ७६ प्रकृतियों का संप्सम गुण
स्थान में उदय होता है । प्रश्न :-सप्तम गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का सत्व रहता है ? उत्तर :- गास्थान की तरह इस गुगास्थान में भी १४६ की सत्ता रहती हैं।
.. किन्तु क्षायिक सम्यग्दृष्टि के १३६ प्रकृति का ही सत्व रहता है। प्रश्न :...-पाठवें गुणस्थान में बन्ध कितनी प्रकृतियों का होता है ? उत्तर :- सातवें गुणस्थान में जिन ५.६ प्रकृतियों का बन्ध कहा है, उनमें से म्यूछिन्न
प्रकृति एक देवायु को घटाने पर ५८ का बंध होता है । प्रश्त :-प्रायने गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का उदय रहता है ? . उत्तर :- सातवें गुगास्थान में जिन ७६ प्रकृतियों का उदय कहा है, उनमें से व्युस्छिन्न
प्रकृतियां बार (सम्यकप्रकृति, अर्द्धनाराचसंहनन, कीलक, प्रासंप्राप्तामृपाटिकासंहनन) के घटाने पर शेष ७२ प्रकृतियों का अष्टम् गुणस्थान में उदय होता है।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :- ग्राठवें गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का सत्व रहता है ? उत्तर :----सातवें गुणस्थान जो १४६ का सत्त्व कहा है, उनमें से युच्छिन्न प्रकृतियां
अनन्तानुवन्धी क्रोध, मान, माया. लोभ इन चारों को बटाने पर द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि उपशम थे गगी वाले के दर्शनमोहनीय का तीन प्रकृति रहित १३६ का सत्त्व रहता है । और क्षपक श्रेणी वाले के सातवें गुणास्थान की ज्युझ्छिन्न प्रकृतियां पाठ को (अनन्तानुबन्नी क्रोध, मान, माया.. लोभ, तथा दर्शन मोहनीय की ३ और एक देयायु को) बटाकर शेष १३८ ।
प्रकृतियों का सत्त्व रहता है। प्रश्न :-नवम गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का बन्ध होता है ? . उत्तर :- पाठवें मुस्थान में जिन ५८ प्रकृतियों का बन्ध कहा है, उनमें से व्युच्छिन्न
प्रकृतियां छतिस . (निद्रा, प्रचला, तीर्थकर, निर्भागा, प्रशस्तविहायोगति, पंजाष्ट्रिय जाति, जसम, कार्माणशरीर, आहारकशरीर पाहारक. प्रांगोपांग, समचतुरस्त्र-संस्थान, चैकिय यांगोपांग, देवमति, देवगत्यानुपूर्वी.. रूप, रस, गंध, स्पर्श, अगुरूलघुत्य, उपधात, परघात, उच्छवास, ससा, बादर पर्याप्त, प्रत्येका, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, हास्य, रति, जुगुमा, भय).
को चटाने पर शेष. २२ प्रकुतियों का नवा गुगास्थान में बन्ध होता है। प्रश्न :--नवम गुणस्थान में उदय कितनी प्रकृतियों का होता है ? । उत्तर :--- अष्टम गणस्थान में जिन ७२ प्रकृतियों का उदय होता है, उनमें से व्युच्छिन्न ।
प्रकृतियां छह (हास्य, रति, अरति, मोक, अय, जुमुरमा) को घटाने पर
शप ६६ प्रकृतियों का उदय होता है। प्रश्न :-नवम गुरणस्थान में सत्य कितनी प्रकृतियों का होता है ? उत्तर :----अष्टम गुराणस्थान की तरह इस. गुणास्थान में भी उपशाम श्रेणी बाले. ___ द्वितियोपशमसम्यग्दाटी के १४२, क्षसिम्यग्दृष्टी के १३६ और क्षपकोणी
वाले के १३८ प्रकृतियों का ही सत्त्व रहता है। प्रश्न :- दशम गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का बंध होता है ? उत्तर :-नवम गुरास्थान में जिन २२ प्रकृतियों का बन्ध होता है, उनमें से ज्युच्छिन्न .. प्रकृतियां पांच (पुरुषवेद, संज्वलन. क्रोध, मान, माया, लोभ) को घटाने पर
शेष १७ प्रकृतियों का यहां बन्ध होता है ।
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श्रध्याय: पहला ]
प्रश्न
उत्तर
प्रश्न
उत्तर
- दशम गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का उदय होता है ?
नवम गुणस्थान में जिन ६६ प्रकृतियों का उदय होता है, उनमें से व्यच्छिन प्रकृतियां छह स्त्रीवेद, पुरुपवेद, नपुंसकवेद, संज्वलन क्रोध, मान, माया की त्रुटाने पर शेष ६० प्रकृतियों का दशम गुणस्थान में उदय होता है । - दशम गुणस्थान में सत्व कितनी प्रकृतियों का रहता है ? -उपशम श्रेणी में तो नवम गुणस्थान की तरह द्वितीयोपसम्य सम्यग्दृष्ट के १४२ र क्षायिकसम्यन्दृष्टि के १३६ और पक श्रेणी बाले के नवम गुणस्थान में जिन १३८ प्रकृतियों का सत्व है, उनमें से प्रतियां छत्तिस तिर्यग्यति तिर्यग्गत्यानुपूर्वी विकलत्रय की रे, प्रचला, स्त्यानगृद्धि, उद्योत में एकेन्द्रिय, साधारण निद्रानिद्रा, सूक्ष्म, स्थावर, ग्रप्रत्याख्यानावरण की ४, प्रत्याख्यानावरणकी ४, काय, की संज्वलन क्रोध मान माया नरकगति नरक गत्यानुपूर्वी को वटा शेष १०२ प्रकृतियों का.. दशम गुणस्थान में सरव रहता है |
प्रचला
३५
?
प्रश्न :- ग्यारहवें गुरणस्थान में बन्ध कितनी प्रकृतियों का होता है उत्तर:- दशम गुणस्थान में जिन ७ प्रकृतियों का यंत्र होता था, उनमें से व्युच्छिन्न प्रकृतियां १६ अर्थात् मानावरण की ५ दर्शनावरण की ४ अन्तराम की ५, यशस्कीर्ति उच्चोत्र ? के घटाने पर शेष एक मात्र सातावेदनीय का ग्यारहवे गुणस्थान में बंध होता है ।
प्रश्न :--- ग्यारहवें गुरणस्थान में उदय कितनी प्रकृतियों का होता हैं
?
उत्तर
- दसवें गुगास्थान में जिन ६० प्रकृतियों का उदय होता है, उनमें से व्युच्छिन्न प्रकृति एक संचलन लोभ को घटाने पर शेष प्रकृतियों का ग्यारहवे गुणस्थान में उदय होता है ।
प्रश्न :- यारहवें गुणस्थान में सत्त्व कितनी प्रकृतियों का होता है ?
उतर
-नवम गुणस्थान और दशम गुरणस्थान की तरह द्वितीय सम्यग्दृष्टी के. १४२ और क्षायिक सत्यदृष्टी के १३६ प्रकृतियों का ग्यारहवें गुणस्थान में सत्व रहता है ।
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Siri
[ गो. प्र. चिन्तामणि मी प्रश्न :---बारहवें गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का बन्ध होता है ? उत्तर :--एक साता वेदनीय मात्र का बंध होता हैं। प्रश्न :--बारहवें गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों उदय है ? उत्तर :-ग्यारहवें गुणस्थान में जिन' ५६ प्रकृतियों का उदय होता है, उनमें से बच्च
नारात्र और नाराच इन दो. व्युच्छिन्न प्रकृतियों के घटाने पर ५७ प्रकृतियों
___ का बारहवें गुणस्थान में उदय होता है । प्रश्न :- बारहवें गणस्थान में सत्त्व कितनी प्रकृतियों का होता है ? उत्तर :-- दशवें गुरगस्थान में क्षपक श्रेणी वाले की अपेक्षा १०२ प्रकृतियों का सत्त्व
है, उनमें से व्युच्छिन्न प्रकृति संज्वलन लोभ को घटाने पर शेप १०१
प्रकृतियों का बारहवें गुरास्थान में सत्व रहता है । . प्रश्न :-तेरहवें गुणस्थान में बन्ध कितनी प्रकृतियों का होता है ? उत्तर :- एक मात्र साता वेदनीय का बन्ध होता है। प्रश्न :- तेहरवें गुरणस्थान में उदय कितनी प्रकृतियों का होता है ? उत्तर :--बारहवें गुरगस्थान में जिन सत्तावन प्रकृतिकों का उदयं होता है, उनमें से
दच्छिन्न प्रकृत्तियां सोलह ज्ञानावरण की ५, अन्तराय की ५, दर्शनावरण का की ४, निद्रा और प्रचला को घटाने पर शेष ४१ प्रकृतियों में तीर्थंकर की अपेक्षा से एक तीर्थकर प्रकृति को मिलाकर ४२ प्रकृतियों का तेरहवें गुण
स्थान में उदय होता है। प्रश्न :-तेहरवें गुणस्थान में सत्त्व कितनी प्रकृतियों का होता है ? उत्तर :-बारहवें गुणस्थान में जिन १०१ प्रकृतियों का सत्त्व है, उनमें से व्युछिन्न ।
प्रकृतियां सोलह (ज्ञानावरण की ५, अन्तराय की ५, दर्शनावरण की ४ निद्रा १, प्रचला) को घटाने पर शेष . ८५. प्रकृत्तियों का तेरहवें गुरणस्थान
में सत्त्व रहता हैं। - प्रश्न :--चौदहवें गुणस्थान में बन्ध कितनी प्रकृतियों का होता है ? . ... उत्तर :- तेरहवें गुणस्थान में जिन एक साता वेदनीय का बन्ध होता था, उसकी उसी
गुणास्थान में ब्युपिछत्ति होने से प्रयोग केवली गुणस्थान में किसी भी प्रकृति का बन्ध नहीं होता है ।
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अध्याय: पहला |
| ૨૬
प्रश्न :
- चौदहवें गुरणस्थान में उदय कितनी प्रकृतियों का होता है ? उत्तर :- तेरहवें गुरगस्थान में जिन ४२ का उदय होता है, उनमें से व्युच्छिन्न प्रकृतियां तीस ( वेदनीय १ बज्रऋषभनाराचसंहनन १, निर्माण २, स्थिर १, अस्थिर १ शुभ, अशुभ, सुस्वर, दुःस्वर, प्रशस्तविहायोगति १, प्रशस्तविहायोगति, श्रीदारिक शरीर आङ्गोपाङ्ग, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरख संस्थान, न्यग्रोध, स्वाति, कुटजक, वामन, हुण्डक, स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, अगुरुलघुत्व, उपघात, परघात, उच्छवास और प्रत्येक को घटाने पर शेष बारह प्रकृतियों का वेदनीय १, मनुष्यगति, मनुष्यायु, पञ्चेन्द्रिय जाति, सुभग, बस, बादर, पर्याप्त, आय, यशः किति, तीर्थंकर प्रकृति और उच्चगोत्र १ का ) प्रयोग केवली गुणस्थान में उदय होता है । - चौदहवें गुणस्थान में सत्त्व कितनी प्रकृतियों का होता है ?
प्रश्न
उत्तर :- तेरहवें गुणस्थान की तरह इस गुणस्थान में भी ८५ प्रकृतियों का सत्व है, परन्तु हि चरम समय में ७२ और अन्तिम समय में १३ प्रकृतियों का सत्त्व नष्ट करके अरिहन्त भगवान मोक्ष जाते हैं ।
प्रश्न :- - कौनसे संहननवाला जीव कहां पैदा होता है ?
उत्तर :- च्या संहननों वाले जीव छठे नरक में जा सकते हैं। स्फाटिक और कीलक संहनन वाले जीव छठें नरक में नहीं जा सकते हैं । इसीलिये यदि के चारों छठे तक कहे हैं। कीलक और स्फाटिक दोनों संहनन की छटे में गति नहीं हैं। पहले वज्र वृषभनाराच संहनन वाले जीव सातवें नरक में जा सकते हैं । वज्ज्र वृषभनाराच संहनन वाले को छोड़कर पांच संहनन वाले जीव सातवें नरक में नहीं जा सकते हैं। छहों संहनन वाले जीव तीसरे नरक तक जा सकते हैं। पांच संहनन वाले जीव पहले से लेकर चौथे, पांचवें नरक तक जा सकते हैं । और स्फाटिक संहतन वाला जीव तीसरे से आगे नहीं जाता है - यह नियम है । स्फाटिक संहनन वाला जीव तीसरे तक ही जाता है, इसीलिये चौथे, पांचवें में पांच संहनन सहित जीव की गति होती है ।
-छहो संहनन वाले जीव स्वर्ग में जावें तो कहां तक जावें ?
-यहीं संहनन वाले जीव पहले स्वर्ग से लेकर आठवें स्वर्ग तक जाते हैं ।
प्रश्न
उत्तर :
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[ गो. प्र. चिन्तामणि पांच संहनन वाले जीव पहले से लेकर बारहवें स्वर्ग तक जाता है और स्फाटिक संहनन आठवें स्वर्ग से ऊपर नहीं जाता है-यह नियम है। इसलिये आदिके पांच बारहवें तक जाते हैं। चारों संहनन बाले जीव पहले में लेकर सोलहवें नमर्ग तक अगा। हिना कला बारहवें से ऊपर नहीं जायेगा, इसीलिए अादि के चारों संहनन कहे हैं। कीलक और स्फाटिक के बिना बज्न वृषभनारान्त्र, बज्वनाराच, नाराच तीन संहनन वाले जीव नौ ग्रोवेयक तक जाते हैं । अन्त के तीनों अद्ध नाराच, कीलक, स्फाटिक संहनन बाले जीव नौ प्रवेयक तक नहीं जाते हैं-ऐसा नियम है । वज. वृषभनाराच संहनन इन दो संहनन वाले जीव नब अनूदिश विमानों तक जाते हैं । और अन्त के नाराच, ग्रई नाराच, कीलक, स्फाटिक इन चार संहनन वाले जीय अनुदिश विमान में नहीं जाय-यह नियम है । एक माद्रिका वनवृषभनाराच संहनन वाला जीव पांच अनुत्तर विमान तक जाला है और पांच संहनन वाले नहीं जाते हैं यह नियम है । पहले संहनन के बिना अन्य संहनन बाले नहीं जाते हैं। जो जीव चरम गरीरी है, उसके एक पहला बनवृषभनागच संहनन होता है, अन्य संहनन नहीं होता है यह नियम है। चरम शरीरी मान जिसके संसार का अन्त आ गया है, प्रागे अव शरीर
धारण नहीं करेगा और नियम से मोक्ष ही जायगा । प्रश्न :-छहों काल के जीवों को कौन-कौनसा संहनन होता है और मर कर कहां
पैदा होते हैं ? - —पहला काल सुखमासुलभा । इस काल में निरंतर सुख ही सुख है कल्पवृक्षः से प्राप्त सामग्री से सुख भोगते हैं । पहले काल में उत्तम भोग भूमि रहती है, दुसरे काल में मध्यम भोग भूमि है । इस काल का नाम सुरुमा है। तीसरे काल. का नाम सुख मादुखमा है, इस काल में पहले प्रादि में मुखं और अन्त में दुःख.. होता है, इन तीनों कालों में वज्ज वृषभ नाराच संहनन होता है । इन तीनों काल.
में भोग भूमि की रचना रहती है । इन कालों के जीवों का छींक तथा जभाई ..... आने पर मरण होता है । जुगलिया को और जुगलिया ही पैदा होते हैं और
पैदा होते ही माता-पिता का मरन हो जाता है, यो भोग भूमि के जीव मर कर. - नियम में देवं ही होते हैं । जो समादृष्टी है, ये तो सौधर्म और ऐशान स्वर्ग में
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अध्याय : पहला
जाते हैं और मिथ्यादष्टी जीव भवत्रिक में जाते हैं और चौथे काल का नाम दुःखमासुखमा है । जैसे किसान पहले खेती कर के खाता है, वैसे ही इस काल के जीब पहले दुःख पाकर धन्न उपार्जन करते हैं, फिर सुख से खाते हैं । इसी चतुर्थ' काल में प्रेषठशलाका पुरुष उत्पन्न होते हैं। इस काल में छहों ही संहनन रहते हैं। पांचवे काल का नाम दुखमा है । इस काल के जीव निरन्तर दुःख ही भोगते हैं। इस पंचम काल में अन्त के तीन. संहनन होते हैं । अादि के तीन संहनन नहीं होते हैं और कर्मभूमि की स्त्री
के तीन संहनन होते हैं । अर्द्ध नाराच संहनन, कीलक, स्फाटिक, ये तीन - संहनन अन्त के सदा ही होते हैं। छठवें काल का नाम दुख मादुःखमा है । . इस काल के जीव महान घोर दुःख ही पाते हैं । इस काल में एक स्फाटिक
सहनन ही होता है । दुसरा कोई भी संहनन नहीं होता है। वीन्द्रिय, त्री इन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंनी पंचेन्द्रिय इन विकल चतुक को एक अन्त का फाटिक संहनन होता है, अन्य दुसरा कोई संहनन नहीं होता है । पंच
स्थावर को कोई संहनन नहीं होता है, क्योंकि वे एकेन्द्रिय हैं। प्रश्न :---कौन-कौन से गुरणस्थान वाले जोव को कौन-कौन से संहनन होते हैं ? उत्तर :-छहों संहनन बाले जीव मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, असंयम, देशसंयम,
प्रमत, अनभन तक पाये जाते हैं। वन वृषभ नाराच, वन नाराच, नाराच ये ग्रादि के तीन संहनन वाले जीव ग्यारखें गुगणास्थान तक ही पाये जाते हैं । अन्त के तीनों संहनन वाले जीव श्रेणी आरोहणा कभी नहीं करते हैं, इसीलिये इन जीवों का सातवां गुणस्थान होता है। क्षपक श्रेगी आरोहरा करने वाले जीवों का तेहरवाँ गुगास्थान होता है, आगे प्रयोग गुणस्थान होता है-सो उसमें संहनन ही नहीं होता है।
- दश प्रकार का बंध कौनसा है ?. उत्तर - जीवों के परांति के भदं से कर्म के बंध दश प्रकार से होता है । जीव ने पर में बुद्धि की इसलिये कर्म का बंध हुआ।
(१) जो प्रकृति उदय याये विना न खिरे उसे उदयबंध कहते हैं। (E) जो प्रायु कर्म के बिना सात कर्मों की प्रकृति जबरदस्ति उदीरणा करके
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। गो. प्र. चिन्तामणि
क्षय कर डाले, उसे उदीरणा बंध कहते है ।(३) प्रकृति बंध होकर उदय आवेनहीं, सत्ता में पड़ा रहे, सो सत्ता बंध है (४) उत्कर्षा परिणामों से जो प्रकृति बांबी थी, फिर परिणामों का निमित पाकर उस प्रकृति की स्थिति बढाये, उसका नाम उत्कर्षण बंध है ।(५) भुज्यमान आयु के बिना और जिस प्रकृति का बंध किया था, फिर परिणामों का निमित पाकर उस प्रकृति की स्थिति । घटाये, उसका नाम अपकरण बंध है। (६) जो प्रकृति वांधी थी, फिर परिगागों के निमित पाकर ताकत से उस प्रकृति को और प्रकृति में मिला दे उसका नाम संक्रमगा बांध है। (७)जो कर्म प्रकृति की उदीरणा न होय, सो उपसमा बंध हैं । (८) जो कर्म प्रकृति बांधी थी फिर वह प्रकृति और प्रकृति में नहीं मिले और उस प्रकृति की उदीरमा भी नहीं होती, उसका नाम निधत्तबंध । कहते हैं । (5.) जो कर्म प्रकृति बांधी थी उस प्रकृति की प्रकृति की स्थिति न घटती है, न बढ़ती है, न जुदीरणा होती हैं, न संक्रमण होती है । ऐसे चार प्रकार के भेद से रहित सौ निःकाचित. वंध हैं। इस प्रकार का दश प्रकार
का बंध जिनागम में कहा है। प्रश्न :-आयु कर्म के बंध के नी भेद कौन कौनसे है ? उत्तर :---प्रायु कर्म का बंध विभाग में होता है। देव और नारको के प्रायु का
जव छह महीना शेष रहे तब प्रिभाग पड़ता है । भोग भूमि के मनुष्य और। तिर्यञ्ज जीव के प्रायु के नौ महीना शेष रहे, तव विभाग पड़ता है। कर्म भूमि के जीव एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय पर्यत सम्पूर्ण स्नायु का निभाग:
१
पड़ता है।
त्रिभंगी किसे कहते हैं, सो बताते हैं। प्रायु के तीन भाग करें । जब दो । भाग खत्म हो जाने पर तीसररे भाग के प्रादि अन्तर्मुहूर्त के अन्दर बंध । पड़ता है । अगर नहीं पड़ा तो जितनी अायु शेष रही, झिर उल का विभाग पड़ेगा, इस प्रकार नौ बार अायु बंधने का समय अाता हैं। इसको अायु
त्रिभंगी कहते हैं । प्रश्न :--आयुबध त्रिभंगी का दृष्टान्त क्या है ? - उत्तर :--जैसे पहले प्रायु के पैसठ सी इकसठ भाग करें। उसकी तिहाई इकाईस सौ ।
..
..
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अपार : पहला.....
..
सत्यासी बाकी रहे, तब बंध का अवसर प्राता है । अगर यहां भी प्रायु नहीं बंधी तो फिर इवकइससी सत्यासी का त्रिभाग करे । उसका त्रिभाग सातसो
उनतीस बाकी रहेगा अगर इसमें भी प्रायु नहीं बंधी तो फिर विभाग करे । ... उसका विशाग दो सौ तैतालिस बाकी रहे, तब आयु बंध होता है । अगर . ... इसमें भी नहीं बंधी तो, फिर विभाग करे । बाकी रही इवयासी - इस .. प्रकार त्रिभाग करते जाय । शेष सताइस इसका त्रिभाग है, इसका त्रिभाग
३, इसका त्रिभाग एक रहता है -- इस प्रकार पाठ बार आयु बंधने का समय माता है । इसमें भी नहीं बंधी तो मरण के अन्त समय में निश्चित ही
आयु बंधती है। विभाग बिना इस जीव के प्रायु का बंध नहीं होता है। प्रश्न :-गुरणस्थानों का गमनागमन किस प्रकार है ? ... . उत्तर :--- मिथ्यात्व गुग्गस्थान के मार्ग चार हैं । प्रश्रम मिथ्यात्य से निकल कर तीसरे
. गुगास्थान तक जाता है । द्वितीय कोई जीव मिथ्यात्व से चौथे गुरपस्थान
तक जाता है । तृतीय कोई जीव मिथ्यात्व से निकलकर पांचवें गुरगस्थान में जाता है। चतुर्य कोई जीव मिथ्यात्व से. सातवें गुणस्थान तक जाता है
यह मिथ्यात्व गुणस्थान का मार्ग जानना। .... दूसरे सासादन गुणस्थान का एक मार्ग है । सासादन गुग्गस्थान से
च्युल जीव मिथ्यात्व गुणास्थान में हो पाता है, अन्यत्र कहीं भी नहीं ..:. जाता है। . . . . . . . . . . . . .
: तीसरे मिथः गुणस्थान के दो मार्ग हैं। मिश्र से ऊपर चढ़े तो चौथे में जाता है और नीचे गीरे तो पहले गुशास्थान में प्राता है। .
चौथे गुणास्थान के पांच मार्ग हैं । चौथे गुणस्थान से नीचे गोरे तो
प्रथम मिश्र मुणस्थान में आता है । द्वितीय टूसरे सासादन गुणस्थान में .... पाता है। तृतीय प्रथम गुणस्थान में आ जाता है - ये तीन मांगे तो
गीरने की अपेक्षा से है और चौथे गुगास्थान से उपर चढ़े तो पांचवें अथवा सातवें गुणस्थान में पहुंच जाता है । ये पांच मार्ग है ।
पांचवे देशवत गुणस्थान के पांच : मार्ग हैं। पांचवें गणस्थान से 6. ऊपर छुढे तो सातवें गुणास्थान अप्रमत्त में जाता है। पांचवें से नीचे गहीरे .
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४२ ]
। गो. प्र. चिन्तामसि तो चौथ में अथवा तीसरे में अथवा दूसरे में वा पहले में ये चार मार्ग गीरने के हैं - इस प्रकार पांचवें गुणस्थान के पांच मार्ग हैं ।
छठे गुग्गस्थान के छह मार्ग हैं । छठे से ऊपर चढ़े, तो सातवें में जाता . : है और नीचे गोरे, तो पांचवें अथवा चौथे में अथवा तीसरे में अथवा दुसरे
में अथवा पहले में जाता है । गीरने के पांच मार्ग और चढ़ने की अपेक्षा एक, ये छह मार्ग छठे गुणस्थान के हैं।
सातवें अप्रमत्त गुणस्थान, पाठवें अपूर्वकरण गुणस्थान, अनिवृत्तिकरण गुग्णस्थान, दशयां सूक्ष्म सोगराय गुणास्थान ये चार गुणस्थान उपशम .. श्रेणी के हैं। सातवें, पाठवें, नववें, दशवे इन चारों गुणस्थान की अपेक्षा सीन-तीन मार्ग हैं । नोचे गीरे तो एक-एक गुणस्थान चारों अनुक्रम से गीरे और ऊपर, चढे तो एक-एक गुणस्थान अनुक्रम से ऊपर चढे और जो भरे तो चतुर्थ गुणस्थान में श्रावे, तव अवतरूपकार्मागा निकले और देवगति को प्राप्त करे।
. . . ग्यारहवें उपशात कपाय गुणस्थान इसके दो मार्ग हैं। नीचे गोरे तो दशवे सूक्ष्मसापराय गुणस्थान में ग्रावे और मरण हो तो चौथे में प्राकर
मरण होता है और नियम से देव होता है । ऐसा ही नियम जिनागम का है। प्रश्न :--पाठों कर्मों के नाठों दृष्टान्त कौन-कौनसे हैं ? उत्तर :---अव यहां पर पाठों कमों के अलग-अलग दृष्टान्त कहते हैं।
(१) जैसे प्रतिमा पर पहा डालने से प्रतिमा दिखाई नहीं देती हैं, वैसे ही ज्ञानावरणीय कर्म आत्मा के ज्ञान गुण को पाच्छादित करता है । सो ज्ञानगुण के प्रगट हुवे बिना वस्तु को नहीं जाने, ज्ञानगुरण का प्रावरण
जब हट जाय तब ही यथावत् पदार्थ का स्वरूप जाने। . . . (२) जैसे दरवाजे का दरबान (पहरेदार) राजा के पास नहीं जाने
देता है, उसी प्रकार दर्शनावरणीय कर्म दर्शनगुराग को प्रकट नहीं होने देता है । दर्शन के बिना पदार्थ का स्वरूपा यथावत् देखने का अभाव होता है।
. (३) जैसे शहद लपेटी तलवार की धार चाटने से शहद से मह मीठा होता है, और जीभ कट जाने से दुःख भी होता है, वैसे वेदनीयकर्म जो
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अध्याय : पहला ]
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उदय में आये तब सुख-दुःख रूप हो जाय, लौकिक सुख में अपने को सुखी : जाने, दुःख में अपने को दुःवी माने, मुख तो थोडा लेकिन दुःख तो बहुत
हैं, यह वेदनीयकर्म है । : जैसे शराब पीने से पागल होता है, कुछ भान नहीं रहता हैं, वैसे ही
ही मोहनीय कर्म के उदय से जीव मोह में मतवाला हो जाता है और विपरीत कार्य करने लग जाता, समझाने पर भी नहीं समझता है । : ...... जैसे चोर का काठ (लकडी) में पांच घुसाकर सांकल से बांध दिया जाय, तो वह कहीं पर भी नहीं जा सकता है, वैसे प्रायु कर्म जब अगली गति बंधती है, तब वर्तमान गति को छोड़े नहीं छुटे, नायु पहले बंधे बिना शरीर को प्रात्मा नहीं छोडता है। - जैसे चित्रकार नाना भांति के चित्र बनाता है, वैसे ही नामकर्म के उदय से जीव एकेन्द्रियादि नाना प्रकार की गति में भ्रमणा करता है, नाना प्रकार के रूप धारण करता है - यह नाम कर्म का ही कार्य है।
___ जैसे कुम्हार नाना प्रकार से छोटे बड़े बर्तन बनाता है, वैसे ही गोत्रकर्म जीव को ऊँच नीच कुल में उत्पन्न कराता है।
जैसे गजा तो दान देना चाहे और भंडारी मना करे; वैसे ही जीव .. तो कोई कार्य करना चाहता है, परन्तु उस कार्य में अन्तराय पड जाता है।
उस कार्य को नहीं होने देता है। . इन्हीं माठ कर्मों के उदाहरणो को चर्चाशतक में छन्दबद्ध किया है - "देव परयो है पट रूपकौं न ज्ञान होय ।।
जैसे दरवान भूप देखनी निवार हैं। सहत लपेटी असिधारा मुखदुःखकार |
मदिरा ज्यौं जीवनिकौं मोहनी विधार है। " काठमैं दिया पाव करै थिति को सुभाव। .
- चित्रकार नाना नाम चित्र कौं सभार हैं।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि चक्री ऊंच नीच धरै भप दीयो मनै करै ।
.. एई पाठ कर्म हरै सोई हुमैं तारै हैं ।।" का प्रश्न :--किस कर्म प्रकृति का कहाँ बंध और कहाँ उदय होता है ? उत्तर :-देवगति, देवायु, देवगत्यानुपूर्वी तीन प्रकृतियाँ, बैक्रियक शरीर, वैक्रियक :
मांगोपांग ये दो, पाहारक शरीर, पाहारक प्रांगोपांग ये दो, अयशस्फीति प्रकृति इन पाठों प्रकृतियां ऊपर के मुरणस्थान में बंधती हैं और नीचे के गुणस्थान में उदय में आती हैं ।
संज्वलन लोभ के बिना पंद्रह कषाय (अनंतानुबंधी ४, अप्रत्याख्यानी .. ४, प्रत्याख्यानी ४, संज्वलन ३ (क्रोध, मान, माया) हास्यादिक में चार - हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, पुरुषवेद, मनुयायु, सूक्ष्म, अपर्याप्त प्रकृति, : साधारण प्रकृति, पाताप प्रकृति, मिथ्यात्व - ये छब्बीस प्रकृतियां जिस-जिस .
गुणास्थान में बंधती हैं, उसी उसी गुणस्थान में उदय में आती हैं । शेष . छियासी प्रकृतियां, उसमें ज्ञानावरणीय ५, दर्शनावरणीय , वेदनीय २, गोत्र
२. अन्तराय ५, चारित्रं मोहनीय की ५, अायु २, नामकर्म की ५६ (गति . ३, आनुपूर्वी. ३, जाति ५, शरीर ३, औदारिक प्रांगोपांग, वर्णादिक ४, संस्थान ६, संहनन ६, निर्माण १, अगुल्लघु, उपघांत, परघात, श्वास, उद्योत, विहायोगति २, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, यश कीर्ति, स्थिर २, शुभ २ सुभग २, त्रस २, तीर्थकर, प्रादेय १, सुस्वर २) इन छियासी प्रकृतियों का .. बंधन नीचे के गुगास्थानों में होता है और उदय ऊंचे गुणस्थानों में होता है। .
___ ज्ञानावरण की ५, अंतराय ५. दर्शनावरणीय ४ इन चौदह प्रकृतियों का बंध दश गुणस्थान तक होता है, और उदय बारहवें गुणस्थान तक होता है । यशकीर्ति और ऊंचगोत्र इनका बंध दशा में गुणास्थान तक है और . उदय चौदहवें गुगास्थान के. अन्त तक होता है । ...
साता वेदनीय कर्म का बंध तेरहवें गुरशस्थान तक होता है और उदय चौदहवें गुणस्थान तक होता है । साता बेदनीय का बंध छठे गुणस्थान तक होता हैं और उदय चौदहवें तक होता है । .
१. चर्चाशतकः पृष्ठ नं० १३६ । ..
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[ ४५
नीगोत्र का बंध पहले में है और उदय पांचवें गुणास्थान तक, agenda का बंध पहले गुणस्थान में होता है, उदय नौवें गुणस्थान के वेद (चौथे) भाग तक है ।
स्त्रीवेद का बंध दूसरे गुणस्थान तक है और उदय नौवें गुणस्थान के वेद भाग तक है ।
श्रध्याय: पहला ]
संज्वलन लोभ का बंध नांवें तक है, उदय दसवें तक है । ग्ररक्षि शौक इनका बं छठे तक है, उदय आठवें तक है ।
निद्रा, प्रचला इनका बंध तक आठवें तक है, अपूर्वकरण के प्रथम भाग तक है, उदय क्षीणकषाय के उपांत समय तक है । निद्रा-निद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि इनका बंध दूसरे तक है और उदय छठे गुणस्थान पर्यन्त है ।
तरका का प्रथम गुणस्थान में ही है. उदयं चौथे गुणस्थान तक है । तिर्यग्गा का मंत्र दूसरे तक है, उदय पांचवें तक हैं। मनुष्यायु का 'बंध चौथे गुणस्थान तक है, उदय चीदवें गुणस्थान है ।
- नरकगति तथा श्रानुपूर्वी इनका बंध प्रथम गुणस्थान में ही है और उदय चौथे में हैं । तिर्यग्गति तथा यानुपूर्वी इनका बंध दूसरे तक है, उदय ate गुणस्थान तक हैं और गति का उदय पांचवें तक होता है ।
मनुष्यगति का बंध चौथे गुणस्थान तक होता है, उदय चौदह गुणस्थान तक होता हूँ । एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय और चौथे इन्द्रिय का बंध पहले में है, उदय दूसरे तक है।
श्रदारिक शरीर, औदारिक अंगोपांग इनका बंध चौथे तक होता है, उदय चौदहवें के उपरांत समय तक होता है ।
पूर्वकरण के छठवें भाग पर्यंत है और उदय चौदहवें
पंचेद्रिय का बंध
गुणस्थान तक है ।
तेजस, काम का बंध चाटवें गुणस्थान के छठे भाग तक है और उदय चीदह गुरसस्थान के उपान्त समय तक है ।
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[ गो. प्र. चिन्तामणिः - हण्डक का बंध पहले. गुगास्थान. में है और कुब्जक, वामन, स्वाति, न्यग्रोध परिमंडल इन चार का बंध दूसरे गुगास्थानों तक है और समचतुरस्त्र का बंध पाठवे के छठे भाग तक है और संस्थानों (छहों) का उदय तेरहवें तक है।
वज्रवृषभनाराच संहनन का बंध चौथे गुणस्थान तक है । वज्रनाराच, नाराच, अर्द्धनाराच, कीलित इनका बंध दूसरे गुरगस्थान तक है, असंप्राप्तसृपाटिका का बंध प्रथम गुणस्थान में है । और अंत के तीन संहननों का उदय सातवें गुणास्थान तक है। नाराच और वज्रनाराच संहनन का उदय . ग्यारहवें गुणस्थान तक है । बञवृषभनाराच का तेरहवें गुगास्थान तक है। - निमणि का बंध नाठवें के छटे भाग तक है, उदय तेरहवें गुगास्थान तक है।
अप्रशस्तगति का बंध दूसरे गुणस्थान तक है। प्रशस्त का आठवें के .. छठे भाग तक है । और दोनों का उदय तेरहवें सयोग गुणस्थान तक है। ...
उद्योत का बंध दूसरे गुगणस्थान तक है और उदय पंचम गुणस्थान तक है । अगुरुलघु, उपधात, उछ्वास इन चार का बंध पाठवें के छठे भाग तक है, उदय तेरहवें तक है।
स्थावर का बन्ध पहले गुणस्थान में ही है । उदय दूसरे गुणस्थान : तक है । बस, बादर, पर्याप्त इनका बन्ध अपूर्वकरण के छठे भाग तक है . और उदय चौदहवें गुणास्थान तक है।
प्रत्येक शरीर का बन्ध पाठवें के छठे भाग तक है, उदय तेरहवें तक है । अस्थिर, अशुभ इन दो का बन्ध छठे गुग्णस्थान तक है, उदय तेरहवें । तक है । स्थिर, शुभ इनका बन्ध, अाठवें के छठे भाग तक है, उदय तेरहवें । गुणस्थान तक है।
दुर्भग, दुस्वर, अनादेय, इस तीन का बन्ध दूसरे गुरगस्थान तक है, .. उदय तेरहवें गुरास्थान तक है । मुभग, प्रदिय इनका बन्ध पाठवें के छठे . .... भाग पर्यंत है, उदय चौदहवें गुणस्थान तक है । सुस्वर का बन्धं आठवें के. . .. छठे भाग तक है, उदय तेरहवें गुगास्थान तक है ! तीर्थक र प्रकृति का बन्ध :
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[ ४७
चौथे से लेकर प्राठों के छठें भाग तक होता है, उदय चौदहवें गुणस्थान पर्यन्त होता है ।
अध्याय: पहला ]
प्रश्न :- चौदह गुरुस्थानों में जीव मर कर कौन-कौन सी गति में जाता है ? - मिश्र गुणस्थान, क्षीणकपाय गुणस्थान, सयोगकेवली गुरणस्थान इन तीन " गुणस्थानों में जीव का मरण नहीं होता है - यह नियम है ।
उत्तर :
सातवें गुणस्थान, प्राट गुणस्थान, नौवें गुणस्थान, दसवें गुग्गास्थान और ग्यारहवें गुणस्थान ये पांचों ही गुणस्थान उपशम के हैं, यहां से मरण करके चौथे स्थान में यावे, अन्तसमय में अवतरूप हो कार्माण निकलता है ।
प्रथम गुणस्थान में मरने वाला जीव चारों ही गति में उत्पन्न हो सकता है, लेकिन देवगति में जाये तो नौवें यक तक जाता है । आगे के स्वर्गों में नहीं जा सकता ।
दूसरे सासादन गुणस्थान में मरा कर जीव नरक गति के बिना बाकी तीनों ही गति में जा सकता है । सांसादन गुणस्थानं वाला कभी नरक में नहीं जा सकता है - यह नियम है ।
जिस जीवने पहले मिथ्यात्व परिणामों में कोई भी गति का बंध बांध रखा हो और पीछे सम्यक्त्व प्राप्त किया हो, तो ऐसा जीव मर कर चारों ही गति में जा सकता है । यहां इतना विशेष जानना की नरक में जावे तो तीसरे नरक से आगे नहीं जावें और क्षायिक सम्यक्त्व वाला जीव प्रथम नरक तक ही जाता है, अगर मनुष्य अथवा तिर्यंच होवे तो भोगभूमि का ही होता है, कर्मभूमि का नहीं, देवगति में जावे तो स्वर्ग ही जाय । अगर श्रायु बन्ध पहले नहीं किया है, तो चौथे गुणस्थान में मरा कर देवगति में जाता है ।
पांचवे गुणस्थान से लेकर ग्यारवें गुणस्थान तक इन सातों ही गुरंग - स्थानों में मरम करने वाला जीव देवगति में ही जाता है । और गति में कदापि नहीं जाता है । और देवगति में भी कल्पवासी देव ही होता है ।
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८८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि __. प्रयोग केवली गुणस्थान में पंडीत-पडीत मरण कर एक सिद्धशीला
ही जाता है, फिर यहां से कभी कोई गति ग्रहण नहीं करता । प्रश्न :-नौवें गुणस्थान में ३६ प्रकृतियों का क्षय किस प्रकार है ? उत्तर :--प्रत्याख्यानावरणीय कपाय.४ और अप्रत्याख्यानावरणीय कषाय ४, संज्वलन
चौकड़ी में से लोभ को छोड़कर तीन, नौ नो कषाय, चार जाति, विकलत्रयः ।। तीन, स्थावर, पातप, उद्योत, सूक्ष्म, साधारण और नरक गति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यञ्च गति, तिर्यञ्च गत्यानुपूर्वी ये सब मिलाकर ३६ प्रकृतियों । नवें गुणस्थान में क्षपक श्रेणी वाला क्षय करता है।
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प्रश्न :- चौदह गुरास्थानों में कर्मों का प्राश्रव किस प्रकार है ? उत्तर:-पहले गुणास्थान में पांच मिथ्यात्व अन्त में घटे। दूसरे सासादनः गुरणस्थान ।
में अनन्तानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ ये चारों ही घटे । पांचवे गुणस्थान में में ग्यारह प्रकृतियां कम होती हैं---पांच इन्द्रियां, छटा मन, पांच स्थावर । की विराधना ये ग्यारह घटते हैं और प्रत्याख्यान ४ ये भी कम हो जाती । हैं- कुल मिलाकर १५ कम होती हैं । बैंकिंवक, बैक्रियक मिथ, अप्रत्याख्यान । की ४ और बस का बात ये सात चौथे गुणस्थान में होती है। छठे प्रमत्त । गुणस्थान में प्राहारक, आहारक मिश्र ये दो कम होती हैं । आठवें अपूर्व करण गुणस्थान में हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा ये छह नोकपाय । कम हो जाती हैं। नौवें गुणस्थान में नपुंसक, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और संज्वलन की. ३ क्रोध, मान, माया ये छह कम होती है। . . .
दसवें गुग्गस्थान में एक सूक्ष्म, लोभ कम हो जाता है । यारहवें क्षीणः । कपाय गुगास्थान में असत्य मन, उभय मन, असत्य वचन, उभय बचन ये चार कम होती हैं । तेरहवें संयोग केवली गुरास्थान में सात योग कम होते हैं। मिश्व योग और कार्मागा योग ये चारों ही गुणस्थान में होते हैं अर्थात । प्रथम, द्वितीय, चौथे, तेरहवें गुणस्थान में, अाहारक की अपेक्षा मिश्च के छठे । प्रमत्त गुणस्थान भी हैं । कामणि की अपेक्षा चारों ही गुणस्थान हैं। :
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अध्याय : पहला ]
[ ४६ --चौदह गुणस्थानों में चारों आयु का बंध और उदय कैसे है ? उत्तर :---नरक प्रायु का बंध तो प्रथम गुणस्थान में होता है, अन्य गणस्थानों में नहीं .
होता है । नरकायु का उदय मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, अविरत इन गुण
स्थानों तक है, आगे नहीं है । तिर्यञ्च प्रायु का बंध मिथ्यात्व, सासादन इन ... दो गुणस्थानों में होता है, अागे बंध नहीं है और लिर्यच प्रायु का उदय
मिथ्यात्व, सासादन, मित्र, असंयम, देशसंयम इन पांचों गुणस्थानों में है, नागे नहीं है । मनुष्य यायु का बंध मिथ्यात्य से लेकर चौथे गुरणस्थान तक
बंध है और देवायु का टांध मिथ्यात्व से लेकर सातवें गुणस्थान तक होता * है, और उदय प्रथम गुगगस्थान से लेकर चतुर्थ गुणस्थान तक होता है,
ग्रागे देवायु का उदय नहीं होता है। मनुष्य अथवा तिर्यञ्च ने सरल परिगणामों से अथवा कुटिल परिणामों से नरकायु बांधी तथा तिर्यच्चायु बांधी तथा मनुष्यायु का बंध बांधा हो, तो ऐसे आयु बंध वाला गुणस्थान परिपाटी चढ़े चौथे गुरास्थान से आगे न बड़े-यह नियम है ।
तीसरे गणस्थान में नरक यायु तिर्यञ्च प्रायु मनुष्य सायु, देवायु इन . . चारों आयु का बंध नहीं होता है, मरण भी नहीं होता है, यह सिद्धान्त का
नियम जानना। प्रश्न :- छहों लेश्यावाले के मिथ्यात्व गुणस्थान में कौनसे कर्मों का बंध होता है ? उत्तर :-- दो इन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय ये तीन विकल मय से स्के. नहीं, सो सक्षम,
अनंतनि का समुदाय सो साधारन, अन्तरालवर्ती सो अपर्याप्त, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, वरकाथु (इन ११७ का) मिथ्यात्व गुणास्थान में कृष्णा, नील, कापोत लेश्यावाला जीव एक सौ सत्रह प्रकृति का बंध करता है । ऊपर कहे नौ, विकलत्रय ३, नारकं ३, सूक्ष्म, साधारण्य, अपर्याप्त इन नौ भाब प्रकृति के बिना एक सौ प्रकृति का पीत लेश्यावाला जीव (मिथ्यात्व में बंध करता है। एकेन्द्रिय, स्थावर और सातप इन तीन बिना पालेश्यावाला जीव मिथ्यात्व .. में एक सौ पांच प्रकृति का बेध करता है । तिर्यकच गति, तिर्यच प्रायू, . . तिर्यच गत्यानुपूर्वी, उद्योत इन चार प्रकृति के बिना मिथ्यात्व गुणास्थान में शुक्ल लेया बाला जीव एक सौ एक प्रकृतियों का बंध करता है।
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प्रश्न :- केवलज्ञान के समय ६३ प्रकृतियों का नाश जीव करता है, वे कौनसी हैं ? उत्तर :-- नरकगति, तिर्यच गति, नरक गत्यानुपूर्वी, तिर्यचगत्यानुपूर्वी ये चार प्रकृतियां और एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, आतप उद्योत साधान रन, सूक्ष्म, स्थावर -- ये तेरह प्रकृतियां नामकर्म की हैं । देवायु, तिर्यञ्चायु, नरका ये १६ प्रकृतियां ग्रघातिया की हैं । ज्ञानावर ५, दर्शनावरण & मोहनीय की २० अन्तराय ५ ये ४७ प्रकृति घातियायां कर्म की है - सब मिला कर ६३ प्रकृतियों का नाश कर जीव केवलज्ञानी बन जाता है ।
प्रश्न :- चारों गतियों में बन्ध योग्य प्रकृतियां कितनी हैं ?
उत्तर :- प्रौदारिक, औदारिक अंगोपांग, ग्राहारक आहारक बांगोपांग, नरक गति
देवगति, नरका, देवायु, नरकगत्यानुपूर्वी, देवगत्यानुपूर्वी ये सब दस प्रकृतियां हुई। दो इन्द्रिय, त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय, सूक्ष्म, साधारन, अपर्याप्त इन सोलह प्रकृतियों के बिना एक सी चार प्रकृतियां देवगति में सामान्य बंधने योग्य हैं ।
एकेन्द्रिय, स्थावर आतप इन तीन प्रकृतियों के बिना, नरकगति में नारकी के सामान्य एक सौ एक प्रकृतियों का बंध होता है । देवगति में १०४ है, उसमें तीन बटायें तो १०१ होती हैं । एक सौ बीस प्रकृतियों
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अध्याय : पहला ] . .
[ ५१ . तीर्थकर, साहारक, ग्राहारकाङ्गोपाङ्ग इन तीनों के बिना तिर्यंच के सामान्य एक सौ सत्रह का बंध होता है। मनुष्य गति में एक सौ बीस प्रकृति का बंध होता है । इन एक सौ वीस का मनुष्य नाश करता है, तब मोक्ष प्राप्ति होती है।
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प्रश्न :--ससस्त जीवों को उत्कृष्ट प्रायु कितनी है ? उत्तर :-गेरू, हरताल आदि कोमल पृथ्वीकायिक जीव की उत्कृष्ट प्रायु बारह हजार
वर्ष की है । पाषाण आदि कटोर पृथ्वीकायिक की उत्कृष्ट अायु बाईस हजार वर्ष की है। जलकायिक जीव की सात हजार वर्ष, वायुकायिक की तीन हजार वर्ष, वनस्पतिकायिक जीव की उत्कृष्ट प्रायु दस हजार वर्ष की । अाकाश में उड़ने वाले पक्षियों की प्रायु बहत्तर हजार वर्ष की और सों की उत्कृष्ट स्थिति बियालीस हजार वर्ष की, अग्निकायिक की उत्कृष्ट स्थिति तीन दिन की। शंख अादि दो इन्द्रिय जीव की उत्कृष्ट स्थिति बारह वर्ष की है। गोभी आदि के श्रिइन्द्रिय जीव की उत्कृष्ट स्थिति ४६ दिन की । भ्रमर आदि चौइन्द्रिय जीव की उत्कृष्ट स्थिति छह मास की। जो छाती के बल चलने वाले जीव सरी, सर्प की उत्कृष्ट प्रायुं न पूर्वाङ्ग की होती है । मत्स्य की उत्कृस्ट आयु एक कोडी पूर्व की है । मनुष्य और तिर्यच्च वी उत्कृष्ट प्रायु भोग भूमियों की तीन पल्य और कर्म भूमियों की आयु . कोटिपूर्व की है । देव और नारकी की उत्कृष्ट अायु तैतीस सागर की है।
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[ गो. प्र. चिन्तामगि
५२ ]
प्रश्न :- चौदह गुणस्थानों में 'सत्तावन' श्राश्रय कैसे हैं ?
उत्तर :- पहले गुणस्थान में पचपन प्राश्रव है, श्राहारकट्टिक के बिना | सासादन में ५० का प्राश्रव है पांच मिथ्यात्व श्राहारकठिक के बिना । मिश्र में तियालीस का आभव है, चार अन्तानुबंधी तीन मिश्र, पांच मिथ्यात्व दो ग्राहारक के बिना। चौथे में छियालीस का प्राश्रव है, ऊपर के ४३ और तीन मिश्र
से
होते हैं ।
वर में तीस का ग्राभव है- ऊपर के ४६ में से ४ कषाय, ४ योग, सबंध ये भी घटाने में ३७ का प्राथव होता है । प्रमत्त गुणस्थान में चौबीस का श्राश्रव है - कषाय १३, योग & ग्राहारक दो। सातवें में २२ ग्राश्रव हैं- -- कषाय १३, योग | आठवें में भी २२ का श्राश्रव है। नौवें गुरगस्थान में १६ का याथव है-नौ योग, चार संज्वलन तथा तीन वेदः । दसवें गुस्थान में १० का श्राश्रव नौ योग, एक सूक्ष्म लोभ । ग्यारह: गुस्थान में नौ योग का आश्रव होता है । और बारहवें में भी नी योग का 1 तेरहवें में 5 योग का ग्राभव काय ३ चौदह गुणस्थान में कोई भी ग्राश्रव नहीं है । प्रश्न :- -मरण समय कौनसी लेश्यावाला जीव कौनसी गति में जाता है ? उत्तर :- शुक्ललेश्या के उत्कृष्ट ग्रंथ से मरा हुया जीव सर्वार्थसिद्धि को ही जाता है। यहां देवायु की उत्कृष्ट स्थिति तेतीस सागर की होती है। शुक्ललेश्या के मध्यम अंश से मरा हुआ जीव ग्रानत नाम तेरहवें स्वर्ग से लेकर विजयाद चार अनुत्तर विमानों तक में पैदा होता है । तथा शुक्ललेश्या के जघन्य अंश से मरकर शतार सहस्त्रार नाम के स्वर्ग - जन्मता है । पद्मश्या के उत्कृष्ट अंश से मरकर सहस्त्रार नाम के बारहवें स्वर्ग में तथा उससे जघन्य अंश से मरकर सनत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग में पैदा होता है । तथा पद्मलेश्या के मध्यम अंश से मरकर सहस्त्रार से नीचे सनत्कुमार, माहेन्द्र के ऊपर यथा योग्य जन्मता है। तेज या पीतलेश्या के उत्कृष्ट अंश से मरकर सनत्कुमार, माहेन्द्र स्वर्ग के अंत के पटल में चक्र नाम के इन्द्रक सम्बन्धी श्र ेणीबद्ध विमानों में उपजता है । तेजलेश्या के जघन्य ग्रंश से मरकर उसके सीधर्म ईशान स्वर्ग का पहिले रितु नाम के इन्द्रकः या इसके श्रग्रीवद्ध विमानों में
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पहला ]
[ ५३
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तथा उसके मध्यम ग्रंश से मरकर सौधर्म ईशान के दूसरे पटल के बिमल नाम के इंद्रक से लेकर सनत्कमार माहेन्द्र के अन्तिम पटल के नीचे पटल के बलभद्र नाम के इन्द्रक तक विमानों में पैदा होता है।
कृष्ण लेश्या के उत्कष्ट अंश से मरकर जीव सातवें नरक के अवधि नामा इंद्रक बिल में पैदा होता है। इसी के जवन्य अंश से. मरकर जीव : पांचवें नरक के अंत मदद के तिषिय ना में तथा ग्राम अंश से मरकर सातवें नरक के शेप चार बिलो में व छटे नरक के तीनों पटलों में व पांचवीं पृथ्वी के अंतिम पटल में यथायोग्य उपजता है। . .
. नील लेश्या के उत्कृष्ट अंश से मरकर जीव पांचवें नरक के अंतिम पटल से पहले पटल के अंध नामा इंद्रक में व जन्य अंश से मरकर तीसरी वालुका पृथ्वी के अंत पटल में संप्रज्वलित नाम इंद्रक में ब मध्यम अंश से मरकर बालुका पृथ्वी के संप्रज्वलित इंद्रक से नीचे चौथी पृथ्वी के सात पटलों में व पांचवें नरक के अंत्र इन्द्रक से ऊपर पैदा होता है ।
___ कापोत लेश्या के उत्कृष्ट अंश से मरकर जीव तीसरे नरक के पाठवें पटल के संप्रज्वलित नाम इन्द्रक में, जघन्य अंश से मरकर पहली पृथ्वी के पहले सीमान्त का नामा इन्द्रक में, मध्यम ग्रंश से मरकर इन दोनों के मध्य में पैदा होता है।
तथा कृष्ण, नील, कापोत इन तीन लेश्याओं के मध्यम अंश से मरे ऐसे कर्म भूमियां मिश्यादृष्टि तिर्यंच या मनुष्य और तेजो लेश्या के माध्यम अंश से मरे ऐसे भोगभूमिया मिथ्यादृष्टि तियंत्र या मनुष्य तीन प्रकार के भवन वासी, व्यंतर व ज्योतिष देवों में उपजता है ।
कृष्णा, नील, कापोत, पीत इन चार लेश्याओं के मध्यम अंग से मरे तिर्यंच या मनुष्य या भवनवासी, व्यतर, ज्योतिषी या सौधर्म, इयान स्वर्ग के बासी देव मिथ्या ष्टि सो बादर पर्याप्त पृथ्वीकायिक, जलकायिक, व वनस्पतिकायिक में पैदा होता है। यहाँ भवनश्रयादि देवों के मात्र पीत : लेश्यासे व तीर्यच या मनुष्यों के कृष्णादि तीन लेश्यामों से भरा होता है ।
तथा सामान्य नियम यह है कि भवनत्रिक को ग्रादि लेकर सर्वार्थ
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. गो. प्र. चिन्तामगि सिद्धि तक देव व धम्मा ग्रादि सात पृथ्वी संबंधी नारकी अपनी-अपनी लेण्या के अनुसार यथायोग्य मनुष्य गति या तियंच गति को जाता है । यह भी बात जान लेनी चाहिये कि जिस गति सम्बन्धी पहले प्रायु बांधी हो । उस ही गति में मरण के समय होने वाली लेश्यां के अनुसार यह जीव पैदा होता है । जैसे मनुष्य के पहले देव गायु का बंध हुवा हो, फिर मरण होते. समय कृष्ण प्रादि अशुभ लश्या हो तो भवनत्रिक में ही पैदा होता है-ऐसा
ही नियम और स्थानों में भी जानना। प्रश्न :-गरणस्थान किसे कहते हैं ? उत्तर :--मोह और योग के निमित्त से प्रात्मा की तारतम्यरूप (उत्तरोत्तर वर्धन
शील) अवस्था विशेष को गुणस्थान कहते हैं । प्रश्न :-----गुणस्थान के कितने भेद हैं ? उत्तर :---गुणस्थान के १४ भेद हैं-१ मिथ्यात्व, २ मासादन, ३ मिश्र, ४ अविरत
सम्यग्दृष्टि, ५ देशविरत, ६ प्रमत्तविरत, ७ अप्रमत्तविरत, ८ अपूर्वक रग, ६ अनिवृतिकरण, १० सुक्ष्मसापराय, ११ उपशांत मोह. १२ क्षीरगमोह,
१३ सयोग केवली, १४ पायोग केवली । प्रश्न :--गुरणस्थानों के इस प्रकार के नामों का क्या कारण है ? उत्तर :-मोहनीय कर्म और योग ही इनका कारगा है। प्रश्न :--कौन-कौन से गुषस्थान का क्या-क्या निमित्त है ? उत्तर :-प्राथमिक चार गुणस्थान तो दर्शन मोहनीय कर्म के निमित्त से होते हैं।
पांचवें गुगास्थान से लेकर बारहवें गुणास्थान पर्यंत पाठ गुरास्थान चारित्र मोहनीय के निमित्त से होते हैं। तेरह्वां और चौदह्वां ये दो गुणस्थान . योग के निमित्त से होते हैं।
पहला गुणस्थान दर्शन मोहनीय के उदय से होता है। इसमें प्रात्मा ... के परिणाम मिथ्यात्त्वरूप होते हैं ।
चौथा गुणस्थान दर्शन मोहनीय कर्म के उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम से होता है। इस गुणस्थान में आत्मा के सम्यग्दर्शन गुरण का प्रादुर्भाव हो जाता है।
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स. अध्याय : पला । .. तीसरा गुणास्थान सम्यमिथ्यात्वरूप दर्शन मीहनीय कर्म के उदय से
होता हैं । इस गुणस्थान में प्रौदयिक भाव, चौथे गुणस्थान में यात्मा के परिणाम सम्यङिमथ्यात्व अर्थात् उभयरूप होते हैं ।
पहिले गुणस्थान में प्रौदयिक भाव, चौथे गुणस्थान में औपशामिक क्षायिक अथवा. क्षायोपशमिभाव और तीसरे गुणस्थान में प्रौदयिक भाव होते हैं ।
. हन्त दूतार मुगवान दर्शन मोहनीय कर्म की उदय, उपशम, क्षय, और क्षयोपशम इन चार अवस्थानों में से किसी भो अवस्था की अपेक्षा नहीं रखता है । इसलिये यहां पर दर्शन मोहनीय कर्म की अपेक्षा से पारिरगामिक भाव है। किन्तु अनन्तानुबंधीरूप चारित्र' मोहनीय कर्म का उदय होने से इस गुणस्थान में चारित्र मोहनीय कर्म की अपेक्षा से प्रौदयिक भाव भी कहा जा सकता हैं । इस गुणस्थान में अनन्तानुवन्धी के उदय से सम्यवत्व का घात होता है । इसलिये यहां सम्यक्त्व नहीं है और मिथ्यात्व का भी उदय नहीं होता है। इसलिये मिश्यात्य परिणाम भी नहीं होता है । अतएव यह गुणस्थान मिथ्याल्व और सम्यक्त्व की अपेक्षा से अनुदय रूप है । इस गुणस्थान का समय यह प्रावली तक का है।
पांचवें गणस्थान से दशावें गास्थान तक छह गम्गस्थान चारित्र मोहनीय कर्म के क्षयोपशम से होते हैं। इसलिये इन गुमास्थानों में क्षायोपक्षमिक भाव होते हैं ! इन गुणस्थानों में सम्यवचारित्र गुग की क्रम से वृद्धि होती हैं।
ग्यारहवां गुणस्थान चारित्र मोहनीय कर्म के उपशम से होता है । इसलिये ग्यारहवें गुणस्थान में औपशामिक भाव होते हैं । यद्यपि यहां पर चारित्र मोहनीय कर्म को पूर्णता या उपशम ही हो जाता है । तथापि योग का सद्भाव होने से पूर्ण चारित्र नहीं होता, क्योंकि सम्यत्रचारित्र के लक्षण में योग पोर कषाय के अभाव से सम्यक्चारित्र होता है-ऐसा लिखा है ।
. बारहवां गुरणस्थान चारित्र मोहनीय क्रम के अय से होता है । इस लिये यहाँ क्षायिक भाव होता है । इस गुरागस्थान में भी ग्यारचे गुणस्थान
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५६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
की तरह सम्यक्चारित्र की पूता नहीं होती, सम्यग्ज्ञान गुण यद्यपि चीये गुणस्थान में ही प्रगट हो जाता है ।
भावार्थ - यद्यपि श्रात्मा का ज्ञान गुण अनादिकाल से प्रवाह रूप चला आ रहा है तथापि दर्शन मोहनीय का उदय होने से वह ज्ञान मिथ्यारूप होता है, परन्तु चौथे गुरास्थान में जब दर्शन मोहनीय कर्म के उदय का प्रभाव हो जाता है, तब यही आत्मा का ज्ञान गुण सम्यग्ज्ञान कहलाने लगता है | और पंचमादि गुणस्थानों में तपश्चरण के निमित से अवधि, मन पर्यय ज्ञान भी किसी जीव के प्रगट हो जाते हैं । तथापि केवल ज्ञान के हुए विना ज्ञान की पूर्णता नहीं हो सकती । इसलिये इस बारहवें गुणस्थान:तक यद्यपि सम्यग्दर्शन की पूर्णता हो गई है, क्योंकि क्षायिक • सम्यग्दर्शन के बिना क्षपक श्रेणी नहीं चढ़ता और क्षपक श्रेणी के विना १२ गुणस्थान नहीं होता, तथापि सम्यग्ज्ञान और सम्यदचारित्र गुण अब तक अपूर्ण है, इसलिये अब तक मोक्ष नहीं हुआ ।
तेरहवां स्थान योगों के सद्भाव की इसका नाम सयोग और केवल ज्ञान के निमित से गुस्थान में सम्यग्जान की पूर्णता हो जाती है, पूर्णता न होने से मोक्ष नहीं होता है ।
दहवां गुणस्थान योगों के प्रभाव की अपेक्षा है, इसलिये इसका नाम प्रयोग केवली है । इस गुणस्थान में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान:और सम्यक्चारित्र इन तीनों गुणों की पूर्णता हो जाती है। अतएव मोक्ष भी दूर नहीं रहता । अर्थात अ इ उ ऋ लृ इन पांच ह्रस्व स्वरों के उच्चारण करने में जितना काल लगता है, उतने ही काल में मोक्ष हों जाता है ।
अपेक्षा से होता है, इसलिये। संयोग केवली है । इस परन्तु चारित्र गुण की
प्रश्न :- मिथ्यात्व गुणस्थान का क्या स्वरूप है
उत्तर : --- मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से प्रतस्वार्थ श्रद्धान रूप आत्मा के परिणाम विशेष को मिथ्यात्व गुणस्थान कहते हैं। इस मिथ्यात्व गुम्मस्थान में रहने वाला जीव मिथ्या श्रद्धावान् होता है । तत्त्वार्थ श्रद्धा और रूची इसकी
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अध्याय : पहला ]. - नहीं होती है। जैसे पित्त उवर बाले रोगी को दुग्धादिक रस कडवे लगते ....
हैं। इसी प्रकार इसको भी समीचीन धर्म अच्छा नहीं लगता हैं। प्रश्न :--मिथ्यात्व के कितने भेद हैं ? : उत्तर :--मिथ्यात्व के पांच भेद हैं--एकान्त मिथ्यात्व, विपरीत मिथ्यात्व, संशय
.: मिथ्यात्व, अज्ञानमिथ्यात्व और विनय मिथ्यात्व । प्रश्न :- एकान्त मिथ्यात्व किसे कहते हैं ? ... उत्तर :--धर्म धर्मी के 'यहां ऐसा ही है । अन्यथा नहीं, इत्यादि एकान्त अभिनिवेश ... अभिप्राय या श्रद्धा को एकांतमिश्यात्व कहते हैं । जैसे--पदार्थ को एकान्त से
.. सर्वथा क्षणिक ही मानना या नीत्य ही मानना या अनित्य ही मानना । प्रश्न :-विपरीत मिथ्यात्व किसे कहते हैं ? . . . . . उत्तर :- सग्रन्थ, निर्ग्रन्थ है, केवली कवलाहार करते हैं-इत्यादि रुचि या श्रद्धा को ।
- 'विपरीत मिथ्यात्व कहते हैं। प्रश्न :--संशय मिथ्यात्व किसे कहते हैं ? उत्तर :- धर्म का अहिंसा लक्षण है या नहीं-इत्यादि जिनागम में नाना प्रकार का
. . संशय को या संशयात्मक श्रद्धा को संशय मिथ्यात्व कहते हैं। प्रश्न :-प्रज्ञान मिथ्यात्व किसे कहते हैं ?.......... उत्तर :-जिसमें हिताहित के विवेक का कुछ भी सद्भाव नहीं हो ऐमी श्रद्धा को
... अज्ञान मिथ्यात्व कहते हैं; जैसे पशुवध में धर्मरूप श्रद्धा । प्रश्न :--विनय मिथ्यात्व किसे कहते हैं ? .. उत्तर :--समस्त देव तथा समस्त मतों में समान श्रद्धा को विनय मिथ्यात्व कहते हैं। प्रश्न :--सासादन गुणस्थान किसे कहते हैं ? .. .. उत्तर :- प्रथमोपशम सम्यक्त्व और द्वितियोपशम सम्यवत्व के काल में जब ज्यादा से .. . . . . ज्यादा ६ प्रावली और कम से कम एक समय मेष रहता है, उस समय
किसी एक अनन्तानुबन्धी कपाय के उदय से सम्बनल्य विहीन परिणाम मासादन गुणस्थान कहलाता है । यह गुणस्थान चतुर्थ. गुरणस्थान से मारने की अपेक्षा से होता है।
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५८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :-मिश्र गुणस्थान किसे कहते हैं ? उत्तर :-- सम्यपि यात्रा प्रति के उदय के जीव के न तो केवल सम्यक्त्व रूप
परिणाम होते हैं और न केवल मिथ्यात्व रूप । किन्तु मिले हुबे दही, गुड़ के स्वाद की तरह एक भिन्न जाति के मिश्र परिणाम होते हैं। इसी मिश्र
परिणाम को मिश्र गुणस्थान कहते हैं । प्रश्न :--अविरतसम्यक्त्व गुरणस्थान का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-दर्शन मोहनीय की तीन और अनन्तानुबन्धी की चार इन सात प्रकृतियों के
उपशम अथवा क्षय अथवा क्षयोपशम से सम्यवत्व सहित और अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ के उदय से अत रहित परिणाम को अविरत सम्यग्यस्य गुणस्थान कहते हैं ।
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नोट :---सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति से मोक्ष का मार्ग प्रारंभ होता है।
जनदर्शन में सम्यग्दर्शन को मोक्ष की प्रथम सीढ़ी कहा है। सम्यग्दर्शन का अन्त मोक्ष ही है; अतः कहीं कहीं तो सम्यग्दर्शन को ही मोक्ष कहा जाता है । चुकि चौथे गुरण- .. स्थान में सम्यग्दर्शन का प्रादुर्भाव होता है, अतः यहां चौथे । गुणस्थान तक का वर्णन किया है । जो मात्र प्रारंभिक अवस्था वाले जीवों की अपेक्षा से है।
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अध्याय दूसरा : सम्यग्दर्शन
प्रश्न : --- सम्यग्दर्शन का लक्षण क्या है ?
उत्तर :- "श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागम तपोभृताम् । त्रिमूढापोढमष्टांगं
सम्यग्दर्शनमस्मयम्” ॥११
"अत्तागम तच्चीणं सद्दह्णां सुगिम्मलं होइ ।
संकाई दोसरहियं तं सम्मत मुणेयब्वं" ॥२
प्रथमानुयोग और चरणानुयोग में सम्यग्दर्शन का स्वरूप प्रायः इस प्रकार
बताया गया है कि परमार्थ देव-शास्त्र-गुरु का तीन मूढताओं और आठ मदों से रहित तथा प्राठ अंगों से सहित श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी देव कहलाता है। जैनागम में अरहन्त और सिद्ध परमेष्ठी की देव संज्ञा है । Atary सर्वज्ञदेव की दिव्यध्वनि से अवतीर्ण तथा गणधरादिक प्राचार्यों के द्वारा गुम्फित आगम शास्त्र कहलाता है और विषयों की ग्राशा से रहित निग्रन्थ- निष्परिग्रह एवं ज्ञान, ध्यान और तप में लीन साधु गुरु कहलाते हैं • हमारा प्रयोजन मोक्ष है, "उसकी प्राप्ति इन्हीं देव, शास्त्र, गुरु के श्रद्धान से हो सकती है । अतः इनकी दृढ़ प्रतीति करना सम्यग्दर्शन है। भय, ग्राशा, स्नेह या लोभ के वशीभूत होकर कभी भी कुदेव, कुशास्त्र और कुगुरुयों को प्रतीति नहीं करना चाहिए ।
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यानुयोग में प्रमुखता से द्रव्य, गुण, पर्याय अथवा जीव, प्रजीव, ग्रास्त्रय, संवर, निर्जरा और मोक्ष इन सात तत्वों एवं पुण्य पाप सहित नौ पदार्थों की चर्चा श्राती है, ग्रतः द्रव्यानुयोग में सम्यग्दर्शन का लक्षणं तत्त्वार्थ श्रद्धान (तस्वार्थ श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ) बताया गया है । तत्त्वरूप अर्थ अथवा तत्व अपने-अपने वास्त for स्वरूप से सहित जीव, अजीवादि पदार्थों का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है । अथवा.
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- समयसार - गाथा १३
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[ गो. प्र. चिन्तामरिंग के भूयत्थंगाभिंगदा जीवाजीवाय पुरापाव ।। श्रास्सव संधर गिज्जर बन्यो मोवखो य सम्मत्तं ।।१
परमार्थ रूप से जाने हुए जीव, अजीव, पुण्य, पाप, अास्त्रब, संवर, निर्जरा वन्ध और मोक्ष ये नौ पदार्थ सम्यग्दर्शन है। यहाँ विषय और विषयी में अभेदः
मानकर जीवादि पदार्थों को ही सम्यग्दर्शन कहा गया है। अर्थात् इन नौ पदार्थों का ... परमार्थ रूप से श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। इसी से द्रव्यानुयोग में स्व पर के श्रद्धान
की भी सम्बदर्शन कहा गया है, क्योंकि ग्रास्त्रवादिक तत्त्व स्व-जीव और पर-कमरूप अजीव के संयोग से होने वाले पर्यायात्मक तत्त्व है, अतः स्व-पर में ही गभित हो जाते हैं। अथवा इसी द्रव्यानुयोग के अन्तर्गत अध्यात्म ग्रन्थों में पर. 'द्रव्यों से भिन्न (दर्शनमात्मविनिश्चिति:१ ) अात्म द्रव्य की प्रतीति को सम्यग्दर्शन कहा है, क्योंकि प्रयोजन भूत तत्त्व तो स्वकीय प्रात्म' द्रव्य ही है। स्व का विनिश्चय होने से पर स्वतः छूट जाता है। . . . . . . . .
.. मूल में तत्त्व दो हैं..जीव और अजीव । चेतना लक्षगा वाला जीव है और उससे भिन्न अजीव है । अजीव पुद्गल, धर्म, अधर्म, अाकाश और काल के भेद से पाँच प्रकार का है । परन्तु यहाँ उन सवसे प्रयोजन नहीं हैं। यहां तो जीव के साथ संयोग । को प्राप्त हुए नोकर्म, द्रव्यकर्म और भावकर्म रूप अजीव से प्रयोजन है । चैतन्य स्वभाव । वाले जीव के साथ अनादिकाल से ये नो कर्म शरीर, द्रव्य कर्म. ज्ञानाघरगणादिक और भाषकर्म रागादिक लग रहे हैं ! ये किस कारण से लग रहे हैं, जद इसका विचार प्राता है, तब प्रास्त्रव तत्त्व उपस्थित होता है । श्रास्त्रव के बाद जीव और अजीव की । • क्या दशा होती हैं ? यह बताने के लिये बन्ध तत्व पाता है। प्रास्त्रव का विरोधी भाव संबर है, वन्ध का विरोधी भाव निर्जरा है तथा जब सब नोकर्म, द्रव्यकर्म और भावार्म जीव से सदा के लिये सर्वथा विमुक्त हो जाते हैं, तब मोक्षतत्व होता है । पुण्य और पाप प्रास्त्रब के अन्तर्गत है। इस तरह श्रात्मकल्याण के लिए उपयुक्त
सात तत्त्व अथवा नौ पदार्थ प्रयोजन भूत हैं। इनका वास्तविक रूप से निर्णयः ।। • कर प्रतीति करना सम्यग्दर्शन है। ऐसा न हो कि प्रास्त्रव और बन्ध के कारणों को
संवर और निर्जरा का कारण समझ लिया जाय.. अथवा जीव की रागादिक पूर्गा । अवस्था को जीव तत्त्व समझ लिया जाय या जीव की वैभाविक परिणति (रागादिक) १. . पुरुषार्थसिद्धयुपाय' ।
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। अध्याय : दूसरा ]
को सर्वथा अजीब समझ लिया जाय, क्योंकि ऐसा समझने से बस्तु ताव का सही . निर्णय नहीं हो पाता और सही निर्णय के अभाव में प्रात्मा मोक्ष को प्राप्त नहीं .. हो पाता। जिन भावों को यह जीव. मोक्ष का कारण मानकर करता है, वे भाव पुण्यास्त्रब के कारण होकर इस जीव को देवादिगतियों में सागरों पर्यन्त के लिये रोक लेते हैं । सात तत्वों में जीव और अजीव का जो संयोग है, वह संसार है तथा प्रास्त्रब और बन्ध उसके कारण है, जीव और अजीव का जो वियोग-पृथग्भाव है, वह मोक्ष है तथा संवर और निर्जरा उसके कारगा हैं।
. जिस प्रकार रोगी मनुष्य को रोग, उसके कारण, रोग मुक्ति और उसके कारण चारों का जानना अावश्यक है। उसी प्रकार इस जीव को संसार, उसके
कारण, उससे मुक्ति और उसके कारण - चारों का जानना आवश्यक है। काम करणानुयोग में मिथ्यात्व, सम्यक्त्व मिश्यात्व, सम्यवत्व प्रकृति और
अनन्तीसुधको प्रोमा मामाजोन इन पास हसियों के उपशम, क्षयोपशम अथवा क्षय से होने वाली श्रद्धा गुण को स्वाभाविक परिणति को सम्यग्दर्शन कहा है। 'करंगानुयोग के इस सम्यग्दर्शन के होने पर चरणानुयोग, प्रथमानुयोग और द्रव्यानुयोग में प्रतिपादित सम्यग्दर्शन नियम से हो जाता है । ..परन्तु शेष अनुयोगों के सम्यग्दर्शन
होने पर कररमानुयोग प्रतिपादित सम्यग्दर्शन होता भी है और नहीं भी होता है। - मिथ्यात्व प्रकृति के अवान्तर भेद असंख्यात लोक प्रमाण होते हैं। एक मिथ्यात्व
प्रकृति के उदय में सातवें नरक की आयु का बन्ध होता है। और एक मिथ्यात्व प्रकृति के उदय में नौवें अवेयक की आयु का बन्ध होता है और एक मिथ्यात्व प्रकृति के उदय
में इस जीव के मुनि हत्या का भाव होता है और एक मिथ्यात्व प्रकृति के उदय में . को स्वयं मुनित्रत धारण करके अट्ठाईस मूलगुणों को निर्दोद पालन करता है । एक
मिथ्यात्व के उदय में कृष्ण लेश्या होती है और एक मिथ्यात्व के उदय में शुक्ल लेश्या होती है । जिस समय मिथ्यात्व प्रकृति का मन्द, मन्द उदय चलता है। उस समय इस जीव के बगानुयोग और द्रव्यानयोग के अनुसार सम्यग्दर्शन हो गया है, ऐसा. जान पड़ता है, परन्तु करणानुयोग के अनुसार वह मिथ्यादष्टि ही रहता है । एक भी प्रकृति का उसके संवह नहीं होता है । बन्ध्र और मोक्ष के प्रकरण में करणानुयोग का सम्यग्दर्शन ही अपेक्षित रहता है, अन्य अनुयोगों का नहीं । यद्यपि कर गानुयोंग .. प्रतिपादित सम्यग्दर्शन की महिमासवोपरि है, तथापि उसे पुरुषार्थपूर्वक प्रान्त नहीं
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६२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि किया जा सकता। इस जीव का पुरुषार्थ चरगानुयोग और द्रव्यानुयोग में प्रतिपादित सम्यग्दर्शन को प्राप्त करने के लिये ही अग्रसर होता है । अर्थात् वह बुद्धिपूर्वक परमार्थ । देव शास्त्र गुरु की शरण लेता है, उनकी श्रद्धा करता है और आगम का अभ्यास कर तत्वों का निर्णय करता है । इन सबके होते हुए अनुकूलता होने पर कशानुयोग प्रतिपादित सम्यग्दर्शन स्वतः प्राप्त होता है और उसके प्राप्त होते ही यह संवर और निर्जरा को प्राप्त कर लेता है। ... प्रश्न : सम्यादर्शन के पांच लक्षण माने गये हैं, वे कौनसे हैं ? उत्तर :- (१) परमार्थ देव शास्त्र-गुरु की प्रतीति ।
(२) तत्त्वार्ध श्रद्धान । (३) स्वपर का श्रद्धान। (४) आत्मा का श्रद्धान । (५) सप्त प्रकृतियों के उपशम, क्षयोपशम अथवा क्षय से प्राप्त श्रद्धा गुग्गा
की निर्मल परिणति ।
इन लक्षणों में पांचवां लक्षणा साध्य है और शेष चार साधन हैं । जहाँ इन्हें सम्यग्दर्शन कहा है, वहां कारग में कार्य का उपचार समझना चाहिये । जैसे अरहंत देव, तत्प्रणीत शास्त्र और निम्रन्थ गुरु की श्रद्धा होने से व कुदेव, कुशास्त्र और कुगुरु की श्रद्धा दूर होने से गृहीत मिथ्यात्व का प्रभाव होता है, इस अपेक्षा से ही इसे सम्यग्दर्शन कहा है, सर्वथा सम्यग्दर्शन का बह लक्षणा नहीं है । क्योंकि द्रव्यलिंगी मुनि । आदि व्यवहार धर्म के धारक मिथ्याद्रष्टि जीवों के भी परहतादिक का (सामान्य) श्रद्धान होता है । अथवा जिस प्रकार अणुव्रत, महावत धारण करने पर देश चारिन । सकल चारित्र होता भी है और नहीं भी होता है । परन्तु अणुव्रत और महाव्रत धारण - किये बिना देशचारित्र, चारित्र कदाचित् नहीं होता है, इसलिये अणुव्रत, . महावत को अन्वयरूप कारण जानकर कारग में कार्य का उपचार कर इन्हें देश चारित्र, सकलचारित्र कहा है । इसी प्रकार अरहन्त देवादिक का श्रद्धान होने पर सम्मरदर्शन होता भी है और नहीं भी होता है, परन्तु अरहन्तादिक की श्रद्धा के बिना सम्यग्दर्शन कदापि नहीं होता, इसलिये अन्वयव्याति के अनुसार कार में कार्य का उपचार कर इसे सम्यग्दर्शन कहा है।
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अध्याय : दुसरा ]
ग्रही पद्धति तत्त्वार्थ श्रद्धान रूप लक्षण में भी संघटित करना चाहिये, क्योंकि २४ द्रव्यलिंगी अपने क्षयोपशम के अनुसार तत्वार्थ का ज्ञान प्राप्त कर उसकी श्रद्धा करता
है, बुद्धिपूर्वक अश्रद्धा की किसी बात को आश्रय नहीं देता, तत्वार्थ का ऐसा विशद विशद व्याख्यान करता है कि उसे सुनकर अन्य मिश्यादृष्टि सम्यग्दृष्टि हो जाय, परन्तु परमार्थ से वह स्वयं मिथ्यादृष्टि ही रहता है । उसकी श्रद्धा में कहां चूक रहती ना है, यह प्रत्यक्ष ज्ञानी जान सकते हैं । इतना होने पर भी यह निश्चित है कि करणानुयोग या प्रतिपादित सम्यग्दर्शन की प्राप्ति तत्त्वार्थ-श्रद्धानपूर्वक होगी । अतः कारण में कार्य का उपचार कर इसे सम्यग्दर्शन कहा है ।
स्थूल रूप से शरीर भिन्न है, पारमा भिन्न है" ऐसा स्वपर का भेदविज्ञान द्रव्यलिगी मुनि को भी होता है। द्रव्यालगी मुनि, पानी में पेल दिये जाने पर भी संक्लेशं नहीं करता और शुक्ल लेश्या के प्रभाव से नौवें ग्रैवेयक तक में उत्पन्न होने की योग्यता रखता है, फिर भी बह मिथ्यादृष्टि रहता है । उसके स्वपर भेदविज्ञान में जो सूक्ष्म चूक रहती है, उसे जनसाधारण नहीं जान सकता [ वह चूक प्रत्यक्ष ज्ञान का ही विषय है । इस स्थिति में यह कहा जा सकता है कि करगानुयोग प्रतिपादित सम्यग्दर्शन इससे भिन्न है, परन्तु उसकी प्राप्ति में स्वपर का भेदविज्ञान कारण पड़ता है। अतः कारणा में कार्य का उपचार कर उसे सम्यग्दर्शन कहा है ।
कपाय की मादता से उपयोग की चञ्चलता दूर होने लगती हैं, उस स्थिति में द्रालगी मुनि का उपयोग भी पर पदार्थ से हटकर स्व में स्थिर होने लगता है। स्व द्रव्य-यात्म द्रव्य की वह बड़ी सूक्ष्म चर्चा करता है । यात्मा के ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव का ऐसा भाव-विभोर होकर वर्णन करता है कि अन्य मिथ्यादृष्टि जीवों को भी यात्मानुभव होने लगता है, परन्तु वह स्वयं मिथ्यादृष्टि रहता है । इस स्थिति में इस यात्मश्रद्धान को करुणानुयोग प्रतिपादित सम्यग्दर्शन का साधन मानकर सम्यग्दर्शन कहा गया है ।
इन सब लक्षणों में जो सूक्ष्म चूक रहती है. उसे छमस्थ जान नहीं सकता, इसलिये व्यवहार से इन सत्रको सम्यग्दर्शन कहा है। इनके होते हुए सम्यक्त्व का धात करने वाली सात प्रकृतियों का उपशमादिक होकर करणानुयोग प्रतिपादित सम्यग्दर्शन प्रकट होता है। देव-शास्त्र-गुरु की प्रतीति; तत्त्वार्थ श्रद्धान, स्वपर श्रद्धान और प्रात्म
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६४ ]
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[ गो. प्र. चिन्तामणिः श्रद्धान ये चारों लक्षा एक दूसरे के वाधक नहीं हैं, क्योंकि एक के होने पर दूसरे लक्षमा स्वयं प्रगट हो जाते हैं । पात्र की योग्यता देखकर प्राचार्यों ने विभिन्न शैलियों से वर्णन मात्र किया है । जैसे पाचरण प्रधान शैली को मुख्यता देने की अपेक्षा देव शास्त्र-गुरु की प्रतीति को, ज्ञान प्रधान शैली को मुख्यता देने की अपेक्षा तत्त्वार्थ श्रद्धान की और कपाय जनित विकल्पों की मन्दमन्दतर अवस्था को मुख्यता देने की अपेक्षा स्वपर श्रद्धान तथा प्रात्म अहान को सम्यग्दर्शन कहा है ! अपनी योग्यता के ग्रानुसार चारों शैलियों को अपनाया जा सकता है । इन चारों शैलियों में भी यदि मुख्यता और अमुख्यता की अपेक्षा चर्चा की जाये तो तत्त्वार्थ श्रद्धान रूप प्रधान शैली मुख्य जान पड़ती है, क्योंकि उसके होने पर ही शेष तीनों शैलियों को बल मिलता है। प्रश्न :-सम्यग्दर्शन फिसे प्राप्त होता है ? उत्तर :----मिथ्यादृष्टि दो प्रकार के हैं---एक अनादि मिथ्यावृष्टि और दूसरे सादि
मिथ्यादृष्टि । जिसे आज तक कभी सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं हुआ है, वह अनादि मिथ्यादष्टि है और जिसे सम्यग्दर्शन प्राप्त होकर छूट गया है, वह र सादि मिथ्याष्टिं जीव है। अनादि मिश्यादृष्टि जीव के मोहनीय कर्म की छब्बीस प्रकृतियों की सत्ता रहती है, क्योंकि दर्शन मोहनीय की मिथ्यात्व सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृति इन तीन प्रकृतियों में से एक मिथ्यात्व 'प्रकृति का ही बन्ध होता है, शेष दो का नहीं । प्रथमोपणाम सम्यग्दर्शन होने पर पर उसके प्रभाव से यह जीव मिथ्यात्व प्रकृति के मिथ्यात्व, सम्यक् मिथ्यात्व
और सम्यक्त्व प्रकृति के भेद में तीन खण्ड करता है, इस तरह मादिक मिथ्यादृष्टि जीव के ही सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृति की सत्ता हो सकती हैं। सादि मिथ्यादृष्टि जीवों में मोहनीय कर्म की सत्ता के तीन विकल्प बनते हैं-एक २८ प्रकृति की सत्तावाला, और दूसरा २७ प्रकृति की सत्ता बाला और तीसरा २६ प्रकृतियों की संता बाला । जिस जीव के दर्शन । मोह की तीनों प्रकृतियां विद्यमान है, वह अट्ठाइस प्रकृतियों की सत्ता बाला है । जिस जीब ने. सम्यास्त्र प्रकृति की उद्वेलना कर दी है, यह सत्ताईस प्रकृतियों की सत्ता वाला है और जिसने सम्यक्त्व मिथ्यास्त्र प्रकृति की उद्वेलना कर ली है, वह छवीस प्रकृतियों को सत्ता बाला है। .
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अध्याय : दूसरा ] प्रश्न :--सम्यग्दर्शन के कितने भेद हैं ?
सम्यग्दर्शन के औषशामिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक इस प्रकार तीन भेद है । यहाँ सर्व प्रथम औप शमिक सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति की अपेक्षा विचार करते हैं; क्योंकि अनादि मिथ्यादृष्टि को सर्व प्रथम प्रौपमिक सम्यग्दर्शन हो प्राप्त होता है | ऑपशमिक सम्बग्दर्शन भी प्रथमोपशम और द्वितीयोपशम के भद से दो प्रकार का है। यहाँ प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन की चर्चा हैं । . द्वितीयोपशम की चर्चा आगे की जायेगी।
इसना निश्चित है कि सम्यग्दर्शन संजो पञ्चेन्द्रिय परितक भव्य जीव को ही होता है; अन्य को नहीं । भव्यों में भी उसी को होता हैं, जिसका संसार भ्रमणं का
ल. अगदात पावन के साल से बाधिक बाकी नहीं है। लेश्यानों के विषय में में कोई लेश्या हो और देव तथा नारंकियों के जहाँ जो लेश्या बतलाई है, उसी में ... गोपशमिक सम्यग्दर्शन हो सकता है। सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिये गोत्र का प्रति- . बन्ध नहीं है अर्थात् जहाँ उच्च-नीच गोत्रों में से जो भी संभव हो, उसी गोत्र में सम्यग्दर्शन हो जाता है । कर्म स्थिति के विषय में चर्चा यह है कि जिसके बध्यमान . कमाँ को स्थिति अन्तः कोड़ा कोड़ी सागर प्रमाण हो तथा सत्ता में स्थित कर्मों की . स्थिति संख्यात हजार सागर कम अन्तः कोड़ा कोड़ी सागर प्रमाण रह गई हो, वही सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकता है, इसी प्रकार जिसके अप्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग द्रिस्थानगत और प्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग चतुः स्थानगत होता है, वही औपमिक सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकता है । यहाँ इतनी विशेषता और भी ध्यान में रखना चाहिये कि जिस सादि मिश्यावृष्टि के आहारक शरीर और ग्राहारक शरीराङ्गोपाङ्ग को .. र सत्ता होती है, उसे प्रश्रमोपशम सम्बग्दर्शन नहीं होता । अनादि मिथ्यांदृष्टि के इनकी . सत्ता होती ही नहीं है। इसी प्रकार प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन से च्युत हुमा जीव दूसरे प्रथमोपशम सम्पबत्व को तब तक प्राप्त नहीं कर सकता जब तक कि वह वेदक काल में रहता है। वेदक काल के भीतर यदि उसे सन्यादर्शन प्राप्त करने का अवसर प्राता है तो यह बेदक क्षायोपशामिक सम्यग्दर्शन ही प्राप्त करता है 1. वेदक काल के विषय.. में यह कहा गया है, कि सम्यग्दर्शन से च्युत हुआ जो मिथ्यादृष्टि जीव, एकेन्द्रिय . पर्याय में भ्रमण करता है वहीं संज्ञी पञ्चेन्द्रिय होकर प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन को तभी
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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्राप्त कर सकता है, जब उसके सम्यक्त्व तथा लम्याइ मिथ्यात्व इन दो. प्रकृतियों की स्थिति एक. सागर से कम शेष रह जावे । यदि इससे अधिक स्थिति शेष है, तो नियम से उसे बेदक-क्षायोपशभिक सम्यग्दर्शन ही हो सकता है । यदि सम्यग्दर्शन से च्युत हुयाः। जीब बिकलय में परिभ्रमण करता है, तो उसके सम्यक्त्व और सम्य मिथ्यात्व प्रकृति की स्थिति पृथकत्व सागर प्रमाण शेष रहने तक उसका वेदक काल कहलाता
है। इस काल में यदि उसे सम्यग्दर्शन प्राप्ति का अवसर प्राता है, तो नियम से वेदक .. क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन को ही प्राप्त होता है। हाँ, सम्यक्त्व प्रकृति की अथवा .. सम्यक्त्व प्रकृति और सम्पङ मिथ्यात्व प्रकृति दोनों की उद्वेलना हो गई है, तो ऐसा
जीव पुनः सम्यग्दर्शन प्राप्त करने का अवसर आने पर प्रथमोपणम सम्यक्त्व को प्राप्त होता है। .
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. . . तात्पर्य यह है कि अनादि मिथ्यादृष्टि जीव के सर्व प्रथम प्रथमोपशम, सम्यग्दर्शन हो होता है और सादि मिथ्यावृष्टियों में २६ या २७ प्रकृतियों की सत्ता वाले जीव के दूसरी बार भी प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन होता है, किन्तु २८ प्रकृति की सत्ता काले जीव के वेदक काल के भीतर दूसरी बार. सम्यग्दर्शन हो तो वेदक-क्षायोपामिक ही होता है। हां, वेदक काल के निकल जाने पर प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन के होता है।
इस प्रकार सम्यग्दर्शन प्राप्त करने की योग्यता रखने वाला संज्ञी पञ्चेन्द्रियः पर्याप्तक, विशुद्धि युक्त, जागृत, साकार उपयोग युक्त, चारों गति वाला भव्य जीवं जब सम्बग्दर्शन धारण करने के सम्मुग्न होता है, तब क्षायोपशमिक, विशुद्धि, देशना.. प्रायोग्य और करण इन पांच लधियों को प्राप्त होता है।
सा हा .. चददि भन्यो ‘सणी पज्जन्तो सुज्झगो. यसागारो । जागारो सल्लेस्सों. : सलद्धिगो सम्मभुपंगमई ॥६५॥जो.का. खउठवसमिय विसोही देसण पाउम्ग करण लद्धी च । चत्तारि वि सामरणा करणं पुरण होदि सम्मत्ते ॥६५०।।जी.का..
इनमें करण लब्धि को छोड़कर शेष चार लब्धियां सामान्य है अर्थात् भव्य और अभव्य दोनों को प्राप्त होती हैं, परन्तु करगालधि भव्य जीव को ही प्राप्त होली है। उसके प्राप्त होने पर सम्यग्दर्शन नियम से प्रकट होता है।
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अध्याय दूसरा ।
---क्षायोपशमिक लब्धि का क्या स्वरूप है ? :-क्षायोपथमिक लटिय-पूर्व संचित कर्म पटल के अनुभाग स्पर्धकों की विशुद्धि
के द्वारा प्रति समय ननन्त गुरिणत हीन होते हुए उदीररणा को प्राप्त होना शायोपशामिक लब्धि है । इस लब्धि के द्वारा जीव के परिणाम उत्तरोत्तर
निर्मल होते जाते हैं। प्रश्न :--विशुद्धि लब्धि का क्या स्वरूप है ? उत्तर :--विद्धि लब्धि-साता बेदनीय अादि प्रशस्त प्रकृतियों के बन्ध में कारण
. भूत परिणामों की प्राप्ति को विशुद्धि लब्धि कहते हैं। प्रश्न :-देशना लब्धि का क्या स्वरूप है ?. उत्तर :-देशना लब्धि-छहों द्रव्य और नौ पदार्थों के उपदेश को देशना कहते हैं । उक्त
देशना के दाता आचार्य आदि की लब्धि को और उपदिष्ट अर्थ के ग्रहण, .. धारण तथा विचारणा की शक्ति को प्राप्ति को देशना लब्धि कहते हैं। प्रश्न :---प्रायोग्य लब्धि का क्या स्वरूप है ? . उत्तर :--प्रायोग्य लब्धि-वायु कर्म को छोड़कर शेष कर्मों की स्थिति को अन्तः
कोड़ा कोड़ी सागर प्रमाग कर देना और अशुभ कर्मों में से घातिया कर्मों के
अनुभाग को लता और दारू इन दो स्थानगत तथा अघातिया कर्मों के अनु...... भाग को नीम और कांजी इन दो स्थानगत कर देना प्रायोग्य लब्धि है। प्रश्न :- करण लब्धि का क्या स्वरूप है ? उत्तर :---करण ल—िकरगा भानों को कहते हैं.। सम्यग्दर्शन प्राप्त करने वाले
करणोंभावों की प्राप्ति को करण लब्धि कहते हैं। इसके तीन भेद हैं-- अथाप्रवृत्तकरण नथवा अधःकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण । जो ... करण-परिणाम इसके पूर्व प्राप्त न हुए हों उन्हें प्रथाप्रवृत्तक रंगा कहते हैं । इसका दूसरा सार्थक नाम अधःकरण है। जिसमें आगामी समय में रहने वाले जीवों के परिणाम पिछले समयवर्ती जीवों के परिणामों से . मिलते जुलते हो, उसे अधःप्रवृत्तकरण कहते हैं। इसमें समसमयवर्ती तथा विषमसमयवर्ती जीवों के परिणाम समान और असमान-दोनों प्रकार के होते हैं । जैसे पहले समय में रहने वाले जीवों के परिणाम एक से लेकर दस नम्बर तक के हैं और दूसरे समय में रहने वाले जीवों के परिणाम छह
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[ गो. प्र. चिन्तामणि से लेकर पन्द्रह नम्वर तक के हैं। पहले समय में रहने वाले जीव के छह से लेकर दस नम्बर तक के परिणाम विभिन्न समयवर्ती होने पर भी परस्पर मिलते-जुलते हैं । इसी प्रकार प्रपत्र माडी गनेक जीवों के एक से लेकर । दस तक के परिणामों से समान परिणाम हो सकते हैं अर्थात् किन्हीं दो। जीवों के पांच नम्बर का परिणाम है । यह परिणामों की समानता और असभानता नाना जीवों की अपेक्षा घटित होती हैं । इस करण का काल अन्तमुहूर्त है और उसमें उत्तरोत्तर समान वृद्धि को लिए हुए असंख्यात लोक प्रमाण होते हैं।
जिसमें प्रत्येक समय अपूर्व-अपूर्व नये-नये परिणाम होते हैं, उसे अपूर्वकरण कहते हैं। जैसे पहले समय में रहने वाले जीवों के यदि एक से लेकर दस नम्बर तक के परिणाम हैं, तो दूसरे समय में रहने वाले जीव के ग्यारह से दीस नम्बर तक के परिणाम होते हैं। अपूर्वकरण में समसमयवर्ती जीवों के परिणाम समान और असमान दोनों प्रकार के होते हैं, परन्तु भिन्न समयवर्ती जीवों के परिणाम असमान ही होते हैं। जैसे पहले समय में रहने वाले और दूसरे समय में रहने वाले जीवों के परिरणाम कभी समान नहीं होते, परन्तु पहले अथवा दूसरे समय में रहने वाले जीवों को परिणाम समान भी हो सकते है और असमान भी। यह चर्चा भी नाना. जीवों की.. अपेक्षा से है। इसका काल भी अन्तमुहर्त प्रमाण है। परन्तु यह अन्तमुंहत अधःप्रवृत्तकरण के अन्तर्मुहुत से छोटा है । इस अन्तर्मुहूर्त प्रमाण काल में भी उत्तरोत्तर । वृद्धि को प्राप्त होते हुए असंख्यात लोक प्रमाण परिणाम होते हैं।
- जहाँ एक समय में एक ही परिणाम होता है, उसे अनिवृत्तिक रगग कहते हैं। इस कररंग में समसमयवर्ती जीवों के परिणाम समान ही होते हैं और विषम समयवर्ती । जीवों के परिणाम असमान ही होते हैं । इसका कारण है कि यहाँ एक समय में एक ही परिणाम होता है, इसलिये उस समय में जितने जीव हांगे इन सबके परिणाम समान ही होंगे और भिन्न समयों में जो जीव होंगे उनको परिणाम भिन्न ही होंगे। इसका काल भी अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है । परन्तु अपूर्वकरण की अपेक्षा छोदा अन्तमहत है । इसके प्रत्येक समय में एक ही परिणाम होता है। इन दोनों कर रगों में परिणामों की विशुद्धता उत्तरोत्तर बढ़ती रहती है। ......
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:
अध्याय : दूसरा
उपयुक्त तीन करणों में से पहले अथाप्रवृत अथवा अधःकरण में चार अवश्य होते है-(१) समय-समय में अनन्त गुणी विशुद्धता होती है। (२) प्रत्येक अन्तमहत में नबीन बन्ध की स्थिति घटती जाती है। (३) प्रत्येक समय प्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग अनन्त गुगणा वढ़ता जाता है; और (८) प्रत्येक समय अप्रशस्त प्रतियों का अनुभाग अनन्तवाँ भाग घटता जाता है । इसके बाद अपूर्वकरण परि
शाम होता है । उस अपूर्वकरण में निम्नलिखित प्रावश्यक और होते हैं। (१) सत्ता . र में स्थित प्रत्येक अन्तर्मुहूर्त में उत्तरोत्तर घटती जाती है, अतः स्थितिकाण्डकपात होता है । (२) प्रत्येक अन्तर्मुहूर्त में उत्तरोत्तर पूर्व कर्म का अनुभाग घटता जाता है इसलिये अनुभागकाण्डकधात होता है और (३) गगणश्रेणी के काल में क्रम से असंख्यात गुणित कर्म, निर्जरा के योग्य होते हैं, इसलिये मुरगश्रेणी निर्जरा होती है। इस अपूर्व करमा में गुरण संक्रमण नाम का अावश्यक नहीं होता। किन्तु चारित्र मोह . । का उपशम करने के लिए जो अपुर्वकरण होता है, उसमें होता है। अपूर्वकरण के
बाद अनिवृत्तिकरण होता है, उसका काल अपूर्वकरण के काल के संख्यातवें भाग. . । होता है । इसमें पूर्वोक्त अावश्यक सहित कितना ही काल व्यतीत होने पर | किमन्तर. । करण नाम? "विवक्खियकम्मारग हेद्विमोवरिमद्विदीयो मोत्तुग मउसे अंतो मुहत्तमेत्तार्ण
टिळदीगण परिणाम विसेसैग पिसेगारणमभावावीकरण मन्तरण मिदि भण्गदे ।" जय । धवल अ. प्र. १५३ । अर्थ :--अन्तरकरगा का क्या स्वरूप है ? : उत्तर :--विवक्षित ..
माँ की अधस्तन और उपरिम स्थितियों को छोड़कर मध्यवर्ती अन्तर्मुहर्त मात्र स्थितियों के निषेकों का परिणाम विशेष के द्वारा प्रभाव करने को अन्तरकरण कहते हैं।] अन्तरकरण होता है अर्थात् अनिवृत्तिकरण के काल के पीछे, उदय प्राने योग्य . मिथ्यात्य कर्म के निपकों का अन्तमुहर्त के लिए अभाव होता है । अन्तरकररा के .. पीछे उपशमकरणा होता है अर्थात् अन्तरकरण के द्वारा प्रभाव रूप किये हुये नियकों के ऊपर जो मिथ्यात्व के निषेक उदय में आने वाले थे, उन्हें उदय के अयोग्य किया जाता है। साथ ही अनन्तानुबन्धी चतुष्क को भी उदय · के अयोग्य किया जाता . है। इस तरह उदय योग्य प्रकृतियों का प्रभाव होने से प्रथमोपशम सम्यक्त्व के प्रथम समय में मिथ्यात्व प्रकृति के तीन खण्डं करता है । परन्तु राजवातिक में, अनिवृत्तिकरणा के चरम समय में मिथ्यादर्शन के तीन भाग करता है- सम्यक्त्व, मिथ्यात्य . और सम्यमिथ्यात्व । इन तीन प्रकृतियों तथा अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ.
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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इन चार प्रकृतियों का इस प्रकार सात प्रकृतियों के उदय का अभाव होने पर प्रथमो. पशम सम्यक्त्व होता है । यही भाव पटवण्डागम (धवल, पुस्तक ६) के निम्नलिखित । सूत्रों में भी प्रगट किया है--
'अहदहेदा मिच्छतं तिणि भागं करेदि सम्मतं मिच्छत्तं ॥७॥ .. अर्थ-- अन्तरकरग करके मिथ्यात्व कर्म के तीन भाग करता है-सम्यक्त्व, । मिथ्यात्व और सम्यमिथ्यात्व ।
दसरस मोहरणीय कम्म उवसामेदि ।।८।।
अर्थ-मिथ्यात्व के तीन भाग करने के तश्चात् दर्शन. मोहनीय कर्म को उपशमाता है। . . .. . . . . प्रश्न :-द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-द्वितीयोपशमः सम्यग्दर्शनं-ग्रौपशमिक सम्यग्दर्शन के प्रथमोपशम और ।
द्वितीयोपशम इस प्रकार दो भेद हैं। इनमें से प्रथमोपशम किसके और अब होना है। इसकी चर्चा जार पा चुकी है। द्वितीयोपशम की चर्चा इस प्रकारः । है । प्रथमोपणम और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन का अस्तित्व चतुर्थ गुणस्थानः । से लेकर सातवें गुगास्थान तक ही रहता है । क्षायोपशामिक सम्यवत्व को। धारण करने वाला कोई जीव, जव सातवें गुग्ग स्थान के सातिशय अप्रमत्त । भेद में उपशम श्रेणी माड़ने के सम्मुख होता है, तब उसके द्वितीयोपशम । सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है । इस सम्यग्दर्शन में अनन्तानुवन्धी चतुष्क की । विसंयोजन, और दर्शन मोहनीय की प्रकृतियों का उपशम होता है। इस सम्यग्दर्शन को धारण करने वाला जीव उपशम श्रेणी माइकर न्यारहवें गुग्गस्थान तक जाता है, और वहाँ से पतन कर नीचे पाता है, पतन की अपेक्षा चतुर्थ, पञ्चम और पप्ठम गुगास्थान में भी इसका सद्भाव ।।।
रहता है। प्रश्न :---क्षायोपशमिक (बेदक) सम्यग्दर्शन का क्या स्वरूप है ? . उत्तर :- क्षायोपशमिक अथवा वेदक सम्यग्दर्शन--मिथ्यात्व, सम्या मिथ्यात्व अनन्ता.
नुवन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ इन छह सर्वघाती प्रकृतियों के वर्तमान काल . में उदय पाने वाले निकों का उदयाभावी अय तथा प्रागारी काल में उदय ।
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[ ७१
अध्याय : दुसरा
आने वाले निकों का सदबस्थारूप उपशम और सम्यवत्व प्रकृतिनामक देशचाती प्रकृति का उदय रहने पर जो सम्यक्त्व होता है, उसे क्षायोपशमिक सम्यक्त्व कहते हैं । इस सम्यक्त्व में सम्यक्त्व प्रकृति का उदय होने से बल, मल और अगाढ़ दोष उत्पन्न होते रहते हैं। छह सर्वघाती प्रकृतियों के उदयाभावो क्षय और सदवस्थारूप उपशम को प्रधानता देकर जब इसका वर्गान होता है, तब इसे क्षायोपशमिक कहते हैं और जब सम्यक्त्व प्रकृति के उदय की अपेक्षा वर्णन होता है, तब इसे वेदक सम्यग्दर्शन कहते हैं।
बैंसें ये दोनों पर्यायवाची हैं। . .. .. इसकी उत्पत्ति मादि मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि दोनों के हो सकती है। सादि मिथ्यांदृष्टियों में जो वेदक काल के भीतर रहता है, उसे वेदक सभ्यग्दर्शन ही होता है। सम्यग्दष्टियों में जो प्रथमोपशम सम्यग्दृष्टि है, उसे भी वेदक सम्यग्दर्शन ही होता है । प्रथमोपशम सम्यग्दृष्टि जीव को चौथे से लेकर सातवें गुणस्थान तक किसी भी गुणस्थान में इसकी प्राप्ति हो सकती है, यह सम्यग्दर्शन चारों गतियों में उत्पन्न हो सकता है। प्रश्न :-क्षायिक सम्यग्दर्शन का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- क्षायिक सम्यग्दर्शन-मिथ्यात्व, सम्यङमिश्यात्व, सम्यक्त्व प्रकृति और
असन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ इन सात प्रकृतियों के क्षय से जो सम्यक्त्व उत्पन्न होता है, वह क्षायिक सम्यक्त्व कहलाता है। दसण मोहयखवरणाषट्ठवगो कम्मभूमि जादो हु। मणुसो. केवलि मूले गिढ़वगो होदि सब्वत्थ ॥७४॥जी.का.॥८॥
दर्शन मोहनीय की क्षपणा का प्रारम्भ कर्म भूमिज मनुष्य ही करता है, और बह भी केवली या श्रुत केवली के पाद मूल में।
. स्वयं श्रुत केवली हो जाने पर फिर केवली या श्रुत केवली के सान्निधान की आवश्यकता नहीं रहती। . .. .... ... ::. परन्तु इसका निष्ठापन चारों गतियों में हो सकता है । यह सम्यग्दर्शन वेदक
सम्यक्त्व पूर्वक ही होता है तथा चौथे से सातवें गुरुपस्थान तक किसी भी गुग्णस्थान में तो हो सकता है । यह सम्यग्दर्शन सादि अनन्त है । होकर कभी छुटता नहीं है, जबकि
पिशमिक पार क्षायोपशामिक सम्यग्दर्शन असंख्यात बार होकर छुट सकते हैं ।
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[ गो. प्र. चिन्तामणिः । मायिक सम्यग्दष्टि या तो उसी भव से मोक्ष चला जाता है या तीसरे भवः में या चौथे भव में, चौथे भव से अधिक संसार में नहीं रहता।
दंसरण मोहे खविदे सिज्झदि एक्केव तदिय-तुरियभवे । णादिकवि तुरियभवं ए विरणसदि सेससम्म व ॥क्षे.जी.का.स.प्र.1
जो क्षायिक सम्यग्दृष्टि बायाक. होने से नरक में जाता है अथवा देवगतिः । में उत्पन्न होता है, वह वहीं से मनुष्य होकर मोक्ष जाता है । इस प्रकार चौथे भव में । उसका मोक्ष जाना बनता है।
चत्तारि वि खेसाई, अायुगबंधेढ होई सम्मत्तं । अणुबद-महत्वदाई ण लहइ देयाउगं मोत्तु ।।६५२।।जी.का.॥१०॥
चारों गति सम्बन्धी आयु का बन्ध होने पर सम्यक्त्व हो सकता है, इसलिये । ब्रद्वायुष्क सम्यग्दृष्टि का चारों गतियों में जाना संभव है। परन्तु यह नियम है कि । सम्यक्त्व के काल में यदि मनुष्य और तिर्यञ्च के आयु बन्ध होता है, तो नियम से । देवायु का ही बन्ध होता है और नारकी तथा देव के नियम से मनुष्यायु का ही बंध होता है। प्रश्न :-सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के बहिरंग कारण कौनसे है ?... उत्तर :- सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति के बरिङ्ग कारग :-कारण दो प्रकार के होते हैं.
एक उपादान कारण और दूसरा निमित्त कारण । जो स्वयं कार्य रूप परि । गात होता है, वह उपादान कारण कहलाता है । और जो कार्य की सिद्धि में । सहायक होता है, वह निमित्त कारग कहलाता है । अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग । के भेद से निमित्त के दो भेद हैं । सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का उपादान कारणे । प्रासन भव्यताकर्म हानिसंज्ञित्व शुद्धि भाक् । .
देशनाद्यस्त मिथ्यात्वो जीवः सम्यक्त्वमश्नुते ।सा.ध.।।११।। ...अासन्न भव्यता आदि विशेषताओं से युक्त प्रात्मा है । अन्तरङ्ग निमित्त कारण सम्बवत्व की प्रतिबन्धक सात प्रकृतियों का उपशम अथवा क्षयोपशम है ।
और बहिरङ्ग निमित्त कारण सद्गुरू आदि हैं। अन्तरङ्ग निमित्त कारण . के मिलने पर सम्यग्दर्शन, नियम से होता है, परन्तु बहिरङ्ग निमित्त के ।
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अध्याय : दूसरा
[ ७३ - मिलने पर सम्यग्दर्शन होता भी है और नहीं भी होता है। सम्यग्दर्शन के
वहिरङ्ग निमित्त चारों गतियों में विभिन्न प्रकार के होते हैं । जैसे नरक गति में तीसरे नरक तक जातिस्मरण, धर्मश्रवण और तीव्र वेदनातुभव ये तीन । .
चौथे से सातनं तक जातिस्मरण और तीन वेदनानुभव ये दो । तिर्यञ्च और :मनुष्यगति में जातिस्मरण, चमश्रवा और जिनविम्ब दर्शन ये तीन । देवगति
में बारहवें स्वर्ग तक जातिस्मरण, धर्मश्रवण, जिनकल्याणकदर्शन और देवद्धि दर्शन ये चार । तेरहवें से सोलहवं स्वर्ग तक देवद्धि दर्शन को छोड़कर तीन और उसके प्रागे नौवें अवेयक तक जातिस्मरण तथा धर्मश्रवण दो। वहिरङ्ग निमित्त हैं । वेयक के ऊपर सम्यग्दृष्टि ही उत्पन्न होते हैं, इसलिये
वहां बहिरङ्ग निमित्त की अावश्यकता नहीं है। प्रश्न :- उत्पत्ति की अपेक्षा सम्यग्दर्शन के कितने भेद हैं ? ।
:--सम्यग्दर्शन के भेद--उत्पति की अपेक्षा सम्यग्दर्शन के निसगंज और अधि: गमज दो भेद हैं । जो पूर्व संस्कार की प्रबलता से परोपदेश के बिना हो। — जाता है, वह निसर्गज सम्यग्दर्शन कहलाता है । और जों पर के उपदेशापूर्वक होता है, वह अधिगमज सम्यग्दर्शन कहलाता है। इन दोनों भेदों में अन्तरङ्ग कारण-सात प्रकृतियों का उमशमादिक समान होता है, मात्र बाह्यकरगा की अपेक्षा दो भेद होते हैं।
करगानुयोग की पद्धति से सम्यग्दर्शन के सौपशमिक, क्षायिक और क्षायोप। शमिक ये तीन भेद होते हैं । जो सात प्रकृतियों के उपशम से होता है, उसे औपसमिक कहते हैं। इसके प्रथमोपशम और द्वितीयोपशम की अपेक्षा दो भेद हैं । जो सात प्रकुतियों के क्षय से होता है, उसे क्षायिक कहते हैं और जो सर्ववाती छह प्रकृतियों के उदयाभावी 'क्षय और सदवस्थारूप उपशम तथा सम्यक्त्व प्रकृति नामक देशघाती "प्रकृति के उदय से होता है, उसे क्षायोपशमिक कहते हैं अथवा वेदक सम्यग्दर्शन कहते
हैं। कृतकृत्य सम्यग्दर्शन भी इसी क्षायोपशामिक सम्यग्दर्शन का अवान्तर भेद है। - दर्शन मोहनीम की क्षपणा करने बाले जिस क्षायोपशसिक सम्यग्दृष्टि के मात्र सम्यक्त्व प्रकृति का उदय शेष रह जाता है, शेष की अपगणा हो चुकी है, उसे कृतकल्य वेदक सम्बग्दृष्टि कहते हैं।
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७४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि चरगानुयोग की पद्धति से सम्यग्दर्शन के निश्चय और व्यवहार की अपेक्षा दो भेद होते हैं। वहां परमार्थ देव-शास्त्र-गुरु की विपरीताभिनिवेश से रहित श्रद्धा . करने को निश्चय सम्यग्दर्शन कहा जाता है और उस सम्यग्दृष्टि की पच्चीस दोषों में, रहित जो प्रवृत्ति है, उसे व्यवहार सम्यग्दर्शन कहा जाता है । शङ्कादिक पाठ दोष नाट माद, छह अनायतन और तीन मुढताएँ ये व्यवहार सम्यग्दर्शन के पच्चीस दोष का कहलाते हैं।
द्रव्यानयोग की दृष्टि से सम्यग्दर्शन के भेद-द्रव्यानयोग की पद्धति से भी सम्यग्दर्शन के निश्चय और व्यवहार की अपेक्षा दो भेद होते हैं। यहां जीवाजीवादि। सात तत्वों के विकल्प से रहित शुद्ध आत्मा के श्रद्धान को निश्चय सम्यग्दर्शन कहते । हैं और सात तत्वों के विकल्प से रहित श्रद्धान को व्यवहार सम्यग्दर्शन कहते हैं ।
अध्यात्म में बीतराग सम्यग्दर्शन और सराग सम्यग्दर्शन के भेद से दो भव होते हैं । यहां यात्मा की विशुद्धि मात्र को वीतराग सम्यग्दर्शन कहा है और प्रशम, । • संवेग, अनुकम्पा और नास्तिवय इन चार गुमगों की अभिव्यक्ति को सराग सम्यग्दर्शन कहते हैं। .
. . . . आज्ञा मार्ग समुद्भवमुपदेशात्सूत्र बोज संक्षेपात् । विस्तारार्थाभ्यां भवमवगाढं परमावगादं च ॥१॥ प्रात्मानुशासन ॥२॥
पारमानुशासन में ज्ञान प्रधान निमित्तादिक की अपेक्षा १. पाना सम्यवत्व २. मार्ग सम्यक्त्व ३. उपदेश सम्वत्व ४. सूत्र सम्यवत्व ५. बीज सभ्यवत्व ६. संक्षेप सम्यक्त्व ७. विस्तार सम्यक्त्व ८. अर्थ सम्यक्त्व है.. अवगाइ सम्यक्त्व और १० परमावगाढ़ सम्यक्त्व ये दस भेद कहे हैं।
मुझे जिन याज्ञा प्रमाण है, इस प्रकार जिनाज्ञा की प्रधानता से ; जो सूक्ष्म अन्तरित एवं दूरवर्ती पदार्थों का श्रद्धान होता है, उसे आज्ञासम्यक्त्व कहते हैं । ...
निर्गन्थ मार्ग के अवलोकन से, जो सम्यवस्व होता है, उसे मार्गसम्यत्रत्व
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कहते हैं।
आगमन पुरुषों के उपदेश से उत्पन्न सम्यगदर्शन उपदेशसभ्यवत्व कहलाता है।
मुमुनि के प्राचार का प्रतिपादन करने वाले प्राचार सूत्र को सुनकर, जो श्रद्धान होता है, उसे सूत्रसम्यक्त्व कहते हैं।
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[ ७५
: अध्याय दूसरा ]
गरंगत ज्ञान के कारण बीजों के समूह से, जो सभ्यवत्व होता है, उसे बीजसत्य कहते हैं ।
पदार्थों के संक्षेपरूप कथन को सुनकर, जो श्रद्धान होता है, उसे संक्षेपसम्यक्त्व कहते हैं ।
विस्ताररूप जिनवाणी को सुनने से जो बद्धान होता है, उसे विस्तारसम्यक्त्व कहते हैं ।
जैनशास्त्र के वचन बिना किसी अर्थ के निमित्त से, जो श्रद्धा होती है, उसे यत्व कहते हैं ।
श्रुत केवली के तत्वान को अवगादसम्यवत्व कहते हैं । केवली के तत्वश्रद्धान को परसावगाढसम्यत्रत्व कहते हैं ।
इन दस भेदों में प्रारम्भ के आठ भेद कारण की पेक्षा और ग्रन्त के दो भेद ज्ञान के सहकारीपना की अपेक्षा किये गए हैं ।
इस प्रकार शब्दों को प्रक्षा संख्यात श्रद्धान करने वालों की अपेक्षा असंख्यात और श्रद्धान करने योग्य पदार्थों की अपेक्षा अनन्त भेद होते हैं ।
प्रश्न :- सम्यग्दर्शन का निर्देश आदि की अपेक्षा से वर्णन किस प्रकार है ? उत्तर: -- सम्यग्दर्शन का निर्देश यादि की अपेक्षा वर्णन - तत्त्वार्थ सूत्रकार उमास्वामी ने पदार्थ के जानने के उपायों का वर्णन करते हुए निर्देश, स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधान इन छह उपायों का वर्णन किया है । 'निर्देश स्वामित्व साधनाधिकरणस्थिति विधानतः ' - त० सून १ - - ७ । . यहां सम्यग्दर्शन के संदर्भ में इन उपायों का भी विचार करना उचित जान पड़ता है । वस्तु के स्वरूप निर्देश को निर्देश कहते हैं । वस्तु के श्राधिपत्य को स्वामित्व कहते हैं । वस्तु की उत्पत्ति के निमित्त को साधन कहते हैं । वस्तु के ग्राधार को
किरण कहते हैं | वस्तु की कालावधि को स्थिति कहते हैं और वस्तु के प्रकारों को विधान कहते हैं । संसार के किसी भी पदार्थ के जानने में इन छह उपायों का यलम्बन लिया जाता है ।.
यहां सम्यग्दर्शन का निर्देश स्वरूप क्या है ? इसका उत्तर देने के लिये कहा गया है कि यथार्थ देव शास्त्र - गुरु का श्रद्धान करना अथवा सप्त तत्त्व नौ पदार्थ का श्रद्धान करना आदि सम्यग्दर्शन का निर्देश हैं ।.
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
सम्यग्दर्शन का स्वामी कौन है ? इस प्रश्न का विचार सामान्य और विशेष रूप से किया गया है । सामान्य की अपेक्षा से सम्यग्दर्शन संज्ञीपञ्चेन्द्रिय पर्याप्तिक satta के ही होता है । अतः वही इसका स्वामी है । विशेष की अपेक्षा विचार इस प्रकार है - निम्नलिखित चौदह मार्गणात्रों में होता है
मइ इन्दिये च काये जोगे वेदे कसाय खाय ।
७६ ]
संजम दंसर लेस्सा भविया सम्मत सति श्राहारे || जी० का०॥१३॥ गति की अपेक्षा नरकगति में सभी पृथिवियों के पर्याप्तक नारकियों के raft और क्षायोपशमिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं । तिर्यंचगति में श्रमिक सम्यग्दर्शन पर्याप्ति तिर्यंचों के ही होता है प्रौर क्षायिक तथा क्षायोपशमिक भोगभूमिज तिचों की अपेक्षा होते हैं । तिर्यचियों के पर्याप्तक तथा अपर्याप्तक दोनों ही
स्थायों में क्षायिक सम्यग्दर्शन नहीं होता, क्योंकि दर्शन मोह की क्षपणा का प्रारम्भ कर्मभूमिज मनुष्य के ही होता है और क्षपणा के पहले तिर्यञ्च श्रायु का बन्ध करने वाला मनुष्य, भोग भूमि के पुरुषवेदी तिर्यंचों में उत्पन्न होता है, स्त्रीवेदी तिर्यंचों में नहीं | नवीन उत्पत्ति की अपेक्षा पर्याप्तक तिर्यञ्चयों के औपशमिक और क्षायोप. शमिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं। मनुष्यगति में पर्याप्त और अपर्याप्तक मनुष्यों के क्षायिक र क्षायोपशमिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं । औपशमिक सम्यग्दर्शन पर्याप्तक मनुष्यों के ही होता है, अपर्याप्त मनुष्यों के नहीं, क्योंकि प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन में किसी का मरण होता नहीं है और द्वितीयोपण सम्यग्दर्शन में मरा हुआ जीव . नियम से देवगति में ही जाता है । मानुषी स्त्रीवेदी मनुष्यों के पर्याप्त अवस्था में तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं; परन्तु अपर्याप्तक अवस्था में एक भी नहीं होता । मानुषियों के जो . क्षायिक सम्यग्दर्शन बतलाया है, वह भाववेद की अपेक्षा होता है, द्रव्यवेद की अपेक्षा नहीं । देवगति में पर्याप्तक और अपर्याप्तक दोनों के तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं । द्वितीयोपशम सम्यग्दर्शन में जीव मरकर देवों में उत्पन्न होते हैं, इस अपेक्षा वहां अपयप्तिक वस्था में भी सिक सम्यग्दर्शन का सद्भाव रहता है । भवनवासी, व्यन्तर ज्योतिष्क देव, उनकी देवाङ्गनाओं तथा सौधर्मेशान की देवांगनात्रों के अपर्याप्तक अवस्था में एक भी सम्यग्दर्शन नहीं होता, किन्तु पर्याप्त अवस्था में नवीन उत्पत्ति की अपेक्षा श्रमिक और क्षायोपशमिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं । स्वर्ग में देवियों का सद्भाव यद्यपि सोलहवें स्वर्ग तक रहता है, तथापि उनकी उत्पत्ति दूसरे स्वर्ग तक
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- अध्याय : दूसरा ] .
[ ७७ ही होती है, इसलिये आगे को देवियों का समावेश पहले-दूसरे स्वर्ग की देवियों में ही समझना चाहिये।
इन्द्रियों की अपेक्षा संज्ञी पञ्चेन्द्रियों को तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं। अन्य न्द्रियं वालों के एक भी नहीं होता । काय की अपेक्षा त्रसकायिक जीवों के तीन होते । परन्तु अयोगियों के मात्र क्षायिक ही होता है । वेद की अपेक्षा तीनों वेदों में तीनों
सम्यग्दर्शन होते हैं, परन्तु अपगत वेद बालों के प्रीपशमिक और क्षायिक ही होते हैं । यहाँ वेद से तात्पर्य भाववेद से है । कपाय की अपेक्षा क्रोधादि चारों कषायों में तीनों होते हैं, परन्तु अकषाय-कषाय रहित जीवों के प्रौपशमिक और क्षायिक ये दो होते है। औपशमिक मात्र या गुरमस्थान तक रहा है । शान की अपेक्षा मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय ज्ञान के धारक जीवों के तीनों होते हैं, परन्तु केवलज्ञानियों के एक क्षायिक ही होता है । संयग की अपेक्षा सामायिक और छेदोंपस्थापना संयम के धारक जीवों के तीनों होते हैं, परिहार विशुद्धि वाले के औपशामिक नहीं होता; शेष दो होते हैं और संयतासंयत तथा असंयतों के तीनों होते हैं । दर्शन की अपेक्षा त्रा,
चक्ष और अनधि दर्शन के धारक जीवों के तीनों होते हैं, परन्तु केवल दर्शन के धारक जीवों के एक क्षायिक ही होता है । लेश्या की अपेक्षा छह लेश्याओं बालों के । तीनों होते हैं, परन्तु लेण्या रहित जीव के एक क्षायिक ही होता है । भव्य जीवों की की अपेक्षा भव्यों के तीनों होते हैं, परन्तु अभव्यों को एक भी नहीं होता । सम्यक्त्व की अपेक्षा जहाँ जो सम्यग्दर्शन होता है, वहाँ उसे ही जानना चाहिये । संज्ञा की अपेक्षा संज्ञियों के तीनों होते हैं, असंजियों को एक भी नहीं होता । संज्ञी और प्रसंज्ञी के व्यपदेश से रहित सयोग केवली और प्रयोग केवली के एक क्षायिक ही होता है। आहार की अपेक्षा याहारकों को तीनों होते हैं, छदास्थ आहारकों के भी तीनों होते हैं, परन्तु समुद्घात केवली अनाहारक के एक क्षायिक ही होता है।
प्रश्न :-- सम्यग्दर्शन का प्रधिकरण क्या है. ? . . .... 3 उत्तर :-श्राधिकरगा के बाह्य और अभ्यन्तर' की अपेक्षा दो भेद हैं ! अभ्यन्तर
अविकरगा स्वस्वामिसम्बन्ध से योग्य प्रात्मा ही है और वाह्य अधिकरण एक राजू चीड़ी तथा चौदह राजू लम्बी लोक नाड़ी है। प्रश्न :--सम्यग्दर्शन की स्थिति क्या है ? उत्तर :-ग्रौपशमिक सम्यग्दर्शन की जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूर्त की है। .
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन की जघन्य स्थिति श्रन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट छियासठ सागर प्रमाण है । क्षायिक सम्यग्दर्शन उत्पन्न होकर नष्ट नहीं होता, . इसलिये इस अपेक्षा उसकी स्थिति सादि ग्रनन्त है, परन्तु संसार में रहने की अपेक्षा जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहुर्त सहित आठ वर्ष कम दो करोड़ वर्ष पूर्व तथा तैतीस सागर की है ।
प्रश्न : सम्यग्दर्शन का विधान क्या है ?
उत्तर: - सम्यग्दर्शन के विधान - भेदों का वर्णन पिछले स्तम्भ में आ चुका है। सम्यत्व मार्गा और उसका गुणस्थानों में अस्तित्व . सभ्यत्व मार्गा के श्रपशमिक सम्यग्दर्शन, क्षायिक सम्यग्दर्शन, श्रयोपशमिक सम्यग्दर्शन, सम्य मिथ्यात्व सासादन और मिध्यात्व ये छ: भेद हैं । औपशमिक सम्यग्दर्शन के दो भेद हैं- प्रथमोपणम और द्वितीयोपशम इनमें प्रथमोपशम चौथे से लेकर साल तक और factory चौथे से लेकर ग्यारहवें गुणस्थान तक होता है । क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन चौथे से लेकर सातवें तक होता है और क्षायिक सम्यग्दर्शन चौथे से लेकर चौदहवे तक तथा सिद्ध यवस्था में भी रहता है । सम्यङ् मिथ्यात्व मार्गगा तीसरे गुणस्थान, में सासादन मार्गणा दूसरे गुगास्थान में और मिध्यात्व मार्गमा पहले गुणस्थान में होती है । इसमें जीव के परिणाम दही और गुड़ से मिले हुए स्वाद के समान सम्यवत्व और मिथ्यात्व दोनों रूप होते हैं। इस मार्गणा में किसी का मरण नहीं होता और न मारगान्तिक समुद्धात ही होता है । श्रपशमिक सम्ययत्व का काल एक समय से लेकर छह सावली तक शेष रहने पर अनन्तानुबन्धी क्रोध-मान- माया लोभ में से . किसी एक कपाय का उदय थाने से जिनका सम्यक्त्व श्रासादना -विराधना से सहित हो गया है, वह मिथ्यात्व के अगृहीत और गृहीत की अपेक्षा दो भेद एकान्त, विपरीत, संशय, अज्ञान और वैनयिक की अपेक्षा पांच भेद अथवा गृहीत, गृहीत और सांशयिक . की अपेक्षा तीन भेद होते हैं ।
के पाचिन्द तमसायते गृहीतं ग्रहायतेऽस्येपाम् ।
मिथ्यात्वमिह ग्रहीत शल्यति सांशयिकमपरेषाम् ||2|| सा० व १४
प्रश्न : --- सम्यग्दर्शन के अंग कौन-कौन से हैं ?.
उत्तर :--- सम्यग्दर्शन के आठ अंग :- जिन्हें मिलाकर अंगी की पूर्णता होती है प्रवा संगी को अपना कार्य पूर्ण करने में जो सहायक होते हैं, उन्हें ग्रंग कहते हैं
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अध्याय : पहला
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ना के शरीर में जिस प्रहार हाथ, पैर मादि आठ अंग होते हैं, उन पाठ अंगों के मिलने से ही मनुष्य के शरीर की पूर्णता होती है और वे अंग ही उसे अपना कार्य पूर्ण करने में सहायक होते हैं, उसी प्रकार सम्यग्दर्शन के नि:शंकित आदि पाठ अंग हैं । इन ग्राट अंगों के मिलने से ही सम्यग्दर्शन . को पूर्णता होती है और सम्यग्दर्शन को अपना कार्य करने में उनसे सहायता मिलती है। कुन्द-कुन्द स्वामी ने अप्टपाहुड के अन्तर्गत चारित्र पाहुइ में चारित्र के सम्यवत्वाचरग और संयमाचरण इस तरह दो भेद कर सम्यक्त्वाचरस्म का निम्नलिखित गाथानों में वर्णन किया है---
एवं चिय गाऊरण यसब्वे मिच्छत्तदोससंकाई. । ... ... .. परिहरि सम्मत्तमला जिणभगिया तिथिहजोएण ।।६।। ।।१५।। गिस्संकिय रिंगवकलिय रिगविवदिगिछा अमूठविट्ठी य ।। उन्नगृहणा ठिदिकरण वच्छल्ल पहावरणा य ते अहः ।।७।। ।।१६।। तं चेय गुणविसुद्धं जिसम्मत्तं सुमुख ठाणाय | .....
जं चरइ पागजुलं पठम सम्मतचरणाचारित्तं ॥८॥ ॥१७॥ .ऐसा जानकर हे भव्य जीवों ! जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कहे हुए तथा सम्यक्त्व में मल उत्पन्न करने वाले शंका आदि मिथ्यात्व के दोषों का तीनों योगों से परित्याग करो।
निःशंकित, निःकाङक्षित, निविचिकित्सा, अमूढदृष्टि, उपगूहन, स्थितिकरण, का वात्सल्य और प्रभावना ये पाठ सम्यक्त्व के गुण हैं ।
निःशंकितादि गुणों से विशद्ध वह सम्यक्त्व ही जिन-सम्यक्त्व कहलाता है तमो जिनः सम्यक्त्व ही उत्तम मोक्ष रूप स्थान की प्राप्ति के लिये निमित्तभूत है। जान सहित जिन सम्बन्ध का जो मुनि श्राचरण करते हैं, यह पहला सम्यक्त्वाचररा नामक चारित्र है।
तात्पर्य यह है कि शंकादिक दोषों को दूर कर निःशंकित यादि गुणों का आचरण करना सम्यक्त्वाचरण कहलाता है, यही दर्शनाचरण कहलाता है, स्वरूपाचरगा इससे भिन्न है।
... अष्टपाड के अतिरिक्त समयसार की गाथाओं (२२६ से लेकर २३६) में भी कुन्द-कुन्द स्वामी ने सम्यग्दृष्टि के निःशंकित आदि गुणों का वर्णन किया है।
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[ गोः प्र. चिन्तामणि
यहाँ बाट गुण श्रागे चलकर ग्राठ अंगों के रूप में प्रचलित हो गये । रत्नकरण्ड में समन्तभद्र स्वामी ने इन ग्राठ अंगों का संक्षिप्त किन्तु हृदयग्राही वर्णन किया है। पुरुषार्थ सिद्धयुपाय में श्रमृतवन्द्र स्वामी ने भी इनके लक्षण बतलाने के लिये आठ श्लोक लिखे हैं । यह आाट अंगों की मान्यता सम्यग्दर्शन का पूर्ण विकास करने के लिये
atra है। अंगों की आवश्यकता बतलाते हुए समन्तभद्र स्वामी ने लिखा है कि जिस प्रकार कम अक्षरों वाला मन्त्र विष- वेदना को नष्ट करने में असमर्थ होता है, उसी प्रकार कम अंगों वाला सम्यग्दर्शन संसार की सन्तति छेदने में असमर्थ रहता है: नाङ्गहीनमतं घेत्तु दर्शनं जन्मसन्ततिम् ।
नहि मोक्षरम्यूनो निहन्ति विषवेदनाम् ॥१८॥
गंगों का स्वरूप तथा उनमें प्रसिद्ध पुरुषों का चरित रत्नकरण्ड श्रावकाचार . के प्रथम अधिकार से ज्ञातव्य है ।
प्रश्न : - सम्यग्दर्शन के अन्य गुण कौनसे हैं ?
उत्तर : ---- सम्यग्दर्शन के अन्य गुणों की चर्चा-प्रथम, संवेग, अनुकम्पा और श्रास्तिक्य ये सम्यग्दर्शन के चार गुण हैं। वाह्य दृष्टि से ये भी सम्यग्दर्शन के लक्षण है । इनके स्वरूप का विचार पञ्चाध्यायी के उत्तरार्ध में विस्तार से किया गया है । संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है
प्रथमो विषयेषुच्चैर्भाव क्रोधादिकेषु च ।
लोका संख्यात मात्रेषु स्वरूपाच्छथिलं मनः ॥ १४२६॥१६॥ सद्यः कृतापराधेषु यद्वा जीवेषु जातुस्वित् । ..
तद्वधादिविकाराय न बुद्धिः प्रशमो मता ।।४२७|| पंचाध्यायी ॥२०॥ पञ्चेन्द्रियों के विषयों में और असंख्यात लोक प्रमाण क्रोधादिक भावों स्वभाव से मन का शिथिल होना प्रथम भाव है । अथवा उसी समय अपराध करने वाले जीवों के विषय में कभी भी उनके मारने आदि की प्रयोजक बुद्धि न होना. प्रणमभाव है ।
संवेग परमोत्साहो धर्मे धर्मफले चितः ।
धर्मस्वनुरागो वा प्रीतिर्वा परमेष्ठिषु ॥ ४३१॥२१॥
धर्म में और धर्म के फल में श्रात्मा का परम उत्साह होना अथवा समान . धर्म वालों में अनुराग का होना या परमेष्ठियों में प्रीति का होना संवेग है ।
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अध्याय : दूसरा
अनुकम्पा कृपा ज्ञेया सर्वसत्वेष्वनुग्रहः । मंत्रीभावोऽथ माध्यस्थ्य नैशल्यं वैर वर्जनात् ।।४३२॥२२॥
अनुकम्पा का अर्थ कृपा है या सब जीवों पर अनुग्रह करना अनुकम्पा है या मैत्री भाव का नाम अनुकम्पा है या मध्यस्थभाव का रखना अनुकम्पा है या शत्रुता का याग कर देने से निःशल्य हो जाना अनुकम्पा है।
प्रास्तिक्यं तत्वसद्भावे स्वतः सिद्ध विनिश्चितिः । धर्मे हेतौ च धर्मस्य फले चास्त्यादिमतिश्चितः ।।४५२॥पंचाध्यायीउ०१॥२३॥
स्वत: सिद्ध तत्वों के सद्भाव में निश्चय भाव रखना तथा वर्म, धर्म के हेतु और धर्म के फल में प्रात्मा की अस्ति आदि रूप बुद्धि का होना प्रास्तिश्य है । उपयुक्त प्रशमादिगुणों के अतिरिक्त सम्यग्दर्शन के आठ गुणा और भी प्रसिद्ध हैं। जैसा कि निम्नलिखित गाथा से स्पष्ट है--
संवेयो गिब्वेषो रिंगदा गरुहा च उनसमी भत्ती । बच्छल्लं अणुकंपा अट्ट गुरखा हुंति सम्मत्तं ।। (वसु० श्रावकाचार) ॥२५॥
संवेग, निर्वेद, निन्दा, गहीं, उपशम, भक्ति, वात्सल्य और अनुकंपा ये सम्यबत्व के पाठ गुण हैं।
___ बास्तव में ये पाठ गुगा उपर्युक्त प्रशमादि चार गुणों के अतिरिक्त नहीं हैं, योंकि संवेग, उपशम और अनुकंपा ये तीन गुण तो प्रणमादि चार गुराणों में नामोवत ही हैं । निवेद, संवेग का पर्यायवाची है । तथा भक्ति और वात्सल्य संवेग के अभिव्यंजक होने से उसमें गतार्थ हैं तथा निन्दा और गहाँ उपशम (प्रशम) के अभिव्यंजक होने से उसमें गतार्थ हो जाते हैं। प्रश्न :-सम्यग्दर्शन और स्वानुभूति क्या है ? उत्तर :----सम्यग्दर्शन और स्वानुभूति-सम्यग्दर्शन दर्शन मोहनीय का विक और
अनन्तानुबन्धी का चतुष्क इन सात प्रकृतियों के अभाव (अनुदय) में प्रगट होने वाला श्रद्धागुण का परिणामन है और स्वानुभूति स्वानुभूत्यावरगनामक मतिज्ञानावरण के अवान्तर भेद के क्षयोपशम से होने वाला क्षायोपशमिक ज्ञान है । ये दोनों सहभायी हैं। इसलिए कितने ही लोग स्वानुभूति को ही सम्यग्दर्शन कहने लगते हैं, पर वस्तुतः ऐसी बात नहीं है। दोनों ही पृथकपृथक् गुरण हैं । छद्यस्थ का ज्ञान लब्धि और उपयोग रूप होता है, अर्थात्
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८२. ]
[ गो. प्र. चिन्तामणिः:
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उसका ज्ञान कभी तो आत्मा के विषय में ही उपर्युक होता है और कभी संसार के ग्रन्य घटपटादि पदार्थों में भी उपर्युक्त होता है । यतः सम्यग्दर्शन: और उपयोगात्मक स्वानुभूति की विषय व्याप्ति है । जहाँ स्वानुभूति होती हैं, वहाँ सम्यग्दर्शन अवश्य होता है, पर जहाँ सम्यग्दर्शन होता है, वहाँ स्वानुभूति भी होती है और घटपटादि अन्य पदार्थों की भी अनुभूति होती है । इतना अवश्य है कि लब्धि रूप स्वानुभूति सम्यग्दर्शन के साथ नियम से रहती है । यहाँ यह भी ध्यान में रखने योग्य है कि जीव को ज्ञान तो उसके क्षयोपशम के अनुसार स्व और पर की भूत, भविष्यत, वर्तमान की अनेक पर्यायों का हो सकता है, परन्तु उसे अनुभव उसकी वर्तमान पर्याय मात्र का ही होता है ।
सम्यक्त्वं वस्तुतः सूक्ष्ममस्ति वाचामगोचरम् ।
तस्माद् वक्तुम् च श्रोतु च नाधिकारी विधि क्रमात् ||४००॥
पंचाध्यायी उ० ||२६||
सम्यक्त्वं वस्तुतः स्पष्टं केवलज्ञान गोचरम् । गोचरं स्वावधिस्त्र मनः पर्यय ज्ञानयोर्द्धयोः ।। ३७५ ॥ २७ ॥
वस्तुतः सम्यग्दर्शन सूक्ष्म है और वचनों का विषय है; इसलिये कोई भी जीव विधिरूप से उसके कहने और सुनने का अधिकारी नहीं है अर्थात् यह कहने और सुनने को समर्थ नहीं है कि यह सम्यग्दृष्टि है अथवा इसे सम्यग्दर्शन है । किन्तु ज्ञान के माध्यम से ही उसकी सिद्धि होती है । यहाँ ज्ञान से स्वानुभूति रूप ज्ञान विवक्षित है 1 जिस जीव के यह स्वानुभूति होती है, उसे सम्यग्दर्शन अवश्य होता है, क्योंकि सम्यग्दर्शन के बिना स्वानुभूति नहीं होती है। प्रश्न उठता है कि जिस समय सम्यग्दृष्टि जीव विषयभोग या युद्धादि कार्यों में संलग्न होता है, उस समय उसका, सम्यग्दर्शन कहां रहता है ? उत्तर यह है कि उसका सम्यग्दर्शन उसी में रहता है, परन्तु उस काल में उसका ज्ञानोपयोगं स्वात्मा में उपयुक्त न होकर अन्य पदार्थों में उपयुक्त हो रहा है । इसलिये ऐसा जान पड़ता है कि इसका सम्यग्दर्शन नष्ट हो गया है, पर वास्तविकता यह है कि उस अवस्था में भी सम्यग्दर्शन विद्यमान रहता है । लब्धि और उपयोग रूप परिणमन ज्ञान का है, सम्यग्दर्शन का नहीं । सम्यग्दर्शन तो सदा जागरूक ही रहता है ।
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[ ८३ . .
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अध्याय : दूसरा ] प्रश्न :--सम्यग्दर्शन को पालने वाली प्रकृतियों अन्तर्दशा कौन हैं ? उत्तर :- सम्यग्दर्शन को घातने वाली प्रकृतियों की अन्तर्दशा :--मुख्य रूप से सम्य.. ग्दर्शन को घातने वाली दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृतियाँ हैं-मिथ्यात्व,
सम्यड निमम र बागमत्त प्रवाहि । इनमें मिथ्यात्व का अनुभाव सबसे अधिक है, उसके अनन्तवें भाग सम्य मिथ्यात्व का है और उसके अनन्तवें भाग सम्यक्त्व प्रकृति का है । इनमें सम्यक्त्व प्रकृति देशघाती है। इसके उदय से सम्यग्दर्शन का घात तो नहीं होता, किन्तु चल, मलिन और अगाढ़ दोष लगते हैं । यह नरहनतादिक मेरे हैं, ये दूसरे के हैं; इत्यादि भाव होने · को चल दोष कहते हैं—शंकादि दोपों का लगना मल दोष है और शान्ति
नाथ शान्ति के कर्ता हैं-इत्यादि भाव का होना अगाढ़ दोष है । ये उदाहरण व्यवहार मात्र हैं, नियम रूप नहीं । परमार्थ से सम्यवत्व प्रकृति के उदय में कौनसे दोष लगते हैं, उन दोषों के समय प्रात्मा में कैसे भाव होते हैं, यह प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय है । इतना नियम रूप जानना चाहिये कि सम्यक्त्व प्रकृति के उदय में सम्यग्दर्शन निर्मल नहीं रहता । क्षायोपक्षमिक या वेदक . सम्यग्दर्शन में इस प्रकृति का उदय रहता है।
क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन को धारण करने वाला कर्मभूमिज मनुष्य जव आयिक सम्यग्दर्शन के सम्मुख होता है, तव वह तीन करण करके मिथ्यात्व के परमाणुनों के सम्यङ मिथ्यात्व रूप या सम्यवत्व प्रकृति रूप परिणामाता है । उसके बाद सम्यङ मिथ्यात्व के परमाणुओं को सम्यक्त्व प्रकृति रूप परिणमाता है, पश्चात् सम्यक्त्व प्रकृति के निषेक उदय में आकर विरते हैं । यदि उसकी स्थिति आदि अधिक हों तो उन्हें स्थितिकाण्डादि घात के द्वारा घटाता है। जब उसकी स्थिति अन्तर्मुहर्त की रह जाती है, तब कृतकृत्य वेदक सम्यग्दृष्टि कहलाता है, पश्चात् क्रम से इन निषेकों का नाश कर क्षायिक सम्यग्दृष्टि होता है । अनन्तानुबन्धी का प्रदेश क्षय नहीं होता, किन्तु अप्रत्याख्यानावरमादि रूप करके उसको सत्ता का नाश करता है । इस प्रकार इन सात प्रकृतियों को सर्वथा नष्ट कर क्षायिक सम्यग्दृष्टि होता है। :सम्यक्त्व होते समय अनन्तानुबन्धी की दो . अवस्थाएँ होती हैं-या तो ... अप्रशस्त उपशम होता है या विसंयोजन होता है । जो अपूर्वादि करण करने पर
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
उपशम विधान से . उपशम होता है, उसे प्रशस्त उपशम कहते हैं। और जो उदय का अभाव है, उसे अप्रशस्त उपशम कहते हैं। इनमें अनन्तानुबन्धी का तो प्रशस्त उपशम होता नहीं है, मोह की अन्य प्रकृतियों का होता है इसका, अप्रशस्त उपशम होता है । तीन करग कर अनन्तानुबन्धी के परमाणुओं को जो अन्य चारित्र मोहनीय की प्रकृति रूप परिणमाया जाता है, उसे विसंयोजन कहते हैं । प्रथमोपशम सम्यक्त्व में अनन्तानुबन्धी का अप्रशस्त उपशम ही होता है । द्वितीयो-.. पशम सम्यक्त्व की प्राप्ति में अनन्तानुबन्धी की विसंयोजना नियम से होती है, ऐसा किन्हीं प्राचार्यों का मत है और किन्ही प्राचार्यों का मत है कि विसंयोजना का नियम नहीं है । क्षायिक सम्यक्त्व में नियम पूर्वक विसयोजना होती है। जिस उपयम और क्षायोपणम सम्यग्दृष्टि के विसंयोजना के द्वारा अनन्तानुबन्धी की सत्ता का नाश होता है, वह सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट होकर मिथ्यात्व में आने पर अनन्तानुबन्धी का जब नवीन बन्ध करता है तभी उसकी सत्ता होती है ।
यहीं कोई प्रश्न कर सकता है कि जब अनन्तानुबन्धी चारिश मोहनीय की. प्रकृति है, तब उसके द्वारा चारित्र का ही बात होना चाहिये, सम्बग्दर्शन का घात उसके द्वारा क्यों होता है ? इसका उत्तर यह है कि अनन्तानुबन्त्री के उदय से क्रोधादिक रूप परिणाम होते हैं, अतत्त्व श्रद्धान नहीं होता, इसलिये परमार्थ से अनन्तानुवन्धी के उदय में होने वाले क्रोधादिक के काल में सम्यग्नर्शन नहीं होता, इस-: लिये उपचार से उसे भी सम्यग्दर्शन का घातक कहा है। जैसे असपना का घातक तो स्थावर नाम कर्म का उदय है, परन्तु जिसके एकोन्द्रिय जातिनाम कर्म का उदय होता है, उसके असपना नहीं हो सकता, इसलिये उपचार से एकेन्द्रिय जातिनाम कर्म को असपना का वातक कहा जाता है। इसी दृष्टि से कहीं अनन्तानुबन्धी में दो. प्रकार की शक्तियाँ मान ली गई हैं-चारित्र को थालने की और सम्यग्दर्शन को
घातने की। . प्रश्न :- यदि अनन्तानुबन्धी चारिन मोहनीय की प्रकृति है, तो उसके उदय का
अभाव होने पर असंयत सम्यादृष्टि गुरगस्थान में भी कुछ चारित्र होना
चाहिये, उसे असंयत क्यों कहा जाता है ? उत्तर :--अनन्तानुबन्धी प्रादि भेद कषाय की तीवता या मन्दता की अपेक्षा नहीं है।
.. क्योंकि मिथ्यादृष्टि के तीन या मन्द पाय के होते हुए अनन्तानुबंधी आदि ।
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चारों कषायों का उदय युगपत् रहता है । मिथ्यादृष्टि के कषाय का इतना मन्द उदय हो सकता है कि उस काल में शुक्ल लेश्या हो जावे और असंयत सम्यग्दृष्टि के इतनी तीव्र कषाय हो सकती है कि इस काल में कृष्ण लेश्या हो जाये जिसका श्रनन्त अर्थात् मिध्यात्व के साथ अनुबन्ध-गठबन्धन हो, वह अनन्तानुबन्धी है । जो एकदेश चारित्र का घात करे, वह अप्रत्याख्यानावरण हैं, जो सकल चारित्र का घात करे, वह प्रत्याख्यानावरण है और जो यथाख्यात चारित्र का घात करें, वह संज्वलन है । असंत सम्यग्दृष्टि के अनन्तानुबन्ध का अभाव होने से यद्यपि कषाय की मन्दता होती है, . परन्तु ऐसी मन्दता नहीं होती । जिससे चारित्र नाम प्राप्त कर सके । कषाय के असंख्यात लोक प्रमाण स्थान हैं, उनमें सर्वत्र पूर्व की अपेक्षा उत्तरोत्तर मन्दता पायी जाती है, परन्तु उन स्थानों में व्यवहार की अपेक्षा तीन मर्यादाएँ की गई हैं --- १. प्रारम्भ से लेकर चतुर्थं गुणास्थान तक के कपाय स्थान असंयम नाम से, २. पञ्चम गुणस्थान के कषाय स्थान देशचारित्र के नाम से और ३. षष्टम गुणस्थानों के कषाय स्थान सकल चारित्र के नाम से कहे जाते हैं ।
अध्याय: दूसरा ]
प्रश्न : - सम्यग्दर्शन की महीमा क्या है ?
उत्तर :- सम्यग्दर्शन की महीमा - सम्यग्दर्शन की महिमा बतलाते हुए समन्तभद्र स्वामी ने कहा है- रत्नकरण्ड श्रावकाचार ३१-४१ तक कि
ज्ञान और चारित्र की अपेक्षा सम्यग्दर्शन श्रेष्ठता को प्राप्त होता है, इसलिये मोक्ष मार्ग में उसे कर्णधार - सेवटिया कहते हैं ।
जिस प्रकार बीज के अभाव में वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फल की प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार सम्यग्दर्शन के प्रभाव में सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फल की प्राप्ति नहीं होती ।
'निर्मोह - मिथ्यात्व से रहित - सम्यग्दृष्टि गृहस्थ जो मोक्षमार्ग में स्थित है, परन्तु मोहवान् मिथ्यादृष्टि मुनि मोक्षमार्ग में स्थित नहीं है । मोही मुनि की अपेक्षा मोह रहित गृहस्थ श्रेष्ठ है ।
ॐ तीनों कालों और तीनों लोकों में सम्यग्दर्शन के समान अन्य कोई वस्तु देह वारियों के लिये कल्याण रूप और मिथ्यात्व के समान ग्रकल्याण रूप नहीं है ।
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[ गो. प्र. चिन्तामरि "सम्यग्दर्शन से शुद्ध मनुष्य व्रत रहित होने पर भी नरक और तिर्य गति, नपुंसक और स्त्री पर्याय, नीच कुल, विकलाङगता, अल्पायु और दरिद्रता के प्राप्त नहीं होते।"
दुर्गतावायुषो बधे सम्यक्त्वं यस्य जायते । मतिच्छेदो न तस्यास्ति तथाप्यल्पतरा स्थितिः ।।२।।
यदि सम्यग्दर्शन प्राप्त होने के पहले किसी मनुष्य ने नरक आयु का बन् कर लिया है, तो वह पहले नरक से नीचे नहीं जाता है। यदि तिर्यञ्च और मनच का बन्ध कर लिया है, तो भोग भूमि का तिर्यञ्च और मनुष्यं होता है और या देवायु का बन्ध किया है, तो वैमानिक देव ही होता है, भवन त्रिकों में उत्पन्न नहुँ होता। सम्यग्दर्शन के काल में यदि तिर्यञ्च और मनुष्य का प्रायु बन्ध होता है, नियम से देवायु का ही बन्ध होता है और नारकी तथा देव के नियम से मनुष्यापू. के ही वन्ध होता है।
हेछिमछापुढवीणं जोइसिवरण भए सम्वइत्थीए । पुरिणदरे गहि सम्भो । सासणो रणारयापुण्णरे ।।१२७जी.का.२६॥
सम्यग्दृष्टि जीव किसी भी गति की स्त्री पर्याय को प्राप्त नहीं होता मनुष्य और तिर्यञ्च गति में नपुंसक भी नहीं होता।
सम्यग्दर्शन में पवित्र मनुष्य, पोज, तेज, वीर्य, यश, वृद्धि, विजय श्री वैभव से सहित उच्च कुलीन, महान वर्थ से सहित श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं।
सम्यग्दृष्टि मनुष्य यादि स्वर्ग जाते हैं, तो वहाँ अणिमा अदि आठ गुणेकी पुष्टि से संतुष्ट तथा सातिशय शोभा से युक्त होते हुए देवाग्ङनाओं के समूह । चिर काल तक क्रीड़ा करते हैं । .
सम्यग्दृष्टि जीव स्वर्ग से प्राकर नौ निधि और चौदह रस्ना के स्वामी समस्त भूमि के अधिपति तथा मुकुटबद्ध राजारों के द्वारा वन्दित चरण होते हो। सुदर्शन चक्र को बताने में समर्थ होते हैं-चक्रवर्ती होते हैं। ...
"सम्यग्दर्शन के द्वारा पदों का ठीक-ठीक निश्चय करने वाले पुरुष अमरे असुरेन्द्र, नरेन्द्र तथा मुनीन्द्रों के द्वारा स्तुनचरण होते हुए लोक के शरण्यम तीर्थकर होते हैं।
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अध्याय : दूसरा ]
[ ८७ सम्यदृष्टि जीव अन्त में उस मोक्ष को प्राप्त होते हैं, जो जरा से रहित है, रोग रहित हैं, जहाँ सुख और विद्या का वैभव चरम सीमा को प्राप्त है तथा जो कर्म मल से रहित है।
जिनेन्द्र भगवान में भक्ति रखने वाला-सम्यग्दृष्टि भव्य मनुष्य, अपरिमित महिमा से युक्त इन्द्र समूह की महिमा को, राजाओं के मस्तक से पूजनीय चक्रवर्ती के से चक्ररत्न को और समस्त लोक को नीचा करने वाले धर्मेन्द्र चन-तीर्थकर के धर्मचक्र को प्राप्त कर निर्वाण को प्राप्त होता है । .
:-सम्यग्दर्शन और अनेकान्त क्या हैं ? उत्तर :--सम्यग्दर्शन और अनेकान्त :-पदार्थ द्रव्य पर्यायात्मक हैं । अतः उसका निरू
.. पण करने के लिए प्राचार्यों ने द्रव्याथिक नय और पर्यायाथिक नय इन दो . .. नयों को स्वीकृत किया है । द्रव्याथिक नय मुख्य रूप से द्रव्य का निरूपण
करता है और पयायाथिक नय मुख्य रूप से पर्याय को विषय करता है। अध्यात्मप्रधान ग्रंथों के निश्चयनय और व्यवहारनय की चर्चा पाती है। निश्चय नय गुण-गुणी के भेद से रहित तथा पर के संयोग से शून्य शुद्ध वस्तुतत्त्व को ग्रहण करता है और व्यवहार नय, गुण-गुणी के भेद रूप तथा पर के संयोग से उत्पन्न अशुद्धता से युक्त वस्तु तत्त्व का प्रतिपादन करता है । द्रव्याथिक और पर्यायार्थिक तथा निश्चय और व्यवहार नय के विषय परस्पर विरोधी है । द्रव्याथिक नय पदार्थ को नित्य तथा एक. कहता. है, तो पर्यायाथिक अनित्य तथा अनेक कहता है। निश्चयनय प्रात्मा को शुद्ध तथा अभेदरूप वर्णन करता है, तो व्यवहार नय अशुद्ध तथा भेद रूप बतलाता है । नयों के इस विरोध को दूर करने वाला अनेकान्त है । विवक्षावश परस्पर विरोधी धर्मों को गोगा मुख्य रूप से जो ग्रहण करना है, उसे अनेकान्त कहते हैं। सम्यग्दृष्टि मनुष्य इसी अनेकान्त का प्राश्रय लेकर.वस्तु स्वरूप को समझता है और पात्र की योग्यता देखकर दूसरों को समझाता है । सम्यग्दर्शन के होते ही इस जीव को एकान्त दृष्टि समाप्त हो जाती है । क्योंकि निश्चय और व्यवहार के वास्तविक स्वरूप को समझकर दोनों नयों के विषय में मध्यस्थता को ग्रहण करने वाला मनुष्य ही जिनागम में प्रतिपादित वस्तु स्वरूप को अच्छी तरह समझ सकता है। सम्यग्दृष्टि जीव
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[ गो. प्र. चिन्तामशिन निश्चयाभास, व्यवहाराभास और उभयाभास को समझकर उन्हें छोड़ता
तथा वास्तविक वस्तु स्वरूप को ग्रहण कर कल्याणपथ में प्रवर्तता है। प्रश्न :--सम्यग्दृष्टि को अन्तर्दृष्टि कैसी है ? उत्तर :- सम्यग्दृष्टि की अतन्दं प्टि-श्री अमृतचन्द्र स्वामी ने कहा है-"सम्यादा
भवति नियतं ज्ञान-वैराग्यशक्तिः" सम्यग्दृष्टि जीव के नियम से ज्ञान प्रो वैराग्य की शक्ति प्रगःो जाती है, इमलिए हर संभ कार्य करता हो भी अपनी दृष्टि को अन्तर्मुखी रखता है। "मैं अनन्तज्ञान का पुञ्ज, शुद्ध रागादि के विकार से रहित चेतन द्रव्य हूँ, मुझ में अन्य द्रव्य नहीं है । अन्य प्रात्मा के अस्तित्व में दिखने वाले रागादिक. भाव मेरे स्वभाव नही। हैं ।" इस प्रकार स्वरूप की और दृष्टि रखने से सम्यग्दष्टि जीव, अनन्त । संसार के कारणभूतं बन्ध से बच जाता है। प्रशंम--संबेगादि गुणों के प्रगट हो जाने से उसके कषाय का वेग ईधन रहित अग्नि के समान उत्तरोत्तर । घटता जाता है। यहाँ तक कि बुराई होने पर उसकी कषाय का संस्कार छह महीने से ज्यादा नहीं चलता। यदि छह माह से अधिक कषाय का संस्कार किसी मनुष्य का चलता है, तो उसके अनन्तानुबन्धी काय का उदयः । है और उसके रहते हुए वह नियम से मिश्यादृष्टि है। अंतोमुहत्त पक्खो छम्मासं संख संख पंतभवं । संजलबमादियारणं वासणकालो दुणिय भेग ॥यो.क.कां.।।
ऐसा समझना चाहिये । सम्यग्दृष्टि जीव अपनी वैराग्य शक्ति के कारमा । सांसारिक कार्य करता हुग्रा भी जल में रहने वाले कमलपत्र के समान निलिप्त रहता है। है । वह मिथ्यात्व, अन्याय और अभक्ष्य का त्यागी हो जाता है । भय, आशा, स्ना था लोभं के वशीभूत होकर कभी भी कुदेव, कुशास्त्र और कुगुरुयों की उपासना नती करता। किसी पर स्वयं अाक्रमण नहीं करता। हाँ, किसी के द्वारा अपने उप प्राकभरा होने पर आत्मा रक्षा के लिए युद्ध आदि भी करता है। मांस-मदिरा आणि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन नहीं करता ।. लात्पर्य यह है कि सम्यकदष्टि की चालवाद ही बदल जाती है ।
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अध्याय तीसरा : सम्यग्ज्ञान
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का एक
:.:... प्रश्न :-सम्याज्ञान का क्या स्वरूप है ?
... उत्तर :-मोक्षमार्ग में प्रयोजन भूत जीवाजीवादि सात तत्वों को संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय से रहित जानना सम्याज्ञान है। यह सम्यग्ज्ञान सभ्यग्दर्शन के साथ ही होता है-जिस प्रकार मेघपटल में दूर होने पर सूर्य का प्रताप और प्रकाश एक साथ प्रकट हो जाते हैं, उसी प्रकार मिथ्यात्व' :का . यावरगा दूर होने पर
सम्यग्दर्शन और सम्यग्जान एक साथ प्रगट हो जाते हैं । यद्यपि ये दोनों एक साथ । प्रगट होते हैं, फिर भी दीपक और प्रकाश के सामान दोनों में कारण-कार्य भाव है । अर्थात सम्यग्दर्शन कारण है और सम्यग्ज्ञान कार्य है।
यहाँ प्रश्न उठता है, कि जब पदार्थ का सम्यग्ज्ञान होगा तभी तो श्रद्धा सम्यक् होकर सम्यग्दर्शन हो सकेगा, इसलिए सम्यग्ज्ञान को कारण और सम्यग्दर्शन को कार्य मानना चाहिये ? ... ... ... .......
उत्तर यह है कि सम्यग्दर्शन होने के पहले इतना ज्ञान तो होता ही है कि जिसके द्वारा तत्त्वस्वरूप का निर्णय किया जा सके, परन्तु उस ज्ञान में सम्यक्पद का .. व्यवहार तभी होता है, जब सम्यग्दर्शन हो जाता है 1 पिता और पुत्र साथ-ही-साथ उत्पन्न होते हैं, क्योंकि जब तक पुत्र नहीं हो जाता तब तक उस मनुष्य को पिला नहीं कहा जा सकता, पुत्र के होते ही पिता कहलाने लगता है। पुत्र होने के पहले वह मनुष्य तो था, पर पिता नहीं। इसी प्रकार सम्यग्दर्शन के होने के पहले ज्ञान तो रहता है, पर उसे सम्यग्नान नहीं कहा जा सकता। सम्यग्ज्ञान का व्यवहार सम्मादर्शन के होने पर ही होता है । जिस प्रकार पिता-पुत्र साथ-साथ होने पर भी पिता कारगण कहलाता है और पुत्र कार्य, उसी प्रकार साथ-साथ होने पर भी सम्यग्दर्शन कारण नीर सम्यग्जान कार्य कहलाता है ।
यह् सम्यग्ज्ञान मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल के भेद से पांच प्रकार का है। इनमें मति और श्रुत ज्ञान. परोक्ष ज्ञान कहलाते हैं, क्योंकि उनकी उत्पत्ति इन्द्रियादि पर पदार्थों की सहायता से होती है, और अवधि, सनःपर्यय तथा केवल ये तीन प्रत्यक्ष ज्ञान कहलाते हैं, क्योंकि इनकी उत्पत्ति इन्द्रियादि पर पदार्थों
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६० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
को सहायता से न होकर स्वतः होती है। इनमें भी अवधि और मनः पर्ययज्ञानः एकदेश प्रत्यक्षज्ञान कहलाते हैं, क्योंकि सीमित क्षेत्र और सीमित पदार्थों को ही जानते हैं | परन्तु केवलज्ञान सकल प्रत्यक्ष कहलाता है, क्योंकि वह लोकालोक के समस्त पदार्थों को स्पष्ट जानता है ।
प्रश्न :- -- मतिज्ञान का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- - मतिज्ञान --जो पांच इन्द्रियों और मन की सहायता से पदार्थ को जानता है, वह मतिज्ञान कहलाता है। इसके मूल में अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये चार भेद होते हैं। ये चार भेद बहु आदि बारह प्रकार के पदार्थों के होते हैं. इसलिये बारह में चार का गुणा करने पर अड़तालीस भेद होते हैं । ये अड़तालीस भेद पांच इन्द्रियों और मन के द्वारा होते हैं । इसलिए अड़तालीस में छह का गुणा करने पर दो सौ अठासी भेद होते हैं । श्रवग्रह के व्यञ्जनावग्रह और अर्थावग्रह इस प्रकार दो भेद हैं । व्यञ्जनावग्रह अस्पष्ट पदार्थों का अवग्रह चक्षु और मन से नहीं होता, इसलिए बहु आदि बारह पदार्थों में चार का गुरणा करने पर उनके अड़तालीस भेद होते हैं । प्रर्थावग्रह के बहत्तर भेद दो सौ अठासी में व्यंजनावग्रह के अड़तासील भेद जोड़ देने से मतिज्ञान के कुल भेद ३३६ होते हैं । मति, स्मृति, संज्ञा, चिन्ता और बोध-आदि मतिज्ञान के ही विशिष्ट रूपान्तर हैं ।
धवला पुस्तक १३, पृष्ट २४०-२४१ पर मतिज्ञान के उत्तर भेदों की चर्चा करते हुए कहा गया है
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'तं जहा ४, २४, २८, ३२ पदे पुम्वुप्पाइदे भंगे दोसु द्वारणेसु दुत्रिय छह बारसेहिय गुरिएय पुरात्तमवरिणय परिवाडीए दृइदे सुत्तपरू विदभंगपमाण होदि । च. एदं – ४, २४, २८, ३२, ४८ १४४, १६८, १०२२८८, ३३६, ३८४ । जत्तिया मदिरणाविधा तसिया चैव प्रभिविवोहियासावरणीयस्स पर्याsवियप्पा ति वतव्यं ।
इसका भावार्थ विशेषार्थ में इस प्रकार स्पष्ट किया गया है- यहाँ मतिज्ञान के अवान्तर भेदों का विस्तार के साथ विवेचन किया गया है। मूल में अवग्रह श्रवा और धारणा में चार भेद हैं। इन्हें पांच इन्द्रिय और मन से गुरित करने पर २४ भेद होते हैं । इनमें व्यञ्जनावग्रह के ४ भेद मिलाने पर २८ भेद होते हैं । २८ उत्तर भेद हैं, इसलिये इनमें अवग्रह श्रादि ४ मूल भंग मिलाने पर ३२ भेद होते
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अध्याय : तोसरा 1
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1 ये तो इन्द्रियों और अवग्रह यादि की अलग-अलग विवक्षा से भेद हुए | अब जो बहु, बहुविध, विषि अनु प्रकार के पदार्थ तथा इनके प्रतिपक्षभूत इतर पदार्थों को मिलाकर बारह प्रकार के पदार्थ बतलाये हैं, उनसे ग्रलगउक्त विकल्पों को गुपित किया जाता है, जो सूत्रोक्त मतिज्ञान के सभी विकल्प उत्पन्न होते हैं । यथा --- ४x६ = २४, २४० ६=१४४, २६४६=१५६, ४×१२=४८, २४१२-२८५, २८.१२३३६ ३२x१२ ३८४ । उक्त सन्दर्भानुसार विवक्षावश मतिज्ञान के ३८४ भेद भी होते हैं । बवला के इसी संदर्भ में अवग्रह के अवग्रह, ग्रवधान, सान, अवलम्बना और मेधा । ईहा केईहा, उहा, अपोहा, मार्गरणा, गवेषणा और मीमांसा, अवाय के प्रवाय, व्यवसाय, बुद्धि, विज्ञप्ति, प्रामुण्डा और प्रत्यामुण्डा तथा धारणा के - धरणी, वारणा, स्थापना, कोष्टा और प्रतिष्ठा ये एकार्थक पर्यायवाची नाम दिये हैं । इनका शब्दार्थ धवला से ही जात करना चाहिये ।
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प्रश्न :-- श्रुतज्ञान का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- श्रुतज्ञान -- मतिज्ञान के बाद अस्पष्ट अर्थ की तर्करणाको लिये हुये हुए जो ज्ञान होता है, उसे श्रुतज्ञान कहते हैं, यह श्रुतज्ञान पर्याय, पर्याय समास आदि बीस भेदों में क्रम से वृद्धि को प्राप्त होता है। दूसरी शैली से श्रुतज्ञान के अंगबाह्य और अंगप्रविष्ट की अपेक्षा दो भेद होते हैं । इनमें अंगबाह्य के अनेक भेद हैं और अंगप्रविष्ट के १. ग्राचारांग, २. सूत्र कृलांग, ३. स्थानांग, ४. समवायांग, ५. व्याख्याप्रज्ञप्ति अंग, ६. धर्मकथांग, ७. उपासकाध्ययनांग, ८. ग्रन्तकृदृशांग, ६. अनुत्तरोपपादिक दिशांग १०. प्रश्न व्याकरणग, ११. विपाक सूत्रांग और १२. दृष्टिवादांग में बारह भेद हैं । इनमें बारहवें दृष्टिवाद अंग के १. परिकर्म, २. सूत्र, ३. प्रथमानुयोग, ४. पूर्वगत और ५. चूलिका इस प्रकार पांच भेद हैं। परिकर्म के २. चन्द्र प्रज्ञप्ति, २. सूर्य प्रज्ञप्ति, ३. जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति, ४. द्वीपसागर प्रज्ञप्ति और ५. व्याख्याप्रज्ञप्ति इस प्रकार पांच भेद हैं । पूर्वगत के १. उत्पाद पूर्व २. प्राणी पूर्व, ३. वीर्यानुवाद पूर्व ४. ग्रस्तिनास्ति पूर्व, ५. ज्ञानप्रवाद पूर्व ६. सत्यप्रवादपूर्व ७. आत्मप्रवाद पूर्व, • कर्मप्रचाद पूर्व प्रत्याख्यान पूर्व १० विद्यानुवाद पूर्व ११. कल्याणवाद पूर्व, १२. प्राशवाद पूर्व १३ क्रियाविशाल पूर्व और १४. त्रिलोक विन्दुसार ये 'चौदह भेद हैं । चूलिका के १. जलगता, २. स्थलगता, ३. मायागता. ४. आकाशगता
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१२ ]
गो. प्र. चिन्तामणि और ५. रूपगता इस प्रकार पाँच भेद है। सूत्र और प्रथमानुयोग के एक-एक ही भेद हैं। अंगबाह्य के १. सामायिक, २. चतुविशतिस्तव, ३. बन्दना, ४. प्रतिक्रमण, . ५. वैनयिक, ६. कृतिकर्म, दशवकालिक, ८. उत्तराध्ययन, . ६. कल्पव्यवहार, १०, कल्पाकल्प, ११. महाकल्प, १२. पुण्डरीक, १३. महापुण्डरीक और १४. निषिद्धक ये ।
चौदह भेद हैं। . . . . . इन सबके वर्णनीय विपय तथा पद आदि की संख्या के लिये जीवकाण्ड की
श्रुतज्ञान मार्गरणा देखना चाहिये। ... यह श्रुतज्ञान स्वार्थ और पदार्थ की अपेक्षा दो प्रकार का है । उनमें परार्थ श्र तज्ञान द्रव्याश्चिक, पर्यायाधिक, नैगम, संग्रह, व्यवहार, · ऋजुसूच, शब्द, समभिरूढ. और एवंभूतनय, अर्थनय, शब्दनय, निश्चयनय तथा व्यवहारनय आदि भेदों को लिये। हुए अनेक नय रूप है। . . . ..
समन्तभद्र स्वामी ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में सम्यग्ज्ञान का अधिक विस्तार नकार मात्र थ तज्ञान को मुख्यता देते हुए समस्त शास्त्रों को १. प्रथमानुयोग, : २. करणानुयोग, ३ चरणानुयोग और ४. द्रव्यानुयोग के भेद से चार अनुयोगों में विभक्त किया है । मनुष्य इन चार अनुयोगों · का अभ्यास कर अपने शुतज्ञान रूप सम्यग्ज्ञान को पुष्ट कर सकता है ! अवधिज्ञान, मनः पर्ययज्ञान और केवलज्ञान तो तत्तत् प्राचरणों का अभाव होने पर स्वयं प्रगट हो जाते हैं, उनमे मनुष्य का पुरुषार्थ :
नहीं चलता है, सिर्फ अनुयोगात्मक श्रुतजान में पुस्पार्थ चलता है। अतः अालस्य ।। • छोड़कर चारों अनुयोगों का अभ्यास करना चाहिये । .. ..... . प्रश्न :—अवधिज्ञान का क्या स्वरूप है ?. :
उत्तर :- अवधिज्ञान--पर पदार्थों की सहायता के विना द्रव्य, क्षेत्र, कालः . भाब की मर्यादा को लिये हुए रूपी पदार्थों को जो स्पष्ट जाने उसे अवधिज्ञान कहते है।
हैं। यह अवधिज्ञान, भवप्रत्यय और गणप्रत्यय के भेद से दो प्रकार का होता है। ... भवप्राय नाम का अवविज्ञान देव और नारकियों के होता है, मनुष्यों में तीर्थकरों के
भी होता है। सर्वांग से होता है । गुग्ग प्रत्यय आवधिज्ञान पर्याप्त मनुष्य संज्ञी और .. पञ्चेन्द्रिय पर्याप्तक तिर्यञ्चों के होता है । यह नाभि के ऊपर स्थित शंखादि चिन्हों
से होता है । इसके अनुगामी, अननुगामी; वर्धमान हीयमान, अवस्थित और अनवस्थित । इस प्रकार छ: भेद होते हैं । इनकी परिभाषाएँ नामों से स्पष्ट हैं। भयप्रत्यय और
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अध्याय : तीसस ]
गणप्रत्यय-~-दोनों ही अवधिज्ञानों में अन्तरंग कारण अवधिज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम हैं । इनके सिवाय अवधिज्ञान के देशावधि, परमावधि और सर्वावधि से तीन भेद और होते हैं । अपर कहा हुआ भवप्रत्यय अवधिज्ञान देशावधि के 'अन्तर्गत होता है । देशावधि चारों गतियों में हो सकता है, परन्तु परमावधि और सर्वावधि चरम शरीरी मुनियों के ही होते हैं। देशावधिज्ञान प्रतिपाती हैं, शेष दो ज्ञान अप्रतिपाती हैं। इन्हें धारण करने वाले मुनि मिथ्यात्व और असंयम अवस्था को प्राप्त . नहीं होते। इन तीनों अवधिज्ञानों का द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट विषय यागम से जानना चाहिये । गुणप्रत्यय का दूसरा नाम क्षयोपशम .. निमित्तक भी है। .
मति, अत और अवधि ये तीन ज्ञान यदि सम्यग्दर्शन के साथ होते हैं, तो सम्यग्ज्ञान कहलाते हैं । . .
प्रश्न :-.-भानः पर्ययज्ञान का क्या स्वरूप हैं ? .. .... उत्तर :- मनः पर्ययज्ञान-इन्द्रियादिक की सहायता के बिना दूसरे के मन में स्थित रूपी पदार्थों को जो द्रव्य क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा लिये हुए स्पष्ट जानता है, उसे मनःपर्ययज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान मुनियों के ही होता है, गृहस्थों के नहीं इसके दो भेद हैं-- एक ऋजुमति और विपुलमति । ऋजुमति, सरल मन-वचन-काय से चिन्तित, पर के मन में स्थित, रूपी पदार्थ को जानता है और विपुलमति सरल तथा कुटिल रूप मन-वचन-काय से चिन्तित पर के मन में स्थित रूपी पदार्थ को जानता है । ऋजुमति की अपेक्षा विपुलमति में विशुद्धि अधिक होती है । ऋजुमति सामान्य मुनियों को भी हो जाता है, परन्तु विपुल मति उन्हीं मुनियों के होता है, जो उपरितन गुणस्थानों से गिर कर नीचे नहीं पाते । तथा सद्भव मोक्षगागी होते हैं। इसके दोनों भेदों का द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा अघन्य और उत्कृष्ट विषय प्रागम, ग्रन्थों से जानना चाहिो । मनःपर्ययज्ञान ईहा-मतिज्ञानपूर्वक होता है । इसका अन्तरंग . कारंग मनःपर्ययज्ञान का क्षयोपशम है।
प्रश्न :-केवलज्ञान का क्या स्वरूप हैं ?.
उत्तर :--केवलज्ञान-जो बाह्य पदार्थों की सहायता के विना लोकालोक के समस्त पदार्थों को उनकी त्रिकाल सम्बन्धी अनन्त पईयों के साथ स्पष्ट जानता है, उसे केवलज्ञान कहते हैं। इसको उत्पत्ति मोहनीय तथा शेष तीन वातिया कर्मों के
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[ · गो. प्र. चिन्तामणि क्षय होने पर तेरह गुणस्थान में होती है। ग्रह क्षायिक ज्ञान कहलाता है और तद्भव मोक्षगामी मनुष्यों के ही होता है । इसे सकल प्रत्यक्ष भी कहते है । यह ज्ञानगुण की सैवत्कृष्ट पर्याय है तथा सादि अनन्त है, इसे प्राप्त कर मनुष्य देशोनकोटि वर्ष पूर्व के भीतर नियम से मोक्ष चला जाता है । यह ज्ञान इच्छा के बिना ही पदार्थों को जानता है।
अप्पा झाययो पिच्चं पाऊणं गुरुपसाएग गुरु के प्रसाद से आत्मा को जानकर नित्य उसका ध्यान करना चाहिए।
-मोक्ष पाहुड, गाथा ३० परदव्वादो दुग्गई सद्दन्वादो सुग्गई । पर द्रव्य के प्राश्रय से दुर्गति (चतुर्गति) तथा स्व द्रव्य से सुगति (मोक्ष) होती है । ......
- मोक्ष पाहुर, गाथा १६
सगदध्वमुवादेयं । अपना आत्मा उपादेय है। ..
—नियममार, गाथा ५० अप्पा सपरपयासो होदि. प्रात्मा स्व-पर प्रकाशक होता है ।
-नियमसार, गाथा १३१ सम्मं मे सव्वभूदेसु बेरं मज्झ रण केरगति । सभी जीवों के प्रति मेरी समता है, मेरा किसी से वैर नहीं है ।
" -नियमसार, गाथा १०६ .
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अध्याय : चौथा प्रसारण-नय ..
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प्रश्न :--प्रमाण और नय का क्या स्वरूप है ? . उत्तर :-प्रमागा और नय-तत्त्वार्थ सूत्रकार ने जीवाजीवादि तत्त्वों तथा सम्यग्दर्शनादि
गुणों के जानने के उपायों की चर्चा करते हुए 'प्रमाण नयैरधिगमः' इस सूत्र द्वारा प्रमाण और नयों का उल्लेख किया है । जो वस्तु में रहने वाले अस्ति-नास्ति, एक-अनेक, भेद-अभेद आदि समस्त धर्मों को एक साथ ग्रहण करता है, उसे प्रमाण कहते हैं, और जो उपर्युक्त धर्मों को गौरग-मुख्य करता हुमा क्रम से ग्रहण करता है, उसे नय कहते हैं 1 प्रमारण के प्रत्यक्ष ।
और परोक्ष की अपेक्षा दो भेद हैं। प्रत्यक्ष भी सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष और परमार्थिक प्रत्यक्ष के भेद से दो प्रकार का है । अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान ये दो ज्ञान एकदेश प्रत्यक्ष कहलाते हैं और केवलज्ञान सकल प्रत्यक्ष
कहलाता है। उपरोक्त सर्व प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। प्रश्न :-परोक्षप्रमारस के कितने भेद हैं ? उत्तर :-परोक्षप्रमाण के पांच भेद होते हैं । स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान और
आगम । प्रश्न : स्मृति किसको कहते हैं ? . . . . . . . . . . उत्तर :...पहले ज्ञात या दृष्ट पदार्थ के याद (स्मरण) को स्मृतिज्ञान कहते हैं। प्रश्न :---प्रत्यभिज्ञान किसको कहते हैं ? उत्तर :--स्मृति और प्रत्यक्ष के विषयभूत पदार्थों के जोड़रूप ज्ञान को प्रत्यभिज्ञान
कहते हैं । जैसे यह वहीं मनुष्य है, जिसे कल देखा था। .. प्रश्न :-प्रत्यभिज्ञान के कितने भेद हैं ? उत्तर :-एकत्व प्रत्यभिज्ञान, सादृश्य प्रत्यभिज्ञान आदि अनेक भेद हैं । . प्रश्न :---एकत्व प्रत्यभिज्ञान किसको कहते हैं ?.. उत्तर :- स्मृति और प्रत्यक्ष के विषय भूत पदार्थ में एकता दिखाते हुये जोडरूप ज्ञान ...
को एकत्व प्रत्यभिज्ञान कहते हैं । जैसे यह वही मनुष्य है, कल देखा था ।
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| गो. प्र. चिन्तामरिंग
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प्रश्न :-सादृश्य प्रत्यभिज्ञान किसको कहते हैं ? उत्तर :- स्मृति और प्रत्यक्ष के विषयभूत पदार्थों में सादृश्य दिखाते हुए जोडरूप ज्ञान
को सादृश्य प्रत्यभिज्ञान कहते हैं। जैसे—यह गौ गवय के (रोक के)
सदृश है। प्रश्न :...तर्क किसको कहते हैं ? । उत्तर :-- व्याप्ति के ज्ञान को तर्क कहते हैं। प्रश्न :--च्याप्ति किसको कहते हैं ? उत्तर :-अविनाभावसम्बन्ध को व्याप्ति कहते हैं। .
प्रश्न. :---अविनाभाय सम्बन्ध किसको कहते है ? .... उत्तर :--जहाँ-जहाँ साधन (हेतु) होय, वहाँ-वहाँ साध्य का होना और जहाँ-जहाँ
___ साध्य नहीं होय, वहाँ-वहाँ साधन के भी न होने को अविनाभात्र सम्बन्ध .. कहते हैं। जैसे---जहाँ-जहाँ धूम हैं, वहाँ-वहाँ अग्नि हैं और जहां-जहाँ
अग्नि नहीं है, वहाँ-वहाँ धम भी नहीं हैं। प्रश्न :-लाधन किसको कहते हैं। उत्तर :--जो साध्य के बिना नहीं होता है जैसे अग्नि का हेतु (साधन) धूम । प्रश्न :-साध्य किसको कहते हैं ? उत्तर :- इष्ट, अबाधित, प्रसिद्ध को साध्य कहते हैं। : प्रश्न :-----दृष्ट किसको कहते हैं ? उत्तर :-वादी और प्रतिवादी जिसको सिद्ध करना चाहे, उसे इष्ट कहते हैं । प्रश्न :-अबाधित किसको कहते हैं ?
उत्तर :---जो दूसरे प्रमाण से वाधित नहीं होता । जैसे ----अग्नि का ठंडापन प्रत्यक्ष .:. . प्रमाण से बाधित है । इस कारण यह ठंडापन साध्य नहीं हो सकता ।
प्रश्न :-~-प्रसिद्ध किसको कहते हैं ? उत्तर :----जो दुसरे प्रभारण से सिद्ध नहीं होता, उसे सिद्ध कहते हैं अथवा जिसका
निश्चय नहीं होता, उसे प्रसिद्ध कहते हैं। प्रश्न :-अनुमान किसे कहते हैं ? उत्तर :--साधन से साक्ष्य के ज्ञान को. अनुमान कहते हैं।
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अध्याय : चौथा ]
प्रश्न :-हेत्वाभास (साधनाभास) किसे कहते हैं ? उत्तर :--सदोष हेतु को हेत्वाभास कहते हैं । प्रश्न :-हेत्वाभास के कितने भेद हैं ? उत्तर :-हेत्वाभास के चार भेद हैं-प्रसिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक (व्यभिचारी) ... और अकिञ्चितकर। प्रश्न :--प्रसिद्ध हेत्वाभाव किसे कहते हैं ? उत्तर :-जिस हेतु के अभाव (गैर मौजूदगी) का निश्चय होता है अथवा जिसके
सद्भाव में (मौजूदगी में) संदेन्द्र (क) होता है, उसे गसिद्ध हेत्वाभास कहते हैं । जैसे "शब्द नित्य हैं, क्योंकि नेत्र का विषय है ।" परन्तु शब्द कर्ण का विषय है, नेत्र का नहीं हो सकता इस कारण "नेत्र का विषय" यह
हेतु असिद्ध हेत्वाभास है। प्रश्न :-विरुद्ध हेत्वाभास किसे कहते हैं ? .. उत्तर :--साध्य से विरुद्ध पदार्थ के साथ जिसकी व्याप्ति होती है, उसे विरुद्ध हेत्वा
भास कहते हैं । जैसे 'शब्द नित्य है, क्योंकि - परिगामी है इस अनुमान में परिगामी की व्याप्ति अनित्य के साथ है, नित्य के साथ नहीं है । इसलिये
नित्यत्व का परिणामी हेलु' विरुद्ध हेत्याभास है। :-अनेकान्तिक (व्यभिचारी) हेत्वाभास किसे कहते हैं ? उत्तर :—जो हेतु पक्ष, सपक्ष, विपक्ष इन तीनों में व्यापता है, उसको अनैकान्तिक
हेत्वाभास कहते हैं । जैसे---इस कोठे में धूम हैं, क्योंकि इसमें अग्नि है। यहाँ अग्नि हेतु पक्ष, सपक्ष, विपक्ष तीनों में व्याप्त होने से अनेकान्तिक
हेत्वाभास है। प्रश्न :—पक्ष किसको कहते हैं। उत्तर :--जहाँ साध्य के रहने का शक होता है । जैसे ऊपर के दृष्टान्त में कोठा । . प्रश्न :-सपक्ष किसको कहते हैं ? उत्तर :- जहाँ साध्य के सद्भाव (मौजूदगी) का निश्चय होता है । जैसे-धूम का - सपक्ष गीले (ईंधन) से मिली हुई अग्निवाला रसोई घर । प्रश्न :---विपक्ष किसको कहते हैं ?
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६५ ]
उत्तर :
[ गो. प्र. चिन्तामणि..
- जहाँ साध्य के प्रभाव (गैर मौजूदगी ) का निश्चय हो । जैसे—अग्नि से तपा हुवा लोहे का गोला |
प्रश्न :- - श्रकिञ्चितकर हेत्वाभास किसे कहते हैं ?
उत्तर :--
-जो हेतु कुछ भी कार्य ( साध्य की सिद्धि ) करने में समर्थ नहीं होता ।
प्रश्न :- किञ्चितकर हेत्वाभास के कितने भेद हैं ?
: उत्तर :- दो हैं --- एक सिद्ध साधन, दूसरा बाधित विषय ।
प्रश्न :- सिद्ध साधन किसको कहते हैं ?
उत्तर :- जिस हेतु का साध्य सिद्ध हो। जैसे- अग्नि गर्म है, क्योंकि स्पर्शन इन्द्रिय से
ऐसा ही प्रतीत होता है ।
प्रश्न :
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- बाधित विषय हेत्वाभास किसको कहते हैं ?
उत्तर :- जिस हेतु के साव्य में दूसरे प्रमाण से बाधा आवे ।
प्रश्न :- - बाधित विषय हेत्वाभास के कितने भेद हैं ?
उत्तर :- प्रत्यक्ष बाधित, अनुमान बाधित, ग्रागम बाधित, स्ववचन बाधित ग्रादि: अनेक भेद हैं ।
प्रश्न :- प्रत्यक्ष बाधित किसको कहते हैं ?
उत्तर :- जिस हेतु के साध्य में प्रत्यक्ष से बाधा आती है, जैसे 'अग्नि दण्डी है, क्योंकि यह द्रव्य है' तो यह हेतु प्रत्यक्ष बाधित है ।
प्रश्न : अनुमान बाधित किसको कहते हैं ?
उत्तर :- जिस हेतु के साध्य में अनुमान से बावा श्राती है, जैसे घास आदि कर्ता के बनाये हुवे हैं, क्योंकि ये कार्य हैं। परन्तु इसमें इस अनुमान से बाबा थाती है कि पास यदि किसी की बनाई हुई नहीं है, क्योंकि इनका बताने वाला शरीरधारी हैं । जो-जो शरीरधारी की बनाई हुई नहीं हैं, वे वे वस्तुएँ कर्ता की बनाई हुई नहीं हैं, जैसे -- श्राकाश ।
प्रश्न :- ग्रागम बाधित किसको कहते हैं ।
उत्तर :- शास्त्र से जिसका साध्य बाधित होता है, उसे श्रागम बाचित कहते हैं । जैसेपाप सुख को देने वाला है, क्योंकि यह कर्म है । जो जो कर्म होते हैं, वे वे सुख देने वाले होते हैं, जैसे--- पुण्यकर्म । इसमें शास्त्र से बाबा आती हैं क्योंकि शास्त्र में पाप की दुःख देने वाला लिखा है ।
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अध्याय : चौथा ]
[ ६ प्रश्न :---स्व बचन बाधित किसको कहते हैं ? ए !-- सिर के सा में नगे वचन से ही बाधा पाती है । जैसे--मेरी माता बन्ध्या
है, क्योंकि पुरुष का संयोग होने पर भी उसके गर्भ नहीं रहता । प्रश्न :--अनुमान के कितने अङ्ग हैं ? उत्तर :-...-पांच है । प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन । प्रश्न :--प्रतिज्ञा किसको कहते हैं ? उत्तर :-पक्ष और साध्य के कहने को प्रतिज्ञा कहते हैं। जैसे---इस पर्वत में . अग्नि है। प्रश्न :--हेतु किसको कहते हैं ? उत्तर--साधन के वचन (कथन) को हेतु कहते हैं । जैसे----क्योंकि यह धमवान हैं। प्रश्न :--उदाहरण किसको कहते हैं ? उत्तर :-व्याप्तिपूर्वक दृष्टान्त के कहने को उदाहरण कहते हैं। जैसे—जहाँ-जहाँ
धूम है, वहाँ-वहाँ अग्नि है। जैसे-रसोई घर । और जहाँ-जहाँ अग्नि नहीं
हैं, वहाँ-वहाँ धूम भी नहीं है । जैसे तालाव । प्रश्न :-दृष्टान्त किसको कहते हैं ? उत्तर :- जहाँ पर साध्य और साधन की मौजूदगी या गैरमौजदगी दिखाई जाती
है । जैसे --रसोई घर अथवा तालाब । प्रश्न :--दृष्टान्त के कितने भेद हैं ? उत्तर :-दो है.--.-एक अन्वय दृष्टान्त, दूसरा व्यतिरेक दृष्टान्त । प्रश्न :--अन्वय दृष्टान्त किसको कहते हैं ? उत्तर :----जहाँ साधन की मौजूदगी में साध्य की मौजूदगी दिखाई जाती है । जैसे
रसोई के घर में धूम का सद्भाव होने पर अग्नि का सद्भाव दिखाया
गया। प्रश्न :-व्यतिरेक दृष्टान्त किसको कहते हैं ? - उत्तर :----जहां साध्य की गैर मौजूदगी में साधन की गैर मौजूदगी दिखाई जाती है।
जैसे-तालाब में धूम । प्रश्न :-उपनय किसको कहते हैं ?
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१०० ]
[ गो. प्र. चिन्तामगि उत्तर :-पक्ष और साधन में दृष्टान्त की सदृशता दिखाने को उपनय कहते हैं ।
. . जी. -- यह पर्वत भी वैसा ही धूमवान् है ।
प्रश्न :--निगमन किसको कहते हैं ? : उत्तर :-नतीजा निकालकर प्रतिज्ञा के दोहराने को निगमन कहते हैं । जैसे
इसलिये यह पर्वत भी अग्निमान हैं । प्रश्न :--हेतु के कितने भेद हैं ? . उतर:-केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी और अन्वयव्यतिरेकी। प्रश्न ::-- केवलान्वयी हेतु किसको कहते हैं ?
उत्तर :--जिस हेतु में सिर्फ अन्वय दृष्टान्त होता है । जैसे-जीव अनेकान्त स्वरूप . . . है, क्योंकि सत्स्वरूप है। जो-जो सत्स्वरूप होता है, वह अनेकान्त स्वरूप
होता है । जैसे—पुद्गलादिक । . . . प्रश्न :--विलव्यतिरेकी हेतु किसको कहते हैं ? उत्तर :-जिसमें सिर्फ व्यतिरेक दृष्टान्त पाया जाता है। जैसे---जिन्दे शरीर में
__ आत्मा है । क्योंकि इसमें श्वासोच्छवास है। जहां-जहां प्रात्मा नहीं होता,
वहां-वहां श्वासोच्छवास भी नहीं होता । जैसे - चौकी वगैरह । प्रश्न :---अन्वय व्यतिरेको हेतु किसको कहते हैं ? . उत्तर :-- जिसमें अन्वय दृष्टान्त और व्यतिरेक दृष्टान्त दोनों होते हैं । जैसे- पर्वत में
अग्नि है । क्योंकि इसमें धूम है। जहां-जहां धूम है, वहां-वहां अग्नि होती है । जैसे- रसोई का घर । जहां-जहां अग्नि नहीं होती, वहां-वहां धूम भी
नहीं होता । जैसे--तालाब । प्रश्न :---पागम प्रमाण किसको कहते हैं ? उत्तर :--प्राप्त के बचन आदि से उत्पन्न हुए पदार्थ के ज्ञान को आगमप्रमार
प्रश्न :--नयके मुख्य रूप से कितने भेद हैं ? उत्तर :-दो भेद हैं, 'द्रव्याथिकनय और पर्यायाथिक नय। . प्रश्न :---द्रव्यायाथिक नय किसका कहते हैं ? . उत्तर :- जो नय द्रव्य अर्थात सामान्य को ग्रहण करता है। प्रश्न :---द्रव्यायाथिकनय के कितने भेद हैं ? ... .
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अध्याय: चौथा ]
उत्तर :- तीन हैं- नेगम, संग्रह, व्यवहार |
प्रश्न :- पर्यायार्थिकनय किसको कहते हैं ? और कितने भेद हैं ?
उत्तर :- जो नय को विशेष ( गुण अथवा पर्याय) को विषय करता है। इसके चार भेद हैं, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवंभूत |
प्रश्न :- नैगमनय किसको कहते हैं ?
[ १०१
उत्तर :--
- जो नय अनिष्पन्न अर्थ के संकल्पमात्र को ग्रहण करता है, उसे नैगमनय कहते हैं । जैसे- लकड़ी, पानी यदि सामग्री इकट्ठी करने वाले मनुष्य से कोई पूछता है कि आप क्या कर रहे हो ? तो वह उत्तर देता हैं कि मैं. भात पका रहा हूँ । किन्तु उस समय वह भात पकाने की तैयारी कर रहा है, पर उसका संकल्प भारत बनाने का है, जो अभी निष्पन्न नहीं हुई, उसे वहां निष्पन्न मानकर व्यवहार करता है, यह नैगमंनय है ।
प्रश्न :- संग्रहनय किसको कहते ?
उत्तर :--जो नय अपनी जाति का विरोध नहीं करके एकपने से समस्त पदार्थों को
ग्रहण करता है, उसे संग्रहनय कहते हैं। जैसे- द्रव्य कहने से समस्त द्रव्यों का, जीव कहने से समस्त जीवों का और पुद्गल कहने से समस्त पुद्गलों का ग्रहण होता है ।
प्रश्न :-- व्यवहारनय किसको कहते हैं ?
उत्तर :-- -जो नय संग्रह नय के द्वारा ग्रहण किये हुये पदार्थों का विधिपूर्वक भेद करता हैं, उसे व्यवहारतय कहते हैं । जैसे द्रव्य के छह भेद करना । जीव के संसारी और मुक्त ग्रादि भेद करना तथा पुद्गल के परमाणु और स्कन्ध श्रादि भेद करना । यह नय वहां तक भेद करता है, जहां तक भेद हो सकते हैं ।
प्रश्न :- ऋजुसूत्र नय किसको कहते हैं ?
उत्तर :--- भूत और भावी पर्याय को छोड़कर जो वर्तमान स्थूल पर्याय को ही ग्रहण करता है, उसे ऋजुसूत्र नय कहते हैं ।
प्रश्न : शब्दtय किसको कहते है ?
उत्तर :- जो नय लिंग, संख्या, कारक आदि के व्यभिचार को दूर करता है, उसे शब्दtय कहते हैं । यह नय लिंगादिक के भेद से पदार्थ को भेदरूप ग्रहण
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१०२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि करता है । जैसे - दार (पु.), भार्या (स्त्री), कलत्र (पु.) ये तीनों गब्दः भिन्न लिंग वाले होकर भी एक ही स्त्री का वामक है परन्तु यह नय।
स्त्री पदार्थ को लिंग के भेद से तीन भेदरूप मानता है । प्रश्न :-समभिरूढ-नय किसको कहते हैं ? उत्तर :--जो नय नाना अर्थों का उल्लंघन कर रूढि से एक अर्थ को ग्रहण करता है,
उसे समभिरूढ नय कहते हैं । यह नय पर्याय के भेद से अर्थ को भी भेदरूप ग्रहण करता है जैसे - इन्द्र, शक्रा, पुरन्दर ये तीनों शब्द, इन्द्र के नाम
हैं, परन्तु यह नय इन तीनों के भिन्न-भिन्न अर्थ ग्रहण करता है। ... प्रश्न :-एवम्भूत-नय किसको कहते हैं ? उत्तर :--जिस शब्द का जिस क्रियारूप अर्थ है, उसी क्रियारूप परिणमे हुये पदार्थ को
.. जो नय ग्रहण करता है, उसे एवम्भूत नय कहते हैं। जैसे - पुजारी को पूजा करते समय ही पूजारो कहना। इन नयों का विषय उत्तरोत्तर सूक्ष्म सूक्ष्म होता जाता है । ये नय परस्पर सापेक्ष होते हैं, निरपेक्ष नय मिथ्याः ।।
माने जाते हैं। प्रश्न :-व्यवहार-नय उपनय के कितने भेद हैं ? उत्तर : -सद्भूत व्यवहार नय, असद्भुत व्यवहार नय और उपचरित व्यवहार नयः ।
अथवा उपचरितासद्भुत व्यवहार नय । प्रश्न :- सद्भूत व्यवहार-नय किसको कहते हैं ? उत्तर :-एक अखंड़ द्रव्य को भेदरूप विषय करने वाले ज्ञान को सद्भूत व्यवहार नयः ।
कहते हैं। जैसे - जीन के केवल ज्ञानादिक या मति ज्ञानादिक गुगा । प्रश्न :--असद्भूत व्यवहार-नय किसे कहते हैं ? उत्तर :-जो मिले हुए भिन्न पदार्थों को अभेदरूप ग्रहण करता है । जैसे - यह शरीर
__ मेरा है अथवा मिट्टी के घड़े को घी का घड़ा कहना । ... प्रश्न :-उपचरित व्यवहार-नय अथवा उपचरित असद्भूत व्यवहार-नय किसको ।
__ कहते हैं ? · : उत्तर :...-अत्यन्त भिन्न पदार्थों को जो भेदरूप ग्रहण करता है। जैसे - हाथी, घोडा,
. महल, मकान मेरे हैं इत्यादि।. . प्रश्न :-जय किसको कहते हैं ?
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अध्याय : चौथा ]
[ १०३
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उत्तर :--वस्तु के एक देश को जानने वाले ज्ञान को नय कहते हैं। .. प्रश्न :--नय के कितने भेद हैं ? उत्तर :-दो हैं, एक निश्चय नय, दूसरा व्यवहार नय अथवा उपनय । प्रश्न :-निश्चय-नय किसको कहते हैं ? उत्तर :---वस्तु के किसी असली अंश को ग्रहण करने वाले ज्ञान को निश्चय नय
कहते हैं। जैसे - मिट्टी के घड़े को मिट्टी का घड़ा कहना । प्रश्न :-व्यवहार-नय किसको कहते हैं ? उत्तर :--किसी निमित के वश से एक पदार्थ को दूसरे. पदार्थ रूप जानने वाले ज्ञान . को व्यवहार नय कहते हैं । जैसे मिट्टी के घड़े को घी का घड़ा कहना । प्रश्न :----निक्षेप किसको कहते हैं ? उत्तर :-..-युक्ति करके सूयुक्त मार्ग होते हुए कार्य के वश से नाम, स्थापना, द्रव्य और
भाव में पदार्थ के स्थापन को निक्षेप कहते हैं । .. प्रश्न :--निक्षेप के कितने भेद हैं ? उत्तर :--नाम निक्षेप, स्थापना निक्षेप, द्रव्य निक्षेप और भाव निक्षेप ।
नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्न्यासः ।।५।।३०। मोक्षशास्त्र, अध्याय १ प्रश्न ---नाम निक्षेप किसको कहते हैं ? उत्तर :---गुण, जाति, द्रव्य और क्रिया की अपेक्षा के विना लोक व्यवहार के लिये
किसी का कोई नाम रखने को नाम निक्षेप कहते हैं । जैसे - किसी मातापिता ने अपने पुत्र का नाम 'इन्द्र' रखा । किन्तु उस पुत्र में इन्द्र का कोई गुरग नहीं होता । अतः वह पुत्र नाममात्र से इन्द्र है, वास्तव में इन्द्र नहीं । स्थापना निक्षेप - धातु, काष्ठ, पाषाण आदि के चित्र या मूर्ति तथा अन्य पदार्थ में 'यह वह है' इस प्रकार कल्पना करना स्थापना निक्षेप है । स्थापना दो प्रकार की होती है । तदाकार और अतदाकार ! उसी प्राकार काले में उसी नाकार वाले की कल्पना करना तदाकार स्थापना कहलाती है। जैसे - इन्द्राकार मूर्ति में इन्द्र की कल्पना करना । भिन्न आकार वाले पदार्थ में भिन्न आकार वाले की कल्पना करना अतदाकार स्थापना कहलाती है । जैसे – सतरंज की गोटी । (मोहर) में बादशाह और वजीर बगैरह की कल्पना करना।
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१०४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
प्रश्न ..द्रव्य निक्षेप किसको कहते हैं ? उत्तर :---भूत और भविष्यत् पर्याय की मुग्यता लेकर वर्तमान में कहना द्रध्यनिक्षेप
है । जैसे इन्द्र की मूर्ति बनाने के लिये जो पापागा या काष्ठ लाया गया हो,
उसे इन्द्र कहना । या मुनीमी छोड़ देने पर भी किसी को मुनीम कहना? प्रश्न :--भावनिक्षेप किसको कहते हैं ? उत्तर :---वर्तमान पर्याय युक्त वस्तु को भावनिक्षेप कहते हैं। जैसे - देवों के स्वामी साक्षात् इन्द्र को इन्द्र कहना।
। प्रश्न :--देशविरत गुरणस्थान का क्या स्वरूप है? उत्तर :-प्रत्याख्यानाबरण क्रोध, मान, माया, लोभ के उदय से संबमभाव रहित,
किन्तु अप्रत्याख्यानावररण क्रोध, मान, माया, लोभ के उपशम से श्रावक के व्रतरूप देश चारित्र सहित परिणाम को देश विरत नामक पंचम गुणस्थान । कहते हैं । चतुर्थ श्चम प्राविकार के समस्त मुगास्थानों में सम्यग्दर्शन
और सम्यग्दर्शन का अविनाभावी सम्यगजान अवश्य होता है । इसके बिना पंचम और षष्ठ प्रादि गुणास्थान नहीं होते हैं । प्रथम तो चतुर्थ गुगणस्थान । में ही, अष्ट मूलगुणों का धारण, सप्त व्यसन का त्याग, रात्री भोजन का । त्याग, अन्याय अभक्ष का त्याग होता है । किन्तु व्रतरूप संयम तो पंचमः । गुणस्थान देश चारित्र में ही होता है। इसीलिये इस गुरास्थान का नाम देश चारित्र है।
नोट :---इस गुगास्थान में चारित्र का यांशिक पारम्भ देखा जाता है। हमनें
चारित्र अधिकार अलग से बनाया है, जो क्रमश: पठनीय है। ...
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अध्याय : पंचम चिारित्र निश्चयरत्नत्रय का स्वरूप तो एसा है कि परद्रव्य से सर्वथा भिन्न अपने को समझना सम्यग्दर्शन है और अपने स्वरूप को जानना, सम्यग्ज्ञान है । अपने प्रात्मा में लीन रहना सम्याचारित्र है । यहां व्यवहार चारित्र का वर्णन कर रहे हैं।
प्रश्न :-व्यवहार चारित्र के कितने भेद हैं ? उत्तर :---दो हैं । सकल चारित्र और विकल चारित्र । प्रश्न :-चारित्र किसे कहते हैं ?
उत्तर :--हिंसा, भूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पांच पापों की प्रगालियों से निवृत्ति होने को चारित्र कहते हैं। इन पांच पापों का सर्वथा त्याग करना मकल चारित्र है । और पांच पापों का एकदेश त्याग करना विकल चारित्र है । यह परिग्रह माहित गृहस्थों के होते हैं । सम्यक् चारित्र की उत्पत्ति सम्यग्दर्शन और सम्यम्नान पूर्वक ही होती है । इसके बिना जो चारित्र होता है, वह मिथ्या चारित्र है। . चारित्र की उत्पत्ति का क्रम और प्रयोजन बताते हुए समंतभद्र स्वामी ने कहा है।
मोहतिमिरापहरणे, दर्शन लाभादवाप्त संज्ञान ।
रागद्वेषनिवृत्यै चरणं प्रतिपद्यते साधुः ॥३१॥रत्नक.श्रा. ___मिथ्यादर्शन रूपी अन्धकार के नष्ट हो चुकने पर सम्यग्दर्शन की प्राप्ति से जिसे सम्यग्ज्ञान प्राप्त हुना है, ऐसा साधु पुरुप राग द्वेष की निवृत्ति के लिये चारित्र - को प्राप्त होता है। मूलतः चारित्र को धारण करने का प्रयोजन ही रागद्वेष की निवृत्ति करना है । जिसने चारित्र धारगा करके भो राग द्वेष को दूर नहीं किया परमार्थ से उसे चारित्र प्राप्त ही नहीं हुवा है । ऐसा समझना चाहिये ।।
प्रश्न :--विकल चारित्र का क्या स्वरूप है ? . .
उत्तर :--अप्रत्याख्यानाबरण, क्रोध, मान, माया, लोभ का अनुदय होने से जो पांच पापों का एकदेश त्याग होता है, वह विकल चारित्र है।
प्रश्न :-विकल चारित्र के कितने भेद हैं ? उत्तर :- मूलरूप में इसके अहिंसाणुनत, सत्याणुव्रत, प्रचौर्याणुव्रत ब्रह्मचर्या
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१०६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण :
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रग वत और परिग्रह परमाणाणुव्रत इस प्रकार पांच ये और इन अणुव्रतों की रक्षा के . लिये तीन गुणवत और चार शिक्षाबन के भेद से सात शील वृत होते हैं। इस तहर सब मिलाकर विकल चारित्र के बारह भेद हैं ।
___ वैसे तो प्राचार्यों ने विकल' चारित्र को क्यारह प्रतिमा रूप में विभक्त किया है ।
प्रश्न :-ग्यारह प्रतिमानों के क्या नाम है ?
उत्तर :-दर्शन प्रतिमा, व्रतप्रतिमा, सामायिकप्रतिमा, प्रोषधप्रतिमा, सचित त्यागप्रतिमा, रात्रिभुक्तित्यागप्रतिमा, ब्रह्मचर्यप्रतिमा, प्रारम्भत्यागप्रतिमा, परिग्रह त्यागप्रतिमा, अनुमति त्यागप्रतिमा और उद्दिष्ट त्यागप्रतिमा-ये ग्यारह प्रतिमानों के नाम हैं।
दंसरण वय सामाइय, पोसह सचित्त राय भत्तेय । बंभारंभ परिग्ग अण्ण मणमुद्दिष्ट देश घिरदोय ॥१॥
चारित्र पाहुड॥३२॥ प्रश्न :-दर्शनप्रतिमा का क्या स्वरूप है ?
उत्तर ---जो सम्यग्दर्शन से शुद्ध है और संसार, शरीर और भोगों से विरक्त । है, पञ्च परमेष्ठियों के चरणों की शरण जिसे प्राप्त हुई है तथा पाठ मूलगुणों को जो । धारणा कर रहा है, वह दर्शनिक श्रावक है।
सम्यग्दर्शन शुद्धः संसार शरीर भोगनिविष्णः । पञ्चगुरु चरणशरगो दनिकस्तत्व पथगृह्यः ।।१६॥३३॥
रत्नकरंड श्रावका०.५॥ जो निरतिचार सम्यग्दर्शन को पालता है, परन्तु ब्रतों से सर्वथा रहित है। वह अविरत सम्यग्दृष्टि कहलाता है। यही जीव जब अष्ट मूलगुरणों को अतिचार रहित धारण करता है तथा सप्न व्यसनों का सातिचार त्याग करता है, लब पाक्षिक श्रावक कहलाता है 1 असयंत सम्यन्दृष्टि तथा पाक्षिक श्रावक ये दोनों ही चतुर्थगुगा । स्थानवर्ती हैं। इसके प्राग जब यह सम्बग्दष्टि संसार, शरीर और भोगों से विरक्त । होकर व्रत धारण करने के क्षेत्र में अग्रसर होता है ।
तथा मद्य, मांस और मधु के त्याग के साथ हिसाणवत प्रादि पांच अणुव्रतों का
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प्राध्याय : पांचवां ] .
[ १०७ धारक होता है और पंच परमेष्ठियों की अखण्ड श्रद्धा रखता है, तब यह दर्शनिक श्रावक कहलाता है । यहां से पञ्चम गुणस्थान का प्रारम्भ होता है। यह नैष्ठिक श्रावक का पहला. भेद है।
प्रश्न :--वृतप्रतिमा का क्या स्वरूप हैं ?
उत्तर :---जो गल्य रहित होता हुवा अतिचार रहित पांचों अणुवतों को और सातों शोलों को धारण करता है, वह अतियों के मध्य में प्रतिक श्रावक व्रतप्रतिमा धारी माना गया है।
निरतिक्रममावत पञ्चकमपि शील सप्तकं चापि । धारयते निःशल्यो योऽसौ व्रतीनां मतो नातकः ॥३४॥
पहली प्रतिमा में तीन शल्यों का प्रभाव नहीं हवा था तथा अणुव्रतों में कदाचित अतिवार लगते थे, परन्तु दूसरी प्रतिमा में पाते ही इसकी तीनों शल्य छुट जाती है, और पांच अणुनतों का निरतिचार पालन होने लगता है। तीन गुणन्नतों और चार शिक्षागतों का भी यह पालन करता है, परन्तु इनके पालन में कदाचित् अतिचार लगते हैं । यह अतिक श्रावक कहलाने लगता है।
प्रश्न :-शल्य कितनी और उनका क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-शल्य तीन प्रकार की है मायाशल्य, मिथ्याशल्य पीर निदानशल्य । जो प्रात्मा को कांटे की तरह दुःख देती है, उसे शल्य कहते हैं ।
___मायाशल्य-छल, कपट करना । मिथ्याशल्य-तत्व श्रद्धा का अभाव । का निदान शल्य-आगामी काल में विषयों की ब्रांछा करना, ये तीनों प्रकार की शल्ये प्रती श्रावक को नहीं होती और अगर तीनों में से एक भी होगी तो अतप्रतिमाधारी नहीं है
प्रश्न :-प्रणवत किस को कहते हैं और उसके कितने भेद हैं ?
उत्तर :-हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और मूर्छा. (परिरह) इन स्थुल पापों से विरत होना अणुवत है। . .. .. .
प्राणातिपातवितथ व्याहारस्तेयकाममूर्छाभ्यः । स्थुलेभ्यः पापेभ्यो व्युपरमरणमणुव्रतं भवति ॥३५॥
जिनके संयोग से जीव जीवित और वियोग में मृत कहलाता है, उन्हें प्राण । कहते हैं, इनके द्रव्य प्राण और भाव प्रारण की अपेक्षा दो भेद हैं । स्पर्शनादि पांच
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१०८ |
[ गो. प्र. चिन्तामणि
इन्द्रियां, तीन बल, ग्रायु और श्वासोच्छवास ये दश द्रव्य प्राण कहलाते हैं। और ज्ञान, दर्शनादि गुण, भावप्राण कहलाते हैं । इन प्राणों के प्रतिपात- बात करने को प्राणातिपात कहते हैं, इसका प्रचलित नाम हिंसा है । जो वस्तु जैसी नहीं है, उसे उस प्रकार कहना वितथव्याहार-असत्य भाषण है । इसके सदपलायु, असदुद्भावन, अन्य रूपाभिधान तथा गहितादि वचन के भेद से चार भेद हैं। प्रदत वस्तु का ग्रहणास्तेय है ।
स्मरणंकीर्तन केलिः प्रोक्षणं गुह्यभाषणम् । सकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिवृति रेव च ॥३६॥
एतन्मैथुनमष्टाङ्गः प्रवदन्ति मनीषिणः । विपरीतं ब्रह्मचर्यमेतदेवाष्ट
लक्षणम् ॥१३७॥
अर्थ :-- स्मरण, कीर्तन, क्रीडा ( हास परिहास), प्रेक्षण, गुह्य भाषण, संकल्प श्रध्यवसाय और क्रियानिवृति (मैथुन में प्रवृत्ति ) इन आठ प्रकार के मैथुनों में प्रवृत्ति होना काम या कुशील कहलाता है। तथा धन्य धान्यादि पदार्थों में ममता: भाव रूप परिणाम होना मूर्च्छा । इसे ही परिग्रह कहते हैं । लोक में ये पांचों कार्य पाप कहे जाते हैं, इनकी स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार की परिस्पति होती हैं। ग्राम जनता में जो पाप स्वीकृत किया गया है, और जिसके करने पर राजकीय तथा सामाजिक दण्ड प्राप्त होता है, उन्हें स्थूल पाप कहते हैं । एसे स्थूलपापों से निवृत्ति होना अणुव्रत कहलाता हैं । गृहस्थ उक्त पापों का त्याग कर सकता है ।
प्रश्न :- हिंसा का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- -जो तीनों योगों के कृत, कारित, अनुमोदना संकल्क से त्रस जीवों को नहीं मारता उसे हिंसादि पापों के त्यागरूप व्रत के विचार करने में समर्थ मनुष्य स्थूल हिंसा का त्याग अर्थात् ग्रहिसा मरण व्रत कहलाता है ।
सङ्कल्पात्कृत कारित मननाद्योग त्रयस्य चर सत्वान् । नाहिनस्ति यत्तवाहु: स्थूलवधाद्विरमरणं निपुखाः ||३८||
संकल्पी, प्रारम्भी, उद्यमी और विरोधी के भेद हिंसा चार की मानी गई विचार से बलिदान आदि के समय जो
गृहस्थी सम्वन्धी अन्य कार्य करने में जो
है । मैं इस जीव को मारू, इस प्रकार के हिंसा होती है, उसे संकल्पी हिंसा कहते हैं
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अध्याय : मव
[ १०६ हिसा होती है, उसे प्रारम्भी हिंसा कहते हैं । खेती तथा अन्य उद्योगों से होने वाली हिंसा भी उद्यमी हिंसा है। और शत्रु से अपना बचाव करने के लिए जो हिंसा होती है, उसे विरोधिहिंसा कहते हैं । इन चार प्रकार की हिंसानों में से अहिंसारण - . वती जीवमाण संकल्पी हिंसा का त्याग कर पाता है। शेष तीन हिसाओं का नहीं और वह भी. मात्र त्रसजोवों की हिंसा का। सामान्य रूप से हिंसादि पापों का त्यागः मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना के भेद से नी प्रकार का होता है। परन्तु यह गृहविरत गृहस्थ के ही संभव हो सकता है। गृहनिरत गृहस्थ के नहीं । गृहनिरत-घर में रहने वाला गृहस्थ यथाशक्ति तीन, छह अथवा नौ कोटियों से हिंसादि पापों का त्याग करता है। प्राचार्य उमास्वामी महाराज ने हिंसा का लक्षण लिखा है--
प्रमत्तयोगात् प्रारराव्यपरोणं हिप्ता । .. अर्थात् प्रमत्त योग से प्रारणों का व्यपरोपण-विधात करना हिसा है। यहां (प्रभत्तयोग) इस हेतु में ही मन, वचन, काय तथा कृत, कारित, · अनुमोदना इन नौ कोटियों का समावेश किया गया है।
प्रश्न :-अहिंसाणुनत की भावनायें कितनी हैं और उनका क्या स्वरूप
उत्तर :----अहिंसारण व्रत की पांच भावनायें हैं । वाग्गुप्ति, मनोगुप्ति, ईर्या समिति, प्रादान निक्षेपण समिति और पालोकित पान भोजन ये भावनायें व्रतों की स्थिरता के लिये हैं, और इसी प्रकार प्रत्येक वृत्तों की पांच-पांच भावनायें हैं । भावना किसी वस्तु का बार-बार चिन्तवन करने को कहते हैं। .. बाङमनो गुप्तीर्यादाननिक्षेपण समत्यिालोकित पान भोजनानि पंच ॥३६।।
मोक्षशास्त्र०अ०७सुत्र नं. ४ वाग्गुप्ति :-बचन की प्रवृत्ति को रोकना । .... मनोगुप्ति :-मन की प्रवृत्ति को रोकना ... . इर्या समिति ---बलते समय चार हाथ प्रमाण जमीन देख कर चलना,
आदाननिक्षेपरग समिति—किसी भी वस्तु को रखते व उठाते समय जीव रक्षा का ध्यान रखते हुए पदार्थ को रखना उठाना ।
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Hasive:
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
आलोकित पान भोजन - भोजन पान ग्रहणं करते समय देखने और शोधने का ध्यान रखना |
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प्रश्न:-हात के परिवार हैं और उनका क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- - हिसारण बूत के छेदना, बाधना, पीड़ा देना, अधिक भार लादना,. और ग्राहार पानी का रोकना अथवा ग्राहार बचाकर रखना ये पांच प्रतिचार हैं ।
छेदन बन्धन पोडन मति भाररोपरां व्यतीचाराः ।
आहार वारणापि च स्थूलं बधाद् व्युपरितः पञ्च ॥ ४० ॥
प्रतिचारोंऽ भञ्जनम् । इस लक्षण के अनुसार अतिचार का अर्थ होता है, वृत का एक देशभङ होना । ऊपर ग्रहिसाबूत का लक्षण लिखते हुए, मन, वचन, काय और कृतं कारित, अनुमोदन इन नौ कोटियों का उल्लेख किया गया है, अर्थात उपर्युक्त नौ कोटियों से व्रत की पूर्णता होती है । इन नौ कोटियों में से कुछ कोटियों के द्वारा व्रत को दूषित करना प्रतिवार कहलाता है और सभी कोटियों से व्रत को भंग कर देना अनाचार कहलाता है ।
इस प्रकार भङ्गभङ्ग की अपेक्षा अर्थात् किसी अपेक्षा से वृत का भङ्ग होना और किसी अपेक्षा से वृत्त का भङ्ग नहीं होना यतिचार का रूप हैं। छेदन बन्धन यादि दोषों के बावजूद भी प्राणरक्षा का भाव रहता है, इसलिये वृत का भङ्ग है, यहां छेदन, बन्धन यादि दोषों का व्याख्यान करते समय 'दुर्भाना' शब्द की योजना ऊपर से कर लेना चाहिये अन्यवा लकड़ी से नाक का छिदांना दूति श्रङ्गोपाङ्गों का. काटना रोग को दूर करने के लिए श्रहारादि का रोकना भी अतिचार में संमिलित हो जावेगी | उमास्वामी महाराज ने भी अहिंसा वृत के ये ही पांच प्रतिचार वतलाये हैं । बन्धवत्रच्छेदातिभारारोपरान्नपाननिरोधः, अर्थात् बन्ध, वध, ( पीडा ), छेद | प्रश्न है कि प्र व्रत का धारक मनुष्य घर में गाय, भैंस प्रति पशुओं के रखने पर उन्हें बाँधता है या नहीं ? यदि वांचता है तो बन्धनाम का अतिचार होता है, तो में उत्पात करते हैं । इस प्रकार विषय में आचार्यों ने उत्तम, मध्यम, और जघन्य .का विभाग करते हुए तीन व्यवस्थाएं की हैं उत्तम तो यह है कि न्ती मनुष्य, गाय,
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[ १११
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अध्याय : पांचवां ] भैस ग्रादि को रखता नहीं है । मध्यम यह है कि यदि रखता है, तो किसी नहाते में उन्हें बिना बन्धन के रखता है । जघन्य यह कि ऐसा बन्धन देता है, जिसे वे उपसर्ग के समय तोड़कर अपनी प्राण रक्षा कर सकें।
प्रश्न :--सत्याणुव्रत का क्या स्वरूप है ? . उत्तर :--जो स्थूल झूठ को न स्वयं बोलता है, न दूसरों से बुलवाता है, और ऐसा सत्य भी न बोलता है, न दूसरे से बुलवाता है, जो दूसरे के प्राण-घात के लिये हो उसे सत्पुरुप स्थूल झूठ का त्याग अर्थात सत्याणुव्रत कहते हैं ।
उमास्वामी महाराज ने असत्य अत का लक्षण लिखा हैअसदभिधानमनूतम् ॥४१॥
इसका व्याख्यान चार प्रकार से होता है-१. न सत् इति असत् विद्य मानमित्यर्थः तस्य अभिधानं कथनमिति असदभिधानम् अर्थात् अविद्यमान पदार्थ का कथन करना, जैसे देवदत्त के न रहने पर भी कहना कि देवदत्त है । यह असदुद्भावन अविद्यमान को प्रगट करने वाला पहला असत्य हैं। २ 'सतो विद्यमानस्य अभिधानं सदभिधान न सदभिधान मिति असदभिधानम्' अर्थात् विद्यमान पदार्थ का कथन नहीं करना, जैसे देवदत्त के रहते हुए भी कहना कि देवदत्त नहीं है । यह सदपलाप-विद्यमान वस्तु को मेटने वाला दुसरा असत्य है ।
३-'ईवत् सत् असत् तस्य अभिधानं असदभिधानम् ।'
यहाँ असत् शब्द के साथ जो नञ् का प्रयोग हुवा है, वह 'अनुदरा कन्या' के समान ईषद् अर्थ में हुअा है अर्थात् जो पदार्थ जिस रूप में कहा गया है, उस रूप में तो नहीं है, परन्तु उसका कार्य सिद्ध कर देता है, इसलिये उसके समान कहा जाता है। जैसे कमण्डलु को घट कहना । यहाँ कमण्डलुः जुदा है और घट जुदा है, इसलिये प्राकार की अपेक्षा कमण्डल को घट कहना मिथ्या है, परन्तु जल धारणरूप' कार्य दोनों का एक सदृश है, इसलिये उक्त वायय ईषद् सत् के कथन में आता है । यह अन्यरूपाभिधान-अन्य को अन्य रूप कहना तीसरा . असत्य है । ४. 'सत् प्रशस्तं न सत् असत् अप्रशस्तं असच्च तत् अभिधानं चेति असदभिधानम्' अर्थात् अप्रशस्त वचन बोलना । जैसे काने को काना, लंगड़े को लंगड़ा आदि कहना, निन्दा तथा चुगली के वचन कहना तथा अप्रिय एवं कर्कश वचन कहना, यह गहितादिवचन नाम का चौथा असत्य है । इन चारों प्रकार के असत्य बचनों का परित्याग करना सत्याणुव्रत है ।
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[ गो. प्र. चिन्तामगि सत्याणुव्रती ऐसा भी सत्य नहीं बोलता है, जो प्राण घात करने वाला हो । जैसे। कोई शिकारी अपनी मद्री में जिन्दा चिड़िया की गर्दन दबाकर एक सत्यवादी से पछता है कि बतायो यह जिन्दा है या मरो ? सत्यवादी विचार करता है कि यदि मैं इसे जिन्दा कहता हूं तो अभी हाल यह गर्दन को दबाकर इसे मार डालेगा। पीर मरी कहता हूं तो इसे छोड़कर कहेगा कि देखो, यह तो जिन्दा है तुम कैसे सत्यवादी हो ? ऐसा विचारकर सत्यवादी ने उत्तर दिया कि 'यह चिड़िया मरी है ।' शिकारी ने तत्काल चिड़िया को मुट्ठी से छोड़कर कहा कि तुम कैसे सत्यवादी हो ? यहाँ जीव रक्षा का भाव होने से असत्यवचन भी सत्य वचन के रूप में परिगात हो गया है । विचारगीय प्रश्न यह है कि सत्यवादी के सामने एक कातिल ने एक निरपराध व्यक्ति की हत्या कर दी । हत्या के अपराध में वह पकड़ा गया । गवाही के लिए उस सत्यवादी को बुलाया गया । यदि सत्यवादी सत्य कहता है तो कातिल को प्राणदगड की सजा मिलती है और असत्य कहता है तो वह छूट तो जाता है, पर उससे अन्याय का समर्थन होता है, जिसके फलस्वरूप उस कातिल के द्वारा अन्य अनेक जीवों की भी हिंसा हो सकती है । इस स्थिति में सत्यवादी सत्य बोले या असत्य ? .
उस समय परिस्थिति के अनुसार सत्यवादी तीन कार्य कर सकता है। प्रथम . तो वह इस प्रकार की गवाही के चक्र में न पड़े । द्वितीय यह कि यदि वह कातिल अपने पाप से घृणा करने लगता है और भागामी समय के लिए वैसा अपराध न करें।
और तृतीय यह है कि अन्य अनेक जीवों की रक्षा के अभिप्राय से वह सत्य बोले, क्योंकि संसार में अराजकता फैले तथा उसके फलस्वरूप अनेक जीवों की हत्या हो ग्रह एक जीव के प्राण-घात की अपेक्षा अधिक पाप है।
प्रश्न : सत्याणुवत के अतिचार कौनसे हैं और उनका क्या स्वरूप है ?
. उत्तर :-मिश्योपदेश, रहोभ्याख्यान, पैशून्य, कूटलेख लिखना और धरोहर को हड़प करने के वचन कहना - ये पांच सत्याणुन्नत के अतिचार हैं ।
परिवाद रहोभ्याख्यापैशुन्यं कूटलेख करणं च । . त्यासापहारितापि च व्यत्तिकमाः पञ्च सत्यस्य ॥४२॥ ...
- परिवाद का अर्थ मिश्योपदेश है अर्थात् अभ्युदय और मोक्ष प्रयोजन वाली किया विशेषों में दूसरे को अन्यथा प्रवृत्ति कराना परिवाद या मिथ्योपदेश है । स्त्री· पुरुषों द्वारा एकान्त में की हुई विशिष्ट क्रिया को प्रगट करना रहोभ्याख्यान है । अंग
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KAR.2312
अध्याय : पाँचवां ]
[ ११३. विकार तथा भौहों का चलाना आदि के द्वारा दूसरे के अभिप्राय को जानकर ईष्या-. . वश उसे प्रकट कर देंना पैगून्य है । यहो साकार मन्त्र भेद कहलाता है। दूसरे के... द्वारा अनुक्त अथवा अकृत किसो कार्य के विषय में ऐसा कहला क्रि ग्रह उसने कहा है, अथवा किया है, इस प्रकार धोखा देने के अभिप्राय से कपट पूर्ण लेख लिखना कुट लख करंगा है। मथा धरोहर रखने वाला पुरुष अपनी धरोहर की संख्या भूलकर अल्पसंख्यक द्रव्य को भांग रहा है, तो उससे कहना कि हाँ, ऐसा ही है, इसे न्यासापहारिता कहते हैं, इस प्रकार परिवादादिक बार और पांचवीं न्यासापहारिता, सब .. मिलाकर सत्यागा अत के पाँच अतिचार कहे हैं। . .
विशेपार्थ----उमा स्वामी महाराज ने तत्त्वार्थ सुत्र में सत्याप वृत के अतिचार निम्न प्रकार कहे हैं :-- . मिथ्योपदेश रहोभ्याख्यान कट लेख क्रिया यासापहारितासाकारमन्त्रभेदाश्त्र अर्थात मिथ्योपदेश, रहोभ्याख्यान, क्लेख किया, न्यासापहारित और साकार मन्त्र भे ये पाँच सत्यागायत के अतिचार हैं । समन्तभ्रद स्वामी ने अलिंचार निरूपण में . उमास्वामी महाराज का अनुकरण तो किया है, परन्तु कितने ही अतिचारों में उन्होंने : .... परिवर्तन भी किया है । जैसे इसी सत्यागा उत्त के अतिचारों में परिवाद और पैशुन्य इन दो नवीन अतिचारों का समावेश किया है और मिथ्योपदेश तथा साकारमन्त्र भेद ... को छोड़ा है । लोक में परिवाद का अर्थ निन्द्रा और पैशुन्य का अर्थ तुगली प्रसिद्ध है। संभव है यही अर्थ स्वामी समन्तभद्र को वाञ्छित रहा होगा । परन्तु संस्कृत टीका कार में तत्वार्थ सूत्र के अतिचारों से मेल बैठाने के लिये परिवाद का अर्थ मिथ्योपदेश : मोर पैशुन्य का अर्थ साकारमन्ध भेद कर दिया है जो कि शब्दों से प्रतिफलित नहीं होता ! समन्तभद्र स्वामी परम विचारक विद्वान थे, इसलिये उन्होने अतिचारों में तो परिवर्तन किया ही है, गुणवृत और शिक्षावृतों के नामों में भी परिवर्तन किया है । जैसे तत्त्वार्थ सूत्रकार ने दिग्बूत, देशवत और अनर्थदण्डवत इन तीनों को गुगाबूत तथा ... मामाथिक, प्रेपरोपवास, भोगोपभोग परिमाणा और अतिथिसंविभाग इन चार को शिक्षाक्त माना है । परन्तु समन्त भद्र स्वामी ने दिग्दत, अनर्थदण्डवत और भोगोषभोप परिमारणवत इन तीन को गुणवतु तथा देशावकाशिक, सामायिक, प्रोषधोपवास
और बयावृत्य कहा है । कुन्द कुन्द स्वामी ने सल्लेखना का चार शिक्षावृतों में समावेश किया है। परन्त तत्वार्थ सुत्रकार तथा स्वामी समन्तभद्र आदि ने इसका पृथक ही - वर्णन किया है ... . ........
।
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११४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामखि
सत्यबूत की रक्षा के लिये तत्वार्थ सूत्रकार ने 'क्रोध लोभ भीरुत्य हास्य प्रत्याख्यानानुवीचिभाषणं पञ्च यर्थात् क्रोध त्याग, लोभ त्याग, भोरुत्व त्याग, हास्य त्याग और अनुयी चिभाषणानुकूल पातनायें बतलायी हैं । इनके होने पर ही सत्यबूत की रक्षा हो सकती है, अन्यथा नहीं । ग्रसत्य बोलने के दो प्रमुख कारण है- एक कषाय और दूसरा अज्ञान । कषाय निमित्तक असत्य से बचने के लिये कोध, लोभ, भय और हास्य का त्याग कराया है, क्योंकि ये चारों ही कपाय के रूप हैं । और ज्ञान मूलकं असत्य से बचने के लिये अनुवीचिभाषण--- प्राचार्य परम्परा से प्राप्त प्रांगमानुकूल वचन बोलने की भावना कराई है। इस भावना के लिये श्रागम का अभ्यास करना पड़ता है । श्रागम के अभ्यास से अज्ञानअसत्य दूर होता है ।
प्रश्न :- प्रचौर्याणुव्रत का क्या स्वरूप ?
उत्तर :- - रखे हुए, पड़े हुए अथवा बिल्कुल भूले हुए बिना दिये हुए दूसरे के धन को जो न स्वयं लेता है और न किसी दूसरे को देता है, वह स्थूल स्तेय का परित्याग अर्थात् प्रचर्या बूत है ।
निहितं वा पतितं वा सुविस्मृतं वा परस्वमविसृष्टं ।
न हरति यत्र च दत्ते तदकुश चौय्र्यादुपारमरणम् ||४३||
प्रकृश चौर्य का अर्थ स्थूल चोरी है । अर्थात् लोक में जो चोरी के नाम से प्रसिद्ध है तथा जिसके लिये राजकीय और सामाजिक दण्ड व्यवस्था निश्चित है । इस 'स्थूल चोरी से उपारमा निवृत होना, सो प्रवृत है । प्रचार्याण व्रत का धारक पुरुष किसी के रखे हुए, पड़े हुए या भूले हुए धन को बिना दिये न स्वयं ग्रहण करता है और न उठाकर दूसरे को देता है ।
विशेषार्थ : -- तत्त्वार्थ सूत्रकार ने चोरी का लक्षण लिखते हुए 'प्रदत्तदान स्तेयम्' यह सूत्र लिखा है, जिसका अर्थ है प्रदत्त विना दी हुई वस्तु को ग्रहण करना चोरी है । स्वामी समन्तभद्र ने प्रदत्त शब्द को व्याख्या करते हुए उसके तीन रूप निर्धारित किये हैं-१ निहित २. पतित और ३ सुविस्मृतं । कोई मनुष्य अपने पास, किसी वस्तु को रख गया अथवा किसी के निज के मकान में कोई मकान बेचते समय उसे उस धन को निकालने का ध्यान नहीं रहा,
नहीं रखा था। धन को लेना
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अध्याय : पांचवां ] 'निहित' धन की चोरी है । किसी के खरीदे हुए मकान में यदि कोई धन मिलता है, तो अचौर्याणुव्रत का धारी मनुष्य उस मकान मालिक को वापिस करता है। यदि किसी पुराने खण्डहर आदि में धन मिलता है, और उसके असली स्वामी का पता नहीं चलता है तो इस स्थिति में अचौर्याणुव्रत का धारक मनुष्य इसकी सूचना राज्य में . देता है। बयोंकि. 'अस्वामिकस्य वित्तस्य दायादो मेदिनीपतिः' अर्थात् जिसका कोई स्वामी नहीं से धन का स्वामी राजा होता है. 1 मार्ग में चलते समय किसी की कोई : ... यस्तु गिर जाती है, उसे पतित कहते हैं । अचौर्यारण वृत का धारक मनुष्य ऐसे धन को न स्वयं उठाता है, और न उठाकर दूसरे को देता हैं। यदि मन में यह विकल्प प्राता है कि इस पड़ी हुई वस्तु को मैं नहीं उठाता हूँ, तो न जाने मेरे पीछे पाने वाले किसले हार में पड़ेगी और शिया वस्तु वे मालिक को इसका मिल जाना असंभव : हो जावेगा, तो उस वस्तु को उठाकर किसी राजकीय कार्यालय में जमा करा देना चाहिये और उसकी सूचना प्रसारित करा देना चाहिये । कोई मनुष्य अपने पास बसे-.. हर के रूप में कुछ धन रख गया, पीछे भूल गया अथवा रखने वाले व्यक्ति की .... अकस्मात् मृत्यु हो गई और उसके उत्तराधिकारी पुत्र आदि को उसकी खबर नहीं । इस स्थिति में उस धन को मांगने के लिये कोई नहीं पाता है, तो ऐसा धन सुविस्मृत. कहलाता है । प्राचौर्याा व्रत का धारक मनुष्य ऐसे धन को अपने पास नहीं रखता। वह उसके उत्तराधिकारी को स्वयं ही वापिस करता है । अचौणि व्रत का धारक : मनुध्य प्रायकर, विक्रयकर तथा निगमकर आदि को नहीं चुराता तथा अपने भाईयों आदि के हिस्से को भी नहीं हड़पता ।
प्रश्न :-प्रचौर्याणवत के अतिचार कितने हैं और उनका क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-चौरप्रयोग, चोरार्थादान, विलोप, सदृशसन्मिश्र और हीनाधिक विनिभान ये पांच अचौर्यारण अंत के अतिचार हैं ।
चौरप्रयोग चौरार्थादान बिलोप सदृश सन्मिश्राः । हीनाधिक विनिमानं पञ्चास्तेये व्यतीपाताः ॥४४॥ अचौर्यारण वृत में निम्नाडिकत पांच अतिचार होते हैं---
चौर प्रयोग -चोरी करने वाले चोर के लिये स्वयं प्रेरणा देना, दसरे से प्रेरणा दिलाना और किसी ने प्रेरणा दी हो तो उसकी अनुमोदना चौर प्रयोग है.।
.....
. .
इश सन्मिश्राः ।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
चीरादान — जिसे अपने द्वारा प्रेरणा नहीं दी गई है तथा जिसकी अनुमोदेना नहीं की गई है, ऐसे चोर के द्वारा चुराकर लाई हुई वस्तु को ग्रहण करना चौदान है । चोरी का माल खरीदने से चोर को चोरी की प्रेरणा मिलती है ।
११६ ]
विलोप उचित न्याय को छोड़कर अन्य प्रकार से पदार्थ का ग्रहण करना विलोप कहलाता है । इसे ही विरुद्ध राज्यातिक्रम कहते हैं। जिस राज्य के साथ अपने राज्य का व्यापारिक सम्बन्ध निषिद्ध है अर्थात् जिस राज्य में अपने राज्य की वस्तुयों का जाना-जाना राज्य की ओर से निषिद्ध किया गया है, उसे विरुद्ध राज्यातिक्रम कहते हैं | विरुद्ध राज्य में महंगी वस्तुएँ स्वल्प मूल्य में मिलती हैं, ऐसा मानकर वहाँ स्वल्पमूल्य में वस्तुओं को खरीदना और तस्कर व्यापार के द्वारा अपने राज्य में लाकर अधिक मूल्य में बेचना विरुद्ध राज्यातिक्रम कहलाता है ।
सदृशसन्मित्र - समान रूप-र वाली नकली वस्तु श्रमन्त्री वस्तु में मिलाकर असली वस्तु के भाव से बेचना जैसे वी को तेल यादि से मिश्रित करना अथवा कृत्रिम - बनावटी - नकली सोना-चांदी के द्वारा धोखा देते हुए व्यापार करना 'सदृशसन्मित्र कहलाता है ।
हीनाधिक विनिमान -- जिनसे वस्तुओं का विनिमान - आदान-प्रदान लेन-देन होता है, उन्हें विनिमान कहते हैं । इन्हीं को मानोन्मान भी कहते हैं । जिसमें भरकर या जिससे तौलकर कोई वस्तु ली या दी जाती है, उसे मान कहते है, जैसे प्रस्थ तराजू यादि। और जिससे नापकर कोई वस्तु ली या दी जाती है, उसे उन्मान कहते हैं, जैसे फुट, गज यादि । किसी वस्तु को देते समय होन मान उत्मान का और खरीदते समय अधिक गान उन्मान का प्रयोग होनाधिक मानोन्मान कहलाता है वृत का भारी मनुष्य इन सब प्रतिचारों से दूर रहकर अपने वृत
को सुरक्षित रखता है ।
विशेषार्थ -- तत्वार्थ सूत्रकार ने भी अचर्यारण बूत के ये ही प्रतिचार निरूपित किये हैं । जैसे
'स्तेन प्रयोग तदाहृतादान विरुद्ध राज्यातिक्रम हीनाधिक मानोत्सान प्रति: रूपक व्यवहाराः' अर्थात् स्तेन प्रयोग, तदाहृतादान, विरुद्ध राज्यातिक्रम, हीनाधिक गानोन्मान और प्रतिरूपक व्यवहार ये पांच चार वृत के प्रतिचार हैं । समन्तभद्रः
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जन
स KIRATRAI
अध्याय : पांचवां ]
[ ११७
स्वामी ने विरुद्ध राज्यातिकाम के बदले बिलोप शब्द रखा है, जिसका अर्थ राजकीय कानून का उल्लंघन करना होता है । विरुद्ध राज्यातिकम भी इसी में गतार्थ हो
जाता है । .
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... अचार्य व्रत की रक्षा के लिए तत्वार्थ सुकार ने निम्नलिखित पांच भावनाओं .. का वर्णन किया है... 'शून्यागार विमोचिताबास परोपरोधाकरण भक्ष्य गुद्धि सद्धर्मा विसंवादाः । पञ्च'अथात् शून्यागारावास-पर्वत की गुफाओं तथा वक्ष की कोटरों आदि प्राकृतिक शून्य स्थानों में निवास करना, विमोचितावास-राजा आदि के द्वारा छुड़वाए हुए-उजड़े ग्रहों में निवास करना; परोपरोधाकरणा-अपने स्थान पर दूसरे के ठहर जाने पर . सवावट नहीं करना, भैक्ष्य शुद्धि-चरगानयोग की पद्धति से भिक्षा की सृद्धि रखना और सद्धर्माविसंवाद---मह धर्मीजनों के साथ उपकरण यादि प्रसंग को लेकर विसंवाद नहीं करना, इन पांच का अन्मायन की रक्षा होती है । मुनि इन भावनाओं का साक्षात्-प्रवृतिहण और गृहस्थ भावना रूप से पालन करते हैं।
प्रश्न :--ब्रह्मचर्याणवत का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :---जो पाप के भय से परस्त्रियों के प्रति न स्वयं गमन करता है, और न दूसरों को गमन कराता है, वह परस्त्रीत्याग अथवा स्वदार संतोप नाम का अरण यत है।
न तु परदारान् गच्छति न परान् गमयति च पापभीतेर्थत् ।। __ सा परदारनिवृत्तिः । स्वदार सन्तोषनामापि ॥४५॥
श्लोक में आये हुए 'परदारान्' शब्द का समास दो प्रकार का होता है...... १. 'परस्य दाराः परदारास्तान अर्थात् पर स्त्रियां । इसमें पहले समास से पर के द्वारा परिगृहीत्त स्त्रियों का बोध होता है और दूसरे समास से पर के द्वारा अपरिगृहीत अविवाहित कन्याओं अथवा वेश्याओं का ग्रहण होता है । इस प्रकार इन परिगृहीत अपरिगृहीत-दोनों प्रकार की परस्त्रियों के साथ पाप के भय से न कि राजकीय और सामाजिका भय से, न स्वयं संगम करना और न परस्त्रिलम्पट अन्य पुरुषों को गमन कराना परस्त्रीत्याग अगं व्रत हैं । इसी को स्वदार संतोषनत भी कहते हैं। .::...
- विशेषार्थ-जिसके साथ धर्मानुकूल विवाह हुया है, उसे स्वस्त्री कहते हैं, और इसके सिवाय जो अन्य स्त्रियां हैं, वे परस्त्रियां कहलाती हैं। परस्त्रियां परिगृहीत
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. ११८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि और अपरग्रहीत के भेद से दो प्रकार की होती हैं। जो दूसरे के द्वारा विवाहित हैं, वे परिगृहीत कहलाती हैं, और जो अविवाहित हैं, अथवा. वेश्या आदि के समान जो उन्मुक्त-स्वच्छन्द हैं, में परिग्रहीत हैं. जागा दशकारी पुरुष स्वस्त्री को
छोड़कर अन्य दोनों प्रकार की परस्त्रियों से दूर रहता है। उसका यह दूर रहना पापः । 'के भय से होता है, राजा आदि के भय से नहीं, क्योंकि अभिप्रायपूर्वक पाप से निवृत्ति होने को हो वृत कहते हैं, अशक्ति अथवा किसी अन्य भय से निवृति होने को श्रत नहीं
कहते हैं । प्राचार्य ने ब्रह्मचरण प्रत के लिए परंदार निवृत्ति और स्वदार संतोष इन :: : दो नामों का प्रयोग किया है, उससे यह भाव ध्वनित होता है कि ब्रह्मचर्याण अतः ।
का धारक पुरुष देश-काल के अनुसार अपनी अनेक स्त्रियां हों तो उनका समागम कर सकता है, पर स्त्रियों का नहीं । वह अपनी स्त्रियों में उसकी विकार पूर्ण दृष्टि नहीं होती। . . . . . . .
. प्रश्न :-ब्रह्मचर्याणुव्रत के प्रति चारों का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-अन्य विवाहकरंग, अनङ्ग क्रीडा, बिटत्व, विपुल तृपश और :... इत्वरिका गमन ये पाँच ब्रह्मचर्याणां व्रत के अतिचार हैं ।
अन्य विवाहाकरमानङ्ग क्रीडा विटत्व विपुलतृषः । .इत्वरिका गमनं चास्मरस्य पञ्च व्यतिचारा: ॥४६॥ :
__अ-ईषत् स्मरः कामा यस्य स स्मर: तस्य. इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिसके स्वस्त्रीविषयक थोड़ा राग रहता है. उसे अस्मर अथवा ब्रह्मचर्यागा प्रती कहते हैं, इस व्रत के धारक पुरुष को निम्नाङ्कित पांच अतिचारों का परित्याग करना चाहिये-अन्यविवाहकरण-कन्यादान को विवाह कहते हैं। अपनी या अपने प्राश्रित भाई आदि की संतान को छोड़कर अन्य लोगों की संतान अन्य संतान हैं। उन अन्य . संतानों का विवाह प्रमुख बनाकर करना अन्यविवाहकरण है । 'अन्य विवाहस्य प्रा. समन्तात् करणं अन्य विवाहकरणम्' इस व्युत्पत्ति से यह भाव प्रगट होता है, कि जो पटिया बनाकर दूसरों का विवाह सम्बन्ध जुटाते रहते हैं. उनके उस कार्य के प्रति ही प्राचार्य का संकेत है। सहधर्मी भाई के नाते उनके पुत्र-पुत्रियों के विवाह में
संमिलित होना ब्रह्मचर्यारण वृत्ती के लिये निषिद्ध नहीं है। अनंगक्रीडा-काम सेवनः ... के लिये निश्चित अंगों के अतिरिक्त अन्य अंगों में क्रीडा करना अनंगक्रीडा है। .. बिटस्व-शरीर से कुचेष्टा करना. और मुख से अश्लील. भद्दे वचनों का प्रयोग करना
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अध्याय : पांचवां ।
[ . ११६ बिटत्व है । विपुलतृषा --- काम सेवन की तीन प्रासक्ति को विपुलतृपा कहते हैं। इत्वरिकागमन - व्यभिचारिणी स्त्री को इत्वरिका कहते हैं । ऐसी स्त्रियों के साथ उठना-बैठना तथा व्यापारिक सम्पर्क बढ़ाना इत्वरिकागमन है।
- विशेषार्थ :-तत्वार्थ सूत्रकार ने ब्रह्मचर्याणवत के निम्नांकितः पाँच अतिचार कहे हैं- 'पर विवाह करणेत्वरिका परिगृहीतापरिगृहीतागमनानङ्गक्रीड़ा. कामतीत्राभिनिवेशाः' अर्थात् १. परविवाह करण, २. परिगृहीतेत्वरिका गमन, ३. अपरिगृहीतेत्वरिकागमन, . ४. अनंगक्रीडा. और ५. कामतीमाभिनिवेश ये पांच ब्रह्मचर्याणुव्रत के अतिचार हैं । समन्तभद्र स्वामी ने 'परिंगृहीतत्वरिकागमन' और . 'अपरिगहोतेत्वरिकागमन' इन दो अतिचारों को एक इत्वरिकागमन में सम्मिलित कर विटत्व का अलग से समावेश किया है।
ब्रह्मचर्याणुव्रत की रक्षा के लिये तत्त्वार्थसुत्रकार ने निम्नलिखित पाँच भावनाओं .. का उल्लेख किया है... . .. .
'स्त्रीरागकथा श्रवणतन्मनोहसँग निरीक्षणा पूर्वरतानुस्मरण वृष्येष्टरंस स्वशरीर संस्कार त्यागाः पञ्च' अर्थात् स्त्रियों में राग बढ़ाने वाली कथानों के सुनने का त्याग करना, उनके मनोहर अंगों के देखने का त्याग करना, पहले भोगे हुए भोगों के स्मरण का त्याग करना, गरिष्ट एवं कामोत्तेजक पदार्थों के सेवन का त्याग करना पीर अपने शरीर की सजावट का त्याग करना इन भावनाओं से ब्रह्मचर्यव्रत सुरक्षित . रहता है।
प्रश्न :-~परिग्रहविरति अणुव्रत का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-धनधान्य आदि परिग्रह का परिमागाकर उससे अधिक में इच्छारहित होना परिमित परिग्रह अथवा इच्छापरिणाम नाम का अणुक्त कहलाता है ।
धनधान्यादिग्रन्थं परिमाय ततोऽधिकेषु निः स्पृहता । ..
परिमित परिग्रहः स्यादिच्छा परिमारा नामापि ॥१५॥४७॥ . ___ गाय भैस आदि को धन कहते हैं। धान्य, गेहूं, चना आदि को वन्य कहते हैं । आदि शब्द से दासी-दास, स्त्री-मकान, खेत, नगद-द्रव्य, सोना-चाँदी के आभूषण तथा वस्त्र आदि का संग्रह होता है । यही सब परिग्रह कहलाता है । अपनी इच्छानुसार र देव अथवा गुरु के पादमूल में इसका परिमाणकर उससे अधिक में इच्छारहित होना परिमित परिग्रह नाम का अणुवत होता है । इस अणुवत में अपनी इच्छा के अनुसार
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१२० ]
। गो. प्र. चिन्तामणि परिग्रह का परिणाम किया जाता है, इसका दूसरा नाम इच्छा परिमाण भी है। - विशेषार्थ :--'परितः गृह्णाति आत्मानमिति परिग्रहः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो आत्मा के सब ओर से जकड़ ले, उसे परिग्रह कहती हैं। परिग्रह का। वाच्यार्थ मूर्छा है । जैसे कि तत्त्वार्थ सूत्र में कहा है----'मूर्छा परिग्रहः अर्थात् पर पदार्थों में जो मुच् ममत्वभाव, वही परिग्रह कहलाता है । यह परिग्रह अन्तरंग
और बहिरंग के भेद से दो प्रकार का होता है। अन्तरंग परिग्रह मिथ्यात्व, क्रोध मान, माया, लोभ तथा हास्यादि नौ नोकथायः के भेद से १४ प्रकार का होता है। और वहिरंग परिग्रह चेतन, अचेतन के भेद से दो प्रकार का होता हैं । दासी-दासः ग्रादि द्विपद मीर गाय-स आदि चतुष्पद चेतनपरिग्रह और खेत, मकान, सोना, चाँदी । श्रादि अचेतन परिग्रह है । मबं मिलाकर क्षेत्र, वास्तु, धन, धान्य, द्विपद. चतुप्पदा । शयनासन, यान, कुप और भाण्ड के भेद से बहिरंग परिकह वश प्रकार का माना गया हैं। परिग्रह त्याग महाव्रत में इन सभी परिग्रहों का त्याग रहता है । परन्तु गृहस्थ । परिग्रहं का पूर्ण त्याग नहीं कर सकता । वह अपनी आवश्यकता के अनुसार उसकी । सीमा निश्चित कर सकता है। इसलिये गहस्थों के लिये परिग्रह परिमागा अगानत. बार करने का उपदेश दिया गया है। गृहस्थ की आवश्यकता भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं। किसी का परिवार थोड़ा है, अत: उसका काम थोडे परिग्रह से चल सकता है और किसी का परिवार बड़ा होता है, अतः उसे अधिक परिग्रह रखना पड़ता। है । इसलिए प्राचार्यों ने परिग्रह परिमारण्यत को इच्छा परिमाग भी नाम दिया है। अर्थात् इसमें अपनी इच्छा के अनुसार परिग्रह का परिमाण किया जाता है । परिमार, किये हुये परिग्रह से अधिक परिग्रह में किसी प्रकार की वांछा नहीं रखना; इस अत । की विशेषता है।
प्रश्न :----परिग्रह परिमाणवत के अतिचारों का क्या स्वरूप है ? .
उत्तर :---अतिवाहन, अतिसंग्रह, अतिविस्मया, अतिलोभ और अतिभार वाहन ये पाँच परिग्रह परिमाण अणुअत के अतिचार निषित्रत किये जाते हैं।
अतिवाहनातिसंग्रह विस्मय लोभाति भारवहनानि । : ..
परिमित परिग्रहस्य च विक्षेपाः पञ्च.. लक्ष्यन्ते ॥४॥ ... : - विक्षेप का अर्थ अतिचार है । जिस प्रकार अहिंसादि अणवतों के पांच-पांच ।। अनिचार बतलाये गये हैं, उसी प्रकार परिग्रह परिमांगगाणुव्रत के भी पांच अतिचार ।
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यध्याय : पांचवां ]
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PORAN
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निश्चित किये जाते हैं । श्लोक में आया हुया 'च' शटद'अपि' प्रार्थ में प्रयुक्त हुआ है। के अतिचार इस प्रकार है- अनिवार-
लोली तीन को कम करने के लिये. परिग्रह का परिमारा कर लेने पर भी कोई लोभ के आवेश से अधिक वाहन रखता है, अर्थात् बैल आदि पशु जितने मार्ग को सुख से पार कर सकते हैं, उसे अधिक मार्ग पर उन्हें चलाता है, तो उसको यह क्रिया अति वाहन कहलाती है। इस नत के धारी किसी मनुष्य ने बैल अादि की संख्या तो कम कर ली, परन्तु उनको संख्या के अनुपात से खेती तथा मार्ग का यातायात कम नहीं किया, इसलिये उन कम किये हुए बैल आदि को ही अंधिक चलाकर अपना काम पूरा करता है। ऐसी स्थिति में अतिवाहन नाम का अतिचार होता है।....
..... .: . अतिसंग्रह---'यह बान्यादिक आगे चलकर अधिक लाभ देंगा' इस लोभ के चश से कोई उसका अत्यधिक संग्रह करता है। उसका यह कार्य अतिसंग्रह नाम का अतिचार है । अतिविस्मय संगृहीत वस्तु की वर्तमान भाव से बेच देने पर किसी का... मूल भी वसूल नहीं हुआ और दुसरे के द्वारा ठहकर वेचने पर उसे अधिक लाभ हुआ, इस स्थिति में लोक्ष के प्रावेश से अतिविस्मय अति .. खेद करता है । अतिविस्मय नाम का अतिलो - विशिष्ट. लोभ मिलने पर भी और भी अधिक लाभ की इच्छा से कोई अधिक लोभ करता है, तो उसका वह अतिलोभ नाम का अतिचार है । अतिभारारोपण---लोभ के आवेश से अधिक भार लादना.. अतिभारारोपण नाम का अतिचार है। एक अतिभारारोपण अतिचार अहिंसाणुअत का भी है, परन्तु वहां कष्ट देने का भाव रहता है और यहां अधिक लाभ प्राप्त करने का - अथवा अतिभारारोपण का एक अर्थ. यह भी हो सकता है कि अपने कारोबार को इतना अधिक फैला लेना, जिसकी वह स्वयं संभाल नहीं कर सकता और उसके कारण उसे सदा व्यग्र रहना पड़ता है ! ...
.. .. . .. ... ... .. ... ...... ... विशेषार्थ : --- तत्वार्थ सूत्रकार ने परिग्रह परिमाणवत के अतिचार दूसरे ही लिखे हुए हैं । यथा - 'क्षेत्र वास्तु हिरण्य सुवर्णधनधान्य. दासी दास कुप्य प्रमागातिक्रम:' अर्थात क्षेत्र वास्तु प्रभागातिकम-खेत और मकान के प्रमाण का उल्लङ्कन करना, हिरण्य सुवर्ण प्रमाणातिक्रम-सोना, चाँदी आदि प्रमाण का उल्लङ्घन करना, बनधान्य प्रमाणातिक्रम- पशुधन तथा अनाज के प्रमाण का उल्लङ्घन करना, दासीदास प्रमाणातिक्रम् -द्रास-दासियों के प्रमाण का उल्लङ्घन करना, कुप्यप्रमागाति
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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क्रम - बस्तु तथा बर्तनों के प्रमाण का जनता में पांच परिह परिमाणाणअत के अतिचार हैं । क्षेत्र बास्तु श्रादि के प्रमाग उल्लङ्घन करने का प्रकार ऐसा है:- जैसे किसी ने नियम लिया कि मैं एक खेत और एक मकान रख गा.। बाद में पास के खेत और मकान को खरीदकर बीच की सीमा तोड़ दी तथा दोनों को एक कर लिया । यहाँ संख्या तो एक खेत या एक मकान की कर ली, परन्तु उसके प्रमाण में विस्तार कर लिया। इस स्थिति में भंगाभंग की अपेक्षा यह अतिचार बनता है। इसी प्रकार सोना-चांदी के विषय में किसी ने नियम किया कि मैं गले का एक, हाथ के दो और पैर का एक प्राभूषण रक्खगा। पीछे लोभ सताने में उसने उन ग्राभूपरणों में और भी सोना-चाँदी मिलवाकर फिर से प्राभूषण वनवा लिया । यहाँ । .. आभूषणो की संख्या तो पहले की तरह रही, परन्तु उनके परिमाण में वृद्धि हो गई। इस तरह भंगाभंग की अपेक्षा ग्रह अतिचार बनता है। इसी प्रकार अन्य अतिवारों के विषय में लगा लेना चाहिये।
इस मत की रक्षा के लिये उमास्वामी महाराज ने निम्नलिखित पांच भावनाएँ लिखी हैं 'मनोजामनोजेन्द्रिय विषय रागद्वप वर्जनानि पञ्च' स्पर्शनादि पाँच 'इन्द्रियों के मनोज और अमनोज विषय में रागद्वाप नहीं करना परिग्रह त्यागनत की। पांच भावनाग हैं।
प्रश्न :--अतिचारों से रहित अणुवतों को पालने से क्या फल मिलता है ?
उत्तर :--अतिचार रहित पांच अणुअत रूपी निधियाँ उस स्वर्ग लोक को .. फलती हैं-फल देती हैं, जिसमें अवधिज्ञान, अणिमा, महिमा आदि पाठ. गुण और सात धातुनों से रहित वैकिधिक शरीर प्राप्त होते हैं।
पञ्चाणवतनिधयो निरतिक्रमणाः फलन्ति सुरलोकम् । यत्राधिरष्टगुणा दिव्य शरीरं च लभ्यन्ते ।।४।।
अतिचार रहित पांच अणुयत निधियों के समान है । इनका निरतिचार पालन करने से नियम पूर्वक स्वर्ग की प्राप्ति होती है और उस स्वर्ग को जहाँ कि । ... अवविन्नान-भवप्रत्यय नाम का अवधिज्ञान नियम से प्राप्त होता है । अणिमा, - महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और. वशित्व ये पाठ ऋद्धियाँ तथा बातु, उपधातु से रहित परम सुन्दर वैकियक शरीर प्राप्त होता है।
- विशेषार्थ :--अणुव्रत धारण करने वाले जीव बद्धायुष्क और अबद्धारक
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की अपेक्षा दो प्रकार के हैं । जो अणुव्रत धारण करने के पहले प्रायु बांध चुके हैं, वे बदायुष्क कहलाते हैं और जो अणुनतों के काल में आयु बांधलें हैं, वे अवद्धायुष्क कहलाते हैं । ये दोनों प्रकार के जीव नियम से देव ही होते हैं। क्योंकि ऐसा नियम है कि देवायु को छोड़कर जिस जीव को अन्य प्रायु का बन्ध हो गया है, वह उस पर्याय में अणुअत तथा महाप्रत धारण नहीं कर सकता और अणुव्रत के काल में यदि अायु बंध होला है, तो नियम से देवायु का ही बंध होता है । देवायु में भी वैमानिक देवायु का हो बन्ध होता है । अण ब्रत धारण करने के पूर्व यदि किसी की मिथ्यादृष्टि अवस्था है, तो उसमें भवनत्रिक की देवायु बंध सकती है, परन्तु अग अत होने पर भवनत्रिक की आयु बैमानिक की यायु के रूप में परिवर्तित हो जावेगी । अरण नतों का बारी जीव सोलहवें स्वर्ग तक ही उत्पन्न हो सकता है, उसके आगे नहीं । उसके आगे नव बेय . प्रादि में उत्पन्न होने के लिये निर्ग्रन्थ मुद्रा का धारण करना आवश्यक है।
प्रश्न :--पाँची अणुव्रतों को पालन करने से किसको क्या फल मिला ?
उत्तर :---यमपाल नाम का चाण्डाल धनदेव उसके बाद वारिपेरण नाम का राजकुमार और जयकुमार ये क्रम से अहिंसादि अणुव्रतों में उत्तम पूजा के अतिशय को प्राप्त हुए हैं।
मातंगो धनदेवश्च वारिषेणस्ततः परः । . - नीली जयश्च संप्राप्ताः पूजातिशयसुत्तमम् ॥५०॥
हिंसाविरति नामक अणुक्त से यमपाल चाण्डाल ने उत्तम प्रतिष्ठा प्राप्त की । सत्याणुयना से धनदेव सेंट ने पूजातिशय को प्राप्त किया था। चौयविरति अगुव्रत से वारिप्रेरण ने पूजा का अतिशय प्राप्त किया था। अन्नह्माविरति अणुदत्तब्रह्म चणुिदत ले नीली नाम की वणिवपुत्री पूजातिशय को प्राप्त हुई । परिग्रह विति अणुव्रत से जयकुमार पूजातिशय को प्राप्त हुआ था।
प्रश्न :--हिंसादि यांच पापों को करने से किसको क्या फल मिला ?... ..
उत्तर:- धनश्री और सत्य घोंप, तापस और कोतवाल और श्यचनवदीत ये पांच क्रम से हिसादि पापों में उपाख्यान करने के योग्य हैं।..
धनश्रीसत्यघोषौ च तापसारक्षकावपि । उपाख्येयास्तथा श्माशु नवनीतो यथाक्रमम् ॥१५॥
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१२४. ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिंग ___ धनश्री नाम की सेठानी ने हिंसा से बहुत प्रकार का दुःखदायक फल भोगा है। सत्यप्रोष पुरोहित ने असत्य बोलने से, तापस ने चोरी से और कोतवाल ने ब्रह्मचर्य का प्रभाव होने से बहुत दुःख भोगा है। इसी प्रकार प्रमथ नवनीत नामकः वरिण क ने परिग्रह पाप के कारण दुःख भोगा है।
प्रश्न :..-गृहस्थों के प्रष्ट मूलगुरषों के क्या स्वरूप हैं ?
उत्तर :-मुनियों में उत्तम. गणधरादिक देव मद्यत्याग, मांसत्याग'. और मध्रुत्याग के साथ पांच अणुक्तों को गृहस्थों के आठ मूलगुण कहते हैं ।
'मद्य मांस मधु त्यागैः सहाणुवत पञ्चकम् । अष्टो मूल गुणानाहु गृहीणां श्रमरणोत्तमाः ।।५२।। . . .
श्रमण, श्रवण अथवा प्रामन ये सब मुनियों के नाम हैं। इनमें जो उत्तम गणधरा दिक देव हैं, वे श्रमरणोत्तम कहलाते हैं। उन्होंने गृहस्थों के पाठ मूलगुण इस प्रकार वतलाये है--१. मद्य त्याग २. मांस त्याग ३. मधु त्याग ४. अहिंसाणुव्रत । ५. सत्याणुव्रत ६. अचौर्याणुक्त ७. ब्रह्मचर्याण व्रत और ८. परिग्रह परिमाण क्त ।
विशेषार्थ----मूलगुग मुख्य गुणों को कहते हैं । जिस प्रकार मूल-जड़ के बिना वृक्ष नहीं ठहरते इसी प्रकार मूलगुणों के बिना मुनि और श्रावक के व्रत नहीं ठहरते। इस तरह मूलगुण का वाच्यार्थ अनिवार्य अावश्यक गुण है । मुनियों के २८ मूलगुण होते हैं और शावकों के ८ । श्रायकों के मूलं गुणों का उल्लेख कई प्रकार से मिलता है। सबसे पहला उल्लेख समन्तभद्र स्वामी का है, जिसमें उन्होंने मद्य त्याग, मांस त्यांग, मधु त्याग और अहिंसा आदि पांच प्रणवत सम्मिलित किये हैं । उनका अभिप्राय ऐसा जान पड़ता है कि मुनियों के २८ मूलगुणों में पांच महाव्रत सम्मिलित हैं, तो गृहस्यों के आठ मूलगुरणों में पांच अगा व्रतों को स्थान दिया है । मद्यत्याग आदि यद्यपि अहिसागा वृत के अन्तर्गत हो जाते हैं, तथापि विशेषता बतलाने के लिए उनका ।
पृथक् से उल्लेख किया है । आगे चलकर जिनसेन' स्वामी ने मधु त्याग को । : - मांस त्याग में गभित कर उसके स्थान में श्रुतत्याग का उल्लेख किया है। जिनसेन ... के परवर्ती प्राचार्यों ने और भी सरलता करते हुए पांच अरण बतों के स्थान पर पांच ३
उदुम्बर फलों के त्याग का समावेश किया है । इनके सिवाय ५० अाशाथर जी ने . सागार धर्मामृत में एक मत का और भी उल्लेख किया है, जिसके आधार पर निम्नलिखित पाठ मल गना. माने जाते हैं।
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अध्याय : पांचवां ]
. १. मद्य त्याग, २. मांस त्याग, ३. मधु त्याग, ४. रात्रि भोजन त्याग, । पचफली त्याग, ६. प्राप्तनुति-देवदर्शन, ७. जीव दया और ८. जल गालन । मूलगुणों का पालन करने वाला ही जैन धर्म की देशना का पात्र होता है । यही .. नहीं, गृहस्थ की संज्ञा भी इस मनुष्य को तभी प्राप्त होती है जव ब्रह पाठ मूलगुणों. ... का पालन करता है। .... प्रश्न :--पुरणवत कितने हैं और किसे कहते हैं ? ..
.. उत्तर :-तीर्थंकर देव आदि उत्तम पुरुष पाठ मूलगुणों की वृद्धि करने के .... कारण दिग्धत अनर्थदण्डवत पीर भोगोपभोग परिमाणवत को गुणव्रत कहते हैं।
दिस्वतमनर्थदण्डवतं च भोगोपभोग परिमारणम् ।
अनुवहरणाद्गुणा नामाख्यान्ति गुणवतान्यार्याः ।।५३।।
. 'गुरण: गुणवभिर्वा गर्यन्त प्राप्यन्त इत्यायः' इस. व्युत्पत्ति के अनुसार जो. गुणों अथवा गुणवान मनुप्यों के द्वारा प्राप्त किये जावें, उन्हें आर्य कहते हैं। ऐसे आर्य तीर्थंकर देब', गधर, प्रतिगणधर तथा अन्य प्राचार्य कहलाते हैं । 'गुरणाय व्रतं गुम्पन्नतम्' गुरण के लिए जो व्रत है, उन्हें गुणवत कहते हैं । उपरितन श्लोक में कहे ... गये पाठ मूलगुरणों की वृद्धि में सहायक होने से दिग्वृत, अनर्थदण्डवत और भोगोपभोग परिमाणवत इन तीन को आर्य पुरुषों ने गुणवतों में परिगणित किया है । दशों दिशाओं में माने जाने की सीमा निर्धारित करना दिग्वृत है 1 मन, वचन; काय के निष्प्रयोजन व्यापार के परित्याग को अनर्थदण्डवत कहते हैं । भोग और उपभोग की वस्तुओं का समय का नियम लेकर अथवा जीवन पर्यन्त के लिए परिमाण करना. भौगोपभोग परिमाणवत है। जो वस्तु एक बार भोगने में आती है, उसे भोग कहते है, जैसे भोजन, पेय पदार्थ तथा गन्धमाला आदि । जो बार-बार भोगने में ग्रावे उसे उपभोग कहते हैं, जैसे वस्त्र, आभूषण, यान-वाहन, शयन-शय्या आदि । इनका . परिमारा काल का नियम लेकर अथवा जीवनपर्यन्त के लिए दोनों प्रकार से होता है। विशेषार्थ :--खेत की रक्षा के लिए बाड़ी का जो स्थान है, वहीं स्थान अणुव्रतों की रक्षा के लिए तीन गुणवतों का है। यातायात की. सीमा निर्धारित होने से, निष्प्रयोजन कार्यों का परित्याग करने से तथा भोग-उपभोग की सीमा को, निश्चित ! करने से यह जीव अपने अहिंसादि अणुक्तों की रक्षा करने में समर्थ होता है, इसलिए प्राचार्यों ने इन तीनों कार्यों को गुरुण वृत में शामिल किया है । भोग और उपभोग की।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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जो परिभाषा समन्तभद्र स्वामी को अभीष्ट है; उसके अनुसार संस्कृत-टीकाकार ने उसका स्पष्टीकरगा किया है । परन्तु साथ में यह भी ज्ञातव्य है कि उमास्वामी. .. महाराज ने भोगोपभोग परिमारग के बदले उपभोग परिभोग परिमारग शब्द का प्रयोग किया है। उनके अभिप्रायानुसार उपभोग. का अर्थ है जो एक बार भोगने में ग्रावे. और परिभोग का अर्थ है जो बार-बार भोगने में प्रावे । समन्तभद्र स्वामी का उपभोग : और उमास्वामी का परिमोग एकाकि है और समन्तभद्र स्वामी का भोग और उमास्वामी का उपभोग एकार्थक है । उमास्वामी ने दिग्वृत, देशवत और अनर्थदण्डात इन तीन को गुणव्रत माना है और समन्तभद्र स्वामी ने दिदात,
गर्भपात सौर गोलो परिमाणमा को गुणवत. माना है । यहाँ समन्तभद्रं स्वामी का यह अभिप्राय जान पड़ता है कि भोगोपभोग की वस्तुओं का परिमाण ... करने से परिग्रह परिभारगारण अत की वृद्धि होती है-- रक्षा होती है. इसलिए इसे गुणवत में सम्मिलितं करना चाहिए। शिक्षाप्रतों की गणना में भी दोनों प्राचायों में मतभेद है। .
प्रश्न :--विग्यत किसे कहते हैं ? - उत्तर :-- मरण पर्यन्त पूक्ष्म पापों की निवृति के लिए दिशाओं के समूह को. मर्यादा सहित करके मैं इससे बाहर नहीं जाऊँगा ऐसा संकल्प करना दिग्यत होता है।
दिग्वलयं परिगणितं कृत्वातोऽहं बहिन यास्यामि । इति सङ्कल्पो . दिग्वतमामृत्यणुपापविनिवृत्त्यः ॥५४॥
पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिरण, शान, ग्राग्नेय, नैऋत्य, वायब्ध, ऊर्व और , अधः इस प्रकार दश दिशाएँ होती हैं। इन सबके समूह का नाम दिग्वलय है। इन दशों दिशाओं की सीमा निश्चित कर ऐसा संकल्प करना कि मैं इनसे बाहर नहीं जाऊँगा, दिग्यत कहलाता है। दिवात मरापर्यन्त के लिए धारण किया जाता है। अर्थात् इसमें देशावकाशिक अत के समान घड़ी, - छटा अादि समय की सीमा नहीं रहती । दिग्धत का प्रयोजन सूक्ष्म पापों की निवृत्ति करना है । मर्यादा के भीतर स्थल पायों से निवृति रहती है, परन्तु भवा के बाहर यातायात सर्वथा बन्द हो जाने से यहाँ सूक्ष्म पापों को भी निवृत्ति हो जाती है। .
..विशेषार्थ :-परिग्रह स्वयं में एक बड़ा पाप है । उसी की पूर्ति के लिए यह
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अध्याय : पांचयां ]
. [ १२७ मनुष्य जीवों की हिंसा करता है, झल बोलता है, चोरी करता है, स्त्री में आसक्ति रखता है तथा सर्वत्र यातायात करता है । जिसने परिग्रह सम्वन्धी अनन्त इच्छाओं का दमन कर लिया, उसने अन्य अनेक पापों में अपने आप की रक्षा स्वयं कर ली, ऐसा समझना चाहिए 1 दिन्नत में जो यातायात की सीमा निश्चित की जाती है, वह उसी परिग्रह सम्बन्धी अनन्त इच्छानों के दमन करने का एक प्रयास है। इस प्रकार दिन्नत का मुख्य उद्देश्य प्रारम्भ और लोभ को कम करने का है, अतः दिग्वत में तीर्थक्षेत्रों का. यातायात सम्मिलित नहीं। तीर्थ यात्रा या तीर्थकर भगवान की - दिव्यध्वनि ग्रादि सुनने के लिए मर्यादा के बाहर भी जाया जा सकता है।
प्रश्न:-दिग्बत में मर्यादा किस प्रकार ली जाय ?
उत्तर :--दशों दिशाओं के परिगरिंगत करने में प्रसिद्ध समुद्र, नदी, अरबी, पर्वत, दें और योजन को मावि कहो है : .
मकराकर सरिदटवी गिरिजन पदयोजनानि मर्यादा । .
प्राहुदिशां दशानां . . प्रतिसंहारे प्रसिद्धानि ॥५५॥ ___ मकराकर समुद्र को कहते हैं, सरित गंगा, सिन्धु आदि नदियों को कहते हैं, अदबी का अर्थ दगडकवन श्रादि सघन जंगल है, गिरि का अर्थ सह्य, विन्ध्य यादि . पर्वत है । जनपद का अर्थ वराट, वापी तट आदि देश है और योजन का अर्थ बीस योजन, तीस योजन आदि हैं । लोक व्यवहार में चार कोश का एक योजन लिया जाता ... है । ब्रत देने वाले और ब्रत लेने वाले को जिनका परिचय प्राप्त है, उन्हें प्रसिद्ध कहते . ... हैं। पूर्वादि दशों दिशाम्रो सम्बन्धी सीमा निश्चित करने के लिये समुद्र, नदी, जंगल, देश अथवा योजन के खम्भों आदि को मर्यादा रूप से स्वीकृत किया जाता है । . ..
. विशेषार्थ :--दिग्बत. का धारक पुरुष ऐसा नियम करता है कि मैं अमुक दिशा में अमुक समुद्र तक या नमुक नदी तक या अभुक जंगल तक या अमुक देश तक या इतने बोजन तक यातायात करूगा, बाहर नहीं । ऐसा करने से उसकी इच्छाएँ अर्थात् परिग्रह सम्बन्धी अनन्त लालसा अपने याप. सीमित हो जाती हैं और जहां परिग्रह सम्बन्धी इच्छाएं कम हुई वहीं हिसादि पाप स्वयं कम हो जाते हैं । इसलिये दिग्बलय की सीमा प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिये ! ... .......... .......... प्रश्न :--दिग्विरतिनत को धारण करने वाले पुरुषों के मर्यादा के बाहर क्या होता है ?
. .... ....
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१२८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि:
उत्तर :--- दिग्ग्रतों को धारण करने वाले पुरुषों के अणुव्रत की की हुई मर्यादा बाहर सूक्ष्म पापों की भो निवृत्ति हो जाने से पाँच महात्रत रूप परिणति प्राप्त होती हैं ।
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हिरा जतिविरले वनम् । महाव्रत परिणतिमनुव्रतानि प्रपद्यन्ते ।। ५६ ।।
पञ्च
जो मनुष्य दशों दिशाओं में श्राने-जाने की मर्यादा कर दियतों को धारण करते हैं, उनके मर्यादा के बाहर सूक्ष्म पाप भी छूट जाते हैं, इसलिये उनके अणुव्रत महाप्रत जैसी अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं ।
विशेषार्थ :- प्रणुग्रत धारण करने वाले जीवों का मर्यादा के भीतर गमनागमन जारी रहता है, इसलिये हिंसादि पापों का स्थूल रूप से ही त्याग हो पाता. है । परन्तु मर्यादा के बाहर गमनागमन बिल्कुल ही छूट जाता है, इसलिये मर्यादा के बाह्य क्षेत्र में उनके अणुव्रत महात्रतपने को प्राप्त हो जाते हैं ।
प्रश्न :- गुणव्रतों में महाव्रतों की परिणति कैसे है ?
उत्तर :- प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ को मन्द उदय होने से अत्यन्तं मन्द अवस्था को प्राप्त हुए, यहां तक कि जिनके अस्तित्व का निर्धारण करना भी कठिन है, ऐसे चारित्र मोह के परिणाम महावृल के व्यवहार के लिये उपचरित: होते हैं - कल्पना किये जाते हैं ।
• प्रत्याख्यानतनुत्वान्मन्दतराश्चरण मोह परिणामाः । सत्त्वेन दुखधारा महाव्रताय प्रकल्प्यन्ते ॥५७॥ ॥
'नामर्कदेशेन सर्वदेशी गृह्यते' नाम के एक देश से सर्वदेश का ग्रहण होता है, इस नियम से जिस प्रकार भीम पद से भीमसेन का बोध होता है । उसी प्रकार यहाँ प्रत्याख्यान शब्द से प्रत्याख्यानावरण द्रव्य क्रोध, मान, माया, लोभ का ग्रहण होता है, क्योंकि प्रत्याख्यान शब्द का अर्थ विकल्पपूर्वक हिसादि पापों का त्याग रूप संयम होता है । उस सँयम को जो प्रावृत करते हैं, अर्थात् जिनके उदय से यह जीव हिंसादि पापों का पूर्ण त्याग करने के लिए समर्थ नहीं हो पाता है, वे प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ कहलाते हैं । यह वय और भाव के भेद से दो प्रकार के होते हैं कर्म प्रवृत्ति को द्रव्य प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ कहते हैं। और उनके उदय से श्रात्मा में जो हिसादि पापों के त्याग न करने रूप भाव होते हैं,
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अध्याय : पांचवां ] उन्हें भाव प्रत्याख्यानावरग क्रोध, भान, माया, लोभ कहते हैं । जब गृहस्थ के इन प्रकृतियों का इतना मन्द उदय हो जाता है कि चारित्र मोह के परिणामों का अस्तित्व भी बड़ी कठिनाई से समझा जाता है, तब उनके उपचार से महावत जैसी अवस्था हो जाती है । दिग्वत के धारक जीव के मर्यादा के बाहर के क्षेत्र में हिंसादि पापों की स्थल तथा सूक्षम दोनों प्रकार की निवृत्ति हो जाती है, इसलिये उनके अणुवत्त महाव्रतपने को प्राप्त होते हैं, परमार्थ से नहीं। परमार्थ से व्यवहार तभी हो सकता है, जब उसके प्रत्याख्यानावरण काय का मन्द उदय भी दूर हो जाये। .
विशेषार्थ :--मोहनीय कर्म के दर्शन मोहनीय और चारित्र.मोहनीय की अपेक्षा दो भेद हैं। उनमें दर्शन मोहनीय आत्मा के सम्यग्दर्शन गुण का घात करता है : और चारित्र मोहनीय. चारित्र गुण का घात करता है। चारित्र मोहनीय कर्म के कषाय बंदनीय और अकषाय वेदनीय की अपेक्षा दो भेद है। इसमें कषाय वेदनीय के अनन्तानुवन्धी, अप्रत्याख्यानावरा, प्रत्याख्यानावर और संज्वलन, कोध, मान, माया, लोभ के भेद मे ४४४ - १६ भेद होते हैं। और हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्री, पुरुष, नासक वेद की अपेक्षा अकाय वेदनीय के नौ भेद हैं । अनन्तानबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ आत्मा के सम्यक्त्व गुण को घातते हैं । यद्यपि ये चारित्र मोह की प्रकृतियाँ है, तथापि इनका उदय रहते हुए सम्यवत्व गुण प्रकट नहीं हो पाता, इसलिये इन्हें पागम में सम्यग्दर्शन का घातक कहा गया है । अप्रत्याख्याना : 'बरगा क्रोध, मान, माया, लोभ, एवदेश चारित्र को धातने हैं अर्थात् इनका उदय . . . रहते हुए श्रावक के अतरूप देशचारित्र प्रकट नहीं हो सकता । प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ, सकल चारित्र को धातते हैं, अर्थात् इनवा उदय रहते हुए . . मुनि के अतरूप सकल चारित्र प्रकट नहीं हो सकता और संज्वलन क्रोध, मान, माया, - लोभ, यथास्यात चारित्र को घातले हैं, अर्थात् इनका उदय रहते हुए पूर्ण वीतराग रूप यथाख्यातः चारित्र प्रकट नहीं हो पाता । इन अंन्तानुबन्धी प्रादि चारों कषायों की तीव्रतर, तीन, मन्द और मन्दतर के भेद से चार-चार प्रकार की अनुभाग दशा होती है । अनन्तानुबन्धी प्रादि प्रकृतियों के तीतर आदि अवस्थाओं का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अनन्तानुबन्धी के उदय से सहित एक जीव निर्गन्थं साधु का घात करने के लिए प्रवृत होता है और एक स्वयं निर्ग्रन्थ साधु वनकर अट्ठाइस मूलगुरगों का पालन करता हुआ कोलू में पेल देने पर भी संबलेश का अनुभय नहीं करता।
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[ गो. प्र. चिन्तामगि
एक जीव अनन्तानुबन्धी के उदय काल में सातवें नरक की तैतीस सागर की आयु का बन्ध करता है और एक जीव अनन्तानुबन्धी के उदय काल में नौवें ग्रेवेयक के अहमिन्द्र की इकतीस सागर की आयु का बन्ध करता है । यद्यपि अन्तानुबन्धी यादि कपायों के मन्दोदय के काल में इस जीव की अणुप्रत या महाव्रताचरण रूप परिणति
हो जाती है, परन्तु करगानुयोग उसे अणुनताचरण या महावताचरण रूप से स्वीकृत ... नहीं करता । वह तभी स्वीकृत करता है, जब कि प्रतिपक्षी कषाय का अनुदय हो जाता
है । यहां प्रकरण यह है कि दिग्यत के धारक जीव के अणुअत मर्यादा के बाद क्षेत्र में महावत जैसी परिणति को क्यों प्राप्त होते हैं ? उत्तर यह दिया गया है. कि .. प्रत्याख्यानावरण शोध, मात, माया, लोभ को अत्यन्त मन्द. उदय रहने से उसके .. उपचार से महाप्रत जैसा व्यवहार होता है, परमार्थ से नहीं। ........
प्रश्न :--उपचार का महावत, साक्षात महावत क्यों नहीं होता? :
उत्तर :--हिंसा प्रादिक पांच पापों का मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना से त्याग करना प्रमत्त विरत-पादि गुरगस्थानवी महापुरुषों का महावन होता है।
पञ्चानां पापानां हिसादोनां मनोयचः कार्यः । कृतकारितानुमोदैस्त्यागस्तु महावतं महत्ताम् ।।५।।
पाप बन्ध में कारगाभुत हिमा, असत्य, चोरी, अबम और परिग्रह इन पांच पापों का कृत, कारिल, अनुमोदना और मन, वचन, काय इन नौ कोटियों से त्याग करना महावत कहलाता है । यह महाव्रत प्रमत्त संयतादि गुगास्थानवर्ती मुनियों के ही
होता है, अन्य के नहीं। . . ... विशेषार्थ :--'महन्च तत् प्रतञ्चेति महावतम्'--. इस विग्रह के अनुसार जो. - स्वयं महान् है-उत्कृष्ट हैं, उन्हें महाउत कहते हैं । संसार के अधिकांश प्राणियों की.
प्रवृत्ति हिसादि पार पापों में हो रही है और उसके कारण वे पाप कर्मों का यन्ध कर . इसी संसार में भ्रमण करते रहते हैं । कुछ ही प्राणी इन हिसादि कार्यों को पाप समझ
कर उनका परित्याग करते हैं । त्याग करने वाले पुरुषों को आचार्यों ने 'महान' संज्ञा दी है तथा उनके इस कार्य को महाअत' नाम दिया है । जो पाप स्वयं किया जाता है, . उसे कृत कहते है । जो दूसरों से कराया जाता है, उसे कारित कहते हैं और किसी के
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है. अध्याय : पांचवां ]
करने पर जिसकी प्रशंसा की जाती है, इसे अनुमोदित कहते हैं । ये तीन कार्य मन से, बबन में, काय से होते हैं। इसलिए सब मिलाकर ३.x३ - १ कोटियों से होते हैं ! यह .. महायत १. अहिंसा महावत, २. सत्य महावत. ३. प्राचार्य महावत, ४ वह्मचर्य महावत
और परिग्रह त्याग महावत के भेद से पाँच प्रकार का होता है । इसका प्रारम्भ प्रमत्तसंयल नामक छठवें गुणस्थान से ही होता है। इसके पूर्व पञ्चम गुणस्थानयती जीन का दत अंगुवृत कहलाता है। इसके पूर्ववर्ती बार गुणस्थान वर्ती जीव भवती कहलाते हैं । अर्थात् उनमें कोई वत नहीं होता । यद्यपि अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावर पाय का मन्द उदय होने से किन्हीं जीवों के ग्राणुवेतों और महावतों का. अाचरण होने लगता है, पर करमानुयोग उन्हें अणुबूत और महाव्रत नहीं मानता ।
मान : विमात ने अतिसार कौन हैं ? ..
उत्तर :--अज्ञान अथवा. प्रमाद से ऊपर, नीचे और तिर्यक् अर्थात् समान धरातल की सीमा का उल्लंघन करना, क्षेत्र का बढा' लेना और की हुई सीमाओं का भूल जाना ये पांच दिग्विरति दूत के अतिचार माने जाते हैं।
ऊर्ध्वधस्तात्तिर्यग्व्यतिपाताः क्षेत्र वृद्धिखधीनाम् । विस्मरणं दिग्विरत्याशाः पञ्च मन्यन्ते ॥५६॥
ऊपर पर्वत आदि पर चढ़ते समय, नीचे कुभा, बावड़ी या खान आदि में उतरते समय और तिर्यग् अर्थात् धरातल पर चलते समय प्रमाद अथवा अजान के कारण सीमा का उल्लङ्घन करना, · प्रमाव और अज्ञान से किसी दिशा का क्षेत्र बढा लेना और वृत लेते समय दशों दिशाओं में आने-जाने की जो सीमायें निश्चित की थी, उन्हें भूल जाना ये पांच दिग्विरति वृत के अतिचार माने जाते हैं।
विशेषार्थ :- जैसे किसी ने नियम किया कि मैं दस हजार फुट तक ऊपर जाऊँगा, परन्तु किसी पर्वत पर चढ़ते समय या वायुयान से यात्रा करते समय इस नियम का ध्यान नहीं रखा और की हई मर्यादा से अधिक ऊँचाई तक चला गया, यह ऊर्ध्वव्यतिपात नाम का अतिचार है। इसी तरह किसो ने नियम किया कि मैं इतने फुट तक नीचे जाऊँगा, परन्तु कुमां या खान आदि में उतरते समय उस नियम का ध्यान नहीं गयखा, यह अंवस्ताद् व्यतिपात नाम का अतिचार है । यही बात समान - धरातल पर की हुई सीमा के विषय में समझना चाहिये । क्षेत्र वृद्धि का अर्थ यह है
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
कि जैसे किमी ने चारों दिशाओं में पचास-पचास कोश तक जाने का नियम किया; परन्तु नियम करने वाद पूर्व दिशा में ५० कोश को दूरी पर अच्छा कारखाना खुल गया वहां से माल लाने में अधिक लाभ होने लगा और पश्चिम दिशा में ऐसा कोई. कारखानां नहीं, अतः नियम लेने वाला पूर्व दिशा की सीमा ६० कोण कर लेता है और पश्चिम दिशा की सीमा घटा कर ४० कोश कर लेता है । यहाँ क्षेत्रफल की अपेक्षा तो प्रतिज्ञा का पालन हुआ, परन्तु प्रतिज्ञा करने का मूल उद्देश्य जो प्रारम्भ और लोभ कम करने का था उसका भङ्ग हो गया । अतः भंगाभंग की अपेक्षा प्रतिचार माना गया है । सीमा के विस्मरण का अभिप्राय ऐसा है, जैसे- किसी ने नियम लिया है कि मैं अमुक दिशा में ४० कोश तक जाऊँगा, पीछे वह नियम भूल कर कहने लंगा कि मैंने नियम ४० कोश तक का लिया था या ५० कोश तक का ऐसी दुविधाकी स्थिति में ४० कोश से आगे जाने में यह प्रतिचार होता है । इसी को तत्त्वार्थ सूत्रकार ने स्मृत्यन्तराधान कहा है, अर्थात् की हुई स्मृति के बदले दूसरी स्मृति का
धारण करना ।
प्रश्न :- - द्वितीयगुणव्रतों में अनर्थदंड का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :--- बूत धारण करने वाले सुनियों में प्रधान तीर्थंकरदेवादि दिग्वृत की सीमा के भीतर प्रयोजन रहित पाप सहित योगों से निवृत्त होने को ग्रनर्थदण्डबूत जानते हैं ।
अभ्यन्तरं दिगवधेरपार्थकेभ्यः सपापयोगेभ्यः ।
विमर्थ दण्डवतं विदुर्व्रत धराग्रण्यः ॥ ६०॥
व्रतचर का अर्थ पञ्च महावृतों को धारण करने वाला मुनि होता है । उन मुनियों में जो अग्रणी प्रधान हैं, वे वृतघरायसी कहलाते हैं । इस तरह मुनियों में प्रधान तीर्थंकर देव ग्रादि ने अनर्थदण्डवृत का लक्ष इस प्रकार कहा हैं कि दिग्विरतिवृत की मर्यादा के भीतर प्रयोजन रहित पाप पूरा मन, बचन, काय के व्यापार रूप योगों से निवृत होना अनर्थदण्डत है । दिग्वृत में मर्यादा के बाहर होने वाले पापपूर्ण निरर्थक कार्यों से निवृत्ति होती है और अनर्थदण्डवत में दिग्वत की सीमा के भीतर होने वाले पाप पूर्ण निरर्थक कार्यों से निवृत्ति होती है। यह इन दोनों में अन्तर है ।
विशेषार्थ :
'श्रपगतः श्रर्थः प्रयोजनं येषां ते अपार्थकारतेभ्य:' इस समास के
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[ १३३
अध्याय पांचवा ]
कहते हैं।
अनुसार जिनका कुछ भी प्रयोजन नहीं है, उन्हें प्रवृत्तिर्दण्डः योगों की प्रवृत्ति को दण्ड कहते हैं अर्थात् मन से विचार करना वचन से उपदेश देना और शरीर से कुछ कार्य करना दण्ड कहलाता है । यह दण्ड जब पाप से युक्त होता है, तब अपराध कहलाता है। जैसे किसी के विषय में खोटा चिन्तन करना, पाप कर्मो का उपदेश देना तथा प्रमाद पूर्वक शरीर से प्रवृत्ति करना श्रादि, जिन कयों से अपना कुछ भी प्रयोजन नहीं है, ऐसे कार्यों से दूर रहना अनर्थदण्डवत नाम का दूसरा गुणवृत कहलाता है ।
प्रश्न : ---- अनर्थदंड क्या है ?
उत्तर :- गणधर देवादिक पापोपदेश, हिंसादात, अपध्यान, दुःश्रुति और इन पांच को अनर्थदण्ड कहते हैं ।
पापोपदेश हिंसा दानापध्यान दुश्रुतीः प्राहुः प्रमाद मनर्थ दण्डान् दण्ड
मन-वचन-काय के शुभ व्यापार को दण्ड कहते हैं क्योंकि, वे दण्ड डंडे के समान दूसरों को पीड़ा करते हैं । तथोक्त दण्डों को न धारण करने वाले गणधर देव यादि ने पापोपदेश, हिसादान, ग्रपधान, दुःश्रुति और प्रमादचर्या इन पाँच को अनर्थदण्ड कहा है। इनसे निवृत्ति होना सो पाँच प्रकार का अनर्थदण्ड वृत है ।
पञ्च ।
धराः ॥ ६१ ॥
विशेषार्थ -- पाप का उपदेश देना और पाप का उपदेश सुनना ये दोनों कार्य वचन योग की दुष्प्रवृत्ति रूप है । खोटा चिन्तन करना, यह मनोयोग की दुष्प्रवृत्ति है। और हिंसा के उपकरण दूसरों को देना तथा प्रमाद पूर्वक शरीर की प्रवृत्ति करना, यह काय योग की दुष्प्रवृत्ति है। इस प्रकार तीनों योगों की दुष्प्रवृत्तिरूप पाँच कार्य होते हैं - १ पापोपदेश, २. हिंसादान, ३. अपध्यानं, ४ दुःश्रुति ५, प्रमादचर्या ये पाँच कार्य प्रर्थदण्ड हैं । इनसे व्यर्थ ही पाप का बन्ध होता है, इसलिए बूती मनुष्य इनसे निवृत होकर पाँच प्रकार के प्रनर्थदण्डवत को धारण करता है ।
प्रश्न : - पापोपदेश अनर्थ दंड का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- पशुओं को क्लेश पहुंचाने वाली क्रियाएँ, व्यापार, हिंसा, प्रारम्भ तथा ठगाई आदि की कथायों के प्रसंग उत्पन्न करना पापपदेश नाम का अर्थदण्ड स्मरण करने के योग्य हैं ।
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। गो. प्र. चिन्तामणि ... तिर्यक् क्लेश वरिराज्यहिंसारम्भ प्रलम्भनादीनाम् । .
कथा प्रसङ्गः श्सवः समर्तव्यः पाप उपदेशः ।।६२॥ .. जो उपदेश पाप के उपार्जन में कारण हो उसे पापोपदेश कहा है । तिर्यक्चलेश
नादि उसके भेद हैं । हाथी सादि को वश में करने की प्रक्रिया तिर्यकलेश है, लेन-देन यादि व्यापारियों को नारिणज्या है, प्रागिरावध करना हिंसा है, खेती अादिक प्रारम्भ है,
तथा दूसरों को किस तरह ठगना प्रादि की कला प्रलम्भन है। तिर्यश्वलेश के समान ... मनुष्यालेश भी होता है, अर्थात् ऐसी क्रियाएँ जिनसे कि मनुष्य को क्लेश होता है।
इन सबकी कथाओं का उपस्थित करना अर्थात् बार-बार इनका उपदेश देना सो पापोपदेश नामक अनर्थदण्ड है। इसका परित्याग करने से पापोपदेश अनर्थदण्डवत होता है 1
.. विशेषार्थ-कहीं-कहीं पापोपदेशा अनर्थदण्ड का ऐसा भी व्याख्यान किया। जाता है-'वले शतिर्मग्दगिज्यावधकारम्भ कादिषु पाप संयुतं वचनं पापोदेशः अर्थात् क्लेश वरिषज्या, तिर्यम्बगिाज्या, व कोपदेश और प्रारम्भकोपदेश इस प्रकार के
पाप संयुक्त जो वचन है, उन्हें. पापोपदेश कहते हैं । इस देश में दाम और दासियाँ ... सुलभ हैं। उन्हें अमुक देश में ले जाकर बेचने में अधिक लाभ होता है ऐसा उपदेया
देता क्लेशवगिज्या है । गाय, भैंस आदि को अमुक देश में खरीदकर अमुक देश में ले जाकर बेचने में अधिक लाभ होता है. ऐसा उपदेश तिर्यग्बगिज्या है । वागुरिकभृगादिक को पकड़ने के लिए जाल फैलाने वाले; शौकरिक सनर आदि का शिकार करने वाले और शाकृनिक-पक्षियों को मारने वाले लोगों को यह उपदेश देना कि. अमुक स्थान पर मृग, शूकर तथा पक्षी आदिक 'अधिक हैं बधकोपदेश है। और किसान आदि प्रारम्भ कामों को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा वनस्पति का प्रारम्भ इस उपाय से करना चाहिये, ऐसा उपदेश देना प्रारम्भकोपदेश है, इस श्लोक का उत्तरार्थ 'ध' प्रति में इस प्रकार है, 'प्रलवः कथा प्रसंग: पाप उपदेश:' इस पाठ में शलोक का अर्थ इस प्रकार होला है-तिर्ययमलेश आदि को उत्पन्न करने वाली कथानों । का जो प्रसंग है, उसे पापोपदेश जानना चाहिये । संस्कृत टीका के द्वारा भी इस पाठ का समर्थन होता है।
प्रश्न :---हिसादान क्या है ? उत्तर :----गणवरदेवादिक विज्ञपुरुष फरसा, तलवार, कुदारी, अग्नि, शस्त्र,
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अध्याय पाचवां |
[ १३५
far तथा सांकल ग्रादिक हिंसा के कारणों के दान को हिंसादान नाम का अर्थदण्ड कहते हैं ।
परशु कृपाणखनिज्वलना युध श्रङ्गिः
खलादीनाम् ।
दहेतुनां दानं हिंसादानं ब्रुवन्ति बुधाः ॥६३॥ | फरसा तथा कुल्हाड़ी यादि को परशु कहते हैं। • जमीन खोदने के साधन ती कुदारी, फावड़ा यादि को ज्वलन कहते हैं, छुरी, लाठी, भाला आदि को प्रायु शृी कहते हैं। और बन्धन के साधन को कारण हैं । इनका दूसरों के लिये देना सो हिसादान अर्थदण्ड है । इनका त्याग करना हिंसादानन्यनर्थदण्ड ग्रत है।
तलवार को कृपाण कहते हैं, खनित्र कहते हैं । अनि को कहते हैं. विष सामान्य को कहते हैं | ये सब हिसा के
विशेषार्थ -- यद्यपि व्रती मनुष्य स्वयं के उपयोग के लिये परशु तलवार तथा गेंती, फावड़ा यादि हिंसा के उपकरणों को रखता है और सावधानी के साथ • उनका उपयोग करता है । परन्तु वह दूसरों के लिये मांगने पर नहीं देता, क्योंकि वह दुरुपयोग नहीं करेगा, इसका विश्वास नहीं है। यदि कोई परदेशी मनुष्य भोजन बनाने. . के लिये अग्नि मांगता है, तो उसके लिये अग्नि देना इस अनर्थदण्ड में नहीं आता है । प्रश्न :- ग्रपध्यान का स्वरूप क्या है ?
उत्तर :
बन्धन
- जिनागम में निपुण पुरुष, द्वेष के कारण किसी के वन, और छेद यादि का तथा राग के कारण परस्त्री यादि का चिन्तन करने को अपध्यान कहते हैं ।
वध
बन्धच्छेदादेव षात्रागाच्च परकलत्रादेः । ध्यानमध्यानं शासति जिनशासने विशदाः || ६४ || द्वेष के कारण किसी के मर जाने, बँध जाने जाने आदि का और राग के कारण परस्त्री ग्रादि का अपध्यान नामक अर्थदण्ड है, ऐसा जिनशासन के ज्ञाता पुरुष कहते हैं ।
विशेषार्थी— ( श्रपकृष्ट ध्यानम् अध्यानम् ) इस व्युत्पत्ति के अनुसार अपध्यान का अर्थ खोटा ध्यान होता है । खोटा व्यान राग द्वेष के कारण होता है । राग के वशीभूत होकर परस्त्री यादि का ध्यान होता है और द्वेष के कारण किसी के
rear गोपाङ्ग के छिद ध्यान- बार-बार चिन्तन सो
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१३६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामगिः
मर जाने, बँध जाने अथवा छिद जाने आदि का विचार होता है। यह सब अपध्यान है-मनोयोग की दुष्प्रवृत्ति है । किसी की हार-जीत का विचार भी इसी अपध्यान में ग्राता है । इसे पाप बन्ध का कारण जानकर व्रती मनुष्य इससे दूर रहता है । यह अपध्यान-अनर्शदण्डवत है ।।
प्रश्न :--दुश्र तिका का क्या स्वरूप है ? -
उत्तर --प्रारम्भ, परिग्रह, साहस, मिथ्यात्व, द्वेष, राग, अंहकार और काम के द्वारा चित्त को कलुषित करने वाले शास्त्रों का सुनना दुश्रुति नाम का अनर्थ
दण्ड है।
प्रारम्भसङ्ग साहस मिथ्यात्व हुष राग मदभवनैः ।। चेतः कलुषयतां श्रु तिरवधीनों दुःशुति भवति ।।६५॥
खेती आदि को प्रारम्भ कहते हैं, और परिग्रह को संग. कहते हैं। इन दोनों का वर्णन जातानीति में किया गया है, क्योंकि. 'कृषिः पशुपाल्यं वाणिज्यं च वार्ता इत्यभिधानात्' अर्थात् खेती, पशुपालन और व्यापार यह सब बार्ता है, यह कहा गया है । अर्थशास्त्र को वार्ता कहते हैं । साहस का अर्थ अत्यन्त याश्चर्य जनक कार्य है । इसका वर्णन वीर मनुष्यों की कथा में किया जाता हैं । अद्वैतवाद तथा अणिकवाद मिथ्यात्व है । इसका वर्णन प्रमाण विरुद्ध अर्थ के प्रतिपादक शास्त्र के । द्वारा किया जाता है । द्वेष का अर्थ प्रसिद्ध है। यह द्वेष विद्वेषीकरणा-द्वेष उत्पन्न करने वाले शास्त्र के द्वारा कहा जाता है। वणीकरण आदि शास्त्र के द्वारा राग उत्पन्न । किया जाता है, मद अहंकार को कहते हैं। इसकी उत्पत्ति . 'वर्णानां ब्राह्मणो गुरु वर्गों का ब्राह्मण गुरु है, इत्यादि ग्रन्थों से जानी जाती है। मदन का अर्थ काम है। यह रतिगुगा बिलास पताका आदि शास्त्रों से उत्कृष्ट होता है । इस प्रकार प्रारम्भ प्रादि के द्वारा चित्त को कलुषित करने वाले शास्त्रों का श्रवरणं करना दुःश्रुति नारक अनर्थदण्ड है.। इसका त्याग करना दुःश्रुति अनर्थदण्डवत है । . : ..
विशेषार्थ----जो शास्त्र प्रारम्भ, परिगह, अद्भुत कार्य, मिथ्यात्व, द्वेष राग, . अहंकार और काम की उत्कटता से चित्त को कलुपित करते हैं, उन्हें दुःश्रुति कहते हैं ।
इनके सुनने का त्याग करना दुःश्रुति नामक अनर्थदगडात है। व्रती मनुष्य सदा ऐसे . ही शास्त्रों का स्वाध्याय करता है, जिससे उसे अपने सर्वज्ञ-बीतसंग स्वरूप की नाही
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आदि को वृद्धि होती
अध्याय : पांचवां ]
दृढ़ हो जाये । इसके विपरीत जिन शास्त्री के सुनने से
है, वे सब कुशास्त्र हैं, बती मनुष्यों को इन सब का त्याग करना चाहिये । प्रश्न :- प्रसादचर्या का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- निष्प्रयोजन पृथ्वी, पानी, अग्नि और वायु का आरम्भ करना वनस्पति का छेदना, स्वयं घूमना श्रीर दूसरों को घुमाना इन सबको प्रमादचर्या नाम का अर्थदण्ड कहते हैं ।
क्षितिसलिल दहनपवनारम्भं विफलं वनस्पतिच्छेदम् ।
सरणं सरणमपि च प्रमादचर्या प्रभाषन्ते ||६६||
व्यर्थ ही पृथ्वी को खोदना, पानी को बिखेरना, ग्रग्नि को जलाना; वायु को रोकना, फल फूल पत्ती आदि को तोड़ना, स्वयं निष्प्रयोजन घूमना और दूसरों को भी निष्प्रयोजन घुमाना यह सब प्रमादचर्या नामक अर्थदण्ड है। इससे निवृत्त होने को प्रमादत्रय अर्थदण्डव्रत कहते हैं ।
विशेषार्थ - कितने ही लोग पृथ्वी को निष्प्रयोजन खोदने लगते हैं, पानी . सींचने लगते हैं अथवा तालाब, नदी में घंटों तैरते रहते हैं, अग्नि को प्रज्वलित करते हैं, पंखा यदि चलाकर वायुकायिक जीवों को त्रास देते हैं, अथवा सिरहाने या गद्दा आदि में हवा भर कर उस पर शयन करते हैं, अनावश्यक फूल - फल, पत्ती आदि को तोड़कर वनस्पतिकायिक जीवों का घात करते हैं, स्वयं निष्प्रयोजन घूमते हैं। और दूसरों को भी निष्प्रयोजन घूमने के लिये प्रेरणा करते हैं । उनका यह सब कार्य . प्रमादचर्या अर्थदण्ड में याता है। यह ठीक है, कि अशुधत के वारक मनुष्य को स्थावर हिंसा का त्याग नहीं है । परन्तु अनावश्यक स्थावर हिंसा मुझसे न हो जाये, इस बात का ध्यान उसे रखना आवश्यक है । प्रमादात् चर्या प्रमादचर्चा इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रमादपूर्वक जितनी प्रवृत्ति है, वह सब प्रमादच अर्थदण्ड में गर्भित है । वृती मनुष्य इनका त्याग कर प्रसादचर्या अनर्थदण्डवत को धारण करता है ।
प्रश्न :- अनर्थ दंड विरती व्रत के पांच प्रतिचारों का क्या स्वरूप ? उत्तर :- राम की तीव्रता से हास-परिहास में भद्दे वचन बोलना शरीर की " कुचेष्टा करना बकवाद करना भोगपभोग की सामग्री का अधिक संग्रह करना और प्रयोजन का विचार किये बिना ही किसी कार्य का अधिक आरम्भ करना वे पांच दण्डविरति वृत के अतिचार हैं ।
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।
[ गो. प्र. चिन्तामणि कन्दर्प कौत्कुच्यं मौखर्यमति प्रसाधनं पञ्च । असमीक्ष्य चाधिकरणं व्यतीतयोऽनर्थदण्डकृद्विरतेः ।।
यद्यपि कोष में कंदर्प का अर्थ काम है, परन्तु यहां काम को उत्तेजित करने वाले भद्दे वचन बोलना कंदर्प माना गया है। भ बचन बोलते हुए हाथ आदि अंगों में शरीर की कुचेष्टा करना कौत्कुच्य कहलाता है । अावश्यकता से अधिक निष्प्रयोजन बहुत बोलना मौर्य कहलाता है। जितने पदार्थ से अपने उपभोग और परिभोग की पूर्ति होती है, उससे अधिक का संग्रह करना अति प्रसाधन कहलाता है,
तथा असमीक्ष्य-प्रयोजन का विचार किये बिना ही अधिक कार्य का करना असमीक्ष्या. धिकरण है । ये पांच अनर्थदण्डविरति वृत के अतिचार हैं। -
विशेषार्थ हमजोली चार मित्र इकटु बैठने पर हंसी-मजाक करते हए भ-भ बचन बोलकर अपनी वर्गणा का दुरुपयोग करता है। साथ ही संभोगादि का . संकेत करते हुए शरीर की भट्टी चेष्टा करते हैं । मित्र गोष्ठी में बैठकर घपटों गपशप:
करते रहते हैं। स्नानादि के लिये तालाब या नदी यादि को जाते समय तेल अादि शृङ्गगार सामग्री इतनी अधिक ले जाते हैं, जो अपनी प्रावश्यकता से अधिक होती है, तथा दूसरे लोग उसका उपयोग कर जीव घात करते हैं। कितने ही लोग अपना खुद का प्रयोजन थोड़ा होने पर भी प्रारम्भकर्ताओं से अधिक आरम्भ कराते हैं। उनके यह सब काम गृहीत व्रत को मलिन करने के कारण अतिचार माने गये हैं । उमा स्वामी महाराज के उपभोग-परिमोगानविय के स्थान पर संमन्तभद्र स्वामी ने अतिप्रसाधन शब्द का प्रयोग किया हैं । परन्तु यह शब्दभेद: ही है, अर्थभेद नहीं ।
प्रश्न :--भोगोपभोग परिमारण नामक व्रत का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :--विषयों के परिमाण के भीतर विषय सम्बन्धी राग से होने वाली प्रासक्तियों को कृश करने के लिए प्रयोजनभूत भो इन्द्रिय विषयों का परिगणमन करना-सीमा निर्धारित करना भोगपभोग परिमारा नाम का गुगावत है ।
अक्षार्थानां परिसख्यानं भोगोपभोग परिमाणम् । अर्थवतामध्यवधी रागरतीनां तनु कृतये ॥६७।।
परिग्रह परिमाणवत की जो सीमा निर्धारित की थी, उसके भीतर विषय सम्बन्धी राग के तींब उदय से होने वाली प्रासक्तियों को अत्यन्त कृश करने के लिये
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अध्याय : पांचवां ]
[ १३
"fare प्रयोजन को सिद्ध करने वाले भी इन्द्रिय सम्बन्धी विषयों का जो परिसंख्यान' नियम किया जाता है, वह भोगोपभोग परिमाण नाम का सुबूत है टीकाकार ने 'अर्थवतामपि' शब्द का एक अर्थ यह किया है कि अर्थ परिग्रहरहित मुनि इन्द्रियों का परिणमन करते ही हैं, परन्तु ग्रर्थवान् परिग्रह सहित गृहस्थ भी इन्द्रिय विषयों का जो परिगमन करते हैं, वह भोगोपभोग परिमाणवूत कहलाता है ।
विशेषार्थ- परिग्रह परिमाणबूत में भोग और उपभोग की वस्तुओंों की जो संख्या निश्चित की जाती है, उनका प्रतिदिन उपभोग नहीं होता, इसलिये उस सीमा को और भी संकुचित करने के लिये भोगपभोग परिमाण वृत धारण किया जाता है।
नाद पांच इन्द्रियों के विषय भूत जो पदार्थ हैं, वे संक्षेप में भोग-उपभोग नाम से व्यवहृत होते हैं । विषय सम्बन्धी रोग की तीता से विषयों में जो प्रासक्तियाँ बढ़ती रहती हैं, उन्हें कम करने के लिये वृती मनुष्य इन्द्रिय विषयों की सीमा को और भी संकुचित करता है । भोग और उपभोग में जो अभक्ष्य प्रथवा ग्रनुपसेव्य पदार्थ हैं, उनका तो जीवन पर्यन्त के लिये त्याग होता है और जो भक्ष्य तथा उपसेव्य हैं, उनका जीवन पर्यन्त के लिये अथवा कुछ काल के लिये भी परिगणन किया जाता है । अभक्ष्य के पांच प्रकार हैं- १. नसघात र प्रमाद, ३. बहुवात, अनिष्ट और ५. अनुपसेच्य । जो मनुष्य त्रसहिंसा का त्याग करना चाहता है, उसे मधु और मांस का त्याग करना चाहिये, क्योंकि उस की उत्पत्ति वास घात के बिना नहीं होती । जो सघात के साथ प्रमाद का परित्याग करना चाहते हैं, उन्हें मद्य का त्याग करना चाहिये, क्योंकि उसके सेवन से त्रसघात और प्रमाद दोनों उत्पन्न होते हैं। अदरक, मूली, हल्दी आदि के सेवन में बहुधात होता है । अनिष्ट तथा अनुपसेव्य पदार्थों का • सेवन भी संक्लेश का कारण होता है, अतः व्रती मनुष्य इनसे दूर ही रहता है । इसके अतिरिक्त भक्ष्य और उपसेव्य पदार्थों के विषय में भी नियम किया जाता है कि श्राज " इतने ग्रत इतने रस और इतने सचित्त पदार्थों का सेवन करूँगा । इतने वस्त्र, इतने आभूषण तथा इतने शयन श्रासन, वाहन आदि ग्रहणं करूंगा। इस व्रत का उद्देश्य fare raat राग को कम करता है ।
प्रश्न : भोग और उपभोग क्या हैं ?
उत्तर : -- भोजन और वस्त्र को आदि लेकर पञ्चन्द्रियों सम्बन्धी जो विषय
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१४० ]
[ गो: प्र. चिन्तामणि
भोगकर छोड़ देने के योग्य है, भोग है और जो भोगकर फिर से भोगने योग्य, वह उपभोग हैं।
मुक्त्या परिहालयो को भुरका युद्धश्च भोक्तव्यः । उपभोगोऽशन बसन प्रभृतिः पाञ्चेन्द्रियो विषयः ॥६॥
जो पदार्थ एक बार भोग कर छोड़ दिये जाते हैं, फिर से काम में नहीं आते ऐसे भोजन, पुष्प, गन्ध तथा विलेपन आदि पदार्थ भोग कहलाते हैं, जो पहले भोगकर फिर से भोगने में आते हैं, ऐसे वस्त्र, आभूषण आदि उपभोग कहलाते हैं । इनकी सीमा निश्चित करना सो भोगोपभोग परिमाण वृत है।
विशेषार्थ :----'भुज्यते सकृत सेव्यते इति भोगः' जो एक बार सेवन में पाने, सो भोग है और. 'उपभुज्यते भूयो भूयः सेव्यते' जो अनेक बार सेवन में प्रावे, वह उपभोग है । . जैसे भोजन और वस्त्र प्रादि । भोजनादि भोग का दृष्टान्त है और यसनादि उपभोग का।।
प्रश्न :-वृती को छोड़ने योग्य पदार्थ कार से हैं ? . उत्तर :-जिनेन्द्र भगवान के चरणों की शरण को प्राप्त हुए पुरुषों के द्वारा स जीवों को हिंसा का परिहार करने के लिए मधु और मांस और प्रमाद का परिहार करने के लिए मदिरा छोड़ने के योग्य हैं।
त्रस हति परिहरणार्थं क्षौद्र पिशितं प्रमादपरिहृतये । सद्य च धर्जनीयं जिन चरणौ . शरणमुपयातः ।।६।।
जो जिनेन्द्र देव के चरणों की शरण को प्राप्त हैं अर्थात जैन धर्म धारक हैं : ऐसे श्रावकों को द्वीन्द्रियादिक बस जीवों की हिंसा से बचने के लिए मधु और मांस कर का त्याग करना चाहिए तथा प्रमाद से बचने के लिए मदिरा त्याग करना चाहिए । 'यह माला है अथवा स्त्री है. इस प्रकार के विवेक के अभाव को प्रमाद कहते हैं । . विशेषार्थ :----जैन धर्म धारण करने का प्रारम्भिक नियम है कि मद्य, मास
और मधु का त्याग किया जाये। इसके बिना जैन धर्म का धारण नहीं हो सकता । क्षुद्रा, मधुमक्षिका को कहते हैं । अतः 'क्षुद्राभिः नियंतयः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार मधु-भक्षिकाओं के द्वारा रचा हा पदार्थ क्षौद्र या मधु कहलाता है । इसमें अनन्त अस जोब उत्पन्न होते रहते हैं। और पिशित-मांस द्वीन्द्रियादिक जीवों का कलेवर है । इसकी भी कच्ची तथा पक्की दोनों - अवस्थाओं में अनन्त बस जीव उत्पन्न होते है
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अध्याय : पांचवां ]
[ १४१
हैं। इनके सेवन करने से उन जीवों का घात होता है। इसी प्रकार मद्य भी नस हिंसा का कारण है । साथ ही उसके सेवन से हिताहित का विवेक भी नष्ट हो जाता है। अतः वह भी धावक के द्वारा जीवन पर्यन्त के लिए छोड़ने योग्य है ।।
प्रश्न :-और भी त्यागने योग्य पदार्थ कौन से हैं ? .
उत्तर :--अल्प फल और बहुत स जीवों का विघात होने से मूली, गीला अदरक, मकवन, नीम के फूल और केतकी-केवड़ा के फूल तथा इसी प्रकार के अन्य पदार्थ भी श्रावक के द्वारा छोड़ने के योग्य हैं।
अल्पफल. बहुविधातामूलकमारिग शृंगवेरारिए । नवनीत निम्ब कुसुमं कैतक मित्येवमबहेयम् ।।७।
मूली, गीला अर्थात् विना सूखा अदरक, उपलक्षरण से बालू, घुइयां, गाजर, शकरकंद आदि मयखन, नीम के फूल, उपलक्षण से सभी प्रकार के फूल तथा केतकी के फूल और इसी प्रकार के अन्य पदार्थ भी अल्पफल और बहुत जीवों का घात होने से छोड़ने के योग्य हैं।
- विशेषार्थ :-जिन बस्तुनों के खाने में बस जीवों का धात होता है, वे तो त्याज्य हैं ही। परन्तु जिनमें अनन्त स्थावर कायों का घात होता हैं ऐसो मूली तथा गीली अदरक, घुइयाँ आदि भी त्याज्य हैं। अङ्गुल के असंख्यातवें भाग बराबर अवगाहना के धारक एक निगोद जीव के शरीर में सिहों तथा समस्त भूतकाल के अनन्त गुरिगत जीवों का निवास है । जिह्वा इन्द्रिय सम्बन्धी अल्प सुख के लिए इन सब जीवों का विधात हो जाता है । दूध या दही को मथकर निकाला हुआ मक्खन नवनीत कहलाता है। इसमें अन्तम हत के पश्चात् असंख्य स जीवं उत्पन्न हो जाते हैं । इसी प्रकार नीम आदि फूल में भी इस जीवों के निवास स्थान हैं। केतकी-केवड़ा आदि के फूलों में भी चलते-फिरते अस जीव दिखाई देते हैं । अतः उन फूलों में सुवासित किये हुए कत्था मादि पदार्थ भी श्रावकों के द्वारा छोड़ने योग्य हैं।
प्रश्न :- जो पदार्थ प्रासुफ होने पर भी अनिष्ट और अनुपसेव्य हैं, तो उन्हें क्यों छोड़े?
___उत्तर :-वशोकि जो वस्तु अनिष्ट-अहितकर हो उसे छोड़े और जो सेवन करने
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१४२ ]
[ भो. प्र. चिन्तामरिए
योग्य न हो वह भी छोड़े क्योंकि योग्य विषय में अभिप्राय पूर्वक की हुई निवृत्ति वृत होती है ।
यद निष्ठ तव द्यच्चानुपसेव्य मेतदपि जह्यात् । श्रभिसन्धिकृता विरति विषय द्योंग्यावतं भवति ॥ ७१ ॥
जो वस्तु प्रासुक होने पर भी अनिष्ट है अर्थात् उदरशूल यादि का कारण होने से प्रकृति के अनुकूल नहीं है, उसे छोड़ना चाहिए। इसी प्रकार जो भी गोमूत्र, ऊँटनी का दूध, शङ्ख चूर्ण पान का उगाल, लार, मूत्र, पुरीष तथा खकार आदि वस्तुएँ अनुसेव्य हैं— विष्ट मनुष्यों के सेवन करने योग्य नहीं हैं, उन्हें भी छोड़ना चाहिए, क्योंकि अनिष्टपन और अनुसेन्यपन के कारण छोड़ने के योग्य हैं । विषय से अभिप्राय पूर्वक जो निवृत्ति होती है, वह व्रत कहलाता है ।
विशेषार्थ - मनुष्य को प्रकृति भिन्न भिन्न प्रकार की होती है । कोई वस्तु किसी के लिए लाभ दायक है और किसी के लिए हानिकारक है इस तरह जो वस्तु जिसके लिए हानिकारक हो वह प्रामुक त्रस स्थावर के घात से रहित होने पर भी अनिष्ट कहलाती है । व्रती मनुष्य को इनका त्याग करना चाहिए | इसी प्रकार जो वस्तुएँ शिष्ट मनुष्यों में सेवन में नहीं आती हैं, वे अनुसेव्य हैं । प्रती मनुष्य को इनका भी त्याग करना चाहिए, क्योंकि योग्य विपय का अभिप्राय पूर्वक त्याग किया जाता है, वही व्रत कहलाता है । इस प्रकार व्रती मनुष्य को १ बस चात, २. बहुघात, ३. प्रमादवर्धक, ४. अनिष्ट और ५ अनुसेव्य इन पाँच प्रकार के अभक्ष्यों का त्याग.. करना चाहिए।
प्रश्न : --- परिग्रह त्याग दो प्रकार का कैसे है . ?.
1
उत्तर :---- -भोग और उपभोग के परिमाण का आश्रय कर नियम और यम दो प्रकार से व्यवस्थापित है-प्रतिपादित हैं । उनमें जो काल के परिमाण से सहित हैं, वह नियम है और जो जीवन पर्यन्त के लिए धारण किया जाता है, वह यम कहलाता है ।
नियमो यमश्च विहितौ द्वधा भोगोपभोगसंहारात् ।
नियमः परिमित कालो यावज्जीवं यमो नियते ॥७२॥
• भोग और उपभोग का परिमाण नियम और यम के भेद से दो प्रकार का होता है । जो परिमाण समय की अवधि से लेकर किया जाता है, यह नियम कहलाता
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अध्याय : पांचवां ]
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है और जो जीवन पर्यन्त के लिए धारण किया जाता है, वह यम कहलाता है । विशेषार्थ -- जो वस्तुएँ ऊपर कहे हुए पाँच प्रकार के मध्य की कोटि में आती हैं, उनका तो यम रूप से त्याग करना चाहिए अर्थात् जीवन पर्यन्त के लिए त्याग करना चाहिए और जो ग्रभक्ष्य की कोटि में नहीं श्राती हैं, उनका अपने परिमाण तथा देश-काल की योग्यता देखते हुए नियम और यम दोनों रूप से त्याग किया जाता है 1
प्रश्न :-- भोगोपभोग परिमाण व्रत में परिमित काल वाला जो नियम रूप त्याग है, वो कैसे ?
उत्तर : - भोजन, सवारी, शमन, स्नान, पवित्र ग्रङ्गविलेपन, पुष्प, पान, वस्त्र, आभूषण, काम सेवन, संगीत और गीत के विषय में आज, एक दिन, एक रातअथवा एक पक्ष, एक साह और एक ऋतु दो माह प्रथवा एक छह माह इस प्रकार समय के विभाग पूर्वक त्याग करना नियम होता है ।
भोजन वाहन शयन स्नान पवित्राङ्ग राग कुसुमेषु । ताम्बूल वसन भूषरण मन्मथ संगीत गीतेषु ॥७३॥ ॥ अद्य दिवा रजनी व पक्षों मासस्तयतुं रथनं वा । इति काल परिच्छित्या प्रत्याख्यानं भवेन्नियमः ||७४ ||
भोजन का अर्थ प्रसिद्ध है, घोड़ा यादि को बाहन कहते हैं, पलंग यादि को शयन कहते हैं, स्नान का अर्थ प्रसिद्ध है, अपवित्र वस्तुनों के सम्पर्क से रहित केशर • आदि के विलेपन को पवित्रा राग कहते हैं, यह ग्रङ्गराग अञ्जन तथा तिलक यादि का उपलक्षण है । अङ्गराग के साथ जो पवित्र विशेपर दिया गया है, वह दोषों को दूर करने के लिए दिया गया है । इसलिए सदोष श्रौषध तथा अंगराग का निराकरण होता है । कुसुम का अर्थ प्रसिद्ध है, ताम्बूल पान को कहते हैं, वसन वस्त्र को कहते हैं, कटक यादि को भूचरण कहते हैं काम सेवन को मन्मथ कहते हैं, जिसमें गीत, नृत्य और वादित्र में तीनों होते हैं, उसे संगीत कहते हैं और जिसमें केवल गीत होता है, नृत्य और वादित्र नहीं होते, उसे गीत कहते हैं । इन सबके विषय में समय की अवधि लेकर जो त्याग होता है, वह नियम कहलाता है । जिस दिन में एक घड़ी, एक पहर आदि काल का परिमाण कर त्याग करना आज का त्याग है। दिन और रात्रि अर्थ स्पष्ट है पन्द्रह दिन को पक्ष कहते हैं। तीस दिन को मास कहते हैं ।
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लक
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| गो. प्र. चिन्तामणि
दो मास को ऋतु कहते हैं । एक वर्ष में चैत्र और वैशाख से लेकर दो-दो मासों में क्रम से वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर ये छह ऋतुएँ होती है । उत्तरायण और दक्षिणायन के भेद से वर्ष में छह-छह मास के दो ग्रयन होते हैं । इस प्रकार समय की अवधि रखकर भोजन यादि का त्याग करना नियम कहलाता है । विशेषार्थ :- - मैं आज एक बार या दो बार भोजन करूँगा, आज सवारी पर नहीं बैठूंगा, ग्राज पलंग पर नहीं सोऊँगा, आज एक बार ही स्नान करूंगा, श्राज शरीर में विलेपन नहीं लगाऊँगा, श्राज फूलों की माला नहीं पहनू गा, ग्राज पान बिलकुल नहीं खाऊँगा ग्रथवा इतने परिमाण में खाऊँगा, आज दो वस्त्र अथवा चार, पांच यादि वस्त्र पहनूंगा, ग्राज आभूषण नहीं पहनू गा अथवा इतने आभूषण पहनूंगा, आज काम सेवन नहीं करूंगा, आज संगीत में शामिल नहीं होऊंगा और बाज गीत बन्द रखूंगा । इस प्रकार काल का परिमाग रखकर जो त्याग किया जाता है। वह नियम कहलाता है । और इन्हीं वस्तुओं का जीवन पर्यन्त के लिये जो त्याग होता. है, वह यम कहलाता है ।
प्रश्न : - भोगोपभोगपरिमारगवत के प्रतिचारों का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- विषय - रूपी विष से उपेक्षा नहीं होना अर्थात् उसमें श्रादर रखना, भोगे हुए विषयों का बारम्बार स्मरण करना वर्तमान विषयों में अधिक लम्पटता रखना आगामी विषयों की श्रविक तृष्णा रखना और वर्तमान विषय का अत्यन्त - आसक्ति से अनुभव करना ये पांच भोगोपभोग परिमाण वृत के प्रतिचार कहे जाते हैं ।
विषय विषतोऽनुपेक्षानुस्मृति रति लौल्यमतितृषाऽनुभवी । भोगोपभोग परिमाणव्यतिक्रमाः पञ्च कथ्यन्ते ॥१७५॥
विषय के समान हैं, क्योंकि जिस प्रकार विष, प्राणियों को दाह तथा संताप यादि कराता है, उसी प्रकार विषय भी प्राणियों को दाह और संताप आदि • उत्पन्न कराते हैं । इस विषय रूपी विष से उपेक्षा नहीं होना अर्थात् उनके प्रति श्रार का भाव बना रहना अनुप्रेक्षा नाम का प्रतिचार है । विषयों का अनुभव - उपभोग विषय सम्बन्धी वेदना के प्रतिकार के लिये किया जाता है, सो विषयानुभव से वेदना का प्रतिकार हो जाने पर भी फिर से संभाषण तथा लिन आदि में जो आदर वह प्रत्यन्त श्रासक्ति का जनक होने से प्रतिचार माना जाता है। विषयानुभव
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अध्याय : पाँचवाँ ।
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वेदना का प्रतिकार हो जाने पर भी सौन्दर्य जनित सुख का साधन होने से विषयों का बार-बार स्मरण करना यह अनुस्मृति नाम का अतिचार है । अत्यन्त आसक्ति का कारण होने से यह अतिचार माना जाता है । विषयों में अत्यन्त गुद्धता रखना अर्थात् विषयानुभव से वेदना का प्रतिकार हो जाने पर भी बार-बार उसके अनुभव की अाकांक्षा रखना अतिलौल्य नाम का अतिचार है । आगामी भोगोपभोग आदि की अत्यधिक गृढता के साथ प्राप्ति की आकांक्षा रखना अतितृषा नाम का अतिचार है ! और नियतकाल में भी जब भोग और उपभोग का अनुभव करता है, तब अत्यन्त आसक्ति से करता है, वेदना के प्रतिकार की भावना से नहीं, यह अत्यनुभव नाम का अतिचार है।
विशेषार्थ :-तत्त्वार्थ सूत्रकार उमास्वामी महाराज ने भोगोपभोग परिमारण वत के सचित्ताहार, सचित्त सम्बन्धाहार, सचित्तसंमिचाहार, अभिषवाहार और दुःपक्वाहार ये पांच अतिवार निरूपित किये हैं। भोग और उपभोग की वस्तुएँ अनेक हैं, अतः सबसे सम्बद्ध अतिचारों को दिदी शम्मद जाए उन्होंने मात्र भोजन सम्बन्धी अतिचारों का वर्णन किया है। उपलक्षण से अन्य भोगोपभोग सम्बन्धी अतिचारों की अोर संकेत किया है। परन्तु समन्तभद्र स्वामी ने भोगोपभोग सामान्य को लक्ष्य में रखकर अतिचारों का वर्णन किया है । अनुप्रेक्षा, अनुस्मृति, अतिलौल्य, अतितृषा और अत्यनुभव इनका सम्बन्ध प्रत्येक भोग उपभोग के साथ होता है । अनुप्रेक्षा आदि अतिचार क्यों हैं ? इसका स्पष्टीकरण टीकार्य में किया जा चुका है।
* शिक्षावत* प्रश्न :--शिक्षाव्रतों के नाम कौनसे हैं ?
उत्तर :--देशावकाशिक, सामायिक, प्रोषधोपवास और वैयावृत्य ये चार शिक्षाबूत कहे गये हैं।
देशावकाशिकं वा सामायिक प्रोषधोपवासो वा। वैयावृत्यं शिक्षाब्रतानि चत्वारि शिष्टानि ॥७६।।
श्लोक में जो 'वा' शब्द है, वह परस्पर के समुच्चय अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । शिक्षावृत के चार प्रकार कहे गये हैं.....१. देशावकाशिक, २. सामायिक, ३. प्रोषधोपवास और ४. यावृत्य ! इन सबके स्वरूप ग्रन्धकार स्वयं ही आगे कहेंगे।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि विशेषार्थ :--'शिक्षायै वृतं शिक्षावृतम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार मुनिवृत की शिक्षा के लिये जो वृत होते हैं, उन्हें शिक्षावृत कहते हैं । शिक्षाबत चार हैं, इस विषय में तो सर्व प्राचार्य सहगत है । परन्तु उनके नाम निरिण में प्राचार्यों के विभिन्न मत हैं । सर्वप्रथम कुन्दकुन्द स्वामी ने १. सामायिक, २. प्रोषध, ३. अतिथिपूजा और ४. सल्लेखना इन बार को शिक्षाबत माना है । उमास्वामी ने १. सामायिक, २. प्रोपधोपवास, ३. भोगोपभोग परिमारण और ४. अतिथि विभाग इन चार को शिक्षाक्तः कहा है । समन्त भद्र स्वामी ने १. देशावकाशिक, २. सामायिक, ३. प्रोपधोपवास, और ४. वैयावृत्य इन चार को शिक्षाकत में परिगणित किया है । प्राचार्य वसुनन्दी ने १. भोगपरिमारण, २. उपभोग परिमाया, २. अतिथि संविभाग, ४. सल्लेखना इन चार
को शिक्षानत माना है। चूंकि सामायिक और प्रोषध को तृतीय और चतुर्थ प्रतिमा .. का रूप दिया गया है, इसलिये वसुनन्दी ने इन्हें शिक्षायतों में शामिल नहीं किया है ।
ऋन्दकुन्द स्वामी ने देशाबकाशिका (देशनत) का वर्णन मुग्णनत में किया है। इसी प्रकार समन्तभद स्वामी ने भोगोपभोग परिमारंगबस को भी गुरगनतों में सम्मिलित किया है । कुन्दकुन्द स्वामी की सल्लेख ना को शिक्षानत मानने सम्बन्धी मान्यता अन्य : प्राचार्यों को संमत नहीं हुई, बयोंकि सल्लेबना मरण काल में ही धारण की जा सकती है और शिक्षानत सदा धारण किया जाता हैं । इसी दृष्टि से अन्य प्राचार्यों ने सल्लेखना का वर्णन बारहमतों के अतिरिक्त किया है । इसके स्थान पर उमास्वामी ते अतिथि संविभाग और समन्तभद्र ने बैवावृत्य को शिक्षाबत स्वीकृत किया है, वैयावृत्य, अतिथि संविभाग व्रत का ही विस्तृत रूप है । कुन्दकुन्द स्वामी ने मल्लेख ना को जो शिक्षाधत में सम्मिलित किया है, उसमें उनका अभिप्राय सल्लेखना की भावना से जान पड़ता है, अर्थात् शिक्षाअत में सदा ऐसी भावना रखना चाहिये कि मैं जीवनान्त में सल्लेखना से मरणा कह । ऐसी भावना सदा रक्सी जा सकती हैं।
प्रश्न :----देशवकाशिक शिक्षावत का क्या लक्षण है ?
उत्तर : -- अणुनत के धारक धावकों का प्रतिदिन समय की मर्यादा के द्वारा देश का संकोच किया जाना देशावकाशिक नल होता है ।
देशावकाशिकं स्यात्काल परिच्छेदनेन देशस्य । प्रत्यहमणुक्तानां प्रतिसंहारो विशालस्य ।।७७।। मर्यादित. देश में नियतकाल तक रहना देशावकाश कहलाता है । या
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[ १४७ देशावकाश जिम प्रत का प्रयोजन है, उसे देशावकाशिक व्रत कहते हैं । दिश्वत नामक गणव्रत में जीवनपर्यन्त के लिये जो विशाल क्षेत्र निश्चित किया था, उसमें एक दिन, एक पहर आदि काल की मर्यादा लेकर और भी संकोच करना देशावकायिक शिक्षाबत कहलाता है । वह ब्रत प्रण अत के धारक श्रावको के होता है । 'मानि शागि तानि येषां ते अणुवताः तेवाम्' इस प्रकार समास करने से ग्राणुव्रत का अर्थ श्रावक हो जाता है । .
विशेषार्थ :-श्रावक को प्रतिदिन प्रातःकाल समय की अवधि लेकर अपने यातायात की सीमा निश्चित करना चाहिये, क्योंकि दिग्धत का क्षेत्र जीवनपर्यन्त के लिये होने से विस्मृत होता है । उतने विस्तृत क्षेत्र में प्रतिदिन गमन नहीं होता। इसलिये अपनी उस दिन की आवश्यकताओं को देखकर विस्तृत क्षेत्र को संकुचित कर देना चाहिये ।
प्रश्न :----देशवकाशिकवत में किस प्रकार मर्यादा की जाती है ?
उत्तर :-गणधर देवादिक चिरन्तन प्राचार्य घर, छावनी, गांव और खेल, नदो, वन तथा योजनों को देशावकाशिक शिक्षानत की सीमा स्मरण करते हैं।
गृह हारिमामा क्षेत्र नदीवावयोजनानां च । देशवकाशिकस्य स्मरन्ति सीनां तपोवृद्धाः ।।७।।
'तपसा वृद्धास्तपोवृद्धाः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो तुप से वृद्ध हैं, ऐसे गणधर देवादिक चिरन्तन-... प्राचीन प्राचार्यों का ग्रहण होता है। उन्होंने देशावकाशिक जत की सीमाय बतलाते हुए मर्यादा के रूप में घर, छावनी, ग्राम, खेत, नदी, वन अश्वया योजन का सीमारूप में स्मरण किया है । 'सीम्नाम्' यहाँ पर कर्म अर्थ में
स्मृत्यर्थदयेशां कर्म' इस मूत्र से पाठी विभक्ति का प्रयोग हुआ है । मूत्र का अर्थ इस * प्रकार है-स्मृत्यर्थक धातुएँ तथा दय और ईश धातु के कर्म में. षष्टी विभक्ति
होती है।
विशेषार्थ :- मैं अाज अमुक महानुभाव के घर तक जाऊँगा, मैं अाज नगर में बनी हुई छावनी तक जाऊंगा, मैं आज अमुक गांव तक जाऊँगा, मैं अाज अमुक वन तक जाऊँगा गीर मैं आज इतने योजन तक जाऊँगा, इस प्रकार का नियम प्रतिदिन श्रावक को करना चाहिये । चार कोश का एक योजन होता हैं। जिस प्रकार आजकल मार्ग में माइलस्टोन ----मील के पत्थर गड़े रहते हैं, उसी प्रकार पहले योजन के स्तम्भ
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। गो. प्र. चिन्तामणि बनाये जाते थे । सीमा निर्धारित करते समय योजन के स्तम्भों की भी सीमा निश्चित की जाती थी। आजकल उसके स्थान पर मील के पत्थर की सीमा निश्चित की जा सकती है।
प्रश्न :-देशावकाशिक व्रत में कालावधि का प्रतिपादन किस प्रकार है ?
उत्तर :- गणधर देवादिक बुद्धिमान् पुरुष एक वर्ष एक ऋतु - दो माह, एक अयन - छह माह, एक माह, चार माह, एक पक्ष - पन्द्रह दिन और एक नक्षत्र में को देशावकाशिक व्रत की काल की मर्यादा कहते हैं।
संवत्सरमृतुमयनं मास 'चतुर्माप्त पक्ष मृक्षं च ।। देशावकाशिकस्य प्राहुः कालावधि प्राज्ञाः ।।७६॥
देशाबकाशिक व्रत में काल को मौदा बताते हुए गगाधर देवादिक में एक वर्ष, एक ऋतु, एक अमन, एक माह, चार माहू, एक पक्ष अथवा एक नक्षत्र को कालावधि कहा है । अर्थात् संवत्सर आदि की सीमा लेकर देशावकाशिक व्रत में यातायात का क्षेत्र निश्चित किया जाता है। ऋक्ष नक्षत्र दो प्रकार के होते हैं--- एक चन्द्र भुक्ति की अपेक्षा और दूसरे सूर्य भुक्ति की अपेक्षा । चन्द्र भुक्ति की अपेक्षा, अश्विनी, भरगी आदि नक्षत्र प्रतिदिन बदलते रहते हैं, अर्थात् एक दिन में एक नक्षत्र रहता है और सूर्य भुक्ति की अपेक्षा एक वर्ष में अश्विनी आदि सत्ताईस नक्षत्र कम से । परिवर्तित होते हैं । संवत्सर ग्रादि का अर्थ स्पष्ट है।
. विशेषार्थ :--देशावकाशिक व्रत के क्षेत्र की अवधि का वर्णन पूर्व श्लोक में किया गया था, यहाँ काल की अवधि का वर्णन किया गया है । उसे इस प्रकार । समझना चाहिये कि मैं एक वर्ष तक, अथवा अमुक ऋतु - दो माह तक, एक अयन - छह माह तक, एक माह तक, चार माह तक, एक पक्ष तक अथवा अमुक नक्षत्रं तक इस स्थान से आगे नहीं जाऊँगा । इस प्रकार समय की सीमा निश्चित करना चाहिये । दिग्बत जीवन पर्यन्त के लिये होता है, परन्तु देशावकाशिक अत समय की मर्यादा लेकर धारण किया जाता है ।
प्रश्न :---देशाधकाशिक व्रत के लेने पर मर्यादा के आगे क्या होता है ?
उत्तर :-सीमाओं के अन्त भाग के पागे स्थूल और सूक्ष्म पाँचों पापों का सम्पक प्रकार त्याग हो जाने से देशावकाशिक प्रत के द्वारा भी महानत सिद्ध किये जाते हैं।
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अध्याय : पांचवां ]
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सीमान्तानां परतः स्थूलेतर पञ्च पाप संत्यागात् । देशावका शिकेन च महाव्रतानि प्रसाध्यन्ते ॥८०॥
देशावकाशिक व्रत में जो क्षेत्र और काल की अपेक्षा सीमाएँ निर्धारित की गई हैं, उनके आगे हिंसादि पांच पापों का स्थूल तथा सूक्ष्म दोनों प्रकार से परित्याग हो जाता है, इसलिये दिखत के समान देशावकाशिक व्रत के द्वारा भी महावतों की सावना की जाती है ।
विशेषार्थ --- क्षेत्र मर्यादा में जो गृह, छावनी आदि की मर्यादा ली थी तथा काल मर्यादा में जो संवत्सर आदि की मर्यादा निश्चित की थी; उन मर्यादायों के आगे गमन न होने से स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकार से पांच पापों का परित्याग हो जाता है । इसलिये वहां अणुवृत धारियों के भी महावृत जैसी अवस्था हो जाती हैं । --- देशावकाशिक व्रत के प्रतिचारों का क्या स्वरूप है ?
प्रश्न :---
उत्तर :---प्रेषण, शब्द, आनंयन, रूपाभिव्यक्ति और पुद्गलक्षेप ये पांच देशाकाशिक शिक्षावृत के अतिचार कहे जाते हैं ।
प्रेषण शब्दानयनं रूपाभिव्यक्ति पुद्गल क्षेपौ ।
देशावकाशिकस्य व्यपदिश्यन्तेऽत्ययाः पञ्च ॥८१॥
स्वयं मर्यादित देश में रहकर 'तुम यह काम करो' इस प्रकार कहकर दूसरे को मर्यादा के बाहर भेजना प्रेषण नाम का अतिचार है । मर्यादा के बाहर कार्य करने वाले कार्यकर्ता के प्रति खकार या खाँसी आदि शब्द करना शब्द नाम का प्रतिचार हूँ । मर्यादा के बाह्य क्षेत्र में रहने वाले लोगों को प्रयोजन वश यह आज्ञा देना कि तुम ग्रमुक वस्तु लाओ आनयन नाम का प्रतिचार है। स्वयं मर्यादित क्षेत्र के भीतर स्थित रहकर बाह्य क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को अपना शरीर दिखलाना रूपाभिव्यक्ति नाम का प्रतिचार है और उन्हीं लोगों को लक्ष्य कर कंकड़ पत्थर आदि फेंकना पुद्गल क्षेप नाम का प्रतिचार है | देशावकाशिक व्रत के ये पांच प्रतिचार हैं ।
विशेषार्थ -- व्रत धारण करने का मूल प्रयोजन रागादि भावों का नियन्त्रण प्राप्त करना है । जहाँ इन भावों का नियन्त्रण नहीं हो पाता है, वहाँ व्रत निर्दोष नहीं पलता है उसमें अनेक दोष लगने लगते हैं। उन दोषों का नाम ही अतिचार है ।. देशाकाशक व्रत के अतिचारों का वर्णन इस प्रकार है-किसी ने नियम लिया कि मैं इतने समय तक इस स्थान से यागे नहीं जाऊँगा । नियम के अनुसार वह अपने
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[ गो. प्र. चिन्तामरि
मर्यादित क्षेत्र में स्थित है, परन्तु राग की उसे दूसरे लोगों को मर्यादा के बाहर भेजकर अपना प्रयोजन सिद्ध करता है । यहाँ कृत की अपेक्षा व्रत की रक्षा होती है और कारित की अपेक्षा भंग हो जाता है । इस प्रकार भंगाभंग की अपेक्षा यह प्रेषण नाम का प्रतिचार है । स्वयं तो मर्यादा के भीतर स्थिर रहता है, परन्तु मर्यादा के बाहर काम करने वाले लोगों को खांस कर या खकार कर सावधान करता है, यह शब्द का अतिचार है । मर्यादा के बाहर फोन आदि करना भी इसी अतिचार के अन्तर्गत है । स्वयं भर्यादा के भीतर रहकर बाहर के क्षेत्र से किसी वस्तु को बुलवाना श्रानयन अतिचार है । तार या पत्र देकर यार्डर से वस्तु को बुलवाना भी इसी अतिचार में गर्भित है । स्वयं मर्यादा के क्षेत्र में स्थित रहकर मर्यादा के बाहर के लोगों को अपना रूप दिखाना, ऐसे स्थान पर बैठना जिससे मर्यादा के बाहर काम करने वाले लोग अपना रूप देखकर सावधानी से. काम करते रहें, यह रूपाभिव्यक्ति नाम का अतिचार है। टेलिविजन के द्वारा अपना चित्र प्रसारित करना भी उसी प्रतिवार के अन्तर्गत हैं। स्वयं मर्यादा के भीतर रहकर मर्यादा के बाहर काम करने वाले लोगों को कंकड, पत्थर आदि फेंककर सावधान. करना पुद्गल क्षेप नाम का प्रतिचार है । मर्यादा के बाहर पत्र भेजना भी इसी में गर्भित है |
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प्रश्न :--
- सामायिक शिक्षात का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- आगम के ज्ञाता गंगाधर देवादिक सब और बाहर की सम्पूर्ण रूप से पांच पापों का किसी निश्चित को सामायिक नाम का शिक्षात कहते हैं ।
मुक्तिमुक्तं पञ्चाधानामशेषभावेन ।
सर्वत्र च सामयिक सामयिकं नाम शंसन्ति ॥८२॥
जगह मर्यादा के भीतर
समय तक त्याग करने
किसी समय की अवधि लेकर उतने समय तक मर्यादा और बाहर दोनों जगह : सम्पूर्ण रूप से हिंसादि पांच पापों का त्याग करना सामायिक नाम का शिक्षाव्रत| देशवाणिक व्रत में मर्यादा के बाह्य क्षेत्र में पांच पापों का त्याग होता है, मर्यादा के भीतर नहीं । परन्तु सामायिक शिक्षावृत में भीतर और बाहर दोनों जगह त्याग होता है । यतः उसकी अपेक्षा सामायिक शिक्षादूत में भेद है | श्लोक में
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अध्याय पांचवा ]
[ १५१
'जो 'मुक्त' शब्द है, उसमें भाववाचक 'क्त' प्रत्यय हुआ है इसलिये 'मुक्त' का अर्थ ''मोचन' छोड़ना होता है । ग्रासमय मुक्ति यह इसका विशेषण है ।
विशेषार्थ ---- जिनागम में सामायिक और सामयिक इस तरह दो शब्द प्रच लित | उनमें 'सामायिक' शब्द की व्युत्पत्यर्थ इस प्रकार है- 'समाय: - समता प्रयोजनं . यस्य सः सामायिकः इस व्युत्पत्ति के अनुसार समाय - समता भाव की प्राप्ति जिसका प्रयोजन है, वह सामायिक कहलाता है । मुनिवृत में सदा समता भाव धारण करना पड़ता है, इसलिये मुनियों के पंचविध चारित्र में सामायिक शब्द का प्रयोग हुआ है । परन्तु गृहस्थ सदा के लिये समता भाव धारण करने में असमर्थ है, अतः वह दिन में दो बार अथवा तीन बार दो घड़ी, वार घड़ी अथवा छह घड़ी के लिये समस्त पापों का परित्याग कर समता भाव धारण करता है। समय की अवधि से सहित होने के 'कारण उसकी यह क्रिया सामयिक शिक्षावृत कहलाती है। जितने समय की अवधि लेकर वह सामयिक में बैठा है, उतने समय के लिये वह पूर्ण मध्यस्थ रहता है । सुखदु:ख, वन्धु वर्ग-शत्रु संयोग वियोग आदि इष्टानिष्ट परिणतियों में उसे हर्ष विषाद नहीं होता । तथा पञ्च पापों का भी उतने समय के लिये पूर्ण त्यागी होता है । सुमन्त भद्र स्वामी ने इस प्रकरण सम्बन्धी समस्त श्लोकों में सामयिक शब्द का ही प्रयोग किया है। इससे जान पड़ता है, कि उन्हें शिक्षावृत का नाम इष्ट है, सामायिक नहीं ।
प्रश्न :- यहां पर जो समय शब्द कहा उसका स्वरूप क्या है ?
उत्तर :- श्रागम के ज्ञाता पुरुष केश, मुट्ठी, वस्त्र बंध के काल को और - पालथी बांधने के काल को अथवा खड़े होने के काल को और बैठने के काल को सामायिक का समय जानते हैं ।
मूर्ध रुहमुष्टि वासो बन्धं पबन्धनं चापि । स्थानमुपवेशनं वा समयं जानन्ति समयज्ञाः ॥८३॥
मूर्य रूह, मुष्टि और वासस् इन तीन शब्दों का इन्द्व समास हुआ है | 'द्वान्ते इन्द्रादों वा श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसम्बन्ध्यते' इस नियम के अनुसार यहां द्वन्द्व के अन्त में श्रूयमागा बन्त्र शब्द का सम्वन्ध प्रत्येक शब्द के साथ होता है । ग्रतः. मूर्व बन्च, मुष्टिबन्ध और बांसोबन्ध ये तीन शब्द विष्पन्न हुए हैं । बन्ध का अर्थ वन्ध काल है । इसी तरह पर्यबन्धन, स्थान और उपवेशन में और उनके काल का
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[ गो. प्र. चिन्तामणि जान ग्राह्य है । जब तक चोटी में गांठ लगी है, मुठी बंधी है, बस्ता में गांठ लगी है. पालथी वांधकर बैठा हूँ, कायोत्सर्ग मुद्रा से खड़ा हूँ प्रथा पद्मासन से बैठा हूँ, तब तक: सामयिक करूगा, ऐसी प्रतिज्ञा सामयिक करने वाला करता है। इसलिये इन सब में जो काल लगता है, वही सामयिक का काल कहलाता है।
विशेषार्थ-जिस प्रकार समय का ज्ञान करने के लिये आज कल घड़ियों का प्रचलन चल पड़ा है, उस प्रकार पहले इनका प्रचलन नहीं था। पहले समय का ज्ञान करने के लिये श्रावक सामयिक में बैठते समय ऐसा विचार कर लेते थे कि जब तक सहज स्वभाव से चोटी की गांठ लगी रहेगी, अथवा जब तक मुट्ठी बांध सगा; अथवा जब तक दुपट्टा आदि की गांठ सहज स्वभाव से लगी रहेगी, अथवा जब तक पालथी बांधकर निराकुलता से बैठा रहूँगा अथवा जब तक निराकुलता से : खड़ा रहँगा, अथवा जब तक निराकुलता पूर्वक पद्मासन से बैठा रहूँगा तब तक सामयिक करूंगा । वही उनका सामयिक का काल कहलाता था।
संस्कृत में समय का एक अर्थ प्राचार भी होता है । अतः 'समयं जानन्ति मर्म । जाः' यहां पर समय का अर्थ आचार हो सकता है, और प्राचार का अर्थ विधि है। अतः सामयिक के लिये बैटते समय श्रावक को चाहिये कि वह अपने केशों और वस्त्रों को संभालकर बांध ले, जिससे वे बीच में खुलकर आकुलता उत्पन्न न करें। हाथों की अंगुलियों को खुला न रखें, किन्तु उनकी अंजुलि बाँध ले। आसनों में पालथी. बांधना, कायोत्सर्ग से खड़े होना अथवा पद्मासन से बैठना इन तीन आसनों में जिस ग्रासन से निश्चित समय तक निराकुलता पूर्वक रह सकें उस ग्रासन को स्वीकृत करे सामयिक के बीच में ग्रासनों में परिवर्तन न करें । उक्त श्लोक का एक अर्थ यह भी होता है।
प्रश्न :--सामयिक का विशेष अभ्यास कहां बढ़ाना चाहिये ?
उत्तर :-वह सामयिक निर्मल बुद्धि के धारक श्रावक के द्वारा स्त्री, पुरुष ... तथा नपुंसकों से रहित प्रदेश में, चित्त में चञ्चलता उत्पन्न करने वाले कारणों से रहित. स्थान में, वनों में, मकानों में अथवा मन्दिरों में भी बढने के योग्य है । ...
एकान्ते सामयिक नित्यक्षिपे धनेषु वास्तुषु च।
चैत्यालयेषु वापि च परिचेतत्यं प्रसन्नधिया ।।८४६ : • पूर्व प्रलोक में सामायिक का काल बतलाया था, इस श्लोक में सामायिक का
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अध्याय : पांचयां ] क्षेत्र बतलाया जा रहा है । सर्वप्रथम सामायिक के लिये एकान्त स्थान होना चाहिये। एकान्त का अर्थ है, जो स्त्री, पुमग तथा नपुंसकों से रहित हो । फिर निर्याक्षेप स्थान होना चाहिये । अर्थात् जिसमें जीन वायु तथा मच्छर मादि का उपद्रव न हो, ऐसा स्थान अटवियों, अपने मकानों, मन्दिरों अथवा पर्वतों की गुफा आदि में कहीं भी हो, वहां प्रसन्न चित्त होकर सामायिक करना चाहिये । 'प्रसन्नधिया' शब्द में प्रसन्न धिर्यस्य स प्रसन्नधिस्तन' इस प्रकार कर्मधारय समास भी होता है । बहुव्रीहि समास के पक्ष में 'प्रसन्नधिया यात्मना' इस प्रकार विशेष्य की कल्पना ऊपर से करनी चाहिये और कर्म धारय समास के पक्ष में 'प्रसन्नधिया' पद का हेतुरूप से व्याख्यान करना चाहिये । ....... विशेषार्थ----सामायिक को प्रसन्न चित्त से करना चाहिये, बेगार समझकर . नहीं । और उसके लिये बुद्धि पूर्वक ऐसा स्थान चुनना चाहिये, जहां किसी प्रकार का उत्पात न हो या चित्त को चञ्चल बनाने वाले कारणों का प्रसंग उपस्थित न हो। बुद्धिपूर्वक निर्द्वन्द्र स्थान में सामायिक के लिये बैंठ चुकने पर यदि कोई बाधा उपस्थित होती है, तो उसे उपसर्ग समझकर समता भाव से सहन करना चाहिये ।
प्रश्न :--सामायिक में कैसे भाव होने चाहिये ? .
.. उत्तर :-शरीरादिक की चेष्टा और मन की व्यग्रता अथवा कलुषता से से निवृत्ति होने पर मानसिक विकल्पों की विशिष्ट निवृत्ति पूर्वक उपवास के दिन अथवा एकाशन के दिन और अन्य समय भी सामायिक करना चाहिये ।
ध्यापार वैमनस्याद्वि निवृत्त्या मन्तरात्मविनिवृत्त्या । सामायिकं बनीयादुपवासे चैक भुक्ते वा ॥५॥
पिछले दो श्लोकों में सामायिक के योग्य काल और क्षेत्र की चर्चा कर चुकने के बाद इस श्लोक में सामायिक के योग्य भाव की चर्चा की जा रही है। सामायिक किस भाव में किस समय बढ़ायी जा सकती ? इसका उत्तर देते हुए, कहा गया है कि व्यापार-शारीर और वचन की चेष्टा तथा बैमनस्य-मन की व्यरता अथवा मन की कलुषता से विनिवृति होने पर अन्तरात्मा-मानसिक विकल्पों को विशिष्ट रूप से दूर करते हुए उपवास और एकाशन के दिन विशेषरूप से सामयिक को बढ़ाना चाहिये । यहां चकार का ग्रहण किया है, उससे अन्य समयों का भी समुच्चय होता है अर्थात । उपवास और एकाशन के सिवाय अन्य दिनों में भी सामयिक को बढ़ाना चाहिये ।
विशेषार्थ----इस प्रलोक में सामयिक के योग्य भावों की चर्चा करते हुए कहा
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गया है, कि सामयिक के पहले शरीर तथा वचन की चेष्टा अर्थात् शरीर का हिलाना डुलाना तथा वचन का जोर से उच्चारण और वैमनस्य-मन की व्यग्रता अथवा कलुषता को दूर करना चाहिये। साथ ही अन्तरात्मा-मन में जो नाना प्रकार के विकल्प उठते हैं, उन्हें विशेष रूप में दूर करना चाहिये । ऐसे भावों से ही सामयिक में वृद्धि हो सकती है । सामयिक की वृद्धि, उपवास अथवा एकाशन के दिन विशिष्ट रूप से करना चाहिये।
प्रश्न :--क्या सामायिक प्रतिदिन करना चाहिए ?
उत्तर :-ग्रालस्य से रहित और चित्त की एकाग्रता से युक्त पुरुष के द्वारा हिंसा त्याग आदि पाँच वृतों की पूर्ति का कारण सामयिक प्रतिदिन भी योग्य विधि के अनुसार वढाने योग्य है ।।
सामयिकं प्रतिदिवसं यथावदप्यनलसेन चेतव्यं । न्द्रत पञ्चक परिपूरण करणवधान युक्त न ॥८६॥
पिछले इलोक में उपवास तथा एकाशन के दिन सामायिक को बढ़ाने की ... - वात कही गई थी, इसलिए कोई ऐसा न समझ ले कि उसी दिन करने के योग्य है,
अन्य दिनों में नहीं। इसका निराकरण करने के लिए इस श्लोक में कहा गया है कि सायिक प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधि से करना चाहिए, क्योंकि यह सामयिक हिंसाविरति आदि पाँच व्रतों की परिपूर्णता अर्थात् उनकी महावत रूपता का कारग . है । सामयिक करने वाले पुरुष को प्रालस्य रहित तथा चित्त की एकाग्रता से युक्त होना चाहिए।
विशेषार्थ :-कितने ही लोग पालस्य के वशीभूत होकर विस्तर पर बैठे-बैठे ही सामायिक करने लगते हैं तथा खड़े होकर चारों दिशाओं में दण्डवत्, यावर्त तथा शिरोनति नहीं करते हैं । अथवा कुछ लोग ऊँघते-ॐघले हुए सामयिक करते हैं। उन्हें सचेत करते हुए प्राचार्य ने 'मनलसन' विशेषण दिया है, जिसका अर्थ होता है। कि सामयिक प्रालस्य रहित होकर करना चाहिये अर्थात् सामंयिक के जो अङ्ग प्रागमन में बतलाये गये हैं, उन्हें विधि पूर्वक करना चाहिए । कितने ही लोग मालाएं फेरने को
ही सामयिक समझ लेते हैं । अतः वे चित्त की स्थिरता की ओर ध्यान न देकर मात्र . चार-छह मालाएँ फेरकर ही अपना सामयिक का काल पूरा कर लेते हैं। उन्हें सचेत
करते हुए प्राचार्य ने 'अवधानयुक्तन' विशेषण दिया है। अर्थात् सामयिक चित्त की.
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अध्याय : पाँचवां ।
[ १५५ एकाग्रता से युक्त होकर करना चाहिये 1 सामायिक से हिंसाविरति अादि पांचों प्रती में पर्णता पाती है। फलतः उनमें महावत जैसा व्यवहार होने लगता है । इसलिए सामायिक को न केवल उपवास या प्रकाशन के दिन में करना चाहिये, किन्तु प्रतिदिन करना चाहिए और जैसा तैसा नहीं, किन्तु यथावत-शास्त्रोक्त विधि का उल्लंघन न करते हुए करना चाहिए । इस श्लोक में सामायिक करने वालों पुरुष के लिए जी 'अनलसेन' और 'अवधानयुक्तेन' ये दो विशेषरा दिये हैं, उनसे सामायिक के योग्य द्रव्य का वर्णन आचार्य ने किया है, ऐसा जान पड़ता है। और इससे सामायिक का काल, क्षेत्र, भाव तथा द्रव्य इन चारों की उपेक्षा वर्णन पूर्ण हो जाता है ।
प्रश्न :-अणुवत ही महायतों में फंसे परिणत होते हैं ? ... उत्तर :- त्र्योंकि सामायिक के काल में प्रारम्भ सहित परिग्रह ही नहीं है, इसलिए उस समय गृहस्थ उपसर्ग के कारण वस्त्र से वेष्टित मुनि ने समान मुनिपने को प्राप्त होता है।
सामयिके सारम्भाः परिग्रहा नैव सन्ति सर्वेऽपि । .. चेलोपसृष्ट मुनिरिव गृही तदा याति यदि भावम् ।।७।।
जब गृहस्थ सामायिक में बैठाता है, तब उसके खेती आदि के प्रारम्भ से सहित बाह्य और अन्तरंग तथा चेतन अचेतन के भेद से सभी प्रकार के परिग्रह नहीं होते, इसलिए उस समय वह उपसर्ग से वस्त्र अोढ़ाये हुये मुनि के समान मुनिपने को प्राप्त होता है।
विशेषार्थ :-सामायिक में वैटने वाला गृहस्थ अमुक निश्चित समय के लिए हिसादि समस्त पापों तथा सब प्रकार के प्रारम्भों का त्याग कर चुकता है। उत्तने समय के लिए वह समस्त परिग्रहों का भी त्याग कर देता है । यद्यपि पद के अनुरूप शरीर पर वस्त्र धारण किये हुए है, तो भी उन वस्त्रों में उसके ममत्व भाव नहीं रहता । यदि सामयिक के काल में कोई दुष्ट मनुष्य उसके शरीर पर स्थित उन वस्त्रों को निकालने की चेष्टा करे तो वह सामयिक से विचलित नहीं होता । उसकी उस समय की अवस्था उस मुनि के समान होती है, जिस प्रकार किसी दुष्ट मनुष्य ने उपसर्ग करने के लिये वस्त्र प्रोढ़ा दिया है । ऐसे मुनि बाह्य में यद्यपि वस्त्र प्रोढ़े हये दिखाई देते हैं, तथापि वस्त्र के प्रति ममत्वभाव न होने से वे वस्त्र रहित ही माने जाते हैं 1 इसी प्रकार गृहस्थ भी सामयिक के काल में यद्यपि अपने पद के अनुरूप वस्त्रं
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१५६ ]
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धारण किये हुये हैं तथापि उन वस्त्रों से उन्हें ममत्वभाव नहीं रहता । इस प्रकार सामायिक करने वाला गृहस्थ सब प्रकार के परिग्रहों से रहित होने के कारण मुनि: जैसी अवस्था को प्राप्त होता है ।
सामायिक करने वाले गृहस्थ और भी क्या करें ?
उत्तर :- सामयिक को स्वीकृत करने वाले गृहस्थ स्थिर समाधि अथवा गृहीत अनुष्ठान को न छोड़ते हुए मौनधारी होकर शीत, उष्ण तथा दंशमशक परिवह को और उपसर्ग को भी सहन करें ।
शीतोष्ण दंशमशक परिषहमुपसर्गमपि च मौन धराः । सामयिक प्रतिपक्षा अधिं कुर्वीरन्नचल योगाः ॥
जिन्होंने सामयिक को स्वीकार किया है, ऐसे गृहस्थों को अपने योग-ध्यान में स्थिर रहकर तथा पीड़ाकारक परिस्थिति के आने पर भी अपनी गृहीत प्रतिज्ञा से विचलित नहीं होते हुए मौन धारी बनकर शीत, ऊष्ण तथा तिर्यंचों के द्वारा किये हुए उपसर्ग को सहन करना चाहिए ।
विशेषार्थ :- सामयिक में बैठने पर यदि सर्दी, गर्मी की बाधा आती है, तिर्यचो के द्वारा कोई
चुपचाप सहन करना
मछरों का उपद्रव होता है अथवा दुष्ट देव, मनुष्य या उपसर्ग किया जाता है, तो उसे दीनता के वचन न कहते हुए चाहिए तथा अपनी गृहीत प्रतिज्ञा से विचलित नहीं होना चाहिये । प्रश्न :- सामायिक क्या विचार करे ? उत्तर :- सामयिक में स्थित मनुष्य इस प्रकार ध्यान करे कि मैं शरण रहित, अंशुभ, प्रनित्य दुःख स्वरूप और अनात्मस्वरूप संसार में निवास करता हूँ और मोक्ष उससे विपरीत स्वरूप वाला है ।
प्रशरणमशुभ मनित्यं दुःखमनात्मानभावयामि भवम् । मोक्षस्तद्विपरीतात्मेति ध्यायन्तु सामयिके ॥८६॥
अपने द्वारा गृहीत कर्मों के वश से चारों गतियों में परिभ्रमण करना भव कहलाता है । मैं जिस भव में रह रहा हूँ वह प्रशारण है - इसमें मृत्यु से कोई रक्षा करने वाला नहीं है । अशुभ कारणों से उत्पन्न होने तथा अशुभ कार्य को करने के कारण प्रशुभ है। चारों गतियों में परिभ्रमण का काल नियत होने से अनित्य है दुःख का कारण होने से दुःख रूप है और ग्रात्म स्वरूप से भिन्न होने के कारण
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अध्याय : पांचवां ]
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अनात्मा है । सामयिक में स्थित मनुष्य इस प्रकार संसार के स्वरूप का विचार कर और मोक्ष इससे विपरीत है अर्थात् शरण है, शुभ है, नित्य है, सुखरूप है तथा ग्रात्म स्वरूप है, इस प्रकार मोक्ष के स्वरूप का विचार करें।
विशेषार्थ :- - सामयिक के समय तत्व-चिन्तन होना चाहिए | तत्वों में प्रमुख जीव तत्व है और जीव तत्व की संसार तथा मोक्ष के भेद से दो अवस्थाएँ हैं । इन दोनों अवस्थाओं का चिन्तन करते हुये संसार और मोक्ष की विशेषता का विचार 'किया जाता है । संसार की विशेषताओं का चिन्तन करते हुए विचार करना चाहिए 'कि यह संसार अशरण, अशुभ, अनित्य, दुःख रूप तथा अनात्मा है अर्थात् आत्मा की शुद्ध अवस्था नहीं है । परन्तु मोक्ष इससे विपरीत शरण, शुभ, नित्य, सुखरूप तथा आत्मा है आत्मा की शुद्ध अवस्था है । ऐसा विचार करने से संसार से उपेक्षा और मोक्ष के प्रति आदर का भाव उत्पन्न होता है । जीव की यह संसार अवस्था, कर्म नोकर्मरूप अजीव के सम्बन्ध से हुई हैं और वह सम्बन्ध भी ग्रासव व बन्ध का कारण हुआ है । इस तरह संसार के स्वरूप चिन्तन के अन्तर्गत अजीव प्रास्त्रव और . बन्ध तत्त्व का चिन्तन ग्राता है । और मोक्ष अवस्था, कर्म-नोकर्म रूप जीव के साथ जीव का सम्बन्ध विघट जाने से होती है और वह सम्बन्ध का विघटन संवर तथा निर्जरा के द्वारा होता है। इस तरह मोक्ष के स्वरूप - चिन्तन के अन्तर्गत संवर और निर्जरा तत्व का चिन्तन आता है ।
प्रश्न :- सामयिक के प्रतिचार कौन कौन से हैं ?
उत्तर : वचन, काय और मन के दुष्प्रणिधान अर्थात् वाग्दुष्प्रणिधान, काय दुष्प्ररिधान, मनोदुष्प्ररिधान, अनादर और अस्मरण ये पाँच परमार्थ से सामयिक के प्रतिचार प्रकट किये जाते हैं ।
वावकाय मानसांनां दुःप्रणिधानान्यनादरास्मरणे । सामयिकस्यातिगमा व्यज्यन्ते पञ्च भावेनं ॥
वचन, काम और मन ये तीन योग हैं। इनकी खोटी प्रवृत्ति करने को प्रधान कहते है । इस तरह तीन योग सम्बन्धी खोटी प्रवृत्ति के कारण तीन प्रतिचार होते हैं । अनादर का अर्थ अनुत्साह है और अस्मरण का अर्थ एकाग्रता का प्रभाव है । सब मिलाकर सामयिक के पाँच प्रतिचार कहे जाते हैं ।
विशेषार्थ -- मन्त्र या सामयिक पाठ का उच्चारण करते समय अशुद्ध
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उच्चारण करना बचन दुष्परिणधान कहलाता है । शरीर को हिलाना डुलाना, इधर-.. उधर देखना, मच्छर को भगाना तथा बीच में ग्रासन बदलना यह सब कायदुष्परिणधान कहलाता है और मन को तत्त्वचितन से हटाकर इधर-उधर के विषयों में लगाना मनोदुष्प्रणिधान हैं । वेगार समझकर अनुत्साह से सामयिक करना अनादर कहलाता है । चार आदमियों की सुखद गोष्ठी चल रही है। इतने में सामयिक का समय हो गया । इस स्थिति में गोष्ठी को छोड़कर अनादर से सामग्रिक करने को अनादर नाम का अतिचार बनता है । चित्त की एकाग्रता न होने से मन्त्र या सामयिक पाठ को भूल जाना. अस्मर रंग कहलाता हैं । जब इन पांच अतिचारों को भाव पूर्वक बचाने का प्रयत्न किया जाता है, लभी निरति चार सामयिक शिक्षावृत होता है । ऊपर कहे पांच अतिचारों में यद्यपि मनोदृष्प्रणिधान नामक अतिवार को बचाना कठिन कार्य हैं, तथापि अभ्यास पूर्वक वह बचाया जा सकता है। उसके पिक में पहला है कि तो दुष्प्रणिधान योगमूलक और कायमूलक के भेद से दो प्रकार का है । मन की. जो साधारण वञ्चलता है, वह योग मूलक दुष्परिणधान है और बुद्धि पूर्वक किसी के इष्टअनिष्ट का चिन्तन करने से जो चंचलता होती है, यह कपाय मूलक दुष्प्रणिधान हैं । सर्वप्रथम कपायमूलक दुष्प्रणिधान को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये अर्थात् सामयिक में बैठकर किसी के इष्ट-अनिष्ट का विचार नहीं करना चाहिये । तदन्तर योग मूलक दुष्प्रणिधान को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये । सामयिक में जो मन्त्र पाठ बोला जाता है, उसके अर्थ की मोर लक्ष्य करने से यह योग मूलक वचन या. दुष्प्रणिधान भी दूर किया जा सकता है। धर्मध्यान के जो प्राज्ञा विचय, अपाय-विचय, विपाक-विचय और संस्थान विचय अथवा पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत के भेद से अनेक भेद बताये गये हैं, उनका चिन्तन करने से भी मन की एकारता होती है -- अत: सामयिक के साथ ध्यान का अभ्यास करना चाहिये ।।
प्रश्न :--प्रोषधोपवास का क्या लक्षण है ?
उत्तर :-चतुर्दशी और अष्टमी के दिन सर्वदा के लिये अत विधान की. वांछा से चार प्रकार के प्राहारों का त्याग करना प्रोषधोपवास जानना चाहिये । .
पर्वण्यष्टम्यां च ज्ञातव्यः प्रोषधोपवासस्तु ।
चलुरम्यवहार्याणां प्रत्याख्यानं सदेच्छाभिः ॥६१॥ अन्न, पान, खाद्य और लेह्य के भेद से साहार के चार भेद हैं । इन चारों
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अध्याय : पांचवां ]
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प्रकार के आहार का प्रत्येक चतुर्दशी और अष्टमी के दिन व्रतविधान की इच्छा से त्याग करना प्रोषधोपवास जानना चाहिये । यहाँ 'सदा' शब्द देने से यह बात सिद्ध की गई है कि यह चार प्रकार के साहार का त्याग सदा के लिये - जीवन पर्यन्त की अष्टमी-चतुर्दशी के लिये होना चाहिये, न कि दो-चार माह की अष्टमी-चतुर्दशी के लिये । इसी प्रकार 'इच्छाभिः' पद देने से यह सिद्ध किया गया है कि यह त्याग अत धारण करने को भावना से होना चाहिये, न कि लोक व्यवहार में किये हुए धारणा आदि की भावना से । अपनी किसी माँग को स्वीकृत कराने के लिये जो साहार त्याग किया जाता है, उसे धारणा कहते हैं । धारणा देने के लिये किया गया आहार त्याग प्रोषधोपचास में सम्मिलित नहीं है ।
विशेषार्थ :-मुनि व्रत में पराश्रित. भोजन होने के कारण चाहे जब निराहार रहना पड़ता है। यदि गृहस्थ अवस्था में निराहार रहने का अभ्यास नहीं किया है, तो मुनि पद में निराहार रहने का अवसर प्राने पर संबलेश होगा, इसलिये गृहस्थ को यह आवश्यक नियम रखा गया है कि प्रत्येक अष्टमी और चतुर्दशी को चार प्रकार के आहार का बुद्धिपूर्वक त्याग कर निराहार रहने की शिक्षा ग्रहण करें । दाल,
भात, रोटी आदि अशान कहलाते हैं, प्रत्येक चतुर्दशी और अष्टमी की इन चार प्रकार र के अाहारों का त्याग करना प्रोषधोपवास कहलाता है । प्रोषधोपवास पद का शटदार्थ
ग्रन्थकर्ता १६ वें श्लोक में स्वयं करेंगे । जैन धर्म में अष्टमी और चतुर्दशी को अनादि पर्व माना गया है। प्रत्येक मास में दो अष्टमी और दो चतुर्दशी इस प्रकार चार पर्व पाते हैं । इन पर्वो के दिन व्रत धारण की इच्छा से चार प्रकार के पाहार का त्याग करना चाहिये । यह त्याग सदा के लिये अर्थात् जीवनपर्यन्तं के लिये होता है, समय की अवधि को लेकर नहीं होता । कुछ टीकाकार 'सदेच्छाभिः' के स्थान पर सदिच्छाभिः पाठ की कल्पना कर उसकी व्याख्या करते हैं--प्रशस्त अभिप्राय से । परन्तु संपादन के लिये प्राप्त प्रतियों में 'सदेच्छाभिः' यही पाट मिलता है, तथा संस्कृत-दीकाकार ने. भी 'सदेच्छाभिः' पद की ही टीका की है। इसलिये नवीन पाठ की कल्पना करना उचित मालूम नहीं होता ! प्रोषधोपवास तप का स्वरूप है और तप शक्ति के अनुसार परिवर्तित होता रहता है । ऋतुचक्र का भी मनुश्य की शत्ति पर प्रभाव पड़ता है ! इसलिये पीछे चलकर प्राचार्यों ने प्रोपधोपवासव्रत को उपवास, अनुपचास तथा एकाशन नाम देकर उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्यं इन तीन भेदों में विभक्त कर दिया है । चारों
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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रकार के आहार का त्याग करना उपवास हैं सिर्फ पानी लेना अनुपवास है और एक बार भोजन करना एकाशन है। · प्रश्न :--उपवास के दिन क्या करना चाहिये ?
उत्तर :--उपवास के दिन पांच पापों, अलंकार धारण करना, खेती ग्रादि प्रारम्भ करना, चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थों का लेपन करना, पुष्प मालाएँ धारण करना या पुष्पों को सुचना, स्नान करना, अञ्जन, काजल, सुरमा आदि लगाना तथा नाक से नस आदि सूचना इन सबका त्याग करना चाहिये ।
पञ्चानां पापानामलं क्रियारम्भ गन्ध पुष्पाणाम् । - स्नानाजन नस्याना मुपवासे परिहृतिं कुर्यात् ।।६२॥
उपवास करने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह उपवास के दिन हिंसा, असत्य, - चौर्य, कुशील और परिग्रह इन पाँच पापों का त्याग करे । शरीर की सजावट, वाणिज्य
आदि व्यापार तथा गन्ध पुष्प आदि के प्रयोग और स्नान, अजन तथा नस आदि के सेवन का परिहार-परित्याग करे । यह सब उपलक्षण है, अतः गीत नृत्य आदि राग के कारणों का भी त्याग पा जाता है ।
विशेषार्थ :---उपवास का मूल उद्देश्य कषाय, विषय और पाहार का त्याग करना है । जिसमें मात्र पाहार का त्याग किया जाता है, कषाय और विषयों-स्पर्शनादि । पञ्च इन्द्रियों के विषयों का त्याग नहीं किया जाता बह उपवास नहीं कहलाता, किन्तु । लङ्घन कहलाती है । इसी उद्देश्य को चरितार्थ करने के लिये प्राचार्य ने उपवास के दिन न करने योग्य कार्यों का निर्देश किया है । न करने योग्य कार्यों में स्नान का भी निषेध बतलाया है, सो यहां स्नान शब्द से तेल तथा उदर्तन आदि लगाकर किय जाने वाले विशिष्ट स्नान का त्याग समझना चाहिये । . शुद्ध प्रामुक जल से किये हुए । साधारण स्नान का निषेध नहीं है, क्योंकि उसके बिना जिनेन्द्र भगवान् का अभिषेक तथा पूजन प्रादि की क्रिया नहीं हो सकती ! श्लोक में जिन कार्यों के न करने के लिये प्राचार्य ने निर्देश किया है, वे उपलक्षण मात्र हैं। इसलिये रागवर्धक गीत, नत्य प्रादि का भी उस दिन त्याग करना चाहिये, यह सिद्ध होता है।
प्रश्न :---ौर भी क्या करना चाहिये ? .. . उत्तर :--उपवास करने वाला व्यक्ति उत्कंपिटन होता हुनः कानों से
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अध्याय :
[ १६१ रूपी अमृत को स्वयं पीवे अथवा दूसरों को पिलावे अथवा सालस्य रहित होता हुआ जान और ध्यान में तत्पर होवे ।
धर्मामृतं सतृष्णः श्रवणाभ्यां पिबतु पायद्वान्यान् । ज्ञान ध्यान परो वा भवतूपयसन्नतन्द्रालुः ॥३॥
समस्त प्राग्गियों के संतोष का कारण होने से धर्म को अमृत कहा है। उपवास करने वाला व्यक्ति यदि धर्म का विशेष ज्ञाता नहीं है, तो वह बड़ी उत्सुकता- . पूर्वक दूसरे विशिष्ट ज्ञानी जनों के मुख से होने वाले धर्मोपदेश को अपने कानों से सुने और यदि स्वयं विशिष्ट ज्ञानी है, तो वह दूसरों को धर्मोपदेश सुनाये । इसके . अतिरिक्त आलस्य को जीतता हुआ स्वयं ज्ञान और ध्यान में तत्पर रहे । स्वाध्याय में लीन रहता हुआ अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, शुचित्व, प्रास्त्रब, संवर, निर्जरा, लोक, बोधि दुर्लभ और धर्म इन बारह भावनाओं के चिन्तन में दत्तचित्त रहे । अथवा ग्राज्ञाथिचय, अपायविचय, विपाकविच्य और संस्थानविय इन चार धर्मध्यान में तत्पर रहे।
विशेषार्थ :-..-उपवास के पूर्व दिन में मध्यान्न का भोजन करने के बाद उपवास का नियम लेकर सब प्रकार के प्रारम्भ का त्याग करना चाहिये । यहां तक कि शरीरादिक में भी ममत्वभाव नहीं रखना चाहिये । एकान्त बसतिकाल में जाकर : समस्त पाप पूर्ण योग का त्याग करे, समस्त इन्द्रियों के विषयों से निवृत हो और . मनोगुप्ति, बचनगुप्ति, कायगुरित का पालन करता हुआ रहे । धर्मध्यान में लीन होता हुधा दिन का गोप भाग व्यतीत करे । फिर सांध्याकालीन सामायिक कर स्वाध्याय से निद्रा को जीतता हुआ पवित्र संस्तर पर रात्रि को व्यतीत करे । उपवास के दिन .. प्रातःकाल उठकर प्रातःकालीन सामायिक आदि क्रियाओं को करके प्रासुक द्रव्य से ....... जिनेन्द्र भगवान की पूजा करे । तदन्तर स्वाध्याय और ध्यान के द्वारा समस्त दिन, ... रात्रि और तृतीय दिन के अर्थ भाग को व्यतीत करे । इस प्रकार समस्त पाप कार्यों से निवृत होकर जो सोलह पहरों को व्यतीत करता है. उसके पूर्ण अहिंसावत होता है । देशवती श्रावकों के भोगोपभोग मूलक ही स्थावर जीवों की हिसा होती है 1 परन्तु उपवास के दिन भोगोपभोग का त्याग हो चुकता है, इसलिये हिंसा का अंश भी उनके नहीं होता । वचन गुप्ति होने से असत्य पाय से निवृत्ति है, सब प्रकार की वस्तुओं के ग्रहण का अभाव होने से चोरी से निवृत्ति है, मैथुन का त्याग होने से प्रबहा पाप से
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निवृत्ति है और शरीर में भी जब मूर्छा-ममता भाव से रहित है, तब परिग्रह से निवृत्ति स्वतः सिद्ध है । इस प्रकार समस्त हिंसादि पापों से रहित बह प्रोपधोपवास करने वाला व्यक्ति उपचार से महावती अवस्था को प्राप्त होता है। परन्तु प्रत्याख्यानावरण नाम का चारित्र मोह का उदय रहने के कारण वह संयम के स्थान को प्राप्त नहीं होता है।
प्रश्न :--प्रोषधोपदास का क्या लक्षण है ?
उत्तर :--- चार प्रकार के आहार. का त्याग करना उपवास है। एक बार भोजन करना प्रोप्रध है और उपवास करने के बाद पारणा के दिन एक बार भोजन करना वह प्रोषधोपवास है ।।
चतुराहार विसर्जनमुपवासः प्रोषधः सद्भुक्तिः ।
स प्रोषधोपवासो यदुपोष्यार समाचरति ॥६४॥ : ... .. . ... - अशन, पान, खाद्य और लेहा के भेद से ग्राहार चार प्रकार का होता है। भात मूग आदि अशन कहलाते हैं, छांछ यादि पीने योग्य पदार्थ पान कहलाते हैं, लाडू ग्रादि खाद्य पदार्थ हैं और खड़ी आदि चांटने योग्य पदार्थ ले ह्य कहलाते हैं । इन चारों प्रकार के ग्राहार का त्याग करना उपवास कहलाता है। एक बार भोजन करना प्रोषध कहलाता है और धारणा तथा पारसा के दिन एकासन के साथ पर्व के दिन जो. उपचास किया जाता है, वह प्रोषधोपनास कहलाता है । 'प्रोप्रवाश्यां धारण कपारणकदिने सकृद्भुक्तिभ्यां सह उपवासः प्रोषधोपवासः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार धारणा और पारणा के दिन एकाशन करते हुए अष्टमी तथा चतुर्दशी को उपवास करना । प्रावधोपवास कहलाता है।
विशेषार्थ :---श्री समन्तभद्र स्वामी प्रोषधोपवास का लक्षारण इस परिच्छेद के १६वें श्लोक में लिख्ख चुके हैं और बाद के श्लोकों में उपवास को दिन न करने योग्य तथा करने योग्य क्रियानों का वर्णन कर चुके हैं। अब इस श्लोक में उन्होंने पुनः . उपवास, प्रोषध और प्रोषधोपत्रास का लक्षण लिखा है जो कि पुनरुबत सा प्रतीत होता है । यहाँ उपवास का लक्षण तो वही है, जो कि १६ श्लोक में लिखा है, परन्तु प्रोमध का लक्षण अतिरिक्स लिखा है और प्रोषधों के साथ जो उपवास है, उसे प्रोषधोपवास कहा है । अन्य ग्रन्थों में प्रोषध का अर्थ पर्व अप्टमी चतुर्दशी लिखा है । अंतः पर्व के दिन किया हुआ उपवास प्रोषधोपवास कहलाता है । वहाँ धारणा और
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अध्याय : पांचवां । पारणा के दिन एकाशन करने की चर्चा नहीं है । यहाँ इस श्लोक में धारणा और . पारणा के दिन एकाशन की भी चर्चा की गई हैं 1 जान पड़ता है कि समन्तभद्र स्वामी ने इस श्लोक में किसी अन्य मान्यता का उल्लेख किया है । धारणा के दिन एकाशन करने की चर्चा तो पुरुषार्थसिद्धयुपाय में अमृतचन्द्र स्वामी ने भी की है। उन्होंने प्रोषधोपचास के १६ पहरों का विवरण देते हुए लिखा है कि उपवास के पूर्व दिन मध्याह्नका भोजन करने के बाद उपवास का नियम लेकर एकान्तवसतिका में चला जाना चाहिये । इस संदर्भ में उन्होंने तृतीय दिन के मध्याह्न तक का कार्य विवरण दिया है । इससे सिद्ध होता है कि धारणा के दिन एकाशन किया जाता था । परन्तु पारणा के दिनं एकाशन की चर्चा अन्यत्र देखने में नहीं आयी । इस श्लोक में प्रारम्भ का अर्थ संस्कृत टीकाकार में सकृद्मुक्ति किया है । प्रारम्न का अर्थ सकृद्भुक्ति' करो हो गया, यह शुद्धि में नहीं आता । प्रारम्भ का अर्थ प्रारम्भ ही है। उपवास के पूर्व दिन मध्याह्न के भोजन के बाद उपवास का नियम लेकर 'मुक्त समस्तारम्भ' हया अब सोलह पहर के बाद वह आरम्भ-गृहस्थी के अन्य कार्य करने के लिये स्वतन्न हो जाता है । यह अर्थ प्रसंगानुसार संगत प्रतीत होता है। वर्तमान में उपवास के तीन हा प्रचलित हैं...-१. सोलह पहर का, २, बारह पहर का और ३, पाठ पहर का । सोलह पहर का उपवास पूर्व दिन के मध्याह्न के भोजन के बाद शुरू होता है, और तृतीय दिन के दोपहर तक चलता है । बारह पहर का उपवास पूर्व दिन्न के शाम के भोजन के बाद शुरू होता है, और तृतीय दिन के मूर्योदय तक चलता है। ग्नौर गाठ , पहर का उपवास सूर्योदय के समय से लेकर आगमी दिन के सूर्योदय तक चलता है।
प्रश्न :-प्रोषधोपवास के अतिचारों का क्या स्वरूप है ?
उत्तर : ...जो बिना देखे तथा बिना बोधे पूजा आदि के उपकरणों को हरा करना, मल मूत्रादि को छोड़ना और संस्तर आदि बिछाना तथा अनादर और अस्मरण हैं, वे प्रोषधोपवास व्रत के पांच अतिचार हैं।
ग्रहणविसर्गा स्तरणान्य दृष्टमष्टान्यनादरास्मरणे । यत्प्रोषधोपवास व्यतिलङ्घनपञ्चक । तदिदम् ।।६.५॥
यहाँ जीव-जन्तु हैं या नहीं, इस प्रकार चक्षु से देखना दृष्ट' कहलाता है, और कोमल उपकरगा से प्रमार्जन करना मृष्ट कहलाता है । जिसमें ये दोनों न हों, उसे ग्राष्ट पृष्ट कहते हैं । अदृष्ट भृष्ट शब्द का सम्बन्ध ग्रहण, विसर्ग और प्रास्तरण इन
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१६४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणिः तोनों के साथ होता है. इसलिए अष्टमृष्ट ग्रहण अतिचार उसके होता है, जो भूख से पीड़ित होकर अर्हन्त आदि की पूजा के उपकरण तथा अपने वस्त्र ग्रादि विना देखें, बिना शोधे ग्रहण करता है। अदृष्टः मृष्ट विसर्ग अतिचार उसके होता है, जो भूख से पीड़ित होने के कारण विना देखी, विना शोधी भूमि में मलमूत्र छोड़ता है, और अदृष्ट मृष्टास्तरण अतिचार उसके होता है. जो भूख से पीड़ित होने के कारण विना देखे, बिना शोधे स्थान पर बिस्तर बिछाता है। इन तीनों के सिवाय अनादर, अस्मरण ये दो अतिचार और होते हैं। जिसमें अनादर का अथी है, भूख से पीड़ित होने के कारण आवश्यक कार्यों में पादर नहीं करना अर्थात् उन्हें उपेक्षा भाव से करना और.. अस्मरगा का अर्थ है अनेकाग्रता अर्थात् चित्त में एकाग्नता का नहीं होना । ... . . विशेषार्थ---तत्त्वार्थमूत्रकार ने भी इस अत के ये ही पांच अतिचार बतलाये । हैं, मात्र शब्दों में अन्तर है, भाव में नहीं। जैसे- १. अप्रत्यवेक्षिता प्रमाजितोत्सर्ग, २. अप्रत्यवेक्षिता प्रमाजितदान, ३. अप्रत्यवेक्षिता प्रमाणित संस्तरोपक्रमरण, ४, अनादर और ५. अस्मरण । अनादर और प्रस्मरण ये दो अतिचार सामयिक शिक्षाअत में भी नाते हैं । वहां सामयिक से सम्बन्ध है, यहां प्रोषधोपवास से सम्बन्ध हैं। अनादर का एक अर्थ यह भी उचित जान पड़ता है. कि कोई व्यक्ति उपवास तो करता है, परन्तु अनादर-अनुत्साह पूर्वक करता है। जैसे-ग्रीष्म ऋतु में उपयास की शक्ति क्षीण हो जाने से कोई प्रतिज्ञा पूर्ति के लिए उपवास करता है, उत्साह पूर्वक नहीं । इसी प्रकार अस्मरण का एक अर्थ बह भी उचित जान पड़ता है कि पर्व के दिन का स्मरण नहीं रखना । जैसे-अष्टमी, चतुर्दशी के निकल जाने पर कोई. किसी से पूछता है कि आज. अष्टमी तो नहीं है? चतुर्दशी तो नहीं है ? इस तरह समयान्तर में पूर्व के दिन का . उपवास करता है।
प्रश्न : वैयावृत्य शिक्षावत का लक्षण क्या है ? :
उत्तर :--- (तपोधनाय) तपरूप धन से युक्त तथा सम्यग्दर्शनादि गुणों के भण्डार गृह त्यागी-मुनीश्वर के लिए विधि, द्रव्य - प्रादि सम्पत्ति के अनुसार प्रतिदान और प्रत्युपकार की अपेक्षा से रहित , धर्म के निमित्त जो दान दिया जाता है, वह वैयाबृत्य कहलाता है।
दानं वैयावृत्यं धर्माय तपोधनाय गुणनिधये । अनपेक्षितोपचारोपनियमगृहाय विभवेन ॥६६॥
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अध्याय : पांचवा ]
[ १६५ तप ही जिनका धन है, तथा सम्यग्दर्शनादि गुरषों के जो निधि आश्रय हैं, ऐसे भाव आगार और द्रव्य प्रागार से रहित मुनीश्वर के लिये उपचार-प्रतिदान तथा उपक्रिया-प्रत्युपकार की भावना से रहित अपनी ब्रिधि, द्रव्य आदि सम्पदा के अनुसार जो साहार. आदि का दान दिया जाता है, वह वयोवृत्य कहलाता है ।
. विशेषार्थ:-ज्यावृत्तिः, दुःख . निवृत्तिः प्रयोजनं यस्य तत् वैयांवत्यं' इस व्युत्पत्ति के अनुसार दुःख निवृत्ति जिसका प्रयोजन है, उसे वैयावृत्य कहते हैं । अन्य प्राचार्यों ने वैयावत्य के स्थान पर अतिथिसंविभाग शब्द रखा है। अतिथिसंविभाग व्रत जिस प्रकार अतिथि के लिए दान की प्रधानता है, उसी प्रकार वैयावृत्य में भी दान की प्रधानता है, क्योंकि साहार आदि दान के द्वारा अतिथि की दुःख निवृत्ति का प्रयोजन सिद्ध होता है । फिर अतिथिसंविभाग शब्द को परिवर्तित करने का प्रयोजन क्या है ? यह प्रश्न उठता है । उसका उत्तर यह है कि अतिथिसंविभाग शब्द में मात्र चार प्रकार के दानों का समावेश होता है, उसके अतिरिक्त संयमीजनों की जो सेवा-सुश्रुषा है, उसका समावेश नहीं होता । परन्तु वैयावृत्य शब्द में दान ओर सेवा-सुश्रुपा सबका समावेश होता है । इसलिये समन्तभद् स्वामी ने. 'वैयावृत्य' - इस व्यापक शब्द को स्वीकृत किया है।
· दान देते समय पात्र का विचार करना नावश्यक है। इस लिये पान का विचार करते हुए ग्राचार्य ने तीन विशेषण दिये हैं-'तपोधनाय 'गुणानिधये' और का ‘अग्रहाय' पात्र वहीं हो सकता है जो तपस्वी हो, सम्यग्दर्शनादि गुणों का आधार हो ।
और गृह त्यागी हो । दान देते समय यही एक उद्देश्य होना चाहिये कि इससे रत्नग्र रूप धर्म की वृद्धि हो । दान के बदले मुनीश्वर हमें कुछ देवे अथवा मन्त्र, तन्वं मादि के द्वारा हमारा कुछ प्रत्युपकार करें ऐसी भावना नहीं रखना चाहिये । इसके सिवाय दान अपने विभव सामर्थ्य के अनुसार देना चाहिये, क्योंकि सामर्थ्य का उलङ्घन.. कर जो दान दिया जाता है, वह संक्लेश का कारण होता है 1
.... प्रश्न :---वैयावृत्य माने क्या ? .
उत्तर :---सम्यग्दर्शनादि गुणों की प्रीति से देशद्रत और सकल व्रत के धारक . संयमी जनों की पाई हुई नाना प्रकार की आपत्ति को दूर करना, पैरों को उपलक्षण से हस्तादिक अङ्गों का दवाना और इसके सिवाय अन्य सी जितना उपकार है, वह सब वैयावृत्य कहा जाता है । .
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[ गो. प्र. चिन्तामणि व्यापत्ति व्यपनोदः पदयोः संवाहनं च गुणरागात् ।
वैयावृत्यं यावानुपग्रहोऽन्योऽपि . संयमीनाम् ॥६७।.. .. देशवती और सकालनती के भेद से संयमी दो प्रकार के हैं। इनके ऊपर यदि बीमारी आदि नाना प्रकार की आपत्तियां पाई हैं, तो उन्हें गुणानुराग से प्रेरित होकर दूर करना, उनके पैर आदि अंगों का मर्दन करना तथा इसके सिवायः और भी जितनी कुछ समयानुकल सेवा है, वह सब वैयावृत्य नामक शिक्षागत है । यह वैयावृत्य । व्यवहार अथवा किसी दृष्ट फल की अपेक्षा से न होकर मात्र गुरणानुराग अर्थात् भक्ति के वश से की जाती है ।
... विशेषार्थ :-मुनियों के योग्य छह अन्तरंग तपों में एक बयावृत्य नाम का सब है । जिसका अर्थ होता है, बालक, वृद्ध अथवा ग्लान-मरण अादि मुनियों की सेयश : ... कर उन्हें मार्ग में स्थिर रखना । परस्पर की सहानभूति की प्रवृत्ति से ही चतुर्विध मुनि
संघ का निर्वाह होता है । प्राचार्य, उपाध्याय. तपस्वी, शैश्य, ग्लान, गगा, कुल, संब, साधु और मनोज इन दस प्रकार के मुनियों का वैयावृत्य नाम का शिक्षाक्त रखा ? गया है । गृहस्थ को चाहिये कि उसके नगर में यदि किसी देशवती या महायती के अपर कोई कष्ट पाया है, तो उसे पूर्ण तत्परता के साथ दूर करें। इस वैयावृत्त्य । शिक्षाव्रत में सभी दानों का समावेश होता है । अयावृत्य करते समय किसी प्रकार की ग्लानि या मान-अपमान का भाव नहीं रखना चाहिये, क्योंकि स्वार्थ बुद्धि से किया हुआ दौयावृत्य धर्म का अंग नहीं होता। सेवा को प्रवत्ति भी कहा है, और परमधर्म भी कहा है । जब सेवा किसी स्वार्थ बुद्धि से की जाती हैं, तब श्ववृत्तिकुकुरवृत्ति कहलाती है और जब निःस्वार्थ भाव से की जाती है, तब परम धर्म। कहलाती है-कर्म निर्जरा का कारण मानी जाती है। . प्रश्न :-दान किस को कहते हैं ? . .
उत्तर :---सात गुणों से सहित और कोलिक, प्राचारिक तथा शारीरिक शुद्धि मे सहित गृह सम्बन्धी कार्य तथा खेती आदि के प्रारम्भ से रहित, सम्यरदर्शनादि गुणों से सहित मुनियों का नवधा भक्ति पूर्वक जो ग्राहारादि के द्वारा गौरवः । किया जाता है, वह दान माना जाता हैं।
नव पुण्यः प्रतिपत्तिः सप्तगुण समाहितेन शुद्धने । अपनारम्भारणामार्यारणामिप्यते . दानम् ॥६॥
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संध्याय : पांचवां
| १६७ जीवघात के स्थान को सूना कहते हैं । संक्षेप से सूना के पांच भेद हैं । जैसा . कि. कहा गया है-खण्डनोति खण्डनी-उखली से कूटना, गेषरणी चक्की से पीसना, चुल्लो--. चला सिलगाना, उदकुम्भ-पानी के घट भरना और प्रमार्जनी-बुहारी से भूमि को बुहारना ये पाँच हिंसा के कार्य गृहस्थ के होते हैं. अतः वह मोक्ष को प्राप्त नहीं होला । खेती यादि व्यापार सम्बन्धी कार्य प्रारम्भ कहलाते हैं। जिनके मूना और प्रारम्भ नष्ट हो चुके हैं ऐसे सम्यग्दर्शनादि गणों से सहित मुनियों का आहार आदि दानं के द्वारा जो गौरत्र या आदर किया जाता है, वह दान कहलाता है । यह दान सात गुणों से सहित दाता के द्वारा दिया जाता है। जैसा कि कहा गया है.-- श्रद्धेति श्रद्धा, संतोष, भक्ति, विज्ञान, अलुब्धता, क्षमा और सत्य ये सात गुण जिसके होते हैं, उस दाता की प्रशंसा करते हैं। इन सात गुणों के सिवाय दाता को शुद्ध भी होना चाहिये । दाता की शुद्धता का विचार तीन प्रकार से किया जाता है-कुल से, प्राचार मे और शरीर से ! जिसकी वंश परम्परा शुद्ध हो उसे कुल शुद्ध कहते हैं, जिसका आचरम शुद्ध हो उसे आचार शुद्ध' कहते हैं और जिसने स्नानादि कर शुद्ध वस्त्र ... धारण किये हैं, अंग भंग नहीं है, तथा जिसके शारीर में हधिरादिक को कराने वाली कोई बीमारी नहीं है, उसे शरीर शुद्ध कहते हैं। यह दान नव प्रकार के पुण्योपार्जन के कारणों के साथ दिया जाता है । जैसा कि कहा गया है—पडिगर्मिति पंडिगाहना, उच्च स्थान देना, पाद प्रक्षालन, पूजन, प्रणाम, मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि और एपग-पाहार गुद्धि ये नव पुण्य कहलाते हैं 1 इन्हीं को नवधा भक्ति कहते हैं।
विशेषार्थ : - इस श्लोक में दान, दाना, पान और दान की विधि बतलाई - गई है। पान को देखकर उसके प्रति जो प्रादर प्रकट किया जाता है, वह दान कहलाता है । जो श्रद्धा आदि सात गुणों से सहित हो तथा शुद्ध हो उसे दाता कहते है । जो चक्की, चूला अादि घर सम्बन्धी तथा खेती आदि व्यापार सम्बन्धी प्रारम्भ से रहित हो. ऐसे रत्नत्रय के धारक मुनि ऐलक, क्षुल्लक, क्षुल्लिका तथा नायिका यादि. पान कहलाते हैं और नवधा भक्ति को दान की विधि कहते हैं। दान देते समय इन . सबका विचार रखना चाहिये । दाता के सात गुणों का वर्णन कई प्रकार का मिलता है । एक वर्णन संस्कृत-ठीका में उदधुत 'श्रद्धा तुष्टि प्रादि यलोक के आधार पर टीकार्थ. में किया जा चुका है। दूसरा वर्शन संस्कृत टीका की 'घ' प्रति में उद्धत 'श्रद्धा शक्ति'-ग्रादि श्लोक के आधार पर इस प्रकार है-श्रद्धा, शक्तिः, अलुब्धता, भक्ति, . .
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१६८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि शान, दया और अमा ये सात गुरण गृहस्थों के होते हैं। इस वर्णन में संतोप के बदले शक्ति और सत्य के बदले दया का उल्लेख हुअा है। पुरुषार्थसिद्धयुपाय. में अमृतचन्द्र सूरि ने दाता के निम्नलिखित सात गुणण लिखे है—१. ऐहिक फल की अपेक्षा नहीं करना, २. शान्ति, ३. निष्कपटता, ४. अनसूया-ग्रन्यदातारों से ईर्ष्या नहीं करना; ५. अविषादित्व, ६. मुदित्व और ७. निरहंकारित्व । इस वर्णन में शाति-क्षमा को छोड़कर सभी नवीन गणों का समावेश हुअा है। .. प्रश्न :-दान देने का क्या फल है ? . .
... उत्तर :--निश्चय से जिस प्रकार जल खून को धो देता है, उसी प्रकार गृह रहित-निग्रन्थ मुनियों के लिए दिया हुग्गा दान गृहस्थी सम्बन्धी कार्यों से उपजित अथवा मुद्रढ़ कर्म को भी नष्ट कर देता है ।
गृह कर्मपाय निचिक मिल गहमिसानाम् । नतिथानां प्रतिपूजा रूधिमलं धावते. बारि
... जिन्होंने अन्तरंग और बहिरंग से घर का त्याग कर दिया है, तथा सब तिथियाँ जिन्हें एक समान हैं, किसी खास तिथि से राग-द्वेष नहीं है, ऐसे मुनियों के लिये जो दान दिया जाता है, वह सावध व्यापार-सपाप कार्यों से संचित बहुत भारी कर्म को भी उसी तरह नष्ट कर देता है, जिस तरह कि जल, मलिन रुधिर को धी देता है-नष्ट कर देता है।
विशेषार्थ :-गृहस्थ का जीवन ऐसा जीवन है कि इसमें हिंसा के कार्य अवश्य होते हैं। जैसे उनली से धान आदि को कटनां, यकी से गहूँ आदि को पीसना, चूल्हा जलाना, पानी के घट भरना और बुहारी से भूमि को झाड़ना तथा व्यापार के लिये खेती अदि करना । इन सब कामों में गहस्य के निरन्तर पाप कर्मों का संचय होता रहता है । इस संचय के होते हुए भी यदि गृहस्थ परमार्थ से गृह के त्यागी मुनियों के लिये दान देता है, तो उससे उत्पन्न हुआ पुण्य उस संचित कर्म को उसी तरह शीत्र नष्ट कर देता है । जिस प्रकार कि पानी मलिन तथा अपवित्र खून को धो डालता है नष्ट कर देता है।
प्रश्न :- नवधा भक्ति करने से क्या फल होता है ?
उत्तर :--तप के भाँडार स्वरूप मुनियों को नमस्कार करने से उच्य गोत्र, पाहारादि दान देने से भोग, प्रतिग्रहण आदि करने से सम्मान, भक्ति करने से सुन्दर रूप और स्तुति करने से सुयश प्राप्त किया जाता है ।
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अध्याय : पांचवां ]
[ १६६ - उच्च गोत्रं प्रणते गो दानादुपासनात्पूजा ।
भक्तेः सुन्दर रूप स्तवनात्कोतिस्तपोनिधिषु ।।१००।
तपस्वियों को प्रणाम करने से उच्च गोत्र; दानादिक देने से भोग, पड़गाहने से पूजा-प्रभावना, भक्ति अर्थात् गुणानुराग से उत्पन्न श्रद्धा विशेष से सुन्दर रूप, तथा 'ग्राप ज्ञान के सागर हैं' इत्यादि स्तुति करने से कीति प्राप्त होती है। ..... विशेषार्थ :-जिस कुल में मोक्ष मार्ग-मुनिमार्ग का प्रचलन हो, उसे उच्च गोत्र कहते हैं, ऐसा उच्च गोत्र मुनियों को प्रणाम करने से प्राप्त होता है। सुन्दर एवं सुखदायी भोजन आदि को भोग कहते हैं । इसकी प्राप्ति मुनियों को ग्राहारादि दानों के देने से होती है । सर्वत्र सम्मान का होना पूजा कहलाती है। इसकी प्राप्ति मुनियों की उपासना-पड़गाहना आदि नवधा भक्ति करने से होती है। गुरणों के अनु-. राग से अन्तरंग में जो श्रद्धा उत्पन्न होती है, उसे भक्ति कहते हैं। मुनियों की ऐसी भक्ति करने से भुन्दर रूप प्राप्त होता है। तथा दिदिगन्त लक फैलने वाले सुयश को कोति कहते हैं । इस कीर्ति को प्राप्ति मुनियों के स्तवन से होती है।
प्रश्न :-थोडा सा दान विशिष्ट फल कैसे प्राप्त कराता है ? .. उत्तर :-~उचित समय में योग्य पात्र के लिये दिया हुआ थोड़ा भी दान उत्तम पृथ्वी में पड़े हुए वट वृक्ष के बीज के समान प्राणियों के लिये माहात्म्य और वैभव से युक्त, पक्ष में छाया की प्रचुरता से सहित बहुत भारी अभिलषित फल कों फलता है-देता है। . .
क्षितिगतमिव बट बीजं पात्र मतदानमल्पमपि काले । फलति उछायाविभवं बहु फल मिष्टं शरीरभृताम् ।।१०१॥
जिस प्रकार उत्तम भूमि में उचित समय में डाला हुअा छोटा-सा बट का .. वीज संसारी जीवों के बहुत भारी छाया के साथ बहुत से इष्ट फल को फलता है, उसी प्रकार उचित समय में सत्पात्र के लिये दिया हुआ थोड़ा भी दान संसारी प्राणियों के लिये अभिलषित सुन्दर रूप. तथा भोगोपभोग आदि अनेक प्रकार के फल को प्रदान करता है । दान पक्ष में 'छाया-विभव' का समास इस प्रकार होता है-'छाया महात्म्यं विभवः सम्पत् तो विद्यते यस्मिन् इति फलस्य विशेषरगं छाया का अर्थ महात्म्य होता है; और विभव का अर्थ सम्पति होता है। छाया और माहात्म्य ये दोनों जिस फल में विद्यमान है, · दान उस फल को देता है । वंट बीज पक्ष में छाया का अर्थ
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[ गो. प्र. चिन्तामरिश अनातप--घाम का प्रभाव होता है और विभव का अर्थ प्राचुर्य--अधिकता लिया जाता है । 'छाया-पातप निरोधिनी तम्या विभवः प्राचुर्य यथाभवत्येवं' इस प्रकार क्रियाविशेषरा किया जाता है । .. विशेषार्थ :--अधिक परिमारग में दिया हुया दान ही सफल होता हो यह.. यावश्यक नहीं है। किन्तु योग्य पात्र के लिए योग्य समय में दिया हुआ थोड़ा सा दान भी अधिक फल देता है । इस विश्व में वट बीज का दृष्टान्त बहुत उपयुक्त है। अर्थात् जिस प्रकार वटं का छोटा-सा बीज यदि योग्य समय में अच्छी भूमि में डाल दिया जाता है तो वह आगे चलकर बहुत भारी छाया के साथ अनेक इष्ट फल प्रदान करता है। उसी प्रकार सत्पात्र के लिए. योग्य काल में यदि थोड़ा भी दान दिया जाता है तो यह आगे चलकर बहुत भारी माहात्म्य और सम्पत्ति के साथ अनेक फल प्रदान करता है। इससे सिद्ध है कि दान में परिमाण की अपेक्षा भावना का विशिष्ट फल है। दान के विषय में पात्र का विचार अवश्य रखना चाहिये । पान उत्तम, मध्यम और जघन्य के भेद से तीन प्रकार का होता है । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के धारक भुनि उत्तम पात्र हैं, श्रावक मध्यंग पात्र है तथा अविरति सम्यग्दृष्टि गृहस्थ जघन्य पात्र है। मिथ्यादर्शन के साथ जो जैन प्राचार का पालन करता है, वह कुपात्र कहलाता है तथा मिच्यादर्शन के साथ जो मिथ्याचार का पालन करता वह अपात्र कहलाता है। सम्यग्दृष्टि मनुष्य पात्र दान के फलस्वरूप स्वर्ग में उत्पन होता है और मिथ्यादृष्टि मनुष्य भोग भूमि में उत्पन्न होता है। कुपात्र दान का फम कुभोग भूमि है और अपात्रदान का फल नरक-निगोदादिक है । . प्रश्न :-दान कितने प्रकार का है ?
उत्तर :-विद्वज्जन श्राहार, औषध और उपकरण तथा श्रावास के भी दान से बैयाबृत्य को चार प्रकार का कहते हैं। ......
. आहारौषधयोरप्युकरणावासयोश्च दानेन । '..
यावृत्यं अक्ते चतुरात्मत्वेन चतुरस्त्राः ॥१०२॥
भक्त पान आदि को आहार कहते हैं, वीमारी को दूर करने वाले पदार्थ को गोप, कहते हैं, ज्ञानोपकरण प्रादि को उपकरण कहते हैं और वसतिका आदि को अावास कहते हैं । इन चारों वस्तुओं को देने से वैयावृत्य चार प्रकर का होता है। . ऐसा पाणिततजन निरूपण करते हैं।
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अध्याय : पांचयां ।
[ १७१ :- विशेषार्थ :-वैयावृत्य का प्रचलित अर्थ दान है. और वह दान चार प्रकार वा है--१.. पाहारदान, २. औषधदान, ३. उपकरणदान, ४. पावासदान । अन्य शास्त्रकारों ने उपकरण दान के स्थान पर ज्ञान दान और प्रावास दान के स्थान पर अभयदान का उल्लेख किया है। परन्तु ज्ञान दान की अगेक्षा उपकरण दान अधिक व्यापक जान पड़ता है, क्योंकि ज्ञान दान में मात्र ज्ञान के उपकरणा-शास्त्रों का दान गभित होता है जबकि उपकरण दान में संयम का उपकरण-मयूरपिच्छ का तथा शौच का उपकरण-कमण्डलु का दान भी गर्भित हो जाता है। यद्यपि यात्रासदानवसलिका का दान, अभयदान का ही एक रूप है तथापि इसकी अपेक्षा पाबासदान जद अधिक व्यापक जान पड़ता है। पूज्यपाद तथा अकलंक स्वामी ने भिक्षा, प्रौपध उपकरण तथा प्रतिश्रय के भेद रो अतिथि संविभाग व्रत के चार भेद माने हैं, जो कि समन्तभद्राचार्य के द्वारा निरूपित चार भेदों के अनुरूप ही है ।
प्रश्न :-..-वह चार प्रकार का दान किस किस के द्वारा दिया गया?
उत्तर :--श्रीपेरण, वृषभसेना, कौण्डेश और मुकर ये चार भेद बाले वैयावृत्य के दृष्टान्त मानने के योग्य हैं। ...
श्रीधेरणवृषभसेने कौण्डेशः मुम्हरश्च दृष्टान्ताः । . वैयावृत्तस्यैले चतुविकल्पस्य मन्तव्याः ।।१०३।।
श्रीपेगा राजा बहारदान, बृपभसेना औषधदान, कौण्डेश उपकरणदान और गुकर पायासदान के दृष्टान्त हैं, ऐसा जानना चाहिये। ..
प्रश्न :- क्या वयावृत्य करने वाले श्रावक को दान और पूजा भी करना चाहिये ?
उत्तर :-श्रावक को आदर से युक्त होकर प्रतिदिन मनोरथों को पूर्ण करने वाले और काम को भस्म करने वाले अरहन्त भगवान के चरणों में समस्त दुःखों को दूर करने वाली पूजा करना चाहिये।
देवाधिदेव चरणे परिचरणं सर्व दुःख निर्हरणम् । कामदुहि कामदाहिनि परिचिनुयादाढतो नित्यम् ॥१०४॥....
इन्द्रादिक देवों के हारा वन्दनीय रहन्त भगवान देवाधिदेव कहलाते हैं। उनके चरण वाञ्छित फल को देने वाले हैं तथा काम को भस्म करने वाले हैं। श्रावक को चाहिये कि वह अादर पूर्वक प्रतिदिन. उनके चरणों की पूजा करे, क्योंकि
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
- १७२ ]
उनकी पूजा समस्त दुःखों को हरने वाली है ।
विशेषार्थ :- गृहस्थ के छह ग्रावश्यक कार्यों में देव पूजा का प्रमुख स्थान है 1. पूजा करते समय पूज्य पूजक, पूजा और पूजा के फल का विचार करना चाहिये | जिसने कामादिक विकास भावों की भस्म कर दिया है ऐसे बीतरांग जिनेन्द्रदेव पूज्य हैं | उपलक्षण से उपर्युक्त विकारी भावों को ग्रांशिक रूप से नष्ट करने वाले निर्ग्रन्थ गुरु तथा सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति में सहायक होने से समीचीन शास्त्र भी पूज्य हैं । यद्यपि ये सब पूजा से प्रसन्न होकर किसी का कुछ नष्ट नहीं करते हैं. तथापि 'कामदुह' मनोरथों को पूर्ण करने वाले कहे जाते हैं । उसका कारण यह है कि इनकी पूजा के काल में पुजा करने वाले मनुष्य के हृदय में जो शुभ रागं उत्पन्न.. होता है, उसके फलस्वरूप पुण्यकर्म का बन्ध होता है और पाप कर्म का अनुभाग क्षीण होता है, इसलिए सुख की प्राप्ति और दुःख का नाश स्वयमेव हो जाता है । उनके गुरणों में जिसे अत्यन्त आदर का भाव है. वह पूजक कहलाता है । परिचर्या, सेवा, उपासना को पूजा कहते हैं और समस्त दुःखों का दूर होना पूजा का फल है । यहाँ प्राचार्य ने 'कामदुहि कामदाहिनि देवाधिदेवचरणे' इन पदों के द्वारा पूज्य का वर्णन करते हुए कहा है कि पूज्य वही हो सकता है जो मनोरथों को पूर्ण करने वाला हो: तथा कामादिक विकारी भावों को भस्म करने वाला हो । पूजक का वर्णन करते हुए 'आता' इस विशेषण द्वारा प्रकट किया है कि पूजक वही हो सकता है जो के. पूज्य गुणों में अत्यन्त आदर भाव रखता है। पूजा का वर्णन करते हुये 'परिचरण' शब्द द्वारा प्रकट किया है कि देव, शास्त्र तथा गुरु की उनकी पद के अनुरूप परिचर्या करना अर्थात् प्रतिमारूप देव की अभिषेक तथा पूजन करना, शास्त्रों की विनय करते हुये उनकी सुरक्षा तथा उनके द्वारा प्रतिपाद्य तत्वों का प्रचार करना और निर्ग्रन्थ गुरुयों की पूजा करते हुये उनकी माहारादि की व्यवस्था करना यह सब पूजा के कहलाती है। और पूजा के फल का वर्णन करते हुये 'सर्व दुःख निर्हरणम्' इस पंद द्वारा प्रकट किया है कि पूजा सब दुःखों को सम्पूर्ण रूप से नष्ट करने वाली है। सम्यग्दृष्टि पुरुष भगवान् जिनेन्द्र की पूजा करते समय यह भाव रखता है कि है भगवन् ! जैसी शान्त निर्विकार मुद्रा श्रापकी है वैसी ही मेरी स्वभाव है । परन्तु मैं स्वभाव को भूलकर विभाव रूप परिणमन के दुःख उठा रहा हूँ। आपकी पूजा के फलस्वरूप में यही चाहता हूँ कि मैं स्वकीय
मुद्रा है, यह मेरा
करता हुआ संसार
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अध्याय : पांचवां ]
। १७३ गद्ध स्वभाव में स्थिर रह । इन्द्र, चक्रवर्ती आदि के पद की मुझं, चाह नहीं है, उन्हें तो में अनन्त बार प्राप्त कर चुका हूँ। उपर्युक्त शुद्ध भावों से की हुई पूजा, परिणामों में अत्यन्त अाह्वाद उत्पन्न करती है । पुण्य बन्ध तो उससे होता ही है यदि कुछ समय के लिए स्वरूप समावेश हो गया तो निर्जरा का भी कारण हो जाती है। जो मनुष्य निश्चल भाव से जिस किसी भी विधि से भगवान की पूजा करता है तो उसके सब मनोरथ सिद्ध होते हैं और दिशाएं उसकी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं अर्थात् जहाँ जाता है, वही उसकी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।
प्रश्न :- पूजा का फल किस किसको मिला? . उत्तर :---हर्ष से प्रमत्त मेढ़क ने राजगृह नगर में एक पुष्प के द्वारा भव्य जीवों के आगे अर्हन्त भगवान् के चरणों की पूजा का माहात्म्य प्रकट किया था। .
अर्हचचरण सपर्या महानुभावं. महात्मनामवदत् । अकः प्रमोदमत्तः. कुसुमेनकेन राजगृहे ।।१०।।
विशिष्ट धर्मानुराग से हर्षित हुए मेढ़क ने राजगृह नगर में भव्य जीवों को बतलाया था कि एक फूल से ही अर्हन्त देव के चरणों की पूजा करने का क्या फल होता है 1
* वैयावृत्य के अतिचार * वेयावत्य के अतिचारों का वर्णन ।
निश्चय से हरित पत्र प्रादि से देने योग्य वस्तु को ढकना तया हरित पत्र प्रादि पर देने योग्य वस्तु को रखना, अनादर, अस्मरणा और मत्सरत्व में पाँच बयावृत्य के अतिचार कहे जाते हैं।
हरितविधान निधाने ह्यनादरास्मरण मत्सरत्वानि । ... वैयावृत्त्यस्यैते त्यतिकमाः पञ्च कथ्यन्ते ॥१०॥
हरे कमलपत्र आदि से आहार को ढाकना हरितपिधान लाम का अतिचार है। हरे कमल पत्र आदि पर अाहार को रखना हरितनिधान नाम का अतिचार है। देते हुए भी आदर का अभाव होना अनादर कहलाता है। माहारादि दान इस समय ऐसे पात्र के लिए देना चाहिये अथवा देने योग्य वस्तुओं में यह वस्तु दी है अथवा नहीं दी है । इस प्रकार की स्मृति का अभाव होना अस्मरण कहलाता है और अन्य
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१७४ ]
गो. प्र. चिन्तामगि
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दाता के दान तथा गुगों के विषय में असहनशीलता का होना मत्सरत्व कहलाता है। ये पांच यावृत्य शिक्षाबत के अतिचार कहे जाते हैं।
विशेषार्थ :-यहां चार प्रकार के दानों में आहारदान की मुख्यता से अतिचारों का वर्णन किया जाता है । मुनि सचित वस्तु के त्यागी होते हैं, अतः उन्हें अचिन-प्रासुका वस्तु ही दी जाती है। परन्तु उस अचित वस्तु को सचित्त काल पत्र
आदि से ढंक कर दिया अथवा चित्त कमल पत्र प्रादि पर रख कर दिया इस तरह सन्चित्त सम्बन्ध को अपेक्षा हरितपिधान और हरितनिधान ये दो अतिचार बनते हैं। .. मुनि को आहार दिया तो सही, परन्तु वेगार समझकर अनादर भाव से दिया इस · स्थिति में अनादर नाम का अतिचार बनता है। अाहारादि की विधि को भूल जाने अथवा किसी वस्तु के देने या न देने का स्मरंगा न रखने पर अस्मरगा नाम का अतिचार होता है । और दूसरे दांता के गुणों में असहनशीलता के होने पर मत्सरस्व नाम का अतिचार होता है। तावार्थसूत्रकार ने सचिस निक्षेप, सचित्तपिधान, परव्यपदेश, मात्सर्य और कालातिकम ये पांच अतिचार बताये हैं। उनमें सचित्तनिक्षेप, सचित्तपिधान और मत्सरत्व ये तीन अतिचार तो समन्तभद्र स्वामी के द्वारा प्रतिपादित अतिचारों में भी परिगरिंगत है। परन्तु पट्यपदेश और कालातिक्रम ये दो अतिचार भिन्न हैं । दूसरे दातार के द्वारा देने योग्य वस्तु को देना परव्यपदेश है । अथवा स्वयं पाहार न देकर नौकर-चाकरों से दिलाना यह अनादर नामक अतिचार का ही
मान्तर है । अाहार के समय को उल्लंघन कर देर में ग्राहार देना यह बालातिकम नाम का अतिचार है।
प्रश्न :--सामायिक प्रतिमा का क्या स्वरूप है ?
उत्तर : --जो चार बार तीन तीन यावत करता है, चार प्रणाम करता है, कायोत्सर्ग में खड़ा होता है, बाह्याभ्यन्तर परिग्रह का त्यागी होता है, दो बार बैठकर नमस्कार करता है, तीनों योगों को . जुद्ध रखता है और तीनों संध्यायों में वन्दना करता है, वह सामायिक प्रतिमाधारी है।
चतुरावर्तनितयश्चतुः प्रणामः स्थितो यथाजातः ।
सामयिको द्विनिषद्यस्त्रियोग - शुद्धस्त्रिसन्ध्यमभिवन्दी ।।१०७।।
इस लोक में से सामायिक प्रतिमा का लक्षण बतलाते हुए उसकी विधि का भी। निण किया गया है. । सामायिक करने वाला पुरुप एक-एक कायोत्सर्ग के बाद चार बार.
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अध्याय : पांचवां ]
[ १७५ तीन पावर्त करता है, अर्थात् प्रत्येक दिशा में "मो अरहताण" इस प्राय सामायिक दण्डया और "थोस्सामिहं" इस अन्तिम स्तव दण्डक के तीन-तीन यावर्त और एक-एक प्ररणाम इस तरह वारह प्रावर्त और चार प्रणाम करता है । श्रावक इन आवर्तादिक की क्रियानों को खड़े होकर करता है, सामायिक को अवधि के भीतर यथाजात नग्न मुद्राधारी के समान वाह्याभ्यन्तर परिग्रह की चिन्ता से दूर रहता है । 'देववन्दना करने वाले को प्रारम्भ में और समाप्ति में बैठकर प्रणाम करना चाहिये इस विधि के अनुसार दो बार बैठकर प्रणाम करता है अर्थात् सामायिक प्रारम्भ करने के लिये प्रथम बार कायोत्सर्ग कर तीन आवर्त करता है, उसके बाद बैठकर पृथिवी में शिर भुकाता हुआ नमस्कार करता है । और सामायिक के बाद कायोत्सर्ग करता है । उसके बाद भी बैठकर पृथिवी में शिर झुकाता हुना नमस्कार करता है और सामयिक के बाद कायोत्सर्ग करता है, उसके बाद भी बैठकर पृथिवी में शिर झुकाता हुंा नमस्कार करता है । तीनों को शुद्ध रखता है अर्थात उनके सावद्य. व्यापार का त्याग करता है और तीनों संध्यायों में वन्दना करता है । यह प्रतिमाधारी श्रावक तीनों ही काल प्रातः, मध्याह्न नौर सायंकाल में कम से काम अडतालीस मिनट तो सामायिक करने को नियम से बैठता है, सामायिक का काल उत्कृष्ट रूप से सवा दो घण्टे का है। दूसरी प्रतिमा में जो सामायिक शिक्षाबत है, उसका शीलबत के हप में पालन होता है। उसमें २ घडी के समय का और तीन बार करने का नियम नहीं रहता है । परन्तु सामायिक प्रतिमा में नियम रहता है ।
प्रश्न :-प्रोषधोपनास प्रतिमा का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :--जो प्रत्येक मास में चारों पर्व के दिनों में अपनी शक्ति को न छिपाकर प्रोषध सम्बन्धी नियम को करता हुआ एकाग्रता में तत्पर रहता है, वह प्रोषधोपवास प्रतिमाधारी है।
पर्वदिनेषु चतुर्वपि मासे मासे स्वशक्तिमनि गुह्यः । . प्रोषधनियमविधायी परिणधिपर प्रोषधानशनः ॥१०८।।
'प्रोपधेन अनशनमुपवासो यस्यासौ प्रोषधानशनः' इस विग्रह के अनुसार बारा-पारणा के दिन एकासन के साथ पर्व के दिन जो उपवास करता है, वह प्रोपधोपवास अत का धारक कहलाता है । इस प्रतिमा के धारी को प्रत्येक मास की दो . अष्टमी और दो चतुर्दशी इस प्रकार पर्व के चारों दिनों में अपनी शक्ति को न छिपा
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[ मो. प्र. चिन्तामणि कर उपवास करना होता है। साथ ही धारणा-पारणा के दिन नियम पूर्वक एकासन करना होता है । इस प्रतिमा का धारक शुभ ध्यान में तत्पर रहता है। .
. . जिन प्राचार्यों ने प्रोषध का अर्थ एकासन न कर पर्व किया है, उनके मत से ' 'प्रोषधानशनः' शटद का समास इस प्रकार होता है ‘प्रोण पर्वणि अनशनमुपवासो
यस्यासी' अर्थात् पर्व के दिन जो उपवास करता है । इस पक्ष में प्रोषधनियमविधायी . इस शब्द का विग्रह इस प्रकार होता है.--'प्रोषधस्य पर्वणो नियमं विदधातीति - प्रोषधनियमविधायी' अर्थात् पर्व के दिन पञ्च पापों, अलंकार, ग्रारम्भ, गन्धपुष्प, ..... स्नान, अंजन, तथा. नस्य आदि के त्याग का जो नियम बताया गया है, . उसका पालन करता है और उपवास के समय अपने चित्त को एकाग्र रखता
है । अर्थात् शुभ ध्यान में लीन रहता है। प्रागिणधानं 'प्रणिधिः' इस व्युत्पत्ति के
अनुसार प्रणिधि का अर्थ चित्त की एकाग्नता है, उसमें जो तत्पर है, वह प्रविधिपर . कहलाता है । यहां चित्त की एकाग्रता से शुभ व्यान. का अर्थ ग्राह्य हैं । श्लोक में जो
'स्वशक्तिमनिगुह्य' पद दिया गया है, उससे सूचित किया है कि शक्ति के रहते हुए तो अवश्य ही उपवास करना चाहिये । परन्तु वृद्धावस्था या बीमारी ग्रादि के कारण यदि उपवास की शक्ति क्षीण हो गई है, तो अनुपबास या एकासन भी कर सकता है।
प्रश्न : -सचित्त त्याग प्रतिमा का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-----जो दया की मूर्ति होता हुना, अपक्व - कच्चे मूल, फल, शाक; शाखा, करीर, कन्द, प्रसून और बीज को नहीं खाता है, वह यह सचित्त त्यागी हैं ।
मूल फल शाक शाखा करीर कन्द प्रसून बोजानि । नामानि योऽति सोऽयं सचित्त विरतो दयामूर्तिः ॥१०६।।
मली, गाजर, · शकरकन्द ग्रादि मल कहलाते हैं, प्राम, अमरूद ग्रादि फल कहलाते हैं, भाजी को शाक कहते हैं, वृक्ष की नई कोपल को शाखा कहते हैं, बांस के - अंकुर को करीर कहते हैं, जमीन में रहने वाले अंगोठा आदि को कन्द कहते हैं । गोभी
आदि के फूल को प्रसून कहते हैं और गेहूं चना आदि को वीज कहते हैं। ये सब .... अपक्व अवस्था में सचित्त-संजीव होते हैं । अतः दया का बारक 'श्रावक इन्हें नहीं
खाता है, गेहूँ चना ग्रादि बीज हरी अवस्था में तो सचित्त हैं ही, परन्तु अंकुरोत्पादन की शक्ति की अपेक्षा शुष्क ग्नावस्था में भी सचित्त माने जाते हैं, अत: ब्रती मनुष्य इन्हें खण्डित अवस्था में ही खाता हैं।
इस श्लोमा में जो मूल आदि बनस्पतियां गिनाई गई हैं, वे उनकी जातियां
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अध्याय : पांचवां ]
। १७७
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बतलाने के अभिप्राय से गिनाई गई हैं। ये सभी भक्ष्य हैं यह अभिप्राय नहीं लेना चाहिये, क्योंकि उनमें मूल, कन्द तथा प्रसून स्पष्ट ही बहुधात तथा बसघात का कारण होने से अभक्ष्य हैं । अतः इनका त्याग भोगोपभोग परिमारणबल में करा जा चुका है। यहां इनका 'अपक्व' अवस्था में त्याग बताया है । इसलिए पक्व अवस्था में ये ग्राह्य हैं। ऐसा फलितार्थ लगाकर व्रती मनुष्य को इनके सेवन में प्रवृत्ति नहीं करना 'श्राहिये । 'इस प्रसंग में स्वत: स्वभाव से सूखी हुई सोंठ तथा हल्दी आदि का दृष्टान्त देना संगत नहीं है, क्योंकि उनका उपयोग औषध के रूप में जब कभी होता है, अतः रागांश की तीव्रता नहीं रहती । परन्तु मूली, गाजर, आलू, अदरख अादि के सेवन में .. स्पष्ट हो राग की तीव्रता रहती है, जो कि वृती मनुष्य के लिये त्याज्य हैं। फल, शाक, शाखा आदि. जो भक्ष्य वनस्पतियां हैं. :. उन्हें छिन्नभिन्न या अग्नि में पकाकर लेना चाहिये।
सुक्कं पक्कं ततं अंविल लघणेरण मिस्सियं दत्वं । ..... जज तेरा यछिण्णं तं सव्वं फासुवं भरिणयं ॥११०लाटी संहिता-७-१७१.
भक्षणेऽत्र सचित्तस्य नियमो न तु स्पर्शनम् ।... । तत्स्वहस्तादिना कृत्वा प्रासुकं चात्र भोजयेत् ।।१११॥ला. सं. ७-१७ ..
यद्यपि छिन्नभिन्न करने में दोष आता है, लेकिन इस प्रतिमा में इतना सूक्ष्मता का विचार नहीं होता है. 1
सचित त्यागी व्रती को प्रत्येक भक्ष्य वनस्पतियों को अचित्त करके ही खाने के उपयोग में लेना चाहिये ।
प्रश्न :--रात्रिभुक्ति त्याग प्रतिमा का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :--जो जीवों पर दयालुचित्त होता हुआ रात्रि में अन्न, पेय, खाद्य और लेह्य – चाटने योग्य पदार्थ को नहीं खाता है, वह रात्रि मुक्ति त्याग प्रतिमाधारी श्रावक है।
अन्नं पानं खाद्य लेह्य नाश्तातियो विभावर्याम । सच रात्रिभक्ति विरत: सत्वेष्वनुकम्पमानमनाः ।।११२।।
वह श्रावक रात्रि भुक्तिविरति - रात्रि भोजन त्याग प्रतिमाधारी कहलाता है जो जीवों पर दयालु चित्त होता हुमा रात्रि में अन्न-दाल, भात, ग्रादि. पान -- द्राक्ष आदि का रस, खाद्य-लड्डू आदि और लेह्य-रवडी आदि को नहीं खाता है। ..
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... १७८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिग .. इस प्रतिमा का नाम रात्रि भोजन त्याग प्रतिमा है । प्रश्न है कि जब छठवीं प्रतिमा में चार प्रकार के प्राहार का त्याग कराया जा रहा है । तब. क्या इसके पहले रात्रि भोजन की छूट रहती है ? दूसरी सोर जव पहली दर्शन प्रतिमा में ही रात्रि. जल का त्याग हो जाता है, तब भोजन की सम्भावना ही कहां रहती? इस स्थिति में इस प्रतिमा की क्या उपयोगिता हैं ? इसका उत्तर यह है कि इस प्रतिमा के पूर्व की प्रतिमाओं में कृत की अपेक्षा नहीं, परन्तु इस प्रतिमा में कृत, कारित, दमोदना तथा मन, वचन, काया इन नौ कोटियों से त्यांग हो जाता हैं। इस प्रतिमा का धारी श्रावक न स्वयं रात्रि को भोजन करता है. न दूसरों को कराता है और न करते हुए की अनुमोदना करता है।
किन्हीं-किन्हीं प्राचार्यों ने इस प्रतिमा का नाम दिवामैथुन त्याग रखा है, अर्थात् दिन में मैथुन का त्याग होना । यहां भी प्रश्न होता है कि जब दूसरी प्रतिमा में ब्रह्मचर्याणुगत के अतिचारों में कामतीमाभिनिवेश नामक अतिचार का त्याग हो जाता है, तब पांचवी प्रतिमां तक दिदा मैथुन की संभावना कहां रहती हैं, जिसका कि इस प्रतिमा में त्याग कराया जाता है ? बिना कामतीनाभिनिवेश के दिवामैथुन में प्रवृत्ति नहीं हो सकती, उसका उत्तर यह है कि इस प्रतिमा में उपयुक्त नौ कोटियों से त्याग होता है।
प्रश्न :-ब्रह्मचर्य प्रतिमा का क्या स्वरूप है ? . . . ... उत्तर :-शुक्र शोगितरूप भलसे उत्पन्न मलिनता का कारण मलमूत्रादि
को भराने बाले दुर्गन्ध से सहित और पलानि को उत्पल करने वाले शरीर को देखता हुभा जो काम सेवन से विरत होता है, वह ब्रह्मचारी अर्थात् ब्रह्मचर्य प्रतिमा का बारक होता है।
मलबीजमलयोनि गलन्मलं पूर्ति गन्धि बीभत्सम् ।। पश्यनङ्गमनङ्गाद्विरमतियो ब्रह्मचारी सः ॥२२॥११३॥
काम से प्राकुलित स्त्री-पुरुष एक दूसरे के शरीर को देखकर उसके सेवन में, प्रवृत्त होते हैं । यहां शरीर की यथार्थता का वर्णन करते हुए कहा गया है कि यह शरीर मलवीज हैं अर्थात शुक्रशोगितरूप मल ही इसका कारण है, मलयोनि है अर्थात् ।
मलिनता-अपवित्रता का कारण है। इससे सदा मलमूत्र तथा पसीना आदि झरता । .. रहता है, दुर्गन्धित है, और, बीभत्स है अर्थात समस्त अवयवों में देखने वालों को ग्लानि
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अध्याय : पाँचयाँ ।
] १७६ उत्पन्न करने वाले हैं । इस प्रकार शरीर के घृणित रूप का विचार जो कामसेवनमैथुन क्रिया से निवृत्त होता है, वह ब्रह्मचारी है। : ब्रह्माणि अात्मनि चरतीति ब्रह्मचारी' जो आत्मा में चरण करता है-अपने ज्ञातादृष्टा स्वरूप में लीन रहता है, वह ब्रह्मचारी है। जिस पदार्थ से राग घटाना, इष्ट होता है, उसके विभत्सरूप का चिन्तन करना आवश्यक होता है। यहां प्राचार्य को शरीर से राग घटाना इष्ट है, उसके बिभत्सरूप का वर्णन किया गया है । तत्व दृष्टि से विचार करने पर शरीर ना काही स्थान है, क्योंकि माता-पिता के शुक्रजोगितरूप अपवित्र उपादान से इसकी उत्पत्ति हुई है, मलिनता-अपवित्रता का कारण है, मगरे का समय ३५ नव द्वारे अपवित्र पदार्थ करते हैं। दुर्गन्धित हैं, और देखने वालों को ग्लानि उत्पन्न करने वाला है, ऐसे शरीर से राग घटा कर विषय सेवन से निवृत होना ब्रह्मचारी का लभरा है । ब्रह्मचर्य की साधना के लिये शरीर की ओर से अनुराग भरी दृष्टि को हटाकर अपने ज्ञानानन्दः स्वभाव में दृष्टि स्थिर करना त्राहिये । ब्रह्मचारी की वेषभूपा रहन सहन तथा भोजन आदि सभी सात्त्विक रहते हैं।
प्रश्न :- प्रारम्भ त्याग प्रतिमाका का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- जो प्राण घात के कारण सेवा, खेती तथा व्यापार आदि प्रारम्भ से निवृत्त होता है, वह प्रारम्भ त्याग प्रतिमा का धारक होता है ।
सेवा कृषि वाणिज्य प्रमुखादारम्भतो न्युपारमतिः ।। प्राणाति पातहेतोर्योऽसावारम्भविनिवृत्तः ॥११४॥
यहाँ प्रारम्भ से निवृत्त होने के लिये ग्रंथकार ने 'व्युपारमति' क्रिया का प्रयोग किया है, जो थि, उप और पाङ उपसर्गपूर्वक रम धातु का रूप है । उगसगों के . कारण उसका अर्थ 'विशेषेगा पासमन्तात् अारम्भेभ्य उपरतो जायते' अर्थात् प्रारम्भ से विशेषतापूर्वक सब ओर से निवृत्त होना होता है । प्रारम्भ का अर्थ परिग्रह संचय करने की विधि विशेष है । उस विधि में सेवा-नौकरी, खेती तथा वाणिज्य' प्रमुख है। पारम्भ त्याग क्यों किया जाता है ? इसका समाधान करने के लिए प्रारम्भ का. 'प्रारणातिपात हेतोः' यह हेत्वर्थक विशेषण दिया है, अर्थात् जो प्रारम्भ, प्राण घात का हेतु है, उससे उसकी निवृत्त होना चाहिये । इस विशेषण के देने से यह सिद्ध हो जाता है कि प्रारम्भत्यांग प्रतिमा का. धारी श्रावक अभिषेक, दान, पूजन आदि का
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१८० ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिह
प्रारम्भ कर सकता है । उससे उसकी निवृत्ति नहीं होती, क्योंकि वह प्राण घात का पारण नहीं है प्राविहिंसा को बचाकर ही कार्य किये जाते हैं। यहां यह विकल्प उठाया जा सकता है, कि जिस वाशिज्य आदि प्रारम्भ में प्राणिहिंसा नहीं होती, उसे कर सकता है क्या ? इसका उत्तर टीकाकार ने दिया है कि ऐसे प्रारम्भ से उसकी निवृत्ति न हो यह हमें अनिष्ट नहीं है अर्थात् स्वीकृत है, क्योंकि जो प्रारम्भ प्राण घात का हेतु है, उसी से निवृत होने वाले श्रावक के यह प्रतिमा होती है !
. प्रश्न यह उठता है कि प्रारम्भ त्यांग प्रतिमा का धारी श्रावक पंच सूनायों का भी त्यागी होता है ? अपने स्नान आदि के लिये पानी भरेगा ? अपने वस्त्र स्वयं धोवेगा? अपने स्थान को बुहारी से साफ करेगा ? और अपने लिये भोजन बनावेंगा या नहीं ? समन्तभद्रं स्वामी ने प्रारम्भ के लिये जो · 'सेवा कृषि वाणिज्य प्रमुखात्'." और 'प्राणातिपात हेतोः' ये दो विशेषरण दिये हैं, उनसे सिद्ध होता है कि यहां व्यापार सम्बन्धी प्रारम्भ का त्याग कराना ही उन्हें इष्ट है । संस्कृत टीकाकार का भी यही भाव विदित होता है । अागामी प्रतिमा का नाम परिम्ह त्याग प्रतिमा है उस प्रतिमा की भूमिका के रूप में प्रारम्भ त्याग प्रतिमा है, अर्थात जो आगे चल कर परिग्रह का त्याग करने वाला है, उसे इस प्रतिमा में नवीन परिग्रह का अर्जन करना । छोड़ देना चाहिये । जो कुछ पहले का किया हुआ संचय उसके पास है, उसीसे अपना । निर्वाह करना चाहिये । संस्कृत टीकाकार की तो यह भी संमति जान पड़ती है कि जिस प्रारम्भ में प्राणिघात नहीं है, वह प्रारम्भ भी किया जा सकता है। इस प्रतिमा का धारी श्रावक परिग्रह रखते हुए भी निमन्त्रण न होने की स्थिति में स्वयं भोजनः । बनाकर नहीं खांव-भूखा रहे, यह कुछ . उचित नहीं जान पड़ता। इस प्रतिमा का
धारक श्रावक भोजन के विषय में स्वाश्रित है, पराश्रित नहीं हैं । इसलिये वह सावन - धानी पूर्वक अपना भोजन स्वयं बना सकता है और पात्र दान का अवसर आता है, तो
उसे भी कर सकता है । पानी भरना, कपड़े धोना तथा अपने स्थान को कोमल वुहारी आदि से साफ करना यह कार्य स्वयं सिद्ध है । 'सेवा कृषि वाणिज्य प्रमुखात्' इस । विशेषण में जो प्रमुख शब्द हैं, उसेसे पशु पालन आदि हिंसक व्यापारों का संग्रह । करना विवक्षित हैं, सूनाओं का नहीं, स्वामी समन्तभद्र ने 'अपसूनारम्माणामार्याणा मिष्यते दानम्' इस श्लोक में सूनायों और प्रारम्भों का पृथक् पृथक् उल्लेख किया है। इससे सिद्ध होता है कि उन्हें प्रारम्भ शब्द से व्यापार ही अभीष्ट है, सूनाओं का है।
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अध्याय : पांचवां ।
. [ १८१ . प्रारम्भ में समावेश करना उन्हें अभीष्ट नहीं है। .
प्रश्न :- परिग्रह त्याग प्रतिमा का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-~-दश प्रकार के बाह्य परिग्रह में ममता भाव को छोड़कर : निर्ममत्व भाव में लीन होता हुआ जो अात्म स्वरूप में स्थित तथा संतोष में तत्पर .. रहता है, वह सब ओर से चित्त में स्थित परिग्रह से विरत होता है ।
बाह्मषु दशषु वस्तुषु ममत्व मुत्सृज्य निर्ममत्वरतः। स्वस्थः संतोषपरः परिचित्त परिग्रहाद्विरतः ॥११५॥
'परि समन्तात् चित्तस्थः परिग्रहोहि. परिचित्त परिग्रहः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो परिग्रहं निरन्तर चित्त में स्थित रहता है, ऐसे ममता के स्थान भूत परिग्रह को परिचित परिग्रह कहते हैं। इस परिग्रह से विरत वही हो सकता है, जो क्षेत्र, बास्नु, वन, धान्य, द्विपद, चतुष्पद, शयनासन, यान, कुप्य और भाण्ड इन दश बाह्य वस्तुओं में ममता-मूळ भाव को छोड़कर निर्ममत्व भाव में स्थित रहता है, अर्थात् ऐसा विचार करता है कि ये बाह्य पदार्थ मेरे नहीं हैं और मैं भी इनका नहीं है, मायाचार प्रादि से रहित होकर. सदा स्वस्थ रहता है--अपने ज्ञाता दृष्टा स्वरूप में स्थित रहता है, और संतोष में तत्पर रहता है-परिग्रह की आकांक्षा से निवृत्त रहता है।
क्षेत्रमिति--जहां धान्य उत्पन्न होता है, ऐसे डोहलिका आदि स्थानों को खेत कहते हैं । जिस खेत में चारों और से बंधान डालकर. पानी रोक लेते हैं । ऐसे · धान्य के छोटे-छोटे खेतों को डोहलिका कहते हैं, इन्हे ग्राम्य भाषा में मढ़ा या डैया
आदि भी कहते है । मकान प्रादि को वास्तु कहते हैं। सोना चांदी आदि को धन कहते हैं धान, गेहूँ, चना ग्रादि को धान्य कहते हैं । दासी दास यादि को द्विपद कहते हैं, गाय, भैस ग्रादि को ग्रासन कहते हैं, डोली-पालकी प्रादि को यान कहते हैं, रेशन, सूती तथा कोशा आदि के वस्त्रों को कुप्य कहते हैं और चंदन, मंजीठ, कांसा तथा ताम्बा आदि के बर्तनों को भाण्ड कहते हैं । यह दश प्रकार का परिग्रह उपयोगी होने से निरंतर मनुष्य के मन में स्थित रहता है, इससे ममत्व भाव को छोड़ना सो . परिग्रह त्याग प्रतिमा कहलाती है। .. जो परिग्रह अनुपयोगी रूप से घर में पड़ा है, उसके त्याग में कोई खास. ... महत्त्व नहीं रहता, क्योंकि त्याग के पूर्व भी. उसमें खास ममत्व. भाव नहीं रहता।
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१८२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
किन्तु जो गृहस्थी के निर्वाह के लिये प्रावश्यक होने से मन में अपना स्थान बनाये रखते हैं, वहीद होना इस प्रतिमा की विशेषता है । बाह्य परिग्रह के त्याग का कारण संतोष है, क्योंकि जब तक संतोष नहीं होता तब तक त्याग नहीं हो सकता, इसलिये ग्रंथकर्त्ता ने त्याग करने वाले को 'संतोषपरः' विशेषणा दिया है, जितना कुछ परिग्रह उसने अपने लिये निश्चित किया है, उसमें संतुष्ट रहने से ही उसके व्रत की रक्षा हो सकती है। त्याग करने का लक्ष्य स्वस्थ होना है, अर्थात् अपने ज्ञाता दृष्टा स्वभाव में स्थिर होना ही परिग्रह त्याग का प्रयोजन है । यदि इस प्रयोजन को और लक्ष्य नहीं है, तो उस त्याग से लाभ नहीं होता । परिग्रह त्याग प्रतिमा का धारी श्रावक अपने निर्वाह के योग्य वस्त्र तथा बर्तनों को रखकर शेष परिग्रह से अपना स्वामित्व छोड़ देता है। यदि पुत्र है तो समीचीन शिक्षा के साथ अपने परिग्रहका भार उसे सौंपता है । यदि पुत्र नहीं है तो दत्तक पुत्र या भाई भतीजा श्रादि को परिग्रह का भार सौंपकर निश्चिन्त होता है । घर रहता है और घर में भोजन करता है | यदि अन्य साधर्मी भाई निमन्त्रणा करते हैं, तो उनके घर भी जाता है। स्वयं व्यापार नहीं करता, परन्तु पुत्र प्रादि यदि किसी वस्तु के संग्रह आदि में अनुमति मांगते हैं, तो उन्हें योग्य अनुमति देता है ।
प्रश्न : - अनुमति त्याग प्रतिमा का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- निश्चय से खेती आदि के आरंभ में प्रथवा परिग्रह में अथवा इस . लोक सम्बन्धि कार्यों में जिसकी अनुमोदना नहीं हैं, वह समान बुद्धि का धारक श्रावक अनुमति त्याग प्रतिमा का धारी माना जाना चाहिये ।
अनुमतिशरम्भे वा परिग्रहे एहि केषु कर्मसु वा ।
नास्ति खलु यस्य समधीरनुमतिविरतः स मन्तव्यः ॥ ११६ ॥
जो खेतीयादि प्रारम्भ, धनधान्यादिक परिग्रह तथा इस लोक सम्बन्धि विवाह आदि कार्यों में अनुमति नहीं देता तथा इष्ट अनिष्ट परिणति में बुद्धि रहता है। उसे अनुमति त्याग प्रतिमा का धारक भावक जानना चाहिये ।
प्रारम्भ त्याग प्रतिमा में नई कमाई का त्याग करता है, परिग्रह त्याग प्रतिमामें परिग्रह के स्वामित्व से निवृत होता है और अनुमति त्याग प्रतिमा में परिग्रह सम्बन्धि किसी प्रकार की अनुमति भी नहीं देता । पुत्र आदि उत्तराधिकारी अपनीबुद्धि से जो कुछ करते हैं, उसमें मध्यस्थ भाव रखता है। हानि लाभ के अवसर पर
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अध्याय : पांचवां ] चित्त में संश्लेश नहीं करता । भोजन के अवसर पर घर के या समाज के लोगों में जो भी प्रार्थना करते हैं, उनके यहां भोजन करता है, किसी का निमन्त्रण पहले से स्वीकृत नहीं करता और न किसी से किसी इच्छित वस्तु के बनाने आदि की इच्छा प्रकट करता है। एक बार ही आहार पानी को ग्रहण करता है। इस प्रतिमा का धारी
श्रावक पारलौकिक धार्मिक कार्यों में अनुमति दे सकता है, परन्तु स्वयं अग्रसर होकर किसी कार्य करने का विकल्प मागे कसर नहीं लेना । . : . ... प्रश्न :- उहिष्ट त्याग प्रतिमा का क्या स्वरूप है ? . .
उत्तर :-जो घर से मुनियों के पास बन को जाकर गरु के पास प्रत ग्रहण कर भिक्षा भोजन करता हुया तपश्चरण करता है तथा वस्त्र के खण्ड को धारण करता है, वह उत्कृष्ट श्रावक है ।।
गृहलो मुनिवनमित्वा गुरुपकण्ठे व्रतानि परिगृह्य । भक्ष्याशनस्तपस्यन्नुस्कृष्ट । श्चेल' खण्डधरः ॥११७॥
उद्दिष्ट त्याग नामक ग्यारहवें स्थान से युक्त श्रावक उत्कृष्ट कहलाता है. । .. यह कौपीन-लंगोट मात्र वस्त्र को धारण करता है । भिक्षा एवं भक्ष्यं इस तरह स्वार्थ,
में गय प्रत्यय अथवा भिक्षाणां समूहो भक्षं इस तरह समूह अर्थ में अरण प्रत्यय होने पर भैक्ष शब्द सिद्ध होता है । इस प्रतिमा का धारी भिक्षा में भोजन करता है अर्थात् मुनियों की तरह चर्या के लिये निकलता है। पड़गाहे जाने पर जहाँ अनुकूल विधि मिलती है, वहाँ भोजन करता है। अथवा जो अनेक भैक्ष्य होता है, वह किमी पात्र में गृहस्थों के घर से भिक्षा को लेता हैं जब उदर पूर्ति के योग्य भोजन एकत्रित हो जाता है तब किसी श्रावक के घर प्रामुक जल लेकर भोजन करता है । इस प्रतिमा को धारण करने वाला श्रावक घर छोड़कर मुनियों के वन में चला जाता है तथा उनके पास प्रत धारण कर उन्हीं की देख-रेख में तपश्चरण करता है । मुनिवन का अर्थ मुनियों का प्राश्चम है । समन्तभद्र स्वामी के समय मुनि, वन में ही निवास करते थे इसलिये उत्कृष्ट श्रावक को गहत्याग कर मुनि वन में जाने की आज्ञा दी गई है। इस समय मुनियों में ग्रामवास या चैत्यबास चल पड़ा है, इस लिए मुनिवन का अर्थ मुनियों का प्राश्रम लिया जाता है। .. . . . विशेषार्थ--इस प्रतिमा धारी को भैश्याशन कहा है । उसी से सिद्ध है कि यह उद्दिष्ट आहार का त्यागी होता है। किसी खास व्यक्ति के उद्देश्य से जो अाहार .
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१८४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
बनाया जाता है, वह उदिदष्टाहार कहलाता है. इस प्रतिमा वारी के ऐलक और क्षुल्लक की अपेक्षा दो भेद प्रचलित हैं। ऐलक लिङ्ग का परदा अर्थात् लंगोट धारण करते हैं और क्षुल्लक लंगोट के शिवाय एक खण्ड वस्त्र भी रखते हैं । खण्ड वस्त्र का अर्थ इतना छोटा वस्त्र लिया जाता है कि जिससे सिर ढकने पर पैर न ढक सके. पैर टकने पर शिर न ढक सके । मार्जन के लिये क्षुल्लक मयूरपिच्छ से निर्मित पिच्छी या वस्त्र के एक खण्ड को रखते हैं। तथा ऐलक पीछी हो रखते हैं।
क्षुल्लक केश लोंच भी करते हैं केंद्री, छुरा से क्षौर कर्म कराते हैं। परन्तु ऐलक केश लोच ही करते है | क्षुल्लक पात्र में भोजन करते हैं, परन्तु ऐलक हाथ में ही भोजन करते हैं, क्षुल्लक और ऐलक दोनों बैठकर ही भोजन करते हैं। दोनों ही पैदल विहार करते हैं। रेल, मोटर आदि में यात्रा करना इस पत्र में वर्जित है ।
पहली से लेकर छठवीं प्रतिमा तक के धावक, सातवी से नौवीं प्रतिमा तक के श्रावक को मध्य श्रावक और दसवीं तथा ग्यारवी प्रतिमा के धारक को उत्तमं श्रावक कहा जाता है । ग्यारहवी प्रतिमा के धारक थावक को आर्य कहते हैं, और स्त्री को प्रकिा कहते हैं । प्रायिका सफेद रंग की १६ हाथ की साड़ी रखती है । स्त्री पर्याय में धारण किये जाने वाले व्रत का यह सर्वश्रेष्ठ रूप है, इसलिये इसे उपचार से महाव्रत का धारक माना जाता है । अयिका से उतरता हुआ दूसरा स्थान शुलिका है | यह १६ हाथ की साड़ी के सिवाय एक चट्टर भी रखती है । ऐलक क्षुल्लक ग्रार्थिका और क्षुल्लिका दूसरे दिन शुद्धि के समय बदलने के लिये दूसरा लंगोट चद्दर और साड़ी भी रखती हैं, साथ के ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणो स्त्रियों उसकी व्यवस्था रखती हैं। पिछले दिन के वस्त्रों को धोकर यही मुखाती हैं । प्रायिका के केशलोंच तथा भोजन की विधि ऐलक के समान हैं और क्षुल्लिका के केशलोंच तथा आहार की व्यवस्था शुल्लक के समान है ।
सोधा प्रथमः श्य मूर्धजानायेत् । सित कौपीन संव्यानः कर्त्तार्या वा क्षुरेण वा ||३८||
सागार धर्मामृत - अध्याय ७.
वह उत्कृष्ट श्रावक दो प्रकार का है, सफेद लंगोटी तथा सफेद उत्तरीय वस्त्र को धारण करने वाला, पहिला श्रावक, दाढी मस्तक के केशों को कैची से अथवा
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अध्याय : पांचवां ]
. [१८५. छरी से अलग करे। कहीं कहीं वह श्रावक गेले रंग के कपड़े भी धारण करता है। और एकादश तार की जनेऊ (यज्ञोपवीत ) भो धारण करता है। ऐसा आगम में पाया जाता है।
स्थानादिषु प्रतिलिखेत् मृदूपकरणोन सः। कुर्यादेव चतुष्पामुपवासं च तुविधम् ।।३६॥सा०प०अ०७॥११८।।
जैसे मुनि पिछि रखते हैं, उसी प्रकार जीवों की विराधना से बचने के लिए झुल्लक भी बैठते समय, उठते समय, सोते समय, पुस्तकादि उठाते. रखते समय पिछि में जीवों को बचाने अर्थात् जमीन वगैरह की मदु बस्त्र आदि से शुद्धि करके अासनादि का उपयोग करे और चार पर्व सम्बन्धी उपवासों को जरूर करे। वह अतिथि (मुनि) की तरह पर्वोपवास से सम्बन्ध नहीं छोड़ सकता है।
प्रश्न :- एक घर क्षुल्लक और अनेक घर क्षुल्लक में क्या भेद है ? उत्तर : स्वयं समुपविष्टोऽद्यात्पाणिपात्रेऽथ भाजने ।
.. स श्रावकगृहं गत्वा पात्र पाणिस्त बङ्गणे ।।४० ॥११॥ स्थित्वा भिक्षा धर्मलाभं . भणित्या प्रार्थयेत वा। . मौनेन दर्शयित्वाऽगं लाभालाभे समोऽचिरात् ॥४१॥१२०॥
निर्मत्याऽन्यद् गृहं गच्छेद् भिक्षोद्य क्तस्तु केनचित् ।
भोजनायाथितोऽद्यात्तद्भुक्त्वा यद्भिक्षितं मनाक् ॥४२॥ प्रार्थयेन्यथाभिक्षां यावत्स्वोदर पूररणीम् ।। लभेत प्रासु यत्राम्भस्तत्रसंशोध्य तां चरेत् ।।४३॥ .. . .
अर्थ :-~-क्षुल्लक बैठकर पात्र में भोजन करे अथवा हाथ में श्रावक के द्वारा अपित भोजन करे । क्षुल्लक अपने हाथ में पात्र लेकर भिक्षा को निकाले । श्रावक के घर जादे, धर्म लाभ कहे और भिक्षा की याचना करे । “अथवा मौन से श्रावक के प्रांगन में केवल खड़ा होकर भिक्षा की प्रार्थना करके चला माये । भोजन के मिलने अथवा न मिलने पर किसी प्रकार का हर्ष त्रिपाद न करे, राग द्वेष न करे और दूसरों के घर जावे । यदि बीच में कोई श्रावक भोजन के लिये रोके, प्रार्थना करे, तो उसके .. घर पर भी भोजन करे । . परन्तु इतना ध्यान रहे कि पहले जो भिक्षा प्राप्त की है उसे शोधकर खाने के बाद भोजन करें। यदि किसी ने बीच में न रोका हो तो शरीर के लिए जितनी भिक्षा आवश्यक है उसकी पूर्ति जव-तक न हो तब तक भिक्षा के
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[ गो. प्र. चिन्तामरिंग लिये श्रावकों के यहां जावे, तथा जहां पर प्रासुक जल मिले वा संशोधन करके
भोजन करे।
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याकलिन संयम शिलापान प्रक्षालनारिए । स्वयं यतेत चादर्पः परथासंघमो. महान् ॥४४॥१२१॥ ततो गत्वा गुरुपान्तं प्रत्याख्यानं चतुर्विधम् । . गृहणीयाद्धिधिवत्सर्वं गुरोरचालोचयेत्पुरः ॥४५॥१२२।।
प्रागिरक्षारूप संयम की रक्षा करने की इच्छा करने वाला वह क्षुल्लक विद्या अतिशय आदि के मद से रहित होकर अपने भोजन करने के पात्र को रखना, उठाना : तथा उच्छिष्टादि को स्वच्छ करना आदि अपने हाथ से करें, दूसरे मिष्यादि से न. कराये। शिष्यादि से कराने से महान असंयम होता है । क्षुल्लक आहार के बाद गुरु .. के पास जाकर शास्त्रोक्त विधि से चार प्रकार के आहार का त्याग करे, तथा याहार के लिए जाने से लेकर आने तक जो कुछ भी अपनी चैप्टाएँ हुईं उन सबकी गुरु के सामने आलोचना करें। और गोचरी सम्बन्धी दोगों का निराकरण करने के लिए प्रतिक्रमण करे । अब अनेक घर क्षुल्लक का स्वरूप कहते हैं । .
यस्त्वेक भिक्षानियमो गत्वाऽद्यादनु मन्यसो। ..... भुक्त्यमावे पुनः कुर्यादुपवासमवश्यकम् ।।४६॥१२३॥
ग्यारहवीं प्रतिमा धारी क्षुल्लक के दो भेद हैं। एक घर में भिक्षा के नियम वाला तथा अनेक घर भिक्षा करने वाला। उसमें अनेक घर भिक्षा करने वाला क्षुल्लक दातार के घर में जाकर भिक्षा लेकर दूसरे घर में जाकर भोजन कर सकता. है ! परन्तु जिनको एक घर भिक्षा करने का नियम है-वह मुनियों की चर्या होने में
वाद दातार के घर जाने तथा उसी के घर में बैठ कर भोजन करे । कारणवशात् .... भोजन नहीं मिलने पर अवश्य ही उपचास करे। एक घर में से निकलकर अनेक घर भिक्षु के समान दूसरे घर में नहीं जावे ।
उसकी विधि विशेष को कहते हैं... वसेन्मुनिवने नित्यं शुभ येत् गुरूचरेत् । तपो द्विधाऽपि दशधा वैयावत्य विशेषतः ॥४७॥१२४।।
वह क्षुल्लक सदैव संयतों के निकट उनके पाश्रम में रहे । धर्माचार्य की सेवा . . .. करे । और अन्तरंग बहिरंग के भेद से दो प्रकार का तप है, उसका आचरण करे ।
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अध्याय : पाँच ]
[ १८७ और विशेष रूप से संयमित्रों की आपत्ति को दूर करने वाली दश प्रकार की यायत्ति करे यद्यपि अन्तरंग तप में वैवाति का संग्रह होता है। फिर भी अतिशय रूप से मुख्य कार्य बैयाबृत्य है, यह बताने के लिए उसका अलग से उल्लेख किया जाता है।
ग्यारहवीं प्रतिमा के क्षुल्लक और द्वितीय ऐल्लक एसे दादी को बर्शन किया है। उसमें क्षुल्लक के एक घर भिक्षु तथा अनेक घर भिक्षु ऐसे दो भेदों का यन किया है। . .. : ..
.. मागे द्वितीय उद्दिष्ट विरति श्रावक का लक्षण बताते हैं ---- तद्वद् द्वितीयः किन्त्वार्यसंझो लुञ्चत्यसौ कक्षान् । कौपीन मात्रयुग्धत्ते यतिवरप्रतिलेखनम् ।।४८ सागार धर्मा ।।१२५।।
द्वितीय ऐल्लक श्रावक की क्रिया प्रथम क्षुल्लक के समान ही है । विशेषता केवल इतनी है क्षुल्लक हुरी अादि में वाल बनवा सकता है और एक लंगोटी उत्तरीय वस्त्र रखता है। परन्तु ऐल्लक दाढ़ी तथा शिर के बालों को हाथों से उखाड़ता है, कोनी आदि से नहीं करवा सकता है । तथा गुह्य अंग को प्रच्छादन करने के लिए लंगोटी मात्र रखता है। उत्तरीय वस्त्र नहीं रख सकता। तथा मुनियों के समान संयम का उपकरण पिच्छिका रखे ।
स्वपाणिपात्र एकात्ति संशोध्यान्यन योजितम् । - इच्छाकारं समाचारं मिथः सर्वे तु कुर्वते ।।४६।।सागार ०।१२६॥
एडलक गृहस्थी के द्वारा अपंगण किये हुये ग्राहार को अपने हाथ में ही संशोधन करके भोजन करता है, थाली प्रादि में नहीं कर सकता तथा वे सब ऐल्लक परस्पर में "इच्छामि" में तुम्हारे पद की इच्छा करता हूँ, इस प्रकार साधारण समाचार का व्यवहार करे ।
प्रश्न :-क्या ये क्षुल्लक सिद्धान्त ग्रन्थ वीरचर्यादि कर सकते हैं ? उत्तर :-श्रावको बीर चाहः प्रतिमातापनादिषु ।
- स्यान्नाधिकारी सिद्धान्तरहस्याध्ययनेऽपि च ॥५०॥सागार०॥१२॥
ग्यारहवीं प्रतिमाधारी थांबक स्वयं भ्रामरी के द्वारा वीरचर्या का अधिकारी नहीं है, तथा दिन प्रतिमा ग्रीम ऋतु में सूर्य के सन्मुख, पर्वत के शिखर पर ध्यान करना, बर्षा काल में बर्फ के नीचे ध्यान करना और शीतकाल की रात्रि में चौराहे पर खड़े रहकर ध्यान करना आदि लक्षण वाले. कायक्लेश विशेष, पालापनादि
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१८८ ]
[ गो: प्र. चिन्तामणि विकाल योग धारण करने का अधिकारी नहीं है तथा मूत्र रूप सिद्धान्त शास्त्र का
और रहस्य · रूप प्राचीन शास्त्रों का पढ़ने का अधिकारी भी नहीं हैं । इसीप्रकार . प्रायिकाओं को और सामान्य गृहस्थों को भी उपरोक्त अधिकार नहीं हैं।
. [सागार धमामृत, पं० प्राक्षाधर जी, ही. प्रा. सुपाच]
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* प्रायिकाओं के समाचार का वर्णन * एसो अज्जाणपि य मारो जहाविमो पुवं । ....... सव्वाह्य अहोरते विभासि दम्वो जबाजोगं ॥१२॥
मूलगुगयों के अनुरूप प्राचारणा को समाचार कहते हैं। अर्थात् मुनि के समाचार का इतः पूर्व में जैसा वर्णन किया है, वैसा ही प्रार्थिका का भी वर्णन समझना चाहिए। विशेष यह है कि वृक्षमूलयोग, अातापनयोग, अभ्रावकाशयोग ऐसे योगादिक आचरण का प्रायिकाओं को निषेध है। क्योंकि वह उनके प्रात्मशक्ति के बाहर का है अर्थात् उनके अनुरूप नहीं है।
प्रश्न :-श्रायिकाओं का परस्पर किस प्रकार का व्यवहार होता है ? उत्तर :-अपणोणमण फलामो अण्णोण हिरवखरणाभिजुत्तायो।
.. गयरोसवेरमाया सलज्जमज्जाद किरियाप्रो ॥१२६॥
ये गायिकाएँ वसतिका में मत्सरभाव छोडकर रहती हैं। अन्योन्य अर्थात अापस में रक्षण करने के अभिप्राय में पूर्ण तत्पर रहती हैं 1. उनसे रोप, वैर, कपट जैसे विकार नष्ट हुए हैं। ये विकार मोहनीय कर्म के विशेष उदय से होते हैं । उनका बह मोहनीय कर्मविशेष नष्ट होने से वे विकार भी नष्ट हुए हैं। लोकापवाद से करना, यह लज्जा का लक्षण है अर्थात् जिस पाचरणा के लोक में अपनी निदा होगी ऐसे आचरण से वे सर्वदा दूर रहती हैं 1 रागद्वेष को दूर रखकर न्याय्य पाचरण करना मर्यादा का लक्षण है । उभयकुलानुरूप प्राचरण को निया कहते हैं । अर्थात् लज्जा, मर्यादा तथा क्रियाओं से वे अयिकाएं अपने चारित्र का रक्षरा करती हैं।
प्रश्न :--प्रायिकाओं के विशिष्ट पाचरण क्या हैं ? उत्तर:-प्राज्झयणे परियहे सबणे कहणे तहाणुपेहाए ।
तविरणपसंजमेसु य अविरहिटुवोग जुत्तानो ॥१३०॥
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अध्याय : पांचवां ।
[ १८६ जिस शास्त्र का पूर्व काल में अध्ययन नहीं किया था, उसके अध्ययन में, पढ़े हुए शास्त्र को कंठस्थ करने में, सुना हुअा अथवा न सुना हुअा शास्त्र श्रवण करने में, जिस शास्त्र का ज्ञान आपने को है ऐसे शास्त्र का अन्यों को उपदेश करने में लथा. शास्त्र के जीवादि सात तत्वों को मन से चिन्तन करने में तथा अनित्यादि बारह अनुप्रेक्षाग्नों का मन से बार बार विचार करने में वे प्रायिका सतत तत्पर रहती हैं। अनशनादि बाहा तप तथा प्रायश्चित्तादि अन्तरंग तप पालने में मन, वचन और शरीर से बढ़ रहना, इंद्रियों को वश रखना, जीव. वध से दूर रहना अर्थात् प्राणिसंयम पालना, सतत ज्ञानाभ्यास में उधु क्त रहना; ऐसे कार्यों में वे तत्पर होती हैं । - मन, वचन, कायों से शुभाचरणा करती हैं। इस प्रकार की उनकी प्रवृत्ति .. होती है।
और भी विशेषाचरण अविकार बत्थवेसा जल्ल मलविलित्त चत्त देहायो।
माल किनि दिवालरपडिरूवबिमुद्ध चरियानो ॥१३१॥
जिनके स्वभाव में कोपादि विकार उत्पन्न नहीं होते, जो निर्विकार वस्त्र धारण करती हैं । अर्थात् जो रंगीले तथा चित्र विचित्र बस्त्र कदापि धारण नहीं करती हैं। . जिनकी गति-गमन, विलास रहित व देखना कटाक्ष रहित हैं, (सर्वांग में पसीना नाकर उसके ऊपर धूल बैठती है, ऐसी मलिनता को जल्ल कहते हैं तथा शरीर के एक अवयव में उत्पन्न हुई मलिनता को मल कहते हैं । ऐसे) जल्ल और गाल से जो युक्त है, जिनका देह सजावट से रहित है, धर्म, कुल, कीर्ति और दीक्षा के अनुरूप निर्मल पाचरगा जो धारण करती हैं। अर्थात् क्षमादिक धर्म, माता पिता कुल, यश और व्रत इनको अबाधित रखने वाला पाचरण ये पार्मिकायें धारण करती हैं।
प्रश्न :-वे प्रायिकाएं अकेली रहती हैं अथवा मिलकर रहती हैं ? उत्सर :----अगिहत्थमिस्सरिजलये असलिये विसुद्ध संचारे।
.. दो तिण्णिव अज्जानो बहुगोप्रो वा सह त्यति ।।१३२॥.. जिस स्थान में यायिका निवास करती है, उसका वर्णन इस प्रकार है
जहाँ स्त्री, धन धन्यादि परिग्रह युक्त गृहस्थ नहीं रहते हैं, ऐसे स्थान में वे रहती हैं। तथा जहां पर परस्त्री लपट. चोर, चुगली करने वाला, दुष्ट तथा पशुओं का अभाव हैं, ऐसे स्थान में वे रहती हैं । यतियों के निवास स्थान से भी वह ..
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१६० ]
[ गो. प्र.. चिन्तामणि
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श्रायिकानों का स्थान दूर रहता है । तथा वह स्थान बाधा रहित होता है । वह संकलेश रहित अथवा जो गुप्तसंचार करने के लिये योग्य हो अर्थात जो मलोत्सर्ग करने के प्रदेश के योग्य हो । जहाँ बाल, वृद्ध, रोगीजन ा जा सकते हैं, तथा जो शास्त्राध्ययन के लिये उपयुक्त हो ऐसे स्थान में वे प्रायिकाएँ दो, तीन तीस चालीस सक एफब रहती हैं !
प्रश्न :--चे आयिका परगृह में कभी जाती है या नहीं ? .. उत्तर:--ए य परगेह मकज्जे गच्छे कज्जे अवस्सगणिज्जे ।
गरिगणीमा पुच्छित्ता संघाडेणेव गच्छज्ज ॥११३॥ .. मुनियों की वसतिका और गृहस्थ का घर ये दोनों ही परगृह कहे जाते हैं। इन परघरों में प्रयोजन के बिना अायिकाओं का जाना निषिद्ध है । यदि जाने का कुछ . आवश्यक प्रयोजन उत्पन्न हो तो आपका अपनी महत्तरिका-मुख्या को पूछकर जाना सकती है । अर्थात् भिक्षा प्रतिकपणा वगैरह के समय में गणिनी को मुख्य प्रायिका को पुछकर नायिका को जाना चाहिये । परन्तु अंकेली जाना निषिद्ध है । अपने साथ अन्य अन्य आर्यिकानों को लेकर जाना चाहिये । .......
प्रश्न :--स्वस्थान में अथवा परस्थान में कौनसी क्रिया नहीं करना चाहिये ? . .
.. . .. ___ उत्तर :-रोदरगाहावरण भोयगड पयरणं सुत्तं च छविहारंभे ।
घिरदारण पादमखण धोवरणगेयं च ण वि कुज्जा ॥१३४॥. ... स्वस्थान में अथवा परस्थान में दुःखातं को देखकर रोना, अवमोचन करना, बाल कादि को स्नान कराना, उनको जिनाना, रसोई बनाना, कपड़ा सीना, सूत कातना इत्यादि कार्य प्रायिका को करना निषिद्ध है । तथा यतिनों के चरण धोना, उनको • नेल लगाकर अभ्यंगस्नान करना, गीत गाना इन कार्यों का निषेध हैं। ये क्रियायें करने से अायिकाओं की निंदा होती है।
प्रश्न :-प्रारम्भ के छह प्रकारों का वर्णन किस प्रकार है ? .... उत्तर :-पारिणयरण्यगं छेरणं गिहबाहरणं च गेहसारमरणं । . .... कुरावलिप्परणं. कुड्डविदे एदंतु छब्बिहारंभो ॥१३५: ।
पानी लाना, छग । घर का ऋद्धा कचरा बाहर फेंककर घर साफ करना, घर गोबर से लेपना, सम्मार्जन करना, भित्ती लिपना, तथा भित्ती को साफ करना,
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अध्याय : पांचवां ]
१६१ ऐसे छह प्रकार के प्रारम्भ हैं । प्रायिका ऐसे कार्यों को न करे ।
प्रश्न :----भिक्षा के लिये वे किस प्रकार से गमन करती है ? . उत्तर :--तिणिव पंच व सत्त व अज्जाम्रो अण्णमण्यारक्खाओ। . . . . .
धेरोहिं संहतरिदा .. भिक्खाय समोदरति सदा ।।१३६।। तीन किंवा पांच अथवा सात गायिकाएँ परस्पर में रक्षण करने का अभिप्राय मन में धारण करती हुई बद प्रायिकानों के पीछे-पीले अनुगमन करती हुई, भोजन के लिये इपिथ समितिपूर्वक विहार करती हैं। यहाँ 'भिक्षा ग्रहण करना' यह कार्य उपलक्षण रूप समझना चाहिये । जैसे कौवे से दही का रक्षरण करो, अर्थात् कौबे, चूहे वगैरह प्राणियों से दही, दूध वगैरह का रक्षरण करो ऐसा अर्थ माना जाता है । वैसे - भिक्षा के समान देव वंदना वगैरह कार्य के लिये जाने के समय में भी उपर्युक्त पद्धति से ही ग्रायिकाओं की प्रवृत्ति होथे । ऐसा अभिप्राय: प्राचार्य ने प्रकट किया है। ..
प्रश्न :-प्राचार्यादिकों की वंदना मुनियों के समान ही करती है क्या ? उत्तर:-पंच दद सत्स हत्थे सूरी अभावगो य साधू य ।
... परिहरिराज्जानो गवासणेगव वंदति ॥१३७॥ .
आचार्य को प्रायिकायें पांच हाथ दूर से, उपाध्याय को छह हाथ दूर से तथा साधु को सात हाथ दूर से गवासना से ही बैठकर वंदना करती है । जिस प्रकार से गी बैठती है, उसी प्रकार से बैठना उसको गवासन कहते हैं । पालोचना, अध्ययन, स्तुति इनकी अपेक्षा से भेद समझना चाहिये । जैसे—ग्रालोचना करते समय आचार्य से पांच हाथ दूर रहकर आयिका पालोचना करे । छह हाथ दूर रहकर उपाध्याय से अध्ययन करे तथा साधु से मात हाथ दूर रहकर उनकी स्तुति करे । ___ एवं विधाण चरियं चरति जे साधवो य अज्जायो ।
ते जगपुज्ज वित्ति सुहं च लदूरण सिझति ।।१३।।
इस प्रकार अर्थात् इस अध्याय में जो समाचार का सविस्तर वर्णन किया है: .. उसके अनुसार जो साधु और नायिकायें प्रवृत्ति करती हैं 1 वे जगत के द्वारा सम्मान, . कीति और सुख प्राप्त करती हैं और अन्त में मुक्त होती हैं। .
... [ मूलाचार अध्याय ४ पृष्ट सं. १०० ] ... प्रश्न :-छठे प्रमत्तचिरत नामक गुणस्थान का क्या स्वरूप है ? ...... उत्तर :--सञ्चलन और नो कपाय के तीन उदय से समय भाव तथा मल
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[गी. प्र. चिन्तामरिण
१६२ ]
जनक प्रमाद युक्त परिणाम को प्रमत्त विरत गुणस्थान कहते हैं ।
यद्यपि संज्वलन और नो कपाय का उदय चारित्र गुरण का विरोधी है.. तथापि वह प्रत्याख्यानावरण कषाय का उपशम होने से प्रादूर्भूत सकल संयम के. घातने में समर्थ नहीं है । इस कार उपचारका कहा है । इसलिये. इस गुगास्थान वर्ती मुनि को प्रमत्तविरत प्रर्थात् चित्रलाचरण कहते हैं । * सकल चारित्र *
प्रश्न :- प्रपत्तविरत तपोधन का क्या स्वरूप है ? उत्तर :---- -विषयाशावशातोतो. निरारम्भोऽपरिग्रहः ।
ज्ञानध्यानतपो रत्नस्तपस्वी स प्रशस्यते ॥१॥१३६॥
जो विषयों की प्राणा के बम से रहित हो, प्रारम्भ रहित हो; परिग्रह रहित: हो और ज्ञान, ध्यान, तथा तप रूपी रत्नों से सहित हो, यह गुरू प्रशंसनीय है ।
स्पर्शनादि इन्द्रियों के विषय भूल माला तथा स्त्री यादि विषयों की प्राकांक्षा सम्बन्धी प्रधीनता जिनकी नष्ट हो गई है, अर्थात् जिन्होंने इन्द्रिय विषयों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है, जो खेती आदि व्यापार का परित्याग कर चुके हैं । जो बाह्य और अभ्यन्तर परिग्रह से रहित हैं तथा ज्ञान, ध्यान और तप को ही जो रत्नों के समान श्रेष्ठ समझ कर उन्हीं की प्राप्ति में लीन रहते हैं, ग्रट्ठाईस मूल गुणों को धारण करते हैं, ऐसे ही सद्गुरु मुनि तपस्वी होते हैं । येही सच्चे मुनियों का लक्षण है ।
प्रश्न - मूलगुण किसे कहते हैं ?
उत्तर :- मुनियों के प्रधान आचरण को मूलगुण कहते हैं । इन मूलगुणों का पालन करने से उत्तर गुण धारण करने की शक्ति प्राती है । मूल शब्द के अनेक अर्थ होते हैं, तो भी यहां मूल प्रधान, मुख्य ऐसा अर्थ समझना चाहिए, गुण शब्द के भी अनेक ग्रंथ हैं, परन्तु यहां श्राचररण विशेष समझना चाहिये ।
प्रश्न : ---मुनियों के मूलगुण कितने होते हैं ? और उनका क्या स्वरूप हैं ? उत्तर :- पंचय महन्वयाई समिविप्रो पंच जि
वरोछिट्टा ।
श्रावासया
पंचेविदिपरोहाछपिय प्रचंचेलक महारां खिदिसयरणमदंत घस्सरणं चेव ।
fofe भीयय भत्तं मूलगुणा श्रट्टवीसा || ३ || १४१ ।। मूलाचार अ. १
लोचों ||२|| १४० ॥
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अध्याय : पांचवां ।
[ १६३ . .पांच महायत, पांच समितियां पांच ही इन्द्रियों के निरोध, छह आवश्यक, लोय, आचेलक्य, अस्नान, पृथिवीशमन, अदंतधर्षण, स्थिति भोजन, एक भक्त ये मुनिगरगों के अट्ठाईस भूलगुण हैं ।।
प्रश्न :-~-प्रथम पांच महावतों के नाम क्या हैं ?
उत्तर :--हिंसा का स्याग, सत्य, चोरी का त्याग, ब्रह्मचर्य और परिरह का त्याग - ये पांच महाव्रत कहे गये हैं।
प्रश्न :--अहिंसा महावत का क्या लक्षण है ? उत्तर :-कार्योदयगुण मग्गण कुलाउजोरगीसु सधजीवारणां।
गाऊरण य ठाणादिसु हिंसादि विवज्जरण महिसा ॥५॥१४२।। काय, इन्द्रिय, गुणस्थान, मार्गरगास्थान, कुल, आयु, योनि---इनमें सब जीवों को जानकर कायोत्स fदि क्रियानों में हिसा आदि का त्याग उसे अहिंसा महानत कहते हैं।
प्रश्न :--- सत्य महावत का क्या स्वरूप है ? -
उत्तर :- रागादीहि असच्चं चत्ता परताव सच्चबयरपोत्ति। . . सुत्तत्थाणवि कहरणे अयधावयणुभरणं सच्चं ॥६॥१४३॥
रागद्वेषमोह आदि कारणों से असत्य वचन को तथा दूसरे को संताप करने बाले एसे सत्य बचन को छोड़ना और द्वादशांग शास्त्र के अर्थ. कहने में अपेक्षा रहित वचन छोड़ना यह सत्य महायत है ।
प्रश्न :--प्रचौर्य महावत का क्या लक्षण है ?
उत्तर :-गांमादिसु पडिदाइंसपप्पदि परेण संगहि । . रणादाणं परदव्वं अदत्त परिवज्जरणं तं तु ॥७॥१४४॥
ग्राम ग्रादिक में पड़ा हुआ, भूला हुग्रा, रक्खा हुआ इत्यादि रूप अल्प भी स्थल सूक्ष्म वस्तु तथा दूसरे का बड़ा किया हुया ऐसे पर द्रव्य का ग्रहण नहीं करना (नहीं लेना) बह अदत्त त्याग अर्थान् अचौर्य महावृत है ।
प्रश्न :-ब्रह्मचर्य महानत. का क्या स्वरूप है ? उत्तर :---मादुसुदा भगिणी विय दट्ट रिपस्थित्तियं च पडिरूवं ।
'. इथिकहादिणियत्ती तिलोय पुज्ज हवे बं ।।।।१४५।। माता, पुत्री और वहिन के समान बूढ़ी, वालिका और तरुण स्त्रियों को
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क्या लक्षण है ?
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[ गो. प्र. चिन्तामणि समझना. यह त्रैलोक्यपूज्य ब्रह्मचर्य है। स्त्रियों के फोटो, भीत पर लिखे हुए स्त्रियों के . आकार चित्र, मिट्टी, पाषाण इत्यादिक से . बने हुए स्त्रीचित्र अर्थात् मनुष्य, देवांगना
और तिर्यचिणी इनके प्रतिबिंब देखकर इनके ऊपर कामुक नहीं होना यह ब्रह्मचर्य है। . ब्रह्मचर्य का संरक्षगा करने के लिये स्त्रीकथा का त्याग करना चाहिये तथा उनमें
माता, सुता और बहिन का संकल्प रखना चाहिये । अर्थात् स्त्रियों का कोमल भाषण,. मृदु स्पर्श, रूपावलोकन, नृत्य, गीत, हास्य, कटाक्ष निरीक्षण प्रेम से तिरछा देखना इत्यादिकों में अभिलाषा नहीं रखना यह त्रैलोक्य पूज्य ब्रह्मचर्य महावृत है । इस प्रत के नी, इक्यासी और एक सौ वासठ भेद होते हैं ।।
प्रश्न :---परिग्रह त्याग महाव्रत का क्या स्वरूप है ?
... उत्तर :-जीवरिणबद्धा बद्धा परिग्गाहा जीव संभवा चेव । ... ... ..... तेसि सबकच्चागो इयरह्मि य रिगमोऽसंगो ॥११।।१४६॥
बद्ध-जीव में उत्पन्न होने वाले अपति जीव के प्रायन ले रहने वाले विकार जैसे - मिथ्यात्व, वेद-स्त्री, पुरुष और नपुसक इनको भोगने की अभिलापा, हास्य . रति, अरति, शोक, भय, जुासा, क्रोध, मान, माया, लोभ से अन्तरंग चौदह परिग्रह ।
हैं, ये जीवाश्रित हैं। दासी, · दास, गाय, घोड़ा वगैरह को भी चेतन परिग्रह कहते हैं।
. . . .. आबद्ध :-- अनाश्रित. जीन से पृथक रहने वाले परिग्रह जैसे खेत, घर, धनं, ' धान्य वगैरह । इनका संग्रह करने की अभिलापा उत्पन्न होती है, इसलिये ये भी. परिग्रह हैं । जीव संभव-जीवों से जिनकी उत्पत्ति होती है, ऐसे पदार्थों को जीब्रोद्भव “परिग्रह कहते हैं, जैसे—मोती, शंख, सीप, चर्म, दाँल, कंवल वगैरह । तथा मुनिपना.
के अयोग्य ऐसे क्रोधादिक । इन सब परिग्रहों का शक्ति से त्याग करना चाहिये । अर्थात् इनके ऊपर अभिलाषा रखना ही नहीं । इनका मन, वचन और शरीर से.. सर्वथा त्याग करना चाहिये । इस · संयम, ज्ञान और शौच के उपकरणभूत पिछी... । शास्त्र. कमंडलु इत्यादि में ममत्व रहित होना चाहिये । इस संयमोपकरगादिक में अतिमूर्छा नहीं रखना चाहिये । यह पांचवा परिग्रह त्याग-महानत है।
प्रश्न :- पांच समितिओं के भेद और लक्षण क्या है ? .. उत्तर :-इरिया भासा एसरण शिक्खेवादारणमेव संमिदीश्री।
पदिठावशिया य तहा उच्चारादोरण पंचविहा ॥१२॥१४७॥
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अध्याय : पांचवां |
[ १३
ईर्यासमिति, भाषासमिति एषणासमिति श्रादानविक्षेपण समिति और प्रतिष्ठापना समिति --- इस प्रकार समिति के पांच भेद हैं ।
विशेषार्थ :
समिति--प्राना, जाना, बैटना वगैरह क्रिया करना अर्थात् अच्छी तरह से देखकर तथा मन को स्थिर कर गमनागमन क्रिया करना ।
भाषासमिति :: बोलने की सम्यक् प्रवृत्ति करना अर्थात् श्रागम व धर्म से ग्रविरुद्ध तथा पूर्वापर संबंध को न छोड़कर निष्ठुरता, कर्कश, मर्मछेदक वगैरह दोषों से रहित ऐसा भाषा बोलना । एपणासमिति---लोकनिद्य तथा सुतकादि दोष सहित ऐसे कुलों को छोड़कर शुद्ध कुल के गृहस्थों के घर में आहार ग्रहण करना । . निक्षेपादान समिति-ग्राँखों से देखकर व पिंथि सेता कर यत्नपूर्वक वस्तु को रखना और ग्रहगा करना | प्रतिष्ठापना समिति-जन्तुरहित प्रदेश में अच्छा निरीक्षण कर मलमूत्रादिकों का त्याग करना । इस प्रकार से पांच समितियां हैं ।
प्रश्न :-- ईयसमिति का विशेष स्पष्टीकरण क्या है ?
उत्तर :- पासुयममरण दिवा जुगन्त रथे हिरणा सक्कज्जेण ।
जंतूरण परिहरतेगिरियासमिदी हवे गमनं ।। १३ । ११४८ ।।
जिसमें से जीब चले गये हैं अर्थात् निर्जन्तुक मार्ग से सूर्योदय होने पर चार दस्त प्रमाण जमीन देखकर एकाग्रचित करके शास्त्र श्रवण, तीर्थयात्रा, गुरुवंदना इत्यादि धर्म कार्य के लिए एकेंद्रियादि- प्राणियों का रक्षण करते हुए जो मुनिराज गमन करते हैं। उसको ईर्यासमिति कहते हैं । विशेष—- हाथी, घोड़ा, गाय महिष गैरह प्रति हमेशा जाने से जो मार्ग निर्जन्तुक हो गया है, ऐसे मार्ग से ही धर्म कार्य के लिए गमन करते हैं । सूर्योदय होने के अनंतर ग्रांखों में पदार्थ देखने की सामर्थ्य व्यक्त हो जाती है तब चार हाथ तक श्रागे की भूमि निहारते हुये और एकेंद्रियादिक प्राणियों का रक्षण करते हुए मुति गमन करते हैं । ऐसे थागमोदत नमन को ईसमिति कहते हैं ।
प्रश्न :- भाषा समिति का स्वरूप क्या है ?
उत्तर :- सुहास क्कसपरणिवा पप्पल विहादी ।
'वज्जिता सपरहियं भासा समिदी वे कहणं ।। १४ । १४६ ।। वैशून्य --- निर्दोष व्यक्ति के ऊपर दोषारोपण करना, हास- हास्यकर्म के उदय में धर्म की हंसी उड़ाकर हर्ष मानना, कर्कश कर कठोर काम युद्ध कलह प्रवर्तक वचन
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१६६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
बोलता, परनिंदा - दूसरों के सच्चे व झूठे दोष प्रकट करना अथवा दूसरों के गुण : नहीं सहना, या प्रशंसा - स्वतः के गुण प्रगट करने का अभिप्राय रखना, विकथादि स्त्री कथा, भोजन कथा, चोर कथा और राजकथा वगैरह रागद्वेषोत्पादक कथा कहना । ये भाषा के सर्व दोष छोड़कर अपना व अन्य का जिससे कल्याण होगा ऐसा.. कर्म बंध के कारणों से रहित वचन बोलना वह भाषासमिति है 1
प्रश्न :- एषणा समिति का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-छादाल दोस सुद्ध कारणजुत्तं विसुद्धणक्कोडी |
सोदादी समभुत्ता परिसुद्धा एसरणां समिदी ।। १५ ।। १५० ।। मुनि जो ग्राहार लेते हैं, वह उद्गमादि दियालीस दोषों से रहित निर्दोष होता है | ( उद्गम दोष के सोलह भेद हैं। उत्पादन दोष भी सोलह प्रकार का है । एपगा दोष के दस भेद हैं | तथा गंगारादिदोष के चार भेद हैं। इनका वर्णन पिड शुद्धि अधिकार में करेंगे ।) असातावेदनीय कर्म का उदय होने से उत्पन्न हुई क्षुधा को मिटाने के लिए और वैयावृत्यादि करने के लिये मुनि श्राहार लेते हैं । बल और आयुष्य वृद्धिगत होने की इच्छा से वे बाहार नहीं लेते हैं । दाता स्वतः के लिए जो निर्दोष आहार बनाता है, वही मुनि लेते हैं । मुनि मन, वचन, शरीर कृत, कारित और अनुमोदन इन नौ भेदों से रहित ग्राहार लेते हैं । ग्राहार बनाने के लिए मुनि श्रावकों को वचनादि से प्रेरणा नहीं करते हैं । वे नव कोटियों से निर्दोष ग्राहार लेते. हैं। शीत, उष्ण, लवणं, रुक्ष, स्निग्ध वगैरह ग्राहारों में वे रागद्वेष रहित रहते हैं ! इस प्रकार का आहार लेने वाले मुनिराज की यह निर्दोष एवासमिति है ।
प्रश्न :- प्रादान निक्षेपण समिति का क्या स्वरूप है ?. उत्तर :- णाणु वह संजसुबह सउचुर्वाह
मध्यमुह वा ।
पयद गहणिक्खेवो समिदी आदाणणिक्खेवा ।।१६।। १५१ ।। ज्ञानोपवि श्रुतज्ञान के उपकरण शास्त्र, संयमोपवि-हिंसादि पापक्रियाओं का त्यागरूप जो संयम उसका संरक्षरण करने के कारण अर्थात् प्राणिदया के निमित्त ऐसे पिटिकादिसंयमोपधि हैं। शोचोपधि-- मलमूत्रादि मल हरण के उपकरण कमंडलु श्रादि पदार्थ । इन पदार्थों का उपयोग प्रयत्न पूर्वक करना चाहिये । प्रथति ये पदार्थ लेते समय और रखते समय जीवदया का ख्याल रखकर लेने की व रखने की प्रवृत्ति करे तथा उपर्युक्त पदार्थ से भिन्न ऐसे बटाई, फलक, तृरण वगैरह पदार्थ लेते या
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Mantra
अध्याय : पांचवां ]
T
रखते समय प्रयत्नपूर्वक प्रवृत्ति करनी चाहिए। इस प्रकार की प्रवृत्ति को प्रादान . . निक्षेपण समिति कहते हैं। .
प्रश्न :-- प्रतिष्ठापनिका समिति का स्वरूप क्या है ? . उत्तर :- एगते प्रश्चित्ते दूर गूढे विसालमविरोहे। . . . .
. उच्चारादिच्चाप्रो पदिठावरिणया हवे समिदी ॥१७॥१५२॥
एकान्त-जहाँ असंयमी जनों का आना जाना नहीं ऐसा प्रदेश; अच्चित्तोहरितकाय बनस्पति और हींद्रियादिक' जीव रहित प्रदेश, जले हुए के समान दिखने बाला प्रदेश; दूरे-ग्राम नगरादिक से दूर ऐसा प्रदेश । अर्थात् ऊपर कहे हुए विशेषणों से
युक्त स्थान में यत्न पूर्वक मल मूत्रादि का त्याग करने के लिए मुनि जाते हैं । उनकी : यह प्रतिष्ठापनिका समिति हैं । . . ... ..........
प्रश्न :- समिति बंध का कारण क्यों नहीं है ? उत्तर :-जियदु व मरदु व जीवो अयदाचारस्थ रिणच्छिदा हिंसा ।
पक्दस्स खत्थिः बंधो हिसामेत्तेण सभिदस्स ॥१८॥१५३।। जो प्रमाद युक्त होकर पाना, जाना, उठना, बैठना इत्यादि क्रिया करता है उसको जीव-प्राणी जीये या मरे हिंसा का दोष अवश्य लगता है । वह हिसक समझना चाहिये । परन्तु जो गमनागमन क्रिया प्रमाद रहित होकर समिति पूर्वक करता है उसको जीव हिसा होने पर भी पाप कर्म का बंध नहीं होता है.।।
प्रश्न :-इन्द्रिय निरोध व्रत का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-चक्खू सोदं घारणं जिभा फासं च इंदिया पंच ।
सग सग बिसए हितो रिणरोहियन्वा समा मुरिगणा ॥१६॥१५४।। प्रांख, कान, नाक, जीभ और स्पर्शन ऐसी पांच इंद्रियां हैं। इन इंद्रियों से . क्रम से पांच प्रकार का रूप, कर्कश, कोमल वगैरह शब्द; सुगंध और दुर्गध, पाँच प्रकार के मधुरादि रस और गीत, ऊरण वगैरह पाठ प्रकार के स्पर्श जाने जाते हैं। अपने-अपने विषयों में प्रवृत्ति करके ये . इंद्रियां प्रात्मा को रागी, द्वेधी, मोही बनाती हैं। अतः इन मनोहर और अमनोहर विषयों से संयमप्रिय मुनिराज इंद्रियों को परावृत करते हैं । ये मुनिराज के पांच मूलगुण हैं । . प्रश्न :-चक्ष निरोध मलंगण का क्या स्वरूप है ?
..
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पया स्वरूप है ?
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१६८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि उत्तर :--सचित्ताचित्ताणं किरियासंठाणवण्या भेएसु ।
रागादि संग हरणं चक्खु रिसरोहो हो मुखिरगो ॥२०॥१५॥ सचित्ताचित्तारणं-ज्ञान दर्शनोपयोगात्मक चैतन्य जिनमें हैं. ऐसे पदार्थ अर्थात् देव मनुष्यादि स्त्रियों के रूप, सचित्त द्रव्य रूप पदार्थ हैं। जिनमें चैतन्य नहीं है, ऐसे सचित्त द्रव्य के प्रतिबिंब को अचित्त द्रव्य रूप कहते हैं। तथा अचित्तद्रव्यः-- अजीव द्रव्य घटपटादि द्रव्य को भी अचित्तद्रव्य कहते हैं। इन वेतन अचेतन पदार्थों के क्रिया, संस्थान-ग्राकृति और वर्ग के भेदों में पारा गौर गाभिलाषा नहीं रखना
यह मुनिराज का चक्षुनिरोध - अर्थात् नेद्रिय को वश रखना इस नाम का मूल. गुण है।
. विशेषार्थ :... स्त्रियों को क्रिया-गीत, विलास, नत्य, तिरछा अवलोकन और :.. इधर उधर सथिलास आना जाना । संस्थान उनके देह की सुन्दर आकृति अथवा एक
हाथ कटी पर रखकर एक हाथ पोष्ट पर रखना इत्यादि. आकर्षक खड़े रहने के प्रकारों को संस्थान कहते हैं । वर्ग स्त्रियों के शरीर का प्रयामादिक रंग। ये सब इष्टानिष्ट प्रकार देखकर जो राग, द्वेष, अभिलाष उत्पन्न होते हैं, उनका निराकरना करना यह चक्षुनिरोध नामक मूलगुराग है। स्त्री पुरुषों के अचेतन प्रतिबिम्ब को क्रियादिक देखकर उसमें भी रागद्वेष वश न होना, अभिलाष रहित होना यह भी चक्षुनिरोध नामक मुलगुरण है ।
प्रश्न :-कर्ण निरोध मूलगुण का क्या स्वरूप है ? उत्तर :----सङ्गादिजीव सह वाणादि अजीव संभवे सहे।
... रागादीव णिमित्ते तदकरणं सोदरोधो दु॥२०॥१५६॥
पड्ज, ऋषभ, गांधार वगैरह सात स्वर के ध्वनि सुनने से तथा बीगा और गया बगैरह के चेतन अचेतन, प्रिय अप्रिय . शब्द सुनने से हृदय में रागद्वेषादि विकार उत्पन्न होते हैं । अतः उपयुक्त स्वर शब्द को स्वतः : सुनने की अभिलाघा मुनिराज मन में उत्पन्न नहीं होने देव । स्वतः पड़जादि स्वर से गायन नहीं करें। यदि अन्यजन पजादि स्वरोच्चार करने लगे तो रागादिभाव से वे स्वर नहीं सुने । इस प्रकार की प्रवृत्ति रखना यह करणं निरोध नामक मूलगुण है । .. प्रश्न :-प्रारणेन्द्रिय निरोध व्रत का स्वरूप क्या है ?
।
CTERSARASHTRA
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श्रध्याय: पांचवां ]
उत्तर :- पयडोवासरखगंधे जीवाजीवरयगे सुहे हे !
[ १६६
घाणगिरोहो मुणिवरस्स ॥२१॥ १५७॥
रागादोसा कर कुछ पदार्थों में स्वभावतः अच्छा और बुरा गंव रहता है और कुछ पदार्थों मैं अन्य पदार्थ के संयोग से अच्छा और बुरा गंध उत्पन्न होता है। अच्छा गंध सुख उप करता है और आप उम्पन्न होता है। बुरा गन्ध दुःखद होता है और उसमें द्वेष होता है, कस्तूरी गोरोचन वगैरह सुगंधि-वस्तु हरिण, गाय वगैरह प्राणियों में उत्पन्न होती है, अतः इनको जीवात्मक गंध कहते हैं और चंदन गंधादिक श्रचेतनात्मक गंव है। इनमें रागद्वे पादिक नहीं करना यह मुनीश्वर का प्रागनिरोध नामक मूलगुण है |
प्रश्न :- रसनेन्द्रिय निरोध का स्वरूप क्या है ?
इट्ठाकाहारे
उत्तर :- प्रसरणादिचदुत्रियपध्ये पंचर से फासुगन्हि खिजे । दत्ते जिन्भाजोऽगिद्धी ।। २२ ।। १५८।। जीव रहित - सम्मूर्छनादि जीव रहित अर्थात् प्रासु प्रहार मुनि लेते हैं । जो प्रहार स्वयं सचित्त है अथवा जिससे सम्मू छनादिक उत्पन्न हो रहे हैं ऐसा आहार ● मुनियों के लिए ग्राह्य नहीं होता । जिस आहार के लेने से पापात्र होता है । तथा लोक में निंदा होती है, वह प्रहार मुनि नहीं लेते हैं । श्राहार के प्रशन, पान, खाद्य और स्वाद्य ऐसे चार भेद हैं । भात, रोटी, पूरी वगैरह प्रशन हैं। दूध, खीर, खड़ी पेयाहार है । लाडू, पेडा वगैरह खाद्याहार है, और इलायची, लवंग वगैरह स्वाद्य है । तीखा, कडुवा, कसायला, अम्ल और मधुर ऐसे लवंग रस का मधुर रस में ग्रन्तर्भाव होता है । कोई ग्रहार मनोहर होता है और कोई प्रिय होता है । उपर्युक्त विशेषणों से संहित श्राहार दांता के द्वारा दिये जाने पर उसमें मुनि गृद्धि नहीं रखते हैं । मधुरादिक. प्रिय प्राहार मुझको हमेशा मिले. और कटु आहार कभी भी नहीं मिले ऐसी इच्छा अर्थात् राग द्वेष भाव मुनि मन में नहीं रखते हैं । यह उनका रसनेन्द्रिय निरोध नामक मूलगुण है !.
पांच रस उस श्राहार में रहते हैं ।
प्रश्न : --- स्पर्शनेन्द्रिय निरोध का लक्षण स्वरूप क्या है ? उत्तर :--- - जीवा जोवा समुत्थे कक्कसमउगादि प्रभेदजुदे 1
फासे हेय हे फालएि रोहो मोहो ।।२३।। १५६ ।। चेतन और वेतन पदार्थों से उत्पन्न हुए कठोर, मृदु, स्निग्ध-निकता, रुक्ष,
प्रभातपत्रपत्रिका
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२०० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि हलका, भारी, ठंडा और उष्ण ऐसे साठ भेद जिसके आधार भत हैं. ऐसे स्पर्श में मुनि गण आनंद और खेद नहीं मानते हैं । यह उनका स्पर्शनिरोध नामक मूल गरम है ।
* छह प्रावश्यक * समदा थयो य बंदरण पडिक्कमरणं तहेव यादव्वं ।
पच्चरखारण विसगो करगीया बासया छप्पि ।।२४।।१६०॥ .
समता-राग द्वेष मोह वगैरह भावों से रहित होना अथवा . त्रिकाल पंच ..
.. समता-संयो ...नमस्कार करना इसको सामयिक भी कहते हैं । स्तव-ऋषभादि चौवीस तीर्थंकरों की .. . स्तुति । वंदना-एक तीर्थकर का दर्शन और वंदन करना अथवा पंच गुरु भक्ति पर्यन्त :
दर्शन वंदना करना । प्रतिक्रमण - जिसके द्वारा मुनि पूर्व संयम के प्रति गमन करते हैं। यह क्रिया प्रतिक्रभरण नाम की है । प्रत अशुनच भर परीर के द्वारा जो प्रवृत्ति हुई थी, उससे परावृत्त होना, अशुभ क्रिया नहीं करना यह प्रतिक्रमना है। किये हुए अपराधों का शोधन करना यह प्रतिक्रमण है। इसके देवसिक, रात्रिक ऐपिथिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, वार्षिक व उत्तमाथिक ऐसे सात भेद हैं। प्रत्याख्यान अयोग्य द्रव्य का त्याग करना किंवा योग्य द्रव्य का त्याग करना । विसर्ग-देह के। ऊपर ममत्व रहित होकर जिनगुण चिन्तन युक्त कायोत्सर्ग करना । ऐसे छह आवश्यक हैं । इन्द्रिय, कषाय, नो कपाय, रागद्वेषादिक के वश जो नहीं होता है, वह अवश है। ऐसे अवश मुनि का ज़ों कर्त्तव्य उसको प्रावश्यक कहते हैं। .. . समता का स्वरूप.---. ..
जीविदमरण लाहालाहे संजोगविष्प जोगेय । बंधुरि सुहदुक्खादिसु समदा सामायियं णाम..।।२५।।१६१॥
जीवित-औदारिक वैक्रियिकादि देह धारण करना, मरण-मृत्यु, प्राणी का प्रारणों से वियोग होना । लाभ--इच्छित वस्तु की प्राप्ति । अलाभ-उसकी अप्राप्ति । अर्थात् आहारादिक की प्राप्ति होने पर अथवा इष्ट वियोग में शत्रु, सुख, दुःख, भूख प्यास, शीत, उष्ण वगैरह में समता रखना यह सामयिक है। जीवित मरण वगैरह । में जो समान परिणाम- रागद्वेप रहित भाव होना वह सामायिक है । त्रिकाल देव वंदना करना यह भो सामयिक प्रत है।
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अध्याय : पांचयां ]
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सामायिक
समतासर्वभूतेषु संयमे . शुभ भावना । प्रातरौद्र परित्यागः तद्धि सामायिक मतम् ।।१६२॥
प्राध्यिान और रोद्रव्यान. का त्याग कर, संयम में शुभ भावना रखते हुवे मर्व जीवों पर समता धारर्ग करना सामायिक है। .. ध्यान
'एकाग्न चिन्ता निरोधो ध्यानम्' एकाग्रता से चित का निरोध करना ही ध्यान है। किसी पदार्थ में ही चित का ..एका हो जाना व्यान है।
प्रश्न :- ध्यान कितने प्रकार का है ?
उत्तर :-~-ध्यान के मूलभेद चार हैं-प्रात, रौद्र, धर्म और शुक्ल । ध्यान के : उत्तरभेद सोलह हैं। .. .. यार्तध्यान के चार भेद-इष्ट वियोग, अनिष्ट संयोग, पीडाचितन, और निदान ।
रौद्र ध्यान के चार भेद हैं । हिंसानन्दी, मृघानन्दी, चौर्यानन्दी परिग्रहानन्दी, . - धर्म ध्यान चार प्रकार का है—अाज्ञा विचय, अपाय विचय, विपाक विचय, और संस्थान विचय । .
शुक्ल ध्यान के चार भेद हैं—पृथकत्ववितक, एकत्ववितर्क, सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति, व्युपरतक्रिया निवर्तनी। .
इन ध्यानों में चार आर्त ध्यान और चार रौद्रध्यान ये जीव को नरक तियच . में ले जाने वाले हैं, इसलिये अशुभ हैं । इन आतं ध्यान और रौद्रध्यान को छोड़कर जो योगी धर्म ध्यान और शुक्लध्यात को ध्याता है । उसकी सच्ची सामायिक होती है । धर्म ध्यान से जीव स्वर्ग जाता है, पुण्य बंध का कारण हैं। और छंटे गुणस्थान में जीव को ही होता है । शुक्ल ध्यान सातवें गुरास्थान से शुरू होता है।
यहां अब धर्म ध्यान का विशेष वर्णन करते हैं क्योंकि प्रमत मुनि इसी ... ध्यान का सहारा लेकर अपने सामायिक में स्थित रहता है । . सामायिक में स्थित योगी किस प्रकार धर्म ध्यान का चितवन करते हैं और ध्यान में क्या चितवन करते हैं, सो कहते हैं । यति होकर ध्यान से कैसे च्युत हो जाता है।
..
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२०२ ]
व्यानों का वर्णन -
श्रनादि विभ्रमारमोहादभ्यासाद
जात
[ गो. प्र. चिन्तामणि
संग्रहात् ।
मप्यात्मन रत्तत्वं प्रस्खलत्येव योगिनः ॥ १६३॥
योगी ( मुनि ) ग्रात्मा के स्वरूप को यथार्थ जानता हुआ भी अनादि विभ्रम की वासना के तथा मोह के उदय से तथा विना अभ्यास ले और उस तत्त्व के संग्रह के अभाव भारी से च्युत हो जाता है अर्थात् मुनि भी तत्व स्वरूप से चलायमान हो जाता है ।
श्रविद्या वासना
बेस विशेष विवशात्मनाम् ।
योन्यमान मपि स्वास्मिन् चत्तः कुरुते स्थितिम् ॥ १६४ ॥
तथा आत्मा के स्वरूप को यथार्थ जान कर अपने में जोड़ता हुआ. भी अर्थात् ध्यान में एकाग्र होता हुआ भी ग्रविद्या की वासना के वेग से विशेषतया face है ग्रात्मा जिनका उनका चित स्थिरता को धारण नहीं करता ।
साक्षारकर्मतः क्षिप्रं विश्वतत्वं यथास्थितम् ।
विशुद्धि चारमन: शश्वद्वस्तुधर्मे स्थिरी भवत् १ ९६५ ।।
इस प्रकार पूर्वोक्त ध्यान के विघ्न के कारण दूर करने के लिये तथा समस्त वस्तुनों के स्वरूप का यथास्थितं तत्काल साक्षात् करने के लिये तथा आत्मा की विशुद्धता करने के लिये निरन्तर वस्तु के धर्म में स्थिरीभूत होवे । भावार्थ-ध्येय में एकाग्र मनका लगना ध्यान है, उसमें विघ्न के पूर्वोक्त कारण हैं । इनको दूर के लिये समस्त वस्तु का यथार्थ स्वरूप निश्चय करके संशयादिक रहित वस्तु के धर्म में ठहरें | यह धर्म ध्यान की सिद्धि का उपाय है सो विशेषता कहते हैं ।
लक्ष्यं लक्ष्यसंघात स्थूलात्सूक्ष्नं विचिन्तयेत् ।
सालस्वाञ्च निरालम्बं तस्व वित्तत्व मञ्जसा ।।१६६||
तत्त्वज्ञानी इस प्रकार तत्त्व को प्रकटतया चितवन करें कि लक्ष्य के.. ( जो अपने लखने में वे उसके ) सम्बन्ध से तो लक्ष्य को ( जो अनुभव गोचर नहीं उसको) चितवन करें और स्थूल इन्द्रिय गोवर पदार्थ से सूक्ष्म इन्द्रियों के अगोचर पदार्थों का चितवन करें इसी प्रकार सालम्ब कहिये किसी ध्येय का बालंबन लेकर उससे निरालम्ब वस्तु स्वरूप से तन्मय होना चाहिये । भावार्थ- दृष्ट पदार्थ के सम्बन्ध से अदृष्ट का ध्यान करना कहा गया है, यहां प्रकरण में परमात्मा का ध्यान
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अध्याय : पांचवा ] हैं, और परमात्मा जो अहात सिद्ध परमेष्ठी हैं, वे छद्मस्थ करके (अल्पज्ञानी के). दष्ट नहीं हैं, तथा उनके समान अपना स्वरूप निश्चय नय से कहा है, वह भी शक्ति रूप है, सो वह भी छगस्थ के ज्ञान का उपयोग दृष्ट है सो इसी के संबंध से सर्वज्ञ के आगम से परमात्मा का स्वरूप निश्चय कर श्रुतज्ञान. के भेद रूप शुद्ध नय के द्वारा परमात्मा का ध्यान करना चाहिये इसी से परमात्म पद की प्राप्ति होती है ।
प्रश्न :-धर्म ध्यान के कितने भेद है ? . .. .. . उत्तर:-..-प्राज्ञापाय विपाकानां क्रमशः संस्थितेस्तथा ।
विचयो यः पृथक् तद्धि धर्म ध्यानं चतुविधम् ।।१६७॥
. माज्ञा, अपाय, वि तथा हो यान इनका भिन्न-भिन्न विषय (विचार) अनुक्रम से करना हो धर्म ध्यान के चार प्रकार हैं। यहाँ विचय नाम विचार करने अर्थात् चितबन करने का है, तथा इन चारों के नाम इस प्रकार कहने चाहिये--१. पाना बिचय, २. अपाय विचय; ३. विपाक विचय और ४. संस्थान विचय ।
प्रश्न :--- प्राज्ञाविचय धर्म ध्यान का स्वरूप क्या है ? उत्तर :--बस्तु तत्त्वं स्वसिद्वान्तं प्रसिद्ध यन्न चिन्तयेत् ।
सर्वज्ञा. भियोगेन तदाज्ञा विचयो मतः ॥१६॥
जिस धर्म ध्यान में अपने जैन सिद्धान्त में प्रसिद्ध वस्तु स्वरूप को सर्वज्ञ भगवन् की आज्ञा की प्रधानता से चितवन करें, सो प्राज्ञा विचय नामा धर्म ध्यान का प्रथम भेद है।
अनन्त गुग पर्याय संयुतं तत्त्रयारयारभकम् । त्रिकाल विषमं साक्षाजिनाज्ञा सिद्ध मामननेत् ॥१६॥
अाज्ञा विनय धर्म ध्यान में तत्त्व अनन्त गुण पर्यायों सहित यात्मक त्रिकाल गोचर साक्षात् जिनेन्द्र भगवान् की आज्ञा से सिद्ध हुआ चितवन करें। - सूक्ष्म जिनेन्द्र वचनं हेतु भियन्न हन्यते ।
प्राज्ञा सिद्ध च तद् ग्राह्य नान्यया वादिनो जिनाः ॥१७॥
जिनेन्द्र सर्वज्ञ देव के वचनों से कहे हुए सूक्ष्म तत्त्व हेतु से वाध्य नहीं हैं, ऐसे तत्त्व प्राज्ञा से ही ग्रहण करने (मानने) चाहियः क्योंकि जिनेन्द्र भगवान् .
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२०४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
वीतराग हैं, वे अन्यथा वादी नहीं होते यदि सर्वश न हो तो बिना जाने अन्यथा कहें. अथवा वीतराग न हो तो रागद्वेष के कारण अन्यथा कहें और सर्वज्ञ और वीतराग हो. वह कदापि अन्यथा नहीं कहेगा !
प्रमाणनय निक्षेपे
निति तत्व परजसा ।
स्थित्युत्पतिच्ययोपेतं चिद चिल्लक्षणं स्मरेत् ॥ १७१ ॥
hat faar ध्यान में प्रमाण नय निक्षेपों से निर्णय किये हुए स्थिति, उत्पति और व्यय संयुक्त अर्थात् उपजें विन स्थिर रहे ऐसा और चेतन अचेतन रूप है लक्षण जिसका, ऐसे तत्त्व समूह का चिन्तवन करें ।
श्रीमत्सर्वज्ञ देवोत श्रुतज्ञानं च निर्मलम् ।
शब्दार्थ निचितं चित्र मंत्र चिन्त्यम विप्लुत्तम् ।।१७२ ॥
तथा इस ग्राज्ञा विचय ध्यान में श्रीमत्सर्वज्ञ करके कहे हुए निर्मल और शब्द तथा अर्थ में परिपूर्ण नाना प्रकार के निर्बाध श्रुतज्ञान का चिन्तन करना चहिये ।
श्रुतज्ञान का वर्णन -----
परिस्फुरति यत्रंत विश्वविद्या कदम्बकम् ।
द्रव्यभावभिदा तद्धि शब्दार्थज्योतिर ग्रिमम् ॥ १७३ ॥
शब्द और अर्थ का प्रकाश है मुख्य जिसमें ऐसा तथा जो समस्त प्रकार की विद्या का समूह है । अर्थात् याचार श्रादि अंग पूर्व अंग बाह्य प्रकीक रूप विद्या का समूह है। तथा द्रव्य श्रुत ( शब्द रूप ) और भावश्रुत ( ज्ञानरूप ) में दो हैं भेद जिसके ऐसा सर्वज्ञ भगवान का कहा हुद्या श्रुतज्ञान है ।
अपार मति गम्भीरं पुण्यतीर्थं पुरातनम् ।
gate विरोधादिकलङ्क परिवजितम् ॥ १७४॥
फिर कैसा है श्रुतज्ञान प्रपार है, क्योंकि जिसके शब्दों का पार कोई अल्पज्ञानी
नहीं पा सकता । तथा गंभीर है क्योंकि जिसके अर्थ की श्राह हर कोई नहीं पा सकता
: तथा पुण्य तीर्थ है । क्योंकि जिसमें पाप का लेश नहीं है अर्थात् निर्दोष हैं इसी कारण जीवों को मारने वाला है तथा पुरातन है अर्थात् अनादि काल से चला आया है और पूर्वापर विरोध आदि कलकों से रहित है ।
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OM
अध्याय : पांचवां ।
[२०५ नयोपनय संताप गहनं गणिभिः स्तुतम् । . विचित्र मपि चित्रार्थ संकीर्ण विश्व लोभनम् ॥१७५।।
फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? द्रव्याथिक पर्यायाथिक नय और सद्भूत असद्भूत अवहारादिक उपनयों के संपात से तो गहन है तथा गाधरादिकों करके स्तुति करने योग्य है तथा विचित्र कहिये अपूर्व है, तयापि चित्र कहिये अनेक प्रकार के अर्थों से भरा हुमा है. तथा समस्त लोक को दिखाने के लिये नेत्र के समान है। .
अनेक पद विन्यासरङ्गापुः प्रकीर्णकः । .. .. प्रसृतं. यन्दि भास्युच्च रत्नाकर इवापरः ।।१७६॥
फिर कैसा है ? श्रुतज्ञान अनेक पदों का विन्यास (स्थान) है, जिनमें ऐसे प्राचारादि अंग तथा अग्रायणी आदि पूर्व और सामायिकादि प्रकीर्णकों से विस्तार रूप है, सो वह श्रुतज्ञान जिस प्रकार रत्नाकर (समुद्र) शोभता है, उसी प्रकार शोभता है ।
मदमतोद्वतक्षुद्र शासनाशीविषान्तकम् । दुरन्तधन मिथ्यात्व ध्यान्त धर्मालम् ।।१७।।.
फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? मदसे माने उद्धृत क्षुद्र (नीच) सर्वथा एकान्त वादियों का शासन (मत) रूपी अशी विष कहिये सर्प का अन्तक है, अर्थात् नष्ट करने वाला है तथा दुरन्त कहिये जिसका अन्त बहुत दूर है. ऐसे दृढ़ मिथ्यात्वरूपी अन्धकार के दूर करने को सूर्य मण्डल के समान है।
यत्पवित्र जगत्यस्मिन्विशुद्धयति जगत्रयी। येन तद्धि सत्तां सेव्यं श्रु तज्ञानं चतुविधम् ॥१७॥
फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? इस जगत में पवित्र हैं, क्योंकि जिसके द्वारा ये तीनों जगत् पवित्र होते हैं, इसी कारग ही वह श्रुतज्ञान सत्पुरुषों के सेवने योग्य है । यह श्रुतज्ञान प्रथमानुयोग, करुणानुयोग, चरमानुयोग और द्रव्यानुयोग के भेद से चार प्रकार का है।
स्थित्युत्पति व्ययोपेतं तृतीयं योगि लोचनम् । नयद्वय समावेशासाद्यनाबि व्यवस्थितम् ॥१७॥
फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? उत्पाद, व्यय, धौव्य करके संयुक्त है तथा योगीश्वरों का तीसरा नेत्र है तथा द्रव्याथिक और पर्यायाथिक इन दो नयों के कारण
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[ गो. प्र. चिन्तामणि सादि अनादि व्यवस्था रूप है, द्रव्यनय से संतान की अपेक्षा अनादि है और पर्यायनय की अपेक्षा तीर्थंकरों की दिव्य ध्वनि प्रकट होता है, इस कारण सादि है।
निः शेषनय निक्षेप निकषनाच सन्निभम् । स्याद्वाद' पविनिर्घात भग्नान्यभत भूधरम् ।।१०।।
फिर यह श्रुतज्ञान समस्त नय निक्षेपों से वस्तु के स्वरूप की परीक्षा करने के लिये कसोटो के समान है । स्थावाद का हवे कथंचित् वचनरूपी बज के निीत से भग्न किये हैं, अन्यमत रूपी पर्वत जिसने ।
इत्यादि गुरग संदर्भ निर्भरं भव्य शुद्धिदम् । ध्यायन्तु धीमतां श्रष्ठाः श्रु तज्ञान महार्णवम् ॥१८१॥
इत्यादि पूर्वोक्त गुणों की रचना से भरा हुआ भव्य जीवों की शुद्धि को देने । वाला श्रुतज्ञान रूप महासमुद्र है, सो इसको वुद्धिमानों से जो श्रेष्ठ हैं, वे व्याया। (चितवन करो) यह प्रेरणाारूप उपदेश है। श्रतज्ञान की महिमा
यज्जन्मज्वर घातकं त्रियुवनाधीशैर्यदम्यचित्तं । । यत्स्याद्वाद महाध्वज नय शता कीर्णम् यत्पठयते ।।। उत्पाद स्थिति भङ्गलाच्छन युता यस्मिनपदार्थाः स्थिता ।। स्तच्छीवीरमुखार बिन्दादितं दद्यातं व शिवम् ।।१५२॥ .
जो श्रुतज्ञान संसार रूपी ज्वर का तो घातक है और तीन भुवन के 'ईश इन्दों से यूजित है। लथा जो स्याद्वाद रूपी बड़ी ध्वजा वाला है और सैकड़ों नयों से पूर्ण है, ऐसा कहा जाता है तथा जिसमें उत्पाद व्यय प्रौव्या लांछन युक्त पदार्थ । रहते हैं, ऐसे श्री वर्द्धमान स्वामी के मुख कमल से कहा हुया श्रुत ज्ञान तुम श्रोताः । जनों को कल्याण रूप हो ऐसा पाशीर्वचन है।
वाग्देव्याः कुल मन्दिरं बुधननानन्दैक चन्द्रोदयं । मुक्ते मङ्गिाल मग्निम शिव पथ प्रस्थान दित्यानकम् ॥ तत्वाभासकरङ्गपञ्च वदनं भव्यान्विनेतु क्षमं । तन्छोत्रालिमिः पिनन्तु गुरिगनः सिद्धान्त वा पयः ॥१८३।।
जो वाग्देवी (सरस्वती के रहने का कुलगृह है, तथा विद्वानों के ग्रानन्द उपजाने के लिये अद्वितीय चन्द्रमा का उदय है । मुक्ति का मुख्य मंगल व
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अध्याय: पांचवां ]
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मम में गमन करने के लिए दिव्य ग्रानक कहिये पटह नाम का वाजा है, तत्वाभान ( मिथ्यात्व ) रूपी हिरण के नाश करने को सिंह के समान है तथा भव्य जीवों को मोक्ष मार्ग में चलाने के लिये समर्थ है। ऐसे इस सिद्धान्त रूपी समुद्र के जल की हे गुणी जनों । कर्म रूपी अञ्जलियों से पात करो ||२०||
येनेते निपतन्ति वादि गिरयस्तु व्यन्ति योगीश्वराः । भव्या येन विदन्ति निर्वृति पदं मुञ्चन्ति मोहं बुधाः ॥ धुर्यमिनां यदक्ष सुखस्या धार भूतं नृणां । तल्लोकद्वय शुद्धिदं जिनवचः पुष्याद्विवेक श्रियम् ॥ १८४ ॥
जिसके द्वारा प्रसिद्ध बादीरूप पर्वत गिरते हैं, अर्थात् खंड-खंड हो जाते हैं, तथा जिसके द्वारा योगीश्वर प्रसन्न होते हैं जिसके द्वारा भव्य जीव मोक्षपद को जाते हैं, अर्थात् प्राप्त होते हैं, तथा जिसको पढ़कर पंडित जन संसार के मोह को छोड़ देते हैं, तथा जो वचन संयमी मुनियों का बंधु (हित करने वाला है) तथा जो ..पुरुषों का अविनाशी सुख का प्राधारभूत है, इस प्रकार दोनों लोकों की शुद्धता का देने वाला जिनेन्द्र भगवान का वचन भव्य जीवों की विवेक रूपी श्री को पुष्ट करें। इस प्रकार यह आशीर्वाद है ।
सर्वज्ञाज्ञां पुरस्कृत्य सम्यगर्थात् विचिन्तयेत् ।
यत्र तद्धयानमाम्नात माज्ञाख्यं योगि पुङ्गवैः ॥१८५॥
जिस ध्यान में सर्वज्ञ की याज्ञा को अग्रेसर (प्रधान) करके पदार्थों को सम्यक्प्रकारसित करें (विचारे) सो मुनियों ने आज्ञा विचयं नाम धर्म ध्यान कहा है।
अपवित्रय धर्मध्यान का स्वरूप ----
अपाय विचयं ध्यानं तद्वदन्ति मनीषिरगः ।
प्रायः कर्मणां यत्र सोपायः स्मर्यते बुधैः ॥ १८६॥
जिस ध्यान में कर्मों का अपाय ( नाश ) हो तथा सोपाय कहिये पंडितजना करके इस प्रकार जिसमें चिन्तवन किया जाय कि इन कर्मों का नांश किस उपाय से होगा ? उस ध्यान को बुद्धिमान् पुरुषों ने अपाय विन्वय कहा है । अपायविचय धर्मध्यान में योगी यह विचार करें कि
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| गो. प्र. चिन्तामणि श्री मत्सर्वज्ञ निविष्ट मार्ग रत्नत्रयात्मकम् । अनासाद्य भवास्ये चिरं नष्टाः शरीरिणः ।।१८७।। मज्जनोन्मज्जनं शश्वद्भजन्ति भव सागरे ।
वराकाः प्राणिनोऽप्राप्य यानपात्रं जिनेश्वरम् ॥३॥१८॥ इस ध्यान में ऐसा चिन्तन होता है कि ये प्रारणी श्रीमत्सर्वज्ञ जिनेन्द्र के उपदेश किये हुए सम्यग्दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र रूप मार्ग न पाकर संसार रूप वन में बहुत काल पर्यन्त नष्ट होते हुए जन्म मरण और उपार्जन किये कमों के नाश करने का उपाय जो रत्नत्रय सो उन्होंने नहीं पाया । तथा ये रंग प्राणी जिनेश्वर देवरूपी जहाज को न पाकर संसार रूप समुद्र में निरन्तर मज्जन उन्मज्जन करते हैं, अर्थात निरन्तर जन्म-मरण पाते रहते हैं। और दुःख भोगते हैं, इस प्रकार चिन्तवन करें 1
महाव्यसन सप्ताचिः प्रदीप्ते जन्म कानने । भ्रमताऽद्य मया प्राप्तं सम्यग्ज्ञानाम्बुधेस्तटम् ।।१८६।।
फिर ऐसा चिंतन करें कि महान कष्ट रूपी अग्नि से प्रज्वलित इस संसार रूपी वन में भ्रमण करता हुआ में इस समय सम्यरज्ञान रूपी समुद्र तट (किनारा.) पा गया।
प्रद्यपि यदि निर्वेद विवेकागेन्द्र मस्तकात् । स्खलेत्तदेव जन्मान्ध फूपपातोऽनिवारितः ॥१६॥
फिर इस प्रकार चिन्तन करें कि मैंने इस समय सम्यग्ज्ञान पाया है, सो यदि अब भी बैराग्य और भेद ज्ञान रूप पर्वत के शिखर से गिरू तो संसार रूप अंधपः । ___ में अवश्य गिर पड़ना होगा ।।५॥ .
अनादिनम संयूतं कथं निर्वायते मया।
मिथ्यात्वा विरति प्रायं कर्मबन्ध निबन्धनम् ॥१६॥ . . तत्पश्चात् इस प्रकार चिन्तन करे कि अनादि अविद्या से उत्पन्न हुए तथा जिसमें मिथ्यात्व व अविरत की बहुलता है, ऐसे कर्मबंध होने के कारण मुझ से किस प्रकार निवारण किये जायेंगे।
सोऽहं सिद्धः प्रसिात्मा छरबोध विमलेक्षणः । जन्म पक्के चिर खिम्नः खण्डयमानः स्वकर्मभा ॥१६२।।.
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अध्याय : पांचवां ।
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. फिर ऐसा चिन्तन करे किं प्रसिद्ध हैं स्वरूप जिसका ऐसा मैं सिद्ध हूँ दर्शन ज्ञान ही निर्मल नेत्र हैं, जिसके ऐसा हूं तथापि संसार रूपी कीचड़ में अपने उपार्जन किये हुए कर्मों से खण्ड-खण्ड किया चिरकाल से खेद खिन्न हुआ हूँ। .
एकतः कर्मणां सैन्यमहमेकस्ततोऽन्यत । स्थातव्यमप्रमत्तेन मयास्मिन्नरि संकटे ॥१६३।।
इस संसार में एक ओर तो कर्मों की सेना है और एक तरफ में अकेला हूँ इस कारण इस शत्रुसमूह में मुझको अप्रमत (सावधान) होकर रहना चाहिये। असाववान रहूंगा तो कर्मरूप बैरी हैं, इसलिए वे मुझे बिगाड़ देंगे।
किमुपेयो ममात्मायं किंवा विज्ञान दर्शने । चरखं वापवर्गाय गिमिः साद्ध स एन वा ।।१६४॥
फिर ऐसा विचार करें मोक्ष के लिये मेरा यह प्रात्मा उपादेय है, अथवा ज्ञान दर्शन उपादेय है, अथवा चारित्र उपादेय है, अथवा ज्ञान दर्शन चारित्र इन तीनों सहित प्रात्मा ही उपादेय है।
कोऽहं ममास्त्रवः कस्मात्कथं बन्धः का निर्जरा। का मुक्तिः कि. विमुक्तस्य स्वरूपं च निगद्यते ॥१६॥
फिर ऐसा विचार कि मैं कौन हूं और मेरे कर्मों का पास्त्र क्यों होता हैं ? तथा कर्मों का बंध क्यों होता है और किस कारण से निर्जरा होती है और मुक्ति क्या वस्तु है ? एवं मुक्त होने पर आत्मा का क्या स्वरूप कहा जाता है ।
जन्मनः प्रतिपक्षस्य मोक्षस्यात्यन्तिकं सुखम् । अव्या बाधं स्यभावोत्थं केनोपायेन लस्यते ॥१६६॥
फिर ऐसा विचारे किं संसार का प्रतिपक्षी जो मोक्ष हैं, उसका अविनाशी अनन्त अव्याबाध (बाचा रहित) स्वभाव से ही उत्पन्न हुमा (स्वाधीन) सुख किस उपाय से प्राप्त हो । . मय्येव विदिते साक्षाद्विज्ञातं भुवनत्रयम् ।
यतोऽहमेव सर्वज्ञः सर्वदर्शी निरञ्जनः ।।१३।।
फिर ऐसा ध्यान करे कि मेरे स्वरूप को जानने से मैंने तीनों भुवन जान लिये, क्योंकि मैं ही सर्वज सबका देखने वाला निरंजन और समस्त कर्म कालिमा से .. रहित हूं।
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सात सुवननयम।
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२१० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि एको भावः सर्वभाव स्वभावः सर्वे भावा एक भाव स्वभावाः .. .. . . एको भावस्तत्वतो येन बुद्धः सर्वे भावास्तत्वतस्तेन बुद्धाः ॥१६७।। .. . एक भाव सर्व भावों के स्वभाव स्वरूप है और सर्व भाव के स्वभाव स्वरूप
हैं, इस कारण जिसने तत्व (यथार्थपने) से एक भाव को जाना, उसने समस्त भावों को यथार्थतया जाना ।
भावार्थः । आत्मा का एक भब रंगा है कि जिसमें समस्त भाव (पदार्थ) प्रतिविम्बित होते हैं, उन पदार्थों के आकार स्वरूप भाव होता है, तथा वे भाव सब ज्ञेय हैं, उनके जितने प्राकार है, वे एक ज्ञान के आकार होते हैं । इस कारग जो इस प्रकार के ज्ञान के स्वरूप को यथार्थ जानता है, उसने सब ही पदार्थ जाने
अर्थात् ज्ञान ज्ञेयाकार हुया इस कारण ज्ञान को जाना तब सब ही जाना, क्योंकि ज्ञान . . . ही आत्मा है, इस कारण ऐसा कहा है। .....
यावद्यावच्च सम्बन्धो मम स्याब्दावस्तुभिः । तावत्ताबस्वयं स्वस्मिस्मिस्थितिः स्वप्नेऽपि दुर्घटा ॥१९८।।
फिर ऐसा ध्यान करे कि जब-जब मेरे वस्तुओं से सम्बन्ध होते हैं, तब-तब मेरी पाप से ही अपने में ही स्थिति होना स्वप्न में भी दुर्घट है ।
तथैवैतेऽनुभूयन्ते पदार्थाः सूत्र सूचिताः । अतो मार्गेऽत्र लग्नोऽहं प्राप्त एव शिवास्पदम् ॥१६॥
फिर ऐसा विचारे कि जिनसूत्र में जो पदार्थ कहे हैं, वे वैसे ही अनुभव किये जाते हैं और जैसे कहे हैं वैसे ही दिखते हैं। इस कारण इस सूत्र के मार्ग में लगा हूं । इसी कारण मोक्ष स्थान भी पाया हुआ है ऐसा मानता हूँ, क्योंकि जब मार्ग पाया और उस मार्ग में चला तो असली ठिकाना प्राप्त हुआ ही कहा जाता है !
इत्युपायो विनिश्चयो मार्गाच्यवन लक्षणः । . कर्मणां च तथापाय उपायश्चात्म सिद्धये ।।२०।।
इस प्रकार पूर्वोक्त मोक्ष मार्ग से नहीं छूटना है, लक्षण जिसका ऐसा तो उपाय निश्चय करना तथा वैसे ही कमों का अपाय (नाश) निश्चय करना इस प्रकार अपाय और उपाय दोनों का आत्मा की सिद्धि के लिये निश्चय करना चाहिये। , ... इति नय ज्ञात सीमालम्बि निदत दोष,
च्युत सकल कलङ्क कोतितं ध्यान मेतत् ।
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अध्याय : पांचवां ]
[ २११ अविरत मनुपूर्व ध्यायतोऽस्त प्रमाद, स्फुरति हृदि विशुद्ध ज्ञान भास्वत्प्रकाशः ।।२०१॥
यह पूक्ति प्रकार का अपाय विचय नामा ध्यान सैकड़ों नयों को अवलम्बन .. करने वाला है, तथा दूर किये हैं, समस्त दोष जिसने ऐसे समस्त कलंक रहित सर्वज्ञ देव ने कहा है, सो जो कोई पुरुष इसको अनुक्रम से निरन्तर प्रमाद रहित होकर ध्याता है, उसके हृदय में निर्मल ज्ञान रूप सूर्य का प्रकाश स्फुरायमान होता है। विपाक विचय धर्मध्यान---
स विपाक इति ज्ञेयो य स्वकर्म फलोदयः । प्रतिक्षण समुद्भूत चित्ररूपः शरीरिणाम् ।।२०२।।
प्राणियों के अपने उपार्जन किये हए कर्म के फल का जो उदय होता है, यह विपाक नाम से कहा है। सो बह कर्मोदय क्षरण प्रतिक्षण उदय होता है और ज्ञानावरणादि अनेक रूप है।
कर्मजातं फलं दत्ते विचित्रमिह देहिनाम् । प्रासाद्य नियतं नाम द्रव्यादिक. चतुष्टयम् ।।२०३॥
जीवों के कर्मों का समूह निश्चित द्रव्य क्षेत्र काल भाव रूप चतुष्टय को पाकर इस लोक में अनेक प्रकार से अपने नामानुसार फल (भागे कहते हैं उस प्रकार) को देता है।
स्त्रक् शय्या सनया वस्त्र वनिता वादिन मित्राइनान्, करा गुरु चन्द्र चन्दन वनक्रीड़ाद्रि सौधध्वजान् । मातङ्गांच्च विहङ्ग चामर पुरीभक्षान्नपानानि वा,
छत्रा दीनु पलभ्य वस्तु विनयान्सौख्यं श्रयन्तेऽङ्गिन्तः ॥२०४॥
ये प्राणी पुष्पमाला, सुन्दर शय्या, आसन, यान, वस्त्र, स्त्री, बाजे, मित्र, पुत्रादि को तथा कपूर अगुरु चन्द्रमा चन्दन वनक्रीड़ा पर्वत महल हवनादिक को तथा हस्ती घोडे, पक्षी चामर नगरी और खाने योग्य अन्नपानादिक को तथा छत्रादिक वस्तुसमूह । को पाकर मुख का आश्रय करते हैं अर्थात् भोगते हैं ।
क्षेत्रारिण : रमणीयानि सर्व सुख दायिनि च । काम भोगास्पदान्युच्चैः प्राप्त सौख्यं निषेव्यते ।।२०५॥
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२१२ ।
[ गो. प्र. चिन्तामणि सर्व ऋतुओं में मुख देने वाले रमगहीय और काम भोग के स्थान ऐसे क्षेत्रों - को प्राप्त होकर अतिशय सुख का अनुभव करते हैं।
प्रासा सिदनुर यन्त्र पन्न गगर व्यालानलोग्रग्रहान् । ....... शील हनि कोटक फरज क्षारा स्थिपङ्कोपलान् ॥
कारागृङ्खल शङ्ककाण्ड निगड न रारि वैरास्तथा । द्रव्याण्याप्य भजन्ति दुःख मखिलं जीवा. भवाहवस्थिताः ॥२०६॥
संसार रूप मार्ग में रहते हुए जीव माला तलबार छुरा यन्त्र, बन्दूक आदि शस्त्र और सर्पविष दुष्ट हस्ती अग्नि तीन खोटे ग्रहादिक को तथा दुर्गन्धित सड़े हुए अंग, लट, रज, क्षार, वरी, वैर इत्यादि द्रव्यों को प्राप्त होकर दुःखों को भोगले हैं । ... निसगरगातिरौद्रारिस भयल्केशास्पदानि च।
दुःख मेवाप्नुवन्त्युच्चैः क्षेत्राण्या. साद्य जन्तवः ॥२०७।।
ये प्राणी स्वभाव से ही रौद्र' भय और क्लेश के ठिकाने ऐसे क्षत्रों न को प्राप्त होकर अतिशय दुखों को ही पाते हैं ।
अरिष्टोत्पात निर्मुक्तो. वात वर्षा विजितः । शीतोष्ण रहित : काल : स्यात्सुखाय शरीरिणाम् ॥२०॥
अरिष्ट (दुःख देने वाले) उत्पात. से रहित तथा पवन वर्षा आदि से वर्जित और अति उष्णता रहित काल जीवों के सुख के लिए है।
वर्षात पतुषाराढ्य ईत्युत्पातादि संकुलः । काल सदैव सखाना दुःखानल निबन्धनम् ॥२०६॥
वर्षा आतप, हिम (बर्फ) सहित तथा . ईति कहिये स्वचक्र परचक्रादिकों के उत्पात प्रादि सहित काल जीवों को निरन्तर दुःख रूप अग्नि का कारण है। . . . . . . . . . . . .
प्रश्न :-जीव को किस भाव से सुख अथवा दुःख होता है। उत्तर :- प्रशमादि समुदत्तो भावः सौख्याय देहिनाम् ।
... कर्म गौर वजः सोऽयं महाध्यसन मन्दिरम् ॥२१॥ · जो कर्म के उपशमादिक से उत्पन्न हुा भाव है । वह तो जीवों को मुख के अर्थ है और जो कर्म के तीव्र गुरुपना से उत्पन्न हुआ भाव है सो महान् १ का घर है। . . . .
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अध्याय : पांचवां ]
[ २१३ मूल प्रकृतयस्तत्र कर्मणामष्ट कीर्तिताः । ज्ञातावरगा पर्वास्ता जन्मिना बन्ध हेतवः ।।२११।।
कर्म की मूल प्रकृति (भेद) आठ हैं, ज्ञानाबरणादिक, बे जीवों के बंधन का कारा हैं। . . . .
ज्ञाना पतिकरं कर्म पञ्च भेद प्रपञ्चितम् । निरुद्ध येन जीवानां मतिज्ञानादि पञ्चकम् ॥२१२॥
उन आठ कर्म प्रकृत्तियों में से प्रथम ज्ञान को पावरमा करने वाला नानावरणीय कर्म पांच भेद रूप कहा गया है, इन पांचों ज्ञानावरण कर्मों ने जीवों के मति ज्ञानादिक (मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल) पांचों ज्ञानों को रोक रक्या है अर्थात् ढक रक्खा है।
'नवभेदं मतं कर्म शावरण संज्ञकम् । रुद्धयते येन जन्तूनां शश्वदिष्टार्थ दर्शनम् ॥२१३॥
दूसरा दर्शनावरण नामक कर्म वह नव प्रकार का है, जिसने जीवों के निरन्तर इष्ट वस्तु के दर्शन को रोक. रक्खा है, अर्थात् ढक रक्खा है ।
वेवनीयं विदुः प्राज्ञा द्विधा कर्म शरीरिणाम् । यन्मधूधिष्टछक्त शस्त्र धारा समप्रभम् ॥२१४॥
इसके पश्चात् तीसरा वेदनीय कर्म दो प्रकार का है, एक साता वेदनीय और दूसरा असाता वेदनीयः सो यह कर्म जीवों को शाहद-लिपटी तलवार की धार के समान किचित् सुखदायक है।
सुरोगनराधीश सेविसं श्रयते सुखम् । सालोदयवशात्प्राणी संकल्पानन्तरोद्भवम् ॥२१॥ असद घोदयातीत शारीरं मानसं द्विधा । जीवो विसह्यते दुःखं शश्वच्छ्यभ्रादि भूभिषु ।।२१६॥
यह प्रारगी साता वेदनीय के उदय के वश से तो देवेन्द्र, नागेन्द्र, धरणीन्द्र ब चक्रवतियों से सेवित तथा मन के संकल्प करते ही प्राप्त होने वाले सुख को प्राप्त होता है । और असाता देदनीय के उदय से शरीर संबन्धी और मन संबन्धी . . . .. दो प्रकार के तीब्र दुःख नरकादिक पृश्वियों में भोगता है ।
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२१४ ]
दृष्टिमोह प्रकोपेन दृष्टि साध्वी विलुप्यते । लिपनिमज्जन्ति प्राणिनः श्वासागरे ॥ २१७
[ गो. प्र. चिन्तामणि
तत्पश्चात् चौथा मोहनीय कर्म है। उसके दो मूलभेद हैं
एक
दर्शन मोहनीय और दूसरा चारित्र मोहनीय इनमें से दर्शन मोहनीय नामक कर्म प्रकोप (उदय) से जीवों का सम्यक्दर्शन लोपा जाता है, सम्यक् दर्शन के लोप से जीव नरक रूपी समुद्र में डूबता है, इस दर्शन मोहनीय की मिथ्यात्व सम्यक मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृति मिथ्याल ऐसी तीन प्रकृतियाँ हैं ।
चरित्र मोह पाकेन नाङ्गिभिर्लभ्यते क्षणम् ।
भाव शुद्धया स्वसात्तु चरणं स्वान्त शुद्धिदम् ॥२१८॥
दूसरा चारित्र मोह कर्म है, उसके उदय से यह प्राणी मन की शुद्धि देने वाले चारित्र को भात्र की शुद्धता से अंगीकार करने के लिए क्षणमात्र भी समर्थ नहीं होता ।
avart यत्प्रमान्ति यत्स्खलनत्थ संयमात् । 'सोऽपि चरित्र मोहस्य विपाकः परिकीर्तितः ॥२२६॥ जो संयम (चरित्र) को ग्रहण करके भी जीव प्रभाव रूप होता है । और संयम से भ्रष्ट हो जाता है। उसका कारण भी चरित्र मोह का उदय कहा है । भावार्थ - पहिले श्लोक में तो चरित्र मोह के उदय से संयम को ग्रहण ही न कर सके, ऐसा कहा है और यहां ऐसा कहा है कि कदाचित चरित्र मोह के क्षयोपशय से चरित्र ( संयम ) ग्रहण कर ले तो उसमें भी प्रमाद होता है । यथवा तीव्र उदय होता है तो संयम से भ्रष्ट भी हो जाता है । इस चरित्र मोह की प्रकृति जो क्रोध मात माया लोभादिक २५ कषायें हैं, उनको वर्णन अन्य ग्रन्थों से जानना । प्रश्न : --- श्रायु कर्म का विपाक किस प्रकार है ?
उत्तर :- सुरायुरारम्भ ककर्मपाकात्संभूय नाके प्रथितभावः । समथ्यैते देहिभिरायुरश्यं सुखा मृतस्वाद लोलचित्तः ॥ २२० ॥ पांचवां प्रयुकर्म हैं, उसके ४ भेद हैं- देवायु मनुष्यायुं तियंगायु और नरका सों इनमें से देवायु उत्पन्न करने वाले कर्म के उदय से प्राणी स्वर्ग में . उत्पन्न होकर विख्यात है प्रभाव जिसका और सुखामृत के प्रास्वादन में प्रासक्त है। चित जिसका ऐसा देव हो स्वर्ग के सुख भोगता है ।
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अध्याय: पाँच |
[ २१५
नराशुषः कर्म विपाक योगासरत्व मासाद्य शरीर भाजः 1 सुखासुखा कान्तधियो नितान्त नयन्ति कालं बहुभिः प्रपञ्चः ॥ २२१॥ तथा प्राणी मनुध्यायु नामा कर्म के उदय भोग से मनुष्यत्व को पाकर 'कुछ सुख दुःख से व्याप्त है बुद्धि जिसकी ऐसे हो नाना प्रकार के प्रपञ्चों ( कार्यों ) से काल यापन करते हैं ।
चर स्थिर विकल्पासु तिर्यग्गतिषु जन्तुभिः ।
तिर्यगायु प्रकोपेन दुःख मेवानुभूयते ॥२२२॥
तथा प्राणो तिर्यञ्च गतियों में उत्पन्न होकर केवल दुःख ही दुःख
भोगते हैं ।
नारकायुः प्रकोपेन नरकेऽचिन्त्यवेदने ।
forefङ्कन स्तूर्णं कृताति करुण स्वना ॥२२३॥
तथा नारकीयु कर्म के उदय से प्राणी प्रचिन्त्य वेदना वाले नरकों के बिलों में जिनके सुनने से कमरा हो आवे ऐसे शब्द करते हुए उत्पन्न होते हैं और पांच प्रकार के दुःख भोगते हैं ।
नाम कर्मेदयः साक्षादले चित्राण्यनेकधा ।
नामनि गतिजात्यदि विकल्पामोह देहिनाम् ॥ २२४ ॥ तथा जीवों को नाम कर्म का उदय अनेक प्रकार के
गति जाति यादि भेद वाले नामों को साक्षात् वारण करता है, नामकर्म की २३ प्रकृतियों का नाम लक्षणादि विशेष भेद गोमटसार ग्रंथ से जानना ।
गोत्रास्यं जन्तु जातस्य कर्म दत्ते स्वकं फलम् ।
शस्ता शस्त्रेषु गोत्रेषु जन्म निष्पाद्य सर्वथा ॥२२५॥ तथा गोत्र नाम कर्म जीवों
कर सर्व प्रकार से अपना फल देता है ।
के समूह को ऊच नीच गोत्र में उत्पन्न
निरुभिः स्वसामर्थ्याद्यानला भादिपञ्चकम् । विसन्तति farartificer कृत्कर्म देहिनाम् ॥२२६॥
आठवाँ कर्म अन्तराय है सो विघ्न करने वाला है । यह अपनी सामर्थ्यं (उदय) से जीवों के प्राप्त होने वाले शक्ति दान लाभ भोग उपभोग में विघ्न सन्तति की रचना करता है । यति दान योगादिक में अन्तराम डाल कर उनको रोकता है ।
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२१६ ]
[ गो, प्र. चिन्तामणि मन्द वीर्यारिण जायन्ते क ण्यति बालान्यपि । अपक्वपाचना योगार फलानीव वनस्पतेः ॥२२७॥
पूर्वोक्त अष्टकर्म अतिशय वलिष्ठ हैं तथापि जिस प्रकार बनस्पति के पालन बिना पके भी पवन के निमितं (पाल आदि) से पक जाते हैं, उसी प्रकार इन कीं। की स्थिति पूरी होने से पहिले भी तपश्चररादि से मन्द वीर्य (अल्प फल देने वाले
हो जाते हैं।
अपकवः क्रियतेऽस्ततन्दैस्तपोभिग्नेवर शुद्धि युक्तः । क्रमाद् गुरपथ रिंग समाश्रयेण सुसंवृतान्तः करणे मुनीन्द्रः ।।२२८॥
नष्ट हुअा है प्रमाद जिनका और सम्यक प्रकार से संवर रूपं हुआ है चिनः । जिनका ऐसे मुनीन्द्र उत्कृष्ट विशुलता सहित तापों से इनु पर. हे गुणश्रेणी निर्जरा को ।।
आश्रय करके विना पके कर्मों को भी पका कर स्थिति पूर्ण हुए बिना ही निर्जरा - करते हैं।
द्रव्याधुत्कृष्ट सामग्रीमासाद्योग्रतपोबलात कर्माणि घातयन्त्युच्चेस्तुर्य ध्यानेन योगिनः ॥२२६॥
योगीश्वर द्रव्य क्षेत्र काल भाव की उत्कृष्ट सामग्री को प्राप्त होकर तीन तप के बल से इस विपाक विचय नामा ध्यान के पश्चात् चौथे संस्थान विचय नाम ध्यान से कर्मों को अतिशयता के साथ नष्ट करते हैं।
विलीना शेष कर्माणि स्फुरन्तमति निर्मलम् । स्वं ततः पुरुषाकरं स्वाङ्गमर्यगतं स्मरेत् ।।२३०॥
उक्त विधान से कर्मों की निर्जरा से वलय हुए हैं समस्त कर्म जिसके ऐसा. स्फुरायमान निर्मल पुरुषाकार स्वरूप अपने अंग में ही प्राप्त हुए यात्मा को स्मरण र करते हैं । अर्थात् चिन्तवन (ध्यान) करते हैं।
इति विविध विकल्पं कर्म चित्र स्वरूपं । प्रति समय मुयोर्ण जन्म वयंङ्ग भाजाम् ॥ स्थिरचर विषयाएवं भावयन स्ततन्दो । दहति दुरित कक्षं संयमो शान्त मोहः ॥२३१।।
पूर्वोक्त प्रकार अनेक हैं भेद (विकल्प) जिसमें ऐसे कर्म स्वरूप संसार में वर्तने वाले प्राणी स्थावर असों के समय-समय प्रति उदयरूप हैं, उसको शान्त मोह संयमी मुनि प्रमाद रहित होकर विचारता हुआ पाप रूपी बन को दग्ध करता है ।।
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अध्याय : पांचवां ]
[ २१७
इत्थं कर्मकटुप्रपाक फलिताः संसार घोराचे । जीबा दुर्गति दुःख वाढव शिखा सन्तान संतापिताः ॥ मृत्युत्पत्ति महोमिजाल निचिता मिथ्यात्व वातेरिताः । क्लिश्यन्ते तदिदं स्मरन्तु नियतं धन्याः स्वसिद्धयथिनः ॥ २३२॥
इस प्रकार भयानक संसार रूप समुद्र में जो जीव हैं वे ज्ञानवरदिक कर्मों
कटु पाक (तोदय से संयुक्त हैं । वे दुर्गति के दुःख रूपी बडवानल की ज्वाला - से संतान से संतापित हैं तथा मरण जन्म रूपी बड़ी लहर से परिपूर्ण भरे हैं तथा मिथ्यात्व रूप पवन के प्रेरे हुये कुलेस भोगते हैं, सो जो धन्य पुरुष हैं, वे अपनी मुक्ति की सिद्धि के लिए इस प्रकार विपाक विचय ध्यान का स्मरण करें ( ध्यावें ) ।
इस प्रकार विपाक विचय ध्यान का वर्खेन किया इसका संक्षेप यह है कि ज्ञानावरणादि कर्म जीवों के अपने तथा पर के निरन्तर उदय से आते हैं, सो यह विपाक है, इसको चिन्तवन करने से परिणाम विशुद्ध हो जाने पर कर्मों के नाश करने का उपाय करें तब मुक्त होता है 1.
* संस्थान-विचय-धर्मध्यान *
संस्थान विचय धर्मध्यान का स्वरूप
आगे संस्थान विचय नामक धर्म ध्यान के चौथे भेद का वर्णन करते हैं, इस ध्यान में लोक का स्वरूप विचार किया जाता है, इस कारण लोक का वर्णन किया जाता है ।
श्रनन्तानन्तमाकाशं सर्वतः स्वप्रतिष्ठितम् ।
तन्मध्येsयं स्थितो लोकः श्रीमत्सर्वज्ञवरितः ॥२३३॥ .
प्रथम तो सर्व तरफ ( चारों ओर ) अनन्तानन्त प्रदेश रूपं आकाश है, सो
क्योंकि उससे बड़ा अन्य
हस्त्र प्रतिष्ठित है, अर्थात् श्राप ही अपने आधार पर है, कोई पदार्थ नहीं है जो उसका आधार हो । उस श्राकाश मध्य (बीच ) में यह लोक स्थित है सो श्रीमत्सर्वज देव ने वर्णन किया है, इस कारण प्रमाणभूत है क्योंकि असत्य कल्पना करके अन्य किसी ने नहीं कहां सर्वत्र भगवान् ने प्रत्यक्ष देख कर जैसा है वैसा ही वर्णन किया है ।
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अना
२१८ ]
.. चिन्तामरिण लोक का स्वरूप
स्थित्युत्पत्तिव्ययोपेतः पदार्थ श्चेतनेतरैः ।
सम्पूर्णोऽनदि संसिद्धः कर्तुत्रापार बजितः ॥२३४।।
__ यह लोक बौव्य उत्पाद और व्यय (क्षय) करके संयुक्त चेतन अचेतन पदार्थ से सम्पूर्ण तथा भरा हुआ है और अनादि संसिद्ध है, कर्ता के व्यापार से वजिल है, अर्थात् कोई अन्यमती इस लोक का कर्ता हा ईश्वर आदि को कहते हैं तथा कच्छप या शेष नाग के ऊपर स्थित है, इत्यादि बुद्धि कल्पित असत्यार्थ कल्पना करके कहते हैं, सो वैसा नहीं है; सर्वज्ञ ने जैसा कहा है वैसा ही सत्य हैं।
ऊधिोमध्न भागों बिभर्ति भुवनत्रयम् । अतः स एवं सूत्रस्त्र लोक्याधार इष्यते ॥२३५॥
तथा यह लोक उर्ध्व, मध्यं अधोभाग से तीन भुवनों को धारण करता है, इस कारण सूत्र जानने वाले तीन लोक (तीन जगत) का प्राधार इस लोक को कहते हैं।
उपयु परि संक्रान्तः सवतोऽपि निरन्तरः । चिमिर्वायुभिरा कोषों महावेग संहाबलः ।।२३६।।
तथा यह लोक उपरि उपरि (एक के ऊपर एक) सर्व तरफ से ग्रन्तर रहित महावेगवान महाबल वाले तीन पवनों से बैठा हुआ है । तीनों पवनों के नाम---
घनाब्धिः प्रथमस्तेषां ततोत्तयैव घनमारूतः । सनुवात स्तृतीयोऽन्ते विजेयावायवः क्रमात ॥२३७।।
उन तीन पवनों में से प्रथम तो यह लोक धनोदधि नाम पचन से बढ़ा हुआ है, उसके ऊपर धनवात नाम का पवन बेढ़ा हुआ है और उसके ऊपर अन्त में तनुवांत नाम का पवन है, इस प्रकार तीन. पवनों से लोक बेढ़ा हुआ हैं। इसी कारण उधर
इधर हट नहीं सकता किन्तु, अाकाश के मध्य भाग में स्थित है। ... प्रत्येक पवन २०-२० बीस-बीस हजार योजन मोटा है
उद्धत्य सकलं लोकं स्वशत्तयैव वयवस्थिताः । पर्यन्त रहिते ज्योम्नि मरुतः प्रांशु विग्रहाः ।।२३।। और ये तीनों पवन तीन लोकों को धारण करके अपनी शक्ति से ही अन्तर
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. अध्याय : पांचवां ।
[ २१६ राहत पाकाश में अपने शरीर को विस्मृत किये स्थित हैं।
घनाब्धि बलये लोकः स च नान्ते व्यवस्थितः । तनवातान्तरे सोऽपि स चाकाशे स्थितः स्वयम् ॥२३६।।
यह लोक तो धनोदधि नाम के बात बलय में स्थित है. और धनोदधि वात वलय धनवात बलय के मध्य में है। अर्थात् धनोदधि वातवलय के चारों ओर धनवात वलय घिरा हुआ है, और धनवातवलय के चारों तरफ तनुवातवलय घिरा हा है और तनुवात वलय आकाश में स्वयमेव स्थित है। इसमें किसी का कोई कर्तव्य नहीं है । अनादि काल से इसी प्रकार की व्यवस्था है । .. अधो वेत्रासना कारो मध्ये स्याज्झल्लरीनिभः ।
मुबला मस्ततोव्यूज़ स विधेति व्यवस्थितः ।।२४०।।
यह लोक नीचे से तो वेत्रासन कहिये मोहे के आकार का है अर्थात् नीचे से चौड़ा है फिर घटता-घटता मध्य लोक पर्यन्त सँकड़ा है फिर मध्य लोक मालर के प्राकार का है और उसके ऊपर ऊर्ध्व लोक मृदंग के आकार का है अर्थात् बीच में कुछ चौड़ा है ऐसे तीन प्रकार के लोक की व्यवस्था है ।
___ अस्य प्रमाण मुन्नात्या सप्त च रज्जवः । .... सप्लैका पञ्च चैका च मूल मध्यान्त विस्तरे ॥२४१।।
इस लोक की ऊंचाई तो सात-सात राजू है अर्थात् नीचे से लगाकर मध्य लोक पर्यन्त सात राजू है और उससे ऊपर राजू है इस प्रकार चौदह राजू ऊंचा है, और मूल में चौड़ा सात राजू है, सो घटता-घटता मध्य. लोक में एक राजू चीड़ा है और उसके ऊपर बीच में पांच राजू चौड़ा है और अन्त में और आदि में मध्य लोक के निकट एक-एक राजू चौड़ा है। अधोलोक
तत्रायो भागमासाद्य संस्थिताः सप्त भूमयः । यासु नारकपण्ढानां निवासः सन्ति भीषरणाः ॥२४२।।
इस लोक के अधोभाग में सातः पृथ्वि हैं जिनमें नारकी नपुंसक जीवों के बड़े भयकारी निवास स्थान हैं।
काश्चिन्दनानलप्रख्याः काश्चिच्छीतोष्रंगसंकुलाः । तुषार बहुलाः काश्चिद् भूमयोऽत्यन्त भीतिदाः ॥२४३३॥
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२२० ]
[ गो. न. चिन्तामणि उन सप्त नरक की पृथ्बियों में कई तो बञाग्नि के समान उष्ण हैं, कई शीत उष्णता से व्याप्त हैं और कई अत्यन्त हिमवाली हैं इस प्रकार अतिशय भयकारक है। उन नरकों में शीत. उष्ण की बाधा
उदीरनिलदीप्तासु निसर्योष्णासु · भूमिथु ।
मेरुमात्रोऽप्ययः पिण्डः क्षिप्तः सद्यो विलीयते . ।।२४४॥ . .. उदय रूप है अग्नि जिनमें ऐसी स्वाभाविक उप्परूप भूमियों में यदि मेरु पर्वत के समान लोहे का पिंड डाला जाय तो तत्काल गल कर भस्म हो जाय ऐसी उन भूमियों में उगता है।
शीत भूमिध्वपि प्राप्तो मेरु मानोऽपि शीर्यते । शातधा साक्यः पिण्डः प्राप्य भुमि क्षरणान्तरे ॥२४॥
जिस प्रकार उघ्रय भूमियों में मेरु समान लोहे का पिड गल जाता है, उसी प्रकार शीत प्रधान भूमियों में भी मेक के समान लोहे का पिड डाला जाय तो शीत के कारण क्षण मात्र में खंड-खंड होकर बिखर जायेगा। उन नरकों के जीव---.
हिसास्तेयानृता ब्रह्म ब्रह्वार भादि पासकैः । विशन्ति नरकं घोरं प्रणिनोऽन्तनिर्छयाः ॥२४६॥
उन घोर नरकों में हिंसा झूठ चोरी कुशील और बहुत प्रारंभ परिग्रहादि पापों के करने से ही अत्यन्त निर्दयी जीव प्रवेश करते हैं। भावार्थ-~-हिंसादि पांच पाप अथवा सात व्यसनों के सेवी जीव ही उन घोर नरकों में जाकर दुःख भोगते है।
मिथ्यात्वाविरति क्रोध रौद्र ध्यान परायणाः । पतन्ति जन्तवः श्वने कृष्ण लेश्या वशं गताः ।।२४७॥
तथा मिथ्यात्य अविरति क्रोध रौद्रध्यान में तत्पर तथा कृष्ण लेश्या के वंश हुए प्राणी नरक में पड़ते हैं। उन तरकों में बुःख
असि पत्रचनाकोणे. शस्त्र.. शूला सिसंकुले । नरकेऽत्यन्तदुर्गन्धे .. वसासक् . . कृमिकर्दमे ॥२४८।।
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अध्याय पांचवां ]
शिवाश्वव्याघ्रकङ्कादये वकण्टक संकीखें
संभूय कोटिकामध्ये ऊर्ध्वपादा श्रद्योभुरवाः ।
ततः पतन्ति सानन्दं वज्रज्वलन भूतले ॥ २५० ॥
मांसाशिविहगान्विते । शूलशाल्मलिदुर्गमे ॥ २४६॥
.
नरक कैसे हैं? कि असिपत्र (तलवार) सरीखे हैं पत्र जिनके ऐसे वृक्षों से तथा शूल तलवार यादि शस्त्रों से व्याप्त हैं प्रत्यन्त दुर्गन्ध युक्त हैं वसा ( श्रपकमास ) afrर और कीटों से भरा हुआ कर्दम हैं जिनमें ऐसे हैं तथा सियाल पचान आदिक से तथा मांस भक्षी पक्षियों से भरे हुए हैं, तथा वज्र भय कांटों से और शूल शाल्मलि आदि से दुर्गम हैं अर्थात् जिनमें गमन करना दुःख दायक हैं ऐसे नरकों में बिलों के संपुट में उत्पन्न होकर वे नारक जीव ऊँचे पांत्र और नीचे मुख ऐसे चिल्लाते हुए उन मंपुटों से वाग्निमय पृथ्वी में गिरते हैं ।
[ २२१
श्रयः कण्टक कीर्णासु द्रुत लोहाग्निवीथिषु ।
छिन भिन्न विशोङ्गा उत्पतन्ति पतन्ति च ।। २५१||
उस नरक भूमि में वे नारकी जीव छिन्न भिन्न खंड-खंड होकर बिखेरे हुए अंग से पड़कर बार-बार उछल उछल के गिरते हैं, सो कैसी भूमि में गिरते हैं कि जहां पर लोहे के कांटे बिखरे हुए हैं और जिनमें लोहा गल जाता है ।
दुःसहा निष्प्रतीकारा ये रोगाः सन्ति केचन ।
साकल्येनैव गात्रेषु नारकारणां भवन्ति च ॥ २५२॥
जो रोग सह्य हैं जिनका कोई उपाय ( चिकित्सा) नहीं हैं ऐसे समस्त प्रकार के रोग नरकों में रहने वाले नारकी जीवों के शरीर के रोम-रोम में होते हैं ।
न तत्र सुजनः सर्वे ते निर्देयाः
अष्ट पूर्व मालोक्य तस्य रौद्रः भयास्पदम् !
दिशः सर्वाः समीक्षन्ते वराकाः शरणार्थिनः ॥ २५३॥
फिर वे नारकी जीव उस नरक भूमि को अपूर्व और रौद्र ( भयानक ) देखकर किसी की शरण लेने की इच्छा से चारों तरफ देखते हैं, परन्तु कहीं कोई सुख का कारण नहीं दिखता और न कोई शरण ही प्रतीत होता है ।
कोऽपि न मित्रं न च बान्धवाः ।
पापाः क्रूरा भीमोग्रविग्रहाः ॥ २५४ ॥
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२२२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामगिः उस नरक भूमि में कोई सुजन बा मित्र वा बाँधव नहीं है, सभी निर्दय, पापी, क्रूर और भयानक प्रचण्ड शरीर वाले हैं।
सर्वे च हुण्ड संस्थानाः स्फुलिङ्गः सदृशेक्षणः । विद्धिता शुभ ध्यानाः प्रचण्डाश्चण्ड शासनाः ।।२५५।।
बे सभी नारकी जीव हुँइक संस्थान वाले हैं अर्थात् जिनके शरीर का प्रत्येक अंग अति भयानक बेडौल है और अग्नि के स्फुलिंग के समान जिनके नेत्र हैं तथा प्रचण्ड, ग्वार्ता सैद्र ध्यान को बढ़ाये हुए है, तथा लोधी हैं और जिनका शासन भी प्रचण्ड है।
तत्राकन्दर ः सा भू यन्ते कर्कशा: स्वनाः । दृश्यन्ते गृधगोम्थुसर्पशादल मण्डलाः ।।२५६।।
उस नरक भूमि में चारों ओर से पुकारने के शब्द बड़े कर्कश सुने जाते हैं, तथा गृधपक्षी, सिवाल, सर्प, सिंह, कुत्ते ये सब जीव बड़े भयानक दीखते हैं।
घायन्ते पूतयों गन्धाः स्पृश्यन्ते वज्र कण्टकाः। .. . जलानि पूति गन्धीनि मधोऽसृग्मांस कर्दमाः ॥२५७॥
जिस नरक भूमि में दुर्गध सूचनी पड़ती हैं और मजमय कांटों में छिदना पड़ता है और जल जहां दुर्गन्धमय है, और रुधिर मांस का है कादा जिनमें ऐसी नदियाँ हैं।
चिन्तयन्ति तदालोक्यं रौद्ध मत्यन्त शङ्किताः । केयं भूमिः क्व चानीताः के वयं केन कर्मणा ॥२५॥
उस स्थान को रौद्र (भयानक ) देखकर वे नारकी गरग (जो नवीन उत्पन्न हुए हैं) अत्यन्त शंकित होकर विचरते हैं कि यह भूमि कौनसी हो और हम कौन हैं कौन से कर्म से यहां आये हैं। .. ..
ततो बिविभडात्स्वं पतितं श्वभ्रसागरे कमगाऽत्यन्तरौद्र र हिमाद्याम्भ जन्मना ।।२५६।।
तत्पश्चात विभङ्गावधि (कुअंबधिज्ञान) से जानते हैं कि हिंसादिक प्रारम्भों से उत्पन्न हुए अत्यन्त रौद्र (खोटे) कर्म से हम नरक रूपी समुद्र में पड़े हैं। .
ततः प्रादुर्भवत्यच्चैः पश्चातापोऽस्ति दुःसहः । . दहन्न विरलं चेतो वनाग्निरिव निर्दयः ।।२६०॥
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श्रध्याय: पांचवां ]
[ २२३
तत्पश्चात् नारकी जीवों के दुःसह पश्चाताप अतिशय करके प्रगट होता है । बहादुःसह पश्चाताप वज्राग्नि के समान निर्दय हो चित्त को दहन करता हुआ प्रगट हुआ है ।
मनुष्यत्वं समासाद्य तदा कैश्चिन्महात्मभिः । श्रपवर्गाय संविग्नैः सम विषया रामपाकृत्य विध्याप्य मदनानलम् । श्रप्रमत्तस्तपश्चरणं धन्यैर्जन्माति शान्तये ॥२६२॥ उपसर्गाग्निपातेऽपि धैर्य मालस्य चोन्नतम् । तैः कृतं तदनुष्ठानं येन सिद्ध समीहतम् ॥ २६३॥ प्रमादमदमुत्सृज्य भाव शुद्धयां मनोषिभिः । केनाप्य चिन्त्यवृत्तेन स्वर्गो मोक्षच्च सघितः ॥ २६४॥ शिवrigiri मार्ग विशन्तोऽप्यतिवत्सलाः ।
मया बोरताः सन्तो निर्मत्स्यं कटुकाक्षरैः ।। २६५ ।।
कितने बड़े पुरुषों ने मनुष्यत्व पाकर वैराग्य सहित हो मोक्ष के लिये पूजनीय पवित्रा• चरण किया और उन महाभागी मुनियों ने विषयों की याशा को दूर करके कामरूप 1. अग्नि को बुझाकर निम्प्रमादी हो संसार पीड़ा की शांति के लिये तप का संचय किया । तत्पश्चात उन उत्तम पुरुषों ने उपसर्गरूपी अग्नि के थाने पर बड़े धैर्य का आलंबन कर वह प्राचरण किया कि जिससे वांछित कार्य सिद्ध हुआ तथा उन बुद्धिमान पुरुषों ने प्रमाद और मद को छोड़कर भाव की शुद्धता से किसी प्रचित्य याचरण से स्वर्ग 'तथा मोक्ष साधा, उन सत्पुरुषों ने वात्सल्य भाव से युक्त हो मुझे मोक्ष और स्वर्ग यादि के मार्ग का उपदेश दिया, परन्तु मैंने बड़े कटु अक्षरों से उनका तिरस्कार करके निंदा की उनका उपदेश अंगीकार किया, इत्यादि पश्चाताप करते हैं।
तस्मिन्नपि मनुष्यत्वे परलोकैक शुद्धि |
ar तत्संचितं कर्म यज्जातं श्वभ्रशं बम् ॥ २६६॥
फिर भी नारकी पश्चाताप करता है कि परलोक की अद्वितीय शुद्धता देने वाले उन मनुष्य भव में भी मैंने वह कर्म संचय किया कि जिससे नरक का शंबल ( प राह खर्च ) अर्थात् उस कर्म ने सहज में हो नरक में ला पटका 1
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२२४ }
[ गो. प्र. चिन्तामणि अविद्याक्रान्तचित्तेन विषयान्धीकृतात्मना । चरस्थिरानि संघालो निर्दों हतो मया ॥२६७॥
फिर नारकी विचारता है कि अविद्या से आक्रान्त है चित्त जिसका तथा विषयों से ग्रंधा होकर मैंने उस स्थावरों के समूह को मारा है।
परबिलामिषासक्तः परिस्त्रीसंग लालसा ।। बहुव्यसन विध्वस्तो रौद्ध. ध्यान परायणः ॥२६॥ बत स्थितः प्राक् चिरं का सत्यैतत्फल भागतम् । अन्तयातनासारे दुरन्ते नरकार्णवे ॥२६६।।
नारकी फ़िर पश्चाताप करता है कि मैं परके धन में और मांस में अथवा पर के धनरूपी मांस में, आसक्त होकर पर स्त्री संग करने में लुब्ध हुअा तथा बहुत प्रकार के व्यसनों से पीड़ित होकर रौद्र ध्यानी हुया, पूर्व जन्म में इस प्रकार रहा इस कारमा उसका यह अनन्त पीड़ा से असार-अपारं नरकरूपी समुद्र फल पाया है ।.
यन्मया वञ्चितो लोको बराको गढमानसः । उपायहुभिः पापैः स्वाक्ष सन्तर्पणाथिना ॥२७०॥ कृतः परामदों येषां धनमूस्त्री कृते मया । धातश्म तेऽत्र संप्राप्ता: कई तस्माय निष्क्रियाम् ।।२७१॥
फिर विचारता है कि मैंने भोले जनों को अति अन्यायरूप उपायों से इन्द्रियों को पोषने के लिए ठगा तथा पर का धन पर की भूमि वा स्त्री लेने के लिए जिनका अपमान किया तथा द्यात किया । लोग यहां नरक भूमि में उसका दंड देने के लिये आकर प्राप्त हुए हैं।
ये तदा शशकप्राया मया बलवता हताः । तेऽध जाता मृगेन्द्राभा मां हन्तु विविधर्वधैः ।।२७२।।
उस मनुष्य भव में जब मैं था तो वे शशक (खरगोश) समान थे और मैं बलवान् था सो मैंने मारा किन्तु वे आज यहां पर सिंह के समान होकर अनेक प्रकार ..के घातों से मुझे मारने के लिए उद्यत हैं।
मानुष्येऽपि स्वतंत्रेण यत्कृतं नात्मनो हितम् । तदद्य किं करिष्यामि देवपौरुष वजितः ।।२७३॥ फिर विचारता है कि जब मनुष्य भव में स्वाधीन था। तब भी मैंने अपना
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अध्याय : पांचवां ]
[ २२५
हित साधन नहीं किया तो अब यहां देव और पौरुष दोनों से रहित होकर क्या कर सकता हूं, यहां कुछ भी हित साधन नहीं हो सकता ।
यदान्धेनापि पापेन निस्त्रि शेवास्त बुद्धिना |
विराध्या राज्य सन्तानं कृतं कर्माति निन्दितम् ।।२७४ ।।
फिर विचारला है कि मद से थे पापी निर्दय नष्ट बुद्धि मैंने ग्राराधने योग्य जो भले मार्ग में प्रवर्तनेवाले उन पूज्य पुरुषों के सन्तान को विराधकर निंदनीय कर्म किया।
यत्पुरग्राम विन्ध्येषु मया क्षिप्तो हुताशनः । जल स्थल बिलाकाश चरिणो जन्तवो हताः ।।२७५ ।। कृन्तन्ति मम मर्माणि स्मर्यमाणान्य तारतमं । प्राचीतान्यद्य कर्माfरण कचानीय निर्दयम् ॥ २७६॥
फिर विचारता है कि मैंने पूर्व भव में पुर ग्राम वन में ग्रग्नि डालकर दब लगाई और जल भर, थल भर आकाश भर तथा बिलों में रहने वाले असंख्य जीवों को मारा, वे पूर्व के पापकर्म इस समय स्मरण आने से निरन्तर मेरे मर्म स्थानों को दया रहित करवत के समान भेदते हैं ।
किं करोमि क्व गच्छामि कर्मजाते पुरः स्थिते ।
शरणं कं प्रपश्यमि वराको देव वन्चितः ॥ २७७ ॥
फिर विचारता है कि ऐसे नरकों के दुःख में भी कर्मों का समूह मेरे सामने है, उसके होते हुए मैं क्या करूँ, कहां जाऊँ, किसकी शरण देखूं, मैं एक दैव सेठमा हुआ है, मुझे कुछ भी सुख का उपाय नहीं दिखता ।
यत्रिमेष मपि स्मर्तु द्रष्टुं श्रोतुं न शक्यते ।
तद्दुः खभग सोढव्यं वर्द्धमानं कथं मया ॥२७८
फिर विचारता है कि नेत्र के टिमकार मात्र भी जिसके स्मरण करने व
सुनने की समर्थता नहीं प्रतिक्षण बढ़ता हुआ वह दुःख मैं कैसे सहूँगा । विषज्वलन संकीर्ण वर्द्धमानं प्रतिक्षणम् ।
मम मूनि विनिक्षिप्तं दुःखं देवेन निर्दयम् ॥१२७॥
फिर विचारता है कि त्रिष तथा अग्नि से व्याप्त क्षरण क्षरण में बढ़ने वाले ये
सब दुःख दैव (कर्म) ने दया रहित होकर मेरे ही माथे पर डाले हैं ।
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२२६ ।
[ गो. प्र. चिन्तामगि न दृश्यन्ते ते मृत्या न पुत्रा न च बान्धवाः । येषां कृते मया कर्म कृत स्वस्यैव धातकम् ।।२८०॥ न लगाणि मित्राणि न पाप प्रेरको जतः । पदमब्येतमायातो मया साद्ध गतमपः ॥२१॥
फिर ऐसा विचारता है कि जिनके लिए मैंने अपने घातक पापकर्म पूर्व जन्म में किये इस समय न तो वे चाकर, न पुत्र, कलत्र, मित्र मण पाप में प्रेरणा करने वाले बांधव कोई देखने में आते हैं । बे ऐसे निर्लज्ज हो गये कि एक कदम भी मेरे . साथ नहीं पाये।
श्राश्रयन्ति यभा बुक्षं फलितं पत्रिणः पुरा । फलापाये पुनर्यान्ति तथा ते स्वजना गताः ।।२८२॥
फिर ऐसा विचारता है कि जिस प्रकार पक्षी पहिले तो फले हुए वृक्ष का ... ग्राश्रय करते हैं, परन्तु फलों का अभाव हो जाता है, तब-तव पक्षी उड़ जाते हैं, उसी प्रकार मेरे स्त्रजन जाते रहे, ये दुःख भोगने को कोई साथ नहीं आया ।
शुभाशुभनि कर्माणि यान्त्येव सह देहिमिः । स्वाजिता नीति यत्प्रोचुः सन्तस्तत्सत्यतां गतम् ॥२८३॥
फिर विचारता है कि जो सत्पुरुष कहते थे कि अपने उपार्जन किये हुए शुभ अशुभ कर्म हैं, वे ही जोष के साथ जाते हैं, अन्य कोई साथ नहीं जाता सो वह आज सत्य प्रतीत हुआ।
धर्म एव समुद्धतुं शक्तोऽस्माच्छ्चभ्रसागरात् । नस स्वप्नेऽपि पापेन मया सम्यक्पुराजितः ॥२४॥
फिर विचारता है कि इस नरकरूपी समुद्र से उद्धार करने के लिये एक धर्म ही समर्थ है; परन्तु मुझ पापिष्ठने पहिले स्वप्न में भी उसका उपार्जन किया।
सहायः कोऽपि कस्यापि नाभून्न च भविष्यति । मुक्तवक प्राकृतं कर्म सर्वसत्वाभिनन्दकम् ॥२८॥
फिर विचारता है कि इस संसार में कोई किसी का सहायक न है, न हुआ और न होगा; किन्तु समस्त जीवों को आनन्द करने वाला अर्थात् जिसमें सब की दया हो ऐसा शुभ कर्म ही सहायक होता है ।
तत्तुर्वन्त्यमाः कर्म जिह्वोपस्थादि दण्डितः । येनत्वभ्रषु पच्यन्ते कृतात करुख स्वनाः ॥१८६॥
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. अध्याय : पांचवां ।
[ २२७. फिर विचारता है कि जो अधम (पापी) पुरुष जिह्वा उपस्थेन्द्रिय से दण्डित होते हैं, वे ऐसा कर्म करते हैं कि जिस कर्म से वे पापी पीडित होकर नरकों में पचाये जाते हैं, रोते हैं वा शब्द करते हैं; जिसको सुनने से अन्य को दया उपज
श्रावें।
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चक्षुरुन्मेषमात्रस्य सुखस्यार्थे कृतं मया । तत्पापं येन सम्पमा अनन्ता बुःखराशयः ॥२७॥
फिर विचारता है कि मैंने नेत्रों के टिमकार मात्र सुख के लिये ऐसा पाप किया कि जिससे अनन्त दुःखों की राशि प्राप्त हई।
याति सार्द्ध ततः पाति करोति. नियतं हितम् । : हन्ति दुःखं सुख दत्ते यः स बन्धनी योषितः ॥२८॥
फिर विचारता है कि यह धर्मरूप बन्धु (हित). ऐसा है कि साथ जाता है और जहां, जाता है, वहीं रक्षा करता है और यह मित्र नियम से हित ही करता है, दुःख का नाश करके सुख देता है। ऐसे धर्मरूपी मित्र को मैंने पोसा ही नहीं और जिनको मित्र समझ के पोसा उनमें से कोई एक भी साथ नहीं पाया।
परिग्रह महाग्राह संग्रस्ते नातं चेतसा । . न दृष्टा यम शार्दुल चपेटा जीवनाशिनी ॥२६॥
फिर विचारता है कि परिगंहरूपी महाग्राह से पकड़े हुए पीडित चित्त होकर मैंने जीव को नाश करने वाली यमरूपी शार्दूल की चपेट नहीं देखी अर्थात् परिग्रह में ग्यासक्त होकर निरन्तर पाप ही करता रहा ।
पातयित्वा महाधोरे मां श्व ऽचिन्त्यवेदने । क्व गतास्तेऽधुना पापा मद्वित्तफल भोगिनः ॥२६॥
फिर विचारता है कि जो कुटुम्बादिक मेरे उपार्जन किये हुये धन के फल भोगने वाले थे, वे पापी मुझे अचिन्त्य वेदनामय इस घोर नरक में डाल कर अब कहां चले गये ? यहां दुःख में कोई साथी न हुआ। . ..
इत्यजस्त्रं सुदुःखार्ता विलापमुखराननाः। शोचन्ते पाप कर्माणि वसन्ति नर कालये ।।२९१॥ .
इस पूर्वोक्त प्रकार से नारकी जीव निरन्तर महादुःख से पीडित हुप, मुख से पुकारते हुए, विलाप करते हुए. अपने पापकार्यों को स्मरण कर करके शोच करते हैं .
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२२८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि और नरक मंदिर में बसते हैं ।
इति चिन्तानलेनोच्चदहामानस्य ते तदा । धावन्ति. शरशूलासिकराः क्रोधाग्नि दीपित्ताः ॥२६२॥ बरं परावं पापं स्मारयित्वा पुरातनम् । निर्भयं कटुकालापैः पीडयन्त्यति निर्वयम् ॥२६३।३.
इस पूर्वोक्त प्रकार की चिन्तारूप अग्नि से अतिशय जलते हुए नारकी के ऊपर उसी समय अन्य पुराने नारकी बारण, शूल, तलवार लिये हुए, क्रोधरूपी अग्नि से जलते हुए दौड़ते हैं और पूर्व के पाप तथा वैर को याद कराते हुए कटु वचनों से तिरस्कार करके उसे अतिनिर्दयता से जिस प्रकार बनता है, दुःख देते हैं ।
उत्पादयन्ति नेत्राणि चूर्णयन्स्यस्थि संचयम् । बारयन्त्युदरं कशास्त्रोटयन्यत्र मालिकाम् ।।२६४॥ ।
वे पुराने नारकी उस विलाप करते हुए नये नारकी के नेत्रों को उखाड़ते हैं, हड्डियों को चूर्ण कर टालते हैं. सदर को फाड़ते हैं और क्रोधी होकर उसकी प्रांतों को तोड़ डालते हैं। .
निष्पीडयन्ति यन्त्रेषु दलन्ति विषमोपलैः ।
शाल्मलीधु निघर्षन्ति कुम्भीषु क्वाथयन्ति च ।।२६।।
तथा वे नारकी उसे धानी में डाल कर पीलते हैं और कठिन पाषाणों से दलते हैं, लोहे के कांटे वाले वृक्षों से घिसते (रगड़ते) हैं तथा कुम्मियों में (कलशियों में) डालकर काढा करते (उबालते) हैं ।
असह्यदुःख सन्तान दान दक्षाः कलिप्रियाः । तीक्षपदंष्ट्रा करालास्या भिन्नाञ्जन समप्रभाः ॥२६६॥ . कृष्णलेश्योद्धताः पापा रौद्र ध्यानक भाविताः। . भवन्ति क्षेत्र दोषेण सर्वे ते नारकाः खलाः ॥२६७।।
तथा वे नारकी असह्य दुःखों की निरन्तरता देने में चतुर हैं, कलह. करना ही जिनको प्रिय है, तीक्ष्ण दाढों से भयानक मुख वाले हैं, बिखरे हुए काजल के समान जिनके शरीर की काली प्रभा है ; तथा कृष्णलेश्या के कारण उद्धत हैं, पापरूप हैं और रोद्रध्यान के भावने वाले हैं, एवं क्षेत्र के दोष से वे सब ही नारकी दुष्ट होते हैं।
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अध्याय : पांचवां ।
। २२६ वैकियिक शरीरत्वादि क्रियन्ते यदृच्छया । यत्राग्निश्वापदाङ्ग स्ते हन्तु चित्रर्वधः परान् ।।२९८॥
उन नारकियों का वैक्रियिक शरीर होने के कारण इच्छानुसार पारणी अग्नि हिस्त्र जन्तु सिंहादिक का रूप बनाकर अनेक प्रकार से परस्पर मारने के लिये विक्रिया करते हैं।
न तत्र बान्धवः अनन्तयातना सारे नरकेऽत्यन्त भीषणे ॥२६६।।
यहां अत्यन्त भयानक नरक में न तो कोई बांधव है; न पुत्र है, न कोई स्वामी है, न कोई मित्र है, न कोई भृत्य ही है, न स्त्री है, न पुत्र है, केवल अनन्त यातना का भयानक वृष्टिपात ही है ।
तत्र ताममुखा गृध्रा लोहतुण्डाश्च वायसाः । दारयन्त्येव मर्माणि चञ्चुभिनखरैः खरैः ।।३००॥
उस नरक में मुख - चोंच जिनके ऐसे तो गृध्रपक्षी हैं और लोहे की चोच वाले काक हैं, सो चोंचों से तथा तीक्ष्ण नखों से नारकी जीवों के मर्मों को विदारते हैं।
कृमयः पूतिकुण्डेषु वज्रसूची समाननाः । भित्वा चर्मास्थि मांसानि पिबग्ल्याकृष्य लोहितमम् ।।३०१॥
तथा उस नरक में पीब के कुण्डों में वज्र की सुई समान हैं, मुख जिनके ऐसे कोई वा जौ के नारकी जीवों के चमड़े और हाड, मांस को बिदा कर रक्त (खून) को को पीते हैं।
बलाद्विदाय संदेशर्वदन क्षिप्यते क्षणात् । थिलीनं प्रज्वलत्ताम यैः पीतं मद्यमुद्धतैः ॥३०२।।
तथा जिन पापियों ने मनुष्य जन्म में उद्धत होकर मद्यपान किया है। उनके मुख को संडासी से फाड़ फाड़ कर तुरन्त के पिघलाये हुए ताम्बे को पिलाते हैं ।
परमांसानि यः पापैक्षितान्यतिनिर्दयः। शुलापक्कानि मांसानि तेषां खादन्ति नारकाः ॥३०३॥
और जिन पापियों ने मनुष्य भव में निर्दय होकर' अन्य जीवों का मांस 'भक्षण किया है। उनके मांस के शूले पका पका कर नारकी जीव खाते हैं।
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२३० ]
[ गो: पं. चिन्तामणि
यैः
प्राक्परकलत्रारिंग सेवितान्यात्मवञ्चकः ।
. योज्यन्ते प्रज्वलन्तीभिः स्त्रीभिस्ते ताम्रजन्मभिः ।।३०४ ।।
तथा जिन आत्मवञ्चक पापी जनों ने पूर्व भव में परस्त्री सेवन की हैं, उनको ताम्बे की अग्नि से लाल की हुई स्त्रियों से संगम कराया जाता है । न सौख्यं चक्षुरुन्मेषमात्रमप्युपलभ्यते ।
नरके नारकं दर्निर्हन्यमानैः परस्परम् ||३०||
नरक में नारकी जीव परस्पर एक दूसरे को मारता है, सो वे दिन एक पलक मात्र भी सुख को नहीं पाते ।
किमत्र बहुनोक्तन जन्म कोटि शतैरपि ।
नाशिक
१०९॥
आचार्य महाराज कहते हैं कि कहां तक कहें ? क्योंकि उस नरक में उत्पन्न हुये दुःख को कोटि जन्म लेकर भी कोई कहने को समर्थ नहीं है। हम क्या कह सकते हैं ।
विस्मृर्त यदि केनापि कारणेन क्षणान्तरे । स्मारयन्ति तदास्येत्य पूर्व बेरं सुराधमाः ॥३०७॥ यदि वे नारकी किसी
कारण से क्षण मात्र के लिए भूल जाते हैं तो उसी समय नीच असुर देव आकर उन्हें पूर्व वैर याद करा देते हैं, जिससे फिर वे परस्पर मारपीट करके अपने को महादुःखी कर लेते हैं ।
बुभुक्षा जायतेऽत्यर्थ नरके तत्र देहिनाम् ।
यां न शामयितुं शक्तः पुद्गलप्रत्रयोऽखिलः ॥ ३०८।।
तथा उस नरक में नारकी जीवों को भूख ऐसी लगती है कि समस्त पुद्गलों का समूह भी उसको शमन करने में असमर्थ हैं।
तृष्णा भवति या तेषु वाडवाग्निरिवोल्वणा ।
न सा शाम्यति निःशेष पीतैरण्यम्बुराशिभिः ।।३०६ ।।
तथा नरक में नारकी जीवों के जो तृषा बड़वाग्नि के समान प्रति उत्कट
(तीव्र) होती है सो समस्तं समुद्रों का जल पीले तो भी नहीं मिटती । बिन्दु मात्रं न तैर्वारि प्राप्यते पातुमातुरः ।
तिल मात्रोऽपि नाहारो ग्रसितुं लभ्यते हितैः ॥ ३२० ॥
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अध्याय : पांचवां ]
[ २३१ यद्यपि नरकों में उपयुक्त भूख प्यास की तीवता है, परन्तु न तो किसी काल में तिल मात्र किसी को भोजन मिलता है और न एक विन्दु पानी ही कहीं मिलता है: .. इस प्रकार आतुर हो कर निरन्तर भूख प्यास सहते हैं ।
तिलावष्यति सूक्ष्मारिष कृतखण्डानि निर्दयः । वभिलति वेगेन पुनस्तेषां विधेर्वशात् ॥३१॥
तथा उन नारकीयों के शरीर निर्दय नारकीयों के द्वारा तिल तिल मात्र रखण्ड किये जाते हैं, परन्तु मृत्यु नहीं पाती, तत्काल मिलकर शरीर बन जाता है, इनके ऐसा भी कर्मोदय है, जो मरण नहीं होता; सागरों की वायु पूर्ण होने पर ही मरण होता है। अकाल मृत्यु कभी नहीं होती। .
यातनारुक शरीरायुलेश्या दुःख भयादिकम् । वर्द्धमानं विनिश्चयमधोऽधः श्वभ्रभूमिषु ॥३१२॥
उन नरक की भूमियों में पीड़ा, रोग, शरीर, पायु, लेश्या, दुःख, भय इत्यादि नीचें नीचे बढ़ता हुआ है। अर्थात् पहिले नरक (पृथ्वी) से दूसरे नरक में अधिक है, दूसरे से तीसरे में और तीसरे से चौथे में और चौथे से पांचवे में और पांचवें से छटे में और छठे में सातवे में इस क्रम से अधिक-अधिक है। यह अधोलोक का वर्णन हया ।
* मध्यलोक * मध्यभागस्ततो मध्ये तत्रास्ते झल्लीरीनिमः । यत्र द्वीप समुद्राणां व्यवस्था वलयाकृतिः ॥३१३।।
उस अधोलोक के ऊपर झालर (घंटा बजाने की घड़बली) के समात गोलाकार मध्य लोक का मध्य भाग है, उसमें गोलगोल वलयों (कड़ों) के समान असंख्यात द्वीप समुद्र हैं।
जम्बूद्वीपादयो द्वीपा लवणोदादयोऽर्णवाः। स्वयम्भूरमणान्तास्ते प्रत्येक द्वीप सागराः ॥३१४॥
उस मध्यलोक में जम्बूद्वीपादिक तो द्वीप हैं और लवरा समुद्रादिक समुद्र हैं मो अन्त के स्वयम्भुरमण पर्यन्त भिन्न-भिन्न हैं । भावार्थ---सबके बीच एक लाख योजन चौड़ा लम्बा गोला जम्बुद्वीप है, और उसके चारों को दो लाख योजन के व्यास की खाई के समान लवरण समुद्र है, इसी प्रकार समुद्र के चारों ओर द्वीप और
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२३२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि द्वीपों के चारों ओर समुद्र, इस प्रकार स्वयम्भूरमरण समुद्र पर्यन्त द्वीप समुद्रों की स्थिति है।
द्विगुरगा द्विगुणा भागाः प्रावान्योन्यमास्थिताः । सर्वे ते शुभ नामानो बलयाकार धारिणः ॥३१५।।
तब वे द्वीप और समुद्र दुनै-दूने विस्तार वाले हैं तथा परस्पर एक दूसरे को लपेटे हुए हैं; गोलाकार कड़े के प्राकार हैं और उनके नाम भी जम्बूद्वीप, घातकी खंड द्वीप, पुष्कर द्वीप, लवण समुद्र, कालोदधि आदि उत्तमोत्तम हैं।
मानुषोत्तर शैलेन्द्रमध्यस्थ मलि सुन्दरम् । भर क्षेत्रं सरिच्छलसुराचल विराजितम् ।।३१६॥
तथा मानुषोत्तर पर्वत के मध्यस्थ नदी पर्वत मेरुपर्वत से अति सुन्दर मनुष्य क्षेत्र है । भावार्थ-सबसे बीच में एक लाख योजन व्यास का जंबूद्वीप है ; जम्बूद्वीप के चारों ओर दो लाख योजन का लवरग समुद्र है। लव समुद्र के चारों तरफ चार. लाख योजन धातकी खंड द्वीप हैं और धातकीखंड द्वीप के चारों तरफ पाठ लाख योजन का कालोदधि समुद्र हैं और कालोदधि समुद्र के चारों तरफ सोलह लाख योजन चौड़ा पुष्कर द्वीप है; पुष्कर द्वीप के उत्तरार्द्ध में अर्थात् अगले भागे के भाग में ८ लाख योजन चौड़ा मानुषोत्तर नाम का दीवार के समान पर्वत पड़ा हुआ है, इस कारण इस द्वीप को पुष्कराद्ध द्वीप कहते हैं। इन अढाई द्वीपों में ही मनुष्य रहते हैं; अगले द्वीपों में मनुष्य नहीं हैं और न उससे आगे मनुष्य जा ही सकते हैं। इसी कारण उस पर्वत का नाम मानुषोत्तर पर्वत है।
तत्रार्यम्लेच्छखण्डानि भूरि : भेदानि तेष्वमी । . आर्या म्लेच्छा नराः सन्ति तत्क्षेत्र जनित गुरणः ॥३१७॥
उस मनुष्य क्षेत्र में अर्थात् अढ़ाई द्वीपों में अनेक आर्य खंड और म्लेच्छखंड है, और आर्य क्षेत्रों में आर्य पुरुष और म्लेच्छ क्षेत्रों में म्लेच्छ रहते हैं; उन क्षेत्रों के अनुसार ही उनके गुण आचारादिक हैं; अर्थात् भार्यों के उत्तम श्राचार, उत्तमः गुण हैं, और म्लेच्छों के निकृष्ट प्राचार और धर्मशून्यतादि निकृष्ट गुण हैं।
__ क्वचित्कुमानुषोपेतं क्वचिद्व्यन्तर संभृतम् ।
क्वचिद्भोग धराकीर्ण सरक्षेत्र निरन्तरम् ।।३१।। यह मनुष्य क्षेत्र निरंतर कहीं तो कमानुष कु भोगभूमि सहित है, कहीं व्यन्तर देवों से
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[ २३३
कहीं उत्तम भोगभूमि सहित है, इस प्रकार संक्षेप से मध्यलोक का
अध्याय : पांचवां ]
भरा है, वर्णन किया ।
* उर्ध्वलोक *
ततो नभसि तिष्ठन्ति विमानानि दिवौकसाम्
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freeथाक्रमम् ॥३१६॥
उस मध्य लोक के ऊपर आकाश में ज्योतिषी देवों के विमान रहते हैं, वे चिर स्थिर भेद से दो प्रकार के हैं; अर्थात् कई विमान तो निरन्तर गमन करते रहते हैं और कई विमान स्थिर रहते हैं ।
तदू संन्ति देवेशकल्पाः सौधर्म पूर्वकाः ।
ते षोडशाच्युत स्वर्ग पर्यन्ता नभसि स्थिताः ॥ ३२०
ज्योतिषी देवों के विमानों के ऊपर कल्पवासी देवों के कल्प ( विमान ) हैं ; जिनके सौधर्म स्वर्ग, ईशान स्वर्ग आदि नाम हैं। वे अच्युत स्वर्ग पर्यन्त सोलह हैं और आकाश में स्थित हैं ।
उपर्युपरि देवेशनिवास युगलं क्रमात् ।
अच्युतान्तं ततोऽप्यध्वं मेकैकत्रिदशास्पदम् ॥३२१॥
देवों के निवास (स्वर्ग) श्राकाश में दो स्वर्ग के ऊपर दो स्वर्ग फिर उन दी के ऊपर फिर दो स्वर्ग इस प्रकार दो-दो के आठ युगल हैं और उनके ऊपर एकएक विमान करके नव ग्रैवेयक विमान हैं, तथा एक अनुदिश और एक अनुत्तर विभान भी है ।
निशदिन विभागोऽयं न तत्र त्रिदशास्पदे ।
रत्नालोकः स्फुरत्युच्चैः सततं नेत्र सौख्यदः ॥ ३२२ ॥
उन देवों के निवासों में रात्रि दिन का विभाग नहीं है; क्योंकि वहां पर सूर्य चन्द्रमा नहीं है, किन्तु नेत्रों को सुख देने वाला रत्नों का उत्तम प्रकाश निरन्तर स्रायमान रहता है ।
वर्षातपतुषारादि समयैः परिवजितः ।
सुखद: सर्वदा सौम्यस्तत्र काल प्रवर्त्तते ॥१२॥३२३॥
उन स्वर्गों में वर्षा, शीत, आतप आदिक समय व ऋतुओं से रहित सदाकाल सुख देने वाला सौम्य मध्यस्थ काल ( वसन्त ऋतु) रहता है ।
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२३४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
उत्पातभयसन्तापभङ्ग चौरारिविद्धराः । न हि स्वप्नेऽपि दृश्यन्ते क्षुद्रसत्त्वाश्च दुर्जनाः ।।३२४॥
तथा उन स्वर्गों में उत्पात, भय, संताप, भंग, चोर, शत्रु, वञ्चक तथा क्षुद्रजीव, दुर्जन ये स्वप्न में नहीं लिखते । .....
चन्द्रकान्तशिलानदाः प्रवालदल दन्तुराः । वन्द्र नोल निर्माणा विचित्रास्तत्र भूमयः ॥३२५।।।
उन देवों के निवासों में पृथ्वी चन्द्रकान्त मणियों से बंधी हुई है तथा मूगे. के पत्र की समान रची हुई है; तथा कहीं कहीं हीरा इन्द्रनीलमरिग आदि नाना प्रकार के रत्नों से बनी हुई हैं। ..
माणिक्यरोचिषां चक्र: कबुरीकृत दिङ मुखाः ।
वाप्य स्वर्णाम्बुजच्छन्ना रत्नसोपानराजिताः ॥३२६।। ... तथा स्वर्गों में वापिकायें मार्गिक की किरणों के समूहों में दशों दिशाओं को अनेक वर्ण मय कर रही है तथा सुवर्णमय कमलों से आच्छादित और रत्नमय सीढ़ियों से सुशोभित हैं।
सरांस्यमल वारीणि हंसकारण्ड मण्डलैः । वाचाल रुद्वतीर्थानि दिव्यनारीजनेन च ।।३२७॥
स्वर्ग में सरोवर भी अतिस्वच्छ निर्मल जल वाले हैं, हंस वा कारंड जाति के पक्षियों के समूह से तथा देयांगना वा अप्सरायों से रुके हुए हैं तट जिनके ऐसे हैं।
गावः कामदुधाः सर्वाः कल्पवृक्षाश्च पादपाः । चिन्तारत्नानि रत्नानि स्वर्गलोके स्वभावतः ।।३२८॥ .
तथा उस स्वर्ग में गौ हैं वे तो कामधेनु हैं, वृक्ष हैं, सो कल्पवृक्ष हैं और रत्न हैं सो चिन्तामणि रत्न हैं; ये सब क्षेत्र के स्वभाव से निरन्तर रहते हैं।
ध्वजचामप छत्रा विमाननिता सखाः । संचरन्ति सुरासारैः सेव्यमानाः सुरेम्बराः ॥३२६।।
. उन स्वर्गों के अधिपति इन्द्र वजा, चमर, छत्रों से चिह्नित हुए विमानों के द्वारा अनेक देवांगनाओं सहित यब-तत्र विचरते हैं; उनकी अनेक देव सेवा करते हैं।
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.. अध्याय : पांचवां ]
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यक्ष किन्नर नारीभिर्मन्दार वन वीथिषु । कान्ताम्लिष्टाभिरानन्द गोयन्ते त्रिवशेम्बराः ॥३३०।।
तथा बहाँ के इन्द्र, मंदार वृक्षों की गलियों में यक्ष और किन्नर जातीय देवों की देवांगनायें, जो अपने पति सहित प्रालिंगित अानंद से भरी गाती है, के गीत सुनते हैं।
श्रीडागिरि निकुञ्जेषु पुष्प शरया गृहेषु वा । रमन्ते त्रिदशा यत्र वरस्त्रीचन्द वेष्टिताः ॥३३॥
तथा उन स्वर्गों के देव क्रीडा पर्वतों की कुजों में, पुष्पलतादि कृत कंदरानो में पुष्पों को शय्या में सुन्दर देवांगानों के समूह के साथ बेष्टित होकर नाना प्रकार की ग्रानंद-क्रीडा करते हैं ।
___ मन्दार चम्पकाशोक मालती रेणुरञ्जिताः। . भ्रमन्ति यत्र गन्धाढ्या गन्धवाहाः शनैः शनैः ॥३३२।।
उन स्वर्गों में मंदार, चम्पक, अशोक, मालती के पुष्पों की रज से रंजित भ्रमरों सहित मन्दमन्द सुगन्ध पवन बहता है।
लीलावन विहारैश्च पुष्पावचयः कौतुकैः ।। जल क्रीडादि विज्ञान विलासास्तत्र योषिताम् ।।३३३।।
तथा उन स्वर्गों में देवांगनानों के बिलास, क्रीडावन के विहारों से तथा पुष्यों के चुनने के कौतुक मे तथा जल क्रीड़ा के विज्ञानों (चतुराइयों) से बड़ी शोभा है।
वोरणामादाय रत्यन्ते कलं गायन्ति योषितः ।। ध्वनन्ति मुरजा धोरं दिवि देवाङ्गनाहलाः ॥३३४॥
तथा उन स्वर्गों में देवांगनायें संभोग के अन्त में वीणा लेकर सुन्दर गान करती है तथा उनके बजाए हुए मृदंग वीरे धीरे बजते हैं ।
कोकिलाः कल्पवृक्षेषु चैत्यागारेषु योषितः । विबोधयन्ति देवेशाल्ललित गीत नि:स्वनैः ॥३३५।।
तथा उन स्वर्गों में कल्प वृक्षों पर.. तो कोकिलायें और चैत्य मन्दिरों में देवांगनायें सुन्दर गीत और शब्दों से इन्द्रों को प्रानन्द प्रदान करती हैं।
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२३६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि नित्योत्सरयुतं रम्यं सर्वाभ्युदय मन्दिरम् । सुख संपद् गुणाधारं के स्वर्गमुपमीयते ॥३३६।।
प्रत्येक स्वर्ग नित्य ही उत्सवों सहित हैं; रमणीक है, समस्त अभ्युदयों के भोगों का निवास है तथा सुख, संपद् और गुणों का आधार है, सो उसको किसकी उपमा दी जाय ?
पञ्चवर्ण महारत्न निर्माणाः सप्त भूमिकाः । . ..। प्रासादाः पुष्करिण्यश्च चन्द्रशाला बनान्तरे ॥३३७॥
तथा उन स्वर्गों के बागों में पांच वर्षों के रत्नों से बने हुए 'सात-सात खण्ड ' के महल हैं और बापिका तथा चन्द्रशाला (शिरोगृह अंटे) हैं।
प्राकार परिखावप्रगोपुरोत्तुङ्ग तोरणैः ।। चैत्यद म सुरागारगर्यो रत्नराजिताः ॥३३८॥
तथा उन स्वर्गों में जो नगरी हैं, वे कोट, खाई, बड़े दरवाजों और ऊँचे तोरगों से तथा. चैत्य वृक्ष और देवों के मन्दिर प्रादिक से रत्नमयी शोभती हैं।
इन्द्रायुध श्रियं धत्ते यत्र नित्यं नमस्तलम् । हाग्रलग्नमारिणक्य मयूखैः कर्बुरीकृतम् ॥३३॥
तथा स्वर्गों में आकाश महलों में लगे हुए रत्नों की किरणों से विचित्र वर्ण का होकर इन्द्रधनुष की सी शोभा को नित्य धारण किये हुए रहता है।
सप्तभिस्त्रिदशानीकविमानै रङ्ग नान्वितैः । कल्पद्रम गिरीन्द्रषु रमन्ते विबुधेश्वराः १३४०॥
स्वर्गों के इन्द्र सात प्रकार की देव सेनानों से तथा देवांगना सहित बिमानों : के द्वारा कल्पवृक्षों तथा क्रीडावनों में रमते (यानन्द करते हैं।
हस्त्यश्वरथ .. पादात. वर्ष गन्धर्वनर्तकि । ... सप्तानीकानि सन्त्यस्य प्रत्येकं च महत्तरम् ॥३४१।।।
'हस्ती, घोड़े, रथ, प्यादे, बैल, गन्धर्व, नर्तकी इस प्रकार सात प्रकार की ... सेना इन्द्र की होती है, सो प्रत्येक एक से बढ़कर एक है।
शङ्कारसार सम्पूर्णा लावण्यवन दीधिकाः। पोनस्तनभरा क्रान्ताः पूर्णचन्द्र निभानमाः ॥३४२॥ विनीताः कामरूपिण्यो महद्धि महिमान्विता । . . .
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अध्याय : पांचवा ]
हाव भाव बिलासाढया नितम्ब भरमन्थरा ॥३४३॥ मन्ये शृगार सर्वस्य मेकीकृत्य विनिर्मिताः। स्वर्गवास विलासिन्यः संति मूर्ला इव श्रियः ॥३४४।।
उन स्वर्गों में विलासीन देवांगनायें शृगार का सार है जिनके ऐसी लावण्य रूपी जल को वापिका ही हैं तथा पीन कुचों के भार सहित हैं, जिनके मुख पूर्णमासी के चन्द्रमा के समान हैं, विनीत हैं, चतुर हैं, महा ऋद्धि की शोभा सहित हैं, मुख के हाव भाव चित्तविकार, विलास, ध्र विकार आदि से भरी हुई हैं, नितम्बो के भार से धीर गति वाली हैं। प्राचार्य महाराज उत्प्रेक्षा करते हैं कि वे देवांगनायें मानो शृगार का सर्वस्व एकत्र करके ही बनाई गई हैं, जिससे मूर्तिमान लक्ष्मी समान ही शोभती
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गीतवादित्र विद्यासु शृगार रस भूमिषु । परिरम्भादि सर्वेषु स्त्रीणां दाक्ष्यं स्वभावतः ॥३४५॥
स्वर्गों में शृगार रस की भूमि ऐसी गीत व बाजे की विद्यानों तथा प्रालिंगA. नादि समस्त क्रियाओं में स्त्रियों की स्वभाव से ही प्रवीणता होती है। .
सर्वावयव सम्पुर दिव्य लक्षण लक्षिताः । अनङ्ग प्रतिमा धीराः प्रसन्नाः पांशु विग्रहाः ॥३४६।। हारकुण्डल केयूर किरीटाङ्गद भूषिताः । मंदार मालती गन्धा अणिमादि गुणान्विताः॥३४७।। प्रसन्नामल पूर्वेन्दु कान्ताः कान्ताजन प्रियाः । शक्तित्रय गुणोपेताः सत्त्व शीलावलम्बिनः ।।३४८।। विज्ञान विनियोदाम प्रोति प्रसर संभृताः । निसर्ग सुभगाः सर्वे भवन्ति त्रिदिवौकसः ॥३४६॥
उन स्त्रों में देव जो कि शरीर के समस्त अवयब जिनके सम्पूर्ण सुडौल हैं, दिव्य सनोहर लक्षणों सहित हैं, कामदेव के समान सुन्दर हैं, धीर (क्षोभ रहित) है. प्रसन्न वा विस्तीर्ण है शरीर जिनका ऐसे हूँ तथा हार कुण्डल केयूर (भुजबन्ध) किरीट (मुकुट) अंगदः (कटक यादि) इन आभूषणों से भूपित हैं, मन्दार मालती के पुष्पों के समान जिनके अंग में सुगन्धि है; अरिणमा महिमादि नष्ट ऋद्धि सहित हैं प्रसन्न निर्मलः पूर्ण चन्द्रमा समान मनोहर हैं और कान्ताजन कहिये .
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UARNAME
वेग स भर
२३८ ]
[गो. प्र. चिन्तामणि : स्त्रियों को अतिशय प्रिय लगने वाले हैं, तीन शक्ति कहिये प्रभुत्व, मन्त्र, उत्साह. इन . गुगणों सहित हैं, तथा सत्व, पराक्रम और शील कहिये मुस्वभाव के अवलम्बन करने वाले हैं तथा विज्ञान, प्रवीणता और विनय वा उत्तम प्रीति के प्रसर कहिये वेग से भरे हैं । स्वर्ग में समस्त देवं इसी प्रकार स्वभाव से मुन्दर होते हैं।
न तत्र दुःखितो. दोनो वृद्धो रोगी गुरगच्युलः ।। विकलाङ्गो गतश्रीकः स्वर्गलोके बिलोक्यते ॥३५०॥
तथा उस स्वर्ग में कोई ऐसा नहीं देखा जाता जो दुःखी, दीन, वृद्ध या रहित, किल-अंग अथवा कान्ति हीन हो । ... सभ्य सामानिका लोक पाल प्रकीर्णकाः ।
मित्राद्यभिमतस्तेषां पार्श्व वर्तों परिग्रहः ॥३५१॥
स्वर्गों में सभ के देव, सामानिक देव, : समादिक देव, लोक पाल देव, प्रकीर्णक देव ये भेद हैं । तथा मित्र आदिक सव ही इन इन्द्रों के. पार्श्ववर्ती परिवार उनके अभिमत (इष्ट प्रीति करने वाले) हैं।
बन्दि गायन सैरन्ध्री स्वाङ्ग रक्षाः पदातयः । नटवेत्रि विलासिन्यः सुराणां सेवको जनः ।।३५२।।
तथा स्त्रों में उन देवों की सेवा करने वाले देव हैं, बन्दीजन हैं, गाने वाले. हैं, नङ्ग रक्षक है, दंड धरने वाले हैं तथा नाचने वाली बिलासिनी अप्सरायें हैं ।
तशतिभव्यताधारे विमाने कुन्द. कोमले । उपपादि शिला गर्भ संभवन्ति स्वयं सुराः ॥३५३।। .
स्वगों में अति मनोजता का प्राधार ऐसे विमान में कुन्द के पुष्प समान कोमल ऐसी उपपादि शिला के मध्य से देव स्वयमेव उत्पन्न होते हैं । भावार्थ :-देवों के उत्पन्न होने की उपपादि शय्या है, उस पर जन्म लेते हैं: जिस प्रकार कोई सोया हया आदमी उठता है. इसी प्रकार जिसका स्वर्ग में जन्म होता है, वह जीव पुगि । उस उपपाद शय्या पर उठता है। .
सर्वाक्ष सुखदे रम्ये नित्योत्सव विराजिते ।। गीत वादिश्व लीलाढये जय जीवस्वना कुले ।।३५४॥ दिव्याकृति सुसंस्थानाः सप्तधातु विजिताः।। काथ कान्ति पयः पूरैः प्रसादित दिगन्तराः ॥३५५।।
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RSS
अध्याय : पांचवां ।
[२३६ शिरीषसुकुमाराङ्गाः पुण्य लक्षण लक्षिताः। अणिमादि गुरंगोपेता ज्ञान विज्ञान पारगाः ॥३५६।। मृगाङ्ग मूत्ति संकाशाः शान्त दोषाः शुभाशयाः। अचिन्त्य महिमोपेता भयक्लेशान्ति वजिताः ॥३५७।। बर्द्धमान महोत्साहा बनकाया महाबलाः अचिन्त्य पुण्य योगेन गृहन्ति वपुजितम् ।।३५८।।
उस उपपाद शय्या का स्थान कैसा है कि समस्त इन्द्रियों को सुख देने वाला है, रमणीक है, नित्य ही उत्सव सहित विराजता है, गीत बादिनादि लीलाओं सहित है. तथा "जयवन्त होओ, चिरंजीवी होयो" ऐसे शब्दों से व्याप्त है ऐसे स्थान पर जो देव उत्पन्न होते है, ने जैसे हैं कि दिलय सुन्दराकार है . संस्थान जिनका सप्त धातु रहित शरीर है, जो शरीर की प्रथा रूपी जल के प्रभावों से समस्त दिशाओं को प्रसन्न करने वाले हैं जिनका शरीर शिरीष पुष्प के समान कोमल है, पवित्र लक्षणों सहित हैं, अरिंगमा महिमादि गुणों से युक्त है, अवधिज्ञानादि विज्ञान चतुरतानों के पारगामी हैं तथा चन्द्रमा की मूर्ति समान हैं; जिनसे सब दोष शान्त हो गये हैं, जिनका चित्त शुभ है, अचिन्त्य महिमा सहित हैं, भय क्लेश पीड़ा से रहित हैं जिनका उत्साह बढ़ता ही रहता है, वज्र के समान दृढ़ पारीर हैं, पराक्रमी हैं, इस प्रकार के देव अचिन्त्य पुण्य से उस उपपाद स्थान में शरीर को धारण करते है।
सुखामृतमहाम्सोधेमध्यादिव घिनिर्गताः। ... . भवन्ति त्रिदशाः सद्यः क्षणेन नवयौवनाः ॥३५.६।।
उस उपपाद शय्या में वे देव उत्पन्न होते हैं, सो जिस प्रकार समुद्र में से कोई मनुष्य निकले उसी प्रकार वे देव सुख रूपी महा समुद्रों में से तत्काल नव यौवन रूप होकर उत्पन्न होते हैं।
कि च पुष्पकलाक्रान्तः प्रवालदल दन्तुरः । तेषां कोकिला वाचालंदु में जन्म निगद्यते ॥३६०॥ .
फूल फलों से भरपूर, कोमल पत्तों से अंकुरित और कोकिलाओं से शब्दाय . मान वृक्षों करके उनके जन्म की सूचना की जाती है।
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२४० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि . गीत वादिन निर्घोषैर्जय मंगल पाठकः । विबोध्यन्ते शुभैः शब्दः सुखनिद्रात्यये यथा ।।३६१३॥.
तथा वे देव उस उपपाद शय्या में ऐसे उत्पन्न होते हैं कि जैसे कोई राजकुमार .. सोता हो और वह गीत वादिनों के शब्दों से, 'जय जय' इत्यापि मंगल के पाठों से तथा ।
उत्तमोत्तम शब्दों से. सुखनिद्रा का अभाव होने पर जगाया जाता है; उसी प्रकार देव भी उस उपपाद शिला (शय्या) से उठकर सावधान होते हैं ।
किञ्चिभ्रममपाकृत्य वीक्षते स शनैः शनैः । । यावदाशा मुहुः स्निग्धस्तदा करणन्तिलोचनैः ।।३६२।
· तथा उस उपपाद शध्या में सामान होकार कुछ प्रम को दूर करके उस समय कर्गान्त पर्यन्त नेत्रों को उघाड़ कर दृष्टि फर फेर चारों ओर देखता है।
. इन्द्रजालमथ स्वप्नः किं नु मायाभ्रमोनु किम् ।
दृश्यमान मिदं चित्रं मम नायाति निश्चयम् ।।३६३।।
फिर सावधान होकर वह देव ऐसा विचारता है कि अहो ! यह क्या इन्द्रजाल है ? अथवा मुझे क्या स्वप्न पा रहा है ? अथवा यह मायामय कोई भ्रम है, यह तो बडा ग्राश्चर्य देखने में आता है, निश्चय नहीं कि यह क्या है ? इस प्रकार सन्देह रूप होता है।
इदं रम्यमिदं सेव्य मिदं श्लाध्यमिदं हितम् । इदं प्रियमिदं भव्यमिदं चित्त प्रसत्तिदम् ।।३६४।। एतत्कन्द लितानन्द मेतकल्याण मन्दिरम् । एतनित्योत्सवाकीख मेतदत्यन्त सुन्दरम् ।।३६५॥ सद्धिमहिमोपेतं महद्धिक सुराचितम् । सप्तानी कान्वितं भाति त्रिदशेन्द्र समाजिरम् ।।३६६॥
तत्पश्चात् वह देव विचार करता है कि यह बस्तु र मणीय है, यह सेवनीयः । है, यह सराहने योग्य है, यह हितरूप है, यह प्रिय है, यह सुन्दर है, यह चित्त को ... प्रसन्नता देने वाली है तथा यह अानन्द को उत्पन्न करने वाला कल्यागा का मंदिर
निरन्तर उत्सव रूप तथा अत्यन्त सुन्दर है. इत्यादि विचार करता है तथा यह स्थान समस्त ऋद्धि और महिमा सहित महाऋद्धि के धारक देवों से पूजनीय सात प्रकार की सेना सहित देवेन्द्र के स्थान के समान दीखता है।
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अध्याय दुसरा ]
मामेवोद्दिश्य सानन्दः प्रवृतः किमयं जनः पुण्यमूत्तिः प्रियः श्लाध्यी विनीतोऽत्यन्त वत्सलः ॥ ३६७॥ त्रैलोक्यनाथ संसेव्यः कोऽयं देशः सुखाकरः । अनन्त महिमा धारो विश्व लोकाभिनन्दितः ॥ ३६८ ॥ इदं पुरमति स्फीतं वनोप वनराजितम् । अभिभूय जगत्या वलातोव ध्वजांशुकः ॥ ३६६॥
[ २४१
फिर वह देव विचारता है कि ये सामने जो लोग खड़े हैं, वे मुझे ही देखकर
अनन्य सहित प्रवृत्त हैं, ये पवित्र हैं, उज्जवल है, मूर्ति जिनकी ऐसे हैं तथा ये सब बहुत प्रिय हैं, प्रशंसनीय हैं, विनीत हैं. चतुर हैं, अत्यन्त प्रीति युक्त हैं तथा फिर विचारता है कि यह सुख को खानि लोन लोक के स्वामी द्वारा सेवने योग्य कौनसा देश ? यह देश अनन्त महिमा का आधार है, सबको बांछनीय है तथा यह नगर भी प्रति विस्तीस है, वह उपनों से शोभित है, संपदा के द्वारा समस्त जगत को जीतकर ध्वजाओं के वस्त्रों के हिलने से मानो दौड़ता है, नृत्य ही करता है, इत्यादि विचारता है । प्राकलय्य तदाकूतं सचिव दिव्यं चक्षुषः ।
नति पूर्व प्रवर्तन्ते वक्तु कालोचितं तदा ॥३७०॥
प्रसादः क्रियतां देव मतानां स्वेच्छ्या दृशां 1.
श्रयतां च वचोऽस्माकं पौर्वापर्य प्रकाशकम् ॥३७१॥
तत्पचात् उमो समय यहां के मंत्री देव दिव्यनेत्रों से उस उत्पन्न हुए देवेन्द्र के अभिप्राय को समझकर नमस्कार करके कहते हैं कि हे देव । हम सेवकों पर प्रसन्न होये, निर्मल दृष्टि से देखिये और हमारे पूर्वी पर परिपाटी के प्रकाश करने वाले वचनों को सुनिये |
अनाथ वयं धन्याः सफलं चाद्य जीवितम् ।
अस्माकं यत्त्वया स्वर्गः संभवेन पवित्रितः ॥ ३७२ ॥ प्रसीद जय जीव त्वं देव पुण्यस्तवोद्भवः । भव प्रभुः समग्रस्य स्वर्गलोकस्य सम्प्रति ॥ ३७३ ॥ सौधर्मोऽयं महाकल्पः सर्वामर शताचितः ॥ नित्याभिनवकल्याणवाद्धि वर्द्धन चन्द्रमाः ॥ ३७४ ॥ कल्पः सौधर्म नामायमीशान प्रमुखाः सुराः । satarन्नस्य शक्रस्य कुर्वन्ति परमोत्सवम् ॥ ३७५॥
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२४२ ।
[ गो. प्र. चिन्तामणि
अत्र संकल्पिता कामा नव नित्यं च यौवनम् । अत्राविनाश्वरा लक्ष्मोः सुखं चात्र निरन्तरम् ॥३७६॥ स्वविमानमिदं रम्यं कामगं कान्तदर्शनम् । पादाम्बुजनता चेयं लब त्रिदशमण्डली ॥३७७।। एते दिव्याङ्गनाकोणाश्चन्द्रकान्ता मनोहराः । प्रासादा रत्नवाप्यश्च कोडानद्यश्च भूधराः ॥३७८।। सभा भवनमेतत्ते नतामर शताचितम् । रत्नदोष कृतालोकं प्रकर शोभितम् ।।३७६।। विनीत वेष धारिण्यः कामरूपा बरस्त्रियः ।। तधादेशं प्रतीक्षन्ते लास्थलोलारसोत्सुकाः ॥३०॥ प्रातपत्र मिदं पुज्यमिदं च हरिविष्टरम् । एलश्च चामरतालमेते विजय केतवः ॥१॥ एता अग्रे महादेव्यो वर स्त्रीवृन्द वन्दिताः । तृणीकृत सुराधीश लावण्यैश्वर्य सम्पदः ।।३८२॥ शृंगार जल धेर्वेला-विलासोल्लासित भ्रवः । लीलालंकार सम्पूस्तिव नाथ समपिता ॥३८३।। सर्वावयब निर्माण श्रीरासां नोपमास्पदम् । यासां श्लाध्यामलस्निग्ध पुण्याणु प्रभवं वपुः ॥३८४॥ प्रयमरावगो नाम देवन्ती महामनाः । धत्ते गुरगाष्टकैश्वर्याच्छ्यिं विश्वातिशायिनीम् ॥३८५।। इदं मत्तगजानी कमितोश्वीचं मनोजनम् । ' एते स्वर्णरथास्तुङ्गा बल्गन्त्येते पदातयः ।।३८६॥ एतानि सप्त सैन्यानि पालितान्यमरेश्वरः । नमन्ति ते पदद्वन्द्व नति विज्ञप्ति पूत्रकम् १३८७।। समग्र स्वर्ग साम्राज्यं दिव्य भूत्योपलक्षितम् । युण्यस्ते सम्मुखीभूतं गृहाण प्रगतामरम् ।।३८८॥ इति वादिनि सुस्निग्धे सचिवेऽत्यन्तन्त वत्सले । अवधि ज्ञान मासाद्य पौर्वापर्य स बुद्धयति ।।३८६।।
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.. अध्याय : पांचवां ] .
[ २४३ यदि कोई मनुष्य मोधर्म स्वर्ग में इन्द्र उत्पन्न होता है, तो उसका मन्त्री सबकी तरफ से इस प्रकार कहता है कि हे नाथ! आपने यहां उत्पन्न होकर इस स्वर्ग को पवित्र किया सो आज हम धन्य हुए, हमारा जीवन भी आज सफल हश्रा हे नाथ ! आप प्रसश होइये, चिरंजीव रयि, हे देव ! आपका उत्पन्न होना पुण्यरूप है, पवित्र है, आप इस स्वर्ग लोक के स्वामी होइये यह सौधर्म नामा स्वर्ग है, सैकड़ों देवों से पूजित है। यह स्वर्ग सर्व देवों के कल्यागरूप समुद्र को बढाने के लिये चन्द्रमा के समान है। यह सौधर्म नामा स्वर्ग ऐसा है कि इसमें जो इन्द्र उत्पन्न होता है, उसका ईशान इन्द्र प्रादि समस्त देव परमोत्सव करते हैं। इस स्वर्ग में वांछित पदार्थ भोग ने योग्य हैं, यहां नित्य नया यौवन है, अविनश्वर लक्ष्मी है, निरन्तर सुख ही सुख है । तथा यह स्वर्गीय विमान जहाँ जाना चाहे वहीं जा सकता है, इसका दर्शन अप्ति मनोहर है, यह देवों की मंडली (सभा) अापके चरण कमलों में नम्रीभूत है । ये मनोहर अप्सराओं से भरे हुए चन्द्रकान्त के समान मनोडर आपके महल हैं, ये रस्तमयी बापिकायें हैं, ये क्रीडानदियाँ तथा पर्वत है। यह सभा भवन है सो नम्री भूत देवों के द्वारा सेवा करने योग्य हैं, पूजितं . है, यह रत्नमयी दीपकों से प्रकाशमान पुष्पसमूहों से शोभित । और विनीत चतुरवेश की धरने वाली कामरूपिणी सुन्दर स्त्रियाँ नृत्य संगीतादि रस में उत्सुक होकर आपके सामने नृत्य करने के लिये आपकी प्राज्ञा की प्रतीक्षा कर रही हैं । तथा यह आपका छत्र है, यह अापका पूजनीय सिंहासन है, यह बमरों का समूह है, ये विजय की ध्वजायें हैं । और ये सब आपकी अग्नमहिषी अर्थात् पट्टदेवियाँ हैं, ये श्रेष्ठ देवांगनाओं द्वारा वंदने योग्य हैं तथा इन्द्र के ऐश्वर्य को तृण की समान समझने वाली है। तथा शुगररूपी समुद्र को लहरों के समान चंचल हैं, विलास के कारण जिनकी भौंहे प्रफुल्लित. हैं अौह लीलारूपी अलंकार से पूरित हैं; सो हे नाथ ये आपके चरणों में समर्पित हैं। इन .. पट्टदेवियों के शरीर की शोभा अनुपम है। क्योंकि इनका शरीर योग्य निर्मल स्निग्ध पवित्र परमाणों के द्वारा बना हुआ है । हे नाथ ! वह नापका महामन वाला ऐरावत नामा हस्ती है; यह अशिमा महिमादि आठ गुणों के ऐश्वर्य से समस्त प्रकार की विक्रियारूप लक्ष्मी को धरने वाला है। और यह आपकी मदोन्मत्त हस्तियों की सेना है, यह घोड़ों की सेना है, इसका वेग मन के समान हैं; यह सुवर्णमयी ऊँचे-ऊँचे रथों की
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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सेना है और ये प्यादे हैं। तथा यह प्रापकी सात प्रकार की सेना है, पूर्व के इन्द्रों द्वारा पालित है; यह आपके चरण कमलों को प्रार्थना पूर्वक नमस्कार करती है। यह समस्त स्वर्गीय राज्य दिव्य सम्पदाओं से शोभित है, सो अापके पुण्य के प्रताप से आपके सन्मुख हुआ है, नम्रीभूत हैं देव जिममें ऐसा है, सो पाप ग्रहण कीजिये। इस प्रकार प्रति स्नेहयुक्त अत्यन्त प्रीति पुर्धक कहला हैं, उसी समय इन्द्र अवधिज्ञान को प्राप्त होकर पूर्व जन्म सम्बन्धी समस्त वृतान्त को जान जाता है। . . . . . . . __ अहो तपः पुरा . चीणं मयान्यजनश्चरम् ।
वित्तीणं चामयं वान प्रागिनां जीवितापिताम् ||३६०॥ पाराधितं मनः शुद्धया हाम्रोधादि चतुष्टयम् । . देवश्च जगतां नाथः सर्वज्ञः परमेश्वरः ॥३६१॥ निर्दग्धं विषयारण्यं स्वरवैरी निपातितः । कवायतर. वश्छिन्ना राग शत्रुनियन्त्रितः ॥३६.२॥ . सर्वस्तस्य प्रभावोऽयमहं. येनाद्य युगतेः। उद्धत्य स्थापितं स्वर्गहाज्ये त्रिदशवन्दिते ॥३६३॥ .
तत्पश्चात् वह इन्द्र अवधिज्ञान से सब जानकर मन ही मन में कहता है कि अहो! देखो, मैंने पूर्व भव में अन्य से पाचरण करने में नहीं पाये ऐसे ता को धारा किया तथा अनेक जीवों को मैंने अभयदान दिया । तथा दर्शन, ज्ञान, चारित्र तप, इन चारों आराधनानों से अलोक्य के नाथ सर्वज्ञ परमेश्वर देवाधि देव का. आराधन किया था 1 तथा मैंने पूर्व भव में इन्द्रियों के विषय रूप वन को दग्ध किया था, काम रूप शत्रु का नाश किया था, कपाय रूप वृक्षों को काट दिया था और रागरूको शत्रु को पीड़ित किया था। उसी का यह प्रभाव है। उक्तः ।। याचरणों ने ही इस समय मुझे दुर्गति से बचाकर इस देवों के वंदनीय स्वर्ग के राज्य में स्थापित किया है।
रागादिदहन ज्वाला न प्रशाम्यन्ति देहिनाम् ।। सद्धृत्तवार्य संसिक्ताः क्वचिज्जन्म शतैरपि ॥३६४॥ .. तन्नात्र सुलभं मन्ये तक्ति कुर्भोऽधुना वयम् । सुराणां स्वर्गलोकेऽस्मिन्दर्शनस्यैव योग्यता ॥३६५।।
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अध्याय : पांचवां ]
[ २४५ ... अपनरत मार्ग महायजी हमार्थ सिद्धये । अर्हदेव पद द्वन्द्व भक्तिश्चात्यन्त निश्चला ॥३६६।। यान्यत्र प्रतिबिम्बानि स्वर्ग लोके जिनेशिनाम् । . विमान: चैत्य . वृक्षेषु मेर्वाध पवनेषु च ॥३६७॥ . तेषां पूर्वमहं कृत्वा स्वद्रव्यैः स्वर्ग संभवः । पुष्प चन्दन नैवेधैर्गन्ध दोपाक्षतोत्करैः ॥३९८॥ गीत वादित्र निर्घोषः स्तुति स्तोममनोहरः । स्वर्गश्वर्य ग्रहीष्यामि . ततस्त्रिदशवन्दितः ॥३६६।। इति सर्वश देवस्य कृत्वा पूजामहोत्सबम् ।.. स्वीकरोति ततो राज्यं पट्टबन्धादि लक्षणम् ।।४००।। . . . . .
तत्पश्चात् वह इंन्द्र विचारता है कि जीवों के रागादिक र अग्नि की ज्वाला सम्यक् चारित्र रूपी जल को सींचे. बिना सैकड़ों जन्म लेने पर भी नहीं बुझती। ऐसा- सम्यक् चारित्र इस स्वर्ग में .मुलभ नहीं है, इसलिए क्या . करूं ? इस स्वर्ग लोक में तो सम्यग्दर्शन की ही योग्यता है, चारित्र को योग्यता नहीं है। इस कारण मेरे स्वार्थ के लिए तत्त्वार्थ श्रद्धान ही कल्याणकारी व श्रेष्ठ है, तथा अरहन्त भगवान के चरण युगल में अत्यन्त निश्चल भक्ति करना ही कल्याणकारी है। इसलिए यहां स्वर्ग में विमानों, चैत्यवृक्षों तथा. मेरु आदि के उपवनों में जो जिनेन्द्र भगवान के प्रतिविम्ब हैं। उनका प्रथम ही इस स्वर्ग के उत्पन्न हुए, अपने द्रव्य पुष्प, चंदन, नैवेद्य, गन्ध, दीपक व अक्षतों के समूह से गुजन करके तथा गीत नत्य वादियों के शब्दों सहित मनोहर स्तुतियाँ करके तत्पश्चात् इस देवों से बंदनीय स्वर्ग के ऐश्वर्य को ग्रहण करना चाहिये । इस प्रकार विचार कर वह इन्द्र सर्वज्ञ देव की पूजा करके महान् उत्सव पूर्वक पट्टबंधादिक है लक्षण जिसका ऐसे स्वर्ग के राज्य को ग्रहण करता है ।
तस्मिन्मनोजवनि विचरन्तों यच्छया । वनाद्रि सागरान्तेषु दीयन्ते ते दिवौकसः ॥४०२।।
तत्पश्चात् वे. स्वर्ग के देव मन के समान वेग वाले विमानों के द्वारा स्वछन्द विचरते हुए वन, पर्वत ब समुद्रों के तीर पर क्रीडा करते रहते हैं।
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२४६ ]
गो. प्र. चिन्तामलिंग संकल्पानन्तरोत्पन्न दिव्य भोगः समन्वितम् । सेबमानाः सुरानीकैः श्रयन्ति वगिणः सुखम् ।।४०३॥
तथा संकल्प करते ही उत्पन्न होने वाले नाना प्रकार के दिव्य मनोहर भोगों को भोगते हुए देवों की सेना सहित वे स्वर्ग के सुख भोगते रहते हैं।
महाप्रभाव सम्पन्न महाभूत्योपलक्षिले । । कालं गतं न जानन्ति निमन्ताः सौख्यसागरे ॥४०४।।
इस प्रकार महाप्रभाव सहित महाविभूति युक्तं स्वर्गों के सुख रूपी समुद्र में निमग्न रहते हुये समय को नहीं जानते कि कितना बीत गया ।
कचिद्गीतः क्वचिस्तत्यः क्वचिद्वाध मनोरमैः। . क्वचिद्विलासिनी बात क्रीडा शङ्गार दर्शनैः ।।४०५॥ . . दशा भोगजे: सौख्यर्लभ्यमानाः पचित् क्वचित् । : वसन्ति स्वगिणः स्वर्ग कल्पनातीत वभवे ॥४०६॥
इस प्रकार कहीं तो मन को लुभाने वाले गीत तथा नृत्य बादित्रों सहित तथा कहीं विलासिनी अप्सराओं के समूह से. किये हा क्रीडा शृगार सहित तथा कहीं पर दश प्रकार के भोगों (कल्प वृक्षों) से उत्पन्न हुए मुखा सहित कल्पनातीत विभव वाले स्वर्गों में वे देव रहते हैं।
दशांग भोगों का स्वरूपमद्यतूर्य ग्रह ज्योति भूषा भाजन विग्रहाः। स्त्रग्दीप वस्त्र पात्रामा दशधा कल्प पादपाः ।।४०७॥
मद्य, वादित्र, गृह, ज्योति, भूषण, भोजन, माला, दीपक, वस्त्र, पात्र. इन दस प्रकार के भोगों के देने वाले दश प्रकार के कल्प वृक्ष. स्वर्गों में होते हैं। इस कारण स्वर्ग के देव देशांग भोग भोगते हैं ।
यत्सुखं नाकिनां स्वर्गे तद्वक्तु केम पार्यते । स्वभाव जमनात सर्वाक्ष प्रोणं नक्षमम् ॥४०॥
स्वर्गों में स्वर्ग वासियों को जो सुख है, उसका वर्णन करने में कोई समर्थ नहीं है। क्योंकि वह सुख बिना प्रयास के स्वयमेव उत्पन्न होता है, उस स्वर्ग में अातंक (रोगादिक) नहीं है और समस्त इन्द्रियों को तृप्त करने में समर्थ है।
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अध्याय : पांचवा ]
[ २४७
अशेष विषयोद्भूतं दिव्यस्त्री संगसंभवम् ।
विनीत जन विज्ञान ज्ञानार्थ स्वयंलाञ्छितम् ॥ ४०६ ॥
स्वर्ग का सुख समस्त प्रकार के विषयों से उत्पन्न हुआ है तथा दिव्य स्त्रियों के संगम से उत्पन्न हुआ है तथा विज्ञान चतुराई ज्ञानादिक ऐश्वर्यं सहित उत्पन्न हुग्रा है, उसका वर्णन कौन कर सकता है ?
सौधर्माद्यच्युतान्ता ये कल्पाः षोडशबणिताः ।
heeratarस्ततो ज्ञेया देवा वैमानिकाः परे ॥ ४१० ॥ प्रवीचारविर्वाजिताः ।
अहमिन्द्राभिधानास्ते
विद्धि शुभेच्यांना. शुक्ललेश्यावलम्बिनः ॥ ४११ ॥
सौधर्म स्वर्ग से लगाकर अच्युत स्वर्ग पर्यन्त सोलह स्वर्ग कल्प कहे जाते हैं, उनसे ऊपर जो व चैत्रेयकों में वैमानिक देव हैं, वे कल्पातीत कहलाते हैं ।
देवमिन्द्र नाम से वर्णन किये जाते हैं अर्थात् उनका श्राचार्यों ने अहमिन्द्र नाम कहा है ये ग्रहमिन्द्र काम रहित हैं उनके स्त्री का मैथुन नहीं है, इसी कारण वहां देवांगनायें नहीं होती; उन देवों का शुभ ध्यान उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ है और शुक्ल लेश्या के धरने वाले हैं ।
अनुत्तर विमानेषु श्री जयन्तादिपञ्चसु ।
संभूय गिरगरच्युत्वा व्रजन्ति पदम व्ययम् ॥। ४१२।।
तत्पश्चात् उन नव ग्रैवेयक विमानों से ऊपर श्री जयन्तादिक पाँच अनुत्तर विमान हैं। उनमें जो देव उत्पन्न होते हैं, वे वहाँ से गिरकर मनुष्य हो अवश्य ही मोक्ष को पाते हैं ।
कल्पेषु च विमानेषु परतः परतोऽधिकाः ।
शुभ श्यायुविज्ञान प्रभावः स्वगिणः स्वयम् ॥ ४१३।।
तथा कल्पों में और कल्पातीत विमानों में शुभ लेश्या आयु विज्ञान प्रभावादिक करके देव स्वयं ही अगले विमानों में अधिक-अधिक बढ़ते हुए हैं । ततोऽग्रे शाश्वतं धाम जन्मजातङ्क विच्युतम् !
ज्ञानिनां यदधिष्ठानं क्षीण निःशेष कर्मणाम् ||४१४ ||
उन अनुत्तर विमानों से आगे अर्थात् ऊपर शाश्वत धाम ( मोक्ष स्थान व सिद्ध शिला) है सो संसार से उत्पन्न हुए क्लेश दुःखादि से रहित है और समस्त कर्मों
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११५।।
२४८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामगि के नाश करने वाले सिद्ध भगवानों का प्राश्रय स्थान है।
चिदानन्दगुणोपेता - निष्ठितार्था विबन्धनाः । यत्र सन्ति स्वयं बुद्धाः सिद्धाः सिद्धः स्वयंवराः ॥४१५।।
उस मोक्ष स्थान में सिद्ध भगवान विद्यमान हैं, वे चैतन्य और प्रानन्द कहिये गुग्गों में संयुक्त हैं, कृत-कृत्य है, कर्म बन्ध से रहित है, स्वयं बुद्ध हैं, अर्थात् जिनके स्वाधीन अतीन्द्रिय ज्ञान है. तथा सिद्ध (मुक्ति) को स्वयं वरने वाले हैं।
समस्तोऽयमहो लोकः । केवलज्ञान गोचरः । तं व्यस्त वा समस्तं वा स्वशक्तया चिन्तयेद्यतिः ।।४१६॥
अहो भव्य जीवों! यह समस्त लोक कपल शान गोवा । तथापि इस संस्थान विचय नामा धर्म ध्यान में मुनि सामान्यता से सबको ही तथा व्यस्त कहिये कुछ भिन्न-भिन्न को अपनी शक्ति के अनुसार चिन्तवन करें।
विलीना रोष कर्माण स्फुरन्तमति निर्मलम् । स्वं ततः पुरुषाकारं स्वाङ्ग गर्भगतं स्मरेत ।।४१७॥
तथा इस. लोक के संस्थान के . चिन्तवन के पश्चात अपने शरीर में प्राप्त धुरुषाकार अपने प्रात्मा को कर्म रहित स्फरायमान अति निर्मल चिन्तवन (स्मरण)
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'. इति निगदितमुच्चैर्लोक संस्थानमित्थं, नियत मनियतं वा ध्यायतः शुद्धबुद्धः । .. भवति सतत योगाद्योगिनो निष्प्रभादं, नियतमति दूरं केवल ज्ञान राज्यम् ॥४१८।।
ग्राचार्य महाराज कहते हैं कि इस पूर्वोक्त प्रकार से कहे हुए लोक के स्वरूप : (संस्थान) को इस प्रकार नियत मर्यादा सहित वा अनियत मर्यादा रहित चिन्तवन करता हना जो निर्मल बुद्धि मुनि है उसको प्रमाद रहित ध्यान करने से नियम से शीघ्र ही केवल ज्ञान राज्य की प्राप्ति होती है। भावार्थ-अप्रमत नामा सातवें गुणस्थान में यह धर्मध्यान उत्कृष्ट होता है, उस गुणस्थान से फिर क्षपक श्रेशी का प्रारम्भ करने पर अन्तमुहर्त में केवल ज्ञान की उत्पत्ति होती है।
इस प्रकार संस्थान विचय नाम धर्मध्यान में लोक संस्थान का चितवन करना होता है, इस कारण लोक के संस्थानों का वर्णन किया; यदि किसी को लोग का विशेष वर्णन देखना हो तो त्रिलोकसारादि ग्रन्थों से देखे । . . .
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..अध्याय : पांचवां ]
.. [ २४६ संस्थान विचय धर्मध्यान के अन्तर्गत प्रथम पिण्डस्थ ध्यान का वर्णन--. पिण्डस्थं च पदस्थ सहपस्थं गाजित चतुर्घा ध्यानमाम्नातं भव्यराजीव भास्करैः ।।४१६॥ . .
जो भव्य रूपी कमलों को प्रफुल्लित करने के लिए मूर्य के समान योगीश्वर हैं, उन्होंने ध्यान को पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत ऐसे चार प्रकार का कहा है।
पिण्डस्थं पञ्च विज्ञेया धारणा बीरणिताः। संयमी यास्व संमूढो जन्म पाशानिकृन्तति ॥४२०॥ .
पिण्डस्थ ध्यान में श्री वर्द्धमान स्वामी ने कहीं हुई जो पांच धारणाएं हैं, . उसमें संयमी मुनि ज्ञानी होकर संसार रूपी पाश को काटता है।
पाथिवी स्यात्तथाग्नेयो श्वसना वाथ वारुणी । तत्व रूपवती चेति विज्ञेयास्तां यथाक्रमम् ॥४२१॥
वे धारणायें पार्थिवी, आग्नेयी तथा श्वसना, बारुणी और तत्व रूपवती ऐसे . यथाक्रम से होती है।
पाथिवीधारणा का स्वरूप । तिर्यग्लोक समें योगी स्मरति क्षीरसागरम् । नि.शब्दं शान्त कल्लोले हारनीहार संनिभम् ॥४२२॥ .
प्रथम ही योगी मध्यलोक में स्वयंभरमरण नामा समुद्रपर्यन्त जो तिर्यक लोक है, उसके समान नि:शब्द, कल्लोल रहित तथा हार और बरफ के सदृश सफेद क्षीर समुद्र का ध्यान (चिन्तवन) करे 1 ... . .
तस्य मध्ये सुनिर्माणं सहस्त्र दल मम्बुजम् । स्मरत्यमित मादीप्तं इत. हेम . समप्रभम् ॥४२३॥
उस क्षीर समुद्र के मध्य भाग में सुन्दर है निमारग (रचना) जिसकी और अमित फैलती हुई दीप्ति से शोभायमान, पिघलाये हुए सुवर्ण की सौ प्रभा वाले एक सहस्रदल के कमल का चिन्तवन (ध्यान) करें। .. . (चित्र नं. १)
अब्जराग समुद्भुत केसरालि विराजितम् । जम्बूद्वीप प्रमारणं च चित्तभ्रमर रञ्चकम् ।।४२४॥ फिर इस कमल को कैसा ध्यावे कि कमल के रोग से उत्पन्न हुई केसरों की
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२५० ]
[ गो. प्र. चिन्तामि
पंक्ति से विराजमान ( शोभायमान ) तथा चित्त रूपी भ्रमर को रंजायमान करने वाले जम्बुद्वीप के बराबर लाख योजन का चिन्तवन करें ।
स्वर्णाचलमयों दिव्यां तत्र स्मरति कणिकाम् । स्फुरत्पिङ्ग प्रभा जाल पिशङ्गित दिगन्तराम् ||४२५ ॥
तत्पश्चात् उस कमल के मध्य सुचिल (मेरु) के समान, स्फुरायमान है.. पीतरंग की प्रभा का समूह जिसमें तथा उसके द्वारा पीतरंग को कर दी हैं दशों दिशायें जिसने ऐसी एक कणिका का ध्यान करे ।
शरच्चन्द्र निभं तस्यामुन्नतं हरिविष्टरम् । तत्रात्मानं सुखासीनं प्रशान्तमिति
उस कमल की करिका में एक ऊंचा सिहासन चितवन करें उस स्वरूप, क्षोभ रहित चितवन करें ।
॥४२६२
शरद ऋतु के चन्द्रमा के सम्मान स्तन का सिंहासन में अपने आत्मा को सुखरूप, शान्त (चित्र नं० २ देखें)
आग्नेय धारणा का स्वरूप
राग षादि निःशेष कलङ्क क्षपणक्षमम् । उक्तं च भवोद्भूत कर्म सन्तान शातने ॥ ४२७३॥
6.
उस सिंहासन पर बैठे हुए अपने श्रात्मा को ऐसा विचारे कि मह. रागद्वेषादि समस्त कलंकों को क्षय करने में समर्थ है और संसार में उत्पन्न हुए जो जो कर्म हैं, उनके सन्तान को नाश करने में उद्यमी है ।
ततोऽसौ निश्चलाभ्यासात्कमलं नाभिमण्डले ।
स्मरत्यति मनोहारि षोडशोन्नत पत्रकम् ॥ ४२८ ॥
तत्पश्चात् योगी (ध्यानी ) निश्चल अभ्यास से अपने नाभिमण्डल में १६ सोलह ऊंचे ऊंचे पत्रों के एक मनोहर कमल का ध्यान (चितवन) करें । प्रतिपत्र समासीन स्वर माला विराजितम् ।
कणिकायां महामन्त्रं विस्फुरन्तं विचिन्तयेत् ॥४२६॥
तत्पश्चात् उस कमल की कणिका में महामन्त्र का ( जो मार्ग कहा जाता है उसका ) चिन्तन करे और उस कमल के सोलह पत्रों पर था इ ई उ ऊ ऋ ऋ लृ लृ ए ऐ श्री श्री मंः इन १६ अक्षरों का ध्यान करे । (चित्र नं० ३)
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अध्याय : पांचवां ]
उस महामन्त्र का स्वरूप
रेफरूद्धं कलाविद् लाब्धितं शून्यमक्षरम् 1 लसादिन्दुच्छ कोटि कान्ति व्याप्त हरिन्मुखम् ||४३०||
{ २५१
रेफ से रूद्ध कहिले ग्रावृंतर त्या विन्दु से चिह्नित और शून्य कहिये हकार ऐसा अक्षर लसत् देदीप्यमान होते हुए इंदु की छटा कोटि को कान्ति से व्याप्त किया है दिशा का मुख जिसने ऐसा महामन्त्र "हे" उस कमल की कणिका में स्थापन कर, चित्तवन करे । चित्र नं० ४ ।
फिर कैसा चिन्तयन करें-
तस्य रेफाद्विनिर्यान्तीं शनं धूम शिखां स्मरेत् । स्फुलिङ्ग संतति पश्चाज्ज्वालालों तदनन्तरम् ॥४३१॥ तेन ज्वाला कलापेन बर्द्धमानेन सन्ततम् । दत्यविरतं धरिः पुण्डरीकं हृदि स्थितम् ||४३२ ॥
( धुआँ ) की
तत्पश्चात् उस महामन्त्र के रेफ से मंद-मंद निकलती हुई धुम शिखा का चिन्तन करे तत्पश्चात् उसमें से ग्रनुक्रम से प्रवाह रूप निकलते हुए स्फुलिंगों की पंक्ति का चिन्तन करे और तत्पश्चात् उसमें से निकलती हुई ज्वाला की लपटों को विचारे । तत्पश्चात् भोगी मुनि क्रम से बढ़ते हुए ज्वाला के समुह् से अपने हृदयस्थ कमल को निरन्तर जलाता हुआ चिन्तवन करे । हृदय कमल का विशेष स्वरूप
तदष्ट कर्म निर्माणमष्ट पत्र मधोमुखम् ।
हत्येव महामन्त्र ध्यानोत्य प्रबलोऽनलः ॥४३३॥
वह हृदयस्थ कमल वो मुख आठ पत्र का (पाखडीवाल) है; उन आठ पत्रों (बलों) पर आठ कर्म स्थित हों, ऐसे कमल को नाभिस्थ कमल की कणिका में स्थित "ई" महामन्त्र के ध्यान से उठी हुई प्रबल अग्नि निरंतर दहती है; इस प्रकार चिन्तयन करें, तब प्रष्ट कर्म जल जाते हैं, यह चैतन्य परिणामों को सामर्थ्य है |
चित्र नं० ५-६ १
ततो बहिः शरीरस्य त्रिकोणं वह्निमण्डलम् ।
स्मरेज्ज्वाला कलापेन ज्वलन्तमिव वाडवम् ॥ ४३४ ॥
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२५२ ]
[ गो, प्र. चिन्तामणि वह्नि बीज समानान्तं पर्यन्ते स्वस्तिकाभितम् । ऊर्ध्व वायु पुरोद्भत निर्द्ध में काञ्चन प्रभम् ॥४३५।। अन्तर्दहति मन्त्राविहिर्वह्निपुरं . पुरम् । धगद्ध' गिति विस्फूर्जज्ज्वालाप्रचय भासुरम् ॥४३६।। भस्म भाव मसौ नील्वा शरीरं तच्च पङ्कजम् ।। दाह्याभावात्स्वयं शान्ति याति वह्निः शनैः शनैः ॥४३७।।
उस कमल के दग्ध हुए पश्चात् शरीर के बाह्य त्रिकोण वह्नि (अग्नि) का . .. चिन्तवन करे, मो ज्वाला के समूहों से जलते हुए बडवानल के समान ध्यान करे। .
तथा अग्नि बीजाक्षर 'र' से व्याप्त और अन्त में साथिया के चिह्न से चिह्नित हो, ऊर्ध्व वायुमंडल से उत्पन्न धूम रहित कांचन की सी प्रभा वाला चितवन करे । इस प्रकार यह धगधगायमान फैलती हुई लपटों के समूह से देदीप्यमान बाहर का अग्निपुर (अग्निमंडल) अंतरंग की मंत्राग्नि को दग्ध करता है । तत्पश्चात् वह अग्निमंडल उस नाभिस्थ कमल और शरीर को भस्मीभूत करके दाह्य (जलाने योग्य पदार्थ) का अभाव होने से धीरे-धीरे अपने आप यह अग्नि शान्त हो जाती है ।
चित्र नं० ७०-८-६ देखे । मारुती धारण का स्वरूप
विमानपथ मापूर्ण संघरन्तं समीरणम् । स्मरत्यविरतं योगी महावेगगं महाबलम् ॥३४८॥
योग (ध्यान करने वाल मुनि) अाकाश में पूर्ण हो कर विचरते हुए महा. वेग वाले और महाबलवान ऐसे वायुमंडल का चिन्तवन करें ।
चालयन्तं सुरानोकं ध्वनन्तं निदशाचलम् । दारयन्तं धनवातं क्षोभयन्तं महागवम् ॥४३६।। व्रजन्तं भुवना भोगे संचरन्तं हरिन्मुखे । विसर्पन्तं जगन्नोडे निविशन्तं धरातले ॥४४०।। ... उध्य तद्रजः शीघ्र तेन प्रबल वायुना । ततः स्थिरी कृताभ्यासः समीर शांति मानयेत्।।४४१।।
तत्पश्चात् उस पवन को ऐसा चिन्तवन करे कि देवों की सेना को चलायमान करता है, मेरु पर्वत को पाता है, मेघों के समूह को बिखेरता हुआ, समुद्र को मोम
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अध्याय : पांचवां । रूप करता हुआ । तथा लोक के मध्य गमन करता हुया, दशों दिशाओं संचरता हुना, जगत रूप में घर में फैला हुना । पृथ्वि तल में प्रवेश करता हुआ चिन्तवन करे । तत्पश्चात् ध्यानी (मुनि) ऐसा सिसवन सरे किचन जो रीसदिक की भस्म है, उसको उस प्रबल वायुमंडल ने तत्काल उड़ा दिया, तत्पश्चात् इस वायु को स्थिर रूप चिन्तबन करके शान्त रूप करे । चित्र नं १७ । वारुणी धारण का स्वरूप
बारुण्या स हि पुण्यात्मा घन जाल चितं नमः । इन्द्रायुधडिगार्जच्चमत्काराकुलं स्मरेत् ॥४४२॥
वही पुण्यात्मा (ध्यानी मुनि ) इन्द्र धनुष, बिजली, गर्जनादि चमत्कार सहित मेघों के समूह से भरे हुए अाकाश का ध्यान (चिन्तवन) करे ।
सुधाम्बु प्रभवः सान्द्र बिन्दुभिमौक्ति कोज्ज्वलः।
वर्षन्तं तं स्मरेद्धोरः स्थूलस्थूले निरन्तरम् ।।४४३॥ - तथा उन मेघों को अमृत से उत्पन्न हुए मोती समान उज्ज्वल बड़े-बड़े बिन्दुओं से निरन्तर धारा रूप बर्षते हुए अाकाश को धीर, वीर मुनि स्मरण करे. अर्थात् ध्यान करे । चिश्न नं० ११।
ततोऽन्दुसम कान्तं परं वरुणलाञ्छितम् ।. .
ध्यायेत्सुधापयः परः ल्पावयन्तंनभस्तलम् ॥४४४।। ... तत्पश्चात अर्द्धचन्द्राकार, मनोहर, अमृत मय जल के प्रवाह से आकाश को बहाते हुए वरापुर (बरुणमंडल) का चिन्तवन करे ।
तेनाचिन्त्यप्रभावेरा, दिव्यध्यानोत्थिताम्बुना । प्रक्षालयति निःशेषं . तद्रजः कायसंभवम् ।।४४५॥
अचिन्त्य है प्रभाव जिसका ऐसे दिव्य ध्यान से उत्पन्न हुए जल से शरीर के जलने से उत्पन्न हुए समस्त भस्म को प्रक्षालन करता है अर्थात् धोता है, ऐसा चिन्तवन करे।
सप्तधातु विनिमुक्तं पूर्णचन्द्रामलत्विषम् । . सर्वज्ञकल्पमात्मानं ततः स्मरति संयमी ॥४४६॥
तत्पश्चात् संयमी मुनि सप्त धातु रहित, पूर्ण चन्द्रमा के समान है निर्मल प्रभा जिसकी से सर्वज्ञ समान अपने ग्रात्मा का ध्यान करे ।
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[ गो. प्र. चिन्तामरि
२५४ ]
मृगेन्द्र विष्ट रारुढं दिव्या तिशय संयुतम् । कल्याण महिमोपेतं देव दैत्योरगाचितम् ॥ ४४७॥ विलोनाशेष कर्मारणं स्फुरन्त मति निर्मलम् । स्वं ततः पुरुषाकारं स्वाङ्गगर्भगतं स्मरेत् ||४४८॥ तत्पश्चात् अपने श्रात्मा के अतिशय युक्त सिहासन पर ग्राम कल्याण की महिमा सहित देव दानव धरणेंद्रादि से पूजित है, ऐसा चित्तवन करें। तत्पश्चात् विलय हो गये हैं आठ कर्म जिसके ऐसा स्फुरायमान (प्रगट ) अंति निर्मल पुरुषाकार अपने शरीर में प्राप्त हुए अपने आत्मा का चितवन करे। इस प्रकार तत्त्वरूपवती धारा कही गई । चित्र नं० १२ ।
इत्यविरतं स योगी विजातश्विलाभ्यासः ।
शिव सुखमनन्य साध्यं प्राप्नोत्यचिरेण कालेन ॥ ४४६ ॥
इस प्रकार पिस्थ ध्यान में जिसका निश्चल अभ्यास हो गया है वह ध्यानी मुनि अन्य प्रकार से सावने में न यावे ऐसे मोक्ष के सुख को शीघ्र ( अल्प समय में ) हो प्राप्त होता है ।
इत्थं यत्रानवद्यं स्मरति नव सुधा सान्द्र चन्द्रांशुगौरं । श्रीमत्सर्वज्ञकल्पं कनक गिरितटे वीत विश्वप्रपञ्चम् ॥ श्रात्मानं विश्वरूपं त्रिदशगुरु गणैरप्य चित्यप्रभावं । तत्पिण्डस्थं प्रणीतं जिन सन्य महाम्भोधिपारं प्रयातः ।।४५० ।।
उक्त प्रकार से जिस पिण्डस्थ ध्यान में निर्दोष, नये अमृत से भीगी हुई. चन्द्रमा की किरण सदृश-गोरे वणं, श्रीमत्सर्वेश भगवान् समान तथा मेरु गिरी के तट वा शिखर पर बैठा, बीते है समस्त प्रपंच जिसके ऐसे तथा विश्वरूप- समस्त ज्ञेय पदार्थों के प्राकार जिसमें प्रतिविम्बित हो रहे हैं, ऐसे देवेंद्रों के समूह से भो जिसका विक प्रभाव हो ऐसे आत्मा का जो चिन्तवन किया जाय, उसको जिन सिद्धान्त रूपी महासमुद्र के पार पहुँचने वाले मुनिश्वरों ने frosts ध्यान कहा है । विद्यामण्डलमन्त्रयन्त्र कुककूराभिचाराः क्रियाः । सिंहाशो विष दैत्यदन्ति शरभा यान्त्येव निःसारताम् ।। शाकिन्यो ग्रह राक्षसप्रभृतयो मुञ्चन्त्यसद्धासनां । एतानधनस्य सन्निधिवशादानोर्यथा कौशिकाः ||४५१ ॥
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अध्याय : पांचवा 1
[ २५५ जिस प्रकार मूर्य के उदय होने पर उलक (घूघ) भाग जाते हैं, उसी प्रकार इस पिण्डस्थ ध्यानरूपी धन के समीप होने से विद्या, मंडल, मंत्र, यन्त्र, इन्द्रजाल के ग्राश्चर्य (प्रसिद्ध कपट) क्रूर अभिचार (मरमादि) स्वरूप किया तथा सिंह, प्राशीविप (सप) दैत्य हस्ती अष्टापद ये सब ही निःसारता को प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् किसी प्रकार का उपद्रव नहीं करते तथा शाकिनी ग्रह राक्षस वगैरह भी खोटी वासना को छोड़ देते हैं।
भावार्थ : -पिण्वस्थ ध्यान के प्राप्त होने वाले मुनि के निकट कोई दुष्ट जीब किसी प्रकार का उपद्रव नहीं कर सकते, समस्त विघ्न दूर से नष्ट हो जाते हैं।
इस प्रकार पिण्डस्थ गान का वर्णन किया । यहाँ कोई ऐसा कहें कि ध्यान तो ज्ञानानन्द स्वरूप प्रात्मा का ही करना है। इतनी पृथ्वि, अग्नि, पवन, जलादिक की कल्पना किस लिये करनी ? उसको कहा जाता है कि :
__यह शरीर पृथ्वि आदि धातुमय है और सूक्ष्म पुद्गल कर्म के द्वारा उत्पन्न हुया है। उसका पात्मा के साथ संबंध है; इनके संबंध से आत्मा द्रव्य भाव रूप कलंक से उत्पन्न होते हैं। उन विकल्पों के निमित्त से परिणाम निश्चल नहीं होते । उनको निश्चल करने के लिये स्वाधीन चिन्तबनों से चित्त को वश करना चाहिये । सो ध्यान में किसी का पालम्बन किये बिना चित्त निश्चल नहीं होता, इस कारण उसको अलम्बन करने के लिए पिण्डस्थ ध्यान में पृथ्वि आदि पांच प्रकार की कल्पना स्थापन की गई है । सो, प्रथम तो पृथ्वि संबंधी धारणा से मन को थामे, तत्पश्चात् अग्नि धारणा से कर्म और शरीर को दग्ध करने की कल्पना करके मन को रोके । तत्पश्चात् पवन की धारणा को कल्पना करके शरीर तथा कर्म की भरम. को उड़ाकर मन को थांभे, तत्पश्चात् जल की धारंगा से उसमें से बचा बचाई रज को धो देने रूप ध्यान से मन को थांभे, तत्पश्चात् प्रात्मा शरीर और कर्म से रहित शुद्ध ज्ञानानंदमय कल्पना करके, उसमें मन का स्तंभन करे। इस प्रकार मन को थाभते-थाभते . अभ्यास के करने से ध्यान का दृढ़ अभ्यास हो जाता है, तब आत्मा शुक्ल ध्यान में ... - ठहरता है, उस समय घाति कमों का नाश करके केवल ज्ञान की प्राप्ति हो कर मोक्ष
हो जाता है तथा अन्य मती भी इसी प्रकार पार्थिवी आदि बारणा करने को कहते हैं; परन्तु उनके आत्म तत्त्व का यथार्थ निरूपण नहीं होने के कारण उनके यहाँ सत्यार्थ . धारणा नहीं होती, कुछ लौकिक चमत्कार सिद्ध हो तो हो जानो, परन्तु मोक्ष की प्राप्ति
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२५६ ।
.. .... [ गो. प्र. चिन्तामणि तो यथार्थ तत्त्व के श्रद्धान ज्ञान प्राचरण बिना होती ही नहीं। इस कारण इसमें मुन्देह नहीं करना।
* पदस्थ-ध्यान पदान्यालम्ब्य पुण्यानि योगिभिर्यद्विधीयते । तत्पदस्थं मतं ध्यान विचित्र नय पारगः ॥४५२॥
जिसको योगीश्वर पवित्र मंत्रों के अक्षर स्वरूप पदों का अवलम्बन करके चितवन करते हैं, उसको अनेक नयों के पार पहुँचने वाले योगीश्वरों ने पदस्थ ध्यान कहा है। वर्णमातृका ध्यान का स्वरूप--
ध्यायेदनादि सिद्धान्त प्रसिद्धां वर्णमातृकाम् । निःशेष शब्द विन्यास जन्म भूमि जगन्नताम् ।।४५३॥
अनादि सिद्धान्त में प्रसिद्ध जो वर्गमातका अर्थात् अकारादि स्वर और ककारादि व्यञ्जनों का समूह है, उसका यिन्तवन करे, क्योंकि यह वर्ण मातृका सम्पूर्ण शब्दों के रचना की जन्म भूमि है और जंगत से वंदनीय है।
द्विगुणाष्टवलाम्भोजे निाभिमण्डल तिनि ।। भ्रमन्ती चिन्तयेद्धयानी प्रतिपत्रं स्वरावलीम् ॥४५४॥ .
ध्यान करने वाला पुरुष नाभि मंडल पर स्थित सोलह दल (पॅखडी) के कमल में प्रत्येक दल पर कम से फिरती हुई स्वरावली का अर्थात् अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ ल ल ए ऐ ओ औ अं अः इन अक्षरों का चिन्तवन करें।
चतुविशति पत्राढयं हृदि कर्ज सरिपकम् ।
तत्र वा निमान्ध्यायेत्संयमी पञ्चविंशतिकम् ।।४५५॥ . . . तत्पश्चात् ध्यानी अपने हृद्रय स्थान पर कणिका सहित चौबीस. पत्रों का कमल संयमी मुनि चिन्तवन करके उसकी करिणका तथा पत्रों में क ख ग घ ङ च छ. जं झाट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म इन पच्चीस अक्षरों का ध्यान करे ।
ततो वदन राजीवे : पत्राष्टक विभूषिते । परं वधिक ध्यायेत्सञ्चरन्तं प्रदक्षिणम् । ४५६॥
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अध्याय : पांचवां ।
[ २५७ तत्पश्चात् पार पत्रों से विभूषित मुख कमल के प्रत्येक पत्र पर भ्रमण करते हुए य र ल व श ष स ह इन अाठ वगों का ध्यान करें।
इत्यजस्त्रं स्मरन् योगी प्रसिद्ध वर्णमातृकाम् । .. श्रु तज्ञानाम्बुधः पारं प्रयाति विगतभ्रमः ॥४५७।।
इस प्रकार प्रसिद्ध वर्मा मातृका का निरन्तर ध्यान करता हुआ योगी भ्रम रहित होकर श्रुत ज्ञान रूपी समुद्र के पार (उत्तर तट) को प्राप्त हो जाता है। भावार्थ - इस प्रकार ध्यान करने वाला मुनि श्रुतकेवली हो सकता है ।
कमलदलोदर मध्ये ध्यायन्वर्णाननादिसंसिद्धान् । नष्टादि विषय बोधं ध्याता सम्पद्यते कालात् ।।४५६।।
ध्यान करने वाला पुरुप कमल के पत्र और करिका के मध्य में अनादि संसिद्ध (पूर्वोक्त ४६) अक्षरों का ध्यान करता हुना कितने की काल में नयादि वस्तु सम्बन्धी ज्ञान को प्राप्त करता है ।
जाप्याज्जयेत् क्षयमरोचक मग्निमान्द्य,.. कुण्ठोदरात्मक सनश्व सनादि रोगान् । प्राप्नोति चाप्रतिमवांमगहती महद्भयः,
पूजां परत्र च गति पुरुषोत्तमाप्ताम् ॥४५६।।
इस वर्ग मातृका के जाप से योगी क्षयरोग, अरुचिपना, अग्निमंदता, कुष्ठ, . उदर रोग, कास तथा श्वास आदि रोगों को जीतता है; और वचनासिद्धता, महान् . पुरुषों से पूजा तथा परलोक में उत्तम पुरुषों से प्राप्त की हुई, श्रोष्ठ गति को प्राप्त होता है । चित्र नं. १३: मन्त्रराज का स्वरूप, जो अनाहत है---
अथ मन्त्रपदाधीशं सर्व तत्त्वकनायकम् । प्रावि मध्यान्त भेवेन स्वरव्यञ्जन सम्भवम् ।।४६०॥ ॐ धोरेफसंरुद्ध सपर बिन्दु लाच्छितम् । अनाहल युतं तस्वं मन्त्रराज प्रचक्षते ॥४६१।।
अब समस्त मन्न पदों का स्वामी, सब तत्वों का नायक, अादि मध्यं और अन्त के भेद से स्वर तथा व्यञ्जनों से उत्पन्न, ऊपर और नीचे रेफ (र) से रुका हुआ तथा बिन्दु ( 1 से चिह्नित सपर कहिये हकार अति (ह) ऐसा बाजीक्षर तत्त्व है;
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२५८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि अनाहत सहित इसको योगीजन मन्त्रराज कहते हैं। अनाहत का. क्या स्वरूप है ?
अनाहत का लक्षण । . . उबिन्द्वाकारहरीद्धर्वरेफ विन्द्वान वाक्षरम् । मालाधः स्थन्दि पीयूषबिन्दु विदुरनाहतम् ।।४६२२॥ इसमें ६ अक्षर मिले हुए हैं।
१. उकार, २. अनुस्वार, ३, ईकार, ४. उर्द्ध रेफ, ५. हकार, ६. हकार, - ७. रेफ, ८. अनुस्वार, ६. ईकार।
देवासुरनत भीमदुर्बोध वान्त. भास्करम् । ___ ध्यायेन्मूद्धस्थ चन्द्रांशुकला पाकान्त दिङ मुखम् ।।४६३॥
देव और असुर कर रहे हैं। नमस्कार जिसको ऐसे, प्रज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करने के लिये सूर्य के समान तथा मस्तक पर स्थित जो चन्द्रमा उसकी किरणों के समूह से व्याप्त किया है, दिशाओं का मुख (कादि) भाग जिसने ऐसे इस मन्त्रराज का ध्यान करे । इस अनाहत मंत्रराज का कैसा ध्यान करे ?
कनक कमल गर्ने कणिकायां निषण्णं, विगतमलकलङ्क सान्द्रांशुगौरम् । गगनमनुसरन्तं , सञ्चरन्तं हरित्सु,
स्मर जिनवरकल्प मन्त्रराज यतीन्द्र ॥४६४।। हे मुनीन्द्र ! मुवर्णमय कमल के मध्य में कणिका पर विराजमान, मल तथा कलंक से रहित, शरद ऋतु के पूर्ण चन्द्रमा की किरणों के समान गौरवर्ग के धारक, आकाश में गमन करते हुए, तथा दिशाओं में व्याप्त होते हुए, ऐसे श्री जिनेन्द्र : के सदृश इस मन्त्रराज का स्मरण अर्थात ध्यान करो। उस मंत्रराज के क्या मत्त है ? . . . . . . . . .
बुद्धः कश्चिद्धरिः कैश्चिदजः कश्चित्महोश्वरः ।
शिवः सार्वस्तथैशानः सोऽयं वर्षः प्रकीर्तितः ॥४६५।। कितने ही इस (हूँ') अक्षर को कितने ही हरि ब्रह्मा, बुद्ध कितने ही महेश्वर, 'कितने ही शिव, कितने ही सार्व और कितने ही ईशानस्वरूप कहते हैं ।
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अध्याय : पांचवां ]
[ २५६ यथार्थ में यह अक्षर क्या है ?
___मन्त्रमूति समादाय देव देवः स्वयं जिनः ।
सर्वज्ञः सर्वगः शान्तः सोऽयं साक्षाव्यवस्थितः ।।४६६।। । यह मन्धराज (ह) अक्षर ऐसा है कि मानो सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, शान्तभूत्ति के धारक देवाधिदेव स्वयं श्री जिनेन्द्र । भगवान् ही मन्त्रमूति को धारण करके साक्षात् . विराजमान है । भावार्थ - यह मन्त्रराज अक्षर साक्षात श्री जिनेन्द्र स्वरूप है।
ज्ञानबीजं जगद्वन्ध जन्मज्वलनवायुचम् ।
पवित्र मतिमान्ध्यायेदिमं मन्त्र महेश्वरम् ।।४६७।।
बुद्धिमान पुरुष मन्त्रराज को ज्ञान का बोज, जगत से वंदनीय तथा संसार रुपी अग्नि के लिये अर्थात् जन्म संताप को दूर करने के लिये मेघ के समान ध्यावे ।
सकदुच्चारितं येनं । हृदि . स्थितिम् ।
तर्वच जन्म सन्तान प्ररोहः प्रविशीर्यते ।।४६८॥ जिस समय यह महातत्त्व मुनि के हृदय में स्थिति करता है, उस ही काल संसार के सन्तान का अंकुर गल जाता हैं, अर्थात् टूट जाता है । इस मंत्रराज का ध्यान कैसे करें?
स्फुरन्तं भूलतामध्ये विशन्तं बदनाम्बुजे । तालुरन्ध्ररण गच्छन्तं स्त्रवन्तममृताम्बुभिः ।।४६६।। स्फुरन्त नेत्र पत्रेषु कुर्वन्त मलके स्थितिम् । भ्रमन्तं ज्योतिषां चक स्पर्द्धमानं सितांशुना ॥४७०।। संचरन्तं दिशामास्ये प्रोच्छलन्तं नभस्तले । धंदयन्तं कलङ्कोचं स्फोटयन्तं भवभ्रमम् ।।४७१।। नयन्तं परमस्थानां योजयन्तं शिवश्रियम् ।
इति मन्त्राधिपं धीर कुम्भकेन विचिन्तयेत् ॥४७२।। धैर्य का धारक योगी कुम्भक प्राणायाम से इस मंत्रराज को भौंह की . लतानों में स्फुरायमान होता हुआ, तालुका के छिद्र से गमन करता हुमा, तथा अमृतमय जल से भरता हुग्रा, नेत्र की पलकों पर स्फुरायमान होता हुया, केशों में स्थित करता हुआ तथा ज्योतिपियों के समूह में भ्रमता हुना, चन्द्रमा के साथ स्पर्धा करता हुया, दिशाओं में संचरता हुअा, प्राकाश में उछलता हुआ कलंक के समूह को
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.२६० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि छेदता हुश्रा, मुसार के भ्रम को दूर करता हुआ तथा परमस्थान (मोक्षस्थान) को प्राप्त करता हुआ, मोक्ष लक्ष्मी से मिलाप कराता हुआ ध्यायें।."
अनन्यशरणः साक्षात्तत्सली नकमानसः ।
तथा स्मरत्यसो ध्यानी यथा. स्वप्नेऽपि न स्खलेत् ॥४७३।। .. ध्यान करने वाला इस मन्त्राधिप को अन्य किसी की शरण न लेकर; इसमें ही साक्षात् तल्लीन मन करके स्वप्न में भी इस मंत्र से च्युत न हो एसा दृढ़ होकर ध्या।
इति मत्वा स्थिरीभूतं सर्वावस्थासु सर्वथा ।
नासाग्रे निश्चलं धत्ते यदि वा भ्र लतान्तरे ॥४७४॥
ऐसे पूर्वोक्त प्रकार से. महामन्त्र के ध्यान के विधान को जानकार मुनि समस्त अवस्थानों में स्थिर स्वरूप सवथा नासिका के अनुभाग में अथवा भौंह लता के मध्य में इसको निश्चल धारण करें।
... तत्र कैश्चिच्च वर्णादि भेदस्तकल्पितं पुनः ।
मन्त्र मण्डल मुद्रादि साधनैरिष्ट सिद्धिदम् ।।४७५।।
इस नासिका के अग्नभाग अथवा भौंह लता के मध्य में निश्चल धारण करने अवसर में कई प्राचार्यों ने उस मंत्राधिप को ध्यान करने में अक्षरादिक के भेद करके .. कल्पना की है और मंडल मुद्रा इत्यादिक साधनों से इष्ट की सिद्धि का देने वाला ___ कहा है । चित्र नं. १४ ! .:: . .
"अकारादि हकारान्तं रेफ मध्यं सबिन्दुकम् ।। तदेव परम तत्त्वं यो जानाति स तत्त्ववित् ॥४७६।।
प्रकार है आदि में जिसके, हकार है अन्त में जिसके और रेफ है मध्य में जिसके और बिन्दु सहित ऐसा जो अह पदं है, वही परम तत्व है । जो कोई इसको जानता है, वह तत्त्व को जानने वाला है ।
सर्वावयव संपूर्ण । ततोऽवयवविच्युतम् ।.
क्रमेण चिन्तयेद्धयानी वर्णमात्रं शशिप्रभम् ।।४७७॥ ...... प्रथम तो ध्यानी अहं अक्षर का पूर्वोक्त समस्त अवयवों सहित चिन्तवन ... करें, तत्पश्चात् अवयव रहित ध्यान करें, फिर कम से चन्द्रमा समान प्रभावाला
वर्णमात्र (हकार) स्वरूप चितवन करें।
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अध्याय : पांचवां ]
बिन्दुहोनं कलाहीनं रेफद्विलयजितम् । । अनक्षर त्वमापन्न मनुच्चार्य च चिन्तयेत् ।।४७८।।
तत्पश्चात् इस मंत्रराज का बिन्दु (अनुस्वार) रहित, कला (अर्द्ध चन्द्राकार) रहित, दोनों रेफ (र) रहित, अक्षर रहितता को प्राप्त, तथा उच्चार करने योग्य . न हो ऐसा क्रम में चितवन' करे। ....
चन्द्रलेखास सूक्ष्म स्फुरन्तं भानु भास्वरम् । अनाहताभिधं देवं दिव्यरूपं विचिन्तयेत् ॥४७६।।
चन्द्रमा की रेखा समान सूक्ष्म और सूर्य सरीखा देदीप्यमान, स्फुराअमान होता हुग्रा तथा दिव्य रूप का धारक ऐसा जो अनाहत नाम का देव है, उसका चिन्तवन करें।
अस्मिंस्थिरी कृताभ्यासाः सन्तः शान्ति समाश्रिताः। अनेन दिव्य पोतेन तीवा जन्मोग्र सागरम् ॥४८०॥
इस अनाहत नामा देव में किया है स्थिर अभ्यास जिन्होंने, ऐसे सत्पुरुष इस दिव्य जहाज के इस संसार रूप धोर समुद्र को तिर कर, शान्ति को प्राप्त हो
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इस चितवन का अन्य प्रकार-----
तदेव च पुनः सूक्ष्म क्रमाद्वालाग्रसन्निभम् । ध्याये देकानतां प्राप्य कत्तुं चेतः सुनिश्चलम् ॥४८१॥
और फिर एकाग्रता को प्राप्त होकर, चित्त को स्थिर (निश्चल) करने के लिए उस ही अनाहत को अनुक्रम से सूक्ष्म ध्याता हुआ बाल के अग्रभाग समान न्यावें। . ततोऽपि गलिता शेष विषयीकल मानसः ।
अध्यक्ष मीक्षते साक्षाज्जगज्ज्योतिर्मयं क्षणे ।।४८२॥
उसके पश्चात् गलित हो गये हैं समस्त विषय जिसमें, ऐसे अपने मन को स्थिर करने वाला योगी क्षण में ज्योतिर्मय साक्षात् जगत को प्रत्यक्ष अवलोकन ... करता है।
सिद्धयन्ति सिद्धयः सर्वा अणिमाद्या न संशयः । सेवां कुर्वन्ति दैत्याधा प्राजेश्वयं च जायते ॥४८३॥ ..
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२६२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि इस अनाहत मंत्र के ध्यान से ज्यानी के अगिमा आदि सर्व सिद्धियाँ होती हैं, और दैत्यादिक सेवा करते हैं तथा अाज्ञा और ऐश्वर्य होता है, इसमें संदेह नहीं है।
क्रमाच्याव्य लक्ष्येभ्यस्ततोऽलक्ष्ये स्थिरं मनः । ___ दधतोऽस्य . स्फुरत्यन्त ज्योतिरत्यक्ष मक्षयम् ।।४८४॥
तत्पश्चात् क्रम से लक्ष्यों (लखने योग्य बस्तुओं) से छुड़ा कर, अलक्ष्य में अपने मन को धारणा करते हुए ध्यानी के अन्तरंग में अक्षय इंद्रियों के अगोचर ज्योति अर्थात् ज्ञान प्रकट होता है ।
इति लक्ष्यानुसारेण लक्ष्याभावः प्रकीर्तितः । तस्मिस्थितस्य मन्येऽहं मुनेः सिद्ध समीहितम् ॥४८५॥
इस प्रकार लक्ष्य के अनुसार लक्ष्य का प्रभाव कहा गया; सो, प्राचार्य महाराज उत्प्रेक्षा से कहते हैं कि उस अलक्ष्य में स्थिर रहने वाले मुनि के वांछित कार्य : को मैं सिद्ध हुआ मानता हूँ।
एतत्तत्वं शिवाख्यं वा समालम्ब्य मनीषिणः । उत्तीर्ण जन्मकान्तार मनन्तं क्लेशसंकुलम् ।।४८६॥
इस अनाहत तत्व अथवा शिवनामा तत्त्व का अवलंबन करके मनीषि गण अनन्त क्लेश सहित संसार रूपी वन से पार हो गये; इस प्रकार मंत्रराज पीर अनाहत दोनों मंत्रों के ध्यान का विधान कहा । चित्र नं. १५. देखें ।। 'नौं कार के ध्यान का स्वरूप
स्मर दुःखानल ज्वाला-प्रक्षान्तेर्नवनीरदम् । प्रगम वाङ्गमान्यज्ञान प्रदीपं पुण्य शासनम् ॥४८७।।
हे मुने ! तू प्रणाम नामा अक्षर का स्मरण कर अर्थात् ध्यान कर, क्योंकि - यह प्राव नामा अक्षर दुःख रूपी अग्नि की ज्वाला को शान्त करने के लिए मेघ की
समान है तथा बाङमय (समस्त श्रुत) के प्रकाश करने के लिये दीपक है और पुण्य का शासन है। .
यस्माच्छब्दात्मकं ज्योतिः प्रसूतमति निर्मलम् । वाच्य वाचक . संबंधस्तेनैव परमेष्ठिनः ।।४८८।।
इस प्रणव से अतिनिर्मल शब्द रूपी ज्योति अधीन जान उत्पा हुआ है और परमेष्ठी का बाच्य वाचक संबंध भी इसी प्रणव से होला है अर्थात् परमेाली तो इस
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अध्याय : पांचवां ]
.. [ २६३ प्रणय का वाच्य और यह परमेष्ठी का वाचक है। .
हत्कञ्जकरिंगकासीनं स्वरव्यञ्जन वेष्टितम् । स्फीत मत्यन्तदुद्धपं देवदैत्येन्द्र पूजितम् ॥४८६।। प्रक्षरन्मूधिन. संकान्त चन्द्र लेखामृत प्लुतम् । . महाप्रभाव सम्पन्न कर्म कक्ष हुताशनम् ।।४६०॥ महात्तत्त्वं महाबीजं महामन्त्रं महत्पदम् । शरच्चन्द्र निभं ध्यानो कुम्भकेन विचिन्तयेत ॥४६१॥
ध्यान करने वाला संयमी हृदय कमल की कणिका में स्थिर और स्वर व्यञ्जन अक्षरों से बेढ़ा हुग्रा, उज्ज्वल, अत्यन्त दुर्वर्ष, देव और दैत्यों के इन्द्रों से पूजित तथा करते हुए मस्तक में स्थित चन्द्रमा की (लेखा) रेखा के अमृत से अाद्रित, महा प्रभाव सम्पन्न, कर्म रूपी वन को दग्ध करने के लिये अग्नि समान ऐसे इस महा तत्त्व, महाबीज, महातंत्र, महापद स्वरूप तथा शरद के चन्द्रमा के समान गौर वर्ण के बारक 'सो' को कु भक प्राणायाम से चितवन करें। विशेष विधान का प्रकार-----
सान्द्रसिदर वरणभं यदि वा विद्रमप्रभम् । चिन्त्यमानं जगत्सर्वं क्षोभ यत्यभिसंगलम् ॥४६२।। जाम्बूनदनिभं स्तम्भे विट्ठा कज्जलस्विषम् । ध्येयं वश्यादिके रक्तं चन्द्रामं कर्मशातने ।।४६३॥
यह प्राव अक्षर गहरे सिंदूर के वर्ण के समान अथवा मूंगे के समान चिन्त बन किया हुया मिले हुए जगत को क्षोभित करता है । तथा इस प्रणव को स्तंभन के प्रयोग में मुवर्मा के समान पीला चिन्तवन करें और द्वेप के प्रयोग में ऋज्जल के समान काला तथा वश्यादि प्रयोग में रक्त (लाल) वर्ण और कमो के नाश करने में चन्द्रमा के समान श्वेत वर्ण का ध्यान करें ।
इस प्रकार प्रगाव अर्थात् ॐ कार मन्त्र के ध्यान का विधान कह; अव पंच परमेष्ठी के नमस्कार रूप. मल के ध्यान का विधान कहते हैं । चित्र नं. १६ । पंच परमेष्ठि महामन्त्र का चिन्तवन- ... ... .
गुरु पञ्च नमस्कार लक्षरणं मंत्र मूजितम् । विचिन्तयेज्जगज्जन्तु . पवित्रीकरणक्षमम् ॥४६४।।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
पंच परमेष्ठियों को नमस्कार करने रूप है लक्षण जिसका, ऐसे महामंत्र का चितवन करें, क्योंकि यह नमस्कारात्मक मंत्र जगत के जीवों को पवित्र करने में समर्थ है।
स्फुरद्विमलचन्द्राभे दलाष्टक विभूषिते । कजे तत्करिणकासीन मन्त्रं सप्ताक्षरं स्मरेत् ।।४६५॥ दिग्दलेखु ततोऽन्येषु विदिक् पत्रमनुक्रमात ।
सिद्धादिकं चतुष्कं च दृष्टि बोधादिकं तथा ॥४६॥ - स्फुरायमान निर्मल चन्द्रमा की कान्ति समान पाठ पत्र से शोभित जो कमल
है, उसकी करिणका पर स्थित सात अक्षर के शामो मारहतारा' मंत्र का चिन्तवन करें । और उस कणिका से बाहर के पाठ पत्रों में से ४ दिशात्रों के ४ दलों पर गमो सिद्धा, गमो पाइरियाणं, गमो उवमायाणं, गामो लोए सव्वसाहणं, ये ४ मंत्र पद और विदिशाओं के चार पत्रों पर सम्यग्दर्शनाय नमः, सम्यग्ज्ञानाय नमः, सम्यक् चारित्राय नमः, सम्मक्तपसे नमः इन चार नमस्कार मंत्रों का चिन्तवन करें, इस प्रकार अष्टदल का कमल और एक कणिका में नव मंत्रों को स्थापन कर चिन्तवन
।
करें।
श्रियमात्यन्तिकी प्राप्ता योगिनो येऽत्र केचन । अमुमेव महामन्त्रं ते . समाराध्य · केवलम् ॥४६७॥. . ..
इस लोक में जिन कितने ही योगियों ने प्रात्यन्ति की लक्ष्मी (मोक्ष लक्ष्मी) को प्राप्त किया है, उन सबों ने एक मात्र इस महामन्त्र का प्राराधन करके ही प्राप्त किया है। ..
..
. प्रभावमस्य निःशेषं यौगिनामध्यगोचरम् । . .. . अनीभिज्ञो जनो ब्रूते यः स मन्येऽतिलादित ।।४६८11
इस महामन्त्र का पूर्ण प्रभाव योगी मुनीश्वरों के भी अगोचर है, उनके द्वारा
भी कहने में नहीं पाता और जो इसको नहीं जानने वाला पुरुष इसके प्रभाव को ...... कहता है, उसको मैं घायु रोग से प्रलाप करने वाला मानता हूँ।
अनेनैव . विशुद्धयन्ति जन्तवः पापपङ्किता। अनेनैव. विमुच्यन्ते भवक्लेशान्मनीषिणः ।।४६६॥ जो जीव पाप से मलिन हैं, वे इसी मन्त्र से विशुद्ध होते हैं और इसी मन्त्र
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षोडशाक्षरी ध्यान जप
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अध्याय : पांचवा ]
[ २६५ के प्रभाव से मनीषिगरण (बुद्धिमान्) संसार के क्लेशों से छूटते हैं। .. .
असावेव जगत्यस्मिन्मध्यव्यसन बान्धवः । . अमु विहाय सत्त्वानां नान्यः कश्चित्वत्कृपापरः ।।५.००॥
भव्य जीवों को आपदा के समय यही मन्त्र इस जगत में बांधव (मित्र) है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी जीवों पर कृपा करने में तत्पर नहीं हैं ।
भावार्थ :-सबका रक्षक यही एक महामन्त्र है। एतद व्यसन पाताले भ्रमत्संसार सागरें । अनेनैव जगत्सवमुद्धत्य : बिघृतं शिवे ॥५०१।।
प्रापदा अर्थात कष्ट ही है पातालगतै जिसमें ऐसे संसार रूपी समुद्र में ___ भ्रमते हुए इस जगत को इस मन्त्र ने ही उद्धार करके मोक्ष में धारण किया है।
कृत्वा पाप सहस्त्राणि हत्वा जन्तु शतानि च । अमु मन्त्रं समाराध्य लियञ्चोऽपि दिवं गताः ॥५०२॥
पूर्व काल में हजारों पाप करके तथा सैकड़ों जीवों को मार कर तिर्यच्च भी इस महामन्त्र का शुद्ध भावों से प्राराधन करके स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं, उनकी कथा पुराणों में प्रसिद्ध है।
शतमष्टोत्तर चास्य त्रिशुद्धया चिन्तयन्मुनिः । भुजानोऽपि चतुर्थस्य प्राप्नोत्य विकलं फलम् ॥५०३॥
मन वचन काय को शुद्ध करके इस मन्त्र को एक सौ आठ बार चिन्तवन करें तो वह मुनि पाहार करता हुआ भी चतुर्थ कहिये एक उपवास के पूर्ण फल को प्राप्त होता है । चित्र नं० १७ । षोडशाक्षरी विद्या का ध्यान
स्मर पञ्च पदोद्भूतां महाविद्यां जगन्न ताम् । गुरु पञ्चक नामोत्थां षोडशाक्षर राजिताम् ।।५०४॥
हे मुने! तू सोलह अक्षरों से विराजमान जो महाविद्या है, उसका स्मरण कर अर्थात् ध्यान कर; क्योंकि पोड शाक्षरी विद्या पञ्च पदों और पंच परम • गुरु के नामों से उत्पन्न हुई है और जगत मात्र से नमस्कार करने योग्य है; वह सोलह अक्षरी विद्या यह है-अह सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यो नमः ।
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२६६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि अस्याः शतद्वयं ध्यानी जपन्न कानमावसः । अनिच्छन्नप्यवाप्नोति चतुर्थ तपसः फलम् ।।५०५॥
जो जीव षोडशाक्षरी विद्या का एकाग्र मन होकर, दो सौ बार जप करता है, वह नहीं चाहता हुआ भी चतुर्थ तप अर्थात् एक उपवास के फल को प्राप्त होता है । चित्र नं० १८ । षडाक्षरी विद्या का ध्यान
विद्यां षड्वर्ण सम्भूतामजय्यां पुण्य शालिनीम् । जपप्रागुक्तमायेति फलं ध्यानी शत त्रयम् ।।५०६।।
तथा "अरहन्त सिद्ध" इस प्रकार छह अक्षरों से उत्पन्न हुई विद्या का तीन सी बार जब करने वाला मनुष्य एक उपवास के फल को प्राप्त होता है, क्योंकि वह पडक्षरी विद्या जप्य है और पुण्य को उत्पन्न करने वाली तथा पुगम से शोभित है । चित्र नं. १६। चार अक्षर की विद्या का ध्यान--
चतुर्वर्णमयं मन्त्रं चतुर्वर्य फल प्रदम् । चतुः शतं जपन्योगी चतुर्थस्य फलं लभेत् ॥५.०७।।
"अरहंत" इन चार अक्षरों का मन्त्र है, सो धर्म अर्थ काम मोक्ष रूप फल को देने वाला है इसका जो चार सौ बार जप करता है, वह एक उपवास का फल पाता है। दो अक्षर वाली विद्या का ध्यान---
वर्णयुग्मं श्रुत स्कन्धसार भूतं शिवप्रदम् । ध्यायेज्जन्मोद्भवाशेषक्लेश . विध्वंसनक्षमम् ।।५०८।।
'सिद्ध' इन दो अक्षरों का युग्म है, सो. श्रुत स्कन्ध (द्वादशांग शास्त्र) का सार भूत है, मोक्ष को देने वाला है, संसार से उत्पन्न हुए समस्त क्लेशों को नाश करने में समर्थ है, इसलिये योगी इसका ध्यान करें। एक अक्षर का जाप---
अवर्णस्य सहस्त्रार्द्ध .. जपन्नानन्दसंभृतः । . . . . प्राप्नोत्येकोपवासस्यः निर्जरं निजिताशयः ॥५०॥ जो मुनि अपने चित्त को वश करके प्रानंद से 'अ' इस वणं मात्र का पांच
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अध्याय : पांचवां ]
[ २६७ सौ बार जप करता है। वह एक उपवास के निर्जरा रूप फल को प्राप्त होता है।
एतद्धि कथितं शास्त्रो रुचिमात्र प्रसाधकम् । किन्त्वमीषां फलं सम्यवस्वर्ग मोक्षक लक्षरगम् ॥५१०॥
यह जो शास्त्र में इन मन्त्रों का उपवास रूप फल कहा है सो केवल मन्त्र जपने की रुचि कराने के लिये है, किन्तु वास्तव में उक्त मंत्रों का उत्तम फल स्वर्ग
और मोक्ष ही है। पंचाक्षरी विद्या का ध्यान--
पञ्च वर्णमयीं विद्या पञ्च तत्त्वोपलक्षिताम् ।। मुनि थोरैः श्रुत स्कन्धा द्वाज बुद्धया समुद्धताम् ।।५११॥
पाँच तत्वों से युक्त, पांच अक्षर मयी विद्या को मुनिश्वरों ने द्वादशांग शास्त्र में से सारभुत समझ कर निकाली है। वह पंचाक्षर मयी विद्या "ॐहाँ ही हौं हः असि पा उ सा नमः' इस प्रकार है ।
अस्यां निरन्तराभ्यासा वशीकृत निजाशयः । .. प्रोचिन्नत्त्याशु निःशङ्को निगूढे जन्म बन्धनम् ।।५१२।।
इस पूर्वोक्त पंचाक्षरमयी विद्या में निरन्तर अभ्यास करने से वशीभूत कर लिया है, मन जिसने ऐसा मुनि निःशंक होकर अति कठिन संसार रूपी बन्धन को शीघ्र ही काट देता है। मगलोतमशरण पदों के ध्यान का फल--- . मङ्गल शरणोत्तम पद निकुरम्ब यस्तु संयमी स्मरति ।
विकलमे काग्रधिया . स चापवर्गश्रियं श्रयति ॥५१३॥
जो संयमी मुनि एकाग्र बुद्धि से मंगल, शरण, उत्तम इन पदों के समूह का म्भरमा करता है, वह भोक्ष लक्ष्मी का अाश्रय करता है । वह मंगलकारक उत्तम पदों
का समह यह है-~चत्तारि मंगलं । परन्त संगलं । सिद्ध मंगलं । साह मंगलं । ' केवलिपपरन्तो धम्मो . मंगलं । चत्तारि लोगुत्तमा । अरहन्त लोगुत्तमा । सिद्ध ‘लोगुत्तमा । साहू लोगुत्तमा । केबलिंपत्तो धम्मो लोगुत्तमा । चत्तारि सरणं
पन्बज्जामि । अरहते सरगं पव्वज्जामि । सिद्ध. सरणं पब्वजामि । साह सरणं. ....पव्य ज्जामि । केवलिपण्णत्तं धम्म सरंण पव्य ज्जामि ।
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२६८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि.. तेरह प्रक्षर वालो विद्या का ध्यान---
सिद्धः सौधं समारोढुमियं सोपान मालिका । त्रयोदशाक्षरोत्पन्ना विद्या विश्वाति शायिनी ।।५१४॥
जगत में अतिशय रूप तेरह अक्षरों से उत्पन्न हुई यह विद्या मोक्ष के महल पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों की पंक्ति है । वह. १३ तेरह अक्षर का मंत्र ॐ अहत् सिद्ध . ... सयोग केवली स्वाहा' इस प्रकार है ।
प्रसादयितुमुद्य क्त मुक्ति कान्तां यशस्विनीम् । दूतिकेयं मता मन्ये जगवन्य मुनीश्वरः ॥५१५॥
यश की धारक मुक्ति रूपी स्त्री को प्रसन्न करने के लिए उद्यमी हुये ऐसे तथा जगत् से पूज्य मुनीश्वरों ने इस तेरह अक्षरी विद्या को मुक्ति को प्रसन्न करने के अर्थ दूती माना है, ऐसा मैं मानता हूँ।
(चित्र नं. २०) नीचे लिखित विद्या का चिन्तवन का प्रभाव जो सप्ताक्षरमय है....
सकल ज्ञान साम्राज्य दान दक्षं विचिन्तय। . . . .. . मन्त्रं जगत्रयी-नाथ-चूडारत्नं कृपास्पदम् ।।५१६॥
यह मन्त्र सकल ज्ञान के साम्राज्य (केवल ज्ञान) के देखने में प्रवीरण है और जगत्त्रय के नाथों के चूड़ा रत्न समान है तथा कृपा का स्थान है, सो हे मुने, तू . चिन्तवन कर । वह मन्त्र---ॐ ह्रीं श्रीं अहँ नमः' है ।
न चास्य भवने कश्चित्प्रभाव गदित क्षमः । श्रीमत्सर्वज्ञ देवेन यः. साम्यमवलम्बते ॥५१७॥
इस मन्त्र का प्रभाव लोक में कोई भी कहने को समर्थ नहीं है, क्योंकि वह मन्त्र श्रीमत्सर्वज्ञ देव की समानता को धारण करने वाला है। (चित्र २१) · पंचाक्षरी विद्या का प्रभाव-... . . .... ...
- स्मरकर्म कलौघ ध्वान्त विध्वंस भास्करम् ।
पञ्च वर्ण मयं मंत्रे पवित्रं पुण्य शासनम् ।।५१८॥
हैं मुने, तू पंच अक्षरमयी जो मन्त्र है, उसे चिन्तवन कर; क्योंकि यह मन्त्र कर्म कलंकों के समूह रूप अंधकार का विध्वंस करने को सूर्य के समान है, पवित्र है ... ... और पुण्य शासन है । यह मन्त्र 'सामो सिद्धागा' यह है। (चित्र नं. २२ देखें)
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अध्याय : पांचवां ]
क्लेशसंतति काटने वाली विद्या और उसका प्रभाव--
सर्व सत्त्वाभयस्थानं वर्णमाला विराजितं । स्मर मंचं जगज्जंतुक्लेश संततिघातकम् ।।५१६।।
हे मुनि! तु समस्त जीवों का अभय स्थान तथा जगत के जीवों के क्लेश को सन्तति को काटने वाला और अक्षरों को पंक्ति से विराजमान ऐसे मन्त्र का चिन्तवन कर। वह मन्त्र यह है---ॐ नमोऽहते केवलिने परमयोगिनेऽनन्त शुद्धि परिणाम विस्फुर दुरु शुक्लध्यानाग्नि निर्दग्ध कर्म बीजाय प्राप्तानन्त चतुष्टयाय सौभ्याय शान्ताय मंगलाय वरदाय अष्टादश दोष रहिताय स्वाहा' । मुख कमल में मंत्र का ध्यान
स्मरेन्दु माण्डलाकारं पुण्डरीक मुखोदरे । दलाष्टक समासीनं वर्णाष्टक विराजितं ।।५२०॥
हे मुने! तू मुख में चन्द्र मण्डल के आकार का, आठ अक्षरों से शोभायमान, ग्राठ पत्रों का एक कमल चिन्तवन करे ।
ॐषमो अरहताणमिति धरानपि कमात् । एकशः प्रतिपत्रं तु तस्मिन्न व निवेशयेत् ॥५२१॥
'ॐ गामो अरहता' ये अाठ अक्षर मुख में स्मरण किये हुए उस कमल के पाठों पत्रों पर कम से एक-एक अक्षर का स्थापन कर ध्यान करना चाहिए ।
स्वर्णगौरी स्वरोद्भता केशरालों ततः स्मरेत् । कणिकां च सुधास्यन्द बिन्दु बज विभूषिताम् ॥५२२॥
तत्पश्चात् अमत के झरनों के बिन्दुओं से सुशोभित करिंगका का चिन्तवन. करे और उसमें स्वरों से उत्पन्न हुई तथा सुवर्ग के समान गौर वर्ण वाली केशरों की पंक्ति का ध्यान करे।
प्रोत्संपूर्ण चंद्राभं चंद्राबिम्बाच्छनैः शनः । . समागच्छत्सुबाबीजं माया वर्ण तु चिंतयेत् ।।५२३।।
पश्चात् उदय को प्राप्त होते हुये, पुर्ण चन्द्रमा के कान्ति समान, चन्द्रबिंव से मंद-मंद अमृत बीज को प्राप्त होते हुए माया वर्ण ह्रीं का चिन्तन करे। .. मायाबीज ही का ध्यान---..
विस्फुरन्तमति स्फीतं प्रभा मण्डल मध्यगम् । संचरन्तं मुखाम्भोजे तिष्ठन्तं करिणकोपरि ॥५२४।।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि भ्रमन्तं प्रतिपत्रेषु चरन्तं वियति क्षणे । छेदयन्तं मनोध्वान्तं स्त्रवन्त ममताम्बुभिः ।।५२५।।। व्रजन्तं तालुरन्ध्रय स्फुरन्तं ध्र लतान्तरे । ज्योतिर्मय मिवा चिन्त्य प्रभाव भावयेन्मुनिः ।।५२६॥
उपर्युक्त माया बीज ह्रीं अक्षर को स्फुरायमान होता हुआ, अत्यन्त उज्जवल प्रभा मंडल के मध्य प्राप्त हुआ, कभी पूर्वोक्त मुखस्थ कमल में संचरता हुआ तथा कभी-कभी उसकी करिंगका के उपरि तिष्ठता हुया, तथा कभी-कभी उस कमल के पाठों दलों पर फिरता हुअा तथा कभी-कभी क्षण भर में आकाश में चलता हुना, . मन के अम्बान अंधकार को दूर करता हुना, अमृतमयी जल से चता हुया तथा तालुका के छिद्र से गमन करता हुआ तथा भौहों की लताओं में स्फुरायमान होता हुआ,... ज्योतिर्मय के समान अचिन्त्य है प्रभाव जिसका ऐसे माया वर्ण का चिन्तवन करे ।
वाक्यथातीत माहात्म्यं देव दैत्योरगाचितम् । विद्यार्णवमहापोतं विश्वतत्त्व प्रदीपकम् ।।५२७॥
इस मन्त्र का महात्म्य वचनातीत है, इसको देव दैत्य नागेन्द्र पूजते हैं तथा यह मन्त्र विद्यारूपी समुद्र के तिरने को महान् जहाज है और जगल के पदार्थों को दिखाने के लिए दीपक ही है ।
प्रमुमेव महामन्त्रं भावयन्नस्त संशयः । . अविद्या व्याल संभूतं विष वेग निरस्यति ।।५२६ ।।
इसी महामन्त्र का संशय रहित होकर ध्यान करने वाला मुनि विद्या रूपी सूर्य से उत्पन्न हुए विष के वेग को दूर करता है।
इति ध्यायन्नों ध्यानी तत्सलोनैक मानसः।. वाङ्मनोमल मुत्सृज्य श्रु ताम्भोधि विगाहतो ॥५२६॥
ऐसे पूर्वोक्त प्रकार इस मन्त्र का ध्यान करता हुया और उस ध्यान में ही लीन है, मन जिसका ऐसा जो ध्यानी है, वह अपने मन तथा वचन के मल को नष्ट करके श्रुत समुद्र में अवगाहन करता है अर्थात् शास्त्र रूपी समुद्र में तैरता है। .
तलो निरन्तरामासान्मासैः षभिः स्थिराशयः । मुखरन्ध्राद्वि निर्यान्तीं . धूमति प्रपश्यति ।।५३०।। __ तत्पञ्चात् वह ध्यान स्थिर चिन होकर निरन्तर प्रयास करने पर छह
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अध्याय : पांचवां ] महीने में अपने मुख में निकलती हई (धूम) धुओं की वत्तिका देखता है ।
लत्तः । संवत्सरं यावत्तथैवाभ्यस्यते यदि । प्रपश्यति महाज्वालां निःसरन्ती मुखोदरात् ।।५३१।।
तत्पश्चात् यदि एक वर्ग पर्यन्त उसी प्रकार अभ्यास करे तो मुख में से निकलती हुई महा अग्नि की ज्वाला को देखता है ।
ततोऽतिजात संवेगो निर्वेदालम्बितो वशी।
ध्यायन्पश्यत्य विश्रान्तं सर्वज्ञ मुख पडजम् ।।५३२॥ तत्पश्चात् अतिशय उत्पन्न हुआ है, धर्मानुराग जिसके ऐसा वैराग्यावलम्बित जितेन्द्रिय मुनि निरन्तर ध्यान करता-करता सर्वज्ञ के मुख कमल को देखता है ।
अथाप्रति हतानन्द प्रीरिपतात्मा जिलश्रमः । श्रीमत्सर्वज्ञ देवेशं प्रत्यक्षमिव वीक्षते ॥५३३१॥
यहां से वही ध्यानी अनिवारित अानंद से तृप्त है, अात्मा जिसका और जीता है दुःख जिसने ऐसा होकर श्रीमत्सर्वज देव का प्रत्यक्ष अवलोकन करता है।
सतिशय संपूर्ण दिव्यरूपोपालक्षितम् । कल्याणमहिमोपेतं सवसत्त्याभय प्रदम् ।।५३४।।
सर्वज्ञ को ध्यानी कैसे प्रत्यक्ष देखता है कि सर्व अतिशयों से परिपूर्ण दिव्य ... रूप से उपलक्षित पंच कल्याणक की महिमा सहित समस्त जीवों को अभयदान देने वाला है।
प्रभावलय मध्यस्थं भन्य राजीव रजकम् । ज्ञान लीलाधरं बोरं देवदेवं स्वयंभुवम् ॥५३५॥
प्रभावलय के बीच में स्थित हुए भव्यरूप कमलों को रंजायमान करने वाले, ज्ञान की लोला के धरने वाले, विशिष्ट लक्ष्मी वाले, देवों के देव स्वयंभू ऐसे सर्वज्ञ को साक्षात् देखता है।
ततो विधूत तन्द्रोऽसौ तस्मिन्संजातनिश्चयः । भवनम मपाकृत्य लोकानमधि रोति ।।५३६॥
तत्पश्चात् इस मन्त्र का ध्यान करने वाला मुनि प्रमाद को नष्ट करके तथा इस मंत्र में सर्वन के स्वरूप का निश्चय हो जाने पर संसार भ्रम को दूर करके लोक ..' के अग्रभाग मोक्ष स्थान का प्राश्रय करता है ।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि इस प्रकार मुख कमल में अटदल कमल में माठ अक्षरों को स्थापन करके कणिका के केशरों में सोलह स्वर स्थापन पूर्वक ह्रीं वर्ण का जो पूर्वोक्त प्रकार से "बान करे, उसका का महिना) वान किया : चित्र नं २३ । क्वी, विद्याका ध्यान किस प्रकार करना चाहिये ?
स्मर सकल सिद्ध विद्या प्रधानभूतां प्रसन्न गम्भीराम् । विद्य, बिम्ब निर्गतामिव क्षरत्सुधाी महाविद्याम् ।।५३७।।
हे मुने, तूं सकल सिद्ध विद्या का भी चितवन कर, क्योंकि वह विद्या प्रधान स्वरूप है, प्रसन्न है, गम्भीर है तथा चन्द्रमा के बिम्ब से निकली हुई के समान जो झरती हुई सुधा है, उससे अाद्रित है; ऐसी वह महाविद्या 'वीं' ऐसा अक्षर है।
अविचल मनसा ध्यायल्ललाट देशे स्थितामिमां देवीम् । प्राप्नोति मुनिरजस्त्रं समस्त कल्याण निकुरम्बम् ॥५३८॥
इस विद्या देवी को ललाट देश पर स्थित करके, निश्चल मन से निरन्तर ध्यान करता हुआ मुनि समस्त कल्याण के समूह को प्राप्त होता है।
अमृत जलधिगर्भात्रिः सरन्ती सुदीप्ता,
मलकतल गिषयां चन्द्रलेखां स्मरत्वम् । : अमृतकण विकीर्णा प्लावयन्ती सुधाभिः, परम पद धरित्र्यां धारयन्ती प्रभावम् ।।५३६।।
है मुनि, तू इस अमृत के समुद्र से निकलती हुई, भले प्रकार देदीप्यमान, ललाट देश स्थित, अमृत के कणों से बिखरी हुई और अमृत से प्राद्रित करती हुई, चंद्रलेखा का स्मरण कर; क्योंकि यह विद्या मोक्षरूपी पृथ्वी में अपने प्रभाव को धारण करने वाली है।
एतां विचिन्तयने व स्तिमितेनान्तरात्मना । जन्मज्वरक्षयं कृत्वा यासि. योगी शिवास्पदम् ।।५४०॥ .
' इस विद्या को पूर्वोक्त प्रकार से अपने निश्चल मन से ध्यान करता हा ध्यानी योगी संसाररूप ज्वर का क्षय करके मोक्ष स्थान को प्राप्त होता है ।
चित्र नं० २३-क देखें ।
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अध्याय : पांचवां ]
सप्ताक्षरीविद्या का स्मरण कैसे करें ?
यदि साक्षात्समुद्विग्नो जन्मदाबो
संक्रमात् ।
तदा स्मरादि मन्त्रस्य प्राचीनं वर्ण सप्तकम् ॥ ५४१ ||
[ २७३
हे मुने, जो तू संसाररूप अग्नि के तीव्र संक्रम ( संयोग ) से उद्वेगरूप हुआ है, ग्रंथांत् दुःखी हुआ है तो यदि मंत्र जो पंच नमस्कार मन्त्र है, उसके पहिले सात अक्षरों का ध्यान करं, वे सात अक्षर 'मो ग्रहंता' ये हैं | चित्र नं० २३ ख ।
प्रणव, शून्य तथा अनाहत ये तीन अक्षरों को कहाँ स्थापन कर ध्यान करना चाहियेयत्र प्रणवं शून्यमनाहतमिति त्रयम् ।
एतदेव विदुः प्राज्ञास्त्रैलोक्य तिलकोत्तमम् ॥५४२॥
जो इस प्रकरण में प्रणव और शून्य तथा अनाहूत ये तीन अक्षर हैं, इन
तीनों (ॐ ह् अ ) अक्षरों को ही बुद्धिमानों ने तीन लोक के तिलक समान कहा है । नासाग्रदेश संलीनं कुर्वन्नत्यन्त निर्मलम् |
:
ध्याता ज्ञानमवाप्नोति प्राप्यपूर्व गुरणाष्टकम् ।।५४३ ॥
इन तीन अक्षरों को नासिका के अग्र भाग में अत्यन्त लीन करता हुआ, व्यानी अणिमा महिमादिक ग्राठ ऋद्धियों को प्राप्त होकर तत्पश्चात् प्रति निर्मल ज्ञान ( केवलज्ञान ) को प्राप्त होता है ।
शङ्खदुकुन्द धवला ध्याता देवास्त्रयो विधानेन ।
जनयन्ति सर्व विषयं बोधं कालेन तद्धयानात् ॥ ५४४ ।।
पूर्वोक्त ये तीन देव (अक्षर) शंख के समान, कुन्द के पुप्प के समान तथा चन्द्रमा समान विधानपूर्वक ध्याये जायें तो इनके ध्यान से कितने ही काल में समस्त विषयों का ज्ञान करने वाला केवलज्ञान उत्पन्न होता है । चित्र नं० २४ ।
अंत में है हंसपद जिसके ऐसे प्रराव और मायाबीजों का ध्यान कहाँ करना चाहिये ? प्रणव युगलस्य युग्मं पार्श्वे माया युगं विचिन्तयति ।
भूर्द्धस्थं हंस पवं कृत्वा व्यस्तं वितन्द्रात्मा ॥। ५४५॥
ne युगल कहिये दो प्रकार का युग्म और दोनों तरफ दो माया युगल ह्रीं ह्रीं ऐसे और इनके उपर हंस पद रखकर, प्रमाद रहित होकर, ध्यानी भिन्न-भिन्न चितवन करे | यह मंत्र 'ह्रीं ॐ ॐ ह्रीं हंसः' ऐसा है ।
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२७४ ]
स्त्रों, बीज का कहां ध्यान करना चाहिये ?
[ गो. प्र. चिन्तामणि
ततो ध्यायेन्महाबीजं स्त्रीकारं छिन्नमस्तकम् । श्रायुतं दिव्यं विस्फुरन्तं, मुखोदरे ।।५४६ ॥
तत्पश्चात् महाबीज जो 'स्त्री' ऐसा अक्षर और छिन मस्तक अर्थात् जिस पर विन्दु ग्रनुस्वार नहीं है, उसको श्रनाहत सहित दिव्य मुख पर स्कुरायमान होता हुआ चितवन करें । चित्र नं० २५ ।
वर्द्धमान प्रभु के मूख से निकलने वाली कौन विद्या है ?
श्री वीर वदनोद्गीर्णा विद्यां चाचिन्त्यविक्रमाम् ।
कल्पवल्ली मिचिन्त्य फल संपादन वामाम्
और भी वीर वर्द्धमान भगवान के मुख से निकली हुई विद्या का चितवन करें कैसी है, वह विद्या ? ग्रचिन्त्य पराक्रम वाली और कल्पवेल के समान अचिन्त्य फल देने में समर्थ है। ऐसी विद्या "ॐ जोगे मत दे भव्ये भविस्से जिगपारिस्से स्वाहा " तत्पश्चात् ऐसा मंत्र है, ॐ ह्री स्वहं नमो नमो नमः" ऐसे अक्षर हैं ।
इस विद्या का ध्यान करने से क्या फल मिलता है ?
से पहले ह्रीं
विद्यां जपति य इमां निरन्तरं शान्त विश्वविस्पन्दः ।
अणिमादि गुणांलब्ध्वा ध्यानी शास्त्रात तरति ।। ५४८ ॥
जो ध्यानी शान्त वेग निश्चल होकर इस विद्या को निरन्तर जगता है, वह श्रणिमादिक गुणों को प्राप्त होकर, शास्त्र समुद्र के पार हो जाता है अर्थात् श्रुत केवली होता है 1
त्रिकाल विषयं साक्षाज्ज्ञान मस्योपजायते ।
'farara प्रबोधश्च सतताभ्यासयोगतः ॥१५४६॥
इस विद्या को ध्यान करने वाले के निरन्तर अभ्यास करने से समस्त तत्त्वों का ज्ञान और त्रिकाल विषयक साक्षात् जान कहिये केवलज्ञान उत्पन्न होता 1
• समस्त उपसर्ग हर विद्या के ध्यान का फल --
साम्यन्ति जन्तवः क्रूरास्तथान्ये व्यन्तरादयः । ध्यान विध्वंस कर्तारो येन तद्धि प्रपञ्च्यते ॥५५०॥
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श्रध्याव: पांचवां ]
[ २७५
व ध्यानी के उपसर्ग करते वाले क्रूर जनु वा ध्यान की नाश करने वाले व्यन्तरादिक जिस ध्यान से उपशमला को प्राप्त होते हैं, उस व्यान का विस्तार से वर्गान करते हैं ।
दिग्दलाष्टक सम्पूर्णे राजीवे सुप्रतिष्ठितम् । स्मरत्वात्मानमत्यन्त स्फुर ग्रीष्मार्क भास्करम् ।। ५५१ ।।
प्रणवाद्यस्य मन्त्रस्य पूर्वादिषु प्रदक्षिणम् । विचिन्तयति पत्रेषु वर्णकमनुक्रमात् ॥१५५२१।
सर्वाशासन्मुखः परम् ।
श्रधिकृत्य छदं पूर्व स्मरत्वष्टाक्षरं मन्त्रं सहस्त्रकं शताधिकम् ।।५५३ ।। प्रत्यहं प्रतिपत्रेषु महेन्द्रा शाखनुक्रमात् ।
अष्ट रात्रं जपेद्योगी प्रसन्नांमल मानसः || ५५४ || तस्याचिन्त्य प्रभावेण क्रूराशय कलङ्किताः । त्यजन्ति जन्तवो दर्प मित्रस्ता इव द्विपा: ११५५५||
आठ दिशा सम्बन्धी ग्राउ पत्रों से पूर्ण कमल में भले प्रकार स्थापित और अत्यन्त स्फुरायमान ग्रीष्मऋतु के सूर्य के समान देदीप्यमान ग्रात्मा का स्मरण करे | are है, आदि में जिसके ऐसे मन्त्र को पूर्वादिक दिशाओं में प्रदक्षिणा रूप एक-एक पत्र पर अनुक्रम से एक-एक यक्षर का चिन्तवन करें। वे अक्षर “ॐ रामो अरहंताणं” ये हैं । इनमें से प्रथम पत्र को मुख्य करके सर्व दिशाओंों के सन्मुख होकर इस अष्टाक्षर मंत्र को ग्यारह सौ बार चिन्तवन ( ध्यान ) करें। इस प्रकार प्रतिदिन प्रत्येक पत्र में पूर्व दिशादिक के अनुक्रम से आठ रात्रि पर्यन्त प्रसन्न होकर जपे । उसके अचिन्त्य प्रभाव से क्रूरचित जीव सिंह से भयभीत होकर जिस प्रकार हाथी गर्व छोड़ देते हैं, उसी प्रकार अपना गर्व छोड़ देते हैं ।
प्रणवर्जित सप्ताक्षरी विद्या और उसके ध्यान का फल -
अष्टरात्रे व्यक्तिन्ते कमलस्यास्पदत्तिनः । निरूपयति पत्रेषु वर्णानेताननुक्रमात् ।। ५५६।। श्रालम्ब्य प्रक्रियामेना पूर्व विघ्नोपशान्तये । पश्चात्सप्ताक्षरं मन्त्रम् ध्यायेत्प्रणव वर्जितं ।। ५५७ ॥
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[गो. प्र. चिन्तामणि मन्त्रः प्रणवपूर्वोऽयं निश्शेषाभीष्टसिद्धिदः । ऐहिकानेक कामार्थ मुक्त्यर्थ प्रणवच्युतः ॥५५८।।
तत्पश्चात् पूर्वोक्त पाठ रात्रियों के व्यतीत होने के पश्चात् इस कमल के पत्रों पर वर्तने वाले अक्षरों को अनुक्रम से निरूपरण' करके देखें। इस प्रकार इस प्रक्रिया को प्रथम विघ्न के समूह की श.न्ति के लिए प्रालंबन करके तत्पश्चात् प्रणवजित सात अक्षर स्वरूप "रामो अरहताएं" इस मन्त्र का ध्यान करे । जब इस मन्त्र को प्रगावपूर्वक ध्यावे, तब यह समस्त मनोवांछित सिद्धि का देने वाला है तथा इस लोक सम्बन्धी अनेक कार्यों के लिए है और प्रणवजित ध्यान करने से यह मन्त्र मुक्ति का कारण है । .
(चित्र नं. २६ देखें) जन्म समूह का नाश करने वाली विद्या का फल---
स्मर मन्त्रपदं बान्यज्जन्मसंघात घातकम् । रागाध नतमस्तोमप्रध्वंसर विमण्डलम् ॥५५६।।
अब कहते हैं कि है मुने, तू अन्य एक मन्त्र पद का स्मरण कर, क्योंकि वह .. मन्त्र जन्म समूह को घात करने वाला है और रागादिक रूप तीव अंधकार को नष्ट करने के लिए सूर्यमण्डल के समान है। वह मन्त्र 'श्रीमदृषभादि वर्द्धमानान्तेभ्यों नमः" ऐसा है। पाप भक्षिरिण विद्या और उसका प्रभाव
मनः कृत्वा सुनिष्कम्पं तां विद्यां पापभक्षिणीम् । स्मर सत्त्वोपकाराय या जिनेन्द्रः प्रकीर्तिता ॥५६॥
तत्पश्चात् हे मुने, तु निश्चल मन से उस पापभक्षिरगी विद्या का स्मरण कर, .. जिसको कि समस्त जीवों के उपकारार्थ श्री जिनेन्द्र भगवान ने कही है। वह विद्या यह है “ॐ अईन्मुख कमलवासिनि पापात्मक्षयंकरि शुतज्ञान ज्वाला सहस्र प्रज्वलिते सरस्वति मत्पापं हन हन दह दह क्षा क्षीं थू क्षः क्षीरबर धवले अमृतसंभवे व वं हूं हूँ स्वाहा' । ये पाप भक्षिणी विद्या के अक्षर हैं। ...
चेतः प्रसत्तिमाधत्ते पापपङ्कः प्रलीयते । प्राधिर्भवति विज्ञानं मुनेरस्याःप्रभावतः ॥५६१॥ .
इस पापक्षिणी विद्या के प्रभाव से मुनि का चित्त प्रसन्नता को धारण करता है, पाप रूपी पंक प्रलय हो जाता है और विशिष्ट ज्ञान प्रकट होता है । ...
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अध्याय : पांचवां ।
[ २७४ मुनिभिः संजयन्ताद्य विद्या वादात्समुद्धतम् । भुक्ति मुक्तः परं धाम सिद्ध चकाभिधम् स्मरेत् ।।५६२।। तस्य प्रयोजक शास्त्रम तदाश्रित्योरदेशतः । ध्येयम् मुनीश्चरं जन्म महाव्यसन शान्तये ॥५६३॥
तत्पश्चात् सिद्धचक्र नामा मंत्र को संजयन्तादिक महामुनियों ने विद्यानुवाद नामा दशम पूर्व से उदृत किया है, सो यह मन्त्र भोग और मोक्ष का उत्कृष्ट वाम है, इसका ध्यान करे। इस सिद्धचक्र मन्त्र के प्रयोजक शास्त्र का आश्रय लेकर उसके उपदेश से जन्मरूप महाकष्ट की शान्ति के लिए मुनीश्वरों को ध्यान करना चाहिये ; इसके अक्षरादिक का विधान उसके प्रयोजक शास्त्र से जानना । असि पाउसा, विद्या का ध्यान--
स्मर मन्त्र पदाधीशम् मुक्ति मार्ग प्रदीपकम् । ... नाभि पङ्खाज संलोन भवर्ण विश्वतोमुखं ॥५६४॥ . सिवर्ण मस्तकाम्भोजे साकारं मुखपङ्कजे । श्राकारं कण्ठकजस्थं स्मरोकारं हृदि स्थितम् ॥५६॥
हे मुने! तू मन्न पदों का स्वामी और मुक्ति के मार्ग को प्रकाश करने वाले अकार अक्षर को नाभिकमल में चिन्तवन कर, यह अक्षर सर्वव्यापी है; और 'सि' अक्षर को मस्तक कमल पर, 'या' अक्षर को कंठस्थ कमल में, 'उ' अक्षर को हृदय कमल पर, और 'सा' अक्षर को मुखस्थ कमल पर ऐसे 'न सि आ उ सा' इन पाँच अक्षरों को पांच स्थानों पर चिन्तवन कर ।।
(चित्र नं. २८ देखे) सर्व कल्याण बीजानि बीजान्यन्यान्यपि स्मरेत् । यान्याराध्य शिवं प्राप्ता योगिनः शीलसागराः ।।५६६।।
सर्व कल्याण के वीज अन्यान्य भी मंत्र हैं, जिनका पाराधन करके शील के सागर योगी गरण मोक्ष को प्राप्त हुये हैं, उन सब ही अक्षरों को ध्यानी मुनि चिन्तवन करे । “नमः सर्व सिद्ध भ्यः' यह भी एक मन्त्र पद है। .. (चित्र नं. २१ देखें)
श्रत सिन्धु समुद्भूत मन्यद्वा पदमक्षरम् । तत्स मुनिभिध्ययं स्यात्पदस्थ प्रसिद्धये ॥५६७॥
अन्य भी पद या अक्षर जो श्रुत समुद्र द्वादशांग शास्त्र से उत्पन्न हुए हैं, बे सब ही पदस्थ ध्यान की प्रसिद्धतार्थ होते हैं उन्हें भी मुनिगुणों को ध्यान गोचर
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२७८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि करना चाहिये।
एवं समस्तवर्णषु मत्र विद्या पदेषु च । काय क्रमेण विश्लेषो लक्ष्य भाव प्रसिद्धये ॥५६८।।
इस प्रकार समस्त अक्षरों में तथा मन्त्र पद और विद्या पदों में अनुक्रम में लक्ष्य भाव की प्रसिद्धता के लिए भेद करना अर्थात् भिन्न भिन्न चिन्तवन करना चाहिये।
अण्यद्याच्छु त स्कन्ध बीजं निर्वेदकारणं ।। तत्तद्धग्रायन्नसौ ध्यानी नापवर्ग पथि स्खलेत् ॥५६॥
अन्य जो जो द्वादशांग शास्त्र के बीजाक्षर हैं तथा बैराग्य के कारण हैं, उन उन मंत्रों का ध्यान करता हुआ मुनि मोक्ष मार्ग में गमन करता हृया डिगता नहीं। भावार्थ-ओ ज्ञान वैराग्य के कारण मन्त्र; पद वा बीजाक्षर हैं, वे सब ही मोक्ष मार्ग में ध्यान करने योग्य (ध्येय) हैं ।
ध्येयं स्याद्वीत रागस्य विश्ववर्त्यथ संचयम् । तद्धर्मव्यत्यया भावान्माध्यस्थ्यमधितिष्ठतः ।।५७०।।
जो वीतराय है, उसके इस लोक में प्रवर्त्तन वाले समस्त पदार्थों के समूह ध्येय हूँ, क्योंकि वीतराग उस पदार्थ के स्वरूप में विपरीतता के प्रभाव से मध्यस्थता का आश्रय करता है । भावार्थ---वीतराग के ज्ञान में जो ज्ञेय आता है, उसका स्वरूप . यथार्थ जानने के कारण उसके इष्ट अनिष्ट ममत्व भाव नहीं होते; इस कारण उनसे मध्यस्थ भाव रहता है, अर्थात् वीतरागता से नहीं डिगते ।।
वीतरागो भवयोगी यत्किञ्चिदपि चिन्तयेत् । तदेव ध्यान माम्नातमतोऽन्यद् ग्रन्थ विस्तरः ॥५७१।।
वीतराग योगी जो कुछ चिन्तवन करे, वही ध्यान है, इस कारण अन्य कहना बह ग्रन्थ का विस्तार मात्र है, वीतराग के सब ही ध्येय हैं ।
वीतरागस्य विज्ञेया ध्यान सिद्धिध्वं मुनेः । . क्लेव एव तदर्थ स्याद्रागार्तस्येह देहिनः ।।५७२॥
जो मुनि वीतराग है, उसके ध्यान की सिद्धि अवश्य होती है और जो राग से पीड़ित है उसका ध्यान करना क्लेश के लिये ही है अर्थात रागी के ध्यान की सिद्धि नहीं होती।
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[ २७६
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करे सर्वथा वीतराग तो सर्व मोह का प्रभाव होने से होता है; उसके ध्यान करने की इच्छा ही नहीं होती श्रीर जो इच्छा होती हैं, तो वह वीतराग कैसे हो ? उसका समाधान यह है कि यहां पर राग संसार देह भोग संबन्धी है, उसकी पेक्षा वीतराग कहा है, ध्यान से राग करने को रांग नहीं कहा जाता क्योंकि ध्यान राग का अभाव करने वाला हैं, इस रोग से भी मुनि के रांग नहीं है, इस कारण वीतराग ही कहा जाता है। परमार्थ अपेक्षा यह एकदेश सर्वदेश का व्यवहार जानना ।
अध्याय : पांचवां
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चन्द्रोदये ।
तसिन्धु मुन्नतधियः श्रीवीर तस्वान्येव समुद्धरन्ति मुनया यत्नेन तान्येतानि हृदि स्फुरन्ति सुभगन्यासानि भव्यात्मनां ।
रत्नान्यतः ॥
ये वाञ्छन्त्यनिशं विमुक्तिललानासम्भोग संभावनाम् ॥१५७३॥
श्री वीर वर्तमान स्वामी रूप चन्द्र के उदय होते हुए जो उन्नत बुद्धि मुनि हैं, वे शास्त्र रूपी समुद्र को मथकर सुन्दर है रखना जिनकी ऐसे मंत्र रूप तत्वों ( रत्नों) को निकालते हैं और ये सब मंत्र पदरूप रत्न मुक्ति रूपी स्त्री के संभोग की निरंतर वांला करने वाले भव्य पुरुषों के ही हृदय में स्फुरायमान होते हैं ।
भावार्थ :-- जो मुक्ति चाहने वाले हैं, वे इन मंत्र रूप पदों का अभ्यास
करें ।
विलानाशेष कर्माणं स्फुरन्तमति
निर्मलम् । स्वं ततः पुरुषाकारं स्वाङ्गगर्भगतं स्मरेत् ।। ५७४ ॥ ॥
इन मंत्र पदों के अभ्यास के पश्चात् विलय हुए हैं । समस्त कर्म जिसमें ऐसे निर्मल स्फुरायमान अपने यात्मा को अपने शरीर में चिन्तवन ( ध्यान ) करें ।
भावार्थ :--- इन मंत्र पदों के अभ्यास से विशुद्धता बढ़ती है और चित्त एकाग्र हो जाने पर शुद्ध स्वरूप का निर्मल प्रतिभास होता है और उस स्वरूप में उपयोग स्थिरता को प्राप्त होता है तथा संवर होता है और कमों की निर्जरा होती है, तथा वाति कर्मों का नाश करके केवल ज्ञान को प्राप्त हो मोक्ष को पाता है ।
इस प्रकार यह मंत्र पत्रों का ध्यान मोक्ष का महान् उपाय है और लौकिक प्रयोजन भी इससे अनेक प्रकार के सिद्ध होते हैं। अणिमा महिमादिक ऋद्धियां प्राप्त होती हैं, परन्तु मोक्ष के इच्छुक मुनियों को इनसे कोई प्रयोजन नहीं है ।
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२८० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि यहाँ कोई पूछे कि गृहस्थ इन मंत्रों का ध्यान करें कि नहीं ? "उसका समावान यह है कि जैसा ध्यान मुनि के होता है, जैसा गृहस्थ के होता ही नहीं, परन्तु जो अपनी शक्ति के अनुसार धर्मार्थी होकर ध्यान करे तो शुभ फल की प्राप्ति होती है; लौकिक प्रयोजन विषय कपाय साधने के लिये आकर्षण विद्वेषण उच्चाटन मारण यादि के लिये ध्यान करने का मोक्ष मार्ग में निषेध किया है।
चित्र नं० ३० का ध्यान ।
मैं उस चौकी पर बैठा विचारता हूं कि मेरे नाभि स्थान पर सोलह पत्तों का श्वेत रंग का कमल खिला हुआ है । उस कमल में हीं, माया बीज स्थापन है । वह कमल बहुत विस्तार में फैला है, तथा जो शुद्ध और साफ है। मैं अपनी ज्ञान दृष्टि उस पर जमाता हूं ऐसा विचार करें ।
चित्र नं० ३१ देखे ।
ध्यानी विचार करे की मेरे हृदय में ग्राठ पांखुड़ी के कमल की रचना है, प्रत्येक पांखुडी पर वारा वारा विन्दु लगे हुवे हैं और बारह बिन्दु मध्य की कणिका पर लगे हुए हैं । इस प्रकार बिन्दु सहित कमल का विचार करके फिर प्रत्येक पाखुडी की प्रत्येक बिन्दु पर एमोकार मंत्र का जप करे । इस प्रकार चिन्तवन करने. से मन की एकाग्रता होती है ।
रूपस्थ ध्यान का वर्णन
रूपस्थ ध्यान का स्वरूप ----
परमेश्वरम् ।
स्वयम्भुवम् ।।५७५ ।। लक्षितम् ।
शेखरम् ॥१५७६ ।।
श्रार्हस्य महिमोपेतं सर्वज्ञ ध्यायेद्दवेन्द्र चन्द्रार्क सभान्तस्थं सर्वातिशय संपूर्ण सर्वलक्षण सर्वभूत हिलं देवं शील शैलेन्द्र सप्त धातु विनिर्मुक्तं मोक्ष लक्ष्मी कटाक्षितम् । अनन्त महिमा धारं सयोगि परमेश्वर ।। ५७७ ।। प्रचिन्त्य चरितं चारु चारित्रैः समुपासितम् । fafar नय निर्णीतं विश्वं विश्वेक बान्धवम् ॥१५७८ ॥ frea करण ग्रामं निषिद्ध विषय द्विषम् । ध्वस्त रागादि सन्तानं भवज्वलन वार्मुचम् ॥१५७६ ॥
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कमलधारणा (गो. प्र. चि. चित्र नं. ३७ }
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स्वर और व्यंजनों के पहले ॐ ह्रीं लगाकर ध्यान करे निश्चित ही मन एकाग्र होगा और कर्म निर्जरा होगी
. (गो. प्र. चि. चित्र नं. ३२) .
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प्रात्मा द्रव्य कर्म भाव कर्म नो कर्म से रहित
शुद्ध स्वरूप का ध्यान करे
(मो.प्र. त्रि. चित्र:
३३.)
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अध्याय : पांचवां ]
[ २८१ दिव्यरूप धरं धोरं विशुद्ध ज्ञान लोचनम् । अपित्रिदश योगीन्दैः . कल्पनातीत वैभवम् ॥५८०।।: . स्याद्वाद .पविनिर्घातभिन्नान्यमतभूधरम् । ज्ञानामृत पयः पूरेः . पचित्रितप्तगत्त्रयम् ११५८१॥ इत्यादि गणनातीत गुण रत्नमहार्णवम् ।
देव देवं स्वयम्वुद्ध स्मराध जिनभास्करम् ।।५८२॥
इस रूपस्थ ध्यान में अरहन्त भगवान का ध्यान करना चाहिये; जिममें घरहंत का किस प्रकार का स्वरूप चिन्तवन करना चाहिये सो कहते हैं—अरहन्तता की महिमा जो समवशरणादि की रचना है उस सहित, सर्वज्ञ, परमेश्वर, देवेन्द्र चन्द्रमा . मर्यादि को सभा के मध्य में स्थित, स्वयंभु । तथा समस्त अतिशयों से संपूर्ण, सव . लक्षणों से लक्षित, तथा जिनसे समस्त जीवों का हित होता है, ऐसे, और शील कहिये इत्तम गुण रूपी पर्वत के शिखर । तथा सप्त धातु से रहित और मोक्ष लक्ष्मी जिनको कटाक्ष पूर्वक देखती है ऐसे, अनन्त महिमा के अाधार सयोग केवली, परमेश्वर । तथा .. अचिन्त्य है चरित जिनका, और सुन्दर परित्र वाले गणधरादिक मुनिगुणों से सेवनीय .. तथा अनेक नयों से निर्णय किया है विश्व अर्थात् समस्त वस्तुओं का आकार स्वरूप अगत् जिन्होंने ऐसे, और समस्त जगत् के हितू । तथा इन्द्रियों के ग्रामों को रोकने वाले, विषय रूप शत्रुओं को निषेध कर देने वाले तथा रागादिक सन्तान का कर दिया है नाश जिन्होंने ऐगे, और संसार रूपी अग्नि के बुझाने को मेघ के समान। . तथा दिव्य रुप के धारक, धीर अर्थात् क्षोभ रहितं, निर्मल ज्ञान ही जिनके नेत्र हैं : से, देव और योगीश्वरों की कल्पना से प्रतीत है विभव जिनका ऐसे । तथा स्याद्वाद माप वन से खड़े हैं अन्य मत रूपी पर्वत जिन्होंने ऐसे, तथा ज्ञान रूप अमृत मय जन के प्रवाहों से पवित्र स्वरूप किया है तीन जगत जिन्होंने ऐसे, इनको आदि लेकर गणना से अतीत गुग्ण रूप रत्नों के महासमुद्र, देवों के देवं, स्वयं बुद्ध, जिनों के सूर्य, ऐसे श्री. ऋषभ देव सर्दन का हे मुने, तू चिन्तवन (ध्यान) कर ।
जन्म मृत्यु जरा कान्तं रागादिविष भूछितम् । . सर्व साधारण दोष रष्टादशभिरावृतम् ॥५८३॥ अनेक व्यसनोच्छिष्ट संयम ज्ञान विच्यतम् । . . . संज्ञा. मात्रेण केचिच्च सर्वज प्रतिपेदिरे ।।५८४॥
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२८२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
कई अन्य मति जन्म जरा मरण से व्याप्त रागद्वेषादि विष से मूर्च्छित सर्व साधारण मनुष्य के समान क्षुधा तृषा आदि १८ दोषों से ग्राच्छादित | Fee व्यसनों (कट पदार्थी ) कर सहित संगम और जान से रहित, ऐसे श्रात्मा को नाम मात्र से सर्वज मानते हैं
1
इतरोऽपि नरः षड्भिः प्रमाणे वस्तु संत्रयम् । परिच्छिन्दन्मतः कैश्चित्सर्वज्ञः लोऽपि नेक्ष (ष्य ) ते । ५८५ ॥ तथा कई ने १. प्रत्यक्ष, २. अनुमान, ३ उपमा ५ प्रर्थापत्ति और ६. प्रभाव, इन छः प्रमारणों से वस्तु के समूह को जानते हुए अन्य पुरुष को भी सर्वज्ञ माना है, सो वह भी सर्वज्ञ नहीं है ।
अतः सम्यक्स विज्ञेयः परित्यज्याभ्य शासनम् ।
युक्त्यागम विभागेन ध्यातु कामै मनीषिभिः ॥ ५८६ ॥
इस कारण जो सर्वज्ञ भगवान का ध्यान करने के इच्छुक बुद्धिमान् पुरुष है, उनको चाहिये कि अन्य मतों को छोड़कर, युक्ति और आगम से निर्णय करके सर्वज्ञ को सम्यक् प्रकार से निश्चय करें ।
युक्त्या वृषभ सेनाद्यं निद्व यासाधु वल्गितम् ।
यस्य सिद्धिः सतां मध्ये लिखिता चन्द्र मण्डले ।।५८७
जिस सर्वज्ञ की सिद्धि वृषभसेन आदि गणधर और आचार्यों ने युक्ति से साधु दुर्जनों के कथन का खंडन करके, सत्पुरुषों के बीच में निर्मल चन्द्र मण्डल में लिखी है ।
अनेक वस्तु संपूर्ण जगद्यस्य चराचरम् । स्फुरत्य विकलं बोध विशुद्धा वर्शमण्डले ।। ५८८ ॥ स्वभावजमसंदिग्धं निर्दोषं सर्व यस्य विज्ञानमत्यक्षं लोकालोकं
दोदितम् । विसर्पति ॥५८॥
यस्य विज्ञान धर्माशु-प्रभा प्रसर पीडिताः 1 क्षणादेव क्षयं यान्ति खद्योता इव दुर्नया: ॥५०॥
पाद पोठोकृता शेष त्रिदशेन्द्र सभाजिरम् । योगिग जगन्नाथं गुण रत्न महार्णवम् ॥५६.१.
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अध्याय : पांचवां ]
पवित्रित धरा पृष्ठं समुद्धत जगत्रयम् । मोक्ष मार्ग प्रणेतारमनन्तं पुण्य शासनम् ।।५६२॥ भामण्डल निरुद्धार्क चन्द्र कोटि समप्रभम् ।। शरण्यं सर्वग शान्तं दिव्यवासी विशारदम् ॥५६३।। प्रक्षोरंगशकुन्तेशं . सर्वाभ्युदय : मन्दिरम् । । दुःखार्णवप तत्सत्त्ववत्त हस्तावलम्बनम् ॥५६४॥ मृगेन्द्रविष्ट रारूढं मारमातङ्ग : घातकम् । इन्दुत्रय समोदामच्छत्र त्रय विराजितम् ॥५६५। हंसालीपातलीलाढय चाभर व्रज वीजितम् । वीत तृष्णं उगन्नार्थ बरदं विश्व रूपिरसम् ।५६६॥ दिव्य पुष्पानकाशोक राजितं राग वजिलम् । प्रातिहार्य महा लक्ष्मी लक्षितं परमेश्वरम् ।।५९७।। नव केवल लब्धि श्री संभवं स्वात्मसंभवम् । तुर्य ध्यान महावह्नौ हुत कमन्धनोत्करम् ॥५६८।। रत्नत्रय सुधास्यन्द मन्दीकृत भवनमम् । बीतसंग जितद्वतं शिवं शान्तं सनातनम् ॥५६६।। अर्हन्तमजमव्यक्तं . कामदं कामनाशकम् । पुरास पुरुषं देवं देव. देवं जिनेश्वरम् ।।६००। विश्वनेत्रं जगद्वन्ध योगिनाथं महेश्वरम् । ज्योति मय मवाद्यन्तं त्रातारं भुवनेश्वरम् ।६०१॥ योगीश्वरं लमीशानमादिदेवं जगदगुरुम् । . अनन्तमच्युतं शान्तं भास्वन्तं भूतनायकम् ॥६०२।। सन्मति सुगतं सिद्ध जगज्ज्येष्ठं पितामहम् । महावीरं मुनिश्रेष्ठं पवनं परमाक्षरम् ॥६०३।। सर्वज्ञं सर्वदं सर्वं बर्द्धमानं निरामयम् । .. नित्यमव्ययम व्यक्तं परिपूर्ण पुरातनम् ॥६०४॥ इत्यादि सान्वयानेक पुण्य नामोपलक्षितम् । स्मर सर्वगतं । देगं वीरममर नायकम् ॥६०५।।
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२८८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामपि
में
प्रवीरण है । इन
इन्द्रिय रूपी सर्पा
तथा दुःख रूप
प्राचार्य महाराज कहते हैं कि है मुने, तू आगे लिखे हुए प्रकार से सर्वज्ञ देव का स्मरण कर कि जिस सर्वज्ञ देव के ज्ञान रूप निर्मल दगा के मंडल में अनेक वस्तुत्रों से भरा हुया चराचर यह जगत प्रकाशमान है। तथा जिनका ज्ञान स्वभाव से उत्पन्न होता है, संशयादिक रहित निर्दोष है, सदाकाल उदय रूप है, तथा इंद्रियों का उल्लंघन करके प्रत्तने वाला है और लोका लोक में सर्वत्र विस्तरता है । तथा खद्योत ( जुगनू ) के समान जिसके विज्ञान रुप सूर्य की प्रभा से पीड़ित हुवे दुर्नय ( एकन्त पक्ष ) क्षण मात्र में नष्ट हो जाते हैं । तथा जिसने समस्त इंद्रों की सभा के स्थान को सिंहासन रूप किया है तथा योगी गणों से गम्य है, जगत का नाथ है, गुग्गा रुपी रत्नों का महान् समूह है । तथा पवित्र किया है. पृथ्वीतल जिसने, तथा उचरण किया है तीन जगत का जिसने ऐसा और मोक्ष मार्ग का निरुपण करने वाला है, अनन्त है और जिसका शासन पवित्र है तथा जिसने भामंडल से सूर्य को अच्छादित किया है, कोटि चन्द्रमा के समान प्रभा धारक है, जो जीवों को शरा भूत है, सर्वज जिसके ज्ञान की गति है, शान्त है, दिव्य वाणी को गरुड समान हैं, समस्त प्रभ्युदय का मंदिर है, जीवों को हस्तावलंबन देने वाला है 1 तथा सिंहासन पर स्थित है, घातक है, तथा तीन चन्द्रमा के समान मनोहर तीन छत्र सहित विराजमान हैं । तथा हंस पंक्ति के पड़ने की लीलापुर्ण चमरों के समूह से वीजित है, तृष्णा रहित है, जगत का नाथ हैं, वर का देने वाला और विश्व रूपी है। अर्थात् ज्ञान के द्वारा समस्त पदार्थों के रूप देखने वाला है। तथा दिव्य पुष्पवृष्टि, प्रानक अर्थात् दुदुभि बाजे तथा अशोक वृक्षों सहित विराजमान हैं, तथा राग रहित ( वीतराग ) है, प्रतिहार्य महालक्ष्मी से चिह्नित है, परम ऐश्वर्येकर के सहित (परमेश्र ) है । तथा १. अनंतज्ञान, २ दर्शन, ३. दान, ४ लाभ, ५. भोग, ६ उपभोग, ७ वीर्य, ८. क्षायिक सम्यक्त्व और चरित्र इन नव लव्धि रूपी लक्ष्मी की जिससे उत्पत्ति है, तथा अपने आत्मा से ही उत्पन्न है, और शुक्ल ध्यान रूपी महान अग्नि में होम दिया है कर्म रूपी इंधन का समूह जिसने ऐसा है । तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, . सम्यकं चरित्र रूप अमृत के भारतों से संसार के खेद को दूर करने वाला है, परिग्रह रहित है, जीत लिया है देस भाव जिसने ऐसा है कल्याण स्वरूप, शान्तरूप तथा सनाः तन अर्थात् नित्य रूप है । तथा ग्रहन्त है, श्रजन्मा है, अव्यक्त है अर्थात् इंद्रियगोचर नहीं हैं तथा कामंद ( मनोवांछित दाता) है काम का नाशक है, पुराण पुरुष है, देव
समुद्र में पड़ते हुए काम रूप हस्ती का
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अर्हन्त का ध्यान (यो प्र. चि. चित्र नं० ३४)
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(योः प्र.जि.चित्र. ३५)
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अध्याय : पांचवां ] है, देवों का देव है, जिनेश्वर है । तथा समस्त लोक को देखने वा दिखाने को नेत्र समान है जगत के वंदने योग्य है, योगियों का नाथ है, महेश्वर है, ज्योतिर्मय (ज्ञान प्रकाश .... . मय) है, आदि अन्त रहित है, सबका रक्षक है, तीन भुवन का ईश्वर हैं । योगोश्वर है, ईशान है, अादि देव है, जगद् गुरु है, अनन्त है, अच्युत है, शान्त है, तेजस्वी है, भूतनायक है, सन्मति है, सुगत है, सिद्ध हैं, जगत् में ज्येष्ठ है, पितामह है, महावीर है, मुनिश्रेष्ठ है, पवित्र है, घरमाक्षर है, सर्वन , सबका दाता है. सर्व हितरि है. वर्द्धमान है, निरामय (रोग रहित) है, नित्य है, अव्यय (नाण रहित) है, अव्यक्त है, परिपूर्ण है, पुरातन है - इत्यादिक. अनेक सार्थ पवित्र नाम सहित, सर्वगत, देवों का नायक, . सर्वज्ञ जो वीर तीर्थङ्कर है, उसका हे मुने ! तू स्मरण कर । ..... इस प्रकार दोप रहित, सर्वज्ञ देव, अरहत जिनदेव का ही ध्यान करना चाहिये; अन्यमति गुण रहित. दोष सहित को सर्वज्ञ कहते हैं, सो नाममात्र है, कल्पित है, वह सर्वज ध्यान करने योग्य नहीं है ।
अनन्यशरणं साक्षात्तत्सलीनेक मानसः । तत्स्वरूपमवाप्नोति ध्यानी तन्मयतां गतः ॥६०६।।
उपयुक्त सर्वज्ञदेव का ध्यान करने वाला ध्यानी अन्य शरण से रहित हो साक्षात् उसमें ही संलीन है, मन जिसका ऐसा हो, तन्मयता को पाकर, उसी स्वरूप को प्राप्त होता है।
यमाराध्य शिवं प्राप्ता योगिनो जन्म निस्पृहाः । यं स्मरन्त्यनिशं भव्याः शिवश्री संगमोत्सुकाः ॥६०७।। यस्य वागमतस्यकामासाद्य करिणकामपि । शाश्वते पथि तिष्ठन्ति प्रागिनः प्रास्तकल्मषाः ॥६०८॥
देव देवः स ईशानो भच्याम्भोजैक भास्करः । ... ध्येयः सर्वात्मनर वीरः निश्चलीकृत्य मानसम् ॥६०६॥
जिस सर्वज्ञदेव का पाराधन करके संसार से निःस्पृह मुनिगरा मोक्ष को प्राप्त हुए हैं, तथा मोक्ष लक्ष्मी के संगम में उत्सुक भध्यजीव जिसका निरन्तर ध्यान .. ! करते हैं । तथा जिनके वचनरूपी अमृत की एक करिएका मात्र को पाकर संसारी . . जीव कल्मष (मिथ्यात्व पापों) को नष्ट करके शाश्वत मोक्षमार्ग में तिष्ठते हैं । सो देवों का देव, ईशान, भव्यजीव रूप कमलों को प्रफुल्लित करने के लिए मूर्य समान ...
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[ गो. प्र. चिन्तामणि ऐसा श्री वीर जिनेन्द्र मन को निश्चल करके ध्यान करने योग्य (ध्येय) है; अन्य कल्पित ध्येय (ध्यान करने योग्य नहीं है।
तस्मिनिरन्तराभ्यास वशात्संजात निश्चलाः । सर्वावस्थासु. पश्यन्ति तमेव परमेष्ठिनम् ॥६१०॥
उस सर्वज्ञदेव के ध्यान में अभ्यास करने के प्रभाव से निश्चल हुए योगींगरण सर्व अवस्थाओं में उसी परमेष्ठी को देखते हैं ।
तदालम्ब्य परं ज्योतिस्तद गरण ग्रामरजितः । . अविक्षिप्तमना योगी तत्स्वरूप मुपाश्नुते ॥६११॥ . .
योगी (ध्यानी मुनि) उस सर्वज्ञदेव परम ज्योति का पालवन करके उसके .. गुगा ग्रामों में रंजायमान होता हुआ मन में विक्षेप रहित होकर उसी स्वरूप को प्राप्त होता है।
इत्थं तद्भावनानन्द सुधास्यन्दाभिनन्दितः। नहि स्वप्नाद्यवस्थासु ध्यायन्प्रच्यवते मुनिः ।।६१२॥
इस प्रकार उस सर्वज्ञ देव की भावना से उत्पन्न हुए आनन्दरूप ग्रंमृत के वेग से प्रानन्दरूप हुआ मुनि स्वप्नादिक अवस्थानों में भी ध्यान से च्युत नहीं होता।
तस्य लोकत्रयश्वयं ज्ञानराज्यं स्वभावजम् । ज्ञानत्रयजुषां मन्ये योगि नामप्य गोचरम् ।।६१३॥
जो उस सर्वनदेव के तीन लोक का ईश्वरत्व हैं, स्वभाव से उत्पन्न ज्ञान का राज्य है, वह मति श्रुत अवधि इन तीत ज्ञान सहित योगी मुनियों के भी अगोचर है, ऐसा मैं मानता हूं।
साक्षानिविषयं कृत्वा साक्ष चेतः सुसंयमी। नियोजयत्य विश्रान्तं तस्मिन्न व जगदगुरौ ।।६१४।।
यद्यपि सर्वज्ञ देव का रूप छद्मस्थ ज्ञानी के अगोचर हैं तथापि इन्द्रिय और मन को अन्य विषयों से हटाकर मुसंयमी मुनि निरन्तर साक्षात् उसी भगवान् के स्वरूप में अपने मन को लगाता है ।
सद्गुराग्राम . . .संलीन मानसस्तद्गताशयः । तभाब भांवित्तो योगी तन्मयत्वं प्रपद्यते ॥६१५॥ उस परमात्मा में मन लगावे तब उसके ही गलों में लीन चित्त होकर उसमें
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अध्याय : पांचवां
[ २८७
ही चित्त को प्रवेश कराके उसी भाव से भावित योगी मुनि उसी की तन्मयता को प्राप्त होता है।
यदाभ्यासवशात्तस्य तन्मयत्वं प्रजायते । तदात्मानमसौ ज्ञानी सर्वशीभूत मीक्षते ।।६१६॥
जव अभ्यास के वशं से उस मुनि के उस सर्वज्ञ के स्वरूप से तन्मयता उत्पन्न · होती हैं, उस समय वह मुनि अपने असर्वज्ञ प्रात्मा को सर्वज्ञ स्वरूप देखता है। .
एष देवः स सर्वज्ञः सोऽहं तद पता मतः । तस्मात्स एव नान्योऽहं विश्वदर्शोप्ति मन्यते ॥६१७॥ .
जिस समय सर्वेज स्वरूप अपने को देखता हैं, उस समय ऐसा मानता है कि यह वही सर्वज्ञदेव है, वहीं तत्स्वरूपता को प्राप्त हुअा मैं हूं, इस कारण वहीं सर्व का देखने वाला मैं हूं, अन्य मैं नहीं हूं, ऐसा मानता है ।
येन येन हि भावेन युज्यते यन्त्रवाहकः । तेन तन्मयतां याति विश्वरूपो मरिणर्यया ॥६१८।।
जिस-जिस भाव से यह यंत्र वाहक (जीव) जुड़ता है, उस-उस भाव से तन्मयता को प्राप्त होता है, जैसे निर्मल स्फटिक मरिण जिस वर्ण से युक्त होता है, वैसा ही वर्ण स्वरूप हो जाता है।
भव्यतैव हि भूतानां साक्षान्मुक्ते. निबन्धनम् । अतः सर्वज्ञता भध्ये भवन्ती नात्र शङ्कयते ॥६१६।।
अथवा इस प्रकार है कि जीवों के भन्यत्व भाव है सो साक्षात मुक्ति का कारण है, इस कारगा भव्य प्राणी में सर्वज्ञता होने में संदेह नहीं करना अर्थात् भव्य के निःसंदेह सर्वज्ञता होती ही है।
अयमात्मा स्वसामा द्विशुद्धयति न केवलम् । चालयत्यपि संकद्धो भुवनानि चतुर्दश ।।६२०॥
यह आत्मा अपने सामर्थ्य से केवल विशुद्ध ही नहीं होता है, किन्तु जो क्रोधरूप होता है तो चौदह भुवनों को (लोकों को भी चला देता है। भावार्थ-पात्मा की अचिन्त्य सामर्थ्य है कि जो पाप सर्वज्ञ के ध्यान से तन्मय होता है तो सर्वज्ञ हो जाता है और किसी समय यदि क्रोध से तन्मय हो जाय तो चौदह भुवनों को चला देता है। ..
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२८६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
त्रैलोक्यनन्दबीजं जनन जलनिधेर्यान पात्रं पवित्रं, लोकालोक प्रदीपं स्फुरद मलशरच्चन्द्र कोटि प्रभादयम् । कस्यामप्यग्र कोटी जगदखिलमतिक्रम्य लब्धप्रतिष्ठ देवं farastra शिवमजमनघं वीतरागं भजस्व ॥ ६२१॥ .
हे मुने, तू वीतराग देव का ही ध्यान कर कैसे हैं वीतराग भगवान ? तीनों लोकों के जीवों को आनन्द के कारण हैं, संसाररूप समुद्र के पार होने के लिये जहाज तुल्य हैं तथा पवित्र, अर्थात् द्रव्यभाव मल से रहित हैं तथा लोक-ग्रलोक के प्रकाश करने के लिये दीपक के समान हैं और प्रकाशमान तथा निर्मल ऐसे जो करोड़ शरद के चन्द्रमा उनकी प्रभा से अधिक प्रभा के धारक हैं तथा किसी मुख्य कोटि में समस्त जगत का उल्लंघन कर पाई है, प्रतिष्ठा जिन्होंने ऐसे हैं जगत के श्रद्वितीय नाथ हैं, शिवस्वरूप हैं, अजन्मा है, पापरहित हैं, ऐसे वीतराग भगवान का ध्यान करो |
. इस प्रकार रूपस्थ ध्यान का वर्णन किया । इसमें अरहन्त सर्वज्ञ सर्व अतिशयों से पूर्ण का ध्यान करना कहा है, उसी के अभ्यास से समय लोकर, उसके समान अपने आत्मा को ध्यावना, जिससे वैसा ही हो जाता है, इस प्रकार वर्णन किया । * रूपातीत ध्यान का वर्णन *
रुपातीत ध्यान किस प्रकार किया जाय ?
वीतरागं स्मरन्योगी वीतरागी विमुच्यते । रागी सराग मालम्व्यं क्रूरकर्माश्रितो भवेत् ॥ ६२२ ध्यान करने वाला योगी वीतराग का ध्यान करता हुआ वीतराग होकर कर्मों से छूट जाता है और रागी का लंम्बन करके ध्यान करने से रागी होकर क्रूर कमों के प्राश्रित हो जाता है, अर्थात् अशुभ कर्मों से मंत्र जाता है ।
मन्त्र मण्डल मुद्रादि प्रयोगंर्ध्यातुमुद्यतः ।
सुरासुरनरनातं क्षोभयत्यखिलं क्षरगात् ।। ६२३ ।।
यदि ध्यानी मुनि मन्त्र, मंडल, मुद्रादि प्रयोगों से ध्यान करने में उद्यत हो तो समस्त सुर, असुर और मनुष्यों के समूह को क्षण मात्र में क्षोभित कर सकता है। क्रस्याप्यस्य सामर्थ्यमचिन्त्यं त्रिदशैरपि ।
अनेक विक्रिया सार ध्यान मार्गावलम्बिनः ।। ६२४ ॥
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अध्याय : पांचवा ]
[ २८६ - अनेक प्रकार की विकिया रूप असार ध्यान मार्ग का अवलम्बन करने वाले क्रोधी के भी ऐसी शक्ति उत्पन्न हो जाती है कि जिसका देव भी चिन्तवन नहीं कर सकते।
बहूनि कर्माणि मुनिप्रवीर विद्यानुवादात्प्रकटी कृतानि । असंख्य भेदानि कुतूहलार्थ. कुमार्गकुध्यानगतानि सन्ति ।।६२५।।
ज्ञानी मुनियों ने विद्यानुवाद पूर्व से असंख्य भेद वाले अनेक प्रकार के विद्वेषरण उच्चाटन आदि कर्म कौतुहल के लिये प्रकट किये हैं, परन्तु वे सब कुमार्ग और कुध्यान के अन्तर्गत है।
असावनन्त प्रथितप्रभावः स्वभावतो यद्यपि यन्त्रनाथः । नियुज्यमानः स पुनः समाधौ करोति विश्वं चरणाग्रलीनम् ॥६२६॥
यद्यपि यह प्रात्मा स्वभाव से ही अनन्त और जगत्प्रसिद्ध प्रभाव का धारक है; फिर समाधि (ध्यान) में जोड़ा हुअा तो यह समस्त जगत को अपने चरणों में लीन कर लेता है ।
स्वप्नेऽपि कौतुकेनापि नरसद्धयानानि योगिभिः । सेव्यानि यान्ति बोजत्वं यतः सन्मार्गहानये ॥६२७॥
परन्तु योगी मुनियों को चाहिये कि असमोचीन ध्यानों को कौतुक से स्वप्न में भी न विचार; क्योंकि असमीचीन ध्यान सन्सार्ग की हानि के लिये बीज स्वरूप (कारण) है भावार्थ-खोटे ध्यान से खोटा मार्ग ही चलता है, इस कारण मुनि जनों को बुरा ध्यान कदापि नहीं करना चाहिये ।
सन्मार्गाप्रच्युतं चेतः पुनवर्षशतैरपि । शक्यले न हि केनापि व्यवस्थापयितुं पथि ।।६२८॥
खोटे ध्यान के कारण सन्मार्ग से विचलित हुए चित्त को फिर सैकड़ों वर्षों में भी कोई सन्मार्ग में लाने को समर्थ नहीं हो सकता; इस कारण खोटा ध्यान कदापि नहीं करना चाहिये।
असद्धयानानि जायन्ते स्वनाशायैव केवलम् । रागाद्यसद्ग्रहावेशात्कौतुकेन कृतान्यपि ॥६२६ ।।।
असमीचीन (खोटे) ध्यान कौतुक मात्र से किये हुये भी रागादि रूप खोटे ग्रहों के प्रांवेश से केवल अपने नाश के लिये ही होते हैं।
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२६० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि निर्भरानन्द सन्दोहपर संपादन क्षमम् । मुक्ति मार्ग मतिकम्य कः कुमार्ने प्रवर्त्तते ॥६३०॥
इस कारण अतिशय रूप प्रानन्द के समूह के स्थान को उत्पन्न करने में समर्थ ऐसे मोक्ष मार्ग (समीचीन ध्यान) को छोड़कर ऐसा कौन है जो कुमार्ग (खोटे ध्यान) में प्रवृत्ति करे, ज्ञानवान् तो कदापि नहीं करे ।
क्षुद्रध्यान पर प्रपञ्च चतुरा रागावलोद्दीपिताः, मुद्रामण्डल यन्त्र मन्त्र करणराराधयन्त्यादृताः । काम क्रोध वशीकृतानिह सुरान् संसार सौख्याथिनो, दुष्टाशाभिहताः पतन्ति नरके भोगातिभिर्वञ्चिताः ॥६३१॥
जो पुरुप खोटे ध्यान के उत्कृष्ट प्रपत्रों को विस्तार करने में चतुर हैं, बे इस लोक में राग रूप अग्नि से प्रज्वलित होकर मुद्रा, मंडल, यंत्र, मंत्र आदि साधनों के द्वारा काम, क्रोध से वशीभूत कुदेवों का आदर से आराधन करते हैं सो सांसारिफ सुख के चाहने वाले और दुष्ट आशा से पीडित तथा भोगों की पीड़ा से वंचित होकर वे नरक में पड़ते हैं, इस कारण कहते हैं कि-----
तद्धयेयं तदनुष्ठेयं तद्विचिन्त्यं मनीषिभिः । यज्जोब कर्म सम्बन्ध विश्लेषायैव जायते ॥६३२।।
वही बुद्धिमानों को ध्यान करने योग्य है और वहीं अनुष्ठान व चिन्तबन करने योग्य है, जो कि जीव और कर्मों के सम्बन्ध को दूर करने बाला हो; अर्थात् ।। जिस कार्य से कर्मों से मोक्ष हो, वही कार्य करना योग्य है ।
स्वयमेव हि सिद्धयन्ति सिद्धयः शान्तचेतसाम् ।
अनेक फल सम्पूर्ण मुक्ति मार्गावलम्बिनाम् ॥६३३॥ __जो मुनि शान्त चित हैं और मुक्ति मार्ग का अवलम्बन करने वाले हैं, उनके अनेक प्रकार के फलों से भरी हुई सिद्धियां स्वयमेव सिद्ध हो जाती हैं । भावार्थ समीचीन ध्यान से नानाप्रकार की ऋद्धियां विना चाहे ही सिद्ध हो जाती हैं। फिर खोटे प्राशय से खोटे ध्यान करने से क्या लाभ है ?
संभवन्ति न चाभीष्ट सिद्धयः क्षुद्रयोगीनाम् । भवत्येव पुनस्तेषां स्वार्थ भ्रंशोऽनिवारितः ॥६३४।।
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अध्याय : पाँचदां ]
[ २९१
जो खोटे ध्यान करने वाले क्षुद्र योगी हैं, उनको इष्ट सिद्धियां कदापि नहीं होतीं, किन्तु उनके उलटी स्वार्थ की अनिवार्य हानि ही होती है । सम्बन्ध निरपेक्षा मुमुक्षवः ।
भवभव
न हि स्वप्नेऽपि विक्षिप्तं मनः कुर्वन्ति योगिनः ।। ६३५ ।।
जो मोक्षाभिलाषी योगीश्वर मुनि हैं, वे जिससे संसार की उत्पत्ति हो ऐसे सम्बन्धों से निरपेक्ष रहते हैं, वे अपने मन को स्वप्न में भी चलेयमान नहीं करते हैं । भावार्थ — उनको किसी प्रकार की ऋद्धि प्राप्त हो, कोई देवता याकर उनकी महिमा करे तथा किसी को ऋद्धिवान् देखे तो भी वे मोक्ष मार्ग स कदापि अपने मन को च्युत नहीं करते हैं ।
रूपातीत ध्यान कैसे किया जाय ?
श्रथ रूपे स्थिरीभूत चित्तः प्रक्षीणविभ्रमः -
श्रमसंमजमव्यक्तं ध्यातुं प्रक्रमते ततः ॥६३६॥
इसके पश्चात् रूपस्थ ध्यान में स्थिरीभूत है, चित्त जिसका तथा नष्ट हो गये हैं विभ्रम जिसके, ऐसा ध्यानी अमूर्त, अजन्मा, इन्द्रियों से अगोचर ऐसे परमात्मा के ध्यान का प्रारम्भ करता है ।
चिदानन्दमयं शुद्धममूर्तं परमाक्षरम् । स्मरेद्यत्रात्मनात्मानं तद्रूपातीत मिष्येते ॥ ६३७।।
जिस ध्यान में ध्यानी मुनिं चिदानन्दमय, शुद्ध, मूर्त, परमाक्षर रूप आत्मा को ग्रात्मा से ही स्मरण करे, अर्थात् ध्यावे सो रूपातीत ध्यान माना गया है । वदन्ति योगितो ध्यानं चित्तमेवमनाकुलम् |
कथं शिवत्वमापन्नमात्मानं संस्मरन्मुनिः ।। ६३८ ॥
योगीश्वर चित्त के आकुलता रहित होने अर्थात् क्षोभरहित होने को ही ध्यान कहते हैं। तो कोई मुनि मोक्ष प्राप्त आत्मा का स्मरण कैसे करें ? भावार्थजब ध्येय और ध्यानी पृथक-पृथक हैं तो चित्त को क्षोभ अवश्य होगा । विवेच्य तद्गुणग्रासं तत्स्वरूपं निरूप्य च ।
अनन्यशरण ज्ञानी तस्मिन्न ेव लयं व्रजेत् ॥६३९॥
प्रथम तो उस परमात्मा के गुण समूहों को पृथक्-पृथक् विचारे और फिर उन गुणों के समुदाय रूप परमात्मा को गुण गुणी के प्रभिन्न भाव से विचारे और
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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SATTA
फिर किसी अन्य के शरण से रहित होकर ज्ञानी पुरुष उसी परमात्मा में लीन हो जावें । भावार्थ -- इस ध्यान में प्रथम तो गुरुग और गुणी का पृथक् रूप से विचार है, परन्तु अन्त में परमात्मा में लीन होने से ध्येय और ध्यानी पृथक् रूप न रहेंगे।
सद्गुण ग्राम सम्पूर्ण तत्स्वभावकभावितः । कृत्वात्मानं ततो ध्यानी योजयेत्परमात्मनि ॥६४०॥
परमात्मा के स्वभाव से एक रूप भावित अर्थात् मिला हुया ध्यानीमुनि उस " परमात्मा के गुण समूहों से पूर्णरूप अपने प्रात्मा को करके फिर उसे परमात्मा में योजन करे, ऐसा विधान है ।
द्वयोगु गर्मत साम्यं व्यक्ति शक्ति व्यपेक्षया । विशुद्धलरयोः स्वात्मतत्त्वयोः परमागमे ॥६४१॥
परमागम में विशुद्ध अर्थात् कर्म रहित और उससे इतर अर्थात् कर्म सहित इन दोनों स्वात्मतत्वों में शक्ति और व्यक्ति की अपेक्षा से गुणों से समानता मानी है। भावार्थ - जब शक्ति और व्यक्ति को भिन्न-भिन्न मानते हैं, तब तो कर्म रहित विशुद्ध श्रात्मा व्यक्तिरूप से परमात्मा है और कर्म सहित आत्मा शक्ति रूप से परमात्मा है। और यदि शक्ति और व्यक्ति को अभिन्न मानते हैं तो दोनों ही समान हैं ।
यः प्रमाणनयन स्वतत्वमबबुद्धयते । बुद्धयते परमात्मानं स योगी बीतविभ्रमः ॥६४२।।
जो मुनि प्रभाग और नयों के द्वारा अपने आत्मतत्व को जानता है, वहीं ... योगी बिना किसी सन्देह के परमात्मा को जानता है । भावार्थ - जब तक प्रमाण
और नयों का स्वरूप तथा इनके द्वारा आत्मा का स्वरूप न जाना जायगा तब तक कर्म सहित ही आत्मा शक्ति की अपेक्षा से कर्म रहित है, वह विरोध भी दूर न हो सकेगा; इन दोनों का विरोध दूर करने वाला स्याद्वाद है। इसलिए स्याद्वाद को समझ कर फिर यदि इन दोनों का विचार करते है, तो कोई विरोध नहीं रहता और - न भ्रम ही रहता है ।
व कर्म रहित परमात्मा का स्वरूप कहते हैं कि जिसके द्वारा यह योगी अपने आत्मा को रूपातीत ध्यान में चिन्तवन करे --
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अध्याय : पाँचवां ।
[ २६६ कर्मरहित परमात्मा का ध्यान कैसे किया जाय ?
व्योमाकारमनाकारं निष्पन्न शान्तमच्युतम् । . चरमाङ्गास्कियन्यून स्वप्रदेशने स्थितम् ।।६४३॥ लोकानशिखरसासीनं शिवीभूतमनामयम् । पुरुषाकारमापन्नमध्यमूतं च चिन्तयेत ।।६४४॥
आकाणा के आकार अर्थात् अमूर्त, अनाकार अर्थात् पुद्गल के आकार से रहित, निष्पन्न अर्थात् फिर जिसमें किसी प्रकार की हीनाधिकला न हो, शान्त अर्थात् क्षोभ रहित, अच्युत अर्थात् जो अपने रूप से कभी च्युत न हो, चरम शरीर से किंचित् न्यून अर्थात् जिस शरीर से मोक्ष हुया है, उस शरीर से नासिकादि रन्ध्र प्रदेशों मे हीन, अपने घनीभूत प्रदेशों से स्थित तथा लोकांकाश के अग्रभाग में स्थित, शिवीभूत अर्थात् पहिले अकल्याए रूप से अब कल्याण रूप हुए ऐसे, अनामय अर्थात् रोगादिक मे सर्वथा रहित और पुरुषाकार को प्राप्त होकर भी अमूर्त अर्थात् अकार तो पुरुष का है, परन्तु तो भी उसमें रूप-रस-गन्ध-स्पादिक नहीं है। ऐसे परमात्मा का ध्यान इस रूपातीत ध्यान में करे ।
निष्कलस्य विशुद्धस्य निष्पन्नस्य जगद्गुरोः। चिदानन्दमयस्योच्चः कथं स्यात्पुरुषाकृतिः ॥६४५.६॥
जो परमात्मा निष्कल अर्थात् देह रहित है, विशुद्ध अर्थात् द्रव्यभाव रूप दोनों मलों से रहित है, निष्पन्न अर्थात् जिसमें कुछ हीनाधिकता होने वाली नहीं है, जो जगत का गुरु है और जो चिदानन्द स्वरूप अर्थात् चैतन्य और प्रानन्द स्वरूप है, महान् है, ऐसे परमात्मा के पुरुषाकृति अर्थात् पुरुष का आकार कैसे हो सकता है ?
विनिर्गतमधूच्छिष्ट प्रतिमे मूषिकोदरे । यादग्गमन संस्थानं तदाकारं स्मरेद्विभुम् ।।६४६॥
जिससे मोम निकल गया है, ऐसी मूषिका के उदर में जैसा आकाश का नाकार है: तदाकार परमात्मा प्रभु का ध्यान करे । इसका दृष्टान्त क्या है ?
सर्वावयवसम्पूर्ण सर्वलक्षणलक्षितम् । विशुद्धादर्शसड कान्त प्रतिबिम्ब समप्रभम् ॥६४७॥
समस्त अवयवों से पूर्ग और समस्त लक्षणों से लक्षित ऐसे निर्मल दर्पण में पढ़ते हुए प्रतिविम्ब के समान प्रभा बाले परमात्मा का चिन्तवन करे। . .
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२९४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरि
भावार्थ - जैसे निर्मल दर्पण में पुरुष के समस्त अवयव और लक्षण दिखाई पड़ते हैं, उसी तरह परमात्मा के प्रदेश शरीर के श्रवयव रूप परिणत हैं और उनमें समस्त लक्षणों की तरह समस्त गुण रहते हैं ।
इत्यसौ सन्तताभ्यासवंशात्संजातनिश्चयः ।
अपि स्वप्नाद्यवस्थासु तमेवाध्यक्ष मोक्षते ॥ ६४८ ॥
इस प्रकार जिसके निरन्तर अभ्यास के वश में निश्चय हो गया है, ऐसा ध्यानी स्वप्नादिक अवस्था में भी उसी परमात्मा को प्रत्यक्ष देखता है । भावार्थ - दृढ़ अभ्यास से स्वप्नादिक में भी परमात्मा ही दिखाई पड़ता है ।
सोऽहं सकल वित्तार्थः सिद्धः साध्यो भवच्युतः ।
परमात्मा परं ज्योति विश्वदर्शी निरञ्जनः ॥ ६४६|| तदा निश्चशोऽनिलको
fararat freफुरत्युच्चैर्घ्यानिध्यात् विवर्जितः ||६५०।
पूर्वोक्त प्रकार से जब परमात्मा का निश्चय हो जाता है और दृढ़ अभ्यास से उसका प्रत्यक्ष होने लगता है, उस समय परमात्मा का चिन्तन इस प्रकार करे कि ऐसा परमात्मा में ही है, मैं ही सर्वज़ हूं, सर्व व्यापक हूँ, सिद्ध हूं, तथा मैं ही साध्य अर्थात् सिद्ध करने योग्य था; संसार से रहित परमात्मा, परम ज्योति स्वरूप, समस्त विश्व का देखने वाला मैं ही हूं, मैं ही निरञ्जन हूं, ऐसा परमात्मा का ध्यान करे; उस समय अपना स्वरूप निश्चल, अमूर्त अर्थात् शरीर रहित, निष्कलङ्क, जगत् का गुरु, चैतन्य मात्र और ध्यान तथा ध्याता के भेद रहित ऐसा अतिशय स्कुरायमान होता है ।
पृथग्भावमतिक्रम तथैक्यं परमात्मनि ।
प्राप्नोति स मुनि: साक्षाद्यथान्यत्वं न बुध्यते ६५१ ।।
यह मुनि जिस समय पूर्वोक्त प्रकार से परमात्मा का ध्यान करता है, उस समय परमात्मा में पृथक् भाव अर्थात् अलंगपने का उल्लंघन करके साक्षात् एकता को इस तरह प्राप्त हो जाता है कि जिससे पृथकूपने का बिल्कुल भाग नहीं होता । भावार्थ उन समय ध्याता और ध्येय में द्वैत भाव नहीं रहता ।
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निष्कलः परमात्माहं लोकालोकावभासकः ।
विश्वव्यापी स्वभावस्थो निकार परिवर्जितः । ६५२ ।।
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अध्याय : पांचवां ]
[ २६५
निष्कल अर्थात् लोक और लोक को देखने और जानने वाला, विश्व में व्यापक, स्वभाव में स्थिर समस्त विकारों से रहित ऐसा परमात्मा मैं हूँ ऐसा अन्य ग्रन्थों में भी अभेद भाव दिखाया है ।
इति विगल विकल्पं क्षोणरागादि दोषं, विदितसकल वेद्य व्यक्तविश्व प्रपञ्चम् 1: शिवमजनयद्य विश्व लोकंकनाथं,
परमपुरुषमुच्चे
र्भावशुद्धया भजस्व ॥ ६५३ ॥
यहाँ साचार्य विशेष उपदेश रूप प्रेरणा करते हैं कि हे मुने, इस प्रकार जिसके समस्त विकल्प दूर हो गए हैं, जिसके रागादिक सत्र दोष क्षीण हो गए हैं, जो जानने योग्य समस्त पदार्थों का जानने वाला है, जिसने संसार के समस्त प्रपञ्च छोड़ दिये हैं, जो शिव अर्थात् कल्याण स्वरूप अथवा मोक्ष स्वरूप है, जो ग्रेज प्रर्थात् जिसको ग्रागे जन्म मरण नहीं करना है, जो अनयद्य सर्थात् पापों से रहित है तथा जो समस्त लोक का एक अद्वितीय नाथ है, ऐसे परम पुरुष परमात्मा की भावों की शुद्धतापूर्वक अतिशय करके भज | भावार्थ- शुद्ध भावों से ऐसे परम पुरुष परमात्मा का ध्यान
कर |
इस प्रकार रूपातीत ध्यान का निरूपण किया। इसका संक्षेप भावार्थ यह है कि जब व्यानी सिद्ध परमेष्ठी के ध्यान का अभ्यास करके शक्ति की अपेक्षा से आपको भी उनके समान जानकर और आपको उनके समान व्यक्तरूप करने के लिये उस (आप) में लीन होता है, तब थाप कर्म का नाश कर व्यक्त रूप सिद्ध परमेष्ठी होता है ।
* धर्मध्यान का फल वर्णन *
ध्यान का विशेष फल -
प्रसीद शान्ति व्रज सन्निरुद्धयतां दुरन्तजन्मज्वर जिह्नितं मनः । श्रगाधजन्माण व पारवत्तनां यदि श्रियं वाञ्छसि विश्व दर्शिनाम् ||६५४।।
हे ग्रात्मन् यदि तू अगाध संसाररूपी समुद्र के पावर्त्ती और समस्त लोका लोक के देखने वाले ऐसे अरहन्त और सिद्ध भगवान् की लक्ष्मी की इच्छा करता है तो प्रसन्न हो, प्रान्तता धारण कर और दुरन्त संसाररूप ज्वर के मूर्च्छित मन को वश कर
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२३६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
भावार्थ - प्राचार्य का उपदेश है कि यदि तू ध्यान करना चाहता है तो प्रथम ही अपने मन को वश में कर और शान्तभाव धारण कर ।
यदि रोड न शक्नोति तुच्छवीर्यो मुनिर्मनः ।
तदा रागेतरध्वंसं कृत्वा कुर्यात्सुनिश्चलम् ||६५५ ।।
और तुच्छवीर्य मुनि अर्थात् सामर्थ्यहीन मुनि यदि अपने कर सके तो रागद्वेष का नाश करके मन को निश्चल करे । भावार्थ रूप परिणत न होने दे ।
अक्षाश्च धर्मस्य स्युः सदैव निबन्धनम् ।
वित्तं भूमौ स्थिरीकृत्य स्व स्वरूपं निरूपय ।। ६५६॥ हे मुने ! ग्रनित्य
का
है
शरणादिकं बारह अनुप्रेक्षा अर्थात् अनित्यादिक का चिन्तवन करना सदा धर्म अपनी चित्तरूपी भूमि में उन अनुप्रेक्षात्रों को स्थिर करके अपने स्वरूप का अवलोकन कर । भावार्थ - यदि तेरा चित्त स्थिर न होता हो तो बारह भावनाओं का चिन्तवन कर, ये भावनायें धर्मध्यान में कारण हैं ।
मन को धश नहीं मन को रागद्वेष
स्फोटयत्याशु frostri यथा दीपोधनं तमः
तथा कर्मकलङ्कीधं मुनेध्यानं सुनिश्चलम् || ६५७ ॥
जैसे निष्क्रम्प अर्थात् अचल दीपक सघन अन्धकार को शीघ्र ही दूर कर देता है; उसी तरह मुनि का निश्चल ध्यान भी कर्मकलंक के समूह को शीघ्र ही नाश करता है । भावार्थ - कर्म के नाश करने के लिये ध्यान करना ही चाहिये । चलत्येवाल्प सत्त्वानां क्रियमाणमपि स्थिरम् । चेतः शरीरिणां शश्वद्विषयैर्व्याकुली कृतम् ||६५८ ॥ न स्वामित्वमतः शुक्ले विद्यतेऽत्यल्पचेतसाम् । प्रसंहननस्यैव तत्प्ररणीत पुरातनः ।।६५६|| छिन्ने भिन्ते हते दग्धे स्वमिव प्रपश्यत् वर्षचातादि दुःखैरपि न
दूरगम् ।
कम्पते ।।६६०||
न पश्यति तदा किञ्चन्न शृणेति न जिनति । स्पृष्टं किञ्चिन्न जानाति साक्षानिवृत्त लेपयत् ।।६६१।।
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Esamagranepan
अध्याय : पांचवां न
[. २६७ . अरूपवीय अर्थात् सामर्थ्यहीन प्राणियों का मन स्थिर करते हुए भी निरन्तर विषयों से व्याकुल होता हुआ चलायमान होता ही है; इसलिये अतिशय अल्प चित्त वालों का शुक्लध्यान करने में अधिकार नहीं है। प्राचीन मुनियों ने पहिले के (वनवृषभनाराच) संहनन के ही शुक्लध्यान कहा है । इसका कारण यह है कि इस संहनन वाले का ही चित्त ऐसा होता है कि शरीर को छेदने, भेदने, मारने और जलाने पर भी अपने प्रात्मा को उस शरीर से अत्यन्त दूर अर्थात् भिन्न देखता हुआ चलायमान नहीं होता, और न वर्षाकाल के पवन आदिक दुःखों से चलायमान होता है तथा उस. ध्यान के समय लेप की मूर्ति अर्थात् रंग से निकाली हुई चित्राम की मूति की तरह हो जाता है। इस कारगा यह योगी न तो कुछ देखता है, न कुछ सुनता है, न कुछ सूघता है और न कुछ स्पर्श किये हुए को जानता है । .
सकार्य-से पुरुष के शुक्ल ध्यान होता है । श्राद्य संहननोपेता निर्वेदपदवीं श्रिताः । कुर्वन्ति निश्चलं चेतः शुक्लध्यानक्षम नराः ॥६६२।।
जिनके प्रादि का संहनन है और जो वैराग्य पदवी को प्राप्त हुए हैं, ऐसे. . पुरुष ही अपने चित्त को शुक्ल ध्यान करने में समर्थ है ऐसा निश्चल करते हैं।
सामग्रयोरुभयोातानं बाह्यान्तरङ्गयोः । पूर्वयोरेव शुक्लं स्थानान्यथा जन्मकोटिषु ।।६६३।।
इस प्रकार पूर्व कही हुई बाह्य और आभ्यन्तर अर्थात् आदि के संहनन और वैराग्य भाव इन दोनों सामग्रियों से ध्यान करने वाले के शुक्ल ध्यान होता है; अन्यथा अर्थात् बिना आदि के संहनन और वैराग्य भाव के, करोड़ों जन्मों में भी नहीं हो सकता।
अतिक्रम्य शरीरादि सङ्गानात्मन्यवस्थितः । नवाक्षमनसा योग करोत्येकाग्रताश्रितः ॥६६४॥
धर्म ध्यान करने वाला शरीरादिक परिग्रहों को छोड़ पात्मा में अवस्थित होता हुअा, एकाग्रता को धारण कर, इन्द्रिय और मन का संयोग नहीं करता है: अर्थात् इन्द्रियों से जो पदार्थों का ग्रहरण होता है, उनका मन से संयोग नहीं करता मन को केवल स्वरूप में ही स्थिर रखता है।
remensitings
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२६८ ]
इस ध्यान का फल ----
[ गो. प्र. चिन्तामणि
असंख्येयम संख्येयं क्षीयते क्षपकस्यैव
दृष्ट यादिगुणेऽपि च । कर्म जात मनुक्रमात् ||६६५ ।।
शमकस्य क्रमात् कर्म शान्तिमायाति पूर्ववत् । प्राप्नोति निर्मातङ्गः स सौख्यं शम लक्षणम् ।।६६६ ।।
지
इस धर्म ध्यान में कर्मो का क्षय करने वाला क्षपक के सदृष्टि अर्थात् सम्यदृष्टि नामक चौथे गुस स्थान से लेकर सातवें अप्रमत्त गुणस्थान पर्यन्त अनुक्रम असंख्यात असंख्यात गुण कर्म का समूह क्षय होता है; और जो कर्मों का उपशम करने वाला उपसंयक है, उसके असंख्यात गुणा कर्म का समूह उपशम होता है; इसलिये ऐसा धर्म ध्यानी आतंक दहादि दुःखों से रहित होता हुआ उपशम भाव रूप सुख को प्राप्त होता है ।
ध्यानस्य विज्ञेया स्थिति रान्त मुहूतिको
arita शमिको भावो लेश्या शक्लेव शाश्वती ।।६६७॥
.
इस धर्म ध्यान की स्थिति अन्त मुहूर्त है, इसका भाव क्षायोपशमिक है और लेश्या सदा शुक्ल ही रहती है ।
भावार्थ - धर्म ध्यान अन्तर्मुहूर्त्त रहता है । धर्म ध्यान वाले क्षायोपशमिक भाव और शुक्ल लेश्या होती है । इदमत्यन्त निवेंद विवेक प्रशमोद्भवम् । स्वात्मानुभवमत्यक्षं पोलयत्यङ्गिनां सुखम् ||६६८।।
यह धर्म ध्यान जीवों को अत्यन्त निर्वेद अर्थात् संसार देह भोगादिकों से अत्यन्त वैराग्य तथा विवेक अर्थात् भेद ज्ञान और प्रथम ग्रर्थात् मंद कषाय इनसे उत्पन्न होने वाले अपने श्रात्मा के ही अनुभव में ग्राने वाले इन्द्रियों से प्रतीत अर्थात् श्रतीन्द्रिय ऐसे सुख को प्राप्त करता है ।
अलौल्य मारोग्यमनिष्ठुरत्वं गन्धः शुभो सूत्र पुरोषमल्पम् । कान्तिः प्रसादः स्वर सौम्यता च योग प्रवृतेः प्रथमं हि चिह्नम् ॥६६६ ॥ ● अर्थात् विषयों में इन्द्रियों की संतान होना और मन का चपल न होना, आरोग्य अर्थात् शरीर नीरोग होना, निष्ठुरता न होना, शरीर का गंध शुभ होना, मल मूत्र का अल्प होना, शरीर कान्ति सहित होना अर्थात् शक्तिहीन न होना
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Pacinginnisimam
अध्याय : पांचवां ]
m ytewasiunicine
nirneshwinikranamitrintentiness
चित्त का प्रसन्न होना अर्थात् खेदं शोबादिक मलिन भाव रूप न होना, और स्वर अर्थात शब्दों का उच्चारण सौम्य होना, ये चिह्न योग की प्रवृत्ति के अर्थात् ध्यान करने वाले के प्रारम्भ दशा में होते हैं ।
भावार्थ - ऐसे चिह्न वाले पुरुष के ध्यान का प्रारम्भ होता है। अथावसाने स्वतनु विहाय ध्यानेन संन्यस्तसमस्तसङ्गाः। ग्रे चेयकानुत्तर पुण्य बासे सर्वार्थसिद्धौ च भवन्ति भव्याः ॥६७०॥
जो भव्य पुरुष इस पर्याय के अन्त समय में समस्त परिग्रहों को छोड़कर, धर्म ध्यान से अपना शरीर छोड़ते हैं, वे पुरुष पुण्य के स्थान रूप ऐसे अवेयक और अनुत्तर विमानों में तथा सर्वार्थसिद्धि में उत्पन्न होते हैं।
___ भावार्थ -यदि परिग्रह का त्याग कर मुनि हो, धर्म ध्यान से इस पर्याय को छोड़े तो नव ग्रेवेयक, नव अनुत्तर और सर्वार्थसिद्धि में उत्तम देव हो ।
तत्रात्यन्त महाप्रभाव कलितं लावण्य लीलान्वितं । स्त्रग्भूषाम्बर दिव्य लाञ्छनचितं चन्द्रावदा वपुः॥ समात्योन्नत बीर्य बोध सुभगं काम ज्वरात्तिच्युतं । ... सेवन्ते बिगतान्तरायमतुलं सौख्यं चिरं गिरणः ॥६७१॥ .
जो जीव धर्म ध्यान के प्रभाव से स्वर्ग में उत्पन्न होते हैं, वे वहां अत्यन्त महा प्रभाव सहित, सुन्दरता और क्रीडायुक्त तथा माला, - भूषण, वस्त्र और दिव्य लक्षणादि सहित, चन्द्रमा सदश शुक्लवर्ण शरीर को पाकर, उन्नत वीर्य और ज्ञान से सुभग, काम ज्वर की वेदना से रहित और अन्तराय रहिला ऐसे अतुल सुखों को चिरकाल पर्यन्त भोगते हैं।
अवेयकानुत्तरवास भाजां : वीचार हीनं सुखमत्युदारम् । निरन्तरं पुण्य परम्पराभिविवर्तते वादिरिवेन्दुपाः ।।६७२१॥
येयका और अनुतरादि विमानों में रहने वाले देवों का सुख काम सेवन से रहित होता है, अर्थात् उनके काम सेवन सर्वथा नहीं है तथापि उनका मुख अत्यन्त उदार है; और वह जैसे चन्द्रमा की किरणों से समुद्र बढ़ता है, वैसे ही निरन्तर पुण्य की परम्परा से बढ़ता ही रहता है।
भावार्थ---वहाँ का सुख वृद्धि रूप है ।
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"...
A
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[ गो. प्र. चिन्तामगि
. देवराज्यं समासाद्य यत्सुखं कल्पवासिनाम् । . निर्विशान्ति ततोऽनन्तं सौख्यं कल्पातित्तिनः ॥६७३॥
इन्द्र पद को पाने पर कल्पवासियों को जो सुख मिलता है, उससे अनन्त गुरगा सुख कल्पातीतो (नव वेयक, नव अनुत्तर और विजयादिक पांच विमानों में रहने वाले अहमिन्द्रों) को प्राप्त होता है। . . संभवत्यथ फल्पेषु तेष्वचिन्त्यविभूतिधम् । .
प्राप्तुवन्ति पर सौख्यं सुराःस्त्रीभोग लाञ्छितम् ।।६७४।।
अथवा धर्म ध्यान से पर्याय छोड़कर, जो उन कल्पस्वर्गों (सोलह स्वर्गो) में उत्पन्न होते हैं, वे देव भी अचिन्त्य विभुति के देने वाले और स्त्रियों के भोगों सहित उत्कृष्ट सुख को प्राप्त होते हैं ।
दशाङ्ग भोग सम्भूतं महाष्टगुण बद्धितम् । यत्कल्प बासिनो सौख्यां तदक्तु केन. पार्यते ॥६७५।।
कल्पवासी देवों का सुख दशाङ्ग भोगों से उत्पन्न हुआ है और अणिमादिक पाठ महा गुणों से बढ़ा हुआ है। इसलिये उस सुख का कौन वर्णन कर सकता है । .
सर्वद्वन्द्व विनिमुक्तं सर्वाभ्युदय भूषितम् ।। नित्योत्सवयुत्तं दिव्यं दिवि सौख्य दिवौकसाम् ॥६७६॥
स्वर्ग में देवों का सुख सर्वद्वन्द अर्थात् क्षोभों से रहित है, समस्त अभ्युदयों से भूषित, नित्य उत्सवों सहित और दिव्य है। :
प्रति समयमुदीर्ण स्वर्ग साम्राज्यरूढं । सकल विषय बीजं . स्वान्तदत्ताभिनन्दम् ॥ ललित युवति लीलालिङ्गनादिः प्रसूतं । सुखमतुल मुदार स्वागणो . निविशन्ति ॥६७७॥
स्वर्ग के देव प्रत्येक समय में उदय रूप अर्थात् विच्छेद रहित, स्वर्ग के साम्राज्य से प्रसिद्ध, समस्त विषयों का कारण, अन्त: करण को श्रानन्द देने वाले, सुन्दर देवाङ्गनाओं को लीला और प्रालिंगनादिक से उत्पन्न, अतुल और उदार सुख का अनुभव करते हैं। .. ... सर्वाभिमत भावोत्थं निविघ्नं स्वः सुखामृतम् । .. .
सेव्यमाना न बुद्धयन्ते गतं जन्म दिवौकसः ॥६७८।।
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अध्याय : पांचवां ।
स्वर्ग निवासी देव अपने समस्त मनोवांछित पदार्थों में उत्पन्न और निर्विघ्न ऐसे स्वर्ग के सुख रूप अमृत का सेवन करते हुए व्यतीत हुए जन्ग को अर्थात् गई हुई देव पर्याय को नहीं जानते ।
तस्माच्च्युत्वा त्रिदिवपटलाछिय भोगावसाने । कुर्वन्त्यस्यां भुवि नरनुते पुण्य वंशेऽवतारम् ।। तश्वर्य परमवपुषं प्रातः देदोरगीत ..-- भौगनित्योत्सव परिस्गत ल्यमाना वसन्ति ॥६७६।। .
फिर वे स्वर्ग के देव दिव्य भोगों को भोग कर, उस स्वर्ग पटल से च्युत होते हैं और इस भूमंडल में जिसको लोग नमस्कार करते हैं ऐसे उत्तम पुण्य बंश में अवतार लेते हैं, और वहाँ भी परम (उत्कृष्ट ) शरीर और ऐश्वर्य को पाकर, नित्य उत्सव रूप परिणत ऐसे देवोपनीत अनेक भोगों से लालित और पुष्ट हुए निवास करते हैं; यह . सब धर्म ध्यान का फल है । . ततो विवेक मालम्ब्य विरज्य जननभ्रमात् ।
त्रिरत्मशुद्धिमासाद्य तपः कृत्वात्य दुष्करम् ॥६८०॥ . धर्मध्यानं च शुक्लं च स्वीकृत्य निजवीर्यतः । कृत्स्नकर्म क्षगं कृत्वा व्रजन्ति पदम व्ययम् ॥६८१॥
उसके बाद अर्थात् उत्तम मनुष्य भव के सुख भोग कर, पुनः भेद ज्ञान (शरीरादिक्र से प्रात्मा को भिन्नता) को अवलम्बन कर, संसार के परिभ्रमण से विरक्त हो, रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र की शुद्धता को प्राप्त कर, दुर्धर तप कर तथा अपनी शक्ति के अनुसार धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान को धारण कर और समस्त कमों का नाश कर, अविनाशी मोक्ष पद को प्राप्त होते हैं, यह धर्म ध्यान का परंपरारूप फल है। इस प्रकार धर्म ध्यान का फल निरूपण किया ।
___ ध्यान का वर्णन शुभचन्द्राचार्य कृत ज्ञानर्णय से लिया है । चतुर्विशतिस्तव का लक्षण
उसहादिजिरगवराणं णामणित्ति गुणाणुकित्ति च । काऊण प्रच्चिदूरण य तिसुद्धिपणमो थवोरणेओ ॥६८२॥
ऋषभ, अजित: संभव आदि चौबीस तीर्थंकरों के नामों का योग्य अर्थ समझ . लेना चाहिये तथा उनके वाक्ति कर्म का क्षय होने पर उन्होंने धर्म रूपी तीर्थ का प्रसार
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[ गो. प्र. चिन्तामणि किया, वे देव और मनुष्यों से बंदनीय हुए, उन्होंने परमार्थ तत्त्व-जीव तत्व का सत्य स्वरूप जान लिया है । वे अठारह दोषों से रहित और सर्वज्ञ बने हैं ऐसा उन के गुणों .. का वर्णन करना चाहिये। तथा गुण वर्णन के साथ तीर्थकरों के चरणों का गंध धूपादि से पूजन कर मन नचन शरीर की विशुद्धि में उनके घरों को नमस्कार करना यह चतुर्विशति स्तब है। : आवश्यक
अरहंत सिद्ध पडिमात वसुदगुरण गुरुगुरुण रादौरा । किदियम्मेरिणदरेण य तियरस संकोचणं परणमो ॥६८३।।
अरहंत और सिद्धों के प्रतिबिम्ब, अनशनाद्रिक तप, अंगश्रुत ज्ञान ब पूर्वरूप श्रुत ज्ञान, व्याकरण तादिक का ज्ञान विशेष रूपी गुगा तथा इनसे जो श्रेष्ठता को प्राप्त हुए हैं, जो दीक्षा से श्वेष्ठ हैं ऐसे गुरुयों को कृतिकर्म में कहीं. हई विधि के अनुसार मनः शुद्धि, वचन शुद्धि और शरीर शुद्धि कर स्तुति पूर्वक नमस्कार करना वन्दना नामक मूलगुरंग हैं।
विशेष :---घातिकर्म का क्षय जिन्होंने किया है, वे ग्रहत् अर्थात् अरित्त है । और जिन्होंने पाठ कर्मों का नाश किया है । वे सिद्ध समझे जाते हैं अथवा गति, वचन और स्थान इन हेतुयों से अरिहन्त और सिद्ध में भेद हैं। अरिहन्त को मनुष्य गति का उद्रय है । सिद्ध गति रहित हैं। अरिहन्त दिव्य ध्वनि से उपदेश करते हैं । सिद्ध उपदेश रहित हैं और अशरीरी होने से बचन रहित हैं। अरिहन्त मध्य लोक में विहार करते हैं । सिद्ध लोकान में मोक्ष शिला पर सदा विराजमान हैं। प्रतिमा- . अरिहन्त की प्रतिमा प्रातिहार्य सहित होती है और सिद्धों की प्रतिमा प्रातिहार्य रहित होती है । अथवा कृत्रिम प्रतिगामों को अप्रतिमा कहते हैं । और अकृत्रिम प्रतिमा को सिद्ध प्रतिमा कहते हैं । तप-शारीर और इंद्रियों को जो सप्त करता है और कम की निर्जरा करता है, वह तप है ।
___ कृति कर्म-सिद्ध भक्ति, श्रुतभक्ति और गुरु भक्ति पूर्वक कायोत्सर्गादिक के . साथ बंदना करना। मुंड बंदना-श्रुस भवत्यादि रहित कायोत्सर्गादि रहित केवल
मस्तक से बंदना करना । मनः शुद्धि, वचन शुद्धि और काय शुद्धि करके अहंदादिको .. ..को प्रमगाम करता वह वंदना नामक मूल गुराण है।
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अध्याय : पांचवां ]
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प्रतिक्रमण मूल गुरग का स्वरूप---
दवे खेत्ते काले मावे या कया बराह सोहरण्यं । रिंगदरणगर हए जुत्तो मरण वचिकायेण पडिकमणं ॥६८४।।
द्रव्य-शरीर और ग्राहारादिक पदार्थ । क्षेत्र-वसतिका, तृणादिक फलक, चटाई और गमवादि क्रियामागं । काल-~-प्रातः काल, मध्यान्ह, दिवस, रात्रि, पक्ष, महिना, वर्ष, भूत, वर्तमान, भविष्यादि काल । भाव-मन की अनेक प्रकार की परिणति । इनके पाश्रय से जो दोष उत्पन्न होते हैं अर्थात् अहिसादि व्रतों में जो
चारादि दोन उत्पन्न होते हैं, उनका नाश करना प्रतिक्रमण है । निंदा और गहींपूर्वक प्रतिक्रमण विधि करना चाहिये । स्वसाक्षिक दोषों का उच्चार करना वह निदा अथवा निंदन है और प्राचार्यादिक के सन्निधि में किये हुए दोपों का पालोचना पूर्वक वर्णन करना गहरे अथवा गहरा है। शुभ मन, शुभ व वन और शुभ शरीर की प्रवृत्ति के द्वारा प्रतिक्रमण करें अर्थात् अशुभ मन, वचन और काय के द्वारा किये हुए अशुभ योग से निवृत्त होना अर्थात् अशुभ परिणाम से उत्पन्न हुए ----किये गये दोषों का त्याग करना यह प्रतिक्रमण है। सारांश ----निदा गर्हायुक्त होकर मन, वचन में शरीर के द्वारा द्रव्य, क्षेत्र और भाव के विषय में किये हुये जो प्रत दोष उनका शोधन-त्याग करना मह प्रतिक्रमण है। . प्रत्याख्यान मूलमुरण का स्वरूप---
रणामादीणं छह अजोग परिवज्जरां तियरणेण । . पच्चक्रवाणं गयं प्रणामयं चागमे काले ॥६८५॥
समीप के भविष्यकाल में अर्थात् नजदीक के मुहूर्त, दिबस, सप्ताह इत्यादिक . भविष्यकाल में नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव ऐसे अनागत छहों दोषों का त्याग करना तथा प्रागत उपस्थित नामादिक छहीं दोषों का त्याग करना प्रत्याख्यान मुलगुग है । अथवा दूर के भविष्य काल में अथवा समीप के भविष्य काल में अयोग्य ऐको छहों नामादिक दोषों का त्याग करना प्रत्याख्यान है । अथवा अनागत काल में नामादिक अयोग्य छहों प्रकार का जो वागमन होगा उसका मन बचन शरीर से त्याग करना प्रत्याख्यान है। पाप के कारण भूत ऐसे नाम स्थापनादिकों का त्याग करना प्रत्याख्यान है । .
. प्रतिक्रमणा और प्रत्याख्यान में अन्तर-अतीत काल में-भूतकाल में उत्पन्म ..
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३०४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामण
हुये दोषों का त्याग करना प्रतिक्रमण है । भविष्यकाल और वर्तमान काल में द्रव्यादिक के दोषों का त्याग करना प्रत्याख्यान है । ऐसा इन दोनों में भेद i तपश्चरण के लिए निर्दोष ऐसे भी द्रव्यादिकों का त्याग करना प्रत्याख्यान है और 1. प्रतिक्रमण दोष परिहार के लिए ही किया जाता है । ऐसी इनमें भिन्नता है । विशेषार्थ - भविष्यकाल में और वर्तमान काल में नामादिक छह अयोग्यपापास्वव के कारणों का शुभ मन वचन काय से त्याग करना यह प्रत्याख्यान है । इसका खुलासा मैं शरीर के द्वारा किसी का शुभ नाम न करूंगा, न कराऊंगा और नुमोदन नहीं दूंगा । दचन के द्वारा मैं अयोग्य नाम नहीं कहूंगा, मैं नहीं कहाऊंगा और कहने वालों को अनुमोदन में नहीं दुगा । मन के द्वारा अशुभ नाम का चितन नहीं करूंगा, नहीं कराऊंगा और उसके विषय में अनुमोदन भी नहीं दूंगा । इस ही प्रकार अशुभ स्थापना को मैं शरीर से नहीं करूंगा, नहीं कराऊंगा और करने वालों. को सम्मति नहीं दूंगा । वचन से नहीं बोलूंगा, नहीं बुलवाऊंगा और बोलने वाले को सम्मति नहीं दूंगा । मन से में अशुभ स्थापना का चिंतन नहीं करूंगा, दूसरों से चितन न कराऊंगा और अशुभ स्थापना का चितन करने वाले को अनुमोदन नहीं दूंगा। दोप सहित द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावों का में शरीर के द्वारा सेवन नहीं करूंगा, सेवन नहीं कराऊंगा और सेवन करने वालों को अनुमति नहीं दूंगा । वचन से सेवन कर में ऐसा नहीं कहूंगा, नहीं कहाऊंगा और सेवन करने वाले को सूने अच्छा किया ऐसी अनुमति वचन से नहीं दूंगा । मन के द्वारा में अशुभ द्रव्यादिकों का चितन नहीं करूंगा, दूसरों को चितन न कराऊंगा और करने वालों को सम्मति नहीं दूंगा । ऐसे सत्ताईस प्रकार के नामांदिक छहों के दोषों का त्याग शुभ मन, वचन, काय से करना प्रत्याख्यान है ।
कायोत्सर्ग का स्वरूप ---
देवसिरिणयमावि जहुत्तमारोण उत्तकालम्हि |
जिरण गुरण चितण जुत्तो काउस्सग्यो त विसग्गो ॥ ६८६ ॥
दिवस, रात्रि, पाक्षिक, चार महीने की वार्षिक वगैरह निश्चय क्रियाथों में परमेष्ठियों ने जो पच्चीस, सत्ताईस, एक सौ ग्राठ वगैरह प्रमाण रूप उच्छ्वास संख्या जिस काल में कहीं है, उस काल में जिन गुण स्मरण सहित अर्थात् सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र शुक्ल ध्यान, धर्म ध्यान अनंत ज्ञानादिचतुष्टय इत्यादि गुणों के चितन
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अध्याय : पांचवां ]
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महित जो शरीर के ऊपर के ममत्व का त्याग किया जाता है । वह कार्योत्सर्ग नामक मूलगुण है। लोच मूल गुण का स्वरूप---
वियतियचउक्कमासे लोचो उक्कस्समजिसमजहपषो। सपडिपकमणे दिवसे उववासेणेव कायवधी ॥६८७॥
हाथ से मस्तक के केश, दाढ़ी और मूछ उखाड़ना यह लोच का लक्षण हैं। यह लोच सम्मुर्छनादि जीवों की उत्पत्ति मस्तकादिकों में न होवे इस वास्ते तथा शरीर में राग मोह विकार न होवे इमलिये स्वशक्ति प्रगट करने के लिए, सर्वोत्कृष्ट, तपश्चरण के लिए, मुनिलिंग के गुण समझने के लिये मुनि करते हैं । इस लोच के उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य ऐसे तीन भेद हैं। इन भेदों से क्रम से उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य आचरण के भेद मुचित होते हैं। उत्कृष्ट लोच दो महीने पूर्ण होने पर अथवा अपुर्ण होने पर मुनि करते हैं। यह लोच दिन में उपवास पूर्वक करना चाहिये । पाक्षिक चातुर्मासिक प्रतिक्रमण के समय लोच करे। परन्तु उपवास पूर्वक ही करे । प्रतिक्रमण रहित दिवस में भी लोच करें । अथवा 'सप्रतिक्रमणे दिवसे' इन पदों का अभिप्राय 'लोच करके प्रतिक्रमण करें ऐसा होता है। लोच शब्द लुच धातु से बना है और इस धातु का अर्थ अपनयन-~-दूर करना, निकालना ऐसा है । प्रश्न -केशों का अपनयन-निकालना क्षुरादिक से-कैंची, उस्तरा आदि से भी होता है तो हाथ से मस्तक के और दाढ़ी, मूछ के केश क्यों उखाड़ना चाहिये ? उत्तर-दीनता, याचना, परिग्रह, अपमान इत्यादिक दोष क्षुरादिक के द्वारा केश निकालने में होते हैं। अतः मुनिराज अपने हाथ से ही केशलोंच करते हैं। अचेलकत्व मूल गुग का स्वरूप-----
बस्थाजिरग वक्केश य अहवा पत्ताइगा असंवरणं । बिभसरपरिणगंथं ऊच्चेलक्कं जगदि. पुज्जं ॥६॥
यस्त्र-धोती, दुपट्टा, कंवलादिक, अजिन-हरिण, बाघ वगैरह का चर्म । बल्कल वृक्ष की छाल. से बने हुए बल्कल बस्न इनके द्वारा शरीर को न ढकना यह आचेलश्य मूलगुण है । अथवा वृक्ष के पत्ते, तृग वगैरह से अपना शरीर न ढकना यह भी ग्रावेलक्य मूलगुरणं है । यह आचेलक्य कडा, केयूर, हार, मृकुट वगैरह अलंकार ।
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[ गो. प्र. चिन्तामरिग
तथा विलेपनादि से रहित होने से रागादिक विकार उत्पन्न नहीं करता है । यह नैर्ग्रन्थ-वाह्यभ्यंतर परिग्रहों से रहित है। इन वस्त्रादिकों को मुनिराज मन, बचन, काय से त्यागते हैं । यह प्राचेलवय मूलगुण जगत में महापुरुषों के द्वारा स्वीकार किया गया है, अतः वंदनीय है-मान्य है ! प्रान-वस्त्रादिक को ग्रहण करने से कौन दोष उत्पन्न होते हैं ? उत्तर--वस्त्रादिक को ग्रहण करने पर यूकादिक जीवों की हिंसा, वस्त्र प्राप्त करने की इच्छा, प्रक्षालन, याचना करना इत्यादिक दोष उत्पन्न होते हैं। ध्यानाध्ययनादिक में विघ्न'. उत्पन्न होता है, अतः मुनिराज आचेलवय मूलगुण के धारक होते हैं। अस्नान व्रत का स्वरूप
हारणादिवज्जणेरण य विलित जल्लमल सेव सम्वगं । अण्हाण घोर गुणं संजम दुगपालयं मुणिगो ॥६८६।।
स्नानादि वर्जन अर्थात् जल में प्रवेश करके स्नान करना, शरीर में मुगन्धी उबटन लगाना, प्रांखों में अंजन लगाना, अंग को जल से धोना, तांबूल भक्षण करना इत्यादिक अंगोपांग को सुखी करने के साधन हैं। इनका त्याग करने से अस्नान नामक व्रत का पालन होता है। सर्व अंग जिससे मलिन होता है, ढक जाता है ऐसे मल को जल्ल कहते हैं । अंग का एकाकि भाग जिससे व्याप्त होता है : ...। उसको मल कहते हैं। रोम के छिद्रों से जो जल बाहर आता है, उसको स्वेद कहते हैं । इस अस्नानन्द्रत के धारण करने से शरीर उपयुक्त जल्लादिक मल से व्याप्त होता है । यह अस्नान व्रत महागुरण है । इससे उत्कृष्ट गुरणों की प्राप्ति होती है। इस व्रत से प्राणिसंयम और इंद्रियसंयम का पालन होता है।
प्रश्न----स्नानादिक का त्याग करने से अशुचिपना आवेगा? उत्तर-स्नान । करने से मुनि को पवित्रता नहीं पाती । अतों से मुनि पवित्र होते हैं। यदि अत रहित प्राणी जलावगाहनादिक से पवित्र होते हैं. तो मत्स्य, मगर और दुराचारी लोक पवित्र मानने पड़ेंगे। परन्तु उनको कोई पवित्र नहीं मानते हैं । अतः व्रत, नियम, संयम ही पवित्रता के कारण हैं । जलादिक नाना सूक्ष्म जन्तुओं से भरा हुआ है, जल स्नान सर्व पाप का मूल है। इसलिये मुनि गरण जलादिक से स्नान नहीं ।
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अध्याय : पाँचवाँ ] .
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भूमिशयन वत का वर्णन
फासुयभूमिपएसे अप्पमसंधारिदम्हि पच्छण्णे । दंड घणुब्ध सेज्जं खिदिसमणं एयपासेरण ॥६६०।।
जहाँ जीव हिमा, मर्दन कलह संवले परिणाम नहीं होते हैं, ऐसे जीव वध रहित निर्जन्तुक भूमि प्रदेश में जहां अल्प भी तृणादिक प्रक्षिप्त नहीं है, अर्थात् जहां शयन के लिये थोड़ा भी तृषा नहीं है । अथवा जहाँ अल्पसंस्तर है, अर्थात् तृणमय काष्ठ का बना हुया फलक किंवा शिला है, ऐसे भूप्रदेश में जो किं . गृहस्थ योग्य प्रच्छादन और शय्या से रहित है, ऐसे स्थान में सोना यह भूशयन नामक मूलगुण है । अथवा जहाँ अात्मना-- स्वतः तृणादिक बिछाया है, ऐसे भूप्रदेश में---किंवा अपने शरीर के प्रमाणानुसार-गस्त र-चारित्र योग्य-प्रासुक-तृणादिक है, ऐसे भूमि प्रदेश में सोना चाहिये । वह भूमि प्रदेश गुप्त अर्थात् एकांत युक्त होना चाहिए तथा स्त्री, पशु ब नपुंसक रहित, संयत लोकों के संचार से रहित होना चाहिये । ऐसे भूमि प्रदेश में दण्ड के समान किया धनुष्य के समान एक बगल से सोना चाहिए । नीचे मुख करके अथवा ऊपर मुख करके नहीं सोवे । क्योंकि ऐसे सोने से स्वप्न दोष उत्पन्न होते हैं। उपयुक्त प्रकार से सोना क्षितिशयन मूलगुण है। प्रश्न-~-इसका पालन चयों करना चाहिये ? उत्तर- इंद्रिय सुख का त्याग करने के लिए, तथा तप मजबूत होने के लिए तथा शरीरादिकों पर निःस्पृहता उत्पन्न होने के लिए यह भूशय्या नामक मूलगुग है। अदन्तधोवन व्रत का लक्षण
अंगलिबहाबलेहरिण कलीहिं पासागछल्लि यादीहि । दंत मला सोहरण्यं संजमयुत्ती प्रदंतमरकं ॥६६॥
हाथ की अंगुली, नख, दात स्वच्छ करने की निब बगैरह की लकड़ी तथा तुमा विशेष इनके द्वारा और पाषाण, वृक्ष की छाल, खप्पर अथवा ठिकरा, संदुल का भूसा अथवा पाटा इन पदार्थों के द्वारा मुनि दोनों का मल नहीं निकालते हैं । दांतों का मल नहीं निकालने से उनके इंद्रियसंयम का रक्षरण होता है। इस मूल गुण का पालन करने से मुनियों को वीरागता प्राप्त होती है तथा सर्वज्ञ जिनेश्वर की प्राज्ञा का पालन होता है।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि .. स्थिति भोजन खड़े होकर भोजन करना इस मूलगुरण का स्वरूप-- .
अंजलि पुडेण हिच्चा कुड्डाइ विवज्जणेरण समपायं । पडि सुद्ध भूमितिये. प्रसरणं ठिदि भोयरसं गाम ॥६६२॥
मुनि खड़े होकर अंजलि पुट के द्वारा अर्थात् हाथ रूपी पात्र के द्वारा आहार लेते हैं। भित्ती, खांब वगैरह का आश्रय लेकर तथा बैठकर किंवा सोते हुए और
तिरछे लेटकर बाहार नहीं लेते हैं। खड़े होकर ग्राहार लेते समय अपने दो पांवों के ... बीच में चार अगुल का अन्तर रखना चाहिये । जीववधादिक से रहित ऐसे तीन भूमि
प्रदेश में मुनि याहार लेते हैं। जिस स्थान पर मुनि पाहार के लिए खड़े होते हैं, ऐसा प्रदेश उनके चरणों का भूमि प्रदेश, उच्छिष्ट जहां पड़ता है ऐसा प्रदेश, तथा दाता जहां खड़ा होकर आहार देता है वह प्रदेश, ऐसे तीन भूमि प्रदेश जीव वधादिक दोषों से रहित होने चाहिये । ऐसे शुद्ध प्रदेश में खड़े होकर पावों में बार अंगुल का अन्तर रखकर भीत, खाब वगैरह का आश्रय नहीं लेते हुए हस्त पुट से याहार लेना इसको स्थिति भोजन कहते हैं।
विशेषा.....नि. दिन में कार ही भोजन करते हैं। उनके पाहार का काल जघन्य तीन मुहूर्त तक कहा है। परन्तु तीन मुहर्त तक पाबों को समान्तर रखकर अंजलिपुट के द्वारा प्राहार लेना चाहिये, ऐसा उसका अभिप्राय नहीं है। उसका अभिप्राय इस प्रकार है। तीन मुहूत काल के बीच में जब कभी मुनि भोजन करते हैं उस समय में चरण समान्तर रखकर अंजुलिपुट से भोजन करे। यदि भोजन क्रिया के समपाद और अंजुलिपुट ये विशषण नहीं माने जायेंगे तो हाथ धोने पर भी अन्यत्र ग्राहार के लिये जाते समय, 'जानुपरिव्यतिक्रम् नाम का जो अन्तराय यागम में कहा है उसको व्यर्थता होगी । “नाभेर धोनिर्गमन' नाम का अन्तराय मानने की भी अावश्यकता नहीं होगी। इससे यह सिद्ध होता है कि, तीन मुहूर्त के मध्य में किसीः । दाता के घर में भोजन क्रिया प्रारंभ करके किसी कारण से हाथ धोकर मौल से अन्य श्रावक के घर पाहार के लिए मुनि जावे ।
..यदि उपर्युक्त अन्तराय एक घर में ही पाहार करने वाले मुनि को होता है .. . ऐसे कहोगे तो 'जानूपरिव्यतिक्रम' यह विशेषरण व्यर्थ होगा तथा समपाद में थोड़ी सी
भी चंचलता आई तो अन्तराय माना जावेगा 'नाभेर बोनिर्गमन' अन्तराय तो दूर ही - रहा उसकी संभावना भी नहीं होगी । अतः उनका परिहार करने के लिये जो उनका
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अध्याय : पांचवां ] स्वरूप कहा है वह व्यर्थ होगा। इसी प्रकार पांव से कुछ ग्रहण करना (पादेन किंचिद्ग्रहणं) इत्यादिक अन्तरायों का वर्णन करना व्यर्थ है ऐसा समझना पड़ेगा। अञ्जलीपुट छोड़कर अन्यत्र जाने का यदि निषेध ही होगा तो 'हाथ से कुछ ग्रहगा करना यह भोजन का अन्तराय है' ऐसा कहना योग्य नहीं होगा। मुनि हाथ से ग्रहण करे अथवा न करे अजंलिपुट छुटने से अन्तराय हुआ ऐसा मानना पड़ेगा तो अन्यत्रं
आहार को कैसे जा सकेंगे । गोडों के नीचे के अवयव का स्पर्शन होना यह भी अन्तराय का विशेषमा नहीं हो सकेगा । ये अन्लराय सिद्ध भक्ति जब तक नहीं की है तब तक होने हैं ऐसा भी न समझे । ऐसा समझने पर तो भोजन का अभाव हो जायेगा । परंतु ऐसी कल्पना अयोग्य है। जब तक सिद्धभक्ति मुनियों ने नहीं की है तब तक वे बैठते हैं व सिद्ध भक्ति करने के अनन्तर खड़े होकर भोजन करेंगे । जब तक बैठे हैं तब तक काकादि पिंड हरण नाम के अन्तराय की संभावना नहीं होती है । (कौवे वगैरह पक्षी का हाथ में से ग्रास को उठा लेना) ।
प्रश्न :--यह स्थिति भोजन मुनि क्यों करते हैं ?...
उत्तर :-जब तक मेरे हाथ और पांव चलते फिरते हैं, तब तक आहार ग्रहण योग्य है । अन्यथा नहीं यह सूचित हो इसलिए वे स्थिति भोजन करते हैं। अपने दो हाथ में ही भोजन करना, यह बैठकर पात्र के द्वारा अथवा अन्य के हाथ से से मैं भोजन नहीं करूंगा इस प्रतिज्ञा का पालन करने के लिये समझना चाहिये। अपने हाथ के तल शुद्ध होते हैं और स्व हस्त में भोजन करने से बहुत अन्न का विर्सजन-छोड़ देना नहीं होता है (यदि पात्र में भोजन मुनि. करेंगे तो सर्व पाहार से भरी हुई थाली छोड़ देंगे । तथा ऐसा छोड़ना दोष है । इंद्रिय संयम और प्राणि संयम का पालन करने के लिये मुनि खड़े होकर भोजन करते हैं ! मुनि जन जब तक आहार करते हैं तब तक समपाद व अलिपुट धारणा करके ही रहे । यदि उसमें समपादता विगड़ जायगी या अञ्जलिपुट छूट जायगा तो याहार छोड़ना चाहिये । क्योंकि यह अन्तराय हुमा है ऐसा समझना चाहिये ।। एक भक्त का स्वरूप
उदयत्थमरणे काले गालीतियवज्जियम्हि मज्झम्हि । एकम्हि : . दुध लिए. मुहुत्त कालेय · भत्तं तु ॥६६३॥ .
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३१० ]
[ गो. प्र. चिन्तामगि
सूर्योदय की तीन घटिका और सूर्यास्त की तीन घटिका छोड़कर बीच के एक मुहूतकाल में, दोनों मुहूतकाल में किंवा तीन मुर्हत काल में जो ग्राहार लेना वह एक भक्त है ।
विशेषार्थ :- तीन घटिका प्रभास उदयकाल और ग्रस्तकाल को छोड़कर तथा मध्यान्ह सामायिक काल भी छोड़कर मध्य काल में भोजन करना यह एक भवत है । अथवा अहोरात्र मध्ये मोज़न वेला दो हैं । उसमें से दिन को भोजन बेला में ऊपर के कथानुसार भोजन करना एक भक्त है। एक भक्त और एक स्थान इसमें फरकतीन मुल के बीच में एक स्थान में चरण-विक्षेप न करके अर्थात् एक स्थान छोड़कर अन्य स्थान में न जाकर भोजन करना एक स्थान है और तीन मुर्हत में एक क्षेत्र की मर्यादा न करते हुए अन्यत्र भोजन करना एक भक्त है। प्रायश्चित्त ग्रंथ में एक स्थान उत्तर गुण है व एक भक्त मूल गुण है ऐसा कहा है। यह भेद इंद्रिय जय, अभिलाषा का त्याग, महा पुरुषों का आचरण अपन पायें इस हेतु से किया है ।
प्रश्न : - इस प्रकार महाव्रत में भेद क्यों किया है ?
उत्तर :-- छेदोपस्थापना संयम के ग्राश्रय से ग्रहिंसा, सत्य, ग्रवीर्य इत्यादि पांच भेद होते हैं ।
प्रश्न :- महाव्रत और समिति में क्या विशेषता है ?
उत्तर :- महाव्रत और समिति में प्रभेद है ऐसा समझना योग्य नहीं है । समिति में जाना, बैठना, भोजन करना मल मूत्र क्षेपण करना इत्यादिक क्रिया यत्ताचार पूर्वक होती हैं । अर्थात् समिति क्रियात्मक है और महाव्रत अक्रियात्मक है श्रर्थात् परिणामात्मक होने से प्रक्रियात्मक है । मैं हिंसा वगैरह पापों का सर्वथा त्याग करता हूँ ऐसा संकल्प महाव्रतों में है बाह्य क्रियात्मकता उनमें नहीं है इसलिये वे क्रियात्मक हैं |
ये महाव्रत श्री समिति धारण करने से आत्मा को दुःख होता है ऐसा समझना प्रयोग्य है । जैसे वैद्य रोगी का फोड़ा फोड़ता है तो रोगी का दुःख दूर करता है | वैसे महाव्रत समिति का याचरण दुःख के लिये नहीं है । उनसे सुख की प्राप्ति होती है ।
तप और गुप्ति का कहां अन्तर्भाव होता है ?
अनशन तप - भोजन का त्याग करना, उसके तीन प्रकार हैं। मैं मन के द्वारा
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अध्याय : पांचवां ]
भोजन करही करूंगा, अन्य को भोजन नहीं कराऊंगा, मैं अनुमति नहीं दूंगा। मैं भोजन करता है, तुमको भोजन करो ऐसा नहीं कहता हूँ । चार प्रकार के शरीर से ग्रहण नहीं करता हूँ । हाथ के इशारे से दूसरे को हूँ और भोजन में प्रवृत को शरीर से अनुमति नहीं देता हूं। वंधन की कारणभूत ऐसी मन, वचन व शरीर की क्रियाओं का त्याग करना अनशन तप है ।
प्रवृत नहीं करता
इस प्रकार कर्म
४.
५.
[ ३११
भोजन करने वाले को भोजन कराता हूँ, तुम प्रहार का संकल्प पूर्वक
७.
अमोदर्य तृप्ति और दर्प उत्पन्न करने वाले भोजन का मन, बचन, काय से त्याग करना अर्थात् अल्प भोजन करना ।
वृत्ति परिसंख्यान - घर, पात्र, दाता इत्यादिकों का नियम करके आहार संज्ञा को जीतना ।
रस परित्याग -- मन, वचन और शरीर से रस व
काय क्लेश- शरीर में सुखाभिलाषा का त्याग करना ।
विविक्त शय्यासन -चित्त की व्याकुलता के कारण जहां नहीं है ऐसे एकान्त स्थान में सोना और बैठना । इस प्रकार बाह्य तप के छह प्रकार हैं | अभ्यंतर
लंपटता को छोड़ना ।
तब वर्णन इस प्रकार समझना --
आलोचना -- स्वयं किये हुए अपराध नहीं छिपाना ।
प्रतिक्रमण - स्वतः उत्पन्न किये अशुभ मनो वचन काय की प्रवृत्तियों से हटना अर्थात् मेरी यह प्रवृत्ति मिथ्या हो, ऐसी खोटी प्रवृत्ति नहीं करूंगा ऐसा संकल्प
करना ।
तदुभव -- उपर्युक्त दोनों का त्याग करना अर्थात् दोषों को न विपाना और शुभ प्रवृत्ति का त्याग करना ।
४. विवेक -- जिससे यथवा जिसमें अशुभयोग हुआ था उस वस्तु को छोड़ना, उससे
दूर होना
कायोत्सर्ग - देह के ऊपर ममत्व नहीं रखना ।
तप — उत्पन्न हुए दोपों का परिहार करने के लिये उपवासादिक करना ।
·
छेद ---- संयम से ग्लानि होने के लिये दीक्षा के दिन मासादिक कम करना ।
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जनिक
[ गो. प्र. चिन्तामगिए ८. मूल-पुनः चारित्र ग्रहण करना अर्थात् पुनः मुनि दीक्षा बारगा करना मूल
प्रायश्चित है। ६. परिहार---ऋषि, अति, अनगार, मुनि ऐसे चार प्रकार के संघ से कुछ काल तक
बहिष्कार करना यह परिहार प्रायश्चित है । - श्रद्धान—मिथ्यात्व को प्राप्त हुए मन को लौटाकर सम्यग्दर्शन में स्थिर करना ।
. विनयतप-अशुभ क्रिया करना ये दर्शन, ज्ञान, चारित्र व तप के अतिचार ... हैं। इन अतिचारों को दूर करना यह बिनय तप है।
.. वयावृत्य-चारित्र के कारण रूप औपध, शरीर शुश्रुषा, मल मूत्र साफ करना यह वैयावृत्य तप है।
स्वाध्याय -- अंग व पूर्वो का निदॉप विधि पूर्वक अध्ययन करना। ध्यान-शुभ विषय में वित्त को स्थिर करना ध्यान हैं।
गुप्ति--साबद्य-पाप योग से आत्मा का रक्षण करना । गुक्ति के मनोगुप्ति, बचनगुप्ति, श्रार काय गस्ति ऐसे तीन भेद हैं। सब प्रकार के तप, गुप्ति और नित्य क्रियाओं का अन्तर्भाव मूल गुरणों में ही होता है और कादाचित्व क्रियाओं का अर्थात् ..
आतापनादि योगों का उत्तर गुणों में अन्तर्भाव होता है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और चारित्र का भी मूल गुराणों में ही अन्तर्भाव होता है। कारण इनके बिना मूल गुणा होता ही नहीं। मूल गुण पालन करने से फल--- ..
एवं विहारगजुत्ते मूल गणे पालिऊण तिविहेण । होऊण जगादि पुज्जो अक्खय सोक्खं लहदि मोक्खं ।।६६४॥
ऊपर कहे हुए प्रकार से सम्यक्त्व, सम्यग्ज्ञानादि पूर्वक कम से कहे हुए अठ्ठावीस मूल गुणों को मन, वचन और शारीर से उत्तम रीति से निर्दोषं पालन करके मुनीराज जगत में पूज्यनीय होते हैं और अन्त में बाधा रहित, अष्टकों के नाश से मोक्ष सुख को पाते हैं। अन्तरायों का स्वरूप .. कागा मेज्झा छद्दी रोहण रूहिरं च अस्सुवादच ।
जण्हहिछामरिसं जाहुबरि बदिक्कमो . चेव ।।६६५।।
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अध्याय : पांचयां ]
१. काक नाम का अन्तराय-काक शब्द से बक, श्येन अर्थात् बाज वगैरह
पक्षिओं का भी उपलक्षरण से ग्रहण करना चाहिये । मुनि आहार को जा रहे हैं अभया पाहा. लिये बड़े हो गये हैं ऐसे समय यदि कौवा, बक और श्येन वगैरह पक्षी मुनियों के शरीर पर मल मूत्र करेंगे तो भोजनांतराय होता है। अमेध्यान्तराय-अपवित्र विष्टादिक से पादादिक लिप्त होने पर भोजनां
तराय होता है। . . ३. छर्दि-मुनिराज को बमन होना । ४. रोधन -ग्राहार के लिए. तुम नहीं जा सकते ऐसा कहकर प्रतिबंध करना । ५. रुधिर—अपना रक्त अथवा अन्य का रक्त देह से चार अंगुल पर्यन्त बहता
हुअा दृष्टिगत होने पर भोजनांतराय होता है। इससे कम वहने पर अन्तनहीं है। गाथा में च शब्द पाया है उससे पीव प्रादि पदार्थ अपने या पर के देह से चार अंगुल पर्यन्त बहते हुए दीखने पर भी नन्तराय समझना
चाहिये। ६. प्रच पाल---दुःख से अपने नेत्रों में तथा पर के नेत्रों में यदि अश्रु आते हो तो
भोजनांतराय होता है । जावधः परामर्श-गोडे घोटे के नीचे यदि हाथ से स्पर्श हो जावे तो
अंतराय होता है। ८. जान परिव्यतिक्रम-गोडे के ऊपर के अवयवों का स्पर्श होने पर अंतराय
होता है। रणाभिप्रधोणिग्यमणं पच्चाक्खिय सेवा य जंतुबहो ।
कागादि पिंड हरणं पाणीदो पिंड पडणं च ॥४०॥ ६. . नाभ्यधोनिर्गमन-नाभि के नीचे मस्तक करके यदि जहाँ अाहार को जाना
पड़ता हो तो वह अन्तराय होता है। प्रत्याख्यात सेवन—जिस वस्तु का देव, गुरु की साक्षी से त्याग किया है. उस वस्तु को भक्षरण करना अाहार का अन्तराय होता है। जंतुवध-अपने सामने मार्जारादिक के द्वारा चूहा वगैरह प्राणी का वध होना ।
..
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३१४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिग १२. काकादिपिड हरण---कौवा, गीध पक्षी इत्यादिकों के द्वारा साधु के हाथ से
अन्न का ग्रास हरण करने पर भोजनांतराय होता है। १३. पिंड पतन ---भोजन करते समय मुनि के हाथ से ग्रास गिर जामा ।
पाणीए. जंतुबहो मंसादी दंसणे य उवसग्गो।
पादतरमि जीवो संपादो भायरगाणं च ॥४१॥ १४. पाणौ जन्तु वध-हस्त पात्र में प्राणी अाकर स्वयं यदि मरे तो अन्तराय है ।
मांसादि दर्शन-मांस, मद्य और मरे हुए पंचेन्द्रिय का शरीर ये पदार्थ
दीखने पर अंतराय समझना । १६. पादान्तरे जीव-आहार लेते समय दोनों पावों के बीच में से पंचेन्द्रिय जीव
का निकल जाना। १७. देवाद्य पसर्ग--देव, मनुष्य, तिर्यचों में से किसी के द्वारा ग्राहार लेते समय
मुनि को उपद्रव होने पर अंतराय होता है। १५. भोजन संपात-परोसने वाले के हाथ से पात्र गिर जाने पर अंतराय होता।
।
२०.
उच्चारं पस्सवणं अभोज्जगिहपोवेसरणं तहा पडणं । उववेसणं सदंसं भूमी संफास गिळवणं ॥४२॥ उच्चार-पाहार के समय अपने उदर में से मल-विष्ठा यदि निकलेगा तो. अन्तराय होता है। प्रस्त्रधरण ----मूत्र और शुक्रादिक यदि निकलेंगे तो अन्तराय होता है । अभोज्य गृह में प्रवेश याहार के लिये निकले हुए साधु का यदि चांडालादि अस्पृश्य लोगों के गृह में प्रवेश हो जाय तो अंतराय होता है । "प्रभोजिगिह भोजणं" ऐसा भी पाठ है । इस पाठ का अर्थ-भोजन के लिये अयोग्य ऐसे चांडालादिक अस्पृश्य लोक अभोज्य माने जाते हैं और सूतक पातकादिक का. संबंध जिनको प्राप्त हुअा है ऐसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भी अभोज्य . माने जाते हैं इनके घर में भोजन करना अन्तराय है ।। पतनं---भ्रम, थकावट, मूर्छादिक से यदि साधु गिर जाय तो अन्तराय है । उपवेशन--साधु यदि बैठ गये तो अन्तराब है। सदक्ष-कुत्ता, बिल्ली वगैरह का दंश होने से अन्तराय है ।
. २२.
२३.
PHOT
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[ ३१५
भूमि स्पर्श - सिद्ध भक्ति होने पर हाथ से भूमिका स्पर्श हो जाये तो ग्रन्तराय है ।
अध्याय : पाँचवां ]
२५.
२६. निष्ठीवन - कफ, थूक आदिक यदि मुनि के द्वारा जमीन पर किया जाय तो अन्तराय होता है । हाथ से मुनि भूमि पर कुछ वस्तु ग्रहण करे तो अन्तराय होता है ।
प्रदत्तग्रहणं पहारगामडाहो ।
उदरविकभिणि आमणं पादेख किनि गनुमं
करेण वा जं च भूमिए ॥ ६६६ ॥
उदर क्रिमि निर्गमन - पेट में से यदि कृमि निकले तो अंतराय होता है । प्रदत्त ग्रहण - नहीं दी हुई वस्तु का ग्रहण करना ।
प्रहार - अपने ऊपर अथवा अन्य के ऊपर प्रहार हो तो ।
ग्राम दाह--गांव में यदि श्राग लगी हो तो ।
पादेन किञ्चिद्ग्रहणं - पाद से पांच से यदि कुछ वस्तु भूमि पर से ग्रहण की जाय तो आहार का अंतराय होता है ।
एदे श्रणे बहुगा कारण भूदा प्रभोजणस्सेह |
वोह लोग दुर्गा रंग संजम स्पिव्वेदठठं च ॥ ६६७॥
पूर्वोक्त सर्व काकादिक अंतराय भोजन त्याग के अंतराय माने गये हैं । इनसे भी भिन्न दूसरे भोजन त्याग के हेतु माने हैं । वे इस प्रकार चांडालादि स्पर्श, कलह, इष्ट मरण, साथमिक संन्यास पतन, प्रधान मरण वगैरह । इन अंतरायों का पालन करना चाहिये । ये प्रन्तराय राज भय, लोकनिंदा यदि होगी तो संयम पालन के लिए व वैराग्य के लिये धारण करना चाहिये ।
चौदह मलों का वर्णन -
हरोमजंतु अठी कण कुंडयपूय चम्म रूहिरमंसारिण ।
बी फल कंद मूला खिष्णाणि भला चउदसा होंति ।। ६६८ ॥ मनुष्य अथवा तिर्यच के हाथ पैरों के नख, रोम-मनुष्य अथवा पशु का केश, जन्तु - मरा हुआ प्राणी ( द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय मरा हुवा प्राणी) अर्थात् . हीन्द्रियादि विकलत्रय जीवों का मृत शरीर । अठ्ठी अस्थि । १. करण-जी, गेहूँ वगैरह धान्य का बाह्य अवयव, २. कुडक-शालि वगैरह धान्य का अंदर का सूक्ष्म अवयव ।
-पका हुआ रक्त जखम में उत्पन्न होने वाला पीव । चर्म शरीर का चमड़ा - पहिला,
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[ गो. प्र. चिन्तामरिग
धातु, रुहिर-रक्त दूसरी धातु, गांव रत को मायामात दीयमातु, ६. बीज-अंकुर होने योग्य जौ, गेहूँ प्रभृति धान्य, फल-बीजसहित आम्र, बेर, वगैरह फल, कंद-जमीन में उत्पन्न होने वाला अंकुर की उत्पत्ति का कारण अथवा सूरण बगैरह्, मूल पीपल वगैरह वृक्षों के जड अदरख वगैरह चौदह मल हैं। इनमें कोई महा मल है, कोई अल्प मल-अल्प दोष है । रक्त, मांस, अस्थि, चमडा, पोव ये महादोष हैं । पाहार में इनके दर्शन से सर्व आहार का त्याग करके प्रायश्चित भी लेना चाहिये । द्वीन्द्रियादि विकलश्रिक का शरीर और बाल अन्न में यदि दिख पड़े तो ग्राहार त्याग करना चाहिये। नख दिन पड़ा तो आहार त्याग के साथ अल्प प्रायश्चित्त लेना चाहिये । अंकुरोत्पन्न धान्य, करण, कुंड, बीज, कंद, फल और मुल ये अन्न से अलग कर याहार कर सकते . हैं । अन्यथा आहार का त्याग करना चाहिये । सिद्ध भक्ति करने पर अपने शरीर में से अथवा भोजन परोसने वाले के शरीर से रक्त पीव यदि गलने लग जाय तो याहार . . का त्याग करना चाहिये ।
पिण्डशुद्धि आदि का वर्णन पिण्डशुद्धि के पाठ भेदों का स्वरूप
उगम उत्पादण एसणं च संजोजणं पमारणं च ।
इंगाल घूम कारण अथिहा पिण्डसुद्धी दु ।।६६६।। .. अर्थ-उद्गम दोष, उत्पादन दोष, एपणा दोष संयोजन दोप, प्रमाण दोष, इंगाल दोष, धूम दोष और कारण दोघ ऐसे पिण्ड शुद्धि के पाठ दोप है। इन दोषों से रहित पिण्डशुद्धि होती है। तात्पर्य - पियशुद्धि के दोषों के सामान्य अाठ भेद हैं और विशेष भेदों का वर्णन आगे क्रम से प्राचार्य करेंगे ।
उद्गम दोष-दाता के रत्नत्रय का नाश करने वाले अभिप्रायों के द्वारा पाहार, श्रीपर, वसति और उपकरणों में जो दो दोष उत्पन्न होते हैं, उनको उद्गम दोष कहते हैं।
• उत्पादन दोष-यति के रत्नत्रय का नाश करने वाले अभिप्रायों के द्वारा जो ..: . दोष उत्पन्न होते हैं, उन्हें उत्पादन दोष कहते हैं ।
. एषणा दोष-जो मुनि के करपुट में आहार अर्पण करते हैं - परोसते हैं, . उनसे होने वाले दोषों को एपणा दोष कहते हैं ।
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अध्याय : पांचवां ]
[ ३१७
संयोजन दोष --- संयोग से होने वाले दोष को संयोजन दोष कहते हैं । प्रमरणातिरेक दोष — प्रमार से अधिक आहार लेना । इंगाल दोष – लम्पटता से आहार लेना ।
धूम दोष-निंदा से प्रहार लेना ।
कारण दोष---विरूद्ध कारणों से बना हुया याहार लेना । ऐसे पिण्डशुद्धि के दोषों के आठ विभाग कहे है । उद्गम दोषों का नामनिर्देश
उद्गम दोषों का नाम निर्देश
आधाकमुद्द सिय अभोवज्से यं पूदि मिस्से व । ठविदे बलि पाहुडिदे पादुक्कारे व कीदे य ॥७००॥ पमिच्छे परियहे अभिमुषिभण माल आरोहे | छज्जे श्रणिट्ठे उगमदोसा दु सोलसिमे ||७०१ ॥
श्रधः कर्म -- यह दोष गृहस्थाश्रित है । इसमें पंचशूना होती हैं । अर्थात् पानी भरना, भावना, रसोई करना, धान्य कूटना और पीसना इन कार्यों से
काय जीवों की विराधना होती है । विराधनारूप यह महादोष है । आठ प्रकार के freefer के दोषों से frन्न है, यह महादोष । निकृष्ट प्रवृत्ति को प्रथः कर्म कहते हैं। पकाय जीवों के समूह का इसमें बब होने से यह महादोष हैं ।
श्री शिक—उद्देश्य से आहार बनाना । अध्यधि-मुनियों को देखकर आहार बनाने को प्रारम्भ करना । पूति प्रासुक और अप्रासुक मिश्र श्राहार |
मिश्र असंयतों के साथ मुनि को आहार देना ।
स्थापित --- अपने घर में अथवा अन्य के घर में स्थापन किया हुआ प्रहार | बलि ---यक्षादिकों को अर्पण करके अवशिष्ट रहा हुआ आहार | प्रातकाल की हानि वृद्धि करके बनाया हुआ आहार |
प्राविष्करण बाहार के लिये साधु आने पर पडदा हटाना, भाजन भस्म से मांजना इत्यादि ।
बनाना ।
कीत - अन्न खरीदकर लाना ।
प्रामृष्य -- ऋण लेकर ग्राहार बनाना ।
परिवर्तन - शालि यादि देकर उसके बदले में ग्रन्य धान्य लेकर आहार
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३१८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
अभिघट - अन्य स्थान से अन्न लाकर मुनि को देना । उद्भन्न—उद्भन्न-भाजन के ऊपर का बंधन निकालकर आहार देना | मालारोह - घर के ऊपर सीडियों से बढकर आहार की वस्तु लाकर मुनि को ग्राहार देना
प्राच्छेद्य राजादि के भय से आहार देना ।
अनीशार्थ --- अप्रधान दाताओंों ने दिया हुआ याहार | ऐसे उद्गमादिक सोलह दोष हैं । इनका क्रम से वर्णन करते हैं । गृहस्थाश्रित अधः कर्म दोष का स्वरूप-
छज्जीवणिकायाणं विराहयोछावरणादिपिप्प
धाकम्म णेयं.
सयपरकदमादसंपणं ॥ ७०२ ॥
यह अधः कर्म दोष षट्काय जीवों की विराधना से होता है । अर्थात् पृथ्वी, जल ग्रग्नि, वायु, वनस्पति और बस जीवों को दुःख देना उसको विराधना कहते हैं । उद्घावन-जीवो का वध करना । जीवों को पीडा देकर और उनका नाश कर जो आहार बनाया जाता है, उस ब्रांहार को भी अधः कर्म दोष कहते हैं । यह दोष स्वयं करना, पर के द्वारा कराना, श्रथवा दूसरों ने किये दोप को अनुमति देना । जीवों को पीडा देकर और उनका नाश कर यह दोष मुनि करेंगे तो उनका मुनियना नष्ट होगा । इसमें वैयावृत्यादिक गुण नहीं होने से मुनियों को यह कार्य सर्वथा वर्ज्य है । वैयावृत्यादिक से रहित और स्वतः के आहार लिये भोजन बनाना बटुकाय जीवों का नाश होने में निमित्त है । अतः यह दोष मुनि स्वतः नहीं करे और दूसरों से न करावें और करने वालों को अनुमति न देवे, मन, वचन, काय से न करें, न करावें, न अनुमति . देवे 1 अर्थात् नौ प्रकार से प्रवः कर्म का त्याग करे | यह दोष छियालीस दोषों से अलग । और यह गृहस्थ का कर्तव्य है । सुनि को इस दोष से सर्वथा दूर रहना चाहिये, ग्रह दोष करने वाला मुनि गृहस्थ होता है । मुनिपता का नाशक यह दोष है । मुनियों को घटका जीव वध का स्याग ही होता है, अतः मुनि हंस दोष से सर्वथा दूर रहते ही हैं। फिर इसका यहां क्यों न किया है। अन्य पाखंड साधु यह दोष पाया जाता है। वे ऐसा प्राविध युक्त बाहार बनाते हैं, वैसा जैन मुनि नहीं करे। अन्य साधु ऐसा श्राहार बनाते हैं, अतः वे गृहस्थ हैं । जैन मुनि निष्परिग्रही है । उनको यह दोष निषिद्ध है ।
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श्रध्याय: पांचवां ]
उद्गम दोषों के सोलह भेद हैं । उनमें से पहिला श्रौशिक दोष है-देवदपाins किवि चावि जंतु उद्दिसि ।
कदम समुछे चदुविहं वा समासे ।।७०३
अधः कर्म महादोष है । उसके अनंतर प्रादेशिक दोष है । यद्यपि वह सूक्ष्म दोष है तो भी उसका त्याग करना चाहिये । देवता-नाग यक्षादिकों को देवता कहते हैं । पाखंडि जैन दर्शन से वाह्य मिथ्यादृष्टि कुतप करने वाले परिवाजक वगैरह साधु । कृपण-दीन लोक । देवताओं के लिये, पाखंडी साधुओं के लिए, दीन जनों के लिये जो श्राहार तैयार किया जाता है, उसे औशिक आहार कहते हैं । अर्थात् शिक दोष के संक्षेप से चार भेद हैं ।
शिक दोष के चार भेदों का स्वरूप --
[१
जावदियं उद्द सो पाडोति य हवे समुद्दे सो |
समणोति य श्रादेसो खिगंधोलि य हवे समादेसो ||७०४ ||
यावानुद्देश - जो कोई मागे उन सबको मैं भोजन देऊंगा ऐसा उद्देशसंकल्प मन में करके जो भोजन बनाया जाता है, उसको यात्रानुद्देश कहते हैं । जो कोई पाखंडी आयेंगे उन सबको आहार देऊंगा, ऐसे उद्देश से बनाये गये अन्न को पाखंडी समुद्देश कहते हैं । जो कोई श्रवगा, श्राजीवक, तापस, रक्तपट, परिव्राजक और छात्र शिष्य यावगे उन सबको मैं आहार देऊंगा ऐसे संकल्प से बनाये हुए अन्न को श्रमादेश यह संज्ञा है । जो कोई निर्बंध मुनि श्रावेगे उनको मैं ग्राहार देऊंगा ऐसे उद्देश से न किया जाता है, उसको निग्रंथ समादेश कहते हैं । तात्पर्य सामान्य के उद्देश्य से, पाखंडियों के उद्देश्य से, श्रमणों के उद्देश्य कर और निर्ग्रथों के उद्देश्य कर जो ग्रन्न बनाना वह चार प्रकार का प्रौद्देशिक दोष होता है । उद्देश से बनवाये आहार को प्रदेशिक प्रहार कहना चाहिये । अध्यधि दोष का स्वरूप-
जल तंदुलक्खेवो चारपट संजदारण सपथ |
भोज्यं यं श्रहवा पागं तु जाव
रोहो वा ॥१७०५॥ -
अपने लिये जो अल पकाया जाता है। उसी में संयत को देखकर उसके लिये भी जो पानी और तंदुलादिकों का पुनः अधिक क्षेपण करना उसको अध्यधि दोष. कहते हैं अथवा जितने काल में प्राहार तैयार होगा उतने काल तक प्रहार के लिये
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३२० ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
प्राये हुए मुनिराज की पूजा के लिये और धर्मप्रश्न आदि के निमित्त स्थापन करना वह भी दोष है ।
प्रति दोष का स्वरूप ---
reater frei पासुदव्वं तु पूदि कम्मं तं ।
चुल्ली उक्खलि दव्वी भायसगंधति पंचविहं ॥ ७०६ ॥
प्रासुक ऐसा भी अन्न श्रप्रामुक सच्चित्तादिक ग्रन्न के साथ मिश्रण करने से पूलि दोष उत्पन्न होता है । अथवा प्रागुक होने पर भी जिसमें संकल्प किया जाता है, उसको भी पूतिकर्म दोष पांच प्रकार का है। जैसे- चुल्लि जिस पर ग्रन्न पकाया जाता है, ऐसी सेगडी अथवा चूल । उनखलि जिसमें चटणी आदि कूटकर किये जाते हैं | द संडासी | भाजन प्रान्त पकाने का पात्र | गंध-गंध युक्त द्रव्य । चूल के ऊपर भात यादि पकाकर साबुको प्रथम देंगे नंतर स्वतः अथवा इतर लोगों को देऊंगा ऐसी कल्पना से प्राशुक भी द्रव्य पूतिकर्म से निष्पन्न होने से पूति कहा जाता है । उद्खल - इस उखली में चुर्ण कर जब तक वह ऋषियों को नहीं देऊंगा तब तक स्वतः के लिये अथवा अन्य के लिये वह उपयोग में नहीं लाऊंगा ऐसी कल्पना से यह उदुखली नामक पूतिकर्म दोष है । यद्यपि वह चूर्गा प्रसुक है तो भी उपर्युक्त संकल्पना से पूर्ति कर्म होता है । दर्वी संडासी से जब तक मुनि को आहार मैं कहीं दूंगा तब तक स्वः को अथवा अन्य को वह योग्य नहीं है ऐसे संकल्प से यह भी पूतिकर्म दोष है । गंध - यह मंत्र जब तक ऋषि को भोजन पूर्वक नहीं दूंगा तब तक ग्रन्थों को नहीं दूंगा । ऐसे संकल्प से यह भी पूतिकर्म दोष होता है। इस प्रकार पूतिकर्म दोष पाँच प्रकार का है । दाता उपर्युक्त संकल्प करके चुल्ली वगैरह से प्रथम प्रारम्भ कर्म करता है, यतः ऐसे आहार को यदि छोड़े देते हैं। यद्यपि इसमें आहार के ग्रन्नादिक पदार्थ प्रासुक हैं तो भी दाता के उपर्युक्त संकल्प से सदोष हैं, ऐसा समझाना चाहिये ।
-
मिश्रदोष के स्वरूप का निरूपण.....
-
पासंडेहि य सद्धं सागारेहिय जदण्समुद्दिसियं ।
दादुमिदि संजदाणं सिद्ध मिस्सं विद्यााहि २१७०७ ।।
प्रासु अन्न तैयार होने पर भी अर्थात् भात यादि अन्न प्रासुक होने पर भी पाखंडियों के साथ और गृहस्थों के साथ मुनियों को जो देने का संकल्प किया
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अध्याय : पांचवां ] जाता है, तब वह अन्न मिश्र दोष से युक्त होता है । पाखंडियों के साथ मुनियों को आहार देने से और गृहस्थों के साथ उनको आहार देने से मुनियों का यथा योन्य प्रादर नहीं हो सकता, अत: इस प्रकार के ग्राहार दान में अनादर दोषं उत्पन्न होता है । तथा पाखंडियों के साथ मुनियों के दान में स्पर्शदोष उत्पन्न होता है, क्योंकि पाखंडी चाहे जहां उनन्द्र मीच लोगों के नरसाहारते हैं : .तथा पाखंडी स्वतः उच्च और नीच जाति के भी होते हैं, अतः इनके साथ मुनियों को बाहार देने से स्पर्श दोष भी उत्पन्न होता है। स्थापित दोष का स्वरूप---
पागाद् भायपाश्री अण्णम्हि य भायणस्मि पक्वविय। सघरे व परघरे वा रिपहिवं विदं वियागाहि १७०८३..
जिस स्थाली में आहार पकाया था, उसमें से बह आहार निकाल कर अन्य स्थाली में-पात्र में वह स्थापना करके स्वगृह में अथवा परगृह में ले जाकर स्थापन करना वह स्थापित दोष है। दाता में भय होने से यह आहार के पदार्थ अन्य भाजन में रखकर अपने अथवा दूसरे के घर में रखकर दान देता है नथवा उसके साथ. उसके स्थजनों का विरोध होने से वह अन्य के घर में आहार के पदार्थ रखता है, अतः ग्रह दान भय और विरोधादि दोषों से दूपित होता है ।। बलिदोष का स्वरूप----
जक्खयणागादोरणं बलिसेसं बलित्ति पणतं । संजद प्रागमणटै बलियम्म वा बलि जाणे ॥७०६॥
यक्ष, नाग, मातृका, कुलदेवता, पितर आदि के लिए जो बलि किया जाता है, उसमें से बचा हुआ जो बलि का अंग्ण वह मुनि के लिए भी उपयोग में लाना, यह वलि दोष है । अथवा नागयज्ञादि के लिये जो बंदनादिक उपयोग में लाकर अवशिष्ट रहे थे, उनका मुनियों के पूजा में भी उपयोग करना यह वलिदोष है, किंवा मुनियों को स्थापन कर चन्दनादिक अर्पण करना, उदक क्षेपण करना, पुष्पफल पत्रादिक तोड़कर उससे अर्चन करना यह सावद्य दोष से युक्त होने से दोष मुक्त माना
प्राभत दोष के स्वरूप का निरूपण
'पाहुडियं पुरण दुविहं बादर सुहमं च दुधिहमेक्केवकं । सोकस्सरण मुक्कस्सरण महकालो वट्ट पावड्ढी ॥७१०।।
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३२२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि प्राभूत दोष के बादर और सूक्ष्म से दो भेद हैं। पुनः बाहर के उत्कर्षगर और अपकर्षण ऐसे दो भेद हैं। सूक्ष्म के भी उत्कर्धरण और अपकर्ष ऐसे दो-दो भेद होते हैं । बादर के दो भेद और सूक्ष्म के दो भेद---
दिवसे पक्खे मासे वास परत्तीय बादरं दुविहं । पुव परमज्भवेलं परियत दुविह सुहुमं च ॥७११॥
ठहाया हुआ-निश्चित किया हुआ दिवस, पक्ष, महिना और वर्ष को बदलकर जो दान दिया जाता है, वह बादर प्रामृतकदोप से दूषित होला है । यह . बादर प्राभृतकदोप दो प्रकार का है। उसका खुलासा-शुक्लाष्टमी के दिन देने के लिए निश्चित किया आहार, दिन कम करके शुक्लपंचमी के दिन देना। और शुक्ल पंचमी के दिन आहार देने का निश्चय बदलकर शुक्लाष्टमी को याहार देना । यह दिवस परावृत्ति-प्राभृतकदोष है । चैत्र शुक्ल पक्ष में देने का निश्चय बदलकर चैत्र कृष्ण पक्ष में देना और चैत्र छग में देने का निश्चय बदलकर चैत्र शुअल में देना । चत्र मास में याहार देने का निश्चय बदलकर फाल्गुन में देना और फाल्गुन का आहार देने का निश्चय बदलकर 'चैत्र मास में ग्राहार देना यह पासपरावृत्ति- ।। प्राभुतकदोग है । आगे के वर्ष में देने का निश्चय बदलकर अब के वर्ष में दान देना : तथा सांप्रतिक वर्ष का निश्चय बदलकर उत्तरवर्ष में आहार देना निश्चित करना इस . प्रकार बादर प्राभूत के दो भेदों का वर्णन किया है !
सूक्ष्म प्राभूत के दो भेद इस प्रकार समझना चाहिए-दिन के पूर्व काल में आहार देने का निश्चय बदलकर मध्यान्हकाल में देना, मध्यान्हकाल का निश्चय बदलकर पूर्वान्हकाल में देना । इस प्रकार काल को हानि और वृद्धि के आश्रय से प्राभतक दोष के दो भेद कहे हैं। संबलेश परिणाम और आरम्भ दोष इनमें दीखता हैं, अतः ये दोष दाता के द्वारा त्याज्य हैं। प्रादुष्कार दोष का वर्णन
पादुक्कारो दुविहो संकमणपघासणा च बोद्धव्यो । भायरए भोयण दीरए मंडल - बिरलादियं कमसो ॥७१२।। .
प्रादुष्कार दोष के संक्रमग्य और प्रकाशन ऐसे दो भेद हैं। संक्रमण प्रादुष्कार दोष--भोजन और भोजन के पात्र एक स्थान से स्थानांतर में ले जाना ।
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अध्याय : पांचवां ]
[ ३९३
प्रकाशन प्रादुष्कार-याहार के उपयुक्त पात्र भस्मादिक से मांदना धोना श्रथवा श्राहार. उपयुक्त पात्र फैल कर रख देना । छत चन्द्रोपक वगैरह ऊपर लगा देना, भीत और जमीन गोवर और मिट्टी से लेपना, साफ सुथरी करना, दीपक जलाना इत्यादिक कार्य करना प्रादुष्कार दोष का स्वरूप है। ये कार्य करते समय ईशुद्धि नहीं रहती है, ग्रतः यह दोष उत्पन्न होता है । एक स्थान से अन्य स्थान में आहारादिक के पात्र ले जाते समय ईयपथशुद्धि का पालन करना चाहिए। वह न होने से प्रादुष्कार दोप उत्पन्न होता है ।
क्रीततर दोष का स्वरूप
कीदयर्ड पुण दुहिं दव्वं भावं व सग परं बुविहं । सच्चित्तादी दव्वं विज्जामंतानि भाव च ॥७१३॥ क्रीततर के द्रव्य और भाव ऐसे दो भेद हैं । द्रव्य के भी स्वद्रव्य और परद्रव्य ऐसे दो भेद हैं। भाव के स्वभाव और परभाव ऐसे दो भेद हैं। गाय, भैंस, ara इत्यादि को द्रव्य कहते हैं । विद्या मन्त्रादि को भाव कहते हैं । गाय, भैंस, ग्रश्व आदि को सचित्तद्रव्य कहते हैं और तांबूल वस्त्रादिकों को अचित द्रव्य कहते हैं । जब मुनि आहार के लिए श्रावक के घर में जाते हैं उस समय श्रावक अपना अथवा अन्य का सचित्तादि द्रव्य और तांबूल वस्त्रादिक अन्य श्रावक को देकर उससे बहार
कर यदि मुनिराज को आहार देगा तो क्रीत दोष उत्पन्न होता है । तथा स्वमंत्र अथवा परमंत्र, स्वविद्या अथवा परविद्या देकर प्रहार प्राप्ति कर लेता है और यति को वह प्रहार यदि श्रावक देगा तो यह भी क्रीतदोष कहा जाता है । प्रज्ञयादिकों को विद्या कहते हैं और चेटक आदि को मंत्र कहते हैं । इनके द्वारा प्रहार उत्पन्न करके मुनि को शाहार देने में कारुण्यदीप उत्पन्न होता है, संक्लेश परिणाम भी उत्पन्न होते हैं ।
ऋण दोष का स्वरूप
हरियरिणं तु भरियं पामिच्छे प्रदरणादि तं पुरण दुविहं भणिदं सवाढियमवड्ढियं लघु ऋण को 'दहरिय' कहते हैं । भात वगैरह है । यह ऋण और अन्नादिक वृद्धि सहित और वृद्धि रहित ऐसे दो प्रकार के हैं । इनका स्पष्टीकरण इस प्रकार से समझना जब मुनि बाहार के लिए जाते हैं । तब
अन्न को पामिच्छा कहते
पदरं ।
चापि ॥७१४॥
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३२४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
दाता अन्य श्रावक के घर में जाकर प्रनादिक की याचना करता है, अर्थात् मेरे घर पर मुनि ग्रहार के लिए श्रायें हैं, यदि इस समय आप मेरे को अन्नादिक देंगे तो मैं आपको उससे अधिक प्रथवा उतने ही यन्नादिक बस्तु दूंगा, इस प्रकार कहकर उनसे अन्नादिक लेकर मुनि को देना यह प्रामृप्यदोप है। इस प्रकार से आहार देने में दाता के परिणामों की निर्मलता नहीं रहती है और आहार लेने के लिए अनेक घरों में जाने के कष्ट भी होते हैं, अतः इस प्रकार से आहार देना सदीप माना है। ऋण लेकर दान देना यह दोष है ।
परावर्त दोष का स्वरूप
वीही करावीहि य सालीकूरादियं तु जं गहिदं ।
दादुमिदि संजदारणं परिय होवि खापव्वं ॥ १७१५।।
अन्य श्रावकों के पास जाकर व्रीहियों के भात वगैरह पदार्थ देकर उनसे शाल्योदनादि पदार्थ लेकर मुनियों को ग्राहार देना यह परिवर्तन नामक दोष है । अथवा मंडकादिक पदार्थ देकर व्रीहिनों का भात वगैरह उनसे लेना यह परिवर्तन दोष है । इसमें दाता को संक्लेश परिणाम उत्पन्न होते हैं, अतः यह दोष है ।
अभिघट दोष का स्वरूप ---
देसोत्तिय सव्वति व दुविहं पुण अभिहडे वियाणाहि । श्रचिणमाचि देसाभिहडं हवे विदियं ॥७१६ ॥
देशाभिट और सर्वाभिघट ऐसे ग्रभिघट दोष के दो भेद हैं। किसी एक प्रदेश से आये हुए भात आदिक पदार्थ को देशा भिघट कहते हैं । अनेक स्थानों से प्राये हुए भात यादि पदार्थ को सर्वाभिट कहते हैं। देशाभिट के श्राचिन्नं देशाभिघट श्री अनाचिन्न देशाभिघट ऐसे दो भेद हैं।
श्राचिश और अनाचिन्न का स्वरूप ---
उज्जु तिहि सतह वा घरेहि जदि श्रागर्द दु श्राचिष्णं ।
परदो वा तेहि भवे तव्चिवरीवं प्रणाचिणं ॥ ७१७॥
सरल पंक्ति स्वरूप तीन अथवा सात घरों से प्राये हुए भात, लड्डू श्रादिक यन्न को प्राचिन्न कहते हैं । ऐसा अन्न मुनियों के ग्रहण योग्य माना है । उसमें दोप नहीं है । परन्तु जो एक पंक्ति में नहीं है, ऐसे घरों में से अन्नादिक लाते समय शुद्धि नहीं होती हैं । श्रतः प्रक्रमपत्तिस्थित घरों से आया हुआ याहार मुनियों
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अध्याय : पांचवां }
३२५
को निषिद्ध है। सर्वाभिघट दोष का स्वरूप ---
लब्बाभिघडं चदुधा सयपरगामे सदेस परदेसे। पुब्धापर पाडण यर्ड पढम सेसं पिरणादब्धं ॥११॥
सर्वाभिघट के स्वग्राम, परग्राम, स्वदेशे और पर ऐसे चार भेद हैं । जिस ग्राम में मुनि तिण्ठे हैं, वह स्वग्राम है। उससे भिन्न ग्राम को पराम कहते हैं । जिस देश में मुनि स्थित है, वह स्वदेश है और उसमे अन्य दंश को परदेश कहते हैं । स्वग्राम से पाये हुए अन्नादिक को स्वग्रामाभिघट दोष कहते हैं। स्वग्राम से पाये हए अनादिक को ग्रहण न करे। इसका स्पष्टोकरण-एक गली में से दूसरे गली में अन्नादिक को ले जाना, पूर्व की गली में से पश्चिम दिशा की गली में अन्नादिकले जाना, यह स्वग्रामाभिघट नामक दोष है। दूसरे ग्राम से अपने ग्राम को अन्नादिक लाना परनामाभिघट नाम का दोष है । अपने देश से अपने ग्राम को अन्नादिक लाना परनामाभिवट नाम का दोष है। अपने देश से अपने ग्राम को अन्नादिक लाना, यह परदेशाभिघट नामक दोष है। ऐसे सर्वाभिघट दोष के चार भेद हैं। इसमें दूर से अन्नादिक लाने से ईर्यापथ शुद्धि नहीं रहती है, अतः इस सर्वाभिवट दोष को त्यागना चाहिये। उभिन्न दोष का वर्णन---
पिहिवं लछिदियं वा प्रोसहाधिवसकरादि दव्वं । उभिदिऊरण देयं उविभाणं होदि रणादववं ॥७१६॥
ढक्कन से बंद किये हए अथवा कीचड़ से लिप्त किंवा लाख से मुद्रित ऐसे पात्रों में रखे हुए जो औपध, घी, गुड़, शवकर, लड्डू, खजूर, आदिक पदार्थ ढक्कन खोलकर बा मुहर तोड़कर यति को देना वह उभिन्न नामक दोष है । ढके हुए पात्रों
में चीटी प्रादिक जन्तु प्रवेश करते हैं और उस पात्र में से गुड़, खांड वगैरह पदार्थ __मनियों को देते समय चींटी प्रादिकों की बाधा होती है, अतः इस प्रकार का ग्राहार.
उभिन्नदोष से दूषित है। मालारोहण दोष का वर्णन
हिस्सेरणी कहादिहि रिणहिदं पूयादियं तु घेत्तूरग। मालारोह किच्चा देयं मालारोहण साम ।।७२०॥
• in .......
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[ गो. प्र. चिन्तामणि निसनी से चढ़कर घर के दूसरे मजले में-माडी रबखे हुए मंडक, लड्डू यादिक पदार्थ को लेकर मुनियों को देना, यह मालारोह नामक दोष है। निसैनी के द्वारा माड़ी पर से लड्ड आदिक पदार्थ लाने वाला दाता नीचे गिरकर पड़ने की संभावना है, दाता को अपाय होने की इसमें संभावना होती है, अतः यह दोष .. स्थाज्य हैं। अच्छेचदोष का स्वरूप
राजाचोरादीहि य संजद भिक्खा समं तु दरग । बीहेदूरण गिजुज्ज · अच्छेज्जं होदि गाददं ॥७२१॥
मुनियों को भिक्षा का कष्ट होता है, ऐसा समझकर राजा तथा राजा के समान अधिकारी व्यक्ति और चौरादिक श्रावकों को भय दिखा कर उनसे मुनियों को पाहार दिलाते हैं, इस प्रकार पाहार देना ग्रह आच्छेय नामक दोष है । राजादिक श्रावकों को इस प्रकार कहते हैं---तुम यदि यतियों को ग्राहार न देंगे तो तुम्हारा धन हम लूटेंगे, गांव से निकाल दंगे. इस प्रकार डराकर के जो दान दिया जाता है; .. बह पाच्छेद्य नामक दोग है। अनीशार्थ दोष के स्वरूप का विवरण
अरिगस8 पुरण. दुविहं इस्सरमहरिपस्सरं च तिवियप्पं । पढमिस्सरसारखं वत्तावत्तं व संधाडं ॥७२२॥
अनीशार्थ- प्रधान हेतु को अनीशार्थ कहने हैं, वह अनीशार्थ ईश्वर और अनीश्वर ऐसा दो प्रकार का है। अथवा धनेश्वर ऐसा पाठ है । जिस अन्न लड्डू ... ग्रादिक पदार्थ के अप्रधान अर्थ कारण है, उन लड्डू 'आदिक पदार्थों को अनीशार्थ कहते हैं। ऐसे पदार्थ को ग्रहण करने में जो दोष होता है, उस दोष को भी अनीशार्थ - कहते हैं । इस अनोशार्थ के ईश्वर और अनीश्वर ऐसे दो भेद हैं ।
. सारक्षईश्वर, यह दान का पहला भेद है 1 अमात्य पुरोहितादिकों को प्रारक्ष कहते हैं, अारक्षों से सहित दान देने वाले ईश्वर को सारक्षईश्वर कहते हैं । इसका
अभिप्राय-दाता के मन में मुनि को दान देने की इच्छा है तो भी वह नहीं दे सकता .. . है, क्योंकि दूसरे लोग देते समय उससे विरोध करते हैं । अर्थात् दाता को दान देता
है, परन्तु अमात्य पुरोहिताविक विरोध करते हैं, इस प्रकार से यदि उस दाता का . दिया हुया अन्न लेंगे तो यह पहला ईश्वर नामक अनीशार्थ दोष है ।
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ཚད་གསུམ་གྱི་ས་བབ་དང་རྒྱ་བས་ལག་ལ་བབ་པ་ཕྱིས་སུ་
KA
अध्याय : पांचवां ]
[ ३२७ अनीशार्थ --- जिस दान का अप्रवान पुरुप हेतु होता हैं, वह दान अनीशार्थ कहा जाता है । और ऐसे दान से उत्पन्न हुए. दोष को भी अनीशार्थ कहते हैं । यहाँ कार्य में कारण का उपचार किया है । दान ग्रहण करना यह कारण है और उससे उत्पन्न हुआ दोष कार्य माना जाता है। कार्य रूप दोष को कारण का नाम देने से कार्य में कारगा का उपचार हुअा है। .
___ यह अनीशार्थ तीन प्रकार का है---व्यक्त, अव्यक्त और संघाटक । अनीश्वर दानादिक का स्वामी नहीं माना जाता है। परन्तु व्यक्त-बुद्धी से, विवेक से कार्य करने वाले अनीश्वर को व्यक्तानीश्वर कहते हैं। ऐसे अनीश्वर के द्वारा दिया जाने चाला पाहार यदि मुनि ग्रहण करेंगे, तो यह व्यक्त अनीश्वर, अनीशार्थ नामक दोष होता है।
अव्यक्त अनीश्वर अतीशार्थ ----पानीश्वर दान का स्वामी नहीं माना जाता है, यह ऊपर कह चुके हैं । अव्यक्त:---जो अविवेक से कार्य करता है, ऐसे अनीशने दिया हुया अन्न ग्रहण करना वह अन्यक्त अनीश्वर नामक अनीशार्थं दोष है । ...
व्यक्ताव्यक्त अनीश्वर नामक अनीशार्थ दोष..इसकी ही संघाटक अनीश्वर नामक अनीशार्थ दोष ऐसा दूसरा नाम है | व्यक्त और अव्यक्त ऐसे अनीश्वर के द्वारा दिया जाने वाला पाहार साधु यदि ग्रहण करें तो यह दोष होता है । ऐसा आहार लेना अपायकारक है। अथवा इस दोष का स्पष्टीकरण इस प्रकार से भी होता है । ईश्वर-दान देने वाला अर्थात् दानपति स्वामी । व्यक्ताव्यक्त दानपति के द्वारा जिसका निषेध किया है, ऐसा दान यदि साधु ग्रहण करेंगे, तो बह व्यक्ताव्यक्तेश्वर नामक अनीशार्थ दोष होता है।
व्यक्ताव्यक्तेश्वर नामक अनीशार्थ दोष-जो दान का स्वामी नहीं है ऐसे अक्ताव्यक्त के द्वारा दिया हुआ जो दान मुनि ग्रहण करते हैं, तब यह दोष उत्पन्न होता है।
संघाटक-समुदाय -अर्थात् कोई पुरुष दान का निषेध करता है और कोई दान देता है । इस प्रकार का दान साधु ग्रहण करेंगे तो यह संघाटक नामानीशार्थ दोष है।
... ईश्वर व्यक्ताध्यक्त, संघाटभेद से दो प्रकार का है 1 ईश्वर-दान का स्वामी ग्राहार देने के लिये उद्य बत हुआ है और ईश्वर ही व्यक्ता, अव्यक्त, संघाट के द्वारा
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[ गो. प्र. चिन्तामि
३२८ ]
जब दान का निषेध करता है तब यह दोष उत्पन्न होता है ।
गाथा में जो 'च' शब्द है वह समुच्चयार्थक है उसका स्पष्टीकरण - ईश्वर दो प्रकार का है और अनीश्वार भी दो प्रकार का है। ईश्वर दानपति दान देता है और व्यक्त, अव्यक्त ऐसे अनीश उसका निषेध करता है । अथवा व्यक्त किंवा व्यक्त ईश्वर के द्वारा निषिद्ध दान को ग्रहण करना ऐसे दो भेद ईश्वरानीशार्थ के हैं। तथा व्यस्त और अव्यक्त अनीश के द्वारा निपिद्ध दान ग्रहण करना ये दो भेद धनीश्वर अनीशार्थ के होते हैं ।
संघटक के द्वारा निषिद्ध किया हुआ दान ग्रहण करना यह भी उपर्युक्त दोषों से भिन्न दोष है, क्योंकि इसमें सर्वत्र निषेध ही दिख पड़ता है ।
अथवा निसृष्ट शब्द का - मुक्त ऐसा अर्थ है अर्थात् जो निषेधा जाता है उसको निसृष्ट कहते हैं । जिसकी मनाई की गई है वह अनिसृष्ट है । अनिसृष्टं के ईश्वर और अनीश्वर ऐसे दो भेद हैं । पुनः चार भेद इस प्रकार होते हैं --- ईश्वर के सारक्ष, व्यक्त, अव्यक्त और संघाटक ऐसे चार भेद हैं। मंत्र्यादियुक्त स्वामी को सारक्ष कहते हैं । वालक स्वामी को अव्यक्त कहते हैं । प्रेक्षापूर्वकारी विवेकी स्वामी को व्यक्त कहते हैं । व्यक्ताव्यवत का समूह संघाटक कहा जाता है। इस प्रकार अनीश्वर के भी भेद हैं। इन्होंने निषेधा हुआ ग्रथवा दिया हुआ दान यदि साधु लेंगे तो प्रनिसृष्ट दोष होता है । इस प्रकार अनिसृष्ट दोप का विवरण हुआ ।
उत्पादन दोषों का प्रतिपावन
धादोदरिणमते प्राजीते वरिये य ते गिछे ।
कोघी मारी मायी लोही य हवंति दस एदे ||७२३| घादी - माता | दूत - वार्ताहर । निमित्त - ज्योतिष | आजीव-ग्राजीविका वनीपक-दाता के भनुकूल भाषण करना। चिकित्सा - वैद्य शास्त्र 1 क्रोधी, मानी, मायावी, लोभी इस प्रकार उत्पादन दोष के दस भेद हैं ।
goat पच्छा संयुदि विज्जामते य चुष्पजोगे छ ।
उत्पाद य दोसो सोलसमो मूलकम्मे य ३७२४।।
पूर्व स्तुति-दान ग्रहण के पूर्व दाता की स्तुति करना । पश्चात्स्तुति-दान ग्रहण के पश्चात् दाता की स्तुति करना । विद्या प्राकाशगामिनी, रूपपरावर्तिनी, शास्त्र स्तंभिनि इत्यादि विद्याओं का माहात्म्य कहना | मंत्र - सर्प विषं, वृश्विकविस दूर करने वाले मंत्र के द्वारा अपना महत्व दिखाकर दाता से आहार ग्रहण करना ।
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अध्याय : पांचवां ]
[ ३२०
चूर्ण, योग- शरीर को सुगंधित और भूषित करने वाले उबटन ग्रादिकों का उपदेश करना ये सब उत्पादन दोष हैं । मूल कर्म- जो वश नहीं हैं, उनको वश करना ऐसे सोलह उत्पादन दोष हैं ।
धात्री दोष का विवरण ----
मज्जम मंडधावी खेल्लावरणवीर अंबधादी य ।
पंच विध धादिकम्मेपादो घादिदोसो दु ॥७३५॥
जो बालक का संरक्षरण करती है पोषण करती है, उसको दूध पिलाती है, उसको कहते हैं । धात्री के पांच भेद हैं। उनका विवेचन - मार्जनधात्री-जो बालक को स्नान करवाती है उसको मार्जनधात्री कहते हैं। जो बालक को तिलक, अंजन और ग्राभूषण से सजाती है उसको मंडन धात्री कहते हैं । जो बालक को क्रीडा के द्वारा ग्रानंदित करती है, उसको क्रीडन चात्री कहते हैं । जो बालक को दूध पिलाती है, स्तनपान कराती है वह क्षीर यात्री है । जो बालक को अपने पास सुलाती है वह अंब धात्री है | ऐसे पांच धात्रियों के कार्यों से जो मुनि गृहस्थ द्वारा प्रहार उत्पन्न कराते हैं उनको यह धात्री नामक उत्पादनं दोष होता है। बालक को इस प्रकार से यदि तुम स्नान करोगे तो वह सुखी और रोग रहित होगा ऐसा उपदेश मुनि गृहस्थ को देते हैं । जिससे गृहस्थ आनंदित होकर मुनि को चाहार देगा । इस प्रकार से मुनि लेंगे तो उनकी यह धात्री नामक दोष उत्पन्न होता है ।
भूषित करने का देता हैं मुनि उस
जो मुनि स्वयं बालक को भूषित करते हैं तथा बालकों को का उपदेश गृहस्थ को देते हैं जिससे गृहस्थ खुश होकर उनको दान दान को यदि ग्रहण करेंगे तो उनको मंडन पात्री नामक उत्पादन दोष होगा, जो मुनि स्वयं क्रीडा सिखलाते है तथा बालक को क्रीडा के खुश रखने का उपदेश गृहस्थ को देते हैं और ऐसे उपदेश से आहार देने के लिये उक्त गृहस्थ का प्रहार जो लेते। हैं, उनको क्रीडन धात्री नामक उत्पादन दोष कहते हैं। जिससे दूध उत्पन्न होता है ऐसा उपाय कहना और योग्य उपाय से बालकों को दूध पिलाने का उपदेश देते है, तथा गृहस्थ संतुष्ट होकर मुनि को आहार देने के लिये प्रवृत्त होता है ।' तब वह आहार यदि मुनि लेंगे तो उनको क्षीर यात्री नामक दोष होता है, जो मुनि बालकों को सुलाने का उपाय बतलाते हैं, तब गृहस्थ संतुष्ट होकर उनको प्रहार देता है । उसको
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३३०
[ गो. प्र. चिन्तामणि
ग्रहण करने वाला साधु संवधात्री नामक दोष से दूषित होता है । इन दोषों से स्वाध्याय का नाश होता है, श्रतः ये दोष त्यागने चाहिये ।
तीनामक दोष का विवरण --
जल थल प्रायासगदं समरगामे सदेस परदेसे । संबंधिary raणं दूदो दोसो हबदि एसो || ७२६ ॥ स्वग्राम से परग्राम को पानी में नाम के द्वारा साधु जा रहे हैं ऐसे समय कोई श्रावक मेरे संबंधी जनों को मेरा संदेश आप कहो ऐसा कहता है तब बहु साधु उसके संबंधी को वह संदेश वहाँ पहुँचाकर कह देता है । तब वह संबंधीजन आनंदित होकर - दानादिक दे और साधु यदि वह लेंगे तो वह शाहार दूतों दोष युक्त होता है । स्वदेश से परदेश को जल में नौका के द्वारा साधु जा रहे हैं तब कोई गृहस्थ अपनी बार्ता संबंधी जन के पास पहुँचाने के लिये कहते हैं साधु वह वार्ता कह देते हैं तब ह संबंधी संतुष्ट होकर आहारादिक देता है और साधु यदि ग्रहण करेंगे तो यह भी दूती दोष होता है । उपर्युक्त प्रकार से एक गांव से दूसरे गांव को, एक देश से दूसरे देश को स्थल से किंवा आकाश से जाते समय मुनि को कोई गृहस्थ संबंधीजन के लिये कोई संदेश पहुँचाने के लिये कह दे और वह साधु उसको कहने पर वह संतुष्ट होकर दानादिक देता है । तब ऐसे दानादिक लेने से साधु दूती दोष से युक्त होते हैं । गृहस्थों के संबंधीजनों के सन्धि संदेश ले जाना सुनियों के लिये योग्य नहीं है । ऐसा दूतकर्म शासन में दोष उत्पन्न करता है।
निमित्त दोष का स्वरूप ----
सरं च वंजरग लक्खा चिण्णं च भोम्मलुमिणं च । तह व अंतरिक्खं प्रविहं होइ मितं ।।७२७॥१
अंग-हाथ पांव ग्रादिक शरीर के श्रवयव । स्वर-शब्द | व्यंजन तिल, मशकाfor चिह्न | लक्षण हस्ततलादिकों पर नन्दिक, आवर्त, पद्म, चक्रादिक प्राकृति | छिन्न-छेद खङ्गादि प्रहार प्रथवा चूहा आदि प्राणियों के द्वारा किये गये वस्त्रादि के छेदों को छिन्न कहते हैं। भूमि विभागों को भौम कहते हैं । सूर्य चन्द्रादिग्रहों के उदयास्त और गति को अंतरिक्ष कहते हैं । स्वप्न-निद्रित प्राणियों का हाथी, विमान aff पर आरोहण देखना ऐसे ग्राठ प्रकार का निमित्त है ।
व्यंजन- शरीर के ऊपर तिलादिक देखकर उनसे होनहार शुभाशुभ जाना
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श्राध्याय : पांचवां ।
[ ३३१ जाता है उसे व्यंजन निमित्त कहते हैं 1 अंग मस्तक, कंठ आदि अवयवों को देखकर पुरुष के शुभाशुभ जान लेना यह अंग निमित्त है । स्वर-शब्द मुनकर मनुष्य अथवा अन्य प्राणियों का शुभाशुभ जानना स्वरनिमित्त है । छेद-प्रहार अथवा वस्त्रादिक में छेद देखकर किसी पुरुष या अन्य का शुभाशुभ जानना भूमि निमित्त है । अन्तरिक्ष अाकाश में ग्रहों का युद्ध, अस्त, वजापात, उल्का पतन, नक्षत्र कंप इत्यादि देखकर राजा प्रजादिकों का शुभाशुभ जान लेना अन्तरिक्ष निमित्त है । लक्षगा-पुरुष अथवा नारी के लक्षण देखकर उनके शुभाशुभ कह देना लक्षण निमित्त है। स्वप्न को देखकर पुरुप अथवा अन्य का शुभाशुभ जानना वह स्वप्तनिमित्त है । 'गाथा में त्र' शब्द है उससे भूमिगर्जना, दिग्दाह इत्यादिकों का ग्रहण होता है इन निमित्तों से आहार उत्पन्न कराकर यदि मुनि श्राहार लेगा तो उसको निमित्त नामक उत्पादन दोष होता है । रसलपटता, दीनता वगैरह दोष इस प्रकार से प्राहार लेने में व्यक्त होते
साजीव दोष का निरूपण---
‘जादोकुल सि तवकम्म इसरत श्राजीवं । तेहि पुरण उत्पादो प्राजीव दोसो हदि एसो ॥७२८।।
जाति-माता के पीढियों की परंपरा अथवा माता के शीलादि गणों की निर्मलता । कुल-पिता के वंश की परम्परा अथवा पिता ग्रादिक पूर्वजों की सदाचार तत्परता । शिल्पकर्म-लेप, चित्र प्राधिक हस्तकला का चातुर्य । तपःकर्म-तपोऽनुष्ठान । ईश्वरत्व समाज में पादरणीयता, धनाढ्यपना । अपनी जाति और कुल का वर्णन सुना करके दाता को प्रसन्न करना और उसने दिया हुअा अाहार लेना यह प्राजीव दोष है। इस ही प्रकार से अपना कला चातुर्य, अपना तपश्चरण अादि वर्गन करके दाता के मन में स्वविषयक आदर उत्पन्न करने से वह पाहार देने में प्रवृत्त होने पर उससे आहारादिक लेना यह ग्राजीवक दोष है। इस प्रकार आहार लेने से अपना सामर्थ्य और दीनतादिक दोष प्रकट होते हैं। बनीपक वचन नामक दोष का निरूपण-----
साग किवण तिथि साहण पासडिय सवरएकागदाणादि ।
पुण्णं णवेति पुढे पुणेति वरणीवयं : वयणं ।।७२६।। :: कुत्ते, दोन कुष्ठादि रोग से पीड़ित जन, मध्याह्नकाल में आये हुए भिक्षुक ...
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३३२ ]
[गो. प्र. चिन्तामगि ब्राह्मण, मासादिक कामना करने की जोग, श्रमा-गाजीवक नाम के साधु अथवा छात्र-विद्यार्थी, काम वगैरह पक्षी, इनको दानादिकं देने से पुण्य प्राप्ति होती है अथवा नहीं होती है ? ऐसा प्रश्न पुछने पर दाता के अनुकूल यदि 'पुण्य होगा' ऐसा बचन साधु बोलेंगे तो बनीपकवचन नामक दोष होता है । दानगति के अनुकुल वचन बोलकर यदि जैन मुनि याहार लेंगे तो वनीपक नामक उत्पादन दोप उत्पन्न होता है । इसमें भी दीनतादिक दीख पड़ते हैं, अतः यह दोष त्याज्य है। चिकित्सा दोष का निरूपण
'कोमारतणुलिगिछारसायणविसभूद खारतंतं च ।
सल्लं सालकियणं निगिच्छदोसो दु अट्टविहो ॥७३०।।
कौमार-बालवैद्य शास्त्र अर्थात् मासिक, सांवत्सरिक पीडा देने वाले ग्रहों का निराकरण करने के उपाय बताने वाले शास्त्र को कौमार शास्त्र कहते हैं । तनुचिकित्सा ज्वरादि रोगों का नाश करने का उपाय दिखाने वाला शास्त्र अथवा कंठ, पेट आदिकों का शोधन करने वाला शास्त्र । रसायन-शरीर के वलि और वृद्धत्व को दूर करने वाली वस्तु को रसायन कहते हैं। रसायन के सेवन से दीर्घ काल तक जीवनावस्था प्राप्त होती है । विष-स्थावरबिध और जंगमविष ऐसे विष के दो भेद हैं । तथा कृत्रिम विद और अकृत्रिम बिष ऐसे भी विष के भेद है । इनसे होने वाली बाधा दूर करना । भूत चिकित्सा-पिशाच को निकालने वाला शास्त्र । क्षारतंत्र-दुष्ट वरण को शोधन करने बाले द्रव्य । शालाकिक-शलाका से नेत्र के ऊपर पाये हुए पटल. को हटाकर मोती बिंदु बगैरह नेत्र रोग को दूर करने वाला शास्त्र । शल्य-भूमिशल्य और शरीर शल्य ऐसे शल्य के दो भेद हैं, तोमरादिकों को शरीर शल्य कहते हैं और हड्डी आदि . को भूमि पाल्य कहते हैं । उसको निकालने वाले शास्त्र को शल्य चिकित्सा कहते हैं। विष दूर करने वाले शास्त्र को 'विष' कहते हैं। भूत-पिशाच हटाने वाले शास्त्र को भूत शास्त्र कहते हैं । यहाँ कार्य कारणोपचार किया है । अथवा चिकित्सा शब्द प्रत्येक के साथ-कौमार, तनु, भूत इत्यादिकों के आगे जोड़ना चाहिये । जैसे कौमार चिकित्सा तनूचिकित्सा, भूतचिकित्सा इत्यादि । जैसे कौवे की प्रांख की तारिका दोनों तरफ घूमती हैं वैसे कौमारादि शब्दों के प्रागे चिकित्सा शब्द जोड़ना चाहिय । जो मुनि उपयुक्त पाठ प्रकार के चिकित्सा शास्त्र के द्वारा थावकों पर उपकार कर उन्होंने दिया हुया आहार लेता है, तब उसको पाठ प्रकार का चिकित्सा का दोष उत्पन्न होता
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अध्याय : पाँचवाँ ।
हैं । सावधादिकों का दोप इसमें दिखता है। अत: इस चिकित्सा दोष का त्याग करना चाहिये। शोध मान माया लोभ वाले दोष---
कोधेरण य माणेण य मालालोभेण चावि उप्पादो। उप्पादणा य. दोसो चविही होदि पायवो ॥७३१॥
क्रोध, मान, माया, लोभ ऐसे चार कषायों के द्वारा भिक्षा की उत्पत्ति कराने से यह उत्पादन दोष चार प्रकार का होता है। क्रोध करके अपने लिये यदि मुनि
आहार उत्पन्न करायेगे तो क्रोध नामक उत्पादन दोष होता है । गर्व करके अपने लिये यदि मुनि श्राहार उत्पादन करेंगे तो मान दोष उत्पन्न होगा। माया-कुटिल भाव से यदि अपने लिये नाहार उत्पन्न करायेंगे तो माया नामक दोष होता है। और लोभ कांक्षा दिखाकर यदि मुनि अपने लिये आहार की उत्पत्ति करायेंगे तो लोभ नामक उत्पादन दोष उत्पन्न होता है। इस प्रकार के आहार उत्पन्न कराने से मन के परिणाम बिगड़ते हैं, अतः ऐसा पाहार त्याज्य है । दृष्टान्त के द्वारा उपरनिदिष्ट दोषों का स्पष्टीकरण--
कोधी य हत्यिकप्पे माणो वेरायडस्मि खयरस्मि । माया वारणारसिए लोहो पुरष रासियाणाम्मि १७३२॥
हस्तिकल्पपत्तन में कोई साधु ने कोध से भिक्षा को उत्पन्न करवाया । वेगातट नगर में किसी साधु ने अभिमान से भिक्षा को उत्पन्न करवाया । वारणारसी नगरी में किसी मुनि ने माया से भिक्षा को उत्पन्न करवाया और राशियान नगरी में लोभ को दिखाकर याहार उत्पन्न करवाया । क्रोधादिक कषाय उत्पन्न करके आहार लेने वाले इन मुनियों की कथा पागम में कही है; वहाँ से जान लेना चाह्मेि । . . पूर्व संस्तुति दोष का निरूपण---
दायगपुरदो कित्ती तं वासवदी जसोधरो वेत्ति ।. . पुन्बी संथुदि दोसो विस्सरिदे बोधणं चावि ॥७३३॥
दाता के ग्रागे दान ग्रहगा के पूर्व में उसकी तू दानियों में अग्रणी है. और तेरी कीति जगत में सर्वत्र फैल गई है ऐसा कहना यह पूर्व संस्तुति दोष है । और जो दाता पाहार देना भूल गया हो उसको तू पूर्व काल में महादान प्रति श्रा, अब दान देना क्यों भूल गया है ऐसा उसको संवोधन करना यह भी पूर्व संस्तुति दोष है । और जो
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३३४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि कीर्ति का वर्णन करना और जो स्मरण करना वह सब पूर्व संस्तुति दोष ही समझना चाहिए । स्तुति करना यह कार्य स्तुति पाटकों का है मुनिओं का नहीं है । अतः ऐसी स्तुति करना योग्य नहीं है । पश्चात संस्तुतियो का सिया
पच्छा संथुदि दोसो दाएं गहिदूरा त पुणो कित्ति । विवादो दागवदी तुज्झ जसो विस्सुदो वेति ।।७३४॥
पश्चात्संस्तुति दोष-- आहारादिक दान ग्रहण करके जो मुनि दाता की तू विख्यात दानपति है, तेरा यण सर्वत्र प्रसिद्ध हुआ है ऐसी स्तुति करता है उसको यह पश्चात् संस्तुति दोष होता है । ऐसी स्तुति करने में मुनि के दीनतादिक दिग्ख पड़ते हैं। विद्यानामक उत्पादन दोष का वर्णन
विज्जा साधित सिद्धा तिस्से प्रासापदाएकरणेहि ।. तिस्से महप्पेण य विज्जादोसो दु उप्पादो ।।७३५॥
साधित करने पर जो सिद्धि होती है, उसको विद्या कहते हैं। ऐसी विद्या की आशा दिखलाना अर्थात् तुझको मैं अमुक विद्या देता हूँ और उस विद्या का ऐसा ऐसा कार्य है, ऐसा महात्म्य है, ऐसा वर्णन करके दाता के मन में उस विद्या की अभिलाषा उत्पन्न करके उससे आहारादिक दान ग्रहण करना यह विद्रा नामक उत्पादन
मंत्रोत्पादन दोष का स्वरूप
__ सिद्ध पढिदे मंते तस्स य प्रासापदान कररोण । तस्स य माहप्पेण य उत्पादो मंतदोसो दु ।।७३६।।
पठन मात्र से जो मंत्र सिद्ध होता है, उसे पठित सिद्ध मंत्र कहते हैं। ऐसा मंत्र तुझको मैं देता हूँ ऐसा कहकर दाता के हृदय में उसकी प्राशा उत्पन्न कर और सर्प विष, वृश्चिक विष दूर करने का उसमें सामर्थ्य है, ऐसा मंत्र का महात्म्य दिखाकर जो साधु उपजीवन करता है और माहारादिक ग्रहरण करता है, उसको मंत्रोत्पाद दोन उत्पन्न होता है। इस प्रकार से अाहारादिक ग्रहण करने में लोगों की प्रतारणा करना, जिह्वालम्पट होना, इत्यादि दोघं हैं । ।
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man
ध्यध्याय : पांचवां ]
विद्योत्पादन दोष और मंत्रोत्पादन दोष का अन्य प्रकार से स्वरूप वर्णन---
श्राहार वायगाणं विज्जामंतेहि देवदाणं तु । प्राह्य साधि दवा विजमतो हवे दोसो ।।७३७॥
ग्राहारदान देने वाली व्यंतर देवताओं को विद्या से और मंत्र से बुलाकर उसको आहार दान के लिये सिद्ध करना यह विद्या दोष और मंत्र दोष है । अपना ग्राहार दायकों के लिये विद्या से या मंत्र से देवताओं को बुलाकर उनको सिद्ध करना यह विद्यामंत्र दोप है । इस दोष को विद्या दोप अोर मंत्र दोष में अन्तर्भूत करने से यह पृथक दोष नहीं है। चर्ग दोष का स्वरूप----
णेत्तस्संजरगच्चुगणं भूसरपचुण्णं च गत्तसोभयरं। चुण्णं तेप्पादा चुपणयदोसो हवदि एसो ।।७३८।।
आँखें निर्मल करने के लिये अंजन वर्ण देना, तथा जिससे तिलक किया जाता है और पत्रवल्ली पाटीर पाः ची जाती है, ऐसा धारीर शोभा बढ़ाने वाला चूर्ण दाता को देना । जिस चूर्ण से शरीर की शोभा-कान्ति बढ़ती है, निर्मलता उत्पन्न होती है, ऐसा चूर्ण दाता को देना ऐसे चूर्ण से भोजन की उत्पत्ति करना वह चुरोत्पादन नामक दोष है । इससे उपजीविका करना यह दोष है । मूलकर्म दोष का स्वरूप
अवसारणं वसियरणं संजोजयणं च विप्पजुत्तारणं- . . . . . भरिमयं तु मूलकम्म एदे उपादसा दोसा ॥७३.६।।
जो वश नहीं है उनको वश करना तथा जो वियुक्त है, उनका संयोग करना यह मूल कर्म है । इस मूल कर्म से जो अाहारादिक उत्पन्न करना यह मुलकर्म नामक दोप हैं । इस वशीकरगा से उपजीविका करना यह दोध इसमें है तथा यह कार्य लज्जा हप्पद है । ये उत्पादनादिक दोष और उद्गमादिक दोष त्याज्य ही हैं। क्योंकि इसमें अधः कर्म का अंश पाया जाता है । अन्य भी जुगुप्सादिक दोष हैं। उनसे सम्यग्दर्शनादिकों में दूधा उत्पन्न होते हैं। उनका भी त्याग करना चाहिये । अशन दोष का निरूपण---
संकि वमक्खि दरिणक्खि पि. हिद संवबरण दाय गुम्मिस्से । अपरिणदलित छोडिद एसरण घोसाई बस एदे ।।७४०॥
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क
३३६ ।
[ गो. प्र. चिन्तामणि
१. शंकित - यह ग्राहार अधः कर्म से उत्पन्न होता है अथवा नहीं ऐसी मनं में शंका कर जो मुनि भोजन करते हैं, उनको शंकितनामक श्राहार दोष उत्पन्न होता है ।
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२ तिघी और तेल से लिप्त हस्त से अथवा घी, तैलादि से लिप्त. कडी आदि से दिया हुआ ग्रहार जो मुनि ग्रहण करते हैं, उनको अक्षित नामक ग्राहार दोष होता है ।
३. निक्षिप्त-- सचित्त पृथ्वी, अग्नि, जल, वीज यादि के ऊपर रखखा हुआ आहार देना यह निक्षिप्त प्रशन दोष है ।
४. पिहित - प्रासु अथवा प्रासुक ऐसे बड़े प्राच्छादन हटाकर दिया हु ग्राहार लेना पिहित दोष है ।
५. संव्यवहरण दोष --ग्रादर से, भीती से आहार देते समय वस्त्र पात्रादिकों को जल्दी खींच कर दिया हुआ आहार लेने से संव्यवहरण दोष होता है ।
६. दायक -- शुद्धता से दिया हुआ आहार ग्रहण करने से दायक दोष उत्पन्न होता है ।
७. उन्मिश्र दोष – अप्रासु द्रव्य से मिश्र आहार जब साधु ग्रहण करता है, तव यह दोष होता है ।
८. अपरिशित दोष --- अग्न्यादिक से अपक्व आहार और पान के पदार्थ जो साधु ग्रहण करता है, उसको यह आहार दोष होता है ।
२. लिप्त दोष --- पानी और ग्रई गैरिकादिक से लिप्त अथवा अपव तंदुलादि विष्ट से लिप्त किंवा शाक से लिप्त ऐसे हस्त से दिया हुआ आहार जो साधु ग्रहण करता है, उसको यह लिप्त नामक श्राहार दोष है ।
१०. छोटित दोष-अस्थिर ऐसे हस्तपुर से बहोतसा आहार नीचे गिरता जाता है, ऐसे आहार को ग्रहण करने से यह छोटित दोष होता है, इस प्रकार प्रशन दोष के दस भेद होते हैं ।
शंकित दोष का विवरण
अगं च पायं वा खादियमध सादियं च प्रभप्पे । footoपयत्ति च संदिद्ध संकियं जाणे ||७४१ ॥
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अध्याय : पांचवां ]
[ ३३७
अशन-भात, रोटी सादिक । पानक-दही, दूध आदिक । खाद्य-लड्डुकादिक । स्वाद्य एला, लवंग, कस्तूरी, ककोलादिक ये पदार्थ मेरे लिये भक्ष्य अथवा अभक्ष्य है, ऐसा मन में संशय उत्पन्न होने पर यदि साधु आहार करेंगे तो उनको शंकिलाहार नामक दोष होता है । अथवा पागम में ये पदार्थ भक्ष्य कहे हैं या अभक्ष्य कहे हैं, ऐसा संशय युक्त होकर जो साधु अाहार करता है, उसको शंकित दोष होता है। . .. म्रक्षित दोष का स्वरूप---
ससिगिद्धेरण देयं हत्थे च भायणेरण दवाए। एसो भक्खिद दोसो परिहरि दब्धो सदा मुरिंगरणा ॥७४२॥
धी, तेल आदि स्निग्ध पदार्थ से लिप्त ऐसे हाथ से अथवा स्निग्ध तैलादि से लित ऐसे कड़छी से अथवा पाय से मुनियों को बाहार देना म्रक्षित दोष से दूषित होता है । इस दोष का सुनि सदा त्याग करे । ऐसे आहार में सुक्ष्म सम्मुर्छन जीव उत्पन्न होते हैं। अतः ऐसा आहार त्याज्य है। निक्षिप्त दोष का स्वरूप---
सच्चित्त पुनधि श्राऊ ते हरिदं च बीयतस जीवा । जं तेसिमुवरि ठविदं रिपक्खितं होदि छन्भेयं ।।७४३।।
सचित्त पृथ्वी, सचित्त पानी, सचित्त अग्नि, सचित्त वनस्पत्ति, बीज और त्रस जीव द्वीन्द्रिय, वीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय जीवों पर रखा हुन्ना ग्राहार मुनिमो को ग्रहण योग्य नहीं है। सचित्त पृथ्ट्यादिक छह भेद हैं । अंकुर शक्ति योग्य मेंहूँ अादि बान्य को बीज कहते हैं । हरित-अम्लान अवस्था के तृगा, पर्गा आदि को हरित कहते हैं। इनके उपर स्थापन किया हुआ आहार निक्षिप्त दोष सहित होता है । अथवा अप्रासुक ऐसे पृथिव्याक्षिक कार्यों पर रखरखा हुआ याहार मुनियों को अयोग्य है। पिहित दोष का निरूपण----
सच्चित्तरण व पिहिदं अथवा अच्चित्तगुरु गपिहिदं च । तं छंडियः जं पेयं - पिहिदं तं होदि बोधयो ।।७४४।।
जो आहारादिक वस्तु सचित्त से ढकी हुई है अथवा अचित्त ऐसे गुरु बड़े बजनदार पदार्थ से ढकी हुई है, वह उसके ऊपर का प्रावरण हटाकर मुनियों को देना वह पिहित दोष है । .. ..
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३३८ ]
संव्यवहार दोष का स्वरूप----
[ गो. प्र. चिन्तामखि
संवरणं किच्चा पदादुमिदि चेलभाजस्थादीरणं । समक्खिय जं देयं संववहरणों हवदि एसो | ७४५ ।।
स्वरा से वस्त्र पात्र लाकर अर्थात् भय से आदर से अथवा मनःक्षोभ से वस्त्र पात्रादि लाकर बिना विचार के और अच्छी तरह से देखकर मुनि को जो ग्राहार देना उसको संव्यवहरण दोप कहते हैं । दायक दोष का विवरण --
सूदी सुंडी रोगी मदय सय पिलायाग्यो च । उच्चार पडिदवंत रुहिर वेसी समणि अंग मक्खीया ||७४६ ||
जो बालक को आभूषणादिकों से
सजाती है, उसको दूध पिलाती है और धाय का कर्तव्य करती है, वह आहार दान- प्रयोग्य है । जो मद्यपान लंपट है, जो रोग से ग्रस्त है, जो मृतक को श्मशान में जलाकर आया है और जिसको मृतक सुलक हैं, जो नपुंसक है, जो पिशाचग्रस्त है, अथवा वातादिक से पीड़ित है, जो वस्त्रहीन है अथवा जिसने एक ही वस्त्र धारण किया है, जो मल विसर्जन करके ग्राया है तथा जो मुत्र करके ग्राया है, जो मूच्छित हुआ है, जिसको बान्ति हुई है, जिसके शरीर से रक्त बाहर या रहा है, जो वेश्या अथवा दासी है, जो यायिका है, अथवा जो लाल रंग के वस्त्र धारण करने वाली रक्त पटिका यादिक अन्य धर्मीय संन्यासिका है, जो अंग मर्दन करके स्नान करती है, ऐसी स्त्री और पुरुष आहार देने योग्य नहीं हैं । प्रतिबाला प्रतिबुद्धा घासतो भिरणो च अंधलिया ।
अंतरिदा व सिगा उच्चस्था ग्रहव पीच्चत्था ||७४७॥
अतिबाला अत्यधिक मूर्ख अथवा वयं से बहुत छोटा ऐसा बालक और बालिका, प्रतिवृद्धा अत्यन्त वृद्धावस्था से पीडित स्त्री-पुरुष, घासत्ती- भोजन करने वाला पुरुष और स्त्री, गर्भिणी- जिसका गर्भ बढ़ा हुआ है, ऐसी स्त्री अर्थात् पांचवें महीने से नौ महिने तक गर्भवती स्त्री गर्भ के बोझ से पीडित होने से प्रहार देने में प्रयोग्य है | after at नेत्र रहित पुरुष और नारी अंतरिता-भीत, पडदा यादि से व्यवहित होकर पुरुष और स्त्री दान देने योग्य नहीं है । जो बैठा है, ऐसा पुरुष और स्त्री आहार देने योग्य नहीं हैं | उच्चस्था-ऊंचे प्रदेश पर खड़े हुए पुरुष और स्त्री तथा नीवस्था निम्न प्रदेश में स्थित स्त्री पुरुष ये श्राहारदार देने में प्रयोग्य हैं । स्त्री
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अध्याय : पांचवां ] और पुरुष यदि दान देंगे तो मुनियों को आहार लेना योग्य नहीं है।
पूयणपज्जालणं वा सारणपच्छादनं च विझवणं । किच्चा तहगिकज्जं णिवादं प्रणं चावि ।।७४८।।
फुत्करण-अग्नि को उत्पन्न करना, प्रज्वलन-मुख' की हवा से अभन्दा अन्य प्रकार से अग्नि और लकडियों को प्रदीप्त करना । सारण-अग्नि में लकड़ियाँ डाल देना, प्रच्छादन--अग्नि को भस्म से हकना, विध्यापन-जलादिक से अग्नि को बुझाना, अग्निकार्य-अग्नि को इतस्ततः फैलाना, निति-अग्नि में से लकडियों का निकालना । घट्टन-अग्नि को दयाना इत्यादि कार्य करने वाली स्त्री या पुरुष मुनियों को दान देने के लिये योग्य हैं।
लेदरसमज्जराकम्मं पियमा दारयं च रिगवखविय । ...
एवं विहादिया पुरण दाणं जदि दिति दायगा दोसा ॥७४६॥
लेपन--गोवर और मिट्टी प्रान्दिक से भीत, जमीन आदिकों को लेपना, मार्जनस्नानादिका करना, ऐसे कार्य करने वाली स्त्री पुरुष आहारदान देने में अयोग्य हैं। स्तनपान करते हुए बालक को छोड़कर कोई स्त्री प्राहारदान देने में उद्यक्त हई तो उससे ग्राहार लेना योग्य नहीं है। इसी प्रकार अन्य भी कार्य करने वाले दान देने योग्य नहीं है। उन्मिन दोष का वर्णन---
पुढवी प्राऊ च तहा हरिदा बीया तसा च सज्जीवा । पंचेहि तेहि मिस्सं पाहारं होदि उम्मिस्सं ॥७५०॥
पृथिवी-..-मिट्टी, प्रापू-अप्रासुक जल, हरित्-वनस्पतिकाय पत्र, पुष्प, फल आदिक । बीज जव, गेहूँ आदिक और त्रस-जीते हुए द्वीन्द्रियादि जीव इन पांचों से मिश्र जो पाहार उसको उन्मिथ आहार कहते हैं, ऐसा आहार लेना यह महादोष है। ऐसे आहार का सर्वचा त्याग करना चाहिये । अपरिगत दोष का वर्णन...
तिल चाऊक उपाणोदय चणोदय तुसोदयं अविद्ध त्यं । अण्णं पि य असणादी अपरिणदं व गेहेज्जो ॥७५१॥ .
तिलोदक--तिल जिससे धोए गये हैं, ऐसे पानी को तिलोदक कहते है। उसी को तिल प्रक्षालन भी कहते हैं । नाउलोदय-तंडुल धोया हुया जल, उष्णगोदका--
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३४० ]
[ गो. प्र. चिन्तामरि
जो उष्ण था अनंतर जो शीत हुआ ऐसा जल, चरक धोया हुआ जल, तुष धोया हुआ जल, अविध्वस्त - जिसने अपने वर्ग, गंध, रसों का त्याग नहीं किया है, ऐसा जल, और अन्य भी जल-हरित की यदि चूर्ण से जिसक वर्ग, रस, गंव में परिशति नहीं हुई है ऐसा जल इन सब प्रकार के जलों को 'अपरिगत' कहते हैं। इस प्रकार के जलों को वे अप्रासुक होने से मुनि ग्रहण नहीं करें | और जब ये परिणत होते हैं, तब ग्राह्य होते हैं अर्थात् तिलादि जलों ने अपने पूर्व के वर्ण गंधादिक छोड़कर यदि तिलादिकों के व, गंध, रसादिक धारण किये हुए हो तो ऐसे तिलजलादिकों का पान करना परिणत दोष दूषित नहीं होगा ।
लिप्त दोष का वर्णन -
रुय हरि दालेख व सेडीय मरोसिला मपिट्ठेण । सपबालोदरण लेवेण व देयं कर भाषणे लिंत्तं ।।७५२||
ठ, हरिताल, खटिका - सफेद मिट्टी, मनशील और कच्चा घाटा इनसे जो गीला हो गया है, अर्थात् गेरु, हरिताल आदिकों के द्रथ से जो लिप्त हुआ है, ऐसे हाथ से ग्रथवा पात्र से आहार देना लिप्त दोष से दूषित होता है । अपक्क जल ग्रर्थात् अप्रासुक जल, प्रपक्क शांक से जो गीला हुआ है, ऐसे हाथ से और पात्र से जो ग्रन्नादिक यदि दिये जायेंगे तो लिप्त नामक दोष होता है ।
छोटित दोष का वन
बहु परिमाणमुज्भि ग्राहारों परिगलंत दिज्जंतं ।
छंडिय भुजगमहवा छोडिद दोसो हवे शोश्रो ।।७५३॥
बहुतसा अन्न छोड़कर थोड़ा अन्न खाना यह छोटित दोष है । अथवा परोसने वाले दाता के हस्त से सत्पात्र के हस्त पर अर्पण किया जाने वाला और नीचे गिरने वाले ऐसे छाछ, दूध यादि पदार्थ का आहार लेना यह छोटित दोष है | छाछ वगैरह द्रव पदार्थ अपने हाथ से नीचे नही गिर पड़ेंगे, ऐसी पद्धति से भक्षण करना चाहिये । अर्थात् दोनों हाथों की दृढ़ अंजलि करके द्रव पदार्थ भक्षण करना चाहिये । अन्यथा द्रव पदार्थ नीचे गिरने से चींटी वगैरह प्राणियों को बाधा होंगी 1 अथवा हस्तपुट छोड़कर भोजन करना यह भी छोटित दोष है । हस्तपुट का बंधन छोड़कर अपने दोनों हाथों की अंजलि तोड़कर भोजन करना यह भी छोटित दोष है । यथवा ग्राहारों में दिये हुए पदार्थों में से इष्ट पदार्थों को खाना और अनिष्ट पदार्थ
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अध्याय : पांचयो । ___ छोड़ देना भी छोटित दोप है । ऐसे शंकितादिक दश दोषों का वर्णन किया है। जीव दया के लिए लोक जुगुप्सा न होवे इसलिए और पाप से अलिप्त रहने के लिए इन दोषों का त्याग करना चाहिए। संयोजना दोध और अनमारण दोष का निरूपण
संयोजणा य दोसो जो संजोएदिभत्तपारणं तु ।। अदिमत्तो श्राहारो पसाप दोसो हदि एसो।।७५४॥
संयोजना दोषाहार के पदार्थ और पान के पदार्थ अन्योन्य मिलाना मिश्रण करना। ठंडा पाहार उपपान से मिश्रित करना । संयोजना नामक दोष हैं।
अतिमात्र दोष--प्रमागा का अतिक्रमण करके भोजन करना अप्रमाण नामक दोष है । पेट के दो भाग भात, दाल, रोटी आदि से भरने चाहिए । और एक भाग द्रव पदार्थों स-जल, छाछ, दुध आदि पतले पाथों से भरना चाहिये । तथा चतुर्थभाग खाली रखना चाहिए । तभी आलस्य के बिना स्वाध्याय और आवश्यकादिक कर्तव्यों में तत्परता आती है अन्यथा नहीं । प्रमागादिक भोजन से अजीर्ण और ज्वरादिक रोग उत्पन्न होते हैं तथा निद्रा, पालस्यादिक दोप उत्पन्न
होते हैं। . अंगार दोष तथा धूम दोष का वर्णन
तं होदि सयंगालो जं आहारेदि मुच्छिदो संतो।
तं पुरण होदि सधर्म अं आहारेदि रिपदतो ॥७५५।। . अंगार दोष---जब साधु लम्पटता से आहार भक्षरण करता है, तब अंगार दोष उत्पन्न होता है। यह प्राहार बहुत मीठा है। यही आहार बार बार मेरे को मिलेगा तो अच्छा होगा, इस प्रकार की लंपटता जब पाहार में उत्पन्न होती है, तब ग्रंगार दोष उत्पन्न होता है।
सधूम दोष-मन में निंदा करता हुआ जय मुनि आहार करता है, तब धूम नामक दोष उत्पन्न होता है। ये आहार के पदार्थ मेरे मन को इप्ट नहीं है, ऐसी निदा करता हुआ पाहार करना धूम नामक दोष है । पहले दोष में लटता और दूसरे में संक्लेश परिणाम उत्पन्न होते हैं।
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३४२ ]
श्राहार ग्रहण करने के और त्यागने के कारणों का वर्णन - स श्राहारतों बि श्रायदि धम्मं ।
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
छह फारहि छह वेव कारणेहि दु रिगज्जुहवंतो विप्रारदि ||७५६।।
भोज्य, खाद्य, लेह्य और पेय ऐसे चार प्रकार के श्राहारों का छह कारणों से प्रयोजनों से भक्षण करने वाला यति चारित्र का पालन करता है । अर्थात् श्राहार ग्रहण करता हुआ भी मुनि वैयावृत्यादि प्रयोजन के लिए आहार ग्रहण करता है । ग्रतः वह आहार करके भी धर्म सा ही करता है। तथा छह कारणों के वश होकर यदि ग्राहार परित्याग मुनि करता है तो भी वह धर्मोपार्जन करता है । यदि ing निष्कारण प्रहार करेगा तो वह आहार ग्रह दोष है । यदि सकारण मुनि प्रहार का ग्रहण अथवा वर्णन करेगा तो उसका त्याग और ग्रहण धर्माचरणरूप ही है ।
आहार ग्रहण करने के कारणों का विवेचन
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dardarava foरिया ठाणे य संजय मट्टाए ।
तथ पारणधम्म चिंता कुज्जा एवेहि श्राहारं ।।७५७।।
वेदना - क्षुधा की वेदना मिटाने के लिये मुनि भोजन करते हैं । वैयावृत्य पता और अन्यों का वैयावृत्य करने के लिए भोजन करते हैं । क्रियार्थ --- मैं भोजन नहीं करूंगा, तो सामायिकादि छह ग्रावश्यक क्रियाओं का पालन मेरे द्वारा नहीं होगा अतः उनके पालन के लिए भोजन करना मेरा कर्तव्य है, ऐसा समझकर मुनि प्रहार करते हैं । संयमार्थ -- तेरह प्रकार से संयमों का पालन करने के लिए मुनि आहार ग्रहण करते हैं | प्रभवा माहार के बिना मेरी इंद्रियां विकल होकर मैं जीव दया पालने में असमर्थ होऊंगा, ऐसा विचार कर प्राणि संयम और इंद्रिय संयम के लिए मुनि आहार ग्रहण करते हैं । तथा प्रासु चिन्ता के लिए भोजन करते हैं । मेरे दश प्राणों का रक्षण आहार के बिना नहीं होगा । श्राहार के प्रभाव में ग्रायु का रक्षण नहीं होगा, श्रतः प्राणार्थ वे श्राहार करते । तथा धर्म चिन्ता के लिए वे बाहार लेते हैं। मैं यदि आहार ग्रहण नहीं कल्या तो उत्तमक्षमादिक दश धर्म मेरे वश नहीं रहेंगे 1 बहार के विना यह जीव उत्तमलमा मार्दवादिक गुणों को धारण नहीं 'करेगा, ऋतः भोजन करना आवश्यक है, ऐसा विचार कर मुनि भोजन करते हैं । मुनि इन छह प्रयोजनों की सिद्धि के लिए आहार लेते हैं ।
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अध्याय : पांचवां ] पाहार त्याग के कारणों का वर्णन
आदके उवसग्ये तितिक्खरणे बंभचेर गुत्तीयो। पारिण दयातव हेउ सरीर परिहारं वोच्छेदो ।।७५८॥
आकस्मिक व्याधि होकर मारणान्तिक पीडा जब होती है, तव मुनि ग्राहार का त्याग करते हैं । दीक्षा का नाश करने वाला उपसर्ग प्राप्त होने पर अर्थात् देव मनुष्य, तिथंच और अचेतनों का उपसर्ग होने पर मुनि श्राहार त्याग करते हैं । ब्रह्मचर्य व्रत का निर्मल रक्षा करने के लिए ग्राहार त्याग करते हैं। प्रारिणदया के लिए आहार त्याग वे करते हैं । यदि याहार मैं ग्रहण करूगा तो बहुत प्राणियों का घात होता है, अतः जीव दया के लिए मैं आहार छोड़ता हूँ, ऐसा संकल्प करके वे अाहार का त्याग करते हैं। बारा प्रकार के तपों में अनशन नामक तपश्चरण मैं अाज करता हूँ, ऐसा संकल्प करके वे पाहार त्याग करते हैं। संन्यास काल प्राप्त होने पर वे ऐसा विचार करते हैं-यह वृद्धावस्था मेरे मुनि धर्म का नाश करने वाली है, मैं असाध्य रोग से पीड़ित हुआ हूँ, मेरी सर्व इंद्रियशक्ति विकल हो गई है । इस वृद्धावस्था में स्वाध्याय करने के लिए समर्थ नहीं हूं। अब · मेरे जीने के उपाय नष्ट हुए हैं । ऐसे समय में शरीर परित्याग करना योग्य ही है, ऐसे विचार से वे ग्राहार छोड़ते हैं । ऐसे छहों कारणों से वे पाहार का त्याग करते हैं। पूर्व गाथा में कहे हुए कारणों से भी यदि उनके साथ मारणान्तिक पीड़ा भी उपस्थित हुई तो पाहार का त्याग करना चाहिये, याहार ग्रहण करना योग्य नहीं है । याहार ग्रहण करने से प्रचुर जीववध होगा तो आहारादिका त्याग करना चाहिये । जिसके शरीर में पीड़ा है, वह तपश्चरण करे । इस प्रकार याहार का त्याग और स्वीकार में विषयभेद है। बलादिकों का लाभ होने के लिए मुनि कभी भी पाहार ग्रहण नहीं करते हैं, इसका स्पष्टीकरण
रग बलाउसाउअठ्ठ स सरीरस्सुवयद्वलेजट्ट । गारगट्टसंजम म ज्झारणछे चेच भुजेज्जो. ॥७५६||
युद्धादिक कार्य करने योग्य बल मुझे प्राप्त होवे ऐसी इच्छा धारण कर मुनि याहार नहीं लेते हैं। तथा आयुर्वृद्धि की इच्छा .. से भी वे आहार ग्रहण नहीं करते हैं । इस ग्राहार का स्वाद बढ़िया है, ऐसी . इच्छा से भी वे आहार ग्रहण नहीं
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३४४ ].
[ गो. प्र. चिन्तामणि करते हैं । मेरा शरीर पुष्ट होकर उसमें मांस वृद्धि होवे इस हेतु से भी वे भोजन नहीं करते हैं । अथवा शरीर में कांतिवृद्धि होने के लिए भी वे ग्राहार नहीं करते हैं । यदि उपर्युक हेतुओं से भोजन नहीं करते हैं, तो श्राहार किस हेतु से लेते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर--स्वाध्याय करने के लिए, संयम के लिए और ध्यान के लिए, बे ग्राहार ग्रहण करते हैं । ग्राहार के बिना स्वाध्याय, ध्यान और संयम में मन नहीं लगता है, अंतः मुनि संयम ध्यानसिद्धयर्थं और स्वाध्याय सिद्धयर्थ ही ग्राहार लेते हैं ।
मुनि कौन सा आहार ग्रहण करते हैं-
एव कोढी परिशुद्ध असणं बादाल दोस परिहीणं । संयोजणाए हीणं पमास सहियं विहितुदितं ॥७६०॥
चाहार यदि नवकोटिनों से शुद्ध होगा तो मुनि वह ग्रहण करते हैं, अन्यथा नहीं । अर्थात् मन से किया गया, करवाया गया और अनुमोदन दिया गया आहार मुनि नहीं लेते हैं। क्योंकि दाता ने यदि मुनि के लिए प्रहार मन से किया, करवाया और अनुमोदन दिया होगा, तो वह ग्रहार मुनियों के लिए योग्य है। मन की तीन कोटियां वचन को तीन कोटियां और शरीर की तीन कोटियां ऐसी नवकोटियां से आहार यदि रहित हो तो मुनि उसे ग्रहण करते हैं । उद्गम, उत्पादन और एपसा दोष से रहित प्रर्थात् ४२ दोष रहित, संयोजन दोष रहित, प्रभाग सहित ग्राहार त्रे लेते हैं । तथा मुनियों का ग्रादर से स्वीकार करना, उच्चासन पर बैठाना, उनके चरा धोना और उनकी पूजा करना, मन, वचन और शरीर शुद्ध करना और ग्राहार की शुद्धि करना ऐसे विधियों से दिया हुआ ग्राहार मुनि लेते हैं, अन्यथा नहीं । दाता सात गुणों से सहित होना चाहिये। उसके गुणों का वर्णन जो दाता मुनियों को आहार देता है, वह श्रद्धा दान देने से मिलने वाले भोग भूभि मुखादि में विश्वास रखना । भक्ति-पात्र के गुणों पर अनुराग । तुष्टि दान देने में हर्ष रखना | विज्ञानप्रहार देने का परिज्ञान होना । अलुब्धता - सांसारिक फलों की अपेक्षा न रखना । क्षमा-कोप के कारण उत्पन्न होने पर भी शान्ति रखना भी धनाढ्यको प्राचर्य चकित करने वाला दान देना, ऐसे इनसे युक्त दाता जो दान देता है, वह मुनि ग्रहग करते हैं । •fafगाल विधूमं छक्कारण संजुदं कम विसुङ्ख ं । जत्तासाधरणमेत्तं चोदसमलवज्जिदं भजे ॥७६१ ॥ ॥
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शक्ति - खुत्पत्ति होने पर दाता के सात गुणा है,
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अध्याय : पांचवां ]
[ ३४५ अंगार दोष रहित तथा धूम दोष रहित आहार मुनि लेते हैं। तथा वेदना परिहार, वैयावृत्य, अावश्य क्रिया, संयम इत्यादि पटकारण युक्त आहार वे लेते हैं । क्रम युक्त, प्राण धारण युक्त अथवा मोक्ष मार्ग को साधन भूत और चौदह मलों से रहित आहार साधू लेते हैं । चौवह सलों का वर्णन---
गहरोमजंतु अट्ठी करण कुडयपूय चम्मयरूहिरं च ।
बीय फल - सासं च मला दु चोइसमे ॥७६२ ।। - नख---मनुष्य अथवा तिर्यंच के हाथ के अलावा चरण के अगुलियों के अन.. भाग अर्थात् नख । केश- मनुष्य के अथवा पशु के बाल ! जन्तु-प्रारण रहित शरीर । अस्थि-ककाल । हड्डी, करण--जब, गेहूं आदि धान्यों का बाह्य अवयव--- छिलका । कुड शाल्यादिकों का अभ्यन्तर सूक्ष्म अवयव । पूय-पक्क रक्त अर्थात् बाग से निकलने वाला सफेद पीब। चर्म शरीर की त्वक चमड़ा । चमडा प्रथम धातु है । रक्त द्वितीय धातु है। मांस रक्त की प्राधार भूत तीसरी धातु है । बीज----- जिससे अंकुरोत्पत्ति होती है, ऐसे गेहूँ, जब अादि । फल- जामुन, ग्राम आदि फल । कंद-.-अंकुर के उत्पत्ति का भूमिगत गड्ढा प्रादि जिस को सूरण, रक्तालुक, गर्जर आदि कहते हैं, ऐसे ये चौदह मल हैं। इनमें से कोई महा मल है। कोई अल्प मल है। कोई महा दोष है। कोई छोटे दोष हैं। रुधिर, मांस, अस्थि, चर्म और पीव ये महादोष हैं । आहार में ये दिखने पर अाहार छोड़कर प्रायश्चित भी लेना चाहिए । हीन्द्रिय, वीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जीवों का शरीर आहार में देखने पर प्रहार का त्याग करना चाहिये । केश आहार में देखने से आहार छोड़ना चाहिये । नख दीखने पर आहार का त्याग कर अल्प प्रायश्चित · भी लेना चाहिये । करा, कुड, वीज, कद, फल आहार में देखने पर इनको आहार से अलग करके आहार ले सकते . . हैं, यदि अलग करना अशवय हो तो याहार का त्याग' करना चाहिये ।
सिद्ध भक्ति के अनन्त र शरीर में से यदि रक्त और पीब बहेगा, तो पाहार का त्याग करना चाहिये। जो अन्न परोसता है उसके शरीर में से रक्त और पीव निकलता हो तो ग्राहार का उस दिन त्याग करना चाहिये। मांस भी शरीर में से निकलता हो तो उस दिन में ग्राहार का त्याग करना चाहिये । पाठ प्रकार की पिंड शुद्धि में चतुर्दश मलों का प्रकरण नहीं कहा था, अतः इसका यहां वर्णन किया है । . . . . .
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[ गो. प्र. चिन्तामणि दोष रहित माहार साधु ग्रहण करते हैं----
पगदा असहो जम्हा तम्हादो दव्वदोत्ति तं दध्वं । फासुगमिदि सिद्ध वि य अप्पट्टकदं असुद्ध'तु ।।७६३।।
साधु द्रव्य और भाव से प्रासुक आहार ग्रहण करते हैं । द्रव्य प्रासुकता का स्पष्टीकरण-जिस द्रव्य से प्राणी निकल गये हैं अर्थात् जो द्रव्य-पाहारादिक पदार्थ एकेन्द्रियादि प्राणियों से रहित है उसको द्रव्यप्रासुक कहना चाहिये । अर्थात् जीव रहित तथा द्वीन्द्रियादिकों के शरीर जिसमें नहीं पाये जाते हैं ऐसा आहार द्रव्यप्रामुक आहार है । जिसमें द्वीन्द्रियादिक और उनके शारीर हैं वह ग्राहार दूर से ही त्यागना चाहिये । क्योंकि वह द्रव्य से अशुद्ध है। द्रव्य से आहार प्रामुक होने पर भी यदि वह अपने लिये बनाया है ऐसा मुनि विचार करते हैं तो बह पाहार द्रव्य से प्रामुक और भाव से अप्रासुक समझना चाहिये । यद्यपि वह द्रव्यतः शुद्ध है तो भी अशुद्ध ही : समझना चाहिये। पर के लिए बनाया श्राहार शुद्ध
जह मच्छयाण पगदे मदणुदए हि मज्जति । गहि मंडूगा एवं परमकदे जदि विसुद्धो ॥७६४॥
जैसे मत्स्यों के लिये बनाये हुए मादक जल से मत्स्य ही विह्वल होते हैं परन्तु मेंढ़क विह्वल नहीं होते हैं। जिस जल में मत्स्य रहते हैं उसी में मेंढ़क भी रहते हैं परन्तु वे मेंढक उस पानी से विह्वल नहीं होते हैं। क्योंकि उनको उन्मत्त । करने की शक्ति उस पानी में नहीं है । इसी प्रकार से पर के लिये बनाये हुए याहार में प्रवृत हुए मुनि उस दोष से लिप्त नहीं है। जो आहार बनाने वाले गृहस्थ है वे उस दोष से लिप्त होते हैं । जो सम्यग्दृष्टि गृहस्थ साधुओं को आहार देते हैं, वे अत्रः कर्मादि दोषों को दूर कर साधुदान फल से स्वर्ग और मोक्ष को जाते हैं। परन्तु जो . मिथ्यादृष्टि हैं ऐसे गृहस्थ साधु दान से भोग भूमि में जन्म धारण करते हैं। भाव से शुद्ध पाहार का निरूपण--- ___ ग्राधाकम्मपरिणदो फासुगदव्वे वि बंधश्रो भणिदो।
सुद्धं गयेसमापो प्राधाकम्मे वि सो सुद्धो ॥७६५॥ पाहार के पदार्थ शुद्ध होने पर साधु यदि पाहार मेरे लिये बनाया है एमा
।
Poetic
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अध्याय : पांचवां ]
[ ३८७ समझेगा तब वह कर्मबंध से युक्त होता है । मेरे लिये बना है ऐसा समझकर उसमें वह साधु पादर युक्त होता है, जिससे उसको कर्म बंध होता है । कृतादि दोष रहित आहार लेने का अभिप्राय धारण करने वाले साधु को यदि अधः कर्म युक्त आहार प्राप्त हो गया और उनसे वह ग्रहण किया तो भी साधु ने शुद्ध आहार की बुद्धि से उसे ग्रहण किया था अतः उसको वह अाहार कर्म बंध का कारण नहीं होता है ।
सवो वि पिंडदोसो दव्वे भावे समासदो दधिहो। दवनगयो पुरण दवे भाव गदो अप्प परिणामो ॥७६६॥
मोट हो ध्या सोप और भाव पिंड दोष ऐसे दो भेद हैं। प्राहार के छियालीस दोष हैं उतने ही द्रव्य पिड दोप व भाष ग्रिड दोष छियालीस छियालीस होते हैं । आहारादिक पदार्थ उद्गमादि दाप सहित होने पर भी अधः कर्म से युक्त होने पर उनको द्रव्य गत पिंड दोष कहते हैं । प्रात्म परिगाम को भाव कहते हैं । द्रव्य शुद्ध होने पर भी परिणामों की अशुद्धि से उसको अशुद्ध कहते हैं । अतः भाव शुद्ध का रक्षण प्रयत्न पूर्वक करना चाहिये । भाव शुद्धि से ही तपश्चरण और ज्ञान दर्शनादिक व्यवस्थित, निर्मल और प्रात्मोन्नति के हेतु होते हैं । द्रध्य के भेदों का वर्णन--
सब्वेसणं च विषरणं च सद्ध सणं च ते कमसो । एसरण समिवि विसुद्ध रिपब्वियडमवंजणं जाणे ।।७६७॥
सर्वेपण, असर्वेयरण, विद्वेषगा, अविद्वेषण, शुद्धाशन, अशुद्धाशन ऐसे ग्राहार के भेद हैं । सर्वेषण-एषणा समिति से युक्त आहार को सर्वेपण पाहार कहते हैं । पांच रसों से रहित अर्थात् गुड, तेल, घी, दही, दुध शाकादि रहित अाहार को निविकृताहार कहते हैं । भात की पेज जिसको कांजी कहते हैं उसको सौवीर ऐसा भी नाम है । अर्थात् कांजी नवनीत रहित छाछ प्रादि से रहित आहार को अव्यंजन कहते हैं। एकाने पर जिस अन्न के ऊपर नमक, मिरच वगैरह का संस्कार नहीं करते हैं ऐसे पाहार को शुद्धाशन कहते हैं । ऐसे कम से आहार के भेद जानने चाहिये। ये तीन प्रकार के आहार द्रव्य योग्य हैं । सर्व रस युक्त और सर्व व्यंजन युक्त ऐसा असर्वाशन कदाचित् योग्य भी है और अयोग्य भी है । इस प्रकार से वर्गान करने पर एषगणा समिति का वर्णन होता है।
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वेदक ]
एषला समिति का पालन-
दव्वं खत्तं कालं भावं बलवीरियं च खाकखं ।
[ गो. प्र. चिन्तामणि
कुज्जा एसरणसमिदि जहोवदिट्टु जिपमदम्मि ||७६८६ | |
द्रव्य - आहारादिक वस्तु, क्षेत्र - जांगल, अनूप और साधारण ऐसे क्षेत्र के तीन भेद हैं । काल- शीतकाल, उष्णकल, वर्षाकाल ऐसे काल के तीन प्रकार हैं । भावरमा के परिणामों को भाव कहते हैं । अर्थात् श्रद्धा की कहता चाहिये 1 जांगल क्षेत्र - जिस देश में पानी, वृक्ष और पर्वत, ग्ररूप रहते हैं उसको जांगल कहते हैं । अनूप क्षेत्र - पानी, वृक्ष और पर्यंत, जहाँ बहुत होते हैं यह अनूपक्षेत्र साधारण क्षेत्र --- जिस देश में पानी, वृक्ष और पर्वत अधिक और अल्प भी नहीं रहते हैं सम रहते हैं उसको साधारण क्षेत्र कहते हैं । वल अपने शरीर सामर्थ्य को बल कहना चाहिए। ग्रात्मा के सामर्थ्य को वीर्य कहते हैं द्रव्य, क्षेत्र, काल. भाव और बल और वीर्य को जानकर श्रागम में कही हुई एषणा समिति का पालन करना चाहिये । द्रव्य क्षेत्रादि के अनुसार प्रवृत्ति न करने से वात पित्तश्लेष्मादि की उत्पत्ति होती है ।
साधु के भोजन की पद्धति-
श्रद्धसरपरस सध्विजणस्स उदरस्स तदियमुदए ।
वा उसंचरण
arcane
भिक्खु ॥७६६॥
पेट का आधा भाग व्यंजन सहित अन्न के द्वारा भर कर उदक में पेट का तीसरा भाग भरना चाहिये और वायु के संचारार्थ चौथा भाग रिक्त रखना चाहिये । ऐसे कार्य से पडावश्यक क्रिया सुख से साधु कर सकेंगे । ध्यानाध्ययनादिकों में प्रवृत्ति होगी और जीर्णादिक भी उत्पन्न नहीं होगें !
भोजन योग्य काल का वर्णन
सूरूदयत्यमरणादो खालीतिय वज्जिदे असणकाले । लिग दुगगमुहत्ते
जमज्झिम्ममुक्कस्से ||७७०॥
सूर्योदय से तीन घटिकात्रों को छोड़कर अर्थात् सूर्योदय के अनंतर तीन घंटिका काल बीत जाने पर और सूर्यास्त को तीन घटिका काल अवशिष्ट रहने पर बीच का काल आहार का काल माना जाता है, उस ग्राहार काल के तीन मूहूर्ती में भोजन करना जघन्याचरण है। दो मूहर्ती में भोजन करना मध्यमाचरण है और एक
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अध्याय : पांचवां ]
[ ३४६ मुहर्त में भोजन करना उत्कृष्टाचरण है। सिद्ध भक्ति के नंतर का यह भोजन काल का प्रमागा कहा है । भोजन के लिए भ्रमण करने वाले परन्तु भोजनको प्राप्त नहीं हा है ऐसे मुनि का यह काल प्रमाण नहीं है।
एक्कम्हि दोणि तिषिण य मुत्तकालो दु उत्तमादोगो। . पुरदो य पच्छिमेण्ड य पालीतिगवज्जिदो चारे ॥७७१।।
सूर्योदय के तीन घटिका के अन्तर और सूर्यास्त की तीन घटिका के पूर्व वीच के काल में ग्राहार का काल है । तीन मुहूर्त का भोजन काल जघन्य काल माना गया है। दो मुहूर्त का काल और एक महूर्त का काल उत्तम माना है। भिक्षा के लिये गमन की प्रवृत्ति
भिक्खा चरियाए पुरष गुत्ती गुण सोल संजमादीणं । रक्खंतो चरदि मुणी पिव्वेदतिगं च पेचछतो ॥७७२।।
भिक्षा के लिये ग्राम में प्रवेश करने वाला साधु मनोगुप्ति, वचन गुप्ति और काय गुप्ति का रक्षा करता हुआ प्रवेश करता है अर्थात् गुप्ति पूर्वक प्रवेश करता है। अपने मूल गुरणों का रक्षण करता. दुसा प्रवेश कारन है। नया शील और संयमों का रक्षा करता है । वह साधु शरीर वैराग्य, संगवैराग्य और संसार चैराग्य का रक्षण करता हुया प्रवेश करता है।
प्रारणा अगवत्या वि य मिच्छत्ताराहणादरगासो य । संजमविराधरणा वि य चरियाए परिहरेदव्या ॥७७३।।
वीतराग प्रभू के शासन का रक्षण करता हुआ साधु पाहार के लिये ग्रामा. दिक में प्रवेश करता है । साहार को जाता हुअा वह साधु स्वेच्छावृत्ति का त्याग करता है सम्यक्त्व के प्रतिकुल प्राचरा. का त्याग करता है। प्रात्मधात अपने सम्बग्दर्शन, ज्ञान चारित्र घात को प्रात्म नाश कहते हैं अर्थात् रत्नत्रय का नाश नहीं होने देता है और संयम का रक्षण करता है ।
(मूलाचार, प्रा. कुन्द-कुन्द कृत) इस प्रकार साधुनों के मूल गुणा व चर्या आहार शुद्धि प्रादि का वर्णन किया अव षष्ठम गुणस्थान के अन्तर्गत साधुनों के भेदों का वर्णन करते हैं ।
प्रश्न :--दश प्रकार के साधु होते हैं वो कौन से हैं ? . उत्तर :--प्राचार्योपाध्याय तपस्वि शक्षग्लान गण कुल संध साधु मनोज्ञानाम् । .. ..
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३५० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि प्राचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, शैक्ष, ग्लान, गगा, कुल, संघ, साधु और मनोज ये दश प्रकार के मुनि होते हैं। प्राचार्य का स्वरूप--
सदापायार विछण्हू सदा प्रायरियं चरे। आयारमायार बंतो प्रायरि पो तेण वुच्चदै ॥७७४॥
जो साधु हमेशा-सर्व काल याचार को जानते हैं, उनको प्राचारवित् कहते हैं। रात में और दिन में प्राचार का परमार्थ रहस्य जानकर जो वैसा आचरणा करते हैं, उनको प्राचार्य कहते हैं। जो यन से युक्त होकर सदाचार-शोभन', प्राचारनिर्दोष दर्शनाचार, ज्ञानाचारादि पांच प्राचारों का पालन करते हैं । जो गराधारादिकों को मान्य ऐसे प्राचार का पालन करते हैं। तथा मुनिपता के लिये योग्य दीक्षा काल तथा शिक्षा काल के आचरण करके कृत कृत्य हुए हैं उनको आचार्य कहते हैं। अन्य साधुनों को जो पंचाचार में तत्पर हैं। उन को प्राचार्य कहते हैं ।
जम्हापंचविहाचारं आचरंतोषभासदि। पायरि दाणि देसन्लोमाइरियो तेरा उच्च १७७५॥
जो दर्शनाचारादि पाँच प्रकार के प्राचारों का पालन करता हुआ शोभता है। तथा जो अपने निर्दोष पांच प्राचार लोगों को शिष्यों को दिखाता हुवा शोभता है वह प्राचार्य है।
संग्रहणुगह कुसलो सुन्नत्थ बिसार यो पहिय कित्ती । किर पाचरणसुजुतो गाय प्रादेज्जवयो य ॥७७६॥
संग्रह-दीक्षा देकर अपने संघ में दाखिल करना; अनुग्रह-जिसको दीक्षा दी उस शिष्य को शास्त्रादिकों का शिक्षण देना ऐसे दो कर्तव्यों में प्राचार्य कुशल होते हैं। सूत्रार्थ विशारदत्व यह गुण प्राचार्य में ऊपर के गुणों के साथ रहता है । मूत्र और उसका अर्थ वार्तिक तथा भाष्य का ज्ञान उन में रहने से उसका विस्तृत खुलासा बे जानते हैं तथा भव्यों को कहते हैं उनकी निर्मल कीति सर्व दिशा में फैलती है । वे क्रियाचरण मयुक्त रहते हैं अर्थात् पंच नमस्कार छह अावश्यक क्रिया (सामायिकादिक) आसिवा और निधिका ऐसी तेरह क्रियानों में वे तत्पर रहते हैं। तथा पांच महाव्रत समितियों और तीन गुप्ति ऐसे तेरह पाचरणों में वे हमेशा तत्पर रहते हैं। वे प्राचार्य ग्राह्य व प्रादेय वचन गुरण के धारक होते हैं । अर्थात् जिनके वचन सुनने से ही सर्व लोक ग्रहण
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अध्याय : पांचवा ]
[ ३५१ करते हैं तथा जो प्राचार्य कहते हैं वह सत्य-प्रभाग युक्त है, अन्यथा नहीं है ऐसा जानकर लोगों के द्वारा प्रदगा किया जाता है ! इस प्रकार मानार्य का स्वरूप हैं ।
मंभीरो बुद्धरिसो सूरोधम्मप्पहवारसा सीलो । खिदिससिसायर सरिसो कमेण तं सो.दु संपत्तो ॥७७७॥
१. गंभीर-जिनको क्षोभ उत्पन्न नहीं होता है। अथवा जिनके गुणों का पार नहीं लगता है । २. दुर्द्धर्ष -प्रवादी जिनका पराभव नहीं कर सकते हैं। प्रावादी जिनके सम्मुख पा नहीं सकते । जिनसे वाद करने में असमर्थ होते हैं। ३. शूर-कार्य करने में समर्थ, धर्म भावनाशील-धर्म व प्रभावना करना यह जिनका स्वभाव है । अर्थात् दान,तप, जिन पूजा,विद्या इनके अतिशय से प्रभावना करने वाले होते हैं।
क्षिति शशिसागर सदृश-क्षमा गुण होने से पृथ्वि के समान सौम्यता से चंद्र ___ समान और निर्मलता से समुद्र तुल्य ऐसे गुणों से संपन्न आचार्य होते हैं ।
और भी बारह प्रकार के तयों का प्राचरण करते हैं। दश धर्मों का पालन करते हैं और छह आवश्यक, सीन गुप्तियों का पालन करते हैं। पंजाचार का पालन करते हैं ऐसे प्राचार्य होते हैं। प्रायिकाओं के आचार्य---
पियधम्मो विदधम्मो, संबिग्गी बज्जभरू परिसुद्धो। . संगहणुग्गकुसलो सददं सारक्खरएजुत्तो ॥७७८।।
प्रायिकाओं का गरराघर (प्राचार्य) इन गुणों का धारण करने वाला होता है । प्रियश्रर्मा-उत्तमक्षमादिक धर्म अथवा चारित्र जिसको प्रिय है, अर्थात् उपशमादि धर्मों से जो युक्त है।
दृढधर्मा-जो धर्म में दृढ विचार रखने वाला हो, संविग्न-धर्म और धर्म फल में अतिशय उत्साहयुक्त अर्थात हर्षयुक्त है, अवश्य भीरू-पापों से डरने वाला, परिशुद्धपरि सर्व-पूर्ण धने से शुद्ध अर्थात् जिसका चारित्र अखंडित है ऐसा, संग्रहानुग्रहकुशलसंग्रह-दीक्षा-उपदेश इत्यादिकों से शिष्यों के ऊपर उपकार करने वाला तथा शिष्यों का संग्रह करने वाला । योग्य ऐसे व्यक्ति को दीक्षा देकर शिष्य बनाना व उनको शास्त्रोपदेश देकर विद्धान तथा सदाचार युक्त करने वाला हो। तथा सतत सारक्षण..पाप क्रियाओं से जो निवृत्ति उसको सारक्षमा कहते हैं ऐसी निवृत्ति से युक्त जो होता.
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Homen
३५२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि है अर्थात् जो हितोपदेश देता है ऐसा गाधर प्रायिकाओं के प्रतिक्रममादिकों का उपदेश देने में योग्य हैं।
गंभीरो दुद्धरिसों मिदवाठी अध्यकोदुहल्लो य. चिरपन्वइदो गिहिदत्यो अज्जारणं गरराघरो होदि ।७७६।।
गंभीर-जिसमें अगाधगुण हैं, दुद्धर्ष-जिसका अंत: करण स्थिर है अर्थात : निर्भय है, अल्प भाषण करने वाला, अल्प कौतुहल-जिसको थोड़ा विस्मय होता है, . अर्थात् जिसके मन में कार्यकारण मंबंधज्ञान जल्दी ध्यान में आने से जिसका आश्चर्य नष्ट होता है अथवा शिष्यादि के दोष मालम पड़ने पर भी किसी के आगे जो प्रगट नहीं करता है। चिर प्रजित-दीर्घ काल तक जिसने व्रत भार धारा किया है अर्थात् जो गुणों से ज्येष्ठ-श्रेष्ठ हैं, गृहीतार्थ-पदार्थों का स्वरूप जानने वाला और प्राचार, प्रायश्चिनादिकों के स्वरूप का ज्ञाता ऐसा जो महामुनि वह आर्यिकानों का गणधर होता है, ऐसे मुनि के पास प्राधिकायें प्रतिक्रमणादि विधि करती हैं। पीर भी आर्यिका. समाचार विधि में सब कहा गया है । और भी आचारसारादि ग्रंथो से जानना । अब आगे बारह तपादिकों का वर्णन करते हैं । तपों का स्वरूप--- ___ तपः पोलेन येनासो संसारो रूसरित्पतिः ।
तौर्यते त्वरयेदानी तत्तपः प्रतिपाद्यते ॥७८०॥
जिस तपरूपी नौका से शीत्र ही संसार रूपी विशाल समुद्र पार किया जाता . है इस समय उस तम को प्रतिपादन किया जाता है. 1 .
जिसकी सहायता से भव्य प्राणी संसार समुद्र को पार करते हैं । अर्थात् जो संसार समुद्र से तिरने के लिए नौका के समान है प्राचार्य उस तपाचार का इस समयः । . वर्गान करते हैं। .
. .... तपः प्राहुरनुष्ठानं मानसाक्षनियामकम् ।
बाह्याभ्यन्तर भेदं तत्प्रत्येक घड्विधं मतम् ।।७८१।।
मन और इन्द्रियों का निरोध करने वाले अनुष्ठान को लप कहा है, वह तप - बाह्य और अभ्यन्तर के भेद मे दो प्रकार का है । और उनमें प्रत्येक छह प्रकार का - माना गया है। ..
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श्रध्याय: पांचवां ]
[ ३५३
इन्द्रिय और मन का निरोध करना तप है । अथवा अपनी इच्छाओं का रोकना तप है। वह तप वाह्य और ग्राभ्यन्तर के भेद से दो प्रकार का है। तथा दोनों प्रकार केतु में प्रत्येक तप के बाह्य तप के भेद
होते हैं.
अनशनावसौदर्य वृत्ति संख्या रसोज्झिती ।
विविक्त शयनासनं कायक्लेशो बहिस्तप ॥७८२॥
अनशन, प्रमोद, वृत्तिपरिसंख्यान, रस परित्याग, विविक्त शयनासन और कायक्लेश से छह प्रकार के बहिरंग तप है ।
अनशन तप का स्वरूप---
प्रशनत्यामोऽनशनं साकांक्षाकांक्ष भेदगम् ।
तदाद्यमेक
द्वियादिषण्मासानशनन्तगम् ३७८३॥
चार प्रकार के थाहार का त्याग करना अनशन है । वह अनशन साकांक्षा और अनाकांक्षा के भेद से दो प्रकार का है। साकांक्षा अनशन एक मास दो महिना तीन महिना चार महिना, पांच महिना यादि श्रनेक भेद वाला है। जहां एक दो दिन आदि से लेकर छह महीना पर्यंत मर्यादित भोजन का त्याग किया जाता है वह साकांक्षा नामक अनशन है । यावज्जीव आहार का त्याग नाकांक्षा अनशन हैं। साकांक्षा अनंशन के भेद
साकार सर्वतो भद्रसिह निष्क्रीडितादयः ।
साकांक्षस्योपवासस्य भेदाश्चैकांतरोदयः ॥७५४॥
साकांक्षा उपवास के साकार, सर्वतोभद्र सिंह निष्क्रीड़ित यादि और एकांतरोदय यदि श्रनेक भेद हैं ।
नन्दीश्वर पंक्ति, चारित्र शुद्धि दुःख हरण, सुख कररण, लक्षण पंक्ति, सिंह निष्क्रीडित, भद्रावसन्त, त्रिलोक सार, श्रुत स्कंध, विभान पंक्ति, सुरज मध्य, मृदंगमध्य, शातकुम्भ, श्रुतज्ञान, द्वादशप्रत, विपंचाणतत्रत, घातिशयत्रत, रत्नत्रय पोशकारण, अष्टक, दशलक्षग्ण, पंचकल्याणक महापंचकल्याणक जिनेन्द्र महात्म्य, ध्यानपंक्ति, प्रमाद परिवार, सम्प्रत्ति संयमपक्ति प्रतिष्ठाकर, महोत्सव, संन्यास महोत्सव, जिन गुण सम्पति, आदि अनेक रूप जिनेन्द्र भगवान द्वारा कथित व्रत हैं । यह सब साकांक्षा
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३५४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
अनशन तप है । इन सब व्रतों में कुछ व्रतों की विधि हरिवंश पुराण में उद्यापनसार में तथा व्रत तिथि निर्णय में लिखी है तथा कुछ व्रतों को विधि तो प्राप्त भी नहीं है । निकांक्षा अनशन का लक्षण
निःकांक्षोsसो भवेद्भेक्त प्रत्याख्याने गिनीमृतिः ।
प्रायोप गमनेष्यायुरन्त सन्यास कर्मसु ॥७८ ५ ॥
आयु के अन्त में समाधि मरण के समय प्रायोपगमन में भक्त प्रत्याख्यान और इंगिनीभरण करना यह निष्कांक्षा नामक अनशन तप है 1
मरा पर्यन्त चतुविधि आहार का त्याग करना निराकांक्षा अनशन तप है । इस व्रत के मुख्य तीन भेद हैं। भक्त प्रत्याख्यान मरण, इगिनीमरण, प्रायोपगमन मरण | आयु के अन्त समय में जो चारों प्रकार का आहार का त्याग किया जाता है, बहु भक्तः प्रत्याख्यान सरा है, उसका उत्कृष्ट काल १२ वर्ष है, जघन्यकाल अन्तर्मूहूर्त है, मध्यम के अनेक भेद हैं, इस मरण में क्षपक की वैध्यावृत्ति दूसरे साधु कर सकते हैं और आप भी अपनी वैयावृत्ति करता है | इसमें अन्त समय में चतुविध प्रहार के
की मुख्यता है ।
इंगिनी मरण - अन्त समय में चारों प्रकार के आहार का त्याग करके अपनी वैयावृत्ति दूसरे से नहीं कराता है। अपनी शरीर परिचर्या अपने हाथों से ही करता हैं, वह इगिनी सररण है । जिसमें क्षपक अपनी वैयावृत्ति प्राप भी नहीं करता है और दूसरे से भी नहीं कराता है । वह प्रायोपगमन मरण है ।
देहवर्प विनाशाय संयमद्वय सिद्धये !
कुर्यादनशनं लाभसत्काराद्यनपेक्षया ||७८६ ।।
क्षपक लाभ सत्कार यादि की अपेक्षा न करके शरीर के दर्प का विनाश करने के लिये और संयम की सिद्धि करने के लिये करे |
अनशन व्रत से संयम की सिद्धि होती है, शरीर का ममत्व छूटता है, इसलिए ख्याति, पूजा, लाभ की इच्छा न करके अपनी शक्ति अनुसार अनशन नामक तप को अवश्य करना चाहिये ।
मौदर्य तप का लक्षण --
ग्रास होन निजाहाराद्यनाहाराशनं व्रतम् । तपः स्याद वमौदर्यमक्षकक्षदवानलः ॥७८७।।
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अध्याय : पांचयां ]
। ३५५ ग्रास हीन अपने ग्राहार से कम भोजन अत इन्द्रिय कपी पाटबी जलाने को के लिए दवानल' अवमौदर्य तप है ।।
पुरुष का स्वाभाविक पाहार बत्तीस ग्रास प्रमाण है । उनमें से एक ग्रास शादि बीन करो वा सामोव, गर है । यह अवमौदर्य तप इन्द्रिय रूपी अग्नि को जलाने के लिए दावानल है, अर्थात् अवमौदर्य व्रत में इन्द्रियों का निरोध होता है।
उपवासोऽतिमात्रा शनोत्पन्न श्रम दोष हृत् ।। ध्यान स्वाध्याय निद्रात्तिजयार्थमिदं मतम् ।।७८८॥
अतिमात्र भोजन करने से उत्पन्न हुये श्रम दोष का नाम करने वाला उपवास है । और ध्यान, स्वाध्याय के लिए. निद्रा अति को जीतने के लिए यह अवमौदर्य अन माना है।
अतिमात्रा में भोजन करने से अजीर्णादि रोग उत्पन्न होते हैं, उन रोगों का नाशक उपवास है । तथा ध्यान स्वाध्याय की वृद्धि के लिये निद्रा और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिये अवमौदर्य प्रत करना चाहिये । क्योंकि उदर भरकर नहीं खाने से आलस्य प्रमाद नहीं होता है, परिणामों की विशुद्धि होती है । निद्रा पर विजय होती है । इन्द्रियां भी शिथिल हो जाती है, इसलिए ध्यान और स्वाध्याय की वृद्धि होती है । तथा भूख से कम खाने पर अजीर्णादि रोग भी उत्पन्न नहीं होते हैं। यह अवमौदर्य तप इन्द्रियों के स्वेच्छाचार को रोकता है, परिणामों को निर्मल करता हैं । और इससे प्रतिक्रमगा, प्रत्याख्याच, समता, बन्दना, स्तुति और कायोत्सर्ग इन एट नावश्यकों की वृद्धि होती है । वृत्ति परिसंख्यान तप का लक्षण--
निर्वाट गृहाऽऽहार पान दातृषुवतनम् । संख्या तन्नियमो वृत्ति परिसंख्या निजेच्छया ॥७८९
गली, घर, ग्राहार, पात्र, दाता में वृत्ति वर्तना करना संख्या करना अपनी इच्छा से उनका नियम करना वृत्ति परिसंख्या है ।
आज इस मोहल्ला में आहार मिलेगा तो पाहार करेंगे नहीं मिलेगा तो नहीं करेंगे यह बाट परिसंख्यान है । इस गली में इस घर में या इतने घर में आहार मिलेगा तो याहार करूगा यह गृह परिसंख्यान है ।
सान सर्वप्रथम पाली में दाल, भात, दही, लड्डु आदि किसी वस्तु के विशेष का
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। गो. प्र.चिन्तामणि
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नियम लेना पाहार परिसंस्थान है । अाज सुवर्गा, कांसी, पीतल, चांदो, मिट्टी के बर्तन में माहार लूगा ऐसे पात्र विशेष का नियम लेना भाजन परिसंख्यान है। वृद्ध, युवा, कुमार, कुमारिका या दो स्त्रियां, पुरुष विशेष का नियम लेना दात विशेष परिसंख्यान है। इस प्रकार अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिए, कपायों का दमन करने के लिये, शरीर के ममत्व को दूर करने के लिये एवं जिनधर्म को प्रभावना के लिये गृह, दाता, आहार विशेष का नियम का स्टिरियान तप है ।
__ इय माशा निराशा यादीनता भावनाप्तये । जात्रयात्रा निमित्तान्न मात्र कांक्षस्य योगिनः ॥७६०॥
शरीर यात्रा के निमित्त मात्र अन्न की आकांक्षा करने वाले योगी के तृष्णा का छेद करने के लिए अदीनता भावना की प्राप्ति के लिए यह वृत्ति परिसंख्यान होता है।
शरीर को रक्षा करने के लिए साधु लोग पाहार करते हैं । उसमें भी तुटणा को नाश करने के लिए प्रदीनतानों की प्राप्ति के लिए ग्रह वृत्ति परिसंख्यान तप किया जाता है। रस परित्याग तप का लक्षण-----
दधि क्षीराऽऽज्यतैलादेः परिहारो रसस्य यः ।। तपो रस परित्यागो मधुरादि रसस्य वा ॥७६१॥ कायकांति मदाक्षेभक्षोभ वारण कारणं । परिहारो रसस्यायं स्पाज्जितेन्द्रिय योगिनः ॥७२॥
दधि, दुध, बृत, तेलादि और गुड़, चीनी आदि मधुर रस का परिहार रस परित्याग तप है यह रस का परित्याग जितेन्द्रिय योगी के काय कातिप्रद मद और इन्द्रिय रूपी हाथियों के क्षोभ के वारण में कारमा है.। . विविक्त शयनासन तप का लक्षप---
विविक्तेऽध्ययन ध्यान बाधवोत्कर जिते । शयनं चाऽसनं यत्तद्विविक्तः शयना सनम् ।।७६३॥ तरु कोटर शून्यागाराऽरामोवी घरादयः ।।
विविक्ताः कामिनीषण्ठ पशुक्षुद्रागि वजिताः ॥७६४॥ .अध्ययन और ध्यान के. बाधाओं के समूह से रहित एकांत स्थान में गो ।
।
Intry----- 14RANSans
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अध्याय : पांचवां ]
[ ३५७
शयन करना बैठना है, वह विविध शयनासन है, तरुकोटर, शून्यागार, उपवन की पृथ्वी पर्वतादि कामिनी, पशु, नपुंसक और क्षुद्र प्राणियों से रहित विविक्तता होती है ।
कामिनी, नपुंसक, पशु, क्षुद्र प्राणियों से रहित, तरूकोटर, शून्यागार, उपवन की भूमि पर्वत आदि विविक्त स्थान है। उस अध्ययन और ध्यान की बाबा के समूह से रहित विविक्त स्थान में शयन करना, बैठना शयनासन तप है ।
कायक्लेश तप का लक्षरण-
सुखोषलालितः कायो नालं सद्ध्यान सिद्धये । क्लेशः क्लेशैर्मतोचितैः ॥७६५॥
तद्द हृदमनं काय
सुख पूर्वक लालन-पोषण किया हुआ शरीर, सद्ध्यान की सिद्धि के लिए. समर्थ्य नहीं होता है, इसलिये जिनेन्द्र कथित उचित क्लेश के द्वारा उस शरीर का दमन करना, अपने अधीन करना, काय क्लेश तप हैं । यहा कारणों के द्वारा शरीर का दमन करता, काय क्लेश तो है, परन्तु तय नहीं है । जिस काय क्ललेश में शरीर के भमत्व के साथ कपायों का दमन होता है, वहीं काय क्लेश तप है । कषाय के आवेश में आकर शरीर का घात किया जाता है, वह तप नहीं है, इसको बताने के लिये प्राचार्य ने मतोचित कहा हैं ।
निर्दयं मर्दनीयोऽयं कायः क्लेशकरः पुरा । चिरं रिपुरिatar: काय क्लेशरतो यतिः ॥७६६॥
यह काय पूर्व में चिरकाल तक शत्रु के समान क्लेश करने वाला है, इसलिये यह काय क्लेश में रत साधु के द्वारा निर्दय होकर मर्दन करना पड़ता है।
यह शरीर अनादिकाल का शत्रु है, इसने पूर्व में सुभे बहुत दुःख दिये हैं। इसलिये यह मर्दनीय है। ऐसा विचार कर काय क्लेश में रत योगी घोर तपश्चरर के द्वारा काय क्लेश करते हैं ।
वीर स्वस्तिक वज्रा जहस्दि शुण्डांशनादयः ।
व्युत्सर्गे शव गोदंड चाव शय्यादयश्च ते ॥७७॥
वीरासन, स्वस्तिकासन, वज्रासन, हस्ति गुण्डाशन, मुतकशय्या, गवासन, दंड शय्या और धनुः शय्यादि से शरीर को क्लेश देना वा इन आसनों से ध्यान करना व्युत्सर्ग रूप कायक्लेश तप है ।
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३५८ }
[ गो. प्र. चिन्तामगिर तपो बाह्यमिदं बाह्यलोकानन्दैक मन्दिरम् । . ... ग्राभ्यन्तर तपः क्षीर सागरेन्दु नभाभ्यहम् ॥७६८।।
बाहा लोको के आनन्द का एक मन्दिर यह वाह्य तप है शीर सागर और अन्द्रमा के समान उज्जवल ग्राभ्यन्तर तप को मैं नमस्कार करता हूँ।
अनशनादि बाह्य तप बाह्य लोगों के प्रानन्द का स्थान है, धर्म प्रभावना का : . भारस है, उसका वर्णन किया । शाब क्षीर समुद्र और .. चन्द्रमा के समान उज्जवल साभ्यन्तर तप को मैं नमस्कार करता हूँ। सान्तरिक मन का नियमन होने में और बाह्य जनों के प्रत्यक्ष न होने वाले तप को ग्राभ्यन्तर तप कहते हैं । प्राभ्यन्तर तपों के भेद. तत्प्रायश्चितं विनयो. यावत्यं . जगन्नुतम् ।
स्वाध्यायो भवेद् व्युत्सों ध्यानं चाभ्यान्तरं तपः ।।७६६।।
प्रायश्चित, विनय, ययावत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान यह तीन जगत में पूज्यनीय आभ्यंतर तप है। प्रायश्चित तप का वर्णन----
येनागो गलति प्रत्नं प्रायश्चितं तदुच्यते । कर्म प्रायोजनस्तस्य चित्तं चैतोहरं यतः ॥१०॥
जिसके द्वारा पुरातन पाप नष्ट होता है, वह प्रायश्चित कहा जाता है, ... अथवा जन प्राय है, अथवा जन प्राय है भन जिनका क्योंकि उस जन के चित्त को हरा करने वाला कार्य प्रायश्चित कहा जाता है।
प्रमाद अथवा अज्ञान जन्य दोषों के निराकर गा करने का नाम प्रायश्चित है । उत्कृष्ट चारित्र धारी वा मानवों को "प्रायः". कहते हैं। और मन को चित्त कहते हैं । अतः मन की शुद्धि करने वाले कार्य को प्रायश्चित कहते हैं, पाथवा पुरातन कर्मों का क्षेत्रग, निर्जरा, शोधन, बावन, निराकरण, उत्क्षेपण, छेदन यह सब प्रायश्चित के नाम हैं। प्रायश्चित के भेद---
अालोचना प्रतिक्रमणोभयानि विवेचनम् । व्युत्सर्गस्तपच्छेद मूल परिहार दर्शनम् ।१८०१३॥
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अध्याय : पांचवां
प्रायश्चित्तस्य भेदाः स्युर्द व तत्र संश्रये । दोषाः यत्प्रमादाद्यराचं तेषां निवेदनम् ||८०२॥
प्रालोचना, प्रतिक्रमण, उभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, मूल, परिहार और श्रद्धान, ये दस प्रायश्चित के भेद हैं। प्रमादादि के द्वारा उत्पन्न दोषों का गुम समक्ष निवेदन करना श्रालोचना है ।
के
गुरु को दोषों के निवेदन करने की विधि -
ज्ञात श्रुतरहस्याय प्रशांत स्वांतवृत्तये । अपरिस्त्रावि शस्तैकान्तस्यायैव सूरये ॥८३॥ विनयेनोपसृत्योपविश्य पार्श्वे कृतांजलेः । बाल व गर्हतोऽवनमित्येतत्स्याद्विशुद्धये ||८०४ ॥
३५६
प्राकंपितानुमापितं दृष्ट बादर सूक्ष्मणम् । छन्नं शब्दाकुलं बहू व्यक्त तत्सेवितान्यपि ।।६०५ ॥ दशेत्यालोचनागांस त्याज्यान्यात्म हितैषिणा ।
जोत के रहस्य को जानता है, जिसका मन अत्यन्त अपरिस्वावी है, ऐसे एकांत में दिल आप में बैठकर अपने दोषों की शुद्धि करने के लिए मायाचार वक्रता का त्याग कर विनय से बालकवत् अपने दोषों की यह करने वाले शिष्य के सलोचना होती है । आलोचना के दश दोषों का स्वरूप ---
प्रशति है, जो के वाम पार्श्व
सदा हि साधयत्यायीः परलोक ममायया ॥ ८०६ ॥
आकंपित दोष, प्रमापित दोष, दृष्ट दोष, बादर दोष, सूक्ष्म दोष, दोष, शब्दाकुल दोष, बहु दोष, प्रव्यक्त दोष, तत्सेवी दोष ये दश श्रालोचना के दोष हैं । श्रात्म हितैषी, मानव, इन दोषों को दूर से छोड़ देवे, क्योंकि माया रहित आलोचना करने से ही परलोक की सिद्धि होती है ।
प्राकंपित दोष
aatein प्रायश्चित भोत्येति सूरये ।
पुरोपकरणानां खानमाकंपितं मतम् ||८०७।।
गुरु मुझे अल्प प्रायश्चित देवें, इसलिए महत् प्रायश्वित के भय से गुरु
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[ गो. प्र. चिन्तामरिए को पूर्व में उपकरण प्रादि देकर अनुकम्पा उत्पन्न कराना, याकंपित दोष है। स्थूल दोष.
ग्लानः क्लेशा सहोऽस्म्यल्पं प्रायश्चितं ममार्यले । चेहोषाख्यां करिष्याभोत्यादिः स्यादनुमापितम् ॥५०॥
में रुगण (रोगी) है, बलेश को सहन करने में असमर्थ हूँ, यदि प्राचार्य मुझे अल्प प्रायश्चित देंगे तो मैं अपने दोषों की आलोचना करूगा स्थूल दोष है । सूक्ष्म दोष सुक्ष्म दोष
.
. . सुक्ष्मामः कीर्तनं सूक्ष्म दोस्यामि विशोधकः । इति ख्यात्यादि हेतोः स्यात्सूक्ष्म स्थुलोपगृहनम् ।।०६!!
यह साधु सुक्ष्म दोषों को भी कहने वाला है, इस प्रकार की ख्याति पूजा की इच्छा से अल्प वा सूक्ष्म दोषों की अालोचना करना, यह स्थुल का उपगुइन करने. वाला सूक्ष्म दोप है। प्रच्छन्न दोष
दो सतीद्दशे देयं किं प्रायश्चित्त मित्यलम् । प्रश्नः स्वच्छादनेन स्याच्छन्न लज्जाभयादिभिः ॥१०॥
ऐसा दोष हो जाने पर क्या प्रायश्चित्त देना चाहिए, इस प्रकार लज्जादि के वशीभूत होकर अपने दोषों को आच्छादन करना, बन्न दोष है। किसी के द्वारा अपने दोष प्रकाशित करने पर ऐसा दोष मेरे में भी है, ऐसा विचार कर गुप्त रूप से . प्रायश्चित लेना, प्रच्छन्न दोष है । शब्दाकुलित दोष
व्रतिवातधनवाने स्वदोष परिकीर्तनम् । . .. लज्जाय: पाक्षिकादौ यत्तच्छन्दाकुलितं मतम् ॥११॥
लज्जादिक के कारगर अतियों के समूह से याकुल शब्द से युक्त पाक्षिकांदि में जो अपने दोषों का कथन करना, वह शब्दाकुलित दोष माना है।
जिस स्थान में बहुत बतियों का कोलाहल हो रहा है, ऐसे पाक्षिकादि प्रतिक्रमण के सयय में लज्जादि के वशीभूत होकर अपने दोषों का काथन करना, "जिससे आचान स्पष्ट रूप से खुन नहीं सके, इसको पदालित दोष कहते हैं ।
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अध्याय : पांचवां ]
बहु दोष
प्रायश्चित्तमिदं युक्तं न वेत्यल्पतदाशया । बहुसूरि परिप्रश्नो, यावदल्पं स बहिति ।।८१२१॥
यह प्रायश्चित युक्त है या नहीं हैं, इस प्रकार अल्प प्रायश्चिन की आशा से बहुत से प्राचार्यों से पूछना; जब तक अल्प प्रायश्चित हो, वह बहु दोष है। . अव्यक्त दोष
स्वसमान ज्ञान तपो वालस्यालोचनं भवेत् । अव्यक्त हीभय प्रायश्चित्त मीत्यादि हेतुतः ।।८१३॥
लज्जा, भय, प्रायश्चित की भीति आदि कारणों से अपने समान ज्ञान, नप, वालक के समक्ष आलोचना करना, अव्यक्त दोष होता है । तत्सेवी दोष
माहशो वेत्यसावेव ममागोऽस्मै यदपितम् । तन्ममेति स्वदोषोक्तिरस्मै तत्सेवितं मतम् ॥१४॥
यह मेरे जैसा ही है, मेरे अपराध इसके लिए जो अर्पण किये हैं, वे मेरे हैं, इसलिये अपने दोषों को बहना तत्सेवी दोष माना है ।
ऐसे गुरु के पास जाकर अपने दोषों की आलोचना करना जो अपने समान अपराधी है, यह तत्सेबी दोष है। अथवा मेरे दोप इसके अपराध के समान है, इसे यह भी जानता है। इसे जो प्रायश्चित मिलेगा, वह मुझे भी युक्त है, इस प्रकार अपने दोषों को छिपाना तत्सेवी दोष है।
साऽऽमांगसंगतं यद्वन्नोषधं व्याधिबाधकम् । तथाऽनालोचना शुद्ध नैनो नाशकर तपः ।।१५।।
जिस प्रकार ग्राम सहित शरीर को प्राप्त हुई औषधि रोग नाशक नहीं है, अर्थात् जो औषधि अपक्व है, वह रोग नाशक नहीं हैं। उसी प्रकार पालोचना से अशुद्ध तप पापों का नाशक नहीं है । निर्दोष तप ही पापों का नाशक है। मुनि की और प्रायिकाओं की आलोचना---
द्वयाश्रयं संयतानां स्यादायिकाणां त्रिगोचरम् । सप्रकाश प्रदेशे तु तच्चारित्र विभूषणम् ॥१६॥ नियों की आलोचना (दोषों का कथन) दो के आश्चय से होती है । अर्थात्
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[ गो. भ. चिन्तामशिा
यदि मुनि अपने दोषों की आलोचना एकांत में गुरु और शिष्य दो हो, तब करे । तीसरा समीप नहीं होना चाहिये । प्रायिकाओं की पालोचना प्राचार्य गणिनी, और अालोचना करने वाली नायिका, इन तीन के प्रनित होती है। अर्थात् अकेली प्रायिका एकांकी प्राचार्य के पास आलोचना नहीं करती है । प्रायिका सूर्य से प्रकाशित प्रदेश में आलोचना करती है । अन्धकारिता प्रदेश में नहीं करती है । यह अालोचना चारित्र का भुषगा है।
पालोच्यापित प्रायश्चित वृत्ति विजितः ।। सन्मंत्र . निश्चयेऽप्युद्योगो नवकलजितः ।।८१७॥
जो मुनि पालोचना करके भी प्राचार्य के द्वारा अपित प्रायश्चित का प्रावरण नहीं करता है। वह सन्मंत्र का निश्चय करके भी उद्योग नहीं करने वाले के समान फल रहित होता है। जैसे मंत्र को जान करके भी जो मंत्र की विधि का अाचरण नहीं करता है, उसको मंत्र के फल की प्राप्ति नहीं होती, उसी प्रकार आलोचना करके भी प्राचार्य कथित प्रायश्चित को पालन नहीं करने वाला निर्दोष . नहीं होता है।
मिथ्यामदाऽगोऽस्त्वि त्याद्य यं घोषेभ्यो निवर्तनम् । .. प्रतिक्रमण मल्पा , पराधस्यकाकिनो मुनेः ॥८१८॥
मेरे अपराध मिथ्या होद इत्यादि वचनों के द्वारा जो दोषों से निवर्तन है. .. वह अल्प अपराधी एकाकी मुनियों के प्रतिक्रमण है। उभय प्रायश्चित का स्वरूप
स्यातदुभयमालोचना प्रतिक्रमणद्वयं । दुःस्वप्न दुष्ट चितादिमहा दोष समाश्रयम् ॥
आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों किये जाते हैं, वह उभय नामक प्रायश्चित है । मुनिराज दुःस्वप्न मानसिक दुष्ट विचार, चितादि महादोग उत्पन्न होने पर - प्रतिक्रमग और आलोचना दोनों करते हैं । विवेक प्रायश्चित का स्वरूप---- . . . .
परिहत्तु मशक्तस्य दोषं द्रव्यादि संश्रयम् । - तद्रव्यादि परित्यागो विवेकः कथितोऽथवा ॥१६॥
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अध्याय : पांचवां ]
अनासुकस्थ्य सेवायां त्यक्तस्य प्रासुकस्य च ।
प्रमादेन पूनः स्मृत्वा स तदा तद्विसर्जनम् ।।२०॥
द्रव्यादि से संश्रित दोष को छोड़ने में अशक्त के उस द्रव्यांदि का परित्याग करना विवेक बहा है, अथवा प्रमाद से अनासक का और त्याग किये हुये प्रासुक द्रव्य . का सेवन करने पर पुनः स्मरण करके उसका त्याग कर देता है, तब वह विवेक नामक प्रायश्चित होता है ।
जो वस्तु अप्रामुक का अभक्ष्य है, अथवा जो छोड़ी हुई है, प्रमाद से या विस्मरगा से उस वस्तु का सेवन कर लिया हो लो तदनन्तर स्मरण होने पर उसको छोड़ देना, विवेक नामक प्रायश्चित है । अथवा जिस वस्तु के सेवन करने से काम क्रोधादि विकृति उत्पन्न होती है, उस वस्तु का त्याग करना विवेक नामक प्रायश्चित है । अथवा जिस वस्तु में अभक्ष्य वा छोड़ी हुई वस्तु मिली है, उसको पृथक् करना शक्य नहीं है, उस वस्तु का त्याग करना भी विधक है । व्युत्सम का स्वरूप--
युत्समोश रहताधिकार काय जनम । सद्ध्यानं तन्मलोत्सर्ग नद्या तरणादिषु ॥२१॥
मल, मूत्र यादि का त्याग करने के बाद, नदी आदि से पार होने के बाद अन्त हीदि काल पर्यन्त शरीर के ममत्व का त्याग करके सध्यान वरना
तप प्रायश्चित्त का स्वरूप
तपः स्यादुपवासक स्थानादि व्यसनादिभिः । ब्रतातिचारे सत्येतत्प्रायश्चितं तु षड्विधम् ।।२२।।
व्यसन आदि के द्वारा बतों में अतिचार हो जाने पर उपवास, एक भुतिः नादि छह प्रकार के बहिरंग तप करना, यह तप नामक प्रायश्चित है ।।
अहिंसादि ब्रतों में अतिचार लग जाने पर अनशनादि छह प्रकार बहिरंग तप के द्वारा आत्म शुद्धि करना तप नामक प्रायश्चित है। छेद का स्वरूप--
दिवसादि तपच्छेदश्छेद संयम पर्यये । सदर्पकृत दोषस्य चिर दीक्षा हितैषिणः ।।८२३॥
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३६४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामगि अभिमान में पाकर किया है, दोष जिसने चिरकाल की दीक्षा हितैषी .. के संयम की पर्याय में दियस अादि तप का छेद करना छेद नामक प्रायश्चित है।
. चिरकाल. का दीक्षित साधु अभिमानी होकर अपने मतों में दुपरा लगाता है, तब उसकी पक्ष, मास, दिवसादि की दीक्षा का छेद कर देना छेद नामक प्रायश्चित है।
पुनर्दीक्षा ग्रहोनूनं जा पूपिशिशिरू : छित्वोन्मार्गस्थ पार्श्वस्थ प्रभृतिश्रमणेत्वियम् ।।८२४॥
सारी पूर्व की तपस्थिति को नष्ट कर पुनः दीक्षा का ग्रहण करना मूल नामक प्रायश्चित है, यह प्रायश्चित उन्मार्गगामी, पार्श्वस्थ प्रभृति महादोषी श्रमणों में होता है।
पूर्व की सम्पूर्ण तपस्थिति का छेद करके पुन: दीक्षा देना मूल नामक प्रायश्चित है । यह प्रायश्चित उन्मार्गगामी, पार्श्वस्थ अादि महादोषी श्रमणों को ही दिया जाता है। पार्श्वस्थ आदि मुनियों के भेद---
सच्चारित्रामृतापात्रं स्युः पार्श्वस्थः कुशीलकः । संसक्तोऽप्यवसन्नश्च मृगचारीति पंचते ।।८२५॥
पार्श्वस्थ, कुशील, संसक्त, श्रबसन्न और मृगचारी ये पांच प्रकार के मुनि सम्यकचारित्र के पात्र नहीं है । पार्श्वस्थ और कुशील
वसत्युपधि संगस्थः पावस्थः स्यात्कुशीलकः । संघाहित फरस्तीन कषायो व्रत जितः ।।८२६।।
पार्श्वस्थ-जो वसतिका, उपाधि और परिग्रह. में स्थित है—वह मुनि पार्श्वस्थ ऋहलाला है। ... कुशील-जो सर्व संध का अहितकर है, तीव्र कमायी है. बतों से रहित हैं,
वह साधु कुशील कहलाता है । .: संसक्त और अयसन्न
- संसक्तो वैद्य मन्त्रावनीश सेवनादि जीवनः ।. ज्ञान चारित्रहीनोऽवसनः स्यादकरलालसः ।।८.२७॥
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अध्याय : पांचवां ]
[ ३६५
Minisiridinnetwount
admanarain winnaginni
संसक्त--जो लोग कपाय के वशीभूत होकर औषधि, मन्य, तन्नादि बताकर अजीविका करता है और राजा आदि की सेवा करता है, वह साधु संसक्त कहलाता है।
अबसन्न-जो ज्ञान चारित्र से रहित है । साधु की दैनिक क्रियाओं में आलसी है, वह अबसन्न कहलाता है । मुगाचारी
स्वच्छंदो यो गणं त्यक्तु चरत्येकाक्यसंवृतः । मृगाचारीत्यमी जैन धर्माऽकोत्तिकरानराः ।।८२८॥ ।
मगाचारी-जो साधु स्वछन्द है, अर्थात् प्राचार्य की प्राज्ञा का विराधक है। संघ को छोड़कर एकाकी असंवृत्त होकर नमरण करता है, यह जन धर्म को मलीन करने वाला साधु मृगाचारी है ।। परिहार उपस्थापना प्रायश्चित के भेद----
परिहारोऽनुपस्थापन पारंभिक भेद भाक् । निजान्य गणभदं तत्राद्य तत्राद्यमुत्तमम् ।।८२६॥
अनुपस्थापन और पारंत्रिक के भेद से परिहार दो प्रकार का है। उसमें अनुपस्थापन, जिनगा अनुपस्थापन और अन्यगरण अनुपस्थापन के भेद से दो प्रकार का है। उसमें निजगरा अनुपस्थापन उत्तम, मध्यम और जघन्य के भेद से तीन प्रकार
द्वादशाब्देशु षण्मासण्मासातशनं मतम् । जघन्यं पंच पंचोपवास मध्यन्तु मध्यमम् ।।८३०॥
बारह वर्षों में छह-छह महीने का उपवास करना उत्तम है, वारह वर्ष तक पांच-पांच उपवास करना जघन्य और मध्यम है । अनुपस्थान प्रायश्चित----
द्वात्रिशदूरालयस्थेन वसतेयतीन् । सर्वान् प्रणमताऽपेत प्रतिवन्दन साधुना ॥३१॥ स्वदोष ख्यातये पिच्छं विभ्राणेन पराङ मुखं । सूरीतरैः सहोपात्रमौनेनैतद्विधीयते ॥३२॥
जो प्राचार्य वा संघ की वसलिका से बत्तीस धनुष दूर स्थान में रहता है और सर्व मुनियों को नमस्कार करता है, परन्तु उसको कोई मुनि प्रतिनमस्कार नहीं
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[ गो. प्र. चिन्तामगि करते हैं। जो प्राचार्य के साथ वार्तालाप करता है, शेप मुनियों और थावकों के साथ नहीं बोलता है, मौन रखता है । अपने दोषों की बिख्शाति (प्रगटता) के लिये पिच्छिका को पराङ मुखी रखता है, छह महीना, पांच महीना ग्रादि का उपवास करता है, यह अनुपस्थान नामक प्रायश्चित है । स्वगग अनुपस्थापन प्रायश्चित देने के कारण
प्रमादे नान्य पाखंडि गृहस्थ यति संश्रितं । वस्तुस्तेनयतः किचिच्चेतना चेतनात्मकम् ।।८३३॥ यतीन्प्रहरतोऽन्य स्त्रीहरणादींश्च कुवर्तः । दश नव पूर्वज्ञस्य व्याय संहननष्य यत् ।।८३४॥
प्रमाद के कारण अन्य पाखंडी गृहस्थ और यतियों से संचित चेतनअचेतनात्मक किचित वस्तु की चोरी करने वाले यति को, मारने वाले पर स्त्री हरगण
आदि पाप करने वाले को नव और दश पूर्व के पाठी तथा प्रादि वनवृषभ वज्र और नाराच वाले को बह परि कथित स्वगग्णानुपस्थापन प्रायश्चित दिया जाता है ।
करोति यदि दर्पण दोषान् पूर्व भाषितान् । सोयमन्यगणानुपस्थापनेन विशुद्धयति ।।८३५।।
जो यति नव या दश पूर्व का पाठी हो, आदि के तीन संहनन (ब्रज वृषभ ... · नारांच, ब्रज नारांच, नारांच) से युक्त हो - परानु प्रमाद के वशीभूत होकर पाखण्डी,
यति, गृहस्थादि को चेतना चेननात्मक वस्तु की चोरी की है, क्रोध में पाकर किसी यति का घात किया है, तथा पर स्त्री का सेवन किया है, तो वह मुनि स्वगणानुपस्थापन नामक प्रायश्चित का भागी होता है। हीन संहनन बाले को यह प्रायश्चित नहीं दिया जाता है।
जो यदि पूर्वोक्त हिंसादि दोष को अभिमान में प्राकर करता है तो वह साधु .. अन्यगरणानुपस्थापन नामक प्रायश्चित के द्वारा शुद्ध होता है । · अन्यगणानुपस्थापन नामक प्रायश्चित का लक्षण
प्रायश्चितं तदेवात्र किन्तु स्वगरण सूरिणा। पालोच्य प्रेषितः सप्त सूरि पावमनुक्रमात् ।।८३६।। मालोच्य संस्तैर प्राप्त प्रायश्चित्तोऽन्त्य सूरिया । तमाद्य प्रापितस्तेन दतं चरति पूर्ववत् ।।८३७॥
Skincareonema.
maline
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अध्याय : पांचवां ]
गान्य गणानुपस्थागत लामक याचिका की विधि । अनुपस्थापन के समान हो है। परन्तु यह विशेषता है । अभिमान पूर्वक अपराध करने वाला साधु अपने दोषों की प्राचार्य के समक्ष आलोचना करता है । तदनन्तर उसकी आलोचना को सुनकर प्राचार्य उसको दूसरे प्राचार्य के समीप भेजते हैं । वह साधु दूसरे प्राचार्य के समीप जाकर अपने दोघो की आलोचना करता है, वह प्राचार्य भी उसकी आलोचना मुनकर तीसरे श्राचार्य के समीप भेजते हैं। इस प्रकार साात प्राचार्य के समीप जाकर अालोचना करता हैं, उसको कोई भी प्राचार्य प्रायश्चित नहीं देते हैं । पुनः कम से सात प्राचार्यों के पास जाकर अपने प्राचार्य के समीप पाता है । तब ग्राचार्य उसको स्वगगणानुस्थापन विधि के अनुसार प्रायश्चित देते हैं। यह अन्यगणानुस्थापन नामक प्रायश्चित है स्वगणानुस्थापन का अर्थ है- अपने गण से बहिस्कृत करना । अपने संघ की वसतिका से ३२ धनुष दूर रखना । अन्यगरणानुस्थापन का अर्थ है - दूसरे प्राचार्य के संघ में जाकर आलोचना करने पर भी प्रायपिचत देकर वे प्राचार्य साधु को अपने गण में नहीं रखते हैं, इसलिये यह अन्यगरणानुस्थापन है । पारंचित प्रायश्चित को विधि-- .
स्वधर्म रहित क्षेत्रे प्रायश्चिते पुरोदिते । चारः पारंचिकं जैनधर्मात्यन्तरतेर्मतम् ।।८३८।। संघोझेश विरोधांतः पुरस्त्री गमनादिषु । दोषेष्ववंद्यः पाप्येष पातकोति बहिः कृतः ।।६३६॥ चतुविधेन संधेन देशानिष्कासितोप्यदः । चरत्येवाऽर्य वैराग्य सत्त्वज्ञान बलो वती ।।८४०।।
अपने धर्म से रहित क्षेत्र में पूर्व में कहे हुये प्रायश्चित में जैन धर्म में अत्यन्त लीन मुनि का बिहार पारंचिक नामक प्रायश्चित माना है, संघ का राजा का, विरोध, अंतःपुर की स्त्री गमनादि दोष हो जाने पर यह अबंदनीय है पापी है पातकी है, इस ग्रकार बहिष्कृत तथा चतुर्विध संघ के द्वारा देश से निकाला हुआ भी यह श्रेष्ठ वैराग्य, तत्वज्ञान रूपी बल से युक्त साधु पाचरगा करता है।
.. इस प्रायश्चित में उपवासादि विधि तो अनुपस्थापन प्रायश्चित के समान है, परन्तु कुछ विशेषला है ! जब कोई साधु संघ का, राजा का विरोधी होकर अंतःपुर की
Re
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३६८ }
[ गो. प्र. चिन्तामणि स्त्रियों के साथ दुराचार करता है, तब अनेक महापराध करने पर चातुर्वर्ण्य श्रम संघ से यह महापापी है, जिनमत से वाह्य है, 'इसको बन्दना मत करो' ऐसी घोषणा देकर अनुपस्थापना नाम प्रायश्चित देकर देश से निकाल देते हैं। यह मुनि भी स्व धर्म सहित क्षेत्र में जाकर ज्ञान, वैराग्य, सत्य, कार में अन्न होकार, मानार्य के द्वारा दिये . हुए प्रायश्चितः का पालन करता हुया विहार करता है, यह पारंचिक नामक प्रायश्चित है।
दर्शनं यत्युनस्तत्व श्रद्धानं तन्महावतैः । साद्धं यतेः स्थितस्येत्वा मिश्वात्वं तदुदीरितं ।।८४१॥
किसी कारण से मिथ्यात्व अवस्था को प्राप्त हुआ मुनि पुनः तत्वश्रद्धान को. प्राप्त होता है, वह दर्शन नामक प्रायश्चित है।
देशं कालं बलं ज्ञात्वा गणी वैद्यवदंगिनाम् । अल्पानल्पेषु दोषेषु कुर्यात्त द्विशोधनं ॥८४२॥
जिस प्रकार वैद्य रोगी के रोग शक्ति प्रादि को जानकर उसके रोग को दूर करने के लिए औषधि देता है उसी प्रकार प्राचार्य साधु के अल्प अनल्प दोषों में देश, कारन, शक्ति को जानकर प्रायश्चित देकर उसके दोनों की शुद्धि करते हैं।
कृतागसैव कर्तव्य प्रायश्चित त्रिशुद्धितः । ग्लानस्यैव प्रयत्नेन युक्तमौषध सेवनं १८४३।।
जिस प्रकार रोगी को प्रयत्न पूर्वक औषधि सेवन करना चाहिए । इसी . ... प्रकार किया है, अपराध जिसने ऐसे साधु को मन, वचन, काय से प्रयत्न पूर्वक युक्त
प्रायश्चित करना ही चाहिए। . : ... जिस प्रकार रोगी मानव योग्य पोषधि सेवन करके रोग दूर करता है।
उसी प्रकार अपराध रूपी रोगों को दूर करने के लिये मन, वचन, काय की शुद्धि पूर्वया.. प्रयत्नशील मुनि को अपने दोपों को गुरु के समक्ष आलोचना करके प्रायश्चित ग्रहण करना चाहिये । औषधि सेवन किये बिना रोगों का निष्कासन नहीं होता । उसी प्रकार प्रायश्चित के बिना पायों का प्रक्षालन नहीं होता है ।
'दोषव्युदासनैः शल्य मर्यादा संयम स्थितिः । स्वांत प्रशांति सम्पत्ति प्रमुखार्थ मिदं मतम् ॥८४४॥
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अध्याय : पांचवां ।
[ ३६६ प्रायश्चित नामक तप के द्वारा शल्य (माया, मिथ्यात्व और निदान) का नाश होता है । मर्यादा संयम की स्थिति होती है । चित्त की शांति और दोष कृत पापों का प्रक्षालन होता है । इसलिये प्रायश्चित नामक तप का वर्णन किया है ! बिनय लप का वर्णन
विनयं स्याद्विनयनं कषायेन्द्रिय मर्दनं । स नीचैर्वत्ति रथवा विनयाहे. यथोचितम् ।।४५॥
विनयते इति विनयनं, विनयन किया जाता है कषाय का और इद्रिय का दमन किया जाता है, अथवा पूज्य पुरुषों के यथा योग्य नम्रता होती है उसकी विनय कहते हैं।
सरज्ञान तपश्चारित्रोपचार प्रपंचकः । तनविनयस्त्यागः शंकादीनाम मीचते ।।८४६।।
सम्यग्दर्शन विनय, सम्यग्ज्ञान विनय सम्यक्चारित्र विनय तपो विनय और उपचार विनय के भेद से पांच प्रकार का विनय है। उसमें शंकादि दोषों का परिहार करना सम्यग्दर्शन विनय है । दर्शन विनय का लक्षण
शंकाऽऽकांक्षा जुगुत्साऽन्हा प्रशंसन संस्तवाः । नाम्ना ज्ञेयास्त्रयोन्स्यौ तु मनोवाविषये स्तुती ।।८४७॥
जिनेन्द्र कथित तत्त्व में संशय करना शंका है। संसारिक भागों की याँछा, कांक्षा है, रत्नत्रयधारी दिगम्बर तपस्वियों के शरीर को देख कर ग्लानि करना भूख प्यास से पीड़ित होकर जैन तपश्चरण से निर्विधन होना जुगुप्सा है। मन के द्वारा मिथ्यादृष्टियों की स्तुति करना संस्तब है । ये पांच सम्यग्दर्शन के अतिचार हैं । इनसे सम्यग्दर्शन मलीन होता है इसलिये इनका त्याग करना चाहिये । इन अतिचारों का त्याग करना सम्यग्दर्शन का विनय है । ज्ञान विनय का लक्षरप---
द्रव्यादि शोधनं वस्तु प्रमाणावग्रहादिक । . . बहुमानः श्रतज्ञेषु अताज्ञासायनोभनं ।।८४८।। धयः शील श्रुतोनाधिकाध पाध्याय कीर्तनं । चानिन्हवेन येनायज्ञानावरणकारणं ॥८४६॥
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३७०
स्वराक्षर पद
ग्रन्थार्थी हीनान्ययनादिकं ।
स्याज्ज्ञान विनयः सम्यग्ज्ञान स्वर्मोक्ष कारणम् ॥८५०॥
यदि का शोधन वस्तु की संख्यादिका अवग्रहादि श्रुतज्ञानियों में बहुमान श्रुत ज्ञानियों के प्रासादन का त्याग निवरहित वय से न्यून और शील श्रुत से अधिक उपाध्याय यादि का कीर्तन जिस कारण से यह निन्हव ज्ञानावरण कर्म कारण है । स्वर, अक्षर, पद, ग्रन्थ, अर्थ को हीनाधिक नहीं पढ़ना यह सम्यग्ज्ञान स्वर्ग और मोक्ष की कारणाभूत ज्ञान है।
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ज्ञानाचार अधिकार में कथित द्रव्य क्षेत्र काल और भाव की शुद्धि से शास्त्र पढ़ना, वस्तु प्रमाणादिका अवग्रह करना, श्रुतज्ञानियों में बहुमान होना, श्रुतज्ञानियों की आसान नहीं करना, उम्र में हीन होते भी जो शील और श्रुत में अधिक उपाध्याय यादि के गुणों का उत्कीर्तन करना जिस गुरु से ज्ञानार्जन किया है वह श्रुत आदि में हीन हो तो भी उसका नाम बताना, ज्ञानावरणादि कर्मों के कारण भूत निन्दु का त्याग करना, अर्थात् अपने श्रुतज्ञान को नहीं छिपाना, शब्द शुद्ध पढ़ना, ये ज्ञान के विनय हैं।
तपो विनय का लक्षण -
[ गो. प्र. चिन्तामणि
rates क्रिया शक्तिर्नानोत्तर मुणोन्नतिः ।
तपस्तद्वत्तमोदश्च स्यात्तपो विनयो मुनेः ||८५१॥
आवश्यक क्रियाओं में श्रासक्ति नाना उत्तर गुणों की उन्नति तपवालों में प्रमोद होना जिससे तपो विनय होता है ।
निर्दोष श्रावश्यक क्रियाओं का पालन करता नाना प्रकार के उत्तर गुणों की वृद्धि करना, बारह प्रकार के तपश्चरण में और तपस्वियों में प्रमोद भाव रखना. तपो विनय है ।
चारित्र विनय का लक्षरण ---
भक्तिश्चारित्रवत्स्वत्य वृत्ताऽनिन्दनमुद्यमः |
परीबह जयादी च चारित्र विनयो मुनेः ॥६५२ ॥ ॥
चारित्र शाली मुनि हंसों के प्रति भक्ति करना अन्य व्रतियों अर्थात् जयन्ध चारित्र वाले की निन्दा नहीं करना परिषद् आने पर उन पर विजय प्राप्त करने के लिये तत्पर रहना यह चारित्र विनय है ।
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अध्याय : पांचवां ।
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उपचार विनय का लक्षण और उसके भेद---
उपोपसत्य यश्चार उपचारो यथोचितः । स प्रत्यक्ष परोक्षात्मा तत्रायः प्रतिपाद्यते ॥८५३॥
समीप में जाकर जो यथोचित सत्कार किया जाता है वह उपचार विनय है। वह उपचार विनय प्रत्यक्ष और परोक्ष के भव सं दो प्रकार का है। इसमें सर्व प्रथम प्रत्यक्ष विनय का वर्णन करते हैं। प्रत्यक्षविनय का लक्षण--
अभ्युत्थानं मतिः सूरायागच्छति सति स्थिते । स्थानं नोचं निविष्टेऽपि शयनोच्चासनोसनम् ।।८५४॥ गच्छत्यनुगमो वक्तर्यनुकूलं वचो मनः । प्रमोदोत्यादिकं चैव पाठकादि चतुष्टये ॥५५॥
प्राचार्य के गाने पर शीन ही आसन से उठकर खड़े होना चाहिये तथा भक्ति पूर्वक उनको नमस्कार करना चाहिये । आचार्य के बैठ जाने पर प्राचार्य से नीचे स्थान पर बैठना चाहिये । प्राचार्य के सामने गायन और उच्चासन को छोड़ना चाहिये। प्राचार्य के गमन करने पर उनके पीछे पीछे चलना चाहिये । प्राचार्य के बोलने पर अनुकूल बचन बोलना चाहिये तथा प्राचार्य के प्रति मन में प्रमोद भाव, उनके गुरगों में अनुशग होना चाहिये । प्राचार्य के समान ही उपाध्याय, गगणधर, स्थावर और प्रवर्तक का विनय करना चाहिये ।
प्राचार्यदिवसत्स्वेवं स्थाविरस्य भुने गुणे । प्रतिरूपकाल योग्या क्रिया चान्येषु साधुषु ।।८५६।।
प्राचार्य की अनुपस्थिति में स्थविर, गणधर और अन्य साधुनों में प्रति रूप काल योग्य क्रिया नहीं करना चाहिये।
आर्यादेशयमाऽसंग्रतादि पचितसस्किया । कर्तव्या चेत्यदः प्रत्यक्षोपचार लक्षरणम् ।।८५७।।
ग्रायिका, देश संयमी और असंयतादि में उचित सत्कार करना चाहिये । यह प्रत्यक्ष उपचार विनय है । परोक्ष विनय का लक्षरए ----
ज्ञान विज्ञान सत्कीतिर्नति राज्ञानुवर्तनं । परोक्षे परगनाथाना परोक्ष प्रश्रयः परः ॥८५८।।
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३७२ 1
। गो. प्र. चिन्तामरिंग परोक्ष में प्राचार्य के ज्ञान विज्ञान का सत्कीर्तन, प्राज्ञा का पालन और नमस्कार परोक्ष विनय है।
विनयेन बिहीनस्य भिक्षोः शिक्षामृतश्रियः । संश्रयाय निदानं नो तथा चाभ्युदय श्रियः ॥८५६॥
जो तपस्वी विनयहीन है अर्थात् गुरुजनों का विनय नहीं करता है उसका शास्त्राध्ययनादि मुक्ति की प्राप्ति तथा स्वर्ग श्री का कारण नहीं है । विनय करने से क्या होता है.----
जिनाज्ञावर्त्तनं क्रीति मैत्री मानापनोदनम् । गुरपानुरागिता संघ सम्मवा धाश्च तद्गुणाः ।।८६०॥
जिनेश्वर की यो का पालन, हीति, निता, पान काप को हानि, गुरगों में अनुराग और चतुर्विध संघ को सन्तोषादि विनय के गुरण हैं।
विनय से जिनेन्द्र भगवान की आज्ञा का पालन होता है, जगत में निर्मल सत्कोति रूपी लता विस्तरित होती है सर्वजनों के मैत्री भाव प्रगट होता है, मान कपाय का नाश होता है तथा चतुर्विध संघ विनय शील मानव पर सन्तुष्ट होता है इत्यादि अनेक विनय के गुण हैं ।
किमत्र बहुनोक्तेन पदं सर्वेष्ट सम्पदाम् । रत्नत्रयी विभूषायां चेन मुक्ति निबन्धनं ।।८६१॥
विशेष कहने से क्या प्रयोजन है बिनय सर्व इष्ट सम्पदाओं का स्थान है, रत्नत्रय का भुपरण है और मुक्ति का कारण है। वैयावृत्य का लक्षण
व्यापत्प्रतिक्रिया यावृत्यं स्यात्सूरिपाठके । तपपस्विक्ष्यिग्लानेषु गणे संघे कुले यतौ ।।८६२६॥ मनोज्ञे च तपस्येषु नानाऽनशनवर्तनः । शैक्षो ज्ञानादि संशिक्षो ग्लानो नागागदातितः ॥८६३३॥ गणः स्थविर सन्ताश्चातुर्वर्ण्यकदम्बकम् । संघः स्याछीक्षकाचार्य शिष्याम्नायः कुल मतम् ।।८६४॥ चिर प्रवजितः साधुर्यतिः शेषो हि संयमी । दोक्षोन्मुख मनोज्ञाख्योऽसंयतो वा. सुदर्शनः ।।८६५॥
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- अध्याय : पाचन
[ ३७३ विद्याजात्यादि विख्यातो मिथ्यादृग्वाऽस्य संग्रहः । जिन प्रवचनस्यायं लोके गौरव कारकः ।।८६६॥ ।
सम्यग्नर्शनादि गुणों के आधार भूत महापुरुष से भव्य जीव स्वर्ग, मोक्ष सुख .. दायक व्रतों को धारण कर आचरण करते हैं, वे प्राचार्य हैं।
जिन व्रत शील भावनाशाली महानुभाव के समीप जाकर भव्यजन विनयपूर्वक श्रुत का अध्ययन करते हैं, वे उपाध्याय हैं ।
मासोपवास प्रादि नाना तपों को तपने वाले तपस्वी हैं। श्रुतज्ञान के शिक्षण में तत्पर और सतत ब्रत भावना में निपुण शैक्ष है। जिनका शरीर रोगों से प्राक्रान्त हैं, वे ग्लान हैं। स्थविरों की संतान गण हैं। दीक्षा देने वाले प्राचार्य की शिष्य परम्परा कुल है। चतुर्वगा श्रमरणों के समूह को संघ' कहते हैं। चिरकाल के दीक्षित पुराने साधक साधु हैं ।।
अभि रूप को मनोज कहते हैं। अथवा लोक में जो विद्वान है वाग्मी है, महाकुलीन आदि जाति से प्रसिद्ध है, जिनका संघ में रहना प्रवचन गौरव का कारण है उसको मनोज्ञ कहते हैं । अथवा जो संस्कार सहित सुसंस्कृत असंयत सम्यग्दृष्टि हैं, बह भी मनोज्ञ हैं । इस ग्रन्थ में विद्या जाति आदि से विख्यात जिन धर्म की प्रभावना करने वाले भद्र परिमगामी मिथ्यादृष्टि को भी मनोज्ञ में ग्रहण किया है । इनकी आपत्ति दुर करना वैयावृत्ति है।
परिषह समाश्लेषेऽभीषां थपछेमुषीसुदः । संपादनं त्रिरत्नाप्यैः वैयावृत्य त्रिशुद्धितः ।।८६७॥ प्रावासान पाना: प्रासुकैः क्लेशनाशिभिः। . तदभावे स्वकायेन स्वोपकारानपेक्षया ॥८६८।। । विण्मूत्रश्लेष्म सिंघारण कादे देहाद पोहतात् । ..
यत्नेनोत्क्षेयनिक्षेप परिवर्तक्रियादिभिः ।।६।।
इन मुनियों पर, व्याधि, परीषह, औषधि, ग्रादि उपद्रव होने पर उनका प्रामुक .. पाहार, पान, प्राश्रय, आसन, पावास, धौंपकरण आदि से प्रतिकार करना तथा संयम, सम्यक्त्वादि से च्युत होने पर उनको संयम और सम्यक्त्व मार्ग में दृढ़ करना ।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि वैयावत्य है । औषधि ग्रादि के अभाव में प्रति उपकार की अपेक्षा नहीं करके अपने नापने हाथों से मल मूत्र, खंकार तथा नाकादि के भीतरी मल को दूर करना यान पूर्वक उठाना, विठाना; परिवर्तन कराना आदि भी वैयावृत्ति है ।
अस्मिन्निविचिकित्सत्य वत्सलत्व सनाथता । यशोऽभ्युदयनिः श्रेयसुखाप्ति प्रमुखा गुणाः ।।८७०३.
वैयावृत्ति करने वाले मानव को निर्विचिकित्सता, वात्सल्यत्व सनाथता, यणोभ्युदय, निश्रेय: मुगुख की प्राप्ति आदि अनेक मुरगों की प्राप्ति होती है। अर्थात् वैयावृति करने बाले में निर्जुगुप्सा गुण होता है, क्योंकि निर्जु गुप्सा के बिना बैमावृत्ति नहीं होती है । वात्सल्य भाव प्रगट होता है । वात्सल्य के अभाव में वैयावृत्ति कर नहीं सकते तथा वैयावृत्ति कारक पवित्र यश संसार में फैलता है और यानि का फल स्वर्ग सम्पदा एवं मूक्ति पद प्राप्त होता है ।
स्वाध्याय तप का लक्षणस्वस्मयोऽसौ हितोऽध्ययः स्वाध्यायो वाचनादिकः । तपोवर्यमतो नान्यत्तषः सु द्वादशस्वपि ॥८७१॥
जो प्रात्मीय हितकारी शास्त्र वाचनादिक अध्ययन है, वह स्वाध्याय है । और . बारह प्रकार के तपों में स्वाध्याय के समान दूसरा कोई तप नहीं है ।
नोवमन्त महतात्सद्ध्यानमध्ययनं पुनः । सदैनो निर्जराकारि किन्तु न स्यात्कृतात्मनाम् ।।८७२।।
ध्यान अन्त मुंह से अधिक नहीं हो सकता है, परन्तु स्वाध्याय तो निरन्तर .. कर सकते हैं । जो पुण्यात्माओं के पाप की निर्जरा का कारण भूत है।
मनः सदर्थ वापाठेवणेऽक्षणी तच्छुतो अती। प्रसक्ते किष्कियेऽक्षेऽन्ये तदेकानय मिहाप्यलम् ॥८७३।।
स्वाध्याय परम ध्यान है, क्योंकि स्वाध्याय करते समय मन समीचीन अर्थ के विचार करने में लग जाता है, वचन पाठ करने में नेत्र वणों को देखने में और कर्मा शब्दों के सुनने में लीन हो जाते हैं. तथा सर्व इन्द्रियां निष्क्रिय हो जाती है, इसलिये स्वाध्याय में पूर्ण एकाग्रता होती है, अतः पत्र स्वाध्याय परम तप है। ..अस्मात्तत्त्वपराभ्यास: प्रशमश्च विरागता ।
प्रभावनैकांत वादिमान प्रमर्दनं ।।७४।।
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प्रवेश
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अध्याय पांचवां
[ ३५५
स्वाध्याय से तत्त्वों का अभ्यास होता है, प्रशम भाव वैराग्य की उत्पत्ति होती, स्वाध्याय के बल से एकांत वादियों के मान के मर्दन करने की शक्ति प्राप्त होती है तथा धर्म की प्रभावना भी होती है ।
व्युत्सर्ग का लक्षण --
शरीरान्तर्बहिः संग संग व्युत्सर्जनं मुनेः । व्युत्सर्गः स्यात्समीचीन ध्यान संसिद्धि कारणम् ||८७५ ॥ अंतरंग और बहिरंग के भेद से परिग्रह दो प्रकार का है। उनमें अंतरंग शरीर का ममत्व कोवादि कषायों का त्याग करना अभ्यन्तर व्युत्सर्ग है और क्षेत्र, वस्तु आदि बहिरंग परिग्रह का त्याग करना बहिरंग ब्युत्सगं मुनियों के ध्यान को सिद्धि का कारण है।
ध्यान तप का लक्षण
परं चित्तैकार्थलीन प्रवर्त्तनं ।
ध्यानं तपः कीर्त्यते हविस्तं मतं मोक्ष प्रधनं ८७६॥
अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त अवस्थान जिसका ऐसा चित्त का एकार्थ में लीन होकर प्रवर्त्त होना स्वर्ग मोक्ष का सावन ध्यान नामक सर्वोत्कृष्ट तप कहा जाता हूँ । विशिष्ट मिष्टं घत्युदारं दूरस्थितं वस्त्वति दुर्लभं च ।
जैनं तपः कि बहुनोदितेन स्वर्गश्रियं चाक्षय मोक्ष लक्ष्मी ॥७७॥
जैन तप के प्रभाव से प्रति दूरस्थ प्रति दुर्लभ, इष्ट विशिष्ट वस्तु की प्राप्त होती | और तो क्या स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति भी जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कथित तप के प्रभाव से होती है ।
दशलक्षण धर्म
( उत्तम क्षमा मार्दवाजेव शौच सत्य संयम तप त्यागाकिञ्चन्या च र्याणिधर्मः । सर्वार्थसिद्धि, प्र० ६ पेज नं. ४१२ पूज्यपादाचार्य कृत )
उत्तम अमा, मार्दव, ग्रार्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, ग्राकिञ्चन्य, ब्रह्म, यह दश प्रकार धर्म है । अब इन धर्मों का स्वरूप अलग-अलग कहते हैं । उत्तम क्षमा-शरीर की स्थिति के कारण की खोज करने के लिये, वह
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३७६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
विहार श्रादिक में ग्रामादिक को जाते समय साधु को दुष्ट जन गाली गलौच करते हैं। उपहास करते हैं, तिरस्कार करते हैं, मारते पीटते हैं और शरीर को तोड़ते मरोड़ते हैं, तो भी उनके मन में किसी प्रकार की कलुषता उत्पन्न नहीं होती, कभी क्षुभित नहीं होते हैं, शांत चित रहते हैं, नाना प्रकार के कारण मिलने पर भी क्रोध नहीं करते, इसी का नाम उत्तम क्षमा है ।
उत्तम मार्दव-जाति यदि आठ प्रकार के मदों के प्रवेशवेश होने वाले अभिमान का अभाव करना मार्दव है, मार्दव का अर्थ है मान का नाश करना । उत्तम आर्जव -- योगों का वक्र न होना ग्रार्जव है । यार्जव गुण का वारी मन से एक, वचन से एक, काय से एक रहता है ।
उत्तम शौच --- प्रकर्ष प्राप्त लोभ का त्याग करना, उत्तम शौच है । अनन्तानु बन्धी लोभ का कम करना ।
उत्तम सत्य —च्छे पुरुषों के साथ साधु वचन बोलना सत्य है ।
उत्तम संयम — समितियों में प्रवृत्ति करने वाले मुनि के उनका परिपालन करने के लिये जो प्राणियों का और इन्द्रियों का परिहार होता है, वह संयम है ।
उत्तम तप-- कर्मक्षय के लिये जो तप तपा जाता है, उसे तप कहते हैं । वह् तप बारह प्रकार का है, सो पीछे उसका बन कर आये हैं ।
उत्तम त्याग - जो संयमी के योग्य उपकरणों का दान करना त्याग है। वह दान चार प्रकार का है, सो वर्णन पीछे कर आये हैं ।
उत्तम प्राकिञ्चन्य - जो शरीरादिक उपात्त हैं, उनमें भी संस्कार का त्याग करने के लिये 'यह मेरा है' इस प्रकार के अभिप्राय का त्याग करना थाकिञ्चन्यं I इसका कुछ नहीं है, वह आकिञ्चन है, और उसका भाव या कर्म. याकिञ्चन्य है ।
उत्तम ब्रह्मचर्य --- अनुभूत स्त्री का स्मरगा न करने से, स्त्री विषयक कथा के सुनने का त्याग करने से और स्त्री से सटकर सोने व बैटने का त्याग करने से परिपूर्ण ब्रह्मचर्य होता है । प्रथवा स्वतन्त्र वृत्ति का त्याग करने के लिए गुरुकुल में निवास करना ब्रह्मचर्य है ।
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अध्याय : पांचवां
पंचाचार दर्शन--सम्यग्दर्शन अर्थात् तस्वों में रूचि रखना, ज्ञान---जीवादि तत्वों के म्वरूप को जानना, चारित्र---पापक्रियानों से विरक्त होना, तप-कर्म को दग्ध करने में समर्थ और शरीर तथा इन्द्रियों को संतप्त करने वाला बाह्य और प्राभ्यंतर भेद जिसके हैं। चोय---शक्ति, अस्थि और शरीर का सामाई, एनत्स्वरूपी बोर्य अथवा इनका जो अनुष्ठान, उसको प्राचार कहते हैं ।
१. दर्शनाचार---जीवादि पदार्थों पर निःशंकितादि अंगों सहित श्रद्धान करना, अर्थात् जिससे सम्यग्दर्शन पहिचाना जायेगा, ऐसी क्रियायें करना, दर्शनाचार है । यहां दर्शन शब्द का अर्थ अवलोकन नहीं है क्योंकि जीवादि तत्त्वों पर श्रद्धान . करना, यह प्रकरण यहां है।
२. ज्ञानाचार-~-पांच प्रकार की ज्ञानोत्पत्ति का कारण ऐसे शास्त्र का अध्ययन करना, उसका आदर करना, इत्यादि क्रिया ज्ञानाचार है।
३. चारित्राचार--प्राणि यध नहीं करना तथा इंद्रिय वश करने में प्रवृत्त । होना चारित्राचार है।
४. तपाचार--काय क्लेशदिक करना तपाचार है। ५. वीर्याचार---शुभ कार्यों में सामर्थ्य रखना, उत्साह रखना।
इस प्रकार के पंचाचारों का वर्णन किया, पड् आवश्यकों का वर्णन पहले कर आये हैं, अब गुप्तियों का वर्णन करते हैं।
गप्ति मण वच काय पत्ती भिक्खू सावज्ज, कज्ज, संजुत्ता। रियप्पं रिणवारयंतो तोहिंदुः गुत्तो हददि एसो. ॥८७
. हिंसादि पाप कार्यों से मन की प्रवृत्ति, वचन का व्यापार और काय की . . व्यापारादि की चेष्टा को निवारण करने वाला साधु कम से, मनोगुन्ति युक्त, बचन सुप्ति युक्त और कासगुप्ति युक्त होता है। मनोगुप्ति और बचन गुप्ति का विशेष लक्षरण-~
जा रायादिरिणवत्ती भरपस्स जारवाहि तं मरणोगुत्ती । अलियादिरिणयत्ति वा मोरणं वा होदि वचिगुत्ती ॥८७६॥
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[ गो. प्र. चिन्तामणि रागद्वेप से उत्पन्न होने वाल सर्व संकल्पों का त्याग करने से मनोगन्ति . होती है, और असत्य भाषण, कटोर भापग, असभ्य भाषण प्रादि कुवचनों का त्याग करना अथवा मीनधारण करना वचनगुन्ति का लक्षशा है । तात्पर्य-राग द्वेष पूर्वक होने वाले संकल्पों का त्याग करके मन को समता में रखना, अथवा धर्म ध्यान और शुबल ध्यान में स्थिर रखना मनोगुपित है । इशारा करके बचनाभित्राय व्यक्त करने से बचनगुप्ति नहीं होती है। अतः इशारों का त्याग करके कठोर वचनादिका का त्याग करना वचनगुप्ति है। साथबा मौन धारण करना बद्धन गुप्ति है, इस प्रकार . मनोगुप्ति का विवेचन किया है। . . कायगुप्ति का स्वरूप-~
कायकिरियाणियत्ती कामोसगो सरीर गुत्तीहि ।
हिसादिगियत्ती वा सरीरगुत्ती हवदि दिट्ठा ।।८८०॥ ........ शरीर की शादी करना मात्रा कायोत्सर्ग करना, किंवा हिंसा, चोरी,
मैथुन सेवनादि पागों का त्याग करना, शरीराप्ति है। गुप्ति का लक्षणा आचार्य ऐसा कहते हैं, सम्यग्दर्शन झान चारित्राणि गुप्यन्ते, रक्ष्यन्ते यकाभिस्ता गुप्तयः अथवा 'मिथ्यात्वा संयम कषायेभ्यो गोप्यते रक्ष्यते श्रात्मा यकाभिस्ता गुप्तवः' सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यरचारित्र रूपी रत्नत्रय का गोपन' अर्थात् रक्षण जिनके द्वारा किया जाता है, उनको गुप्ति कहना चाहिये । अथवा जो मिथ्यात्व, अभंवम और कपायों से प्रात्मा का रक्षणा करती है, उनको गुप्ति कहते हैं। इस प्रकार प्राचार्य परमेष्टि के छतिस मल गुन्गों का वर्णन किया, पागे उपाध्याय परमेष्टि के भूल गुणों का वर्गान करते हैं।
उपाध्याय परमेष्ठी रयरगत्तय संजुत्ता जिण कहिय पयत्भदेसया सूरा । णिक्करव भान सहिया उवाया एरिसा होति ।।८८१३
- (नियमसार, प्राचार्य कुन्दकुन्द) रत्नत्रय से. संयुक्त, जिनेंद्र देव द्वारा कथित पदार्थों का उपदेश देने वाले, शूर और नि:क्षित भाव से सहित ऐसे उपाध्याय परमेष्ठी होते हैं 1 और द्वादशांग के पाठी और शिष्यों को (मुनियों) पढ़ाने वाले होते हैं। समस्त श्रुतज्ञान के पाठी.
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अध्याय : पांचवां ]
श्रुत ज्ञान
१. पर्याय २. पर्याय समास, 5. ग्रक्षर, ४. ग्रक्षर भमास ५. पद ६. पदसमास, ७ संचात संघात समास, 2. प्रतिपत्ति १०. प्रतिपत्ति समास, ११. अनुयोग, १२. अनुयोग समास १३. प्राभृत-प्राभृत, १४. प्राभृत-प्राभुत समास, १५. प्राभृतक १६ प्राभृतक समास १७. वस्तु १८. वस्तु समास १६. पूर्व २०. पूर्व समास, ये सब २० भेदाङ्ग के अन्तर्गत ही होते हैं, अब इनका अलंग-ग्रलग खुलासा लिखते हैं ।
१. पर्याय श्रुतज्ञान
सूक्ष्म नित्यनिगोद के लब्ध्यपर्याप्तक जीव के पहले समय में जो श्रुतज्ञान होता है, उसकी पर्याय तज्ञान कहते हैं ।
यह ज्ञान सबसे जघन्य होता है 'लब्ध्यक्षर' इसका नाम है | श्रुतज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम को 'लब्धि' कहते हैं । और जिस ज्ञान का कभी नाश न हो उसकी 'क्ष' कहते हैं । यह ज्ञान सदा बना रहता है, इसका कभी अवरस्य नहीं होता । यह ज्ञान एक क्षर का अनंतवां भाग होता है। इसीलिए यह ज्ञान सबसे जघन्य कहा जाता है । यह ज्ञान सदा आवरण रहित रहता है । श्रतएव इतना ज्ञान सदा बना रहता है, यदि इसका प्रभाव मान लिया जाय तो जीव का नाश ही हो जाय । क्योंकि उपयोग ही जीव का लक्षण है । यदि उसका भी नाश मान लिया जायेगा, तो जीव काही प्रभाव हो जायेगा । इसलिए जीव के कम से कम इतना ज्ञान अवश्य रहता है । सो ही लिखा है ।
[902
सुमरिगोद प्रपज्जत, यस्स जावस्स पढमसमयि हवदि हु सवजह रिगच्चुग्धाडं गिरावर ॥८२॥
२. पर्याय समास - जब पर्याय श्रुत ज्ञान अनंतभाग वृद्धि असंख्यात भांग वृद्धि, संस्थान भाग वृद्धि, संख्यात गुण वृद्धि, असंख्य गुण वृद्धि, अनंत गुण वृद्धि, इस प्रकार पर गुणी वृद्धि होते-होते जब प्रसंख्यात लोक प्रमाण हो जाता है, तब उसको 'समास' ज्ञान कहते हैं । प्रक्षर तज्ञान से पहले तक 'समास' कहलाता है।
३. अक्षर श्रुतज्ञान-प्रकार आकार आदि प्रक्षर रूप श्रुत ज्ञान को अक्षर ज्ञान कहते हैं ।
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३८० ]
[ गो. प्र. चिन्तामि ४. प्रक्षर समास--अक्षर तज्ञान से ऊपर पद श्रवज्ञान से नीचे जो श्रुतज्ञान के भेद हैं, उनको 'अक्षर समास' कहते हैं ।
५. पदभुत---अक्षर श्रुतज्ञान के श्रागे क्रम-क्रम से अक्षरों की वृद्धि होतेहोते जब संख्यात अक्षरों की वृद्धि हो जाती हैं, तब उस ज्ञान को पदश्रुत ज्ञान ' कहते हैं ।
६. पदसमासपद तज्ञान के श्रागे संघात श्रुतज्ञान होने तक श्रुत ज्ञान के जितने भेद हैं, उन सबको पद समास' कहते हैं ।
७. संघात -- एकपद ज्ञान के आगे एक एक ग्रक्षर की वृद्धि होते, जब संख्यात हजार पदों की वृद्धि हो जाती है, तब यह संघात ज्ञान होता है, यह ज्ञान चारों गतियों में से किसी एक गति का वर्गान कर सकता है ।
८. संघात समास - प्रक्षरों के द्वारा बढ़ता हुआ जो वासलेकर प्रतिपत्ति श्रुतज्ञान तक जाता है, उसको 'संघात समास' श्रुतज्ञान कहते हैं
९. प्रतिपत्ति ज्ञान - संघात समास में बढ़ते-बढ़ते जब संख्यात हजार संघातों की वृद्धि हो जाय तब प्रतिपत्ति श्रुतज्ञान होता है । इस ज्ञान के द्वारा चारों गतियों का स्वरूप बन किया जा सकता है ।
१०. प्रतिपत्ति समास - प्रतिपत्ति ज्ञान से ग्रागे जब संख्यात प्रतिपत्ति रूप ज्ञान बढ़ जाता है, तब अनुयोग से पहले तक उसको 'प्रतिपति समास' कहते हैं । ११. अनुयोग - प्रतिपत्ति समास से एक एक प्रक्षर की वृद्धि होते जब संख्यात हजार प्रतिपत्ति की वृद्धि हो जाती है, तब एक अनुयोग श्रुतज्ञान होता है । इस ज्ञान से चौदह मार्गाओं का स्वरूप जाना जाता है ।
१२. अनुयोग समास - अनुयोग जान से आगे और प्राभृत-प्राभृत ज्ञान से पहले जितने ज्ञान के विकल्प हैं, सब अनुयोग समास है ।
१३. प्रामृत प्राभृत--- अनुयोग ज्ञान के आगे एक-एक अक्षर की वृद्धि होतेहोते संख्या अनुयोग होने पर प्रामृत प्राभूत ज्ञान होता है । प्राभृत शब्द का अर्थ अधिकार है । वस्तु नामक शुतज्ञान के अधिकार को प्राभृत और उसके भी अधिकारों को प्राभृत प्रामृत कहते हैं ।
१४. प्रामृत - प्राभृत समास- प्राभृत प्राभृत से बागे और प्राभृत से पहले तक agart के जितने विकल्प है, उन सबको 'प्राभृत- प्राकृत समास' कहते हैं ।
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अध्याय : पांचवां ।
[ ३८५ . १५. प्राभूत-प्राभृत-प्राभृत ज्ञान की वृद्धि होते-होते जत्र चौबीस प्राभृत हो . जाते हैं, तब एक 'प्रामृत ज्ञान होता है।
१६. प्रामृत समास-----प्रामृत से ऊपर और वस्तु में नीचे जो थुतजान के .. विकल्प हैं, उन सब को 'प्राभृत समास' कहते हैं। ..
१७. वस्तु २ त ज्ञान--प्राभूत ज्ञान की वृद्धि होते-होते जब बीस प्राभूत बढ़ जाते हैं, तब 'वस्तु श्रुतज्ञान' होता है.।।
१८. बस्तु समास-~-वस्तु ज्ञान से ऊपर क्रम से अक्षर पदों की वृद्धि होतेहोते दस वस्तु ज्ञान की वृद्धि हो जाय उसमें से एक अक्षर कम तक जो ज्ञान के विकल्प हैं. उनको वस्तु समास ज्ञान कहते हैं।
१६. पूर्वश्रुत--पूर्व ज्ञान के चौदह भेद हैं | वस्तु समास के अन्तिम भेद में अक्षर मिलाने से उत्पाद पूर्व होता है ।
२०. उत्पाद पूर्व समास-उत्पाद पूर्व में भी वृद्धि होते-होते चौदह वस्तु पर्याय वृद्धि होने पर उसमें से एक अक्षर कम करने से उत्पाद पूर्व समास ज्ञान
होता है।
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उसमें एक अक्षर बढ़ाने से अग्रायम्गीय पूर्व और उसकी वृद्धि होते-होते . .. अग्रायणीय पूर्व समास होता है । इसी प्रकार यारो के पूर्व और पूर्व समास समझने • चाहिये।
इस प्रकार यह द्वादशांग श्रुतज्ञान अनन्त पदार्थों को विषय भुत करने से अत्यन्त गम्भीर है और अबाधित विषय होने से अत्यन्त श्रेष्ठ है, इस प्रकार की शास्त्र प्रणाली के अनुसार वह श्रुतज्ञान बारह प्रकार का है। ऐसे श्रुतज्ञान को मैं नमस्कार करता हूँ। ..... श्र तज्ञान के बारह भेदों का स्वरूप---
प्राचारं सूत्रकृतं, स्थानं समवाय नामधेयं च । .. व्याख्या प्रप्ति च, ज्ञातृकथोपासकाध्ययने ।।८८३॥ वन्देन्तकृदृशः मनुत्तरोपपादिक दशं दशावस्थम् ।.. प्रश्न व्याकरणं हि, विषाक सूत्रं च दिनमामि ।।८८४॥
अंगप्रवृष्ट श्रुत ज्ञान के बारह भेद हैं। उनके नाम ये हैं..... प्राचारांग; २. सूत्रकृतांग, ३. स्थानांग, ४. समवायांग, ५. व्याख्या प्रजात्यंग, ६. ज्ञातृकथांग,
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३८२ ]
| गो. प्र. चिन्तामणि ७. उपासकाध्ययनांग, ८. अंतकृशांग, ६. अनुत्तरोपपादिक दशांग, १२. प्रश्न व्याकरणांग, ११. विपाक सूत्रांग और १२. दृष्टि वादांग । इन बारह भेदरूप श्रुतज्ञान को मैं नमस्कार करता हूँ।
इन बारह अंगों को पद संख्या और स्वरूप
वस्तुत श्रुत ज्ञान के दो भेद हैं, एक द्रव्य श्रुत और दूसरा भाव श्रुत । द्रव्य श्रुत की रचना शब्दात्मक है, इसलिए उसकी पद संख्या कही जा सकती है; पण माजश्रुत जानवर है, इसलिए असली पद संख्या आदि कुछ नहीं कही जा सकती।
१. प्राचारांग- इसकी पर संख्या अधारह हजार और इसमें गुप्ति समिति आदि मुनियों के प्राचरणों का वर्णन है ।
द्वादशांग श्रुतज्ञान में प्राचारांग को सबसे पहले स्थान मिला है । इसकर कारण यह है कि मोक्ष का साक्षात् कारण मुनि मार्ग है । और वह गुप्ति समिति पंचाचार दशधर्म प्रादि रूप है । इन सबका वर्णन आचारांग में हैं। इसलिये सबसे पहले यही कहा है । अथवा भगवान् अरहंतदेव ने अपनी दिव्यध्वनि के द्वारा मोक्षमार्ग का निरूपण किया उसी को सुनकर गणधरदेव ने द्वादशांग श्रुतज्ञान की रचना की, उसमें से सबसे पहले मोक्ष का साक्षात् कारण होने के कारण अचारांग सबसे पहला अंग कहा है।
२. सूत्रकृतांग-इसमें ज्ञान की प्राप्ति के लिये ज्ञान का विनय और अध्ययन के कारण आदि का वर्णन है, इसको पद संख्या छत्तीस हजार है।
३. स्थानांग- इसमें जीवादिक द्रव्यों के एक से लेकर अनेक स्थानों तक का वर्णन किया है । जैसे संग्रहनय से प्रारमा एक है । संसारी मुक्त के भेद से. दो प्रकार का है । उत्पाद व्यय प्रौव्य की अपेक्षा तीन प्रकार का है । गतियों की अपेक्षा से चार प्रकार का है । औपशमिक, क्षायिक, क्षयोपशिमक, प्रौदयिक, पारिणामिक भावों की अपेक्षा से पांच प्रकार का है। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे इन छह दिशाओं की ओद (विग्रह गति में) गमन करने के कारण छह प्रकार का है । स्यात् अस्ति, स्यात्नास्तिः प्रादि सप्त भंगों की अपेक्षा से सात प्रकार का है । पाठ कर्मों के प्रतिक्षण प्रास्त्रव की अपेक्षा सेल आठ प्रकार का है । नव पदार्थ रूप स्वरूप की अपेक्षा
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अध्याय : पांचवां ]
से नौ प्रकार का है 1 पृथ्वी कायिक, जल कायिक, वायु कायिक, अग्नि कायिक, प्रत्येक साधारण, दो इन्द्रिय, त्रि इन्द्रिय, चौ न्द्रिय, पंचेन्द्रिय के भेद से इस प्रकार का है, इस प्रकार जीव के अनेक भेद हैं।
इस प्रकार पुद्गल धर्म अधर्म आदि समस्त द्रव्यों के विकल्प समझने चाहिये । सब भेद स्थानांग में निरूपण किये गये हैं । इस अंग की पद संख्या बयालीस हजार है।
४. समवायांग- इसमें द्रध्य क्षेत्र काल भाव की अपेक्षा से द्रव्यों में जो परस्पर समानता हो सकती है, वह दिखलाई है । जैसे १. धर्म द्रव्य, २. अधर्म द्रव्य ३ लोकाकाश और ४. एक जीव के प्रदेश समान हैं, यह द्रव्य की अपेक्षा समानता है । १. जंबूद्वीप, २. अप्रतिष्ठान नरक, ३. नन्दीश्वर द्वीप की बावड़ियों और ४. सर्वर्थसिद्धि विमान समान क्षेत्र के हैं । यह क्षेत्र कृत समानता है । १. उत्सपिगी, २. अवसर्पिणी दोनों का काल समान हैं । यह काल की समानता है। १. क्षायिक ज्ञान और २. क्षायिक दर्शन दोनों समान हैं । यह भाषकृत समानता है। इस प्रकार समानता को निरूपण करने वाला समवायांग हैं। इसकी पद संख्या एक लाख चौसठ हजार है।
५. व्याख्या सजायंग-जीद है आमा नहीं है, इस प्रकार गणधर देव ने साठ हजार प्रश्न भगवान परहंतदेव से पूछे ! उन सब प्रश्नों का तथा उनके उत्तरों का वर्णन इस अंग में है। इसकी पेद संख्या दो लाख अट्ठाईस हजार हैं।
६ मातृकथांग-~-इसमें भगवान् तोर्थकर परमदेव और गरगधर देवों की कथानों का लथा उपकथानों का वर्णन है। अन्य महापुरुषों की कथाएँ. भी उसी में हैं । इसकी पद संख्या पांच लाख छापन हजार है ।
७. उपासकाध्ययनांग--इसमें श्रावकों के समस्त आचरण, क्रिया, अनुष्ठान आदि का वर्णन है । इसकी पद संख्या ग्यारह लाख सत्तर हजार है।
८. अन्तकृशांग-~-प्रत्येक तीर्थकर के समय में दश-दश मुनीश्वर ऐसे होते हैं, जो भयंकर उपसर्गों को सहन कर समस्त कमों का नाश कर मोक्ष जाते हैं, उनका वर्शन इस अंग में है। संसार का अंत करने वाले दश-दश मुनियों का वर्णन जिसमें हो उसको अंत कृदशांग कहते हैं । इसकी पद संख्या तेईस लाख अट्ठाईस हजार है।
६. अनुत्तरोपपादिक वशांग--प्रत्येक तीर्थंकर के समय में दश मुनि ऐसे होते हैं, जो घोर उपसर्ग सहन कर समाधि मरगा से अपने प्राणों का त्याग करते हैं और विजय, वैजयन्त, जयन्त. अपराजित और सर्वार्थ सिद्धि इन अनुत्तर विमानों में उत्पन्न
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३.४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
होते हैं । इन सबका वर्णन इस अंग में है ! इनकी पद संख्या बानवे लाख चवालीस
हजार है।
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१०. प्रश्न व्याकरणांम----जो वस्तु खो गई है या मुट्ठी में है वा और कोई चिंता का विषय हो, उन सब प्रश्नों को लेकर उनका पूर्ण यथार्थ व्याख्यान का समाधान का वर्णन इस अंग में है । इसकी पद संख्या तिरानवे लार्ख सोलह हजार है ।
११. विपाक सूत्रांग-- इसमें अशुभ कर्मों का उदय शुभ कर्मों का उदयं तथा उनका फल वर्णन किया है । इसकी पद संख्या एक करोड़ चौरासी लाख है।
- इस प्रकार ग्यारह अंगों की पद संख्या चार करोड़ पन्द्रह लाख दो हजार है । ऐसे श्रुतज्ञान को मैं नमस्कार करता हूं।
१२. बारहवें अंग दृष्टिवाद के लक्षण और भव-- परिकर्म च सूत्रं च, स्तौमि, प्रथमानुयोग पूर्व गते। . साद्धं चूलिकयापि च, पंचविध दृष्टिबादं च ॥६॥
दृष्टिबाद नाम के बारहवें अंग के पांच भेद हैं । १. परिकर्म, २. सूत्र, ३. प्रश्रमानुयोग, ४. पूर्वगत, और ५. चूलिका इन सबको मैं नमस्कार करता हूँ।
१. परिकर्म--जिसमें गणित की व्याख्या कर उसका पूर्ण विचार किया हो उसको परिकर्म कहते हैं । इसके पांच भेद हैं-१. चन्द्र प्रज्ञप्ति, २. सूर्य प्रज्ञप्ति ३. जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति, ४. द्वीप सागर प्राप्ति और ५. व्याख्या प्रज्ञाप्ति ।
चन्द्र प्रज्ञप्ति--इसमें चन्द्रमा की आयु, गति, परिवार, विभूति आदि का वर्णन है, इसकी पद संख्या छत्तीस लाख पांच हजार है।।
सूर्य प्रज्ञप्ति- इसमें सूर्य की प्रायु, गति, परिवार, विभूति ग्रहरण प्रादि का वर्णन है। इसकी पद संख्या पांच लाख तीन हजार है ।
जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति--इसमें जम्बूद्वीप सम्बन्धी सात क्षेत्र, कुलाचल पर्वत सरोवर नदियां आदि का वर्णन है । इसकी पद संख्या तीन लाख पच्चीस हजार है।
द्वीपसागर प्रज्ञप्ति--इसमें असंख्यात द्वीप समुद्रों का वर्णन है। उन द्वीप समुद्रों में रहने वाले अकृत्रिम चैत्यालय ज्योतिष व्यंतर ग्रादि सबका वर्णन है । इसकी पद संख्या बावन लाख छत्तीस हजार है।
व्याख्या प्रज्ञप्ति---इसमें जीवाजीवादिक द्रव्यों का स्वरूप, उनका रूपो, अरूपीपना आदि का वर्णन है । इसकी पद संख्या बौरासी लाख छत्तीस हजार है।
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अध्याय : पांचवां ]
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२. सूत्र-~~इसमें जीद कर्मों का कर्ता है, उनके फल को भोक्ता है, शरीर परिमारण है, इत्यादि पदार्थों का यथार्थ स्वरूप निरूपण किया है, तथा यह जीव पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु से उत्पन्न नहीं हुआ है, अणु मात्र नहीं है, सर्वगत नहीं है, इत्यादि रूप से अन्य मतों के द्वारा माने हुए पदार्थों के स्वरूप का खंडन है, इसकी पद संख्या अठासी लाख है ।
३. प्रथमानुयोग-~~-इसमें श्रेसठ शलाका पुरुषों के चरित्र व पुराणों का निरूपण है । इसकी पद संख्या पांच हजार है।
४. पूर्वगत---इसमें समस्त पदार्थों के उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य आदि का बर्णन है। इसकी पद संख्या पिचानवे करोड़ पचास लाख पांच है ।
५. चूलिका के पांच भेद हैं--जलगता, स्थलगता, मायागता, रूपगता और आकाशगता । ..
जलगता-इसमें जल में गमन करने के लिये तथा जल का स्तम्भ करने के लिये जो कुछ मंत्र, संथ व तपश्चरण कारण है, उन सब का वर्णन है । इसकी पंद संख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दो सौ है।
स्थलगता---इसमें पृथ्वी पर गमन करने के कारण मंत्र तंत्र और तपश्चरणों का वर्णन है । पृथ्वी पर होने वाली जितनी वास्तु विद्याएँ हैं मकान बनाने आदि की विद्याएँ उन सबका वर्णन है। इसकी पद संख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दो सौ है ।
मायागता--- इसमें इन्द्रजाल सम्बन्धी मंत्र, तंत्रों का वर्णन है, इसकी पद संख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दो सौ है ।
रूपगता- इसमें सिंह, व्याघ्र, हिरण प्रादि के रूप धारण करने के मंत्र, तंत्रों का वर्णन है तथा अनेक प्रकार के चित्र बनाने का वर्णन है । इसकी पद संख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दो सौ है ।
अाफाशगता---इसमें आकाश में गमन करने के कारण मंत्र तंत्र और तपश्चरण का वर्णन है। इसकी पद संख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार
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३५६ }
[ मो. प्र. चिन्तामखि
पूर्वगत के भेद और लक्षण
यद्यपि पूर्वगत की स्तुति कर चुके हैं, तथापि उसके अनेक भेद हैं, इसलिये न सब भेदों को कहते हुए उस पूर्वगत की फिर भी स्तुति करते हैं । पूर्वगतं तु चतुवंश, चोदितमुत्पाद पूर्व माद्यमहम् । aureated, पुरुवीर्यानुप्रवादं # ॥८५॥ संततमहमभिवंदे, तथास्तितास्ति प्रवादं पूर्व च ।
ज्ञान प्रवाद सत्य, प्रवाद मात्म प्रवादं च ॥ ६८६ ॥ कर्म प्रवाद मीडेऽथ, प्रत्याख्यान नामधेयं च । दशमं विधाधारं, पृथुविद्यानुपवादं च ८८७ कल्याण नामधेयं प्रारणांवायं क्रियाविशालं च । श्रथलोक विदुसार बंदे लोकाय सारपदं ॥८८॥
पूर्वगत के चौदह भेद हैं, उनके नाम ये हैं- १. उत्पाद पूर्व, २. ग्रायणीय
पूर्व, ३. वीagare पूर्व ४. अस्ति नास्ति प्रवाद पूर्व ५. ज्ञानप्रवाद पूर्व, ६. सत्यप्रवाद पूर्व, ७. ग्रात्मप्रवाद पूर्व, ८. कर्मप्रवाद पूर्व प्रत्याख्यान पूर्व १०. विद्यानुवाद पूर्व ११. कल्याणवाद १२. प्राणानुवाद पूर्व १३ क्रिया विशाल १४. लोक बिंदुसार । १. उत्पाद पूर्व -- इसमें जीवादिक पदार्थों के उत्पाद, व्यय, धौव्य रूप धर्मो का वर्णन है । इसको पद संख्या १ करोड़ है ।
२. श्राग्रायणीय पूर्व सुनय और द्रव्यों का वर्णन है।
इसमें प्रधान व मुख्य पदार्थों का निरूपण हैं । दुर्नय इसकी पद संख्या छियानवे लाख है ।
३. वीर्यानुवाद -- इसमें चक्रवती, इन्द्र, धरणेन्द्र, केवली आदि को सामर्थ्य
का महात्म्य दिखलाया है। इनकी पद संख्या सत्तर लाख है ।
४. अस्ति नास्ति प्रवाद -
- इसमें श्रनेक प्रकार से छहों द्रव्यों के अस्तित्व और नास्तित्व आदि धर्मो का वर्णन है । इसकी पद संख्या साठ लाख है ।
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५. ज्ञान प्रवाद--- इसमें पांचों ज्ञानो का तथा तीनों मिथ्या ज्ञानों के स्वरूप है। उसके प्रगट होने के कारण उनके प्राधार वा पात्र | जिनके वह ज्ञान होता है ] आदि का वर्णन है । उसके पद संख्या विन्यानवे हजार नौ सी नित्यानवे है ।
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अध्याय : पांचवा ]
[ ३८७ ६, सस्य प्रकाद-इसमें वचन गुप्ति का वर्णन है, वचनों का संस्कार किस प्रकार होता है उसका वर्णन है, कंठ, तालु आदि उच्चारण स्थानों का वर्णन है, जिनके बोलने की शक्ति उत्पन्न हो गई है ऐसे दोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय, पंचेन्द्रिय जीवों के शुभ, अशुभ वचनों के प्रयोगों का वर्णन है। इसकी पद संख्या एक करोड़
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७. प्रात्म प्रवाद ---इसमें जीव के ज्ञान, सुख और कृतत्व आदि धर्मों का वर्णन है । इसकी पद संख्या छब्बीस करोड़ हैं। .
८. कर्म प्रवाव-इसमें कर्मों का बध, उदय, उदीरणा, उपशम और निर्जरा आदि का वर्णन है। इसकी पद संख्या एक करोड़ अस्सी लाख है।
६. प्रत्याख्यान पूर्व – इसमें द्रव्य और पर्यायों के त्याग का वर्णन है । उपवास करना, प्रत, समिति, गुप्ति, पालन करना, प्रतिक्रमण, प्रतिलेख, विराधना विशुद्धि आदि का वर्णन है । इसकी पद संख्या चौरासी लाख है।
१०. विद्यानुवाद--इसमें सात सौ लधु विद्या, पांच सौ महाविद्यानों का वर्णन है। पाठों महानिमित्तों का वर्णन है तथा इन सब विद्याओं का साधन का वर्णन है । इसकी पद संख्या एक करोड़ दस लाख है।
११. कल्याणवाद----इसमें तीर्थकर परमदेव चक्रवर्ती बलदेव नारायण प्रादि के गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक सादि का वर्णन है। इसकी पद संख्या छब्बीस करोड़ है।
१२. प्रारगानुवाथ-इसमें प्रारण, अपान के विभाग का वर्णन है, आयुर्वेद शास्त्र, मंत्र शास्त्र, गारुडीविद्या आदि का वर्णन है । इसकी पद संख्या तेरह करोड़ है। .
१३. किया विशाल----इसमें बहत्तर कलाओं का वर्णन है तथा छंद शास्त्र और अलंकार शास्त्र का वर्णन है । इसकी पद संख्या नौ करोड़ है।
१४. लोक बिन्दुसरर-इसमें लोक में सबसे प्रधान और सार भूत जो मोक्ष है उसके सुख, साधन और उसको करने के लिये कहे गये समस्त अनुष्ठानों का वर्णन है । इसकी पद संख्या बारह करोड़ पचास लाख है। . .
इन पूर्वो के अधिकार तथा प्रत्येक अधिकार के प्राभूत आदि का वर्णन-... दश च चतुर्दश चाष्टा, वष्टादश भ द्वयोद्विष्टकं च । षोडश च विशति च, त्रिशत मपि पंचदश च तथा ६०॥
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३८८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि ऊपर जो उत्पादपूर्व प्रादि चौदह पूर्व कहे हैं उनमें नीचे लिखे अनुसार अधिकार हैं । उत्पाद पर्व के दश अधिकार हैं । प्राग्रायणीय के चौदह, वीर्यातुवाद के आठ, अस्ति नास्ति प्रवाद के अठारह, ज्ञान प्रवाद के बारह, सत्य प्रवाद के बारह, आत्म प्रवाद के सोलह, कर्म प्रवाद के बीस, प्रत्याख्यान पूर्व के तीस, विद्यानुवाद के पन्द्रह, कल्याणवाद के दश, प्राणानुवाद के दश, क्रिया विशाल के दश और लोक बिंदुसार के दश अधिकार हैं।
वस्तूनि दश दशान्येष्वनुपूर्व भाषितानि पूर्वाणाम् । प्रतिवस्तु प्राभृतकानि, विशति विशति नौमि IC६१॥
ये सब मिलकर एक सौ पिचानवे अधिकार होते हैं । इन सब अधिकारों को वस्तु कहते हैं । एक-एक वस्तु वा अधिकार में बीस-बीस प्राभूत होते हैं इस प्रकार एक सौ पिचानवे अधिकारों में उन्तालीस सौ प्राभूत होते हैं । तथा एक-एक प्राभृत में चौबीस प्राभूत-प्राभूत होते हैं सब प्राभूत प्राभूतों की संख्या तिरानवे हजार छ: सौ होती है । .
.. पूर्व १४, वस्तु १६५, प्राभूत ३६००, प्राभूत प्राभूत ६३६०० होते हैं। इन सबको मैं भक्ति पूर्वक नमस्कार करता हूँ।
___ आगे आनायणीय पूर्व के चौदह अधिकार अथवा वस्तु कही जाती हैं उनके नाम पूर्व परम्परा से उपलब्ध हो रहे हैं । इसलिये प्राचार्य उनका वर्णन करते हैं ।
पूर्वातं ह्यपरान्त, घ्र बमध्र बच्यवन लब्धि नामानि । अघ्र व वसंप्ररिपरिणधि चा, प्वर्थ भौमाययाधं च ॥८६॥ सवार्थ कल्पनायं, ज्ञानमतीतं स्वनागलं कालं ।' सिद्धिमुपाध्यं च तथा, चतुर्दश वस्तूनि द्वितीयस्य ॥१३॥
इस दूसरे प्राणायगीय नाम के पूर्व के चौदह अधिकार हैं, उनके नाम ये हैं--- पूर्वान्त, अपरान्स, प्रक, अधव, च्यवनलब्धि, अध्र व संप्रणिधि, अर्थ भौमावय, सर्वार्थ कल्पनीय, ज्ञान, अतीत काल, अनागत काल, सिद्धि और उपाध्य' । ये नाम प्राचार्य परम्परा से चले आ रहे हैं । इनको भी मैं नमस्कार करता हूँ।
___ आगे इस प्राग्रायणीय पूर्व के चौदह अधिकारों में से पांचवां अधिकार च्यवनलब्धि' है उसके चौथे अध्याय का नाम 'कर्म प्रकृति' है, उसके चौबीस अनुपयोग हैं, उनके नाम प्राचार्य परम्परा से चले पा रहे हैं प्राये उन्हीं की स्तुति करते हैं।
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अध्याय : पांचवां
पंचमदस्तु चतुर्थ, प्राधृतकस्यानुयोग नामामि । कृतिवेदने सथैव, स्पर्शन कर्म प्रकृति मेव ॥१६॥ बंधन निबंधन प्र, क्रमानुपक्रम मथाभ्युदयमोक्षौ । संक्रमलेश्ये च तथा, लेश्यायाः कर्म परिणामौ ॥८६५। सातम सातं दीर्घ, हस्वअवधारसीय संजं च । पुरु पुद्गलात्म नाम च, निधत्तनिधत्तमभि नौमि 1८६|| सनिकाचित मनिकाचिस, मथ कर्मस्थितिक पश्चिमस्कंधौ । अल्प बहुत्वं च यजे, सवाराणां चतुर्विशम् ॥७॥
१. कृति, २. वेदना, ३. स्पर्शन, ४. कर्म, ५. प्रकृति, ६. बन्धन, ७. प्रक्कम, ८. अनुपक्रम, ६. अभ्युदय, १०. मोक्ष, ११ संक्रम, १२. द्रा लेरा, १२. भानग्या , १४. सात, १५. मसात, १६. दीर्घ, १७. ह्रस्व, १८. भवधारणीय, १६. पुरु पुद्गलात्म, २०. निधत्तमनिधत्त, २१. सनिकांचित मनिकांचित, २२. कर्म स्थितिक, २३. पश्चिम स्कंध, २४, अल्प बहुत्व ये चौबीस अनुयोग हैं ये चौबीसों अनुयोग अथवा पञ्चीस अनुयोग प्राग्रायरणीय पूर्व के पांचवे च्यवन लब्धि नाम के अधिकार के कर्म प्रकृति नामक चौथे प्राभूत कहे जाते हैं । इनको मैं भक्ति पूर्वक नसस्कार करता हूं। द्वादशांग श्रुत ज्ञाम को पद संख्या
कोटीनां द्वादशशत, मण्टापंचाशतं सहस्त्राणाम् । लक्षय शोतिमेवच, पंच च वंदे अत पदानि
इस प्रकार समस्त द्वादशांग की पद संख्या एक सौ बारह करोड़, तीरासी लाख, अठ्ठावन हजार पांच है । इस श्रु त ज्ञान को मैं सदा नमस्कार करता हूँ। मागे एक एक पद में कितने कितने अक्षर होते हैं....
षोडश शतं चतुस्त्रिशत, कोटोनां त्र्यशीति लक्षारिए । . शतसंख्याष्टा सप्तति, मष्टाशीति च पदवरान् ॥६६
पद तीन प्रकार के होते हैं । १. अर्थ पद, २. प्रमार' पद, ३. मध्यम पद । कहने वाले का अभिप्राय जित्तने अक्षरों से पूर्ण हो जाय उतने अक्षरों का एक अर्थ पद होता है । इस पद के अक्षर नियत नहीं है । किसी पद में अधिक अक्षर होते हैं और किसी में कम । जैसे 'अग्नि लाओ इसमें थोड़े अक्षर हैं और 'सफेद गाय को अपनी जगह पर बांध दो" इसमें अधिक अक्षर हैं।
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HITEHSISTाठापनाउRARIA
३६० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि अाठ अक्षर वा इससे अधिक अक्षरों के समुदाय को प्रमाण पद कहते हैं । इससे अलबाह्य श्रत की संख्या कहीं जा सकती है। जैसे अनुष्टुप श्लोक के प्रत्येक चरण में पाठ अक्षर होते हैं।
अंग प्रविष्ट श्रुत की संख्या के निरूपगा करने वाले जो पद हैं उमको मध्यम पद कहते हैं । इस श्लोक में उन्ही मध्यम पद के अक्षरों की संख्या का प्रमाण कहते हैं । सोलह सौ चौंतीस करोड़ तिरासी लाख, अठत्तर सौ अठासी अक्षर अर्थात् सोलह अरब चौंतीस करोड़, तिरासी लाख, सात हजार, पाठ सौ अठासी अक्षर एक-एक मध्यम पद के होते हैं।
समस्त श्रु तज्ञान के अक्षरों की संख्या इकट्ठी प्रमाण है- अर्थात् १८४४६७४४०७३७०६५५१६१६ इतने अक्षर हैं।
इसमे मध्य पद के अक्षरो का शाग देना चाहिए जो फल प्राये वह द्वादशांग की पद संख्या समझनी चाहिये । तथा जो अक्षर बाकी रहते हैं, वे अक्षर अङ्गबाह्य श्रु त ज्ञान के समझने चाहिये । जो अक्षर बाकी रह जाते हैं उनसे मध्यपद बन नहीं सकता इसीलिये वे अक्षर अंग बाह्य के समके जाते हैं। उनकी संख्या आठ करोड़, एक लाख, पाठ हजार, एक सौ पिचहत्तर हैं। उस अंग बाह्य के अनेक भेद हैं उन्हीं की स्तुति करते हैं :अङ्गाबाह्य के अनेक मेदों का स्वरूप---
सामायिक चतुर्विशति, स्तवं वंदना प्रतिक्रमणं । वैनयिक कृति कर्म च, पृथुदशवकालिकं च तथा 16001 वरमुत्तराध्ययनमपि, कल्प व्यवहारमेवमभिवंदे । कल्पाकल्पं स्तौमि, महाकल्पं पुडरीकं च ॥६०१॥ परिपाटया प्रणिपतितोऽस्यहं महापुडरोकतामय ।। निपुरणान्य शीतिक च, प्रकीर्णकान्यंग बाह्यानि ॥६०२॥
अंग बाह्य श्रुत झान के चौदह भेद हैं, उनके नाम ये हैं--१. सामायिक २. चतुर्विशति स्तवं, ३. वंदना, ४. प्रतिक्रमण; ५. वैनयिक, ६. कृति-कर्म, ७. देशवैकालिक, ८. उत्तराध्ययन, ६. कल्प व्यवहार, १०. कल्पाकल्प, ११. महाकल्प, १२. पुडरीक, १३. महापुडरीक, १४. अशीतिक इन्हीं को प्रकीर्णक कहते हैं । इनमें । पदार्थों का स्वरूप अत्यंत सूक्ष्म रीति से वर्णन किया है। ऐसे इन चौदह प्रकीर्णकों को मैं बड़ी विनय के साथ वंदना करता हूँ।
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अध्याय : पाँचवां ]
[ ३९१ १. सामायिक----गृहस्थ वा मुनि जो नियत काल तक अथवा अनियत काल तक समता धारण करते हैं, उसको सामायिक कहते हैं । उनका जिसमें वर्णन हो वह सामायिक प्रकीर्णक है।
२. चतुर्विशतिस्तक-- वृषभादि चौबीस तीर्थंकरों के आठ प्रतिहार्य चौतीस अतिशघ, चिन्ह तथा अनंत चतुष्टय आदि की स्तुति करना स्तब है। उसका जिसमें वर्णरण हो वह चतुर्विशति स्तव है ।
३. वंदना-पंच परमेष्ठियों में से प्रत्येक की अलग अलग वंदना करना वंदना है । उसका जिसमें वर्णन हो वह वंदना है !
४. प्रतिक्रमण--जिसमें सात प्रकार के प्रतिक्रमण का वर्णन हो उसको प्रतिक्रमण कहते हैं । यथा (१) देवसिक-जिनके दोषों को निराकरण करने वाला प्रतिक्रमण । (२) रात्रिक-रात्रि के दोषों का निराकरण करने वाला प्रतिक्रमण (३) पाक्षिकपद्रह दिन के दोषों के निराकरण करने वाला प्रतिक्रमण (४) चातुमासिक प्रतिक्रमण--जिसमें चार महीने के दोषों का निराकरण हो। (५) सांवत्सरिक प्रतिक्रमरण-जिसमें एक वर्ष के दोषों का निराकरण हो। (६) ऐपिथिक-जिसमें ईपिथ संबंधी दोषों का निराकरण । (७) उत्तमार्थिक जिसमें समस्त पर्याय संबंधी दोषों का निराकरण किया जाय । इस प्रकार सात प्रकार के प्रतिक्रमणों का वर्णन जिसमें हो उसको प्रतिक्रमण प्रकीर्णक कहते हैं।
५. धनयिक-जिसमें ज्ञान विनय, दर्शन विनय, चारित्र विनय, तप विनय और उपचार विनयों का वर्णन हो उसको वैनयिक प्रकिर्णक कहते हैं।
६. कृति कर्म-जिसमें दीक्षा देने और दीक्षा लेने का विधान हो उसको कृति कर्म कहते हैं।
७. यश बैंकालिक-द्रम, पुष्पिल आदि दश दश अधिकारों के द्वारा इसमें मुनियों के समस्त आचरणों का वर्णन है ।
८. उत्तराध्ययन-इसमें अनेक प्रकार के उपसर्ग सहन करने और उनको सहन करने के फलों का वर्णन है ।
६. कल्पाकल्प---इसमें मुनियों के योग्य आचरणों का तथा उन आचरणों से च्युत होने पर योग्य प्रायश्चित का वर्णन है।
१०. कल्पाकल्प- इसमें गृहस्थ और मुनियों के योग्य आचरणों का वर्णन
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३२ ]
[ मो. प्र. चिन्तामणि है । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अपेक्षा का विशेष समय के अनुसार योग्य आचरणों का निरूपण इसमें किया गया है ।
११. महाकल्प - दीक्षा, शिक्षा, गणपोषण, आत्मसंस्कार, भावना, उत्तमार्थ ये छह कालभेद माने हैं। इनके अनुसार इसमें मुनियों के आचरणों का निरूपण हैं । १२. पुण्डरोक -- इसमें भवनवासी, व्यंतर ग्रादि देवों में उत्सन्न होने के कारण तपश्चरण का वर्णन है ।
१३. महापुण्डरीक --- इसमें देव, देवांगना, अप्सरा आदि स्थानों में उत्पन्न होने के कारण का वर्णन है ।
१४. प्रशीतिक इसमें मनुष्यों की प्रायु और सामर्थ्य के अनुसार स्थूल दोष और सूक्ष्म दोषों के प्रायश्चित्तों का वर्णन है ।
इस प्रकार ये चौदह प्रकीर्णक कहलाते हैं। इनमें अत्यन्त सुक्ष्म पदार्थों का वर्णन है, इसीलिये इनको निपुण कहते हैं । ये अङ्ग बाह्य इतने ही हैं । न इनसे कम हैं और न इनसे अधिक हैं, ऐसे इस अंग बाह्य को मैं नमस्कार करता हूँ। इस प्रकार श्रुतज्ञान के पाठी उपाध्याय परमेष्ठि होते हैं ।
(भक्ति, ग्रा. पूज्यपाद कृत )
महोपवासादिक का अनुष्ठान करने वाले तपस्वी कहलाते हैं, ये १० प्रकार के
सपस्वी का लक्षण ----
होते हैं ।
शैक्ष्य --
ग्लान-
गण
कुल ---
संघ --
जो निरंतर शिक्षाशील रहते हैं, उन्हें शैक्ष्य कहते हैं 1.
रोग आदि से क्लान्त शरीर वालों को ग्लान कहते हैं ।
स्थविरों की संतति को गरम कहते हैं ।
दीक्षाचार्य के शिष्य समुदाय को कुल कहते हैं ।
चार वर्ण के श्रमणों को संघ कहते हैं ।
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अध्याय : पांचवां । साधु
चिरकाल से प्रजित को साधु. कहते हैं। ... मनोज्ञ--
लोक में जिनकी वसा जा रही है। उन्हें मनोज्ञ कहते हैं । .. मुनियों की समाचार नीति तनोति संपदं नोतिर्यवृत्त द्वद्गरण श्रियम् । सत्प्रियां या समाचार नीतिः सा कोय॑तेऽधुना ॥६०३।।
जिस प्रकार नीति महान सम्पदा को. देने वाली हैं, उसी प्रकार समाचार नीति महान गुरण श्री को देने वाली है। वह मुनियों की समाचार नीति अब कही जाती है। समाचार को निरुक्ति
समः समानः सं सम्यगाहारो यः समैयुतेः । प्राचार्यत इति प्राज्ञः स समाचार ईरितः ॥६०४॥
रागद्वेष के अभाव रूप समताभाव है वह समाचार है, अथवा सम्यक् अर्थात् प्राचार रहित जो मूलगुरगों का अनुष्ठान पाचरण है वह समाचार है. अथवा प्रमत्तादि समस्त मुनियों का अहिंसादि रूप प्राचार है. वह समाचार है, अथवा सब क्षेत्रों में हानिवृद्धि रहित कायोत्सर्गादिक सदृश परिणाम रूप प्राचरण है वह समाचार है । सम्यक् प्राचरण के प्रकार---
एषः संक्षेपविस्तार द्विभेदो दशभेदपः । संक्षेपोऽनल्पभेवोऽन्य आदिभेवा इमे दशः ।।६०५॥
समाचार अर्थात् सम्यक् प्राचरण दो ही प्रकार के हैं-१. औधिक २. पदविभागिक । प्रौधिक के दश भेद होते हैं और पदविभागिक समाचार अनेक प्रकार का है। प्रौधिक समाचार के भेद---
इच्छामिथ्या तथा कारेच्छा वृत्यासी निषिद्धिकः । . प्राप्रच्छन्न प्रतिप्रश्नश्च निमंत्रण. संभयो ।६०६॥
इच्छाकार, मिथ्याकार, तथाकार, इच्छावृत्ति, आशिका, निषिद्धिका, आपृच्छा, प्रतिपृच्छा, सनिमंत्रणा और संश्रय इस तरह ते औधिक समाचार के दश भेद हैं ।
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३८४ ]
इच्छाकार
पुस्तकातrपयोगादेर्यो यात्रा विनयान्विता । स्वपरार्थे यतीन्द्राणां सेच्छाकारः प्ररूपितः ॥१०७॥
पिच्छिका आदि संयम के उपकरण, शास्त्रादि ज्ञानोपकरण, कमण्डलु itareer, safध प्रादि के ग्रहण और प्रतापन योगादि के करने के लिए गुरु से • जो विनय पूर्वक याचना की जाती है, वह इच्छाकार है 1
मिथ्याकार-
[ गो. प्र. चिन्तामणि
यन्मया दुष्कृतं पूर्वं तन्मिथ्याऽस्तु न तत्पुरः ।
करोमीति मनोवृति मिथ्याकारोऽति निर्मलः ॥६८
जो व्रतादिक में प्रतिचार रूप पाय मैंने किया हो, वह मिथ्या हो, ऐसे मिथ्या किये हुए पाप को फिर करने की इच्छा नहीं करता और मनरूप अंतरंग भाव से प्रतिक्रमण करता है, उसी के दुष्कृत मिथ्याकार होता है ।
तथाकार-
तत्वाख्यानोपदेशादौ नान्यथा भगवद्वचः तत्तथेत्यादरेणोक्तिस्तथाकारो गुणाकारः ॥ ९०६ ॥
तत्वाख्यान के उपदेश आदि में भगवान के वचन भगवान कहते हैं, वैसा ही है, इस प्रकार आदर पूर्वक कहना,
तथाकार !
भगवान सर्वज्ञ ने जो कहा हैं, वह सत्य हैं, क्योंकि भगवान अन्यथा वादी नहीं है । ऐसा दृ favवास करना तथाकार है ।
इच्छानुवृति
पूर्वात्ताननासा पयोगोपकरणादिषु ।
वृत्ति वृत्तिर्या विनयास्पदा ॥१०॥
अन्यथा नहीं है, जैसा गुणों को करने वाला
पूर्व में गृहीत उपवास, प्रतापन, योग पुस्तकादि उपकरणों में जो गुरू की इच्छानुकूल वृत्ति है, वह विनय का स्थान इच्छानुवृत्ति है ।
आचार्य आदि के द्वारा दी हुई पुस्तक यादि उपकरण के ग्रहण में गुरु की इच्छानुकूल प्रवृत्ति करना इच्छानुवृत्ति (छंदन ) है ।
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अध्याय : पांचवां ]
{ ३६५ प्राशीका
स्थिता वयमियत्कालं यामः क्षेमोवयोस्त ते. . इतीष्टाशंसनं यंतरांदेराशी निरुच्यते ॥११॥
सपने कारक महां पर ठहरे थे, अब हम जा रहे हैं, तेरा कल्याण हो, इस प्रकार व्यंतरादिकी प्रशंसा करना इष्ट अशी कही जाती है। - किसी गुफा, शून्य मकान, पर्वत की कन्दरा आदि में ठहरकर पुनः वहां से निकलते समय कहना कि हे व्यंतर देवों, हम इतने काल तक यहां पर ठहरे थे, अब हम जा रहे हैं, तुम्हारा कल्याण हो इस प्रकार के वचनों से व्यंतरादि देवी को पाशीर्वादात्मक वचन कहना प्राशी है। निषिधिका
जीवना व्यन्तरादीनां बाधायै यनिषेधनम् । अस्माभिः स्थीयते युष्मदृष्ट्यैवेति निषिद्धिका ॥१२॥
व्यन्तरादि जीवादि की बाधा के लिये जो निषेध है कि हे व्यन्तर देवों ! हम लोगों के द्वारा तुम्हारी दृष्टि से ही ठहरा जाता है, इस प्रकार कहना निषिद्धिका है।
किसो जिन मंदिर, शून्य गृह, पर्वत की कन्दरा आदि में प्रवेश करते समय हे व्यंतर देव! हम लोग यहां ठहरना चाहते हैं । तुम्हारी दृष्टि से हमारा स्थान निविघ्न हो ऐसा कहना निषिद्धिका है। अर्थात् किसी स्थान में प्रवेश करते समय निःसहि-२ का उच्चारण करना तथा वहां से निकलते समय मासहि-२ का उच्चारण करना प्रासिका और निषिद्धिका है।
प्रवासायसरे कन्दरावासादे निषिद्धिका । तस्मानिर्गमने कार्या स्यादाशीरहारिणी ॥९१३॥
कन्दरावासादि के प्रवेश के समय निषिद्धिका तथा उस स्थान से निकलते समय वैर विरोध को नाश करने वाली प्रासिका करना चाहिए।
शुन्य मकान आदि में प्रवेश करते समय निषिद्धिका और निकलते समय पासिका करना चाहिये, यह आसिका और निषिद्धिका विरोध की नाशक हैं । अन्यथा देवों के साथ विरोध होने की संभावना है । . . . .
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३६६ ]
प्राप्रच्छना
[ गो. प्र. चिन्तामरिए
ग्रंथारंभकचोल्लोच काय शुद्धि क्रियादिषु ।
प्रश्न: सूर्यादिपूज्यानां भवत्या प्रच्छन्नं मुनौ ॥१४॥
ग्रन्थ का आरम्भ, केशलोंच, प्रादि काय शुद्धि की क्रिया में शायादि पूज्य पुरुषों को पूछना मुनि में आप्रच्छन होती है ।
किसी शास्त्र का आरम्भ, केशलोंच आदि क्रिया करना हो तो श्राचार्य को पूछकर करना चाहिये, इसी को प्रच्छना कहते हैं ।
प्रतिप्रच्छा-
after महत्कार्य कार्य पुष्ट्वा यतीश्वरात् ।
विनयेन पुनः प्रश्नः प्रतिप्रश्नः प्रकीर्तितः ॥१५॥
जो कुछ छोटा या बड़ा कार्य हो उसको आचार्यों को विनयपूर्वक पूछकर पुनः प्रश्न करना प्रतिप्रश्न कहा जाता है ।
जो कुछ महान कार्य हो वह गुरु प्रवर्तक स्थविरादिक से पूछकर करना के लिए दूसरी बार उनसे तथा अन्य साधर्मी साधुत्रों से
चाहिए, के पूछना वह प्रतिपृच्छा है, ऐसा जानना चाहिये ।
श्रानिमंत्रण --
पुस्तकrat पुरा दसे रथात्मार्थे निवेदनम् ।
जिघृक्षायां पुनः सूरि प्रमुखध्वानिमंत्रणम् ॥१६॥
पूर्व में दी हुई पुस्तक यादि में स्व के लिये स्वीकार करने के लिये पुनः ग्रहण करने की इच्छा होने पर आचार्य श्रादि से जो निवेदन किया जाता है, वह निमंत्रण है ।
पूर्व गुरु श्रादि को दी गई अपनी पुस्तक वा उसकी पुस्तकादि कोई वस्तु पुनः ग्रहण करने की इच्छा हो तो विनय पूर्वक याचना करके लेना चाहिये अथवा पूर्व ग्रहण की हुई पुस्तकादि को पुनः देते समय कोई अब हमें नहीं चाहिये, ऐसा विनय पूर्वक निवेदन करना प्रानिमंत्रण है । संश्रय का स्वरूप और मेद
विनय क्षेत्र मार्गाणां संश्रयः सुखदुःखयोः । सूत्रस्य खेत्ययं पंच प्रकारः संश्रयः स्मृतः ॥१७॥
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अध्याय : पांचवां
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विनय, क्षेत्र, मार्ग का, सूख-दुख का और सूत्र का इस प्रकार यह पांच प्रकार का संश्रय कहा गया है।
__ गुरुजनों के लिए मैं आपका हूं, इस प्रकार आत्मसमर्पण करना संश्रय है ! तथा यह विनय संश्रय, क्षेत्र सश्रय, मार्ग संश्रय, सुख या दुख संश्रय और सूत्र संश्रय के भेद से पांच प्रकार का है । विनयसंश्रय--
बोक्ष्यागन्तु कमायांतं यपिमुत्थाय संभ्रमात् । पदानि सप्त गत्वा च कृत्वा तद्योग्यवन्दनम् ॥१८॥ मार्ग श्रान्तिम पोह्यासन प्रवानादियत्नतः । . निरत्नसुस्थितादीनां प्रश्नो विनय संश्रयः ॥१६॥
आये हुए आगन्तुक मुनि को देखकर शीघ्र ही उठकर, सात पैर उसके सम्मुख जाकर और उसके योग्य वन्दना करके, प्रासन प्रदान आदि के यत्न से मार्ग के खेद को दूर करके रत्नत्रय की कुशल पूछना विनय संश्रय है।
अन्य संघ के मुनि को अपने संघ में आता हुआ देखकर शीघ्र ही उठकर सात पैर उसके सम्मुख जाकर उसका सत्कार करना, तदनन्तर आसन प्रदान करना, पैर दबाकर मार्ग के खेद को दूर करना, आपका आगमन कहाँ से हुआ है ? आपका स्थान कहा है ? आपके गुरु का नाम क्या है ? आपको रत्नत्रय की कुशलता है, आदि पूछना विनय संश्रय है। क्षेत्रसंश्रय--
व्यक्त्वा दुर्न पमक्षमापं पापं पापिजनाकूलम् । देशं दीक्षोन्मुखापेतं दुभिक्षं क्लेशदायकम् ॥२०॥ निधिसस्यवधश्र व गुणमण्डलम् । क्षेत्रसंश्रयणं तत्राऽऽवासश्चेतः सुखावहः ॥२१॥
पृथ्वीरक्षा नहीं करने वाला दुराचारी राजा, साबध युक्त पाणीजनों से भरे हुए दीक्षा का सम्मुखता से रहित, दुर्भिक्ष से ब्याप्त, क्लेश धायक देश को छोड़कर जिस देश में निधि सस्य के समान गुणों का समूह वृद्धिंगत होता है, उस क्षेत्र में चित्त को सुखकारी आवास करना क्षेत्र संश्रय है।
जिस क्षेत्र में राजा नहीं है, अथवा पापी राजा है, क्षेत्र पापाचार या पापी.
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३९८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
जनों से व्याप्त है, जो दुर्भिक्ष से पीड़ित हैं, दीक्षा के सन्मुखता से रहित है ऐसे क्षेत्र को छोड़कर, जिस देश में निर्विघ्न व्रतों के समूह का पालन होता है, उस क्षेत्र में रहना क्षेत्र है ।
मार्गसंश्रय---
प्रागन्तुक सुने मर्ग यातागमन जातयोः । यः सुखा सुखयोः प्रश्नः सोऽयं स्यान्मार्गसंश्रयः ।।६२२॥
श्रागन्तुक मुनि के मार्ग में गमनागमन से उत्पन्न हुए सुख-दुख में जो प्रश्न पूछना है, वह यह मार्गसंश्रय है ।
आगन्तुक मुनि के मार्ग में सुख-दुख के विषय में प्रश्न पूछना, यह मार्गे संश्रय है ।
सुखासुखसंश्रय-
..
चौर क्रूर गोवंश पीड़ितात सिनाम् । तोषोत्कर्षण माहार भेषजायतनादिभिः ॥२३॥ स्वात्मार्थमहं तुभ्यमीति व सुखेऽसुखे । सच्चित प्रसादार्थं तत्सुखासुख संश्रयः ॥२४॥ चोर, क्रूर, प्राणी, रोम, राजा आदि से पीड़ित होने से दुखी यतिगरणों को आहार, औषध, श्रायतन आदि के द्वारा सन्तुष्ट करना, सुख में और दुख में में तुम्हारे लिए हूं इस प्रकार जो ग्रात्म समर्पण करना है, वह उसके चित्त को प्रसन्न करने के लिए वह सुखासुखसंश्रय है :
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जिस क्षेत्र में व्रत, संयम, तप की विराधना होती है, दुर्जन राजा व अगामी नों के निमित्त से परिणामों में प्राकुलता होती है, उस क्षेत्र को छोड़कर तप, संगम के वृद्धि कारक क्षेत्र में निवास करना, क्षेत्रसंश्रय है ।
आगन्तुक मुनि के मार्ग में उत्पन्न हुई सुख-दुख की वार्ता पूछना, मार्गसंश्रय है, तथा मार्ग में उनको किसी चोर ने वा किसी दुष्ट प्राणी ने पीड़ित किया है अथवा कोई रोग उत्पन्न हुआ हो, तो उसको औषधि, ग्रासन, उपकरण आदि देकर दूर करना और आप श्राकुलित न हों, सुख दुख में मैं आपका ही हूँ इस प्रकार आत्मसमर्पण करना सुख-दुख संश्रय है ।
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अध्याय : पांचवाँ ]
[ ३६६
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पुरा स्वगुरु पादान्ते शास्त्रं च स्वाऽखिसं पुनः । जिज्ञासायां स्वलोकान्यथा ग्रन्यातिशये मुनिः ॥६२५॥ भक्त्योपेत्य गुरुन्नत्वा युधमल्याद प्रसादतः । अन्यन्मुनीन्द्र वृन्दं ते द्रष्टुं वांछः प्रवर्तते ॥६२६॥ .. इत्येवं बहुशः स्पृष्ट्वा लब्ध्वाऽनुज्ञां गुरोर्व मेत् । . तिनकेन वा द्वाभ्यां बहुभिः सह नान्यथा ॥२७॥
प्रथम अपने गुरु के चरणों में सर्वशास्त्रों को सुनकर पश्चात् ग्रन्थों के अतिशय के लिये दूसरे ग्रन्थों को पढ़ने की इच्छा होने पर मुनि भक्ति से गुरु के समीप जाकर नमस्कार करके आपके चरणों के प्रसाद से मेरी दूसरे मुनि समूह के दर्शन ... करने की इच्छा है, इस कार मह तार-चार पूछकर गुरु की अनुमति को प्राप्त कर एक मुनि दो या बहुत से मुनियों के साथ जावे अकेला नहीं जावे ।
सूत्र, अर्थ और सूत्रार्थ के जानने के प्रयत्न को सूत्रसंश्रय कहते हैं। उसके अर्थ को जानने का प्रयत्न करना अर्थ संश्रय है । सूत्रार्थ का जानने का प्रयत्न करना उभय संश्रय है। इसी को मुलाचार में उपसंयत् कहा है । उसी में सूत्र संश्रय, अर्थ संश्रय, उभय संश्रय, लौकिक, वैदिक और सामायिक के भेद से तीन-तीन प्रकार का कहा है । व्याकरण गणित आदिक लौकिक सूत्र हैं। सिद्धान्त शास्त्र वैदिक कहलाते है । स्याद्वाद-न्याय शास्त्र अथवा अध्यात्मिक शास्त्र सामायिक हैं । जिसने पूर्व में स्वकीय गुरु से सर्व सिद्धान्तों को जान लिया है, पुनः विशेष शास्त्रों के जानने की इच्छा होने पर विनयशील मुनिभक्ति. और अग्दरपूर्वक अपने गुरु के पास जाकर बारबार प्रार्थना करता है कि हे गुरुदेव, आपके प्रासांद से यद्यपि मैंने सारे सिद्धान्त को जान लिया है फिर भी विशिष्ट ज्ञान को प्राप्त करने के लिए मैं सकल शास्त्र के पारंगत अन्य प्राचार्यों के समीप जाना चाहता हूँ, इस प्रकार बार-बार प्रच्छना करे। तदनन्तर गुरु को अनुमति से एक-दो या बहुत से मुनियों के साथ वह दूसरे प्राचार्य के समीप जाने के लिए विहार करे ।
एकाकी बिहार ज्ञान संहनन न स्वांत भावना बलवन्भुनेः । चिर प्रजितस्यैक बिहारस्तु मतः श्रुते ॥२८॥
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४०० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि एतद् गुरण गरणापेतः स्वेच्छाचारसः पुमान् । यस्तस्यकाकिता मा भून्मम जातु रिपोरपि ॥२६॥
बहुत काल के दीक्षित ज्ञान, संहनन, स्वांत भावना से बलशाली मुनि के एकाकी विहार करना शास्त्रों में माना है, परन्तु जो इन गुण समूह से रहित स्वेच्छाचार में रत पुरुष है, उस मेरे शत्रु के भी एकाकी विहार की भी नहीं हो ।
जो ज्ञान बल, संहनन बल, मनोबल और शुभ भावना से युक्त है, बह एकाकी विहार कर सकता है । ज्ञान बल, विशिष्ट आध्यात्मिक ज्ञान का धारी है । संहनन बल, उत्कृष्ट संहनन का धारी हो अर्थात भूख, प्यास सहन करने की शक्ति वाला हो, ग्रात्मानुभूति से अपने मन को वश में करने वाला हो, चिरकाल का दीक्षित हो ऐसा विशिष्ट मुनि एकाकी विहार करने वाला हो सकता है । परन्तु जिसमें यह गुरण नहीं है, जो स्वेच्छाचार में रत रहता है अर्थात् सोने, बैठने, मलमूत्र के त्यागने में वस्तु के ग्रहण करने में स्वच्छन्द होकर प्रवृत्ति करता है ऐसा मुनि कभी एकाकी विहार न करे ।
प्राचार्य खेद के साथ कहते हैं कि इन मुखों से रहित साधु मे शत्रु भी हो तो भी एकाकी विहार न करे। एकाको विहार से हानि
श्रुत संतान चिन्छित्तिर नवस्था यमक्षयः । प्राज्ञाभंगश्च दुष्कोतिस्तीर्थस्य स्याद्गुरोरपि ६३०॥ अग्नितोयग राजीरणसर्प क्रादिभिः क्षयः । स्वस्याप्यात दिकावेक विहारेऽनुचिते यतः ॥३१॥
क्योंकि अनुचित एकाकी विहार करने पर श्रुतज्ञान के संतान की विच्छित्ति अनवस्था संयम का नाश तीर्थ और गुरु को भी आज्ञा का भंग और अपयशस्कोत्ति अग्नि, जल, विष, अजीर्ण और सादिक क्रूर प्राणियों के द्वारा प्रार्तध्यान से अपना नाश होगा।
एकाकी विहार करने से संयम का धात, श्रुत का विच्छेद, दीक्षा देने वाले गुरु को निन्दा, जिनं शासन में कलंक, मुर्खता, कुशीलता आदि अनेक दोष उत्पन्न होते हैं तथा जो स्वच्छन्द होकर एकाकी विहार करते हैं, वे कंटक, चोर, क्रूर पशुओं के द्वारा पीड़ित होते हैं, उनका अजीर्ण रोगादि से आर्तध्यान युक्त होकर मरण होता
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४०१ है। अनेक प्रकार की आपत्तियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए एक, दो, तीन या बहुत से मुनियों के साथ विहार करना चाहिये । एकाकी विहार नहीं करना चाहिये। पांच प्रकार के मुनियों का प्राश्रय क्यों करें--
मयातः सूर्योपाध्याय वर्मक इशिरान्चितम् । गरणं गणधरोपेतमुपेयावीदशाश्वते १९३२॥
अतः ऐसे साधु अपने संघ से निकलकर आचार्य, उपाध्याय, प्रवर्तक, स्थविर से युक्त गरणधर वाले गण को प्राप्त करें।
गुरु की अनुमति लेकर वह तपस्वी दो, तीन मुनियों के साथ अन्य संघ में जाता है, जिसमें प्राचार्य, उपाध्याय, स्थविर, प्रवर्तक और गणधर यह पांच मुनि होते हैं। संघ प्रवर्तक का लक्षण
प्रभावनाधिकोऽयाधमन्नाच: संघवतंकः। जगदादेय वामूसिवर्तकः कालदेशवित् ।।६३३॥
अधिक प्रभावनाकारी अन्न आदि के द्वारा अबाधित रूप से संघ का प्रवर्तक देशकाल को जानने वाला जगत में पादेय है, वचन मूर्ति जिसकी ऐसा प्रवर्तक साधु होता है ।
जो देशकाल का ज्ञाता है, निर्दोष रूप से अन्न औषधि आदि के द्वारा संघ का पोषण करता है, सारे प्राणियों के द्वारा जिनके वचन माननीय हैं, जो जिन धर्म का प्रभावक है, वह प्रवर्तक कहलाता है। स्थविर और गणी का लक्षण
समय स्थिति सद्गीतिः स्थविरः स्याद्गस्थिरः। गणरक्षाक्षम सूरिमुषी गणधरः स्मृतः ।।६३४॥
समय की स्थिति को जानने वाला स्थिर गुरण वाला स्थविर गरण की रक्षा करने में समर्थ गुणी आचार्य गणधर कहलाते हैं।
जो दीक्षादि देकर शिष्यों के उपकार करने में चतुर हो वह प्राचार्य है, जो धर्म का उपदेश देते हैं, शास्त्र पढ़ाते हैं, वे उपाध्याय हैं जो चर्या आदि के द्वारा संघ का उपकार करते हैं, वे प्रवर्तक हैं, जो संघ की रीति, स्थिति, प्राचीन परम्परा की
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Aniलासम्म
४०२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि मर्यादा को जानते हैं, वे स्थविर और जो गरण को पालते हैं, रक्षा करते हैं, वे गरधर कहलाते हैं। प्रागन्तुक मुनि के साथ संघ व प्राचार्य परस्पर एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करें
तं प्राप्य तद्गणाधीश मभ्यायांतं सहात्मनः । गणेनाऽऽज्ञानति स्वीकारेच्छावात्सल्य कारणः ॥६३५॥ प्रोत्या प्रेक्ष्याति भक्त्या तं प्रणम्य गणमध्यथ । मार्गातिचार नियम निधान्याः क्रिया अपि ॥६३६॥ वंदित्वा गणनं गणमप्युचित क्रियया दिनम् । तद्विश्रय द्वितीयेऽह्नि तृतीये वासरेऽथवा ।।९३७॥ गणिनं मुरिणनं संघ गुरण संगमवेत्य तम् । यादम शमावश्यक क्रिया करणादिषु ।।६३८॥ सूरि संश्रित्य नत्वेष्टं स्वस्य विज्ञापयेच्छनः । वत्वाऽस्मै : चेतनायेतनासरताजितोधिम् ।
अपने गरा के साथ सन्मुख पाये हुए उस गरण के अधीश को प्राप्त कर आज्ञा, नति स्वीकार की इच्छा, वात्सल्य आदि कारणों के द्वारा प्रीति से परीक्षा करके प्रति भक्ति से उस गण को नमस्कार कर इसके बाद मार्ग के अतिचार के नियम को और अन्य भी क्रियाओं को निवृत्त कर योग क्रियाओं से सूरि को और संघ को नमस्कार कर उस दिन को विश्रांति लेकर दूसरे दिन में अथवा तीसरे दिन में दया, दम, शम, आवश्यकादि क्रियाकरण आदि मैं गुणशाली संघ के गुणों का समूह उस प्राचार्य को जानकर सूरि के समीप में बैठकर नमस्कार करते हुए मार्ग में प्राप्त हुई चेतन, अचेतन उपधि को उस प्राचार्य के लिए देकर अपने इष्ट को धीरे-धीरे विज्ञापन
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शास्त्रज्ञान का इच्छुक संयमी अपने गुरु की अनुमति लेकर प्राचार्य, उपाध्याय प्रवर्तक, स्थविर, गरणी से शोभित पर संघ में जाते हैं, पर संघ के साधु उस पागन्तुक मुनि को देखकर सात पैर उसके सम्मुख जाकर तथा परस्पर में नमस्कार करके रलत्रय कुशल पूछते हैं । तदनन्तर आगन्तुक मुनि और संघ के मुनि परस्पर में एक दूसरे की आज्ञापालन नमस्कार स्वीकार, इच्छा, वात्सल्यादि कारणों के द्वारा परीक्षा करके प्रीति और प्रतिभक्ति से आचार्य को नमस्कार करके आगन्तुक के मुनि मार्ग के
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४०३ अतिचारों को दूर कर, उचित क्रिया से एक दिन विश्रान्ति देकर सारी दैनिक प्रावश्यक क्रियाओं में तथा प्रतिलेखन क्रिया में परस्पर दो तीन दिन तक परीक्षा करते हैं। तदन्तर दूसरे या तीसरे दिन जाकर साधु आचार्य को नमस्कार कर उनके समीप बैठ जाय । तदनन्तर मार्ग में शिष्य यादि चेतन, पुस्तक कमण्डलु आदि अचेतन कोई भी वस्तु प्राप्त हुई हो तो प्राचार्य को अर्पण कर दे। उसके बाद अति विनय भावों से धीरे-धीरे अपने आने के कारण को आचार्य से निवेदन करे ।
गुरु सन्तान चारित्र शुद्धो शास्त्रो यदीतरः ।
कृत्वा छेदमुपस्थापनादि शुद्धश्च नेतरः ॥१६४०॥
गुरु की सन्तान और चारित्र जिसका शुद्ध है, ऐसा वह आगन्तुक मुनि ग्रहण करने योग्य है और जो गुरु सन्तान, चारित्र से शुद्ध नहीं हैं, वह छेद करके उपस्थापनादि से शुद्ध है, वह ग्राह्य है। जो प्रायश्चित लेकर शुद्ध नहीं हुआ हो, वह ग्राह्य नहीं है।
प्रागन्तुक यति की गुरु परम्परा और चारित्र शुद्ध हो तो प्राचार्य उसको ग्रहण करे । यदि चारित्र आदि में अशुद्धि हुई हो तो प्रायश्चित देकर पुनः नतों की उपस्थापना करे । यदि आगन्तुक मुनि प्रायश्चित ब्रहण नहीं करे तो उसे स्वीकार नहीं करे और उसको अपने संघ में पाश्रय नहीं दे । छोड़ने योग्य श्रोता
शिला भग्न घटा जावि डालमृच्चालिनी शुकैः । मशका चाहिमहिषैरपि श्रोतान् समान त्यजेत् ॥४१॥
शिला, भग्नघट, अजा, बिडाल, मिट्टी, चालनी, तोता, मशक, सर्प, भैंसा के समान श्रोताओं को छोड़ देवें ।
शिला, भग्नघट, बकरी, बिडाल, मिट्टी, चालनी, तोता, मशक, सर्प, भैसा आदि के समान श्रोताओं को छोड़ दें अर्थात् उनको समझाने की चेष्टा नहीं करे।।
मिट्टी-सुनते समय ही प्रभावित होने वाले, बाद में जो सुने और समझकर उस पर आचरण नहीं करने बाले । झाडू-सार ग्राहक प्रसार को छोड़ने वाला। भैंसा--सुना, ना सुना दोनों बराबर । हंस-विवेकशील । शुक-जितना सुना उतना ही बिना समझे याद रखने के समान होता है। बिल्ली चालाक पाखण्डी। · बगुलाअर्थात् सुनने का ढोंग करने वाले । मशक-वक्ता तथा सभा को परेशान करने में
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४०४ }
[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रवीण। बकरा-देर में समझने वाले तथा कामी। जौक-दोषग्राही। अन्य कुछ श्रोताओं के उदाहरण, सैकड़ों छेदयुक्त घड़े या फूटे घड़े-इस कान सुना उस कान निकाल दिया । पशु-किसी का जोर पड़ा तो कुछ सुन समझ लिया। सर्प-कुटिल । शिला-प्रभावशाली से दिये जा सकते हैं । इस प्रकार संसार के सभी श्रोता चौदह प्रकार के होते हैं।
जो विवेकी श्रोता सांसारिक भोगविलास रूपी फलों की स्वप्न में भी इच्छा नहीं करता तथा मोक्ष लक्ष्मी की प्राप्ति करने का अडिग तथा अकम्प निर्णय करके प्राणिमात्र के लिए कल्याणकारी जिन धर्म की विशाल कथा को सुनता है, उस मनुष्य के सब ही पापों का निःसन्देह समूल नाश हो जाता है।
मोहादिना निषिद्धस्य श्रीलमन्तमतेरपि । सति प्राशे विनीतेऽस्मिन् यो व्याख्याति नराधमः ॥६४२॥ भिन्न रत्नत्रयो यान पात्रोऽसौ भूरि गौरवात् । विधृत बोधिः संसार वारि राशौ निमज्जति ॥६४३॥
जो नीच इस विनीत शिष्य के होने पर भी मोहादि के कारण विद्वानों के द्वारा निषिद्ध मन्दमति श्रोता को भी उपदेश देता है । नष्ट हो गया है रत्नत्रयरूपी यान पात्र जिसका और नष्ट हो गया है ज्ञान जिसका ऐसा वह प्राचार्य महान् गौरव होने से संसार रूपी समुद्र में डूब जाता है।
जो प्राचार्य विद्वानों के द्वारा निषिद्ध श्रोता को धर्म का उपदेश देता है, अध्ययन कराता है, उसकी रत्नत्रय रूपी नौका नष्ट हो जाती है और वह संसार समुद्र में डूब जाता है। . . . . सूत्र संश्रय का लक्षण
संचित्येति स्थित स्थानं तपः काल मुरुकुलम् । . पृष्ट्वा श्रुतं नाम एवं प्रलिकमरणादिकम् ॥६४४॥
शयनासनयनादौ प्रेक्ष्य वृतं धिनत्रयम् । निश्चित्य गुरुश्चारित्र शुद्धि तत्सरिसम्मतः ॥१४॥ स्वशक्ति मुक्त्या व्याख्या तद्वयाख्यातं पठेन्द्रले। स्वस्पेष्टं प्रश्रयादेतत्पठनं सूत्र संश्रयः ॥४६॥ इस प्रकार विचार कर रहने के स्थान काल सप गुरु कुल श्रु त अपने सुने
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अध्याय : पांचवां :
[ ४०५ हुए नाम और प्रतिक्रमणादि को पूछकर तीन दिन तक शयन अासनादि में आचरण की परीक्षा करके चारित्र की शुद्धि को निश्चय कर गुरु उसके प्राचार्य की सम्मति से अपनी शक्ति को कहकर व्याख्यान प्रादि में कहे गये श्रुत को पढ़े। विनय से अपने इष्ट को पढ़ना यह सूत्रसंश्रय है।
सर्व प्रथम प्राचार्य आगन्तुक मुनि के रहने के स्थान और गुरु के कुल को पूछे तथा तुमको दीक्षा लिये कितने दिन हुए हैं, तुमने प्रतिक्रमरण कहां-कहां किये हैं, तुम्हारे गुरु का क्या नाम है आदि सभी क्रिया पूछकर तीन दिन तक उसकी सामायिक आदि क्रियाओं का निरीक्षण करे। पीछे सूक्ष्म दृष्टि से उसके चारित्र और गुरु की शुद्धि का निर्णय करे, तथा आगन्तुक नती भी तीन दिन नूतन संघ के प्राचार्य वा संघस्थ साधुओं की चारित्र शुद्धि व कुल शुद्धि का निर्णय करे । तदनन्तर प्राचार्य की अनुमति से व्याख्यानादि में कथित श्रुत का अध्ययन करे । इस प्रकार विनय पूर्वक उस संघ में जाकर विधि पूर्वक प्राचार्य के समीप शास्त्रों का अध्ययन करना सुत्रसंश्रय है। विस्तार समाचार विधि- .
सविस्तार समाचारनैक भेदोऽध वण्यंते । . उदाहरण मात्रेण विश्व को वस्तुभीश्वरः ।।६४७१३ रात्रि दिवं यनिवार्य यत्कर्माचर्यते वरम् ।
तविस्तार समाचार इति येन जिनोदितः ॥१४॥
विस्तार सहित समाचार के अनेक भेद हैं। इस ग्रन्थ में उदाहरण मात्र से वर्णन किया जाता है, क्योंकि सम्पूर्ण समाचार विधि को कहने के लिए कौन समर्थ है ? जिसके द्वारा साधुनों में, प्रायिकानों में जो श्रेष्ठ क्रिया रात दिन पाचरण की जाती है, इस प्रकार जिनेन्द्र भगवान द्वारा कथित विस्तार समाचार है।
पूर्व में संक्षेप समाचार विधि कही है। इस समय उसके भेद वाले विस्तार समाचार विधि का उदाहरण मात्र कथन करते हैं। क्योंकि सम्पूर्ण समाचार विधि का कथन करने के लिए कौन समर्थ है ? मुनि आर्थिकामों को जो रात्रि और देवसिक क्रिया जिनेन्द्र ने कही है, वह विस्तार समाचार विधि है।
क्रियाकलापमल्पाल्प सूत्राण्याचार वर्सनम् । पठदेथ पुराणानि निकलो स्थिति कीर्तनम् ।।६४६॥
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४०६ ]
सिद्धांत तर्क भंगां गवाह्यादेशार्थ देशनम् ।
[ यो चितामशि
शक्त्यनुसारेण भक्त्या मोक्षैक कांक्षया ॥५०॥ -
इसके बाद अपनी शक्ति के अनुसार भक्ति पूर्वक मोक्ष की द्वितीय आकांक्षा से रत्नत्रयधारी क्रियाकलाप को अल्पाल्प सूत्रों को आचरण वर्णन करने वाले शास्त्रों को, पुराणों को, स्थिति कीर्तन तर्कशास्त्र अंगबाह्य, अंगप्रविष्ट का कथन करने वाले सिद्धान्त ग्रन्थों को पढ़े ।
क्रियाकलाप जिसमें श्रावक और मुनियों fare का वर्णन हो अल्पाल्प सूत्र - जिसमें अल्प अक्षर हों और बहुत विषय का वर्णन हो । आचार वर्णन - जिसमें गृहस्थ और मुनियों के चरित्र का वर्णन हो । पुराण - जिसमें त्रेसठ शलाका पुरुषों का वन हो । स्थिति कीर्तन - जिसमें मोहनीय ग्रादि सारे कर्मों की सर्व प्रकृतियों का धन्य उत्कृष्ट स्थिति का वर्णन हो । सिद्धान्त ग्रन्थ- षट्संड आदि सिद्धान्त ग्रन्थ जिनमें गुणस्थान, मार्गशा, जीव समास, पर्याप्त, प्राण, संज्ञा, उपयोग आदि सारे सिद्धान्तों का वर्णन हो । प्रमाण, नय के द्वारा जिसमें वस्तु की सिद्धि की जाती है वह तर्क शास्त्र हैं । गणधर के द्वारा पदों में रचित बारह अंग हैं । दश वैकालिक आदि अंग बाह्यग्रन्थ हैं। साधु अपनी शक्ति के अनुसार द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की शुद्धिपूर्वक उन शास्त्रों का अध्ययन करे ।
efarara afterरणां शरणं शरणं सताम् । महत्व सत्य गांभीर्य वैर्यादि गुण भूषणः ॥५१॥ चिर प्रव्रजितो दांतः प्रव्यक्त समय स्थितिः ।
दया वात्सल्य साकल्यः शांतोऽयं गणितोचितः ॥५२॥
समीचीन चारित्रों की रक्षा करने वाला, शरणभूत श्रेष्ठ श्रद्धान वाला, महानता, सत्व, गम्भीरता, धैर्यादि गुणों से भूषित, चिरकाल का दीक्षित, इन्द्रियविजयी, लोकस्थिति का ज्ञाता, दया, वात्सल्यादि से परिपूर्ण, क्षमाशील यह साधु प्राचार्य पद के योग्य है ।
सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र का धारी, सत्वधारी, गम्भीर, वीर, वीर, इन्द्रियविजयी, क्षमाशील, लोक व्यवहारक साधु ही आचार्य पद के योग्य होता है । इति सूर्यपिताचार्यपदः सन् संघसम्मतः । प्रायश्वितादिशास्त्राणि रहस्याति पठदेथ ॥५३॥
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४०७
इस प्रकार शास्त्रों का अध्ययन कर लेने पर संघ की सम्मति से प्राचार्य के द्वारा अर्पित किया गया है आचार्य पद जिसको, ऐसा साधु रहस्यभूत प्रायश्चित आदि शास्त्रों को पढ़े।
पूर्व में गुरु के समीप पुराण, सिद्धान्त आदि शास्त्रों का अध्ययन करे । तदनन्तर आचार्य के द्वारा आचार्य पत्र अर्पण करने के बाद रहस्यभूत प्रायश्चित ग्रंथों का अध्ययन करें ।
यः शिष्यत्वमकृत्वैव सूरितां कर्तु मोहते ।
सः स्यादुत्मार्ग गस्तोपो वाऽशिक्षित तरंगमः ॥५४॥
जो साधु शिष्यत्व को स्वीकार नहीं करके आचार्यत्व प्राप्त करने की चेष्टा करना चाहता है, वह अशिक्षित घोड़े के समान तीक्ष्ण उन्मार्गगामी हो जाता है । सर्व सत्व गुरिक्लेशनिषु णेषु करोश्वलम् ।
मंत्री प्रमोद कारुण्य माध्यस्थ्यानि वथाक्रमम् ॥५५॥
साधुओं को सर्व जीवों के साथ मैत्री भाव, गुणीजनों के साथ प्रमोद भाव, दुःखी दीन जनों के प्रति कारुण्य भाव तथा दुर्जन, क्रूर, कुमार्गगामी के प्रति माध्यस्थ भाव रखना चाहिए ।
जिनान् सिद्धान् गणाधीशानुपाच्याञ्जगद्गुरुन् ।
साधून् धर्मं जगच्चर्मकरं वन्देत् तेतरान् ॥ १५६ ॥
दिगम्बर साधु रिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, सर्व साधु, जिन धर्म, जिनबिम्ब और जिन शास्त्रों को ही नमस्कार करें। इनके सिवाय अन्य लोगों को ( पाखण्डियों को ) नमस्कार नहीं करें ।
क्षुधात भयजृम्भेष्टार्थारभस्खलने बुधैः ।
शयने विस्मयादौ व स्मर्तव्यो वृजिनो जिनः ॥६५७॥
बुद्धिमानों को भूख प्यास, दुःख, भय में और जंभाई आदि के आने पर, अपने इष्ट कार्य में स्खलित हो जाने पर शयन में तथा विस्मयादि के हो जाने पर जिनेन्द्र भगवान का स्मरण करना चाहिए ।
प्राचार्यादिक को वंदना करने का क्रम---
सुखेनासीनभव्य सूरि वंदेत् सम्मुखम् । safaa विज्ञाप्य हस्तमत्रांतर स्थितिः ॥७५८ ॥
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४०८
[ गो. प्र. चिन्तामणि . . प्रमृज्य कर्तरीस्पर्शात्माष्टांगान्यवनीमपि ।
पश्वर्दशय्ययाऽनभ्य सपिच्छांबुलि भालक ॥५६॥
अनाकूल होकर सुख पूर्वक बैठे हुए आचार्य के सन्मुख एक हाथ दूर गवासन से बैठकर, पिच्छि सहित अंजुलि को मस्तक पर रखकर पूर्व में प्राचार्य को सूचित करे, कि गुरुदेव मैं वन्दना करता हूँ", तदन्तर अपने आठों अंगों को स्पर्श करे, भूमि आदि को पिछी से मार्जन करे तथा पिच्छि सहित अंजुलि को मस्तक पर रखकर, मवासन से अंगों को झुका कर भक्तिपूर्वक प्राचार्य को नमोऽस्तु करे । मुनियों के नमस्कार करने पर प्राचार्य क्या करें?
विगौर वादि दोषेण सपिच्छांजुलि शालिना। सदज सूर्याऽऽचारण कर्तध्यं प्रतिवेदनम् ॥६॥
जब मुनिराज प्राचार्य को नन्दना करते हैं तत सज्जन कमल वन दिवाकर प्राचार्य, ऋद्धि गौरव, रस गौरव, ज्ञान गौरव से रहित होकर हाथ में पिच्छि लेकर नमोस्तु कहकर प्रतिवन्दना करे ।।
ये दोषाविषिरणोऽन्येषां सद्गरणावर्णवर्णनाः। तपस्विनोऽपि पाश्वंस्था ये च बंद्या न ते यतेः ।।६६१॥ "
जो मुनि दूसरों के दोषों का कथन करता है तथा उनके सद्गुणों का आच्छादन करता है अथवा जो पार्श्वस्थ मुनि हैं, वे साधुओं के द्वारा वन्दनीय नहीं हैं।
पुरो गुरुणां स्थातव्यं न यथेष्टककोपयम् । तानापच्छेद्वचस्तेसा प्रतिच्छेत्तत्परो भवेत् ।।६३२॥
गुरु के सामने बैठना नहीं चाहिए, प्राचार्य को कुपित नहीं करते हुए अपनी इच्छा को पूछे तथा उनकी बात को तत्पर होकर स्वीकार करे।
हस्तद्वयेन दातव्यं ज्येष्ठेभ्यः पुस्तकादिकम् ।
तत्तछेयं करद्वन्तु नादेयं विनयानतः ॥९६३॥ ___ अपने गुरु आदि को विनयपूर्वक दोनों हाथों से पुस्तक देना चाहिए और उनके द्वारा दी हुई पुस्तक प्रादि को भी महान आदर से दोनों हाथों से ही ग्रहण करना चाहिये।
नमोऽस्विति नतिः शस्ता समस्तमतसंमता। कर्मक्षयः समाधितेस्स्वित्यार्याजने “नते ॥६६॥
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४०६ धर्मद्धिः शुभं शांतिरस्त्यिस्याशरोरगरिणि । पापक्षयोऽस्तिवति प्राजश्चाण्डालादि दीयताम् ।।६६५।।
दिगम्बर साधुः परस्पर में नमोऽस्तु ऐसा व्यवहार करें। यदि दिगम्बर साधु को प्रायिका नमस्कार करे तो तेरा कर्मक्षय हो, तुम्हारी समाधि हो ऐसा आशीर्वाद दे तथा जिन धर्मावलम्बी गृहस्थ के नमस्कार करने पर तेरे धर्म की वृद्धि हो, तुम्हारा कल्याण हो, शांति हो, मन प्रसन्न हो इत्यादि आशीर्वाद देना चाहिये तश्रा चांडालादि के नमस्कार करने पर तेरा पापक्षय हो ऐसा आशीर्वाद देना चाहिये ।
मान्यः सदर्शनी शानी होनोऽप्यपरसद गुणः। वरं रत्नमनिष्पनशोभं कि नाध्यंहति ॥६६६।।
जो मुनि अपर-उत्तर गुणादि सद्गुणों से सम्पन्न नहीं है परन्तु सम्यग्दृष्टि है, ज्ञानी है तो वह श्रेष्ठ है, वंदनीय है। क्योंकि श्रेष्ठ रत्न यदि संस्कार आदि से रहित है तो भी बहुमूल्य होता है।
उक्तिः कार्या सहाचार्यः कार्यार्थ शेषयोगिभिः । न मिथ्याष्टिभिर्भाच्या पात्रकः स्वजनश्चसा ।।६६७॥ .. :
मुनि उन आचार्यों के साथ वार्तालाप करे । शेष मुनिजनों के साथ कोई विशेष हो तो बार्तालाप करे । मिथ्यादृष्टियों के साथ कभी भी वार्तालाप नहीं करे। जिनधर्मावलम्बी श्रावकों के साथ कभी किसी कार्यवश बात करे और निष्प्रयोजन कभी वार्तालाप न करे ।
स्पृष्टे कपालिचांडाल पुष्पवल्याति के ससि । ... .. जपेदुपोषितो मंत्रं प्रागुप्लुत्याशु दंडवत् ॥६६॥
यदि कपालिक, चांडाल, पुष्पवती (मासिक धर्मवाली) स्त्री का स्पर्श हो हो जावे तो शीघ्र ही दंडवत् स्नान करे और उपवास करके गणमोकार मंत्र का जाप्य करे ।
संस्तरावासयोः प्रेक्षा कार्या कल्यास्तकालयोः । प्रकाशे सूरिभिः साधं वृत्तिश्चावश्यकादिषु ॥६६६
सूर्य के अस्त और उदयकाल में प्रकाश में संस्तर और श्रावासादि का निरीक्षण करना चाहिये तथा सामायिक आदि प्रावश्यक क्रिया आचार्य के साथ करनी दाहिये ।
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४१० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि मुनिनेकेन नो वाच्यमेकार्या यदि पृच्छति । गुरणमुख्यां पुरस्कृत्य पृष्टं ब्रूयात् तदीक्षितम् १९७०॥
यदि अकेली आर्यिका अकेले मुनि को कोई बात पूछे तो मुनि को उत्तर नहीं देना चाहिये । यदि अपनी गरिंगनी को साथ लेकर आबे और कोई बात पूछे तो उत्तर देना चाहिये ।
मालालापं कयाश्चर्याजनैः साद्ध यमो त्यजेत् । तदाश्रयेऽशनं स्थानं व्याख्यानं शयनादिकम् ।।१७१॥
मापिकाओं के साथ वार्तालाप करना, उनके स्थान में बैठना, प्रवास करना, व्याख्यान देना, सोना, ये सब साधुओं को नहीं करना चाहिये।
मुनिनकाकिनकान्ते म स्थातव्यं कदाचन । योषिअनागमे काले समाचार यशोथिना ||९७२॥
सदाचार और यश के इच्छुक मुनियों को स्त्रियों के आगमन के समय एकान्त में एकाकी कभी भी नहीं रहना चाहिये ।
नामाऽप्यानन्दनिध्यन्दि स्त्रीति लोचन गोचरम् ।। तदंगमंगज स्फारशरोग्रं न करोति किम् १९७३॥
स्त्री इस प्रकार का नाम भी प्रानंदामृत को हर्षाने वाला है । तो फिर दृष्टिगोचर हुआ स्त्री का शरीर क्या कामोत्पाद नहीं होगा, अवश्य ही होगा इसलिये उसकी संगति नहीं करना चाहिए ।
स्त्रीणां दर्शनमादरेक्षसमतो धार्तेष्ट वार्ता मनाङ, नमोक्तिर्नसिनर्मरत्युनगवाक शृंगार सारं वचः।। रवान्तस्योल्लसनं धृतेः क्षिसि रति प्रीतिमते भ्रान्तिता । तस्यां च स्मरवीर विशिख धातस्य लक्षः क्षरणात् ॥६७४॥
पूर्व में (पुरुष) स्त्रियों को सामान्य रूप से देखता है, पुनः आदर पूर्वक देखता है, तदन्तर इष्ट वार्तालाप करता है, थोड़ी-थोड़ी हंसी मजाक सहित बोलता है, तदन्तर नमस्कार, प्रेम सहित अनुगमन एवं उसके अनुसार अति प्रेम गार के वचनादि बोलता है जिससे उसका मित्त उल्लसित हो जाता है, धैर्य नष्ट हो जाता है, मति भ्रमित हो जाती है इस प्रकार एक क्षण में वह काम बारणों से पीड़ित हो जाता है।
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अध्याय : पांचवां ।
[ ४११ चिर प्रजिसः सूरिः स्थविर: श्रु तपारगः । तपस्वीति यतो नास्ति पणना विषमायुधे ॥७॥
काम के उत्पन्न होने में प्राचार्य चिर दीक्षित, स्थविर, श्रु तपारगामी आदि की गरगना नहीं है । अर्थात् चिर दीक्षित, तपस्वी, श्रुतपारगामी त्यागी भी काम के वशीभूत हो जाते हैं।
विधवी लिंगनी कन्यां स्वैरिणी गरियकादिकाः । प्रासअन्नचिराद्भिक्षुर पवादक मन्दिरम् ।।६७६॥
कन्या, विधवा, रानी वा विलासिनी, स्वेच्छाचारिणी, दीक्षा धारण करने वाली ऐसी स्त्रियों से क्षण मात्र भी वार्तालाप करता हुआ मुनिराज भी लोक निदा का पात्र होता है।
संवृतांगोऽतिगंभीरो जिताखिल परिषहः । शाक चारित्रवान सूरिरायणां मितभाषणः ।।९७७॥
इन्द्रिय विजयी, अतिगंभीर, परिवह जयो, मितभाषी, सम्यग्ज्ञान और उत्कृष्ट चारित्र शील साधु ही प्रायिकाओं का प्राचार्य हो सकता।
प्राज्ञाभंगादिदोषाहः करोति यदि सूरिताम् । मदोदयाद्गुरखवातेनतेन रहितो यतिः ॥६ ॥
जो मुनि पूर्व कथित गुरण सहित नहीं है और मान कषाय के वशीभूत होकर आर्यिकारों का प्राचार्यपना करता है तो प्राज्ञा का भंग. निदा, गणपोवरण, गच्छ आदि विराधना होती है ।
लज्जाविनयवैराग्यसाचारादि भूषिते । प्रार्यानाते समाचारः संयतोष्विव किन्स्विह ॥१७॥
लज्जा, विनय, वैराग्य, सदाचार प्रादि से भूषित आर्यिकानों के समूह में समाचार विधि संयतों के समान ही है, किन्तु (परन्तु) इसमें कुछ अन्तर है। "
जो समाचार विधि संयमियों की कही है वही समाचार विधि प्रायिकामो की है परन्तु प्रतापन योगादि कुछ विधि प्रायिकाओं के नहीं है । सायिकानों का वर्णन
याद्याः समं वर्सत्यार्या महस्था संकराश्रये। तगृहानति दूराति समीपेऽवध जिते ॥७८०॥
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४१२ }
[ गो. प्र. चिन्तामणि
जो संयमी जनों के आवास से रहित हो, श्रावकों के घर से अत्यन्त दूर भी नहीं और अत्यन्त समीप भी नहीं हो, सर्व साध से रहित हो. ऐसे स्थान में दो तीन यादि आर्यिका मिलकर रहें। अकेली नहीं रहे । आायिकाओं को अकेली रहना आगम में निषिद्ध है ।
जैने नगतिविधार्थं महान् ।
अन्योन्य परिरक्षानुकूलवृत्ति परायणाः ॥ १ ॥
जब आर्यिकायें आहार के लिए जाती है, तब वृद्ध श्रार्थिकाश्रों से अन्तरित परस्पर में एक दूसरे की रक्षा करती हुई दो तीन मिलकर मौन पूर्वक भ्रमण करती हैं। आहार के समय भी अकेली श्राविका नहीं जाती है, दो तीन साथ में जावें । श्राविकाओं का कर्त्तव्य है कि यह परस्पर अनुकूल वृत्ति तथा रक्षा करने में तत्पर रहें ।
श्रन्यदश्य गन्तव्यं धर्म कार्ये गृहेस्ति चेत् !
मरिणन्यादेशतो याति द्वयाद्याः सार्धं व चान्यथा ॥८२॥
यदि श्रावक घर में भिक्षा के काल से अन्यकाल में अवश्य जाने योग्य धर्मकार्य हो तो गणिती के प्रदेश से दो आदि के साथ जाती है, अन्यथा नहीं जाती है ।
नमन्ति सूर्यपाध्याय साधनार्या यथाक्रमम ।
पचषट्सप्त हस्तान्त राजस्थाः पशुशय्याः ॥८३॥ श्रधिकायें आचार्यों को और साधुओं को सात हाथ दूर से
करती हैं।
पांच हाथ दूर से, उपाध्याय को छह हाथ दूर से गवासन से वंदना, आलोचना, अध्ययन, स्तुति
संहननत्रयम् ।
कर्मभूद्रव्या नाद्यं वस्त्रदानाच्चारित्र च तासां मुक्तिकथा वृथा ।। ६८४||
कर्म भूमि स्त्रियों के बज्र वृषभनाराच, वज्रनाराच और नाराच ये आदि के तीन संहनन नहीं होते हैं । इनसे वस्त्रों का पूर्ण त्याग नहीं होता है, इसलिये चरित्र भी पूर्ण नहीं है, उन स्त्रियों को मुक्ति होती हैं। ऐसा कहना तो निष्प्रयोजन है । यदि त्रिरत्नमात्रेण ता पुस नग्नता बुया ।
तिरश्वामपि दुर्गारा निर्वाणाप्तिलिगिता ॥६८॥
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अध्याय : पांचवां ।
[ ४१३ एक देश रत्नत्रय से स्त्रियों को मुक्ति की प्राप्ति होती है, तो पुरुषों की नग्नता व्यर्थ है, अर्थात् पुरुषों को भी नग्न नहीं होना चाहिये । उनको भी वस्त्र सहित मुक्ति हो जायेगी । तथा एक देश रत्नत्रय तो तिथंचों को भी है, इसलिये उनको तो मुक्ति हो जानी चाहिये ।।
मुक्तिश्चेदस्ति कि नासा प्रतिमाः स्तवनान्यपि । . . . क्रियन्ते पूज्याश्चेत्तासां मुक्सेत्तो मलाजुलिः ॥६६॥
यदि उन स्त्रियों को मुक्ति होती है तो उनकी प्रतिमा और स्तोत्र क्यों नहीं है । यदि कहो कि वह पूज्य है तो सत्य है । मुक्ति के लिये तिलांजलि दे दी । अर्थात् पुज्य होने मात्र से मुक्ति की पात्र नहीं हैं। . . . . . ....
देशवतान्विसैस्तासा मारोप्यन्ते बुधस्ततः । ............ महायतानि सज्जाति सप्त्यर्थ मपचारतः ॥१८॥
यद्यपि स्त्रियां पूर्ण महावत को धारण नहीं कर सकती है, तथापि उनकी सज्जाति को प्रकट करने के लिये प्राचार्य, प्राविकानों में देश के साथ उपचार से महायतों का प्रारोपण करते हैं, अर्थात् प्रायिकाओं के वास्तविकता से तो देश संयम है, क्योंकि इनके पांचवां गुण स्थान है, परन्तु उपचार से महावत कहे जाते हैं।
ऋतौ स्नात्वा तु सुर्येह्नि शुद्धयंत्यरस भुक्तयः । कृत्वा विरात्र मेकान्तरं वा सज्जयसंयुत्ताः ॥८॥
मासिक धर्म में आर्यिका तीन दिन तक एक स्थान बैठकर अन्तर्जल्प से णमोकार मन्त्र का जाप करती है, नीरस भोजन का एक दिन बाद पाहार करती है और चतुर्थ दिन स्नान करके शुद्ध होती है।
गानाक्रन्दन सन्मार्जनाचवद्य क्रियोझिलाः । जातिकोयंञ्चिताचाराश्चायोक्षान्स्यार्जवान्विताः ॥६६॥ अविकार वस्त्र वेषाः स्वकीय कायेऽपि निःस्पृहा नित्यम् । पठन परिवर्तनाऽऽख्यानादि अत भावनानिरताः ॥६६॥
गीत, आक्रन्दन सन्मार्जन आदि सावध क्रियाओं से रहित जाति कीति से . पूजनीय है, चारित्र जिन्हों का ऐसे क्षमा और आर्जव से युक्त निविकार वस्त्रधारी अपने शरीर में भी निस्पृह निरन्तर पठन, परिवर्तन व्याख्यानादि श्रुत भावना में रत श्रेष्ठ प्रायिका होती है । ..
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४१४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
fair at गीत गाना, रोना, घर को झाडू देकर साफ करना और हिंसामय क्रिया करना निषिद्ध है । आर्यिका क्षमा प्रार्जव आदि गुणों से युक्त होती है । जाति कीति में पूज्यनीय होती है । निर्विकार वस्त्र धारण करती है । अपने शरीर में जिनके ममत्व नहीं है ।
चरंति ये चार चरित्र संपदः,
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पदं समाचार मिमं यमीशिनः ।
समाश्रयं तेsभ्युदय प्रमोदिनः
परां श्रियं ते कृति लोक नंदिनः ॥१॥
सज्जन पुरुषों को आनन्दकारक यशस्वी मुनि और आर्यिका चारित्र रूपी संपदा की स्थानभूत इस समाचार विधि का जो पूर्णरूप से पालन करते है, वे स्वर्ग सम्पदा का अनुभव कर मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त करते हैं ।
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क्षुतृट् शीत मलोष्ण दंशमशकेर्या रोगशय्यावृण, स्पर्श क्लेशवधान लाभमरति निर्देर्शनं स्त्रीक्लमम् । प्रशाज्ञान भवौ सनाग्न्यशयनान् सत्कार याञ्चानिष चोद्भूतांश्च परीषहान् विजयते यो वोर्यचर्यो यति ॥९९२॥
१. भूख, २, प्यास, ३. शीत, ४. उष्ण, ५. दंशमशक, ६. नास्त्य, ७. श्ररति, . स्त्री, ६. चर्या, १०, निषद्या, ११. शय्या, १२. आक्रोश, १३. बंध, १४. याचना, १५. अलाभ, १६. रोग, १७. तृणस्पर्श, १८. मल १६. सत्कार पुरस्कार, २०. प्रज्ञा, २१. अज्ञान, और २२. प्रदर्शन इन कारणों से उत्पन्न परिषहों को जो जीतता है, वह
यतिराज वीर्याचारवान है ।
क्षुधा परिषह-
- क्षुत्तीक्ष्णानशनादि जाक्षतिकरं स्वज्ञेय बोक्षाक्षम, स्वान्तं भ्रान्ततरं करोति बलवत्प्राणान्प्रणोन्मुखान् । यादीनन जनेऽफलाऽसि सफला त्यागात्तपः पुष्टये, तस्या नृत्यमृताशनेन शममं कुर्वन्वती क्षुज्जयः ॥३॥
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४१५
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अत्यन्त तीक्षण उपवास आदि से उत्पन्न क्षुधा इन्द्रियों के समूह को अपने ज्ञेय विषय के जानने में असमर्थ कर देती है । चित्त को श्रान्त कर देती है । बलवत्प्राणों को प्रयाण के सन्मुख कर देती है । अर्थात् क्षुधा से व्याकुल मानव की इन्द्रियां अपने कार्य से विमुख हो जाती है। मनः आकुल व्याकुल हो जाता है। मत्यु सन्मुख या जाती है । इस क्षुधा को अन्न के आधीन रखने वाले मानव जीत नहीं सकते हैं । उस से क्षुधा को जो आहार का त्याग कर धृतिरूपी अमृत के अशन से शमन करते हैं, वही साधु क्षुधा परिषह जयी होते हैं। तृषा परिषह
चंडश्चंडकरः स्थलस्थितययः संचारिणः प्रागिनः, भ्रष्टप्लुष्ट तनु स्तनोति नितरां यस्मिस्तपे तापने । तस्मिन् स्निग्ध विरुद्ध भोजन रुजाजतापावि पुष्यतृषा, त्यक्ते निःस्पृहतामूलेन कृतधीपाति तृष्णाजयः ।।६६४॥
जिस ग्रीष्मकाल में तीक्षा सूर्य की किरणों से तालाब नदी शुष्क हो जाते है, जलचर, स्थलचर, नभश्चर, जीवो का शरीर दग्ध हो जाता है, उस ग्रीष्म ऋतु में स्निग्ध, रूक्ष, प्रकृति विरुद्ध, आहार से वा रोगादि से उत्पन्न ध्यास को पुण्यात्मा, पवित्र बुद्धि के धारक यतीश्वर परित्यक्त वस्तु में स्पृहा का त्याग कर समतामृत के पान से बुझाते हैं. वे तृषा परिषहजयी होते हैं। शीत परिषह---
प्रोत्कम्पा हिम भीमशीत पवन स्पर्श प्रभिमांगिनो, यस्मिन्यान्यति शोत खेद मशाः प्रालयकालेऽगिनः । तस्मिन्नस्मरतः पुरा प्रियतमाश्लेशादि जात सुखं, योगागार मिरस्तशीत विकृते निर्वास सस्तज्जय HRE५||
जिस शीतकाल में शरीर में कम्पन उत्पन्न करने काली शीतल वायु के स्पर्श से शरीर के अवयव फट जाते हैं, तथापि पूर्वकाल में अनुभूत यनिता जन्य सुखों को स्मरण नहीं करते हुये दिगम्बर साधु धीर वीर होकर शुभ ध्यानरूपी घर में निवास करके शीत की बाधा का निवारण करते हैं अर्थात् शांत बाधा से पाकुलित नहीं होते हैं, वे शीत परिषह जयी होते हैं ।
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४१६ ]
मल परिषह
[ गो. प्र. चिन्तामणि
प्राणाघात विभतितस्तनुरति स्वागाच्च भोगा स्पृहः, स्नानोद्वर्तन लेपनादि विगमात् प्रस्वेद पांसूदितं । लोकानिष्ट मनिष्ट मात्मवपुषः पामादि मूलं मलं, मात्र त्राण featurदि वृजिनं जेतुं मलक्लेश जित् ॥६६॥
जो संयमी प्राणियों के विघात से भयभीत है, जिसका शरीर के प्रति ममत्व नहीं है, इसलिये प्राणियों के विघातक स्नान, विलेपन नहीं करने वाले साधु के शरीर में पसीना व धूल से मल उत्पन्न हो जाता है, जिससे शरीर में खुजाल उत्पन्न होती है, लौकिक जन को जो अनिष्ट हैं, देखने में अमनोश है ऐसे मल को पाप भीरू साधु पापको नाश करने के लिए शरीर रक्षक कवच के समान धारण करता है, वह मल परिषह जयी कहलाता है ।
उस परिषह
ग्रीष्मे goraशेष देहि निकरे मार्तण्ड चंडांशुभिः, संतप्तात्तनुस्तृषानशन रुक् क्लेशादि जातोष्णनम् । शोष स्वेद विदाह खेदमशवशे नाप्तं पुराऽपिस्मरत्
मुक्त्यै निज भाव भावनरतिः स्यादुष्य जिष्णु तो ॥७॥
प्राणियों के शरीर को ग्रीष्मकाल में कृश करने वाले सारे प्राणी तीक्ष्ण सूर्य के किरणों से संतप्त हो रहे हैं, तृषा, उपवास, विहार, रोग, क्लेशादि से उत्पन्न उष्णता से तालु शुष्क हो रहा है, सारे शरीर में पसीना निकल रहा है, शरीर में दाह उत्पन्न हो रहा तो भी व्रती साधु खेद खिन्नता को प्राप्त नहीं होकर प्रात्म भावना में लीन रहता है, वह ऊष्ण परिषह जयी होता है ।
दंशमशक परीषह----
शून्यागारदरी गुहादि शुचिनि स्थाने विविक्ते स्थितः, dreniger at दंशमशकारचंड तुडैः कृताः । स्वमिति परदेह जातिमिवतां यो मन्यमानो मुनिः, निःसंग स सुख व दंशमशक क्लेशं क्षमी त तुम: Healt
जो शून्य गृह पर्वत की कन्दरा, गुफा, वृक्ष के कोटर में रहकर तीक्ष्ण खटमल कीट, मच्छर, देश मशकादिका के द्वारा उत्पन्न हुई अपने शरीर के पीड़ा को
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----CINE-DAN
अध्याय : पांचवां ]
[ ४१७ दूसरे के शरीर में उत्पन्न हुई पीड़ा के समान समझता है, वह निष्परिगस्, सुखी दिगम्बर साधु दंशमशक परिषह जयी कहलाता है । उसको मैं नमस्कार करता हूं। चर्या परिषह
शार्दूलमिलितेच्छ भल्ल भुज गामोगेभयकास्पदे । ...... गन्धाद्विरदोत्करे करिरिपु कोई कनीडे बने । स्वरं कण्टक कर्करादि परुषेयत्रारण पावश्चरन् । एकः सिंह इवासिभीति विजयी व्रज्यात्तिजित्संयमी MREE
जो शार्दूल, व्याघ्र, चीता, रीछ, सर्प आदि से भरा हुआ है, भयास्पद है, गन्ध से मदोन्मत्त हुये, गजराजों के क्रीडा का स्थान है, ककर, पत्थर, कण्टक प्रादि से व्याप्त है, ऐसे वन में सिंह के समान निर्भय होकर अत्राग पाद (जूता रहित) पैरों से भ्रमण करने वाले मुनि चर्या परिषहजयी होते हैं । रोग परिषह
कण्ड्यागलगण्ड पाडवक्थु प्रन्थिज्वश्लीपद । ...... . श्लेष्मोदुम्बर कुष्ठ. पधन . श्वासादि रोगावतः ।। भिक्षुः क्षीरा , बलोऽपि भेषज सुहृन्मंत्रानपेक्षः :क्षमी। दुस्कारि विनिमिताति विजयी स्याद् व्याधियार्धाजयः ॥१०००।
खुजाल, गंडमाल, पांडु रोग, दाह, ग्रन्थि, ज्वर, श्लीपद, कफ, उदुम्बर, कुष्ठ, वायु, श्वास आदि रोग से पीड़ित, क्षीण शक्ति वाला भी क्षमा शील साधु भैषज, मित्र और मन्त्रों की अपेक्षा नहीं करता है और दुष्कर्म रूपी शत्रु के द्वारा निर्मित रोगों पर विजय प्राप्त करने वाला साधु व्याधि परिषहजयी होता है। शयन परिषहजय----
झंझा वातहतात कौशिक शिवा फेत्कार घोर स्वरां। शंपा कर रवां स्फुरद चितडिज्जिह्वां क्षया राक्षसीम् ॥ पो ता दाग गमयस्यसौ शयन जाता घास जिद्धारधीः । . ध्वान्तात्यन्तकराल • भूधर बरी देशे प्रसुप्तः क्षरणं ॥१००१॥
जहां वर्षा सहित भयंकर वायु से पीड़ित होकर उल्लू और माल चीत्कार कर रहे हैं, वह तो जिसके शब्द हैं, शंपा जिसके क्रूर दाँत हैं; स्फुरायमान कांति वाली विद्युत जिसकी जिह्वा है, ऐसी विकराल रात्रि रूपी राक्षसिनी को धीर बुद्धि वाले
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४१८ ]
1. गो. प्र. चिन्तामणि
तपस्वी घोर अन्धकार से पूरित पर्वत की गुफा के प्रदेश में सोये हुये सुख पूर्वक व्यतीत करते हैं, वे शयन परिषद् जयी होते हैं ।
तृणस्पर्श परिषह-
श्रान्तः सन् श्रुतं भावनाऽनशन सद् ध्यानाऽध्व यानादिभिः । स्लोकं कालमति श्रमापहृतये शय्यानिषधे भजन् ॥ शुद्धोवरणपत्र संस्तरशिला पट्ट तत्पोडन: 1 कंड्यादिसहो भवेदिह तृश्वस्पर्शाची संप
श्रुत की भावना, उपवास, समीचीन ध्यान और मार्ग में गमनादि के कारणों सेक्लान्त संयमी अतिश्रम को दूर करने के लिए शुद्ध पृथ्वी, तृण पत्र, संस्तर और शिलापट्ट पर स्तोक काल तक शयनासन करते हैं । उस समय तृण आदि से शरीर में खुजाल उत्पन्न होती है, उसको आनंदित होकर सहन करते हैं, मन में खेद खिन्न नहीं होते हैं। वे तृण स्पर्श परिषह जयी कहलाते हैं । वध परिवह-
ve: पूर्व भवापकार कलनातज्जन्म वैरात्वलैः । म्लेच्छनिष्करुणैरकारण गुण द्वेषैश्च पापात्मक : 11 देहच्छेदनभेदनादि विधिता यो मार्यमाणोऽप्यलं । देहात्मात्मविभेद वेदन भवक्षांतिधातिक्षमी ॥१००३॥
पूर्व भव के अपकार के जान लेने से अथवा उस जन्म सम्बन्धी वैर भाव से रुष्ट हुये शत्रुओं के द्वारा अथवा निष्कारण गुणों में द्वेष रखने वाले, पापी, निर्दयी म्लेच्छों के द्वारा शरीर के छेदन, भेदन, मारण, ताडन आदि करने पर भी जो शरीर और आत्मा के भेद विज्ञान से उत्पन्न श्रात्मानुभव के सामर्थ्य से वेद खिन्न नहीं होता है, क्षमाशील वह साधु वध परिषह जयी कहलाता है ।
लाभ परिषह
हो २ देह १. सहायतां तव समुद्दिश्यैवपोध्यो मया । gat मतपसो गृहावलिमतो भ्रान्त्वाप्यनाप्तेऽशने ॥ दोषः कोपि न विद्यते भम पुनलोभादलाभक्षमा । तां पूसि प्रतनोत्यतः प्रियतमेवैवेत्यलाभक्षमा || १००४ ॥ ॥
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अध्याय : पांचवा ]
[ ४१६ हे शरीर! तू मेरे तप की वृद्धि का कारण है, इसलिए मैं योग्य आहारादि के द्वारा तेरा पोषरण करने के लिए घरों की पंक्ति में भ्रमण करता हूँ । यदि भ्रमरण करने पर भी प्राहार की प्राप्ति नहीं होती है, तो मेरा कोई दोष नहीं है । आहार की प्राप्ति की अपेक्षा आहार की प्राप्ति मेरे तप की विशेष वृद्धि करती है, इसलिए आहार की प्राप्ति ही मुझे प्रियतम है। ऐसा विचार करके आहार की प्राप्ति में जो आनन्द मानता है, वह संयमी अलाभ परिषह जयी होता है। अरति परिषह--
दुरिन्द्रिय वृन्द रोग निकर क्रूरादि बाधोत्करैः। : प्रोद्भूता मरति व्रतोत्कर परित्राणे गुणोत्पोषणे ॥ मक्ष क्षीरपतरां करोत्यरतिजिद्वौरः स बंद्यः सतां । यो दंडत्रय दंडनाहितमातः सत्य प्रतिको प्रती ॥१००५॥
जो संयमी अमनोज्ञ इन्द्रियों के विषय से, रोग प्रादि से उत्पन्न होने से, क्रूर पशु प्रादि की बाधाओं के समूह से उत्पन्न अरति को अपने व्रतों की रक्षा करने में एवं गुरण समूह को पुष्ट करने के लिए क्षीण कर देता है, मानसिक जुगुप्सा उत्पन्न नहीं होने देता है, वह सन, वचन, काय, का विजयी सत्य प्रतिज्ञ, धीर, वीर, अरति परिषह जयी संयमी सत्पुरुषों के द्वारा वंदनीय होता है। प्रदर्शन परिषद
वर्ण्यते बहवस्सपोऽतिशयजाः सप्तद्धि पूजादयः ।। प्राप्ताः पूर्वतपोधनरिति वचोमात्रं तदद्यापियत् ।। तत्वज्ञस्य ममापि तेषु नहि कोऽपोत्यात संगोलिता। चेतोवृत्तिरहक परिषहजयः सम्यक्त्व संशुद्धितः ॥१००६॥
पूर्वकाल में तपोधनों ने बहुत से तपो अतिशय से उत्पन्न सप्त ऋद्धियां प्राप्त की हैं, ऐसा आज भी शास्त्रों में सुना जाता है। परन्तु मुझे तो यह वार्ता सत्य प्रतीत नहीं होती है । क्योंकि मैं तत्त्वज्ञानी इतना उत्कृष्ट तपश्चरण करता हूँ, परन्तु मुझे तो एक भी ऋद्धि प्राप्त नहीं हुई है। इस प्रकार मानसिक अश्रद्धा उत्पन्न नहीं होना ही सम्यक्त्व की निर्मलता है और इसी से योगी प्रदर्शन परिषह जयी होता है।
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४२० ।
मो. प्र. चिन्तामरिण
स्त्री परिषह----
जेता चित्त भवस्त्रयस्य जगतां यासामपांगेषुभिः । । ताभिमत्तनितम्बिनोभिरभितः संलोभ्यमानोऽपि यः॥ तत्फल्गुत्वभवस्य मैति विकृति तं वयं न्दिर। वन्दे स्यात्तिजयं जयन्त मखिलानर्थ कृतार्थ यति ॥१.००७।।
जिन स्त्रियों के कटाक्ष रूपी बारणों के द्वारा कामदेव तीन जगत का जीतने वाला हुआ था। उन वनितानों के द्वारा चारों तरफ से संलोभ्यमान होकर भी जो उन कटाक्षों को निस्सार समझकर विकृति भाव को प्राप्त नहीं होता है । उस श्रेष्ठ धैर्यधारी कुत कृत्य अखिल अनर्थों को जीतने वाले स्त्री परिषह जयी साधु को मैं नमस्कार करता हूँ। प्रज्ञा परिषह---
प्रत्यक्षाक्रम विश्वयस्तु विषय ज्ञानात्मनः स्वात्मनो। गर्वः सर्वमत तज्ञ इति यः प्राप्त परोक्षस ।। सर्वस्मिन्नपि नो तनोति हृदये लज्जां स कि तामिति । प्रशोत्कर्ष मदापनोदनपरः प्रज्ञासि जित्तस्ववित् ।।१००८॥
वास्तविक में आत्मा प्रत्यक्ष एवं युगपत् सर्व पदार्थों का जानने वाला है, उसके परोक्ष श्रुत के जान लेने पर मैं सर्व मत का ज्ञाता हूं। यह जानता हुआ भी हृदय में अनिर्वचनीय लज्जा को प्राप्त होता है। यह प्रज्ञा के उत्कर्ष के मद को अपनोदन करने में तत्पर तत्त्वज्ञानी प्रज्ञा परिषह जयी होता है । अज्ञान परिवह
ज्ञान ध्यानरत्ता मतिर्ममतपस्तीतून चोत्पद्यते । ज्ञानं पूर्णमयं जरः पशुरिति श्रोतुं वचोऽहं क्षमः ॥ .. नेत्यज्ञान परिषह स सहते प्रव्यक्त वस्तु स्थितिः । यः कार्य भवति स्वहेतु युगले सत्येव नेत्यन्यथा ।।१००६॥
मेरी बुद्धि ज्ञान ध्यान में लीन है, मैं तीन तपस्वी हूं, तथापि मुझे पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, यह पशु है, मुर्ख है, अज्ञानी है, इस प्रकार के बचनों को सुनने के लिए मैं समर्थ नहीं हूं, इस प्रकार की अज्ञान परिषह को भो अंतरंग बहिरंग कारणों
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श्रध्याय: पांचवां ]
[ ४२१
के मिलने पर ही कार्य होता है, अन्यथा नहीं, इस प्रकार वस्तु की स्थिति को जानने वाला सहन करता है, वह मज्ञान परिषह को जीतने वाला होता है । नाग्न्य परिषह-
भूषा वेष fanirrer free त्यागात्प्रशस्ताकृते । बालस्येव मनोज जात विकृतिश्वितस्य लज्जेतिताम् ॥ हित्वा मातृसमान मेव सकलं कान्ताजन पश्यतः । पूज्यो नाग्न्य परिषहस्य विजयस्तत्वज्ञ ताप्तोदयः ॥ १०१०॥
जिनका शरीर, वेश भूषा, आदि विकार रहित है, जिनकी प्राकृति अत्यन्त atreenaraय है । मनोविकार से उत्पन्न हुई विकृति रूपी लज्जा को छोड़कर बालक के समान निर्भय और निर्विकार होते हैं । समस्त स्त्री समूह को माता के - उमान देखते हैं। नम रहते हुये भी किचित् मात्र भी मन में विकार नहीं है, वह साधु नग्न परिषह विजयी कहलाता है ।
आक्रोश परिवह
aff कर्णहृदt विदारण करान् क्र राशयः प्रेरिता । नाक्रोशान् घनगर्ज तर्जन खरान् शृण्वन्न शृण्वनि ॥ शायुत्तम संपदापि सहितः शान्ताशयश्विन्तयन् । यो बाल्यं वलसंकुलस्य शयनः क्लेश क्षमी तं स्तुवे ||१०११॥ जो संयमी क और हृदय के विदारक क्रूर चिल बालों के द्वारा प्रेरित अत्यन्त तीक्ष्ण, आक्रोशकारी वचनों को सुन करके भी नहीं सुनने वाले के समान होता है तथा जो उत्तम शक्ति रूपी सम्पदा से सहित होते हुए भी शान्त चित्त बाला संयमी उन दुष्ट वचन कारी दुष्टों की मूर्खता का चितवन करता हुमा, आक्रोश परिषह को सहन करता है, उसको हम स्तुति करते हैं । सरकार पुरस्कार परिवह
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7
यातोऽहं तपसा तेन च पुरस्कारं प्रशंसा नति भक्त्या मे न करोति कोऽपि यतिषु ज्येष्ठोऽहमेवेति यः । ग्लानि मानतां न याति स मुनिः सत्कार जातिजित् दोषा मे न गुणा भवन्ति न गुणा दोषाः स्युरित्यन्यन्तः ॥१०१२ ।।
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४२२
[ गो. प्र. चिन्तामणि मैं सप के द्वारा, श्वत के द्वारा विख्यात हूँ, यतियों में मैं ही ज्येष्ठ हूं. भक्ति से मेरा कोई भी पुरस्कार प्रशंसा नमस्कार नहीं करता है इस प्रकार जो मान कषाय से उत्पन्न ग्लानि को नहीं प्राप्त होता है, वह विचार करता है कि मेरे दोष नहीं है गुण होते हैं सत्कार करने पर गुण नहीं दोष होते हैं, वह मुनि सत्कार से उत्पन्न अति को जीतने वाला होता है। याचा विजय परिषह
प्राज्यं राज्य मुदस्य शाश्वत पद प्राप्त्यै तपोवृहरणे, बेहो हेतुरयं हि भुक्त्यनुगता चास्य स्थितिस्तस्कुतः। भिक्षाय भ्रमणं हियः पदमिदं यस्मान्महार्यास्पद, नीच वृत्तिरनिन्दितेति विचरन याञ्चाजयः स्यान्मुनि ॥१०१६॥
. शाश्वत पद की प्राप्ति के लिए उत्कृष्ट राज्य को छोड़कर तप की वृद्धि में यह शरीर कारण है और इस शरीर की स्थिति भक्ति के अनुसार है इसलिए भिक्षा ' के लिए भ्रमण करना लज्जा का स्थान कैसे हैं ? क्योंकि भिक्षा के लिये भ्रमण महार्थों
का प्रास्पद है इस प्रकार नम्रवृत्ति बाला अनिन्दित चर्चा करने वाला मुनि याचना परिषह जयी होता है। विद्या परिषह
सर्वाशाश महान्धकार पुरुजाऽऽयामा त्रियामां यमी, योग र्योगमयत्यवार्यमहिमाऽऽभोगै महर्स यथा। क्षेत्र स्त्रीजन पश्व बध रहिते हृय निषास्थितः, सन्नत्युन निशाचराप्रतिहतध्यानो निषद्याजयी ।।१०१४॥
स्त्रीजन, पशु, नपुसक आदि दोषों से रहित मनोज्ञ क्षेत्र में अति उन निशा. घरों के द्वारा अप्रतिहत ध्यानी निषधा से स्थित अवार्य महिमा वाला जो संयमी सर्व दिशाओं को भक्षण करने वाले महान्धकार से व्याप्त दीर्घ रात्रियों को जैसे मुहर्त के समय विस्तरित योग के द्वारा व्यतीत करता है, वह निषद्या जयी होता है । परिवह विजय का फल . .....
देशं कालं स्वकीय... बलमपि नृपतिः सम्यगालोच्य यद, :..: छद्रातस्य जेता भवति यति रपि स्वीयकर्मोदयेन ।
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अध्याय : पाँच ]
जातस्यास्यति जातोद्भटभटकटकस्योरु धैर्यस्तथा यः, सोऽयंस्याद्वर्य वीर्याचरण चरणजुतो वीर लक्ष्मी निलासः ।।१०१५॥ जैसे देश काल से अपने सेना का भली प्रकार विचार कर संजा, शत्रु समूह का जीतने वाला होता है उसी प्रकार महान् धैर्य वाला जो यति भी अपने कर्मोदय से उत्पन्न इस बाइस प्रकार के परिषह रूपी वीर भट को सैन्य का जीतने वाला होता है वह यह उत्कृष्ट वीर्याचार के आचरण से विख्यात कोति वाला वीर की लक्ष्मी का निवास होता है ।
{ ४२३
परिषहों का घोर उदय आने पर और आयु क्षीण होती दिखने पर मुनिराज ध्यान करते हैं, और परिषहों को जीतकर समाधि करते हैं । उसका वर्णन -
दीक्षा पीठिक योदितेन विधिना शिक्षां गृहीत्वा समाचारेणानुमतो गणेन गरिस्पना प्राप्तश्च सत्सूरिताम् । भूलो व्यपगत व्यापद गरणं सद्गणं,
रक्षन् यः समयं नयत्यतितरां धन्यः स मान्यो सुनिः ।। १०१६।।
पीठिका के द्वारा afer for से दीक्षा और शिक्षा को ग्रहण करके समाचार समूह से स्वीकृत और सूरि के द्वारा सत्य सूरिपने को प्राप्त छत्तीस गुण के भूषण से युक्त, नष्ट हो गये हैं प्रपत्तियों के समूह जिसके ऐसे अपने संघ को रक्षा करता हुआ जो काल को व्यतीत करता है वह माननीय मुनि अत्यन्त धन्य है ।
ज्योतिः शास्त्र विनूल जातक मतान्नानानिमित्तक्षरगात् terrear चय गृहावलि बल क्षीणत्व सं क्षणात् । प्रश्नस्याक्षर लक्ष क्षरण वशात्कालागमात्स्वायुधोमानं द्वादश वर्ष संमित मतो होनं च निश्वित्य सः ॥ १०१७ || पश्चाच्चारुतरात्मसंस्करणधी धोरो मुमुक्षुणी प्रीत्या पालित मात्मनात्मनि महात्स्नेहानुबंधे महत् । वृन्दं तुम्बिलरोगिसुतष: शैक्षावि भिक्ष्यन्वितं प्रारोप्यात्मभर वरं गधरे सत्तलक्ष्मीधरे ॥ १०१८॥ रक्षादक्षतमं गरणस्थ गखिनं सर्वगणं चादराचाय प्रियवाक् चयाभूत रसासारेख चेलोगतम् ।
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३२४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणिं
तापं तस्य निरस्य दुस्तरंतरं जातं द्विजाद शुः स्वास्थातो नियतं विहारपरं कुर्वन्मुनीन्द्रोत्तमः ॥ १०१६।। ज्योतिष शास्त्र में कथित लक्षणों से वा ग्रहों के बलाबल के क्षीणत्व देखने . से अथवा केवल प्रश्न चूडामरिंग में कथित दग्ध श्रभिघूमित प्रादि प्रश्नोत्तरों से अपनी आयु को बारह वर्ष प्रमाण या हीन जानकर रत्नत्रय से अलंकृत धीर श्री मुमुक्षु - आचार्य, अपने धर्मानुराग से पालित अपने वृद्ध रोगी, नवीन दीक्षित महोपवासी, शिक्षित आदि से समन्वित संघ के भार को अपने में महान् स्नेह रखने वाले शिष्यों में आरोपित करता है । तदन्तर अपने संघ की रक्षा करने में चतुर नूतन प्राचार्य को और सर्व संघ को बुलाकर उनके गुरु के वियोग से उत्पन्न चेतोगत दुःख को, अपने वचन रूपी अमृत वर्षा की धारा से शांत करता है । तदनन्तर मैं यहां ठहरूमा इस प्रकार के संकल्प से रहित होकर अनियत विहार करता है वह श्रेष्ठ मुनीन्द्र कहलाता है ।
प्रक्ष्यन्ते बहुदेश संश्रयवशात्संवेगिदाधाप्तयस्तीर्थाधीश्वर केवलोद्गममहीं निर्वाखभूम्यादयः । स्थैर्य धैर्य विरागतादिषु गुणेष्वाचार्यवर्येऽक्षाद्विद्यावित्तसमागमादधिगमो नूत्नार्थस्य च ।।१०२०।
बहुदेश के संश्रय के यश से संवेग यादि की प्राप्ति तीर्थाधीश्वर केबलोद्गम दर्शन होते हैं । प्राचार्यवर्य के अवलोकन से क्षरण मात्र में धीरता वीतरागादि गुणों में स्थिरता और ज्ञान शास्त्रियों के समागम से नूतन अर्थ
भूमि निर्वाणभूमि, आदि के
के समूह का ज्ञान होता है ।
सद्भू बहुसूरि भक्ति क्षेत्रं पात्रमपीक्ष्यते
युतंक्षामादि दोषोन्भिलं, परित्यागस्य निःसंता ।
सर्वस्मिन्नपि चेतनेतर बहित्संगे स्वशिष्यादिके,
गर्भस्थापचयः परीषजयः सल्लेखना श्रोतमा ||१०२१॥
बहुसूरि की भक्ति युक्त, क्रोधादि दोषों से रहित, योग्य राजा जिसमें हो ऐसा क्षेत्र पात्र शरीर के परित्याग की निःसंगता, सर्वचेतन, अचेतन, बहिरंग परिग्रह Area frofer में भी गर्व का अभाव परिषहों पर विजय होने पर उत्तम सल्लेखना देखी जाती हैं ।
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अध्याय : पांचवां ]
सम्यक्काय कषाय कार्यकरणं सल्लेखनाद्या वरैः .
चतुष्टयं रस परिस्यारी
:
स्तयाब्वद्वयम् । मँसदद्दल - ..
• सौवीरान रसोज्झनैरभिषवान्नेनान्द बाह्य मैन्दतपोभिरुग्रनियमैरब्दार्थ
भली प्रकार कार्य और कषायों को कुश
करना सल्लेखना है । उसमें उत्कृष्ट योगों के द्वारा चार वर्ष पर्यन्त रस परित्याग के द्वारा चार वर्ष व्यतीत करना इसके are दो वर्ष कांजी आहार और रस त्याग के द्वारा एक वर्ष वृष्यं अन्न के सेवने से यह उससे श्रधा वर्ष बाह्य मन्द मन्द तप के द्वारा आधा वर्ष उग्र नियमों के द्वारा शरीर को कृश करना प्रथम काय सल्लेखना है ।
कालं कालं च वैशमशनं पानं प्रकृत्यादिकं, arrai freeफानिलः विजयतेर्न स्याद्यया विक्रिया । reforfarer तोक्त विधिभिर्बाह्य स्तपः प्रक्रमराचार्यानुमतैः समाधिफल दरेषांग सल्लेखना ||१०२३||
जिससे वात, पित्त और कफ से अपने ज्ञान में विकृति नहीं हो ऐसे काल, शरीर, बल, देश, श्रन्न, पान और प्रकृति आदि को जान करके प्राचार्य के द्वारा अनुगत समाधि रूप कल के देने वाले पूर्व कथित विधि से बाह्य तप के द्वारा विद्वानों को यह काय सल्लेखना करनी चाहिये ।
تی
मंगार्दनम ||१०२२॥
eqध्यान प्रकरैः कषाय विषया सहलेखना श्रपसीस्वेष्टानिष्ट वियोग योगयुगजे. बाधा निदानोभये ।
इत्यस्य चतुविधस्य विजयो हिंसामृषास्तेयस
रक्षानन्द विभेदतोऽशुभकृतो ध्यानस्य रोद्रस्य च ।। १०२४ ||
[ ४२५
धर्म और शुवल ध्यान के द्वारा इष्ट वियोग, अनिष्ट संयोग, पीड़ा चितवन और निदान बंध नामक चार प्रकार के प्रार्तध्यान पर विजय और हिसानंद, भूषानंद स्तेयानन्द एवं परिग्रहानन्द इन चार प्रकार के रौद्र ध्यान पर विजय प्राप्त करना कषाय को कृश करने वाली उत्तम सल्लेखना है ।
ध्यातृध्यान विचित्य चिंतन कलान्यंगाति चत्वारितैः, स्याद् ध्यानं सदसत्व तत्र भवति ध्यातोसमैरन्वितः ।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्राय: संहनने स्त्रिभिस्त्रिभिरू ऐतोऽन्त्यैः स नाऽस्मिन्पुनः । चिन्सातबहिरंग. कारण सरिणर्या हि कार्यद्विपः ॥१०२५।।
ध्याता, ध्यान, ध्येय और ध्यान का फल चार अंग हैं । उन चारों में सद् और असत् ध्यान होता है, आदि तीन-तीन उन - उत्तम संहननों से युक्त भ्याता होता है । अन्तिम संहननों से वह ध्यान नहीं होता है। क्योंकि पुनः इस चिन्ता अंतरंग बहिरंग कारण रूप मार्ग में कार्यरूपी हाथी प्रेरित करने योग्य है । संक्षेप से ध्यान का लक्षण---
एकस्मिन् विषयेऽग्रमान नम भूदस्या मतेरित्यसा, वेकाना विषयोपयोग निरता चिता निरोधोऽचला। वस्था स्यानिजगोचराचलमनो मानं तदन्तर्मुह, विस्थान मतीवयुर्धरतया नाऽतः परं तिष्ठति ॥१०२६॥
इस मति को एक विषय में एकाग्रता होती है, इस प्रकार यह एकाग्रता विषयों में उपयोग की लीनता चिता का निरोध अचल अवस्था अपने गोचर अचल मन ध्यान है, वह ध्यान अन्तर्मुहर्तावस्था वाला होता है, अत्यन्त दुर्धर होने से इसके आगे यह ध्यान नही रहता है।
मिश्यात्योरुतमस्तिरस्कृत सुदृरज्ञानोऽधिक कोषवान्, स्तब्धः सत्स्वपि वंचनांचित मसिलुब्धः परार्थेष्वपि । दुलेश्यापशमाशयश्च भवति ध्याताऽशुभ ध्यानयोः, ध्येयं ध्यान विशेष लक्षण विनिर्देशक्षणे लक्ष्यते ॥१०२७॥
मिथ्यात्व रूपी महान अन्धकार से तिरस्कृत है, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यकचारित्र जिसका ऐसा प्रत्यन्त क्रोधी मुर्ख, सत्पदार्थों में भी वंचनमति पर धन का लोलुपी, दुर्लेश्या के वशीभूत हुअा, प्रारणी, मार्त रौद्र ध्यान का ध्याता होता है । अशुग ध्यान का ध्येय का ध्यान, विशेष लक्षण के वर्णन करने के क्षण में कहेंगे। मार्तध्यानों के चार भेद और स्वरूप---
जीवा जीव कलत्र पुत्र कनकाऽगारादिकावाल्मनः, ' प्रेम प्रीतिवशात्मसात्कृत बहिः संगाद्वियोगोदमे । क्लेशेनेष्ट वियोग जार्तमचलं तच्चिन्तन में कथ न स्यादिष्ट वियोग इत्यपि सदा भन्दस्य दुःकर्मणः ॥१०२८।।
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अध्याय: पांचवां 1
[ ४२७
अपने जीव, जीव, स्त्री, पुत्र, सुवर्ण घरादि से प्रेम और प्रीति के वश से ग्राम सात्कृत बहिरंग परिग्रह के वियोग से हो जाने पर क्लेश से मेरा इष्ट वियोग fret प्रकार नहीं होवे इस प्रकार भन्द कर्म का प्रचल चितवन करना इष्ट वियोग में उत्पन्न मध्यान है ।
क्रूरैर्व्यन्तर और दरि मनुजे व्यर्लिम मैरापदि प्राप्तायां गरलाविकैश्च महती तनाशचिन्ताऽऽपदा ।
संयोगो न भवे सदा कथमिति क्लेशातिनुन्नं मनः, श्चात ध्यान मनिष्ट योग जनितं जातंदुरस्तंनरः ॥ १०३११४
क्रूर व्यन्तर, चौर, वैरी मनुष्य, व्याल, मृग, विष भादि पदार्थों के द्वारा आपत्ति आने पर उस प्रापत्ति के नाश की चिन्ता उत्पन्न होती है । मेरे श्रनिष्ट पदार्थों का संयोग न हो। इस प्रकार की चिन्ता से चित्त निरखर आकुलित रहता है वह पापों का कारण भूत अनिष्ट संयोग नाम द्वितीय श्रार्त्तध्यान है ।
बाधासंजन तात निहित स्वान्तं नितान्तस्थिरं, ताद्विश्व परिवहन्मम कदर विश्लेषण इत्यंगिनः ।
दीनस्यास्त विशिष्ट वस्तु विषय ज्ञानस्य न स्यात्कथं, 'क्लेशात्या सम जातु संगम इति विष्टं च तस्त्यात्मनः ।। १०३०॥
ती विश्वपरावह से मेरा वियोग कब होता अथवा क्लेशों के समूह का मेरे कभी भी संयोग नहीं होवे इस प्रकार अस्त हो गया है, विशिष्ट वस्तु विषय का विज्ञान जिसका ऐसे दीन प्रारणी का मन क्लेशित होता है । और दुःख में क्षिप्त मन अत्यन्त स्थिर रहता है, वह रोग से उत्पन्न आर्त्तध्यान में निहित ध्यान होता है । नानोपायचयेन मोच चरितं भ्रन्त्विा विशालामिला,
माभोलं मकराकरं च बहुशो तुच्छोच्या पाप्य यत् ।
प्राप्यं तुण्यवता जनेन कनकं कान्तं च कान्तादिकं,
कांक्षा क्षुभिता मतिर्वत् निधानार्थं महातिप्रदम् ।। १०३१ ॥
नाना प्रकार के उपायों के समूह के द्वारा नीच आचरणों के द्वारा विशाल पृथ्वी पर भ्रमण करके और बहुत बार तुच्छ इच्छा से भयंकर समुद्र को प्राप्त करके गुणवान मानव के द्वारा प्राप्त करने योग्य जो सुवर्ण और मनोश कान्ता आदि
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४२८ ]
[गो. प्र. चिन्तामणि हैं, उस धनादि की इच्छा से क्षुभित मति है, महान अति को देने वाला निदान नामक आर्तध्यान है, यह खेद की बात है। ..
ग्लान्य द् गमशोक शोष जडता मांग कंपोकता, निःश्वास स्वर भंग कार्ण्य कृशतामौनाऽभिवीक्षामूति । . प्रस्वेदाऽनिमिषेपास्थिति . रुजायाञ्चामृषोक्तयादयः, स्पष्टाः स्वस्य परस्य वार्तजनितास्तज्झापकाः कायिकाः ।।१०३२।।
ग्लानि, अश्रुओं का निकालना, शोक, रोष, जड़ता, मूर्छा, अंग की कंपन, दीर्घ निश्वास, स्वर भंग, कृष्ण, कृशता, मौन, बार-बार देखना, मृत्यु, बार-बार पसीना आना, अनिमिषेण से देखना, अस्थिरता रोग, याचना, असत्य भाषरण आदि अपने और पर के प्रार्तध्यान की ज्ञापक अथवा पार्तध्यान में जनित काय की चेष्टा स्पष्ट देखी जाती है।
अतिर्दुःख मय जात जनितं स्यादातमतौ भवं, पापादान निदान मात्र सिचयं यद्रजः संश्रयम् । मिथ्यावृष्टि गुणादिषड् गुरणपदं येन प्रमादास्पदं,, धुलेश्यात्रयज सुदुःखजनक तिर्यम्मति प्रापकम् ।।१०३३॥
असाला वेदनीय. से उत्पन्न दुःख अति है, अति में होने वाला आर्त होता है, जिस प्रकार गीला वस्त्र रज से संश्रय का कारण है, उसी प्रकार प्रार्तध्यान पाप के पादान का कारण है, जिससे मिथ्यात्वादि षट् गुणस्थान होते हैं, प्रमाद का स्थान है, दुःस्व का जनक है और तिर्यंच गति का प्रापक है । रौद्रध्यान भेद, और उनके लक्षरण--
हिंसानन्दम सात कारण गुरणे हिसारुचिर्देहिनां, भेवच्छेद विधारणासुहररूपश्च तरुणः। शेषेष्याधुदितैरसत्यवचनरम्यस्य हान्या मृषा, नंदं रौद्र मसात सन्सति पदे मिथ्याप्रलापे रुचिः ॥१०३४।।
भेद, च्छेद, विदारण, प्राणहरण आदि के द्वारा अन्य भी उन दारुण असाता कारणों के समूह के द्वारा प्राणियों की हिंसा में रूचि करना, हिंसानन्द नामक प्रथम रौद्र ध्यान है, शेष ईा प्रादि से कधित असत्य वचनों के द्वारा दूसरे की हानि के लिए असाता की सन्तति के स्थान मिथ्या प्रलाप में संचि रखना मुषानन्द नामक द्वितीय रौद्रध्यान हैं।
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अध्याय पांचवां ]
स्तेयानन्द मवाप्य यत्परधन वंद्यावि निद्य हित, रादित्वमवाप्तुमुत्सुकतरं चेतश्च संस्तद्भवेत् । स्वं संरक्ष्य विपक्षदूरमुदिता तोषोग्रता या तुसं, रक्षानन्दमपि स्वबस्तु निखिलं निवेरि कुर्वे इति ॥१०३५|| उन वन्द्यादि निन्दनीय चेष्टाओं के द्वारा दूसरे के धन को प्राप्त करके त्व को प्राप्त करने के लिये उत्सुकतर चित्त है, वह स्तेयानन्द होता हैं, धन की रक्षा करने जो विपक्ष के दूर करने में हर्षित होकर उग्र सन्तोष है, वह संरक्षानन्द नामक रौद्रध्यान है, मैं सारी अपनी वस्तु को को वैर रहित करता हूं. इस प्रकार के विचार का नाम भी संरक्षानन्द रौद्रध्यान हैं ।
प्रक्षापट मानारुणता दातश्च देहे महान्, हेरger fevretriकुटयः शक्ति प्रशंसात्मनः ।
स्वेद स्वाधर निष्ठुर ग्रह करा घातगिकपादयः, arrier careasts विषयास्तद्रोद्रभावोद्भवाः ।। १०३६ ॥
[ ४२६
इन्द्रिय के विकलता आंख मुख का रक्त होना शरीर में महान दाह, शस्त्र का उत्क्षेपण, faver वचन बोलना, भृकुटिका चढ़ना अपनी शक्ति की प्रशंसा पसीना माना, अपने अधरों को निष्ठुरता से ग्रहण, हाथों का घात अंग का कम्पन यादि होना स्व और पर के दृष्टिगोचर होने वाले उस रौद्र भाव से उत्पन्न कायिक चिह्न हैं ।
"
रुदः क्रूरतराशयो गत क्यो रौद्र रुद्र भवं,
धर्म यथोरधूलिनिलयं
कुकर्मालयम् । पंचस्वादिगुणेषु तीव्रतर सरकृष्णा त्रिलेश्योद्गतं,
प्रोद्य तीव्रराति नारक गति प्राप्रोनिनिमित्तं मनम् ||१०३७॥
क्रूर चित्तवाला दया रहित भाव रुद्र है, निश्चय से रौद्र में होने वाला परिणाम रौद्र ध्यान है, जैसे प्रार्द्र चमड़ा महान धूलि का स्थान होता हैं, उसी प्रकार कुकर्मों का स्थान है, पांच मिथ्यात्व प्रादि गुलस्थानों में तीव्रतर कृष्णादि तीन अशुभ लेश्या से उत्पन्न तीव्रतर गति से नारक गति प्राप्ति का निमित्त माना है । शुभ ध्यान का लक्षण ----
ध्याताsपेसजनो
गीत वितताऽऽतोद्याविकोलाहले, स्थाने स्थावरजंगमांगि रहिते पूते नितांतं समे ।
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४३० ।
[ गो. प्र. चिन्तामणि
_ निश्छिद्र निरुपद्रथे पृथुशिलेलाचे मुख स्पशिनि,
प्रध्यानाभिरतः स्थितो न नियमः स्वभ्यस्तयोगे स्वयम् ॥१०३८।।
मनुष्यों के द्वारा गाये गये गीत का समूह वादित्र आदि के कोलाहल से रहित स्थावर और जंगम प्राणियों ये रहित पवित्र अत्यन्त समान निच्छिद्र निरुपद्रव सुख स्पर्श बाली विस्तरित शिला पृथ्वी आदि पर स्थित ध्यान करने वाला उत्कृष्ट ध्यान में लीन होता है, परन्तु अभ्यस्त योग में यह नियम नहीं है ।
यानांगवयव प्रचालन वचो माधभावो मुनि, व्युत्सरण समावलंवक शिलास्तंभो निखातो यथा । . पर्यकेन यथा सुखं स्वमनसः शय्यादिभिर्वा स्थितो, निःसगोऽस्तसमस्त बाह्मा विषयाश्यापत्यशेषेन्द्रियः ।।१०३६॥ प्राणापान विनिग्रहादतितरां भ्रांतिर्मते रुच्छवस, स्मन्दं मन्दमतो न नेत्र युगल सम्पग्निमीलन्न च । प्रोन्मीलन्द शनैर्मनाग्दशनपंवत्यं ग्राणि विनन्मनः, शांति मूतिमतो मिवात्तिजयिनी स्वां मूत्तिमप्यूजिताम् ॥१०४०। सष्टि में दुताऽऽर्जवादि सहितः श्रेभ्योरशेष श्रुतः । स्याद्रध्याता दशपूर्वपिच्च नवपूर्वज्ञो परत्राऽपि च । ध्येयन्यस्तमना निरस्त नियमः कालेषु संध्यादिषु, निरिणोचित माध संहनन मेवाऽस्मिन्पुनातरि ॥१०४१॥
जिसके गमन के समय अंग की चंचलता, वचन, जंभाई आदि का प्रभाव हैं, जो शिला में अंकित स्तम्भ के समान कायोत्सर्ग से अचल ९ड़ा है अथवा पर्यकासन से बैठा है, यथायोग्य शय्या आदि से भी स्थित है, परिग्रह रहित है। समस्त इन्द्रियों के व्यापार से शल्य है, प्रारणापान के निरोध से अत्यन्त मन्द-मन्द श्वासोच्छवास ले रहा है, जिसके नेत्र अोन्मीलित हैं, दाँतों की पंक्ति दातों पर धारण किये हुए हैं, मन अत्यन्त शांत है, अार्तध्यान को जीतने वाली अत्यन्त सौम्य शरीर की प्राकृति को धारण करता है, क्षपक श्रेणी या उपशम श्रेणी पर प्रारूढ़ है । नव पूर्व या दश पूर्व का झाता सम्यादृष्टि प्रार्जवादि गुणों से युक्त होकर ध्येय में व्यस्त है। मन जिसका ऐसा मुनि तीनों काल की संध्या के समय में निरत नियम से ध्याता होता है । इस ध्याता के निर्वाण के योग्य प्रथम संहनन होता है । .
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अध्याय : पांचवां ]
धम्यं शुक्ल मिति द्विभेद मुदितं सद्धयानामाखन्तयो, राज्ञाऽपाय विपाकपाच विवयात्संस्थान गारस्पान्यतु । भेदं भूरि विकल्प जाल कलितं जतान्नयान्नैगमा, सर्व सर्वविदो बचो नहि नयायेत यतो वस्तु च ॥१०४२ ॥
सद्ध्यान धर्मध्यान, शुक्लध्यान इस प्रकार दो प्रकार कहा है, उन दोनों में धर्मध्यान आज्ञा, अपाय, विपाक, संस्थान का विषय होने से चार प्रकार का है, जिनेन्द्र भगवान के नैगम नय की अपेक्षा से बहुत से विकल्प जाल से कलित है, क्योंकि सर्वज्ञ भगवान के सब वचन और वस्तु नय से रहित नहीं हैं ।
विज्ञातुं न तु शक्यावृति युताध्यक्षानुमानदिना, त्यानंत विषसंर्वात सकलं वस्त्वस्तदोषाताम् ।
आशायायियोतमन्तं देखि तद्वस्तुल चिन्ताज्ञा fिaast frषुर्नयचयः संज्ञानपुण्योदयः ।। १०४३ ॥
[ ४३१
इन्द्रियातीत अनन्त पर्यायवर्ती सकल वस्तु आवरण युक्त प्रत्यक्ष ज्ञान श्रीर अनुमानादि के द्वारा जानने के लिये शक्य नहीं है, परन्तु बीतरागी श्रहंत की श्राज्ञा से वचनों का विचार है कि भगवान की आज्ञा से कहा गया वस्तु का स्वरूप असत्य नहीं है, इस प्रकार उस वस्तु का चिन्तन सँज्ञान और पुण्य का उदयभूत नय का समूह आज्ञा विषय है ।
g: कर्मात्मदुरोहि तैरुपचितं मिष्याविरत्यादिभि यवज्जन्म जरामृति प्रभृतयो वांडपाय एनः कृताः । जीवेनादिभवे भवेत्कथमलोsपायादपायः कवा, eferrer ममेत्यrय विचयः सत्कारणा दीक्षरम् ||१०४४ ॥
जीव के द्वारा पूर्व भव में मिथ्यात्व अविरति आदि अपनी दुष्चेष्टाओं के द्वारा उपार्जित दुष्कर्म अथवा पापकृत आपत्ति, जन्म, जरा, मृत्यु प्रभृति पाय हैं । इस अपाय से मेरा निराकरण कब होगा ? इस प्रकार सत्कारणों से चिन्तन करना पाय विषय है ।
गत्यादौ परिणामतस्तनुभृतां प्राप्तोदयोदीर, क्लेशाश्लेकरं सुखोत्कर करं कर्माशुमं तच्छुभम् .
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४३२ ]
[गो. प्र. चिन्तामणि शक्त्या युक्तसंख्यलोक मितषट् स्थानान्वितं स्थानया, इत्येवं बिनयो विपाक विचयः प्रत्यस्तदोषोच्चय. ॥१०४५।।
गति आदि में परिणामों से प्राणियों के प्राप्त है उदय और उदीरणा जिन की, ऐसे क्लेशों को करने वाले और सुख को करने वाले असंख्यात लोक प्रमाण, षट् । स्थान से अन्वित शक्ति से युक्त अशुभ वह शुभ कर्म है, इस प्रकार विचार करना नष्ट हो गया है दोषों का समूह जिसका, ऐसा विषाक विचय है ।।
* बारह अनुप्रेक्षा * . . सस्थानं यदनित्यताऽशरगता संसार एकाकिता, ज्यत्वं चाशुचिताऽस्त्रवः सुनयतः स्यात्संवरो निर्जरा । लोको बोध्यति दुर्लभत्वमपरो 'धर्मस्तदित्यन्वित, ..... भेदैः स्वैचिंचयोऽस्य धितनमनुप्रक्षा, स्मृतं द्वादश ॥१०४६॥
अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, भन्यत्व, अशुचित्व, पानव और सुनय से संबर निर्जरा होती है । लोक बोधि की अति दुर्लभता, उत्कृष्ट धर्म, इस प्रकार बारह अनुप्रेक्षाएं हैं। उनका अपने-अपने भेदों से युक्त जो चिन्तबन करना है, वह संस्थान विचय ध्यान है। ...
अनित्य भावना उत्पत्तिः प्रलयश्च पर्ययवशाद् द्रव्यात्मना नित्यता, यस्तुमा निश्रये प्रतिक्षरण मिहाज्ञानाज्जनो मन्यते । . नित्यत्वं द्रवयंबुदोपकलिकास्थैर्य प्रथार्थी दिके, .. . नष्टे नष्टधृतिः करोति व्रत शोकार्ती याऽऽत्मीयफे ॥१०४७॥
इस लोक में वस्तुओं के समूह में प्रतिक्षण द्रव्याथिक नय की अपेक्षा नित्यता है, पर्याय की अपेक्षा उत्पत्ति और विनाश हैं। अज्ञान से जन नष्ट होने वाले पानी और दीपक की कलिका में स्थिरता नित्यत्व मानता हैं, जिससे अपने धनादि के नष्ट हो जाने पर नष्ट हो गया है धैर्य जिसका, ऐसा मानव व्यर्थ शोक और दुःख को प्राप्त करता है।
प्रशरण भावना मंत्रास्तंत्रततिस्तदन्धित कृतिढुंगा द्विषदुर्गमा, भृत्याः किं न भृताः सुहृत्ततिरपीत्येतेषु सत्सप्यमः ।।
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अध्याय : पांचवां ]
सर्वे पूर्ण महीभृतः क्षतिमतः कस्यापि कालत्रये त्राताऽत्रास्ति न नाशमोयुषि पुरा पुण्याजिते वायुषि ।।१०४८ ॥
| ४३३
मन्त्र तन्त्रों का समूह, मन्त्र तन्त्र के जानने वाले की कृति, शत्रुओं से दुर्गम किले, मित्रों का समूह, नौकर रक्षक थे, इनके होने पर भी सर्व पूर्व राजा लोग क्या नाश को नहीं प्राप्त हुए ? इसलिये इस लोक में तीन कालों में पूर्व में उपार्जित .. के नाश हो जाने पर किसका रक्षक कोई भी नहीं है, यह शरण भावना है ।
संसार भावना जातिगतिव्याप्तकरणोऽनंतांगहारः
सदा,
वृत्या प्रोभूति प्रलयो नरामर मृगाचाहार्य पर्यायवान्
हित्वा सात्विक भाव जात मित्तरंभविः स्वकर्मोद्भवैः,
rasयं नटभ्रमत्यभिनवः सर्वत्र लोकत्रये ॥१०४९ ॥
पञ्च परिवर्तने रूपं परिभ्रमरण से ८४ लाख जाति और चार गतियों में प्राप्त किया है इन्द्रिय लाभ जिसने, अपरिमित शरीरधारी हमेशा उत्पत्ति और विनाशवान् नर, मानव, पशु आदि पर्यायों को धारण करने वाला यह जीव सात्विक भाव से उत्पन्न अनन्त ज्ञाननिधि को छोड़कर इतर स्वकर्मों से उत्पन्न मिथ्यात्वादि भावों के द्वारा नूतन शरीर को वार करके सर्वत्र तीन लोक में नट के समान भ्रमण करता है । यह संसार भावना है ।
एकत्व भावना
astra: स्वजनोऽनुगोऽस्ति न परो वा यालि अन्मांतर, जीवे जन्म निवाsa मित्रनिकरैः किं नाशितं वा हतम् । चित्रं गावराजाविजं हृदयजं asardaar मृत्युत्पत्ति निवृतिषु प्रणयिनोऽन्येऽर्थेष्वनर्थे निजः ॥ १०५० ॥
प्राप्त स्वजन साथ में चलने वाला दूसरा कोई भी जन्मान्तर में साथ नहीं
जाता है अथवा इस जन्म में मित्रों के समूह के द्वारा चित्र शरीर के रोगादि से उत्पन्न
अथवा मानसिक असाता क्या किसी के द्वारा नाश की गई है जन्म, मरण और निर्वाण में जीव अकेला ही है। धन के समय पाप में स्वयं ही जीव भागी होता है। यह एकत्व भावना है ।
अथवा हरी गई है ? दूसरे प्यारे बनते हैं,
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४३४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
....... अन्यत्य भावना .. बैतन्यं अडकताऽविसंदोहोदिताऽनेकता, नित्यत्वं क्षयिता च मूर्ति वियतिमूर्तत्व मित्यादिभिः।
भेवं देहि शरीर योरगयन् कि नेक्षते वृद्धिम्, - देहं खेदिनि देहिनि स्थित मति कांतेऽत्र भित्रवत् ॥१०५१॥
अवयवी के समूह में प्रकट हुए चैतन्य और अचैतन्य एकमेक हैं। चैतन्य नित्य है और क्षण ध्वसी शरीर है, इसलिये शरीर और आत्मा में अनेकता है । मूर्ति के प्राश्रय है इसलिये मूर्त है, इत्यादि के द्वारा शरीर और आत्मा में भेद को नहीं मानता हुमा खेदकारी आत्मा के निकल जाने पर उत्कर्षता को प्राप्त हुए शरीर को दुभिक्ष के समान यहां पर स्थित क्या नहीं देखता है ? यह अत्यत्व भावना है ।
अशुचि भावना . रेतः शोणि जातिधातु निचितं प्रच्छादितं चमगा, सान्द्रोद्रित्तगलन्मलं बहुबिलरंग जुगुप्सानुगाम् । भौति किं न तनोत्य संस्कृति बहिश्चौधगा न वेत, स्पृष्ट द्रष्टुपि क्षमोऽस्ति किमिदं त्रातुपसण्यादितः ॥१०५२॥
वीय, रक्त, जाति प्रादि धातुनों से व्याप्त चमड़े के द्वारा पाच्छादित नाक, आँख, कर्ण आदि बहुत से बिलों से अत्यन्त प्रवाह से बह रहा है मल जिस में, ऐसा यह शरीर ग्लानि का अनुकरण करने वाली भय को क्या नहीं विस्तारित करता है ? यदि इस शरीर में संस्कार रहित बाहर का चर्म नहीं हो तो क्या इस शरीर को स्पर्श करने के लिये, देखने के लिये, पक्षी प्रादि से रक्षा करने के लिये कौन समर्थ है अर्थात् कोई नहीं है । यह अशुचि भावना है। ..
- प्राश्रय भावना .. देहे स्नेह युते लगत्य विश्त रेपोगरगोऽयं यया, मिथ्यावस कषाय योग कलुषेऽस्त्र सजत्यगिनि । · · तद्वत स्वैक शरीरगा सुनिलिताऽनतारावो वर्गाणा, विश्वात्मावयवेवनंतगणना नो कर्मणा कर्मणाम् ॥१०५३॥
जैसे तेल सहित शरीर में रेणु का समूह निरन्तर लगता है, उसी प्रकार. मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग से कलुषित संसारी आत्मा में सारे प्रात्मा के
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४३५ अवयवों पर निरन्तर अपने एक शरीर को प्राप्त होने वाली कर्मों की (नों कर्मों की) सम्यक् प्रकार से मिलो हुई अनन्त अणु जिसमें, ऐसी अनन्त संख्या वाली वर्गणा प्राप्त होती है । ऐसा चिन्तवन करना आस्रव भावना है।
संवर भावना .." दष्टे दुष्ट विषाहिनाऽगिनि यथा. नष्ट प्रवेटे विक्रमांक पुष्याज्जांगलिकेन मंत्र बलिना संस्तमितं तिष्ठतिपyसम्यक्त्य व्रत निकषाय परिणामाऽयोगताभिस्तथा मिथ्यात्वादिस्ततुः स्वहेतु विगमान्नलन सा नागमः ।।
जैसे दुष्ट विष वाले सर्प के द्वारा काटने पर नष्ट चेष्टा वाले प्राणी का विष वैद्य के द्वारा अथवा मन्त्र शक्ति के द्वारा कीलित हो जाता है, उसी प्रकार सम्यक्त्व, नत, निष्कषाय परिणाम और अयोगता के द्वारा मिथ्यात्त्वादि अपने चार कारणों के नाश हो जाने से नूतन पापों का आगमन नहीं रहता है । ऐसा चिन्तवन करना संवर भावना है । .
निर्जरा भावना संशिलष्टात्मस लस्य निगलनतो निःशेष विश्लेषत, श्चान्तर्बाह्य चतुःस्वहेतुवशतः स्वर्णोपले स्वर्णता । यह हिनि फर्मरगोशमलनान्मिः शेष विश्लेषतः, सम्यक्त्व ग्रहणायनेक करणेस्तद्वि शुद्धात्मता ॥१०५५।।
जिस प्रकार कर्षण, छेदन, तापन आदि कारणों के द्वारा अनादिकालीन सुवर्ण की कालिमा नष्ट हो जाती हैं और सुवर्ण शुद्ध बन जाता है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र आदि गुणों के द्वारा आत्मा की पाप कालिमा दूर हो जाती है और आत्मा शुद्ध बन जाती है ऐसा चितवन करना निर्जरा भावना है।
लोक भावना मध्यांशः परितोऽनंतवियतो लोकस्त्रियालाऽवृतः, _पंच द्रध्य चितः प्रकृत रहितो नित्यः सदाऽवस्थितः । संस्थानेन तु सुप्रतिष्ठक समोऽसंल्य प्रदेश प्रमो, मध्यस्थ अस नालि रज विना स्पृष्टं न ष्टं पदम् ॥१०५६।। अनन्तानन्त प्रदेशी, अखण्ड, सर्वव्यापी, आकाश के मध्य में धनवातवलय,
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[गो. प्र. चिन्तामणि घनोदधिवातवलय और तनुवातवलयों से वेष्टित जीव पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल से मरे हुए संस्थान से सुप्रतिष्ठाकार, नित्य, सदा ब स्थित, स्वयंसिद्ध, असंख्यात, प्रदेशी, लोकाकाश है। उसके मध्य में एक राजू चौड़ी, चौदह राजू ऊँची अस नली है । संसारी. प्रारी इस लोक को अपनी चर्म चक्षु के द्वारा पूर्ण रूप से देखने के लिए समर्थ नहीं है । इस प्रकार चिन्तवन करना लोक भावना है। ... .
... मोधि दुर्लभ भावना नकाक्षर्विकलाम करता सं . तु ना, लब्धा बोधिरगण्य पुण्यं वशतः संपूर्ण पर्याप्तिभिः । भव्यः संजिभि राप्तलब्धिविधिभिः कैश्चित्कदाचितवचित्, प्राच्या सा रमता महोय हृदये स्वर्गापवर्गप्रदा ॥१०५७।।
वह बोधि, हीन पुण्य वाले एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंही पंचेन्द्रिय के द्वारा कभी भी प्राप्त करने योग्य नहीं है । सभ्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और चारित्र की प्राप्ति को बोधि कहते हैं । जिसको क्षयोपशमलब्धि, विशुद्धिलब्धि, देशनालब्धि, प्रायोग्यलब्धि और करण लब्धि प्रात हो गई है, जो संज्ञी है, पञ्चेन्द्रिय है, पर्याप्त है, भव्य है, उसी को ही बोधि की प्राप्ति होती है। वह बोधि निरन्तर मेरे हृदय में वास करे । ऐसा निरन्तर चितवन करना बोधि दुर्लभ भावना है ।
. . . . धर्म भावना वाताऽभीष्ट विशिष्ट वस्तु निमय स्याकांक्षिणेऽपिक्षरणा, खाते नरमारकादि मृवसंभूतेः स्मृते कृतेः । हंताक्रान्त जगत्रयांतक रिपोर्यः स्वाम्तगः संस्तुत, स्वातावारणशरीरिणां नहि परो धर्मात्सुशर्म प्रदात ॥१०५८।।
संसार में अभीष्ट वस्तु को देने वाला धर्म है । स्मृति मात्र से भय देने वाली, नरनारकादि आपत्तियों से बचाने वाला जिन धर्म ही है । तीन जगत् के जीवों को दुःख देने वाले यमराज रूपी शत्रु का नाशक धर्म है। अशरण संसारियों को शरण देने वाला धर्म है, वह धर्म वस्तु का स्वभाव है। वह हृदय में रहता है तब ही जीव की रक्षा होती है। धर्म को छोड़कर इष्ट. वस्तु को देने वाला, आपत्तियों से बचाने वाला, यमराज का नाशक, प्राणियों का रक्षक, दूसरा कोई नहीं है, यह धर्मभावना है।
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अध्याय : पांचवां ।
[ ४३७ वर्म का लक्षण---
श्रद्धानं सदशंकिताविसदनं . तत्वार्थसंचिन्तन, संवेग: प्रशमोदयेन्द्रियदमः प्राज्योद्यमः संयमः । बराग्यं वराप्तिातातिमता निर्मायिसाऽसंगता, धर्मस्येति समस्त बस्तु परमोपेक्षा च लक्ष्मोदितम् ॥१०५६।।
तत्त्वार्थ श्रद्धान, नि:शंकत्व तत्वार्थ चिन्तयन, संवेग, प्रशम, दया, इन्द्रियदमन, उत्कृष्ट उद्यम, संयम, वैराग्य, उत्कृष्ट गुप्ति, परिणामों की अति कोमलता, निर्मायित्व, असंगता, समस्त वस्तु के प्रति परम उपेक्षिता यह धर्म का लक्षण कहा है।
धम्यं स्यानिखिलार्थ सार्थ निहितं चित्तं समं संस्थितं, सम्यगहष्टय यताविसप्तम गुणांतेषु प्रवृद्ध कमात् । सांबर शिशादि कर नानात्मनां कर्मयां, सल्लेश्यात्रयजं च नाक सुखदं प्राग्न मासिद्धियम् ॥१०६०॥
सकल पदार्थों के समूह में चित्त समान स्थित हो अर्थात् सुख-दुःख आदि में समान भाव और राग-द्वेष का प्रभाव धर्मध्यान है । यह धर्मध्यान अविरत सम्यक्दृष्टि नामक चौथे गुणस्थान से लेकर अप्रमत्त नामक सातवें गुरणस्थान तक क्रम से वृद्धि को प्राप्त होता है। साक्षात् नानात्मक कर्मों की निर्जरा का कारण है। पीत, पद्म, शुक्ल - इन तीन शुभ लेश्या वाले के ही होता है। उत्कृष्ट स्वर्ग के सुत्रों का दाता है और क्रम से मोक्षफल को देता है।।
(प्राचारसार, प्रा० बोरनन्दी) शुक्लध्यान का स्वरूप रामाधुपरजाकलाप कलितं सन्देह लोलायित । विक्षिप्तं सकलेन्द्रियार्थ गहने कृत्वा मनो निश्चलम् ।। संसार व्यसन प्रबन्ध बिलयं मुक्त विनोदा स्पदं । . धर्मध्यान मिदं विवस्तु निपुरमा प्रत्यक्ष सौख्यार्थिनः ॥१०६१॥
. अतीन्द्रियः सुख के चाहने वाले निपुण मुनि प्रथम ही रामादिक तींव रोगों के समूह से व्याप्त, अनेक संदेहों से चलायमान अर्थात् जब तक निर्णय न हो तब तक
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४३८ }
[ गो. प्र. चिन्तामणि
स्थिर न रहने वाले और समस्त इन्द्रियों के विषय रूप गहन वन में विक्षिप्त अर्थात् भूले हुए मन को निश्चल करते हैं, संसार के कष्ट प्रापत्ति प्रादि व्यसनों के प्रबन्ध से रहित और मुक्ति के क्रीडा करने का स्थान ऐसे इस ध्यान को धर्म ध्यान कहते हैं ।
भावार्थ :- मन को निश्चल करके धर्म ध्यान होता है; इसमें सांसारिक व्यापार के प्रवर्तन का सर्वथा अभाव है।
श्रात्मार्थं अय मुञ्च मोह गहने मित्र विवेकं कुरु, बेराग्यं भज भावंयस्व नियतं भेदं शरीरात्मनोः ।
धर्मध्यान सुधा समुद्र कुहरे कृत्वावगाहं पर, पश्यानन्त सुख स्वभाव कलितं मुक्त सुखाम्भोरुहम् ||१०६२ ॥
हे श्रात्मन: तूं आत्मा के प्रयोजन का आश्रय कर अर्थात् और प्रयोजनों को छोड़कर केवल आत्मा के प्रयोजन का ही ग्राश्र कर तथा मोह रूपी वन को छोड़, विवेक अर्थात् भेद ज्ञान को मित्र बना, संसार देह के भोगों से वैराग्य का सेवन कर, और परमार्थ से जो शरीर और आत्मा में भेद है, उसका निश्चय से चिन्तवन कर, और धर्म ध्यान रूपी अमृत के समुद्र के कुहर (मध्य) में परम अवगाहन ( स्नान ) करके अनन्त सुख स्वभाव सहित मुक्ति के मुख कमल को देख ।
शुक्ल ध्यान का निरूपण -
वात्यन्तिकी श्रितः । मत्यन्त निर्मलम् ॥। १०६३।।
इस धर्म ध्यान के अनन्तर धर्म ध्यान से प्रतिक्रान्त होकर अर्थात् निकल कर, अत्यन्त शुद्धता को प्राप्त हुआ, धीर कर मुनि प्रत्यन्त निर्मल शुक्ल ध्यान के ध्यावने का प्रारम्भ करता है ।
ग्रंथ धर्म मतिक्रान्तः शुद्धि ध्यातुमारभते वीरः शुल्क
शुक्ल ध्यान का लक्षण ---
निष्क्रियं करणातीतं ध्यान धारण वजिसम्
अन्तर्मुखं च यथितं तच्छ्रुक्तमिति पठयते ॥ १०६४॥
जो निष्क्रिय अर्थात् क्रिया रहित है,
इन्द्रियातीत है, और ध्यान की धारणा इच्छा से रहित है, और जिसमें चित्त
से रहित है अर्थात् "मैं इसका ध्यान करू ऐसी अन्तर्मुख अर्थात अपने स्वरूप के ही सन्मुख है, उसको शक्ल ध्यान कहते हैं ।
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४३६ शुक्ल ध्यान करने योग्य कौन ? __ प्रादि संहननोपेतः पूर्वज्ञः पुण्यचेष्टितः। :
चतुर्विधमपि ध्यानं स शुक्लं ध्यातुमर्हति ॥१०६५॥
जिसके प्रथम-बजतषभनाराच महान है; जो पूर्व अर्थात् ग्यारह अंग चौदह पूर्व का जानने वाला है, और जिसकी पुण्यरूप चेष्टा हो अर्थात् शुद्ध चारित्र हो; वहीं मुनि चारों प्रकार के शुक्लध्यानों को धारण करने योग्य होता है ।
शुचिगुरण योगाच्छुरूकं कषायरजसः क्षयादुपशमाहा। वैडूर्यमरिणशिखामिध सुनिर्मसं निष्प्रकम्पं च ॥१०६६।।
आत्मा के शुचि गुण के सम्बन्ध से इसका नाम शुक्ल पड़ा है; कषाय रूपी रज के क्षय होने से अथवा उपशम होने से जो आत्मा के निर्मल परिणाम होते हैं, वही शुचि मुरण का योग है, और वह शुक्ल ध्यान वैडूर्यमणि की शिखा के समान निर्मल और निष्कंप अर्थात् कंपता से रहित है ।
कषायमल विश्लेषाप्रशमाद्वाः प्रसूयते । यतः साभतस्तः शुक्ल मुक्त निरुक्तिकम् ॥१०६७।।
. पुरुषों के कषाय रूपी मल के क्षय होने से अथवा उपशम होने से यह शुक्ल ध्यान होता है । इसलिए उस ध्यान के जानने वाले प्राचार्यों ने इसका नाम शुक्ल, ऐसा निरुक्ति पूर्वक अर्थात् सार्थक कहा है ।
छनस्थ योगिनामा तु शुक्ले प्रकीसिते ।
त्वन्त्ये क्षीण दोषाणां केवलज्ञान चक्षुषाम् ॥१०६८।।
शुक्ल ध्यान के पृथकद वितर्क, एकत्व वितर्क, सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति, व्युपरत क्रिया निवृत्ति ऐसे चार भेद हैं; उनमें से पहले के दो अर्थात् पृथकत्व वितर्क और एकत्ववितर्क तो छहास्थ योगी अर्थात बारहवें गुरणस्थान पपन्त अल्प ज्ञानियों के होते हैं और अन्त के दो शुक्ल ध्यान सर्वथा रागादि दोषों से रहित. ऐसे केवल ज्ञानियों के
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श्रतमानार्थ सम्बन्धाच्छ तालम्चन पूर्वके । पूर्वेपरे जिनेन्द्रस्य मिःशेषालम्बनच्युते ।।१०६६।।
प्रथम के दो शुक्ल ध्यान जो कि छद्मस्थों के होते हैं, वे श्रुतज्ञान के अर्थ के सम्बन्ध से. श्रुत ज्ञान के प्रालंबनपूर्वक हैं. अर्थात् उनमें श्रुतज्ञान पूर्दक पदार्थ का
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[ गो. प्र. चिन्तामणि आलंबन होता है; और अन्त के दो शुक्लध्यान, जो कि जिनेन्द्रदेव के होते हैं, वे समस्त प्रालंबन रहित होते हैं। .
. : सवतर्क सवीचार सपृथक्त्वं च कीतितम् । शुक्ल माद्य द्वितीयं तु विपर्यस्तमतोऽपरम् ॥१०७०॥
आदि के दो शुक्ल ध्यानों में पहला शुक्ल ध्यान वितर्क, विचार और पृथक्त्व सहित है, इसलिए इसका नाम पृथक्त्व वितर्क विचार है और दूसरा इससे विपर्यस्त है, सो ही कहते हैं।
सवितर्कमविचार मेकत्व. पदलालितम् । कोतितं मुनिभिः शुल्क द्वितीयमति निर्मलम् ॥१०७१।।
दूसरा शुक्लध्यान वितर्क सहित है, परन्तु विचार रहित है, और एकत्व पद से लाञ्छित अर्थात् सहित है; इसलिये इसका नाम मुनियों ने एकत्य वितर्क विचार कहा है। यह ध्यान' अत्यन्त निर्मल है।
सूक्ष्म क्रिया प्रतीपाति तृतीयं सार्थनामकम् । . . समुच्छिन्नक्रियं ध्यानं. तुर्यमार्योनवेदितम् ॥१०७२॥
तीसरे शुक्लध्यान का सूक्ष्म क्रिया अप्रतिपाति ऐसा सार्थक नाम है; इसमें उपयोग की क्रिया नहीं है, परन्तु काय की क्रिया विद्यमान है। यह काय की क्रिया घटते-घटते जब सूक्ष्म रह जाती है, तब यह तीसरा शुक्ल ध्यान होता है, और इससे इसका सूक्ष्म क्रिया अप्रतिपाति ऐसा. नाम है; और आर्य पुरुषों ने चौथे ध्यान का नाम समुच्छिन्न क्रिया. अर्थात व्युपरत क्रिया. निवृत्ति ऐसा कहा है। इसमें काय की क्रिया भी मिट जाती है ।
तत्र त्रियोगिनामा द्वितीयं त्वेकयोगिनाम् । तृतीयं तनुयोगानां स्थातुरीयभयोगिनाम् ।।१०७३॥
शुक्ल ध्यान के चारों भेदों में पहला, जो पृथक्त्य वितर्क विचार है, सो मन, वचन, काय, इन तीन योगों वाले मुनियों के होता है; क्योंकि इसमें योग पलटते रहते हैं। दूसरा एकत्व वितर्क विचार किसी एक योग से ही होता है; क्योंकि इसमें योग पलटते नहीं; योगी जिस योग में लीन है, वही योग रहता है; तीसरा सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति काय योग वाले के ही होता है। क्योंकि केवली भगवान् के केवल काय योग की सूक्ष्म क्रिया ही है: शेष दो योगों की क्रिया नहीं है; और चौथा समुछिन्न
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अध्याय : पांचवा ]
[ ४४१
क्रिया आयोग केवली के होती है, क्योंकि प्रयोग केवली के योगों की क्रिया का सर्वथा अभाव है।
पृथक्वेन वितर्कस्य विचारो यत्र विद्यते ।
सवितर्क सविचारं सपथक्स्वं तदिष्यते ॥१०७४॥ जिस ध्यान में पृथक्-पृथक् रूप से वितर्क अर्थात् श्रुत का विचार अर्थात् संक्रमण होता है अर्थात् जिसमें अलग-अलग श्रुतज्ञान बदलता रहता है उसको सबितर्क सविचार सपृथकत्व ध्यान कहते हैं।
अवीचारो चितर्कस्य चौकत्वेन संस्थितः । ...
सवितर्कमवीचारं सदेकत्वं विदुर्बुधाः ।।१०७५॥ जिस ध्यान में वितर्क का विचार (संक्रमण) नहीं होता और जो एक रूप में स्थित हो उसको पंडितजन सवितर्क अविचार रूप एकत्व ध्यान कहते हैं।
पृथक्रवं सत्र नानात्वं वितर्क: धतमुस्यते ।
अर्थ व्यजनयोगामां वीचारः संक्रमः स्मृतः ॥१०७६।।
वहां नानात्व अर्थात् अनेक पने को पृथकत्व कहते हैं, शुत ज्ञान को वितर्क कहते हैं और अर्थ, व्यञ्जन और योगों के संक्रमण का नाम विचार कहा गया है।
अर्थादन्तिरापत्तिरर्थ संक्रान्ति रिष्यसे । ज्ञेया व्यजनसंक्रान्तिव्यंजनाध्यञ्जने स्थितिः ॥१०७७।। स्यादियं योग संक्रांतियोगायोगान्तर गतिः।
विशुद्ध ध्याम सामरिक्षीय मोहस्य योगिनः ॥१०७८॥ .
एक अर्थ (पदार्थ) से दूससे अर्थ की प्राप्ति होना अर्थसंक्रान्ति है; एक व्यञ्जन से दूसरे व्यञ्जन में प्राप्त हो कर स्थिर होता व्यञ्जनसंक्रान्ति है; और एक योग से दूसरे योग गमन करना योम संक्रान्ति है। इस प्रकार विशुद्ध ध्यान के सामर्थ्य से जिसका मोहनीय कर्म नष्ट हो गया है ऐसे योगी के ये होते हैं।
अर्थादर्थ वचः शब्दं योगायोग समाश्रयेत ।
पर्यायादपि पर्यायं द्रव्यागोश्चिन्तयेदणम् ॥१०७६।।
एक अर्थ से दूसरे अर्थ का चिन्तबन करे; एक शब्द से दूसरे शब्द का और एक योग से दूसरे योग का आश्रय ले; एक पर्याय से दूसरे पर्याय का चिन्तवन करे; और द्रव्य रूप अणु से अणु का चिन्तवन करे; ऐसा अन्य ग्रन्थों में लिखा है।
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४४२ ]
... गो. प्र.चिन्तामणि प्रर्यादिषु यथा ध्यानी संक्रामत्यविलम्बितम् ।
पुनावत ते तेन प्रकारेण स हि स्वयम् ॥१०८०॥
जो ध्यानी अर्थ व्यञ्जन प्रादि योगों में जैसे शीघ्रता से संक्रमण करता है वह ध्यानी अपने आप पुनः उसी प्रकार लौटता है।
वियोगी पूर्व विद्यः स्यादिदं ध्यायत्यसौ मुनिः ।
सवितर्क सविचारं सपृथक्त्वमतो मतम् ।।१०८१॥ जिसके तीनों योग होते हैं और पूर्व का जानने वाला होता है, वही मुनि इस पहले ध्यान को धारण करता है। इसलिये इस. ध्यान का नाम सवितर्क सविचार सपृथकत्व कहा है।
अस्याचिन्त्य प्रमावस्य सामर्थ्यात्स प्रशान्त धीः । .. मोहमुन्मूलयस्येव . शमयत्यथवा क्षणे ॥१९५२॥
___ इस अचिन्त्य प्रभाव वाले ध्यान के सामर्थ्य से, जिसका चित्त शान्त हो गया है ऐसा ध्यानी मुनि क्षणभर में मोहनीय कर्म का मूल से नाश करता है; अथवा उपशम करता है।
इदमत्र तु तात्पर्य श्रुतस्कन्धमहारसवात् ।
अर्थमेकं समाशय ध्यानान्तरं व्रजेत् ॥१०५३।।
इस ध्यान में अर्थादिक के पलटने का तात्पर्य यह है कि श्रुत स्कन्ध अर्थात् द्वादशांग शास्त्र रूप महा समुद्र से एक अर्थ को लेकर उसका ध्यान करता हुआ दूसरे अर्थ को प्राप्त होता है। ... शब्दाच्छब्दान्तरं यायद्योगं योगान्तरादपि ।
सविचार मियं तस्मात्सवितकं च लक्ष्यते ।।१०८४॥
यह ध्यान एक शब्द से दूसरे शब्द पर जाता है और एक योग से दूसरे योग पर जाता है इसलिये इसका नाम सविचार सवितर्क कहते हैं।
अतस्कन्धमहासिन्धुं भवगाह्य महामुनिः ।
ध्यायेत्पृथक्स्व वितर्फ वीचारं ध्यानमनिमम् ॥१०॥
महामुनि द्वादशांम शास्त्र रूप महा समुद्र का अवगाहन करके, इस पृथकत्ववितर्क विचार नामक पहले शुक्ल ध्यान को ध्यावे ।
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अध्याय : पांचवां }
[ ४४३ एवं शान्तकषायामा कर्मकक्षाशु शुक्षरिणः ।
एकस्वध्यानयोग्यः स्यात्पृथक्वेन जिताशयः ॥१०८६॥ इस प्रकार पृथकत्व ध्यान से जिसने अपमा चित्त जीत लिया है और जिसके कषाय शान्त हो गए हैं और जो कर्म रूप कक्ष अर्थात् तृण समूह अथवा वन को दग्ध करने के लिए अग्नि के समान हैं। ऐसा महामुनि एकत्व ध्यान के योग्य होता है।
' पृथक्त्वे तु या ध्यानी भवत्यसल मानसः ।
तदकत्वस्य योग्यः स्वादाविभूतात्म विक्रमः ॥१०४७॥ . . जिस समय इस ध्यानी का चित्त पृथकत्व ध्यान के द्वारा कषाय मल से रहित होता है, तब इस ध्यानी का पराक्रम प्रकट होता है और तभी यह एकत्व ध्यान के योग्य होता है । भावार्थ-एकत्व ध्यान, पृथकत्व ध्यान पूर्वक ही होता है।
ज्ञेयं प्रक्षीण मोहस्य पूर्वज्ञस्यामिता तेः ।
सवितर्कमिदं ध्यान मेकत्व मति निश्छलम् ।।१०८८॥ ___जिसका मोहनीय कर्म नष्ट हो गया है और जो पूर्व का जानने वाला है और जिसकी दीप्ति अपरिमत है, उस मुनि के अत्यन्त निश्छल ऐसा यह सवितर्क एकत्व ध्यान होता है।
अपृथक्त्वमवीचारं सवितर्क छ योगिनः ।
एकत्वमेक योगस्य जायतेऽत्यन्त निर्मलम् २१०६ किसी एक योग वाले मुनि के पृथकत्व रहित, विचार रहित और वितर्क सहित ऐसा यह एकत्व ध्यान अत्यन्त निर्मल होता है।
द्रध्यं चेकमणु चैकक पर्यायं चैकमश्रमः ।
चिन्तयत्येक योगेल यौकत्यं तदुच्यते ॥१०॥ जिस ध्यान में योगी खेद रहित होकर, एक द्रव्यं को, एक अणु को अथवा एक पर्याय को एक योग से चिन्तवन करता है, उसको एकत्व ध्यान कहते हैं। .
एक द्रव्यमथाणु वा पर्यायं चिन्तयेति । .
योगैकेन यदक्षीणं तदेकत्वमुदीरितम् ॥१०६१
यदि यति समर्थ होता हुआ एक योग से एक द्रव्य, एक अणु अथवा एक पर्याय का चिन्तबन करे उसे एकत्व ध्यान कहते हैं।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि अस्मिन् सुनिर्मल ध्यान ताशे प्रविम्भिते ।।
विलीयन्ते क्षरणादेव धातिकर्माणि योगिनः ॥१०६२।।
योगी पुरुषों के अतिशय निर्मल एकत्ववितर्क अविचार नामक द्वितीय ध्यान रूपी अग्नि के प्रकट होते हुए धातिया कर्म क्षणमात्र में नष्ट हो जाते हैं।
इम्बोधरोधक द्वन्द्वं मोहविध्नस्य वा परम् ।
स क्षिरणोति क्षणादेव शुक्लनमध्वजाचिषा ||१०६३।। ध्यानी मुनि इस दूसरे शुक्ल ध्यान रूपी अग्नि की ज्वाला से दर्शन और नाम के आरा करने वाले दर्शनाप, ज्ञानावरण कर्म को, मोहनीय कर्म को और अन्तराय कर्म को क्षणमात्र में ही नष्ट कर देता है।
भावार्थ--इस. एकत्व शुक्ल ध्यान से घाति कर्म शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।
इस प्रकार पृथक्त्ववितर्क विचार और एकत्व वितर्क अविचार इन आदि के दोनों शुक्ल ध्यानों का निरूपण किया। इनका संक्षिप्त भावार्थ यह है कि पहले ध्यान में द्रव्य पर्यायरूप अर्थ से अर्थान्तर का संक्रमण करता है तथा उस अर्थ की संज्ञा रूप शास्त्र के वचन से बचनान्तर (दूसरे बचन) का संक्रमण करता है और तीनों योगों में से एक योग से दूसरा, दूसरे से तीसरा योगान्तर-इस तरह संक्रमण करता है ; पलटते. पलटते ठहरता भी है, परन्तु उसी ध्यान की सन्तान चली जाती है, इसलिये उस ध्यान से मोहनीय कर्म का क्षय अथवा उपशम होता जाता है और दूसरे ध्यान में संक्रममा होना बन्द हो जाता है। तब शेष रहे हुए घालिया कर्मों का जड़ से नाश करके, केवल ज्ञान को प्राप्त होता है।
प्रात्मलाभमयासाथ शुद्धि चात्यन्तिकी पराम् । प्राप्नोति केवलज्ञान तथा केवलदर्शनम् ॥१०६४॥
एकत्व वितर्क अविचार ध्यान से धातिकर्म का नाश करके, अपने आत्मलाभ को प्राप्त होता है और अत्यन्त उत्कृष्ट शुद्धता को पाकर केवलज्ञान और केवल दर्शन को प्राप्त करता है।
अलम्ब पूर्व मासाद्य तबासी ज्ञानदर्शने । वेत्ति पश्यत्ति निःशेषं लोकालोकं यथास्थितम् ।।१.०६५।३ . वे ज्ञान और दर्शन दोनों अलब्धपूर्व हैं अर्थात् पहले कभी प्राप्त नहीं हुए थे
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अध्याय : पांचवां }
[ ४४५
सो उनको पाकर, उसी समय वे केवली भगवान् समस्त लोक और अलोक को यथावत् देखते और जानते हैं ।
तदा स भगवान् देवः सर्वज्ञः सर्वदोदितः ।
अनन्त सुख वीर्यादिभूतेः स्यादग्रिमं पदम् ॥१०६६॥ .
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जिस समय केवलज्ञान को प्राप्ति होती है, उस समय वे भगवान् सर्वकाल में उदयरूप सर्वज्ञ देव होते हैं और अनन्तं सुख, अनन्त वीर्य आदि विभूति के प्रथम स्थान होते हैं, वह भावमुक्त का स्वरूप है ।
इन्द्रचन्द्रार्क भोitereer नतक्रमः
विहरत्पवनी पृष्ठं स शोलेश्वर्य लाञ्छितः ॥ १०६७।।
इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, धरणेन्द्र, मनुष्य और देवों से नमस्कृत हुए हैं चरण जिनके ऐसे केवली भगवान् शील अर्थात चौरासी लाख उत्तर गुण और ऐश्वर्य सहित पृथ्वीतल में विहार करते हैं ।
उन्मुrafe freयात्वं द्रव्यभावसतं विभुः ।
बोयत्यपि निःशेषं भव्यराजीव भण्डलम् ||१०६८||
वे विभु सर्वज्ञ भगवान् पृथ्वीतल में विहार करके जीवों के द्रव्य मल और भाव मूल रूप मिथ्यात्व का जड़ से नाश करते हैं और समस्त भव्य जीव रूपी कमलों की मण्डली (समूह) को प्रफुल्लित करते हैं ।
भावार्थ -- जीवों के मिथ्यात्व को दूर करके उनको मोक्षमार्ग में लगाते हैं ।
ज्ञान लक्ष्मी तपो लक्ष्मी त्रिदशयोजिताम् ।
आत्यन्तिकीं च सम्प्राप्य धर्म चक्राधिपो भवेत् ॥१०६६॥
इस शुक्ल ध्यान के प्रभाव से ज्ञानलक्ष्मी, तपोलक्ष्मी और देवों की समवशरण लक्ष्मी तथा मोक्ष लक्ष्मी को पाकर, धर्मचक्र के चक्रवतीं होते हैं ।
कल्याचिभवं श्रीमान् सर्वाभ्युदयसूचकम् ।
समासाद्य जगद्वन्द्यं त्रैलोक्याधिपतिर्भवेत् ॥११००॥
अन्तरंग बहिरंग लक्ष्मी सहित केवली भगवान् जगत् से वन्दनीय और सब अभ्युदयों का सूचक ऐसे कल्याणरूप विभव (सम्पदा) को पाकर, सीमों लोकों के अधिपति होते हैं ।
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४४६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
तन्नामग्रहणादेव निःशेषा जन्म रुजः । व्यादि समुद्भूता सभ्यानां यान्ति लाघवम् ॥ ११०१॥
जिन भगवान् के नाम लेने से ही भव्य जीवों के अनादि काल से उत्पन्न हुए जन्म-मरण- जन्य समस्त रोग लघु (हल्के ) हो जाते हैं ।
तदात्वं परिप्राप्य स देवः सर्वगः शिवः । जरामरण अजितः ||११०२॥
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तब वे सर्वगत और शिव ऐसे भगवान् श्रहन्तपने को पाकर, सम्पूर्ण कर्मों के समूह और जरा-मरण से रहित हो जाते हैं ।
भावार्थ--अरहन्तपना पाकर सिद्ध परमेष्ठी होते हैं ।
तस्यैव परमेश्वर्यं चरण ज्ञानभवम् । ज्ञातु वक्तुमहं मन्ये योगिनामप्य गोचरम् ॥११०
आचार्य कहते हैं कि मैं ऐसा मानता हूं कि उन सर्वज्ञ भगवान् का परम ऐश्वर्य, चारित्र और ज्ञान के विभव का जानना और कहना बड़े-बड़े योगियों को भी अगोचर हैं ।
मोहेन सह दुद्धर्षे हते धाति चतुष्टये । देवस्य व्यक्ति रूपे शेषमास्ते चतुष्टयम् ।।११०४ ।।
केवली भगवान् के जब मोहनीय कर्म के साथ ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय --- इन चार दुर्धर्ष घातिया कर्मों का नाश हो जाता है, तब अवशेष चार घाति कर्म व्यक्तिरूप से रहते हैं ।
सर्वज्ञः क्षीरंगकर्मासौ केवलज्ञान भास्करः ।
अलमुहले शेषास्तृतीयं ध्यानमर्हति ॥ ११०५ ॥
कर्मों से रहित और केवलज्ञान रूपी सूर्य से पदार्थों को प्रकाशित करने वाले ऐसे वे सर्वज्ञ जब अन्तर्मुहूर्त प्रमाण आयु बाकी रह जाती है, तब तीसरे सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति शुक्लध्यान के योग्य होते हैं ।
astraight शेषे संवृता ये जिनाः प्रकरण ।
ते यांfor ear शेषा भाज्या: समुद्धाले ।।११०६ ॥
जो जिनदेव उत्कृष्ट छः महीने की आयु अवशेष रहते हुए केवली हुए हैं, वे
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४४७ अवश्य ही समुद्घात करते हैं और शेष अर्थात् जो छः महीने अधिक आयु रहते हुए केवली हुए हैं, वे समुद्घात में विकल्प रूप हैं ।
भावार्थ----उनका कोई नियम नहीं है, समुद्घात करें और न भी करें। यदायुरधिकानि स्युः कर्माणि परमेष्ठिनः । समुद्धातविधि साक्षात्यागे वारमते तदा ।।११०७॥ .
जब अरहन्त परमेष्ठी के आयुकर्म अन्तर्मुहूर्त अवशेष रह जाता है और अन्य तीनों कर्मों की स्थिति अधिक होती है, तब समुद्घात की विधि साक्षात् प्रथम ही प्रारम्भ करते हैं।
अनन्तवीर्य प्रथितप्रभावो दण्डं कपाट प्रतरं विधाय । स लोकमेनं समर्थश्चतुर्भिनिश्शेषमापूरयति क्रमेण ॥११०८॥
अनन्त वीर्य के द्वारा जिनका प्रभाव फैला हुआ है, ऐसे ये केवली भगवान् क्रम से दण्ड, कपाट, प्रतर-इन तीन क्रियाओं को तीन समय में करके चौथे समय में इन समस्त लोकों को पूरण करते हैं ।
भावार्थ-प्रात्मा के प्रदेश पहले समय में दण्डरूप लम्झे, द्वितीय समय में कपाट रूप चौड़े, तीसरे समय में प्रतर रूप मोटे होते हैं और चौथे समय में प्रदेश समस्त लोक में भर जाते हैं। इसी को लोक पूरण कहते हैं। ये सब क्रियाएँ चार समय में होती हैं !
तवा स सर्वगः सार्यः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः । विश्वव्यापी विभा विश्वमूत्ति महेश्वरः ॥१.१०६१
केवली भगवान् जिस समय लोक- पूर्ण होते हैं, उस समय उनके सर्वगत, सार्व, सर्वज्ञ, सर्वतोमुख, विश्वव्यापी, विभु, भर्ता, विश्वमूर्ति और महेश्वर--ये नाम यथार्थ (सार्थक) होते हैं।
लोकपूरणमासाद्य करोति ध्यानवीर्यतः । आयुः समानि कर्माणि मुक्तिमानीय तस्क्षरग ॥१११०॥
केवली भगवान् लोक पूरण प्रदेशों को पाकर, ध्यान के बल से वेदनीय, नाम और गोत्र-इन तीनों प्रघातिया कर्मों की स्थिति. घटाकर अर्थात् भोग में लाकर, आयुकर्म के समान स्थिति करते हैं। . . भावार्थ-यदि वेदनीय, नाम और गोत्र कों की स्थिति प्राय कर्म से
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४४८ ।
प्र. चिन्तामणि अधिक हो तो लोक पूरण अवस्था में उनकी स्थिति आयु कर्म की स्थिति के समान कर लेते हैं।
ततः क्रमेण सेनैव स पश्चाधिनिवर्तते । लोक पूरणतः श्रीमान् चतुभिः समयः पुनः ॥११११॥
श्रीमान् केवली भगवान् पुनः लोक पूरण प्रदेशों से उसी क्रम से चार समयों में लौटकर स्वस्थ होते हैं।
भावार्थ-लोक पूरण से प्रतर, कपाट, दण्डरूप होकर, चौथे समय में शरीर के समान प्रात्म प्रदेशों को करते हैं ।
काय योगे स्थिति कृत्वा बादरेऽचिन्त्यष्टितः । सूक्ष्मी करोति वाकञ्चित्तयोगयुग्मं स बादरम् ॥१११२॥
जिनकी चेष्टा अचिन्त्य है, ऐसे केवली भगवान् उस समय बादर कस्य योग में स्थिति करके, बादर वचनयोग और बादर मनोयोग को सूक्ष्म करते हैं ।
काय योगे ततस्त्यक्त्वा स्थितिमासाद्य तदये। स सूक्ष्मी कुरुते पश्चात् काय योग , बादरम् ।।१११३॥
पुनः वे भगवान् काययोग को छोड़कर, वचनयोग और मनोयोग में स्थिति करके, बादर काययोग को सूक्ष्म करते हैं ।
काय योगे ततः सूक्ष्मे स्थिति कृत्वा पुनः क्षणात् । योग द्वयं निगलाति सद्यो वाश्यित्तसंज्ञकम् ॥१११४॥
तत्पश्चात् सूक्ष्म काययोग में स्थिति करके, क्षणमात्र में उसी समय वचनयोग और मनोयोग दोनों का निग्रह करते हैं।
सूक्ष्म क्रियं सतो ध्यान से साक्षात् ध्यातुमर्हति । सूक्ष्मैककाय योगस्थ स्मृतीयं यद्धि पठ्यते ।।१११५॥
तब यह सूक्ष्मक्रिया ध्यान को साक्षात् ध्यान करने योग्य होता है; और वह वहां पर सूक्ष्म एक काययोग में स्थित हुया उसका ध्यान करता है । यही तृतीय सुक्ष्मक्रियाऽप्रतिपाति ध्यान है।...
द्वासप्तति बिलीयन्ते कर्म प्रकृतयो द्रुतम् ।. .. उपास्ये देवदेवस्य मुक्ति श्री प्रतिबन्धकाः ॥१११६॥ तदनन्तर प्रयोग गुणस्थान के उपान्त्य अर्थात् अन्त समय के पहले समय में
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४४e
afra के मुक्तिरूपी लक्ष्मी की प्रतिबन्धक कर्मों की बहत्तर प्रकृति शीघ्र ही नष्ट होती हैं ।
तस्मिव क्ष साक्षादाविर्भवति निर्मलम् ।
समुच्छिन्न क्रियं ध्यानमयोग परमेष्ठिनः ॥ १११७॥
भगवान् योगी परमेष्ठी के उसी प्रयोग गुणस्थान के उपान्त्य समय में साक्षात् निर्मल ऐसा समुच्छिन्नक्रिया नामक चौथा शुक्लध्यान प्रकट होता है । विलयं वीतरागस्य पुनर्यान्ति त्रयोदश ।
श्रमं समये सद्यः पर्यन्ते या व्यवस्थिताः ।। १११८ ।।
तत्पश्चात् वीतराग प्रयोगी केवली के प्रयोग गुणस्थान के अन्त समय में शेष रही हुई तेरह कर्म प्रकृति जो कि अब तक लगी हुई थीं, तत्काल ही विलय हो जाती हैं ।
तदासौ निर्मलः शान्तो निष्कलङ्को निरामयः । जम्मआने agar arearer विच्युतः ॥ १११९॥ सिद्धात्मा सुप्रसिद्धात्मा निष्पन्नात्मा निरञ्जनः । frfoयो निष्कलः शुद्धो निर्देवकहवोऽति निर्मलः ॥ ११२०॥ ग्राविर्भूतयथास्यात चररणोऽनन्त वीर्यवान् । परां शुद्धि परिप्राप्तो हर्बोधस्य वात्मनः ॥११२१॥ . योगी व्यक्त योगत्वात्केवलोत्पाद निर्वृत्तः । साधितात्मस्वभावश्च परमेष्ठी परं प्रभुः ॥ ११२२ ॥ लघुपञ्चाक्षरोवारकालं स्थित्वा ततः परम्
स स्वभावाहजत्यूर्ध्वं शुद्धात्मा वीतबन्धनः ।।११२३॥
उस योग केवल वह गुणस्थान में केवली भगवान् निर्मल, शान्त, निष्कलङ्क निरामय और जन्म-मरण रूप संसार के अनेक दुर्निवार बन्ध के कष्टों से रहित हैं; इनका आत्मा सिद्ध, सुप्रसिद्ध और निष्पन्न हैं, तथा ये कर्म-मल रहित निरञ्जन हैं, क्रिया रहित हैं, शरीर रहित हैं, शुद्ध हैं, निर्विकल्प हैं और अत्यन्त निर्मल है; इनके यथाख्यात चारित्र प्रकट होता है प्रर्थात् चारित्र की पूर्णता हुई है; और अनन्त वीर्य सहित हैं अर्थात् अपने स्वरूप से कभी च्युत नहीं होते और ग्राम के दर्शन ज्ञान की उत्कृष्ट शुद्धता को प्राप्त हुए
हैं
तथा ये मन-वचन-काय के
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४५० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
योगों से रहित हैं इसलिये प्रयोगी हैं, अत्यन्त निवृत्त हैं इसलिये केवल हैं; इन्होंने अपना आत्मा सिद्ध कर लिया है, इसलिए साधितात्मा हैं, तथा स्वभाव स्वरूप हैं, परमेष्ठी हैं और उत्कृष्ट प्रभु हैं; उस चौदहवें गुणस्थान में इतने समय तक रहते हैं कि जितने समय में लघु- पांच अक्षर का उच्चारण हो और फिर कर्म बन्धन से रहित वे शुद्धात्मा स्वभाव से ही ऊर्ध्वगमन करते हैं।
( ज्ञानार्णव, श्र० शुभचन्द्रस्वामी) सिद्ध भगवान *
अवरोध विनिर्मुक्त लोकाग्रं समये प्रभुः ।
धर्माभावे ततोsप्यूर्ध्वगमनं नानुमीयते ।। ११२४॥
पश्चात् वे भगवान् उर्ध्व गमन कर एक समय में ही कर्म के अवरोध रहित लोक के अग्रभाग विषे विराजमान होते हैं । लोकाग्र भाग से श्रागे धर्मस्तिकाय का अभाव है, इसलिये इनका यागे गमन नहीं होता। यही अनुमान द्वारा दिखलाते हैं । धर्मो गतिस्वभावोऽयमधर्मः स्थिति लक्षणः ।
तयोर्योगात्पदार्थानां मतिस्थिती उदाहृते ॥११२५॥
जो गति स्वभाव हैं अर्थात् गमन करने में हेतु है, सो धर्मास्तिकाय है और जो स्थिति लक्षण रूप है ग्रंर्थात् पदार्थों की स्थिति में कारण है, सो प्रर्मास्तिकाय है; इन दोनों के निमित्त से पदार्थों की गति और स्थिति कही गई है।
तौ लोकगमनान्तस्थौ ततो लोके गतिस्थिती |
ari न तु लोकान्त मतिक्रम्यं प्रवर्तसे ।।११२६ ॥
a धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय लोक के गमन पर्यन्त स्थित हैं, इसलिये पदार्थों की गति और स्थिति लोक में ही होती है; लोक का उल्लंघन करके नहीं
होती, इसलिये भगवान् लोकाग्रभाग तक ही गमन करते हैं ।
स्थिति मसाध सिद्धात्मा तत्र लोकाग्र मन्दिरे ।
प्रास्ते स्वभाव जानन्त गुणैश्वर्योपलक्षितः ॥ ११२७॥
सिद्धात्मा उस लोकाग्रमन्दिर में स्थिति पाकर, स्वभाव से उत्पन्न हुए अनन्व
गुल और ऐश्वर्य सहित विराजमान रहते हैं।
trafai fretatघ मत्यक्षं स्व स्वभावजम् ।
यत्सुखं देव वेवस्य तद्वय केन पार्यते ॥ ११२८।।
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४५१
सिद्धात्मा देवाधिदेव का जो अत्यन्त बाधा रहित, अतीन्द्रिय और अपने स्वभाव से ही उत्पन्न सुख है, उसका वर्णन कौन कर सकता है ? तथाप्युद्दशतः किञ्चन् श्रीवोभि सुख लक्षणम् ।
निष्ठतार्थस्य सिद्धस्य सर्वद्वन्द्वाति वत्तिनः ।।११२६॥ श्राचार्य कहते हैं कि जिसके समय
हो चुके हैं और सुख के घातक ऐसे समस्त द्वन्द्रों से जो रहित है ऐसे सिद्ध भगवान के सुख को यद्यपि कोई नहीं कह सकता तथापि मैं नाममात्र से किञ्चित कहता हूँ ।
ये देवमनुजाः सर्वे सौख्यनाक्षार्थ सम्भवम् ।
निविशन्ति निराबाधं सर्वाक्षत्र नक्षमम् ॥ ११३०॥
सर्वेण कालेन यन्त्र भुक्तं महद्धिकम् ।
भाविनो यच भोक्ष्यन्ति स्वादिष्ठं स्वान्तरञ्जकम् ||११३१|| अनन्तगुणितं तस्मादत्यक्षं स्वस्वभावजम् ।
एकस्मिन् समये भुङ्क्ते तत्सुखं परमेश्वरः ॥ ११३२॥
जो समस्त देव और मनुष्य इन्द्रियों के विषयों से उत्पन्न और इन्द्रियों तृप्त करने में समर्थं ऐसे निराबाध सुख को वर्तमान काल में भोगते हैं तथा सबने अतीत काल में जो सुख भोगे हैं और जो सुख महाऋद्धियों से उत्पन्न हुए हैं तथा स्वादिष्ट और मन को प्रसन्न करने वाले जो सुख प्रागामी काल में भोगे जायेंगे उन समस्त सुखों से अनन्त गुणे प्रतीन्द्रिय और अपने बचाव से उत्पन्न होने वाले सुख को श्री सिद्ध भगवान् परमेश्वर एक ही समय में भोगते हैं । .
free front शेष द्रव्य पर्याय सङ्कलम् ।
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जनस्फुरति बोधार्के युगपद्योगिनां पतेः ॥ ११३३॥
योगीश्वरों के पति श्री सिद्ध भगवान के ज्ञान रूपी सूर्य में भूत, भविष्यत्, वर्तमान तीनों काल सम्बन्धी समस्त द्रव्य पर्यायों से व्याप्त हैं जो यह जगत् है सो एक ही समय में स्पष्ट प्रत्यक्ष प्रतिभासित होता है ।
भावार्थ- इन्द्रिय ज्ञान तुच्छ है, उससे उत्पन्न हुआ सुख कितना हो सकता है; सिद्ध भगवान के एक ही समय में समस्त पदार्थों का ज्ञान होता है; इसलिये उनके सुख की क्या महिमा ? सुख का कारण ज्ञान है; जहाँ पूर्ण ज्ञान है, वहाँ पूर्ण सुख भी है।
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४५२ ]
[ मो. प्र. चिन्तामणि सर्वतोऽन्समाकाश लोकेतर विकल्पितम् । तस्मिन्नपि घनीभूय यस्य ज्ञान व्यवस्थितम् ॥११३४॥
यह आकाश सर्वतः अनन्त है और उसके लोक और अलोक ऐसे दो भेद हैं; उस समस्त श्राकाश में सिद्ध परमेष्ठी का ज्ञान धनीभूत हो कर भरा हुआ है।
निद्रा तन्द्रा भय भ्रान्ति राग धात्ति संशयः। शोक मोह जरा जन्म मरणाचं श्च विच्युतः ।।११३५॥
श्री सिद्ध भगवान् निद्रा, तन्द्रा, भय, भ्रान्ति, राग, द्वेष पीड़ा और संशय से रहित हैं तथा शोक, मोह, जरा, जन्म और मरण इत्यादिक से रहित हैं।
क्षुत्तटु श्रममदोन्माद मूर्छा मात्सर्य वजिसः । वृद्धि ह्रास व्यतीतास्मा कल्पनातीत वैभवः ॥११३६॥
और क्षुधा, तृषा, खेद, मद, उन्माद, मूर्छा और मत्सर भावों सेरहित हैं और न इनकी प्रात्मा में वृद्धि हास (घटना-बढ़ना) है और इनका विभव कल्पनातीत है ।
निष्कलः करणातीतो निर्विकल्पो निरञ्जनः । अनन्त बोर्यतापन्नो नित्यानन्दाभिनन्वितः ।।११३७॥
सिद्ध भगवान् शरीर रहित हैं, इन्द्रिय रहित हैं, मन के विकल्पों से रहित हैं, निरञ्जन हैं अर्थात् जिनके नये कर्मों का बंध नहीं है; अनन्त वीर्यता तो प्राप्त हुए हैं अर्थात् अपने स्वभाव से कभी च्युत नहीं होते और नित्य प्रानन्द से प्रानन्दरूप हैं अर्थात् जिनके सुख का कभी विच्छेद नहीं होता।
परमेष्ठी परं ज्योतिः परिपूर्ण: सनातनः । संसारसागरोत्तीर्णः कृत कृत्योऽचल स्थितिः ॥११३८।।
तथा परमेष्ठी (परम पद में विराजमान), परं ज्योतिः (जान प्रकाश रूप) परिपूर्ण सनातन (नित्य), संसार रूपी समुद्र से उत्तीर्ण अर्थात् संसार सम्बन्धी चेष्टाओं से रहित, कृत कृत्य (जिनको करना कुछ शेष नहीं है), अचलस्थिति (प्रदेशों की क्रियाओं से रहित) ऐसे सिद्ध भगवान हैं।
संतृत्तः सर्वदेवास्ते देवस्त्रोलोक्यमूर्दनि । नोपमेयं मुखादीनां विक्षते परमेष्ठिनः ॥११३६।।
पुनः सिद्ध भगवान् संतृप्त है, तृष्णा रहित हैं, तीन लोक के शिखर पर सदा विराजमान हैं अर्थात् गमन रहित हैं, इस संसार में कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है,
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४५३
जिसकी उपमा परमेष्ठी के सुख को दी जाय; श्रर्थात् उनका सुख निरुपमेय हैं । चरस्थिरार्थ सम्पूर्ण मृगमा जगत्रये ।
उपमानोपमेयत्व मन्ये स्वस्यैव स स्वयम् ॥ ११४० ॥
आचार्य कहते हैं कि यदि चर और स्थिर पदार्थों से भरे हुए इन तीनों जगतों में उपमेय और उपमान ढूंढा जाय तो मैं ऐसा मानता हूँ कि वे स्वयं ही उपभान उपमेय रूप हैं । भावार्थ सिद्ध भगवान् का उपमान सिद्ध ही है और किसी के साथ उसकी उपमा नहीं दी जा सकती ।
यतोऽनन्त गुणानां स्यादनन्तां शोपि कस्यचित् ।
ततो न शक्यते कतु तेन साम्यं जगत्रये ॥११४१ ॥
क्योंकि तीनों जगत में उन सिद्ध परमेष्ठी के अनन्त गुणों का अनन्तवां ग्रंश भी किसी पदार्थ में नहीं है, इसलिये उनकी समानता किसी के साथ नहीं कर सकते । भावार्थ - इसलिये उनका उपमान उपमेय भाव अपना अपने ही साथ है । शक्यते न यथा ज्ञातुं पर्यन्तं व्योम कालयोः ।
तथा स्वभाव जातानां गुणानां परमेष्ठिनः ।। ११४२ ।।
जैसे कोई आकाश और काल का श्रन्त नहीं जान सकता, उसी तरह स्वभाव
से उत्पन्न हुए परमेष्ठी के गुणों का अन्त भी कोई नहीं जान सकता । गगनघन पतङ्गाहोन्द्र चन्द्रा चलेन्द्र, क्षिति दहन समीराम्भोधिकल्पद्र मारणाम् । freeमपि समस्तं निन्त्यमानं गुरणानां
परम्
regentinपमानत्वमेति ।।११४३ ॥
श्राकाश, मेघ, सूर्य, सर्पो का इन्द्र, चन्द्रमा, मेरु, पृथ्वी, अग्नि, वायु, समुद्र और कल्पवृक्षों के गुणों का समस्त समूह भी चिन्तवन किया जाय तो भी उनकी उपमा परम गुरु श्री सिद्ध परमेष्ठी के साथ नहीं हो सकती । भावार्थ-संसार में उत्तमोतम पदार्थों के गुण विचार करने से भी ऐसा कोई पदार्थ नहीं दिखता जिसके गुणों की उपमा सिद्ध परमेष्ठी के गुणों के साथ दी जाय । नासत्पूर्वाश्च पूर्वा मो निर्विशेष विकारजा: ।
स्वाभाविक विशेषा हाभूत पूर्वाश्व तद्गुणाः ।।११४४।।
सिद्ध परमेष्ठी के गुण पूर्व में नहीं थे, ऐसे नहीं हैं अर्थात् पूर्व में भी शक्ति
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[ गो. प्र. चिन्तामणि रूप से विद्यमान ही थे, क्योंकि असत् का प्रादुर्भाव नहीं होता यह नियम है; यदि असत् का भी प्रादुर्भाव माना जाय तो शशशृग का भी प्रादुर्भाव होना चाहिये, किंतु होता नहीं है; यही इस नियम में प्रमाण है और पूर्व में व्यक्त नहीं थे तथा विशेष विकार से उत्पन्न नहीं, किन्तु स्वभाविक हैं (इस प्रकार पूर्वार्द्ध द्वारा निषेध मुख कथन करके, इस विषय को पुनः उत्तरार्द्ध द्वारा विधि मुख वाक्य से कहते हैं कि सिद्ध परमेष्ठि के गुण स्वाभाविक विशेष अर्थात् पूर्व में भी शक्ति की अपेक्षा स्वभाव में ही विद्यमान और अभूतपूर्व अर्थात् पूर्व में व्यक्त नहीं हुए ऐसे हैं । भावार्थ-प्रात्मा के जो स्वाभाविक गुण हैं, पूर्वावस्था में अव्यक्त रहते हैं, वे ही सिद्धावस्था में व्यक्त हो जाते हैं; और पूर्व में व्यक्त नहीं थे, इससे पूर्व में थे' ऐसा भी नहीं कह सकते; और स्वाभाविक होने के कारण उनको विकारज भी नहीं सकते, किंतु वे शक्ति (मुख) की अपेक्षा स्वाभाविक और व्यक्ति की अपेक्षा अभूतपूर्व ही कहे जाते हैं।
वाक्पथातीत महात्म्य मनन्त ज्ञान वैभवम् । सिद्धात्मना गुणग्रामं सर्वज्ञ ज्ञानं गोचरम् ॥११४५।।
जिसका महात्म्य वचनों से कहने योग्य नहीं है और जिसके अनन्त ज्ञान का विभव है, ऐसे सिद्ध परमेष्ठी के गुणों का समूह सर्वज्ञ के ज्ञान के गोचर है ।
स स्वयं यदि सर्वशः सम्यग् ते समाहितः। तथाप्येति न पर्यन्तं गुणानां परमेष्ठिनः ॥११४६।।
सर्वज्ञदेव परमेष्ठी के मुरणों को जानते हैं, परन्तु यदि वे उन गुरणों को समाधान सहित अच्छी तरह कहें तो वे भी उनका पार पा नहीं सकेंगे।
भावार्थ---बचन की संख्या अल्प है और गुरण अनन्त हैं, इसलिये वे वचनों से नहीं कहे जा सकते ।
त्रैलोक्य तिलकोभूतं निःशेष विषयच्युतम् । निर्द्वन्दं नित्यमत्यक्षं स्वादिष्टं स्वस्वभावजम् ।।११४७॥ निरौपम्यमविच्छिन्नं स देवः परमेश्वरः । तयास्ते स्थिरीभूतः पिबन् ज्ञान सुखामृतम् ।।११४०।।
श्री सिद्ध परमेष्ठी परमेश्वर देव समस्त त्रैलोक्य का तिलक स्वरूप, समस्त विषयों से रहित, निर्द्वन्द अर्थात् प्रतिपक्षी रहित, अविनाशी, अतीन्द्रिय, स्वादस्वरूप, अपमे स्वभाव से ही उत्पन्न, उपमा रहित और विच्छेद रहित ज्ञान और सुख रूपी
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४५५ अमृत को पीते हुए स्थिरीभूत तीन लोक के शिखर पर विराजमान रहते हैं ।
देवः सोऽनन्तवीर्यो दृगवगम सुखानध्यरत्नावकीर्णः, श्री मात्रैलोक्यचिन प्रतिवसति भवध्वान्तविध्वंस भानुः । स्थात्मोत्थानन्त नित्य प्रवर शिव सुधाम्भोधिमग्नः स देवः, सिद्धात्मा निर्विकल्पोऽप्रतिहत महिमा शश्ववानन्दधामा ।।११४६।।
जिनके अनन्त वीर्य हैं, अर्थात् प्राप्त स्वभाव से कभी व्युत नहीं होते, जो दर्शनज्ञान और सुख रूप अमूल्य रत्नों सहित हैं, जो संसार रूप अन्धकार को दूर कर सूर्य के समान विराजमान है, जो अपने आत्मा से ही उत्पन्न ऐसे अनन्त नित्य उत्कृष्ट शिवसुख रूपी अमृत के समुद्र में सदा मग्न हैं, विकल्प रहित हैं, जिनकी महिमा अप्रतिहत (जो किसी से पाहत न होवे) है और जो निरन्तर प्रानन्द के निवास स्थान हैं, ऐसे श्री सिद्ध परमेष्ठी देव शोभायमान जो तीनों लोकों का मस्तक (शिखर) हैं, उसमें सदा निवास करते हैं।
इति कतिपय वर वर्णेनिफलं कोतितं समासेन । निःशेषं यदि वक्तुं प्रभवति देवः स्वयं वीरः ।।११५०॥
ऐसे पूर्वोक्त प्रकार कितने ही श्रेष्ठ अक्षरों के द्वारा संक्षेप से ध्यान का फल कहा है। इसका समस्त फल कहने को स्वयं श्री वर्धमान स्वामी ही समर्थ हो सकते हैं ।
(प्रा. शुभचन्द्र स्वामी, ज्ञानाच) इस प्रकार के ध्यानों को करके जीव अगर चरमशरीरी है तो मोक्षपद प्राप्त कर लेता है और चरमशरीरी नहीं है, तो देवत्व, कल्पवासी देवादिक में उत्पन्न होकर फिर मनुष्य पर्याय पाकर मोक्ष जाता है ।
पा जाता हर योगी चार माराधना की सिद्धि कैसे करें?
संस्कारातिशयः प्रसन्न हृदयस्त्यागौ क्षमी प्रोद्यमी, प्रध्यक्त स्व पर स्थितिः शुभवचोरत्नावली राजिसः । शूरः शील परी गुरपस्थिर रुचिर्मव्योऽभिमानी परं, साध्वीं साधयति स्वभाव सुभपामाराधना नायिकाम् ॥११५.१॥ .
उत्तम संस्कार बाला, प्रसन्न हृदय वाला, समस्त परिग्रह का त्यागी, क्षमावान, प्रात्मपुरुषार्थी, प्रत्यक्त है, स्व पर स्थिति जिसकी, शुभ वचन बोलने वाला, सम्यग्दर्शनादि रत्नों से शोभित, शूरवीर, शीलवान्, गुरणों में स्थिर रुचि रखने वाला, भव्य,..
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४५६
[ गो. प्र. चिन्तामणि स्वाभिमानी मानस ही केवल स्वभाव से मान्य प्रशंसनीय सिद्धि की प्राप्त कराने वाली आराधना को साधता है।
शेषेऽल्ये निज जीवने जन हितं देशं महीशान्यितं, माना जनजनास्पदं सुख पदं सत्संगिनां योगिनाम् । संप्राप्यात्म मनोगतं बहुमत सम्यधिवेध स्थितः, सूरिभ्यः सकलैश्च तः सुविधिसः संघान्वितैः स्वीकृतः ॥११५२१
मेरी प्रायु अल्प है, ऐसा जानकर यतिराज जनता का हित करने वाले राजा से शोभित, नाना जन लोगों से भरे हुये, सत्पुरुष योगिजनों के रहने का स्थान ऐसे देश में जाकर बहुजनों के द्वारा माननीय अपने मनोगत विचारों को प्राचार्य के समक्ष भली प्रकार से निवेदन करता है । तदनन्तर सकल संघ के द्वारा स्वीकृत किया जाता है।
प्राचार्यः परिचर्ययाऽऽहिताहितः सत्यून पंचाशता, द्वाभ्यां वातिजघन्यतः परिवृतः प्रीत्योत्तमार्थाय॑तः । पालोच्याऽस्मकृतं कृती त्रिकरणशेष विशुद्धाशयः, श्रृत्वातः प्रवरं प्रतिकरणमध्यारा सत्संस्तरम् ।।११५३।। प्राशोऽसौ फमशोऽशनं. परिहन्नेकैकमास्वायत, त्सम्यग्दशितमिष्ट मिष्ट मसकृकांक्षाक्षयार्थ बुधः । हित्वाऽतस्त्रिविधाशनं धृतिकरं कि स्तोकमेतन्मया, भुक्तात्पूर्वमनेकमेरुमहतो मे तृप्तिकस्येत्यतः ॥११५४ त्यक्त्वाऽतः कुशलः क्रमेण विविधं धीरः समाध्याप्तये, पान सिक्थयुतं विलेपि सरसं निःस्नेह मच्छं पयः । कि तृप्ति वतीयतो भवभवे पोलादजातेत्यतो, नानानीरिधि नोरतोऽतिमहतो मे कर्मधर्मासिनः ॥११५५।। ज्ञाताऽऽस्वाद समस्त वस्तु भिरलं याहयरसारैः परं, जैनेन्द्र वचनामृतं जननमृत्यातक नाशोति तत् । धृत्वा पंचगुरुन्मनस्य विचलं तन्मन्त्रमुच्चाश्यन्, धम्य शुक्लमपि प्रकृष्ट फलदं ध्यायंस्तनु व्युत्सृजेत् ।।११५६।।
उत्कृष्ट अड़तालीस और जघन्य दो आचार्य (साधु) जिसकी प्रीति से परिचर्या करते हैं तथा विशुद्ध प्राशक्वाला क्षपक पुण्यात्मक उत्तमार्थ के लिये अपने
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अध्याय : पांचवां }
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दोषों को मन दचन काय से पालोचना करे तथा उत्तमार्थ प्रतिक्रमण सुन कर समीचीन संस्तर पर प्रारूढ हो, अर्थात् सल्लेखना धारण करे । तदनन्तर पाहार की कांक्षा को क्षय करने के लिये बुद्धिमान प्राचार्य के द्वारा बार-बार दिखाये गये इष्ट और स्वाद युक्त आहार का एक-एक प्रास्वादन करके प्रशन का त्याग करे । तदनन्तर अहो मैंने पूर्व में बहुत पदार्थों का भरण किया है, अब तक उनसे तप्ति नहीं हुई तो इस स्तोक पदार्थों से क्या तृप्ति हो सकती है, कदापि नहीं, ऐसा विचार कर क्षपक खाद्य और लेह्य इन पदार्थों का त्याग कर देता है । तदन्तर कर्म रूपी ताप से दुःखी मेरी प्यास समुद्रों के पानी पीने से शांत नहीं हुई तो क्या ? इस अल्प पेय से मेरी तृप्ति हो सकती है? कदापि नहीं हो सकती, ऐसा विचार कर क्रमश: दूध, छाछ, स्वच्छ पानी का भी.त्याग करता है । जिसने वस्तु का स्वरूप मान लिया है, अनादि काल से अनुभूत दृष्ट, श्रुत बाह्य वस्तुओं से क्या प्रयोजन हैं ? बाद्य पदार्थों का संयोग ही दुःख दायक है, इस प्रकार की भावनामों से पवित्रात्मा, क्षपक, जन्म, जरा, मृत्यु के नाशक जैनेन्द्र भगवान के वचनरूपी अमृत का पानकर और पंच परमेष्ठी को अविचल रूप से मन में धारण करता हुआ तथा पंचपरमेष्ठी याचक मन्त्र को बचन से उच्चारण करता हुना उत्तम स्वर्म और मोक्ष फल को देने वाले धर्मध्यान और शुक्लध्यान में लीन होता हुआ शरीर को छोड़े।
देवस्तिर्यग चेतनश्च भनुजः प्राप्तोप सर्गस्तदा . ध्यक्त्वाऽऽहार शरीर संगमखिलं बाधाऽविरामावधि । सावा सकलं च निर्मल मना ध्याने प्रशस्ते स्थित, स्तिष्ठत्वं च गुरुमभिमत फल प्राप्त्यभ्यु पायानपि ॥११५७।।
देवकृत, तिर्यंचकृत, मानवकृत और अचेतन कृत उपसर्म के आ जाने पर, जब तक उपसर्ग दूर न हो तब तक अखिल आहार, परिग्रह और सकल सावध का त्याग करके योगीगरण अभिमत फल के प्राप्ति के कारणभूत पंच परमेष्ठी का निर्मल चित से चितवन करते हुये धर्मध्यान और शुक्ल ध्यान में स्थिर होवे ।।
इंगिन्यां चान्य संपादितहित विरतौ वरिणतोयोऽत्र भक्त, प्रत्याख्याने कमोऽसौ मिरलिशयमृतौ स्वोपकार प्रवृतौ।.. जेयः प्रायोपगत्यां स्वपरहित कृत्त्यतयांच्छाप्रवृती : ताभिः सप्लाष्ट जन्म स्वपमतदुरितां मोक्षलक्ष्मी लभन्ते ॥११५८।।
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४५८ ]
। गो. प्र. चिन्तामणि जब यह ज्ञान हो जाय कि अब मेरा जीवन अल्प है, तब क्रम से अन्न का त्याग, दूध आदि स्निग्ध पदार्थों का त्याग, तदनन्तर समस्त पाहार का त्याग किया जाता है । शरीर की वैय्यावृत्ति का त्याग नहीं किया जाता है, वह भक्त प्रत्याख्यान मरण है । उसका उत्कृष्ट काल बारह वर्ष है, जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है । और जिसमें श्राहार पानी के त्याग के साथ अपने शरीर की बैश्यावृत्ति भी दूसरों से नहीं कराता है, वह इंगिनी मरण है । जिस संन्यास में अपने शरीर की बैय्यावृत्ति दूसरे से भी नहीं कराता है और अपने हाथों से भी नहीं करता है, केवल ध्यान में मग्न रहता है, उसको प्रायोपगमन प्रत्याख्यान कहते हैं । आहार पानी के त्याग की विधि तीनों में समान है, इन तीनों प्रकार के संन्यासपूर्वक मरण करने वाला यतिराज सात आठ भव में निश्चय से मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है।
दीक्षामावाय शिक्षामथ गणधरता रक्षणार्थ गणस्य, संस्कार स्वस्य भावः शमदमविभवयोऽत्र संल्लेखना च । कोधादीनां विधाय प्रथितपथुयशाः साधयेवुत्तमाथ, सः स्यात्सद्भव्य सस्योत्पल निकर मुदं मेधचन्द्रो मुनीन्द्रः ॥११५६॥
प्रथम दीक्षा शिक्षा और गरम की रक्षा के लिये प्राचार्य पद को धारण करके विख्यात यश का धारी मुनिराज तदनन्तर अपने समता इन्द्रिय मन आदि विभवों के द्वारा क्रोधादि कषायों के संस्कार को कृश कर करके उत्तमार्थ को सिद्ध करते हैं। वह मुनि भव्य जोवरूपी धान्य के लिए मेघ और भव्य कमलों के लिए चन्द्रमा के समान होते हैं। आराधना का विशेष स्वरूप भगवती आराधना से जानना ।
(वीरमन्दीस्वामी, प्राचारसार) पुलाक, बकुश, कुशील, निग्रन्थ, स्नातक, इन पांच प्रकार के मुनियों का स्वरूप
पुलाक बकुश कुशील निर्ग्रन्थ स्नातकाः निर्ग्रन्थाः ।
पुलाक-जो उत्तर गुरणों की भावना से रहित हो और जिनके मलमणों में भी कभी-कभी दोष लग जाते हों, उन्हें पुलाक कहते हैं। पुलाक का अर्थ है, मल...
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Hindemon
अध्याय : पांचवां ]
{ ४५६ सहित तण्डूल । पुलाक के समान कुछ दोष सहित होने से मुनियों को पुलाक कहते हैं।
बकुश---जो मुलगुरगों का निदोष पालन करते हों, लेकिन शरीर और उपकरणों से शोभा बढ़ाने की इच्छा रखते हैं । और परिवार में मोह रखते हैं, उनको बकुश कहते हैं । बकुश का अर्थ हैं, शवल (चितकबरा) ।
कुशील–के दो भेद हैं - प्रतिसेवना कुशील और कषाय कुशील । जो उपकरण तथा शरीर अदि से पूर्ण विरक्त न हो तथा जो मूल और उत्तर गुणों का निर्दोष पालन करते हैं, लेकिन जिनके उत्तर गुणों की कभी-कभी विराधना हो जाती हो, उनको प्रतिसेवना कुशील कहते हैं ।
कषाय कुशाल--- अन्ध कषायों को जोत लेने के कारण केवल संज्वलन कवाय का ही उदय हो, उनको कषाय कुशील कहते हैं ।
निर्गन्य-जिस प्रकार जल में लकड़ी की रेखा अप्रकट रहती है। उसी प्रकार जिनके कर्मों का उदय अप्रकट हो और जिनको अन्तमुहूर्त में केवल झान उत्पन्न होने वाला हो, उनको निम्रन्थ कहते हैं ।
स्नातक-घातिया कर्मों का नाश करने वाले केवली भगवान् को स्नातक कहते हैं।
यद्यपि चारित्र के तारतम्य के कारण इनमें भेद पाया जाता है, लेकिन लेगम आदि नय की अपेक्षा से इन पांचों प्रकार के साधुओं को निर्ग्रन्थ कहते हैं । पुलाक आदि मुनियों में विशेषता__ संयम श्रत प्रतिसेवना तीर्थ लिङ्ग लेश्योपपाद स्थान विकल्पतः साध्याः।
संयम, श्रुत, प्रतिसेवना, तीर्थ, लिङ्ग, लेश्या, उपपाद और स्थान इन आठ अनुयोगों के द्वारा पुलाक आदि मुनियों में परस्पर विशेषता पाई जाती है ।
पलाक, बकुश और प्रतिसेवना कुशील इन मुनियों के सामायिक और छेदोपस्थापना चारित्र होते हैं ।
कषाय कुशील के यथाख्यात चारित्र को छोड़कर अन्य चार चारित्र, होते हैं । निर्ग्रन्थ और स्नातक के यथाख्यात चारित्र होता है। उत्कृष्ट से पुलाक, बकुश और प्रतिसेवना कुशील मुनि अभिन्नाक्षर दश पूर्व
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४६० ]
[ मो. प्र. चिन्तामरिण
के ज्ञाता होते हैं ।
श्रभिन्नाक्षर का अर्थ - जो एक भी अक्षर से न्यून न हो । अर्थात् उक्त मुनि दश पूर्व के पूर्ण ज्ञाता होते हैं । कषाय कुशील और निर्ग्रन्थ चौदह पूर्व के ज्ञाता होते हैं । जघन्य से पुलाक प्रचार शास्त्र का निरूपण करते हैं । बकुश, कुशील और निर्ग्रन्थ आठ प्रवचन मातृकाओं का निरूपण करते हैं। पाँच समिति और तीन गुप्तियों को ग्राठ प्रवचन मातृका कहते हैं । स्नातकों के केवलज्ञान होता है, श्रुत नहीं होता ।
व्रतों में दोष लगने को प्रतिसेवना कहते हैं । पुलाक के पाँच महाव्रतों और रात्रि भोजन त्याग व्रत में विराधना होती है। दूसरे के उपरोध से किसी एक व्रत की प्रतिसेवना होती है । अर्थात् वह एक व्रत का त्याग कर देता है |
प्रश्न – रात्रि भोजन त्याग में विराधना कैसे होती है ? उत्तर---इसके द्वारा श्रावक आदि का उपकार होगा ऐसा विचार कर लाक मुनि विद्यार्थी प्रादि को रात्रि में भोजन कराकर, रात्रि भोजन त्याग व्रत का . विराधक होता है ।
बकुश के दो भेद - उपकरण बकुश और शरीर बकुश ।
उपकरण बकुश नाना प्रकार के संस्कार युक्त उपकरणों को चाहता है । शरीर बकुश अपने शरीर में तेल मर्दन यादि संस्कारों को करता है, वही दोनों की प्रतिसेवना है। प्रतिसेवना कुशील मूलगुणों की विराधना नहीं करता है । किन्तु उत्तर गुणों की विराधना कभी करता है, इसकी यही प्रतिसेवना है ।
. कषाय कुशील, निर्ग्रन्थ और स्नातक के प्रतिसेवना नहीं होती है। ये पांचों प्रकार के मुनि, सब तीर्थकरों के समय में होते हैं ।
लिङ्ग के दो भेद हैं- द्रव्य लिङ्ग और भाव लिङ्ग
पांचों प्रकार के मुनियों में भाव लिङ्ग समान रूप से पाया जाता है । द्रव्य लिङ्ग की अपेक्षा उनमें निम्न प्रकार से भेद पाया जाता है
कम्बल आदि वस्त्रों को ग्रहण कर और न फट जाने पर सीते हैं, तथा कुछ शरीर में विकार उत्पन्न होने से लज्जा के
कोई असमर्थ मुनि शीतकाल आदि में लेते हैं, लेकिन उस वस्त्र को न धोते हैं समय बाद उनको छोड़ देते हैं । कोई मुनि
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अध्याय : पांचवां ]
[ ४६१
कारण वस्त्रों को ग्रहरण कर लेते हैं । इस प्रकार का व्याख्यान भगवती आराधना में अपवाद रूप से बतलाया है । इसी आधार को मानकार कुछ लोग मुनियों में सचलता (वस्त्र पहनना ) मानते हैं। लेकिन ऐसा मानना ठीक नहीं है । कभी किसी मुनि का वस्त्र धारण कर लेना तो केवल अपवाद है, उत्सर्ग मार्ग को अचेलकता ही हैं, श्री वही साक्षात् मोक्ष का कारण होती है । उपकरण कुशील मुनि को अपेक्षा अपवाद मार्ग का व्याख्यान किया गया है, अर्थात् उपकरण कुशील मुनि कदाचित अपवाद मार्ग पर चलते हैं ।
पुलाक के पीत, पद्म और शुक्ल, ये तीन लेश्याएँ होती हैं । बकुश और प्रतिसेवना कुशील के छहों लेश्यायें होती हैं ।
प्रश्न :- बकुश और प्रतिसेवना कुशील के कृष्ण, नील और कापोत ये तीन लेश्याएँ कैसे होती हैं ?
उत्तर :--- पुलाक के उपकरणों में आसक्ति होने से और प्रतिसेवना कुशील' के उत्तर गुणों में विराधना होने के कारण कभी प्रार्त्तध्यान हो सकता है | अतः ध्यान होने से आदि की तीन लेश्याओं का होना भी संभव है। पुलाक
ध्यान का कोई कारण न होने से अन्त की तीन लेश्याएँ ही होती हैं । कषाय कुशील के अन्त की चार लेश्याएँ ही होती हैं । कषाय कुशील के संज्वलन कषाय का उदय होने से कापोत लेश्या होती है । निर्यन्थ और स्नातक के केवल शुक्ल लेश्या ही होती है । प्रयोग केवली के होस्या नहीं होती है ।
उत्कृष्ट से पुल का अठारह सागर की स्थिति वाले सहस्त्रार स्वर्ग के देवों में उत्पाद होता है । बकुश और प्रतिसेवना कुशील का बाईस सागर की स्थिति वाले प्रारण और प्रच्युत स्वर्ग के देवों में उत्पात होता है । कषाय कुशील और निर्व्रन्थों का तैतीस सागर की स्थिति वाले सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के देवों में होता है । स्नातक का उपपाद मोक्ष में होता है ।
स्थान असंख्यात है । पुलाक और वे दोनों एक साथ
होते हैं । छोड़ देता है, पुनः कषाय
ear के निमित्त से होने वाले संयम कषाय कुशील के सर्व जघन्य असंख्यात संयम स्थान 'असंख्यात स्थानों तक जाते हैं, बाद में पुलाक साथ ..कुशील अकेला ही प्रसंख्यात स्थानों तक जाता है
।
इसके बाद कषाय कुशील प्रतिसेवना
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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कुशील और बकुश, एक साथ असंख्यात स्थानों तक जाते हैं, बाद में बकुश साथ छोड़ देता है। और असंख्यात स्थान जाने के बाद प्रतिसेका सुशील भी साथ छोड़ देता है । पुनः असंख्यात स्थान जाने के बाद कषाय कुशील की भी निवृत्ति हो जाती है । इसके बाद निर्ग्रन्थ असंख्यात अकषाय निमित्तक संयम स्थानों तक जाता है, और बाद में उसकी भी निवृत्ति हो जाती है । इसके अनन्तर एक संयम स्थान तक जाने के बाद स्नातक को निर्वाण की प्राप्ति हो जाती है । स्नातक की संयम लब्धि अनन्त गुणी होती है ।
(तत्त्वार्थवृति प्र. ह सूत्र नं. ४७-४८)
ORA
COWNIAMYM WOOVVISSE BØRSTE ___ कषायों से प्राकुलित होकर जीव दुखी हो रहा है ।
क्षयोपशमरूप इन्द्रियों से तो इच्छा पूर्ण होती नहीं है, इसलिए मोह के निमित्त से इन्द्रियों को अपने-अपने विषय ग्रहण की निरन्तर इच्छा होती ही रहती है, उससे पाकुलित होकर दुःखी हो रहा है । ऐसा दुःखी हो रहा है कि किसी एक विषय के ग्रहण के अर्थ अपने मरण को भी नहीं गिनता है। जैसे हाथी को कषट की हथिनी का शरीर स्पर्श करने की, मच्छ को बंशी में लगा हुआ मांस का स्वाद लेने की, भ्रमर को कमल-सुगन्ध सूघने की, पतंगे को दीपक का वर्ण देखने की, और हिरण को राग सुनने की इच्छा ऐसी होती है कि तत्काल मरना भासित हो तथापि मरण को नहीं गिनते । विषयों का ग्रहण करने पर, उसके मरण होता था, विषय सेवन नहीं करने पर इन्द्रियों की पीड़ा अधिक भासित होती है । इन इन्द्रियों की पीड़ा से पीडितरूप सर्व जीव निविचार होकर जैसे कोई दुःखी पर्वत से गिर पड़े वैसे ही विषयों में छलांग लगाते हैं। नाना कष्ट से धन उत्पन्न करते हैं, उसे विषय के अर्थ खोते हैं तथा विषयों के अर्थ जहाँ मरण होना जानते हैं,
वहाँ भी जाते हैं । नरकादि के कारण जो हिंसादिक कार्य है, उन्हें करते हैं, E तथा क्रोधादि कषायों को उत्पन्न करते हैं। Sanaa wana DABODAASAUNAWAAD
DA ANADANAMANDADADADabas
ANAAAAAAAAAAAAADBaada
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अध्याय छठा : शेष गुणस्थानों का वर्णन
प्रश्न :--अप्रमत्त गुणस्थान का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-सज्वलन और नो कषाय के मद उदय से प्रमाद रहित संयम परिणाम को अप्रमत्त विरत गुणस्थान कहते हैं।
प्रश्न :-अप्रमत गुरणस्थान के कितने भेद हैं ? . उत्तर :-दो हैं-~- स्वस्थान अप्रमत्तविरत और सातिशय अप्रमत्तविरत । प्रश्न :-स्वस्थान या निरतिशय अप्रमत्त विरत किसे कहते हैं ?
उसर : --हजारों बार छठे से सातवें में और सातवे से छठे गुणस्थान में आने जाने रूप परिणाम को स्वस्थानअप्रमत्त विरत कहते हैं।
प्रश्न :-- सातिशय या (परस्थान) अप्रमत्त विरत गुरणस्थान का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- जो श्रेणी चढ्ने के सन्मुख होता है, उसे सातिशय अप्रमत्त विरस कहते हैं।
प्रश्न :-श्रेणी चढ़ने का पान कौन होता है ?
उत्तर :-क्षायिक सभ्यग्दृष्टि और द्वितीयोपशम सम्यक् दृष्टि हो श्रेणी चढ़ते हैं । प्रथमोपशम सम्यक्त्व वाला तथा क्षायोपशगिक सम्यकत्व वाला श्रेणी नहीं चढ़ सकता । प्रथमोपशम सम्यकत्व बाला प्रथमोपशम सम्यकत्व को छोड़कर क्षायोपशमिक सम्यक् दृष्टि होकर प्रथम ही अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ का विसंयोजन करके दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृतियों का उपशम करके या तो द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि हो जाय अथवा तोनों प्रकृतियों का .क्षम करके क्षायिक सम्यग्दृष्टि हो जाय, तब श्रेणी चढ़ने का पात्र होता है।
प्रश्न :--श्रेणी किसे कहते हैं ?
उत्तर :-जहाँ चारित्र मोहनीय की शेष रही इक्कीस प्रकृतियों का क्रम से उपशम या क्षय होता है, उसे श्रेणी कहते हैं ।
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४६४ ]
प्रश्न :- श्रेणी के कितने भेद हैं ?
उत्तरः -- दो हैं - एक उपशम श्रेणी और दूसरी क्षपक श्रेणी ।
प्रश्न :- उपशम श्र ेणी किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिसमें चारित्र मोहनीय की २१ प्रकृतियों का उपशम होता है, उसे उपशम श्रेणी कहते हैं ।
[ गो. प्र. चिन्तामणि
प्रश्न :- क्षपक श्र ेणी किसे कहते हैं ? और कौन-कौन जोव इन दोनों लियों को चढ़ते हैं ?
जिसमें चारित्र मोहनीय की २१ प्रकृतियों का क्षय होता है, उसे क्षपक श्रेणी
कहते हैं ।
क्षायिक सम्यग्दृष्टि तो दोनों ही श्रेणी चढ़ते हैं, किंतु द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि उपशम श्रेणी ही चढ़ता है क्षपक श्रेणी नहीं चढ़ता है ।
उपशम श्रेणी के चार गुणस्थान है- आठवां, नवां दशवां, ग्यारहवां श्रौर अपक श्रेणी के भी चार गुणस्थान हैं- ग्राठ, नौ, दश, बारहवां ।
प्रश्न : - श्रधःकरण किसे कहते हैं।
?
उत्तर :- जिस करण में ( परिणाम समूह में ) उपरितन समयवर्ती तथा स्तन समयवर्ती जीवों के परिणाम सदृश तथा विसदृश होते हैं, उसे अधःकरण कहते हैं 1
प्रश्नः - अपूर्वकरण गुणस्थान का पया स्वरूप है ?
उत्तरः--- जहां प्रत्येक समय में प्रपूर्व प्रपूर्व, नवीन नवीन ही परिणाम होते हैं, उसे पूर्वकरण कहते हैं । इसमें सम समयवर्ती जीवों के परिणाम सदृश तथा विसदृश दोनों प्रकार के होते हैं, परन्तु भिन्न समयवर्ती जीवों के परिणाम विसदृश ही होते हैं ।
प्रश्न : --- निवृतिकरण गुरपस्थान का क्या स्वरूप ?
उत्तर :-- जहां समसमयवर्ती जीवों के परिणाम सदृश हों और भिन्न समयवर्ती जीवों के परिणाम विसदृश ही होते हैं, उसे निवृत्तिकरण कहते हैं । ये पूर्व करणादि परिणाम उत्तरोत्तर विशुद्धता को लिये हुए होते हैं तथा संज्वलन चतुष्क उदय की मन्दता में क्रम से प्रकट होते हैं ।
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अध्याय : छठा ]
[ ४६५ प्रश्न :- सूक्ष्मसापराय गुस्सस्थान का क्या स्वरूप है ?
उसर :-- जहां केवल संज्वलन लोभ का सूक्ष्म उदय रह जाता है, उसे सूक्ष्मसाम्पराय कहते हैं। अष्टम मुरास्थान से उपशम श्रेणी और क्षपक श्रेणी ये दो श्रेणियां प्रकट होती हैं। जो चारित्र मोह का उपशम करने के लिये प्रयत्नशील हैं, वे उपशम श्रेणी में प्रारूढ़ होते हैं और जो चारित्र मोह का क्षय करने के लिये प्रयत्नशील हैं, वे क्षपक श्रेणी में आरूढ़ होते हैं। परिणामों की स्थिति के अनुसार उपशम या क्षपक श्रेणी में यह जीव स्वयं प्रारूढ़ हो जाता है, बुद्धिपूर्वक प्रारूढ़ नहीं होता है। क्षात शेती पर शाया मष्टि ही गारद हो सकता है, पर उपशम श्रेणी पर ग्रौपशभिक और क्षायिक दोनों सम्यग्दृष्टि आरूढ़ हो सकते हैं । यहाँ विशेषता इतनी है कि जो औपशमिक सम्यग्दृष्टि उपशम श्रेणी पर आरूढ़ होगा, वह श्रेणी पर आरूढ़ होने के पूर्व अनन्तानुबन्धी को विसंयोजना कर उसे सत्ता से दूर कर द्वितीयोपशमिक सम्यग्दृष्टि हो जावेगा । जो उपशम श्रेणी पर प्रारूढ़ होता है, वह सूक्ष्म साम्पराय मुखस्थान के अन्त तक चारित्र मोह का उपशम कर चुकता है और क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ होता है, वह चारित्र मोह का क्षय कर चुकता है।
प्रश्न :-उपशान्त मोह गुरगस्थान का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :--उपशम श्रेणी वाला जीव दशवें गुरवस्थान में चारित्र मोह का पूर्ण उपशम कर ग्यारहवें उपशान्त मोह गुरणस्थान में आता है। इसका मोहपूर्ण रूप से शान्त हो चुकता है और शरद ऋतु के सरोवर के समान इसकी सुन्दरता होती है। अन्तर्मुहूर्त तक इस गुणस्थान में ठहरने के बाद यह जीव नियम से नीचे गिर जाता है।
प्रश्न :---- क्षोरण मोह गुरणस्थान का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-क्षपक श्रेणी बाला जीव दसवें गुणस्थान में चारित्र मोह का पूर्ण धायकर बारहवें क्षीरगमोह गुरणस्थान में प्राता है यहां इसका मोह बिल्कुल ही क्षीण हो चुकता है और स्फटिक के भाजन में रखे हुए स्वच्छ जल के समान इसकी स्वच्छता होती है।
प्रश्न :--सयोग केवली मुणस्थान का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-बारहवें गुणस्थान के अन्त में शुक्लध्यान के द्वितीय पाद के प्रभाव . से ज्ञानाबरणादि कर्मों का युगपत् क्षयकर जीव तेरहवें गुरणस्थान में प्रवेश करता है। यहां इसे केवलज्ञान प्रकट हो जाता है, इसलिये केवली . कहलाता है और योगों
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४६६ ]
[ गो. प्र चिन्तामणि की प्रवृत्ति जारी रहने से सयोग कहा जाता है। दोनों विशेषताओं को लेकर इसका सयोग केवल नाम प्रचलित है । इस गुणस्थान में जीव को अन्तरंग और बहिरंग लक्ष्मी प्रकट हो जाती है और अन्त कहलाने लगता है । केवलज्ञान उत्पन्न होते ही समवशरण की रचना देवों द्वारा की जाती है ।
अगर सामान्य केवली है तो उनको गंव कुटि की रचना होती है और तीर्थंकर केवली है तो, उनके शरीर की जैसी अवगाहना होती है उसी श्रवगाहना के अनुसार समवसरण की रचना होती है ।
समवशरण का वर्णन
प्रश्न :- अर्हन्त प्रभु का समवशरण कैसा होता है ?
उत्तर:- समवशरण की दिव्य भूमि स्वाभाविक भूमि से एक हाथ ऊँची रहती है और उससे एक हाथ ऊपर कल्पभूमि होती है । यह भूमि अपनी शोभा से स्वर्गे लक्ष्मी को जीतने वालो, चौकोर सुखदायी और देशकाल के अनुसार बारह योजन से लेकर एक योजन तक विस्तार वाली होती है ।
भावार्थ -- समवशरण भूमि का उत्कृष्ट विस्तार बारह योजन और कम से कम विस्तार एक योजन प्रमाण होता है । यह भूमि कमल के श्राकार की होती है। इसमें गंधकुटी तो कणिका के समान ऊँची उठीं होती है और बाह्य भूमि कमल दल के समान विस्तृत है । यह इन्द्र नीलमणि से निर्मित होती है, इसका बाह्य भाग दर्पण तल के समान निर्मल होता है और प्रवेश करने वाले बहुत से जीवों को एक साथ स्थान देने वाली रहती है । जिसमें मान के योग्य इन्द्र श्रादि देव त्रिलोकीनाथ भगवान की दूर से ही पूजा करते हैं वह मानांगण नाम की भूमि है ।
इस भूमि की चारों महादिशाओं में दो-दो को विस्तृत महाविथियां हैं। से विधियां अपने मध्य में स्थित चार मानस्तम्भों के पीठ धारण करती हैं । ये पीठ अपनी ऊँचाई से तिगुने चौड़े एवं स्वर्ण और रत्नमधी मूर्तियों के धारक होते हैं तथा मनुष्य, सुर, असुर सभी आकर इन्हें नमस्कार करते हैं । जहाँ स्थित होकर मनुष्य और देवमानस्तम्भों की पूजा करते हैं वह ग्रास्थानांगणा नाम की भूमि देदीप्यमान लाल मरियों की कान्ति को धारण करती है। ये पीठ अपनी ऊँचाई से तिगुने चौड़े एवं सुवर्ण और रत्नमयी मूर्तियों के धारक होते हैं तथा मनुष्य, सुर, ग्रसुर सभी
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अध्याय : छठा
[ ४६७ आकर इन्हें नमस्कार करते हैं । जहाँ स्थित होकर मनुष्य और देव मानस्तम्भों की पूजा करते हैं । वह आस्थानांगणा नाम की भूमि देदीप्यमान लाल मणियों की कान्ति को धारण करती हैं। विधियों के मध्य में तीन कटनीदार चार सुवर्णमयी पीठिकायें हैं छाती बराबर ऊँची हैं और प्राधा कोस चौड़ी हैं।
उन पाठिकाओं पर चार मानस्तम्भ सुशोभित हैं, जो पाठिकाओं की चौड़ाई से एक धनुष कम चौड़े हैं और एक योजन से कुछ अधिक चौड़े हैं और एक योजन से कुछ अधिक ऊँचे हैं, वे मानस्तम्भ बारह योजन की दूरी से दिखाई देते हैं, पालिका के अग्रभाग पर जो कमल हैं, उन्ही पर स्थित हैं, उनका मूलभाग होरा का मध्यभाग स्फटिक का है और अग्ल भाग वैडूर्य मलि का बना हुआ है । हर एक मानस्तम्भ दो-दो हजार कोगों से सहित है, दो दो हजार पहल के हैं, नाना रत्नों की किरणों से मिले हुए हैं. उसकी चारों दिशाओं में लाल सिहों की प्रतिमाएं विराजमान हैं तथा उनकी रत्नमयी बड़ी बड़ी पालिकायें हैं। पालिकाओं के अग्रभाग पर जो कमल हैं, उन पर स्वर्ण के देदीप्यमान घट हैं ।
उन घटों के अग्रभाग से लगी हुई सीढ़ियां हैं तथा उन सीढ़ियों पर लक्ष्मी देवी के अभिषेक की शोभा दिखलायी गयी है, वे मानस्तम्भ लक्ष्मीदेवी के धूडारल के समान अपनी कांति के समह से बीस योजन तक का क्षेत्र प्रकाशमान करते हैं तथा जिनका मन अहंकार से युक्त है ऐसे देव और मनुष्यों को वही रोक देने वाले हैं उन मानस्तम्भों की चारों दिशायें हंस, सारस और चकवों के शब्दों से अत्यन्त सुन्दर है तया उनमें खिले हुए कमलों से युक्त चार सरोवर हैं।
सरोवर के आगे एक बज्रमय कोट है, जो छाती बराबर ऊंचा है, अत्यन्त कान्ति से युक्त है । ऊँचाई से दूना चौड़ा है और चारों ओर से घेरे हुए है । इस कोट को चारों ओर से घेरकर एक परिवा स्थित है, जिसकी भूमि जल के समान कान्ति वाले मागियों से निर्मित है।
। उसमें घुटनों प्रमाण गहरा पानी भरा है तथा वह पृथ्वी रूपी स्त्री की नीली साड़ी के समान जान पड़ती है । वह परिखा अत्यन्त स्वच्छ है तथा उसका जल स्वर्णमय कमलों की पराग के समुह से पीला-पीला हो रहा है, अतएव उसमें प्रतिबिम्बित दिशा रूप स्त्रियों के मुख अंगराग से सहित समान जान पड़ते हैं ।
उसके आगे चारों ओर से घेरकर स्थित लताओं का बन सुशोभित है जो
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४६८ }
[ गो. प्र. चिन्तामणि फूलों के द्वारा दिशात्रों के अन्त भाग को सुगन्धित कर रहा है तथा पक्षियों और भ्रमरों के समूह से व्याप्त है, उसके आगे देदीप्यामान स्वर्ण के समान चमकीला एवं विजय आदि चांदी के बड़े-बड़े चार गोपुरों से सुशोभत कोट चारों ओर से घेरे हुए हैं जो उन गोपुरों पर व्यन्तर जाति के देव द्वारपाल है, जो कटल आदि आभूषणों से
मोभित हैं, पाने पभान मे अयोग्य व्यक्तियों को दूर हटाते रहते हैं तथा जिनके हाथ मुद्गरों से उद्धत होते हैं, देदीप्यमान कान्ति से युक्त उन गोपुरों के मणिमय तोरणों की दोनों ओर छत्र चभर तथा भृगार प्रादि अष्टमङ्गल द्रव्य एक सौ पाठ-एक सौं आठ संख्या में सदा सुशोभित रहते हैं ।
उन गोपुरों के प्रागे वीथियों की दोनों ओर तीन-तीन खण्ड की दो-दो नाट्यशालाएं हैं, जिनमें बत्तीस-बत्तीस देव कन्यायें नृत्य करती हैं।
तदनन्तर पूर्व दिशा में अशोक वन दक्षिण में सप्तपूर्ण वन पश्चिम में चम्पक वन और उत्तर में आम्र बन सुशोभित है, इन चारों वनों में अशोक वन का अशोक वृक्ष सप्तपर्ण वन का सप्तपर्ण वृक्ष चम्पक वन का चम्पक वृक्ष और पान बन का आम्र वृक्ष स्वामी है । ये स्वामी वृक्ष सिद्ध की प्रतिमानों से सहित है अर्थात उनके नीचे सिद्धों की प्रतिमाएं विराजमान रहती हैं, उन वनों में तिकोनी चौकोनी और गोलाकार अनेक वापिकानों के तट रल्ल निर्मित हैं, तथा उनकी भूमि स्फटिक से निर्मित हैं, ये सभी वापिकायें तोरणों युक्त हैं, दर्शनीय हैं, सीढ़ियों से युक्त हैं, ऊंचेऊँचे बरण्डों से सुशोभित हैं प्रवेश करने में गहरी हैं और दो कोस चौड़ी हैं नन्दा नन्दोतरा आनन्दा नन्दवती अभिनन्दिनी और नन्दघोषा ये छह वापिकायें अशोक दन में स्थित है । विजया अभिविजया जैसी वैजयन्ती अपराजित जयोत्तरा में छह वापिकाएं सप्तपर्ण वन में स्थित है, कुमुदा, नलिनी, पद्मा, पुष्करा विश्वोत्पला और कमला में छह वापियां चम्पक वन में मानी गई हैं और प्रभासा, भास्वती, भासा, सुप्रभा भानुमालिनी और स्वयंप्रभा में छह वापियां आम्रवन में कही गई हैं, पूर्ण आदि दिशाओं की वापिकायें क्रम से उदय, विजय, घाती और ख्याति नामक फल देती हैं तथा इन फलों के इच्छुक मनुष्य इन वापिकाओं की पूजा करते हैं।
क्रम के जानने वाले भक्तजन उन वापिकाओं से यथोक्त फूलों का समूह प्राप्त कर स्तुपों तक क्रम क्रम से जिनेन्द्र प्रतिमाओं की पूजा करते हुए आगे प्रवेश करते हैं उदय और प्रातिरूप फल को देने वाली वापिकाओं के बीच के आगे के दोनों ओर
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अध्याय : छठवां ]
[ ४६६ तीन खण्ड को स्वर्णमयी देदीप्यमान बत्तीस नाट्यशालाएं हैं, ये नाट्यशालाएं डेढ़ कोस चौड़ी हैं, नाना प्रकार के बेल बुटों से सुशोभित हैं और उनकी मूर्तियां रत्नों की बनी हैं तथा उनकी दीवालें स्वच्छ स्फटिक से निर्मित हैं, उनमें ज्योतिषी देवों की ३२-३२ देवांगनाएं नृत्य करती हैं जो हाव-भाव और विलास से युक्त तथा शृगार प्रादि रसों की पुष्टि से सुपुष्ट होती हैं । उसके पामे चार गोपुरों से युक्त अत्यन्त सुन्दर ब्रजमयी वनदेवी है, जो पूर्वोक्त वनों को चारों ओर से घेरे हुए है ।।
. चार गोपुरों के आगे चार विथियां हैं और उनके दोनों पसवाड़ों में ध्वजाओं की पंक्तियां फहराती रहती हैं प्रत्येक विभाग में उन ध्वजाओं की पृथक्पृथक् पीठिकायें हैं, जो तीन धनुष चौड़ी हैं, चित्र विचित्र हैं तथा उनपर आधा योजन अंने रत्नमाणी लांस लगे हुए हैं उन बांसों के अग्नभाग पर जो पटियां लगी हैं उनमें दशों प्रकार की रंग-बिरंगी छोटी-छोटी घण्टियों और जिस पट्टकों से युक्त बड़ी ध्वजाएं फहराती रहती हैं । वे दश प्रकार की ध्वजाएं फहराती रहती हैं वे दश प्रकार की ध्वजाएं क्रम से मयूर, हंस, गरुण, भाला, सिंह, हाथी, मकर, कमल, बैल और चक्र के चिन्ह से चिन्हित होती हैं एक दिशा में एक जाति की ध्वजाएं एक सौ पाठ होती हैं और चारों दिशात्रों की मिलकर एक जाति की चार सौ बत्तीस होती हैं, यह इनकी सामान्यरूप से संक्षेप में संख्या बतलायी है ।
विशेष रीति से एक दिशा में एक करोड़ सोलह लाख चौसठ हजार है और चारों दिशाओं में चार करोड़ अड़सठ लाख छत्तीस हजार कुछ अधिक है।
प्रीति और कल्याण रूप फल देने वाली बपिकानों के बीच के मार्ग में दोनों ओर पांच खण्ड की नृत्यशालाएं हैं, जिनमें भवनवासी देवों की देवांगनाएं नृत्य करती हैं नृत्यशालानों के आगे पांच-पांच स्खण्ड के रत्नमयी चार गोपुरों से विभूषित स्वर्ग निर्मित दूसरा कोट है।
गोपुरों के दोनों पसवाड़ों में देदीप्यान स्वर्ण के पीठों पर स्थित शंख के समान सुन्दर कण्ठों में पड़ी मालानों से सुशोभित्त मुखों पर कमल धारण करने वाले एवं जल से भरे स्वर्ण निर्मित मंगलकलश दो-दो की संख्या में सुशोभित हैं इस दूसरे कोट द्वारों पर भवनवासी देवों के इन्द्र द्वारपाल हैं जो बेत की छड़ी धारण किए हुए पहरा देते हैं, गोपुरों के आगे दो-दो नाट्यशालाएं हैं और उसके आगे स्वर्ण निर्मित दो-दो धूपघट रखे हुए हैं उससे आगे चारों दिशाओं में सिद्धों की प्रति
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४७० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
मात्र से युक्त दो-दो सिद्धार्थ वृक्षों से सहित कल्प वृक्षों का वन वीथियों के अन्त में यथारीति स्थित है । तदनन्तर चार गोपुरों सहित वन की रक्षा करने वाली विदिका है। और मार्गों में तोरणों युक्त सबका भला करने वाले नौ-नौ स्तुप हैं, वे स्तूप पद्मराग मणियों से निर्मित होते हैं तथा उनके समीप स्वर्ण और रत्नों के बने मुनियों और देवों के योग्य नाना प्रकार के सभागृह रहते हैं ।
सभागृहों के आगे आकाशस्फटिक मणि से बना नाना प्रकार के महारत्नों से निर्मित सात खण्ड वाले चार गोपुरों से सुशोभित तीसरा कोट है । इस कोट के पूर्व द्वार के विजय, विश्रुत, कीर्ति, विमल, उदय विश्वयुक् वासवीर्य और वट ये आठ नाम प्रसिद्ध हैं। दक्षिण द्वार के वैजयन्त, शिव, ज्येष्ठ, वरिष्ठ, ग्रन्थ, धारण याम्य और अप्रतिघ ये आठ नाम कहे गये हैं, पश्चिम द्वार के जयन्त, अमित, सार, सुधाम, भक्षोम्य, सुप्रभ, वरुण और वरद ये आठ नाम स्मरणीय किये गये हैं । और उत्तर द्वार के अपराजित, ग्रर्थं अतुलार्थ, उदक, प्रमोधक, उदय, अक्षय और पूर्णकमल ये आठ नाम हैं, उन द्वारों के पसवाड़ों में उत्तम रत्नमय प्रासनों के मध्य में स्थित मंगलरूप दर्पण सुशोभित हैं जो देखने वालों के पूर्व भव दिखलाते हैं । ये दर्पण गाढ़ अन्धकार को नष्ट करने वाले कान्ति के समूह से सदा देदीप्यमान रहते हैं और उनसे गोपुर सूर्य की प्रभा को तिरस्कृत कर अतिशय शोभायमान होते हैं ।
और तीन
से
विजयादिक गोपुरों में यथायोग्य 'जय हो' 'कल्याण हो' इन शब्दों का उच्चारण करने वाले एवं देदीप्यमान आभूषणों से युक्त कल्पवासी देव द्वारपाल रहते हैं ये तीनों कोट एक कोस, दो कोस कोस ऊँचे होते हैं तथा मूल मध्य ऊपरी भाग में इनकी चौड़ाई ऊंचाई प्राधी होती हैं इन कोटों के जगतीतलों का प्रमाण अपनी ऊँचाई से तीन हाथ कम कहा गया है और उनके ऊपर बने हुए बन्दर के सिर के आकार के कंगूरे एक हाथ तथा एक वितस्ति चौड़े और आधा येमा ॐ कहे गये हैं । उसके आगे नाना वृक्षों और लतागृहों से व्याप्त मंच प्रेक्षागरि और प्रेक्षागृहों से सुशोभित अन्तवर्ण हैं । वेदिकाओं से बद्ध वीथियों के बीच में कल्याण जय नाम का गन है और उसमें शाल्मली वृक्ष के समान ऊंचे एवं अन्तर से स्थित केला के वृक्ष प्रकाशमान हो रहे हैं ।
तदनन्तर उन्हीं के भीतर नाट्यशाला है जिसमें स्वर्ण के समान कान्ति की धारक लोकपाल देवों की देवांगनाएं निरन्तर नृत्य करती रहती हैं, उनके मध्य में
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[ ४७ १
अध्याय : छठवां ]
श्रेष्ठ गुणों का स्थान है तथा ऊंची उठने वाली किरणों से सुशोभित रत्नावली से अन्धकार के समूह को नष्ट करने वाला दूसरा पीठ है उसके आगे सिद्धार्थ वृक्ष हैं जो सिद्धों की प्रतिमाओं से सुशोभित शाखाओं से इच्छापूर्वक ही मानो दिशाओं को व्याप्त कर स्थित है । उसके आगे एक मन्दिर है जिसे पृथ्वी के ग्राभरणस्वरूप बारह स्तूप उस तरह सुशोभित करते रहते हैं जिस तरह कि स्वर्णमय चार मेरु पर्वत जम्बूद्वीप के महामेरु को करते रहते हैं ।
इनके आगे चार दिशाओं में शुभ वापिकाएं हैं जो चारों दिशाओं में बने हुए गोपुर द्वारों और वेदिका से अलंकृत हैं नन्दा भद्रा जया और पूर्णा ये चार उनके नाम हैं उन वापिकाओं के जल में स्नान करने वाले जीव अपना पूर्व भव जान जाते हैं ये वापिकायें पवित्र जल से भरी एवं समस्त पापरूपी रोगों को हरने वाली हैं। इनमें देखने वाले जीवों को अपने आगे पीछे के सात भव दिखने लगते हैं वापिकाओं के आगे एक जयांग सुशोभित है जो एक कोस ऊंचा है एक योजन से कुछ अधिक चौड़ा है कटि बराबर ऊंचे बरण्डों पर स्थित कदली ध्वजाश्रों से व्याप्त है, जिसमें मनुष्य निरन्तर प्रवेश करते और निकलते रहते हैं ।
ऐसे द्वारों और उच्च तोरणों से युक्त है तीन लोक की विजय का आधार है उसमें बीच-बीच में मूगाओं की लाल-लाल बालुका अन्तर देकर मोतियों की सफेद बालू बिछी है ग्रामरत्नमय पुष्पों और रखे हुए स्वर्ण कमलों से चित्र विचित्र है उस जागरण के भू-भाव जहां-जहां स्वर्ण रससे लिप्त अतएव पृथ्वी पर आये हुए सूर्यो के समान दिखने वाले विशाल वर्तुलाकार मण्डलों से सुशोभित हैं ।
जहां-तहां नाना प्रकार के चित्रों से चित्रित वह जयगण देव असुर और मनुष्यों से परिपूर्ण भवनों मण्डपों तथा अन्य सुखकर निवास स्थानों से सुशोभित है । कहीं चित्रों से सुन्दर और कहीं पुराणों में प्रतिपादित आश्चर्यकारी विभूति से युक्त तथा नाना प्रकार के कथानकों से सहित भवन बने हैं, वे भवन कहीं पुष्य के फलकी प्राप्ति से देखने वाले लोगों को धर्म का साक्षात् फल दिखलाते हैं, तो कहीं पाप का परिपाक दिखाकर अधर्म का साक्षात् कल दिखाते हैं । वे भवन उन दर्शकजनों को दानशील, तप और पूजा प्रारम्भ तथा उनके फल की एवं उनके अभाव में होने वाली विपत्तियों को श्रद्धा कराते हैं ।
उस जयांगण के मध्य में स्वर्णमय पीठ को अलंकृत करता हुआ इन्द्रध्वज
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४७२ ]
[गो. प्र. चिन्तामणि सुशोभित होते हैं जो ऐसा जान पड़ता है मानो भगवान् का विजय लक्ष्मी का मूर्ति धारी शरीर ही हो उस इन्द्रध्वज में देदीप्यमान गोले लटकती हुई मोतियों की माला
और जगमगाते हुए मरिणयों से युक्त एक पताका लगी रहती है । वह पताका वायु से कम्पित होने के कारण घण्टियों के शब्दों से अत्यन्त रमणीय जान पड़ती है । ऊपर उठती हुई किरणों से युक्त रत्नों की माला से सुशोभित वह पताका जब आकाश में फहराती है तब ऐसी जान पड़ती है मानो समुद्र से लहर ही उठ रही हो । इन्द्रादिक देव उसे बड़े कौतुहल से देखते हैं।
. उसके आगे एक हजार खम्भों पर खड़ा हुमा महोदय नाम का मण्डप है, जिसमें मूतिमती श्रु तदेवता विद्यमान रहती है । उस श्रु तदेवता को दाहिने भाग में करके बहुश्रुत धारक अनेक धीर-वीर मुनियों से घिरे श्रुतकेवली कल्याणकारी श्रुत का व्याख्यान करते हैं । महोदय मण्डप से प्राधे विस्तार वाले चार परिवार मण्डप और हैं जिनमें कथा कहने वाले पुरुष आक्षेपिरणी आदि कथाएं कहते रहते हैं । इन मण्डपों के समीप में नाना प्रकार के फुटकर स्थान भी बने रहते हैं जिनमें बैठकर केवलज्ञान आदि महाऋद्धियों के धारक ऋषि इच्छुकजनों के लिए उनकी इष्ट वस्तुओं का निरूपण करते हैं।
उसके आगे नाना प्रकार की लताओं से व्याप्त एक स्वर्णमय पीठ रहता है, जिसकी भव्य जीव नाना प्रकार की समयानुसार पूजा करते हैं। उस पीठ का श्रीपद नाम का द्वार है जो रत्नों और फूलों के समूह से युक्त है तथा जो मार्ग के बीच में बने हुए सूर्य और चन्द्रमा के समान देदीप्यमान मण्डलों से परिपूर्ण है । उस मार्ग के सम्मुख इच्छानुसार फल देने वाले निधियों के स्वामी दो देव सुशोभित रहते हैं ।
उनके आगे प्रमदा नाम की दो विशाल नाट्यशालाएं हैं जिनमें कल्पवासिनी अप्सरायें सदा नृत्य करती रहती हैं । विजयांगरण के कोनों में चार लोकस्तूप होते हैं, जिनपर पताकाओं की पवितयां फहराती रहती हैं, तथा जो एक योजन ऊंचे रहते हैं। ये लोकस्तुप नीचे वेत्रासन के समान मध्य में भालर के समान ऊपर मृदंग के समान
और अन्त में तालवृक्ष के समान लम्बी नालिका से सहित हैं, इनका स्वच्छ स्फटिक के समान रूप होता है अतः इनके भीतर की रचना अत्यन्त स्पष्ट रहती है इन स्तूपों में लोक की रचना दर्पणतल के समान स्पष्ट दिखाई देती हैं इन स्तूपों के आगे मध्य लोक नाम से प्रसिद्ध स्तूप है जिनके भीतर मध्यलोक की रचना स्पष्ट दिखलाती है ।
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अध्याय: छठai ]
[ ४७३.
आगे मन्दराचल के समान देदीप्यमान मन्दर नाम के स्तूप हैं जिन पर चारों दिशा में भगवान की प्रतिमाएँ सुशोभित हैं, उनके आगे कल्पवासियों की रचना से युक्त कल्पवास नामक स्तूप हैं जो देखने वालों को कल्पवासी देवों की विभूति साक्षात् दिखाते हैं ।
उनके आगे ग्रैवेयकों के समान आकार वाले ग्रैवेयक स्तूप हैं जो मनुष्यों को मानो ग्रैवेयकों की शोभा ही दिखाते रहते हैं । उनके आगे अनुदिश नाम के नौ स्तूप सुशोभित हैं, जिनमें प्राणी नौ अनुदिशों को प्रत्यक्ष देखते हैं, आगे चलकर जो चारों दिशाओं में विजय आदि विमानों से सुशोभित हैं, ऐसे समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले सर्वार्थ सिद्धि नाम के स्तूप हैं । बन के आगे स्फटिक के समान निर्मल सिद्ध स्तूप प्रकाशमान हैं, जिनमें सिद्धों के स्वरूप को प्रकट करने वाली दर्पणों की छाया दिखाई देती है ।
उनके आगे दैदीप्यमान शिखरों से युक्त भव्यकूट नाम के स्तूप रहते हैं, जिन्हें भव्य जीव नहीं देख पाते क्योंकि उनके प्रभाव से उनके नेत्र अन्धे हो जाते हैं । उनके आगे प्रमोह नाम के स्तुप हैं, जिन्हें देखकर लोग अत्यधिक भ्रम में पड़ जाते हैं और चिरकाल से अभ्यस्त गृहीत वस्तु को भी भूल जाते हैं। आगे चलकर प्रबोध नाम के अन्य स्तूप हैं, जिन्हें देखकर लोग प्रबोध को प्राप्त हो जाते हैं और तत्त्व को प्राप्त कर साधु हो निश्चिन्त हो संसार से छूट जाते हैं ।
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इस प्रकार जिनकी वेदिकाएं एक दूसरे से सटी हुई हैं। तथा जो तोरणों से समुद्भासित हैं, ऐसे अत्यन्त ऊँचे दश स्तूप क्रम क्रम से परिधि तक सुशोभित हैं । इसके यागे एक कोट रहता है जो एक कोस चौड़ा तथा एक धनुष ऊँचा होता है और उसकी मण्डल की भूमि को बचा कर मनुष्य तथा देव प्रदक्षिणा देते रहते हैं । इस परिधि में बाहर की ओर सत्रह कणिकाएँ हैं जो एक-एक कोस विस्तृत हैं और भीतर की ओर एक करिका है जो साढ़े तीन योजन विस्तार वाली है ।
जिस प्रकार परिवेश सूर्य को घेरता है, उसी प्रकार चित्र-विचित्र रत्नों से निर्मित यह परिधि भीतर के देदीप्यमान मण्डल को घेरे रहती हैं । यहाँ गणधर देव की इच्छा करते ही एक दिव्य पुर बन जाता है, सो ठीक ही है, क्योंकि मन:पर्ययज्ञान के धारक जीवों का प्रभाव महान् होता है, वह पुर कल्व के ज्ञाता मनुष्य के द्वारा त्रिलोकसार, श्रीकान्त, श्रीप्रभु, शिवमन्दिर, त्रिलोकी श्री, लोक कान्ति श्री, श्रीपुर,
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४७४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि त्रिदशप्रिय, लोकालोक प्रकाशाद्यौ, उदय, अभ्युदया वह क्षेम, क्षेमपुर, पुण्य, पुण्याह, पुष्पकास्पद भुवःस्वः तप:सत्य, लोका-लोकोत्तम, रुचि रुचावह उदारद्धि, दान-धर्म पुर श्रेय श्रेयस्कर तीर्थ तीर्थावह उदग्रह, विशाल, चित्रकूट, धीश्रीधर, त्रिविष्टप, मंगलपुर, उत्तमपुर, कल्याणपुर, शरणपुर, जयपुरी, अपराजितपुरी आदित्यपुरी, जयन्तीपुरी, अचलसंपुर, विजयन्त, विमल विमलप्रभ, काम, गगनाभोग, कल्याण, कलिनाशन, पवित्र, पंचकल्याण, पद्यावर्त, प्रमोदय, पराय मण्डितावास, महेन्द्र महिमालय, स्वायम्भुव, सुधाधात्री, शुद्धावास, सुखावती, विरजा, वीतशोका, अर्थविमला, विनयावति, भूतधात्री, पुराकल्प, पुराण, पुण्यसंचय, ऋषिवती, यमवती, रत्नवती, अजरामरा, प्रतिष्ठा, ब्रह्मनिष्ठो:, केतुमालिनी, अरिन्दम, मनोरम, तमःपार, परली, रत्नसंचय, अयोध्या, अमृतधानी, ब्रह्मपुर, जाताह्य य और उदस्तार्थ नाम से कहा जाता है।
. भगवान के प्रभाव से उत्पन्न वह नगर तीन लोक के समस्त श्रेष्ठ पदार्थों के समूह से युक्त आश्चर्य स्वरूप एवं बहुत भारी आश्चर्य उत्पन्न करता हुअा सुशोभित होता है, उसका बनाने वाला कुबेर भो एकाग्रचित्त हो, उसके बनाने का पुनः विचार करे तो वह भी नियम से भूल कर जायगा, फिर अन्य मनुष्य की बात ही क्या है ?
- उस नगर का निर्माण यथास्थान छब्बीस प्रकार के सुवर्ग और मणियों से चित्र विचित्र है, अतः अत्यधिक सुशोभित होता है । उसके तल भाग में तीन जगती रहती है जो आधा-आधा कोस चौड़ी होती है और ऊपर-ऊपर उन जगतियों में उतनी ही हानि होती जाती है । उन जगतियों की रचना बज्रमयी एवं चित्रविचित्र रत्नों से उज्ज्वल है और उनकी श्रेष्ठ कान्ति चारों ओर इन्द्र धनुषों को विस्तृत करती रहती है छाती प्रमाण ऊँचे तथा देदीप्यमान प्रभा के धारक बरण्डे उन जगतियों को सुशोभित करते रहते हैं, तथा उन पर एक धनुष के अन्तर से स्थित सुशोभित पताकाएं हैं ।
उन जगतियों में तीस-तीस वितस्तियों के कुट और उनसे द्विगुरा अायाम वाले दश दश धनुषों के अन्तर से स्थित कोष्टक रहते हैं । उन जगतियों के समीप दोनों प्रोर द्वारपालों के दो-दो आवास स्थान हैं, जिनमें प्रत्येक द्वार पर कुवेर की अपूर्व धनराशि प्रकाशमान है । प्रत्येक जगती के कूटों की संख्या सात सौ बहत्तर है तथा कोष्टकों की संख्या अड़तालीस है ।
संक्षेप से तीनों जगतियों की कूट संख्या बाईस सी बीस है और कोप्टों की
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अध्याय: छठवां ]
[ ४७५
संख्या उसी प्रमाण से है । प्रथम जगती में बसीस हजार तीन सौ इक्यासी, दूसरी में चौबीस हजार दो सौ उन्नीस और तीसरी में इकतीस हजार छप्पन ध्वजाऐं रहती है। पूर्व कूटों में दो लाख बत्तीस हजार चार सौ सत्तर, मध्यम कूटों में सात लाख इकसठ हजार एक सौ और अन्तिम कूटों में दो लाख चौवन हजार आठ सौ अस्सी और कोष्टों में दुनी दुनी है ।
इस प्रकार समस्त स्वजनों की संख्या छब्बीस लाख बीस हजार दो सौ छप्पन है । वहां सस्वेद - जलसिक्त प्रदेशों में रत्नों से मण्डित अनेक मण्डप हैं जो दो कोस चौड़े और एक कोस ऊँचे हैं, जिनकी रचना मण्डपों से साधी चौड़ी है । ऐसे शिखरों के मध्य भाग में विराजमान जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमाएं हैं जो उत्तम मंगल द्रव्यों से सुशोभित हैं । यद्यपि ये प्रतिमाऐं अपने-अपने स्थान पर स्थित हैं, तथापि सामने खड़े होकर देखने वाले को ऐसी दिखाई देती हैं, मानो उन स्थानों से निकलकर आकाश में ही विद्यमान हो ।
वहां चारों दिशाओं में देदीप्यमान तीन पीठ होते हैं. उनमें पहले पीठ पर चार हजार धर्म चक्र सुशोभित हैं। दूसरी पीठ पर मथुर और हंस श्वजाओं से भिन्न थाठ प्रकार की महाध्वजाएँ दिशाओं को सुशोभित करती हुई विद्यमान है। तीसरी पीठ पर श्री मण्डप को सुशोभित करने वाला अनेक मंगलद्रव्यों से सहित गंधकुटी नाम का प्रसाद है, उनमें भगवान का सिंहासन रहता है । उस सिंहासन पर विराजमान जिनेन्द्रदेव की सन्तुष्ट चित्त के धारक मनुष्य, सुर और असुरों के झुण्ड के झुण्ड मुकुटों पर हाथ लगाकर स्तुति करते थे, वे कह रहे थे कि हे महादेव ! आपकी जय हो । हे महेश्वर ! श्राप जयवन्त हों, हे महाबाहो ! आप विजयी हों, हे विशाल नेत्र ! आप जयवन्त हो ।
मुनिसमूह को यदि लेकर बारह गरण भगवान श्रहन्त को प्रणाम कर यथास्थान उनकी उपासना करने को स्थित हो गये ।
मार्ग के चारों ओर घेर कर बारह सभाएँ उनकी पूर्व, दक्षिण आदि दिशाओं में मुनि समूह को आदि लेकर बारह गए विराजमान थे । वहां उत्कृष्ट वर को प्रदान करने वाले भगवान श्रर्हन्त के आगे गणधर को आदि लेकर अनेक मुनि सुशोभित थे, जो धर्म के स्वरूप को प्रत्यक्ष करने वाले एवं उदयन्त निर्मल धमेश्वर के ग्रंश के समान जान पड़ते थे ।
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४७६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिंग उनके आगे कल्पवासिनी देवियाँ सुशोभित थीं जो ऐसी जान पड़ती थीं मानी भगवान की बाह्याभ्यन्तर विभूतियां ही उनका रूप रखकर स्थित हों ।
उनके बाद तीसरी सभा में लज्जा, दया, क्षमा शान्ति श्रादि गुण- रूपी सम्पत्ति से सुशोभित श्राविकाऐं विराजमान थीं जो समीचीन धर्म की पुत्रियों के समान जात पड़ती थीं ।
चौथी सभा में प्रशंसनीय एवं अपने आप से निकलने वाली प्रभा से सुशोभित ज्योतिषी देवों की स्त्रियां बैठी थीं जो भगवान की कान्ति के समान जान पड़ती थीं । पांचवी सभा में मुलिधारिणी वन की लक्ष्मी के समान सुन्दर बनवासी व्यन्तर देवों की स्त्रि स्थित थी तथा वे वन की पुष्प लताओं के समान नत्रीभूत हो भगवान के चरणों को नमस्कार कर रही थीं ।
- छठी सभा में भगवान् की अत्यधिक भक्ति से युक्त भवनवासी देवों की अंगनाएँ स्थित थीं जो ऐसी जान पड़ती थीं मानो स्वर्गभूमि और अधोलोक की लक्ष्मयाँ ही भगवान के समीप श्राकर बैठी हैं ।
सातवी सभा में फरणा के समान देदीप्यमान रत्नों की कान्ति से लाल-लाल दीखने वाले भवनवासी देव अपने संसार से भयभीत होते हुए, पाप बन्ध का छेदन करने वाले भगवान् के समीप विद्यमान थे ।
आठवों सभा में सुन्दर आकार के धारक व्यन्तर देव बैठे थे । वे भगवान् के श्रीभूषण स्वरूप थे तथा फूलों की मालाओं को धारण करने वाले मन्दरगिरि के समान जान पडते थे ।
rai सभा में, जिनकी अपनी प्रभा भगवान् की प्रभा में निमग्न हो गयी थी, ऐसे सूर्य प्रादि ज्योतिषी देवों के समूह नम्रीभूत हो भगवान् से अपनी प्रभावृद्धि की प्रार्थना कर रहे थे ।
दसवीं सभा में सौन्दर्य के स्वामी, सुखी एवं ऊपर बैठे हुए भगवान् के श्रंशों के समान इन्द्र आदि कल्पवासी देव सुशोभित हो रहे थे ।
ग्यारहवी सभा में चक्रवर्ती आदि राजा भगवान् की उपासना करते थे और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो शरीरधारी दान-पूजा आदि वर्मो के निर्मल अंश ही हों । बारहवी सभा में जिन्हें अविद्या, वर, माया श्रादि दोषों के नष्ट हो जाने से विद्या, क्षमा आदि तत्तद्गुण प्राप्त हुये थे, ऐसे सिंह, हाथी आदि तिर्यच विद्यमान थे
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अध्याग : कावा
[ ४७७ और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो उन्हीं के समान दूसरे तिर्यच हो ।
भावार्थ-तिर्यच अपनी स्वाभाविक कुटिलता को छोड़कर तदाकार होने पर भी ऐसे लगते थे जैसे ये वे न हों, दूसरे ही हों । इस प्रकार द्वादशांग के गुणों के समान बारह सभानों-सम्बन्धी बारह गए प्रदक्षिणा रूप से भगवान् की उपासना करते थे।
भगवान् अर्हन्त, अपने सिंहासन की शोभा से दूसरों में न पाये जाने वाले परमेष्ठीपना को स्थापित कर रहे थे । क्रमपूर्वक ढोरे जाने पर देवोपनीत चमरों से महेशिता को तीन चन्द्रमा के समान कान्ति को धारण करने वाले छत्रत्रय से तीन लोक के स्वामित्व को संसार के प्रान्तरिक अन्धकार को नष्ट करने वाले भामण्डल से कान्ति की अधिकता को सब ऋतुओं के फूलों से युक्त अशोक वृक्ष के द्वारा अन्य समस्त जीवों के शोक दूर करने की सामर्थ्य को पुष्पवृष्टि रूप पूजा के द्वारा पूज्यता को अभयोत्पत्ति की घोषणा करने वाली दिव्य धुनी से. जयलक्ष्मी की सर्वहितकारिता को
और आनन्ददायी मंगलमय वादित्रों के नाद से साधुजनों की चित्त को आनंदित करने की सामर्थ्य को प्रकट कर रहे थे।
जो आत्मा के प्राधीन हों उन्हें प्रतिहार कहते हैं, इस प्रकार प्रात्माधीन गुरगों से उत्पन्न अष्ट महा प्रातिहार्यों से भगवान अर्हन्त सुशोभित हो रहे थे । आत्मोत्थ समस्त विभूति को धारण करने वाले भगवान् सर्वलोकातिवर्ती दीप्ति से लोगों का कल्यारण करने के लिये समोशरण में विराजमान हुये। उस समयं देव लोग घोषणा के साथ यह कहकर जीवों का आह्वान कर रहे थे कि हे आत्महित के इच्छुक भव्य जनो ! सम्पूर्ण विकसित प्रात्मा को धारण करने वाले केवली भगवान् यहाँ विराजमान हैं। शीघ्रता से यहां आओ, प्राग्रो और इन्हें नमस्कार करो । इस प्रकार उन देवों ने आह्वान किया तब शीघ्र ही मनुष्य, देव और असुर वैभव के साथ सब ओर से समवशरमा में पाने लगे।
समवसरण के दृष्टिगोचर होते ही वे मानांगरण में खड़े हो सबसे पहले हाथ जोड़ मस्तक से लगाकर वाहनों से नीचे उतरते हैं । तदनन्तर वाहन आदि परिग्रह को बाहर छोड़कर विशिष्ट राज्य-चिह्नों से युक्त हो मान पीठ की प्रदक्षिणा देते हैं । प्रदक्षिणा के बाद सबसे पहले मानस्तम्भ को नमस्कार करते हैं, सदनन्तर हृदय में उत्तम भक्ति को धारण करते हुये उत्तम पुरुष भीतर प्रवेश करते हैं और पापी, विरुद्ध
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४७८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि कार्य करने वाले, शूद्र, पाखण्डी, नपुसक, विकलांग, विकलेन्द्रिय तथा भ्रान्त चित्त के धारक मनुष्य बाहर ही प्रदक्षिणा देते रहते हैं । सुरेन्द्र, असुरेन्द्र तथा नरेन्द्र श्रादि उत्तम पुरुष छत्र, चमर और भृमार आदि को जयांगण में छोड़ प्राप्तजनों के साथ हाथ जोड़कर भीतर प्रवेश करते हैं ।
मणिमय मुकटों को धारण करने वाले वे सब, भीतर प्रवेश कर विधिपूर्वक प्रणाम करते हैं और चक्रपीठ पर प्रारूढ होकर भगवान् जिनेन्द्र की तीन-बार प्रदक्षिणा देते हैं । इच्छानुसार अपनी शक्ति और दिभव के अनुकूल सामग्री से पूजा करते हुये अपने नाम का उल्लेख कर नमस्कार करते हैं।
तदनन्तर जिन्होंने अपनी अंजलिया मा से इमा रखी हैं और रोमांचों के जिनका भाव प्रकट हो रहा है, ऐसे वे सब अपनी-अपनी सीढ़ियों से नीचे उत्तर कर सभाओं में यथास्थान बैठते हैं।
- जिस प्रकार सूर्य के सम्मुख खिला हुमा कमलों का समूह सुशोभित होता है, उसी प्रकार जिनेन्द्र भगवान् रूपी सूर्य के सम्मुख वह गणरूपी द्वादश सभा रूपी कमलों का समूह सुशोभित हो रहा था । जिस प्रकार नदी समुद्र को भरने में समर्थ नहीं है, उसी प्रकार सब ओर से समवशरण में प्रवेश करती हुई वह सेना उसे भरने में समर्थ नहीं थी । यहाँ बाहर निकलता, पाता, प्रवेश करता, दर्शन करता, प्रदक्षिणा देता, सन्तुष्ट होता, भगवान् को प्रणाम करता और उनकी स्तुति करता हुआ सज्जनों का समूह सदा विद्यमान रहता है।
. समवशरण के भीतर भगवान् के प्रभाव से न मोह रहता है, न रागद्वेष उत्पन्न होते हैं, न उत्कण्ठा, रति एवं भात्सर्यभाव रहते हैं, न अंगड़ाई और जमुहाई आती है, न नींद आती है, न तन्द्रा सताती है, न बलेश होता है, न भूख लगती है, न प्यास का दुख होता है और न सदा समस्त दिन कभी अन्य समस्त प्रकार का अमंगल ही होता है।
बाह्य विभूति के अद्वितीय स्थान समवशरण भूमि में जब अन्तरंग आत्मा की पवित्रता से युक्त भगवान् विराजमान होते हैं, तब बारह सभाओं का समूह अपने तृषित नेत्रों से उनके अमृत रूप सौन्दर्य सागर का पान करता है।
इस प्रकार समोशरण का रचनाक्रम कहा । तीर्थकर प्रभु की आयु थोड़ी रह जाती है, तब अहंत भगवान् योग निरोध करते हैं, समवशरण का विघटन हो
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अध्याय : छठवां ]
[ ४७६ जाता है । ये तीर्थंकर अरहन्त भगवान् चौदहवें गुणस्थान में प्रवेश करते हैं !
प्रश्न :-चौदहवें गुरणस्थान का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-जिनकी योगों की प्रवृत्ति दूर हो जाती है, उन्हें प्रयोग केवली कहते हैं । यह जीव इस गुणस्थान में 'अ, इ, उ, ऋ, लु' इन पांच लघु अक्षरों के उच्चारण में जितना काल लगता है, उतने ही काल तक ठहरता है। अनन्तर शुक्ल ध्यान के चतुर्थ पाद के प्रभाव से सत्ता में स्थित पिचासी प्रकृतियों का क्षय कर एक समय में सिद्ध क्षेत्र में पहुंच जाता है।
. (हरिवंशपुराण, पेज नं० ६४७, जिमसेन स्वामी)
NADADADADADANA ADDAWANNAD
DAAAAAAAAADUSTAJAD
बन रस्नेषु मोशीष बन्दनेषु यथा मतम्। .. मरिणषु बेडूयं यथा शेयं तथा ध्यानं व्रतादिषु ॥ जिस प्रकार बहुमूल्य रत्नों में बज (हीरा) रत्न सर्वोत्तम कहा जाता है, चन्दनों में मलयागिरि चन्दन सुवासित-शीतल एवं महत्वपूर्ण जाना जाता है, मणियों में भैडूर्यमणि को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, उसी प्रकार व्रत,, संयम, शील, चरित्र, तपादि अनुष्ठानों में ध्यान सर्वोत्तम और महत्त्वपूर्ण हैं । यह साधुओं का प्राण है। कहा भी है---"दह्यतेऽनन्त कर्मारिए ध्यानाग्निना क्षणात् ।" अर्थात् ध्यान रूपी अग्नि से अनन्त भवों में संत्रित किये कर्मभुज क्षणभर में रूई के ढेर के समान जलकर भस्म हो जाते हैं। प्राचार्य कहते हैं "ध्यान प्राणाः मुनीश्वराणां ।" अर्थात् ध्यान मात्र ही साधुओं का जीवन है। ..
प्रात्मदर्शन का एक मात्र ध्यान ही उपाय है। WWWXWWWWWUSV MEUWAWALA
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अध्याय सातवां : लोक वर्णन .
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नरकों का वर्णन और नरकों के नाम
रन शर्करा वालुका पर धूम तमो महातमः प्रभा भूमयो ..
घनाम्बुवाताकाश प्रतिष्ठाः सप्ताधोऽधः ॥११६०॥ '... " रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, वालुका प्रभा, पङ्क प्रभा, धूम प्रभा, तमः प्रभा और महातमः प्रभा, ये सात नरक क्रम से नीचे-नीचे स्थित हैं। ये कमशः घनोदधिवात वलय, घनबात बलय और तनुवात वलय से बेष्टित हैं और तीनों वात वलय
आकाश के आश्रित हैं। रत्नप्रभा सहित भूमि रत्नप्रभा है, इसमें मन्द अन्धकार है । शर्कराप्रभा सहित भूमि शर्कराप्रभा है, इसमें बहुत कम तेज है । वालुका प्रभा भूमि अन्धकार प्राय है। आगे की भूमियाँ उत्तरोत्तर अन्धकारमय ही हैं । बालुका प्रभा के स्थान में बालिका प्रभा भी पाठ देखा जाता है । महातमः प्रभा का तगस्तम: प्रभा यह दूसरा नाम है । ये वातवलय नरकों के नीचे भी हैं। धनोदधिवात वलय गोमूत्र के रंग के समान है। धनवात मूग के रंग का है। तनुवात वलय अनेक रंग का है। तीनों बातवलय क्रमश: लोक के नीचे के भाग में तथा सप्तम पृथिवी के अन्तिम भाग तक एक बाजू में बीस-बीस हजार योजन मोटे हैं। सप्तम पृथिवी के अन्त में क्रमशः सात, पाँच और चार योजन मोटे हैं । फिर क्रमशः घटते हुए मध्यलोक में पांच, चार और तीन योजन मोटे रह जाते हैं । फिर क्रमशः बढ़कर ब्रह्मलोक के पास सात; पांच और चार योजन मोटे हो जाते हैं। पुनः क्रमशः घटकर लोक के • अन्तिम भाग में पांच, चार और तीन योजन रह जाते हैं । लोक शिखर पर दो कोस, एक कोस तथा सवा चार सौ धनुष कम एक कोस प्रमाण मोटे हैं।
प्रश्न :--लरकों का विस्तार किस प्रकार है ?
उत्तर :- प्रथम पृथिवी एक लाख अस्सी हजार योजन मोटी है । इसके तीन भाम हैं-.१. खर भाग, २. पङ्क भाग और ३. अब्बहुल भाग । खर भाग का विस्तार सोलह हजार योजन, पङ्ग भाग का चौरासी हजार योजन और अब्बहल भाग का अंस्सी हजार योजन है । खर भाग के ऊपर और नीचे एक-एक हजार योजन
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अध्याय : सातवा ]
[ ४८१ छोड़कर शेष भाग में तथा पंक भाग में भवनवासी और व्यन्तर देव रहते हैं, और अजल के भाग में नारकी रहते हैं । द्वितीय आदि पृथिवियों का विस्तार क्रम से ३२, २३, २४, २०, १६ और ६ हजार योजन है। सातों नरकों के प्रस्तारों की संख्या क्रम से १३, ११, ६, ७, ५, ३ और १ है । प्रथम नरक में १३ और सप्तम नरक में केवल एक प्रस्तार है ।
सातों नरकों के रूतुनाम इस प्रकार हैं
१. धम्मा, २. वंशा, ३. शैला या मेधा, ४. अञ्जना, ५. अरिष्टा, ६. मघवी और ७. माधवी । सातों नरकों में बिलों को संख्या
तासु त्रिंशत्यचविशति पञ्चदश दशत्रिपञ्चोनेक नरक शत सहस्त्राणि पञ्च चैव यथाक्रमम् ।।११६१॥
उन प्रथम आदि नरकों में क्रम से तीस लाख, पच्चीस लाख, पन्द्रह लाख, दस लाख, तीन लाख, पांच कम एक लाख और पांच बिल हैं। सम्पूर्ण बिलों को संख्या चौरासी लाख है। नारकियों का वर्णन
नारकोनित्या शुभतर लेश्या परिणाम देहवेदना विक्रियाः ॥११६२।।
नारकी जीव सदा ही अशुभतर लेश्या, परिणाम, देह, वेदना और विक्रिया वाले होते हैं । उनके कृष्ण, नील और कापोत ये तीन अशुभ लेश्यायें होती हैं। प्रथम और द्वितीय नरक में कापोत लेश्या होती है । तृतीय नरक के उपरिभाग में कापोत और अधोभाय में नील लेश्या है । चतुर्थ नरक में नील लेश्या है। पञ्चम नरक में ऊपर नील और नीचे कृष्ण लेनया है । छठवें और सातवें नरक में कृष्ण और परम कृष्ण लेश्या है। उक्त वर्णन द्रव्य लेश्यामों का है, जो अायुपर्यन्त रहती हैं। भावलेश्याएँ अन्तर्मुहूर्त में बदलती रहती है, अतः उनका वर्णन नहीं किया गया। .
स्पर्ण, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द को परिणाम कहते हैं । शरीर को देह कहते हैं । अशुभ नाम कर्म के उदय से नारकियों के परिणाम और शरीर अशुभतर
। प्रथम नरक में नारकियों के शरीर की ऊँचाई सात धनुष, तीन धनुष, तीन हाथ और छह अंगुल हैं। प्रामे के नरको में कम से दुगनी-दुगनी ऊँचाई होती गई है,
michadaily
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४८२
[ गो. प्र. चिन्तामणि
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जो सातवें नरक में ५०० धनुष हो जाती है । शीत और उष्णता से होने वाले दुःख का नाम वेदना है। मारकियों को शीत और · उष्णता-जन्य तीन दुःख होता है । प्रथम नरक से चतुर्थ नरक तक उष्ण वेदना होती है । पञ्चम नरक के ऊपर के दो लाख बिलों में उष्ण वेदना है, और नीचे के एक लाख दिलों में शीत वेदना है । मतान्तर से पांचवें नरक के ऊपर के दो लाख पच्चीस बिलों में उष्ण वेदना तथा २५ कम एक लाख बिलों में शीत वेदना है। छठे और सातवें नरक में उष्ण वेदना है । शरीर की विकृति को विक्रिया कहते हैं । अशुभ कर्म के उदय से उनकी विक्रिया भी अशुभ ही होती है । शुभ करना चाहते हैं, पर अशुभ होती है । नारको एक दूसरे के प्रति व्यवहार
परस्परोदीरित दुःखा ॥११६३॥
नारकी जीव परस्पर में एक दूसरे को दुःख उत्पन्न करते हैं । वहाँ सम्यग्दृष्टि जीव अवधिज्ञान से और मिथ्यादृष्टि विभंगावधिज्ञान से दूर से ही दुःख का कारण समझ लेते हैं और दुःस्त्री होते हैं। पास में आने पर एक दूसरे को देखते ही क्रोध बढ़ जाता है, पुनः पूर्व भव के स्मरण और तीव्र वैर के कारण वे कुत्तों की तरह एक दूसरे को भोंकते हैं तथा अपने द्वारा बनाये हुए नाना प्रकार के शस्त्रों द्वारा एक दूसरे को मारने में प्रवृत्त हो जाते हैं। इस प्रकार नारकी जीव दिन रात कुत्तों की तरह लड़कर, काटकर, मारकर स्वयं ही दुःख पैदा करते हैं । एक दूसरे को काटते हैं, छेदते हैं, सीसा गलाकर पिलाते हैं, वैतरिणी में ढकेलते हैं, कड़ाही में झोंक देते हैं आदि । असुर कुमार देव को पृथ्वी----
संक्लिष्टा सुरोधोरित दुःखाश्च प्रार चतुर्ध्या ॥११६४।।
चौथे नरक से पहले अर्थात तृतीय नरक पर्यन्त अत्यन्त संक्लिष्ट परिणामों . के धारक अम्बाम्बरीष आदि कुछ असुर कुमारों के द्वारा भी नारकीयों को दुःख पहुँचाया जाता है। असुर कुमार देव तृतीय नरक तक जाकर पूर्व भव का स्मरण कराके नारकियों को परस्पर में लड़ाते हैं और लड़ाई को देखकर स्वयं (प्रसन्न) होते हैं। च शब्द से असुर कुमार देव पूर्व सूत्र में कथित दुःख भी पहुंचाते हैं ऐसा समझना चाहिये।
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अध्याय: सातवां ]
नरकों में आयु वर्णनdear
परा स्थितिः ॥११६५॥
उन नरकों से नारकी जीवों की उत्कृष्ट आयु क्रम से एक सागर, तीन सागर, सात सागर, दश सागर, सत्रह सागर, बाईस सागर और तेतीस सागर है । प्रथम नरक के प्रथम पटल में जघन्य श्रायु १० हजार वर्ष है । प्रथम पटल में जो उत्कृष्ट आयु है, यही द्वितीय पटल में जघन्य आयु है । यही क्रम सातों नरकों में है ।
पटल १
नरक ६०
१ हजार वर्ष
५
पटलों में उत्कृष्ट स्थिति इस प्रकार है
२
६ ७
६०
लोख
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[ ४८३
सप्त दश सप्त वश द्वाविंशति त्रयस्त्रत्सागरोपमा सत्यानां
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४८४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
इन नरकों में मद्यपायी, मांसभक्षी, यज्ञ में बलि देने वाले, असत्यवादी, परद्रव्य का हरण करने वाले, परस्त्री- लम्पटी, तीव्र लोभी, रात्रि में भोजन करने वाले, स्त्री, बालक, वृद्ध और ऋषि के साथ विश्वासत्रात करने वाले, जिनधर्म निन्दक, रौद्र ध्यान करने वाले तथा इसी प्रकार के अन्य पाप कर्म करने वाले जीव पैदा होते
है !
उत्पत्ति के समय इन जीवों के ऊपर की ओर पैर और मस्तक नीचे की ओर रहता है । नारकी जीवों को क्षुधा, तृषा आदि की तीव्र वेदना श्रायु पर्यन्त सहन करनी पड़ती है । क्षण भर के लिये भी सुख नहीं मिलता है ।
अज्ञी जीव प्रथम नरक तक, सरीसृप ( रेंगने वाले ) द्वितीय नरक तक, पक्षी तृतीय नरक तक, सर्प चतुर्थ नरक तक, सिह पांचवें नरक तक, स्त्री छटवें नरक तक और मत्स्य सादें एक तक जाते हैं।
यदि कोई प्रथम नरक में लगातार जावे तो आठ बार जा सकता है । अर्थात् कोई जीव प्रथम नरक में उत्पन्न हुआ, फिर वहाँ से निकल कर मनुष्य या तिर्यञ्च हुआ, पुनः प्रथम नरक में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार वह जीव प्रथम नरक में ही जाता रहे ती आठ बार तक जा सकता है। इसी प्रकार द्वितीय नरक में सात बार, तृतीय नरक में छह बार, चौथे नरक में पांच बार, पाँचवें नरक में चार बार, छठवें नरक में तीन बार और सातवें नरक में दो बार तक लगातार उत्पन्न हो सकता है ।
सातवें नरक से निकला हुआ जीव तिर्यञ्च ही होता है और पुन: नरक में जाता है। छठवें नरक से निकला हुआ जीव मनुष्य हो सकता है और सम्यग्दर्शन को भी प्राप्त कर सकता है, लेकिन देशप्रती नहीं हो सकता । पञ्चम नरक से निकला हुआ जीव देशप्रती हो सकता है, लेकिन महाव्रती नहीं । चौथे नरक से निकला हुआ, जीव मोक्ष भी प्राप्त कर सकता है । प्रथम, द्वितीय और तृतीय नरक से निकला हुआ जीव तीर्थकर भी हो सकता है ।
* मध्यलोक *
जम्बूद्रीप लवणोदादय: शुभनामानो द्वीप समुद्राः ।। ११६६ ।।
मध्य लोक में उत्तम नाम वाले जम्बूद्वीप आदि और लवण समुद्र आदि असंख्यात द्वीप समुद्र हैं ।
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अध्याय : सातवां
[ ४८५ १. जम्बूद्वीप, १ लवरण समुद्र, २. धातकी खण्ड द्वीप २ कालोद समुद्र, ३. पुष्करवर द्वीप, ३ पुष्करयर समुद्र, ४. वारुणीवर द्वीप, ४ वारुणीवर समुद्र, ५. क्षीरवर द्वीप ५ क्षीरवर समुद्र, ६. धृतवर द्वीप ६ घृतवर समुद्र, ७, इक्षुवर द्वीप ७ इक्षुवर समुद्र, ८, नन्दीश्वर द्वीप ८ नन्दीश्वर समुद्र, ६. अरुणवर द्वीप ६ अरुएबर समुद्र । इस प्रकार स्वयम्भूरमरण समुद्र पर्यन्त एक दूसरे को धेरे हुये असंख्यात द्वीप और समुद्र हैं । अर्थात् पच्चीस कोटि उद्धार पल्यों के जितने रोम खण्ड हो उतनी ही द्वीप समुद्रों की संख्या है।
मेरु से उत्तर दिशा में उत्तर कुरु नामक उत्तम भोग भूमि है। उसके मध्य में नाना रत्नमय एक जम्बू वृक्ष है । जम्बू वृक्ष के चारों ओर चार परिवार वृक्ष हैं । प्रत्येक परिवार वृक्ष के भी एक लाख बयालीस हजार एक सौ पन्द्रह परिवार वृक्ष हैं । समस्त जम्बू वृक्षों की संख्या १४० १२० है। मूल जम्बू वृक्ष ५०० बोजन ऊँचा है । मध्य में जम्बू वृक्ष के होने से ही इस द्वीप का नाम जम्बूद्वीप पड़ा। उत्तर कुरु की तरह देव कुरु के मध्य में शाल्मलि वृक्ष है। प्रत्येक वृक्ष के ऊपर रत्नमय जिनालय है । इसी प्रकार धातकी द्वीप में धातकी वृक्ष और पुष्करवर द्वीप में पुष्करबर वृक्ष है । खोप और समुनों का विस्तार और रचना
द्विद्विविकम्भाः पूर्व पूर्व परिक्षेपिणो वलयाकृतयः ।।११६७।।
प्रत्येक द्वीप समुद्र दूने-दूने विस्तार वाले, एक दूसरे को धेरै हुए तथा चूड़ी के प्राकार वाले हैं।
जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन, लबरण समुद्र का दो लाख योजन, धालकी द्वीप का चार लाख योजन, कालोद समुद्र का आठ लाख योजन, पुष्करवर द्वीप का सोलह लाख चोजन, पुष्करवर समुद्र का बत्तीस लाख योजन विस्तार है। इसी क्रम से स्वयम्भूरमरण समुद्र पर्यन्त द्वीप और समुद्रों का विस्तार दूना है। जिस प्रकार धातकी द्वीप का विस्तार जम्बूद्वीप और लवरण समुद्र के विस्तार से एक योजन अधिक है, उसी प्रकार असंख्यात समुद्रों के विस्तार से स्वयंभूरमरण समुद्र का विस्तार एक लाख योजन अधिक है । पहले पहले के द्वीप समुद्र आगे-आगे के द्वीप समुद्रों को, धेरे हुए हैं । अर्थात् जम्बूद्वीप को लवण समुद्र, लवण समुद्र को धातकी द्वीप, धातकी द्वीप को कालोद समुद्र धेरे हुये हैं । यही क्रम आगे भी है।
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४८६ ]
[ मो. प्र. चिन्तामणि ये द्वीप समुन्द्र चूड़ी के समान गोलाकार हैं। त्रिकोण, चतुष्कोरा या अन्य श्राकार वाले नहीं हैं।
. जम्बूद्वीप की रचना और विस्तार तन्मध्ये मेरूमाभिवतो योजन शत सहस्त्र विष्कम्भो जम्बूद्वीपः ॥११६८॥
उन असंख्यात द्वीप समुद्रों के बीच में एक लाख योजन विस्तार वाला जम्बू द्वीप है । जम्बुद्वीप के मध्य में मेरु है, अत: मेरु जम्बूद्वीप की नाभि कहा गया है । जम्बूद्वीप का आकार गोल है।
मेक पर्वत एक लाख योजन ऊँचा है। वह एक हजार योजन भूमि से नीचे और ६६ हजार योजन भूमि से उपर है । भूमि पर भद्र शाल बन है । भद्रशाल वन से पाँच सो योजन ऊपर नन्दन वन है। नन्दन वन से प्रेसठ हजार योजन ऊपर सौमनस वन है । सोमनस वन से साढे पैतिस हजार योजन ऊपर पाण्डुकवन है । मेरु पर्वत की शिखर चालीस योजन ऊंची है। इस शिखर की ऊँचाई का परिमाण पाण्डुकवन के परिमाग के अन्तर्गत नहीं है।
जम्बूद्वीप का एक लाख योजन विस्तार कोट के विस्तार सहित हैं । जम्बूद्वीप का कोट पाठ योजन ऊंचा है । मूल में बारह योजन, मध्य में आठ योजन और ऊपर भी पाठ योजन विस्तार है। उस कोट के दोनों पाश्चों में दो कोस ऊंची रत्नमयी दो वेदियां हैं। प्रत्येक वेदी का विस्तार एक कोस और एक हजार सात सौ पचास धनुष है । दोनों वेदियों के बीच में महोक्ष देवों के अनादिधन प्रासाद है, जो बक्ष, यापी, सरोवर, जिन मन्दिर प्रादि से विभूषित हैं । उस कोट के पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर चारों दिशाओं में कम से विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित नाम के चार द्वार हैं। द्वारों की ऊँचाई आठ योजन और विस्तार चार योजन है। द्वारों के आगे अष्ट प्रतिहार्य संयुक्त जिन प्रतिमायें हैं।
जम्बूद्वीप की परिधि तीन लाख सोलह हजार दो सौ सत्ताईस योजन तीन कोस एक सौ अट्ठाईस. धनुष और साढ़े तेरह अंगुल से कुछ अधिक है। क्षेत्रों का वर्णन----
भरत हैमवत हरि विदेह रम्यक हैरण्यक्तेरावत वर्षाः क्षेत्राणि ॥११६६।।
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अध्याय : सातवा ]
[ ४८७ ___ जम्बूद्वीप में भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत ये अनादि निधन नाम वाले सात क्षेत्र है।
हिमवान् पर्वत और पूर्व दक्षिण-पश्चिम समुद्र के बीच में धनुष के प्रकार का भरत क्षेत्र है । इसके गंगा-सिन्धु नदी और विजयार्द्ध पर्वत के द्वारा छह खण्ड हो गये हैं।
भरत क्षेत्र के बीच में पच्चीस योजन ऊँचा रजतमय बिजयार्द्ध पर्वत है, जिसका विस्तार पचास हजार योजन है । विजयाद्ध पर्वत पर और यांच म्लेच्छ खण्डों में चौथे काल के आदि और अन्त के समान काल रहता है। इसलिये वहाँ पर शरीर की ऊँचाई उत्कृष्ट पाँच सौ धनुष और जघन्य सात हाथ है 1 उत्कृष्ट प्रायु पूर्व कोटि और जघन्य एक सौ बीस वर्ष है।
विजयार्द्ध पर्वत से दक्षिण दिशा के बीच में अयोध्या नगरी है। विजयार्द्ध पर्वत से उत्तर दिशा में और क्षुद्र हिमवान् पर्वत से दक्षिण दिशा में गंगा-सिन्धु नदियों तथा म्लेच्छ खण्डों के मध्य में एक योजन ऊँचा और पचास योजन लम्बा, जिनालय सहित सुवर्णरत्नमय वृषभ नाम का पर्वत है । इस पर्वत पर चक्रवर्ती अपनी प्रशस्ति लिखते हैं।
हिमवान-महाहिमवान पर्वत और पूर्व-पश्चिम समुद्र के मध्य में हैमवत क्षेत्र है। इसमें जघन्य भोगभूमि की रचना है। हैमवत क्षेत्र के मध्य में गोलाकार एक हजार योजन ऊँचा, एक योजन लम्बा शब्दवान् पर्वत है।
जघन्य भोग भूमि में शरीर की ऊँचाई एक कोश, एक पल्य की प्रायु और प्रियंडु के समान श्याम वर्ण शरीर होता है । वहाँ के प्राणी एक दिन के बाद प्रांवला प्रमाण भोजन करते हैं । आयु के नव मास शेष रहने पर गर्भ से स्त्री पुरुष युगल पैदा होते हैं । नवीन युगल के उत्पन्न होते ही पूर्व युगल का छींक और जभाई से मरण हो जाता है । उनका शरीर बिजली के समान विघटित हो जाता है । नूतन युगल अपने अँगूठे को चसते हए सात दिन तक सोधे सोता रहता है। पुन: सात दिन तक पृथ्वी पर सरकता है । इसके बाद सात दिन तक मधुर वाणी बोलते हुए पृथ्वी पर लड़खड़ाते हुए चलता है । चौथे सप्ताह में अच्छी तरह चलने लगता है 1 पांचवें सप्ताह में कला और गुणों को धारण करने के योग्य हो जाता है। छठवें सप्ताह में तरुण होकर भोगों को भोगने लगता है । और सातवें सप्ताह में सम्यक्त्व को ग्रहण करने के योग्य
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४५८ 1
[ गो. प्र. चिन्तामणि हो जाता है । सब युगल दश कोस ऊँचे दश प्रकार के कल्प वृक्षों से उत्पन्न भोगों को भोगते हैं । भोग भूमि के जीव आर्य कहलाते हैं, क्योंकि वहाँ पुरुष स्त्री को प्रार्या और स्त्री पुरुष को आर्य कहकर बुलाती हैं। १. मद्यांग जाति के कल्प वृक्ष मद्य को देते हैं। मद्य का तात्पर्य शराब या मदिरा
से नहीं है किन्तु दूध, दधि, घृत आदि से बनी हुई सुगन्धित द्रव्य को काम___ शक्तिजनक होने से मद्य कहा गया है। . २. वादिनाँग जाति के कल्प वृक्ष मृदंग, भेरी, वीणा आदि नाना प्रकार के बाजों
. ३. भूषणांग जाति के कल्प वृक्ष विविध प्रकार के आभूषणों को देते हैं । ४. माल्यांग नाम के कल्प वृक्ष अशोक, चम्पा, परिजात आदि के सुगन्धित पुष्प
- माला आदि को देते हैं । ... ज्योतिरंग जाति के कल्पवृक्ष सूर्यादिक के तेज को भी तिरस्कृत कर देते हैं। • ६. दीपंग जाति के कान ए माना अवगर के हीरों को देते हैं, जिनके द्वारा लोग ... ... 'घरों के अन्दर अन्धकार युक्त स्थानों में प्रकाश करते हैं।
७. गृहांग जाति के कल्पवृक्ष प्राकार और गोपुरयुक्त रत्नमय प्रासादों का निर्माण ' करते हैं। 5. भोजनांग कल्पवृक्ष छह रसयुक्त और अमृतमय दिव्य आहार को देते हैं । ९. भाजनांग जाति के कल्पवृक्ष मरिण और सुवर्ण थाली, घड़ा आदि बर्तनों को • देते हैं। १०.. वस्त्रांग जाति के कल्पवृक्ष नाना प्रकार के सुन्दर और सूक्ष्म वस्त्रों को देते
- वहां पर अमृत के समान स्वादयुक्त अत्यन्त कोमल चार अंगुल प्रमाण घास होती हैं, जिसको मायें चरती हैं । वहाँ की भूमि पञ्च रत्नभय है । कहीं-कहीं पर मरिण और सुवर्णमय क्रीड़ा पर्वत हैं। वापी, सरोवर और नदियों में रत्नों की सीढ़ियां लगी हैं ! पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च मांस नहीं खाते और न परस्पर में विरोध ही करते हैं।
. वहाँ विकलत्रय नहीं होते हैं । कोमल हृदय वाले, मन्दकषायी और शीलादिसंयुक्त मनुष्य ऋषियों को आहारदान देने से और तिर्यञ्च उस पाहार को अनुमोदना
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minatin
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अध्याय : सातवां ]
[ ४६ करने से भोग भूमि में उत्पन्न होते हैं । सम्यग्दृष्टि जीव वहां से मरकर सौधर्म-ऐशान स्वर्ग में उत्पन्न होते हैं।
महाहिमवान् और निषध पर्वत तथा पूर्व और पश्चिम समुद्र के बीच में हरि क्षेत्र हैं। इसके मध्य में वेदाढच नाम का पटहाकार पर्वत हैं। हरि क्षेत्र में मध्यम भोगभूमि की रचना है। "
____ मध्यम भोगभूमि में शरीर की ऊंचाई दो कोस, प्रायु दो पल्य और वर्ण चन्द्रमा के समान होता है। वहां के प्राणी दो दिन के बाद विभीतक (बेहरे के फल के बराबर भोजन करते हैं। कल्पवृक्ष बीस योजन ऊँचे होते हैं । अन्य वर्णन जघन्य भोगभूमि के समान ही है।
* निषध नीलः पर्वत तथा पूर्व और पश्चिम समुद्र के बीच में विदेह क्षेत्र है। विदेह क्षेत्र के चार भाग हैं:-१. मेरु पर्वत से पूर्व में पूर्व विदेह, २. पश्चिम में अपरविदेह, ३. दक्षिण में देव कुरु और ४. उत्तर में उत्तर कुरु। विदेह क्षेत्र में कभी जिनधर्म का विनाश नहीं होता है, धर्म की प्रवृत्ति सदा रहती हैं और वहां से मरकर मनुष्य प्रायः मुक्त हो जाते हैं । अतः इस क्षेत्र का नाम विदेह पड़ा। विदेह क्षेत्र में तीर्थकर सदा रहते हैं । यहाँ भरत और ऐरावत क्षेत्र के समान चौबीस तीर्थंकर होने का नियम नहीं हैं । देवकुरु, उत्तर कुरू, पूर्व विदेह और अपर विदेह के कोने में मजदन्त नाम के चार पर्वत हैं । इनकी लम्बाई तीस हजार दो सौ नव योजन, चौड़ाई पांच सौ योजन और ऊँचाई चार सौ योजन है । ये गजदन्त मेरु से निकले हैं। इनमें से दो गजदन्त निषध पर्व की पोर, और दो गजदन्त नील पर्वत की ओर गये हैं । दक्षिण दिग्वी गजदन्तों के बीच में देवकुरु नामक उत्तम भोग भूमि है । देवकुरु के मध्य में एक शाल्मलि वृक्ष है। उत्तर दिग्वर्ती गजदन्तों के बीच में उत्तर कुरु है। . .
उत्तर भोग भूमि में शरीर की ऊँचाई तीन कोस, मायु तीन पल्य. और वर्ग उदीयमान सूर्य के समान है । वहाँ के मनुष्य तीन दिन के बाद बेर के बराबर भोजन करते हैं। कल्पवृक्षों की ऊँचाई लीस गब्यूती है । मेरु के चारों प्रोर भद्रशाल नाम का वन है। उस वन से पूर्ण और पश्चिम में निषध और नील पर्वत से लगी हई दो वेदियां हैं।
: पूर्व विदेह में सीता नदी के होने से इसके दो भाग हो गये हैं उत्तर भाग और दक्षिण भाग । उत्तर भाग में आठ क्षेत्र हैं। . . . .
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४६० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
वेदी और वक्षार पर्वत के बीच में एक क्षेत्र है। क्षार पर्वत और दो विभंग नदियों के बीच में दूसरा क्षेत्र है । विभंग नदी और वक्षार पर्वत के मध्य में तीसरा क्षेत्र है । वक्षार पर्वत और दो विभंग नदियों के बीच में चौथा क्षेत्र है। विभंग नदी और वक्षार पति के बीच में पांचवा क्षेत्र हैं । वक्षार पर्वत और दो-दो विभंग नदियों के अन्तराल में aai क्षेत्र है । विभंग नदी और वक्षार पर्वत के बीच में सातवां क्षेत्र है । वक्षार पर्वत और वन वेदिका के मध्य में आठवां क्षेत्र है। इस प्रकार चार वक्षार पर्वतों, तीन विभंग नदियों और दो वेदियों के नौ खण्डों से विभक्त होकर आठ क्षेत्र हो जाते हैं । इन आठ क्षेत्रों के नाम इस प्रकार हैं- १. कच्छा, २. सुकच्छा ३. महाकच्छा, ४. कच्छकावती, ५. श्रावर्ता, ६. लांगलावती, ७ पुष्कला और ८. पुष्कलावतो । इन क्षेत्रों के बीच में ग्राठ मूल पत्तन हैं- १. क्षेमा, २. क्षेमकरी, पुण्डरीकशी । ३. अरिष्टा ४. अरिष्टपुरी, ५. खंग, ६ मञ्जूषा ७. श्रौषधी और म प्रत्येक क्षेत्र के बीच में गंगा और सिन्धु नाम की दो-दो नदियां हैं जो नील पर्वत से fनकली हैं और सीता नदी में मिल गई हैं । प्रत्येक क्षेत्र में एक-एक विजयार्द्ध पर्वत है। प्रत्येक क्षेत्र में विजयार्ध पर्वत से उत्तर की ओर और नील पर्वत से दक्षिण को ओर वृपमगिरि नामक पर्वत है। इस पर्वत पर चक्रवर्ती अपनी प्रसिद्धि लिखते हैं ! प्राठों ही क्षेत्र में छह-छह खण्ड हैं- पांच-पांच म्लेच्छ और एक-एक कार्य सण्ड । श्राठों ही आर्य खण्डों में एक-एक उपसमुद्र है। प्रत्येक क्षेत्र में सीता नदी के अन्त में व्यन्तरदेव रहते हैं जो चक्रवतियों द्वारा वश में किये जाते हैं ।
सीता नदी से दक्षिण दिशा में भी आठ क्षेत्र हैं, पूर्व दिशा में वन वेदी है । वन वेदी के बाद वक्षार पर्वत, विभंगानदी, वक्षार पर्वत, विभंगा नदी, वक्षार पर्वत, विभंगानदी, वक्षार पर्वत और वन वेदी ये क्रम से नौ स्थान हैं । इनके द्वारा विभक्त हो जाने से आठ क्षेत्र हो जाते हैं -- १. वत्सा, २. सुवत्सा, ३- महावत्सा, ४. वत्सकावती, ५. रम्या, ६. रम्यका, ७. रमणीया, प. मंगलावती । इन पाठ क्षेत्रों के मध्य में आठ मूल पत्तन हैं - १. सुसीमा, २ कुण्डला, ३- अपराजिता, ४. प्रभङ्करी, ५. प्रङ्कवती, ६. पद्मावती ७. शुभा व रत्न संचया । श्राठों क्षेत्रों में से प्रत्येक में दो-दो गंगा-सिन्धु नदियाँ बहती हैं, जो निषध पर्वत से निकली है और सीता नदी में मिल गई हैं। आठों क्षेत्रों के मध्य में आठ : उपसमुद्र हैं । निषध पर्वत से उत्तर में और विजयार्द्ध पर्वतों से दक्षिण में आठ वृषभागिरि हैं जिन पर चक्रवर्ती अपने-अपने दिग्विजय के वर्णन की
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अध्याय : सातवां ]
[ ४६१ लिखते हैं । आठों क्षेत्र दो खुण्डों (५ म्लेच्छ और १ आर्य) से शोभायमान हैं। सीता नदी में मागधवरतनुप्रभास नामक व्यन्तरदेव रहते हैं ।
__सीतोदा नदी अपरचिदेह के बीच से निकल कर पश्चिम समुद्र में मिली हैं। उसके द्वारा दो विदेह हो गये हैं - दक्षिण विदेह और उत्तर विदेह । उत्तर विदेह का वर्णन पूर्व विदेह के समान ही है। .
. सीतोदा नदी के दक्षिण तट पर जो क्षेत्र हैं उनके नाम-१. पना, २. सुपना, ३. महापा, ४. पद्मकावती, * शङ्खा, ६. नलिना, ७. कुमुदा, ८. सरिता ।
- इन क्षेत्रों के मध्य की पाठ मूल नगरियों के नाम-१. अश्वपुरी, २. सिंहपुरी, ३. महापुरी, ४. विजयापुरी, ५. अरजा, ६. विरजा, ७. अशोका, ८. बीतशोका । सीतोदा नदी के उत्तर तट पर जो पाठ क्षेत्र हैं उनके नाम-१. वप्रा, २. सुनता, ३. महावा, ४. वप्रकावती, ५. गन्धा, ६. सुगन्धा, ७. गन्धिला, गन्धमादिनी। इन क्षेत्रों सम्बन्धी प्राठ मूल नगरियों के नाम---१. विजया, २. वैजयन्ती, ३. जयन्ती, ४. अपराजिता, ५. चक्रा, ६. खंगा, ७. अयोध्या, ८. अवध्या । क्षेत्र और पश्चिम समुद्र की वेदी के मध्य में भूतारण्य बन है।
नील और रुविम पर्वत तथा पूर्व और पश्चिम समुद्र के बीच में रम्यक क्षेत्र है । रम्यक क्षेत्र में मध्यम भोग भूमि की रचना है। इसका वर्णन हरि क्षेत्र के समान है । रम्यक क्षेत्र के मध्य में गन्धवान पर्वत है ।
रुक्मि और शिखर पर्वत तथा पूर्व और पश्चिम समुद्र के बीच में हैरण्यवत क्षेत्र है । इस क्षेत्र में जघन्य भोग भूमि की रचना है। इसका वर्णन हैमवत क्षेत्र के समान है । हैरण्यवत क्षेत्र के मध्य में माल्यवान् पर्वत है।
शिखरि पर्णत और पूर्ण, अपर, उत्तर समुद्र के बीच में ऐरावत क्षेत्र है। ऐरावत क्षेत्र का वर्णन भरत क्षेत्र के समान है।
पांचों मेरु सम्बन्धी ५ भरत, ५ ऐरावत नौर ५ विदेह इस प्रकार १५ कर्म भूमियां हैं।
__५ हैमवत, ५ हरि, ५ रम्यक, ५ हैरण्यवत, ५ देवकुरु और ५ उत्तर गुरु इस प्रकार ३० भोग भूमियां हैं ।
विकलत्रय जीव कर्म भूमि में ही होते हैं । लेकिन समवशरण नहीं होते हैं।
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४६२ ]
[ मो. प्र. चिन्तामणि कर्म भूमि से अतिरिक्त मनुष्य लोक में, पाताल लोक में और स्वर्गों में भी विकलत्रय नहीं होते हैं। क्षेत्रों का विभाग करने वाले पर्वतों का नाम---
तविभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन् । निषच नील रुक्मि शिखरियों वर्षश्वर पर्वताः ॥११७०३
भरत प्रादि सात क्षेत्रों का विभाग करने वाले, पूर्व से पश्चिम तक लम्बे हिमवान्, महाहिमवान्, निषध नील, रुक्मि और शिखरी ये अनादि निधन नाम वाले छह पर्वत हैं। ............ ..
भरत और ऐरावत क्षेत्र की सीमा पर सौ योजन ऊंचा और पच्चीस योजन भूमिगत हिमवान् पर्वत है । हैमवत और हरि क्षेत्र की सीमा पर दो सौ योजन ऊँचा और पचास योजन भूमिगत महाहिमवान् पर्णत है। हरि और विदेह क्षेत्र की सीमा पर चार सौ योजन ऊँचा और सौ योजन भूमिगत निषध पर्वत है। विदेह और रम्यक क्षेत्र की सीता दर चार सौ योजन ऊँचा और एक सौ योजन भूमिगत नील पर्वत है । रम्यक और हैरणवत क्षेत्र की सीमा पर दो सौ योजन ऊँचा और पचास योजन भूमिगत रुक्मि पर्वत है। हैरण्यवत और ऐरावत क्षेत्र की सीमा पर सौ योजन ऊँचा और पच्चीस योजन भूमिगत शिखरी पर्वत है। पर्वतों के रंग का वर्णन----
हेमार्जुन तपनीय वैडूर्य रजत हेम मयाः ॥११७१॥
- उन पर्वतों का रंग, सोना, चांदी, सोना, बैंड्र्यमणि, चांदी और सोने के समान है। - हिमवान् पर्वत का वर्ण सोने के समान अथवा चीन के वस्त्र के समान पीला है । महा हिमवान् पर्वत का रंग चांदी के समान सफेद है । निषध पर्वत का रंग तये हुये सोने के समान लाल है। नीला पर्वत का वर्ण वैडूर्यमणि के समान नौला है। रुक्मि पर्वत का वर्ण चाँदी के समान सफेद है । शिखरी पर्वत का रंग सोने के समान पीला
पर्वतों का आकार- मणिविचित्र पाव उपरि मूले च तुल्य विस्तारः ॥११७॥ .
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। ४६३ उन पर्वतों के तद नाना प्रकार के मरिणयों से शोभायमान हैं, जो दव, विद्याघर और चारण ऋषियों के चित्त को भी चमत्कृत कर देते हैं। पर्वतों का विस्तार "ऊपर, नीचे और मध्य में समान है। पर्वतों पर स्थित सरोवरों के नाम ... . ::::
पद्य महापातिगिच्छ केशरि महापुण्डराक पुण्डरीका हुदास्तेसाभुपरि॥११७३॥
.. हिमवान् आदि पर्वतों के ऊपर कम से पद्म, महापा, तिगिच्छ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डराक ये छह सरोवर हैं। .. . ... .. प्रथम सरोवर की लम्बाई, चौड़ाई
प्रथमो योजन सहस्त्रायामस्तबद्ध विष्कम्भो हृदः ॥११७४।। . . हिमवान् पर्वत के ऊपर स्थित प्रथम सरोवर एक हजार. योजन लम्बा और पांच सौ. योजन चौड़ा है । इसका तल भाग वनमय और तट नाना रत्नमय है। प्रथम सरोवर को गहराई
दश योजनावगाहः ॥११७५॥
पद्म सरोवर दश योजन गहरा है। . . पम सरोवर में कमल किसमा- लम्बा चौड़ा है--. :
सम्मध्ये योजनं पुष्करम् ।।११७६॥ .. ... : पद्म सरोवर के मध्य में एक योजन विस्तार वाला कमल है। एक कोस लम्बे उसके पत्ते हैं और दो कोस विस्तार युक्त करिएका के मध्य में एक कोस प्रमाण विस्तृत श्री देवी का प्रसाद है । यह कमल जल से दो कोस ऊपर है । पत्र' भौर करियका के विस्तार सहित कमल का विस्तार एक योजन होता है। "अन्य सरोवरों के विस्तार प्रादि का वर्णन....... तद्विगुणाद्विगुणा हमाः पुष्कराणि च ॥११७७।।
आगे के सरोवरों और कमलों का विस्तार प्रथम सरोवर और उसके कमल ..... के विस्तार से दुना-दूना है । ..अर्थात् महा पद्म दो हजार योजन लम्बा, एक हजार
योजन चौड़ा और बीस योजन गहरा है । इसके कमल का विस्तार दो योजन है। इसी
प्रकार: महापद्म के विस्तार से दूना विस्तार तिगिच्छ हुद का है। केसरी, महापुण्डरीक, ... . और पुण्डरीक हृदों का विस्तार क्रम से तिगिच्छ, महापद्म और पन हृद के विस्तार के
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कायकायक-DACIAL
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४६४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि समान है। इनके कमलों का विस्तार भो तिगिच्छ आदि के कमलों के विस्तार के संमान है। कमलों में रहने वाली देवियों के नाम--
तन्निवासिन्यो वेन्यः श्री हो ति कीति बुद्धिलक्ष्म्यः पल्योपम स्थित्यः संसामानि रिसत्काः ।।११३८
उन पद्म प्रादि सरोवरों के कमेलों पर क्रम से श्री, ही, धृति, कीर्ति, बुद्धि... और लक्ष्मी ये छह देवियां सामानिक और परिषद जाति के देवों के साथ निवास करती हैं। देवियों की आयु एक पल्य है ।
छहों कमलों की कणिकाओं के मध्य में एक कोस लम्बे, अर्द्ध कोस चौड़े और कुछ कम एक कोस ऊँचे इन देवियों के प्रासाद हैं, जो अपनी कान्ति से शरद् ऋतु से निर्मल चन्द्रमा की प्रभा को भी तिरस्कृत करते हैं । कमलों के परिवार कमलों पर सामानिक और परिषद् देव रहते हैं। श्री, ह्री, धूति देवियां अपने परिवार सहित सौधर्म इन्द्र की सेवा में तत्पर रहती हैं। .. नदियों का वर्णन और उनके नाम
___ गंमा सिन्धु रोहिद्रोहितास्या हरिद्वारकान्ता सीता सीतोदा नारी नरकान्ता सुवर्ण रूप्यफूलारक्तारक्तोदाः सरितस्तस्तन्यध्यगाः ॥११७६।।
. गङ्गा, सिन्धु, रोहित्, रोहितास्या, हरित्, हरिकान्ता, सीता, सीतोदा, नारी, नरकान्ता, सुवर्णकूला, रूप्यकूला, रक्ता और रक्तोदा ये चौदह नदियां भारत आदि सात क्षेत्रों में बहती हैं। नदियों के बहने का क्रम
द्वयो योः पूर्वाः पूर्यगाः ।।११८० .
दो-दो नदियों में से पहली-पहली नदी पूर्व समुद्र में जाती है । अर्थात् गङ्गासिन्धु में गङ्गा नदी पूर्व समुद्र को जाती है, रोहित्-रोहितास्या में रोहित नदी पूर्व समुद्र को जाती है । यही क्रम आगे भी है। . हिमवान् पर्वत के अपर जो २म हद है। उसके पूर्व तोरणद्वार से गंगा नदी निकली है जो विजयाई पर्वत को भेदकर मलेच्छ खण्ड में बहती हुई पूर्व समुद्र में मिल जाती है। पद्महद के पश्चिम तोरण द्वार से सिन्धु नदी निकली है, जो विजयाद्ध पर्वत को भेदकर म्लेच्छ खण्ड में बहती हुई पश्चिम समुद्र में मिल जाती
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[ ४६५ है। ये दोनों नदियां भरत क्षेत्र में बहती हैं । हिमवान पर्वत के ऊपर स्थित पद्महद के उत्तर तोरण द्वार से रोहितास्या नदी निकली है, जो जघन्य भोग भूमि में बहती हुई पश्चिम समुद्र में मिल जाती है। महापग्रहद के दक्षिरा तोरण द्वार से रोहित नदी निकली है, जो जघन्य भोग भूमि में बहती हुई पूर्व समुद्र में मिल जाती है । रोहित
और रोहितास्या नदी हैमवत क्षेत्र में बहती है । महा पग्रहद के उत्तर तोरण द्वार से हरिकान्ता नदी निकली है, जो मध्यम भोग भूमि में बहती हुई पश्चिम समुद्र में मिल जाती है । निषध पर्वत के ऊपर स्थित तिगिच्छ के ह्रद के दक्षिण तोरण द्वार से हरित नदी निकली है, जो मध्यम भोग भूमि में बहती हुई पूर्व समुद्र में मिलती है । हरित और हरिकान्ता नदियां हरिक्षेत्र में बहती हैं।
तिगिच्छ हद के उत्तर तोरण द्वार से सीतोदा नदी निकली है, जो अपर विदेह और उत्तम भोग भूमि में बहती हुई पश्चिम समुद्र में मिल जाती है । नील पर्वत पर स्थित केसरी ह्रद के दक्षिण तोरण द्वार से सीता नदी निकली है, जो उत्तम भोग भूमि और पूर्व विदेह में बहती हुई पूर्व समुद्र में मिल जाती है । सीता और सीतोदा नदियां विदेह क्षेत्र में बहती हैं।
केसरी हद के उत्तर में तोरण द्वारसे नरकान्ता नदी निकली है, जो मध्यम . भोग भूमि में बहती हुई पश्चिम समुद्र में मिल जाती है । रुक्मि पर्वत पर स्थित महा पुण्डरीक ह्रद के दक्षिण तोरण द्वार से नारी नदी निकली है, जो मध्यम भोगभूमि में बहती हुई पूर्व समुद्र में मिल जाती है। नारी और नरकान्ता नदी रम्यक क्षेत्र में वहती हैं।
महापुण्डरीक हृद के उत्तर तोरण द्वार से रूप्यकूला नदी निकली है, जो जघन्य भोग भूमि में बहती हुई पश्चिम समुद्र में मिल जाती है । शिखरी पर्वत पर. स्थित पुण्डरीक हद के दक्षिण तोरणद्वार से सवर्णकूला नदी निकली है, जो जघन्य भोग भूमि में बहती हुई पूर्व समुद्र में मिलती है। सुवर्णकूला और रूप्यकूला नदी हैरण्यवत् क्षेत्र में बहती हैं।
पुण्डरीक ह्रद के पश्चिम तोरण द्वार से रक्तोदा नदी निकली है, जो विजयाद्ध पर्वत को भेदकर म्लेच्छ खण्ड में बहती हुई पपिसम समुद्र में मिल जाती है । पुण्डरीक ह्रद के पूर्व तोरण द्वार से रक्ता नदी निकली है, जो विजया पर्वत को भेदकर भ्लेच्छ खण्ड में बहती हुई समुद्र मिल जाती है । रक्ता और रक्तोदा नदी
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[ गो. प्र. चिन्तामणि ऐरावत क्षेत्र में बहती हैं। ...
देव कुरु के मध्य में सीतोदा नदी सम्बन्धी पांच ह्रद हैं । प्रत्येक हद के पूर्व और पश्चिम तटों पर पांच-पांच सिद्ध कूट नामक क्षुद्र पर्वत है । इस प्रकार पांचों ह्रदों के तटों पर पचास क्षुद्र पर्वत हैं। ये पर्वत पचास योजन लम्बे पच्चीस योजन चौड़े और संतीस योजन ऊंचे हैं। प्रत्येक पर्वत के ऊपर अष्ट प्रातिहार्य संयुक्त, रत्न, सुवर्ण और चांदी से निर्मित, पल्यङ्कासनारूढ़ और पूर्वाभिभूख एक-एक जिन प्रतिमा है।
अपरं विदेह से भी सीतोदा नदी सम्बन्धी पांच ह्रद हैं। इन हदों के दक्षिण और उत्तर तटों पर पांच-पांच सिद्धकूट नाम के क्षुद्र पर्वत हैं । अन्य वर्णन पूर्ववत् है ।
.: इसी प्रकार कुरा में सीता सम्बन्धी पांच लद हैं । इन हदों के पूर्व और पश्चिम तटों पर पूर्ववत् पचास सिद्ध कूट पर्वत हैं । पूर्व टिदेद में भी सीता नदी सम्बन्धी पांच हद हैं। इन ह्रदों के दक्षिण और उत्तर तटों पर पचास सिद्ध कूट पर्वत हैं । इस प्रकार जम्बूद्वीप के मेरु सम्बन्धी सिद्धकूट दो सौ हैं, और पांचों मेरु सम्बन्धी सिद्ध कूटों की संख्या एक हजार है । शेष बची हुई नदियां कहां जाती हैं ?
शेषारस्वपरगाः ॥११८१॥
पूर्व सूत्र में कही गई नदियों से शेष बची हुई नदियाँ पश्चिम समुद्र को जाती हैं, अर्थात् गंगा और सिन्धु में से सिन्धु पश्चिम समुद्र को जाती है । यही क्रम आगे भी है। नदियों का परिवार--
चतुर्दश मदी सहस्त्र परिवता गंगासिन्ध्वादयो नः ।।११८२॥ गंगा, सिन्धु आदि नदियां चौदह हजार परिवार नदियों से सहित हैं।
यद्यपि बीसवें सूत्र गत 'सरितस्तन्मध्यगाः' इस वाक्य में आये हुये सरित शब्द से इस सूत्र में भी नदी का सम्बन्ध हो जाता, क्योंकि यह नदियों का प्रकरण है फिर भी इस सूत्र में 'नछः' शब्द का ग्रहण यह सूचित करता है कि आगे-आगे की युगल नदियों के परिवार नदियों की संख्या पूर्व-पूर्व की संख्या से दूनी दूनी हैं !
यदि 'चतुर्दश नदी सहस्त्र परिव्रता नद्यः' इतना ही सूत्र बनाते तो 'अनन्तस्य ।
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विवि प्रतिषेधो का इस नियम अनुसार शेपास्त्वपरगाः' इस सूत्र में कथित पश्चिम समुद्र को जाने वाली नदियों का ही यहां ग्रहण होता और चतुर्दश नदी सहस्त्र परिवृता गंमादयो नद्यः ऐसा सूत्र करने पर पूर्व समुद्र को जाने वाली नदियों का ही ग्रहण होता। अतः सब नदियों को ग्रहण करने के लिये 'गंगासिन्ध्वादयो' वाक्य सूत्र में आवश्यक है।
गंगा, सिन्धु नदियों को परिवारनदियां चौदह-चौदह हजार, रोहित और रोहितास्या नदियों की परिवारनदियां अट्ठाईस-अट्ठाईस हजार, हरित और हरिकान्ता नदियों की परिवारनदियां छप्पन छप्पन हजार, सीता और सीतोदा नदियों में प्रत्येक को परिवार नदियां एक लाख बारह हजार हैं । नारी और नरकान्ता, सुवर्णकूला और रूप्यकुला, रक्ता और रक्तोदा नदियों के परिवारनदियों की संख्या क्रम से हरित और हरिकान्ता, रोहित और रोहितास्या, गंगा और सिन्धु नदियों के परिवार नदियों की संख्या के समान है। .... . - भोग भुमि को नदियों में त्रस जीव नहीं होते हैं । जम्बूद्वीप सम्बन्धी मूल नदियां अठत्तर हैं। इनकी परिवारनदियों की संख्या पन्द्रह लाख बारह हजार है। जम्बूद्धीप में विभंग नदियां बारह हैं ।
इस प्रकार पश्चिममेरु सम्बन्धी मूल नदियां तीन सौ नब्बे हैं और इनकी परिवारनदियों को संख्या पिचहत्तर लाख साठ हजार है । विभंग नदियों की संख्या साठ है। भरत क्षेत्र का विस्तार-...
भरतः षड्विंशति पच योजन शत विस्तारः षट् चैकोन विशति भागा योजनस्य ॥११८३॥
भरत क्षेत्र का विस्तार पांच सी छब्बीस योजन और एक योजन के उन्नीस भागों में छह भाग ५२६, है । मागे के पर्वत और क्षेत्रों का विस्तार--
___ तदद्विगुरादिगुरण विस्तारा वर्यधर वर्षा बियेहान्ताः ॥११८४॥
___ आगे-आगे के पर्वत और क्षेत्रों का विस्तार भरत क्षेत्र के विस्तार से द्रनादुना है । लेकिन यह क्रम विदेह क्षेत्र पर्यन्त ही है । क्षेत्र से उत्तर के पर्वतों और क्षेत्रों का विस्तार क्षेत्र के विस्तार से आधा-आधा होता गया है । .
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' [ गो. प्र. चिन्तामणि ... भरत क्षेत्र के विस्तार से हिमवान् पर्वत का विस्तार दूना है । हिमवान् पर्वत के विस्तार से हैमवत् क्षेत्र का विस्तार दूना है । यही क्रम विदेह क्षेत्र पर्यन्त है । विदेह क्षेत्र के विस्तार से नील पर्वत का विस्तार आधा है । नील पर्वत के विस्तार से रम्यक क्षेत्र का विस्तार प्राधा है । यह क्रम ऐरावत क्षेत्र पर्यन्त है ।। __ उत्तरा दक्षिणतुल्या: ।।११८५॥
उत्तर के क्षेत्र और पर्वतो. का विस्तार दक्षिण के क्षेत्र और पर्वतों के विस्तार के समान है । अर्थात् रम्यक, हैरण्यवत् और ऐरावत क्षेत्रों का विस्तार क्रम से हरि हैमवत और भरत क्षेत्र के विस्तार के समान है । नील, रुक्मि और शिखरी पर्नतों का विस्तार क्रम से निषध, महाहिमवान् और हिमवान् पर्वतों के विस्तार के बराबर है। भरत और ऐरावत क्षेत्र में काल का परिवर्तनभरातैरावतयो वृद्धिह्नासौ षट् समयाभ्यामुत्सपिण्यवसर्पिणीभ्याम्
॥११८६३ भरत और ऐरावत क्षेत्र में उत्सर्पिणी और अक्सपिरणी काल के छह समयों द्वारा जीवों की आयु, काय, सुख प्रादि की वृद्धि और हानि होती रहती है । होत्रों की हानि वृद्धि नहीं होती। कोई प्राचार्य "भरतैरावतयोः' पद में षष्ठी द्विवचन न मानकर सप्तमी का द्विवचन मानते हैं । उनके मत से भी उत्सर्पिणी और अवपिरणी काल के द्वारा भरत और ऐरावत क्षेत्र की वृद्धि और हानि होती है, किन्तु भरत और ऐरावत क्षेत्र में रहने वाले मनुष्यों की प्रायु उपभोग आदि की वृद्धि और हानी होती है। उत्सपिगी काल में आयु और उपभोग आदि की वृद्धि और अवसर्पिणी काल में हानि होती है।
प्रश्न :-छहों काली का वर्णन किस प्रकार है ?
उत्तर :- प्रत्येक उत्सपिणी और अक्सगिणी के छह-छह भेद हैं । अबसर्पिणी काल के छह भेव-१. सुषमा सुषमा, २. सुषमा, ३, सुषमा दृषमा, ४. दुःषमा सुषमा, ५ दुषमा, ६. अति दुःषमा ।
उत्सपिसी काल के छह भेद-१. अति दुःषमा, २. दूषमा, ३. दुधमा सुषमा, ४. सुषमा दुःषमा, ५. सुषमा, ६. सुषमा सुषमा ।
यद्यपि वर्तमान में प्रवसपिरणी काल होने से सुत्र में अवसपिणी ग्रहण का
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अध्याय : सातवां ]
[ ४ee
पहले होना चाहिए, लेकिन उत्सर्पिणी शब्द को अल्प स्वरवाला होने से पहले
कहा है ।
सुषमा सुषमा चार कोड़ा कोड़ी सागर, सुषमा तीन कोडा - कोडी सागर सुपमा दुःपमा दो कोड़ा कोड़ी सागर, दुषमा सुषमा बयालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ा कोड़ी सागर, दुःषमा इवकीस हजार वर्ष और अति दुःषमा इक्कीस हजार वर्ष का है ।
अवसर्पिणी के प्रथम काल में उत्तम भोग भूमि की, द्वितीय काम में मध्यम भोग भूमि की और तृतीय काल में जघन्य भोग भूमि की रचना होती है । तृतीय काल में पल्य के आठवें भाग बाकी रहने पर सोलह कुलकर उत्पन्न होते हैं । पन्द्रह कुलकरों की मृत्यु तृतीय काल में हो ही जाती है, लेकिन सोलहवें कुलकर की मृत्यु चौथे काल में होती है ।
प्रथम कुलकर की आयु पल्य के दशम भाग प्रभार है। ज्योतिरङ्ग hereक्षों की ज्योति के मन्द हो जाने के कारण चन्द्र और सूर्य के दर्शन से मनुष्यों को भयभीत होने पर प्रथम कुलंकर उनके भय का निवारण करता है । द्वितीय कुलकर की आपल्य के सौ भागों में से एक भाग प्रमाण है । द्वितीय कुलकर के समय में तारायों को देकखर भी लोग डरने लगते हैं, ग्रतः वह उनके भय को दूर करता है । तृतीय कुलकर की आयु पत्य के हजार भागों में से एक भाग प्रसारण है । वह सिंह, व्याघ्र प्रादि हिंसक जीवों से उत्पन्न भय का परिहार करता है । चतुर्थ कुलकर की आयु पल्य के दश हजार भागों में से एक भाग प्रमाण है । वह सिंह, व्याघ्र आदि के भय को निवारण करने के लिये लाठी श्रादि रखना सिखाता है । पांचवे कुलकर की आयु पल्य के लाख भागों में से एक भाग प्रमाण है । वह कल्प वृक्षों की सीमा को वचन द्वारा नियत करता है, क्योंकि उसके काल में कल्प वृक्ष कम हो जाते हैं और फल भी कम लगते हैं । छटवें कुलकर की प्रायु पल्य के दश लाख भोगों में से एक भाग प्रसारण है । वह गुल्म आदि चिन्हों से कल्प वृक्षों की सीमा को नियत करता है, क्योंकि उसके काल में कल्प वृक्ष बहुत कम रह जाते हैं और फल भी अत्यल्प लगते हैं। सातवें कुलकर की भ्रा पत्य के करोड़ भागों में से एक भाग प्रमाण हैं । वह शूरता के उपकरणों का उपदेश और हाथी यादि पर सवारी करना सिखाता है । आठवें कुलकर की प्रायु पल्य के दश करोड़ भागों में से एक भाग
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५०० 1
[ गो, प्र. चिन्तामणि प्रमाण है । वह सन्तान के दर्शन से उत्पन्न भय को दूर करता है । नवम कुलकर की प्रायु पल्य के सौ करोड़ भागों में से एक भाग प्रमाण है । वह सन्तान को आशीर्वाद देना सिखाता है। दशम कुलकर की आयु पल्य के हजार करोड़ भागों में से एक भा मारा है ।
वह बालकों के रोने पर चन्द्रमा आदि के दर्शन तथा अन्य क्रीडा के उपाय बतलाता है । ग्यारहवें कुलकर की आयु पल्य के दश हजार करोड़ भागों में से एक भाम प्रमाण है । उसके काल में युगल (युरुष और स्त्री) अपनी सन्तान के साथ कुछ दिन तक जीवित रहता है। बारहवें कुलकर की आयु पल्य के लाख करोड़ भागों में से एक भाग प्रमाण है। वह जल को पार करने के लिये नौका आदि की रचना कराना सिखाना तथा पर्वत आदि पर चढ़ने और उतरने के लिये सिढी प्रादि को बनवाने का उपाय बताता है । उसके काल में युगल अपनी सन्तान के साथ बहुत काल तक जीवित रहता है । मेधों के अल्प होने के कारण वर्षा भी अल्प होती है । इस कारण से छोटी-छोटी नदियां और छोटे-छोटे पर्वत भी हो जाते हैं। तेरहवें कुलकर की आयु पल्य के दश लाख करोड़ भागों में से एक भाग प्रमाण है। वह जरायु (गर्भ जन्म से उत्पन्न प्रारिखयों के जरायु होती है 1) आदि के मल को दूर करना सिखाता है । चौदहवें कुलकर की प्रायु पूर्व कोटि वर्ष प्रमाण है । वह सन्तान के नाभिनाल को काटना सिखाता है। उसके काल में प्रचुर मेघ अधिक वर्षा करते हैं। बिना बोये धान्य पैदा होता है । वह धान्य को खाने का उपाय तथा अभक्ष्य औषधि
और अभक्ष्य वृक्षों का त्याग बतलाता है। पन्द्रचों कुलकर तीर्थकर होता है । सोलहवाँ कुलकर उसका पुत्र चक्रवर्ती होला है। इन दोनों की आयु चौरासी लाख पूर्व की होती है।
सुषमा-सुषमा नामक चौथे काल के श्रादि में मनुष्य विदेह क्षेत्र के मनुष्यों के समान पांच सौ धनुष ऊंचे होते हैं। काल में तेईस तीर्थंकर उत्पन्न होते हैं और मुक्त भी होते हैं । ग्यारह चक्रवती, नव बलभद्र, नव वासुदेव, नव प्रतिवासुदेव और ग्यारह रुद्र भी इस काल में उत्पन्न होते हैं । वासुदेवों के काल में नव नारद भी उत्पन्न होते हैं तथा ये कलह प्रिय होने के कारण नरक में जाते हैं ! चौधे काल के अन्त में 'मनुष्यों की प्रायु एक सौ बीस वर्ष और शरीर की ऊंचाई सात हाथ रह जाती है । दुःषमा नामक पञ्चम काल के आदि में मनुष्यों की आयु एक सौ बीस वर्ष और
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अध्याय: सातवां ]
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शरीर की ऊंचाई सात हाथ होती है। और अन्त में आयु बीस वर्ष और शरीर की ऊंचाई साढ़े तीन हाथ रह जाती है ।
अति दुःषमा नामक छठवें काल के आदि मनुष्यों की आयु बीस वर्ष होती है, अन्त में सोलह वर्ष और शरीर की ऊँचाई एक हाथ रह जाती है । छठवें काल के अन्त में प्रलय काल याता है। प्रलय काल में सरस, विरस, तीक्ष्ण, रुक्ष, उष्ण, विष और क्षार मेघ क्रम से सात-सात दिन बरसते हैं । सम्पूर्ण प्रार्य खण्ड में प्रलय होने पर मनुष्यों बहत्तर युगल शेष रह जाते हैं। चित्राभूमि निकल आती है । बराबर हो जाती है । इस प्रकार दस कोड़ा-कोड़ी सागर का अवसर्पिणी काल समाप्त होता है । इसके बाद दस का कोडी सागर का उत्सर्पिणी काल प्रारम्भ होता है ।
उत्सर्पिणी के प्रतिदुषमा नामक प्रथम काल के श्रादि में उनचास दिन पर्यन्त लगातार क्षीर मेघ बरसते हैं, पुनः अमृत मेघ भी उतने ही दिन पर्यन्त बरसते हूँ । यदि मनुष्यों की श्रायु सोलह वर्ष शरीर की ऊंचाई एक हाथ रहती है और अन्त में मा बीस वर्ष और शरीर की ऊंचाई साढ़े तीन हाथ हो जाती है । मेघों के बरसने से पृथिवी कोमल हो जाती है । श्रौषधि, तरु, गुल्म, तृण आदि इस सहित हो जाते हैं । पूर्वोक्त युगल बिलों से निकलकर सरस वान्य श्रादि के उपभोग से सहर्ष रहते हैं ।
Hare fद्वतीय काल के यादि में मनुष्यों की आयु बीस वर्ष और शरीर की ऊंचाई साढ़े तीन हाथ होती है । द्वितीय काल में एक हजार वर्ष शेष रहने पञ्चम काल के चौदह कुलकर उत्पन्न होते हैं । ये कुलकर अवसर्पिणो काल राजाओं की तरह होते हैं। तेरह कुलकर द्वितीय काल में ही उत्पन्न होते हैं और मरते भी द्वितीय काल में ही हैं । लेकिन rear कुलकर उत्पन्न तो द्वितीय काल में होता लेकिन मरता तृतीय काल में है। चौदहवें कुलकर का पुत्र तीर्थंकर होता है। और तीर्थंकर का पुत्र चक्रवत होता है इन दोनों की उत्पत्ति तीसरे काल में होती है ।
।
'दुषमा सुषमा नामक तृतीय काल के यादि में मनुष्यों की आयु एक सौ बीस वर्ष और शरीर की ऊंचाई सात हाथ होती है । और अन्त में श्रायु कोटि पूर्व वर्ष ओर शरीर की ऊंचाई सवा पांच सौ धनुष प्रमाण होती है, इस काल में शलाकापुरुष उत्पन्न होते हैं ।
सुषमा दुषमा नामक चोथे काल में जघन्य भोग भूमि की रचना सुषमा नामक
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( गो. प्र. चिन्तामणि पञ्चम काल में मध्यम भोग भूमि की रचना और सुषमा-सुषमा नामक छठे काल में उत्तम भोग भूमि की रचना होती है।
चौथे, पांचवें पोर छठे काल में एक भी ईति नहीं होती है। ज्योति रंग कल्पवृक्षों के प्रकाश से रात दिन का विभाग भी नहीं होता है। मेघ वृष्टि, शीत बाधा, उष्ण बाधा, क्रूर मृग बाधा आदि कभी नहीं होती हैं। इस प्रकार दश कोड़ा कोड़ी सागर का उत्सपिरणी काल समाप्त हो जाता है। पुनः अवसर्पिणी काल पाता है। इस प्रकार अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल का चक्र चलता रहता है। उत्सपिणी के दश कोड़ा कोड़ी सागर का एक कल्प होता है। एक कल्प में भोग भूमि का काल अठारह कोड़ा कोड़ी सागर है। भोग भूमि के मनुष्य मधुर भाषी, सर्व कला कुशल, समान भोग वाले, पसीने से रहित और ईर्ष्या, मात्सर्य, कृपरपता, ग्लानि, भय, विषाद, काम आदि से रहित होते हैं । उनको इष्ट वियोग और अनिष्ट संयोग नहीं होता । आयु के अन्त में जंभाई लेने से पुरुष की और छींक से स्त्री की मृत्यु हो जाती है। वहाँ नपुसक नहीं होते हैं। सब मृग (पशु) विशिष्ट घास को चरने वाले और समान आयु बाले होते हैं। अन्य भूमियों का वर्णन
ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥११८७॥
भरत और ऐरावत क्षेत्र को छोड़कर अन्य भूमियां सदा अवस्थित रहती हैं। उनमें काल का परिवर्तन नहीं होता, हैमवत, हरि और देवकुरु में कम से अवसपिरणी काल के तृतीय, द्वितीय और प्रथम काल की सत्ता रहती है। इसी प्रकार हैरन्यवत, रम्यक और उत्तर कुरू में भी काल की अवस्थिति समझना चाहिये । हैमवत आदि क्षेत्रों में प्रायु का वर्णन
एक द्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवत कहारिवर्षक देवकुखकाः ॥११८८॥
हैमवत, हरिक्षेत्र तथा देवकुरु में उत्पन्न होने वाले प्राणियों की प्रायु क्रमशः एक पल्य, दो पल्य और तीन पल्य की है। शरीर की ऊँचाई क्रमशः दो हजार धनुष, चार हजार और छह हजार धनुष हैं । भोजन क्रमश: एक दिन बाद, तथा तीन दिन बाद करते हैं । शरीर का रंग क्रम से नील कमल के समान, कुन्द पुष्प के समान और कंचन वर्मा होता है।
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अनाम : साता
[ ५०३ उत्तर के क्षेत्रों में प्रायु की व्यवस्था--
तथोत्तराः ॥११८६
उत्तर के क्षेत्रों के निवासियों की प्रायु दक्षिण क्षेत्रों के निवासियों के समान ही है । अर्थात् हैरण्यवत, रम्यकक्षेत्र तथा उत्तर कुरु में उत्पन्न होने वाले प्राणियों की आयु कमशः एक, दो और तीन पल्य की है । विदेह क्षेत्र में वायु को व्यवस्था
विवेहेषु संख्येयकालाः ॥११६०॥
विदेह क्षेत्र में संख्यात वर्ष की आयु होती है। प्रत्येक मेरु सम्बन्धी, पांच पूर्व विदेह और पांच अपर विदेह होते हैं । इन दोनों विदेहों को महाविदेह कहते हैं । विदेह में उत्कृष्ट प्रायु पूर्व कोटि वर्ष जघन्य आयु अन्त मुहूर्त है ।
विदेह में सदा दुषमा सुषमा काल रहता है। मनुष्यों के शरीर की ऊँचाई पांच सौ धनुष है । वहाँ के मनुष्य प्रतिदिन भोजन करते हैं।
___ सत्तर लाख करोड़ और छप्पन हजार करोड़ वर्षों के समूह का नाम पूर्व है । अर्थात् ७०५६०००००००००० वर्ष का पूर्व होता है । भरत क्षेत्र का दूसरी तरह से विस्तार वर्णन
भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभागाः ॥११६१॥
भरत क्षेत्र का विस्तार जम्बू द्वीप के एक सौ नम्वेचा भाग है। अर्थात् जम्बू द्वीप के एक सौ नन्दे भाग करने पर एक भाग भरत क्षेत्र का विस्तार है ।।
जम्बूद्वीप के अन्त में एक वेदी है, उसका विस्तार जम्बूद्वीप के विस्तार में ही सम्मिलित है। इसी प्रकार सभी द्वीपों की बेदियों का विस्तार द्वीपों के विस्तार के अन्तर्गत ही है । लवण समुद्र के मध्य में चारों दिशाओं में पाताल नाम वाले अलजलाकर चार बड़वानल' हैं, जो एक लाख यौजन गहरे, मध्य में एक लाख योजन विस्तार युक्त और मुख तथा मूल में दश हजार योजन विस्तार वाले हैं। चारों विदिशाओं में चार क्षुद्र बड़वानल भी है । जिनकी गहराई दश हजार योजन, मध्य में विस्तार दश हजार योजन और मुख तथा मूल में विस्तार एक हजार योजग है। इन आठ बड़वानलों के आठ अन्तरालों में से प्रत्येक अन्तराल में पंक्ति में स्थित एक सौ पच्चीस बाडव हैं जिनकी गहराई एक हजार योजन, मध्य में विस्तार एक हजार प्रोजन और मुख
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५०४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि तथा मूल पांच सौ योजन विस्तार है। इस प्रकार बड़वालों की संख्या एक हजार आठ है । इन बड़वानलों के प्रन्तराल में भी छोटे-छोटे बहुत से बड़वाल है । प्रत्येक बड़वाल के तीन भाग हैं। नीचे के भाग में वायु, मध्य भाग में वायु और जल, और ऊपर के भाग में केवल जल रहता है। जब वायु धीरे-धीरे नीचे के भाग से ऊपर के भाग में चढ़ती है तो मध्यम भाग का जल वायु से प्रेरित होने के कारण ऊपर को चढ़ता है । इस प्रकार बडवानल का जल समुद्र में समुद्र का जल तट के ऊपर आ जाता है । पुनः जब वायु धीरे-धीरे नीचे की चली जाती है तब समुद्र का जल भी घट जाता है ।
लवण समुद्र में ही वेला ( तट ) है अन्य समुद्रों में नहीं । अन्य समुद्रों में बड़वाल भी नहीं है, क्योंकि सब समुद्र एक हजार योजन गहरे हैं। लवण समुद्र का ही जल उन्नत है अन्य समुद्रों का जल सम ( बराबर ) है ।
लवण समुद्र के जल का स्वाद नमक के समान, वारुणी समुद्र के जल का स्वाद मदिरा के समान, क्षीर समुद्र जल का स्वाद दूध के समान, धृतोद समुद्र के जल का स्वाद घृत के समान, कालोद, पुष्कर और स्वयम्भूरमण समुद्र के जल का स्वाद जल के समान और अन्य समुद्रों के जल का स्वाद इक्षुरस के समान है ।
लवण, कालोद और स्वयंभूरमण समुद्र में ही जलचर जीव होते हैं, प्रन्य समुद्रों में नहीं । लवण समुद्र में नदियों के प्रवेश द्वारों में मत्स्यों का शरीर नौ योजन और समुद्र के मध्य में नदियों के प्रवेश द्वारों में मत्स्यों के शरीर का विस्तार अठारह योजन और समुद्र के मध्य में छत्तीस योजन है । स्वयंभूरमरण समुद्र के तट पर रहने वाली मछलियों के शरीर का विस्तार पांच सौ योजन और समुद्र के मध्य में एक हजार योजन है । लवण, कालोद और पुष्करवर समुद्र में ही नदियों के प्रवेश द्वार हैं, अन्य समुद्रों में नहीं हैं । अन्य समुद्रों की वेदियां भित्ति के समान हैं ।
घातकी खण्ड द्वीप का वर्णन
. द्विर्धातकी खण्डे ।।११६२॥
घातकी खण्ड द्वीप में क्षेत्र, पर्वत यादि की संख्या समस्त बातें जम्बूद्वीप से
दूनी दूनी हैं।
धातकी खण्ड द्वीप की दक्षिण दिशा में दक्षिण से उत्तर तक लम्बा इवाकार नामक पर्वत है जो लवण और कालोद समुद्र की वेदियों को स्पर्श करता है ।
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अध्याय : सातवां }
. [ ५०५ और उत्तर दिशा में भी इसी तरह का दूसरा इष्वाकार नामक पर्वत है । प्रत्येक पर्वत चार लाख योजन लम्बे हैं। दोनों इष्वाकार पर्वतों से धातकी खण्ड के दो भाग हो गये हैं-एक पूर्व घातकी खण्ड और दूसरा अपर धातकी खण्ड । प्रत्येक भाग के मध्य में एकएक मेरु है । पूर्व दिशा में पूर्व मेरु और पश्चिम दिशा में अपर मेरु है। प्रत्येक मेरु सम्बन्धी भरत आदि सात क्षोत्र और हिमवन् प्रादि छह पर्वत हैं। इस प्रकार धातकी खुण्ड में क्षोत्र और पर्वतों की संख्या जम्बू द्वीप से दूनी हैं । जम्बू द्वीप में हिमवान् आदि पर्वतों का जो विस्तार है उससे दूना विस्तार धातकी खंड के हिमवान आदि पर्वतों का है, लेकिन ऊँचाई और गहराई अबूद्वी के समान ही है। इसी तरह विजयार्द्ध पर्वत और वृत्तवेदाढ्य पर्वतों की संख्या भी जम्बू द्वीप के समान है। धातकी खंड में हिमवान् आदि पर्वत चक्र के सारे के समान हैं और क्षेत्र प्रारों के छिद्र के आकार
पुष्कर द्वीप का वर्णन--
पुष्कराः छ ॥११९३६ : पुष्कर द्वीप के पद्ध' भाग में भी सब रचना जम्बू द्वीप से दूनी है।
धातकी खंड द्वीप के समान पुष्करार्ध में भी दक्षिण से उत्तर तक लम्बे और आठ लाख योजन विस्तृत दो इष्वाकार पर्वत हैं। इस कारण पुष्कराद्ध के दो भाग हो गये हैं। दोनों भागों में दो मेरु पर्वत है--एक पूर्व मेरू और दूसरा अपर मेरु । प्रत्येक मेरु सम्बन्धी भरत आदि सात क्षेत्र और हिमवान् प्रादि छह पर्वत हैं । पुष्कराध द्वीप में सारी रचना धातकी खंड द्वीप के समान ही है । विशेषता यह है कि पुष्कराई के हिमवान आदि पर्वतों का विस्तार धातकी खंड के हिमवान आदि पर्वतों के विस्तार से दूना है । पुष्कर द्वीप के मध्य में गोलाकार मानुषोत्तर पति है, अतः इस पर्वत से विभक्त होने के कारण इसका नाम पुष्करा पड़ा। प्राधे पुष्कर द्वीप में ही मनुष्य हैं, अतः पुष्कराद्ध का ही वर्णन यहाँ किया गया है। मनुष्य क्षेत्र की सीमा---
प्राङ्मानुषोत्तरात्मनुष्यः ।।११६४॥ .. . .. ..
मानुषोत्तर पर्वत के पहले ही मनुष्य होते हैं, प्रागे नहीं मानुषोत्तर पर्वत के बाहर विद्याधर और ऋद्धि प्राप्त मुनि भी नहीं जाते हैं। मनुष्य क्षेत्र के अस भी बाहर नहीं जाते हैं । पुष्कराद्ध की नदियां भी मानुषोत्तर के बाहर नहीं बहती हैं।
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. जब मनुष्य के क्षेत्र के बाहर मत कोई तिर्यंच या देव मनुष्य क्षेत्र में प्राता है तो मनुष्य गत्यानुपूर्वी नाम कर्म का उदय होने से मानुषोत्तर के बाहर भी उसको उपचार से मनुष्य कह सकते हैं । दंड, कपाट, प्रतर और लोक पूरण समुद्धात के समय भी मानुषोत्तर से बाहर मनुष्य जाता है। मनुष्यों के भेद-~
आर्या म्लेच्छाश्व ॥११६५।। मनुष्यो के दो भेद हैं-आर्य और म्लेच्छ ।
जो गुरणों से सहित हों अथवा मुणवान् लोग जिनकी सेवा करें, उन्हें प्राय कहते हैं । जो निर्लज्जता पूर्वक चाहे जो कुछ बोलते हैं, वे म्लेच्छ हैं।
आर्यो के दो भेद-ऋद्धि प्राप्त आर्य और ऋद्धि रहित आर्य । ऋद्धि प्राप्त अायों के ऋद्धियों के भेद से पाठ भेद हैं। पाठ ऋद्धियों के नाम--बुद्धि, क्रिया, विक्रिया, तप, बल, औषध, रस और क्षोत्र।
. बुष्टि ऋजिर टाइटेड हैं। १. अवधिज्ञानी, २. मनः पर्ययज्ञानी, ३: केवलज्ञानी, ४. बीज बुद्धि वाले, ५. कोष्ठ बुद्धि वाले, ६. साम्भियश्रोत्री, ७. पदानुसारी १. दूर से स्पर्श करने में समर्थ, १. दूर से रसास्वाद करने में समर्थ, १०. दूर से गंध ग्रहण करने से समर्थ, ११. दूर से सुनने में समर्थ, १२ दूर से देखने में समर्थ, १३. दश पूर्व के ज्ञाता, १४. चौवह पूर्व के ज्ञाता, १५, पाठ महानिमित्तों के जानने वाले, १६. प्रत्येक बुद्ध, १७. वाद विवाद करने वाले और १८. प्रज्ञाश्रमरण । एक बीजाक्षर का ज्ञान होने से समस्त शास्त्र का ज्ञाता हो जाने को बीज बुद्धि कहते हैं । धान्यागर में संग्रहीत विविध धान्यों की तरह जिस बुद्धि में सुने हुये वर्ण आदि का बहुत काल तक विनाश नहीं होता है, वह कोष्ठ बुद्धि हैं। क्रिया ऋद्धि दो प्रकार की है-जंघादि चारणत्व और अाकाश गामित्व । जंघादि चारणत्व के नौ भेद हैं-~
१. जंधाचारणत्व--भूमि से चार अंगुल ऊपर आकाश में गमन करना। २. श्रेणियारणत्व---विद्याधरों की श्रेणि पर्यन्त आकाश में गथन करना । ३. अग्निशिखा चारणत्व-~-अग्नि की ज्याला के ऊपर गमन करना । ४. जल चारसत्व-जल को विना छुये जल पर गमन करना। ५. पत्र प्रारणत्व–पत्ते को बिना छुए पत्ते पर गमन करना ।
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अध्याय : सातवां ]:
६. फल चारण-फल को बिना छुए फल पर गमन करना । ... पुष्प शारामा .....पुर को बिला हुए पुष्प पर गमन करना ।
८. बीज चारणत्व-बीज को बिना छुए बीज पर गमन करना । ६. तन्तु चारणत्व-तन्तु को विना छुए तन्तु पर गमन करना ।
पैरों के उत्क्षेपण (उठाना और रखना) के बिना प्रकाश में गमन करना, पर्यङ्कासन से आकाश में गमन करना, ऊपर को स्थित होकर आकाश में गमन करना, अथवा सामान्य रूप से बैठकर आकाश में गमन करना आकाशगामित्व है ।
अणिमा आदि के भेद से विक्रिया ऋद्धि अनेक प्रकार की है।
प्रतिमा- शरीर को सूक्ष्म बना लेना अथवा (कमलनालं) में भी प्रवेश करके चक्रवर्ती के परिवार को विभूति को बना लेना अंरिणमा है।
महिमा-शरीर को बड़ा बना लेता महिमा है। लधिमा-शरीर को छोटा बना लेना लधिमा है । गरिमा शरीर को भारी बना लेना मरिमा है ।
प्राप्ति-भूमि पर रहते हुए भी अंगुलि के अग्रभाग से मेंरू की शिखर, चन्द्र, सूर्य आदि को स्पर्श करने की शक्ति का नाम प्राप्ति ऋद्धि है ।
प्राकाम्य-~-जल में भूमि की तरह चलना और भूमि पर जल की तरह गमन करना, अथवा जाति, क्रिया, गुरा द्रव्य सैन्य प्रादि का बनाना प्राकाम्य है।
ईशित्व-तीन लोक के प्रभुत्व को पाना ईशित्व है । वशित्व--सम्पूर्ण प्राणियों को वश में करने की शक्ति का नाम वशित्व है।
अप्रतीधात--पर्वत पर भी प्रकाश की तरह गमन करना, अनेक रूपों का बनाना अप्रतिधात है।
कामरूपीत्व-मूर्त और अमूर्त अनेक प्राकारों का बनाना कामरूपित्व है ।
अन्तर्धान-रूप को अदष्ट बना लेना । तप ऋद्धिक सास भेद हैं....
१. घोर तप, २. महा तप, ३. उग्र तप, ४. दीप्त तप, ५. तप्त तप, ६. घोर गुण ब्रह्मचारिता, ७. घोर पराक्रमता ।
घोर तप---सिंह, व्याध, चीता, स्वायद आदि दृष्ट प्राणियों से युक्त गिरिकंदरा
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५०८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि आदि स्थानों में और भयानक श्मशानों में तीन तप, शीत आदि की बाधा होने पर भी घोर उपसर्गों का सहना घोर तप है ।
महातप--पक्ष, मास, छह मास और एक वर्ष का उपवास करना महातप है। एक वर्ष के उपरान्त पारणा होती है और केवलज्ञान भी हो जाता है। इसलिये एक वर्ष से अधिक उपवास नहीं होता है । . .. उन तप-पञ्चमी को, अष्टमी को और चतुर्दशी को उपवास करना और दो या तीन बार आहार न मिलने पर तीन, चार अथवा पांच उपवास करना उग्र
।
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... ..... दीप्त तप- शरीर से बारह सूर्यों जैसी कान्ति का निकलना दीप्त तप है ।
हत तपःो गए लोहपिणन पर गिरी हुई. जल की बूंद की तरह आहार ग्रहण करते हों आहार का पता न लगना अर्थात् आहार का पच जाना तप्त तप है।
घोर गुरण प्रहाचारिता-सिंह, व्याघ्र आदि क्रूर प्राणियों से सेवित होना घोर गुण ब्रह्मचारिता है।
घोर पराकमता---मुनियों को देखकर भूत, प्रेत, राक्षस, शाकिनी आदि का घर जाना घोर पराक्रमता है।
बल ऋद्धि---इसके तीन भेद हैं--मनोबल, वचनबल, कावबल ।
मनोबलअन्तर्मुहूर्त में सम्पूर्ण श्रुत को चिन्तन करने की सामर्थ्य का नाम मनोबल है।
वचन बल-अन्तर्मुहूर्त में सम्पूर्ण श्रुत को पाठ करने की शक्ति का नाम वचनबल है।
काय बल--एक मास चार मास, छह मास और १ वर्ष तक भी कायोत्सर्ग करने की शक्ति होना अथवा अंगुली के अग्र भाग से तीनों लोकों को उठाकर दुसरी जगह रखने की सामर्थ्य का होना काय बल है।
औषध ऋद्धि--पाठ प्रकार की है। जिन मुनियों को निम्न पाठों बातों के द्वारा प्राणियों के रोग नष्ट हो जाते हैं, वे मुनि औषद्ध ऋद्धि के धारी होते हैं। .
१. बिट् (मत) लेपन, २: मल का एक देश छूना, ३. अपक्व आहार का स्पर्श, ४. सम्पूर्ण अंगों के मल का स्पर्श, ५. निष्ठीवन का स्पर्श, ६. दन्त, केश, नख मुत्र आदि का स्पर्श, ७. कृपादृष्टि से अवलोकन और कृपा से दातों का दिखाना ।
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अध्याय : सातवां ]
रस ऋद्धि के छह भेद हैं
१.
२.
३.
४.
५.
श्रास्यविष --- किसी दृष्टिगत प्राणी को मर जानो' ऐसा कहने पर उस प्राणी का तत्क्षण ही मररण हो जाय इस प्रकार की सामर्थ्य का नाम मास्यवि अथवा वाग्विष है ।
effer - किसी क्रुद्ध मुनि के द्वारा किसी प्राणी के जाने पर उस प्राणी का उसी समय मरण हो जाय इस प्रकार की सामर्थ्य का नाम दृष्टिविष है 1.
क्षेत्र ऋद्धि के दो भेद हैं
{ ५०६
-
क्षीरस्त्रावी - नीरस भोजन भी जिन मुनियों के हाथ में आने पर क्षीर के समान स्वादयुक्त हो जाता है अथवा जिनके वचन क्षीर के समान संतोष देने वाले होते हैं, वे क्षीरस्त्रावी कहलाते हैं ।
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nearera - नीरस भोजन भी जिन मुनियों के हाथ में आने पर मधु के स्वाद को देने वाला हो जाता है और जिनके वचन श्रोताओं को मधु के समान लगते हैं, वे मुनि मध्वास्त्रावी हैं ।
eferस्त्रावी - नीरस भोजन भी जिनके हाथ में आने पर घृत के स्वाद युक्त हो जाता है और जिनके वचन श्रोताओं को घृतके स्वाद जैसे लगते हैं, ये मुनि सपिरास्वावी हैं ।
अमृतास्त्राबो- जिनके हस्तगत भोजन अमृत के समान हो जाता है और जिनके वचन अमृत जैसे लगते हैं, वे मुनि अमृतास्त्रावी हैं ।
अक्षी महान ऋद्धि और अक्षीण ग्रालय ऋद्धि ।
किसी मुनि को किसी घर में भोजन करने पर उस घर में चक्रवर्ती के परिवार को भोजन कराने पर भी अन्न की कमी न होने की सामर्थ्य का नाम अक्षीण महान ऋद्धि है ।
ऋद्धि रहित श्रार्यों के पांच ह हैं
frat मुनि को किसी मन्दिर में निवास करने पर उस स्थान में समस्त देव, मनुष्य और तिर्यों को परस्पर बाधा रहित निवास करने की शक्ति का नाम अक्षरालय ऋद्धि है ।
१. सम्यक्त्वार्थ, २. चारित्रार्य, ३. कर्मार्य, ४. जात्वार्य और ५. क्षेत्रार्य ।
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५१० ]
[गो. प्र. चिन्तामरिह
व्रत रहित सम्यादृष्टिः सम्यक्त्वार्य है ।
चारित्र को पालने वाले यति चारितार्य हैं । कर्मयों के तीन भेद हैं.--:
सावध कार्य, अल्पसावध कार्य और असावध कार्य । सायंध कार्य के छह हैं
असि, मसि, कृषि, विद्या, शिल्प और वाणिज्य कार्य ।
तलवार, धनुव, वारण, छुरी, गदा आदि नाना प्रकार के आयधों को चलाने में चतुर असि कार्य हैं । प्राय व्यय प्रादि लिखने वाले अर्थात् मुनीम या क्लर्क मसि कर्मार्थ हैं । खेती करने वाले कृषि कार्य हैं । गरिंगत आदि बहत्तर कलाओं में प्रवीण विद्या कार्य हैं । निर्णेजक नाई प्रादि शिल्प कार्य हैं । धान्य, कपास, चन्दन, सुवर्ण आदि पदार्थों के व्यापार को करने वाले वाणिज्य कार्य हैं।
श्रावक अल्प सावध कार्य होते हैं और मुनि असावद्य कार्य हैं ।
इक्ष्वाकु आदि वंश में उत्पन्न होने वाले इक्ष्वाकुवंशी, भरत के पुत्र अर्क कीति के कुल में उत्पन्न होने वाले सूर्यवंशी, बाहुबली के पुत्र सोमयश के कुल में उत्पन्न होने बाले सोमवंशी, सोमप्रभ श्रेयांस के कुल में उत्पन्न होने वाले कुरुवंशी, अकम्पन महाराज के कुल में उत्पन्न होने वाले नाथवंशी, हरिकान्त राजा के कुल में उत्पन्न होने वाले हरिवंशी, यदुराजा के कुल में उत्पन्न होने वाले यादव, काश्यप राजा के कुल में उत्पन्न होने वाले उग्रवंशी कहलाते हैं ।
कौशल, गुजरात, सौराष्ट्र, मालव, काश्मीर प्रादि देशों में उत्पन्न होने वाले क्षेत्रार्य कहलाते हैं। म्लेच्छ दो प्रकार के होते हैं
अन्त:पज और कर्मभूमिज । - लवरण समुद्र में आठों दिशाओं में पाठ द्वीप हैं । इन द्वीपों के अन्तराल में भी पाठ द्वीप हैं । हिमवान पर्वत के दोनों पाश्वों में दो द्वीप हैं। शिखरी पर्वत के दोनों पाश्वों में दो द्वीप है । और दोनों विजयार्द्ध पर्वतों के दोनों पार्यो में चार द्वीप हैं । इस प्रकार लवण समुद्र में चौबीस द्वीप हैं। इनको कुभोग भूमि कहते हैं।
चारों दिशाओं में जो चार द्वीप हैं, वे समुद्र की वेदी से पांच सौ योजन की दूरी पर हैं। इनका विस्तार सौ योजन है। चारों विदिशामो के चार द्वीप और
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अध्याय : सातवा ] अन्तराल के पाठ द्वीप समुद्र की बेदी से साढे पांच सौ योजन की दूरी पर हैं, उनका विस्तार पचास योजन है । पर्वतों के अन्त में जो आठ द्वीप हैं. वे समुद्र की वेदी से छह सौ योजन की दूरी पर हैं। इनका विस्तार पच्चीस योजन है।
पूर्व दिशा के द्वीप में एक पर वाले मनुष्य होते हैं । दक्षिण दिशा के द्वीप में मनुष्य शृङ्ग (सींग) सहित होते हैं । पश्चिम दिशा के द्वीप में पूंछ वाले मनुष्य होते हैं । उत्तर दिशा के द्वीप में गे मनुष्य होते हैं । आग्नेय दिशा में शश (खरहा) के समान कान वाले और नैऋत्य दिशा में शकुली के समान कान वाले मनुष्य होते हैं। वायव्य दिशा में मनुष्यों के कान इतने बड़े होते हैं कि वे उनको मोड़ सकते हैं । ऐशान दिशा में मनुष्यों के लम्बे कान होते हैं ।
पूर्व और आग्नेय के अन्तराल में अश्व के समान मुख वाले, प्राग्नेय और दक्षिरण के अन्तराल में सिंह के समान मुख वालं. दक्षिण और नंऋत्य के अन्तराल में भषण-कुत्ते के समान मुखवाले, नैऋत्य और पश्चिम के अन्तराल में गर्यर (उल्लू) के समान मुखवाले, पश्चिम और वायव्य के अन्तराल में शूकर समान मुखवाले, वायव्य
और उत्तर के अन्तराल में व्याघ्र के समान मुख वाले, उत्तर और ऐशान के अन्तराल में काक के समान मुख वाले और ऐशान और पूर्व के अन्तराल में कपि बन्दर) के समान मुख वाले मनष्य होते हैं।
हिमवान् पर्वत के पूर्व पार्श्व में मछली के समान मुख वाले और पश्चिम पार्श्व में काले मुख वाले, शिखरी पर्वत के पूर्व पार्श्व में मेध के समान भुख वाले और पश्चिम पापर्व में विद्युत् के, दक्षिण दिशा के विजयाद्ध के पूर्व पार्श्व में गाय के समान मुख वाले और पश्चिम पार्श्व में मेष के समान मुख वाले और उत्तर दिशा में विजयार्द्ध के पूर्व पार्श्व में हाथी के समान सुख वाले और पश्चिम पार्श्व में दर्पण के समान मुख वाले मनुष्य होते हैं।
एक पैर वाले मनुष्य मिट्टी खाते हैं और गुहाओं में रहते हैं । अन्य मनुष्य वृक्षों के नीचे रहते हैं और फल-पुष्प खाते है । इनकी आयु एक पल्य और शरीर की ऊंचाई दो हजार घनुष है ।
उक्त चौबीस द्वीप लवण समुद्र के भीतर हैं। इसी प्रकार लवण समुद्र के बाहर भी चौबीस द्वीप हैं । लवरण समुद्र के कालोद समुद्र सम्बन्धी की अंडतालीस द्वीप हैं । सब मिलाकर छियानवे म्लेच्छ द्वीप होते हैं । ये सब द्वीप जल से एक योजन
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५१२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि ऊपर हैं। इन द्वीपों में उत्पन्न होने वाले मनुष्य अन्तर्वीपज कहलाते है।
- पुलिन्द, शबर, यवन, खस, बर्बर आदि कर्म भूमिज म्लेच्छ हैं। कर्मभूमियों का वर्णन
भरतैरावत विदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरुत्तर कुरुभ्यः ॥११९६॥
पाँच भरत, पाँच ऐरावत और देवकुरु एवं उत्तर कुरु को छोड़कर पाँच विदेह इस प्रकार पन्द्रह कर्मभूमियां हैं ।
इसके अतिरिक्त भूमियां भोगभूमि ही हैं, किन्तु अन्तद्विपों में कल्पवृक्ष नहीं होते हैं।
___ भोगभूमि के सब मनुष्य मरकर देव ही होते हैं। किसी प्राचार्य का ऐसा मत है कि चार अन्तर्वीप है, वे कर्मभूमि के समीप हैं । अतः उनमें उत्पन्न होने वाले मनुष्य चारों गतियों में जा सकते हैं।
मानुषोत्तर पर्वत के प्रागे और स्वयम्भूरमरण द्वीप के मध्य में स्थित स्वयंप्रभ पर्णत के पहिले जितने द्वीप हैं, उन सबमें एकेन्द्रिय और पञ्चेन्द्रिय जीव ही होते हैं। ये द्वीप कुभोगभूमि कहलाते हैं । इनमें असंख्यात वर्ष की आयु वाले और एक कोस ऊंचे पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च ही होते हैं, मनुष्य नहीं। इनके नादि के चार गुणस्थान ही हो सकते हैं।
मानुषोत्तर पर्वत सत्रह सौ इक्कीस योजन ऊंचा है, और चार सौ तीस योजन भूमि के अन्दर है, मूल में एक सौ बाईस योजन, मध्य में सात सौ तेतीस योजन, ऊपर चार सौ चौबीस योजन विस्तार वाला है । मानुषोत्तर के ऊपर चारों दिशाओं में चार चैत्यालय हैं।
सर्वार्थसिद्धि को देने वाला उत्कृष्ट शुभ कर्म और सातवें नरक में ले जाने वाला उत्कृष्ट अशुभ कर्म यहीं पर किया जाता है । तथा असि, मसि, कृषि, वाणिज्य आदि कर्म यहीं पर किया जाता है. इसलिये इनको कर्मभूमि कहते हैं । यद्यपि सम्पूर्ण जगत में ही कर्म किया जाता है, किन्तु उत्कृष्ट शुभ और अशुभ कर्म का प्राश्रय होते से इनको ही कर्मभूमि कहा गया है।
स्वयम्प्रभ पर्वत से पामे लोक के अन्त तक जो तिर्यञ्च हैं, उनके पांच गुरंगस्थान हो सकते हैं । उनकी आयु एक पूर्व कोटि की है। वहां के मत्स्य सातवें नरक में ले जाने वाले पाप का बन्ध करते हैं। कोई कोई थलचर जीत स्वर्ग प्रादि के
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अध्याय : सातवां ]
.. { ५१३ हेतुभूत पुण्य का भी उपार्जन करते हैं । इसलिये प्राधा स्वयंभूरमरण द्वीप, पूरा स्वयंभूरमण समुद्र और समुद्र के बाहर चारों कोने कर्मभूमि कहलाते हैं। मनुष्यों को प्रायु का वर्णन
नस्थिती परावरे त्रिपस्योपमान्तमुहर्ते ॥११६७।। . मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु तीन पल्य और जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त है । पल्य के तीन भेद हैं--
व्यवहार पल्य, उद्धार पल्य और अद्धापल्य ।
व्यवहार पल्य से संख्या का, उद्धार पल्य से द्वीप समुद्रों का और अद्धा पल्य से कर्मों की स्थिति का वर्णन किया जाता है। व्यवहार पल्य का स्वरूप प्रमाणांगुल से परिमित एक प्रमाण योजन होता है । अवसर्पिणी काल के प्रथम चक्रवर्ती के अंगुल को प्रमाणांगुल कहते हैं । चौबीस प्रमाणांगुल का एक हाथ होता है । चार हाथ का एक दण्ड होता है । दो हजार दण्डों की एक प्रमारणगब्यूति होती हैं। चार गव्यूति का एक प्रमाण योजन होता है । अर्थात् पांच सौ मानव योजनों का एक प्रमाणयोजन होता हैं। मानव-योजन का स्वरूप- .
आठ परमाणुओं का एक त्रसरेणु होता है। आठ त्रसरेणुओं का एक रथरेणु होता है । पाठ रथरेणुगों का एक चिकुरान होता है । पाठ चिकुरानों की एक लिक्षा होती है। पाठ लिक्षाओं का एक सिद्धार्थ होता है। पाठ सिद्धार्थों का एक यव होता हैं । पाठ यवों का एक अंगुल होता है । छह अंगुलों का एक पांद होता है। दो पादों की एक वितस्ति होती है । दो वितस्तियों की एक रति होती है । चार रतियों का एक दण्ड होता है । दो हजार दण्डों की एक मन्यूति होती है । चार गव्युति का एक मानवयोजन होता है और पांच सौ मानव योजनों का एक प्रमाण योजन होता है।
एक प्रमाण योजन लम्बा, चौड़ा और गहरा एक गोल गड्ढा हो । सात दिन तक के मेष के बच्चों के बालों को कैंची से कतर कर इस प्रकार टुकड़े किये जायें कि फिर दूसरा टुकड़ा न हो सके । उन सूक्ष्म बालों के टुकड़ों से वह गड्ढा कूट कूटकर भर दिया जाय, इस गड्ढे को व्यवहार पल्य कहते हैं । पुनः सौ. वर्ष के बाद उस गड्ढे में से एक-एक टुकड़ा निकाला जावे । इस क्रम से सम्पूर्ण रोम खण्डों के निकलने में जितना समय लगे उतने समय को व्यवहार पल्योपम कहते हैं ।
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[ गो. प्र. चिन्तामगि पुनः असंख्यात करोड़ वर्षों के जितने समय हों, उतने समयों से प्रत्येक रोम : खण्डों का गुणा करे और इस प्रकार के रोम-खण्डों से फिर उस गड्ढे को भर दिया जाय । इस गड्ढे का नाम उद्धार पल्य है । पुन: एक-एक समय के बाद एक-एक रोमखण्ड को निकालना चाहिये । इस क्रम से सम्पूर्ण रोम-खण्ड़ों के निकलने में जितना ... समय लगे उतने समय को उद्धार पल्योपम कहते हैं । दश कोड़ा-कोड़ी उद्धार-पल्यों का एक उद्धार सागर होता है ।
अढाई उद्धार सागरों अथवा पच्चीस कोड़ा-कोड़ी उद्धार पल्यों के जितने रोमखण्ड होते हैं, उतने ही द्वीप समुद्र हैं ।
एक वर्ष के जितने समय होते हैं, उनसे उद्धार पल्य के प्रत्येक रोमखण्ड का मुरंगी करे और ऐसे रोमखण्डों से फिर वह गड्ढा भर दिया जाय तंब इस गड्ड का नाम श्रद्धा पैल्य है । पुनः एक-एक समय के बाद एक-एक रोमखण्ड को निकालने पर समस्त रोमखण्डों के निकलने में जितने समय लगें, उतने काल का नाम श्रद्धा पल्यापम है ।
दस कोड़ा-कोड़ी अद्धा-पल्यों का एक अद्धा-सागर होता है । और दश कोड़ा-कोड़ी श्रद्धा-सागरों की एक उत्सर्पिणी होती है । अवंसपिरणी का प्रमाण भी यही है।
प्रद्धा-पल्यापम से नरक तिर्यञ्च देव और मनुष्यों की कर्म की स्थिति, प्रायु की स्थिति, कार्य की स्थिति और भव की स्थिति गिनी जाती है। तिर्यञ्चों की स्थिति
तिरंग्योनिजानाञ्च ॥११९८॥
मनुष्यों की तरह तिर्यञ्चों की भी उत्कृष्ट और जघन्य आयु क्रम से तीन . पल्य और अन्तर्मुहूर्त है। .. इस अध्याय मैं नरक, द्वीप, समुद्र, कुल पर्वत, पद्मादि हृद, गंगादि नदी, मनुष्यों के भेद, मनुष्य तिर्यञ्चों की आयु आदि का वर्णन है।
अब ऊर्च लोक का वर्णन करते हैं.--...
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अध्याय । सातवां ]
१० ५१५ * उद्धलोक * देवों के भेष
देवाश्चतुरिणकायाः ॥११६६॥
देवों के चार भेद हैं....भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और कल्पवासी । . देवमति नाम कर्म के उदय होने पर और नाना प्रकार की विभूति युक्त होने के कारण जो द्वीप, समुद्र, पर्वत आदि स्थानों में अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करते हैं, उनको देव कहते हैं। जाति की अपेक्षा 'देवाश्चतुशिकायः' ऐसा एक वचनान्त सूत्र होने पर भी काम चल जाता, फिर भी सूत्र में बहुवचन का प्रयोग प्रत्येक निकाय के अनेक भेद बतलाने के लिये किया गया है । क्षेत्रों में लेश्याश्नों का वर्णन--
मादितस्त्रिषु पोतान्तलेश्याः ॥१२००॥
भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवों के कृष्ण, नील, कापोत और पीत ये चार लेश्याएँ ही होती हैं। . निकायों के प्रभेद--. .. दशाष्ट पञ्च द्वावश विकल्पाः कल्पोपपन्न पर्यन्ताः ॥१२०१॥
भवनवासी देवों के दश भेद, व्यन्तर देवों के आठ भेद, ज्योतिषी देवों के पांच भेद और कल्पोपपन्न अर्थात् सोलहवें स्वर्ग तक के देवों के बारह भेद होते हैं। अधेयक
आदि में सब अहमिन्द्र ही होते हैं, इसलिये वहां कोई भेद नहीं है। देवों के सामान्य भेद
. इन्द्र सामानिक बायस्त्रिंशपारिषदात्मरक्ष लोक पालानीक प्रकोर्णकाभियोग्य
किल्विषिकाश्चैकशः ॥१२०२॥ . . . प्रत्येक निकाय के देवों में इन्द्र, सामानिक, वायस्थिश, पारिषद, प्रात्मरक्ष, लोकपाल, अनीक, प्रकीर्णक, प्राभियोग्य और किल्विषक-ये दश भेद होते हैं । .... इन्द्र -..जो अन्य देवों में नहीं रहने वाली अणिमा प्रादि ऋद्धियों को प्राप्त कर असाधारण ऐश्वर्य का अनुभव करते हैं, उनको इन्द्र कहते हैं।
सामानिक-आशा और ऐश्वर्य को छोड़कर जिनकी आयु, भोग, उपभोगादि इन्द्र के ही समान हों, उनको सामानिक कहते हैं।
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[ गो. प्र. चिन्तामरिग
श्रास्त्र -- मंत्री और पुरोहित के काम को करने वाले देव त्रास्त्रिश कहलाते हैं । ये संख्या में तैंतीस होते हैं ।
५१६
पारिषद -- सभा में बैठने के अधिकारी देवों को पारिषद कहते हैं । श्रात्मरक्ष—इन्द्र की रक्षा करने वाले देव प्रात्मरक्ष कहलाते हैं । लोकपाल - जो देव अन्य देवों का पालन करते हैं, उन्हें लोकपाल कहते हैं । ये आरक्षिक, वर और कोट्टपाल के समान होते हैं। जो ग्राम आदि की रक्षा के लिये नियुक्त होते हैं, उनको आरक्षक कहते हैं । अर्थ (घन ) सम्बन्धी कार्य में नियुक्त श्रर्थचर कहलाते हैं । पतन, नगर आदि की रक्षा के लिये नियुक्त (कोट्टपाल ) कहलाते हैं । अनीक -- जो हस्ति, अश्व, रथ, पदाति, वृषभ, गन्धर्व और नर्तकी इन सात प्रकार की सेना में रहते हैं, ये अनीक हैं ।
नगरवासियों के समान जो इधर-उधर फैले हुये हों, उनको
ate कहते हैं ।
श्रभियोग — जो नौकर का काम करते हैं, वे अभियोग्य हैं ।
fafeature -- किल्विष पाप को कहते हैं । जो सवारी में नियुक्त हों तथा नाई आदि की तरह कर्म करने वाले होते हैं, उनको किल्विषिक कहते हैं । Raftar लोकपालवर्ज्या व्यन्तर ज्योतिष्काः ॥५॥
व्यन्तर और ज्योतिषी देवों में त्रास्त्रिश और लोकपाल नहीं होते हैं । reat की व्यवस्था के प्रकार-
पूर्वयोन्द्राः । १२०३॥१
भवनवासी और व्यन्तर देवों में प्रत्येक भेद सम्बन्धी दो-दो इन्द्र होते हैं । Tatari देवों में असुर कुमारों के अमर और वैरोचन, नागकुमारों के ster और भूतानन्द, विद्युत्कुमारों के हरिसिंह और हरिकान्त, सुवर्णकुमारों के वेणुदेव और ताली, अग्निकुमारों के अग्निशिख और श्रग्निमारावं, वातकुमारों के वेसम्ब और प्रभञ्जन, स्तनितकुमारों के सुघोष और महाघोष, उदधिकुमारों के जलकान्त और जलप्रभ, द्वीपकुमारों के पूर्व और अवशिष्ट, दिक्कुमारों के अमितगति और अमितवाहन नाम के इन्द्र होते हैं ।
व्यन्तर देवों में किन्नरों के किन्नर और किम्पुरुष, किम्पुरुषों के सत्पुरुष और
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अध्याय : सातवां ]
[ ५१७
महापुरुष, महोरगों के प्रतिकाय और महाकाय, गन्धर्वो के गीतरति और गीतयश, यक्षों के पूर्णभद्र और मणिभद्र, राक्षसों के भीम और महाभीम, भूतों के प्रतिरूप और अप्रतिरूप और पिशाचों के काल और महाकाल माम के इन्द्र होते हैं । देवों के भोगों का वर्णन-~
काय प्रवीचारा पा ऐशानात् ॥१२०४॥
ऐशान स्वर्गपर्यन्त के देव अर्थात् भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और प्रथम व द्वितीय स्वर्ग के देव, मनुष्य और तिर्यञ्चों के समान शरीर से काम सेवन करते हैं ।
मर्यादा और अभिविधि, क्रिया योग और ईषत् अर्थ में 'माइ' उपसर्ग याता है । तथा वाक्य और स्मरमा अर्थ में 'आ' उपसर्ग प्राता है । 'पा' उपसर्गः को स्वर परे रहते सन्धि नहीं होती। इस सूत्र में श्री और ए ( ऐ) इन दोनों की सन्धि हो सकती थी, लेकिन सन्देह को दूर करने के लिये प्राचार्य ने सन्धि नहीं की है। यहाँ प्रा अभिविधि के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अभिविधि में उस वस्तु का भी अहरण होता है, जिसका निर्देश मा के बाद किया जाता है जैसे इस सूत्र में ऐशान स्वर्ग का भी ग्रहण
शेषाः स्पर्श रूप शब्य मनः प्रचोछाराः ॥१२०५॥
- शेष देव (तृतीय स्वर्ग से सोलहवें स्वर्ग तक) देवियों के स्पर्श से, रूप देखने से, शब्द सुनने से और भन में स्मरण मात्र से काम सुख का अनुभव करते हैं।
सनत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग के देव और देवियां परस्पर में स्पर्श मात्र से; ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव और कापिष्ठ स्वर्ग के देव और देवियां एक दूसरे के रूप को देखने से; शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्त्रार स्वर्ग के देव और देवियां परस्पर शब्द श्रवण से और पानत, प्रारपत, पारद और अच्युत स्वर्ग के देव पौर देवियां मन में एक दूसरे के स्मरण मात्र से अधिक सुख का अनुभव करती हैं।
परेऽप्रवीचारा: ॥१२०६॥
तब प्रेयेयक, नथ अनुदिश और पञ्चोत्तर विमानवासी देव फामसेवन से रहित होते हैं । इन देशों को कामसेवन की इच्छा ही नहीं होती है। उनके तो सदा हर्ष और प्रानन्द रूप सुख का अनुभव रहता है । भवनवासियों के भेद
भवनवासिनोऽसुर नागवियत्सुपग्निवातस्तमितोधि द्वीप दिक्कुमाराः ॥१२०७॥
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५१८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि भवनवासी देवों के असुर कुमार, नाम कुमार, विद्युत कुमार, सुपर्ण कुमार, अग्नि कुमार, वात कुमार, स्तमित कुमार, उदधि कुमार, द्वीप कुमार, दिक्कुमार-ये दश भेद हैं। . . . ........ .. .. . भवनों में रहने के कारण इन्हें भवनवासी कहते हैं। ...
असुर कुमार---जो परस्पर में लडाकर उनके प्रारणों को लेते हैं, उन्हें असुर कुमार कहते हैं । ये तृतीय नरक तक के नारंकियों को दुःख पहुंचाते हैं। ...... नाग कुमार--पर्वत या वृक्षों पर रहने वाले देव नागकुमार देव कहा . जाता है । ....... ... ..
...विधुत कुमार-जो विद्युत के समान चमकते हैं, वे विधुत कुमार हैं। ... सुपर्ण कुमार-जिनके पक्ष (पंख) शोभित होते हैं, वे सुपर्ण कुमार हैं। .. ... : अग्नि कुमार---जो पाताला लोक से क्रीड़ा करने के लिये ऊपर पाले हैं, वे अग्नि कुमार कहलाते हैं।
... वात कुमार:-तीर्थंकर के विहार मार्ग को शुद्ध करने वाले वातकुमार हैं। : ... स्तनित कुमार .... शान करने वाले को गोलि कमार कहते हैं । . उदधि कुमार--- समुद्रों में क्रीड़ा करने वाले उदधि कुमार हैं।
द्वीप कुमार-द्वीपों में क्रीडा करने वाले द्वीप कुमार हैं। ....... दिवकुमार--दिशानों में क्रीड़ा करने वाले दिक्कुमार हैं।
... असुर कुमारों के प्रथम नरक के पङ्कबहुल भाग में और शेष भवनवासी देवों । के खरबहुल भाग में भवन हैं। न्यन्तर देवों के भेष- ... . . . . ... व्यन्तराः किन्न कम्पुरुष मष्टोरग गन्धर्व यक्ष राक्षस भूत पिशाचाः ।।१२०६॥
. . अन्तर देवों के . किन्नर, किम्पुरुष, महोग, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, भुत, पिशाच-ये आठ भेद होते हैं । . . . . . . नाना देशों में निवास करने के कारण इनको व्यन्तर कहते हैं । जम्बूद्वीप के असंख्यात.द्वीप समुद्र को छोड़कर, 'प्रथम नरक के खर भाग में राक्षसों को छोड़कर अन्य सात प्रकार के व्यन्तर रहते हैं और पङ्क भाग में राक्षस रहते हैं। ज्योतिषी देवों के भेद--- ... .. .. ज्योतिरकाः सूर्याचन्द्रमसौ ग्रह नक्षत्र प्रकोणक: तारकाश्च ।।१२०६॥
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अध्याय : सातवा ]
[ ५१६ . ज्योतिषी देवों के सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह नक्षत्र और तारा ये पांच भेद हैं । ज्योति (प्रकाश) युक्त होने के कारण इनको ज्योतिषी कहते हैं ।
इस पृथ्वी से सात सौ नव्वे योजन की ऊंचाई पर ताराओं के विमान हैं। .... ताराओं से दस योजन ऊपर सूर्य के विमान है। सूर्य से अस्सी योजन ऊपर चन्द्रमा का विमान है । इसके बाद चार योजन ऊपर नक्षत्र हैं । नक्षत्रों से चार योजन अपर बुध, बुध से तीन योजन ऊपर शुक्र, शुक्र से तीन योजन ऊपर बृहस्पति, बृहस्पति से तीन . योजन ऊपर मंगल और मंगल से तीन योजन ऊपर शनैश्चर देव रहते हैं । इस प्रकार मंगल से एक सौ दश योजन प्रमाण प्रकाश में ज्योतिषी देव रहते हैं। सूर्य से कुछ कम एक योजन नीचे केतु और चन्द्रमा से कुछ कम एक योजन नीचे राहु रहते हैं।
,सब ज्योतिषी देवों के विमान के ऊपरं स्थित पद्धगोलका के आकार के होते हैं । चन्द्रमा, सूर्य और ग्रहों को छोड़कर शेष ज्योतिषी देव अपने-अपने एक ही .. मार्ग में गमन करते हैं। ज्योतिषी देवों की पति
मेरु प्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥१२१०॥ ... . . . . . . . . . .... मनुष्य लोक के ज्योतिषी देव मेरु को प्रदक्षिणा देते हुए सदा गमन करते रहते हैं। मनुष्य लोक के बाहर ज्योतिषी देव स्थिर रहते हैं। प्रश्न ::-ज्योतिषी देवों के विमान अचेतन रहते हैं। उनमें गमन कैसे
सम्भव है? उत्तर :--प्राभियोग्य जाति के देवों द्वारा ज्योतिषी देवों के विमान खींचे .. जाते हैं। आभियोग्य देवों का कम विपाक अन्य ज्योतिषी देवों के विमानों को खींचने .. पर ही होता है । मेरु से ग्यारह सौ इक्कीस योजन दूर रहकर ज्योतिषी देव भ्रमण करते रहते हैं। ... जम्बूद्वीप में दो सूर्य, छप्पन नक्षत्र और एक सौ छिहतर ग्रह हैं । लवण समुद्र में चार सूर्य, एक सौ बारह नक्षम और तीन सौ बावन ग्रह हैं। .....
__ . धातकी खंड द्वीप में बारह सूर्य, तीन सौ छत्तीस नक्षत्र और एक हजार छप्पन ग्रह हैं । कालोद समुद्र में बयालीस सूर्य, ग्यारह सौ छिहत्तर नक्षत्र और तीन हजार छह सौ निन्यानवे ग्रह हैं । और पुष्करार्द्ध द्वीप में बहत्तर सूर्य, दो हजार सोलह नक्षत्र, छह हजार तीन सौ छत्तीस ग्रह हैं । चन्द्रमाओं को संख्या सूर्य के बराबर है।
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५२० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रत्येक चन्द्रमा के ग्रहों की संख्या अठासी है, और नक्षत्रों की संख्या अट्ठाईस है। मानुषोतर पर्वत से बाहर के सूर्यादि की संख्या आगमानुसार समझ लेनी चाहिये ।। व्यवहार काल का हेतु--
तस्कृतः काल विभागः ॥१२११॥
दिन, रांत, मास आदि व्यवहार काल का विभाग नित्य गमन करने वाले ज्योतिषी देवों के द्वारा किया जाता है । काल के दो भेद. हैं- मुख्यकाल और व्यवहार काल । मुख्यकाल का वर्णन अगले अध्याय में किया जायेगा । समय, प्रावली, मिनिट, घण्टा, दिन-रात आदि व्यवहार काल हैं । . .
बहिरवस्थिताः ॥१२१२॥ मनुष्य लोक के बाहर के सब ज्योतिषी देव स्थिर हैं।
चन्द्रमा के विमान के उपरितन भाग का विस्तार प्रमाण योजन के इकसठ भागों में से छप्पन भाग प्रमाण १.५६/६१ योजन) है सूर्य के विमान के उपरितन भाग का विस्तार प्रमाण योजन के इकसठ भागों में से अड़तालीस भाग प्रमाण (४८/६१ योजन) है। शुक्र के विमान का विस्तार एक कोश, बृहस्पति के विमान का विस्तार कुछ कम एक कोश और मङ्गल, बुध और शनि के विमानों का विस्तार 'श्राधा कोश है। . . निक देवों का वर्णन
वैमानिकाः ॥१२१३॥
विमानों में रहने वाले देव वैमानिक कहलाते हैं। जिनमें रहने वाले जीव अपने को विशेष पुण्यात्मा मानते हैं, उनको विमान कहते हैं । विमान तीन प्रकार के होते हैं--इन्द्रक विमान, शेशी विमान और प्रकोएक विमान । मध्यवर्ती विमान को इन्द्रक विमान कहते हैं । जो किमान चारों दिशाओं में पंक्ति में अवस्थित रहते हैं, वे श्रेरिण विमान हैं । इधर-उधर फैले दुए अक्रमबद्ध विमान प्रकीर्णक विमान हैं।
इन विमानों में जो देव प्रासाद हैं तथा जो शाश्वत जिन चैत्यालय हैं, वे सब प्रकृत्रिम हैं। इनका परिमाण मानवयोजन कोश आदि से जाना जाता है। अन्य शाश्वत या अकृत्रिम पदार्थों का परिमारण योजन कोश आदि से किया जाता है । यह परिभाषा है । परिभाषा नियम बनाने वाली होती है।
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अध्याय: सातवां ]
वैमानि देवों के भेद ---.
कल्पाः कल्पातीतश्च ॥१२१४॥
वैमानिक देवों के दो भेद हैं— कल्पोपपन्न और कल्पातीत । कल्प प्रर्थात् कल्पोपपन्न और नवग्रैवेयक, नव अनुदिश और वाले देव कल्पातीत कहलाते हैं । और ज्योतिषी देवों में भी इन्द्र आदि का कल्प
या भेद है, फिर भी रूढ़ि के कारण वैमानिक देवों की ही कल्पोपपन्न संज्ञा है ।
सोलह स्वर्गों में उत्पन्न होने वाले देव पांच अनुत्तर विमानों में उत्पन्न होने raft rararat व्यन्तर
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विमानों का क्रम -
उपर्युपरि ।।१२१५।।
कल्पोपपन्न और कल्पातीतं देवों के विमान क्रमशः ऊपर-ऊपर हैं। अपना उपरि-परि शब्द समीपदाची भी हो सकता है। इसलिए यह भी अर्थ हो सकता है कि प्रत्येक पटल में दो-दो स्वर्ण समीपवर्ती हैं। जिस पटल में दक्षिण दिशा में सोधर्म स्वर्ग है, उसी पटल में उत्तर दिशा में उसके समीपवर्ती ऐशान स्वर्ग भी है। Turfar देवों के रहने का स्थान-
सौधर्मशानसनत्कुमार माहेन्द्र ब्रह्मब्रह्मोत्तर लान्तवं कापिष्ट शुक्र महाशुक्र शतार सहस्त्रारेध्यानत प्रापतयोराररगाच्युतयोर्नदसु ग्रैवेयकेषु विजय वैजयन्त जयन्ता पराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च ।। १२१६।।
सौधर्म, ऐशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव, कापिष्ठ, शुक्र, महाशुक्र, शतार, सहस्त्रार, प्रान्त, प्रारगत, आरण और अच्युत इन सोलह स्वर्गों में तथा नवग्रैवेयक तव अनुदिश और विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित श्रीर सर्वार्थसिद्धि इन पांच अनुत्तर विमानों में वैमानिक देव रहते हैं ।
इस सूत्र में यद्यपि नव अनुदिशों का नाम नहीं आया है, लेकिन 'नवसु ग्रैवेयकेषु' में नव शब्द को नव अनुदिशों को ग्रहण करने के लिए पृथक रखा गया है । सूत्र में सर्वार्थसिद्धि को सर्वोत्कृष्ट होने के कारण "सर्वार्थसिद्धी" इस प्रकार पृथक रखा गया है । प्रत्येक स्वर्ग का नाम उस स्वर्ग के इन्द्र के नाम से पड़ा है ।
सबसे नीचे सौधर्म पर्यन्त क्रमशः दो-दो कल्प हैं।
और ऐशान करूप है, आरण और अच्युत
और इनके ऊपर अच्युत स्वर्ग कल्प के ऊपर नव ग्रैवेयक, नव
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५२२ ]
। गो. प्र. चिन्तामरिण यवेयकों के ऊपर नव अनुदिश. और नव अतुदिशों के ऊपर पांच अनुतर विमान हैं।
एक लाख योजन ऊँचा मेरू पर्वत है । मेरू पर्वत की चोटी और सौधर्मस्वर्ग के इन्द्रक ऋतुविमान में एक बालमात्र का अन्तर है । मेरु के ऊपर ऊर्ध्वलोक, - मेरु से नोचे अधोलोक और मेरु के बराबर मध्यलोक या तिर्यक् लोक है । - सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के इकतीस पटल हैं, उनमें प्रधम ऋतुपटल है । ऋतुपटल के बीच में ऋतु नामक पैंतालीस लाख योजन विस्तृत इन्द्रक (मध्यवर्ती) विमान है । ऋतुविमान से चारों दिशाओं में चार विमान श्रेणियां हैं। प्रत्येक विमान श्रेणी में बासठ विमान हैं। विदिशाओं में प्रकीर्णक विमान हैं। ऋतु पटल से ऊपर प्रभा नामक अन्तिम पटल पर्यन्त प्रत्येक पटल के प्रत्येक श्रेणी विमानों की संख्या क्रम से एक-एक कम होती गई है। इस प्रकार अन्तिम पटल में, प्रत्येक दिशा में बत्तीस श्रेणी विमान हैं। प्रभः नामक इकतीसवें पटल के मध्य में प्रभा नामक इन्द्रक विमान है। इन्द्रक विमान की चारों दिशाओं में चार विमान श्रेणियां हैं। प्रत्येक विमान श्रेणी में बत्तीस विमान हैं । दक्षिण दिशा में जो विमान श्रेणी है, उसके अठारहवें विमान में सौधर्म इन्द्र का निवास है, और उत्तर दिशा के अठारहवें विमान में ऐशान इन्द्र रहता है। उक्त दोनों विमानों के तीन-तीन कोट हैं। बाहर के कोट में अनीक और पारिषद जाति के देव रहते हैं। मध्य के कोट में त्रायस्त्रिश देव रहते हैं, और तीसरे कोट के भीतर इन्द्र रहता है। इस प्रकार सब स्वर्गों में इन्द्रों का निवास समझना चाहिये ।
पूर्व, पश्चिम और दक्षिण दिशा की तीन विमान श्रेणियां और आग्नेय और नैऋत्य दिशा से प्रकीर्णक विमान सौधर्म स्वर्ग की सीमा में है। उत्तर दिशा की एक विमान श्रेणी और ईशान दिशा के प्रकीर्णक विमान ऐशान स्वर्ग की सीमा
इसके ऊपर सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग है। इनके सात पटल हैं । प्रथम अञ्जन पटल के मध्य में अंजन नामकं इन्द्रक विमान है । इन्द्रक विमान की चारों दिशानी में चार विमान श्रेणियां हैं। प्रत्येक श्रेणी में इकतीस विमान हैं। प्रथम पटल से अन्तिम पटल पर्यन्त प्रत्येक पटल में, प्रत्येक श्रेणी में विमानों की संख्या क्रमश: एक-एक कम हैं। सात पटल में 'इन्द्रक विमान की चारों दिशाओं में चार
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अध्याय : सातवा ] विमान श्रेणियां हैं। प्रत्येक श्रेणी में पच्चीस विमान हैं। इस पटल की दक्षिण श्रेणी के पन्द्रहवें विमान में सानत्कुमार और उत्तर थेगो के पन्द्रहवें विमान में माहेन्द्र इन्द्र रहते हैं।
इसके ऊपर ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर स्वर्ग हैं। इनके चार पटल हैं। प्रथम अरिष्ट पटल के मध्य में अरिष्ट नामक इन्द्रक विमान की चारों दिशाओं में चार विमान श्रेणियां हैं, प्रत्येक श्रेणी में चौबीस विमान हैं। ऊपर के पटलों में श्रेणी विमान की संख्या क्रमशः एक-एक कम हैं । चौथे पटल में प्रत्येक श्रेणी में इक्कीस विमान हैं । इस पटल की दक्षिण श्रेणी के बारहवें विमान में ब्रह्मन्द्र और उत्तर श्रेणी के बारहवें विमान में ब्रह्मोत्तर इन्द्र रहते हैं।
इसके ऊपर लान्तव और कापिष्ट स्वर्ग हैं। इनके दो पटल हैं--ब्रह्म हृदय और लान्तव । प्रथम पटल की प्रत्येक विमान श्रेणी में बीस विमान हैं। और द्वितीय पटल की प्रत्येक विमान श्रेणी में उन्नीस विमान हैं । इस पटल की दक्षिरण श्रेणी के नौवें विमान में लान्तब और उत्तर श्रेणी के नौवें विमान में कापिष्ट इन्द्र रहते हैं।
इसके ऊपर शुक्र और महाशुक्र स्वर्ग हैं। इनमें महाशुक्र नामक एक ही पटल है । इस पटल के मध्य में महाशुक्र नामक इन्द्रक विमान है । चारों दिशाओं में चार विमान श्रेणियां हैं। प्रत्येक विमान श्रेगी में अठारह विमान हैं । दक्षिण श्रेणी के बारहवें विमान में शुक्र और उत्तर श्रेणी के बारहवें विमान में महाशुक्र इन्द्र रहते हैं ।
___ इसके ऊपर शतार और सहस्त्रार स्वर्ग है। इनमें सहस्त्रार नामक एक ही पटल है । चारों दिशाओं में प्रत्येक श्रेणी में सतरह विमान हैं। दक्षिरण श्रेणी के गौवें विमान में शतार और उत्तर श्रेणी के नौवें विमान में सहस्त्रार इन्द्र रहते हैं ।
इसके ऊपर पानत, प्रारणत, पारण और अच्युत स्वर्ग हैं। इनमें छह पटल है । अन्तिम अच्युत पटल के मध्य में अच्युत नामक इन्द्रक विमान है। इन्द्रक विमान से चारों दिशाओं में चार विमान श्रेणियां हैं। प्रत्येक विमान श्रेणी में ग्यारह विसान हैं। इस पटल की दक्षिण श्रेणी के छह विमान में प्रारण और उत्तर श्रेमी के छठवें विमान में अच्युत इन्द्र रहते हैं।
___इस प्रकार लोकानुयोग नामक ग्रन्थ में चौदह इन्द्र बतलाये हैं। श्रतसागर प्राचार्य मत से तो बारह ही इन्द्र होते हैं । प्रादि दार और अन्त के चार इन पाय
।
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५२४ ]
[ गो, प्र. चिन्तामरिग सवर्गों के पाठ इन्द्र और मध्य के आठ स्त्रों के चार इन्द्र अर्थात् ब्रह्म, लान्तव, शत्रु और शतार इस प्रकार सोलह स्वर्गों में बारह इन्द्र होते हैं।
विमानों की संख्या-सौधर्म स्वर्ग में बत्तीस लाख, ऐशान स्दगों में अटाईस लाख, सानत्कुमार स्वर्ग में बारह लाख, माहेन्द्र में प्राठ लाख ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर में चालीस लाख, लान्तव और का पिष्ट में पचास हजार, शुक्र और महाशुक्र में चालीस हजार, शतार और सहस्त्रार में छह हजार, प्रानत, प्राणत, पारण और अच्युत स्वर्ग में सात सौ विमान हैं । प्रथम तीन ग्रंबेयकों में एक सौ ग्यारह, मध्य के तीन ग्रंयकों में एक सौ सात और ऊपर के तीन मैवेयकों में एकानवे विमान हैं। नव अनुदिश में नौ विमान हैं। सर्वार्थासद्धि पटल में पांच विमान हैं, जिनमें मध्यवर्ती विमान का नाम सर्वार्थसिद्धि है, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा में क्रम से विजय, बैजयन्त, जयन्त और अपराजित विमान हैं।
. विमानों का रंग-सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के विमानों का रंग श्वेत, पीला, हरा, लाल और काला है। सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग में विमानों का रंग श्वेत, पीला, हरा, लाल है । ब्रह्म ब्रह्मोत्तर, लान्तव, और कापिष्ट स्वर्ग में विमानों का रंग श्वेत, पीला और लाल है । शुक्र से अच्युत स्वर्ग पर्यन्त विमानों का रंग श्वेत और पीला है। नव गैवेयक, नव अनुदिश और अनुत्तर विमानों का श्वेत ही है । सर्वार्थसिद्धि विमान परमशुक्ल है और इसका विस्तार जम्बूद्वीप के समान है । अन्य चार विमानों का विस्तार असंख्यात करोड़ योजन है।
उक्त प्रेसठ पटलों का अन्तर भी असंख्यात करोड़ योजन है।
मेरु से ऊपर डेढ़ राजू पर्यन्त क्षेत्र में सौधर्म और ऐशान स्वर्ग हैं । पुनः डेढ़ राजू. प्रमाण क्षेत्र में सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग हैं । ब्रह्म से अच्युत स्वर्ग पर्यन्त दोदो स्वर्गों की ऊंचाई आधा राजू है । और गैवेयक से सिद्धशिला तक एक राजू ऊंचाई है । ऊर्ध्व लोक में जितने विमान हैं, सभी में जिनमन्दिर हैं। वैमानिक देवों में उत्कर्ष---- .. स्थिति प्रभाव सुखयति लेश्याविशुद्धीन्द्रियावधि विषयतोऽधिकाः ॥१२१७॥
वैमानिक देवों में क्रमशः ऊपर-ऊपर आयु, प्रभाव-शाप और अनुग्रह की शक्ति, सुख-इन्द्रिय सुख, दीप्ति-शरीर कान्ति, लेश्याओं की विशुद्धि, इन्द्रियों का विषय और अवधिज्ञान के विषय की अधिकता पाई जाती है ।
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अध्याय : सातवां ।
[ ५२५ वैमानिक देवों में अपकर्ष
मति शरीर परिग्रहाभिमानतो होमाः ॥१२१८॥
वैमानिक देव गमन, शरीर, परिग्रह और अभिमान की अपेक्षा क्रमशः ऊपरऊपर हीन हैं।
ऊपर-ऊपर के देवों में गमन परिग्रह और अभिमान की हीनता है।
शरीर का परिमारण---सौधर्म और ऐशान स्वर्ग में शरीर की ऊँचाई सात अनि, सानत्कुमार और माहेन्द्र में छह अरनि, ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव और कापिष्ट में पांच अरनि, शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्त्रार में चार अरनि, 'मानत और प्रारपत में साढ़े तीन अरनि और आरण और अच्युत मैं तीन अरत्ति शरीर की ऊंचाई है। प्रथम तीन ग्रेवेयकों में ढाई अरनि, मध्य प्रवेयक में दो परनि, ऊर्ध्व अवेयक और नव अनुदिश में डेढ़ अरलि शरीर की ऊंचाई है। पांच अनुत्तर विमानों में शरीर की ऊंचाई केवल एक हाथ है । मुंडे हाथ को अरनि कहते हैं । वैमानिक देशों में लेश्याओं का वर्णन
पीत पद्म शुक्ल लेश्या द्वित्रिशेषेषु ॥१२१६॥ . ___ दो युगलों में, तीन युगलों में और शेष के विमानों में क्रमशः पीत, पर और शुक्ल लेश्यायें होती हैं।
__ सौधर्म, ऐशान, सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग में पीत लेश्या होती है। विशेष यह है कि सानत्कुमार और माहेन्द्र में मिश्र-पीत और पद्म लेश्या होती है । ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव, कापिष्ट, शुक्र और महाशुक्र स्वर्ग में पद्म लेश्या होती है । लेकिन शुक्र, महाशुका, शतार और सहस्त्रार स्वर्ग में मिश्र-पद्म और शुक्ल लेश्या होती है। प्रानत, प्राणत, पारण और अच्युत स्वर्ग में और नव वेयकों में शुक्ल लेश्या होती है । नव अनुदिश और पांच अनुत्तर विमानों में परम शुक्ल लेश्या होती है।
यद्यपि सूत्र में मिथ लेश्या का ग्रहण नहीं किया है, किन्तु साहचर्य से मिश्र का भी ग्रहण कर लेना चाहिए। जैसे 'छाते वाले जा रहे हैं। ऐसा कहने पर जिनके पास छाता नहीं है, उनका भी ग्रहण हो जाता है । उसी प्रकार एक लेश्या के कहने से उसके साथ मिश्रित दूसरी लेश्या का भी ग्रहण हो जाता है । सूत्र का अर्थ इस प्रकार करना चाहिए।
सौधर्म और ऐशान स्वर्ग में पीत लेश्या और सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग
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[ गो. प्र. चिन्तामणि में मिश्र-पीत और पद्म लेश्या होती है । लकिन पद्म श्या की विवक्षा न करके सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग में पीत लेश्या ही कही गई है। ब्रह्म से लान्तव स्वर्गपर्यन्त पा लेश्या और शुक्र से सहस्त्रार स्वर्ग पर्यन्त मिश्र-पद्म और शुक्ल लेश्या होती है, लेकिन शुक्र और महाशुक्र में शुक्ल लेश्या की विवक्षा न करके पद्म लेश्या ही कही गई है। इसी प्रकार शतार और सहस्त्रार स्वर्ग में पक्ष लेश्या को विवक्षा न करके शुक्ल लेश्या हो सूत्र में कही गई है । कल्प को सीमा
प्राग्न धेयकेभ्यः कल्पः ११२२०॥
त्रेयकों से पहिले के विमानों की कल्प संज्ञा है । अर्थात् सोलह स्वर्गो को कल्प कहते हैं । न ग्रेवेयक, नव अनुदिश और पांच अनुत्तर विमान करूपातीत कहलाते हैं। लौकान्तिक देवों का निवास--
ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः ।१२२॥ लौकान्तिक देव ब्रह्मलोक नामक पांचवें स्वर्ग में रहते हैं ।
प्रश्न- यदि ब्रह्मलोक में रहने के कारण इनको लोकान्तिक कहते हैं, तो ब्रह्मनिवासी सब देवों को लौकान्तिक कहना चाहिये ?
उत्तर--लौकान्तिक यह यथार्थ नाम है और इसका प्रयोग ब्रह्मलोक निवासी राब देवों के लिये नहीं हो सकता । लोक का अर्थ है ब्रह्मलोक के अन्त को लोकान्त और लोकान्त में रहने वाले देवों का नाम लोकान्तिक हैं । अथवा संसार को लोक कहते हैं । और जिनके संसार का अन्त समीप है, उन को लौकान्तिक कहते हैं । लोकान्तिक स्वर्ग से च्युत होकर मनुष्य भव धारण कर मुक्त हो जाते हैं। अतः लौकान्तिक यह नाम सार्थक है । लौकान्तिक देवों के भेद----
सारस्वतादित्य बह्नमरण गर्दतोयतुषिता व्याबाधारिष्टाश्च ॥१२२२॥
सारस्वत, आदित्य, वह्नि, अरुण, गर्दतोय, तुषित, अव्याबाध, अरिष्ट ये आठ प्रकार के लोकान्तिक देव होते हैं ।
सारस्वत--जो चौदह पूर्व के ज्ञाता हों, वे सारस्वत कहलाते हैं । मादित्य- देवमाता अदिति की संतान को प्रादित्य कहते हैं ।
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अध्याय : सातवां ]
बलि-जो पति के समान देदीप्यान हो, उसे वह्नि कहते हैं। अरुण---उदीयमान सूर्य के समान जिनकी कान्ति हो, वे अंग कहलाते हैं ।
गर्दतोय-शब्द को गर्द और जल को तोय कहते हैं। जिनके मुख से शब्द जल के प्रवाह की तरह निकलें, वे गईटीय कहते हैं ।
तुषित--जो संतुष्ट और विषय सुख से परान्मुखं रहते हैं, वे तुषित हैं। अव्याबाध-जिनके कामादिजनित बाधा नहीं है, वे अव्यांबाथ हैं।
अरिष्ट-- जो अकल्याणकारी कार्य नहीं करते हैं, उनको अरिष्ट कहते हैं।
. सारस्वत सादि देवों के विमान क्रमशः ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिरण नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य और उत्तर दिशा में हैं। इनके अन्तराल में भी दो-दो देवों के विमान हैं । सारस्वत और आदित्य के अन्तराल में अग्न्याभ और सूर्याभ, आदित्य और वह्नि के अन्तराल में चन्द्राभ और सत्याभ, वह्नि और अरुण के अन्तराल. में श्रेयस्कर और क्षेमकर, अरुण और गर्दतोय के अन्तराल में वृषभेष्ट और कामचर, गर्दतोयं और तुषित के मध्य में निर्माण रज और दिगन्तरक्षित, तुषित और अव्याबाध के मध्य में ग्रात्मरक्षित और सर्वरक्षित, अव्यांदाध और अरिष्ट के मध्य में मस्त और वसु और अंरिष्ट और सारस्वत के मध्य में अपूर्व और विश्व रहते हैं ।
___ सब लौकान्तिक स्वाधीन, विषय सुख से परान्मुख, चौदह पूर्व के ज्ञाता और देवों से पूज्य होते हैं । ये देव तीर्थकरों के तप कल्याण में ही आते हैं ।
__ लोकान्तिक देवों की संख्या चार लाख सात हजार पाठ सौ बीस है। विजय आदि विमानवासी देवों की संसार की अवधि
विजयादिषु द्विचरमाः ॥१२२३॥
विजय, वैजयन्त और अपराजित विमानवासी अहमिन्द्र मनुष्य के दो भव धारणा कर नियम से मोक्ष चले जाते हैं। यहां मनुष्य भव की अपेक्षा से इनको द्विचरम कहा है। कोई भी अहमिन्द्र विजयादि से च्युत होकर मनुष्य गति में आयेगा । पुनः वह मनुष्य भव समाप्त कर विजयादि में ही उत्पन्न होगा । फिर निंजयादि से ध्युत होकर मनुष्य भवं धारण कर नियम से मोक्ष चला जायेगा, इस प्रकार मनुष्य भव की अपेक्षा दो भव और मनुष्य भव में देवपर्याय को भी मिला देने से दो मनुष्य भव और एक देव भव इस प्रकार विजय प्रादि में उत्पन्न होने वाले अहमिन्द्रों के तीन भव और बाकी रह जाते हैं। लेकिन सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्र एक भवावतारी होते
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५२८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण हैं ! मनुष्य का एक भल धारगा करके ही मोक्ष चले जाते हैं। .... तिर्यञ्चों का वर्णन----
प्रौपपादिकमनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः ।।१२२४॥
उपपाद जन्म बाले देव और नारकी तथा मनुष्यों को छोड़कर शेष समस्त संसारी जीव तिर्यञ्च हैं । तिर्यञ्च सम्पूर्ण लोक में व्याप्त हैं। भवनवासी देवों की उत्कृष्ट प्रायुस्थितिरसुरनागसुपर्ण द्वीपशेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमा हीन मिताः
॥१२२॥ भवनवासी देवों में असुरकुमार, नागकुमार, सुपर्णकुमार, द्वीपकुमार और शेष के छह कुमारों की उत्कृष्ट प्रायु कम से एक सागर, तीन पल्य, अढ़ाई पल्य, दो पल्य, डेढ़ पल्य है। वैमानिक देवों की उत्कृष्ट प्रायु
सौधर्मेशानयोः सागरोपमे अधिके ॥१२२६॥ .
सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के देवों की उत्कृष्ट प्रायु कुछ अधिक दो सागर है । 'अधिके' इस शब्द को अनुवृत्ति सहस्त्रार स्वर्ग पर्यन्त होती है । इसलिये सहस्त्रार तक के देवों की आयु कथित सागरों से कुछ अधिक होती है । . सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के पटलों में प्रायु का वर्णन
प्रथम पटल में ६६६६६६६ करोड़ पंल्य और इतने ही पल्य तथा पल्य के तीन विभागों में से दो भाग उत्कृष्ट प्रायु है । ..
दूसरे पटल में १३३३३३३३ करोड पल्य.तथा ३३३३३३३ पल्य और पल्य के तीन भागों में से एक भाग प्रायु है।
तीसरे पटल में दो कोड़ा-कोड़ी पल्य की श्रायु है ।
चौथे पटल में २६६६६६६६ करोड़ पल्य तथा ६६६६६६६ पल्य और पल्य के तीन भागों में से दो भाग प्रमाण प्रायु है ।
पांचवें पटल में ३३३३३३३ करोड़ पल्य तथा ३३३३३३३ पत्य और पल्य के तीन भागों में से एक भाग प्रमाण आयु है।
छठवें पटल में बार कोड़ा-कोड़ी पल्य की प्रायु है । . सातवें पटल में ४६६६६६६६ करोड़ पल्य तथा ६६६६६६६ पल्य और
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अध्याय : सातवां ।
[ ५२६ पल्य के तीन भागों में से दो भाग प्रमाण आयु है ।
आठवें पटल में ५३३३३३३३ करोड़ पल्य और ३३३३३३३, १ बटे ३ पल्य की आयु है।
नौवें पटल में छह कोड़ा-कोड़ी पल्य को आयु है ।
दसवे पटल में ६६६६६६६६ करोड़ पल्य और ६६६६६६६, २ बटे ३ पल्य की आयु है।
___ ग्यारहवे पटल में ७३३३३३३३ करोड़ पल्य और ३३३३३३३, १ बटे ३ पल्य की प्रायु है।
बारहवें पटल में आठ कोड़ा-कोड़ी पल्य की अायु है ।
तेरहवें पटल में ८६६६६६६६ करोड़ पल्य प्रौर ६६६६६६६, २ बटे ३ पल्य की प्रायु है।
चौदहवें पटल में 8.६३३३३३३ करोड़ पन्य है और ३३३३३३३, १ बटे ३ पल्य की आयु हैं ।
पन्द्रहवें पटल में एक सागर की आयु है।
सोलहवें पटल में एक सागर ६६६६६६६ करोड़ पल्य और ६६६६६६६, २ बटे ३ पत्य की आयु है।
सत्रहवें पटल में एक सागर १३३३३३३३ करोड पल्य और ३३३३३३३, १ बटे ३ पल्य की आयु है।
अठारहवें पटल में बारह कोड़ा-कोड़ी पल्य की आयु है।
उन्नीसवें पटल में १२६६६६६६६ करोड़ पल्य और ६६६६६६६, २ बटे ३ पल्य की प्रायु है।
बीसवें पटल में १३३३३३३३३३ करोड़ पल्य और ३३३३३३३, १ बटे ३ पल्य की आयु है।
इक्कीसमें पटल में चौदह कोड़ा-कोड़ी पल्य की प्रायु है ।
बाईसवें पटल में १४६६६६६६६ करोड़ पल्य और ६६६६६६६, २ बढे ३ पल्य की प्रायु है। . तेईसवें पटल में १५३३३३३३३ करोड़ पल्य और ३३३३ १३३३, १ बटे ३ पल्य की प्रायु है।
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५३० ।
[गा. प्र. चिन्तामणि .. चौबीसवें पटल में सोलह कोड़ा-कोड़ी पल्प की आयु है ।
पच्चीसवें पटल में १६६६६६६६६ करोड़ पल्य और ६६६६६६६, २ बटे ३ पल्य की आयु है।
. छब्बीसवें पटल में १७३३३३३३३ करोड़ पल्य और ३३३३३३३, १ बटे ६ पल्य की आयु है।
सत्ताईसमें पटल में अठारह कोड़ा-कोड़ी पल्य की प्रायु है।
अट्ठाईसमें पटल में १८६६६६६६६ ६करोड़ पल्य प्रौर ६६६६६६६, २ बटे ३ पल्य की आयु है।
उनतीसवें पटल में १६३३३३३३३ करोड़ पल्य और ३३३३३३३, १ बटे ३ घल्य की प्राय है।
तीसवें पटल में बीस कोड़ा-कोड़ी पल्य की आयु है। इकतीसवें पटल में कुछ अधिक दो सागर की प्रायु है ।। सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सप्तः ॥१२३७।।
सानत्कुमार और माहेन्द्र में स्वर्ग में देवों की आयु कुछ अधिक सात सागर है । प्रथम पटल में २,५ बटे ७ सागर, द्वितीय पटल में ३, ३ बटे ७ सागर, तीसरे पटल में ४, १ बटे ७ सागर, चौथे पटल में ४, ३ बटे ७ सागर, पांचवें पटल में ५, ४ बेटे ७ सागर, छठवें पटल में ६, २ बटे ७ सागर और सातों पटल में कुछ अधिक सात सागर की आयु है।
त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदश पञ्चदश भिरधिमानि तु ।।१२२८।।
ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर स्वर्ग में दश सागर के कुछ अधिक, लान्तब और कापिष्ट स्वर्ग में चौदह सागर से कुछ अधिक, शुक्र और महाशुक्र में सोलह सागर से कुछ अधिक, शतार और सहस्त्रार में अठारह सागर से कुछ अधिक, आनंत प्राणत में बीस सागर और प्रारण और अच्युत में बाईस सागर की उत्कृष्ट प्रायु है । इस सूत्र में 'तु' शब्द यह बतलाता है कि पूर्व सूत्र के 'अंधिके' शब्द की अनुवृत्ति सहस्त्रार स्वर्ग पर्यन्त ही होती है । अतः प्रागे के स्वर्गों में श्रायु सागरों से कुछ अधिक नहीं है । ब्रह्म
और ब्रह्मोत्तर स्वर्ग के प्रथम पटल में ७, २ बटे ४ सागर, द्वितीय पटल में ८, १ बटे २ सागैर, तीसरे पटल में ६,१ बटे.४ सांगर और चौथे ऐटल में देशं सागर से कुछ अधिक पायु है।
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अध्याय : सातवां 1
[ ५३१
लाव और कापिष्ट स्वर्ग के प्रथम पटल में बारह सागर और दूसरे पटल में कुछ अधिक चौदह सागर की प्रायु है। शुक्र और महाशुक्र में एक ही पटल हैं । शतार और सहस्त्रार में भी एक ही पटल है ।
आनत, प्राणत, आरण और अच्युत स्वर्ग में छह पटल हैं। प्रथम पटल में सागर के तीसरे भाग से कुछ अधिक कम उन्नीस सागर की आयु हैं । दूसरे पटल में बीस सागर, तीसरे पटल में २०, २ बटे ३ सागर, चौथे पटल में इक्कीस सागर, पांचवें पटल में २१, १ बटे ३ सागर और छठवें पटल में बाईस सागर की आयु है ।
प्रारणाच्युतादूर्ध्वमेककेन नवतु ग्रंथेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ च ।। १२२६॥ रंग और अच्युत स्वर्ग से ऊपर नव ग्रैवेयकों में, नव अनुदिशों में और विजय आदि विमानों में एक-एक सागर बढ़ती हुई आयु है। सूत्र में नव शब्द का ग्रहण यह बतलाता है कि प्रत्येक में एक-एक की वृद्धि होती है । 'विजयादिषु' में आदि शब्द के द्वारा नव अनुदिशों का ग्रहण होता है ।
इस प्रकार प्रथम वेयक में तेईस सागर और नवमें ग्रैवेयक में इकतीस सागर की आयु है। नव अनुदिशों में बत्तीस सागर और विजय आदि पांच विमानों में तैंतीस सागर की उत्कृष्ट आयु है । सर्वार्थसिद्धि में जघन्य आयु नहीं होती इस बात को बतलाने के लिए सूत्र में सर्वार्थसिद्धि शब्द को पृथक् स्वता हैं । नवत्रैवेयकों के १. सुदर्शन, २. प्रमोध, ३. सुप्रबुद्ध ४ यशोधर, ५. सुभद्र, ७. सुमनस, = सौमनस और ६. प्रीतिङ्कर ।
नाम
६. सुविशाल,
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स्वर्गों में जघन्य आयु का वन
श्रायु है ।
ree eatenfone ॥१२३०॥
atri at ऐशान स्वर्ग के प्रथम पटल में कुछ अधिक एक पत्य की
परतः परसः पूर्वा पूर्वाऽनन्तराः ॥१२३१
पहिले-पहिले के पटल पर स्वर्ग की आयु आगे के पटलों और स्वंगों की जघन्य आयु है । अर्थात् सोधर्म और ऐशान स्वर्ग की उत्कृष्ट स्थिति सानत्कुमार और
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५३२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिए
महेन्द्र स्वर्ग में जघन्य आयु है । इसी क्रम से विजयादि चार विमानों तक जघन्य श्रायु जान लेना चाहिए।
नारकियों की अघन्य श्रायु
'नाकारणाञ्च द्वितीयादिषु ।।१२३२॥
पहिले-पहिले के नरकों को उत्कृष्ट श्रायु दूसरे आदि नरकों में जघन्य श्रायु होती है । इस प्रकार दूसरे नरक में जघन्य श्रायु एक सागर और सातवें नरक की जघन्य प्रयु बाईस सागर की हैं।
दशवर्षसहस्त्राणि प्रथमायाम् ॥१२३३।।
पहिले नरक में जघन्य श्रायु दश हजार वर्ष की है। यह जघन्य आयु प्रथम पटल में है। प्रथम पटल की उत्कृष्ट स्थिति नब्बे हजार वर्ष, द्वितीय पटल की जघन्य आयु है । इसी प्रकार आगे के पटलों जघन्य आयु का क्रम समझ लेना चाहिये ।
Hanaासियों को जधन्य श्रायुभवनेषु च ।। १२३४॥
Hearts की जन्य आयु दश हजार वर्ष की है।
व्यन्तरों की जघन्य श्रायु
व्यन्तराखाञ्च ।। १२३५।।
व्यन्तर देवों की भी जघन्य श्रायु दश हजार वर्ष की है । व्यन्तरों की उत्कृष्ट स्थिति
परा पल्योपमधिकम् ॥१२३६।१
व्यन्तर देवों की उत्कृष्ट आयु एक पल्य से कुछ अधिक है ।
ज्योतिषी देवों को उत्कृष्ट श्रायु-
ज्योतिष्काणाञ्च ॥ १२३७॥
ज्योतिषी देवों की उत्कृष्ट आधु कुछ अधिक एक पल्य की हैं ।
मदष्टभागोऽपरा ।।१२३८॥
ज्योतिषी देवों की जघन्य श्रायु एक पल्य के आठवें भाग प्रमाण हैं ।
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अध्याय : सातवां
[ ५३३
विशेष- चन्द्रमा की एक पत्य और एक लाख वर्ष सूर्य की एक पत्य और एक हजार वर्ष, शुक्र की एक पल्य और सौ वर्ष बृहस्पति की एक पत्थ, बुध को ग्राधा पल्य; नक्षत्रों की आधा पल्य और प्रकीर्शक ताराओं की १ बटे ४ पस्य उत्कृष्ट श्रायु है । प्रकोक ताराधों की और नक्षत्रों की जघन्य स्थिति पल्य के आठवें भाग ( १ बटे पल्य) प्रभार है और सूर्यादिकों की जघन्य श्रायु पल्य के चौथे भाग ( १ बटे ४ पत्य) प्रमाण है ।
atefantaract सागरोपमानि सर्वेषाम् ।।१२३६ ।।
'समस्त लौकान्तिक देवों की आयु प्राठ सागर को हैं । इन देवों में जघन्य और उत्कृष्ट आयु का भेद नहीं है । सब लौकान्तिक देवों के शुक्ल लेश्या होती है । इनके शरीर की ऊंचाई पांच हाथ है ।
प्रश्न :- सिद्ध लोक और सिद्ध शिला का वर्णन कैसा है ?
लम्बाई ७ राजू है एवं
उत्तर :- सर्वार्थसिद्धि नामक इन्द्रक के ध्वज दण्ड से १२ योजन मात्र ऊपर जाकर "पाभावान की भावों पृथ्वी स्थित है, तीन भुवन के मस्तक पर स्थित इस पृथ्वी की पूर्व पश्चिम चौड़ाई १ राजू है. उत्तर दक्षिण मोटाई योजन मात्र है । अतः यह पृथ्वीलोक के अन्त तक पृथ्वी के ऊपर ३ वातवलय हैं । जो कुछ कम १ योजन खात वलय २ कोस, घनवात वलय १ कोस तनु बातबलव ४२५ धनुष कम १ कोस है ।
योजन मोटी है । इस मात्र है । घोि
इस आठवी पृथ्वी के मध्य में रजतमयी, श्वेत छत्र के आकार वाला मनुष्य . क्षेत्र समान गोल पैतालीस लाख योजन विस्तृत "सिद्ध क्षेत्र" हैं । तिलोयपण्णत्तिः ग्रन्थ में इस क्षेत्र को "उत्तानधवल" क्षेत्र सदृश कहा है। इस क्षेत्र के मध्य की मोटाई
योजन है । एवं क्रम से घटते घटते अंत में १ अंगुल मात्र हैं । अर्थात् यह शिद्ध शिला उपरिम भाग में तो समान रूप है और नीचे हानि वृद्धि रूप है । त्रिलोकसार में इस सिद्ध शिक्षा को औधे रखे हुए कटोरे के सदृश कहा है । यह शिला ४५००००० योजन विस्तृत है । और इसकी परिधि १४२३०२४६ योजन प्रमाण हैं ।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि सभी सिद्ध भगवान सिद्ध क्षेत्र के उपरिम भाग तनुवात के चतुर्थ भाग में विराजमान है । अन्तिम, शरीर के प्रमाण से किंचित् न्यून आत्मप्रदेश वाले हैं ।
आठवीं पृथ्वी के ऊपर सात हजार पचास धनुष जाकर सिद्धों का आवास है । अर्थात् सर्वार्थसिद्धि से १२ योजन ऊपर की पाठवीं पृथ्वी है । यह एक राजू चौड़ी ७ राजू लम्बी है, किन्तु मोटी योजन मात्र ही है ! इस पृथ्वी के मध्य में सिद्ध शिला है । बह भी मोटी ८ योजन मात्र ही है । मध्य में गोलाकार है । जो कि ४५००००० योजन प्रमाण है । इसके ऊपर ४२५ धनुष कम १ योजन में तीन वासवलय है ! सिद्ध परमेष्ठी में अंतिम तनुवात बलय में स्थित है । १ योजन में ८००० धनुष होते हैं । उसमें से ७०५० धनुष पर जाकर सिद्धों का आवास है। जो कि १०५०५६२६० १६५३, १ बटे ८ योजन प्रमाण है ।
तनुवात बलय १ कोस का है। एक कोस में २०० धनुष होते हैं । इसमें ४२५ धनुष घंटाइये, तब १५७५ धनुष होता है । २००० - ४२५=१५७५ धनुष । तनुबस्त वलय के कोस प्रमाणांगुल की अपेक्षा से है । और सिद्धों की अवगाहना व्यवहारांगुल की अपेक्षा से है । इसलिये १५७५ को ५०० से गुणा करके व्यवहार धनुष बना लीजिये १५७५४५०० = ७८७ - ५.०० तनुवात की मोटाई को ५०० से गुणा करके १५.०० का भाग देने पर सिद्धों की उत्कृष्ट : अवगाहना का प्रमाण होता. है। एवं ६००००० का भाग देने पर जघन्य अवगाहना होती है । जैसे-१५७५४ ५०० : १५०० - ५२५ धनुष/१५७५४५.०० + ६००००० - ७ बटे ८ धनुष = ३, १ बटे २ हाथ । इसमें सिद्धों की जघन्य अवगाहना ७ धनुष के आठ भाग है । धनुष के चार हाथ होते हैं । अतः ७४४ =२८, २८:६-३, १ बटे २ । सिद्धों की जघन्य अवगाहना ३, १ बटे २ हाथ है । एवं उत्कृष्ट अवगाहना ५२५ धनुष है ।
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... अध्याय आठवां : द्रव्य-वर्णन अजोय तत्त्व का वर्णन
अजीवकाया धर्माधर्माकाश पुद्गलाः १२४०॥ . .
धर्म, अधर्म, अाकाश और पुदगल ये चार द्रव्य अजीवकाय हैं। शरीर के समान प्रलय या पिण्ड रूप होने के कारण इन द्रव्यों को अजीवकाय कहा है। यद्यपि काल द्रव्य भी अजीव है, लेकिन प्रचय रूप न होने के कारण काल को इस सूत्र में नहीं कहा है । काल द्रव्य के प्रदेश मोती के समान एक दूसरे से पृथक है। निश्चयनय से एक पुद्गल परमाणु बहुप्रदेशी नहीं है, किन्तु उपचार से एक पुद्गल परमाणु भी बहुप्रदेशी कहा जाता है, क्योंकि उसमें अन्य परमाणुओं के साथ मिलकर पिण्डरूप परिणत होने की शक्ति है। प्रश्न :--'असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधमक जीवानाम्' ऐसा प्रागे सूत्र है । उसी
से यह निश्चय हो जाता है कि धर्म आदि द्रव्य बहुप्रदेशी हैं । फिर इन द्रव्यों को बहुप्रदेशी बतलाने के लिये इस सूत्र में कार्य शब्द
का ग्रहण क्यों किया? उत्तर :---इस सूत्र में काय शब्द यह सूचित करता है कि धर्म आदि द्रव्य बहुप्रदेशी हैं और आगे के सूत्रों से उन प्रदेशों का निर्धारण होता है कि किस द्रव्य के कितने प्रदेश हैं ! काल द्रव्य के प्रदेश प्रचयरूप नहीं होते हैं, इस आत्त को बतलाने के लिये भी इस सूत्र में काय शब्द का ग्रहण किया है । 'अजीवकाय' इस शब्द में अजीय विशेषरण है और काय विशेष्य है। इसलिये यहां विशेषरण विशेष्य समास हुआ है । किन्हीं दो पदार्थों में व्यभिचार (असम्बन्ध) होने पर किसी एक स्थान में उनके संबंध को बतलाने के लिये विशेषण विशेष्य समास होता है। काल द्रव्य अजीव है, लेकिन काय नहीं है, जीव द्रव्य काय है, लेकिन अजीव नहीं है । अत: अजीव और काय में व्यभिचार होने के कारण विशेषण विशेष्य समास हो गया है। . .. द्रव्य का लक्षण
द्रव्याणि ॥१२४१॥
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५३६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि उक्त धर्म आदि चार द्रव्य हैं । जिसमें गुण और पर्याय पाये जाय उनको द्रव्य कहते हैं।
नैयायिक कहते हैं कि जिसमें द्रव्यत्व नामक सामान्य रहे, वह द्रव्य है। ऐसा कहना ठीक नहीं है । जब द्रव्यत्व और द्रव्य दोनों की पृथक्-पृथक् सिद्धि हो, तब द्रव्यत्व का द्रव्य के साथ सम्बन्ध हो सकता है। लेकिन दोनों की पृथक्-पृथक् सिद्धि नहीं है । और यदि दोनों की पृथक् सिद्धि है, तो बिना द्रव्यत्व के भी द्रव्य सिद्ध हो गया, तब द्रव्यत्त्व के सम्बन्ध मानने की क्या आवश्यकता है ? इसी प्रकार गुणों के समुदाय को द्रव्य कहना भी ठीक नहीं है, कि पु और समुदाय में अभेद मानने पर एक ही पदार्थ रहेगा और भेद मानने पर गुणों की कल्पना व्यर्थ है, क्योंकि बिना मुणों के भी समुदाय सिद्ध है। ...... गुण और द्रव्य में कथञ्चित् भेदाभेद मानने से कोई दोष नहीं आता। मुग
और द्रव्य पृथक्-पृथक् उपलब्ध नहीं होते, इसलिये उनमें अभेद है और उनके नाम, लक्षण, प्रयोजन आदि भिन्न भिन्न हैं, इसलिये उनमें भेद भी है। ....... पूर्व सूत्र में धर्मः प्रादि बहुत पदार्थ हैं, इसलिए इस सूत्र में धर्म आदि का द्रव्य के साथ समानाधिकरण होने से द्रव्य शब्द को बहुवचन कहा है, लेकिन समानाधिकरण के कारण द्रव्य शब्द पुल्लिग नहीं हो सकता, क्योंकि द्रव्य ..शब्द सदा नपुसक लिङ्ग
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जीव वध्य किस प्रकार के हैं--- - जीवाश्च ॥१२४२।।
जीव भी द्रव्य है। आगे काल को भी द्रव्य बतलाया है। इस प्रकर धर्म, अधर्म, भाकाश, पुद्गल, जीव और काल ये छह द्रव्य हैं। प्रश्न :-प्रागे 'गुरणपर्ययवद् द्रव्यम्' इस सूत्र में द्रव्य का लक्षण बतलाया
है। इसी से यह सिद्ध हो जाता है कि धर्म प्रादि प्रध्य हैं। फिर
यहां द्रव्यों की गणना करना ठीक नहीं है ? असर :-~-यहां द्रव्यों की गणना इसलिये की गई है कि द्रव्य छह ही हैं । अन्य लोगों के द्वारा मानी गयो द्रव्य की संख्या ठीक नहीं है।
नैयायिक पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा, मात्मा और मन ये
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अध्याय : आठवां ]
[ ५३७ नव द्रव्य मानते हैं । यह संख्या ठीक नहीं है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और मन का पुद्गल' द्रव्य में अन्तर्भाव हो जाता है।
जिनेन्द्र देव ने पुद्गल द्रव्य के छह भेद बतलाए हैं-अतिस्थूल, स्थूल-स्थूल, स्थूलसूक्ष्म, सूक्ष्मस्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्म-सूक्ष्म । इनके क्रमशः उदाहरण ये हैं-पृथ्वी, जल, छाया, नेत्र के सिवाय शेष चार इन्द्रियों के विषय, कर्म और परमाणु । .. प्रश्न :-पुद्गल द्रव्य में रूप रस गंध और स्पर्श पाये जाते हैं। घायु और
मन में रूप आदि नहीं है । अतः पुद्गल में इनका अन्तर्भाव कैसे
होगा? उत्तर :- वायु में भी रूप प्रादि चारों गुण पाये जाते हैं । वायु में नैयायिक के मत के अनुसार स्पर्श है हो और स्पर्श होने से रूपादि गुरणो को भा मानना पड़ेगा । जहाँ स्पर्श है, वहां शेष गुण होना ही चाहिये । ऐसा भी कहना ठीक नहीं कि वायु में रूप है तो वायु का प्रत्यक्ष होना चाहिये, क्योंकि परमाणु में रूप होने पर भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होता । इसी प्रकार जल, अग्नि आदि में स्पर्श आदि चारों गुण पाये जाते हैं। चारों का परस्पर प्रविनाभाव है ।
मन के दो भेद हैं - द्रव्यमान और भायमन । द्रव्यमान का पुद्गल में और भावमान का जीव में अन्तर्भाव होता है। द्रव्यमान रूपादि युक्त होने से पुमल द्रव्य का विकार है। द्रव्यमन झानोपयोग का कारण होने से रूपादि युक्त (मूर्त) है। शब्द भी पौद्गलिक होने से मूर्त ही है, अतः नैयायिक का ऐसा कहना कि जिस प्रकार शब्द प्रमूर्त होकर ज्ञानोपयोग में कारण होता है, उसी प्रकार द्रव्यमन भी अमूर्त होकर ज्ञानोपयोग में कारण हो जायेगा, यह ठीक नहीं है ।
प्रत्येक द्रव्य के पृथक्-पृथक् परमाणु मानना भी ठीक नहीं है । जल के परमाणु पृथ्वी रूप भी हो सकते हैं और पृथ्वी के परमाणु जलरूप भी । जिस प्रकार वायु आदि का पुद्गल में अन्तर्भाव हो जाता है, उसी प्रकार दिशा का आकाश में अन्तर्भाव हो जाता है; क्योंकि सूर्य के उदयादि की अपेक्षा प्रकाश के प्रदेशों की पंक्ति में पूर्व आदि दिशा का व्यवहार किया जाता है। ....
.. ये द्रव्य नित्य किस प्रकार हैं?-- ....... . . . . . .
नित्यावस्थितान्यरूपाणि ।।११४३॥
जीव आदि सभी द्रव्य नित्य, अवस्थित और अरूपी हैं। ये द्रव्य कभी नष्ट महीं होते हैं, इसलिये नित्य हैं। इनकी संख्या सदा छह ही रहती है अथवा ये कभी भी
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५३८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि अपने-अपने प्रदेशों को नहीं छोड़ते हैं, इसलिये अवस्थित हैं। द्रव्यों में नित्यत्व, और अवस्थित व द्रव्य नय की अपेक्षा से है । इन द्रव्यों में रूप, रस आदि नहीं पाये जाते, इसलिये अरूपी हैं। पुद्गल का स्वरूप----
रूपिणः पुद्गलाः ॥१२४४॥
पुद्गल द्रव्य में रूप, रस, गन्ध और स्पर्श पाये जाते हैं। इसलिये पुद्गल द्रव्य. रूपी है । जिस में पूरग और गलन हो वह पुद्गल है। पुद्गल के परमाणु, स्कन्ध
आदि अनेक भेद हैं. इसलिये सूत्र में बहुवचन का प्रयोग किया है । ये तीन द्रव्य किस प्रकार के हैं ?
श्रा आकाशादेक द्रव्याणि ।।
अाकाश पर्यन्त अर्थात् धर्म और आकाश-ये तीन द्रव्य एक-एक हैं । जीव या पुद्गल की तरह अनेक नहीं हैं ।
प्रश्न :--'पा प्राकाशावेककम्' ऐसे लघुसूत्र से ही काम चल जाता, फिर
__व्यर्थ ही द्रव्य शब्द का ग्रहण क्यों किया ?
उत्तर :- उक्त द्रव्य, द्रव्य की अपेक्षा एक-एक है, लेकिन क्षेत्र और भाव की अपेक्षा असंख्यात पोर अनन्त भो है, इस बात को बतलाने के लिये सूत्र में द्रव्य शब्द का ग्रहण आवश्यक है। ये द्रव्य निष्क्रिय किस प्रकार हैं ?
निष्क्रियाणि च ॥११४५।।
धर्म, अधर्म और प्राकाश ये द्रव्य निष्क्रिय भी हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने को क्रिया कहते हैं । इस प्रकार की क्रिया इन द्रव्यों में नहीं पाई जाती, इसलिये ये निष्क्रिय हैं। प्रश्न :-यदि धर्म प्रादि द्रव्य निष्क्रिय हैं, तो इनको उत्पत्ति नहीं हो सकती,
क्योंकि उत्पसि क्रियापूर्वक होती है। उत्पत्ति के प्रभाव में विनाश भी संभव नहीं है। अतः धर्म आदि द्रव्यों को उत्पाद-व्यय
और प्रौश्य युक्त कहना ठीक नहीं है? उत्तर :--यद्यपि धर्म प्रादि द्रव्यों में क्रिया निमित्तक उत्पाद नहीं है, फिर भी इनमें दूसरे प्रकार का उत्पाद पाया जाता है।
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अध्याय : आठवां ]
[ ५३६ स्वनिमित्त और परनिमित्त के भेद से दो प्रकार का उत्पाद धर्म आदि द्रव्यों में होता रहता है । इन द्रव्यों के अनन्त अगुरुलघु गुरणों में छह प्रकार की वृद्धि और छह प्रकार की हानि स्वभाव से ही होती रहती है, यही स्वनिमित्तक उत्पाद और व्यय है । मनुष्य आदि की गति, स्थिति और अवकाशदान में हेतु होने के कारण धर्म आदि द्रव्यों में पर प्रत्ययापेक्ष उत्पाद और विनाश भी होता रहता है । क्योंकि क्षण-क्षण में गति आदि के विषय भिन्न-भिन्न होते हैं और विषय भिन्न होने से उसके कारण को भी भिन्न होना चाहिये। प्रश्न :-क्रिया सहित जलादि ही मछली प्राधि की गति प्रादि में निमित्त
होते हैं । धर्म प्रादि निष्क्रिय द्रव्य जीवादि की गति आदि में हेतु
कैसे हो सकते हैं ? उत्तर :--ये द्रव्य केवल जीवादि की गति आदि में सहायक होते हैं, प्रेरक नहीं। जैसे चक्षु रूप के देखने में निमित्त होता है, लेकिन जो नहीं देखना चाहता उसको देखने की प्रेरणा नहीं करता। इसलिये धर्म आदि द्रव्यों को निष्क्रिय होने पर भी जीवादि की गति आदि में हेतु होने में कोई विरोध नहीं है।
जीव और पुद्गल को छोड़कर शेष चार द्रव्य निष्क्रिय हैं। उध्यों के प्रदेशों की संख्या कितनी हैं
असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मकजीयानाम् ।।१२४६॥
धर्म, अधर्म और एक जोव के असंख्यात प्रदेश होते हैं । आकाश के जितने प्रदेश में एक पुद्गल परमाणु रह सकता है, उतने आकाशदेश को प्रदेश कहते हैं । असं. ख्यात के तीन भेद हैं- जघन्य, उत्कृष्ट और अजधन्योत्कृष्ट । इनमें से यहां अजघन्योस्कृष्ट लिया गया है । धर्म और अधर्म द्रव्य पूरे लोकाकाश में व्याप्त हैं। एक जीव लोकाकाश प्रमाण प्रदेश वाला होने पर भी प्रदेशों में संकोच और विस्तार की अपेक्षा स्वकर्मानुसार प्राप्त शरीर प्रमाण हो रहता है । लोक पुरण समुद्धात के समय जीव पूरे लोकाकाश में व्याप्त हो जाता है। जिस समय जीव लोक पूरण समुद्धात करता है, उस समय मेरु के नीचे चित्र वज्र पटल के मध्य में जीव के पाठ मध्य प्रदेश रहते हैं और शेष प्रदेश पूरे लोकाकाश में व्याप्त हो जाते हैं। दण्ड, कपाट, प्रतर और लोक पुरण की अपेक्षा चार सभय प्रदेशों के विस्तार में और चारं समय संकोच में इस प्रकार लोक पूरण समुद्धात करने में आठ समय लगते हैं।
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५४० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
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आकाशस्थानन्ताः ॥१२४७॥ आकाश द्रव्य के अनन्त प्रदेश हैं, पर लोकाकाश के असंख्यात ही प्रदेश हैं । संख्येयासंख्येयाश्च पुद्गलानाम् ।।
पुद्गल द्रव्य के संख्यात और अनन्त प्रदेश हैं। सूत्र में 'च' शब्द से अनन्त का ग्रहण किया गया है । अनन्त के तीन भेद हैं-परीतान्त, युक्तानन्त, और अनन्तान्त । यहां तीनों अनन्तों का ग्रहण किया गया है। किसी द्वयणुक आदि पुद्गल के संख्यात प्रदेश होते हैं। दो अणु से अधिक और डेढ़ सौ अंक प्रमाण पर्यन्त पुद्गल परमाणुओं के समूह को संख्यात प्रदेशी स्कंध कहते हैं। लोकाकाश के प्रदेश प्रमाण परमाणुओं वाला स्कंध प्रसंख्यात प्रदेशी होता है। इसी प्रकार कोई स्कंध असंख्यात संख्यात प्रदेश वाला, कोई परीतान्त प्रदेश वाला, कोई युक्तानन्त प्रदेश वाला और कोई अनन्तानन्त प्रदेश वाला भी होता है।
प्रश्न :-लोकाकाश के असंख्यात प्रदेश हैं, फिर वह अनन्त और
. अनन्तानन्त प्रदेश वाले पुद्गल द्रव्य का आधार कैसे हो
__ सकता है ?
उत्तर :-~-पुद्गल परमाणुनों में सूक्ष्म परिणमन होने से और अव्याहत अवगाहन शक्ति होने से प्राकाश के एक प्रदेश में भी अनन्तानन्त पुद्गल परमाणु रह सकते हैं।
नारयोः ॥१२४८॥
परमाणु के दो प्रादि प्रदेश नहीं होते हैं । परमाणु एक प्रदेशी ही होता है । पुद्गल के सबसे छोटे हिस्से का नाम परमाणु है। अतः परमाणु के भेद या प्रदेश नहीं हो सकते । परमाणु से छोटा और आकाश से बड़ा कोई नहीं है। अतः परमाणु के प्रदेशों में भेद नहीं डाला जा सकता। दृश्यों के रहने का स्थान
लोकाकाशेऽवगाहः ।।१२४६।।
जीद प्रादि द्रव्यों का अवगाह (स्थान) लोकाकाश में है। लीकाकाश आधार और जीवादि द्रश्य प्राधेय हैं। लेकिन लोकाकाश का अन्य कोई आधार नहीं है, वह अपने ही आधार से हैं। ... प्रश्न :-जैसा लोकाकाश का कोई दूसरा आधार नहीं है, उसी प्रकार
धर्मादि द्रव्यों का भी दूसरा आधार नहीं होना चाहिये अथवा
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अध्याय : पाठवां ]
[ ५४१ धर्मादि के आधार की तरह प्रकाश का भी दूसरा आधार होना
चाहिए? उत्तर :-आकाश से अधिक परिमाण वाला अर्थात् बड़ा दूसरा कोई द्रव्य नहीं है, जो प्रकाश का आधार हो सके । अतः आकाश किसी का प्राधेय नहीं हो सकता । आकाश भी व्यवहार नय की अपेक्षा धर्मादि द्रव्यों का आधार माना गया है । निश्चय नय से तो सब द्रव्य अपने अपने प्रावार से हैं । आकाश और अन्य द्रव्यों में आधार-प्राधेय सम्बन्ध का तात्पर्य यही है कि आकाश से बाहर अन्य द्रव्य नहीं है । एवम्भूतनय की अपेक्षा से तो सभी द्रव्य स्वप्रतिष्ठित ही हैं । एवम्भूत अर्थात् निश्चयनय । परमात्म प्रकाश (१----५) में सिद्धों को स्वात्म निवासी ही बतलाया है ।
प्रश्न :--प्राधार और प्राधेय पूर्वापर काल भावी होते हैं। जैसे घड़ा
पहले रखा हुआ है और उसमें बेर प्रादि पीछे रख दिये जाते हैं। आकाश और धर्मादि द्रव्य समकाल भाषी हैं, इसलिए इनमें
सहारनय से भाधा-शालेय म्नन्ध नहीं बन सकता? उत्तर :-कहीं-कहीं समकालभावी पदार्थों में भी प्राधार-प्राधेय सम्बन्ध पाया जाता है, जैसे घट और घटके रूपादिक में । इसी प्रकार समकाल भावी प्रकाश और धर्मादि द्रव्यों में उक्त सम्बन्ध है।
लोक और अलोक का विभाग धर्म और अधर्भ द्रव्य के सद्भाव से होता है । यदि धर्म और अधर्म द्रव्य न होते तो जीव और पुद्गल की जहाँ कि धर्म और अधर्म द्रव्य हैं, वहां लोक और उसके बाहर अलोक गति और स्थिति के अभाव हो जाने से लोकालोक का विभाग भी न होता।
धर्माधर्मयोः कृत्स्ने ॥१२५०।।
धर्म और अधर्म द्रव्य समस्त लोकाकाश में तिल में तेल की तरह व्याप्त हैं। इनमें अवगाहन शक्ति होने से परस्पर में व्याघात नहीं होता है । ..... प्रश्न :--प्रलोकाकाश में अधर्म द्रव्य न होने से प्राकाश की स्थिति और
काल द्रब्ध न होने से प्राकाश में परिणमन कैसे होता है ? उसर :-जैसे जल के समीप स्थित, उष्णा लोहे का गोला, एक ओर से जल को खींचता है, लेकिन जल पूरे लोह पिण्ड में व्याप्त हो जाता है, उसी प्रकार लोक के अन्त भाग के निकट का अलोकाकाश अधर्म और काल द्रव्य का स्पर्श करता
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५४२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
है, और उस स्पर्श के कारण समस्त अलोकाकाश की स्थिति और उसमें परिवर्तन होता है ।
एक प्रदेशादिषु भाग्य: पुद्गलानाम् ।।१२५१११
पुद्गल द्रव्य का अवगाह लोकाकाश के एक प्रदेश को आदि लेकर असंख्यात प्रदेशों में यथा योग्य होता है । आकाश के एक प्रदेश में एक परमाणु से लेकर असंख्यात और अनन्त परमाणुओं के स्कन्ध का अवगाह हो सकता है । इसी प्रकार आकाश के दो, तीन यादि प्रदेशों में भी पुद्गल द्रव्य का श्रवगाह होता है ।
प्रश्न :
धर्म और अधर्म द्रव्य अमूर्त हैं, इसलिए इनके श्रवगाह में कोई विरोध नहीं है; लेकिन अनन्त प्रवेश वाले मूर्त पुद्गलस्कन्ध का असंख्यात प्रदेशी लोकाकाश में श्रवगाह फँसे हो सकता है ?
उत्तर :- सूक्ष्म परिगमन और अवगाहन शक्ति होने से आकाश के एक प्रदेश में भी अनन्त परमाणु वाला पुद्गल स्कन्ध रह सकता है । जैसे एक कोठे में अनेक दीपकों का प्रकाश एक साथ रहता है । इस विषय में प्रागम भी प्रमाण है । प्रवचनसार में कहा है कि सूक्ष्म, बादर और नाना प्रकार के अनन्तानन्त पुद्गल स्कन्धों से यह लोक ठसाठस भरा है।
इस विषय में रुई की गांठ का दृष्टान्त भी उपयुक्त है। फैली हुई रुई अधिक क्षेत्र को घेरती है, जबकि गांठ बांधने पर अल्प क्षेत्र में या जाती है ।
असंख्येय भागादिषु जीवानाम् ।।१२५२ ।।
जीवों का प्रवाह लोकाकोश के असंख्यातवें भाग से लेकर समस्त लोकाकाश में है । लोकाकाश के असंख्यात भागों में से एक, दो, तीन यादि भागों में एक जीव रहता है, और लोक पूरण समुद्धात के समय वही जीव समस्त लोकाकाश में व्याप्त हो जाता है ।
प्रश्न :- यदि लोकाकाश के एक भाग में एक जीव रहता है, तो एक भाग में द्रव्य प्रमाण से शरीर युक्त श्रनन्तानन्त जीव राशि कैसे रह सकती है ?
उत्तर :- सूक्ष्म और बादर के भेद से जीवों का एक यदि भागों में अवगाह होता है । अनेक बादर जीव एक स्थान में नहीं रह सकते, क्योंकि वे परस्पर में प्रतिघात ( बाधा ) करते हैं । लेकिन परस्पर में प्रतिघात न करने के कारण एक
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अध्याय : आठवां }
[ ५४३ निगोद जीव के शरीर में अनन्तानन्त सूक्ष्म जीव रहते हैं । बादर जीवों से भी सूक्ष्म जीवों का प्रतिघात नहीं होता है । असंख्यात प्रदेशी जीव लोक के प्रसंख्यातवें भाग में---
प्रदेश संहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ।।१२५३।।
दीपक के प्रकाश की तरह जीव प्रदेशों के संकोच और विस्तार की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें आदि भागों में रहता है। दीपक को यदि खुले मैदान में रक्खा जाये तो उसका प्रकाश दूर तक होगा । उसी दीपक को कोठे में रखने से कम प्रकाश और घड़े में रखने से और भी कम प्रकाश होगा। इसी प्रकार जीव भी अनादि कार्मरण शरीर के कारण छोटा और बड़ा शरीर धारण करता है और जीव के प्रदेश संकोच और विस्तार के द्वारा शरीर प्रमाण हो जाते हैं। लघु शरीर में प्रदेशों का संकोच और बड़े शरीर में प्रदेशों का विस्तार हो जाता है, लेकिन जीव वही होता है, जैसे जो हाथी और वही चींटी के शरीर में ।
एक प्रदेश में स्थित होने के कारण यद्यपि धर्म आदि द्रव्य परस्पर में प्रवेश करते हैं, लेकिन अपने-अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते, इसलिए उनमें संकर या एकत्व दोष नहीं हो सकता । पञ्चास्तिकाय में कहा भी है. कि---"ये द्रध्य परस्पर में प्रवेश करते हैं, एक दुसरे में मिलते हैं, परस्पर को अवकाश देते हैं, लेकिन अपने-अपने स्वभाव को नहीं छोड़ते।" धर्म और अधर्म द्रव्य का उपकार
गति स्थित्युपग्रही धर्माधर्मयोरूपकारः ॥१२५४॥
एक देश से देशान्तर में जाना गति है, ठहरना स्थिति है । जीव और पुद्गलों को गमन करने में सहायता देना धर्म द्रव्य का उपकार और जीव तथा पुद्गलों को ठहरने में सहायता देना अधर्म द्रव्य का उपकार है । यद्यपि उपकार दो हैं, लेकिन उपकार शब्द सामान्य वाची होने से सूत्र में एक वचन का ही प्रयोग किया है।
प्रश्न :-सूत्र में उपग्रह शब्द व्यर्थ है, क्योंकि उपकार शब्द से ही प्रयोजन
सिद्ध हो जाता है, इसलिए पतिस्थितिधर्माधर्म योरूपकार'
ऐसा सूत्र होना चाहिये ? । उत्तर :-~-यदि सूत्र में उपग्रह शब्द न हो, तो जिस प्रकार धर्म द्रव्य का
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:૪૪
[ गो. प्र. चिन्तामणि
उपकार गति और धर्म द्रव्य का उपकार स्थिति है, ऐसा क्रम से होता है, उसी प्रकार जीवों के गमन में सहायता करना धर्म द्रव्य का उपकार और पुद्गलों को ठहरने में सहायता देना अधर्म द्रव्य का उपकार है - ऐसा विपरीत अर्थ भी हो जाता । श्रतः इस भ्रम को दूर करने के लिए सूत्र में उपग्रह शब्द का होना आवश्यक है ।
प्रश्न :--- धर्म और प्रधर्म द्रव्य का जो उपकार बतलाया है, यह श्राकाश का ही उपकार है, क्योंकि आकाश में हो गति और स्थिति होती है ?
उत्तर :--- ग्राकाश द्रव्य को उपकार द्रव्यों को अवकाश देना है | इसलिए aft और स्थिति को प्रकाश का उपकार मानना ठीक नहीं है। एक द्रव्य के अनेक प्रयोजन मानकर, यदि धर्म और अधर्म द्रव्य का अस्तित्व स्वीकार न किया जाए, तो लोक और आलोक का विभाग नहीं हो सकेगा । इन्हीं दो द्रव्यों के कारण ही यह विभाग बनता है ।
प्रश्न :--- --धर्म और अधर्म द्रव्य का प्रयोजन पृथ्वी, जल प्रादि से ही सिद्ध हो जाता है, इसलिये इनके मानने की कोई आवश्यकता नहीं है ? उत्तर : -- पृथ्वी, जल आदि गति और स्थिति के विशेष कारण हैं । लेकिन इनका कोई साधारण कारण भी होना चाहिये। इसलिये धर्म और अधर्म द्रव्य का मानना आवश्यक है, क्योंकि ये गति और स्थिति में सामान्य कारण होते हैं । धर्म और अधर्म द्रव्य गति और स्थिति में
प्रेरक नहीं होते, किन्तु सहायक
मात्र होते हैं, अतः ये परस्पर गति और स्थिति का प्रतिबन्ध नहीं कर सकते । प्रश्न :- धर्म और अर्धम द्रव्य की सत्ता नहीं है, क्योंकि इनकी उपलब्धि नहीं होती है ?
उत्तर :- ऐसा कोई नियम नहीं है कि जिस वस्तु को प्रत्यक्ष से उपलब्धि हो वही वस्तु सत् मानी जाय । सब मतावलम्बी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के पदार्थों को मानते हैं । धर्म धर्म द्रव्य अतीन्द्रिय होने से यद्यपि हम लोगों को प्रत्यक्ष नहीं होते हैं, लेकिन सर्वज्ञ तो इनको प्रत्यक्ष करते ही हैं। श्रुतज्ञान से भी धर्म अधर्म द्रव्य की उपलब्धि होती है ।
श्राकाश का उपकार किस प्रकार है
श्राकाशस्थावगाहः ।।१२५५।।
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अध्याय : पाठवां ]
[ ५४५ समस्त द्रव्यों को अवकाश देना,आकाश का उपकार है। .. प्रश्न :-क्रिया वाले जीव और पुदगलों को प्राकाश देना तो ठीक है, लेकिन
निष्क्रिय धर्मादि बच्चों को अवकाश देना तो संभव नहीं है? उत्तर :- यद्यपि धर्म आदि में अवगाहन क्रिया नहीं होती है, लेकिन उपचार से वे भी अवगाही कहे जाते हैं। धर्म आदि द्रव्य लोकाकाश में सर्वत्र व्याप्त हैं, इसलिये व्यवहार नय से इनका अवकाश मानना उचित ही है । प्रश्न :---यदि आकाश में अवकाश देने की शक्ति है, तो दीवाल में गाय
प्रादि का और बच्न में पत्थर आदि का भी प्रवेश हो जाना
चाहिये? उत्तर :- स्थूल होने के कारण उक्त पदार्थ परस्पर का प्रतिघात करते हैं । यह अाकाश का दोष नहीं है, किन्तु उन्हीं पदार्थों का है। सूक्ष्म पदार्थ परस्पर में अवकाश देते हैं, इसलिये प्रतिधात नहीं होता। इससे यह भी नही समझना चाहिये कि अवकाश देना पदार्थों का काम है, आकाश का नहीं, क्योंकि सब पदार्थों को अवकाश देने वाला एक साधारणकारण आकाश मानना आवश्यक है । .
यद्यपि पालोकाकाश में अन्य द्रव्य न होने से आकाश का अवकाशदान लक्षण वहां नहीं बनता, लेकिन अवकाश देने का स्वभाव वहां भी रहता है, इसलिये अलोकाकाश अवकाश न देने पर भी प्रकाश ही है । पुदगल तथ्य का उपकार.. शरीरवाङ्मनः प्राणापानाः पुद्गलानाम् ।।१२५६॥ . .
शरीर, बचन, मन और श्वासोच्छवास ये पुद्गल द्रव्य के उपकार हैं।
शरीर विशीर्ण होने वाले होते हैं, औदारिक, वैक्रियिक, प्राहारक, संजस और कामगा ये पांच शरीर पुद्गल से बनते हैं । प्रात्मा के परिणामों के निमित्त से पुद्गल परमाणु कर्मरूप परिमात हो जाते हैं और कर्मों से औदारिक प्रादि शरीरों की उत्पत्ति होती है, इसलिये शरीर पोद्गलिक हैं। ... .. प्रश्न :-~-कार्मण शरोर अनाहारक होने से पौगलिक नहीं हो सकता?
उत्तर :- यद्यपि कार्मण शरीर अनाहारक है, लेकिन उसका विपाक गड कांटा आदि मूर्तिमान द्रव्य के सम्बन्ध होने पर होता है इसलिये कार्मण शरीर भी पौद्गलिक ही है।
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५४६ }
[ गो. प्र. चिन्तामणि
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__वचन के दो भेद हैं-द्रव्य वचन और भाव वचन ३. वीर्यान्तराय, मति और श्रुत ज्ञानावरगद का क्षयोपशम होने पर और अंगोपांग नाम कर्म के उदय होने पर भाब बचन होते हैं, इसलिये पुद्गल के आश्रित होने से पौगलिक हैं । भाव वचन को सामर्थ्य से युक्त प्रात्मा के द्वारा प्रेरित होकर जो पुद्गल परमाणु वचन रूप से परिणत होते हैं ,वे द्रव्य वचन हैं । द्रव्य वचन श्रोत्रेन्द्रिय के विषय होते हैं।
प्रश्न :-वचन अमूर्त हैं, अतः उनको पौद्गलिक कहना ठीक नहीं है ?
उत्तर :- वचन अमूर्त नहीं हैं किन्तु मूर्त हैं, और इसीलिये पौद्गलिक भी हैं। शब्दों का मूर्तिमान् द्रव्यकर्ण के द्वारा ग्रहण होता है, दीवाल आदि मूतिमान् द्रव्य के द्वारा शब्द का प्रवरोध देखा जाता है, तीव्र भेरी आदि के शब्दों के द्वारा मन्द मच्छर
आदि के शब्दों का व्याघात होता है, मूर्त वायु के द्वारा भी शब्द का व्याघात होता है । विपरीत. वायु चलने से शब्द अपने अनुकूल देश में नहीं पहुंच पाता, इन सब कारणों से शब्द में मूर्तत्व सिद्ध होता है । मूर्त द्रव्य के द्वारा ग्रहण, अवरोध, अभिभव आदि अमूर्त वस्तु में नहीं हो सकते।
मन के भी दो भेद हैं-द्रव्यमान और भावमान । ज्ञानावरण और वीर्यान्तराय के क्षयोपशम होने पर अंगोपांग नामकर्म का उदय होने पर गुरण और दोषों के विचार करने में समर्थ आत्मा के उपकारक जो पुद्गल मन रूप से परिणत होते हैं, वे द्रव्यमन हैं। भावमन लब्धि और उपभोग रूप होता है और द्रव्यमन के आश्रित होने से पौद्गलिक है। प्रश्न :-मन अणमात्र और रूपादि गुणों से रहित एक भिन्न, द्रव्य है ।
उसको पौद्गलिक कहता ठीक नहीं है ? उत्तर :- यदि मन अणुमात्र है, तो इन्द्रिय और प्रात्मा से उसका सम्बन्ध है या नहीं? यदि सम्बन्ध नहीं है, तो वह आत्मा का उपकारक नहीं हो सकता । और आत्मा के साथ मन का सम्बन्ध है, तो एक देश में ही सम्बन्ध हो सकेगा, तब प्रत्य देशों में वह उपकारक नहीं हो सकेगा। अदृष्ट के कारण अलातचक्र की तरह मन का पारमा के सब प्रदेशों में परिभ्रमण मातना भी ठीक नहीं है। क्योंकि प्रात्मा अदृष्ट नैयायिक मत के अनुसार स्वयं क्रिया रहित है, अतः बहू. मन. की क्रिया में भी कारण नहीं हो सकता। क्रियावान् वायु आदि के गुरण ही अन्यत्र क्रिया हेतु हो सकते हैं।
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अध्याय : पाठवा. ]
[ ५४७ ज्ञानावरण और बीर्यान्तराय के क्षयोपशम होने पर और अंगोपांग नीमकर्म के उदय होने पर शरीर के भीतर से जो वायु बाहर निकलती है; उसको प्रारण और जो वायु बाहर से शरीर के भीतर जाती है, उसको अपान कहते हैं।
मन और प्रासापान का भी मूर्त द्रव्य से प्रतिघात प्रादि देखा जाता है; इसलिये ये भी मूर्त हैं किसी के गिरते मन का इसिवा और मदिरा प्रांदि से अभिभव देखा जाता है। हाथ आदि से मुख को बन्द कर देने पर प्राणापान का प्रतिघात और गले में कफ अटक जाने पर श्वासोच्छवास का अभिभव भी देखा जाता है।
प्रारणापान क्रिया के द्वारा जीव का अस्तित्व सिद्ध होता है। शरीर में जो श्वासोच्छ्वास क्रिया होतो है, उसका कोई कर्ता अवश्य होना चाहिये, क्योंकि कर्ता के बिना क्रिया नहीं हो सकती और जो वासोच्छ्वास क्रिया का कर्ता है, वही जीव है । . उक्त शरीर प्रादि पुगल के उपकार जीव के प्रति कैसे हैं --
सुख दुःखं जीवित मरसोयग्रहाश्च ॥१२५७।।
सुख, दुःख, जीवितं और मरण ये भी जीव के प्रति पुद्गल के उपकार हैं । साता वेदनीयं के उदय से सुख और असाता बेंदनीय के उदय से दुःख होता है। प्रायु कर्म के उदय से जीवन और आयु कर्म के विनाश से मरण होता है। ये सुख प्रादि मुर्त कारण के होने पर होते हैं, इसलिये ये पौद्गलिक हैं ।
सूत्रगत उपग्रह शब्द इस बात को सूचित करता हैं कि पुद्गल का पुद्गल के प्रति भी उपकार होता है । जैसे काँसे का बलन भस्म से साफ हो जाता है, मैला जल फिटकरी आदी से स्वच्छ हो जाता है और मरम लोहा जल से ठंडा हो जाता है । सूत्रगत 'च' शब्द यह सूचित करता है कि इन्द्रिय आदि अन्य भी पुद्गल के उपकार
जीव का उपकार क्या है
परस्परोपग्रहों जीवानाम् ॥१२५८॥
जीव परस्पर उपकार करते हैं, जैसे पिता-पुत्र, स्वामी-सेवक और गुरु-शिष्य प्रादि । स्वामी धनादि के द्वारा, सेवक अनुकल कार्य के द्वारा स्वामी का उपकार करता है । गुरु शिष्य को विद्या देता है तो शिष्य शुश्रूषा प्रादि से गुरु को प्रसन्न रखता है। सूत्रगत . उपग्रह शब्द सूचित करता है कि सुख, दुःख, जीवित पौर मरण द्वारा भी जीव परस्पर उपकार करते हैं।
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५४८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण काल का उपकार
वर्तना परिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य ॥१२५६।।
वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व, अपरत्व ये काल द्रव्य के उपकार हैं। कहीं 'वर्तना परिणामः क्रिया' इन तीनों पदों में स्वतन्त्र विभक्तियां भी देखी जाती हैं। कहीं 'वर्तना परिणाम क्रिया:' ऐसा समस्त पद उपलब्ध होता है । सब पदार्थों में स्वभाव से ही प्रतिसमय परिवर्तन होता रहता है. लेकिन उस परिवर्तन में जो बाह्य कारण है, वह परमाणुरूप काल द्रव्य है । काल द्रव्य के निमित्त से होने वाले परिवर्तन का नाम वर्तना है । वर्तना से काल द्रव्य का अस्तित्व सिद्ध होता है। चावलों को बर्तन में अग्नि पर रखने के कछ समय बाद प्रोदन (भात) बन जाता है। चावलों से जो प्रोदन बना वह एक समय में और एक साथ ही नहीं बना, किन्तु चावलों में प्रत्येक समय सूक्ष्म परिणमन होते-होते अन्त में स्थूल परिणाम दृष्टिगोचर होता है । यदि प्रति समय सूक्ष्म परिणमन न होता तो स्थल परिणमन भी नहीं हो सकता था । अतः चावलों में जो प्रति समय परिवर्तन हुआ वह काल रूप बाह्य कारण की अपेक्षा से ही हुआ। इसी प्रकार सब पदर्थों में परिण मन काल द्रव्य के कारण ही होता है । काल द्रव्य निष्क्रिय होकर भी निमित्त मात्र से सब द्रव्यों की वर्तना (क्रिया) में हेतु होता है।
___ एक पर्याय को निवृत्ति होकर दूसरे पर्याय की उत्पत्ति होने का नाम परिगाम है ! जीव के परिणामः क्रोध, मन, माया, लोभादि हैं। पुद्गल का परिणाम वादि हैं। धर्म, अधर्म और आकाश का परिणाम अगुरुलघु गुरणों की वृद्धिहानि से होता है।
हलन चलन का नाम क्रिया है। क्रिया के दो भेद हैं-प्रायोगिकी और वैस्त्रसिकी। शकट (गाड़ी) आदि में क्रिया दूसरों के द्वारा होती है । इसको प्रायोगिकी क्रिया कहते हैं । मेघ आदि में क्रिया स्वभाव से ही होती है। इसको वैस्त्रसिकी क्रिया कहते हैं।
___ छोटे और बड़े के व्यवहार को परत्वापरत्व कहते हैं । क्षेत्र और काल की अपेक्षा से परत्वापरत्व व्यवहार होता है, लेकिन यहाँ काल का प्रकरण होने से कालकृत परत्वापरत्व का ही ग्रहण किया गया है । कालकृत परत्वापरत्व से समीप देशवर्ती और ब्रतादि गुरगों से रहित वृद्ध चाण्डाल को बड़ा और दूर देशदर्ती प्रतादि गुणों से सम्पन्न ब्राह्मण बालक को छोटा कहते हैं ।
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अध्याय : पाठवा
[ ५४६ परिणाम, किया परस्वापरत्व, प्रावली, घड़ी, घण्टा, दिन आदि का कारण व्यवहार काल है। सूर्यादि को क्रिया से जो समय, प्रावली प्रादि का व्यवहार होता है, वह व्यवहार कालकुत है । एक पुद्गल परमारण, को आकाश के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश तक जाने में जो काल लगता है, उसका नाम समय है और उस समय का कारण मुख्य काल है । व्यवहार में भूत, भविष्यत् आदि व्यवहार मुख्यतया होते हैं।
यद्यपि परिणाम प्रादि वर्तना के ही विशेष या भेद हैं, लेकिन काल द्रव्य के मुख्य और व्यवहार ये दो भद बतलाने के लिए सबका ग्रहण किया गया है। मुख्य काल वर्तना रूप है और व्यवहार काल परिणाम, क्रिया और पस्त्वापरत्व रूप है। पुद्गल का स्वरूप---
स्पर्शरस पंध वसवन्तः पुद्गलाः ॥१२६०॥
पुद्गल में स्पर्श, रस, गंध और वर्ण ये चार गुण पाये जाते हैं। कोमल, कठोर, हलका, भारी, शीत, उष्ण, स्निग्ध और रक्ष ये स्पर्श के पाठ भेद हैं । खट्टा, मीठा, कडुवा, करायला और चिरपरा ये रस के पांच भेद हैं, लवण रस का भी रसों में ही अन्तर्भाव है । सुगन्ध और दुर्गन्ध ये गंध दो भेद हैं । काला, नीला, पीला, लाल और सफेद ये वर्ण के पांच भेद हैं। इनके भी संख्यात, असंख्यात और अनन्त उत्तर भेद होते हैं । जिन अग्नि आदि में रस आदि प्रकट नहीं है, वहाँ स्पर्श की सत्ता द्वारा शेष का अनुमान कर लेना चाहिए।
यद्यपि 'रूपिरणः पुद्गलाः' इस पूर्वोक्त सूत्र से ही पुद्गल के रूप रसादि दाले स्वरूप का ज्ञान हो जाता है, लेकिन वह सूत्र पुद्गल को रूप रहित होने की आशंका के निवारण के लिए कहा गया था। 'नित्यावस्थितान्य रूपारिण' इस सूत्र से पुद्गल में भी अरूपित्व की प्राशंका थी । अतः यह सूत्र पुद्गल का पूर्ण स्वरूप बतलाने के लिये है, निरर्थक नहीं है। पुद्गल की पर्याय
शब्द बध सौम्य स्थौल्य संस्थान भेव तमश्छाया तपोद्योत बन्तश्च ॥१२६।।
पुद्गल द्रव्य में शब्द, बन्ध, सूक्ष्मता, संस्थान, भेद, छाया, तम, प्रापत और उद्योत रूप से परिणमन होता रहता है अर्थात् में पुद्गल की पर्यायें हैं। शब्द के दो
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[ गो. प्र. चिन्तामणि दो भेद हैं---भाषारूप और प्रभावारूप । भाषारूप शब्द के भी दो भेद हैं--अक्षरास्मक और अक्षरात्मक । अक्षरात्मक शब्द संस्कृत और असंस्कृत के भेद से आर्य
और म्लेच्छों के व्यवहार का हेतु होते हैं। दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय और पांचं इंद्रिय जीवों में ज्ञानातिशय को प्रतिपादन करने वाला अनक्षरात्मक शब्द है । एकेंद्रियादि की अपेक्षां दी इन्द्रियं आदि में ज्ञानातिशय है । एकेद्रिय में तो ज्ञानमात्र है । अतिशय झान वाले सर्वज्ञ के द्वारा एकेंद्रिय का स्वरूप बताया जाता है।
कई लोग सर्वज्ञ के शब्दों को अनक्षरात्मक कहते हैं, लेकिन उनका यह कहना ठीक नहीं हैं, क्योंकि अंनक्षरात्मक शब्द से अंर्थ का ज्ञान नहीं हो सकता। सर्व भाषात्मक शब्द पुरुषकृत होने से प्रायोगिक होते हैं ।
प्रभाषात्मक शब्द के दो भेद हैं--प्रायोगिक और वैससिक । प्रायोगिक, के चार भेद हैं--तत, वितत, धन और सुषिर ।।
तत-चमड़े के तानने से पुष्कर, भेरी, दुन्दुभि आदि बाजों से उत्पन्न होने वाले शब्द को तत कहते हैं ।।
_ वितत तन्त्री के कारण वीणा आदि से उत्पन्न होने वाला शहद वितत है । किन्नरों के द्वारा कहा गया शब्द भी वितत है ।
धन-घण्टा, ताल आदि से उत्पन्न होने वाला शब्द धन है । सुषिर--बांस, शंखं प्रादि से उत्पन्न होने वाला शब्द सुषिर हैं । वैस्त्रसिक--मेघ, विद्युत प्रादि से उत्पन्न होने वाला शब्द वैस्रसिक है।
बन्ध के दो भेद हैं--प्रायोगिक और वैनसिक । पुरुषकृत बन्ध को प्रायोगिक कहते हैं । इसके दो भेद हैं---अजीवविषयक और जीवाजीवविषयक । लाख और काष्ठ आदि का सम्बन्ध अजीव विषयक प्रायोगिक बन्ध है । जीव के साथ कर्म और नोकर्म का बन्ध जीवाजीवविषयक प्रायोगिक बन्ध है । पुरुष की अपेक्षा के बिना स्वभाव से ही होने वाले बन्ध को वैससिक बन्ध कहते है। रुक्ष और स्निग्ध गुण के निमित्त से विद्युत, जलधारा, अग्नि, इन्द्रधनुष आदि का बन्ध वैससिक है।
- सौभ्य के दो भेद हैं-- अन्त्य और प्रापेक्षितं । परमाणुओं में अन्त्य सौम्य हैं। बेलं, आंवला, बर आदि में प्रापेक्षिक सौम्य है । बेल की अपेक्षा प्रांवला सूक्ष्म है और आँचले की अपेक्षा बेर सूक्ष्म है। .
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अध्याय : पाठवां ]
स्थौल्य के भी दो भेद हैं--अन्त्य और प्रापेक्षित । अन्त्य स्थौल्य संसार व्यापी महास्कन्ध में है । बेर, आंवला, बेल आदि में प्रापेक्षित स्थौल्य है । बेर की अपेक्षा आंवला स्थल है और प्रांवले की अपेक्षा बेल स्थौल्य है।
संस्थान के दो भेद है-इत्थं लक्षण और अनित्थं लक्षण । जिस प्रकार का अमुक रूप में निरुपण किया जा सके वह इत्थं लक्षण संस्थान है । जैसे गोल, त्रिकोण, चतुष्कोण मादि । जिस प्रकार के विषय में कुछ कहा न जा सके वह अनित्थं लक्षण संस्थान है, जैसे मेघ, इन्द्रधनुष आदि का आकार अनेक प्रकार का होता है ।
भेद छः प्रकार का है---उत्कर, चूर्ण, खण्ड, चूरिका और अणुचटन । उत्कर-करोत, कुल्हाड़ी आदि से लकड़ी प्रादि को काटना को उत्कर है। चूर्ण-जौ, गेहूँ प्रादि को पीसकर सत्तु आदि बनाना चूर्ण हैं । खण्ड---घट का फूट जाना खण्ड है । रिणका-उड़द, मूग आदि को दलकर दाल बनाना चूणिका है। प्रलर---मेघ पटलों का विघटन हो जाना प्रतर है ।
अणुचटन----संतप्त लोहे के गोले को धन से कूटने पर जो आगे के करण निकलते है, वह अणुचटन है ।
प्रकाश का विरोधी अन्धकार पुद्गल की पर्याय है।
प्रकाश नौर. आवरण के निमित्त से छाया होती है । इसके दो भेद हैं-- वर्णादिविकारात्मक और प्रतिबिम्बात्मक ।
वर्णादिविकरात्मक छाया--गौरवर्ण को छोड़कर श्यामवर्ण, रूप, हो जाना वर्णादिविकरात्मक छाया है।
प्रतिबिम्बात्मक छाया--चन्द्र प्रादि का. जल में जो प्रतिबिम्ब होता है, वह प्रतिबिम्बात्मक छाया है ।
श्रातप-सूर्य, बह्नि आदि में रहने वाली उष्णता. और प्रकाश का नाम
उद्योत--चन्द्रमा, भरिंग, खद्योत (जुगनू) आदि से होने वाले प्रकाश को उद्योत कहते हैं।
उक्त शब्दादि दश. पुद्गल द्रव्य के विकारी पर्यायें हैं। सूत्र में 'च' शब्द से अभिधात, नोदन प्रादि अन्य भी पुद्गल द्रव्य के चिकारों का ग्रहण कर लेना चाहिये।
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[ मो. प्र. चिन्तामणि पुद्गल के भेद-~
प्रणवः स्कन्धाश्च ॥१२६२॥
पुदगल द्रव्य के दो भेद हैं-अरए और स्कन्ध ! अण, का परिमारा आकाश के एक प्रदेश प्रमाण है । यद्यपि परमारण प्रत्यक्ष नहीं है, लेकिन उसका स्कन्ध रूप कार्यों को देखकर अनुमान कर लिया जाता ह ।।
परमारण प्रों में दो अबिरोधी स्पर्श, एक वर्ण, एक गन्ध और एक रस रहता है । ये स्वरूप की अपेक्षा से नित्य हैं, लेकिन स्पर्श आदि पर्यायों की अपेक्षा से अनित्य भी हैं ! इनका परिमाण परिमण्डल (गोल) होता है। नियमानुसार परमारण का स्वरूप इस प्रकार बतलाया है--
"जिसका वही प्रादि, वही मध्य, वही अन्त हो, जो इन्द्रियों से नहीं जाना जा सके, ऐसे प्रविभागी द्रव्य को परमारग कहते हैं।"
स्कन्ध-स्थूल होने के कारण जिसका ग्रहण, निक्षेपण प्रादि हो सके, ऐसे पुद्गल के परभाग अओं के समूह को स्कन्ध कहते हैं । ग्रहण आदि व्यापार की योग्यता न होने पर भी उपचार से द्वयण के प्रादि को भी स्कन्ध कहते हैं।
यद्यपि पुद्गल के अनन्त भेद हैं, लेकिन प्रण रूप जाति और स्कन्ध रूप जाति को अपेक्षा से दो भेद हो जाते हैं। प्रश्न-जाति में एकवचन होता है, फिर सूत्र में बहुवचन का प्रयोग क्यों
किया? उत्तर- अरण और स्कन्ध के अनेक भेद बतलाने के लिये बहुवचन का
प्रयोग किया गया है । यद्यपि 'अरण, स्कन्धाश्च' इस प्रकार एकपद पाले सूत्र से ही काम चल जाता है । लेकिन पूर्व के दो सूत्रों में भेद बतलाने के लिए 'अरणकः स्कन्धाश्च' इस प्रकार
दो पद का सूत्र बनाना पड़ा । 'स्पर्श रस गन्ध वरणं वन्तः पुद्गलाः' इस सूत्र का सम्बन्ध केवल अरग से है अर्थात् परमारण प्रों में स्पर्श, रस, गंध, वर्ण पाये जाते हैं । लेकिन स्कन्ध का सम्बन्ध 'स्पर्श रस' इत्यादि और 'शब्द बन्ध' इत्यादि दोनों सूत्रों से है। स्कन्ध स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण वाले होते हैं तथा शब्द, बन्ध आदि पर्यायवाले भी होते हैं।
इस सूत्र में 'च' शब्द समुच्चयार्थक है अर्थात् प्रण ही पुद्गल नहीं हैं
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अध्याय : पाठयां ।
[ ५५३ किन्तु स्कन्ध भी पुदगल हैं । निश्चयनय से परमाण ही पुद्गल हैं और व्यवहार नय से स्कन्ध भी पुद्गल हैं। स्कन्धों की उत्पत्ति का कारण
भेवसातेभ्य उत्पश्चन्ते ।।१२६३।।
स्कन्धों की उत्पत्ति भेद, संघात और दोनों से ही होती है । भेद अत्ति - विदारण जुदा होना, संधात अर्थात् मिलना इकट्ठा होना ।.
दो प्रण ओं के मिल जाने से दो प्रदेश वाला स्कन्ध बन जाता है । दो प्रदेश वाले स्कन्ध के साथ एक अरण के मिल जाने से तीन प्रदेश बाला स्कन्ध हो जाता है । इस प्रकार संघात से संख्यात, असंख्यात और अनन्त प्रदेश परिमारण स्कन्ध की उत्पत्ति होती है । भेद से भी स्कन्धों की उत्पत्ति होती है । संख्यात और अनन्त प्रदेश वाले स्कन्धों के भेद (टुकड़े) करने से द्विप्रदेश पर्यन्त अनेक स्कन्ध बन जायेंगे। इसी प्रकार भेद और संघात दोनों से भी स्कन्ध की उत्पत्ति होती है ! कुछ परमाणुओं से भेद होने से, और कुछ परमाणुओं के साथ संघात होने से स्कन्ध की उत्पत्ति होती है। अणु की उत्पत्ति का कारण
भेवादणुः ।।१२६४॥
परमाणु की उत्पत्ति भेद से ही होती है----संघात और भेदसंघात से अणु की उत्पत्ति नहीं होती है । किसी स्कन्ध के परमाणु पर्यन्त भेद करने से परमारण की की उत्पत्ति होती है। रश्य स्कन्ध की उत्पत्ति का कारण--
मेद संघासाभ्यां चाक्षुषः ॥१२६॥
चाक्षुष अर्थात् बक्षु इन्द्रिय से देखने योग्य स्कन्धों की उत्पत्ति भेद और संघात से होती है, केवल भेद से नहीं । अनंत अरण अओं का संघात होने पर भी कुछ स्कंध चाक्षुष होते हैं। और कुछ अचाक्षुष । जो अचाक्षुष स्कंध है, उसका भेदं हो जाने पर भी सूक्ष्म परिमारण बने रहने के कारण वह चाक्षुष नहीं हो सकता। लेकिन यदि उस सुक्ष्म स्कंध का भेद होकर अर्थात् सूक्ष्मत्व का विनाश होकर अन्य किसी चाक्षुष स्कंध के साथ सम्बंध हो जाय तो वह चाक्षुष हो जायेगा । इस प्रकार चाक्षुष स्कंध की उत्पत्ति भेद और संघात दोनों से होती है।
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५५४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
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द्रव्य का लक्षण---
सद् द्रव्य लक्षणम् ।।१२६५।।
द्रव्य का लक्षण सत् है, अर्थात् जिसका अस्तित्व अथवा सत्ता हो, वह द्रव्य है। सत् का स्वरूप-- . उत्पाद व्यय प्रौव्य पुवते सत् ।।१२६६।।
: जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य सहित हो, वह सत् है । अपने मूल स्वभाव को न छोड़कर नवीन पर्याय की उत्पत्ति को उत्पाद कहते हैं। जैसे मिट्टी के पिण्ड से घट पर्याय का होना । पूर्व पर्याय का नाश हो जाना व्यय है । जैसे घट की उत्पत्ति होने पर मिट्टी के पिण्ड का विनाश व्यय है । ध्रौव्य, द्रव्य के उस स्वभाव का नाम है जो द्रव्य की सभी पर्यायों में रहता है और जिसका कभी विनाश नहीं होता । जैसे - मिट्टी । पर्यायों का उत्पाद-विनाश होने पर भी द्रव्य स्वभाव का अन्वय बना
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प्रश्न :--भेद होने पर युक्त शब्द का प्रयोग देखा जाता है । जैसे - देवदत्त
दण्ड से युक्त है। इसी तरह यदि उत्पाद, व्यय, धौव्य और ध्य में भेद है; तो दोनों का प्रभाव हो जायगा, क्योंकि उत्पाद, व्यम और ध्रौव्य के बिना द्रव्य की सत्ता सिद्ध नहीं हो सकती
और द्रव्य के प्रभाव में उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य भी संभव नहीं है ? उत्तर :---उत्पाद आदि और द्रव्य में अभेद होने पर भी कथञ्चिद् भेद नय की अपेक्षा से युक्त शब्द का प्रयोग किया जाता है । यह खम्भा सार युक्त है, ऐसा व्यवहार अभेद में भी देखा जाता है। द्रव्य लक्ष्य है और उत्पाद आदि लक्षण हैं । अतः लक्ष्यलक्षण भाव को दृष्टि में रखने पर पर्यायाथिक नय की अपेक्षा से द्रव्य और उत्पाद आदि में भेद है, लेकिन द्रव्याथिक नय की अपेक्षा से उनमें अभेद है । अथवा यहां युक्त शब्द योगार्थक युज् धातु से नहीं बना है, किन्तु युक्त शब्द समाधि (एकता) वाचक है । अतः जो उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यात्मक हो, उसका नाम द्रव्य है । तात्पर्य यह है कि उत्पाद; व्यय और घाव्य एतत्त्रयात्मक ही द्रव्य है, दोनों का पृथक् अस्तित्व नहीं है । पर एक अंश है और दूसरा अंशी, एक पर्याएँ है तो दूसरा अन्वयी द्रव्य, एक लक्षरण है, तो दूसरा लक्ष्य इत्यादि भेद दृष्टि उनमें भेद है.........
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अध्याय : आठवां ]
[ ५५५
निस्य का लक्षरण---
तभावाव्ययं नित्यम् ।।१२६७।।
उस भाव या स्वरूप के प्रत्यभिज्ञान का जो हेतु होता है, वह अनुस्यूत अंश नित्यत्व है । यह वही है, इस प्रकार के ज्ञान को प्रत्यभिज्ञान कहते हैं ! यह ज्ञान बिमा हेतु के नहीं हो सकता । अतः तद्भाव प्रत्यभिज्ञान का हेतु है । किसी ने पहिले देवदत्त को बाल्यावस्था में देखा था। जब वह उसे वृद्धावस्था में देखता है और पूर्व का स्मरण कर सोचता है कि - यह तो वही देवदत्त है। इससे ज्ञात होता है कि देवदत्त में एक ऐसा तद्भाव (स्वभाव विशेष ) है जो बाल्य और वृद्ध दोनों अवस्थाओं में अन्वित रहता है । यदि द्रव्य का अत्यन्त विनाश हो जाय और सर्वथा नूतन पर्याय की उत्पत्ति हो तो स्मरण कर प्रभाव हो जायगा और स्मरणाभाव होने से लोक व्यवहार की भी निवृत्ति हो जायगी। द्रव्य में नित्यत्व द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से ही है, सर्वथा नहीं । यदि द्रव्यं सर्वथा नित्य हो तो आत्मा में संसार की निवृत्ति के लिए की जाने वाली दीक्षा आदि क्रियाएँ निरर्थक हो जायेंगी । और आत्मा की मुक्ति भी नहीं हो सकेगी।
अपितानपितसिद्धः ॥१२६॥
मुख्य या प्रधान और गौरण या यप्रधान के विवक्षा भेद से एक ही द्रव्य में नित्यत्व अनित्यत्व आदि अनेक धर्म रहते हैं। वस्तु अनेक धर्मात्मक है। जिस समय जिस धर्म की विवक्षा होती है, उस समय वह धर्म प्रधान हो जाता है और अन्य धर्म गौरण हो जाते हैं । एक ही मनुष्य पिता, पुत्र, भ्राता, चाचा आदि अनेक धर्मों को धारण करता है । वह अपने पुत्र की अपेक्षा पिता है, पिता की अपेक्षा पुत्र है, भाई की अपेक्षा भ्राता है । अतः अपेक्षा भेद से एक ही वस्तु में अनेक धर्म रहने में कोई विरोध नहीं है। द्रव्य सामान्य अन्वयी अंश से नित्य है तथा विशेष पर्याय की अपेक्षा अनित्य है । इसी तरह भेद-प्रभेद, अपेक्षित्व-अनपेक्षित्व, देव-पुरुषार्थ, पुण्य-पाप आदि अनेकों विरोधी-युगल वस्तु में स्थित हैं । वस्तुतः इन सभी धर्मों का अविरोधी आधार है। परमाणुमों के बन्ध का कारण---
स्निग्ध क्षत्वाद् अन्धः ॥१२६६।। . स्निग्ध और रुक्ष मुरण के कारण परमाणुओं का परस्पर में बन्ध होता है।
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[ मो. प्रः चिन्तामणि स्निाध और रुक्ष वाले दो परमाणुओं के मिलने से द्वषणुक और तीन परमाणुओं के मिलने से व्यणुक की उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार संख्यात, असंख्यात और अनन्त परमाणु वाले स्कन्धों की भी उत्पत्ति होती है । स्निग्ध और रुक्ष गुण के एक से लेकर अनन्त तक भेद होते हैं । जैसे जल, बकरी का दूध और धृत, गाय का दूध और धत और ऊंटनी का दूध और घृत इनमें स्निग्ध गुण की उत्तरोत्तर अधिकता है । धूलि, रेत, पत्थर, वज्र प्रादि में रुक्ष गुण की उत्तरोत्तर अधिकता है । इसी प्रकार पुद्गल परमाणुओं में स्निग्ध और रुक्ष गुण का प्रकर्ष और अपकर्ष पाया जाता है ।
ने जघन्य गुणानाम् ॥१२७०।।
जघन्य गुण वाले परमाणुओं का बन्ध नहीं होता है। प्रत्येक परमाणुओं में स्निग्ध आदि के एक से लेकर अनन्त तक गुण रहते हैं । गुरण उस अविभागी प्रतिच्छेद (शक्ति का अंश) का नाम है, जिसका दूसरा विभाग या विवेचन न किया जा सके । जिन परमाणुओं में स्निग्धता और रक्षता का एक ही तुम सा झ रहता है, उनका परस्पर बन्ध नहीं हो सकता । गुण शब्द का प्रयोग गौरा, अवयव, द्रव्य, उपकार, रूपादि, ज्ञानादि, विशेषरण, भाग आदि अनेक अर्थों में होता है। वहीं गुरुम् शब्द भाग (अविभागी अंश) अर्थ में लिया गया है।
एक गुण बाले स्निग्ध परमाणु का एक, दो, तीन आदि अनन्त गुणवाले स्निग्ध या रुक्ष परमाणु के साथ बन्ध नहीं होगा। इसी प्रकार एक मुरण वाले रुक्ष परमाणु का एक, दो तीन प्रादि अनन्त गुरण वाले रुक्ष या स्निग्ध परमाणु के साथ बन्ध नहीं होगा । जघन्य मुग बाले स्निग्ध और रक्ष परमाणुओं को छोड़कर अन्य स्निग्ध और रुक्ष परमाणुओं का परस्पर में बन्ध होता है।
गुगसाम्ये सदृशानाम् ।।१२७१।।
गुणों की समानता होने पर एक जाति वाले परमाणुओं का भी बन्ध नहीं होता है । अर्थात् दो गुण वाले स्निग्ध परमाणु का दो मुसा वाल स्निग्ध या रक्ष परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता है । और दो गुण वाले रुक्ष परमाणु का दो गुण वाले रुक्ष या स्निग्ध परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता है।
यञ्चापि गुण की समानता होने पर सजातीय या विजातीय किसी प्रकार के परमाणुओं का बन्ध नहीं होता है और इस प्रकार सूत्र में सदृश शब्द निरर्थक हो जाता है, लेकिन सदृश शब्द इस बात को सुचित करता है कि गुणों की विषमता होने
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अध्याय : आठवां ]
[ ५५७
पर समान जाति वाले परमाणुओं का भी बन्ध होता है, केवल विसदृश जाति वाले परमाणुओं का ही नहीं। बन्ध होने का अन्तिम निर्णय----
अधिकादिगुरखानान्तु ॥१२७२॥ . दो से अधिक गुण वाले परमाणुओं का बन्ध होता है । तु शब्द का प्रयोग पाद पूरण अवधारण, विशेषण और समुच्चय इन चार अर्थों में होता है, उनमें से यहाँ तु शब्द विशेषाणार्थक है। पूर्व में जो बन्ध. का निषेध किया गया है, उसका प्रतिषेध करके इस सूत्र में बन्ध का विधान किया गया है। दो गुण वाले स्निग्ध परमाणु का एक, दो और तीन गुरा बाले स्निग्ध या रुक्ष परमाणु के साथ बन्ध नहीं होगा, किन्तु चार गुण वाले स्निग्ध या रुक्ष परमाणु के साथ बन्ध होगा। दो गुण वाले स्निग्ध परमाणु का पांच, छह आदि अनन्त गुण वाले स्निग्ध या रुक्ष परमाणु के साथ भी बन्ध नहीं होगा । तीन गुण वाले स्निग्ध परमाणु का पाँच गुण वाले स्निग्ध या मक्ष परमाणु के साथ ही बन्ध होगा अन्य गुण वाले परमाणु के साथ नहीं । इसी प्रकार दो गुण वाले रुक्ष परमाणु का चार गुण वाले रुक्ष या स्निग्ध परमाणु के साथ ही बन्ध होगा और तीन गुण वाले रुक्ष परमाणु का पांच गुण वाले रुक्ष या स्निग्ध परमाणु के साथ ही बन्ध होगा, अन्य गुण वाले परमाणु के साथ नहीं । अतः दो गुण अधिक होने पर समान और असमान , जाति वाले परमारण ओं का परस्पर में बन्ध होता है।
बन्ऽधिको पारिवामिको च ॥१२७३॥
बन्ध में अधिक मुरण वाले परमाणु कम गुण वाले परमाणुओं को अपने में परिणत कर लेते हैं । नूतन अवस्था को उत्पन्न कर देना पारिणामिकत्व है । जैसे गीला गुड़ अपने ऊपर गिरी हुई धूलि को गुड़रूप परिणत कर लेता है, उसी प्रकार चार गुरण वाला परमाणु दो गुण वाले परमाणु को अपने रूप में परिगत कर लेता है, अर्थात् उन दोनों की पूर्व अवस्थाएँ नष्ट हो जाती हैं । एक तीसरी ही अवस्था उत्पन्न होती है । उनमें एकता हो जाती है । यही कारण है कि अधिक गुण वाले परमाणुओं का ही बन्ध होता है । समगुण वाले परमाणुओं का नहीं। यदि अधिक गुण परमाणुओं को पारिणामक न माना जाय तो बन्ध अवस्था में भी परमाणु सफेद और काले तन्तुओं से बने हुए कपड़े में तन्तुओं के समान पृथक् पृथक ही रहेंगे, उनमें एकत्व
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। गो. प्र. चिन्तामणि परिणमन न हो सकेगा। इसी प्रकार जल और सत्तू में परस्पर सम्बन्ध होने पर जल पारिणाम होता है।
___इस प्रकार बन्ध होने पर ज्ञानावरण, दर्शनावरण आदि कर्मों की तीस कोड़ा कोड़ी सागर की स्थिति भी बन जाती है. क्योंकि जीव के साथ पूर्व सम्बद्ध कार्मरण द्रव्य स्निग्ध प्रादि गुरगों से अधिक हैं । द्रव्य का लक्षण
गुरण पर्यवद् द्रव्यम् ।।१२७४॥ ..
जो गुण और पर्याय बाला हो, वह द्रव्य है । गुरण अन्वयी (नित्य) होते हैं। अर्थात् द्रव्य के साथ सदा रहते हैं. द्रव्य को कभी नहीं छोड़ते । गूरणों के द्वारा ही एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य से भेद किया जाता हैं । यदि गुण न हों तो एक द्रव्य दूसरे द्रव्यरूप भी हो जायेगा । जीवनमा पनि को द्रव्यों से पृथक् करता है । इसी प्रकार पुद्गलादि द्रव्यों के रूपादि गुण भी उन द्रव्यों को अन्य द्रव्यों से पृथक् करते हैं।
पर्याय व्यतिरेकी (अनित्य होती है, अर्थात् द्रव्य के साथ सदा नहीं रहती बदलती रहती हैं । गुरगों के विकार को ही पर्याय कहते हैं, जैसे - जीव के ज्ञान गुण की घट ज्ञान, पट ज्ञान प्रादि पर्यायें । व्यवहार नय की अपेक्षा से पर्याय द्रव्य से कथञ्चित् भिन्न हैं । यदि पर्याय द्रव्य से सर्वथा अभिन्न हों, तो पर्यायों के नाश होने पर द्रव्य का भी नाश हो जायगा। .
कहा हैं कि द्रव्य के विधान करने वाले को गुण कहते हैं । और द्रव्य के . विकार को पर्याय कहते हैं । अनादि निधन द्रव्य में जल में तरंगों के समान प्रतिक्षण पर्याये उत्पन्न और विनष्ट होती रहती हैं। द्रव्य में गुण और पर्याय में सदा रहती हैं । गुण और पर्यायों के समूह का नाम ही द्रव्य है । गुण और पर्याय को छोड़कर द्रव्य कोई पृथक् वस्तु नहीं है । काल द्रव्य का वर्णन---
कालश्च ।।१२७५॥ ... काल भी द्रव्य है; क्योंकि उसमें द्रव्य का लक्षण पाया जाता है । द्रव्य का लक्षण उत्पाद व्यय ध्रौव्ययुक्त और गुण पर्ययवद् द्रव्यम्' बतलाया है। काल में दोनों प्रकार का लक्षण पाया जाता है । स्वरूप की अपेक्षा नित्य रहने के कारण काल में
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अध्याय : पाठवां ]
में स्वप्रत्यय प्रौव्य है । उत्पाद और व्यय स्वप्रत्यय और पर प्रत्यय दोनों प्रकार से होते हैं । अगुरुलघु गुरगों को हानि और वृद्धि की अपेक्षा काल में स्वप्रत्यय उत्पाद और व्यय होता रहता है। काल द्रव्यों के परिवर्तन में कारण होता है । अतः परप्रत्यय उत्पाद और व्यय भी काल में होते हैं ।
___ काल में साधारण दोनों प्रकार के गुरणं रहते हैं । अचेतनत्य, अमूर्तत्व, सूक्ष्मत्व, अगुरुलधुत्व अादि काल के साधारण गुण हैं । द्रव्यों के परिवर्तन में हेतु होना. काल का असाधारण गुरण है । इसी प्रकार काल में पर्यायें भी उत्पन्न और विनष्ट होती रहती हैं । अतः जीवादि की तरह काल भी द्रव्य है। प्रश्न :-काल द्रय को पृथक क्यों कही ? पहले "जीवकाया धर्मा धर्मा
कांश काल पुदगलाः" ऐसा सूत्र बनाना चाहिये यां। ऐसा करने
' से कॉल द्न्य का पृथक वर्णन न करना पड़ला ? - उत्तर :-यदि "अंजीवकाया" इत्यादि सूत्र में काल द्रव्य को भी सम्मिलित कर देते तो धर्म आदि द्रव्यों की तरह काल भी कार्य हो जाता, लेकिन काल द्रव्य मुख्य और रहार दोनों हार से काम नहीं है।
पहिले निष्क्रियाणि च" इस सूत्र में धर्म, अधर्म और आकाश द्रव्य को निष्क्रिय बतलाया है । इनके अतिरिक्त अन्य सक्रिय हैं । अतः पूर्व सूत्र में काल का वर्णन होने से काल भी सक्रिय द्रव्य हो जाता है और "r आकाशदेकद्रव्यम्" इसके अनुसार काल भी एक द्रव्य हो जाये । लेकिन काल न तो सक्रिय है और न एक द्रव्य है । इन कारणों से काल द्रब्य का वर्णन पृथक् किया गया है।
काल द्रव्य अनेक है, इसका तात्पर्य यह है कि लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश-प्रदेश : पर एक-एक कालाणु रत्नराशि के समान पृथक्-पृथक् स्थित है। लोकांकाश के प्रदेश असंख्यात होने से काल द्रव्य भी असंख्यात है । कालाणु अमूर्त और निष्क्रिय हैं, तथा सम्पूर्ण लोकाकाश में व्याप्त हैं। व्यवहार काल का प्रमाण
सोऽनन्ससमयः ।।१२७६॥
व्यवहार काल का प्रमाण अनन्त समय है । यद्यपि वर्तमान काल का प्रमाण एक समय ही है, किन्तु भूत और भविष्यत् काल की अपेक्षा से काल को अनन्त समय वाला कहा गया है।
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५६० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि अथवा यह सूत्र व्यवहार काल के प्रमाण को न बतलाकर मुख्यकाल के प्रमाण को ही बतलाता है । एक ही कालाणु अनन्त पर्यायों की वर्तनर में हेतु होने के कारण उपचार से अनन्त समय वाला कहा जाता है। समय काल के उस छोटे से छोटे अंश को कहते हैं, जिसका बुद्धि के द्वारा विभाग न हो सके । मन्दगति से चलने वाले पुद्गल परमाणु को आकाश के एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश तक चलने में जितना काल लगे, उतने काल को समय कहते हैं।
यहां समय शब्द से प्रावली, उच्छ्वास आदि का भी ग्रहण करना चाहिये । असंख्यात समयों का एक प्रावली होती है । संख्यात् प्रावलियों का एक उच्छवास होता है । सात उच्छ्वासों का एक थोव होता है और सात थोवों का एक लव होता है । साढ़े अड़तीस लवों की एक नाली होती है। दो नालियों का एक मुहूर्त होता है, और पावली से एक समय अधिक तथा मुहूर्त से एक समय कम अन्र्तमुहर्त का काल है। इसी तरह माह, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, पल्योपम आदि की गणना होती है । . इल्य का लक्षण ---
दुव्याश्रया निगुणा गुस्साः ॥१२७७॥ जो द्रव्य के आश्रित हों और स्वयं निर्गुण हों, उनको गुरण कहते हैं ।
निगुण विशेषरण से घणुक, व्यणुक आदि स्कन्धों की निवृत्ति हो जाती है। यदि 'द्रव्याश्रयागुरणाः' ऐसा भी लक्षण कहते तो द्वयणुक आदि भी गुण हो जाते. क्योंकि ये अपने कारणभूत परमाणु द्रव्य के प्राश्रित हैं। लेकिन जब यह कह दिया गया कि जो मुरण को निर्गुण भी होना चाहिये तो दूधणुक आदि गुण नहीं हो सकते, व्योंकि निर्गुण नहीं है, किन्तु गुरण सहित हैं।
। यद्यपि घर संस्थान आदि पर्यायें भी द्रव्याश्रित और निर्गुण हैं, लेकिन वे गुरण नहीं हो सकती, क्योंकि 'द्रव्याश्रया' का तात्पर्य यह है कि मुराग को सदा द्रव्य के आश्रित रहना चाहिये । और पर्यायें कभी-कभी साथ रहती हैं, वे नष्ट और उत्पन्न होती रहती है, अतः पर्यायों को गुण नहीं कह सकते। नैयायिक गुरंगों को द्रव्य से पृथक् मानते हैं, लेकिन उनका ऐसा मानना ठीक नहीं है। यद्यपि संज्ञा, लक्षण आदि के भेद से द्रव्य और गुण में कथञ्चित भेद है, लेकिन द्रव्यात्मक और द्रव्य के परिणाम या पर्याय होने के कारण गुण द्रव्य से अभिन्न हैं।
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अध्याय : आठवां ]
[ ५६१ पर्याय का वर्णन----
तभावः परिणामः ॥१२७८।।
धर्मादि द्रव्यों के अपने-अपने स्वरूप से परिणमन करने को पर्याय कहते हैं। धर्मादि द्रव्यों के स्वरूप को ही परिणाम कहते हैं । परिणाम के दो भेद हैं- सादि
और अनादि । सामान्य से धर्मादि द्रव्यों का गत्युपग्रह आदि अनादि परिणाम है और वही परिणाम विशेष की अपेक्षा सादि है । तात्पर्य यह कि गुण और पर्याय दोनों ही द्रव्यों के परिणाम हैं।
* जीव-वर्णन * श्रीमतस्त्रिगणनामा गर्नु कि श्री का नाताम् । बन्वे धर्माधिपानः पञ्च परमेष्ठिन उत्तमान् ॥१२७६॥
जो तीन जगत के नाथ हैं, सज्जन पुरुषों को स्वर्ग और मोक्ष लक्ष्मी प्रदान करने वाले हैं, तथा धर्म के अधिनायक हैं, ऐसे परमोत्कृष्ट पंचपरमेष्ठियों को मैं नमस्कार करता हूँ ।
अब वक्ष्यमारण विषय की प्रतिज्ञा करते हैं :--- अथ यैः पूरितो लोकः क्वचिस्ववचित्रसाङ्गिभिः । सर्वत्र स्थावर जीवन तामेश्च सूरिभिः ॥१२८०॥ पायुः कायाक्षसंस्थान जाति वेद कुलादिभिः।। तांस्त्रसान् स्थावरान् सर्वान् वक्ष्ये सप्तां दयाप्ततये ॥१२८१॥
यह लोक कहीं-कहीं स जीवों से भरा हुआ है, किन्तु स्थावर जीवों से तो सर्वत्र भरा हुआ है, अतः सज्जन पुरुष दया पालन कर सकें, इसलिए मैं सर्व अस और स्थावर जीदों के नाना प्रकार के भेद-प्रभेद, आयु, काय, इन्द्रियां, संस्थान, जाति, बेद और कुल आदि का विवेचन करूंगा। जीव के भेद और सिद्ध जीव का स्वरूप--
सिद्ध संसारि भेदाभ्यां स्युद्विधा जोवराशयः । सिद्धा भेदादि निष्कान्ता अनन्ता ज्ञान मूर्तयः ॥१२८२१॥
सम्पूर्ण जीव राशि सिद्ध और संसारी के भेद से दो प्रकार की है, जिसमें सिद्ध जीब भेद-प्रभेदों से. रहित और अनन्त ज्ञान मूर्ति स्वरूप हैं।..
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. ५६२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि संसारी जोच के भेद और स्थावर जीवों के प्रकार---
अस स्थावर भेदाभ्यां द्विधा संसारिणोऽङ्गिनः । पृथिव्यादि प्रकारश्च पञ्चधा स्थायरा मताः ॥१२८३॥
त्रस और स्थावर के भेद से संसारी जीव दो प्रकार के हैं। उनमें स्थावर जीव पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति कायिक के भेद से पांच प्रकार के हैं । त्रस और स्थावर जीवों को पृथक्-पृथक् संख्या---
पृथ्व्यप्तेजोऽग्नि मरुन्नित्येतर काय मयात्मनाम् । सप्त सप्तव लक्षाणि प्रत्येकं सन्तिः जातयः ॥१२॥४॥ जातयो दश लक्षारिण वनस्पति शरीरिणाम् । प्रत्येकं विद्विलक्षाणि द्वित्रितुर्येन्द्रियात्मनाम् ॥१२८५।। तिर्यग्नारकदेवानां प्रत्येक स्युश्च जातयः । चतुर्लक्षारिण लक्षाणि अतुर्दशनृजातयः ॥१२८६॥ इत्थ चतुरशीतिश्च लक्षारिख जीधजातयः । अधुना विस्तरेणषां काञ्चिजाति वे पृथक् ।।१२८७॥
पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, नित्य निगोद और इतर निगोद, इन छह प्रकार के जीवों में से प्रत्येक की सात-सात लाख जातियाँ होती हैं । बनस्पति कायिक जीवों की दश लाख, द्वीन्द्रिय जीवों की दो लाख, बेन्द्रिय की दो लाख, चतुरिन्द्रिय की दो लाख, पचेन्द्रिय तिर्यञ्चों की चार लाख, नारकियों की चार लाह, देवों की चार लाख, मनुष्यों की चौदह लाख जातियां होती हैं । इस प्रकार सम्पूर्ण संसारी जीवों की कुल जातियां (७ ला.-७ ला.+ ७ ला. १७ ला. + ला. + ७ ला. + १०.ला. + ६ ला. + ४ ला.+४ ला.+४ ला.+१४ ला.) = ८४००००० अर्थात् चौरासी लाख जातियां (योनियाँ) होती है । अब इन जातियों में से कुछ जातियों का पृथक् पृथक् विस्तार पूर्वक कथन करते हैं। पृथ्वी के चार भेद और उनके लक्षण---
पृथिवी पृथिवीकायः पृथिकायिकस्तथा। पृथिवीजीच इति ख्याता पृथ्विीभेवाश्चतुविधाः ॥१२६८॥ मार्गोपमादिता धूलिः पृथिवी प्रीच्यसे बुधैः । निर्जीव इष्टिकादिश्च पृथिवी कायो मतः श्रुते ॥१२८६॥
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अध्याय: प्राठवां
. [ ५६३ सजीवा पृथिवी सर्वा पृथिवीकायिको भवेत् । विग्रहा वान मापन्नोऽङ्गो पृश्त्रिी जीव उच्यते ॥१२६०।।
पृथ्वी के चार भेद कहे गये हैं, पृथ्वी, पृथ्वीकाय, पृथ्वीकायिक और पृथ्वीजीन । विद्वानों के द्वारा मार्ग की उपदित धूल को पृथ्वी कहते हैं। तथा आगम में निर्जीव ईट आदि को पृथ्वीकाय, सम्पूर्ण सजीव पृथ्वी को पुथिवीकायिक, और पृथिवीकायिकों में जाते हुए, पृथ्वीकायिक नाम कर्म के उदय से युक्त विग्रहगति में स्थित जीव पृथिवी जीव कहा है ।।
___ नोट-पृथ्वी और पृथ्वीकाय यद्यपि दोनों अन्त्रित हैं, तथापि पृथ्वी में पुनः जीब उत्पन्न हो सकता है, किन्तु पृथ्वीकाय में पुनः पृथ्वी जीव उत्पन्न नहीं हो सकता। जल, अग्नि और वायु के चार-चार भेद और लक्षण----
अप तथैवाप् शरीरं चाऽपकायिकोऽपजीव इत्यपि । मेवाश्चत्वार पाम्नाता जिनरपकायकात्मनाम् ॥१२६१॥ जल मान्दोलितं लोकः संकदम तथा भवेत् । उपरणोदकं च निर्जीव मन्यद्वापकाय उच्यते ३१२६२॥ जल काय युतः प्राणी चाय कायिको निगद्यते । अपकायं नेतु मागच्छन् जीयोऽप्जीयो गतौ भवेत् ।।१२६३।। पूर्व तेज: कायस्तेजः कायिकस्तथा । तेजो जीव इमे भेदाश्चत्वारस्तेजसा मताः १२६४॥ भस्मनाच्छादितं तेजो मात्रं तेजः प्ररूप्यते । जीवोज्झितं च भस्मादि तेजः काय इहोच्यते ।।१२६५।। तेजः कायमयो बेहो तेजः कायिक इष्यते । तेजोऽङ्गार्थ राजमार्ग तेजोजीव मतो बुधैः ।।१२९६।। वायुश्च वायुकायोऽथ तृतीयो वायुकायिकः । वायुजीव इमे भेदाश्चत्वारो वायुदेहिनाम् ॥१२६७।। रजः पुजमयो वायुभ्रंमान् वायुजिनैः स्मृतः । जीवातीतो मरुत्पुद्गलो वायुकाय ईरितः ॥१२६८।। कायुः प्राणमयः प्राणी प्रोदितो वायुकायिकः । वातागर्थ वजन्मार्गेऽङ्गी वायुजीव उच्यते ॥१२६६।।
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५६४ }
[ गो. प्र. चिन्तामरिण जिनेन्द्र भगवान ने जलकाय जीवों के जल, जलकाय, जलकायिक और जल जीव इस प्रकार चार भेद कहे हैं। लोगों के द्वारा प्रालित एवं कीचड़ सहित जलको जल कहते हैं । उष्ण निर्जीव जल को जलकाय, जलकाय युक्त जीव को जलकायिक तथा जलकाय में जन्म लेने के लिये जाते हुए विग्रहगति में स्थित जीव को जलजीव कहते हैं। पूर्ववत् तेजकाय जीवों के तेज, तेज काय, सेजकायिक और तेज जीव इस प्रकार चार भेद कहे हैं। भस्म से आच्छादित अग्नि को अर्थात् किञ्चित उग भरम को तेज कहते हैं । जिसमें से जीव निकलकर चला गया है, उस भस्मादि को तेज काय कहते हैं । तेजकाय सहित जीव को तेजकायिक और तेजनाम कर्म से युक्त जो जीव विग्रहगति में स्थित हैं, उन्हें विद्वानों में तेज जीव कहा है। वायु जीवों के वायु, वायुकाय, वायुकायिक और वायु जीव इस प्रकार चार भेद होते हैं । धूल पुज से युक्त भ्रमण करती हुई वायु (प्रांधियों) को जिनेन्द्र देव ने वायु कहा है । जीव से रहित पंखे प्रादि की पौगलिक वायु देह को वायुकाय कहते हैं। प्राण युक्त वायु को वायुकायिक और वायुगति में आने वाले विग्रह गति में स्थित जीव को वायु जीव कहते हैं । बनस्पति के चार भेद और उनके भिन्न-भिन्न लक्षण---
प्रादो वनस्पतिश्चाथ वनस्पति वपुस्ततः। वनस्पत्याचिकः काधिको वनस्पतिजीववाक् ॥१३००॥ वनस्पस्या अमी भेवाश्चत्वारः कोसिता जिनः । अन्तओवयुतो बाहत्यक्त जीवो बनस्पतिः ॥१३०१ वनस्पतिवपु स्मृतः छिन्नभिन्न तृणादिकम् । वनस्पस्पत्यङ्ग युक्तोऽङ गोस्याद्वनस्पतिकायिकः ॥१३०२।। प्राक्शरीर परित्यागे वनस्पत्यङ गसिद्धये ।। प्राणान्लेऽङगी गतिः गच्छन् स्यादन् स्याद्वनस्पति जीववाक् ॥१३०३।।
वनस्पति, वनस्पतिकाय, वनस्पतिकायिक और वनस्पति जीव ऐसे वनस्पति के चार भेद जिनेन्द्र देव के द्वारा कहे गये हैं । अभ्यन्तर भाग जीव युक्त है और बाह्य भाग जीव रहित है, ऐसे वृक्ष आदि (कटे हुए हरे वृक्ष) को वनस्पति कहते हैं । दिन भिन्न किये हुए तृणादिक को वनस्पति काय माना गया है, जीव सहित वनस्पति काय को वनस्पतिकायक कहते हैं, और आयु के अन्त में पूर्व शरीर को त्याग कर जो जीन
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अध्याय : पाठवा ]
[ ५६५ वनस्पतिकायिकों में उत्पन्न होने के लिये विग्रहगति में जा रहा है, उसे वनस्पति जीव कहते हैं। पंच स्थावरों के चार-चार भेद---- ..
एतेषां प्राकनो भेदः किञ्चित्प्रारणाश्रितो मतः । पृथ्व्यादीनां द्वितीयस्य केवल जीवदूरगः ।।१३०४॥ जोवयुक्तस्तृतीयश्च चतुर्थों भेद ईरितः ।। रयत प्राग्वपुर्षा भाविपृथ्व्याङ्गाय गच्छताम् ॥१३०५॥ . एतान् भेदान् बुधैर्ज्ञात्वा सचेतनानचेतनान् । पृथ्व्यादीनां सुरक्षायै कर्तव्यं यत्नमजता ॥१३०६॥
इन पंच स्थावरों के चार-चार भेदों में से प्रथम भेद किंचित जीव युक्त होता है । द्वितीय भेद मात्र अजीव होता है, तृतीय भेद जीव सहित होता है, और चतुर्थ भेद में जीद पूर्व शरीर को छोड़ कर पृथ्वी आदि. शरीर को धारण करने के लिये जाता है, अतः यह चेतन ही है । इस प्रकार विद्वानों के द्वारा कहे हुये भेदों में चेतन अचेतन भेदों को जानकर पृथ्वी आदि पंच स्थावरों की रक्षा के लिए यत्न करना चाहिए। अब पृथ्वीकाकिय जीवों में से मृदु पृथ्वीकायिक जीवों के भेदों का निरूपण----
मृत्तिका वालुका लोहं लवसं सागरादिजम् । सानं रूप्यं स्वर्ण च त्रिपुषः सीसकं तथा ॥१३०७॥ हिए गुलं हरितालं च मनः शिलाथ सस्यकम् । प्रजनं भ्रक चा वालुकामी हि षोडश ।।१३०८॥ भेदा मृदुपृथ्वी कायात्मनां प्रोक्ता जिनाममे ।
इदानी खर पृथ्वीनां भेदान् मण्यादिकान् ॥१३०६।। मिट्टी, बालुका, लोहा, समुद्र आदि में उत्पन्न होने वाला नमक, ताम्र, चांदी, स्वर्ण, विपुष (कथीर या रांगा) सोसा, हिंगुल, हरताल, मनः शिला, जस्ता, अञ्जन (नीला थूथा या सुरमा), अभ्रक और भोडल ये सोलह भेद जिनागम में कोमल पृथ्वीकायिक जीवों के कहे गये हैं, अब खर पृथ्वी के मणि आदि भेदों को कहते हैं । अब खर पृथ्वी के भेदों का निरूपण---
प्रथालं शर्करा वन शिलोपलं सप्तः परम् । कर्केतन मरिण म्ना रजकाल्यो मरिणस्ततः ।।१३१०॥
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[ गो. प्र. चिन्तामणि चन्द्र प्रभोऽथ बेडर्य कोमणिः स्फटिको मरिणः । जलकान्तो मरिणः सूर्यकान्तश्च गैरिको मणिः ॥१३११॥ चन्दनः पद्मरागाख्यो मरिणमरकसाह्वयः । थको मोचो मरिणमसरणं पाषाणसंझकः ।१३१२।। एते दिशतिसभेदाः पृथ्वीकायमयात्मनाम् ।। खराख्यासां सुभव्यानां व्यायरिणभिर्गताः ॥१३१३।।
प्रवाल, शर्करा, हीरा, शिला, उपल (पत्थर), कर्केतनमन्गि, रजकमरिण, चन्द्रप्रभमरिण, वैडूर्य मरिण, स्फटिक मरिण, जलकान्त मणि, सूर्यकान्त मरिण, गरिक मरिण, चन्दनमरिंग, पाराग, मरकतमणि, बकमरिण, मोचमारिण. बैमसृण और पाषण खर पृथ्वी स्वरूप पृथ्वीकायिक जीवों के ये बीस भेद भव्य जीवों के दया पालनार्थ गणधर देवों के द्वारा कहे गये हैं। पृथ्वीकायिक पृथ्वी से बने हुए पर्वत एवं प्रासादों आदि का वर्णन --
रत्नप्रभादयः सप्त पृथ्ख्यश्चत्य माखिलाः । मेधाः पर्थताः सर्वे वेदिकातोरणादयः ।।१३१४॥ त्रिलोकत्थ विमानानि जम्बाद्याः सकालागु माः।। नविद्य शसुराणां च प्रासादाः कमलानि च ॥१३१५॥ स्तूपरत्नाकराधाये पृथ्वीकायमयाश्च ते। सर्वे ह्यन्तर्भवन्त्येषु पृथ्वी भेदेषु नान्यथा ॥१३१६।। एसान्पृथ्वीमयान्जीयान् पृथ्वोकायाश्रितान् बहून्। सम्यग्ज्ञात्वा प्रयत्नेन . रक्षन्तु साधयोऽमिशम् ॥१३१७॥
रत्नप्रभा ग्रादि सातों पृथ्वीयां, सम्पूर्ण चैत्यवृक्ष, मेरु आदि सर्व पर्वत, वेदि. काएँ एवं तोरण आदि, बैलोक्य स्थित विमान, जम्बू आदि समस्त वृक्ष, मनुष्यों, विद्याधरों और देवों के प्रासाद, पन आदि सरोवरों में स्थित कमल, स्तूप और रत्ना
कर प्रादि ये सब पृथ्वीकायमय हैं, और इन सबका अन्तर्भाव पृथ्वीकाय के भेदों में ही * होता है, अन्य में नहीं । पृथ्वीकाय के आश्रित रहने वाले इन सब पृथ्वीमय जीवों को
भली प्रकार जान कर सज्जन पुरुषों को अहर्निश इनको रक्षा प्रयत्न पूर्वक करना चाहिये।
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अध्याय : पाठवां ]
अब जलकायिक जीवों के मेवों का प्रतिपादन- . .
अवश्यायजलं रात्रि पश्चिम प्रहरोभवम् । हिमाख्यं अलकायं च जलबन्धन सम्भवम् ।।१३१८॥ माहिकास्पं जलं घूमाकाराम्बु च हरज्जलम् । स्थूल विन्दु जलं चातुः सूक्ष्म बिन्दु जलं तथा ॥१३१६॥ शुद्धाम्बु चन्दु कान्तोस्थमुदकं निर्भरादिजम् । सामान्यम्बुघनास्याम्भोऽधि ब्रहरीघ वातजम् ।।१३२०॥ सरिस्कूपसरः कुण्ड निराब्धि हृदादयः । एष्वप्कायेषु सर्वेऽन्येऽतर्भवन्त्यम्बुकायिकाः ।।१३२१॥ एलानकाय सभेदान कायाश्रितान् बहून् । जोवान् विज्ञाय यत्नेन पालयस्वास्मवत्संवा ।।१३२२॥
रात्रि के पिछले पहर में उत्पन्न होने वाला प्रोस जल, हिम नाम का जलकाय, मेघ जलकाय, कोहरे का जल, धूम प्राकार (धुन्ध) जल, दाभ की अरणी पर स्थित जल, स्थूल बिन्दु जल, जल का, सूक्ष्म बिन्दु जल, शुद्ध जल, चन्द्रकान्त मरिग से उत्पन्न जल, सामान्य जल, धन जल (घनोदधि), द्रह जल, मेघ से उत्पन्न जल, धनवातज जल, नदी, कूप, तालाब, कुण्ड, भरना, समुद्र एवं सरोवर आदि सर्व जल का जालकाय में अन्तर्भाव होने से ये सब जलकायिक ही हैं। इन सब जलकाय के भेदों को तथा जल काय के प्राश्रित रहने वाले असंख्यात जीवों को अपनी आत्मा के सदृश जानकर प्रयत्न पूर्वक निरन्तर उनकी रक्षा करनी चाहिए । अग्निकायिक जीवों का वर्णन--
अङ्गाराणि ज्वलज्वालाचिोप शिखादिका । मुर्मरायोहिकार्षाग्निःमुद्धाग्निःशुद्धाग्निर्बहुभेद भाव।।१३२३॥ विस्पाताग्नि वनाग्नि सूर्यकान्सादि गोचरः । अग्नि सामान्य रूपाग्नि निधूमो वाडबादिजः ।।१३२४॥ नन्दीश्वर महाधूम कुण्डिका मुकुटादिजाः । अग्निकाया अमोचन्त भवन्त्य नलयोनिषु ॥१३२५॥ इमांस्तेजों मायन जीवस्तेिजःकायाश्रितापरान्। विदित्वा सर्वयत्नेन रक्षन्तु मुनयोऽनिशम् ।।१३२६॥
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५६८ ]
[ मो. प्र.चिन्तामणि अंगार रूप अग्नि, ज्वालास्नि, अचि अरिन, दीपशिखाग्नि, मुर्मराग्नि, कार्षाग्नि और बहुत प्रकार की शुद्धागि, विद्युत्पालान, पानि, कान्त आदि से उत्पन्न अग्नि, सामान्य अग्नि, निर्धू माग्नि, बडवाग्नि, नन्दीश्वर द्वीपस्थ महाधूम कण्डों की अग्नि तथा मुकुट आदि से उत्पन्न अग्नि, अग्नि काय होने से इन सब अग्नियों का अनिलयोनियों में अन्तर्भाव हो जाता है। तेजकाय के प्राश्रित रहने वाले सर्व तेजकायिक जीवों को भली प्रकार जान मुनिजन इनकी अहर्निश प्रयत्न पूर्वक रक्षा करते हैं । वायुकायिक जीवों के स्थानों का वर्णन--
वासः सामान्यरूपश्चोभ्रंम ऊर्व भ्रमन् व्रजेत् । उत्कलि मण्डलि पृथ्वीलग्नो भ्रमन् प्रगच्छति ॥१३२७॥ गुरुआबातो... महाबातो वृक्षादि भङ्गकारकः । धनोवधिश्च नाम्ना धनानि लस्नुवात वाक् ।।१३२८॥ उदरस्थ विमानाधार पृथ्थ्य धस्तलाश्रिताः। त्रिलोकाच्छादका वाता प्रवान्त भवन्ति च ॥१३२६।। एतान् वातङ्ग भेदांश्चजीयान् वात वपुःश्रितान् । माथा नित्यं प्रयत्नेन पालयन्तु स्ववद्विदः ।।१३३०१
सामान्य रूप वायु, उद्भ्रम वायु, ऊपर भ्रमण करने वाली वायु, उत्कलि वायु, मण्डल वायु, पृथ्वी स्पर्श कर भ्रमण करने वाली वायु, गुजावात, वृक्षों आदि को नष्ट करने वाली महावायु, घनोदधि वायु, धन वायु, तनुवायु, उदरस्थ वायु, विमान जिसके आधर से हैं, वह वायु, पृथ्वीतल के आश्रित वायु और त्रैलोक्य पाच्छादक वायु ये सर्व वायु इन्ही पवनों में अन्तर्भूत होतो हैं । ये सब भेद वायु काय के कहे गये हैं । वायु कायिक जीव इसी वायुकाय के प्राश्रित रहते हैं, ऐसा जानकर विद्वज्जनों को इन्हें अपनी प्रात्मा के सदृश समझ कर नित्य ही इनकी दया का प्रत्यनपूर्वक पालन करना चाहिए। बनस्पतिकायिक जीवों के भेद
असाधारण साधारण भेदाभ्यां जिनागमे ।। कीर्तिता द्विविधाः संक्षेपादनस्पति कायिकाः ॥१३३१॥ प्रत्येक द्विपकरास्ते साधारण तराङ्गिनः । उदकार्थश्च जीवोस्य सन्मूच्छिमति भेदलः ।।१३३२॥
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अध्याय : पाठवां ]
[ ५६६ भूलारपोर कद स्कन्धबीजोद भवदेहिनः । स्वा पत्राणि प्रवालामि पुष्पाणि च फलान्यपि ॥१३३३॥ मुख्छागुल्मानि बल्ली च तुरण पर्वादि कायिकाः । प्रत्येकादि चतुर्भेदानां सभेवा मता इसे ।।१३३४॥
जिनागम में प्रसाधारण (प्रत्येक) वनस्पतिकायिक और साधारण वनस्पतिकायिक के भेद से बनस्पतिकायिक जीवों के संक्षेप से दो भेद कहे गये हैं। इनमें से असाधरण अर्थात् प्रत्येक वनस्पति सप्रतिष्ठित (साधारण सहित) और अप्रतिष्ठित (साधारण सहित) के भेद से दो प्रकार की है । (मिट्टी और) जल आदि के सम्बन्ध होने वाली सम्मूर्छन जन्म वाली बनस्पतियां भी सप्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित के भेद से दो प्रकार की होती हैं। मूल, अग्र, पोर, कन्द, स्कन्ध और बीज से उत्पन्न होने वाले वनस्पतिकायिक जीव, तथा त्वक् पत्र, प्रवाल पुष्प, फल, गुच्छा, गुल्म, बल्ली, तृण और पर्व आदि प्रत्येक के वनस्पति, वनस्पतिकाय, वनस्पतिकायिक और बनस्पति जीव ये चार भेद माने गये हैं।
इन वनस्पतियों के भेदों का सुख पूर्वक बोध प्राप्त करने को कहते हैं :--
जिनकी मूल से उत्पत्ति होती है, वे मूल जीव हैं, जैसे--अदरख, हल्दी आदि । जो भग्न (टहनी) से उत्पन्न होते हैं, वे अग्र जीव हैं । यथा--केतकी, गुलाब, प्रार्यका, मोगरा आदि जो पर्व के प्रदेश (गांठ) से उत्पन्न होते हैं, वे पोर बीज हैं, यथा ईख, बेंत आदि । जो कन्द से उत्पन्न होते हैं, वे कन्द जीव हैं । यथा-सकरकन्दी, पिण्डालू (सूरण) प्रादि । जिनकी उत्पत्ति स्कन्ध से होती है, वे स्कन्ध जीव हैं, यथा सल्लकी (साल), कटकी, बड़, पीपल, पलाश, देवदारू आदि । जिन जीवों की भूमि एवं जल सादि सामग्री के सहयोग से उत्पत्ति होती है, वे बीज जीव हैं, यथा--जव, गोहूँ आदि । वृक्ष आदि की बाह्य छाल को त्वक् और युतक (काई) आदि को सैवाल कहते हैं । जिसमें केवल पत्ते ही होते हैं, पुष्प और फल नहीं होते, उसे पत्र वृक्ष कहते हैं । पत्तों की पूर्व अवस्था को प्रवाल कहते हैं। जिन वनस्पतियों में मात्र पुष्प होते हैं. फल मादि नहीं होते, उसे पुष्प वनस्पतिः कहते हैं। पुष्प के बिना जिसमें केवल फल उत्पन्न होते हैं, उन्हें फल वृक्ष कहते हैं। एक समय में उत्पन्न होने वाले बहुत के समुदाय को गुच्छा कहते हैं। मोगरा, मल्लिका प्रादि को गुल्म और करंज, कथारी आदि को वल्जी कहते हैं। मालती आदिक नाना प्रकार के तृण हैं, पर्व और ग्रन्थि
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५७० ]
के मध्य बेंत आदि होते हैं । साधारण वनस्पति कायिक जीवों के लक्षण यादि --
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
एते प्रत्येक कायाः स्युः केचिच्चानन्त कायिकाः । केचिद् बोजोद्भवाः केचित् सम्मूच्छिका हि देहिनः ।। १३३५ ।। नित्येतर निकोताभ्यां द्विवा साधारणामताः । अनन्त: fret ater अनन्तकाक्ष संकुलाः ॥१३३६॥ यत्रैको प्रारणी 'तत्रैवानन्तजस्मिनाम् ।
मरणं चेककालेन तत्समं ह्वयक कायत: ॥१३३७॥ यत्रो जायते जीवस्तत्रोत्पत्ति भवेत्स्फुटम्
अनन्त देहिनां सार्धं तेन तत् क्षण मज्जसा ।।१३३८ ॥ ततस्तेऽनन्त जीवात्ताः प्रोक्ता श्रनन्त कायिकाः । युगपन्म रणोत्पत्ते रमन्ते केन्द्रियात्मनाम् भ्रमभिदु भंवादवीम् ।
॥१३३६॥
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तीव्रमिध्यादियुक्तं श्रनन्तां प्राणिभिर्धार दु:कर्मप्रसितात्मभिः ॥१३४०॥ अनन्त काय वर्गेषु न सत्यं कदाचन
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प्राप्तं तेनन् कायात्ताः मता नित्यनिकोतकरः ॥१३४१॥ श्रनन्त कायिका एते पञ्च भेदामता इति । जम्बूद्रीपाद दृष्टान्तैः स्कन्धा डरादयो जिनेः ॥ १३४२ ||
ये पूर्व कथित जीव प्रत्येक काय हैं, इनमें कोई-कोई श्रनन्तकाय हैं, कोई बीज से उत्पन्न होने वाले हैं, और कोई जीव सम्मृच्छेन जन्म वाले हैं । साधारण वनस्पति कायिक जीवों के नित्य निगोद और इतर निगोद, ये दो भेद हैं । ये अनन्त कायिक अर्थात् साधारण अनन्त एकेन्द्रिय जीव एक काय होने से एक ही समय में जहां एक जीव उत्पन्न होता है, वहीं
एक साथ अनन्त जीवों का मरसा होता है और उसी क्षण एक साथ अनन्त जीव जन्म लेते हैं । इन अनन्त एकेन्द्रिय जीवों का एक ही साथ मरण और एक ही साथ जन्म होता है, इसीलिए उन अनन्त जीवों के समूह को कहते हैं । जो तीव्र मिथ्यात्व श्रादि से युक्त और और दुष्कर्मों से ग्रसित हैं, ऐसे अनन्तानन्त प्राणी भयावह संसार रूपी अटवी में भ्रमण करते हैं. । अनन्तकाय जीवों के समूह में जो जीव कभी भी त्रस पर्याय को प्राप्त नहीं करते,
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अध्याय : आठवां
[ ५७१ उन्हें नित्य निगोदिया कहते हैं। इन अनन्त कायिक जोकों के पांच भेद माने गये हैं, जो जिनेन्द्र के द्वारा जम्बूद्वीप आदि के दृष्टान्तों से स्कन्ध, अंडर, आवास, पुलवि और शरीर आदि के रूप में प्रतिपादन किये गये हैं। जम्बूद्वोप आदि के दृष्टान्तों द्वारा स्कन्ध, अण्डर, प्रादि का प्रतिपादन- ..
जम्बूद्वीप यथा क्षेत्र भारसं भारतेऽस्ति ।। कोशलः कोशले देशेऽयोध्यायां सौधपङ्क्तयः ।।१३४३॥ तथा स्कन्धा असंख्येयलोक प्रदेश मात्रकाः । एकैकस्मिन् पृथक् स्कन्धे हरण्डरा गदिता जिनः ।।१३४४ः। असंख्यलोक तुल्यान्दैकैकस्मिानण्डरे स्मृताः । प्रायासेभ्यो हवसंख्यात लोक मात्रा न संशयः ।।१३४५॥ . एकैकस्मिन् तथा बासे प्रोक्ता पुलक्योऽखिलाः । असंख्घलोक माना एकैस्मिन् पुलवो भवे ॥१३४६।। असंख्यात शरीराणि लोकमानानि सन्ति च । एककस्मिन्नि कोताना मायोरे प्रारिनो अदा : १३ अलीतानन्त कालोस्थानन्त सिद्ध भ्य एवं च। सर्वेभ्यः प्रागमे प्रोक्ता पाण्यानन्त गुणा जिनः ।।१३४८।।
जैसे जम्बूद्वीप में भरतक्षेत्र है, भरत क्षेत्र में कोशल देश है, कोशल देश में आयोध्या नगरी है, और एक-एक अयोध्या नगरी में अनेक प्रासाद (महल) पंक्तियां हैं, उसी प्रकार असंख्यात लोक प्रमाण पुद्गल परमाणुओं का एक स्कन्ध और एक-एक स्कन्ध में असंख्यात लोक, असंख्यात लोक प्रमाण आवास हैं, इसमें कोई संशय नहीं है । पृथक्-पृथक एक-एक प्रावास में असंख्यात लोक-असंख्यात लोक प्रमाण पुलवियाँ हैं, एक-एक पुलवि में असंख्यात लोक असंख्यात लोक प्रमाण शरीर हैं और पृथक्पृथक् एक-एक निगोद शरीर में जिनेन्द्र भगवान के द्वारा प्रागम में अतीत और आगामी अनंतकाल में होने वाले सर्व अनंत सिद्धों के अनंत गुरंगी जीव राशि कहीं गई है। अर्थात् अतीत और अनागत में होने वाली सर्व सिद्ध राशि का जितना प्रमाण है, उससे अनन्त गुणे जीव एक निगोद शरीर में रहते हैं। बावर अनन्तकाय जीवों का कथन--
शैवालं पणनाम केणुगः कवगस्तथा । पुष्पि केल्यादयः सन्त्वनन्त कायाश्च बादराः ॥१३४६॥
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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अस्य भास्यमाह :--
शैवाल जलगत हरित रूपं, पणकं भूमिगत शैवाल, इष्कादि प्रभवं च, केणुकः, पालम्बकछत्राणि शुक्ल हरित नील रूपाणि अपस्करोद् भवानि कवगः
गालबकछत्राणि । पुष्पिका आहारकञ्जिकादि पता: ! इत्याद्याः स्थूला अनन्तकायिकाः स्युः ।
अर्थ :- सैवाल, परणक, केणुक, कवग और पुष्पक इत्यादि ये सब बादर अनन्तकायिक बनस्पतियां हैं।
अब इसी को भाष्य रूप में कहते है :___ जल में जो हरी काई होती है, उसे शवाल, भूमि में जो हरी-हरी काई होती है. उसे पणक, ईट आदि में जो उत्पन्न होती है, उसे केगुक, श्वेत, हरे और नील वर्ण के छत्र सदृश को आलम्बक (कुकुरमुत्ता), मल या कचरे में उत्पन्न होने वाले को कवग, वक छत्र को शृगाल कहते हैं, (एक प्रकार का कुकुरमुत्ता, जिसकी डंठल टेडी होती है।) आहार कांजी आदि के ऊपर उत्पन्न होने वाली फ दी को पुष्पिका कहते हैं । इस प्रकार सेवालादि अनेक बादर अनन्तकायिक वनस्पतियां होती हैं। साधारण, प्रत्येक सूक्ष्म एवं बादर जीवों के लक्षण और उनके निवास क्षेत्र प्रादि का कथन
गूढानि स्युः सिरासन्धि परिण जन्मिनां भुवि । येषां स्यान्सम भङ्ग चाही रुक सूत्र सन्निभम् ॥१३५०॥ छिन्न भिन्न शरीराणि प्रारोहन्त्यप्यानन्ततः। तेऽत्र साधारणा जीवाः प्रत्येकास्तद् विपर्ययाः ॥१३५१।। एते स्युर्वादशजोवाः क्वचिल्लोके क्वचिन्न च।। पृथ्व्यादि कायमापन्नाः पञ्चधाः स्थावराः परे ॥१३५२॥ . . सूक्ष्माः पृथ्व्यादयः पञ्चस्थावरा रष्टगोचराः। एते तिष्ठन्ति । सर्वत्र प्रपूर्य भुवनत्रयम् ॥१३५३३३ वनस्पत्यनिनोऽन्ये च स्थावराः सूक्ष्मवादराः। .. अनन्ताधिविधा एसे रक्षणीयाः सदा बुधः ।।१३५४।। न प्रतिस्खलनं येषां गत्यादौ सूक्ष्मदेहिनाम। पृथ्वोजलाग्निकातार्जातु ते सूक्ष्म कायिकाः ॥१३५५।।
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अध्याय : पाठवा
प्रतिस्खलन्ति ये स्थूलाः स्थावरा गमनादिषु । केचिदृश्या अदृश्यास्ते बाद: श्री जिनमताः ॥१३५६॥
जिनकी शिरा-बहिः स्नायु, सन्धि-रेखाबन्ध और पर्व-गाठ अप्रगट हों और जिन वनस्पतियों का भंग करने पर समान भंग हो, दोनों भंगों में परस्पर सूत्र-तन्तु न लगा रहे तथा शरोरों को छिन्न-भिन्न कर देने पर भी जो ऊग जाते हैं तथा वृद्धि आदि को प्राप्त होते हैं ऐसे अनन्तकायिक वे सब जीव यहां पर साधारण कहे गये हैं । जो जीव इन चिन्हों से रहित हैं, वे प्रत्येक (अप्रतिष्ठत) वनस्पतिकायिक हैं।
पृथ्वी प्रादिक पांचों कायों को धारण करने वाले पांचों बादर स्थावर जीव इस लोक में कहीं हैं. और नहीं हैं, किन्तु दृष्टि अगोचर पृथ्वीकायिक पांचों सूक्ष्म स्थावर जीव तीनों लोक को परिपूर्ण करते हुए सर्वत्र रहते हैं। .
विद्वानों को अन्य अनन्त प्रकार के सूक्ष्म और बादर वनस्पतिकायिक व स्थावर जीवों की रक्षा करनी चाहिए।
सूक्ष्म नाम कर्म के उदय से युक्त पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुकायिक आदि के द्वारा जिन जीवों की गति आदि कभी भी रुकती नहीं है, उसे. सूक्ष्म कायिक कहते हैं।
जिन स्थावर जीवों की गति आदि दूसरों से रुकती है और दूसरों को रोकती हैं, उन्हें जिनेन्द्र भगवान ने बादर जीव कहा है, इनमें कुछ जीव दृष्टि अगोचर होते हैं। स जीवों के भेद प्राधि का वर्णन---
प्राणिनी विकलाक्षाश्च सकलाक्षास्ततः परे। इस्यमी द्विविधाः प्रोक्तास्त्रसा उस गिनोऽसुखात् ॥१३५७॥ द्वित्रितुर्याख्यभेदाचं स्त्रिविधा विकलेन्द्रियाः । स्युः कम्याचा नूगीर्वाणतिर्यञ्चः सकलेन्द्रियाः ॥१३५८१॥ कृमयः शुक्तिकाः शङ्खाः पालकाश्म कपई काः ।। जलकामा मत्ताः शास्त्रे द्वीन्द्रिया द्वीन्द्रियांगिला ॥१३५६।। कुन्धवो मरकुरणा यूका वश्चिकाश्व पिपीलिकाः । उहिका हि गोम्याद्यास्त्रीन्द्रियास्थ्यक्षसंयुताः ॥१३६०॥
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५७४ ]
[ मा. प्र. चिन्तामणि मर्शका भ्रमरा दंशाः पङ्गगा मधुमक्षिकाः ।.. .: मक्षिका कोटकाद्याः स्युश्चतुरिन्द्रियजातयः ॥१३६१।। जलस्थलनभो. गामिनस्तियञ्चो नरामराः ।। नारकाः श्री जिनः प्रोक्ताः पञ्चाक्षाः सकलेन्द्रियाः ११३६२॥ एताप्रसाङ्गिनः सम्यग्ज्ञात्वा मुहितपोधनाः । पालयन्तु समित्याद्यः सर्वत्र स्वमिवान्यहम् ।।१३६३॥ इति पृथ्वयादिकायानां जातिभेदान् जिनागमात् । प्राख्यायातः सतांवृक्ष्ये कुलानि विविधानि च ।।१३६४॥
दुःख से उद्घ गित त्रस जीव विकलेन्द्रिदय और सकलेन्द्रिय के भेद से दो प्रकार के होते हैं।
इनमें से कुनि प्रादिन्द्रिय, मोद्रिय और चतुरीन्द्रिय के भेद से विकलेन्द्रिय जीव तीन प्रकार के होते हैं। मनुष्य, देव और तिर्यञ्च ये सकलेन्द्रिय स हैं।
कृमि, सीप, शंख, वालुका, कौंडी, जौंक आदि दो इन्द्रिय से चिन्हित इन जीवों को द्वीन्द्रिय जीव कहते हैं।
कुन्यु, खटमल, जू, विच्छ, चींटी, दीमक और कान खतरे आदि तीन इन्द्रियों से युक्त जीवों को बेन्द्रिय जीव कहते हैं ।
मच्छर, भौंरा, डांस, पाङ्गा, मधुमक्खी, मक्खि और कोटक आदि चतुरिन्द्रय जीव कहलाते हैं ।
जल-स्थल एवं नभचर तिर्यञ्च, मनुष्य, देव और नारकी ये जीव पचेन्द्रिय होते हैं, इन्हें ही जिनेन्द्र भगवान ने सकलेन्द्रिय कहा है।
इस प्रकार स जीवों के भेद प्रभेदों को भली प्रकार जानकर श्रावको एवं तपोधनों को समिति आदि के द्वारा अपनी आत्मा के सदृश ही सर्वत्र अस जीवों की रक्षा करनी चाहिये।
इस प्रकार जिनागम से पृथ्वी काय आदि षटकाय के जीवों के जाति भेदों को कहकर अब अनेक प्रकार के कुल भेदों को कहूँगा।
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[ ५७५
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अध्याय : पाठवां ] भिन्न-भिन्न जीवों की कुल कोटिया कहते हैं- .
द्वाविंशकोटि लक्षारिण. पृथ्वीनां स्युः कुलानि च। अपकाया मतां सप्तकोटि लक्षारिण तेजसाम् ।।१३६५॥. : कुलत्रिकोटि लक्षारी वायूनां च कुलाया। स्युः सप्त कोटि लक्षारिण वनस्पत्यङ्गिनां तथा ।।१३६६॥ कुलानि कोटि लक्षागि. ह्यष्टाविशतिरेवहि । द्वान्द्रियाणां संथा सप्तकोटि लक्षकुलानि च ॥१३६७॥ वीन्द्रियारणां भवन्त्यष्टकोटिलक्ष कुलान्यपि । तुर्याक्षारणां नवैव स्युः कोटिलक्षकुलानि च ॥१३६८॥ अरचराणां हि लक्षारिंग साध द्वादश कोटयः ।.. कुलानि पक्षिणां द्वादशकोटि लक्षकानि च ॥१३६६॥ . . दशव कोटि लक्षारिण कुलानि स्युश्चतुष्पदाम् । नवैध कोटि लक्षाण्युरः सपरिणां कुलानि च ॥१३७०।। वदिशकोटि लक्षाणि कुलानिस्युः सुधाभुजाम् । पञ्चविंशति कोटि लक्षारिण नारक जन्मिनाम ॥१३७१॥ आर्यम्लेच्छ न भोगामिमनुष्याणां कुलानि च । . द्वि सप्तकोटि लक्षापीति सर्वेषां च देहिनाम ॥१३७२।। एकव .कोटि कोटि नवतिः साधनवाधिका। कोटीलक्षारिप सिद्धान्ते कुल संख्या जिनोदिता ॥१३७३।। इत्यङ्ग कुलजात्यावोन् सम्यग्ज्ञात्वा बुधोत्तमैः । षड्ङ्गिनां दया कार्या धर्मरत्लखनी सदा ॥१३७४।।
शरीर के भेदों के कारणभूत नाना प्रकार की नो कर्म वर्गणाओं को कुल कहते हैं) पृथ्वीकायिक जीवों की बाईस लाख कोटि, जलकायिक जीवों की सात लाख कोटि, अग्निकायिक जीवों की तीन लाख कोटि, वायुकायिक जीवों की सात लाख कोटि, वनस्पतिकायिक जीवों की २८ लाख कोटि, द्वीन्द्रिय जीवों की सात लाख कोटि, त्रीन्द्रिय जीवों को आठ लाख कोटि, चतुरिन्द्र जीवों की नव लाख कोटि, जलचर जीवों की १२ लाख कोटि, पक्षियों की बारह लाख कोटि, चतुष्पद (पशुओं) की दश लाख "कोदि, छातो के सहारे चलने वाले सर्प आदिको की नव लाख कोटि, देवों की २६ लाल क्रोटि, नारकी जीवों की २५ लाख कोटि तथा नार्य मनुष्य, म्लेच्छ मनुष्य और
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. ५७६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामपि
विद्याधरों ( इन सब ) की चौदह लाख कोटि, इस प्रकाह सम्पूर्ण कहे गये हैं । जिनेन्द्र भगवान ने आगम में पृथिवोकायिक से लेकर मनुष्य पर्यंत सम्पूर्ण संसारी जीवों के कुल कोटि की संख्या का योग एक करोड़ निन्यानवे लाख पचास हजार कोटि (१,६६,५०,००,०००,०००,००० ) कहा है ।
इस प्रकार विद्वानों को जीवों के कुल और जाति यादि के भेदों को भली प्रकार जानकर धर्मरूपी रत्नों की खान के संदृश निरन्तर छह काय जीवों की दवा में में उपक्रम करना चाहिये ।
tra योनियों के मेद, प्रभेद आकार और स्वामी
सचित्ताचित्त मिश्राख्याः शीतोष्ण मिश्रयनयः ।
संवृता विवृता मिश्राश्चेत्येता नवयोनयः ।। १३७५३॥ darni नारकारणां चाचित्तयो निविचेतना । गर्भजाना सचितावित योनिश्चेतनेतरा ॥१३७६॥ एकाक्ष द्वीन्द्रियाणां च त्र्यक्षतुर्येन्द्रियात्मनाम् । नानापञ्चाक्ष सम्मूर्च्छकानां केषाञ्चिदेव च ॥१३७७॥ सचित्तकास्ति केषामेवाश्वेत्ता योनिरजसा । केषाञ्चिन्मियोनिश्चेति त्रिधा योनयो मताः ॥१३७८॥३ देवानां नारकारणां च केषां चिच्छ्रोत योनयः । उष्णयोनिश्च केषां चिदिति द्विविधं योनयः ॥ १३७६॥ तेजसा मुष्णयोनिः स्याच्छीतयोनिर्जलाङ्गिनाम् । शेषाणां पृथिवी वायु वनस्पति शरीरिणाम् ।। १३८० ॥ एक द्वित्रिचतुः पञ्चाक्षयर्भेतर जन्मिनाम् । पृथक रूपेरण शीताद्याः स्युस्त्रियोनयः ।। १३८१ ॥ नारकाक्ष देवानां संवृत्ता योनिरस्ति । विवृता विकलाक्षाणां मिश्रा सा गर्भ जन्मिनाम् ।। १३८२ ॥ griर्भात योनीनां शुभाशुभो भयात्मनाम् । सविशेषास्त्रिधा artisarumaानये ॥१३८३ ॥४ शङ्खाया योनिः पराकूर्मोसाभिया । तृतीय वंश पत्रात्यात्रेति
त्रिविधयोनयः ।। १३८४१४
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अध्याय : पाठवां ]
[ ५७७ तीर्थशाश्चकिरणो रामा वासुदेवाश्चतद्विषः । फर्मोग्नतम महायोनी जायन्ते स्फटिकोपमे ॥१३८५।।.. बंशपत्राख्य योनी धोत्पद्यन्ते भोग भूमिजाः । द्वियोन्योः प्रारिपनोऽन्ये. शङ्खावर्तवंश पत्रयोः ॥१३८६॥ शङ्कावर्तकुयोनौ च नियमेन विनश्यति । गर्भोऽशुभोऽङ्गि नामेतधामीनां लक्षणं भवेत् ।।१३८७॥
सचित्त, अचित्त एवं सचित्ताचित्त, शीत, उष्णा एवं शीतोष्ण, संवत, विवत एवं संवृतविवृत (मिश्र) इस प्रकार योनियों नौ प्रकार की हैं। . . .. .
देव और नारकियों की योनियाँ प्रात्मप्रदेशों से रहित अचित होती हैं, तथा गर्भज जीवों के सचित्ताचित्त (मिश्र) योनि होती है।
एकेन्द्रिय, द्विन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और सम्मूर्छन जन्म वाले पंचेन्द्रिय जीवों में से किन्हीं जीवों में से किन्हीं किन्हीं जीवों की सचित्त-योनि है, किन्हीं की अचित योनि हैं और किन्हीं जीवों के सचित्ताचित्त (मिश्र) योनि है । इस प्रकार सम्मूर्च्छन जन्म बालों के तीनों प्रकार की योनियां मानी गई हैं।
देव और नारकियों में किन्हीं की शीत योनियां, किन्हीं की उष्ण योनियां और किन्हीं की शीतोष्ण योनियां होती हैं।
अग्निकायिक जीवों को उष्णयोनि, जलकायिक जीवों को शीत योनि होती है। शेष पृथ्वी, वायु और वनस्पतिकायिक जीवों के तथा एकेन्द्रिय, हीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय
और सम्मरछन जन्म वाले जीवों के पृथक-पृथक् एक रूप से शीत प्रादि तीनों योनियां होती हैं । अर्थात् किन्ही जीवों के शीत, किन्हीं के कारण और किन्हीं के मित्र इस प्रकार तीनों योनियां होती है।
देव, नारकी और एकेन्द्रिय जीवों के संवृत योनि होती है। विकलेन्द्रि जीवों के विवृत (प्रगट) योनि और गर्भज जीवों के नियम से संवृत (मिश्र) योनी होती है । ।
इसके पश्चात योनी सम्बन्धी पाप नाश के लिए शुभ अशुभ कर्मोदय से युक्त गर्भज जीवों के विशेषता पूर्वक तीन प्रकार की योनियां कहूँगा।
प्रथम शंखावत, द्वितीय कर्मोन्नत और तृतीय वंशपत्र नामक तीन प्रकार की योनियां होती हैं।
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५७८ ]
। गो. प्र. चिन्तामणि स्फटिक की उपमा को धारण करने वाली कर्मोन्न नाम की महायोनि में तीर्थकर, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव और प्रतिवासुदेव उत्पन्न होते हैं ।
___ वंश पत्र नाम की योनि में भोग भूमिज और शंखावर्त एवं वंशपत्र इन दोनों में कर्मभूमिज आदि अन्य सांधारण मनुष्य जन्म लेते हैं, किन्तु शंखावर्तनामक कुयोनि में नियम से गर्भ के विनाश होता है । क्योंकि वह गर्भ अशुभ होता है । इस प्रकार जीवों की इन योनियो के लक्षण कहे हैं। जीवों के शरीरों की अवगाहना--
पश्यप्तेजो मरुस्कायानां सूक्ष्मवाद रास्मनाम् । अङ्गगुलस्याप्यसंख्यात भागतुल्यं वपुर्भवेत् ।।१३८८॥ सूक्ष्मा पर्याप्त जगह निकोलस्वाजिनो मतम् । तृतीये' समये सर्वजघन्याङ्ग जगत्त्रये ॥१३८६॥ सर्वोत्कृष्ट शरीरं स्यान्मत्यानां महतां भुवि । तयोर्मध्ये परेषां स्युर्माना देहानि देहिनाम् ॥१३६०॥
सूक्ष्म और बादर पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक जीवों के शरीर की अवगाहना अंगुल के असंख्यात भाग-प्रसारण होती है ।
त्रैलोक्य में सर्वजघन्य अवगाहना सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के उत्पन्न होने से तीसरे समय में होती है और शरीर की सर्वोत्कृष्ट अवगाहना महामत्स्यों के होती है । इन दोनों (जघन्योत्कृष्ट) के बीच में अन्य जीवों के शरीर को मध्य अवगाहना विविध प्रकार की होती है। अब जीयों के संस्थानों का कथन--
पृथ्व्यङ्गिनां च संस्थान मसूरिकाकरणाकृतिः । अंपकायानां हि संस्थान दभग्रिविन्दुसन्निभम् ॥१३६१॥ .. तेजः कायात्मनां तत् स्यात् सूचीकलापसम्मितम् । संस्थानं वायुकायानां पताकाकारमेव च ॥१३६२।। समादिचतुरस्त्रं च न्यग्रोधस्वाति कुन्जकाः । वामनाल्यं हि हुण्डाख्यं संस्थानामीति षड्भुवि ।।१३६३॥ मनुष्याणां च पञ्चाक्षतिरश्चा सन्ति तानि षट् । देवनामादि संस्थानं नारकाणां हि हुण्डकम् ॥१३६४॥
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समपाल
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अध्याय : आठवां ]
द्वित्रितुर्येन्द्रियाणां च सर्वेषां हरिताङ्गिनाम् ।
अनेकाकार संस्थानं हुण्डाख्यं स्याद् विरूपकम् ।।१३६५ ।।
पृथ्वीकायिक जीवों के शरीर का आकार मसूर के करण सदृश, जलकायिक जीवों के शरीर का आकार डाभ के अग्रभाग पर रखी हुई जलबिन्दु के सदृश, अनि कायिकों का खड़ी सुइयों के समूह सदृश और वायुकायिक जीवों के शरीर का संस्थान ध्वजा के सदृश होता है । समचतुरस्त्र संस्थान, व्यग्रोध, स्वाति, कुब्जक, वामन और हुण्डक ये ह संस्थान संसारी जीवों के होते हैं। मनुष्यों और पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के छहों संस्थान होते हैं । देवों के समचतुरस्त्र संस्थान और नारकियों के हुण्डक संस्थान ही होते हैं । द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवों के तथा सम्पूर्ण वनस्पतिकायिक जीवों के fafar आकारों के लिये हुए विरूप आकार वाला हुण्डक संस्थान होता है ।
संसारी जीवों के संहननों का विवेचन
म्लेच्छ विद्यमर्त्यानां संज्ञि पञ्चेन्द्रियात्मनाम् । कर्मभूज तिरश्चां च सन्ति संहनानि षट् ॥१३६६॥ संज्ञि विलाक्षाणां लब्ध्य पर्याप्त देहिनाम् । शुभं चान्तिमं हीनं षष्ठं संहननं भवेत् ॥१३६७॥ वजर्षभादि नाराचं वज्रास्थिमय वेष्ठितम् । श्रच नाराचं वज्रास्थितं द्वितीयकम् ॥१३६८ ॥ मारावं त्रीणि चेमानि सन्ति संहननानि च । परिहार विशुद्धयास्य संघमाप्त मुनीशिनाम् ।। १३६६॥ चतुर्थमर्ध नाराचं कोलिकाख्यं च पञ्चमम् । सम्प्रतापाद्यादिकं सिंहनानि च ॥१४००
[ ५७६
इमानि स्युः स्फुर्ट कर्मभूमि द्रव्ययोषिताम् । भोग भूमि जनूंस्त्रीणामार्थ संहननं परम् ॥१४०१॥ मिथ्यात्वाथ प्रसत्तान्त गुरराणस्थानेषु सप्तसु । वर्तमान atari सन्ति संहननानि षट् ॥। १४०२ ।। पूर्वकरणाभियेऽनिवृत्ति कराये I सूक्ष्मादि साम्परायाल्ये हयुपशान्तकषायके ११४०३॥
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-RDASTI
५८० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि श्रेषयामुपशमाख्यायां founi सजिलो बन्छ । त्रोणि संहननानि स्युरादिमानि दृढानि च ॥१४०४।। अपूर्व करणाल्ये वानिवृत्ति करणाभिषे । सूक्ष्मादि साम्परायाख्ये क्षीण कषाय नामनि ॥१४०५॥ सयोगे च गुणस्थानेऽत्राद्य संहननं भवेत् । केवलं क्षपक श्रेण्या रोहरण कृत योगिनाम् ॥१४०६॥ अयोगिजिन नाथानां देवानां नारकात्मनाम् । प्राहारक महर्षीणामेकाक्षाणां चषि च ।।१४०७॥ यानि कामरण कायानि बजतां परजन्मनि ।
तेषां सर्वशरीराणां नास्ति संहननं क्वचित् ॥१४०॥
म्लेच्छ मनुष्यों, विद्याधरों, मनुष्यों, संजी पञ्चेन्द्रिय तियंचों और कर्मभूमिज तिर्यञ्चों के छहों संहनन होते हैं । असंज्ञी तिर्यञ्चों के, विकलेन्द्रिय जीवों के और लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के अन्तिम असम्प्राप्तसृपाटिका नाम का छठवां अशुभ संहनन । होता है। वज्रमय वर्षभ, कीलें एवं अस्थि से युक्त और वज्रमय वेष्ठन से वेष्ठित पहला वज्रर्षभनाराच संहनन, वनमय नाराच ( कीलों ) व अस्थियों से युक्त दूसरा वननाराच संहनन और तीसरा संहनन है। ये तीनों संहनन परिहार विशुद्धि संयम से युक्त मुनिराजों के होते हैं । चौथा अर्धनाराच, पांचवां कोलक और छठवां मसम्प्राप्तसृपाटिका ये तीनों संहनन कार्यभूमिज द्रव्यवेदी स्त्रियों के होते हैं । भोगभूमिज मनुष्यों और स्त्रियों के आदि का एक उत्कृष्ट संहनन होता हैं। मिथ्यात्व गुरणस्थान, से लेकर सप्तम गुणस्थान पर्यन्त सात मुरणस्थानों में प्रवर्तमान जीवों के छहों संहनन । होते हैं। .
उपशम श्रेणीगत अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसापराय और उपशान्त कषाय भुरणस्थानों में प्रवर्तमान मुनिराजों के प्रादि के तीन दृढ़ संहननों में से कोई एक होता है । क्षपक श्रेणीगत अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मपिराय, क्षीणकषाय और सयोगकेवलि गुणस्थानों में प्रवर्तमान मुनिराजों के प्रादि का मात्र एक दजर्षभनाराच संहनन ही होता है।
अयोगी जिनों के, देवों के, नारकियों के, आहारक शरीरी महाऋषियों के एकेन्द्रिय जीवों के और आगामी पर्याय में जन्म लेने के लिए विग्रह गति में आने वाले।
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प्रध्याय: श्रीठी
[ ५८ १
arrate युक्त जीवों के संहनन नहीं होता अर्थात् इन जीवों का शरीर नहीं सहमतों से रहित होता है ।
संसारी जीवों के वेदों का कथन ---
एकrrfanmrपां सर्वेषां नारकात्मनाम् । समूह नज़ पञ्चाक्षारगां वेदेको नपुंसकः ॥ १४०६ ॥ भोग भूमि भवार्याणि चतु विधसुधा भुजाम् | fararni भवतो at द्वौ स्त्रीषु संज्ञको भुवि ।। १४१० ।। harti] गर्भजानां च तिरश्वां मनुजात्मनाम् ।
स्त्री 'नपुंसकाभियाः सन्ति वेदास्त्रयः पृथक् ।। १४११ ।। सम्पूर्ण एकेन्द्रिय जीवों के, विकलेन्द्रिय जीवों के, नारकी जीवों के और संमूर्च्छन पञ्चेन्द्रिय जीवों के एक नपुंसक वेद ही होता है !
भोगभूमि के तथा चारों निकायों के देवों के स्त्री और वेद नाम वाले दो ही वेद होते हैं। शेष सम्पुर्ण मनुष्यों एवं तिर्यञ्च जीवों के पृथक्-पृथक्, स्त्री वेद, वेद तथा नपुंसक वेद नाम के तीनों वेद होते हैं । जीयों को उत्कृष्ट और जघन्य आयु का प्रतिपादन :मृदुपृथ्वी शरीराणामुत्कृष्ट मायुरजसा ।
द्विषड्वर्ष सहस्त्राणि वर पृथिवीमयात्मनाम् ।। १४१२ । । द्वाविंशति सहस्त्राणि वर्षाणां जीवितं परम् । सप्त सहस्त्र वर्षाforcकायामां सुष्ठुजीवितम् ॥ १४१३।। तेजोमय कुकाया नामायुदिनत्रयं भवेत् । त्रीणि वर्ष सहस्त्राणि ह्यायुर्वाताङ्गिनां परम् ॥। १४१४।। दश वर्ष सहस्त्राण्पायुर्वनस्पति देहिनाम् । वर्षाfरण द्वादशैत्रायुः प्रवरं द्वीन्दियाङ्गिनाम् ।। १४१५ ।। referreri aante पञ्चाशद्दिन जीवितम् । aire प्रमितायुकं चतुरिन्द्रिय अस्मिनाम् ॥ १४१६ ॥ मत्स्यानां परमायुः स्यात्पूर्व कोटि प्रमाणकम् । eeteer नामायुर्नव पूर्वाङ्ग सम्मितम् ॥ १४१७॥ leafत सहस्त्राब्व प्रथमायुश्च पक्षिणाम् । sarai द्वित्वारि
शत्सहस्त्रप्राब्दजोवितम् ॥ १४१८ ||
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PILL
५- २ ]
जघन्यायुरिष्यते ।
एकाक्षद्वित्रितुर्या क्षारणां कृताष्टादश भागानामुच्छ्वासस्यैक भागकः ॥ १४१६ ।। संज्ञिनामत्यमृत्यादि युता पुण्यनृणां सर्वजघन्यमंत्र च ।। १४२०।।
भवेत् !
प्रभुहूर्तमायुष्यं
पृथ्वीकाfe जीवों की उत्कृष्ट आयु बारह हजार वर्ष की, खर पृथ्वीकायिक जीवों की बाईस हजार वर्ष की, जलकायिक जीवों की उत्कृष्टायु सात हजार वर्ष की, श्रमिकायिक जीवों की तीन दिन की तथा वायुकायिक जीवों की तीन हजार वर्ष की उत्कृष्ट श्रायु हैं ।
[ गो. प्र. चिन्तामणि
वनस्पतिकायिक जीवों की उत्कृष्टायु दस हजार वर्ष, द्वीन्द्रिय जीवों की - बारह वर्ष, त्रेन्द्रिय जीवों की उनचास (४६ ) दिन की तथा चतुरिन्द्रिय जीवों की उत्कृष्ट छह मास प्रमाण होती है ।
महामत्स्यों की उत्कृष्टायु एक कोटि पूर्व की, श्रर्थात् सात करोड़ छप्पन लाख वर्षों की, पक्षियों की सर्पों को बयालीस हजार वर्षो की उत्कृष्टायु होती है ।
एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय तथा चतुरिन्द्रिय जीवों की जघन्य आयु स्वांस के अठारह भागों में से एक भाग प्रभाग होती है ।
सरीसृप जीवों की नयपूर्वाङ्ग बहत्तर हजार वर्षों की और
गर्भज संशी जीवों की अल्पायु और पुण्यहीन गर्भज मनुष्यों की सर्व जघन्य मात्र अन्तर्मुहूर्त प्रसारण की होती है ।
नोट -- लब्ध्यपर्याप्तक, संज्ञी, अशी पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चों की तथा लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यों की जघन्यायु प्रवास के अठारहवें भाग होती है । स्पर्शन आदि पांचों इन्द्रियों को प्राकृति-
५:
श्रोत्रियस्य संस्थानं यवनालसमाकृतिः । चक्षुरिन्द्रिय संस्थानं वृत्तं मसूरिकासमम् ॥ १४२१॥ संस्थानं प्रापयस्यास्त्यति मुक्त पुष्पसन्निभम् । जिह्नन्द्रियस्थ संस्थानमचन्द्र समानकम् || १४२२॥ स्पर्शेन्द्रिय सस्थानमनेका कारमस्ति च । ममादि चतुरस्त्रादि भेद भिन्नं च षड्विधय ॥ १४२३३३
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अध्याय : पाठवां ]
[ ५८३ कर्णेन्द्रिय का प्राकार यर की नाली के सहण, चारिन्द्रिय का प्राकार मसूर सदृश (गोल) धाणेन्द्रिय का आकार तिल के घुष्प, सदृश और जिह्वा इन्द्रिय का आकार अर्ध चन्द्र सदृश कहा गया है । .
स्पर्शनेन्द्रिय का आकार अनेक प्रकार का होता है, क्योंकि समचतुरस्त्र आदि भेदों से संस्थान छ: प्रकार के होते हैं। इन्द्रियों के मेर-प्रभेद
द्रव्य भाव विभेदाभ्यामिन्द्रियं द्विविध स्मृतम् । अन्तनिवृति बाह्मोपकरणाद- द्रव्यखं द्विविधा ।।१४२४॥ . . लम्ब्युपयोग भेदाभ्यां द्विधा मावेन्द्रिय मतम् । अन्तरात्म' प्रदेशोत्थं कर्मक्षयसमुद्भवम् ॥१४२५॥ :
द्रव्येन्द्रियों और भावेन्द्रियों के भेद से इन्द्रियां दो प्रकार की होती हैं । इनमें अभ्यन्तर में रचना और बाह्य में उपकरणों के भेद से द्रव्येन्द्रियां दो प्रकार की तथा लब्धि एवं उपयोग के भेद से कर्मों के क्षयोपशम से प्रात्मप्रदेशों में उत्पन्न होने वाली भावेन्द्रियाँ भी दो प्रकार की हैं। अब पांचों इन्द्रियों के विषयों का स्पर्श बताते हैं
पृथिव्यादि वनस्पत्यन्तै काक्षारखा मतः श्रुसे। स्पर्शाख्यो विषयो लोके धनुः शत चतुष्टयम् ॥१४२६।। होन्द्रियाणां भवेत्स्पर्श विषयो दूरती भजन ।। स्पर्शाक्षेण विषयार्थान् धनुरष्टशत प्रमः ।।१४२७॥ विषयो रसनाख्योत्यश्चतुः षष्टि धनु प्रमः । प्रोन्द्रियासुमता स्पर्श विषयः: स्पर्शन क्षमः ॥१४२८।। स्पर्शार्थानां च चापानां स्थापोडश शतप्रमः । जिद्वाक्ष विषयश्चाप शताष्टाविशति भवेत् ।।१४२६॥ प्रारणाक्ष विषय भ्याप्ति धनुषां शतमानकः । चतुरिनिय जीवानां विषयः स्पर्शनाक्षजः ।।१४३०॥ द्वात्रिशच्छत चापानि विषयो रसाक्षजः । धनुषां द्विशते षट् पञ्चाशदरसादिवित् ॥१४३११॥
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५८४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
प्रारणाख्य
विषयश्चाप शतद्वय प्रमारकः ।
विषयश्चक्षुरसोत्थों दूरार्थदर्शकों भवेत् ।। १४३२॥
योजनः ।
चतुः पञ्चाशदर्य कोनशिल प्रसंज्ञि पञ्चखानां च विषयः स्पर्शनप्रजः ॥ १४३३॥ चापानां हि चतुः षष्टिः शतानि रसनाक्षम: 1 पञ्चशतानि च ।। १४३४।। faषयो धनुषां द्वादशाग्र विषयो प्राण रवोत्पन्नो धनुः- शत चतु प्रमः । क्षुरिन्द्रियजात विषयो रूपिदर्शक: ।। ९४३५ ॥ ।
प्रसः ।
योजनानां किलाष्टायें कोनषष्टि शत श्रोत्राक्ष fararaापाष्ट सहस्त्र प्रमाणकः ।।१४३६ ।। संज्ञि पंचेद्रियाणां व स्पर्शाक्षस्याखिलोतमः । रसनाक्षस्य हि घ्राणेन्द्रियस्य विषयो भुवि ।। १४३७ ।। प्रत्येकं वर्तते स्वस्वार्थे योजन नव प्रमः । सप्तचत्वारिशस्त्रिषष्ट्यधिके शते ।।१४३८॥ सहस्त्रा: द्व े महायोजनानां चेकक्रोशो धनुषा तथा । eos पञ्चदशाग्राणि द्वावशेष शतानि च ॥ १४३॥ हस्तेको यवतुर्याशार्थं द्वेऽङ गुलेऽखिलोसमाः । इस्यस्ति संशिनां चक्षुविषयो दूरदर्शकः ॥१४४० श्रोत्रस्य विषयो ज्येष्टो योजन द्वावशप्रमः ।
पञ्चैते विषयस्कृष्टा ज्ञेया महर्षि चक्रिणाम् ॥। १४४१ ।।
गम में पृथिवी कायिक से लेकर वनस्पतिकार्यिक पर्यन्त एकेन्द्रिय जीवों
के स्पर्श का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ४०० धनुष कहां है। होन्द्रिय जीवों के स्पर्श का विषय क्षेत्र ८०० धनुष है और इन्हीं द्वीन्द्रिय जीवों के रसनेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र -६४ धनुष प्रमाण है। त्रीन्द्रिय के स्पर्शनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र १६०० धनुष, रसनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र १२८ धनुष प्रमाण है और प्राणेन्द्रिय का विषय क्षेत्र १०० धनुष प्रमाण है । चतुरिन्द्रिय जीवों के स्पर्शनेन्द्रिय का विषय का क्षेत्र ३२०० धनुष रसनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र २५६ धनुष, प्राणेन्द्रिय का विषय क्षेत्र २०० धनुष और चक्षुरिन्द्रय को उत्कृष्ट विषय क्षेत्र २९५४ योजन प्रमाण होता है । संजी
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अध्याय : आठवां }
[ ५८५ पंचेन्द्रिय जीवों का सोनिय का विषय क्षेत्र ६.४५ अनुष, सन्द्रिय का ५१२ धनुष प्राणेन्द्रिय का ४०० धनुष, चक्षुरिन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ५६०८ योजन और श्रोत्रेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ८०० धनुष प्रमाण होता है । संजी पंचेन्द्रिय जीवों के स्पर्शनेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र : योजन, रसनेन्द्रिय का ६ योजन, प्रारणेन्द्रिय का र योजन चक्षुरिन्द्रिय का विषय क्षेत्र ४७२६३ योजन १ कोस, १२१५ धनुष, १, १/४ हाथ २ अंमुल और १/४ यव प्रमाण है, तथा श्रोत्रेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र । योजन १२ योजन प्रमाण है, चक्षुरिन्द्रिय अादि का यह उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ऋध्दिवान मुनिराजों एवं चक्रवर्तियों के ही होता है । . एकेन्द्रियादि जीवों की संख्या का प्रमाण----
प्रथकाक्षादि जीवानां प्रमाणं पृथगुच्यते । वनस्पती निकोतानिनोऽनन्सा प्रोदिता जिनः ॥१४४२॥ पृथ्वीकायिक . अप्कायिकास्तेजोमयाङ्गिनः ।.. वायुकाया इमे सर्वे प्रत्येक गदिता जिनः ॥१४४३॥ असंख्य लोकमानाचा संस्थलोकस्य सत्यपि । .. यावन्तोऽत्र प्रदेशास्तावन्मात्राः सूक्ष्मकायिकाः ॥१४४४॥ पुनस्ते । पृथिवीकायाचाश्चतुर्विध चादरः । पृथग् वासंख्य मात्रा अयं विशेषोऽस्ति चागमे ॥१४४५।। द्वोन्द्रियास्त्रीन्द्रियास्तुर्येन्द्रियाःपञ्धेन्द्रिया मताः । प्रत्येकं चाप्यसंख्याताः श्रेयः परमागमे ॥१४४६॥ प्रतराज गुलसंज्ञास्या संख्येयभाग सम्मिताः । .
अथ वक्ष्ये गुणस्थानः संख्याश्व भ्रादिजाङ्गिनाम् ॥१४४७॥
अब एकेन्द्रिय आदि जीवों का पृथक् प्रमाग कहते हैं । वनस्पतिकायिक जीवों में जिनेन्द्र भगवान् ने निगोद जीवों को अन्तानन्त कहा है। जिनेन्द्र देव के द्वारा बादर पृथ्वीकायिक, बादर अग्नि कायिक और बादर वायुकायिक जीव असंख्यात लोक मात्र अर्थात् असंख्याता संख्यात कहे गये हैं, और असंख्यात लोक के प्रदेशों का जितना प्रमाण है पृथक्-पृथक् उतने ही प्रमाण सूक्ष्म पृथिवीकायिक, सूक्ष्म जलकायिक सूक्ष्म अग्निकाचिक तथा सूक्ष्म वायु कायिक जीव कहे गये हैं । पुनः बादर पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुकायिक जीय पृथक्-पृथक. असंख्यात-असंख्यात ही हैं । प्रागम में
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५०६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण विशेष है । परमागम में द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय एवं पंचेन्द्रिय जीवों का पृथक् पृथक प्रमाण प्रसंख्यात श्रेणी कहा गया है। र्थात् द्विन्द्रियं जीव श्रसंख्यात श्रेणी प्रमाण त्रीन्द्रिय जीव असंख्यात श्रेणी प्रमाण है । इत्यादि (परन्तु पूर्व पूर्व द्वीन्द्रियादिक की अपेक्षा उत्तरोत्तर श्रीन्द्रियादिक का प्रभाग क्रम से हीन है और इसका प्रतिभागहार आवलि का असंख्यातवां भाग है ) | असंख्यात श्रेणी का प्रमाण प्रतरांगुल का असंख्यातवां भाग माना गया है। अब में गुणस्थानों के माध्यम से नरकादि में उत्पन्न जीवों की संख्या कहूंगा ।
ra प्रत्येक गतियों के गुणस्थानों में जीवों का प्रभाग क्या है ?
नरक गति गत प्रथम नरक में मिथ्यादृष्टि नारकी जीव असंख्यात श्रेणी प्रमाण हैं, जो घनांगुल कुछ कम द्वितीय वर्ग मूल प्रमाण हैं । द्वितीय पृथिवी से सप्तम पृथिवी पर्यन्त के छह नरकों में मिथ्यादृष्टि जीव श्रेणी के प्रसंख्यातवें भाग प्रमाण हैं । सांतों नरक भूमियों में सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और
संत सम्यग्दृष्टि जीवों का पृथक-पृथक प्रमाण पत्योपम के असंख्यातवें भाग है । तिर्यञ्चगति में मिथ्यादृष्टि जीव अनन्त हैं । सासादन: सम्यग्दृष्टि, सम्यस्मिथ्यादृष्टि असंयतसम्यग्दृष्टि और देश संयत जीव पृथक् पृथक् पत्योपम के प्रसंख्यातवें भाग प्रमाण हैं । मनुष्य गति में मिथ्यादृष्टि मनुष्य श्रेणी के श्रसंख्यातवें भाग प्रमाण हैं । और वह श्रेणी का असंख्यातवां भाग श्रसंख्यात कोड़ा कोड़ी योजन प्रमाण हैं । सासादन गुणस्थानवर्ती जीव ५२ करोड़ प्रमाण हैं । तृतीय स्थानवर्ती सम्वर्गमथ्यादृष्टि मनुष्य १०४ करोड़ प्रमाण चतुर्थ गुणस्थान में अविरत सम्यन्दृष्टि मनुष्य ७०० करोड़ प्रमाण, पंचम गुणस्थान में देश संगत मनुष्य उत्कृष्टतः १३ करोड प्रमाण
। प्रमत्त गुणस्थान में प्रमत्त संयत मुनिराज उत्कृष्टतः ५६३६८२०६ है । श्रप्रमत्त गुणस्थान में श्रप्रमत्तं संयत मुनिराज २६६६६१०३ हैं । अपूर्व करण गुणस्थान में उपशम श्रेणीगतं योगी २६६ हैं और क्षपक श्रेणीगत क्षपक जीव ५६८ हैं । अनवृत्तिकरण गुणस्थान में उपशम श्रेणिगत जीव २६६ और क्षपक श्रेणीगत ५६८ हैं । सूक्ष्म साम्पराय गुरुस्थान में उपशम श्रेणी प्रारोहित मुनिराज २६६ हैं और क्षति मुनिराज ५६८ हैं । उपशान्त कषाय गुणस्थान स्थित मुनिराजों का प्रमाण २६६ हैं तथा क्षीणकषाय गुणस्थान वर्ती योगियों का प्रमाण ५६८ है । संयोग गुणस्थान में सयोगिजनों की सर्वोत्कृष्ट संख्या प्रमाण ८५०२ हैं । tate गुणस्थान स्थित प्रयोगिजनों का प्रमाण उत्कृष्टतः २६ होता है। चतुर्थकाल
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अध्याय आठवां ]
[ ५८७
में अढ़ाई द्वीप स्थित छठवें गुणस्थान से १४ के गुण स्थान पर्यन्त के सर्व योगिराजों का योग करने पर सर्व तपोधनों का उत्कृष्ट प्रमाण ८६६६६६७ और तीन कम नौ करोड़ प्राप्त होता है ।
tara में ज्योतिष्क श्रौर व्यन्तर देवों का प्रमाण असंख्यात श्रेणी स्वरूप अंतर से असंख्यातवें भाग प्रभाग और भवनवासी मिथ्यादृष्टि देव असंख्यात श्रेणी स्वरूप अर्थात् धनांगुल के प्रथम वर्गमूल प्रमाणं श्रेणी है । सोधर्मेशान स्वर्गो में मिथ्यादृष्टि देव असंख्यात श्र ेणी स्वरूप अर्थात् घनांगुल के तृतीय वर्गमूल प्रमाण हैं। सनत्कुमारादि कल्पों में और कल्पातीत स्वर्गों में मिथ्यादृष्टि देवणी के प्रसंख्यातवें भाग अर्थात् असंख्यात योजन करोड़ क्षेत्र के जितने प्रदेश हैं उतनी संख्या प्रमाण है। ज्योतिष्कों व्यन्तरवासी देवों, सौधर्मेशान स्वर्गो, सानत्कुमारादि कल्पों और कल्पातीत विमानों में सासादन सम्यग्दृष्टि, सभ्यग्मिध्यावृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों का प्रत्येक स्थानों में पृथक्-पृथक् प्रमाण पत्योपम के प्रसंख्यातवें भाग मात्र है !
जीवों के प्रमाण का अल्पबहुत्व
तुतिषु संसारे मध्ये स्युः सकलाङ्गिनाम् ।
अत्यल्पा मानवाः श्रष्यसंख्येये भाग मात्रकाः ।। १४४६ ।। मनुष्येभ्योऽप्यसंख्यात गुणा तरक योनिषुः । नारकाः स्युरसंख्याताः श्र ेणयी दुःख विह्वला ॥१४४॥ नारकेभ्योऽप्यसंख्यातगुरया देवास्तुविधाः ।
भवन्ति प्रतरासंस्थेय भाग सम्मिताः शुभाः ।। १४५०॥ देवेभ्यः सिद्धनाथाः स्युरनन्त गुरुण मानका सिद्धभ्योऽखिल तिर्यञ्चः सन्त्यन्तगुरणप्रभाः ।।१४५१६
इस गति संसार में पचेंद्रिय जीवों में मनुष्य सबसे स्तोक है, इनका प्रमाण श्रेणी के प्रसंख्यातवें भाग मात्र है। नरक भूमियों में दुःख से विह्वल नारकी जीव मनुष्यों से असंख्यात गुणे हैं, जो असंख्यात श्रेणी प्रमाण है । नारकियों से श्रसंख्यातनिकाय के देव हैं, जो प्रतर के असंख्यातवें भाग प्रभाग हैं। देवों से अनंतगुणे सिद्ध भगवान हैं, और सिद्धों से अनंत गुणे तिर्यञ्च जीव हैं ।
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५८८ ]
[गो. प्र. चिन्तामरिण नरकगति की अपेक्षा अस्पबहुत्व-- . .
• सप्तमे नरके सन्ति सस्तोकाश्च नारकाः । तभ्योऽपि नारकेभ्यः स्युरुपयु परियतिषु ।।१४५२॥ षट् पृथिवी नरकेष्वत्र नारकाः सुखदूरगाः । ... असंख्यात गुरणाः प्रत्येक दुःखाम्बुधि मध्यगाः ॥१४५३॥
सप्तम नरक में नारको जीव सबसे स्तोक हैं । सप्तम नरक से नारकियों से ऊपर ही छहों नरक पृथिवियों में दुःख रूपी समुद्र के मध्य डूबे हुए अत्यन्त दुःखी नारकी जीव असंख्यात गुख का गुसरे अधिक अधिक हैं । अर्थात् सप्तम नरक के नारकियों से छठवें नरक के नारकी असंख्यातगुरणे, छठवें से पांचवें में असंख्यात गुणे इत्यादि।
प्रश्न:-उन्हीं सप्तम नरक में अलग-अलग व्यास की संख्या किस प्रकार है ? उत्तर :--अमीषा सप्त नरक पृथ्वीषु व्यासेन पृथक्-पृथक् संख्या निगद्यते ।
सप्तम पृथ्वी में नारकी जीव सबसे कम अर्थात् श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। (सात राजू की श्रेणी होती हैं) श्रेणी के दूसरे वर्गमूल से श्रेणी को भागित करने पर जो लब्ध प्राप्त होता है, उतने प्रमाण सप्तम. नरक के नारकी जीवों की संख्या है । सप्तम पृथ्वी से छठवी पृथ्वी में नारकी जीव असंख्यात गुणे हैं । श्रेणी के तृतीय वर्गमूल से श्रेणी को अपहत (भागित) करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतने प्रमाण नारकी जीव छठवीं पृथ्वी में हैं। छठवीं पृथ्वी से पांचवीं पृथ्वी के नारकी जीव असंख्यात गुरणे हैं। श्रेणी के छठवें वर्गमूल से श्रेणी को भागित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतने प्रमाण पांचवें नरक के नारकी जीवों की संख्या हैं। पांचवीं पृथ्वी से चतुर्थ पृथ्वी में नारकी जीव असंख्यात् गुरगे हैं। श्रेणी के अष्टम वर्गमूल से श्रेणी को भाजित. करने पर जितना लब्ध प्राप्त होता है, उतने ही प्रभारण चतुर्थ पृथ्वी के नारकी जीवों का है। चतुर्थ पृथ्वी से तृतीय पृथ्वी के नारकी जीव असंख्यात गुणे हैं। श्रेणी के दसवें वर्गमूल से श्रेणी को भाजित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो, उतनी संख्या प्रमाण जीव तृतीय पृथ्वी में हैं । तृतीय पृथ्वी से द्वितीय पृथ्वी के नारकी जीव असंख्यात गुणे हैं। श्रेणी के बारहवें वर्गमूल से श्वेणी को,भाजित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतने प्रमाण जीव द्वितीय पृथ्वी में हैं, वे श्रेणी के एक भाग प्रमाण प्राप्त होते हैं । द्वितीय से प्रथम पृथ्वी के नारंकी जीव असंख्यात गुरणे हैं,
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अध्याय : आठवां 1. वे संख्या में घनांगुल के वर्गमूल प्रमाण श्रेरिणयों के बराबर हैं, अर्थात् श्रेणी को धनांगुल के वर्गमूल से गुणित करने पर जो संख्या प्राप्त हो तत्प्रमाण (प्रथम पृथ्वी में नारकी) हैं। तिर्यञ्चति की अपेक्षा अल्पवहत्व
पञ्चेन्द्रिया हि तिर्यञ्चः सर्वस्सोका महीसले । " भवन्ति प्रतरासंख्यातभाग प्रमितास्ततः ॥१४५४॥ पञ्चाक्षेभ्यश्चतुर्याक्षाः स्युविशेषाधिका भुवि । " स्वकीय संश्य संख्यात भाग मात्रेण दु:खिनः ॥१४५५॥ तुर्याक्षेभ्यस्सथा द्वीन्द्रिया- विशेषाधिका मताः। . विशेषाः स्वस्थराशेश्वासंख्यातभाग मात्रकाः ॥१४५४॥ खोन्द्रियेभ्यस्तथा त्रीन्द्रिया विशेषाधिकाः स्मृताः । . विशेषः स्वस्वराशेरसंख्येय भाग मात्रकाः ॥१४५७।। श्रीन्द्रिपेश्यस्तथैकाक्षा अनन्सगुणसम्मिताः। अथ वक्ष्ये नरणां संख्याल्पबहुत्वं यथागमम् ॥१४५८॥
तिर्यञ्च राशि की अपेक्षा संसार में पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च जीव सर्व स्तोक अर्थात् प्रतर के असंख्यातवें भाम प्रमाण हैं। पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चों से अत्यंत दुःख से युक्त चतुरिन्द्रिय जीव विशेष अधिक है। अर्थात् पंचेंद्रिय तिर्यञ्चों की राशि के असंख्यात भाग प्रमाण अधिक हैं। चरिद्रिय जीवों से द्वीन्द्रिय जीव विशेष अधिक हैं । वह विशेष का प्रमाण अपनी-अपनी राशि अर्थात् चतुरिन्द्रिय राशि का प्रसंख्यातवां भाग है। द्वीन्द्रिय जीव राशि से त्रीन्द्रिय जीव विशेष अधिक हैं । विशेष का प्रभारण अपनी-अपनी राशि अर्थात् द्वीन्द्रिय जीव राशि का असंख्यातवां भाग मात्र है । श्रीन्द्रिय जीव राशि के प्रमाण एकेन्द्रिय जीव राशि अनंतगुरणी अधिक है। अब मैं आगम के अनुसार मनुष्यों की संख्या का अल्पबहुत्व कहूँगा । मनुष्य गति में स्थित मनुष्यों का अल्पबहुत्थ
भवन्ति नृगतौ सर्वस्तोकाः संख्यासमानवाः । अन्तीपेषु विश्वेषु पिण्डितास्तेभ्य एव च ॥१४५६॥ अन्तर्वीप मनुष्येभ्यः संख्यातगुरण सम्मिताः । दशसूत्कृष्ट सद्भोग भूमिधु प्रधरा मराः ॥१४६०॥
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५६० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
तेभ्यो मत्यश्चि संख्यातगुणाधिका जिनैः स्मृताः । हरि रम्यक वर्षेषु द्विपञ्चसु सुभोगिनः ॥ १४६१॥ तेभ्य श्रार्याश्च संख्यातगुणा दशसु सन्ति ये ।
सु हैमयल हैरण्य वतान्त भोग भूमिषु ॥ १४६२ ॥
भर
कर्म भूमिषु संख्यात गुणा नराः शुभाशुभाः १४६३॥ तेभ्यः पञ्चविदेहेषु संख्यात गुण मानवाः ।
यः सम्मुनोत्पन्ना श्रसंख्यातगुणा नराः ॥ १४६४॥ Hafta श्रसंख्यातैक भाग मात्रका अपि 1.
स च श्ररसंख्यात आय प्राख्यात भागमे ।। १४६५ ।। असंख्य योजनः कोटि कोटि प्रदेश मात्रका: एते युध्यतिर मर्त्याः सम्मूर्छ नोभयाः ।। १४६६॥ नाभीस्तानान्तरे योनौ कक्षायां च निसर्गतः ।
सूक्ष्मा मरा इमे स्त्रीणां जायन्ते दृष्टयगोचराः ॥ १४६७।। शेषा ये गर्भजा मर्त्याः पर्याप्तास्ते न चेतरा: 1
ramat वक्ष्येऽल्प बहुत्वं जिनागमात् ॥ १४६८ ॥
मनुष्यगति में लवणोदधि और कालोदधि समुद्रों में स्थित ६६ अंपों के मनुष्यों का प्रमाण एकत्रित करने पर भी वे सर्व स्तोक हैं । तद्वीपों के मनुष्यों से पञ्चमे सम्बंधी दश उत्कृष्ट भोग भूमियों के मनुष्य संख्यात गुणे हैं ।
उत्कृष्ट भोगभूमियों के मनुष्यों से पञ्चमे सम्बंधी हरि- रम्यकः नामक दश मध्यम भोग भूमियों के मनुष्य सख्यात गुणे हैं ।
मध्यम भोग भूमियों से हैमवत हैरण्यवत नामक १० जघन्य भोग भूमियों के मनुष्य संख्यात गुणे हैं, और जन्व भोगभूमियों के प्रमाण से पञ्च भरत, पञ्च ऐरावत नामक दशकर्मभूमियों में शुभ-अशुभ कर्मों से युक्त मनुष्य संख्यातः गुरणे हैं । कुभूमिज मनुष्यों के प्रमाण से पंचविदेह क्षेत्रों में मनुष्य संख्यात गुणे हैं और विदेहस्थ मनुष्यों के प्रमाण से सम्मूर्च्छन मनुष्यों का प्रमाण असंख्यात गुणा है । जो श्रेणी के असंख्यात भागों में से एक भाग मात्र है ।
आगम में उस श्रेणी के प्रसंस्वातवें भाग का प्रमाण असंख्यात कोटा- कोटी
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अध्याय : पाठवां ]
[ ५६१ योजन क्षेत्र में जितने प्रदेश होते हैं, उतने प्रशारण रहा है, अत समूच्र्छन जन्म वाले लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का भी यही प्रमाण है। . ..
- दृष्टि अगोचर ये सूक्ष्म लध्यपर्याप्तक मनुष्य कर्मभूमिज स्त्रियों की नाभि, योनि, स्तन और कांख में स्वभावतः उत्पन्न होते हैं ।
इंन अपर्याप्तक मनुष्यों के अवशेष गर्भज मनुष्य पर्याप्त ही होते हैं, अपर्याप्तक नहीं । अब अागमानुसार देवगति में अल्पबहुत्व कहते हैं । देवगति की अपेक्षा अल्पबहुब
विमानवासिनः स्तोकादेवा बेच्यो भवन्ति । 'सेभ्योऽसंख्य गुरसाः सन्ति दशधा भावनामराः ।।१४६६।। तेभ्योऽसंख्यगुणा देवा व्यन्तरा अष्टधा मताः । तेभ्यः पञ्चविधा ज्योलिष्काः संख्यातगुणाः स्मृताः ||१४७०।। . . .
देवगति में विमानवासी देय देवियों का प्रमाण सर्वस्तोक है । विमानवासी देवों के प्रकार से दश प्रकाश के भवनवासी देवों का प्रमाण असंख्यात गुरगा है । भवनवासी देवों से प्राट प्रकार के अन्तर देवों का प्रमाण असंख्यात गुरगा है । और व्यन्तर देवों से पांच प्रकार के ज्योतिषी देवों का प्रमाण संख्यात गुरगी है। देवों का भिन्न-भिन्न अल्पमहत्व-- . .
देवगति गत सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्र देय सबसे स्तीक हैं। इनसे विजय, बंजयन्त, जयन्त और अपराजित में तथा नवोत्तर विमानों में स्थित सर्व अहमिन्द्र देव असंख्यात गुगणे अर्थात् पल्यापम के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। इनसे नववेयक, मानत, प्रानत, पारणं और अच्युत स्वर्गों के देव संस्थात गुरणे अर्थात् पल्योपम के असंख्यात भाग प्रमाण हैं । इनसे शतार-सहस्त्रार स्वर्ग के देव असंख्यात गुरणे अर्थात् श्रेयो के चतुर्थ वर्गमूल का श्रेणी में भाग देने पर जो लब्ध्य प्राप्त हों उसके एक भाग प्रमाण हैं । इनसे शुक्र-महाशंक कल्प के देव असंख्यात गुणे अर्थात् श्रेणी के पंचम वर्गमूल से भाजित श्रेणी के एक भाग प्रमाण हैं। इनसे लान्तव, कापिष्ट कल्प के देव असंख्यात गुरणे अर्थात् श्रेणी के सप्तम वर्गमूल से खण्डित श्रेणी के एक भाग प्रमाण हैं । इनसे ब्रह्म अह्मोतर कल्प के देव श्रेणी के नवम वर्गमूल से खण्डित श्रेणी के एक भार प्रभारस हैं । इनसे सानत्कुमार-महेन्द्रः कल्प के देव असंख्यात गुरणे अर्थात् श्रेणी के ग्यारहवें वर्गमूल से खण्डित श्रेणी के एक भाग. प्रमहरा हैं । इनसे सौधर्मेशान
Padurintenamentatio
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५६२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि कल्प के देवों का प्रमाण असंख्यात गुणा है । सौधर्म स्वर्ग से सर्वार्थसिद्धि पर्यंत के सर्वविमानवासी देव असंख्यात श्रेणी प्रमाण है । अर्थात् धनांगुल के तृतीय वर्गमूल से कुछ अधिक प्रमाण श्रेणियां हैं । इनसे असंख्यात गुणे दश प्रकार के भवनवासी देव हैं, जो असंख्यात श्रेणी प्रमाण अर्थात् धनांगुल के प्रथम वर्गमूल का जितना प्रमारण है, उतनी श्रेणियों के प्रमाण हैं । इनसे असंख्यात गुरमे पाठ प्रकार के व्यन्तर देव हैं, वे जगप्प्रतर के असंख्यातवें भाग प्रमाण अर्थात संख्यात प्रतरांगलों से श्रेणी को भाजित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतनी श्रेणिया प्रमाण है । इनसे संख्यात गुरणे पांच प्रकार के ज्योतिषी देव हैं। वे ज्योतिष देव जगत्प्रतर के असंख्यात भाग प्रमाण हैं । अर्थात् पूर्वोक्त. संख्यात प्रतरांगुलों से संख्यातगुण हीन प्रतरांगुलों द्वारा श्रेणी को खण्डित करने पर जो प्रमासा प्राधे उतनी नोगियां हैं। जीवों को पर्याप्तियां और प्रारणों का कथन- :
आहारोऽय शरीरं चेन्द्रियान प्रारा संज्ञको । भाषा मम इमाः षट्स्युः पर्याप्तयोऽत्र संझिनाम् ॥१४७१॥ असंक्षि विकलाक्षाणां स्थुस्ताः पञ्च मनो विना । एकाक्षाणां चतस्त्रश्च पर्याप्तयों वो विना ॥१४७२॥ पञ्चेन्नियाह बयाः प्राणा मनोवाक्काय जास्त्रयः । पान प्रारणास्तयायुश्वामी प्रारणा वश संजिनाम् ।।१४७३॥ असंझिनां नव प्रारणास्ते भवन्ति मानो विना । चतुरिन्द्रियजीवानामष्टौ श्रोत्रं विनापरे ॥१४७४॥ श्रीन्द्रियाणां च ते प्रारणाः सप्त चक्षुविना स्मृताः । द्वीन्द्रियाणां च षट् प्रारणाः सन्ति घाणेन्द्रियं विना ॥१४७५।। पृथिव्यादि वनस्पत्यन्त यवस्थावरात्मनाम् । एकाक्षारसां चतुः प्रारणा रसना बचोऽतिगाः ॥१४७६॥ पञ्चेन्द्रियाहयाः प्रारणा प्रायः शरीरमित्यमी । सप्तप्राणा अपर्याप्तसंजि पञ्चाक्षजन्मिनाम् ॥१४७७॥ पञ्चाक्षायुः शरीराल्याः प्राणाः सप्त भवन्ति । अजिनाम पर्याप्त पञ्चेन्द्रियात्त देहिनाम् ।।१४७८।।
पक्ष
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प्रध्याय : आठवां }
[ ५६३ चत्वार इन्द्रियः प्राणा प्रायः काय इसे मताः ।। प्राणाः षट् भुध्धपर्याप्त चतुरिन्द्रिय अम्मिनाम् ।।१४७६॥ स्पर्शाक्षरसन घारणाक्षायुः काया अपीत्यमी।। प्राणाः पञ्चह्मपर्याप्त श्रीन्द्रिया मुमतां स्मृताः ॥१४८०॥ स्पर्श जिह्वाक्ष कायायुः प्राणाश्चत्वार एव हि । प्रागमे कीर्तिता हीन्द्रिया पर्याप्ताङ्गिनां जिनः ।।१४०१॥ स्पर्शन्द्रिय शरीरायुः प्राणास्त्रयो मता जिनः । अपर्याप्त पृथिव्यादि पञ्चस्थावर जन्मिनाम् ॥१४८२॥
ग्रहीत पाहार वर्गणा को खल रस. अदि रूप परिमाने की जीव की शक्ति के पूर्ण होने को पर्याप्ति कहते हैं। आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छवास, भाषा और मन इस प्रकार पर्याप्ति के छह भेद हैं । संशी पंचेन्द्रिय जीयों के छहों पर्याप्तियाँ होती हैं।
असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के और विकलेन्द्रिय-द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय जीवों के मन पर्याप्ति के बिना.. पाँच तथा एकेन्द्रिय जीवों के मन और वचन के बिना चार पर्याप्तियाँ होती हैं। :
प्रारण :-- (जिनके सद्भाव में जीव में जीवितपने का और वियोग होने पर मरणपने का व्यवहार हो, उन्हें प्रारण कहते हैं ) । पांच. इन्द्रिय (स्पर्शन, रसना, प्राग, चक्षु कर्ण) प्राग मनोबल, वचन बल और काय बल के भेद से तीन बल प्राण एक श्वासोच्छवास और एक प्रायु, इस प्रकार दश प्राण होते हैं। असंही पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों के मनोबल को छोड़कर, शेष नव प्रारण होते हैं, चतुरिन्द्रिय जीवों के श्रोत्रेन्द्रिय को छोड़कर आठ प्रारण, श्रीन्द्रिय जीवों के चक्षु को छोड़कर, सात प्राण और द्वीन्द्रिय जीवों के प्रारणेन्द्रिय को छोड़कर शेष छह प्राण होते हैं। पृथिवी कायिक से लेकर बनस्पति कायिक पर्यन्त, पांचों स्थावर जीवों के रसनेन्द्रिय और वचनबस को छोड़कर शेष चार प्रारण होते हैं । संज्ञी पंचेन्द्रिय अपर्याप्तक जीवों के पांच इन्द्रियां कायबल. और आयु. इस प्रकार सात प्राण होते हैं । असंही पंचेन्द्रिय अपर्याप्तक जीवों के पांच इन्द्रियां; कायबल और आयु ये ही सात प्रारण होते हैं। अपर्याप्तक चतुरिन्द्रिय जीवों के चार इन्द्रियां, आयु और काय बल ये छह प्राण होते
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५६४ ]
[ गोः प्र. चिन्तामणि
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है। अपर्याप्तक त्रीन्द्रिय जीवों के स्पर्शन, रसना और धारण ये तीन इन्द्रियां, पायु और कायबल, ये पांच प्रारण होते हैं । जिनेन्द्रों के द्वारा आगम में अपर्याप्तक द्वीन्द्रिय जीवों के स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय आयु और कायबल, ये चार प्रारण कहे गये है । जिनेन्द्र के द्वारा स्पर्शनेन्द्रिय, कायबल और आयु. ये तीन प्रारण अपर्याप्तक पृथिवी
आदि पांच स्थावर जीवों के कहे गये हैं। . . . . . . . जीवों को गति-पाति का प्रतिपादन--
ये पृथ्वीकायिकाकालिका वनस्पति देहितः । द्वि वितुर्याक्ष पश्चाक्षा लब्ध्य पर्याप्त काश्च ये ॥१४६३॥ पृथ्वमादिक वनस्पत्यन्ताः सूक्ष्माः निखिलाश्च ये।। जीवाः पर्याप्त का पर्याप्ताप्ते जीवायुकायिकाः ॥१४८४॥ सूक्ष्म बादर पर्याप्ता पर्याप्ताः सकलाश्च ते । असजिनश्च सर्वेषां तेषां मध्ये विधेर्थशात् ॥१४८५३॥ उत्पद्यन्ते व्रतातीता स्तिर्यञ्चो मानवाः अधात् । तस्मिन्नेव भवे मृत्वा स्वार्तध्यानकुलेश्यया ॥१४८६॥ पृथ्वोकायास्तथाप्कायिका वनस्पतिकायिकाः ।। सूक्ष्म बादर पर्याप्त पर्याप्ता विकलेन्द्रियाः ॥१४८७॥ एते कर्म लघुत्वेन जायन्ते तद्भवे मृताः । . मृतियम्भवयोर्मध्ये काललध्या न संशयः ॥१४८८।। सूक्ष्म दादर पर्याप्सा पर्याप्तनलकायिकाः । सूक्ष्म बादर पर्याप्तापर्याप्तवायुकायिकाः ॥१४८६।। न लभ्यस्ते मनुष्यस्व मूत्वा सस्मिन् भवे क्वचित् । किन्त्वेते केवलं तिर्यग्योनि यान्ति कुकर्मभिः ॥१४६०॥ प्रत्येकाख्य वनस्पत्यनिषु पृथ्व्यम्बुयोनिषु ।. बादरेषु च पर्याप्तेषु जायन्ते विधेशात ॥१४६१॥ प्राध्यानेन दुर्मुत्यु प्राप्य संक्लिष्ट मानसाः। . तिर्यञ्चो मानवा देवास्तस्मिरभवे प्रतातिगाः ।।१४६२॥ नृगतौ भौगभूम्यादि जिताया. सुरेषु च । भावन व्यन्तर ज्योतिकजेः . नरकादिमे ॥१४६३॥, ... ... ... ...
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अध्याय : आठवां ] :
- कर्म भूमिजतिर्यग्योनिषु सर्वासु तद्भवे । . . तिर्यश्चोऽसंज्ञि पर्याप्ता उत्पद्यन्ते स्वकर्मणा ॥१४६४॥ "तिर्यचो. मानवा भोगभूजास्तभोगजास्तथा । यान्ति देवालयं सर्वे नूनं मन्द कषायिणः ॥१४६५॥
-पृथिवीकायिक, जलकायिक, वनस्पतिकायिक, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय इन लब्ध्यपर्याप्तक जीवों में पर्याप्त एवं अपर्याप्तक सूक्ष्मकाय पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पतिकायिक जीवों में समस्त अग्नि कायिक, वायु कायिक जीवों में तथा सम्पुर्ण असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक अपर्याप्तक जीवों में पाप कर्म के वशीभूत होते हुए व्रत रहित तिर्यञ्च और मनुष्य उत्पन्न होते हैं, तथा अार्तध्यान एवं कुलेश्याओं से युक्त सूक्ष्म-बादर पर्याप्तक और अपर्याप्तक पृथिवी कायिक, जल कायिक, वनस्पतिकायिक जीव एवं पर्याप्तक अपर्याप्तक विकलेन्द्रिय जीव इन पर्यायों से मरकर कर्मों के कुछ मंदोदय से एवं काललब्धि से मनुष्यों तथा तिर्यञ्चों में उत्पन्न होते है । सूक्ष्म, बादर, पर्याप्तक और अपर्याप्तक अग्नि कायिक जीव तथा सूक्ष्म-बादर पर्याप्तक और अपर्याप्तक वायू कायिक जीव इन भवों से मरकर. कभी भी मनुष्य पर्याय प्राप्त नहीं करते, दुष्कर्मों के कारण मात्र तिर्यञ्च योनियों में ही उत्पन्न होते हैं । संक्लेश परिणामों से युक्त तथा व्रत रहित तिर्यञ्च, मनुष्य और देव आर्तध्यान एवं कर्मोदय के वश से दुर्भृत्यु को प्राप्त होकर बादर पर्याप्तक पृथिवीकायिक, जलकायिक और प्रत्येक वनस्पति कायिक जीवों में उत्पन्न होते हैं। अपने कर्मों के वशीभूत होते हुए, असंज्ञी पर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च भरकर भोग भूमिज मनुष्यों को छोड़कर मनुष्य गति में, भवन वासी, व्यन्तरवासी और ज्योतिष्क रूप देवगति में, प्रथम नरक में तथा कर्मभूमिज तिर्यञ्च योनि में उत्पन्न होते हैं। भोग भूमिज तिर्यञ्च और मनुष्य नियम से देवों में ही उत्पन्न होते हैं, क्योंकि वे स्वभाव से मन्दकषायी होते हैं। 'धर्म प्राप्ति के लिए जोष रक्षा का उपदेश
इति विविध सुभेदैर्जीवयोनीविदित्वा, गतिकुलवपुरायुः स्थान · संख्याधनेकैः । स्वपरहित वृषाप्त्यै प्रोदिता ज्ञान दृष्टया, - सुचरणं शिव कामाः स्वात्मवत्पालयन्तु ॥१४६६॥
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{ गो. प्र. चिन्तामगिए ___ इस प्रकार उत्तम चारित्र के साथ-साथ मोक्ष की इच्छा करने वाले सज्जन पुरुषों को स्वपर हितकारी धर्म की प्राप्ति के लिए जीवों की गति, कुल, शरीर, आयु, संस्थान और संख्या आदि के द्वारा नाना प्रकार के भेदों को ज्ञान चक्षु से भली प्रकार जानकर अपनी आत्मा के सदृश ही जीवों की रक्षा करना चाहिये ।
...... (सिद्धान्त सार दीपक, सकल कीति प्राचार्य) प्रश्न :- उद्वेलना और विसंघोजना में क्या अन्सर है ?
उत्तर :-मूल प्रकृति की उद्वेलना और विसंयोजना होती नहीं है, उत्तरप्रकृति अपने रूप खिरती नहीं है, पर प्रकृति में मिलकर खिर जाती है, फिर सत्ता में नहीं रहती हैं, उसे उद्धलना कहते हैं। और हो तर प्रकृति अपनी जातीय प्रकृति में मिल जाती है, उसे विसयोजना कहते हैं । उद्धारण, जैसे अनंतानुबंधी अप्रत्याख्यानावरण में । यहां विशेष इतता समझना--उद्वेलन की हुई प्रकृति, फिर से बन्ध किये बिना उदय में नहीं पाती है । और विसंयोजना वाली उदय में आती है।
प्रश्नः --अन्तमुहर्त के कितने भेद हैं ?
उत्तर :- एक प्रावली एक समय को जघन्य अन्तर्मुहूर्त कहते हैं । एक समय कम मुहूर्त को उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त कहते हैं तथा भिन्न मुहूर्त कहते हैं-~-मध्य के असंख्यात भेद हैं। .. प्रश्न: ---प्राबलो का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :---एक मुहूर्त के सैतीस सौ तिहत्तर स्वासोच्छवास होते हैं । एक स्वासोच्छवास में कोडा कोडी प्रावली से कुछ अधिक ही होती है। यहां कोई कहता है कि हम तो अंगुली के आवर्त को आवलि जानते हैं, सो उपरोक्त काल तो बहुत थोड़ा हुआ । उसका समाधान करते हैं । प्रावलि असंख समया संखेज्जावलिहवेइ उस्सासो।
गोमट सार जीव कांड, गा. २१, प्रश्न :- सम्यग्दृष्टि प्रादि परस्पर असंख्यात गुणी अधिक निजरा वाले कहे हैं, सो उनका स्वरूप क्या है ?
उत्तर :----सम्यग्दृष्टि, श्रावक, विरत, अनन्त वियोजक, दर्शन मोह,,क्षपक उपशमक, उपशांतमोह. क्षायिक, क्षीणमोह, जिन ये दशविध के पुरुष जानने । प्रथम ही प्रथमोपशम सम्यक्त्व की उत्पत्ति के पहले करात्रय के परिणाम के चरम समयवर्ती
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..
..
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अध्याय : पाठवा ]
[ ५६५ विशुद्धि विशिष्ट मिथ्यादृष्टि के जो निर्जरा होती है, उससे असंख्यात् गुणी निर्जरा शौथे गुणस्थान वाले अविरत सम्यग्दष्टि के होती है। ऐसे ही क्रमशः एक से आगे एक की असंख्यात गुणी निर्जरा होती है। . ..
प्रश्न :-- केवलि समुद्घात के पाठ समय हैं, उनमें त्रस नाडी के बाहिर जीव के प्रदेश कौन से समय में होते हैं ?
उत्तर :--तेरहवें-गुणस्थान के अन्त में प्रात्मप्रदेश की प्रसरण संवररण रूप क्रिया पाठ समय के अन्दर होती है, वहां केवलो जो कायोत्सर्गासन सहित होता है, तो बारह अंगुल प्रमाण समवृत अथवा मूल शरीर प्रमाण समवृत्त उपविष्ट होता है, तो मूल शरोर ते त्रिमुरो मोटाई सहित तीनों वातवलय हीन लोक नाड़ी प्रमाण उर्दू दंडाकार प्रात्म प्रदेश प्रथम समय में करें । यहाँ प्रदेश अस नाडी के बाहर नहीं गये, तदनन्तर जो केवल पूर्व मुख होंगे तो दक्षिणोत्तर में वालवलय हीन चौदह राजू ऊर्द्धलोक के अन्त तक विस्तीर्ण, दण्ड प्रमाण दल संयुक्त और उत्तर मुख होंगे तो पूर्व पश्चिम में बातवलय हीन चौदह राजू ऊर्द्ध लोक के अन्त तक विस्तीर्ण दंड प्रमाण दल संयुक्त पात्म प्रदेश को कपाटाकार दुसरे समय करते हैं। यहाँ लोक नाड़ी के बाहर आत्म प्रदेश गए । तदन्तर वातवलय के समस्त लोक व्यापि आत्मप्रदेशनिको, प्रतर, अपर समस्थान नाम समुद्धात करते हैं । यह प्राकार तीसरे समय में करता है, यहां आत्म प्रदेश बाहर गये । तदनन्तर वातवलय समेत सम्पूर्ण लोक व्यापी आत्मप्रदेशों को लोकपूर्ण रूप चौथे समय में करता है । यहा भी प्रारम प्रदेश बाहर गये । ऐसे चार समय के अन्दर प्रदेश फैलते हैं, और च्यार समय में ही संकोचते हैं। पहले समय में लोक पूर्ण संकोचते हैं। दूसरे समय में प्रतर रूप, तीसरे समय के कपाट रूप, चौथे समय में दंड के रूप, वहां दण्ड के प्रसरण और संवरण रूप में दो समय औदारिक योग है । औदारिक शरीर योग पुद्गल का ग्रहण करता है । कपाट के प्रसरण संवरण के अन्दर प्रत्येक संवरण में तीन समय औदारिक मिथ योग है । वहां औदारिक मिश्र शरीर योग्य पुद्गल का ग्रहण करता है । प्रतर के प्रसरण में लोक पूरण के प्रसरण संवरण में तोन समय कारिणयोग है। यहां कोई भी जो कर्म संबंधी पुद्गल का ग्रहण नहीं है, इसीलिए ये अनाहारक है । इस प्रकार पाठ समय में केवल समुद्घात का वर्णन किया । . . . . ......
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F
५६८ }
प्रश्न :--- - चौबीस तिर्थंकरों में कोन कोनों ने समुद्धात किया ? विका और बिलनाथजी ने समुद्घात किया ।
उत्तर:--
१६९ महापुषका वन-
भरत क्षेत्र में जिनागम में १६६ महापुरुष कहे गए हैं । ये विशेष पुण्याधिकारी होते हुए अंत में मोक्ष पदवी को प्राप्त करते हैं। उनके विषय में ज्ञातव्य बातों पर प्रकाश डाला जाता है ।
: १६९ महापुरुषों के नाम
कुलकर या मनु
क्रमांक
१०
११
तीर्थंकरों के पिता
तीर्थंकरों की माता
तीर्थंकर
संख्या
१४
२४
- २४
२४
.१२
सकल चक्रवर्ती
बलदेव
वासुदेव (नारायण)
प्रतिवासुदेव ( प्रतिनारायण ) ६
नारद
६
रुद्र
कामदेव
€
१.१
२४
विशेष कथन
ये तीसरे काल के अंत में होते हैं । तथा सभी उर्ध्वगामी होते हैं
सभी उर्ध्वगामी होते हैं ।
सभी उर्ध्वगामी होती हैं ।
ये सब चीथे काल में होते हैं और सभी मोक्षगामी होते हैं ।
कोई. मोक्षगामी कोई उगामी कोई अधोगामी होते हैं ।
सभी उर्ध्वगामी होते हैं ।
सभी अधोगामी होते हैं ।
23
[ गो. प्र. चिन्तामणि
27
は
31
"
"
12
"
सब मोक्षगामी होते हैं ।
$1
१६ε
इन १६६ महापुरुषों में इस हुंडावसर्पिणी काल के प्रभाव से कुछ संख्या में
न्यूनता आ गई है | इसलिये शाँतिनाथ, कुन्थुनाथ तथा अरनाथ इन तीन तीर्थकरों
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अध्याय : पाठवा ]
[ ५६६
को कामदेव तथा चक्रवर्ती इन दो पदवियों के भी स्वामी कहे गये हैं । इस प्रकार से तोन पदवी तीर्थंकर, कामदेव तथा चक्रवर्ती पदवी के धारक कहे गये हैं अतएव व्यक्तियों की गणना की अपेक्षा. १६३ महापुरुष हुये हैं।
प्रश्न : - प्रेसठ शलाका महापुरुष कौन से हैं ?
उसर : -- १६६ पुण्य पुरुषों में चौबीस तीर्थकर, द्वादश चक्रवर्ती, नव वासुदेव नव प्रतिवासुदेव इस प्रकार ६३ सहपुरुषों को त्रेसठ शलाका महापुरुष कहते हैं । यह कथन जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरत क्षेत्र की अपेक्षा है । धातकी खंड द्वीप में दो भरत क्षेत्र हैं । इसी प्रकार पुष्करार्ध द्वीप में भी दो भरत क्षेत्र हैं । इन चारों क्षेत्रों में जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र संमान १६६ पुण्य पुरुष माने गये हैं । पंच ऐरावत क्षेत्रों के विषय में भी ऐसा ही कथन पाया जाता है। पंचभरत पंच ऐसवत के समान पंच विदेह भी कहे गये हैं । प्रत्येक पूर्वापर विदेह में जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के समान बत्तीस-बत्तीस देश हैं । विदेह में सदा चौथे काल सदृश रचना पाई जाती है । यही बात त्रिलोकार संस्कृत का पाया में इस प्रकार कही गई है :'चतुर्थ कालो विदेहे वावस्थित एव' विदेह में चतुर्थकाल अवस्थित ही रहता है।
भरह इरावद पण पण मलेच्छखंडेसु खयर सेढीसु दुस्समदीदो, अंतोतिय हारिणबड्ढी य । १४६७॥
अर्थ - भरत तथा ऐरावत क्षेत्र सम्बन्धी पांच-पांच म्लेच्छ खंडो के तथा faerer for में तुर्थ काल के यादि से अंत पर्यंत आयु यादि सम्बन्धी हानि होती है । वहाँ पंचम काल तथा छठवा काल नहीं होते हैं। उत्सर्पिणी काल में तृतीय काल के आरम्भ से लेकर उसके अंत पर्यन्त वृद्धि होती है। वहां चतुर्थ, पंचम तथा षष्ठम काल नहीं होते । कहा भी है. ( अवसर्पिण्या ) पंचम पृष्ठ कालो ने प्रवर्तते । उत्सर्पिष्यां तु तृतीयः कालः स्यादित प्रारस्य तस्यैवांत पर्यन्तं वृद्धि से स्यात् । तत्र चतुर्थ पंचम पष्ठ काला न प्रवर्तन्ते । पृष्ठ ३५२.
पदमोदेवे चरिमो खिरए तिरिये परेबि छक्काला ।
दियो कुरणारे दुस्सम दुस्समसरिसो चरिमुवहिदीवृद्ध ।। १४६८ ।।
(सं. छाया ) -- प्रथमो देवे चरमो नरके तिरश्चि नरेपि षट् कालाः । तृतीयः कुनरे दु:षमसदृश चरमोदधिद्वीपायें ॥
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६०० ]
[ मो. प्र. चिन्तामरि . देवगति में प्रथम काल है । नरक में छठवां काल है । तियंञ्चगति तथा मनुष्य गति में छह काल होते हैं। कुमनुष्य भोग भूमि में तीसरा काल रहता है ! स्वयंभूरमरण द्वीपार्ध में तथा स्वयंभूरमण समुद्र में पंचमकाल समान काल पाया जाता है। सिद्धान्त सार दीपक मे कहा है
विजयार्थ नगेष्वन म्लेच्छखंडेषु पंचसु ।
चतुर्थ काल एवास्ति शाश्वतो निरूपद्रवः ॥१४६६॥ विजया पर्वतों मे पंच म्लेच्छ खंडों में सदा उपद्रवरहित चतुर्थकाल रहता है। नागेन्द्र पर्वताद्वाहा स्वयंभूरमसावे । स्वयंभूरमरण द्वीपार्धे कालः पंचमोऽव्ययः ।।१५००।
नागेन्द्र पर्वत के बाहर स्वयंभूरमरा द्वीप के अर्ध भाग में तथा स्वयंभूरमरण समुद्र में अविनाशी पंचमं काल रहता है।
विदेह क्षेत्र में सदा चतुर्ण काल रहने से शलाका पुरुष सदा पाये जाते हैं । भरत क्षेत्र में छह प्रकार का काल चक्र चलता रहता है । अतः यहाँ अवसपिरणी के चतुर्थ काल में तथा उत्सपिणी के तृतीय काल में तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव, नारायण, आदि महापुरुषों का सद्भाव पाया जाता है। शंका :--छह तीर्थंकर-चक्रवर्ती और कामदेव पद-भगवान शांतिनाथ,
कुन्थुनाथ तथा परनाथ तीर्थकर, चक्रवर्ती तथा कामदेव हुये हैं,
अतएव कोई यह सोचते हैं कि शेष इक्कीस तीर्थकर का पुण्य, * प्रभाव तथा सौन्दर्य पूर्वोक्त तीर्थकर अय की अपेक्षा न्यून होगा ?
समाधान---जगर में प्रत्येक दृष्टि से तीर्थंकर का पद श्रेष्ठ कहा गया है। जिस प्रकार प्रकाश में सूर्य के तेज की श्रेष्ठता को सभी स्वीकार करते हैं, इसी प्रकार . रूप प्रभाव, पुण्य, प्रताप आदि समस्त गुरगों की अपेक्षा तीर्थकर भगवान के समान अन्य नहीं है।
.
... .. धबला टीका में लिखा है--
सकल भुवनेक नाथस्तीर्थकरो वय॑ते मुनिवरिष्ठः । " - विषुधवलचामराणां तस्य स्माद चतुःषष्ठि ॥१५०११॥
।
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अध्याय : पाठवा [
[ ६०१
अर्थ -- मुनीन्द्रों ने तीर्थंकर को त्रिभुवन का अद्वितीय स्वामी कहा है । उनके ऊपर चन्द्रोज्वल चौसठ चामर दुराये जाते हैं ।
त्रिलोक सार में लिखा है
भुवाहो तिथयरी धवलेहि सायहि सद्विहि
कोमुद्दीन कुमा विज्जभाषणो सो ।११५०२।।
: अर्थ-जो तीन लोक के द्वितीय स्वामी हैं। चान्दनी के समान श्रथवा कुन्द पुष्प के समान धवल चौसठ चामर जिन पर दुराये जाते हैं, वे तीर्थंकर भगवान हैं । अकलक स्वामी ने राजवार्तिक में लिखा है, 'यस्योदचात् आर्हत्यमचित्यविभूति विशेष युक्त मुमजायते तत्तीर्थंकरत्व नाम कर्म प्रतिपत्तव्यं ( पृ० : ३०९ ) जिस कर्म के उदय से श्रचित्य अर्थात् जिसकी कल्पना तक न की जा सके, ऐसी विभूति विशेष युक्त प्रत पद प्राप्त हो, उसे तीर्थंकरत्व नाम कर्म जानना चाहिये ।
स्वामी समंतभद्र ने तीर्थंकर नाम कर्म के उदय से प्राप्त होने वाली महंत पदवी को ग्रचित्य कहा है, अद्भुत होने के साथ त्रिलोक द्वारा पूजा अर्थात् स्तुति का कहा है। स्वयंभू स्तोत्र में पार्श्वनाथ भगवान की स्तुति में उनने ग्रहंत भगवान के प्रति पूर्वोक्त विशेषणों का प्रयोग किया है ।
स्वयोगनिस्त्रिशनिशात धारया निशास्य यो दुर्दयमोहविद्विषम् ।
arrer त्रिलोक पूजातिशयास्पदं पदम् ।।१५०३।२
श्रतएव तीर्थंकर पदवी के समक्ष कामदेव पदवी अथवा
चक्रवर्ती की वैभव
विभूति अपनी विशेषता नहीं रखती । जिस प्रकार सूर्य का नभोमंडल में प्रकाश व्याप्त होने पर रात्रि के समय अपनी ज्योत्स्ना द्वारा जगत् को आनंदित करने वाला चंद्र पलाशपत्र के समान पांडुर वर्णयुक्त हो जाता है, 'यद्वासरे भवति पाण्डु पलाशकल्पम्' उसका रंच मात्र भी महत्व नहीं रहता है और न उसके प्रकाश का स्वतंत्र पता चलता है, उसी प्रकार तीर्थङ्कर प्रकृति रूप सूर्य के प्रकाश फैलने पर चक्रaara arat कामदेव ने की विशेषता उस पुण्य सिंधु में विलीन हो जाती है ।
कामदेव, सौन्दर्य का अप्रतिम पुंज माना गया है, किन्तु उसकी तुलना तीर्थकर से नहीं हो सकती । तीर्थङ्कर भगवान के जन्म होते ही जन्माभिषेक के लिये उनको मेरु पर ले जाते समय इंद्र प्रभु के सौन्दर्य को देखकर इतना चकित होता है
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६०२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि कि वह विस्मय युक्त हो प्रभु के रूप' सुधा पान की लालसावश अपने दो नेत्रों के स्थान में हजार नेत्र बनाता है । यही बात समन्त भद्र स्वामी ने अरनाथ भगवान की स्तुति में कहा है
सवरूपस्य सौन्दर्य दृष्ट्वा तृप्तिमनापिवान् । . ट्यक्षः शक्रः सहस्त्राक्षो बभूव बहुविस्मयः ॥१५०४॥
ऐसा सौन्दर्य कामदेव में कहाँ पाया जाता है कि देवेन्द्र तक विस्मय के सिंधु में डूब जाय ? मामतुगाचार्य जिनेन्द्र के सौन्दर्य के विषय में लिखते हैं
यः शांतरागरूधिभिः ..परमाणुभिस्स्वम् । . निर्मापितस्त्रिभनेरलामा .॥ तावंत एवं खलु तेऽस्यमयः पृषिभ्याम् । यो समानमपरं न हि रूपमस्ति ।।१,५०५॥
हे त्रिलोक में शोभायमान जिनेन्द्र ! जिन शांततापरिपूर्ण परमाणुओं द्वारा आपके शरीर की रचना हुई है, वे परमाणु जगत् में उतने ही थे, इसी कारण आपके समान सुन्दर अन्य व्यक्ति नहीं पाया जाता ।
महावैभव तथा विभति का अधिपति भी तीर्थकर के चरणों को प्रमाण करता है, क्योंकि ज्ञान साम्राज्य के अधिपति तथा धर्मचक्र के स्वामी तीर्थङ्करत्व के समक्ष चक्रवर्ती पद तथा कामदेव पद विशेषता धारण नहीं करते। . शंका :-तीथंडर भगवान को विशेषता में कहा गया संपूर्ण कथन हमें .. मान्य हैं, फिर भी यह मानना है कि तीर्थसूरत्व के साथ उपरोक्त
चक्रवर्ती और कामदेव पदवी का संयोग उनमें अन्य तोयंकरो की
अपेक्षा कोई विशेषता उत्पन्न करता है या नहीं ? समाधान-लोक व्यवहार में शांतिनाथादि तीन तीर्थङ्करों को तीन पदवी का धारक कहते हैं और शेष इक्कीस भगवान् की इस प्रकार स्तुति नहीं की जाती, इतना अंतर तो उनमें है, किंतु परमार्थ दृष्टि से सब में समानता है ! एक उदाहरण से विषय स्पष्ट हो जायेगा । दिन के प्रकाश में यदि कोई एक जगह दो दीपक जला दे, तो क्या उस उजले से सूर्य के प्रकाश में वृद्धि हो जायेगी और उनके बुझाने से प्रकाश में न्यूनता पा जायगी ? सूर्य के प्रकाश के आगे दीपकों का जलना ने जलना तनिक
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अध्याय : आठवां ]
[ ६०३ भी महत्व नहीं रखता । इसी प्रकार तीर्थंकर भगवान के कामदेव तथा चक्रवती पदवी के धारण करने तथा न करने के विषय में जानना उचित होगा । 'सर्वे पदाः हस्तिपदे निमग्नाः । हाथी के पांव के भीतर सभी के पांव समा जाते हैं, इसी प्रकार अचित्य, अद्भुत तथा त्रिलोक वंद्य तीर्थकर पदवी के समक्ष अन्य पदवियों का सद्भाव कोई विशेष महत्व नहीं रखता है।
तीर्थकर प्रकृति की श्रेष्ठता को सूचित करते हुये अकर्मक स्वामी लिखते हैं:'तीर्थकरत्वं हि प्रधानभूतं सर्वेषु सुभकर्मसु ततस्तस्य पृथग्रहणं क्रियते' (राजवार्तिक पृ. ३१०) समस्त शुभ कर्मों में तीर्थङ्करत्व प्रधान रूप है, इससे उसका नाम कर्म की प्रकृतियों में पृथक रूप से सूत्र में उल्लेख किया गया है ।
श्रेसठ शलाका पुरुष कहां-कहां से प्राकर जन्म लेते है ? मूलाबार में लिखा है...
रिसरयेहि गिग्गवारणं प्राणतर भवेहित्यि सियमादु । बलदेव-वासुदेवसणं च तह चक्क बदितं ॥१५०६॥
अर्थ :- नरक से आने वाला जीव अनन्तर भव में बलदेव, वासुदेव और चक्रवर्ती पद को प्राप्त नहीं करता है ।
स्वर्ग से आने वाला जीव उपरोक्त पदों को प्राप्त करता है । सिध्दान्तसार दोपिका में लिखा है. . निर्गस्य नरकान्जीवा चरश-बल-केशमाः । .
सम्छत्रवो न जायते चयंत्यसे यतो दिवः ।।१५०७।।
नरक से निकलकर बलदेव, बासुदेव तथा प्रतिवासुदेव और चक्रवर्ती पद को प्राप्त नहीं करते हैं।
स्वर्ग से आने वाले इन पद को धारण करते हैं।
त्रिलोकसार में भी लिखा है-“पिरयचरोगत्यि हरिबल-चक्की' मूलाचार में लिखा है-~
माणुस सिरियाय तहा सलागपुरिसारण होति खलुरिणयमा ।
सेसिं अणंतरभवे भयरिगन्जं मिथुदोगमणं ॥१५०॥ . मनुष्य और तिर्यञ्च गति से आकर तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव, नारायण प्रतिनारायण रूप शलाका पुरुष नहीं होते हैं।
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६०४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामगिए मूलाचार में यह भी लिखा है कि-- . ..... प्राजोदिसोति देव सलागपुरिसा पहोंति खलु रिणयमा है . . .
तेसि अतरभवे. भयरिंगज्जं .रिगडबुदोगमणं ॥१५०६॥
भवनत्रिक देवों में से आकर कोई शलाका पुरुष नहीं होते। यही बात त्रिलोकसार में भी इस प्रकार कही गई है। . . .
पर तिरिय-दोहि तो भवतियायोय रिणग्गया जोधा । . ... . गलहते ते. पदवि . तेनटि-सलागपुरिसाणं ॥१५१०॥
अर्थ---मनुष्य तथा तिर्यञ्च गति से निकले तथा भवनत्रिक से निकलें.जीव वेसठ शलाका पुरुषों की पदवी को नहीं प्राप्त करते हैं । ..
रिपधुदिगमरणे रामसरगयतिस्थयर-कवट्टि ते । प्रणदिसणुसरबासी तदो चुदा होति. भयणिज्जा ॥१५११॥
अतुदिश तथा अनुत्तर विमानवासी देव चय करं बलदेव, तीर्थकर तथा बस पक्षियों को मार्ग सभाते हैं ! . ... ...
" उपरोक्त प्रागम से यह बात स्पष्ट होती है कि नरक से चय कर तीर्थङ्कर पदवी के सिवाय चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव तथा प्रतिवासुदेव नहीं होते हैं। तीसरे नरक से निकला हुआ जीव तीर्थङ्कर हो सकता है । भवनत्रिक से चय कर तीर्थकर चक्रवर्ती प्रादि शलाका पुरुष नहीं होते। भावों की विचित्रता है कि भवनत्रिक रूप देवपर्याय वाला जीव तीर्थङ्कर नहीं होता और तीसरे नरक तक का नारकी तीर्थङ्कर हो सकता है । विमानवासी देव शलाका पुरुष हो सकता है । तिलोयपत्ति में लिखा है :
तिस्थयरा-तग्गुरप्रो-चक्की-बलकेसि-रुस सारहा । अंगज-कुलयर पुरिसा भथिया सिझति णियमेण ॥१५१२॥
तीर्थङ्कर, उनके माता-पिता, चक्रवर्ती, बलदेव, नारावरण, प्रतिनारायण, रुद्र , नारद, कामदेव और. कुलकर ये सभी भव्य रहते हैं और नियम से मोक्ष प्राप्त करते हैं।
प्रश्न- जगत में प्रसिद्ध पुरुष के नाम कौन से है ?
उत्तर--विशेष प्रसिद्ध हुए महापुरुषों के नाम-इन १६६ महापुरुषों में ये जगत् में विशेष प्रसिद्ध हुये हैं :--
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अध्याय : पाठवां
नाभिराज-मनु, कुलकरों में १४ वा कुलकर । श्रेयांसराजा-दातृशिरोमरिए हस्तिनापुर के राजा।
भरत चक्रवर्ती-श्री ऋषभनाथ भगवान के ज्येष्ठ पुत्र, भावों की निर्मलता में विख्यात हुये, इन्होंने अंतर्मुहूर्तकाल में केवल ज्ञान प्राप्त किया ।
बाहुबली-श्री ऋषभनाथ भगवान् के पुत्र, प्रथम कामदेव तप में प्रसिस हुए । एक वर्ष कायोत्सर्ग आसन से खड़े रहे थे ।
रामचन्द्र--अष्टम बलिभद्र । हनुमान-१८वां कामदेव, के रूप में प्रसिद्ध हुए। रावण-वां प्रतिनारायण, यानी पुरुषों में प्रसिद्ध हुये। . कृष्ण-वां नारायण । पार्श्वनाथ--स्वामी, तीर्थकर, उपसर्ग केवली। . महादेव-~~११वां रुष्ट्र, पार्वती का पति । . प्रश्न--कुलकर-मनु या युगादि पुरुषों का कार्य क्या था?
उत्तर--भोगभूमि का अंत होते समय तथा कर्मभूमि के प्रारम्भकाल में विशेष परिवर्तन देखकर चकित और चिंतित मानव समाज को निराकुल बना ठीक मार्ग का प्रदर्शन करने वाले चौदह महापुरुष , होते हैं । ,इनको 'कुलकर कहते हैं । महापुराण में लिखा है कि 'ये सब कुलकर अपने पूर्वभव विदेह क्षेत्र में ऊच्चकुल दाले महापुरुष थे, उन्होंने सम्यकत्व ग्रहण करने के पूर्व में पुण्यप्रद पात्र दान आदि उज्जवल कार्यों के द्वारा भोग भूमि की आयु बांध ली थी। पश्चात् जिनेंद्र भगवान् के समीप क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्त किया । और विशेष श्रुत शान की प्राप्ति की तथा आयु के अंत होने पर मरण कर वे इस भरत क्षेत्र में उत्पन्न हुये थें । इनमें से कितने ही अवधिज्ञान रूपी नेत्र के धारक थे और कितने ही जाति स्मरण युक्त थे, इसलिये उन्होंने विचार कर प्रजा के लिये उपकारी कार्यों का उपदेश दिया था (महापुराण पर्व 3 श्लोक २०७-२१) जिनसेन स्वामी ने कहा हैं..-'
प्रजानां जीवनोपायमननान-मनवोमताः । . प्रार्याणां कुलसंस्स्यायकृतेः कुलकरा इमे ॥१५१३॥ कुलानां धारणदेते मताः कुलधरा इति । युगादिपुरुषाः प्रोक्ता युगादौ प्रभविष्ययः ॥१५१४॥ ...'
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[ गो, प्र. चिन्तामणि ये प्रजा के जीवन का उपाय जानने से 'मनु' कहे मथे हैं । अार्य पुरुषों को कुल की भांति इकट्ठे रहने का उपदेश देने से कुलकर कहलाते थे । कुलों के अर्थात् वंशों के धारण करने से . अर्थात् उनका स्थापन करने से उन्हें कुलकर कहा गया है । युग के प्रारम्भ में जन्म लेने से इन्हें युगादि पुरुष भी कहा है।
.... इन कुलकरों को हरिवंशपुराण में महाप्रभाव सम्पन्न होने के साथ अपने जन्मांतर के स्मरण समन्वित कहा है.।
'महाप्रभावसम्पन्नः स्वभव स्मरणान्वितः । (७-१२५४) हरिवंश पुराण में इनको मन इससे कहा है कि मनुष्यों के प्रयोजत भूत कार्यों का ज्ञान धारण करते थे। 'मननात् मनुजार्थस्य मनु संज्ञा मनुसृतः' (१-१) ..
मनु शब्द मन् धातु से बना है, उसका अर्थ है अवबोधन अर्थात् दूसरों को को बताना । इन महापुरुषों ने समयानुसार प्रजा-जनों को अनेक प्रकार से जीवनोपायों का ज्ञान कराया था
. . . . . . . . . . महापुराण में लिखा है :---
वृषभस्तीर्थकृत्य कुलकृपचव सम्मतः । ... भरतश्चाभूपचैव कुलवच्चंच वरिणतः ।।१५१५॥ '
.. भगवान् वृषभदेव तीर्थंकर थे तथा कुलकर भी माने गये हैं । भरतेश्वर चक्रवर्ती थे तथा कुलकर भी कहलाते थे।
प्रश्न--अपराधी प्रजा के लिये क्या वण्ड दिया जाता था ?
उत्तर---अपराधी प्रजा के लिये दण्डव्यवस्था. का स्वरूप- एक से लेकर पांच कुलकरों ने दोषी मनुष्यों को 'हा' कहकर अर्थात् खेद है कि तुमने ऐसा अपराध किया है, दण्ड की व्यवस्था की थी। आगे के पांच कुलकरों ने 'हा' के साथ 'मा' रूप दण्ड की व्यवस्था की थी, 'हामा' अर्थात् तुमने बुरा किया आगे ऐसा अपराध मत करो। तथा शेष कुलकरों ने 'हामा धिक्' अर्थात् तुम्हें धिक्कार है । इस प्रकार दण्ड की व्यवस्था की थी।. आदिनाथ भगवान् के समय में उक्त प्रकार की दण्ड पद्धति थी विशेष दण्ड व्यवस्था की नियोजना करने में सोलह कुलकर महाराज भरत का नाम पाता है । महापुराणकार कहते हैं.......
शरीर दंडन चैव. बध बन्मादिलक्षणम् । नृसां प्रगलदोषारणां भरतेन नियोजितम् ॥१५१६॥
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अध्याय : पाठवां ]
महान् अपराध करने वाले पुरुषों के लिये भरत चक्रवर्ती ने वधं बंधन पादिक शरीरिक दण्ड की पद्धति चलाई थी।
इस प्रकार जैन धर्म की दृष्टि से दण्ड व्यवस्था के पुरस्कर्ता के रूप में भरतेश्वर का प्रथम स्थान है।
.. ऋषभनाथ भगवान् ने प्रजा को शस्त्र संचालन, कृषि करना, वाणिज्य, शिल्प, मसि तथा पशुपालन अादि प्रजा के जीवनोपयोगी कार्यों को बतलाया था, इसलिये वे प्रजापत्ति कहलाये । यथार्थ में अन्य संप्रदाय में कथित प्रजापति की प्रसिद्धि इन ऋषभनाथ भगवान् की ही महिमा को बताती हैं । इन भगवान् ने केवलज्ञान के पश्चात् धर्म तीर्थ का प्रवर्तन किया था । चक्रवर्ती भरत छह खंडों को जीतकर आदर्श राज्य पद्धति की स्थापना की थी। अन्य संप्रदाय में आदर्श राज्य को रामराज्य कहा जाता है । भगवान् मुनिसुव्रतनाथ बीसवें तीर्थंकर शासन काल में महाराज रामचंद्र हुए हैं ! जन दृष्टि से उनको तथा अन्य नीति मार्ग पर पर चलने वाले नरेशों को आदर्श शासक चक्रवर्ती भरत की लोक शासन पद्धति से प्रकाश और प्रेरणा मिलती रही है । सिद्धांतसार दीपक में भी भगवान् ऋषभनाथ को कुलकर कहा है तथा उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत की चक्री कुलकर तथा बध-बंध आदि दण्ड-प्रदाता कहा है । यथा-- वृषभस्तीर्थकृत् पूज्यः कुलकृत विजगद्धितः ।
... हा-मा-घिग्नीलिमार्गोक्तोस्य पुत्रो भैरतोऽग्नयः ॥१५१७॥ 'चक्री-कुलकरों जातो वध बंधादिदंडभूत ।' (सिद्धांत सार दीपक)
भोगभूमि के युगल और भोग सामग्रो--भोगभूमि में स्त्री-पुरुषों में युगल धर्म पाया जाता था। जिनसेन स्वामी का यह कथन ध्यान देने योग्य है, 'भोगभूमि में जिस समय दम्पत्ति (युगल) का जन्म होता है । उस समय उनके जनक और जननी का देहांत हो जाता है । अतएव वहां के जीयों में पुत्र प्रादि का संकल्प नहीं होता । (पर्व ७-७०) पुरुष को उसकी स्त्री प्रार्य कहती थी और उसे पुरुष प्रार्या कहता था । भोगभूमि के समय में पुरुषों तथा स्त्रियों के यही साधारण नाम थे । लोग सरल प्रकृति के थे । पुरुष को छींक आने पर और स्त्री को जम्हाई आने पर मरण होता था। इन जीवों को प्राजीविका के लिये कष्ट नहीं उठाना पड़ता था। वहां पाँच इंद्रियों को अवर्णनीय सुख सामग्री मिलती थीं।
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६०६
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हरिवंश पुराण में लिखा है
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तदा ।। १५१८।।
aver neverter भोगं युग्मानि भुते । anirभोग चक्र सभोगताभ्यधिकं सम्पत्ति इस प्रकार के कल्पवृक्षों से उत्पन्न भोगों को मानते थे । जो दशांग भोगों के भोगने वाले चक्रवर्ती के भोगों की अपेक्षा अधिक थे ।
उन दश प्रकार के कल्पवृक्षों का इस प्रकार वर्णन किया गया है १. गृहांग नाना प्रकार के उत्तमोत्तम गृह देने वाले हैं ।
पात्र देने वाले हैं | भोजन देने वाले हैं।
मधुररस
२. भाजनांग
३. भोजनांग
४. पानांग
५. वस्त्रांग
६. भूषणांग
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[ गो. प्र. चिन्तामरिण
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53
रत्नादि श्राभूषण देने वाले हैं ।
सुगन्ध पुष्प मालाएँ देने वाले हैं।
७. माल्यग
८. दीपांग
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ज्योतिरांग सूर्य के समान प्रकाश देने वाले हैं ।
१०. तूर्याङ्ग : नाना प्रकार के उत्तमोत्तम भेरी यादि बाजी के देने वाले हैं । तिलोपपति में इन कल्पवृक्ष के विषय में लिखा है
ते सब्बे कमावरप्फदी सो अंतरा सब्बे ।
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चन्द्रमा के समान शीतल प्रकाश देने वाले हैं ।
पवर पुढविear पुण्यफलं देति जीवांखं ॥ १५१६॥ -
अर्थ- ये समस्त कल्पवृक्ष न वनस्पति रूप हैं और न ये सब व्यंतर रूप हैं । यथार्थ में ये पृथ्वी स्वरूप है, तथा जीवों को उनके पुण्य कर्मों का फल देते हैं ।
कल्पवृक्षों के सम्बन्ध में महापुराण का यह स्पष्टीकरण है कि ये वृक्ष निसर्गात फलदायिन:' अर्थात् स्वभाव से फल देते हैं । 'नहिभाव-स्वभावानां उपालंभः सुसंगत:' इन वृक्षों का जो स्वभाव है, उसके विषय में दूषण देना उचित नहीं है । जिनसेनः स्वामी कहते हैं :--
दान फसादे फलन्ति विपुलं फलम् ।
यथास्यपादयाः काले प्राणिनामुपकारकाः ।।१५२०।।
जिस प्रकार अन्य वृक्ष अपने-अपने समय पर अनेक प्रकार के फल देकर
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अध्याय : ग्राठयां ]
[ ६०६
प्राणियों का उपकार करते हैं, उसी प्रकार दान के फल से ये कल्पवृक्ष भोगभूमियों को विपुल फल देते हैं ।
भोग भूमि में शरीर को पूर्णता-तिलोयपष्पति में कहा है कि उत्तम भोग भूमि में शरीर की पूर्णता होने पर २२ दिन में सम्यग्दर्शन धारण करने की योग्यता हो जाती है । मध्यम भोगभूमि में ३ दिन में तथा वन्य भोग में दिन में सम्यक्त्व लाभ करने की योग्यता प्राप्त होती है । ( गाथा ३८०-४०० - ४०६ अध्याय ४) हरिवंश पुराण सर्ग ६ के पद्म ६२, ६३, ६४ से यह सूचित होता है कि सभी भोगभूमियों में सप्त सप्ताहों में सम्यक्त्व ग्रहण की योग्यता श्राती है कहा भी है
तदस्ति पुंसा युग्मानां गर्भा शिलुठिताभूनाम् । दिनानि सप्त गच्छन्ति निजांगुष्ठावले हनेः ॥१.१५२१॥ गलामपि सप्तैव सप्तास्थिर पराक्रमः ।
स्थिरैश्च सप्ततैः सप्त कलासुत्र गणेषु च ॥ १५२२॥ कालेन सावता तेषां प्राप्तयौवन संपदाम् । सम्यक्त्वग्रहरणैरपि स्याद् योग्यता सवलभिवितः ।। १५२३॥
अनेक ग्रन्थों में कथन प्राता है कि ४९ उनचासवें दिन के पश्चात् भोगभूमियों सभ्यत्व ग्रहण की योग्यता होती है । तिलोपपत्ति में कथित २२ तथा ३५ दिन का काल उत्तम भोगभूमि तथा मध्यम भोगभूमि की विशेष अपेक्षा से कहा गया जानना चाहिये ।
कर्म भूमि के मनुष्यों में सम्यक्त्व की उत्पत्ति पर्याप्त अवस्था में आठ वर्ष की अवस्था के आगे होती हैं । मनुष्य की दृष्टि से भूमि तथा कर्म भूमि में समानता होते हुए भी सम्यक्त्व की उत्पत्ति सम्बन्धी योग्यता में काल कृत अन्तर इस बात को सूचित करता है कि सूक्ष्म दृष्टि से दोनों अवस्थाओं भिन्नता भी है । सुख और ग्रानन्द की सामग्री भोग भूमि में प्रचुर प्रमाण में पाई जाती है, किन्तु मुक्ति प्राप्ति के योग्य श्रेष्ठ रीति से रत्नत्रय धर्म की समाराधना कर्म भूमि में ही होती है, अतएव कर्म-भूमि में मनुष्य पर्याय पाने का विशेष प्रयत्न है. 1:
यह बात भी कम महत्व की नहीं है कि तिर्यञ्चों में दिवस पृथकत्व अर्थात् तीन से अधिक और नौ के भीतर दिनों में सम्यक्त्व उत्पन्न करने की योग्यता पाई
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६१० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि जाती है । देवों में पर्याप्ति पूर्ण होने के अन्तर्मुहूर्त में सम्यक्त्व उत्पन्न हो सकता है, इसी प्रकार अर्थात् देवों के समान नारकियों के वर्शन में कहा गया है । इससे स्पष्ट होता है कि कर्मभूमि का मनुष्य चारों गति में सबसे अधिक काल बीतने पर सम्यक्त्व पैदा करता है । एक दृष्टि से मनुष्य पर्याय है कि सम्पन्न करने के साथ सकल संयम को स्वीकार करने वाला साधु अन्तर्मुहूर्त में सर्वज्ञ परमात्मा भी बन सकता है।
प्रश्न :- भोमभूमि मनुष्यों के विषय में शातथ्य बातें कौनसी है ? उत्तर :--- भोगभूमि मनुष्यों के विषय में अनेक ज्ञातव्य बातें-तिलोयपण्यति के चतुर्थ अधिकार में लिखा है कि- 'भोगभूमि के मनुष्यों का शरीर बहुत बलशाली था। नौ हजार हाथियों के सदृश बल था !
'ठावरागः सहस्स - सरिस बल जुत्ता ।' वे आर्जव भाव सहित, मंदकषायी, सुशीलता पूर्ण, वज्रवृषभ नाराच संहनन युक्त, समचतुस्त्र संस्थान सहित, बालसूर्य सदृश तेजस्वी, कवलाहार करते हुए भी नीहार रहित और युगलधर्म युक्त होते हैं । उस काल में नर-नारी के अतिरिक्त अन्य परिवार नहीं होता । भोगभूमि के मनुष्य तथा तिचों की नौ मास आयु शेष रहने पर उनके गर्भ रहता है । और मृत्युकाल आने पर उनके युगल-संतान उत्पन्न होती है ।
मृत्यु होने पर भोगभूमि के मिथ्यादृष्टि मनुष्य तिर्यञ्च भवत्रिक में और सम्यग्दृष्टि सौधर्म ईशान स्वर्ग में जन्म लेते हैं । भोगभूमियां जीव जातिस्मरण से, कोई देवों के प्रतिबोधित करने से और कोई चारण मुनि यादि के उपदेश से सम्यक्त्व ग्रहण करते हैं । कहा भी है
जादि भररण केई केई पडियोहरलेण देयाणं ।
चारण मुरिए पहुदोणं सम्मतं तत्व गेहुंति ॥१५२४ ।। विशेष यह है कि उनमें संयम नहीं होता है । कहा भी हैते सब्बे वरजुला अलोणुपलपेम संमूढा 1
जम्हां सम्हा तेसुं सावय-बद-संयमोणत्थि ।। १५२५।। अर्थ – ये सब उत्तम युगल पारस्परिक प्रेम में अत्यन्त मुग्ध रहा करते हैं. इसलिये उनके श्रावक के व्रत और संयम नहीं होता। वे नर-नारी युगल मणित, शिल्प, गन्धर्व, चित्र यदि चौंसठ कलाओं में स्वभाव से ही अतिशय निपुण होते हैं ।
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अध्याय : पाठवां ।
[ ६११ उनमें कुल जाति का भेद नहीं कहा है (कुल-जादि भेद होणा-३८७) ।
वहां व्याघ्र प्रादिक भूमिचर और काक आदि नभचर तिर्यञ्च मांसाहार के बिना कल्पवृक्षों का मधुर फल भोगते हैं। अन्य तृणजीवी पशु युगल दिव्य तृणों का भक्षण करते हैं ।
जिन्होंने पूर्व में मनुष्य आयु को . बांध लिया है और पश्चात् तीर्थङ्कर के पादमूल में क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्त किया है, ऐसे क्षायिक सम्यग्दृष्टि पुरुष भी भोगभूमि में उत्पन्न होते हैं। कितने ही मिथ्यादृष्टि मनुष्य निर्ग्रन्थं मुनियों को दानादि देकर भोगभूमि में उत्पन्न होते हैं । पापों के त्यागी, गुणों के अनुरागी तथा मंदकषाय वाले भी वहां उत्पन्न होते हैं। ...
भोगभूमि में ग्राम नगरादिक सब नहीं होते। केवल वे सब कल्पवृक्ष होते हैं, जो भोगभूमिवासी जीवों को मनोवांछित वस्तु देते हैं । कहा भी है--- ..
ग्राम-णयरादि सव्वं होदिते होंति सब्बकप्पतरू। रिणय-रिणयमरणसा संकप्पिय-वत्थरिंग तिजुगलाणं ॥१५२६॥ :
भोगभूमि के पुरुष इन्द्र से भी अधिक सुन्दराकार होते हैं ( देविदादोदि सुन्दराकारा ) स्त्रियो अप्सराओं के सदृश होती हैं । भोग भूमिजों के युगल कदलीधात मरण से रहित होते हुए प्रायु पर्यन्त चकवर्ती के भोग समूह की अपेक्षा अनंत गुणे भोगों को भोगते हैं, कहा भी है ।
जुगलाणि अणतगुणं भोग चषकहर भोग योहादो। भुजति जाव प्राचं कवलीयादेश रहिदारिण ॥१५२७।।
तिलोयपण्णति में यह भी लिखा है, वे युगल कल्पवृक्षों से दी गई वस्तुओं को ग्रहण करके और विक्रिया से बहुत से शरीरों को बनाकर अनेक प्रकार के भोगों को भोगते हैं।
प्रश्न :--भोग भूमि में लिर्घञ्च कौन जीव होता है ?
उत्तर :--तिलोयपाति में इस प्रकार कहा है-'जो पापी जिनलिंग को ग्रहण करके संयम एवं सम्यक्त्व भाव को छोड़ देते हैं, और पश्चात् माया में प्रवृत्त होकर चरित्र को नष्ट करते हैं, तथा जो कोई मूर्ख मनुष्य कुलिगियों को नाना प्रकार के दान देते हैं या उनके भेष को धारण करते हैं, वे भोग भूमि में तिर्यञ्च होते हैं ।
(माथा ३७३-३७४)
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...
[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :-भोग भूमि के अन्त में परिवर्तन कसे होता है?
उत्तर :--भोग भूमि का अंत होने पर नैसर्गिक परिवर्तन भोग भूमि का अंत होने पर ते कल्पवृक्ष नष्ट हो गये थे। इससे प्रजा जन अत्यन्त व्याकुल हो गये थे । वातावरण में अद्भूत परिवर्तन हो रहा था। अनेक प्रकार के धान्यादि स्वयं उत्पन्न हो गये थे । इस विषय में जिनसेन स्वामी लिखते हैं...
तदा पितृव्यतिक्रान्तावपत्यानीच तप्तवम् ।
कल्पवृक्षोचित स्थानं तान्यध्यासिषत स्फुटम् ॥१५२८॥ - जिस प्रकार पिता की मृत्यु होने पर उनके स्थान पर पुत्र प्रारुढ़ होता है, उसी प्रकार कल्पवृक्षों के अभाव होने पर वे धान्यादि उनके स्थान पर प्रारूत हुये थे ।
उस समय आकाश में मेष इकट्ठे होकर वर्षा करने लगे पर महाकवि उत्प्रेक्षा करते हैं :---
ध्वनन्तो ववृषुर्मुक्त स्कूल धारं पयोधराः । रुदन्त इव . शोकार्ताः कल्पवृक्ष..परिक्षये ॥१५२६॥
उस समय मेघ गर्जना पूर्वक स्थूल धारा से बरसते हुये ऐसे प्रतीत होते थे, मानों कल्पवृक्षों के क्षय हो जाने से शोकयुक्त होते हुये रो रहे हैं।
प्रश्न :--प्रादि ब्रह्मा ने क्या व्यवस्था की प्रजा को ?
उत्तर :--'प्रादि ब्रह्मा' श्री ऋषभनाथ तीर्थकर - भोगभूमियां जीवों का कथन करते समय तिलोयपपणात्ति में लिखा है कि 'जुगला कुल-जाति भेद होगा (४-३८७) अर्थात् उस युगल मनुष्यों में कुल, जाति का भेद नहीं था, तब कर्मभूमि में कुल जाति भेद के साथ वर्णन व्यवस्था अदि कैसे आ गई ? इस विषय में समाधान निमित्त महापुराण से महत्त्वपूर्ण सामग्री प्राप्त होती है । बात यह है, भोगभूमि की प्रणाली लोप होने पर कल्पवृक्ष तो चले गये थे तथा कुछ समय के बाद बिना बोया धान्य का लाभ भी बन्द हो गया, तब महाराज नाभिराय की प्राज्ञा से दुःखी और क्षुधित भोगभूमियां भगवान ऋषभदेव के चरणों में गई और उन्होंने प्रार्थना की
विभो समूलमुत्सन्नपितकल्पा महाध्रिया:. । फलस्यकृष्टपच्यानि सस्यान्यपि च नाधुना ॥१५३०॥
हे विभो पिता के समान हमारी रक्षा करने वाले कल्पवृक्ष समूल नष्ट हो गये और अब बिना बोया हुआ परिपाक को प्राप्त होने वा धान्य नहीं फलता है--
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अध्याय : पाठवा ]
[ ६१३ त्या देवमादिकर्तारं कल्पानिपभियोग्नतम् । समाश्रिता कथं भीतेः पदं स्याम क्यं विभो ।।
है भगवान् ! हम कल्पवृक्ष के समान उन्नत इस युग के आदिकर्ता आपके समीप आये हैं, इसलिए हमें भय किस प्रकार हो सकता है ? उनकी दीनवाणी को सुनकर भगवान ने यह निश्चय किया कि--
कर्म भूरध जातेयं व्यतीते कल्प भूरूहाम् । ततोऽन कर्मभिः षड्भिः प्रजानां जीवकोचिता ।।
कल्पवृक्षों के नष्ट हो जाने पर अब यहां कर्मभूमि प्रगट हुई हैं, इसलिये प्रजा को असि अर्थात् शस्त्रसंचालन, मषि अर्थात् लेखन कार्य, कृषि, शिल्प, वारिणज्य तथा पशुपालन द्वारा आजीविका करना उचित है।
उपरोक्त निश्चय भगवान ने गम्भीर विचार के उपरांत किया था। उन्होंने विशेष ज्ञानोपयोग द्वारा विदेह की वर्तमान स्थिति का विचार कर विदेह को आदर्श बना यहां की वर्णाश्रम व्यवस्था करने का निश्चय किया। जिनसेन स्वामी ने लिखा है
पूर्वापर विदेहेषु या स्थितिः समवस्थिता । साद्य प्रवर्तनीयात्र ततोजीवंत्यमः प्रजाः ॥
पूर्व पश्चिम विदेह में जो स्थिति बर्तमान है, वही स्थिति आज यहां प्रवृत्त करने योग्य है। उससे यह प्रजा जीवित रह सकती है ।
षट्कर्माणि यथा तत्र यथा वर्णाश्रमस्थितिः । यथाग्राम गृहादीनां संस्त्यायाश्च पृथग्विधाः ॥
जैसे वहां असि, मधि आदि छह कर्म हैं । तथा वर्णाश्रम को व्यवस्था है और जैसी ग्राम, गृह आदि की अलग-अलग रचना है ।
तयात्राप्युचिता वृत्तिः उपायरेभिरंगिनाम् । नोपायान्तरमस्त्येषां प्राणिनां जीविका प्रति ॥
उसी प्रकार यहां भी होना चाहिये। इन्हीं उपायों से प्राणियों की आजीविका चल सकती है। इनकी आजीविका के लिये कोई अन्य उपाय नहीं है। '
इस कथन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि वर्णाश्रम व्यवस्था जैन धर्म की किसी धर्म से उधार ली गई वस्तु नहीं है । जिस विदेह क्षेत्र में सदा धर्म का सूर्य
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६१४ ]
[.. मो. प्र. चिन्तामणि प्रकाशमान होता है तथा · जहां मिथ्या संप्रदाय नहीं है, वहां भी वर्ण व्यवस्था है । उसके ही आधार पर भगवान् वृषभदेव ने इस भरत क्षेत्र में व्यवस्था के लिये आवश्यक तथा सूक्ष्म बातों को दिव्य ज्ञान द्वारा जान सके थे। ऐसी स्थिति में शंका के लिये स्थान नहीं रहता है । परम कारूणिक तीर्थकर वृषभदेब ने गम्भीर चिंतन के पश्चात् विदेह की वर्णाश्रम व्यवस्था के आधार पर तत्कालीन समाज के हितार्थ योजना की थी। उसमें छिद्रों की कल्पना करना योग्य नहीं है । वैदिकों की वर्ण व्यवस्था और जैन वर्ण व्यवस्था में अंतर है, यद्यपि बाह्यरूप में उनमें साम्य दिखता है। जैन व्यवस्था अहिंसा की आधार शिला पर अवस्थित है । उसके मूल में पक्षपात, विद्वष या घृणा का. सद्भाव नहीं है । यह पुर्णतया मनोवैज्ञानिक है। कोई प्रागमज्ञ विचारक यह कहते हैं कि जैनों की वर्ण व्यवस्था को ही वैदिकों ने अपनाकर अपनी कर्तृत्ववाद की संस्कृति की मुहर उस पर लगाई है।। प्रश्न :--कोई-कोई कह बैठते हैं, उपरोक्त मत तो जिनसेन स्वामी का रहा
है, उसे उन्होंने ऋषभनाथ भगवान के नाम से लिखा है ? उत्तर :-यह कथन उचित नहीं है । यह परमागम की चर्चा कोई राजमीति की बात नहीं है। इसमें सर्वज्ञ, हितोपदेशी, वीतराग भगवान की दिव्यध्वनि से प्रकाशित तथा गरगधर देव द्वारा ग्रन्थरूप से रचित पदार्थ का निरूपण है । अतएव तत्त्व प्रेमी मुमुक्षुओं को वर्ण व्यवस्था के विषय में परमागमोक्त उक्त बात श्रद्धान करने योग्य है । इस व्यवस्था की उपेक्षा के कारण ही आज की भौतिक विकास युक्त दुनियां में घृणा, अशांति, असंतोष तथा विद्वेष की वृद्धि हो रही है।
प्रश्न :---कर्म भूमि का प्रारम्भ किस प्रकार हुमा ? उत्तर :- कृतयुग (कर्मभूमि) का प्रारम्भ--- युमादिब्रह्मरणा सेन यवित्थं स कृतो युगः । ततः कृतयुगं नाम्ना तं पुराणविदो विदुः ।।
युग के आदि विधाता ऋषभनाथ भगवान ने इस प्रकार कर्मयुग का प्रारम्भ किया था, इससे पुराणवेत्ता उन भगवान को कृतयुग के नाम से जानते हैं।
प्राषाढ़ मास बहुल प्रति दिवसे कृतो । कृत्वा कृतयुगारंभं प्राजापत्यमुपेयिवान् ॥
कृतकृत्य भगवान ऋषभदेव ने आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के दिन कृतयुग अर्थात् कर्मभूमि का प्रारम्भ करके प्रजापति पदं को प्राप्त किया था।
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अध्याय : पाठवां ]
इस प्रसंग में महापुराण का यह कथन भी स्मरण योग्य है कि भगवान ऋषभदेव ने प्रजा के हित का विचार कर इन्द्र को स्मरण किया । तत्काल देवों सहित इन्द्र आदिनाथ प्रभु के पास आया और उसने नीचे लिखे अनुसार विभाग कर प्रजा की जीविका के उपाय किये ! शुभदिन, शुभनक्षत्र, शुभमुहूर्त तथा शुभलग्न के समय और सूर्य आदि ग्रहों के अपने-अपने उच्चस्थानों में स्थित रहने और जगद्गुरु भगवान के अनुकूल रहने पर इन्द्र के प्रथम ही मांगलिक कार्य किया और फिर भी उसी अयोध्या पुरी के बीच में जिन मन्दिर की रचना की। इसके बाद पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर प्रकार की चारों दिशाओं में भी यथाक्रम से जिन मन्दिरों की रचना की । कहा
अथानुध्यानमात्रेण विभोः शुक्रः सहामरः । प्राप्तस्तज्जीवनोपायनित्यका द्विभागतः ॥ शुभे दिने सुनक्षत्रे सुमुहूर्ते शुभोदये । स्वोच्चस्थेषु पहेपुच्चः प्रानुकल्ये जगद्गुरोः ।। कृप्त प्रथम मांगल्ये सुरेन्द्रो जिनमंदिरम् । न्यवेशयत् पुरस्यास्य मध्ये विश्वप्यनुक्रमः ।।
इस कथन से यह बात भी स्पष्ट होती है कि लोगों को जीविका का उपाय बताने के साथ उनके धर्माशंधन के हेतु जिनेन्द्र मंदिर की व्यवस्था की गई थी, जिससे षट्कर्म जनित दोषों का प्रक्षालन भी हो । जीविका का उपाय बताने के सिवाय यदि धर्म का कथन बताया होता और उसका साधन नहीं जुटाया गया होता, तो इससे जीवों का अच्छा कल्याण नहीं हो पाता । तीर्थंकर ऋषभनाथ प्रभु ने ऐसा मार्ग प्रदर्शन किया, जिससे समाज की योग्य व्यवस्था के साथ मात्मा का परिपूर्ण हित भी होता रहे।
भगवान ने पापरहित भाजीविका के उपायों का समर्थन किया था। कहा
यावती जगति वृत्तिः, अपापोपहता 'चया। सासर्वास्य मतेनासीत् . सहि माता सनातनः ।।
उस समय जगत में पापरहित माजीविका के जो उपाय थे, वे सब भगवान् की संमति से प्रवृत्त हुए थे, क्योंकि ऋषभनाथ भगवान ही सनातन ब्रह्मा हैं।
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६१६ ]
त्रिलोक सार में कहा है
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
पुरग्रामपवृनादि : लौकिकशास्त्र: लोकव्यवहारः । विनिर्मित आदिब्रह्मणा ।।१५३१।।
धर्मोऽपि दयामूलः अर्थात् यदि ब्रह्मा ऋषभनाथ भगवान ने पुर राम, पत्तनादि, लौकिकशास्त्र, लोक व्यवहार तथा दया मूलक धर्म की स्थापना की थी ।
अवसर्पिणी काल के तीसरे काल के अंत में चौदह कुलकर हुये थे । भगवान ऋषभदेव तथा चक्रवर्ती भरत भी कुलकर नाम से विख्यात हुए। इनको कुलों को धारण करने से कुलंधर और कुलों के करने में कुशल होने से कुलकर कहते थे ! तिलोयपणति में यही बात इन शब्दों द्वारा कही गई है-
सुपसिद्धा ।।१५३२।।
हुआ ?
कुलधारणा दु सव्वे कुल धारणामेण भुवरविक्वादा। कुलकरखम्मियकुसला कुलकरणार प्रश्न :---- --- उत्सर्पिणी काल का प्रारंभ कैसे उत्तर : ---- उत्सर्पिणी का प्रारम्भ काल - इस अवसर्पिणी का अंत होने पर उत्सव का प्रथम काल प्रतिदुःखमा श्राता है । वह २२ हजार वर्ष का है। उसके बाद २१ हजार वर्ष का दूसरा काल दुखमा नाम का श्राता है । इस दुःखमा काल के २० हजार वर्ष बीतने पर तथा एक हजार वर्ष शेष रहने पर कनक श्रादि सोलह कुलकर उत्सर्पिणी काल संबंधी उत्पन्न होते हैं । इन में प्रथम कुलकर की ऊंचाई चार हाथ है, तक्षा सोलहवें की ऊंचाई सात हाथ कही गई है ।
ये कुलकर कहते हैं कि
मदिरा कुणह रिंग पचेह श्रष्णाणि भुजह अहिच्छं । सोबखेणं करि विवाह बंधवपहुदिद्वारेण
।।१५३३॥
मथ करके आग को उत्पन्न करो । अन्न को पकाश्रो और विवाह करके बांधवादिक के निमित्त से इच्छानुसार सुख का उपभोग करो ।
अंतिम कुलकर के यहां प्रथम तीर्थंकर भगवान् महापद्म का जन्म होगा । उस समय से यहां विदेह वृत्ति सदृश होने लगती है । तिलोयपति में कहा है-'सक्काले थिरा चउदस हवंति तालपद्मजिरो । अंतिम कुलकर सुो विवेह वत्तीको होदि
।।१५३४।१२
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अध्याय : पाठवां ।
[ ६१७ उत्सपिणी के लोसरे काल दुषमसुषमा में १२० वर्ष की आयु होती है और सात हाथ प्रमाण शरीर की ऊंचाई रहती है । प्रथम तीर्थंकर को प्रायु १२० वर्ष के स्थान में ११६ वर्ष 'सोलसुत्तरं च सदं' कही गई है।
तीर्थंकर महापुरुष प्रश्न :- तीर्थंकर महापुरुषों का कार्य क्या है ?
उत्तर :-जब जगत में अंधकार का अखंड सामाज्य हो जाता है, तब नेत्रों की शक्ति कुछ कार्य नहीं कर पाती है। अंधकार नेत्रयुक्त मानव को भी अंध सदश बना देता है । इस पौद्गलिक अंधकार से गहरी अंधियारी मिथ्यात्व के उदय से प्राप्त होती है। उसके कारण यह ज्ञान वान जीव अपने स्वरूप को नहीं जान पाता है । मोहनीय कर्म के आदेशानुसार यह निंदनीय कार्य करता फिरता है । जड़ शरीर में यह मिथ्यात्वांध व्यक्ति अत्मिबुद्धि धारण करता है । जब इसे कोई सत्पुरुष समझाते हैं कि तुम चैतन्य पुंज झायक स्वभाव प्रात्मा हो । शरीर का तुमसे कोई संबंध नहीं है, तो यह अविवेकी उस वाणी को विष समान समझता है ।
सूर्योदय होते ही अंधकार का क्षय होता है, उसी प्रकार तीर्थंकर रूप धर्म सूर्य के उदय होते ही जगत में प्रवर्धमान मिथ्यात्व का अंधकार भी अंतः करण से दूर होकर प्रारणी में निजस्वरूप का अवबोध होने लगता है।
इस स्थिति में प्राचार्य रविषेण एक मार्मिक तथा सुयुक्ति समर्थित बात कहते हैं कि जब जमत में धर्मग्लानि बढ़ जाती है, सत्पुरुषों को कष्ट उठाना पड़ता है, तथा पाप वृद्धि बालों के पास विभूति का उदय होता है, तब तीर्थीकर रूप महान आत्मा उत्पन्न होकर सच्चे आत्मधर्म की प्रतिष्ठा बढ़ाकर जीवों को पाप से विमुख बनाते हैं । पद्मपुराण में रविषेखाचार्य ने लिखा है
प्राचाराणा विधातेन कुदृष्टीनां च संपदा । धर्मग्लानि परिप्राप्ताच्छ्यन्ते जिनोत्तमाः ||१५३५
जब उत्तम प्राचार का विधात होता है, मिथ्याधर्मियों के समीप श्री कि बद्धि होती हैं, जैन धर्म के प्रति घृणा का भाव उत्पन्न होने लगता है, तब तीर्थकर उत्पन्न होते हैं और जैन धर्म का उद्धार करते हैं।
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- ६१८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि वर्तमानकालीन १४ कलकर (कलंकर) अथवा मनु
शरीर का
व. कुलकरों के
नाम
कुलकरों की स्त्रियों के
नाम
शरीर की ऊंचाई
कुलकरों के परस्पर अन्तरकाल और
जन्मकाल प्रमाण
.१. प्रतिभूति,
स्वयंप्रभा
इनका जन्म हुतीय काल के एक पल्य का १/८वां भाग माकी रहने पर
२. सन्मति
যৰি
सुवर्ण
१३०.
.. प्रथम कुलकर के मरने के बाद पल्य
का १/५० को भाग बीत जाने पर इनका जन्म होता है।
सुनन्दा
सुवर्स
दूसरे कुलकर के मरने बाद पल्प का १/८०० यो भाग बीस जाने पर इनका जन्म होता है। तीसरे कुलकर के मरने के बाद पल्य का १/५०००० वा भाग बीत जाने पर इनका जन्म होता है।
४. क्षेमन्धर
विमला
सुवर्स
७७५
५. सौमकर
मनोरम
सुदर्रा
चौथे कुलकर के मरने के बाद पल्य का १/५०००० या भाग बीत जाने पर इनका जन्म होता है। पांचवे कुलकर के मरने के बाद का
का १/६ लाख को भार बीत जाने - ... पर इनका जन्म होता है।
कशोधारिणी
४२५
७. निमनबाहुन
सुमति
सुवर्ण
. ५००
छठे कुलकर के मरने के बाद पल्य का १/८०.साल बा भाग बीत आने पर इनका जन्म होता है। .
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अध्याय : आठवां ] सम्बन्धी कई जानने योग्य तथ्य
आयु कास प्रमाण
विशेष
कौन-कौन से कुलकर के समय कौन-कौन से कुलकर अवागत अर्थात् में कौन-कौन सी विशेष अपनी अपराधी प्रजा भविष्यत काल बातें हुई?
को किस-किस तरह में होने वाले दण्ड देते रहें, उसका १६ कुलकरों
|
एकपल्या १११००० जोतिरांग कल्पवृक्ष का कम सुमधुरामा उसकतेबकुलकर के भाग प्रमाण होने से प्रकाश में सूर्य-चन्द्रमा हैं। ऐसे वचन से काल के दूसरे काल समय और श्री
एक से लेकर पांच के अन्त समय में होने लगे और इन्द्र दिखाई पड़ने लगे।
बालकर प्रजाजनों को एक हजार वर्ष ने उनका विवाह
पर देते रहे। बाकी रहने पर कम किया था। एक पल्य का ११०० अंधकार, नक्षत्र और तारागरा
से १६ खुलकर होते हजार या भाग प्रमाण दिखने लगे ।
हैं उनके नाम
.
१. कनक
एका पल्य का १/१००० र मृग, हिंसक जंतुनों से दां भाग प्रमाए बाधा होने लगी।
२. कनक प्रभ
एक पल्म का १/१० दीपोधीनोपाय बतलाए। हजार या माग प्रमाणे :
३.कनकराज
एक पल्व का १/१ प्रजाजनों को कल्पवृक्षों की साख व माग प्रमाण सीमा दिसला दी।
४. कनकध्वज
एक पल्प का १/१० दिखलाई हई सीमा विशेष का हा मा तमने बरा साख वां भाग प्रमाण चिन्ह बतला दिया ।
इस तरह के वचनों
२. कुलकर को छोड़ कर बाकी सबमा नाम प्रार्य था इसलिये मरुदेवी के पिता का नाम नहीं बताया है।
एक पल्म का १/१ हाथी, घोड़े प्रावि माहनों की कुलकर करोड़वां भाग प्रमाण उपभोग बना दिया।
'प्रजा को दण्ड देते . नलिन रहे।
-
-
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... Malinmamt
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६२० ]
[ मो. प्र. चिन्तामणि
८, चक्षुष्मान
बसुन्धरा
श्यामवरण
सातवें कुलकर के मरने के बाद पत्य का १ करोड वा भाग बीत जाने पर इनका जन्म होता है।
..
१. यशस्वी
काम्समाला
श्यामवर्ण
१५०
a mmanditionalyug
.
पाठचे कुलकर के मरने के बाद पत्य को १/८७ करोड़ वो भाग बीत जाने पर इनका जन्य होता है।
१०. अमिचन्द्र
श्रीमती
सुवर्स :
६२५
नवें कुलकर के मरने के बाद पत्य का १400 करोड़ वा भाग नीत आने पर इनका जन्म होता है ।
११. चन्द्राम
प्रावती
धवल
धवल
३००
उसः कुलकर के मरने के बाद पस्य का१/८०००० करोड़ वां भाग दौत जाने पर इनका जन्म होता है।
१२. भर व
सुवर्ण
अनुपमामाथि { सत्या)
रियारहवें कुलकर के मरने के बाद : पस्य का १/५०००० करोड़या भाग बीत जाने पर इनका जन्म होता है।
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अमृतमति (प्रमितमति
बारहवें मुलकर के मरने के बाद पस्य का १/१० लाख करोड़ वां भाग बीत जाने पर इनका जन्म होता है।
१४, नाभिराज
मरुदेषी
सैरहवें कुलकर के मरने के बाद १११०० लाख करोड़ वां भाग शीव जाने पर इनका जन्म होता है।
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अध्याय : पाठवा ]
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७. नलिनप्रभ
एक पल्म का १/१० बच्चों के मुखावलोकन का भय पारोड़ या भाग प्रमाण दूर किया !
८. नलिनराज
एक पत्य का १/१०० बालकों की नामकरण विधि करोड वा सम प्रमाण बतला दी।
१. नलिनभनव
१०. नलिनपुगव
एक यस्य का११००० शिशुरादन-निवारण हेतु करोड़ था माग प्रमाण बालकों के साम चन्द्र दर्शनावि
कीड़ा बताई।
३. चौदहवें कुलकर राजानाभिराज और रानी मरदेवी का विवाह इन्द्र ने किया है । इस प्रकार महापुराण पर्व २२ में लिखा है।
११. पद्म
एक पल्य का १/१० बालक और माता-पिता का हजार करोड़दा परस्पर नाता उनको समभाकर माग प्रमाण कह दिया।
१२. पयप्रभ
एक पल्य का १/१ नदी समुद्रादि लागयों के 'हा माधिक' तुमने १३. पद्यराज लाख करोंड बा तरणोपारस्पनाक, जहाजादिदुरा काम किया।
ऐसा काम मत करो। भार प्रभाए लाने की रीति बतला दी। तमको धिक्कार है। १४. पप्रध्वज
इस बच्चन से म्यारह एक पल्य का १/१० जन्म समय के जरायु के से लेकर चौदहवें लाख करोड़ निकालने का उपाय बेतला कुलकर और पंद्रहवे १ गय भाग प्रमाण दिधा मा।
'मनु' कहलाने पाते वृषक्षदेव अपनी प्रजा
को दण्ड देने रहे। १६. मड़ापन एक करोड़ पूर्व काल जन्म समय की नाभि के नाल प्रभार को काटने का उपाय पतला
शत्रिय आदि कुल दिया । इनके समय कर्म
का प्राचार और
अग्नि से अनादिक भूमि का प्रारंभ हुआ।
पक्वान्नों का विधान वताना इत्यादि कार्य अगायों को बता देना उनका कर्तव्य
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- amirma -manandinanciatio
mamarmalamumariomomymaravmurwasnasumnamaasummeme-PusparinaametotaaRIESewa
६२२ ].
[ गो. प्र. चिन्तामणि __ वैदिक धर्म की मान्यता है कि धर्म की ग्लानि होने पर धर्म की प्रतिष्ठा स्थापना हेतु शुद्ध अवस्था प्राप्त परमात्मा मानवादि पर्यायों में अवतार धारण करता है । जिस प्रकार बीज के दग्ध होने पर वृक्ष उत्पन्न नहीं होता, उसी प्रकार रागद्वेष, मोह आदि विकारों के बीज प्रात्मसमाधि से नष्ट होने पर परम पद को प्राप्त प्रात्मा का रागद्वेष पूर्ण दुनियां में आकर विविध प्रकार की माला किसान सुविस, सविचार तथा गंभीर चिंतन के विरुद्ध है।
प्रश्न :-तीर्थ और तीर्थकर किसे कहते हैं ?
उत्तर :- तीर्थ और तीर्थकर-इस तीर्थकर शब्द में आगत तीर्थ शब्द के स्वरूप पर विचार करना उचित है । प्राचार्य प्रभाचन्द्र ने लिखा है, 'तीर्थमागमः तदाधारसंघश्च' अर्थात् जिनेन्द्र कथित प्रागम तथा पागम का आधार साधुवर्ग तीर्थ है । तीर्थ शब्द का अर्थ 'घाट' भी होता है । अतएव तीर्थंकरोतीति तीर्थकरः' का भाव यह होगा, कि जिनकी वाणी के द्वारा संसार सिंधु से जीव तिर जाते हैं, वे तीर्थ के कर्ता तीर्थकर कहे जाते हैं ! सरोवर में घाट बने रहते हैं, घाट से मनुष्य सरोवर के बाहर सरलता पूर्वक या जाता है, उसी प्रकार तीर्थकर भगवान के पथ प्रदर्शन का अवलंबन लेने वाला जीव संसार सिंधु में न डूब कर बाहर आकर चिन्तामुक्त हो जाता है।
मूलाचार में तीर्थ के दो भेद कहे हैं एक द्रव्य तीर्थ, दूसरा भावतीर्थ । द्रव्य तीर्थ के विषय में इस प्रकार स्पष्टीकरण किया गया है--
दसणारण चरित्ते गिजुत्ता जिरणवरा दु सन्वेपि । तिहि कारोहिं जुत्ता सम्हा ते भावदोलित्थं ॥१५३६।।
सभी जिनेन्द्र भगवान सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्रचारित्र संयुक्त हैं। इन तीन कारणों से युक्त हैं इससे भगवान भावतीर्थ हैं ।
जिनेन्द्र वाणी के द्वारा जीव अपनी आत्मा को परम उज्ज्वल बनाता है, उस रत्नत्रय भूषित प्रात्मा को भावतीर्थ कहा है । जिनेन्द्र रूप भाव तीर्थ समीप में षोडशकारण भावना को भाने वाला जीव तीर्थंकर बनता है। रत्नत्रय भूषित जिनेन्द्र रूप भावतीर्थ के द्वारा अपवित्र आत्मा पवित्रता को प्राप्त कर जगत् के संताप को दूर करने में समर्थ होता है । इस जिनदेव रूप भावतीर्थ के द्वारा प्रात्मा तीर्थकर बनता है और श्रुतरूप तीर्थ की रचना में निमित्त होता है।
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awakoare. -
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अध्याय : आठवां ]
[ ६२३ जिनेन्द्र भगवान के द्वारा धर्म तीर्थ प्रवृत्ति होती है, इससे उनको धर्म तीर्थंकर कहते है । मूलाचार के इस अत्यन्त भाव पूर्ण स्तुति पद्य में भगवान को धर्म तीर्थंकर कहते हैं
लोगज्जोरा धम्मतित्थयरे जिरणवरे व अरहते । कित्सरण केवलिमेव य उत्तमवोहिं मम विसंतु ॥१५३७॥
जगत् को सम्यग् ज्ञान रूप प्रकाश देने वाले धर्म तीर्थ के कर्ता उत्तम, जिनेन्द्र, अर्हन्त केवली मुझे विशुद्ध बोधि प्रदान करें, अर्थात् उनके प्रसाद से रत्नत्रय धर्म की प्राप्ति हो।
तीर्थकर शब्द का प्रयोग भगवान महावीर के समय में अन्य संप्रदायों में भी होता था, यद्यपि प्रचार तथा रुढ़िवश तीकर शब्द का प्रयोग जिनेन्द्र भगवान के लिये किया जाता है। जैन शास्त्रों में भी तीर्थंकर शब्द का प्रयोग श्रेयांस राजा के साथ. करते हुए उनको दान तीर्थकर कहा है । अतएव तीर्थंकर शब्द के पूर्व में धर्म शब्द को लगाकर धर्म तीर्थकर रूप में जिनेन्द्र का स्मरण करने की प्राचीन प्रणाली रही है।
__ समीचीन धर्म की व्याख्या करते हुए प्राचार्य समंतभद्र ने लिखा है कि सम्य. ग्दर्शन, सम्यक्ज्ञान, सम्यक्चारित्र रूप धर्म है, जिससे जीव संसार के दुःखों से छूटकर श्रेष्ठ मोक्ष सुख को प्राप्त करता है, इस धर्म तीर्थ के कर्ता इस असपिरगीकाल की अपेक्षा वृषभदेव आदि महावीर पर्यन्त चौबीस श्रेष्ठ महापुरुष हुए हैं । तीर्थंकर का पद किसी की कृपा से प्राप्त नहीं होता है । पवित्र सोलह प्रकार की भावनाओं तथा उजवल जीवन के द्वारा कोई पुण्यात्मा मानव तीर्थकर पद प्रदान करने में समर्थ तीर्थंकर प्रकृति नाम के पुण्य कर्म का बंध करता है। यह पद इतना अपूर्व है कि दस कोड़ा कोड़ी सागर प्रमाण इस अवसर्पिणी काल में केवल चौबीस ही तीर्थंकरों ने अपने जन्म द्वारा इस भरत क्षेत्र को पवित्र किया है । असंख्य प्राणी रत्नत्रय की समाराधना द्वारा . अहन्त होते हुए सिद्ध पदवी को प्राप्त करते हैं, किन्तु भरत क्षेत्र में तीर्थंकर रूप में जन्म धारण करके मोक्ष जाने वाले महापुरुष चौबीस ही होते हैं। प्रश्न :- सोलह कारण भावना के नाम क्या हैं ?. जिन्हें तीर्थकर
भाते हैं ? .. उत्तर :-तीर्थङ्कर प्रकृति के बंध में कारण, ये सोलह भावनाएँ प्रागम में
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MRAPAD
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६२४ ]
[ मो. प्र. चिन्तामणि
कही गई है । (१) दर्शन विशुद्धि ( २ ) विनय सम्पन्नता ( ३ ) शील व्रतेष्वनतिवार ( ४ ) अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग ( ५ ) संवेग (६) शक्तितस्त्याग: ( ७ ) शक्तितस्तप ( ८ ) साधु समाधि ( ९ ) वैयावृत्यकरण (१०) अर्हत्-भक्ति (११) प्राचार्य भक्ति (१२) बहुश्रुत भक्ति (१३) प्रवचन भक्ति (१४) आवश्यक परिहारिण (१५) मार्ग प्रभावना (१६) प्रवचनवत्सलत्व । इन सोलह प्रकार की श्रेष्ठ भावनाओं के द्वारा पद तीर्थरत्व की प्राप्ति होती है ।
महाबंध ग्रन्थ में तीर्थङ्कर प्रकृति को तीर्थंकर नाम गोत्र कर्म कह कर उल्लेख किया गया है, यथा 'एदेहिं सोलसेहि कारणेहिं जीवो तित्थयर गामा गोदं कम्मं वंधदि' (ताम्र पत्र प्रति पृष्ठ ५) उस महाबंध के सूत्र में सोलहकरण भावनाओं के नामों का इस प्रकार कथन श्राया है
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'afafe जीता नित्ययर गामा मोदं कम्म बंधदि । तत्थ इमे पाहि सोलस कारणेहि जीवा तित्थयरणामा गोदं कम्म बंधदि दसरा विसुज्झयाए, fare संपदा, सीलवदेसुनिरदिचारदाए, श्रावाससु अपरिहदाए, लवपsिes (बुज्झ ) दाए, लद्धिसंवेग संपण्णवाए अरहंत भसोए, बहुसुदभतीए, पवयाभत्तीए, पवयवच्छल्लदाए, पवयरणप्रभावणदाए, अभिवस्वरगंगा-खोपयुत्तदाए । उपरोक्त नामों में प्रचलित भावनाओं से तुलना करने पर विदित होगा कि यहाँ आचार्य भक्ति का नाम न गिनकर उसके स्थान में 'खालव- पडिबुज्झरादा' भवन का संग्रह किया गया है। इसका अर्थ है, क्षरण में, लव में अर्थात् क्षण-क्षण "अपने रत्नत्रय धर्म के कलंक का प्रक्षालन करते रहना क्षलव प्रतिबनता है । - इन सोलह कारणों के द्वारा यह मनुष्य धर्म तीर्थंकर जिन केवली होता है । कहा भी है :—— जस्स इ कम्मस्स उदयेण सदेवासुरमानुसस्स लोगस्स श्रचणिज्जा पूजरिज्जा वंदणिज्जा रामसरिगज्जा धम्मतित्थयरा जिला केवली ( केवलिरगो) भवति ( पृष्ठ ५ ) 1
प्रश्न : --- सीर्थंकर प्रकृति का बंध जीव किस अवस्थां में कर सकता है ? उत्तर :- जिस तिर्थंकर प्रकृति के उदय से देव; सुर तथा मानवादि द्वारा वन्दनीय तीर्थंकर के पद की प्राप्ति होती है, उस कर्म का अन्य तीनों प्रकार के सम्यक्त्व करते हैं । सम्यक्त्व के होने पर ही तीर्थकर प्रकृति का बन्ध होता है । किन्हीं आचार्यों का कथन है कि प्रथमोपशम सम्यवत्व का काल अल्प अंतर्मुहूर्त प्रमाण
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श्रध्याय: श्राठai ]
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है । उसमें सोलह भावनाओं का भाया जाना सम्भव नहीं है । अतः उसमें तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध नहीं होगा ।
यह भी बात स्मरण योग्य है कि इसका बंध मनुष्य गति में ही केवली प्रथा तवली के चरणों के समीप प्रारम्भ होता है । 'तित्थयरबंधपारंभयाणरा heegi | ( ६३ कर्मकांड मो० ) इस प्रकृति का बंध तिर्यञ्चगति को छोड़ शेष तीन गतियों में होता है । इसका उत्कृष्टपने से अन्तर्मुहूर्त अधिक आठ वर्ष न्यून दो कोटि पूर्व अधिक तैंतीस सामर प्रमाण काल पर्यन्त बंध होता है । केवली श्रुत केवली का सानिध्य इससे आवश्यक कहा है कि 'तदन्यत्र तादृग्विशुद्धि विशेषासंभवात्' उनके सानिध्य के सिवाय वैसी विशुद्धता का अन्यत्र प्रभाव है ।
नरक की प्रथम पृथ्वी में तीर्थंकर प्रकृति का बंध पर्याप्त तथा पर्याप्त श्रवस्था में होता है । दूसरी तथा तीसरी पृथ्वी में पर्याप्त अवस्था में ही इसका बंध होता है । आगे के नरकों में इस प्रकृति का बंध नहीं होता है । कहा भी है
श्रमतित्यं बंध वंसा मेधारा पुष्णगो चेव । १०६ गो० कर्म० । गोमट्टसार कर्म कांड माथा १३६ में लिखा है कि तीर्थकर प्रकृति का उत्कृष्ट स्थिति बंघ अविरत सम्पदृष्टि के होता है ।
तित्यरं च मस्सो प्रविरदसम्म समज्जेइ । इसकी संस्कृत टीका में लिखा है— 'तीर्थकर उत्कृष्ट स्थितिकं नरकगतिगमनाभिमुख – मनुष्यासंयम सम्यग्दृष्टिरेव astra' ( बड़ी टीका पृष्ठ १३४) उत्कृष्ट स्थिति सहित तीर्थंकर प्रकृति को नरकगति जाने के उन्मुख असंयत सम्यक्त्वी मनुष्य बांधता है, कारण उसके तीव्र संक्लेश भाव रहता है । उत्कृष्ट स्थिति बंध के लिये तीव्र संक्लेश युक्त परिणाम आवश्यक है । नरकगति में गमन के उन्मुख को तीव्र संक्लेश के कारण तीर्थंकर रूप शुभ प्रकृति का अल्प अनुभाग बंध होगा क्योंकि 'सुहपयडी विसोही प्रसुहारा संकिलेसेस ति० लो० (१६३) शुभ प्रकृतियों का तीव्र अनुभाग बंध विशुद्ध भावों से होता है । तथा
शुभ प्रकृतियों का तीव्र अनुभाग बंध संक्लेश से होता है, तीर्थंकर प्रकृति का बंध अपूर्वकरण गुणस्थान के छठवें भाग पर्यन्त होता है, श्रतएव इस गुणस्थानवर्ती मुमिराज के उत्कृष्ट अनुभाग बंध होगा । स्थिति बन्ध का स्वरूप विपरीत होगा अर्थात् वह न्यून होगा ।
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६२६ ]
[ गा. प्र. चिन्तामखि
प्रश्न :- तीर्थंकर नाम कर्म के सोलह कारणों में दर्शन विशुद्धि भावना की प्रमुखता क्यों है ?
:-→
उत्तर :---पं० श्राशावर जी ने सागर धर्मामृत ( ८-७३ ) में लिखा है कि केवल दर्शन विशुद्ध भावना से ही श्रेणिक नरेश ने तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया है । संस्कृत टीका में उपरोक्त कथन का समर्थन करते हुये ये शब्द लिखे गये हैं। 'एकया असहायया विनयसंपन्नतादितीर्थंकरत्वकारणान्तररहितया दृग्विशुध्या श्रेणिको नाम मगधमंडलेश्वरस्तीर्थकृत् धर्मतीवरों भविता भविष्यति' । अर्थात् विनय संपन्नतादि तीर्थंकरत्व के कारणांतरों से रहित केवल एक दर्शन विशुद्धि के द्वारा श्रेणिक नामक मगध महा मंडलेश्वर धर्मतीर्थकर होंगे ।
शंका :--- उत्तर पुराण के प्रकृत प्रसंग पर प्रकाश डालने वाली एक भिन दृष्टि पाई जाती है | वहां पर्व ७४ में श्रेणिक राजा ने गवर देव से पूछा है कि मेरी जैनधर्म में बड़ी भारी श्रद्धा प्रगट हुई है तथापि मैं व्रतों को क्यों नहीं ग्रहण कर सकता है ? समाधान :- उत्तर देते हुए गणधर देव ने कहा तुमने नरकायु का बंध किया है ? यह नियम है कि देवायु के बन्ध को छोड़कर अन्य आयु का बन्ध करने वाला फिर व्रतों को स्वीकार नहीं कर सकता। इसी कारण तुम व्रत धारण नहीं कर सकते । हे महाभाग ! श्राज्ञा, मार्ग, बोज श्रादि दस प्रकार की श्रद्धाओं में से आज तुम्हारे कितनी ही श्रद्धाएँ विद्यमान हैं । इनके सिवाय दर्शनविशुद्धि आदि शास्त्रों में कहे हुए जो शुद्ध सोलह कारण हैं, उनमें से सब या कुछ कारणों से यह भव्य जीव तीर्थंकर नाम कर्म का बन्ध करता है। इनमें से दर्शनविशुद्धि आदि कितने ही कारणों तू तीर्थकर नाम कर्म का बन्ध करेगा । मरकर रत्नप्रभा नरक में जायेगा और वहाँ से आकर उत्सर्पिणी काल में 'महापद्म' नाम का प्रथम तीर्थंकर होगा । ग्रन्थकार के शब्द इस प्रकार हैं
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एतास्वपि महाभाग तव संस्कार | दर्शनाद्यागम प्रोक्तशुद्ध पोडशकारः ॥१४३ भव्योव्यस्तः समस्तैश्च नामात्मीकुरुते सम । तेषु श्रद्धादिभिः कैश्विदुबध्या तनामकारणैः ॥ १५३६॥
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अध्याय : ग्राउवा ]
__ [ ६२७ रहाप्रभां प्रविष्ट: संस्तत्फलं मध्यमायुषा । भुक्त्वानिर्गल्य भव्यास्मिन् महापाख्य-तीर्थकृत ॥१५४०॥
इस विषय में तत्वार्थ श्लोकवातिकालकार का यह कथन ध्यान देने योग्य है। विद्यानन्दि स्वामी कहते हैं :
दग्विशुध्यायो नाम्नस्तीर्थंकृत्वस्य हेतयः । समस्ता व्यस्तरूपा वा दुग्विशुध्या समन्विताः ॥१५४१॥
दर्शनविशुद्धि आदि तीर्थंकर नाम कर्म के कारण हैं, चाहे भे सभी कारण हों या पृथक-पृथक हों किन्तु उनको दशनविशुद्धि समन्वित होना चाहिए। इसके एश्चात् तीर्थंकर प्रकृति के विषय में बड़े गौरव पूर्ण शब्द कहते हैं :
सर्वातिशायि तत्पुण्या त्रैलोक्याधिपतित्वकृत् ।।१५४२५॥ वह पुण्य तीन लोक का अधिपति बनाता है । वह पुण्य सर्व श्रेष्ठ है।
दर्शनविशुद्धि प्रादि भावनाएँ पृथक् रूप में तथा समुदाय रूप में जीर्थकर पद की प्राप्ति में कारण हैं, ऐसा भी अनेक स्थलों में उल्लेख आता है । हरिवंश पुराण में कहा है :--
तीर्थकर नामकर्मारिप षोडश तत्कारणायमूनि ।
व्यस्तानि समस्तानि भवति सद्भाव्य मानानि ॥१५४३।। प्रकलंक स्वामी राजवातिक में लिखते हैं :
तान्येतानि षोडशकारणानि सम्यग् भाव्यमानानि व्यस्तानि समस्तानि च तीर्थकर कामकर्मणः तत्र कारणानि प्रत्येतव्यानि । (सूत्र २४ पृ० २६७)
इन भावनाओं में दर्शनविशुद्धि का स्वरूप विचार करने पर उसकी मुख्यता स्पष्ट रूप से प्रतिभासमान होती है। तीर्थकर प्रकृति रूप धर्म कल्प तरु पूर्ण विकसित होकर रत्नत्रय के फलों से समलंकृत होते हुये पुण्य रूपी पुष्पोंसे अगणित भव्यों की अवर्णनीय आनन्द तथा शांति प्रदान करता है, उस कल्पतरु की बीजरूपता का स्पष्ट रूप से दर्शन प्रथम भावना से होता है ।
दर्शन विशुद्धि में प्रागत दर्शन शब्द सभ्यर्शन का वाचक है, इसी कारण यह अागम बावय है 'सम्मेवे तित्थ बन्धों' - तीर्थङ्कर प्रकृति का बन्ध सम्यकत्व होने पर ही होता है । विशुद्धि का भाव है पुण्य प्रद. उज्जवल भाव, जिसका संवलेश की कालिमा से तनिक भी सम्बन्ध न हो । कारण विशुद्ध भाव से शुभ प्रकृतियों में तीन
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६२८ ]
[ मो. प्र. चिन्तामरिए अनुभाग पड़ता है । इस सम्बन्ध में यह बाल भी ध्यान में रखना उचित है कि तीर्थङ्कर प्रकृति के बन्ध रूप बीज बोने का कार्य केवली श्रुत केवली के पादमूल अर्थात् चरणों के समीप होता है । भरत क्षेत्र में इस काल में अब उक्त साधन युगल का प्रभाव होने से तीर्थकर प्रकुति का बन्ध नहीं हो सकता है।
प्रश्न-मावना के लिये केवली के चरणों की समीपता का क्या कारण है ?
उत्तर-इस प्रकार का उत्तर यह होगा कि उन जिनेन्द्र की दिव्यवारणी के प्रसाद से देव, मनुष्य, पशु सभी जीवों को धर्म का अपूर्व लाभ होता है । यह देखकर किसी महाभाग के हृदय में ऐसे अत्यन्त पवित्र भाव उत्पन्न होते हैं कि मिथ्यात्वरूप महा अटवी में भोह की दावाग्नि जलने से अगणित जीव मर रहे हैं, उनके अनुग्रह करने की प्रभो! आपके समान क्षमता, शक्ति तथा सामर्थ्य-मेरी भी आत्मा में उत्पन्न हो, जिससे में सम्पूर्ण जीवों को आत्मज्ञान का अमृत पिलाकर उनको सच्चा सुख मार्ग बता सकू। इस प्रकार की विश्वकल्याण की भावना के द्वारा सम्यक्त्वी जीव तीर्थङ्कर प्रकृति का बन्ध करता है।
विनयसंपन्नता, अर्हत भक्ति, प्राचार्य भक्ति, प्रवचन भवित, मार्ग प्रभावना, प्रवचनवत्सलत्व सदृश अनेक भावनाएं सम्यक्त्व के होने पर सहज ही उसके अंगरूप में प्राप्त हो जाती हैं । जिस प्रकार अक्षर हीन मंत्र विषवेदना को दूर नहीं कर सकता है। ऐसी स्थिति में सम्यक्त्व यदि सांगोपांग हो तथा उसके साथ सर्व जीवों को सम्यक ज्ञानामृत पिलाने की भावना या मंगल कामना प्रबल रूप से हो जाय तो तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध हो सकता है । दर्शन विशुद्धि भावना परिपूर्ण होने पर अनेक भावनाओं के निरुपण को गोरा बनाकर कथन किया जाय तो तीर्थंकर पद में कारण दर्शन विशुद्धि को भी (मुख्य मानकर) कहा जा सकता है।
इस प्रसंग में पहले महामंडेलश्वर राजा श्रेणिक का उदाहरणा पा चुका है। श्रेणिक महाराज अवती थे, क्योंकि वे नरकायु का बन्ध कर चुके थे । वे क्षायिक सम्यक्त्वो थे । उनके दर्शन विशुद्धि की भावना थी, यह कथन भी ऊपर आ चुका है। महावीर भगवान का सानिध्य होने से केवली का पादमूल भी उनको प्राप्त हो चुका था। उनमें शक्तितस्त्याग, शक्तिस्तप, आवश्यकापरिहाणि, शीलवतों में निरतिचारता सदृश संयमी जीवन से सम्बन्धित भावनाओं को स्वीकार करने में कठिनता आती है, किन्तु अर्हत भक्ति, गगधरादि महान गुरुओं को श्रेष्ठ सत्संग रहने से प्राचार्य भक्ति,
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अध्याय : आठवां ]
[ ६२६ बहुश्रुतभक्ति, प्रवचनभक्ति, मार्ग प्रभावना, प्रवचन वत्सलत्व सदृश सद्गुणों का सद्भाव स्वीकार करने में क्या बाधा आती है ? ये तो भावनाएं सम्यक्त्व की पोषिकाएं हैं । क्षायिक सम्यक्त्वी के पास उनका अभाव होगा ऐसा सोचना तक कठिन प्रतीत होता है । अतएव दर्शन विशुद्धि की विशेष प्रधानता को लक्ष्य में रखकर उसे कारणों में मुख्य माना गया है। इस विवेचन के प्रकाश में प्रतीयमान विरोध का निराकरण करना उचित है।
विशेष-सम्यग्दर्शन और दर्शन बिशुद्धि भावना में भिन्नता है । सम्यग्दर्शन प्रात्मा का विशेष परिणाम है । वह बन्ध का कारण नहीं हो सकता । उसके सद्भाव में एक लोक कल्याण की विशिष्ट भावना उत्पन्न होती है, उसे दर्शन विशुद्धि भावना कहते हैं । यदि दोनों में अन्तर न हो, तो मलिनता आदि विकारों से पूर्णतया उन्मुख सभी क्षायिक सम्यक्त्वी तीर्थकर प्रकृति के बन्धक हो जाते; किन्तु ऐसा नहीं होता, अतः यह मानना तर्क संगत है कि सम्यक्त्व के साथ में और भी विशेष पुण्य भावना का सदभाव आवश्यक है।
मागम में गाया है कि सानो सम्पपरों में तीर प्रकृति का बन्ध हो सकता है, अतः यह मानना उचित है कि सम्यक्त्व रूप आत्मनिधि के स्वामी होते हुए भी विशुद्ध भावना का सद्भाव आवश्यक है। उसके बिना क्षायिक सम्यक्त्वी भी तीर्थङ्कर प्रकृति का बन्ध नहीं कर सकेगा। क्षायिक सम्यक्त्व मात्र यदि तीर्थङ्कर प्रकृति का कारण होता तो सिद्ध पदवी की प्राप्ति के पूर्व सभी केवली तीर्थङ्कर होते; क्योंकि केवल ज्ञानी बनने के पूर्व क्षपक श्रेणी प्रारोहण करते समय क्षायिक सम्यक्वी होना अनिवार्य नियम है। भरत क्षेत्र में एक अवसर्पिणी में चौबीस ही तीर्थकर हुए हैं। इतनी अल्पसंख्या ही तीर्थंकर प्रकृति की लोकोत्तरता को स्पष्ट करती है। क्षायिक सम्यक्त्वी होने मात्र से यदि तीर्थंकर पदवी प्राप्त होती तो महावीर तीर्थकर के समवशरण में विद्यमान ७०० केवली सामान्य केवली न होकर तीर्थंकर केवली हो जाते, किन्तु ऐसा नहीं होता । एक तीर्थकर के समवशरण में दूसरे तीर्थकर का सद्भाव नहीं होता । एक स्थान पर एक ही समय दो सूर्य या दो चन्द्र प्रकाशित नहीं होते, उसी प्रकार दो तीर्थकर एक साथ नहीं पाए जाते हैं । हरिवंश पुराण में कहा है---
नाग्योन्यदर्शन जातु चकियां धर्मवकिरणाम् । हलिनां बासुदेवानां त्रैलोक्य प्रतिक्रिरणाम् ॥१५४४।।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि चक्रवर्ती, धर्मचक्रवती, वासुदेव, प्रतिवासुदेव तथा बलदेव इनका और अन्य चक्रवर्ती, धर्म चक्रवर्ती, वासुदेव, प्रतिकासुदेव तथा बलदेव का क्रमशः परस्पर दर्शन नहीं होता है।
प्रश्न---तीर्थजुर प्रकृति को विशेषता क्या है ?
उत्तर--तीर्थकर प्रकृति के सद्भाव की विशेषता-तीर्थकर प्रकृति का उदय केबली अवस्था में होता है | तित्थं केवलिरिण-यह पागम का वाक्य है । यह नियम होते हुए तीर्थंकर भगवान के गर्भकल्याणक जन्मक ल्यारक तथा तपकल्याण के रूप कल्याएकमय तीर्थकर प्रकृति के सद्भाव मात्र से होते हैं । होनहार तीर्थंकर के गर्भकल्याराहक के छह माह पूर्व ही विशेष प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगता है । भरत तथा ऐरावत क्षेत्र में पंचकल्याणक वाले ही तीर्थकर होते हैं। देवगति से चयकर पाते हैं या नरक से पाकर मनुष्य पदवी प्राप्त करते हैं। तिर्यञ्च पर्याय से पाकर तीर्थकर रूप से जन्म नहीं होता है । तिर्यञ्चों में तीर्थकर प्रकृति के सत्व का निषेध है । 'तिरियेगा तित्थसत्तं तं' यह वाक्य गोरकर्मयागा है। पनकल्याणक वाल तीर्शकर मनुष्य पर्याय से भी नहीं पाते । वे नरक देवगति से प्राते हैं । अपनी पर्याय परित्याग के छः माह शेष रहने पर नरक में देव जाकर होनहार तीर्थीकर के असुरादि कृत उपसर्ग का निवारण करते हैं । स्वर्ग से. पाने वाले देव के छह माह पूर्व माला नहीं मुरझात्ती हैं । त्रिलोक सार में कहा है--
. तित्थयर. संतकम्मुवसग्गं खिरए सिधारयतिसुरा।
छम्मासाउगसेसे सग्गे अमलास-मालंका ॥१५४५॥ तीर्थङ्कर सत्कर्मोपिसम नरके निकायंनि सुराः ।
प्रमासायुकशेधे स्वः नरके मालाकाः ॥१४४६।। . इस अवसपिणी काल में सभी तीर्थ कर स्वर्ग से चयकर इस भरत क्षेत्र में पाये थे । जब स्वर्ग चय करने को छह मास शेष रहे तब उस महान आत्मा के प्रति सुरसमुदाय को महान प्रादर भाव उत्पन्न होता था । सबकी दृष्टि भगवान की ओर केन्द्रित हआ करती थी। वर्षमान चरित्र में बताया है कि जिनेन्द्र होने काले उस स्वर्गवासी देव को देवता लोग प्रणाम करने लगते हैं । कगि ने महावीर भगवान् के जीब प्राणतेन्द्र के विषय में जो बात लिखी वह अन्य तीर्थ करों के विषय में भी उपयुक्त दिखती है।
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अध्याय : पाठवां ]
[ ६३१ __ भक्त्या प्रमुरतं मनसा सुरेन्द्र,
पासपरजीवितमेत्यदेवाः । तस्मादनंतरभवे वितनिष्यमाणं ।
___ तोर्थ भवोदधिसमुत्तरणकतीर्थम् ॥१५४६॥ जिनकी देवगति सम्बन्धी आयु के छह माह शेष रहे हैं तथा जो आगामी जन्म में संसार समुद्र को तरकर जाने के लिये अद्वितीय घाट सदृश धर्मतीर्थ का प्रसार करने वाले हैं, ऐसे उस प्राणतेन्द्र के समीप जाकर अनेक देवता अन्तःकरण पूर्वक प्रणाम करने लगे थे।
ऐसी भक्ति पूर्वक समाराधना पूर्णतया स्वाभाविक है। होनहार तीर्थ कर देवराज को स्वर्ग में देखकर देवों को देवियों को, तथा देवेन्द्रों को ऐसा हर्ष होता है कि जैसे सूर्य दर्शन से कमलों को आनन्द प्राप्त होता है और वे विकास को प्राप्त होते हैं । जिस प्रकार किसी जगह पर कोई अद्भुत निधि अल्प काल के लिये आ जाए तो उसके दर्शन के लिये सभी नागरिक गए बिना नहीं रहते। इसी प्रकार छह माह के पश्चात् स्वर्ग को छोड़कर मनुष्य लोक प्रयाण करने वाली उस परम पावन प्रात्मा की सभी देव अभिवन्दना द्वारा अपने को कृतार्थ अनुभव करते हैं। भगवान् छह माह पश्चात् स्वर्ग लोक का परित्याग करने वाले हैं, इसलिये इस पुण्यात्मा का अनुगमन करने वाली लक्ष्मी छह माह पूर्व ही स्वर्ग से मध्य लोक में रत्नवृष्टि के बहाने से जा रही थी। जिनसेन स्वामी की कल्पना कितनी मधुर है
संक्रन्दननियुक्तेन धनदेन निपातिता । साभात् स्वसंपदौत्सुक्यात प्रस्थितेयाप्रतो विभोः ।।१५४७।।
इन्द्र के द्वारा नियुक्त हुए कुबेर के द्वारा जो रत्नों की वर्षा हो रही थी, वह इस प्रकार शोभायमान होती थी; मानों जिनेन्द्र देव की संपत्ति उत्सुकतावश उनके आगमन के पूर्व ही आ गई हो ।
* पंचकल्याणक * तीर्थकरों के पंचकल्याण या पंचकल्याणक--तीर्थकर भक्ति में उनकी अनेक विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। वृषभादि महावीर पर्यन्त चौबीस. तीर्थंकरों. का प्रथम विशेषरा है, 'पंचमहाकल्याणसंण्णा ' वे पंच महान कल्याणकों को
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६३२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि प्राप्त हैं । अतएव प्रभु के पंच कल्याणका आदि के विषय में संक्षेप में प्रकाश डालना उचित प्रतीत होता है।
इस संसार को पंच प्रकार के संकटों अकल्यासों को आश्रय भूमि माना गया है । उनको द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव तथा भावरूप पंच परावर्तन कहते हैं। तीर्थकर भगवान के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान तथा मोक्ष का स्वरूप चितवन करने वाले सत्पुरुष को उक्त पंच परावर्तन रूप संसार में परिश्रम का कष्ट नहीं उठाना पड़ता है। उनके पुण्यजीवन के प्रसाद से पंच प्रकार के अकल्याण छूट जाते हैं। तथा यह जीव मोक्ष रूप पंचमगति को प्राप्त करता है । पंच अकल्याणों के प्रतिपक्ष रूप तीर्थकर के जीवन गर्भ जन्मादि पंच अवस्थाओं की पंच कल्याण' या अल्यारएक नाम से प्रसिद्धि है। इन पांच प्रसंगों पर समस्त इन्द्रादिक श्राकर महान् पूजा उत्सवों को करते हैं। इन उत्सवों को पंच कल्याणक कहते हैं ।
प्रश्न :- अयोध्यानगरी को रचना किस प्रकार है ?
उत्तर:- अयोध्या नगरी की रचना-जिनेद्र भगवान के गर्भ में आने के छह माह पूर्व से ही इस वसुन्धरा(भूमि )में भावी तीर्थंकर के मंगलमय आगमन की महत्ता को सूचित करने वाले अनेक कार्य सम्पन्न होने लगते हैं।
भगवान वृषभदेव के माता मरुदेवी के गर्भ में आने के छह माह पूर्व ही इन्द्र की आज्ञानुसार देवों ने स्वर्गपुरी के समान 'अयोध्या' नगरी की रचना की । उसे साकेता, विनीता तथा सुकोशलापुरी भी कहते हैं। उस नगरी की अपूर्व रमणीयता का कारण महाकवि जिनसेन स्वामी के शब्दों में यह था
स्वर्गस्यैव प्रतिच्छंदं भूलोकेऽस्मिन् निधियुभि ।। विशेषरमरणीयेव निममे सामरैः पुरी ॥१५४८॥
देवों ने उस नगरी को विशेष मनोहर बनाया । इसका कारण यह प्रतीत होता है कि देवताओं की यह इच्छा थी कि मध्यलोक में स्वर्ग की एक प्रतिकृति हो ।
उस नगरी के मध्य में सुरेन्द्र भवन से स्पर्धा करने वाला महाराज नाभिराज के निवासार्थ नरेन्द्र भवन की रचना की गई थी, उनकी दिवालों में अनेक प्रकार के दीप्तिमान मरिण लगे थे । सुवर्ण मय स्तंभों से वह समलंकृत था। पुष्प, मूगा, मुक्तादि की मालाओं से शोभायामान था । हरिवंश पुराण में लिखा है कि उस राजभवन का
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अध्याय : पाठवां । नाम 'सर्वतोभद्र' था। उसके ८१ मंजले थे, वह परकोटा; वापिका, उद्यानादि से शोभायमान था। हरिवंश पुराण के शब्द इस प्रकार है----
सर्वतोभद्र संशोऽसौ प्रासाबः सर्वतोमतः । सैकाशीतिपदः शालयपयुधानाचलंकृतः ॥१५४६॥ शांत भमयस्तंभो विचित्रमणिभित्तिकः पुष्पविद् मक्तादि मालाभि रूपशोभितः ।।१५५०॥
आदिनाथ भगवान जिस नगर में जन्म लेने वाले हैं, तथा जहां सभी देव, देवेन्द्र निरन्तर पाया करेंगे, उसको श्रेष्ट रचना में संदेह के लिये स्थान नहीं हो सकता है। इसका कारण महापुराणकार इस प्रकार प्रगट करते हैं
सुत्रामा सूत्रधारोऽस्याः शिल्पिनः कल्पजाः सुराः । वास्तुजातं मही कृत्स्ना सोद्धानास्कथं पुरी ।।१५५१॥ . .
उस जिनेन्द्रपुरी के निर्माण में इन्द्र महाराज सूत्रधार थे, कल्पवासी देव शिल्पी थे, तथा निर्माण के योग्य समस्त पृथ्वी पड़ी थी वह नगरी प्रशंसनीय कमों न. होगी? वह नगरी द्वादश योजन प्रमाण विस्तार युक्त थी। . .
जिनसेन स्वामी का कथन है-उस अयोध्या. नगरी में सब देवों ने हर्षित होकर शुभ दिन, शुभ मुहूर्त, शुभ योग तथा शुभलग्न में पुन्याहवाचन किया। जिन्हें अनेक सम्पदानों की परम्परा प्राप्त हुई है, ऐसे महाराज नाभिराज तथा महारानी मरदेवी ने हर्षित हो समृद्धि युक्त अयोध्या नगरी में निवास प्रारम्भ किया ।
विश्वदृश्वैतयोः पुत्रो जनितेति शतक्रतुः । तयोः पूर्जा व्यवसाच्चैरभिषेक पुरस्सरम् ।।१५५२॥
इन राजदम्पति के सर्वज्ञ पुत्र उत्पन्न होने वाले हैं, इसलिये इन्द्र ने अभिषेक पूर्वक उन दोनों की बड़ी पूजा की थी। ...
रनवृष्टि--भगवान के जन्म के १५ माह पूर्व से उस जन्म नगरी में प्रभात, मध्यान्ह, सायंकाल तथा मध्य रात्रि में चार बार साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा होती थी, इस प्रकार चौदह करोड़ रत्नों की प्रतिदिन वर्षा हुया करती थी। महापुराण व हरिवंशपुराण में लिखा है, कि यह रत्नवर्षा राजभवन में होती थी। वर्धमान चरित्र में कहा है कि तिर्यग्विज भंक नाम के देवगरण कुबेर की प्राज्ञा से चारों दिशाओं में साढ़े तीन कोटि रत्नों की वर्षा करते थे । (सर्ग १७ श्लोक ३६)..:..
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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :-~मिनेन्द्र की मां को सेवा देवियां किस प्रकार करती हैं ?
उत्तर-जिनेन्द्र की जननी की अनेक देवांगनाएँ सेवा करती रहती हैं-धर्शशर्माभ्युदय में लिखा है कि उनमें से श्री देवी सेवार्थ, राज भवन में पहुँची और भगवान के पिता से कहने लगी--
निर्जरासुर-मरोरगेषु ते कोऽधुनापिगुरपसाम्यमच्छतिः । अग्रतस्तु सुतरा बनोपुरुस्तवं जगत्त्रयः पुरोर्भविष्यसि ।।१५५३॥
देव, असुर, मानव तथा नागकुमारों में अब कौन अापके गुणों से समानता को प्राप्त करेगा, क्योंकि अवप. त्रिलोक के गुरु के भी गुरु होंगे।
इसके पश्चात् वे देवियां माता की सेवा के लिए अन्तःपुर में प्रवेश करती हैं, अशा कवि ने लिखा है कि कुन्डल पर्वत पर निवास करने वाली चूलावती, मालनिका, नवमालिका, त्रिशिरा, पुष्पचूला. कनकचित्रा, कलकादेवी तथा वारुणीदेवी नाम की अष्टदिक्कन्यकाएं इन्द्र की आज्ञा से जिनमाता की सेवार्थ गई थी। इसी तरह जिनमाता की सेवा करने वाली ५६ देवांगनाओं के नाम१. कल्पवासी देवों के देवेन्द्र की इन्द्राणियाँ
१२ । इनमें से २. भवनवासी देवों के देवेन्द्र की इन्द्राणियाँ
२० । कुलाचल ३. व्यन्तर देवों के देवेन्द्र की इन्द्रारिणयाँ
१६ । वासिनी ४. ज्योतिष्क देवों के देवेन्द्र की इन्द्ररिणयाँ:
२ श्री देवी ५. कुलाचल-वासिनी श्री देवी आदि देवियाँ
ह्री देवी ति देवी
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कीतिदेवी, बुद्धिदेवी, लक्ष्मीदेवी ये छह: देवियां माता के गर्भ शोधन का। कार्य करती है। शेष, देवियां माता की सेवा प्रगट रूप से तथा प्रस्छन (गुप्त) रूप से करती रहती हैं, ऐसा पुराण में लिखा है।
प्रश्न:-तीर्थकर की माता का पूण्यः किस प्रकार का है ?
उत्तर:---जिन माता का अलौकिक पुण्य-पूर्व पश्चिम, दक्षिण, उत्तर इन चारों दिशाश्त्रों में सामान्य दृष्टि से समानला होते हुये भी पूर्व दिशा को विशेष महत्व इस लिये दिया जाता है कि भूमंडल में अपना उज्ज्वल प्रकाश प्रदान करने वाला भास्कर ।
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अध्याय : पाठकों ] को उसी दिशा में विशेष ज्योति की आभा दिखाई पड़ती हैं और वह दिशेश सबके नेत्रों को विशेष रमणीय लगती है। इसी प्रकार जिनेन्द्र जननी के गर्भ से दया धर्म के संय तो कर परमदेव का जन्म होने के पहले से हो अपू सौभाग्य और सातिशय पुण्य को प्रभा दृष्टि गोचर होती है । तीर्थकर भगवान के जन्म लेने के पहले से ही वह भावी जिनमाता मनुष्यों की तो बात ही क्या! देवेन्द्रों तथा इन्द्राणियों के द्वारा भक्ति पूर्वक सेवा तथा पूजा को प्राप्त करती है। सचमुच में जिनेन्द्र की जननी का भाग्य और पुथ्य अलौकिक है । नेमिचन्द्र प्रतिष्ठापाठ में गर्भ कल्याणक के प्रकरण में भगवान की. माता की आदर पूर्वक पूजा करते हुये यह पद्य लिखा गया है--
विश्वेश्वरें विश्वजगत्सवित्रि पूज्ये महादेवि महासतित्वाम् । सुमंगलेऽWः बहुमंगलार्थैः संभाययामो भवन प्रसन्ना ११५:५४॥
हैं विश्वेश्वरा, विश्वजगत सर्वित्रि पूज्या, महादेवी, महासती, सुमंगला, माता अनेक मंगल रूप पदार्थों के अंर्घ्य द्वारा हम आपकी समाराधना करते हैं.। हे माता हम पर प्रसन्न हो । गर्भ कल्याणर्क
गर्भ कल्याणक-- स्वर्ग से अवतरण के छह मास के समय में जैसेजैसे दिन न्यून हो रहे थे, वैसे-वैसे यहां अयोध्यापुरी की सर्वाङ्गीण श्री, वैभव, सुख आदि की वृद्धि हो रही थी । शीघ्र ही वह समय आ गया कि देवायुः का उदयः समाप्त हो गया । मनुष्यायु तथा मनुष्यगत्यानुपूर्व्य का उदय प्रा जाने से वह स्वर्ग की विभूति मानव लोक में पाई और उसने माता मरुदेवी को सोलह स्वप्न दर्शन द्वारा उक्त बात। की सूचना देने के साथ अपने मंगल जीवन की महत्ता को पहले से ही प्रकट कर दिया। जिनेन्द्रजननी के सोलह स्वप्नों का वर्णन
प्रत्येक जिनेन्द्र-जननी सोलह स्वप्नों को रात्रि के अंतिम प्रहर में दर्शन के पश्चात् अपने पतिदेव से उनका फल पूछती हैं, जिससे माता को अपार आनन्द प्राप्त होता है।
जिनमाता के सोलह स्वप्न--- १. गर्जना करने वाले सफेद हाथी को देखा, २: सफेद बल को देखा; ३. सिंह को देखा, ४. दोनों बाजू से दो कलशाभिषेक
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६३६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
कर रहे हैं ऐसी लक्ष्मी को देखा, ५. लटकती हुई दो फूलों की मालाएँ देखी ६. चान्दनी युक्त पूर्ण चन्द्रमा को देखा, ७. उदय होते हुए सूर्य को देखा, ८. सरोवर में क्रीड़ा करने वाले दो मीन देखे, C. कमलाच्छादित सुवर्णमय दो पूर्ण कलश देखे, १०. पद्म सरोवर देखा, ११. उन्मत्त लहर युक्त समुद्र देखा, १२. रत्न जड़ित सिंहासन देखा, १३. रत्नeft aisa देव विमान देखा, १४. नागेन्द्र भवन देखा, १५. प्रकाशमान रत्नराशि देखी, १६. धूमरहित प्रखर प्रखर अग्नि ज्वाला देखी ।
उन सोहल स्वप्नों के फल --
भगवान के पिता जिनेन्द्र जननी को स्वप्नों का फल इस प्रकार बताते - मुनिसुव्रत काव्य में लिखा है कि
नागेन तु गचरितो वृषतो वृषात्मा सिंहेन विक्रमघनो रमयाऽधिकश्रीः । स्वग्भ्यांघूतश्च शिरसाशशिनात्कम स् िसूर्येपदीप्तिमहितो ऋषतः सुरूपः ॥ कल्याणभाक्कलशतः सरसः सरस्तोगंभीर धोरुवधिनासनतस्तदीशः । देवाहिवास - मणिराश्यनलेः प्रतीतवेवोरगागमगुणोद्गमक मंदाहः ।।१५५५ ।।
हे देवी! राजेन्द्र दर्शन से सूचित होता है कि तुम्हारा पुत्र उच्च चारित्र वाला होगा, वृषभ दर्शन से धर्मात्मा सिंह दर्शन से पराक्रमी, लक्ष्मी से श्री संपन्न, माला से सबके द्वारा शिरोधार्य, चन्द्रमा से संसार के संताप को दूर करने वाला, सूर्य दर्शन से अधिक तेजस्वी, मत्स्य दर्शन से रूप संपन्न, कलश से कल्याण को प्राप्त, सरोवर से वात्सल्य भाव युक्त, समुद्र से गंभीर बुद्धि वाला, सिंहासन से सिंहासन का स्वामी, देव विमान से देवों का आगमन, नागभवन से नागकुमार देवों का आगमन, रत्नराशि से गुणों का स्वामी तथा अग्नि दर्शन से सूचित होता है कि वह पुत्र कर्मों का दाह करके मोक्ष को प्राप्त करेगा ।
माता मरुदेवी के स्वप्न में ऐसा दिखा था कि माता के सुख से वृषभ ने प्रवेश किया उसका फल यह था कि वृषभनाथ भगवान तुम्हारे गर्भ में प्रवेश करेंगे । अन्य तीर्थंकरों के श्रागमन के समय वृषभ के आकार के स्थान में गजाकार धारी शरीर का मुख्य द्वार से प्रवेश होता है । जिनेन्द्र जननी के समान सोलह स्वप्न अन्य सरागी देवताों की माताओं के नहीं आते हैं । भ्रष्टांग निमित्त विद्या में एक भेद स्वप्न विज्ञान है। नीरोग स्वस्थ व्यक्ति के स्वप्नों द्वारा भविष्य का बोध होता है । क्षेत्रचूडामणि
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अध्याय : आठवां ]
[ ६३७ काव्य में कहा है--'अस्वप्नपूर्व हि जीवानां नहि जातु शुभाशुभम् . जीवों के कभी भी स्वप्न दर्शन के बिना शुभ तथा अशुभ नहीं होता है । इस विद्या के ज्ञाताओं की प्राज उपलब्धि न होने से उस विद्या को अयथार्थ मानना भूल भरी बात है । तुलनात्मक रीति से विविध धर्मों का साहित्य देखा जाय, तो भावि जिनेन्द्र शिशु की श्रेष्ठता को सुचित करने वाले उपरोक्त स्वप्न जिनमाता के सिवाय अन्य माताओं को नहीं दिखते। इस स्वप्न दर्शन के प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक दृष्टि डालने वाले को जिनेन्द्र तीर्थकर की श्रेष्ठता स्वयं समझ में आये बिना न रहेगी। माता के गर्भ में पुण्यहीन शिशु के आने पर अमंगल स्वप्न पाते हैं । उपरोक्त स्वप्न दर्शन के पश्चात् तीर्थकर होने वाली आत्मा माता के गर्भ में भा गई।
उस समय समस्त सुरेन्द्रादि गर्भावतरण की बात विविध निमित्तों से जानकर अयोध्यापुरी में पाए । सब देवेन्द्रों तथा देवों ने नगर प्रदक्षिणा की और महाराज नाभिराज तथा माता देवी को गमगार किया : बड़े हर्म से गर्भ कल्याण का महोत्सव मनाया गया ।
भगवान स्वर्ग छोड़कर अयोध्या में आए हैं, किन्तु उनकी सेवा में तत्पर देवदेवी समुदाय को देखकर ऐसा लगता है कि स्वर्ग का स्वर्ग ही उन प्रभु के पीछे-पीछे वहां आ गया है। देवताओं का चित्त स्वर्ग लौट जाने को नहीं होता था, कारण जो निधि जिनेन्द्र भगवान के रूप में अब अयोध्या में आ गई हैं, वह अन्यत्र नहीं है । जिमेन्द्र भक्ति का अद्भुतफल
जिनेन्द्र भक्ति और इन्द्र-इन्द्राणी प्रादिका अद्भुत भाग्य---माता का मनोरंजन तथा सेवा का कार्य देवांगनाएँ करने लगी । इन्द्र का एक मात्र लक्ष है कि देवाधिदेव की सेवा श्रेष्ठ रूप में सम्पन्न हो । इस सेवा तथा भक्ति का पुरस्कार भी तो असाधारण प्राप्त होता है । बादिराज सूरि ने एकीभाव स्तोत्र में लिखा है - भगवन ! इन्द्र ने आपकी भली प्रकार सेवा की इसमें आपकी महिमा नहीं है । महत्त्व की बात यह है कि उसे सेवा के प्रसाद से उस इन्द्र का संसार परिभ्रमरण छूट जाता है। कहा भी है...
इन्द्रः सेवां तथ सुकुरुता कि तया श्लाघनं ते । तस्यैदेयं भवलयकरी श्लाध्यतामासनोति ॥१५५६॥
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६३८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण त्रिलोकसार में लिखा है कि सौधर्म स्वर्ग का इन्द्र उसकी इन्द्राणी. वहां से चयकर एक मनुष्य भव धारण करके मोक्ष को प्राप्त करते हैं । सौधर्मेन्द्र तो साधिक दो सागर प्रमाण देवायुपूर्ण होने के पश्चात् मनुष्य होकर मोक्ष जाता है, किन्तु उसकी पट्टदेवी शची पचपन पल्य प्रमाण वायु को भोग मनुष्य होकर शीघ्र मोक्ष जाती है । सागर प्रमाण स्थिति के समक्ष पचपन पत्य की प्रायु, बहुत कम हैं । इन्द्राणी के शोध मोक्ष जाने का कारण यह है कि जिनमाता और जिनप्रभु की सेवा का उत्कृष्ट सौभाग्य उसे प्राप्त होता है । इस कार्य से उसे अपूर्व विशुद्धता प्राप्त होती है। लौकान्तिक देव की पदवी महान हैं । उसकी स्थिति पाठ. सागर है । सर्वार्थसिद्धि के देव लोकोत्तर हैं। उनकी स्थिति ३३ सागर है । इतने लम्बे काल के पश्चात् उन महान् देघों को मोक्ष का लाभ मिलता है। शची का भाग्य अद्भुत हैं । स्त्रीलिंग छेदकर वह शीघ्र निर्वाण को प्राप्त करती है। जिनेन्द्र भगवान की भक्ति का प्रत्यक्ष उदाहरण इन्द्राणी है । त्रिलोक सार में कहा है--
सोहम्मो वरदेवी सलोमयाला क्विणमारा । लोयंतिय सव्वट्ठा लदो चुना गिधुदि जंति ॥१५५७।।
सौधर्मेन्द्र, शची, उनके सोम, आदि लोकपाल, दक्षिणेन्द्र, लौकान्तिक, सर्वार्थसिद्धि के देव वहां से चय करके नियम से मोक्ष जाते हैं. । .
जिनमाता के दोहला-माता की सेवा में तत्पर. श्री। अादि..देवियों ने वया। कार्य किया इसे महाकवि जिनसेनाचार्य कहते हैं
श्री ही तिश्च कीतिश्च बुद्धिलक्ष्म्यौ च देवताः । श्रियं लज्जा च धैर्य च स्तुति-बोधं च वैभवम् ।।१५५८॥
श्री देवी ने माता में श्री अर्थात शोभा की वृद्धि की। ह्री देवी ने ही अर्थात लज्जा की, धृतिदेवी ने धैर्य की, कोति देवी ने स्तुति की, बुद्धि देवी ने ज्ञान की वृद्धि, की तथा लक्ष्मी देवी ने विभूति बढ़ाई.।। - माता के, शरीर में गर्भ वृद्धि का बाह्य चिल न देखकर शंकितः मनको इससे शान्ति मिलती थी. कि जिन माता की तीव्र अभिलाषा त्रिभुवन के उद्धार रूप दोहला में हुआ करती है ! . . .
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अध्याय : पाठवां ] मुनिसुव्रत काव्य में लिखा है---
गर्भस्थ लिंग परमाणु करुपमप्येतदं गेष्वनवेक्ष्यरक्षी । जगत्त्रयोद्धारसदोहदेन परं नराणां बुबुधे ससत्वां ॥१५५६।।
अर्थात् भगवान के पिता ने जिनेन्द्र जननी के शरीर में परमाणु प्रमाण भी गर्भका कार्य के चिन्ह - देशाकर, के उल जगत्त्रयं के उद्धाररूप दीहला से उसे गर्भवती समझा। इस कथन से जिनेन्द्रजननी की शरीरस्थिति सम्बन्धी परिस्थिति का ज्ञान होता है, वैसे भगवान के गर्भ कल्याणक सम्बन्धी अपूर्व सामग्री को देखकर सभी जीव प्रभु के गर्भादतरण को भली प्रकार जानते थे और उनके जन्म महोत्सव देखने की ममता से एक-एक क्षण को ध्यानपूर्वक गिला करते थे । महापुराणकार ने लिखा है -
रत्नगर्भा धरा जाता हर्ष गर्भाः सुरोत्तमाः ।।.. क्षोभमायाजगद्गर्भो गर्भाधानोत्सवे विभोः ।।१५६०॥
अर्थात् भगवान के गर्भ कल्याणक के उत्सव के समय पृथ्वी तो रत्नवर्षा के कारण रत्नगर्भा हो गई है। सुरराज हर्ष गर्भ अर्थात् हर्ष पूर्ण हो गए हैं । जगत्गर्भ अर्थात् पृथ्वी मंडल क्षोभ को प्राप्त हुआ था अर्थात् संसार भर में प्रभु के गर्भावतरण की वार्ता विख्यात हो गई थी।
प्रश्न:-~-देवियां माता से क्या प्रश्न करती हैं और माता उनका क्या उत्तर देती हैं ?
उत्तर :-देवियों के माता से किये गये प्रश्नोत्तरों की रूपरेखा-गर्भस्थ शिशु जैसे-जैसे वर्धमान हो रहे थे, वैसे-वैसे माता की बुद्धि विशुद्ध होती जा रही थी। नववा माह निकट आने पर सेवा में संलग्न देवियों ने अत्यन्त गूढ़ तथा मनोरंजक प्रश्न माता से पूछना प्रारम्भ किया तथा माता द्वारा सुन्दर समाधान प्राप्त कर वे हर्षित होती थीं । देवियों ने पूछा--(महापुराण में लिखा है)
का पंजरमध्यास्ते कः पहषनिस्वमः ।
कः प्रतिष्ठा जोवानां कः पायोऽक्षरच्युतः ॥१५६१॥ __ माता ! पिंजरे में कौन रहता है ? कठोर झालंद करने वाला कौन है ? जीवों का प्राश्रय कौन है ? अक्षर ध्युतं होने पर भी पढ़ने योग्य क्या पाठं है । इन प्रश्नों का माता में उत्तर दिया--
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६४० ]
। गो. प्र. चिन्तामणि शुकः पंजरमध्यास्ते, काकः परुषनिस्वनः ।
लोकः प्रतिष्ठा जीवानां, श्लोकः पाद्योऽक्षरस्युतः ॥१५६२।।
कः पंजर मध्यास्ते'। इसमें 'शु' शब्द को जोड़करः माता कहती हैं, शुक (सोता) पिंजरे में रहता है। दूसरे प्रश्न के उत्तर में माता 'का' शबद जोड़कर कहती हैं कठोर स्वर वाला 'काक' पक्षी होता है। तीसरे प्रश्न के उत्तर में माता 'लो' शब्द को जोड़कर कहती हैं, जीवों का प्राश्रय 'लोक' है । चौथे प्रश्न के उत्तर में माता कहली हैं 'श्लो' शब्द को जोड़ने से अक्षर च्युत होने पर भी श्लोक पठनीय है । तीनों देशों के क्रम में शाम छ .. .
कः समुत्सृज्यते धान्ये, घटयत्यम्ब को घटम् ? वृषान्धशतिकः पापी बदाय रक्षरः पथक् ? ॥१५६३।।
माता ! धान्य में क्या छोड़ दिया जाता है ? घट को कौन बनाता है ? वृषान् अर्थात् चूहों को कौन पापी भक्षण करता है ? इसका उत्तर पृथक्-पृथक् शब्दों में बताइये जिनके प्रादि के अक्षर पृथक्-पृथक हों ?
__माता ने उत्तर दिया 'पलाल' धान्य में छोड़ा जाता है । 'कुलाल कुम्भकार घट को बनाता है 'बिडाल' चूहों को स्वाता है। इन उत्तरों में प्रारम्भ के दो शब्द पृथक्-पृथक् होते हुये अंत का अक्षर 'ल' सब में है। ..
प्रगट रूप से अनेक देवियां माता की बड़े विवेक पूर्वक सेवा करती थीं। महापुराण में यह महत्त्वपूर्ण कथन आया है
निगूढं च श्ची देवी सिषेवे लिसाप्सराः । मधोनाघ-विनाशाय प्रहिता सा महासती ॥१५६४॥
अपने समस्त पापों का नाश करने के लिये इन्द्र के द्वारा भेजी गई इन्द्राणी ___ अनेक अप्सरानों के साथ माता की गुप्त रूप से सेवा करती थी।
प्रभु की माता में प्रारम्भ से ही लोकोत्तरता थी। अब जिनेन्द्र के गर्भ में आने से वह सचमुच में जगत की माता या जगदम्बा हो गई । उसकी गरिमा का कौन वर्णन कर सकता है ?
प्रश्न :-गर्भ मे भगवान कैसे थे?.
उत्तर :-गर्भ कल्याणक के वर्णन के प्रसंग में माता के गर्भ में विराजमान तथा सूर्य सदृश शीघ्र ही उदय को प्राप्त होने वाले उन भगवान की अवस्था पर प्रकाश डालने वाला धर्मश भ्युदय का यह पद्य कितना भाव पूर्ण है ?
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अध्याय : पाठवां ]
[ ६४१ गर्भ बसन्नपि मलेरकलंकितांगो,.
ज्ञानत्रयं त्रिभुवनैक: गुतर्षभार । .. तुगोदयाद्रि गहनांतरितोपि धाम, .
किं नाम मुंचति कदाचम तिम्मरश्मिः ॥१५६५॥ . अर्थात्-वे जिन भगवान गर्भ में निवास करते हुए भी मल से अकलंक अंग युक्त थे, त्रिभुवन के अद्वितीय गुरु उन प्रभु ने मति, श्रुत तथा अवधि इन ज्ञानत्रय को धारण किया था । उन्नत उदयाचल के गहन में छिपा हुआ भी तिग्मरश्मि अर्थात् सूर्य क्या कभी अपने तेज को छोड़ता है ?
जन्मकल्याणक-प्राची दिशा के गर्भ में सूर्य सदृश जिन जननी के गर्भ में छिपे हुये वे धर्मसूर्य जिनेन्द्र भव्यों को अधिक हर्ष प्रदान कर रहे थे। किन्तु जिस समय उन प्रभु का जन्म हुआ, उस समय के अानन्द और शान्ति का कौन बर्णन कर सकता है ? अन्तःकरणों में सभी जीवों ने जिनेन्द्र जन्म-जनित ग्रानन्द का अनुभव किया । त्रिभुवन के सभी जोयों को सुख प्राप्त हुआ। जन्म के समय जननी को कोई कष्ट नहीं हुआ । देवियाँ सेवा में तैयार थीं। - उस समय नैसर्गिक वातावरण अत्यन्त रमणीय और सुन्दर हो गया । नभोमंडल अत्यन्त स्वच्छ था । मंद सुगन्ध पवन का संचार हो रहा था । आकाश से सुगन्धित पुष्पों की वर्षा हो रही थी। उससे प्रतीत हो रहा था कि समस्त प्रकृति प्राकृतिक मुद्रा को पार कर प्रात्मा की वैभाविक परिणति का त्याग कर अपनी प्राकृतिक स्थिति को ये जिनेन्द्र शीघ्र ही प्राप्त करेंगे, इसलिए सचेतन एवं अचेतन प्रकृति के मध्य एक अपूर्व उल्हास और प्रानन्द की रेखा दिखाई पड़ती थी।
प्रश्न-जन्म समय में कौनसे चिन्ह प्रकट होते हैं ?
उत्तर :--जन्म समय के चिह्न -महापुराण में जन्म के समय हुई मधुर __ बातों का इस प्रकार वर्णन किया है---
विशः प्रसत्ति मासेदुः प्रासोनिमलमम्बरम् । गुरणानामस्य धमल्यं अनुकत्तुं मिय प्रभोः ॥१५६६।।
उस समय समस्त दिशाएँ स्वच्छता को प्राप्त हुई थी और आकाश भी निर्मल हो गया था। उससे ऐसा प्रतीत होता था मानो भगवान के गुणों की निर्मलता का वे अनुकरण कर रहे हों। .... .
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३४२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिंग प्रजानां यवृधेहर्षः सुराविस्मयमाश्रयन् । अम्लानि कुसुमान्युसचैः मुमुचुः सुरभूरूहाः ॥१५६७॥
प्रजा का हर्ष बढ़ रहा था, देव आश्चर्य को प्राप्त हो रहे थे और कल्पवृक्ष ऊँचे से प्रफुल्लित पुष्पों की वर्षा रहे थे। .
अनाहताः पृथुध्वाना दध्वनुदिविजानकाः । - मृदुः सुगंधिशिशिरो मरुन्मंदं सदाबयौ ॥१५६८।।
देवों की दुन्दुभि अपने-आप ऊँचा शब्द करते हुये बज रही थीं । कोमल शीतल और सुगंधित पवन मंद-मंद बह रहा था।
प्रचचालमहीतोषात् नृत्यन्तीव चलगिरिः ।। उद लो जलधिनमगमत् प्रमदं परम् ।।१५६६।।
उस समय पहाड़ों को कंपित करती हुई पृथ्वी भी हिलने लगी थी। मानो आनन्द से नृत्य ही कर रही हो । समुद्र की लहरें सीमा के बाहर जाती थीं, जिससे सूचित होता था कि वह परम आनन्द को प्राप्त हुआ था। मुनिसुव्रत काव्य में लिखा है--
गृहेषु शंखाभवनामराणां, बनामराणां, पटलाः पदेषु । ज्योतिस्सुरागां सदनेषु सिंहाः, कल्पेषुघंटा: स्क्यमेवनेदुः ॥५५७०॥
प्रभु के जन्म होते ही भवनवासियों के यहां शंख ध्वनि होने लगी। व्यंतरों के यहां भेरीनाद होने लगा । ज्योतिषी देवों के यहां सिंहनाद तथा कल्पवासियों के यहां स्वयमेव घंटा बजने लगा।
उस समय सौधर्मेन्द्र का ग्रासन कंपित हुमा तथा उनका मस्तक भुक गया था, सौधर्मेन्द्र' चकित हो सोचने लगे कि यह किस निर्भय, कारहित, अत्यन्त बाल स्वभाव, मुग्ध प्रकृति, स्वछन्द भाव वाले तथा शीघ्र करने वाले व्यक्ति का कार्य है । हरिवंश पुराण में कहा है- ..
प्रासनस्य प्रकपेन, दथ्यो विस्मित धीस्तथा । सौधर्मेन्द्रश्चलन्मौलिभूत्वा मूर्धानमुमतम् ।।१५७१।।। अतिबालेन मुराधेल. स्वतंत्रणाशुकारिगा । निर्भयेन विशंकेन केनेदमप्यनुष्ठितम् ॥१५७२।।
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अध्याय : पाठयां ] इन्द्र महाराज पुन: चिन्ता निमग्न होकर विचार करते हैं
देवदानवचनस्यस्वपराकम शालिनः। . कथंचित्प्रतिकूलस्य यः समर्थः कदर्थने ।।१५७३।। इन्द्रः पुरंदरः शक्रः कथं न गरिणतोऽधुना ।" . सोऽहं कपयंतानेन सिंहासनमपितम् ॥१५७४।।.. .
अपने पराक्रम से शोभायमान भी देव-दानव समुदाय के किंचित् प्रतिकूल होने पर जो उनके दमन करने की सामर्थ्य धारण करता है, ऐसे शक्र, पुरन्दर, इन्द्र नामधारी मेरे अपित सिंहासन को कंपित करते हुये, उसने मेरी कुछ भी गणना नहीं की।
फिर सौधर्मेन्द्र के चित्त में एक बात उत्पन्न हुई कि तीनों लोकों में ऐसा प्रभाव तीर्थङ्कर भगवान के सिवाय अन्य में संभावनीय नहीं है - 'संभावयामि नेहेत्थप्रभावं भुवनत्रये प्रभु तीर्थकरादन्यम्' पश्चात् अवधिज्ञान द्वारा ज्ञात हो भैया कि भरत क्षेत्र में महाराज नाभिराज के यहां ऋषभनाथ तीर्थकर का जन्म हुआ है । तत्काल ही वह विस्मय भाव महान प्रानन्द रस में परिणित हो गया। 'जयतां जिन इत्युक्त्वाप्रगनाम कृतांजलिः' (१२८ सर्ग ८) जिनेन्द्र भगवान जयवंत हो ऐसा कहकर सात पैर जा हाथ जोड़कर जिनेन्द्र भगवान को परोक्ष रूप से प्रणाम किया। प्रश्न :---भगवान का जन्म लो अयोध्या में हुश्रा और उनके जन्म की सूचना
देने वाली वाद्य-ध्वनि स्वर्ग लोक में होने लगी। इन्द्रों के मुकुट झुक गये । इस विषय में क्या कोई वैज्ञानिक समाधान भी है या
नहीं ? उत्तर :--जिनागम में जगद्व्यापी एक पुद्गल का महास्कंध माना है, वह सूक्ष्म है । अाज के भौतिक शास्त्रज्ञों ने 'ईथर' नाम का एक तत्वं माना है, जिसके माध्यम से हजारों मील का शब्द रेडियो यन्त्र द्वारा सुनाई पड़ता है । इस विषय में आगम का यह आधार ध्यान देने योग्य है । तत्वार्थसूत्र में पुद्गल के शब्द, बन्ध आदि भेदों का उल्लेख करते हुए उसका भेद सुक्ष्मता के साथ स्थूलता भी बताया है। तत्वार्थ राजवार्तिक में लिखा है, 'द्विविध स्थौल्यमवगंतव्यं तत्रांत्यं जगद्व्यापिनि महास्कंधे ।' (अध्याय ५ सूत्र २४), दो प्रकार की स्थूलता कही गई है । पुद्गल की अन्तिम स्थूलता जगत् भर में व्याप्त महास्कन्ध में है। इस महास्कन्ध के माध्यम से
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६४४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरित
जिनेन्द्र जन्म की सूचना तत्काल संपूर्ण जगत को अनायास प्राप्त हो जाती है । इस महास्कन्ध तत्व का स्वरूप किसी भी एकान्तवादी सिद्धान्त में नहीं बताया गया है, कारण वे एकांतवाद अल्पक्षों के कथन पर आश्रित हैं, और जैन धर्म सर्वश के परिपूर्ण ज्ञान तथा तदनुसार निर्दोष वाणी पर अवस्थित है ।
प्रश्न : - इन्द्र की सात प्रकार की सेना कौन सी है ?
उत्तर :- इन्द्र की सात प्रकार की सेना - सिद्धान्तसार दीपक में लिखा है कि इन्द्र महाराज की सवारी के आगे-आगे सात प्रकार की सेना मधुर गीत गाती हुई चलती थी। अभियोग्य जाति के देवों ने गज, तुरंग आदि का रूप धारण किया था । देवगति नामकर्म का उदय होते हुये भी अल्प पुण्य होने के कारण उन अभियोग्य जाति के देवों को विविध प्रकार के वाहन आदि का रूप धारण करना पड़ता है । ऐसी ही दशा fafeoधिक देवों की हीनपुण्य होने के कारण होती है । वे अशुद्ध freurt न होते हुये भी शुद्रों • समान उच्च देवों से पृथक् गमनादि कार्य करते हैं । जिनेन्द्र जन्मोत्सव के समय उनका कहां स्थान रहता है, यह पृथक् रूप से उल्लेख नहीं किया गया है ।
तीन लोक के स्वामी तीर्थंकर का जन्म जानकर देवों की हाथी, घोड़ा, रथ गंधर्व, पदाति, बैल तथा नृत्य कारिणी रूप धारी सात प्रकार की सेना इन्द्र महाराज की आज्ञा से निकली । उस समय शोक, विषाद आदि विकारों का सर्वत्र प्रभाव हो गया था । सर्व जगत श्रानन्द के सिंधु में निमग्न था । शांति का सागर दिदिगंत में लहरा रहा था । इन्द्र की सात प्रकार की देव सेना तीर्थंकर आदि का गुणानुवाद तथा नृत्य गायन करती हुई चलती है। इस सम्बन्ध में यह कथन ज्ञातव्य है :---
सात प्रकार की देवसेना का स्वरूप
a a free गुण किस, स्वर में गाते हुये चलते थे ?
. पहली --- गजरूप धारी देवों की सेना
षडज स्वर में विद्याधर कामदेव श्रादि का गुणगान करती थी ।
दूसरी - तुरंगरूप धारी देवों की सेना ऋषभ स्वर में मांडलिक, महामांडलिक
तीसरी रथरूपधारी देवों की सेना
राजाओं का गुणगान करती थी । गांधार स्वर में बलभद्र नारायण,
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अध्याय : पाठवां
सात प्रकार की देवसेना का स्वरूप
वे देव किसका गुण किस स्वर में गाते
हये चलते थे?
प्रतिनारायण के बलबीर्य का गुणगान करती
थी, तथा सस्य करती जाती थी। चौथीं-पैदल रूपधारी देवों की सेना मध्यम स्वर में चक्रवर्ती की विभूति बल
वीर्यादि का गुणगान करती थी। पंचवीं--वृषभ रूपधारी देवों की सेना पंचम स्वर में लोकपाल जाति के देवों का
गुणानुवाद करती थी। चरम शरीरी मुनियों
का भी गुणगान करती थी। छठवीं-गंधर्व रूपधारी देवों की सेना धैवत स्वर में गणधर देव तथा ऋद्धिधारी
मुनियों का गौरवपूर्ण ज्ञान करती थी। सातवीं-नत्यकारिणी देवों की सेना निषाद स्वर में तीर्थंकर भगवान के
नियालीस गुरगों का और उनके पुण्य जीवन का मधुर गान करती थी। .
प्रश्न :-ऐरावत हाथी का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-ऐरावत हाथी--सौधर्मेन्द्र ने एक लाख योजन के ऐरावत हाथी पर शची के साथ बैठकर अनेक देवों से समलंकृत हो अयोध्या को प्रस्थान किया। ऐरावत गज का वर्शन अद्भुत रस को जागृत करता है। दैविक चमत्कार का वह अत्यन्त मनोज्ञ रूप था। विक्रिया शक्ति संपन्न देवों में कल्पनातीत शक्ति रहती है। . इनका शरीर औदारिक शरीर की अपेक्षा : अत्यन्त सूक्ष्म होता है। उस सूक्ष्म परिणमन प्राप्त बैंक्रियिक शरीर का स्थूल रूप दर्शन ऐरावत हाथी के रूप में होता
था । वह गज लौकिक गजेन्द्रों से भिन्न था । देवसामर्थ्य का सुमधुर प्रदर्शन था। . उस गज के बत्तीस मुख थे । प्रत्येक मुख में पाठ-पाठ दांत थे। प्रत्येक दात पर
एक-एक सरोवर था । प्रत्येक सरोवर में एक-एक कमलिनी थी। एक-एक कमलिनी में बत्तीस-बत्तीस कमल थे । कमल के प्रत्येक पत्ते पर बत्तीस-बत्तीस देवांगनाएँ मधुर .. नृत्य कर रही थीं। इस प्रकार २५६ दात, ८१६२ कमला; २६२१४४ कमल पत्र तथा
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६४६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण ५३८५६०८ देवांगनाएँ थीं । यही बात मुनिसुव्रत काव्य में इस प्रकार लिखी है :
द्वात्रिंशदास्यानि मुखेऽष्टता दंतेब्धिरम्धौ बिसिनी बिसिन्यां । द्वात्रिशदजानि छलानि चाब्जे द्वात्रिशदिद्विरदस्यरेजुः ॥१५७५॥ ..
ऐरावत का स्वरूप चिंतन करते ही बुद्धि जीवी मनुष्य में अद्भुत रस उत्पन्न हुये बिना न रहेगा । यदि वह सोचे कि स्थल रूपधारी छोटे दर्पण में बड़े-बड़े पदार्थ प्रतिबिंब रूप से अपना सुक्ष्मं परिणामन करके प्रतिबिम्बित होते हैं । छोटे से मेरा द्वारा बड़ी वस्तुओं का चित्र खींचा जाता हैं, तब इससे भी सूक्ष्म वैक्रियिक जक्ति धारी देवे रचित. ऐरावत हाथी का सद्भाव पूर्णतया समीक्षक बुद्धि के अनुरूप है। सम्यग्दृष्टि जीव की श्रद्धा पदाथों की. अचित्य शक्ति को ध्यान में रखकर ऐसी बातों को शिरोधार्य करने में संकोच का अनुभव नहीं करती है । सर्वज्ञ वीतराग हितोपदेशी भगवान के द्वारा कथित तत्व होने से ऐसी बातें सम्बकत्वी सहज ही स्वीकार करता है । इन बातों को काल्पनिक समझने वाला आगम की विविध शाखाओं का मार्मिक ज्ञाता होते भी सम्यकत्व शून्य ही स्वीकार करना होगा, कारण सम्यकत्वी जीव प्रवचन में कथित समस्त तत्वों को प्रमाणिक मानता है। एक भी बात को न मानने वाला प्रागम में मिथ्यात्वोदय के प्राधीन माना जाता है । प्रश्न :---इन्होंने वैभव के साथ अयोध्या नगरी में किस प्रकार प्रवेश
किया था? उत्तर :--सौंधर्मेन्द्र का अयोध्या नगरी में प्रवेश-सोलह स्वर्ग तक के समस्त देव, देवांगना तथा भवनत्रिक के देवताओं का समुदाय महान् पुण्यात्मा सौधर्मेन्द्र के नेतृत्व में प्राकाश मार्ग से श्रेष्ठ वैभव, प्रानन्द, प्रसन्नता तथा अमर्यादित उल्लास के साथ अयोध्या की ओर बढ़ रहा था। जिनसेन स्वामी ने लिखा है :
तेषामापतता यानविमानैराततं नमः । विष्टि पटलेभ्योऽन्यत्र स्वर्गान्तरमिवासजत् ।।१५७६।।
• उन पाते हुए, देवों के विमान और वाहनों से व्याप्त हुमा प्राकाश ऐसा प्रतीत होता था, मानों सठ पटल वाले स्वर्ग को छोड़कर अन्य स्वर्ग का निर्माण हुपा हो । महाराज. नाभिराज के राजभवन का प्रांगण सुरेन्द्रों के समुदाय से भर गया था। देवों की सेनाएँ अयोध्या. पुरी को घेर कर अस्थित हो गई थी । इन्द्र ने शंची को आदेश दिया कि तुम प्रसव मन्दिर में प्रवेश करो। माता को सुखमयी निद्रा
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अध्याय : आठवां ]
[ ६४७ में निमग्न करके उनकी गोद में मायामयी शिश् को रखकर जितेन्द्र देव को मेरु पर्वत पर अभिषेक के लिये लायो ।
शची ने सुरराज़ की आज्ञा का पालन करते हुये उस नरेन्द्र भवन के अन्तःपुर में प्रवेश किया और माता मरुदेवी के अंचल के भीतर बैठे हुये बाल स्वरूप जिनेन्द्र का दर्शन किया। उस समय इन्द्राणी के हृदय में ऐसा प्रानन्द पाया कि उसका वर्णन साक्षात् भारती (सरस्वती) के द्वारा भी शायद ही सम्भव हो । त्रिलोकी नाथ की मुखचन्द्रिका दर्शन कर शची के. नयन चकोर पुलकित हो रहे थे। हृदय कल्पनातीत प्रानन्द सिधु में निमग्न हो रहा था । शची ने बालजिनेन्द्र सहित माता को बड़े प्रेम, ममता, श्रद्धा तथा भक्ति पूर्वक देखा । अनेक बार भगवान और जिन माता की प्रदक्षिणा के पश्चात् त्रिभुवन के नाथ भगवान को बड़ी भक्ति से प्रणाम किया तथा जिनमाता की स्तुति करते हुये कहा :- . . .
त्यमम्ब भुवनाम्बासि कल्याणीत्वं सुमंगला । महादेवी स्वमेवाद्यत्वं सपुण्या यशस्विनी ॥१५७५७.'
हे माला ! तुम तो तीनो लोकों का कल्याण करने वाली विश्वजननी हो । कल्याणकारिणी हो । सुमंगला हो । महादेवी हो । यशस्विनी और पुण्यवती हो।
इस प्रकार जिनेन्द्र जननी के प्रति अपना उज्जवल प्रेम प्रदर्शित करते हुये माता को निद्रा निमग्न कर तथा उसकी गोद में मायामयी शिशु को रख कर शची ने जगद्गुरु को अपने हाथ में उठाया और परमानन्द को प्राप्त किया। जिनसेन स्वामी कहते हैं
तद्गात्र-स्पर्शमासाद्य सुदुर्लभमसौतदा। मन्येत्रिभुवनश्वयं स्वसाकृतमिवाखिलम् ॥१५७६।।
उस समय अत्यन्त दुर्लभ बालजिनेन्द्र के शरीर का स्पर्श कर शची को ऐसा प्रतीत हुआ मानों तीन लोक का ऐश्वर्य ही उसने अपने अधीन कर लिया हो । इन्द्राणी ने प्रभु को बड़े सादरपूर्वक लेकर इन्द्र को देने के लिये प्रसव मन्दिर के बाहर पैर रखे, उस समय भगवान के प्रागे अष्ट मंगल द्रव्य अर्थात् छत्र, चामर, ध्वजा, कलश, सुप्रतिष्टक (लोना), भारी, दर्पण तथा पंखा धारण करने वाली दिककुमारी देवियाँ भगवान् की उत्तम ऋद्धियों के समान गमन करती हुई प्रतीत होती थीं । इसके अमन्तर इन्द्राणी ने देवाधिदेव को सुरराज के करतल में सौंपा । कहा भी है
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६४८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
ततः करतले देवी देवराजस्य तं न्यधात् । बार्कमये सानो प्राचीवप्रस्फुरन्मणौ ॥१५७॥
जिस प्रकार पूर्व दिशा प्रकाशमान मणियों से शोभायमान उदयाचल के शिखर पर बाल सूर्य को विराजमान करती है, उसी प्रकार इन्द्राणी ने बालजिनेन्द्र को इन्द्र के करतल में विराजमान कर दिया ।
प्रश्न - इन्द्र के सहस्र नेत्र बनाने का वर्णन किस प्रकार है ?
उत्तर-- इन्द्र के सहस्त्र नेत्र- प्रभु की अनुपम सौन्दर्यपूर्ण मनोज्ञ छवि का दर्शन कर सुरराज ने सहस्त्र नेत्र बनाकर अपने आश्चर्य चकित अन्तःकरण को तृप्त करने का प्रयत्न किया, किन्तु फिर भी वह आश्चर्य एवं श्रानन्द के सिन्धु में श्राकण्ठ निमग्न रह आया । जिस समय सुरराज ने जिनराज को गोद में लिया, उस समय जय जयकार के ऊच्च स्वर से दशों दिशाएं पूर्ण हो रही थीं । इन्द्र ने प्रभु की स्तुति करते हुये कहा --
त्वदेव जगतां ज्योतिस्त्वं देव जगतां गुरुः ।
त्वं देव जगतां धाता त्वं देव जगतां पतिः ॥ १५८०॥
हे भगवन् ! आप विश्वज्योति स्वरूप हो । जगत् के गुरु हो । त्रिभुवन को मोक्ष मार्ग प्रदर्शन करने वाले विधाता हो । हे देव ! श्राप समस्त जगत् के नाथ हो । प्रश्न- भगवान् को पांडुक शिला की ओर कैसे ले आते हैं ?
उत्तर-- पाण्डुक शिला को ओर प्रस्थान - भगवान् को अपनी गोद में लेकर सुरराज ऐरावत पर विराजमान हुये । उस समय ऐसा दिखता था मानो निषध पर्वत के अंक में बालसूर्य शोभायमान हो रहा हो । उस परम दृष्य की क्षण भर अपने मन में कल्पना करने से भी हृदय में एक मधुर रस की धारा प्रवाहित हुये बिना न रहेगी । fter की गोद में त्रिलोकीनाथ हैं । ईशान स्वर्ग का सुरेन्द्र धवल वर्ष का छत्र लगाएं हैं । सनत्कुमार तथा महेंद्र नामक इन्द्र युगल देवाधिदेव के ऊपर चामर दुरा रहे हैं । उस लोकोत्तर दृश्य की कल्पना भी जब हृदय में पीयूष धारा प्रवाहित करती है, तब उस समय के दृश्य के साक्षात् दर्शन से जीवों की क्या मनः स्थिति हुई होगी। जिनसेनाचार्य कहते हैं-
वृष्ट्वा तदानों भूति कुदृष्टिमरुतोऽपुरे ।
सन्मार्गरुचिमानुः इन्द्रप्राभाव्य मास्थिताः ॥ १८१
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अध्याय : पाठवां ।
उस समय की विभूति का दर्शन करके अनेक मिथ्यादृष्टि देवों ने इन्द्र को प्रमाण रूप मानकर सम्यक्त्व भाव को प्राप्त किया था।
ज्योतिषी मण्डल का उल्लंघन- महापुराण में लिखा है 'मेरु पर्वत पर्यन्त नील मरिणयों से निर्मित सोपान पंक्ति ऐसी शोभायमान हो रही थी, मानों नील वर्ण दिखने वाले नामउल में भक्तिवश सीढ़ियों रूप परिणमन कर लिया हो। .
समस्त देव समाज ज्योतिष पटल को उल्लंघन कर जब ऊपर बढ़ा । तब वे देव तारापों से समलंकृत गगन मण्डल को ऐसा सोचते थे मानों यह कुमुदिनियों से शोभायमान सरोबर ही हो । ज्योतिष पटल में ७६० योजन पर ताराओं का सद्भाव है।
ताराओं के आगे है योजन ऊंचाई पर केतु (अरिष्टं) का विमान है । केतु के आगे १ योजन ऊंचाई पर सूर्य का , सूर्य ७६
, राहू का , राहु , १
चन्द्र कार ॥ ३
नक्षत्रों का , नक्षत्रों ३
दुध का बुध , ३
शुक्र का , गुरु का ,
मंगल.का , मंगल , ४
शनैश्चर का , इस प्रकार समतल भूमि (चित्रा भूमि) से ७६० योजन ऊंचाई पर ११० योजन में ज्योतिषी देवों का आवास है । ये ज्योतिषी देव मेरु पर्वत से ११११ योजन दूर रहकर मेरु की परिक्रमा करते हैं ।
जब जिमनाथ को लेकर देव और देवेन्द्र समुदाय ज्योतिर्लोक के समीप से जा रहा था, उस समय के दृश्य को ध्यान में रखकर कवि अहंदास एक मधुर उत्प्रेक्षा करते हैं...
मुग्धाप्सराः कापि चकार सर्वानुत्फुल्लवनान् किलधूप चूर्णम् । .. रथाग्रवासिन्यरुपेक्षिपंति हसतियांगारचयस्य बुब्स्या ॥१५८२॥ किसी भोली अप्सरा ने सूर्य सारथि को अंमार की राशि-समझ कर उस पर
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६५० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
धूप चूर्ण डाल कर सबको हास्य युक्त कर दिया था ।
सुमेरु की ओर जिनेन्द्र देव को लेकर जाता हुआ समस्त सुर समाज ऐसी श्राशंका उत्पन्न करता था; मानो जिनेन्द्र के समवशरण के समान व स्वर्ग भी भगवान के साथ-साथ विहार कर रहा है ।
प्रश्न-- - सुमेरु पर्वत और पांडुक शिला का वर्णन किस प्रकार है ? उत्तर - सुमेरु पर्वत और पांडुक शिला - जम्बूद्वीप सम्बन्धी मेरु का नाम सुदर्शन मेरा है | उस की नींव एक हजार योजन प्रमाण है । इस मेरु के नीचे भद्रशालवन है । ५०० योजन ऊंचाई पर नन्दन वन है । पश्चात् ६२५०० योजन की ऊंचाई पर सौमनस वन है । वहां से ३६ हजार योजन ऊंचाई पर पांडुक वन है । इन चारों वनों में चारों दिशाओं में एक-एक प्रकृत्रिम चैत्यालय है । एक मेरु सम्बन्धी चारों वनों के सोलह चैत्यालय हैं । विजय, अचल, मंदर तथा विद्युन्माली नाम के चार मेरु के सोलह-सोलह जिनालय मिलकर पांच मेरु सम्बन्धी ८० जिनालय श्रागम में कहे गये हैं । इन अकृत्रिम जिनालयों में अत्यन्त वैभव पूर्ण जीवित जिनधर्म समान मनोश १०८ प्रतिबिम्ब शोभायमान होते हैं । राजवार्तिक में लिखा है । 'प्रत् प्रतिमा अनाद्यनिधना प्रष्टशत संख्या वर्णनातीत विभवाः मूर्ता इव जिनधर्मा विराजन्ते (पृष्ठ - १२६)
यह मेरु पर्वत नीचे से ६१ हजार योजन पर्यन्त नाना रत्न युक्त है । उसके ऊपर यह सुवर्णव संयुक्त हैं । त्रिलोकसार में कहा है-
नानारत्नविचित्रः एकषष्टिसहस्त्र केषु प्रथमतः ।
ततउपरि मेरुः सुवर्णवर्णान्वितः भवति ।। १५८३ ॥
मेरु सम्बन्धी जिनालयों की देव, विद्याधर तथा चारण ऋद्धिधारी मुनीश्वर वन्दना करके ग्राम निर्मलता प्राप्त करते हैं । इस सुबर्ण मेरु की ४० योजन ऊंची चूलिका कही गई हैं । उस चूलिका से बालाग्रभाग प्रमाण दूरी पर प्रथम स्वर्ग का ऋविमान या जाता है। इस एक लाख योजन ऊंचे मेरु के नीचे से अधोलोक प्रारंभ होता है । मेरु प्रसारण मध्य लोक माना गया है । यही बात राजवंर्तिक में इस प्रकार वरिणत है- 'मेहरयं त्रयाणां लोकानां यानदंड: । तस्याधस्तादधोलोकः । चूलिकामूलादूर्ध्व-मूर्ध्वलोकः मध्यमप्रमाणस्तिर्य विस्तीर्ण स्तिर्यग्लोकः । एवं च कृत्वाऽत्यर्थनिर्वचनं food | ataai मिनातीति मेरुरिति' (पृष्ठ - २७१ )
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अध्याय : आठवां ।
मेरु के ऊपर जो पांडुक बन है, उस वन में ईशान दिशा में सुवर्ण वर्णवाली पांडुक शिला है । यह शिला १०० योजन लम्बी ५० योजन चौड़ी और ८ योजन ऊंची होते हुये अर्ध चन्द्रमा के समान आकार वाली है । उस पर भरत क्षेत्रोत्पन्न तीर्थकर का अभिषेक होता ।
आग्नेय दिशा में रजत (चांदी) वर्णवाली पांडुक शिला ऊपर निर्दिष्ट पांडक शिला के समान है । उस पर पश्चिम विदेह के तीर्थंकर का अभिषेक होता है।
नैत्रत्य दिशा में तप्तसुवर्ण वर्गवाली रक्तशिला ऊपर निर्दिष्ट शिला के समान है । उस पर ऐरावत क्षेत्र के तीर्थ करों का अभिषेक होता है।
वायव्य दिशा में रक्तवर्स (लाल) वाली रक्तकम्बला ऊपर निर्दिष्ट शिला के समान है, उस पर पूर्व विदेह के तीर्थ करों का अभिषेक होता है । यह कथन त्रिलोकसार ग्रन्थ में किया हैं .
पांक-पांडकंबल-रक्ता तथा रक्तकंबलास्याः शिलाः । ईशानात् कांचन हत्य-तपनीय-रुधिरनिभाः ॥१५८४॥ भरतापरवियेहैरावतपूर्व विदेह जिन निबद्धाः । पूर्वापरदक्षिरसोत्तरदीर्घा अस्थिरस्थिरभूमि मुखाः ।।१५८५॥ मध्ये सिंहासनं जिनस्य दक्षिणतंतु सौधर्म । उत्तरमीशानेन्द्र भद्रासनमिहत्रयं वृत्तम् ॥१५८६॥ सत्वार्थ राजवातिक में यह कश्चन पाया है कि-- 'तस्यां प्राच्यां दिशि पांडुकशिला' अर्थात् पूर्व दिशा में पांडुकशिला है। "अपाच्या पांडुकबलाशिला' अर्थात् दक्षिण दिशा में पांडुकम्बला शिला है। 'प्रतीच्या रक्तकम्बलशिला' अर्थात् पश्चिम दिशा में रक्तकम्बला शिला है। 'उदीच्या प्रतिरक्तकम्बला' अर्थात् उत्तर में अतिरक्तकम्बल शिला है ।
अकलंक स्वामी ने यह भी लिखा है कि पूर्व दिशा के सिंहासन पर पूर्व विदेह वाले तीर्थ करों का, दक्षिण दिशा में भरत बाले तीर्थ करों का, पश्चिम दिशा में पश्चिम विदेहोत्पन्न तीर्थ करों का तथा उत्तर के सिंहासन पर ऐरावत क्षेत्रोत्पन्न तीर्थ करों का चारों निकाय के देवेन्द्र' सपरिवार तथा महाविभूति पूर्वक क्षीरोदधि जल से भरे १००८ कलशों से अभिषेक करते हैं।
पौरस्त्ये सिंहासने पूर्वविदेजान्, अपाच्ये भरसजान्, प्रतीच्ये अपरविदेहमान,
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६५२ ]
. [ गो. प्र. चिन्तामणि उदीच्ये ऐरावतजास्तीर्थरांचतुनिकाय देवाधिपाः सपरिवाराः महत्याविभूत्या क्षीरो. दवारिपरिपूर्णररष्टाधिकसहस्त्रकनककलशै र भिषिचंति (पृष्ठ-१२७)
तिलोयपण्ाति में लिखा है कि पांडुकशिला में सूर्य के समान प्रकाशमान उन्नतसिंहासन है। सिहासन के छोनों पात्र में निवारत्नों से रचे गये भद्रासन विद्यमान हैं, जिनेन्द्र भगवान को मध्यसिंहासन पर विराजमान करते हैं । सौधर्मेन्द्र दक्षिण पीठ पर और ईशान इन्द्र उत्तर पीठ पर अवस्थित होते हैं (अ. ४ गाथा १८२२ से १८२६)
प्रश्न-जन्माभिषेक का वर्णन कैसा है ?
उत्तर--पांडुक शिला पर भगवान का अभिषेक--अब सौधर्मेन्द्र मेरु पर्वत के शिखर पर जिनेन्द्र भगवान के साथ पहुँच गये । महापुराण में कहा है कि सुरन्द्र ने बड़े प्रेम से गिरिराज सुमेरु की प्रदक्षिणा की और पांडुकवन में ईसान दिशा में स्थित पांडुक शिला पर भगवान् को पूर्व मुख विराजमान किया । सभी देवगण जन्मोत्सव द्वारा जन्म सफल' करने के हेतु पांडुकशिला को घेर कर बैठ गये । देवों की सेना आकाश रूपी आंगन को व्याप्त कर ठहर गई । देव दुन्दुभि बज रही थी। अप्सराएं नत्यगान में निमग्न थीं । अत्यन्त प्रशान्त, भव्य तथा प्रमोद परिपूर्ण वातावरण था । बहुत से देव क्षीर सागर का जल लाने के लिये कमर बांधकर सुवर्णमय कलशों को लेकर श्रेणीबद्ध होकर खड़े हो रहे थे। जो स्वयं पवित्र हैं, और जिसमें दुग्ध सदृश स्वछन्द सलिल है, भगवान के शरीर का स्पर्श करने के लिये ऐसे क्षीर सागर जल के सिवाय अन्य जल योग्य नहीं है ऐसा विचार कर ही देवों ने पंचम क्षीर सागर के जल से पंचगमति को प्राप्त होने वाले जिनेन्द्र के अभिषेक करने का निश्चय किया था। .
प्रश्न :-क्षीरसागर की विशेषता का वर्णन किस प्रकार है ?
उत्तर :-क्षीर सामर की विशेषता के विषय में त्रिलोकसार का यह कथन ध्यान देने योग्य है---
जलयरजीवा लवणे कालेयंतिम सयंभुरमणेय । कम्ममहीपहिबद्ध सहि सेसे अलयरा जीवा ॥१५८७।।
अर्थात्--लवण समुद्र, कालोदधि समुद्र, अन्तिम स्वयंभूरमरण समुद्र ये कर्मभूमि से सम्बद्ध हैं । इन समुद्रों में जलचर जीव पाए जाते हैं। शेष समुद्रों में जलचर जीव नहीं हैं।
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अध्याय : पाठवां ।
इससे यह विशेष बात दृष्टि में प्राती है कि क्षीर सागर का जल जलचर जीवों से रहित होने के कारण विशेषता धारण करता है । अभिषेक जल लाने से स्वर्ग निर्मित कलश पाठ योजन गहरे, उदर में चार मोजन तथा मुख पर एक योजन चौड़े । 'मुक्ता फलांचितग्रीवा: चन्दनद्रवचिताः' अर्थात् दे घिसे हुये चन्दन से चर्चित थे तथा उनके कंठ भाग मुक्ताओं से अलंकृत थे ।
सौधर्मेन्द्र ने अभिषेक के लिये प्रथम कलश उठाया । ईशानेन्द्र ने सघन चंदन से चर्चित दूसरा भरा हुआ कलश उठाया । और जय जय शब्द करते हुये सौधर्मेन्द्र ने प्रभु के मस्तक पर प्रथम ही जल धारा छोड़ी, उस समय करोड़ों देवों ने भी जय जयकार के शब्दों द्वारा महान कोलाहल किया । भगवान का रक्त धदल वर्ण का था । क्षीर सागर का जल भी उसी वर्ण का है । अतएवं उस जल द्वारा जिनेन्द्र देव का अभिषेक बड़ा सुन्दर प्रतीत होता था ।
प्रश्न :- भगवान की शक्ति कैसी है ?
उत्तर :- तीर्थकर भगवान के अतुल बल का प्रदर्शन--भगवान में अतुल बल था। विशाल कलशों से गिरी हुई जलधारा से बाल जिनेन्द्र को रंचमात्र भी बाधा नहीं होती थी। यह देख अनेक देवगण विस्मय में निमग्न हो गये थे ।
महावीर भगवान का जब मेरु पर इन्द्रकृत अभिषेक सम्पन्न होने को था, उस समय सुरेन्द्र के चित्त में एक शंका उत्पन्न हुई थी कि भगवान का शरीर छोटा है, कहीं बड़े-बड़े कलशों के द्वारा किया जाने वाला महान अभिषेक प्रभु के अत्यन्त सुकुमार शरीर को संताप उत्पन्न न करे । भगवान ने अवधिज्ञान से इस बात को समझ कर इन्द्र के संदेह को दूर करने के लिये अपने पैर के अंगूठे के द्वारा उस महान गिरिराज को हिला दिया था, उससे 'प्रभावित होकर इन्द्र ने वर्धमान तीर्थकर का नाम 'वीर' रखा था। प्राचार्य प्रभाचन्द्र ने वृहत्प्रतिक्रमण की संस्कृत टीका में उपरोक्त कथन इन शब्दों में स्पष्ट किया है, 'जन्माभिषेके च लघुशरीरदर्शनादाशांकितवृत्तेरिद्रस्म स्वसामर्थ्यख्यापनार्थ पादांगुष्ठेन मेरु संचालनादिन्द्रेण 'वीर' इति नामकृतम्' (पृष्ठ १६ प्रतिक्रमणग्रन्थत्रयी)।
वर्धमान चरित्र में उक्त प्रसंग का इस प्रकार निरूपण किया है... तस्मिन् तदा शुवतिकंपितशैलराजे घोरणाविष्ट सलिलात्पृथुकेऽप्यास्त्रम् । इन्द्रादयस्तृणमिवैकपदे निपेतुः वीर्यनिसगंजमनन्तमहो जिधानां ।।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
अर्थात् - जिस समय इन्द्र ने बालजिनेन्द्र का अभिषेक किया, उस समय नासिका में जल का प्रवेश होने से बालजिनेन्द्र को छींक आ गई। इससे मेरू पर्वत कंपित हो गया और इन्द्र आदिक देव गण तृण के समान सहसा गिर पड़े। जिनेश्वर के स्वाभाविक अपरिमित बल हैं ।
यह प्रभाव देखकर इन्द्र ने प्रभु का नाम 'वीर रखा था । पद्मपुराण का यह कथन भी ध्यान देने योग्य हैपादांगुष्ठेन यो
मेरुमनायासेनाकम्पयत् ।
सेभे नाम महावीर इति नाकालयाधिपात् ॥। १५८८ ॥
अर्थात् भगवान वर्धमान प्रभु ने बिना परिश्रम के पैर के अंगुष्ठ के द्वारा मेरु को कंपित कर दिया था, इसलिए देवेन्द्र ने उनका नाम 'महावीर' रखा था । यथार्थ में तीन लोक में जिन भगवान की सामर्थ्य के समान दूसरे की शक्ति नहीं होती है। मेरु शिखर पर किया गया महाभिषेक भगवान् जिनेन्द्र की बाल्य अवस्था में भी अपार सामर्थ्य को प्रकट करता है ।
इस प्रसंग में रत्नाकर कवि का यह कथन स्मरण योग्य है- 'हे रत्नाकराarrer ! देवेन्द्र पकी सेवा में अपने ऐरावत हाथी को अर्पण कर गौरव को प्राप्त करता है । वह अपनी इन्द्राणी से आपके गुणगान कराता है । आपके अभिषेक के लिए देवताओं की सेना के साथ शक्ति पूर्वक सेवा करता है | श्रद्धापूर्वक छत्र धारण करता है, नृत्य करता है । पालकी उठाता है। जब इन्द्र की ऐसी मार्दव भावपूर्ण पररणति है,
तब कीट को अहंकार धारण करना कहां तक उचित है ? ( रत्नाकर शतक पद्य - १ )
प्रश्न : --- बाल भगवान के वस्त्राभूषण कहां से श्राते हैं ?
उत्तर : -- तीर्थंकर भगवान के वस्त्राभूषण श्रेष्ठ रीति से त्रिलोक चूड़ामणि जितेन्द्र का जन्माभिषेक होने के पश्चात् इन्द्राणी ने बालजिनेन्द्र को विविध आभूषणों तथा वस्त्रादि से समलंकृत किया । भरत तथा ऐरावत क्षेत्र के तीर्थंकरों के उपभोग में ग्राने वाले रत्नमय आभूषण सौधर्म तथा ईशान स्वर्ग में विद्यमान रत्नमय सीकों में लटकते हुये उत्तम रत्नमय करंडको अर्थात् पिटारों में रहते हैं । तिलोयपत्ति में इन पिटारों के विषय में लिखा है, 'सक्कादि पूजखिज्जा' अर्थात् ये इन्द्रादि के पूजनीय हैं। 'प्रादिहि' अर्थात् अनादि निधन हैं 'महारम्मा' अर्थात् महारमरणीय हैं ।' (अध्याय गाथा ४०३ भाग दूसरा ) के रत्नमय पिटारे वज्रमय द्वादश वारायुक्त
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अध्याय : आठवाँ 1 मानस्तम्भों में पाए जाते हैं । त्रिलोकसार में भी कहा है - 'सौधर्मद्विके तो मानस्तंभौ भरतरावततीर्थकर प्रतिबद्धो स्तायाम् ।' सानत्कुमार महेन्द्र स्वर्ग के मानस्तम्भों में पूर्वापर विदेह के तीर्थंकरों के भूषण रहते हैं। (त्रिलोकसार गाथा ५२२, ५२२) पांडकशिला से देवेन्द्र का प्रभु के साथ अयोध्या नगर में प्रागमन--
सुदर वास्त्राभूषणों से प्रभु को समलंकृत कर सुरराज ने अपने अंतःकरण के उज्ज्वल भावों को श्रेष्ठ स्तुति के रूप में व्यक्त किया । पश्चात् वैभव सहित वे देव देवेन्द्र ऐरावत हाथी पर प्रभु को विराजमान कर अयोध्यापुरी पाए । इन्द्र ने महाराज नाभिराज के सर्वतोभद्र महाप्रासाद में प्रवेश कर श्रीगृह के आंगन में भगवान को सिंहासन पर विराजमान किया । महाराज नाभिराज उसे प्रिय दर्शन भगदान को प्रेम से विस्तृत नेत्रयुक्त हो तथा रोमांचयुक्त होकर देखने लगे। इस समय जनक-जननी को प्रभु का दर्शन कर जो सुख प्राप्त हुआ, वह कौन बता सकता है ? तीर्थकर के जन्म से जब जगत् भर के जीवों को अपार आनन्द हुआ, तब उनके ही माता-पिता के श्रानन्द की सीमा बताने की कौन धृष्टता करेगा ? धर्मशर्माभ्युदय में लिखा है---
उत्संगभारोप्य समंगजं मृपः परिस्वजन्मीलित लोचनो बभौ। अंततिनिक्षिप्य सुखं वयुग हे कपाठयोः संघट्यन्निवद्वयम् ।।१५।
पिता ने अपने अंग से उत्पन्न अंगज अर्थात् पुत्र को गोद में लिया तथा प्रालिंगन किया। उस समय उनके दोनों नेत्र बंद हो गए थे । इन्द्र ने जब प्रभु का प्रथम बार दर्शन किया था, तब तो वह सहस्र नेत्रधारी बना था, किन्तु यहां त्रिलोकीनाथ के पिता ने मनुष्य को सहज प्राप्त चक्षुयुगल का उपयोग न ले उनको भी बंद कर लिया था, इसका क्या समाधान है ? इस शंका के समाधान हेतु महाकवि के पद्य का उत्तरार्ध ध्यान देने योग्य है । पिता ने भगवान के दर्शन जनित सुख को शरीर रूपी भवन के भीतर रखकर नेत्र रूपी कपाट खुमल को बंद कर लिया, जिससे वह हर्ष बाहर न चला जाय । कितनी मधुर तथा आनन्ददायी उत्प्रेक्षा है।
एक नरभव धारण करने के पश्चात् शीघ्र ही सिद्ध भगवान बनकर भगवान के साथ में सिद्धालय में निवास करने के सौभाग्य वाले इन्द्र की भक्ति विवेक तथा सद्विचार से परिपूर्ण थी। भगवान को पिता के कर कमलों में सौंपने के पश्चात् सुरराज भगवान की परिचर्या के हेतु समान रूप तथा वेष धारण करने वाले देव कुमारों को निश्चित कर स्वर्ग को चले गए।
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[ गो. प्र. चिन्तामरिय
३० तीर्थङ्करों को सहज प्राप्त जन्म काल के दस प्रतिशय गुण१. सौरव्य -- प्रत्यन्त सुन्दर शरीर होना । २. सौरभ --- अत्यन्त सुगन्धित शरीर होना ।
३. निःस्वेदत्व - पसीना रहित शरीर होना ।
४. निर्मलत्व --- मल-मूत्र रहित निर्मल शरीर होना ।
५. प्रियहितवादित्व - मधुर हित-मित प्रिय वचन बोलना | ६. अमित वीर्यता --- अनन्त बल-वीर्य होना ।
७. क्षोरगौर रुधिरत्व --- दूध के समान धवन रुधिर होना ।
८. सौलक्षण्य - शरीर पर १००८ उत्तम लक्षणों का धारण करना ।
६. समचतुरस्त्र संथान --- उत्तम आकार का शरीर होना ।
१०. वजू वृषभनाराच संहनन - वज्रमय शरीर होना ।
ये दश स्वाभाविक अतिशय तीर्थंकरों के जन्म ग्रहण से ही उत्पन्न हो
जाते हैं ।
'एवं त्थियरा जम्ममहरणादि उत्पवयं इस प्रकार तिलोघपति में लिखा है । (देखो भाग १ ० ४ गाथा ८६६-६६८ )
प्रश्न : ---तीर्थंकरों के छाल्यकाल में श्राहार है, परन्तु नीहार नहीं है, क्या काररण है ?
उत्तर :- तीर्थंकर भगवान के केवलज्ञान होने के पूर्व कबलाहार अर्थात् प्रन्न1. कहा भी हैपान ग्रहण होते हुए भी नीहार अर्थात् मलमूत्र नहीं होता तित्थयरा - तधियरा हलहरचक्की इ-वासुदेवाहि । वासुभोगभूमि प्रहारो रात्थि सीहारो ॥। १४६० ॥
प्रर्थात् मस् तीर्थंकर, उनके माता, पिता, बलदेव, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण तथा समस्त भोग भूमिया जीवों के श्राहार है, परन्तु नीहार नहीं है ।
3
इस गमवाय के पीछे यह वैज्ञानिक सत्य निहित है, कि तीर्थकर प्रादि विशिष्ट श्रात्मानों की जठराग्नि इस जाति की होती है, कि उसमें डाली गई वस्तु रस, रुधिर आदि रूप में परिणत हो जाती है । तत्त्व नहीं बचता है, जो व्यर्थ होने के कारण मलमूत्र रूप से निकाल दिया जाय ।
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अध्याय : पाठवां ]
[ ६५७ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि जब जठराग्नि मन्द होती है, तब मनुष्य के द्वारा गृहीत वस्तु से सार तत्त्व शरीर को नहीं प्राप्त होता है और प्रायः खाई मई सामन्त्री बाहर निकाल दी जाती है । इससे खूब खाते हुये भी व्यक्ति क्षीण होता जाता है। ठीक इसके विपरीत स्थिति उक्त महान् पुरुषों की होती है। शरीर में प्राप्त समस्त सामग्री का समुदाय रुविरादि रूप में परिणत हो जाता है ।
प्रश्न :-तार्थंकर की माता रजस्वला नहीं होती है। क्या कारण है ?
उत्तर :--जिन माता के शरीर में मल मूत्र नहीं होता है, तो यह सहज प्रश्न उत्पन्न हुआ करता है कि जिन माता रजस्वला होती है या नहीं ? इस शंका के निवारण निमित्त महापुरण का यह श्लोक ध्यान देने योग्य है----
सम्मता नाभिराजस्य पुष्पवत्यरजस्वला। तदा वसुन्धरा भेजे जिनमातुरनुक्तियां ॥१५६१॥
भगवान के गर्भावतरण के समय वह पृथ्वी भगवान की माता मरुदेवी का अनुकरण करती थी, क्योंकि माता मरदेवी महाराज नाभिराज को जिस प्रकार प्रिय थी, उसी प्रकार वह पृथ्वी भी प्रिय थी। माता पुष्पवती होकर भी रजस्वला नहीं होती थी, इसी प्रकार पृथ्वी भी रजस्वला अर्थात् धूलि युक्त न होकर पुष्पों से सुशोभित होने के कारण पुष्पवती थी।
प्रश्न :-तीर्थङ्कर के शरीर में श्वेत रक्त होने का रहस्य क्या है ?
उत्तर :- भगवान के शरीर में श्वेत आकार धारण करने वाला रुधिर होता है। इस विषय में यह बात गम्भीरता पूर्वक विचारणीय है कि माता के शरीर में अपने पुत्र के लिए स्नेह होने से क्षण भर में उसके स्तन में दुग्ध आ जाता है। रुक्मिणी ने प्रभुम्न को देखा था । जननी हृदय में नैसगिक स्नेह भाव उत्पन्न होने से उसके स्तनों में दुग्ध आ गया था । इस शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक व्यवस्था को ध्यान में रखने से यह बात अनुमान करना सम्यक् प्रतीत होती है कि जिनेन्द्र भगवान के रोम रोम में समस्त जीवों के प्रति सच्ची कहाणा, दया तथा प्रेम के बीज परिपूर्ण हैं । तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध करते समय दर्शन विशुद्धि भावना भाई गई थी। दूसरों शब्दों में उसका यह रहस्य है कि भगवान के विश्व प्रेम के वृक्ष का बीज बोया था, जो वृद्धि को प्राप्त हुआ है और केवलज्ञान काल में अपने कल द्वारा समस्त जगत को सुख तथा शान्ति प्रदान करेगा। एकेन्द्रिय बनस्पति तक प्रभु के विश्व प्रेम की भावना
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
रूप जल से लाभ प्राप्त करेगी । इसी से केवलज्ञान की उल्लेखनीय महत्वपूर्ण बातों में सौ योजन भूमि में पृथ्वी धान्यादि से हरी भरी हो जाती है । भगवान का हृदय संपूर्ण जीवों को सुख देने के लिए जननी के तुल्य है । समन्तभद्र स्वामी ने भगवान पार्श्वनाथ स्तवन में उन्हें 'मातेव बालस्य हितानुशास्ता' बालक के लिए कल्याणकारी अनुशासनकर्त्री माता के समान होने के कारण माता तुल्य कहा है । प्राणी मात्र के दुःख दूर करने की भावना तथा उसके योग्य सामर्थ्य और साधन सामग्री समन्वित मातृतस्क जिनेन्द्र के शरीर में रुधिर का होना होकर की
उत्कृष्ट कारुणिक वृत्ति तथा महत्ता का परिचायक प्रतीत होता है ।
शरीर संबंधी विद्या में प्रवीण लोगों का कहना है कि महान बुद्धिमान, सदाचारी, कुलीनतादि संपन्न व्यक्तियों के रक्त में रक्तवर्णीय परमाणु पुंज के स्थान में धवलवरणीय परमाणु पुंज विशेष पाये जाते हैं । आज के असदाचार प्रचुर युग के शरीर शास्त्रज्ञ वर्तमान युग के होनावरण मानवों के रक्त को शोधकर उपरोक्त विचार पूर्ण सामग्री प्रस्तुत करता है । यदि यह कथन सत्य है, तो तीर्थंकर भगवान के शरीर के रुधिर की धवलता को स्थूलरूप से समझने में सहायता प्राप्त होती है ।
एक बात और है भगवान् ग्रारम्भ से ही सभी भोगों के प्रति आसक्ति रहित लालिमा हैं, अतएव विरक्त आत्मा का रक्त यदि विरक्त अर्थात् विगत रक्तापना, शून्यता से संयुक्त हुआ हो तो इसमें माश्वर्य की कोई बात नहीं है । विरक्तों के आरध्य देव का देह सचमुच में विरक्त परमाणुत्रों से ही निर्मित मानना पूर्ण संगठन है । सरागी जगत के लोगों का शरीर विषयों में प्रतुरक्त होने से क्यों न रक्त वर्ण का होगा 1
भगवान का रोम-रोम विषयों से विरक्त था । इतना ही नहीं उनकी वाणी विरक्तता अर्थात् वीतरागता का सदा सिंहनाद करती थी । मौन स्थिति में उनके शरीर से ऐसे परमाणु बाहर जाते थे, जिससे उज्जवल ज्योति जगे, इसी अलौकिकता के कारण सौधर्म इन्द्र सदा प्रभु के चरणों की शरण ग्रहण करता है। भगवान के हृदय में, विचार में, जीवन में जैसी विरक्तता थी, वैसी ही उनके रुधिर में विरक्तता थी । इन्द्र भी चाहता था कि प्रभु को अंतः बाह्य विद्यमान विरक्तता मुझे भी प्राप्त हो जाए। वैसे देवों के शरीर में भी विश्वतता है, किन्तु ग्रांतरिक विरक्तता के बिना
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अध्याय : पाठवां ]
[ ६५६ बाह्य विरक्तता शव का शृंगार मात्र है। परम प्रौदारिक शरीर धारी होकर अंतः बाह्य विरक्तता के धारक तीर्थकर ही होते हैं। सरागी शासन में इस विरक्ता की कल्पना नहीं हो सकती; यह बात तो वीतरागी शासन में ही बताई जा सकती है। वैभव शून्य मानव वैभव के शिखर पर स्थित श्रेष्ठ प्रात्मानों की कल्पना भी नहीं कर सकता है।
भगवान में प्रारम्भ से ही विरक्तता है, इसका प्राधार यह है कि वे भगवान् जब माता के गर्भ में आने के समय से लेकर अाठ वर्ष की अवस्था के होते है, तो वह भगवान सत्पुरुषों के योग्य देश संयम को ग्रहण करते हैं । प्रादिपुराण में लिखा है :--
स्वायुराद्यष्टवर्षेभ्यः सर्वेषां परतो भवेत् । उदिताष्टकषायाणां तीर्थेशां देशसंयमः ॥१५६२।।
सब तीर्थङ्करों के अपनी आयु के प्रारम्भ से आठ वर्ष के आगे से देशसंयम होता है, क्योंकि उनके प्रत्याख्यानावरण तथा संज्वलन कषायें उदयावस्था को प्राप्त है । यदि प्रत्याख्यानावरण कषाय का उदय न हो तो वे महाव्रती बन जाते ।
सतोऽस्य भोगवस्तूनां साकल्येपि जितात्मनः । वृत्तिनियमितकाभूदसंख्येय गुरण निर्जरा ॥१५६३॥
यद्यपि इन जिनेन्द्र देव के योग्य वस्तुओं की परिपूर्णता थी, तथापि वे जितात्मा थे, और उनकी प्रवृत्ति नियमित रूप से ही होती थी, इससे असंख्यात गुरणी कर्मों को निर्जरा होती थी। प्रश्न :-तीर्थरों के शरीर पर रहने वाले १००८ सुलक्षणों की
नामावली क्या है ? उत्तर :- भगवान का जीवन अंतः बाह्य सौन्दर्य का अपूर्व केन्द्र था । सामुद्रिक शास्त्र की दृष्टि से भी भगवान का पौद्गलिक शरीर १००८ लक्षणों से समलंकृत होने के कारण अत्यन्त महत्वपूर्ण धा, महापुराण में लिखा है कि भगवान के शरीर में, १ श्री वृक्ष (मारियल का वृक्ष-बिल्ववृक्ष), २. शंख, ३. कमल, ४. स्वस्तिक (साथिया), ५. अंकुश, ६. तोरण, ७. चमर, ८. श्वेत-छत्र (धवल छत्र), ६. सिंहासन (सिंह-पीठ), १०. ध्वजा (पताका), ११. मीन युगल (दो मोन), १२. दो कुभ, १३. कच्छप (कर्म), १४. चक्र, १५. समुद्र, १६. सरोवर,
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- AAMKinHEIGLAMINimadimanamainalisammu
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[ गो. प्र. चिन्तामणि १७. विमान (देव विमान), १८. भवन (नागेन्द्र भवन), १६. हाथी, २०. मनुष्य, २१. मनुक्षी (स्त्री), २२. सिंह, २३. बाग, २४, धनुष, २५. मेरु (महामेरू), २६. इन्द्र (देवेन्द्र), २७, देवांगना, २८. पुर (पट्टण), २६. गोपुर, ३०. चन्द्रमा, ३१. सूर्य, ३२. उत्तम घोड़ा, ३३. पंखा, ३४, बांसुरी (मुरली), ३५. बीणा, ३६. मृदंग, ३७ मालाएं (दो पुष्प माला), ३८. रेशमी वस्त्र, ३६. दुकान, ४०. शेखर पट्ट-शीर्षाभूषण (मुकुट-किरीट) ४१. हार (कंठिका वली मौक्तिक माला) ४२. पदक (चूड़ामरिग), ४३. ग्रेवयक, ४४. प्रालम्ब, ४५. केयूर (भुजबन्द बाजूबन्द}, ४६. अंगद, ४७. कटिसूत्र (करधनी), ४८. दो मुद्रिका (पवित्र अंगूठी), ४६. कुन्डल कर्ण भूधरण, ५०. कर्णपुर, ५१, दो बकरण (कड़ा), ५२. मंजीर (नूपुर-घुघरू), ५३. कटक, ५४. पट्ट (भाल पट्ट), ५.५. सूत्र (ब्रह्म सुत्र), ५६. फल भरित उद्यान, ५७. पके वृक्षों से सुशोभित खेत (फल भार से नन्न हुई शाली का खेत), ५८. रत्नदीप, ५६. बज्र, ६०. पृथिवी, ६१. लक्ष्मी, १२ सरस्वती, ६.३. कामधेनु, ६४. वृषभ (बैल), ६५. चूड़ामरिण, ६६. महानिधियां, ६७, गृहांग कल्प वृक्ष, ६.. भाजनांग क०, ६६. बोजनांग क०, ७०. पानांग (मद्यांग), ७१. वस्त्रांग क०, ७२. भूषणांग क०, . ७३. माल्यांग (कुसुमांग) क०, ७४. दीपांग क०, ७५. ज्योतिरांग क०, ७६. सूर्याङ्ग क०, ७७. सुवर्ण, ७८, जम्बूवृक्ष, ७६. गरुरण, ८०. नक्षत्रों का समूह, ५१. तारागरण, ८२. राजभवन, ८३. अंगारक (शनि.) गृह, ८४. रविग्रह, ८५. चन्द्रग्रहः ८६. मंगलग्रह, २७. बुध, ८८. गुरु, ८६..शुक्र, ६०, राहु, ६१. केतु, १२. सिद्धार्थ वृक्ष, ६३. अशोक वृक्ष, ६४. स्ल सिंहासन, ६५. छत्रत्रय, ६०. भामंडल (प्रभामंडल), ६७. दिव्यध्वनि, ६८. पुष्पवृष्टि, ६६. चमर, १००. देवदुन्दुभि, १०१. झारी (शृगार), १०२, कलश, १०३. ध्वजा, १०४. छत्र, १०५. स्वास्तिक (सुप्रतिष्ठ-साथिया), १०६. चमर, १०७. दर्पण, १०८, पंखा (ताल व्यंजन तालवृन्त), इस प्रकार १०६. मुख्य लक्षण तथा मरिकादि, १०० व्यंजन अर्थात् सामान्य लक्षण, ये सब मिलकर १००८ सुलक्षण विद्यमान थे। (देखो महा पुल पूर्व १५२ लोक ३७ से ४४) ।
प्रश्न :--क्या निमित्त ज्ञान सच्चा है ?
उत्तर :--निमित्त ज्ञान के शास्त्र और शास्त्रज्ञ-महाकवि कहते हैं---इन । मनोहर और श्रेष्ठ लक्षणों से व्याप्त हुआ भगवान का शरीर ज्योतिषी देवों से भरे
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अध्याय : पाठवां ]
हुए आकाशरूपी आंगन के समान शोभायमान हो रहा था।
अभिरामं वपु तुंः लक्षौरभिजितः । ज्योतिभिरव संच्छम्न गमन प्रांगसं बभौ ॥१५६४।।
आज इस महान् विज्ञान के ज्ञाताओं का प्रायः लोप हो गया, इससे इस विद्या के महत्व को भी लोग भूलने लगे। जिन धरसेन महामुनि ने भूतबलि तथा पुष्पदन्त साधु युगल को महाकर्म प्रकृति प्राभूत रूप परमागम का उपदेश दिया था, वे सामुद्रिक विचा, स्वरशास्त्र, स्वप्न शास्त्र आदि में पारंगत थे । धबलग्रन्थ पृष्ठ ६७ में घरसेन आचार्य को 'अटुगमहारिणमित्त पारएग' शब्द द्वारा अष्टांग निमित्त विद्या के पारगामी कहा है । यह विज्ञान विद्यानुवाद नाम के दशमपूर्व में संग्रहीत है।
प्रश्न-लांछन या चिन्ह किसको कहते हैं ?
उसर--सीर्थङ्करों के जन्मकाल के दश अतिशयों में से "सौलक्षण्य" नामक एक अतिशय है, उस अतिशयानुसार उनके शरीर पर रहने वाले १००८ लक्षणों में से उनके दाहिने पर के अंगूठे में जो चिन्ह रहेगा उसको 'लांछन' या 'चिन्ह' कहते हैं । लिखा भी है
अम्मरणकाले जस्सदु दाहिरणपायम्मि होइ जो चिण्हं ।। तं लपखरण पाउत्तं प्रागमसुत्ते सुजिगदेहं ॥१५६४॥ प्रश्न-तीर्थकर भगवान गृहस्थावस्था में अवधिज्ञान जोड़ते थे या नहीं ?
उत्तर--तीर्थंकरों के जन्म से मति-श्रुत अवधि ये तीन ज्ञान रहते हैं । वे गृहस्थ अवस्था में अवधिज्ञान जोड़ते रहते थे। इस विषय में सोमसेन कृत लघुपनपुराण में लिखा है कि
पट्टहिस्तसामुक्तो भुक्ति करोति बुःखधाम् । सट्टष्टावधिनेत्रेण निनः प्राह जनान प्रति ॥१५६५॥
अर्थात्-एक दिन २०३ मुनिसुव्रत नाथ तीर्थ कर गृहस्थावस्था में अपने पुत्र के साथ सभा मण्डप में विराजमान थे। वहां जया पट्टहाथी का प्रसंग आया था, उस समय उन्होंने अपने अवधि ज्ञान से सब सभासदों को पट्टहाथी का वृतांत कह दिया था । अतः उत्तर पुराण में भी यह कथन पाया है
वनस्मरणसंत्यक्तकबालग्रहणं नृपः । . निरीक्ष्याथिनेत्रविज्ञानात्मनोगलम् ॥१५६६॥
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प्र. चिन्तामणि
तत्पूर्वभवसाय कौवहनगर नृणाम् । प्रवोचवृत्तमित्युच्चैः स मनोहरया गिरा ॥१५६७॥
वन का स्मरण कर मुख्य हाथी ने खाना पीना छोड़ दिया था। उसे देखकर सुनिसुव्रत महाराज ने अपने अवधिज्ञान रूपी नेत्रों से उसके पूर्व भव का सम्बन्ध जान लिया और मनोहर तथा ऊची वाणी से कौतुहल युक्त लोगों को वे समझा दिये थे । इससे स्पष्ट होता है कि तीर्थ कर भगवान गृहस्थावस्था में अवधिज्ञान का उपयोग करलें हैं। प्रश्न---तीर्थयार (छयस्थ) प्रभु की और मुनियों का मेल होता है या नहीं ?
और मुनिश्वरों की वन्दना करते या नहीं ? उत्तर-- उनका मेल होता हैं, परन्तु तीर्थ कर मुनीश्वरों की वन्दना नहीं करते हैं । एक दिन श्री कुन्थुनाथ चक्रवर्ती (तीर्थकर) वन विहार करके लौटे । अपने नगर में आते समय रास्ते में एक प्रातापनयोग साधु को देखकर उन्होंने अपनी तर्जनी अंगुली से मन्त्री को बताया था। उस समय मन्त्री ने मुनि को नमस्कार किया था, और तीर्थ कर (छअस्थ) प्रभु से पूछा था हे देव ! ऐसे दुर्धर तप करने से साधुओं को कौनसा फल मिल सकता है ? तब प्रसन्न मुख भगवान ने कहा था कि यदि कर्म नाश करे तो इसी भव मोक्ष चले जायेंगे । कदाचित् कर्म का नाश न हो तो इन्द्रादिक पद प्राप्त कर वे कर्म का नाश कर मुक्त हो जायेंगे ।
अशग कवि कृत वर्धमान चरित्र सर्ग १७ श्लोक ६२ में लिखा है कि विजय, संजय नाम के दो चरण मुनियों को किसी एक बात के अर्थ के विषय में सन्देह उत्पन्न होने के बाद अकस्मात् उनको श्री वर्धमान स्वामी का दर्शन होते ही वे निःसन्देह हो गये थे। तब अन्होंने बड़ी भक्ति भाव से वर्धमान स्वामी को 'सन्मति' यह नाम देकर वहां से प्रस्थान किया था । इसलिये तीर्थरों की (छदास्थ अवस्था में) मुनियों से भेंट होती है, यह सिद्ध होता है।
प्रश्न- सपकल्याणक का वर्णन किस प्रकार है ?
उत्तर---तपकल्याणक या परिनिष्क्रमण- भगवान की मोह निद्रा दूर होने से वे भली प्रकार जाग चुके । अब उन्हें कर्मचोर नहीं लूट सकते हैं । जगने के पूर्व में भगवान पिता होने के रूप में भरत, बाहुबली ब्राह्मी सुन्दरी को देखते रहे । पितामह होने के रूप में मरीचि आदि पौत्रों पर दृष्टि रखते थे। अयोध्या की जनता को प्रजा
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अध्याय : पाठवां
[ ६६३ पति होने से आत्मीय भाव से देखते थे । अब उनकी सम्पूर्ण दृष्टि बदल गई । एक चैतन्य आत्मा के सिवाय अन्य सब पदार्थ पर प्रतिभा समान होने लग गए । मोतिया बिन्दु वाले मनुष्यों के नेत्र में जाला पाने से वह अंध सदृश हो जाता है । जाला दूर होते ही उसे प्रकाश प्राप्त होता है । अपना पराया पदार्थ दिखने लगता है।
नीलांजना को अवलम्बन मनाकर मुधी समाज ने भगवान के नेत्रों को स्वच्छ करने में बड़ी चतुरता से काम लिया। भगवान के जन्म होने पर उस इन्द्र ने आनन्दित होकर सहस्त्र नेत्र बनाये थे । आज भी सुरराज मोह जाल दूर होने से आध्यात्मिक सौन्दर्य समन्वित विरक्त आदिनाथ प्रभु की अपने ज्ञान नेत्रों द्वारा नीरांजना करते हुये, आरती उतारते हुये अपूर्व शांति तथा प्रसन्नता का अनुभव कर रहा है। इसका कारण यह कि इन्द्र महाराज की जिनेन्द्र में जो भवित थी वह मोहान्धकार से मलिन नहीं थी। वह सम्यक्त्व रूप चिन्तामरिण रत्न के प्रकाश से दैदीप्यमान थी।
अब तक विरक्त तथा दिव्य विषयों में आसक्त रहने वाले देवर्षि रूप से माने जाने वाले लौकान्तिक देव अपने स्थान से ही जिनेन्द्र प्रणाम करते थे। सुदर्शन मेरु के शिखर पर सारे विश्व को चकित करने वाला जिनेन्द्र भगवान का जन्माभिषेक हुया ! वहां सभी चारों निकाय के देव विद्यमान थे, केवल इन विरक्त देषियों का अभाव था । ये वैराग्य के प्रमी कोकिल सदृश थे, जिन्हें अपना मधुर गीत प्रारम्भ करने के लिये बैराग्य पूर्ण बसन्त ऋतु चाहिये थी, जिरासे सब कष्टों का सदा के लिये अन्त हो जाता है । योग्य बेला देखकर ये देवर्षि भगवान के समीप आए।
प्रभु को प्रणाम कर कहने लगे, "भगवन ! आपने मोह के जाल से छूटने का जो पवित्र निश्चय किया है वह आप जैसी उच्च आत्मा की प्रतिष्ठा के पूर्णतया अनुरूप है। अब तो धर्म तीर्थ प्रवर्तन के योग्य समय आ गया है, "वर्तते कालो धर्म तीर्थ प्रवर्तने ।"
हे नाथ ! चारों गति रूप महाटवी में दिशाओं का परिज्ञान न होने से भटकते हुए जीवों को मुक्तिपुरी में पहुंचने का सुनिश्चित मार्ग बताइये । प्रभो ! अब
आपके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर सत्पुरुष जन्म मरण के श्रम से से शून्य होकर बिलोक के शिखर पर जहां अविनाशी प्रामन्द है, पहुचकर विश्राम करेंगे ।
इसके अनन्तर चारों निकाय के देव पाए। उन्होंने क्षीर सरोवर के जल से भगवान का अभिषेक किया । जन्म कल्याणक के समय निर्मल शरीर वाले बाले जिनेन्द्र
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६६४ ]
[ मो. प्र. चिन्तामणि के शरीर का महा अभिषेक हुआ था। आज वैराग्य को प्राप्त मोक्षपुरी को जाकर अपने प्रात्म-साम्राज्य को प्राप्त करने को. उद्यत प्रभु के अभिषेक में भिन्न प्रकार की मनोवृत्ति है । आज तो ऐसा प्रतीत होता है कि बाह्य शरीर के अभिषेक के बहाने से ये सुरराज अन्तःकरण में जागृत ज्ञान ज्योति से समलंकृत प्रात्मदेव का अभिषेक कर रहे हैं। यह अभिषेक बाल रूप धारी तीर्थकर का नहीं है। यह तो सिद्ध वधू को वरण करने के लिये उद्यत प्रबुद्ध विरक्त जिनेन्द्र के शारीर का अन्तिम अभिषेक है । इसके पश्चात् इन बीतरागी जिनेन्द्र का अभिषेक नहीं होगा। आगे ये जिनेन्द्र सदा चिन्मयी विज्ञान गंगा में डुबकी लगाकर आत्मा को निर्मल बनावेंगे । अब तो भेद विज्ञान भास्कर उदित हो गया है। उसके प्रकाश में ये शरीर से भिन्न चैतन्य ज्योति देखकर उसे विशुद्ध बनाने के पवित्र विचार में निमग्न हैं।
दीक्षा पालकी-प्रात्म प्रकाश से सुशोभित जिन राज ने मार्मिक वाणी द्वारा सबको नग्न सत्य कहते हुए स्वयं अन्तःबाह्य नग्नमुद्रा धारण करने का निश्चय किया। वीतराग प्रभु अब 'सुदर्शना' . पालकी पर विराजमान हो गए । भूमि गोचरी राजाओं ने प्रभु को पालकी सात पैड तक अपने कन्धों पर रखी। विद्याधरों ने भी सप्तपद प्रमाण प्रभु की पालकी को वहन किया। इसके पश्चात् देवताओं ने प्रभु की पालकी कन्धों पर रखकर आकाश मार्ग द्वारा शीघ्र ही दीक्षावन को प्राप्त किया । यह सिद्धार्थ नाम का दीक्षा बन अयोध्या के निकट ही. था। भगवान का सारा परिवार प्रभु की विरक्ति से व्यथित हो रहा था । उसे देखकर ऐसा लगता था, मानो मोह शत्रु के विजयार्थ उद्योग में तत्पर भगवान को देखकर मोह की सेना ही रो रही है । चारों ओर बैराग्य का सिन्धु उद्वेलित हो रहा था। - प्रश्न--दीक्षा पालकी उठाने के प्रसंग पर क्षोभ की कल्पना करना उचित
है या नहीं?
उत्तर--कोई-कोई सोचते हैं भगवान की दीक्षा की बेला में उस प्रस्थान के पावन प्रसंग पर पालकी उठाने के प्रकरण को लेकर मनुष्यों तथा देवताओं में झगड़ा हो गया यह कल्पना अत्यन्त असंगत, अमनोज्ञ तथा अनुचित है। उस प्रसंग की गम्भीरता को ध्यान में रखने पर एक प्रकार से यह कल्पना सारशून्य ही नहीं अपवादपूर्ण भी प्रतीत हुये बिना न रहेगी। जहां विवेकी सौधर्मेन्द्र के नेतृत्व में सर्वकार्य सम्यक रीति से संचालित हो रहे हों। चक्रवर्ती भरत सदृश प्रतापी नरेन्द्र प्रजा के
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अध्याय : पाठयां
[ ६६५ अनुशासन प्रदाता हो और जहां भगवान के वैराग्य के कारण प्रत्येक का ममता पूर्ण हृदय विशिष्ट विचारों में निमग्न हो, वहां झगड़ा उत्पन्न होने की कल्पना तक अमंगल रूप है । सभी लोक विवेकी थे । अतएव संपूर्ण कार्य व्यवस्थित पद्धति से चल रहा था। सौधर्मेन्द्र लो एक सौ सत्तर कर्म भूमियों में एक सौ सत्तर तक की संख्या वाले अनेक तीर्थंकर के कल्याणकों के कार्य संपादन करने में सिद्धहस्त तथा अनुभव प्राप्त हैं । प्रतः स्वप्न में क्षोभ की कल्पना नहीं की जा सकती।
प्रश्न--भगवान की दीक्षा विधि का वर्णन किस प्रकार है ? .
उत्तर--दीक्षा विधि--भगवान सिद्धार्थ बन में पहुँकर पालकी से नीचे उतरे । हरिवंश पुराण में लिखा है
अवतीर्णः स सिद्धार्थी शिविकाया: स्वयं यथा । देवलोकशिरस्थाया दिवः सर्वार्थसिद्धिसः ॥१५६६।।
सिद्ध बनने की कामना वाले सिद्धार्थी भगवान ऋषभदेव देवलोक के शिर पर स्थित पालकी पर से स्वयं उतरे, जैसे वे सर्वार्थ सिद्धि स्वर्ग से अवतीर्ण हुये थे । अब मुमुक्षु भगवान मोहज्वर से मुक्त होकर प्रात्म स्वास्थ्य की प्राप्ति के हेतु स्वस्थता सम्पादक तपोवन के ही वातावरण में रह कर क्रमश: रोग मुक्त हो अविनाशी स्वा. स्थ्य को शीघ्र प्राप्त करेंगे । उन्होंने देख लिया कि सच्चा स्व तथा पर का कल्याण अपने जीवन को आदर्श (दर्पण) के समान बनाना है । मलिन दर्पण जब तक मल रहित नहीं बनता है, तब तक वह पदार्थों का प्रतिबिम्ब ग्रहण करने में असमर्थ रहता है, इसी प्रकार मोह मलिन मानव का मन त्रिभुवन के पदार्थों को अपने में प्रतिबिम्बित कराने में अक्षम रहता है । भगवान ने यह तत्व हृदयंगम किया, कि आत्मा की कालिमा को धोकर उसे निर्मल' बनाने के लिये समाधि अर्थात् आत्म-ध्यान की आवश्यकता है । अत: एक चित्त वृत्ति को स्थिर बनाकर मोह को ध्वंस करने के लिए ही ये प्रभु आवश्यक कार्य सम्पादन में संलग्न हैं।
तीर्थङ्कर भगवान के कार्य श्रेष्ठ कहे हैं, अतएव तपस्या के क्षेत्र में भी इनकी अत्यन्त समुज्जवल स्थिति रहती है । वैराग्य से परिपुर्ण इनका मन आत्मा की ओर उन्मुख है । अब वह अधिक बहिर्मुखता को आत्महित के लिए बाधक सोच रहे है, अपने समीप पाने वाली प्रजा को प्रभु ने कहा 'शोकत्यजत भोः प्रजा' और प्रजाजन तुम शोकभाव का परित्याग करो। तुम्हारी रक्षा के हेतु भरत को मैंने राजा का पद
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प्र. चिन्तामरिण
दिया है, 'राजा को रक्षर दक्षः स्थापितो भरतो मया ।' तुम भरत राजा की सेवा करना । भगवान ने एक बार पहले सर्वतोभद्र नरेन्द्र भवन परित्याग करते समय बन्धु वर्ग से पूछ लिया था, फिर भी उन जगत पिता ने सर्व इष्ट जनों को धैर्य देते हुये पुनः अनुज्ञा प्राप्त की।
उस वन में चन्द्रकान्त मरिंग की शिला देवों ने पहले से ही रख दी थी। इन्द्राणी ने अपने हाथों से रत्नों को चूर्ण कर उस शिला पर चौक बनाया । उस पर चन्दन के मांगलिक छींटे दिए गए थे। उस शिला के समीप ही अनेक मंगल द्रव्य रखे थे। भगवान उस शिला पर विराजमान हो गये। आसपास, देव, मनुष्य, विद्या धरादि उपस्थित थे।
भगवान ने वस्त्र, आभूषणादि का परित्याग किया । उस त्याग में आत्मा, देवता तथा सिद्ध भगवान साक्षी थे । महापुराण में लिखा है- तत् सर्वं विभुरत्याक्षीत नियंपेक्षं त्रिसाक्षिकम् ।
भगवान ने अपेक्षा रहित होकर त्रिसाक्षि पूर्वक समस्त परिग्रह का त्याग कर दिया। भगवान के केशलोंच करने का क्रम
__ केशलोंच-अनंतर भगवान ने पूर्व की ओर मुख करके पद्मासन होकर सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार किया और पंचमष्टि केशलोंच किया । पंच अंगलि निर्मित मुष्टि के द्वारा संपादित केशलोंच करते हुये वे पंचमगति को प्रस्थान करने को उद्यत परम पुरुष द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव तथा भावरूप पंचपरावर्तनों का मूलोच्छेद करते हुये प्रतीत होते थे।
तीर्थंकर भगवान के दाढ़ी मछ नहीं होते। वे सदा सोलह वर्ष की अवस्था वाले पुरुष के समान सुशोभित होते हैं, इसलिए भगवान केवल शिर के केशों का ही पंच मुष्टियों से लोच करते हैं। कहा भी है---
देवावि रणारयाविय भोगभुवा चक्कि-जिरपरिदारणं ।
सब्वे केसब-राम-कामवि ग कुचिर्ण हुति ।।१५६६।। '. अर्थातचनिकाय के देव, नरकी जीव, भोग भूमियाँ, चक्रवती, तीर्थंकर, नारायण, बलभद्र और कामदेव के मुख पर दाढ़ी-मूछो के बाल नहीं होते हैं ।
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[ ६६७
अध्याय आठवां ]
भावार्थ- -इन सबकी हमेशा नव-यौवन अवस्था बनी रहती है । उन सबके केश शोभारूप उत्पन्न होते हैं और शोभा रूप ही बढ़ते हैं । इसलिये उनके क्षौर कर्म ( बाल बनवाना ) नहीं होता है अर्थात् तीर्थंकरादि कभी बाल नहीं बनवाते हैं, क्योंकि इतने नहीं बढते कि उन्हें कटवाना पड़े !
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एक यह बात भी विचारणीय है कि यदि तीर्थंकरों के मुख दाढ़ी-मूंछ के बाल माने जाय तो उनकी प्रतिमाओं में भी दाढ़ी-मूंछ के बाल मानने पड़ेंगे; परन्तु ऐसा है नहीं, इस लिये तीर्थंकरों के दाढ़ी-मूंछ का प्रभाव समझना चाहिये। कहा भी है-केश |दिरोमहीनांगं श्मश्रुरेखाविवर्जितम् t
स्थितं प्रलम्बितहतं श्रीवत्सादयं दिगम्बरम् ।।१६००।।
अर्थात् प्रतिमाएँ ऐसी होनी चाहिये जिन पर केशादि रोम न हों दाढ़ी मूछ के बाल न हो खड़गासन हो, हाथ लटकते हों, श्रीवत्स का चिन्ह हो और दिगम्बर हों। भगवान का दीक्षा लेने के बाद मौन से रहने का रहस्य --
मौनव्रत का रहस्य -- केशलोंच के बाद अब ये प्रभु संचमुच में महामुनि, मामौनी, महादम, महाक्षम, महाक्षम, महाशील, महायज्ञ वाले तथा महामख बन गए----
महामुनिर्महामौनी महाध्यानी महादमः ।
महाक्षमः महाशीलो महायज्ञो महामखः । १६०१ ॥
इन महामुनि प्रभु का मौन अलौकिक है । इनका मौन अब केवलज्ञान की उपलब्धि तक रहेगा। इनकी दृष्टि बहिर्जगत् से अन्तर्जगत् की ओर पहुँच चुकी है। इसलिये राग उत्पन्न करने की असाधारण परिस्थिति आने पर भी इन्होंने वीतराग वृत्ति को frosis रखा। इनके चरणानुरागी चार हजार राजाओं ने इनका अनुकरण कर दिगम्बर मुद्रा धारण की थी । परिषहों को सहने में असमर्थ होकर व राजा भ्रष्ट होने लगे । और भी विशिष्ट परिस्थितियाँ समक्ष आई | दुर्बल मनोवृत्ति वाला मानव ऐसे प्रसंगों पर मोह के चक्कर में फंसे बिना न रहता, किन्तु ये जिनेन्द्र महामोनी ही रहे ।
सभी तीर्थंकर दीक्षा लेने के पश्चात् मौन व्रती रहते हैं । यदि ऐसा कठिन महाव्रत न होता तो भगवान ऋषभनाथ सहदीक्षित चार हजार राजाओं को क्षुधादि की पीड़ा सहन करने में असमर्थ होकर धर्म मार्ग को छोडते समय उनका स्थितिकरण
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६६८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि अवश्य करते, यदि प्रादिनाथ भगवान का मौन न रहता तो पाहार देने की विधि उनसे ज्ञात की जा सकती थी । इस सम्पूर्ण सामग्री को ध्यान में रखने से श्रेष्ठ तपस्या में उद्यत तीर्थीकरों की मौनी मानना उचित है, अनुभव तथा तर्क संगत है !
योग विद्या के अन्तस्तत्व को न जानने वाले भगवान के मौन का रहस्य नहीं जान पाते। उसके मर्म को अवगत करने वाले पूज्यपाद. महर्षि समाधि शतक में में कहते हैं
जनेभ्यो बाक् सतः स्पन्दो ममसचित्त विभ्रमाः । भवन्ति सस्माससर्ग जनयोगी ततस्त्यजेत् ॥१६०२॥
लोक संसर्ग होने पर वचन प्रवृत्ति होती है। उससे मानसिक विकल्प उत्पन्न होते हैं । इससे चित्त में विभ्रम होता है । इससे स्वयंवेदन (स्वानुभव) में संलग्न श्रेष्ठ संयमी जन संसर्ग त्याग करे।
पूज्यपाद स्वामी की वाणी के द्वारा भगवान की लोकोत्तर वीतराग वृत्ति पर प्रकाश पड़ता है। भगवान अध्यात्म के क्षेत्र में क्षण-क्षण में प्रगति करते जा रहे है । भगवान धुरिणत पौद्गलिया देह का परिणाम कर चिन्मूति मात्र रहना चाहते हैं । उनका लक्ष्य है वि देह बनना । इससे वे प्रात्मा में ही आत्म भावना करते हैं । इसका रहस्य समाधिशतक में इस प्रकार बताया गया है.---
देहान्तर्गते बोजं देहेऽस्मिन्नात्म भावना । बीजं विदेहनिष्परात्मन्येवात्म भावना ॥१६०३॥
एक शरीर को छोड़कर अन्य देह धारण का बीज शरीर में प्रात्म भावना है। विदेही बनने का अर्थात् शरीर रहित बनने का मूल कारण आत्मा में प्रात्मभावना है। भगवान के प्राश्रित रहने वाले पदाथों में पूज्यता कैसे मा जाती है---
तीर्थंकरों के आश्रित पदार्थों की पूज्यता--देवों ने भगवान के केशों को रत्नमय पिटारे में रखा तथा बड़े प्रादर पूर्वक उनको क्षीर समुद्र में क्षेपण किया। महापुराणकार कहते हैं
महतां संश्रयान्तनं यांतीज्या मलिना अपि । . मलिनैरपि यत्केशः पूजाबाप्ताश्रितः गुरुम् ॥१६०४॥
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अध्याय आठवां ]
[ ६६६
महापुरुषों का आश्रय ग्रहण करने से मलिन व्यक्ति भी सम्मान को प्राप्त करते हैं । यह बात यथार्थ है, क्योंकि भगवान के मस्तक का श्राश्रय पाने वाले मलिन केशों को भी देवों द्वारा पूज्यता प्राप्त हुई ।
वस्त्राभरणमाल्यानि यान्युन्मुक्तान्यधोशिना ।
तान्यप्यनन्यसामान्यां निष्युरत्युरस्युद्धति सुराः ॥ १६० ॥
भगवान वस्त्र आभूषण तथा माला आदि का त्याग किया था । देवों ने उन सबकी असाधारण पूजा की थी ।
fe car के नीचे भगवान ने मुनि पदवी अंगीकार करते हुये निर्ग्रथ दीक्षा की थी, यह वृक्ष चादर धन्य हो गया। आज भी वैदिक लोग उस वटवृक्ष को 'अक्षय वट' मानकर आदर करते हैं ।
महान आत्माओं के जीवन से सम्बन्धित होने वाले छोटे तथा लघु भी पदार्थ गौरव को प्राप्त होते हैं । एकेन्द्रिय वृक्ष भी महत्वपूर्ण माना जाता है। केवल ज्ञान का वृक्ष 'अशोक वृक्ष' के रूप में प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है ।
वृक्ष तो सचेतन है । भूमि भी श्रादर की पात्र बनती है । महान आत्माओं का प्रभाव चित्य है उनसे सम्बन्धित वस्तुओं के प्रति आदर का भाव व्यक्त करने के भीतर प्रभु के प्रति श्रद्धा भक्ति का भाव निहित है । यदि ऐसी दृष्टि न हो, तो फिर वही भक्ति लोक मूढ़ता का रूप धारण कर सम्यक्त्व की ज्योति को बुझा देती है । दृष्टि स्वच्छ तथा विमल होनी चाहिये ।
जिस चैत कृष्ण नवमी के दिन भगवान ऋषभनाथ भगवान तीर्थंकर ने समस्त परिग्रह को पाप सदृश निश्चय कर त्याग किया था तथा निग्रर्थ बने थे, वह दिन धन्य माना जाने लगा । सर्व साधन सम्पन्न जिन भगवान का समस्त परिग्रह त्याग For faशुद्धि का कारण होता है ।
दीक्षावृक्षों की ऊंचाई
दीक्षा वृक्षों की ऊंचाई - श्री महावीर स्वामी को करों के दीक्षा वृक्षों की ऊंचाई उनके शरीर के बारह गुनी महावीर भगवान का दीक्षा वृक्ष ३२ धनुष ऊँचा था । बान तीर्थ की प्रवृत्ति-
छोड़कर बाकी सब तीर्थअधिक समझना चाहिये ।
दान तीर्थ की प्रवृत्ति - लाभांतराय का क्षयोपशम होने पर विवेक, faar
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६७० ]
६. गो. प्र. चिन्तामणि नादि सात गुणों से समलंकृत महाराज श्रेयांस ने राजभक्त में अक्षय तृतीया को एक वर्ष, एक माह नव दिन के पश्चात् तीन लोक के नाथ, आदिनाथ प्रभु को इक्षु रस का आहार दिया। प्रभु के कर कमल में पड़ती हुई इक्षु रस की धारा पुण्य की धारा सदृश प्रतीत होती थी । इस दान में विधि, द्रव्य, दाता, पात्र, सभी श्रेष्ठ होने से यह उत्तम श्रेणी का पात्र दान माना गया । यद्यपि वह इक्षु रस मल्य रहित था, इससे उसके देने से श्रेयांस महाराज को कोई उल्लेखनीय लोभ का त्याग नहीं करना पड़ा, फिर भी चक्रवर्ती भरतेश्वर ने महाराज श्रेयांस को महादान पति कहा है । महापुराणकार कहते हैं---
ततो भरतराजेन श्रेयानप्रच्छि सादरम् । महादानपते बूहि कथं ज्ञातमिदं त्वया ॥१६०६।।
उत्तम पात्र के दान की महिमा अवर्णनीय है। चक्रवर्ती भरत कहते हैं, हे श्रेयांस ! तुम दान तीर्थंकर हो ! तुम महान पुण्यवान हो । 'त्वं दानतीर्थ कृच्छायान् त्वं महापुराण भासि । . .. .. पंचाश्चर्य---देवताओं ने इक्षुधारा से स्पर्धा करते हुये आकाश से रत्नों की धारा पृथ्वी पर बरसाई थी । मंद सुगन्ध तथा शीतल पवन बहने लगी थी। दिव्यपुष्पों की वृष्टि हुई थी । जय-जय शब्द का उद्घोष हो रहा था। देवदुन्दुभि की मधुर-ध्वनि हुई थी। इस प्रकार पंचाश्चर्य हुये थे। इस श्रेष्ठ पात्र दान के प्रभाव से दाता की देवताओं ने अभिषेक सहित पूजा की थी। हरिवंश पुराज में कहा है
अभ्यचिते तपोवृद्ध्य धर्मतीर्थकरे गते । . . दान तीर्थकरं देवाः साभिषेकम पूजयन् ॥१६०७।। . धर्म तीर्थंकर वृषभदेव भगवान् की पूजा के पश्चात् तपोवृद्धि के हेतु प्रस्थान करने के अनन्तर देवताओं ने दानतीर्थकर महाराज श्रेयांस की अभिषेक पूर्वक पूजा की। भगवान को प्रथमदान देने का प्रभाव
. तीर्थंकरों का सर्वप्रथम प्राहारदान और दान की महिमा तीर्थकर भगवान के सर्वप्रथम पाहारदान की बड़ी महिमा बताई गई है। हरिवंश पुराणा में कहा है कि अजितनाथ आदि तेईस तीर्थङ्करों ने तीसरे दिन प्रथम पारणा की है कि तृतीये दिवसेऽन्येषां प्रथमा पारणा यता । जिनेन्द्र भगवान को प्रथम पारणा के दिन क्षीरादि
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अध्याय : आठवा ]
[ ६७१ निर्मित पदार्थों के दासा नररत्नों को सर्वत्र स्तुति की गई । उत्तम पात्र का आहारदाता या तो उसी भव में मोक्ष को प्राप्त करता है या स्वर्ग का सुख भोग कर वह तीसरे भव में मुक्ति को पाता है। भगवान को प्रथम बार याहार देने वाले व्यक्ति के भाव अवर्णनीय उज्जवलता प्राप्त करते हैं। इससे वह उत्तम दाता शीघ्र ही तप की शरण ग्रहण कर का उद्धार करता है। हरिवंश पुराण में कहा है-- ... ... .
तपः स्थिताश्च ते केचिस्सिद्धास्तेनैव जन्मना । जिनांते सिद्धिस्तेषां तृतीये जन्मवि स्मृताः ।।१६०८॥
यह तो आध्यात्मिक श्रेष्ठ लाभ है, कि दाता मोक्ष को प्राप्त होता है। तत्काल दाता के भवन में अधिक से अधिक साढ़े बारह करोड़ और कम से कम इसका हजारवां भाग अर्थात् १२५००० एक लाख पच्चीस हजार रत्नों की वर्षा होती है । सत्पात्र के दान की अपार महिमा है । पंचाश्चर्य सत्पात्र को प्राहार दान देने में ही प्राप्त होते हैं । इससे इसकी महत्ता इतरदानों की अपेक्षा स्पष्ट ज्ञात होती है । इसका कारण यह है कि इस माहारदान से वीतराग मुनियों की रत्नत्रय के परिपालन में विशिष्ट सहायक उनके पवित्र शरीर का रक्षण होता है । गृहस्थ स्वयं श्रेष्ठ तप नहीं कर पाता है, किन्तु अपनी न्यायपूर्वक प्राप्त द्रव्य के द्वारा महाव्रती का सहायक बनता है । इस कारण पात्रदान द्वारा गृहस्थ के जीवनोपाय के षट्कमौ अर्थात् असि, मषी, कृषि, वाणिज्य, शिल्प और पशुपालन तथा चक्की, चूल्हा, बुहारी, उखली और पानी आदि पंचसूना क्रियाओं द्वारा अजित महान् दोषों का क्षय होता है । क्या दूध दूषित है--
दूध को दूषित सोचना यह दृष्टि विचार शुन्य है--ऋषभनाथ भगवान ने इक्षु रस लिया था, यह बात सर्वत्र प्रसिद्ध है । शेष तीर्थंकरों ने गोक्षीर से बनाये हुये श्रेष्ठ अन्न (खीर) का प्राहार किया था । कहा भी है---
प्राय नेक्षुरसो दिव्यः पारसायां पथित्रितः । अन्यगोंक्षीर निष्पपरमान्नमलालसैः ।।१६०६।।
अाजकल कोई लोग नवयुग के वातावरण से प्रभावित होकर दूध को मांस सदृश दूषित सोचते हैं । यह दृष्टि विचार शून्य है। दूध यदि सदोष होता, तो परम दयालु सर्व परिग्रहत्यागी तथा समस्त सुखों का परित्याग करने वाले तीर्थकर भगवान उसको आहार में क्यों ग्रहण करते । मधुर होते हुए भी मधु को. नवनीत आदि को
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६७२ ]
[ गा. प्र. चिन्तामणि
जीव दया के विधातक होने से जैसे जिनागम में त्याज्य कहा है 'उसी प्रकार वे त्रिकालदर्शी महापुरुष जिनेन्द्र दूध को भी त्याज्य कह देते । दूध दुहने के बाद अंतर्मुहूर्त अर्थात् ४८ मिनट के भीतर उसे उपरण करने से बह निदोष हो जाता है, ऐसा जैनाचार
के ग्रन्थों में वर्णन है । भगवान को दूध में सदोषता ज्ञात होती तो वे तीर्थकर भगवान - की मूर्ति के अभिषेक के लिये दूध का क्यों विधान करते ? पद्मपुराण में भगवान के ___ जल, घृतादि के द्वारा अभिषेक का महत्त्व बताते हुये लिखा है---
अभिषेक जिनेन्द्राणां विधाय क्षीरधारया। विमाने क्षीरधवले नरागी जायते धुतिः ॥१६१०॥
जो जिनेन्द्र भगवान का दुग्ध की धारा द्वारा अभिषेक करते हैं, वे क्षीर सदृश धवल विमान में जन्म लेकर निर्मल दीप्ति को प्राप्त करते हैं।
हरिवंश पुराण में भी उक्त कथन का इस प्रकार समर्थन किया गया हैक्षीरेक्षुरसधारो घृतवध्युवकादिभिः । अभिषिच्य जिनेन्द्रामचिता नुसुरासरैः ॥१६११॥
क्षीर तथा इक्षुरस की धारा के प्रवाह द्वारा तथा धृत दधि जल मादि से जिनेन्द्र देव की अभिषेक पूर्वक जो पूजा करता है, वह मनुष्यों तथा सुरासुरों द्वारा पूजित होती है।
दूध के विषय में आयुर्वेद शास्त्र कहता है कि भोजन पहले खल भाग रूप परिणत होता है। इसके पश्चात् बह रस रूपता धारण करता है। बनवे के अनस्तर दूध का रक्त बनता है । शारोष्ण दूध को इसीलिये प्रायुर्वेद में महत्वपूर्ण कहा है कि तत्काल ही शरीर में जाकर रुधिररूप पर्याय को शीघ्र प्राप्त करता है । दूध को गोरस कहने से स्पष्ट होता है कि वह रस रूप पर्याय है । दूध के दुहने से गाय क्षीरण नहीं होती. किन्तु रक्त के निकालने से उस जीव में क्षीणता पाती है, वेदना की वृद्धि होती है । दूध के सेवन से सात्विक भावों का उदय होता है । रुधिर मांसादि सेवी नर राक्षस बन जाते हैं। दूध में मांस का दोष माना जाय, तो सभी मनुष्य मांसभक्षी व्याघ्र आदि की श्रेणी में श्रा जावेगे, क्योंकि बिना दूध पिये बालक का प्रारम्भिक जीवन ही असंभव है। शरीर रचना की दृष्टि से मनुष्य की समानता शाक तथा फलभोजी प्राणियों के साथ है । मांस भक्षी निरन्तर अशान्त, क्रूर, चंचल तथा दुष्ट स्वभाव वाले होते हैं । दूध के सेवन से ऐसी बात नहीं होती है।
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अध्याय आठवां ]
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जो दूध को सदोष सोचते हैं, दे पानी भी नहीं पी सकते ? पानी में जलचर जीवों का सदा निवास रहता है । उनका जन्म-मरण उसी के भीतर होता रहता 1 उनका मलमूत्रादि भी उसके भीतर हुआ करता है, फिर भी लोक जल को पवित्र मानते हैं । इसी प्रकार गतानुगतिकता या अंध परम्परा का त्याग कर यदि मनुष्य मस्तिष्क अनुभव तथा सद्विचार से काम लेगा, तो उसे शुद्ध साधनों द्वारा प्राप्त, मर्यादा के भीतर उष्ण किया गया तथा सावधानीपूर्वक शुचिता के साथ सुरक्षित किया गया दूध अभक्ष्य कोटि के योग्य नहीं देखेगा। यह देखकर भ्राश्चर्य होता है कि सरासर शुचि भोजन पान को करते हुये मांसाहार दोष के दोषी लोग अहिंसात्मक प्रवृत्ति बालों के उज्जवल कार्यों को भी सकलंक सोचते हैं। उन्हें रात्रि भोजन में दोष नहीं दिखता, जल के पीने में संकोच नहीं होता । अशुद्ध आहार आदि के भक्षण | करने में तथा मधु सेवन करने में निर्दोषता दिखती है। मधु की एक बिन्दु भक्षण करने में सात गांवों के ध्वंस बराबर जीव घात का पाप लगता है, किन्तु ये उसे निर्दोष, बलदायक मानकर बिना संकोच के सेवन करते हैं और अपने को अहिंसा व्रत सोचते हैं। अहिंसा के क्षेत्र में अंतिम प्रामाणिक निर्णय दाता के रूप में जिनेन्द्र की वाणी की प्रतिष्ठा है । उस जिनागम के प्रकाश में दूध के विषय से अभक्ष्यता का भ्रम दूर करना चाहिये । वैसे रसपरित्यागवती घी दूध आदि का त्याग इन्द्रियजय की दृष्टि से किया करता है ।
दिव्यध्वनि का विशेष स्वरूप -- दिव्य ध्वनि के विशेष विचार- मृदु, मधुर, प्रतिगंभीर और एक योजन प्रमाण समवशरण में रहने वाली बारह प्रकार की सभाओं में विद्यमान देव, मनुष्य और तिर्यञ्चादि सब संज्ञी भव्य जीवों को युगपत् प्रतिबोधित करने वाली दिव्य ध्वनि होती है । जैसे मेघ का पानी एक रूप हैं तो भी वह नाना वृक्ष और वनस्पतियों में जाकर नामा रूप परिणत हो जाता है, उसी तरह दांत, तालु-ओठ और कंठ आदि के हलन चलन से रहित वह वारणी १८ महाभाषा और ६०० क्षुद्र भाषाओं में परिणत होकर युगपत् समस्त भव्यजनों को प्रानन्द प्रदान करती है ।
अर्थ मागधी यह नाम भाषारूप है । कहा भी है--- मागध्यावन्तिका प्राच्या शौर संन्यर्धमागयो । वाहीकी दाक्षिणात्याच भाषाः सप्त प्रकीर्तिताः ॥ १६१२॥
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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मागधी, भावन्तिका, प्राच्या, शौरशैनी. अर्धमागधी, बाहीकी तथा दाक्षिणात्या इस तरह सात प्रकार की प्राकृत भाषायें है । इसमें एक अर्धमागधी भाषा है ।
__ तीर्थकरों की दिव्यध्वनि मगध नाम के व्यन्तर देवों के तिमित से सर्व जीवों को भली प्रकार सुनाई पड़ती थी । प्राचार्य पूज्यपाद द्वारा रचित नन्दीश्वर भक्ति में इस अर्धमागधी भाषा का नाम सार्वार्धमागधी लिखा है 'सर्वार्धमागधी या भाषा' (५) टीकाकार आचार्य प्रभाचन्द्र ने लिखा है, सर्वेभ्यो हितसार्वा । सा चासौ अर्धमागधीया च ।' सबके लिये हितकारी को सार्व कहते हैं । सार्व तथा जो अर्धमागधी भाषा थी, उसका नाम सर्वार्धमागधी होगा। पूज्यवाद स्वामी ने सर्व के स्थान पर सार्व शब्द को ग्रहण कर यह अर्थ सूचित किया है कि भगवान की वाणी सम्पूर्ण जीवों के लिए हितकारिणी थी। प्रश्न :- जब दिव्यध्वनि को भगवान के अष्ट प्रातिहार्यों में गिना है, तब
उस जिनेन्द्र वाणी को सर्धिमागधी भाषा का नाम देवोपनीत
अतिवादों में गिनने का क्या प्रयोजन है ? उसर :--मगधदेव के सन्निधान होने पर जिनेन्द्र की वाणी को सम्पूर्ण जीव भली प्रकार ग्रहण करने में तथा उससे लाभ उठाने में समर्थ हो जाते हैं । आज वक्ता की वाणी को ध्वनि वाहक (लाउडस्पीकर) यंत्र द्वारा दुरवर्ती श्रोताओं के कानों के पास पहुंचाया जाता है । उस यत्र की सहायता से वाणी समीप में अधिक उच्च स्वर से श्रवण गोचर होती है । और कहीं उसका स्वर मन्द होता है । परन्तु जिनेन्द्र की ध्वनि प्रतीत होता है, कि मगध देवों के सानिधान से सभी जीवों को समान रूप से पूर्ण स्पष्ट और अत्यन्त मधुर सुनाई पड़ती है। जिनेन्द्र देव से उत्पन्न दिव्य ध्वनि रूपी जलराशि को मगध देव रूपी सहायकों के द्वारा भिन्न-भिन्न जीवों के कर प्रदेश के समीप सरलतापूर्वक पहुंचाया जाता है । जैसे सरोवर का जल नल के माध्यम से जनता के समीप जाता है और जनता उसे नल का पानी यह नाम प्रदान करती है । प्रतीत होता है कि भगवान की वाणी को भिन्न-भिन्न जीवों के समीप पहुंचाकर उसे सुख पूर्वक श्रवण योग्य बनाने आदि के पवित्र कार्य में अपनी सेवा से तथा सामर्थ्य समर्पण करने के कारण भगवान की सार्ववाणी को सार्वार्धमागधी नाम प्राप्त होता है । जब मगध देव उस भगवद वारणी की. सेवा करते हैं तो महात्माओं की सेवा का उन्हें यह पुरस्कार प्राप्त होता है कि उस श्रेष्ठ वारणी में सेवक के नाते उनका भी
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अध्याय: श्राठयां ]
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नाम आता है । समशरण में जिस वाणी को सुनकर भव्य जीव अपनी भव बाधा को दुर करने योग्य बोध प्राप्त करते हैं, वह वासी जितेन्द्र देव द्वारा उद्भूत हुई है, और मागध देवों के सहयोग से भव्यों के समीप पहुँची है। जब उस वाणी की श्रोताओं को उपलब्धि द्विविध कारणों से होती है, तब द्वितीय कारण को उस कार्य का श्राधां श्रेय स्थूल दृष्टि से दिया जाना अनुचित प्रतीत नहीं होता ।
प्रश्न : --- कोई-कोई यह सोचते हैं कि राजगिरि नगर जिस प्रान्त की राजधानी थी । उस देश की भाषा के अधिक शब्द भगवान को दिoraft में रहे होंगे प्रथा भगवान प्राकृत भाषा के उपदेश रूप अर्धमागधी नाम की भाषा में बोलते होंगे ? उत्तर :-- -लोक रूचि के परितोष के लिए उपरोक्त समाधान देते हुये कोईकोई विद्वान देखे जाते हैं, किन्तु आगम की पृष्ठ भूमि उक्त समाधान को आश्रय नहीं देती है । सूक्ष्म तथा अतीन्द्रिय विषयों पर साधिकार एवं निर्दोष प्रकाश डालने की क्षमता सम्पन्न श्रागम कहता है कि भगवान को वाणी किसी एक भाषा में सीमित नहीं होती है । सर्व विद्या के ईश्वर सर्वत्र एक ही भाषा का उपयोग करेंगे और अन्य देश तथा अन्य प्रान्त की बहुसंख्यक जनता के कल्याणार्थ अपनी पूर्व प्रयुक्त भाषा में परिवर्तन नहीं करेंगे । यह बात अन्तःकरण को अनुकूल प्रतीत नहीं होती है । उदाहरणार्थ, भगवान जब राजगृह के समीप विपुलाचल पर विराजमान थे। तब मरा देश की मागधी भाषा में विशेष जन के कल्याण को लक्ष्य कर उपदेश देना उचित तथा ग्रावश्यक प्रतीत होता है. किन्तु म्हैसूर प्रान्त में भव्य जीवों के पुण्य से पहुँचने वाले परम पिता जिनेन्द्र देव यदि कानड़ी भाषा का आश्रय लेकर तत्व निरूपण करें तो अधिक उचित बात होगी। जिनेन्द्र देव की सम्पूर्ण बातें उचित और निर्दोष ही होती हैं। ऐसी स्थिति में सर्वत्र सर्वदा मागधी नाम की मग प्रांत विशेष की भाषा में प्रभु का उपदेश होता है, यह मान्यता सुदृढ तर्क पर आश्रित नहीं दिखती है ।
महान तपश्चर्या, विशुद्ध सम्यग्दर्शन, परमंयथास्यात चारित्र, केवल ज्ञान यादि श्रेष्ठ सामग्री का सन्निधान प्राप्तकर समुद्भूत होने वाली सम्पूर्ण जीवों को शाश्वतिक शान्तिदायिनी भगवद् वारणी की सामान्य संसारी प्राणियों की भाषा से तुलनाकर दोनों को समान समझने का प्रयत्न सफल नहीं हो सकता है । वह वाणी
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
लोकोत्तर है, और लोकोत्तम योगिराज जिनेन्द्र देव की है । भोगिराज योगिराज की विद्या, विभूति और सामर्थ्य का लेश मात्र भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं। रेल का एक क और पर्वत कैसे दोनों समान रूप से विशाल कहे जा सकते हैं । महान तार्किक विद्वान समन्तभद्र जिनेन्द्र की प्रवृत्तियों के गम्भीर चिंतन के पश्चात् इस परिणाम पर पहुँचते हैं, कि जिनेन्द्र के कार्य प्राचित्य हैं । 'धीर ! aranमचित्यमोहितम् ।' (७४ स्वयंभू स्तोत्र ) उन्होंने धर्मनाथ जितेन्द्र के विषय में लिखा है।
मानुषी प्रकृतिमभ्यतीतवान् देवतास्वपि च देवता यतः ।
सेन नाथ परमासि देवता श्रेयसे जिनवृष प्रसीद नः ।। १६१३॥
हे धर्मनाथ जिनेन्द्र ! श्रापने निर्दोष अवस्था को प्राप्त कर मानव प्रकृति की सीमा का प्रतिक्रमण किया हैं, अर्थात् मानव समाज में पाई जाने वाली पूर्णता तथा असमर्थताओं से आप उन्मुख हैं। आप देवताओं में भी देव स्वरूप हैं, इसलिए हे स्वामिन् आप परम देवता हैं । हम पर कल्याण के हेतु प्रसन्न हों ।
योगियों की अद्भुत तपस्यात्रों के प्रसाद से जो फल रूप में सिद्धियां प्राप्त " होती हैं, उनसे समस्त विश्व विस्मय के सिंधु में डूब जाता है । समीक्षक सिद्धियों के अद्भुत परिपाक को देखकर हतबुद्धि बन जाता है । वह यदि इन जिनेन्द्रों की उत्कृष्ट रत्नत्रय धर्म की समाराधना को ध्यान में रखे, तो वह चमत्कारों को देख श्रद्धा से fara मस्तक हुए बिना न रहेगा । दीक्षा से लेकर केवलज्ञान तक महामौन स्वीकार करने वाले तीर्थङ्करों की वाणी में लोकोसर प्रभाव पाया जाना तर्क दृष्टि से पूर्ण 'संगत तथा उचित है । जब भगवान का प्रभामंडल रूप प्रांतिहार्य सहस्त्र सूर्य के तेज को जीतता हुआ समवशरण में दिन रात्रि के भेदों को दूर करता हुआ भव्य जीवों को उनके सात भव दिखाने वाले अलौकिक दर्पण का काम करता है, तो भगवान की दिव्य ध्वनि महान् चमत्कार पूर्ण प्रभाव दिखाये तो यह पूर्णतया उचित प्रतीत होता है । चन्द्र प्रभ काव्य में दिव्य ध्वनि के विषय में लिखा है।
सर्वभाषास्वभावेन ध्वनिनाथ जगदगुरुः ।
जगाद गखिन: प्रश्नादिति तत्वं जिनेश्वरः ॥१६१४।।
जगत के गुरु चन्द्रप्रभ जिनेन्द्र ने गणधर के प्रश्न पर सर्व भाषा: स्वभाव: वाली दिव्यध्वनि के द्वारा तत्वों का उपदेश दिया ।
हरिवंश पुराण में भगवान की दिव्यध्वनि को हृदय और कर्ण के लिए
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अध्याय : पाठवां ]
[ ६७७
रसायन लिखा है :--- 'चेतः कर्ण रसायन ।' उन्होंने यह भी लिखा है :---
जिन भाषाऽधरस्पंद मंतरेण विजुभिता । . तियादेव मनुष्याणां दृष्टिमोहमनीनशत् ।।१६१५॥
प्रोष्ठ कंपन के मिना उत्पन्न हुई जिनेन्द्र की भाषा ने तिर्यञ्च, देव तथा मनुष्यों की दृष्टि सम्बन्धी मोह को दूर किया था।
पूज्यपादस्वामी उम दिव्यध्वनि के विषय में यह कथन कहते हैं :घ्यनिरपि योजनमेकं प्रजायते श्रोन्नहृदयहारिगं भीरः । ससलिल जलधरफ्टल ध्वनितामिव विततान्तराशावलयं ॥२२॥
जिनेन्द्र भगवान की दिव्य ध्वनि श्रोत्र तथा कर्ण तथा हृदय को सुखदाई तथा गंभीर होती है। वह दिव्यध्वनि सलिल से परिपूर्ण मेध पटल की ध्वनि के समान दिगंतर में व्याप्त होती हुई एक योजन तक पहुँचती है । महापुराणकार जिनसेन स्वामी का कथन है. :--
एकतयोपि यथैव जलौघश्चिनरसो भवति ममेदात् । पात्र विशेषवशाच्च तथा सर्वविदो ध्वनिराप बहुत्वं ॥१६१६॥
जिस प्रकार एक प्रकार के पानी का प्रवाह वृक्षों के भेद से अनेक रस रूप परिणत हो जाता है, उसी प्रकार यह सर्वज्ञ देव के दिव्यध्वनि एक रूप होते हुए भी पात्रों के भेद से विविध रूपता को प्राप्त होती है। कर्नाटक की कानडी भाषा के जैन व्याकरण में यह उपयोगी श्लोक पाया है :
गंभीर मधुरं मनोहरतरं दोषव्यपेतं हित । कंठौष्ठादि वसोनिमितरहितं नो वातरोधोद्गतं ॥ स्पष्टं तत्तदभीष्टवस्तुकथकं निःशेषभाषात्मकं । दूरासन्नसमं शमं निरूपम जैन वचः पातु नः ॥१६१६॥
गम्भीर, मधुर, अत्यन्त मनोहर, निष्कलंक, कल्याणकारी, कंट, ओष्ठ, तालु आदि वचन उत्पत्ति के निमित्त कारणों से रहित, पवन के रोध बिना उत्पन्न हुई, स्पष्ट श्रोताओं के लिए अभिष्ट तत्त्वों का निरूपण करने वाली सर्व भाषा स्वरूप, सभीप तथा दूरवर्ती जीवों को समान रूप से सुनाई पड़ने वाली, शांति रस से पूरिपूर्ण तथा उपमा रहित जिनेन्द्र भगवान की दिव्य ध्वनि हमारी रक्षा करे। ,
तिलोयपण्णति में इस दिव्य ध्वनि के विषय में यह बताया है कि दिव्य
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
ध्वनि १८ महाभाषा ७०० लघु भाषा तथा और भी संजी जीव जीवों की भाषा रूप परिणत होती है । यह तालु, दन्त, प्रोष्ठ और कन्ठ की क्रिया से रहित होकर एक ही समय में भव्य जीवों को उपदेश देती है !
एक्ककाल भव्यजागे दिव्यभासितं (४-६०२)
भगवान की दिव्य ध्वनि प्रारम्भ में अनक्षरात्मक होती है, इसलिए उस समय केवली भगवान के अनुभय' बचन बोम माना गया है । पश्चात् श्रोताओं के कर्ण प्रदेश को प्राप्त कर सम्यग्ज्ञान को उत्पन्न करने से केवली भगवान के सत्य वचन योग का सद्भाव भी आमम में माना है। गोम्मटसार की संस्कृत टीका में इस प्रसंग पर महत्व पूर्ण बात कही है। 'सयोगकेवलि दिव्यध्वनेः कथं सत्यानुभय वाग्योगस्वमितिचेत् तत्र तदुत्पत्तावनक्षरात्मकत्वेन श्रोत-श्रोत्र-प्रदेश प्राप्ति समय पर्यन्तमनुभयभाषात्वसिद्धेः । तदनन्तरं च श्रोतृजनाभिप्रेतार्थेषु संशयादि निराकरणेन सम्यग्ज्ञानजनकत्वेन सत्यवाग्योगत्वसिद्धेश्च तस्यापि तदुभयत्व घटनात् (गो. जी. गाथा २२७ पृ० ४८८) । प्रश्न :- सयोग केवली को दिव्यध्वनि को किस प्रकार सत्य अनुभय वचन
योग कहा है ? उत्तर :---केवली की दिव्यध्वनि उत्पन्न होते ही अनक्षरात्मक रहती है, इसलिए श्रोताओं के कर्ण प्रदेश से सम्बन्ध होने के समय तक अनुभय वचन योग सिद्ध होता है। इसके पश्चात् श्रोताओं के इष्ट अर्थों के विषय में संशय आदि को निराकरण करने से तथा सम्यग्ज्ञान को उत्पन्न होने से सत्य वचन योग का सद्भाव सिद्ध होता है। इस प्रकार केवली के सत्य और अनुभय वचन योग सिद्ध होते हैं ।
___इस कथन से ज्ञात होता है कि श्रोताओं के समीप पहुँचने के पूर्व वारणी अनक्षरात्मक रहती है, पश्चात् भिन्न-भिन्न श्रोताओं का आश्रय पाकर वह दिव्य ध्वनि अक्षर रूपता को धारण करती है। स्वामी समन्तभद्र ने जिनेन्द्र देव को वाणी को सर्वभाषा स्वभाव वाली कहा है, यथा---
तव वागमृत्तं श्रीमत्सर्वभाषास्वभावकम् । शीरणयस्यमृतं यत्पारिएनो व्यापि संसघि ॥१६१८॥
श्री सहित तथा सर्व भाषा स्वभाव वाली आपकी अमृत वाणी समवशरण में व्याप्त होकर अमृत की तरह प्राणियों को आनन्दित करती है।
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अध्याय : आठवां ] . .
[ ६७६ महापुराणकार दिव्यध्वनि को अक्षरात्मक कहते हुए इस प्रकार प्रतिपादित करते हैं----
देवकृतो ध्वनिरित्यसेबसन् विगुणस्य तथा विहतिः स्यात् । . साक्षर एव च वर्णसमूहान्नव विनाथगतिजति स्यात् ।।१६१६।।
कोई लोग कहते हैं कि दिव्यध्वनि देवकृत है । यह कथन वास्तविक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने से जिनेन्द्र भगवान के अतिशय गुर्ग का व्याघात होता है। वह दिव्यध्वनि अक्षरात्मक ही है (यहां 'ही' बाचक 'एच' शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है ) कारण अक्षरों के समूह के बिना लोक में अर्थ का बोध नहीं होता है।
जयधवला टीका में जिनसेन स्वामी के गुरु बीरसेनाचार्य ने दिव्यध्वनि के विषय में ये शब्द कहे हैं-केरिसा सा (दिव्यज्झुणी) ? सव्वभासा-सरूबा, अक्खराणवखरपिया, पणन्तत्थ-गम बीजपदघडियसरीरा' (भाग १ पृ० १२६)
__ वह दिव्यध्वनि किस प्रकार की हैं ? वह सर्वभाषा स्वरूप है। अक्षरात्मक अनक्षरात्मक है । अनन्त अर्थ है गर्भ में जिसके, ऐसे बोजपदों से निर्मित शरीर वाली है अर्थात् उसमें बीजपदों का समुदाय है ।
चौसठ ऋद्धियों के बीज बुद्धि नाम की ऋद्धि का भी कथन आता है। उसका स्वरूप राजवातिक में इस प्रकार कहा है-जसे हल के द्वारा सम्यक प्रकार से तैयार की गई उपजाऊ भूमि में योग्य काल में बोया गया एक भी बीज बहुत बीजों को उत्पन्न करता है, उसी प्रकार नो इन्द्रियावरण, श्रुतज्ञानावर तथा वीर्याऽन्त राय कर्म के क्षयोपशम के प्रकर्ष से एक बीज पद के ज्ञान द्वारा अनेक पदार्थों को जानने की बुद्धि को बीजबुद्धि कहते हैं--'सुकृष्ट सुमथिते क्षेत्रे सारवति कालादिसहायापेक्ष बीजमेकमुप्तं यथानेकबीजकोटिप्रदं भवति तथा नोइन्द्रियावरण-श्रुतावरण, बीर्यान्तराय क्षयोपशम प्रकर्षे सति एक बीजपद ग्रहणादनेक पदार्थ प्रतिपत्ति/जबुद्धि.' .
(रा. वा० अध्याय ३ सूत्र ६६ पृ० १४३) इस सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि जिनेन्द्रदेव की बीजपदयुक्त वाणी को गणधर देव. बीजबुद्धि ऋद्धिधारी होने से अवधारण करके द्वादशांग रूप रचना करते हैं।
___ इस प्रसंग में यह बात विचार योग्य है कि प्रारम्भ में भगवान की वाणी को झेलकर गराधर देव द्वादशांग की रचना करते हैं, अतः उस वासी में बीजपदों का
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६८० ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण समावेश आवश्यक है, जिनके श्राश्रय से चार ज्ञान धारी महर्षि गरधर देव अंगपूर्वो की रचना करने में समर्थ होते हैं । वीर भगवान की दिव्यध्वनि को गौतमगरावर देव सुनकर 'बारहगाणं चोट्स पुण्वारणं च गंथारणमेवकरण चैव मुहुतेरा कमेारयणा कदा' (धवला. टीका - भाग १ सु. ६५) द्वादशांग तथा चौदहपूर्व रूप ग्रन्थों की एक मुहुर्त में क्रम से रचना की ।
इसके पश्चात् भी तो महावीर भगवान की दिव्यध्वनि खिरती रही है । श्रोतृमण्डली को गणधर देव द्वारा दिव्यध्वनि के समय के पश्चात् उपदेश प्राप्त होता है । जब दिव्यध्वनि खिरती है, तब मनुष्यों के सिवाय सज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च देवादि भी अपनी-अपनी भाषाओं मे अर्थ को समझते हैं। इससे वीरसेन स्वामी ने उस दिव्य वाणी को 'सव्वभाषा सरुवा' सर्वभाषा स्वरूपा भी कहा है । उस दिव्यवाणी की यह ratheir है कि उस दिवाणी से गएर देव सतु महानुभाव ज्ञान के सिन्धु भी अपने लिये अमूल्यज्ञान निधि प्राप्त करते हैं । तथा महान मंदमति प्राणी, सर्प, गाय, व्यान्त्र, कपोत, हंसादि पशु-पक्षी भी अपने-अपने योग्य ज्ञान की सामग्री प्राप्त करते हैं । उपरोक्त समस्त कथन पर गम्भीर विचार तथा समन्वयात्मक दृष्टि डालने पर प्रतीत होता है कि जिनेन्द्र देव की दिव्यध्वनि अलोकिक वस्तु है, अनुपम है और आश्चर्य-प्रद है । उस वाणी के समान विश्व में अन्य कोई वाणी नहीं है । वाणी की लोकोत्तरता में कारण तीर्थंकर भगवान की त्रिभुवन वंदित अनन्त सामर्थ्य समलंकृत व्यक्तित्व है । श्रेष्ठ सामर्थ्यधारी गणधर देव, महान महिभाशाली सुरेन्द्र आदि भी प्रभु की अपूर्व शक्ति से प्रभावित होते हैं। योग के द्वारा जो चमत्कार युक्त वैभव दिखाई पड़ता है, वह स्थूलदृष्टि वालों की समझ में नहीं पाता है, अतएव वे विस्मय के सागर में डूबे ही रहते है । दिव्यध्वनि तीर्थंकर प्रकृति के विपाक - उदय की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है, क्योंकि तीर्थंकर प्रकृति कर्म का बंध करते समय केवली, श्रुत'केवली के पादमूल में इसी भावना का बीज बोया गया था कि इस बीज से ऐसा वृक्ष बने, जो समस्त प्राणियों को सच्ची शांति तथा मुक्ति का मंगल संदेश प्रदान कर सके। मनुष्य पर्याय रूपी भूमि में बोया गया यह तीर्थंकर प्रकृति रूप बीज अन्य साधन सामग्री पाकर केवली की अवस्था में अपना वैभव तथा परिपूर्ण विकास दिखाता हुआ त्रैलोक्य के समस्त जीवों को विस्मय में डालता है । आज भगवान ने
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अध्याय : माठवा ]
[ ६८१
इच्छा का भाव कर दिया है, फिर भी उनके उपदेश प्रादि कार्य ऐसे लगते हैं, मानों वे इच्छाओं द्वारा प्रेरित हों। इसका यथार्थ में समाधान यह है कि पूर्व की इच्छाओं के प्रसाद से भी कार्य होता है । जैसे घड़ी में चाबी भरने के पश्चात् वह घड़ी अपने आप चलती है, उसी प्रकार तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध करते समय जिन कल्याणकारी भावों का संग्रह किया गया था, वे ही बीज अनन्तगुणित होकर विकास को प्राप्त हुये हैं । ग्रतः केवली की अवस्था पूर्व संचित पवित्र भावना के अनुसार सब जीवों को कल्याणकारी, सामग्री प्राप्त होती हैं।
दिव्यध्वनि के विषय में कुन्दकुन्दाचार्य के सूत्रात्मक ये शब्द बड़े महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं- तिहुव-हिद-मधुर-विसद-वक्काणं' अर्थात् दिव्यध्वनि के द्वारा त्रिभुवन समस्त भव्य जीवों को हितकारी, प्रिय तथा स्पष्ट उपदेश प्राप्त होता है । जब छास्थ तथा बाल अवस्था वाले महावीर प्रभु के उपदेश के बिना ही दो चारण ऋद्धिवारी महामुनियों की सूक्ष्म शंका दूर हुई थी तब केवलज्ञान, केवल दर्शनादि सामग्री संयुक्त तीर्थंकर प्रकृति के पूर्ण विपाक उदय होने पर उस दिव्यध्वनि के द्वारा समस्त जीवों को उनकी भाषाओं में हो जाता है, यह बात तनिक भी शंका योग्य नहीं दिखती है ।
इस दिव्यध्वनि के विषय में धर्मशर्माभ्युदय का यह पद्य बड़ा मधुर तथा भावपूर्ण प्रतीत होता है
सर्वासमोसृष्टिः सुधावृष्टिश्च करण्योः ।
प्रावर्तत ततो वारणी सर्वविश्च श्वराद्विभोः ।। १६२० ॥
सर्व विद्याओं के ईश्वर जिनेन्द्र भगवान के सर्व प्रकार के आश्वयों की जननी तथा कर्णों के लिए सुधा की वृष्टि के समान दिव्य ध्वनि उत्पन्न हुई । गोम्मटसार itaris की संस्कृत टीका में लिखा है कि तीर्थंकर की दिव्यध्वनि प्रभात, मध्याह सायंकाल तथा मध्यरात्रि के समय छह-छह घटिका काल पर्यन्त अर्थात् दो घण्टा atara fafters प्रतिदिन नियम से खिरती है । इसके सिवाय गणधर चक्रवर्ती, . इन्द्र सदृश विशेष पुण्यशाली व्यक्तियों के आगमन होने पर उनके प्रश्नों के उत्तर के लिए भी दिव्यध्वनि खिरती है । इसका कारण यह है कि उन विशिष्ट पुण्याधिकारियों के संदेह दूर होने पर धर्म भावना बढ़ेगी और उससे मोक्षमार्ग की देशना का प्रचार होगा जो धर्म तीर्थंकर की तत्य प्रतिपादन की पूर्ति स्वरूप होगी । जीवकांड की
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AaraaraamananesewictiNamratarangmarwaryan
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६८२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि संस्कृत टीका में ये शब्द पाए हैं----'पातिकर्मक्षयानन्तर केवलज्ञान सहोत्पन्नतीर्श करत्व पुण्यातिशय विजृ भितमहिम्नः तीर्थंकरस्य पूर्वाह्न मध्याह्नापरलार्धरात्रिषु षट् षट्यटिकाकालपर्यन्त द्वादशगण सभामध्ये स्वभावतो दिव्यध्वनिरुद्गच्छति । एवं समुद्भूतो दिव्यध्वनिः समस्तासन्नश्रेतृगणानुद्दिश्य उत्तमक्षमादिलक्षणं रत्नत्रयात्मक वा धर्म कथयति' (पृष्ठ-७६१)
जय धवला टीका में लिखा है कि यह दिव्यध्वनि प्रातः, मध्यान्ह तथा सायंकाल इन तीन गायों में छह-छह घड़ी पर्यन्त खिरती है-तिसंज्झै विसयछचडियासु गिरतरं पयट्टमारिणया' (भाग १ पृष्ठ-१२६) . तिलोयपण्णति में तीन संध्याओं में नवमुहूर्त पर्यन्त दिव्यध्वनि खिरने का उल्लेख है। कहा भी है--
पगदीए अक्खलियो संझत्तिदम्मि रणवमुहतारिण। गिस्सरदि रिणस्यमाणो दिव्यज्भुणी जाय जोयणयं ॥१६२१॥
लिलोयपण्यत्ति में यह भी कहा है कि 'गरपधर इन्द्र तथा चक्रवर्ती के प्रश्नानुरूप अर्थ के निरुपरणार्थ यह दिव्यध्वनि समयों में भी निकलती है, यह भध्य जीवों को छह द्रव्य, नौ पदार्थ, पांच अस्तिकाय और सात तत्वों का नाना प्रकार के हेतुओं द्वारा निरुपण करती है। प्रश्न--(गोम्मटसार में) मध्यरात्रि को दिव्यध्वनि खिरने पर यह शंका की
जा सकती है कि मध्यरात्रि को जोध निद्रा के वशीभूत रहते हैं । उस
समय दिव्यध्वनि के खिरने से क्या उपयोग होगा ? उत्तर--समवशरण में भगवान के प्रभामण्डल के प्रभाव से दिन और रात्रि का भेद नहीं रहता है. ! समवशरण में जाने वालों को निद्रा आदि की पीडायें भी नहीं होती हैं।
अनन्त सुख का स्वरूप-त्रिलोक सार में लिखा है कि मोहनीयादि चार धातिया कर्मों के क्षय से अनन्त चतुष्टय अर्थात् अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान, अनन्त सुख और अनन्तवीर्य ये चार गुरण उत्पन्न होते हैं । यह भी लिखा है 'भोग्येश्वर्थेष्वनौत्सुक्यमन्तसुखतामता' अर्थात् भोगने योग्य पदाथों में उत्सुकता का प्रभाव रहना इसको अनन्त सुख कहा है।
तीर्थङ्करों के १८ दोष नहीं रहते हैं-- १८ दोषों के नाम--- १. क्षुधा (भूख),
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अध्याय : पाठवा ]
[ ६८३ २. तृषा (प्यास), ३. जन्म, ४. जरा (बुढ़ापा), ५. मरण, ६. विस्मय (आश्चर्य), ७. अरति, (पीड़ा) ८. खेद, (दुःख), ६. शोक, १०. रोग, ११. मद, गर्व) १२. मोह, १३. राग, १४. दुष, १५. भय, १६. निद्रा, १७. चिन्ता, १६. स्वेद (पसीना) । ये अठारह दोष केवली भगवान के नहीं होते हैं।
प्रश्न-ऋषभदेव के केवल ज्ञान का उद्यान कौन सा था ?
उत्तर--भगवान ऋषभदेव और केवल ज्ञान का उद्यान-भगवान ऋषभदेव एक हजार वर्ष तक घोर तपस्या करके एक दिन 'पुरिमतालपुर' पहुँचे। जिसका वर्तमान नाम 'प्रयाग' या 'इलाहाबाद' है । उस नगर के समीपवर्ती 'शकट उद्यान में ऋषभदेव ने वटवृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर केवलज्ञान प्राप्त किया था। भगवान ऋषभदेव को जिस वटवृक्ष के नीचे अक्षय बोधि का लाभ हुआ था, या इश्वरीय रूप प्राप्त हुआ था उसी दिन से उस वटवृक्ष का नाम अक्षयवट' संसार में प्रसिद्ध हो गया है।
केवलज्ञान प्राप्त होने पर समवशरण की रचना कुबेर द्वारा की गई थी। सब इन्द्र अपने परिवार के साथ ज्ञान कल्याणक पूजा के लिए वहां आये थे । और पुरिमतालपुर में इन्द्र ने भगवान ऋषभदेव की पूजा की थी। भगवान ऋषभनाथ की सर्वप्रथम धर्म देशना 'पुरिमतालपुर' में हुई थी ।. बहुत संभव है कि तभी से इस पुरिमतलापुर का नाम 'प्रयाग' हो गया है। याग नाम पूजा का है और सबसे बड़ी पूजा इन्द्र के द्वारा की जाती है जिसका नाम 'इन्द्रध्वज पूजा' है।
. प्रयाग को इलाहाबाद भी कहते हैं । इलाह शब्द का अर्थ देवता ! अथवा पूजा करने लायक ऐसा होता है, इससे सम्भव है कि इसी पूजा के निमित्त से प्रयाग को इलाहाबाद भी कहते होंगे।
प्रश्न--समवशरण में मानस्तंभादिकों की उंचाई का क्या प्रमाण है ?
उत्तर-समवसरण में मानस्तंभादिकों की ऊंचाई-जो मानस्तंभ, ध्वजास्तंभ, चैत्यवृक्ष, सिद्धार्थ वृक्ष, स्तूप, तोरण, कोट, गृह वनवेदिका आदि रहते हैं उनकी ___ऊंचाई तीर्थंकरो के शरीर से बारह गुणी होती हैं।
प्रश्न- केवली कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर--केवली भगवान सामान्यता से दो प्रकार के होते हैं । एक तीर्थकर केवली और दूसरे सामान्य केवली । उनमें तीर्थंकर केवलियों में पञ्चकल्याणक तीर्था
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६८४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि कर केवली, तीन कल्याणक तीर्थकर केवली, और दो कल्याणक तीर्थकर केवली आदि भेद. पाये जाते हैं । और सामान्य केवलियों के भी उपसर्ग केवली, अन्तःकृत केवली, मूक केवली, अनुबन्ध केवली या. अनुबद्ध केवली इत्यादि भेद होते हैं। तीर्थकर केवली और अन्य सामान्य केवली में अंतर-- . .
केवलज्ञानादि गुणों की अपेक्षा तीर्थकर केवली तथा अन्य सामान्य केवलियों में कोई अन्तर नहीं है । तथापि जिन्होंने धातिया कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त किया है, वे सामान्य रूप से केवली. भगवान कहे जाते हैं। और जिन्होंने पहिले तीर्थाकर नाम कर्म प्रकृति बंध किया हो और केवलज्ञान प्राप्त किया जाता है तो वे तीर्थकर केवली भगवान कहे जाते हैं। तीर्थंकरों कि अलौकिकता--- . तीर्थकर केवलियों की विशेष अलौकिकता है-तीर्थकर और सामान्य केवली इन दोनों में जो कुछ अंतर है वह निम्न प्रकार समझना चाहिथ । ... तीर्थकर केबली भगवान के तीर्थंकर प्रकृति रूप विशेष पुण्य के उदय से उनकी इन्द्रादिक पंचकल्याणादि के रूप में विशेष भक्ति करते हैं और बाह्य में जिनके उत्कृष्ट समवशरणादि रचना रूप वैभव पाया जाता है ऐसी बातें सामान्य केवलियों में नहीं होकर केवल गंधकुटी की रचना होती है।
तीर्थकर केवली भगवान के समान सामान्य केवली भगवान की दिव्य ध्वनि से जीवों को शान्ति भी मिलती है। तत्वों का ज्ञान भी प्राप्त होता है । इस प्रकार दोनों के धर्मोपदेशादि की समानता के होते हुये भी उनमें महत्वपूर्ण यह अन्तर है कि तीर्थंकरों का तीर्थप्रवर्तन काल चलता है। एक तीर्थंकर के मोक्ष होने के पश्चात् जब । तक दूसरे तीर्थंकर उत्पन्न नहीं होते, तब तक उन मोक्ष प्राप्त तीर्थंकर का तीर्थ ।। प्रवर्तन काल माना जाता है । सामात्य केवली में ऐसी बात नहीं होती है।
इस अवपिणी काल में ऋषभादि वर्धमान तक केवल चौबीस तीर्थकर हुये हैं, किन्तु इन एक-एक तीर्थकाल में प्रसंख्य भव्य जीवों ने केवली होकर मोक्ष पद प्राप्त किया है । तीर्थंकरों की यही अल्पसंच्या उनकी अलौकिकता को सम्यक प्रकार से स्पष्ट कर देती है। पांच कल्याणकों के धारी तीर्थंकर---
पंच कल्याणक तीर्थीकर केवली-भरत, ऐरावत और विदेह क्षेत्र में पांच मेह
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अध्याय आठवां ]
[ ६८५
सम्बन्धी १७० कर्म भूमियों में होते हैं । भरत, ऐरावत क्षेत्र में चतुर्थ काल ( अवसfret के दुषमसुषमकाल ) में होते हैं । और उत्सर्पिणी के तृतीय काल ( दुषमसुषम काल ) में होते है । विदेह क्षेत्र में सदैव होते रहते हैं । विदेह क्षेत्र की अपेक्षा जिसने पहले भव में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया है वही पंच कल्याणं तीर्थंकर कहलाता है। तीन अथवा दो कल्याणक केवली
तीन और दो कल्याणक तीर्थंकर केवली -पूर्व अपर (पश्चिम) दोनों विदेह क्षेत्रों में पंचमेरु सम्बन्धी १६० विदेह क्षेत्रों में होते हैं । जिन्होंने गृहस्थ अवस्था में रहते हुये तीर्थंकर प्रकृति का बंद कर लिया है उनके कल और मोक्ष ये तीन कल्याणक होते हैं और जिन्होंने मुनि होकर तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया है, उनके ज्ञान और मोक्ष ये दो कल्याणक होते हैं ।
उपसर्ग केवली -- जिनके उपसर्ग अवस्था में केवलज्ञान हो उनको 'उपसर्ग केवली' कहते हैं । जैसे श्री पार्श्वनाथ भगवान । हुन्डोवसर्पिणी काल के सिवाय अन्य काल के तीर्थंकरों के उपसर्ग नहीं कहे गये हैं ।
अन्तःकृत केवली -
अन्तः कृत केवली - जो केवलज्ञान के उत्पन्न होते ही लघु धन्तमुहूर्त में मोक्ष प्राप्त करते हैं, उनको 'अन्तःकृत केवली' कहते हैं । जैसे पांडयादि । जिस प्रकार नेमिनाथ तीर्थंकर के तीर्थकाल में कुमार भ्रमण गजकुमार घोर उपसर्ग को सहन करते हुये अन्तःकृत केवली हुये हैं, इसी प्रकार चौबीस तीर्थकरों के तीर्थकाल में दस-दस अन्तः कृत केवली हुए हैं। इनका वर्णन द्वादशांग वाणी के आठवें अंग हुआ है, उसका नाम है अन्तःकृत दशांग | श्री वर्धमान भगवान के तीर्थंकाल में होने वाले तथा अत्यन्त arer उपसर्गों को जीत कर सम्पूर्ण कर्मों का क्षय करने वाले दस मन्तः कृत केवलियों इस प्रकार नाम कहे हैं ---
नमि, पतंग, सोमिल, रामपुत्र, सुदर्शन, यसकील, बलोक, किस्किबल, मालम्ब तथा अष्टपुत्र । इस प्रकार तत्वार्थ राजवार्तिक पृष्ठ ५१. में और धवला भाग १६-१०३ में लिखा है । हरिवंश पुराण में कहा कि
दह्यमानशvisit शुक्लध्यानेन कर्मणाम् । अंतःकृत्or at मोक्षमन्तः कृत्केवली मुनिः ॥ १६२२||
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[ गो. प्र. चिन्तामणि मूक केवली
मूक केवली--कोई-कोई केवली भगवान उपदेश नहीं देते हैं अर्थात् जिनकी वारणी (दिव्य ध्वनी)नहीं खिरती है, उनको 'मूक केवली' कहते हैं । लाटा संहिता सर्ग १ में कहा है कि लूक गल्ली रात कृष् केवली की वारणी नहीं खिरती है । अनुबन्ध या अनुबद्ध केवली--
. अनुबन्ध या अनुबद्ध केवली-श्री महावीर भगवान के मोक्ष होने के पश्चात् गौतम स्वामी ने केवल ज्ञान प्राप्त किया। उनका मोक्ष होने पर सुधर्मा स्वामी ने केवलज्ञान प्राप्त किया पश्चात् जम्बू स्वामी केवली हुए । इस प्रकार परिपाटी क्रम से केवलज्ञान प्राप्त करने वालों को अनुबंध या अनुबद्ध केवली कहते हैं । इस दृष्टि से जम्बू' स्वामी को अन्तिम केवली कहा गया है। यदि यह परिपाटी क्रम दृष्टि में न रखा जाय तो कुन्डलगिरि से अंत में मोक्ष प्राप्त करने वाले श्री धर केवली को अन्तिम केवली तथा मुक्ति प्राप्त करने वाला कहा गया है (देखो तिलोयपण्णति, पृष्ठ ३३८) तीर्थकर केवली और सामान्य केवलियों में अन्तर--
तीर्थकर केवली और सामान्य केबलियों के गुण विचार-~पंच कल्याणक तोर्थकर केवली भगवान में १० जन्मातिशय, १० केवल ज्ञान के अतिशय, १४ देवकृत अतिशय, ८ प्रतिहार्य तथा ४ अनंत चतुष्टय इस प्रकार ४६ अतिशय गुण होते हैं । इनको 'जिनगुण' ऐसा भी कहते हैं ।
. कोई-कोई कहते हैं सामान्य केवली के दश जन्मातिशयों को छोड़कर शेष ३६ गुरणं मानना चाहिये । परन्तु सामान्य केवली में अनन्त चतुष्टय का सद्भाव तो नियम से मानना होगा। केवल ज्ञान के दस प्रतिष्पयों में से गगनगमन, चारों दिशाओं में मुखों का दर्शन होना, उपसर्ग का अभाव, कवलाहार का प्रभाव, सर्व विद्याओं का स्वामीपना, नख तथा केशों का नहीं बढ़ना, आदि गुणों का सद्भाव मानना आवश्यक है। इस विषय में पागम का खुलासा वर्णन देखने में नहीं पाया है। किन्तु युक्ति तथा विचार द्वारा इस सम्बन्ध में चिन्तन के लिये पर्याप्त क्षेत्र है। जन्म के जो दस प्रति. शय तीर्थकर भगवान के माने गए हैं. उनमें से केवली की अवस्था में सुगन्धित शरीर का होना, पसीना रहितः होना मलमूत्र का न होना, प्रिय हित मित वाणी का सद्भाव
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अध्याय : आठवां ।
[ ६८७ होना, अतुल बल का सद्भाव होना, रक्त का धवल वर्ण का होना, वज्रमय शरीर होना, इन अतिशयों को मानना अविरोधी दिखता है। जिसके समचतुरस्त्र संस्थान न हो वह भी केवली बन सकता है तथा उसके शरीर में १००८ लक्षणों का सद्भाव नहीं होगा, अतः सातिशय रूपता का प्रभाव भी संभवनीय हो सकता है। इससे जन्म के . सभी अतिशयों का प्रभाव कह देना ठीक नहीं जंचता है। क्योंकि बाहुबली, हनुमान, प्रद्युम्न, जीवन्धर जम्बू स्वामी आदि कामदेवों के सदृश केवली के सातिशय रूपता का सद्भाव स्वीकार करने पर उनके एक गुण की और वृद्धि अन्यों की अपेक्षा मानना उचित होगा । इस प्रकार सामान्य केवली के ३६ ही गुरा मानना उचित नहीं प्रतीत होता है, जैसा कि पूर्व में विवेचन किया जा चुका है।
तीर्थकर केबली और सामान्य केवली इन दोनों के तो 'अनन्त चतुष्टय' और 'अष्ट प्रातिहार्य' रहते हैं। बाकी के गुणों का सामान्य केलवी में नियम नहीं है, के यथायोग्य जानना चहिये। सामान्य केवली भगवान की गंधकुटी में मानस्तंभ रहते हैं या नहीं
___ जैसे तीर्थंकर केवली के समवशरण में मानस्तंभ रहते हैं, उसी तरह सामान्य केवलियों की गंधकुटी में भी मानस्तंभ रहते हैं। सुदर्शन चरित्र में लिखा है कि कुबेर द्वारा सूवर्ण रत्नादिक से युक्त जब गंध कुटी बनकर तैयार हुई थी। उसमें सिंहासन, छत्र, चमर, ध्वजादि सब शास्त्रोक्त रचना की थी इसी तरह वहां गंध कुटी मानस्तम्भों से सुशोभित की गई थी ! इत्यादि वर्णन सुदर्शन चरित्र में आया है। सामान्य केलियों को गंधकुटी में गरधर
सुदर्शन चारित्र में लिखा हैविथ्येन ध्वनिता देवस्तवा सन्मार्गवृत्तये । धर्म तत्वादि विश्वार्थानुवाचेति गणान् प्रति ।।१६२३॥
सामान्य केवलियों के भी गणधर रहते हैं। गरणधरों के अभाव में दिव्यध्वनि नहीं खिरती है। इसलिये तीर्थंकर केवली के समान सामान्य केवलियों के भी गणधर
भगवान सुदर्शन केवली ने मोक्ष मार्ग की प्रवृत्ति बढ़ाने के लिये गणधरों के द्वारा धर्म तथा समस्त तत्व का स्वरूप बता दिया था ।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
६८८]
समवशरण में विद्यमान सात प्रकार के मुनियों की संख्या-
तीर्थंकर केवली भगवान के समवशरण में केवली, पूर्ववर, शिक्षक, विपुलमति मन:पर्यय ज्ञानी, विक्रिया ऋद्धिधारी, अवधिज्ञानी तथा वादी इन सात प्रकार के मुनियों की जो संख्या बताई गई है वह समवशरण में रहने वालों की है या उनके तीर्थकाल में होने वालों की है ?
समाधान-ऋषभदेव के समवसरण में जितने गणधारादि मुनि प्रत्यक्ष रहते थे, उन्हीं की संख्या बताई गई है। यह बात पद्मपुराण के चौथे पर्व में लिखी है । it तरह बाकी प्रत्येक तीर्थकरों के मुनियों की संख्या समझनी चाहिये । योगी जिन कितनी कर्म प्रकृतियों का क्षय करते हैं
,
भगवान ने घातिया कर्मों की ६३ प्रकृतियों का क्षय किया था । इनमें ५ ज्ञानावरण ६ दर्शनावरण, २८ मोहतीय तथा ५ अंतराय, मनुष्यायु को छोड़कर शेष तीन ग्रायु तथा १३ नाम कर्म की प्रकृतियाँ हैं । इस सम्बन्ध में बला टीका का यह कथन भी विचार है 'एदेसु सहि-कम्मेसु खीसु सयोगिजियो होदि -योगिकेवली a fiचि कम्मं खवेदि ।' (भाग १ पृ० २२३ )
इन कर्मों में साठ प्रकृति कर्मों के क्षय होने पर संयोगी जिन होता है । सयोग केवली किस कर्म का क्षय नहीं करते हैं ।
प्रश्न :-- सर्वत्र श्रागम में ६३ प्रकृतियों के क्षय को परम्परा प्रसिद्ध है, तब धवला टीका में ६० प्रकृतियों का क्षय क्यों कहा गया है ? उत्तर :- तत्वार्थ राजarfe में कर्मों के के न तथा साध्य इस प्रकार दो भेद कहे हैं। चरम शरीरी जीव के नरकायु, देवायु, तथा तिर्यञ्चाधु का सत्व न होने से बिना प्रयत्न के अभाव माना गया है। कहा भी है वो द्विविधो, यत्न साध्योऽयत्न साध्यश्चेति । तत्र चरमदेहस्य नरक तिर्यग्देवायुषामभावोऽयल विचार कर केवली के साध्य:' ( ६,३६१, अ० १० सुत्र २ ) अतएव सामान्य दृष्टि ६३ प्रकृतियों का अभाव कहा गया है । यत्न साध्य अर्थात् पौरूष द्वारा संपादित कर्माभाव को ध्यान में रखकर धवला टीका में ६० प्रकृतियों के अभाव से केवली पद की प्राप्ति प्रतिपादित की गई है ।
शेष रही श्रघाति कर्मों की ८५ प्रकृतियों में से ७२ प्रकृतियों का प्रयोग जीवन
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अध्याय : पाठवां ।
[ ६८६ केवली के उपांत्य समय में क्षय होता है और १३ प्रकृतियों का क्षय अयोगी के अंतिम समय में होता है । इस दृष्टि से खुलासा हो जाता है कि सयोगी जिन के किसी भी कर्म का क्षय नहीं होता है । अरिहन्त या अहल् शब्द गुरणवाचक है--
अन्य संप्रदायों में केवली शब्द के स्थान में जिनेन्द्र देव की अर्हत् या अरिहन्त के रूप में प्रसिद्ध है। ऋग्वेद में अर्हन्त का उल्लेख पाया है अर्हन्इदं दयसे विश्वमम्वम्। मुद्राराक्षस नाटक में जो अर्हन्त के शासन को स्वीकार करेंगे, वे मोह व्याधि के वैद्य हैं, ऐसा उल्लेख पाया है 'मोहवाहिवेज्जाणं अलिहन्ताणसासरणं पडिबज्जह ।' हनुमन्त नाटक में लिखा है 'महन्त इत्यथ जैन शासनरताः' जैन शासन के भक्त अपने आराध्य देव को अर्हत् कहते हैं।
यह अरहंत शब्द गुण वाचक है। जो भी व्यक्ति घातिया कर्मों का विनाश करता है, वह अरहन्त वन जाता हैं । अतः यह शब्द व्यक्ति वाचक न होकर गुरण
___ 'अ' का अर्थ विष्णु 'अकारो विष्णुनामस्यात् । केवली भगवान केवलज्ञान के द्वारा सर्वत्र व्याप्त है, अतः 'अ' का अर्थ होगा केवली भगवान, 'र' का अर्थ है राग कोश में कहा है 'रागेबलेखे' इत्यादि, 'ह' हनन करने वाले वाचक है। हर्षे च हननेहः, स्यात् । 'त' शूर वीर वाचक है । कहा भी है 'शूरे चौरे च तः प्रोक्तः ।
धवला ग्रन्थ में 'अरहताणं' पर प्रकाश डालते हुये लिखा है--अरिहननात् अरिहंता । नरक-तिर्वक्कुमानुष्य-प्रेताःयासगताशेष दुःख प्राप्ति निमित्तत्वात् अरिमोहः । तस्यारेहननादरिहन्ता । अर्थात् अरि के नाश करने से अरिहंत है नरक, तिर्यञ्च, कुमानुष, प्रेत इन पर्यायों में निवास करने से होने वाले समस्त दुःखों की प्राप्ति का निमित्त कारण होने से मोह को अरि अर्थात् शत्रु कहा है । उस मोह शत्रु का नाश करने से अरिहत हैं।
. अन्य कर्म महनीय कर्म के प्राधीन हैं, क्योंकि मोहनीय कर्म के बिना शेष कर्म अपना कार्य करने में समर्थ नहीं होते हैं। बारहवें क्षोण मोह गुणस्थान की प्राप्ति होने पर अन्त समय में पंच ज्ञानावरण, पंच अंतराय, तथा दर्शनावरण चतुष्टय शीघ्र नष्ट हो जाते हैं और झीरण मोहि आत्मा केबली, स्नातक, परमात्मा, जिनेन्द्र बन्न जाता है।
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६९०
[ गो. प्र. चिन्तामणि 'रजोहननाद्वा अरिहन्ता ज्ञान दगावरणानि रजांसीव बहिरंगान्तरंगा शेष - त्रिकाल गोचरानन्तार्थ-व्यंजन परिणामात्मक-वस्तुविषय-बोधानुभव प्रतिबंधकत्वात् रजांसि' अथवा रज का नाश करने से अरिहंत हैं, ज्ञानावरण तथा दर्शनावरण रज के समान हैं । बाह्य तथा अन्तरंग समस्त त्रिकाल गोचर अनंत अर्थ पर्याय और व्यंजन पर्याय स्वरूप वस्तुओं को विषय करने वाले बोध तथा अनुभव के प्रतिबंधक होने से वे ज्ञानावरण, दर्शनावरण कर्म रज हैं। मोहनीय कर्म भी रज है, क्योंकि जिस प्रकार जिनका मुख भस्म से व्याप्त होता है, उनमें जिम्ह भाव अर्थात् कार्य की मंदता देखी जाती है । उसी प्रकार मोह से जिनका आत्मा व्याप्त हो रहा है, उनके भी जिम्ह भाव देखा जा सकता है । अर्थात् उनकी स्वानुभूति में कालुष्य मन्दता या कुटिलता पाई जाती है । इन तीन कर्मों के क्षय के साथ अन्य कर्मों का नाश अवश्यंभावी है । अतएव उक्त रजों के नाश करने से जिनेन्द्र अरिहन्त हैं।
रहस्याभावाद्वा अरहिन्ता रहस्यमंतरायः तस्य शेषधातित्रितय-विनाशाविना. भाविनो भ्रष्टबीजवन्तिः शक्ति कृता पाति कर्मणो हननादरिहन्ता । रहस्य का प्रभाव करने से अरिहन्त हैं। अंतराय कर्म रहस्य है । उस अन्तराय कर्म के क्षय का ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा मोहनीय कर्म के क्षय के साथ अधिनाभाव है, अन्तराय के नाश होने पर अधातिया कर्म भ्रष्ट बीज के समान शक्ति रहित हो जाते हैं । अतएव अन्तराय के क्षय से जिनेन्द्र को अरिहन्त कहते हैं ।
जिन भगवान को अहंत भी कहते हैं । 'अतिशयपूजाहत्वाद्वाहतः । स्वर्गावतरण-जन्माभिषेक-परिनिष्क्रमण केवल ज्ञानोत्पत्ति-परिनिर्वाणेषु देवकृतानां पूजानां देवासुरमानव प्राप्त पूजाभ्योऽधिकत्वादतिशयाना महत्वा द्योग्यत्वादहन्त : अतिशय युक्त पूजा को प्राप्त होने से अर्हन्त हैं । स्वर्गावतरण, जन्माभिषेक, परिनिष्क्रमरण अर्थात् दीक्षा, केवलज्ञान की उत्पत्ति तथा परिनिर्धारण रूप पांच कल्याणकों में देवकृत पूजाएँ सुर, असुर, मानवी की पूजाओं से अधिक होने से अतिशयों के अर्ह अर्थात् योग्य होने से अर्हन्त हैं। मूलाचार में कहा है--
प्ररहन्ति वमोक्कारं परिहापूजा सुरतमा लोए । रअहंता अरिहतिय अरहन्ता तेगा उच्चंछे ।।१६२४॥
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अध्याय : आठवां ]
जो नमस्कार करने योग्य हैं. पूजा के अह अर्थात योग्य हैं, लोक में देवों में उत्तम हैं । रज अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण के नाश करने वाले हैं, अथवा अरि अर्थात् मोहनीय और अंतराय के नाश करने वाले हैं, इससे अरिहन्त कहते हैं । टीकाकार प्राचार्य वसुनन्दि सिद्धान्त चक्रवर्ती लिखते हैं 'येनेह कारणनेत्थंभूतास्तेनाहत्तः सर्वज्ञाः सर्वलोकनाथा लोकेऽस्मिन्नुच्यन्ते। वे इन कारणों से. इस प्रकार हैं, अतएव उनको अर्हन्त, सर्वज्ञ, सर्वलोक के नाथ इस लोक में कहते हैं।
केवली भगवान को अन्तरंग कर्म के क्षय करने की दृष्टि से अरहिन्त कहते हैं । मूलाचार में कहा है---
अरिहन्ति बंदण -- रामसारिण अरिहन्ति पूय-सरकारं । श्ररहन्ति सिद्धिगमणे अरहन्ता तेरण उच्चंति ॥१६२५॥
वन्दना तथा नमस्कार के योग्य हैं, पूजा-सत्कार के योग्य हैं, सिद्धि ममन के योग्य हैं, इससे इन जिनेन्द्र को अरहन्त (अर्हत) कहते हैं।
कभी-कभी यह शंका उत्पन्न होती है कि 'रामो अरिता पाठ ठीक है या 'मो अरहताएं पाठ ठीक है ? उपरोक्त विवेचन के प्रकाश में यह विदित होता है कि दोनों पाठ सम्यक् हैं । बृहत् प्रतिकभरा पाठ के सूत्र में गौतम गणधर बताते हैं 'सुत्तस्य मूलपदाण मच्चासणदाएं' अर्थात् आगम के मूल पदों में होनता कृत जो दोष उत्पन्न हुआ है, उसका मैं प्रतिक्रमण करना चाहता हूँ। प्रभाबन्द्राचार्य की टीका में ये शब्द प्राये हैं--
सूयस्य आगमस्य सम्बन्धिनां मूलपदानां प्रधान पदानामत्या सादनता हीनता तस्यां यः कश्चिदुत्पन्नोदोषस्तं प्रतिक्रमितु मिच्छामि । इसका उदाहरण देते हये कहते हैं---'तं जहा गमोक्कारपदे णमो अरहतारणमित्यादिलक्षणे पंचनमस्कार पदे याज्यासादनता तस्यां अरहत पदे इत्यादि 'अहदादीनांवाचके पदे यायासादनता तस्यां मंगलपदे चत्तारिमंगलमित्यादि लक्षणे, लोगुत्तमपदे चत्तारि लोगुत्तमा, इत्यादि स्वरूपे सरणपदे चत्तारिसरणं पन्धज्जामि इत्यादि लक्षणे...........' (पृष्ठ १३६) इसमें उल्लेखनीय बात यह है कि मौतम स्वामी रामोकार पद के द्वारा मो अरहता इत्यादि पंच नमस्कार पद का संकेत करते हैं । इससे यह 'भो अरहताण' नादि पद रूप नमस्कार मंत्र षट् खंडागम सूत्रकार भूतबलि-पुष्पदंत कृत है। यह प्राधुनिक प्रचार भ्रांत प्रमाणित होता है। इसके पश्चात् 'अरहन्त पदे' शब्द का प्रयोग पाया है,
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६६२ ]
गो. प्र. चिन्तामणि परिहन्त पद शब्द नहीं है । प्रतएव दोनों पाठ भिन्न-भिन्न दृष्टियों से सम्यक हैं । सूक्ष्म विचार से ज्ञात होगा कि बारहवें गुणस्थान के अंत में भगवान अरि समूह का नाश करने से अरिहन्त हो गये । इसके अन्तर सुरेन्द्रादि देवगरण अाकर जब केवलज्ञान कल्याणक की पूजा करते हैं, तब 'अरिहन्ति पूर्य सक्कार' इस दृष्टि से उनको अर्हन्त कहेंगे । उनका 'अरहन्त' रूप प्राकृत भाषा में पाया जाता है ।
णमो अरिहन्ताणं रूप पंच नमस्कार मंत्र का भूत बलि-पुष्पदंताचार्य के पहले सद्भाव था। इसके प्रमाण उपलब्ध होते हैं । मलाराधना नाम की भगवती पाराधना पर रचित टीका में पृष्ठ २ पर यह महत्त्वपूर्ण उल्लेख आया है, कि सामायिक आदि अमबाह्य भागम में तथा लोक बिन्दुसार है, अन्त में जिसके ऐसे चौदह पूर्व साहित्य के प्रारम्भ में गौतम गणधर ने णमो अरहन्तारणं इत्यादि रूप से पंच नमस्कार पाठ लिखा है । जब गणधर देव रचित अंग तथा अंग बाह्य साहित्य में एमो गरहन्ताणं इत्यादि मंगल रूप से कहे गये हैं। तो फिर इनकी प्रचलित मान्यता निर्दोष रहती है, जिसमें यह पढ़ा जाता है 'अनादिमूलमंत्रोऽयम्' । मूलाराधना टीका के ये शब्द ध्यान देने योग्य हैं, 'यद्येवं सकलश्रुतस्य सामयिकादेर्लोक बिन्दुसारान्तस्यादौ मंगलं कुर्वद्भिर्गणधरैः समो प्ररहन्तारणमित्यादिना कथं पंचानों (परमेष्टिनां) नमस्कारः कृतः ?
वृहत्प्रतिक्रमरण पाठ में दोष शुद्धि के लिये गौतम मरणधर ने यह लिखा है, 'मूलगुणसु उत्तरगुणेसु अइक्कमो जाव अरहन्ताण भयवंताएं पज्जुवासं करेमि तात्रकायं (बोसिरामि) पृष्ठ १५१)।' टीकाकार पज्जुवास अर्थात् पुर्यपासना का स्वरूप इस प्रकार कहते हैं कि २२४ उचासों द्वारा १०८ बार पंच नमस्कार मंत्र का उच्चारण करे । टीकाकार प्रभाचन्द्र आचार्य के शब्द इस प्रकार है 'पज्जुवासं करेमि - एकाग्रेशण हि विशुद्ध न मनसा चतुर्शित्युत्तर शतात्रयाधु च्छ्वासैरष्टोत्तर शतादिवारान् पंचनमस्कारोच्चारणमहतां पर्यकासनकरण तद्यावत् कालं करोमि ........।' पंच समस्कार मंत्र का तीन उच्छवासों में पाठ करने का 'मुनियों के प्राचार ग्रन्थों में प्रतिक्रमण प्रायश्चित्तादि के लिये उल्लेख पाया जाता है । मुनि जीवन के लिये जैसे २८ मूलगुरण प्रारण स्वरूप हैं. इसी प्रकार यह मूलमंत्र भी अत्यन्त आवश्यक है । पैतीस अक्षरात्मक यह मूल मंत्र जैन उपासक तथा पाश्रम जीवन के लिये प्रावश्यक है । भूतबलि-पुष्पदन्त के पश्चात् इसकी रचना भानना जीवद्वारण के निबद्ध अनिबद्ध भेद युक्त मंगल चर्चा के
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अध्याय आठवां ]
[ ६६३
आधार पर कहा जाता है। यह भी विचार तर्क संगत नहीं है । जीवट्ठा की चर्चा पर आदर्श प्रति के आधार से विचार किया जाये, तो विदित होगा कि वीर सेनाचार्यको भूतबलि दुखतंताचार्य रहित नहीं माना है । अलंकार चिन्तामणि में अन्य ग्रन्थकार रचित मंगल को अनिबद्ध मंगल कहा है । 'परकृतमनिबद्धं । जीवद्वाण ग्रन्थ का विशेषण बाह्य है, "इदं पुरा जीवद्वारा बिमंगल" ( पू. ४१) भ्रम से लोग 'निबद्ध मंगलं यस्मिन् तत्' इस प्रकार अर्थ विस्मरण कर पारिभाषिक निबद्ध मंगल मान बैठते हैं । जीवलाण ग्रन्थ के आदि में मंगल है | ग्रन्थ को ही निबद्ध मंगल कहना प्रसंगत बात होगी । अतः यह अर्थ उचित होगा कि इस जीवद्दारण ग्रन्थ में मंगल निबद्ध किया है । जब गौतम गणधर ने reter मंत्र को अपने द्वारा निबद्ध ग्रागम ग्रन्थों में लिखा है, तब जीवट्ठाण में afra विवेचन का विरोधी अर्थ करना विज्ञ व्यक्तियों का कर्तव्य है ।.
प्रश्न :- अपराजित मूल मंत्र में 'खमो अरहन्तार' को प्रथम स्थान क्यों दिया गया है ?
उत्तर - पूज्यता की दृष्टि से प्रष्ट कर्मों का क्षय करने वाले सिद्ध भगवान को प्रणाम रूप ' णमो सिद्धाणं' पद पहले रखा जाना चाहिये था, किन्तु अपराजित मूल मंत्र में 'रामो अरहन्ता' को प्रथम स्थान पर रखा है। रहस्य है ।
इसका विशेष
सम्यग्ज्ञान के द्वारा इष्ट पदार्थों की उपलब्धि होती है । उस ज्ञान का साधन शास्त्र हैं । उन राज्यों के मूल कर्ता मरहन्त भगवान हैं । इस कारण जीव मोक्ष प्राप्त करने वाली जिनवाणी के जनक होने से जिनेन्द्र तीर्थंकर सर्व प्रथम वन्दनीय माने गये हैं, क्योंकि उपकार को न भूलना सत्पुरुषों का मुख्य कर्तव्य है । उपकार करने वाले प्रभु का स्मरण न करने से कृतघ्नता का दोष लगता है । नीच माने जाने वाले पशु तक अपने उपकारी के उपकार को स्मरण रखते हैं, तब विचारवान मनुष्य को तो कृतज्ञता की मूर्ति बनना चाहिये । उपकृत व्यक्ति की दृष्टि में उपकर्ता का सदा अन्य की अपेक्षा उच्च स्थान माना गया है ।
हरिवंश पुराण में एक कथा आई है. चारूदत्त ने मरते हुए बकरे के कान में पंच नमस्कार मंत्र दिया था । उस मंत्र से बकरा सौधर्म स्वर्ग में देव हुआ । वह देव कुकंटक नामक द्वीप के कर्कोटक पर्वत पर जिन चैत्यालय में विद्यमान मुनिराज के चरणों के समीप स्थित चारुदत्त के पास पहुँचा । उस देव ने पहले चारुदत्त को
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
प्रणाम किया था, मुनिराज की वन्दना बाद में की थी। उस देव ने कहा था जिन धर्मोपदेशक: चारुदत्तो साक्षात् गुरुः' जिन धर्म का उपदेश देकर मेरी आत्मा का उद्धार करने वाले चारुदत्त मेरे साक्षात गरु हैं, क्योंकि 'दतः पंचनमस्कारो मरणे करणावता' (२१-१५०) उन्होंने करुणापूर्वक मुझे मरण समय पर पंच नमस्कार मंत्र प्रदान किया था।
जातोऽहं जिन धर्मेण सौधर्मो विबुवोत्तमः । चारुदत्तो गुरुस्तेन प्रथमो नमितो मया ॥१६२६॥
जिन धर्म के प्रभाव से मैं सौधर्म स्वर्ग में महान देव हुमा हूँ। इस कारण मैंने अपने गुरु चारुदत्त को सबसे पहले प्रणाम किया है । हरिवंश पुराग की यह शिक्षा चिरस्मरणीय है :
अक्षरस्यापि चैकस्य पदार्थस्य पदस्य था । दातारं विस्मरन् पापी कि पुनर्धर्मदेशिनम् ।।१६२७॥
एक अक्षर का अथवा एक पद का या पदार्थ के दाता को विस्मरण करने वाला पापी है, तब फिर धर्म के उपदेशक को भूलने वाला महान पापी क्यों न होगा ?
__ इस कथन के प्रकाश में अरहन्त भगवान का अनन्त उपकार सर्वदा स्मरणीय है और उनके चरण युगल सर्व प्रथम वन्दनीय हैं ।।
__ प्राचार्य वीरसेन ने अरहन्त भगवान के सम्बन्ध में यह सुन्दर गाथा धवला टीका में उद्धृत है :---- .
तिरयण तिसूल धारिय मोहं धासुरक बंधविदहरा । सिद्धसयलप्परुवा अरहंता दुप्पणयकयंता ॥१६२८॥
जिन्होंने रत्नत्रय रूप त्रिशूल को धारण कर मोह रूपी अंधकासुर के कबंध चन्द का हरण किया है और अपने सकल प्रात्म स्वरूप को प्राप्त कर लिया है, वे. मिथ्या पक्षों के विनाश करने वाले अरहन्त भगवान हैं ।
मूलाचार में लिखा है कि ये अरहन्त भगवान जगत में त्रिविधतम अर्थात् तीन प्रकार के अन्धकारों से विमुक्त हैं, इस सम्बन्ध की गाथा विशेष महत्त्वपूर्ण है--
मिच्छत्तवेदीयं पारणावरणं चरित मोहं च । तिविहा तयाहु मुक्का तम्हा ते उत्तमा होति ॥१६२६॥
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अध्याय आठवा ]
[ ६६५
ये चौबीस तीर्थङ्कर लोक में उत्तम कहे गये हैं, क्योंकि ये मिथ्यात्व वेदनीय, ज्ञानावरण तथा चारित्र मोहनीय इन तीन प्रकार के अन्धकारों से मुक्त हैं । संस्कृत टीकrare वसुनन्दि सिद्धान्त चक्रवर्ती ने लिखा है, "त्रिविधं तमस्तस्मात् मुक्ता यतस्तस्मात्ते उत्तमाः प्रकृष्टा भवन्ति ।" इसका भाव यह है कि अरहन्त भगवान मिथ्यात्व अंधकार से रहित होने से सम्यक्त्व ज्योति से शोभायमान हैं । ज्ञानावरण के क्षय होने से केवलज्ञान समलंकृत हैं । चारित्र मोह के प्रभाव होने से परम यथाख्यात चारित्र संयुक्त हैं । मिथ्यात्व अज्ञान तथा असंयम रूप अन्धकार के होते हुए यह जीव परमार्थ दृष्टि से उत्तम ( उत् अर्थात् रहित + लम अन्धकार ) अर्थात् अन्धकार रहित नहीं कहा जा सकता है। लोक में श्रेष्ठ पदार्थ को उत्तम कहते हैं । तत्त्व दृष्टि से मुमुक्षु जीव अरहन्त भगवान को उत्तम अर्थात् उत्तम मानता है । मोहनीय कर्म पाप प्रकृति है । इसके भेद राग भाव को भी पाप रूप मानना होगा, किन्तु वह रागभाव अरहन्त भगवान तो वह जीव को कुगतियों से बचाकर परम्परा से मोक्ष का अतः मूलाचार में 'अरहंतेषु यत्रो --स सत्थराम्रो राग प्रशस्त राग अर्थात् शुभ राग कहा है, (देखो गाथा ७३, ७४ षडावश्यक अधिकार )
के विषय में होता है, कारण हो जाता है, अरहन्तों में किया गया
अरों को नमस्कार करने से जीव सम्पूर्ण दुःखों से छूट जाता है । जो यह सोचते हैं कि अरहन्त का स्मरण करने से मन में संग भाव होता है, वह FE का वर्धक ही होगा । उससे आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता है | यह धारणा सद्विचार, विवेक तथा आगम के प्रकाश में भ्रम मूलक प्रमाणित होती है । वीतराग की भक्ति के द्वारा श्रात्मा में लगा हुआ अनादि कालीन मोहज्वर दूर हो जाता है । धर्मशर्माभ्युदय में एक सुन्दर बात कही गई है जिनेन्द्र देव के चरण कमल की भक्ति रज से कषाय मैल से मलिन अन्तःकरण रूप दर्पण को मांजने से वह श्रात्म दर्पण स्वच्छ हो जाता है और तब उस नाम दर्पण में समस्त चराचर जगत् की वस्तुयें प्रतिबिम्बित होने लगती हैं ।
इस अरहन्त नमस्कार रूप 'रामो श्रहन्तार' पद का महत्व इस गाथा में कहा है । (देखो मूलाचार ) :
अरहंत मोवकारं भावेण थे जो करेदि पदमयो ।
सो सव्व दुक्ख मोक्खं पावदि ग्रचिरेण काले ।।१६३० ।।
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६६६ ]
। गो. प्र. चिन्तामणि जो व्यक्ति सावधान होकर भक्ति भाव से अरहन्त भगवान को नमस्कार जनता है, वह मानव शीघ्र ही समस्त दुःखों से छूट जाता है ।
प्रश्न :- तीर्थकर के केवलो अवस्था में नौ केवल लब्धियां अर्थात् भोगोप. भोग आदि के सद्भाव होने का क्या रहस्य है ?
उत्तर :- केवली भगवान की परम केवल लब्धियां प्राप्त होती हैं :--- (१) दर्शनावरण कर्म के क्षय होने से अनन्तदर्शन-क्षायिक दर्शन की प्राप्ति होती है। (२) ज्ञानावरण , अनन्तज्ञान-क्षायिक ज्ञान की (३) वीर्यान्तराय , अनन्तवीर्य-क्षाधिक वीर्य की (४) चारित्र मोहनीय , अनन्तसुख-क्षायिक चारित्र की (५) दर्शन मोहनीय , अनन्तदर्शन-क्षायिक सम्यक्त्व की (६) दानान्तराय , क्षायिक दान की (७) लाभान्तराय , क्षायिक लाभ की (८) भोगान्तराय ,
क्षायिक भोग की (६) उपभोगान्त राय ,
क्षायिक उपभोग इस प्रकार चार धातिया कर्मों के क्षय से नौ परम केवल लब्धियाँ प्राप्त होती हैं । इन्हीं को जीव के असाधारण क्षायिक भाव भी कहते हैं। प्रश्न :-~-जिस समय तीर्थकर भगवान ने निग्रन्थ दीक्षा धारण की थी,
उस दीक्षा के समय वे भगवान सर्व प्रकार के परिग्रह का त्याग कर चुके थे, तब उनके केवल ज्ञान अवस्था में भोगः उपभोग के सद्भाव होने का क्या रहस्य है ? इसी प्रकार पदार्थों के अभाव
में उनमें दान के कथन का क्या भाव है ? उत्तर :-जो पदार्थ एक बार सेवन में आता है, उसे भोग कहते हैं, जैसे पुष्पमाला। जो अनेक बार भोगने में आता है, उसे उपभोग कहते हैं, जैसे वस्त्र । भगवान परम वीतरागी होने से सम्पूर्ण परिग्रह के पाप से उन्मुक्त हैं, फिर भी तीर्थंकर प्रकृति के विपाक काल में वैभव तथा विभूति की इतनी वृद्धि होती है कि संसार में उन तीर्थकर के समान कोई वैभव शाली नहीं है, फिर भी प्रांतरिक त्याग के अनुकूल वे उस वैभव से दूर रहते हैं। उस वैभव का उपयोग तो दूसरी बात है, स्पर्श भी नहीं करते है । अनन्त अतीन्द्रिय प्रात्मोत्थ आनन्द का रसास्वाद आने से उन वीतराग
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अध्याय : आठवां ] प्रभु की दृष्टि कर्माधीन सुख की ओर से पूर्ण विमुख है।
राजवातिक में लिखा है-'सम्पूर्ण भोगांतराय के तिरोभाव हो जाने से अतिशयों का अविर्भाव होने से भगवान के क्षायिक अनन्त भोग होता है। इसके फल स्वरूप पंचवर्ण युक्त सुगन्धित पुष्पों की वर्षा चरणों के निक्षेप के स्थान में अनेक प्रकार की दिव्य गंध युक्त सात कमलों की पंक्ति, सुगन्धित धूप, सुखद और शीतल पवनादिक प्राप्त होते हैं । कृत्स्नस्य भोगांतरायस्य तिरोभावादाविर्भूतोऽतिशयवाननंतो भोगः क्षायिको, यत्कृताः पंचवर्ण सुरभि कुसुमवृष्टि विवध, दिव्य गंध चरण निक्षेप स्थान सप्तपद्मपंक्ति सुगंधित धूप सुख शीतमारुतादयो भावाः ।'
- क्षायिक उपभोग के विषय में प्राचार्य का कथन है परिपूर्ण रूप से उपभोगान्तराय कर्म के नाश होने से उत्पन्न होने वाला अनन्त उपभोग क्षायिक है । इसके कारण सिंहासन, बाल व्यजन (पंखा) अशोक वृक्ष, छत्रत्रय, प्रभा मंडल, गम्भीर तथा मधुर स्वर रूप परिणमन होने वाली देव दुन्दुभि आदि पदार्थ होते हैं, 'निरबशेषस्योपभोगान्तराय कर्मणः प्रलयात्प्रादुभूतोऽनंत उपभोगः क्षायिको, यत्कृताः सिंहासन-बाल व्यजन अशोकपादप-क्षत्रत्रय-प्रभामण्डल-गम्भीर-स्निग्ध स्वर परिणाम-देवदुन्दुभिप्रभृतयो भावाः (पृ०७३)
- भगवान के द्वारा दिए जाने वाले क्षायिक दान पर अकलंक स्वामी इस प्रकार प्रकाश डालते हैं दानान्तराय कर्म के अत्यन्त क्षय होने से उत्पन्न होने वाला त्रिकाल गोचर अनन्त प्रारणी मात्र का अनुग्रह करने वाला क्षायिक अभय दान होता हैं । 'दानान्तरायस्य कर्मणोऽत्यन्त संक्षयादाविर्भूतं त्रिकालगोचरानन्त-प्रारिणगणानुरह करं क्षायिकमभयदान (पृ० ७३) . . जिनेन्द्र भगवान के कारण अनंत जीवों को कल्याणदायी तथा अविनाशी सुख का कारण अभयदान प्राप्त होता है, उसकी तुलना संसार में नहीं की जा सकती है । अन्य दोनों का सम्बन्ध शरीर तक ही सीमित है । यह वीतराग प्रभु का दान आत्मा को अनंत दुःख से निकालकर अविनाशी उत्तम सुख में स्थापित करता है । यह सामर्थ्य अलौकिक है।
प्रश्न :--सिद्ध भगवान में अभयदानादिक का सद्भाव कसे सिद्ध होगा ?
: उत्तर :-उक्त दानादि का सिद्धों में कैसे सद्भाव सिद्ध होगा? इस प्रश्न के उत्तर में अकलंक स्वामी कहते हैं 'शरीरनामकर्योदयाद्यपेक्षत्वात्तेषां तद्भावे तदप्रसंगः
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[गो. प्र. चिन्तामणि परमानंताव्याबाध रूपेणव तेषां च तत्र वृत्तिः केवलज्ञानरूपेरणानंतवीर्यवत्'--उक्त रूप से अभयदानादि के लिये शरीर नाम कर्म के उदय की अपेक्षा पड़ती है। सिद्ध भगवान के शरीर नाम कर्म के उदय का प्रभाव होने से उक्त प्रकार की अपेक्षा पड़ती है। सिद्ध भगवान के शरीर नाम कर्म के उदय का अभाव होने से उक्त प्रकार के अभयदानादि का प्रसंग नहीं आयेगा । जिस प्रकार केवलझान रूप से उन सिद्धों में अनन्त वीर्य गुण माना जाता है अर्थात् अनन्त वीर्य के साथ केवलज्ञान का अविनाभाव सम्बन्ध होने से केवलज्ञान होने से अनन्तवीर्य का सदभाव सिद्ध होता है, उसी प्रकार उक्त अभयदानादि भावों का समावेश करना चाहिये। .
. प्रात्मा में अनन्त शक्ति है जो वीर्यान्तराय कर्म के क्षय से उत्पन्न होती है । यह शक्ति प्रात्मा कि स्तुति नहीं है, किन्तु वास्तव में युक्ति द्वारा यह शक्ति सिद्ध होती है। पं. आशाधरजी ने सागरधर्मामत में लिखा है कि आत्मा में अनन्त शक्ति का सद्भाव मानना अतिशयोक्ति नहीं है, किन्तु यह वास्तविक है। प्राचार्य कल्प पं. प्राशायरी का प्रजिताय सह है कि जगत गर में सुर, नर, पशु, देव, दानव आदि तथा अन्य सम्प्रदायों में पूज्य माने गये उनके भगवान आदि भी कामवासना के कारण स्त्री का परित्याग करने में असमर्थ हैं। इतना प्रभाव इस काम भाव का है, जिसका स्वानुभव में निमग्न जिन भगवान ने जड़मल से नाश कर दिया है, अतएव अनन्त जीवों पर शासन करने वाले काम के विध्वंसक जिनेन्द्र देव में अनन्त वीर्य का सद्भाव मानना पूर्णतया युक्ति संगत है ।
प्रश्न :--समवशरण में तीर्थंकर प्रभु का कौनसा पासन रहता है ? उत्तर:- समवशरण में तीर्थंकर प्रभु का प्रासन पद्यासन रहता है। प्रश्न :--भगवान भव्य जीवों के संताप दूर करने के लिए जो विहार करते
. हैं, उस समय उनके पैरों को उठाकर डग भरते हुये गमन को देखकर ऐसा प्रतीत सोता हैं कि भगवान के इस प्रकार की क्रिया का सद्भाव स्वीकार करना इच्छा अस्तित्व का संदेह उत्पन्न
करना है। तो वास्तव में क्या है ? उत्तर :--मोहनीय कर्म का अत्यन्त क्षय हो जाने से जिनेन्द्र भगवान के इच्छा का पूर्णतया प्रभाव हो चुका है, फिर भी उनके शरीर में जो क्रिया होती है, वह अबुद्धि पूर्वक स्वभाव से होती है। प्रवचनसार में कुन्द-कुन्द प्राचार्य ने लिखा है----
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अध्याय आठवां ]
f ६६&
ठासेज्जविहार धम्मुवदेसो हि शियदयो तेसि ।
अरहंताणं काले मायाकारोव इच्छी ।।१५३१॥ अरहन्त भगवान के केवली अवस्था में खड़े होना, पद्मासन से बैठना, विहार करना तथा धर्मोपदेश देना ये सब कार्य स्वभाव से ही पाये जाते हैं। जिस प्रकार स्त्रियों में मायापरिणाम स्वभाव से होता है ।
जिस प्रकार जिनेन्द्र देव की दिव्य देशना इच्छा के बिना होती है, उसी प्रकार उनके शरीर में खड़े रहना, बैठना तथा विहार करना आदि कार्य भी इच्छा के बिना ही होते हैं ।
प्रश्न :-- समवशरण में बिहार के पश्चात् श्ररहन्त भगवान खड्गासन में रहते हैं या उनके पद्मासन हो जाता है ?
उत्तर :- बिहार के पश्चात् समवशरण में भगवान अरहन्त पद्मासन से विराजमान रहते हैं । हरिवंशपुराण में लिखा है कि महावीर भगवान के दर्शनार्थ चतुरंग सेना समन्वित सम्राट श्रेणिक ने सिंहासन पर विराजमान वीर भगवान के दर्शन कर उनको प्रमाण किया था । श्लोक में 'सिंहासनोपविष्ट' शब्द का अर्थ है सिहासन पर बैठे हुये ।
मूल श्लोक इस प्रकार है
सिंहासनोपविष्टं
सं सेनया चतुरंगया।
श्रेणिकोऽपि च संप्राप्तः प्राणनाम जिनेश्वरम् ।। १५३२ ।।
इस प्रकरण में यह बात ज्ञातव्य है कि वीर भगवान ने कायोत्सर्ग आसन से मोक्ष प्राप्त किया है । तिलोयपष्पति में लिखा है-
उसहोय वासुपूज्जों पेमी पल्लंकबद्धया सिद्धा । errea जरा सेसा मुति सभावा ।। १५३३।।
ऋषभनाथ भगवात, वासुपूज्य स्वामी तथा नेमिनाथ भगवान ने पत्यंक ब आसन से मोक्ष प्राप्त किया है ।
शान्तिनाथ पुराण में लिखा है कि समवशरण में शान्तिनाथ भगवान का पत्यकासन था । कहा भी है
श्र ेष्ठषष्ठो पचासेन धवले दशमीदिने ।
पौषमास दिनस्यान्ते पत्यंकासनमास्थितः ।। १५३४।।
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[ गो. प्र. मिन्तामणि निग्रंथो नीरजो बीतविघ्नों विश्वकबांधवः । केवलज्ञान साम्राज्यधिया शान्तिमशिनियत् ॥१५३३॥
धर्म शर्माभ्युदय में लिखा है कि धर्मनाथ तीर्थंकर समवशरण में बैठे हुये थे। कहा भी है...
रत्नज्योतिर्भासुरे तत्र पोठे तिष्ठन् देवः शुभ्रभामंडलस्थः । क्षीरांभोधेः सिच्यमानः पयोभिभूयोरेज कांचनावाविवोच्चैः ॥१५३६॥
तिलोयपरणत्ति के उपरोक्त कथन के प्रकाश में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि धर्मनाथ, शान्तिनाथ तथा महावीर भगवान का मोक्ष कायोत्सर्ग आसन से हुआ है, किन्तु समवशरण में बे पद्मासन से विराजमान रहते थे। अतएव केवलज्ञान होने पर समवशरण में तीर्थंकर भगवान को पभासन मुद्रा में विराजमान मानना उचित है । सिंहासन रूप प्रातिहार्य अहंत भगवान के पाया जाता है। उस पर कायोत्सर्ग आसन से रहने की कल्पना उचित नहीं दिखती है ।
एक बात यह भी विचारणीय है कि द्वादश सभाओं में समस्त जीव बैठे रहे, और भगवान खड़े रहे, ऐसा माने पर भक्त भव्य जीवों पर अविनय का दोष श्राये बिना न रहेगा। तीन लोक के नाथ खड़े रहें उनके चरणों के सेवक जीव बैठे
ज्ञानार्णव में पिंडस्थ ध्यान के प्रकरण में सिंहासन पर पद्मासन से विराजमान जिनेन्द्र देव चितवन करने का कथन पाया है। अतः यह बात आगम तथा युक्ति के अनुकूल है कि समवशरण में भगवान सिंहासन पर पभासन से विराजमान रहते हैं। बिहार में कार्योत्सर्ग आसन होता है । उसके पश्चात पद्मासन हो जाता है । आसन में परिवर्तन मानने में कोई बाधा नहीं है। . ऋषभनाथ तीर्थकर प्रभु की दिव्यध्वनि गणधर का प्रभाव---
__भगवान ऋषभदेव को जब केवलज्ञान प्राप्त हुआ था, तब उनके उपदेश के पूर्व साधारण लोग धर्म तत्व से पूर्ण अपरिचित थे, अंतः समवशरण के निर्माण होने पर भी मगधर कौन बनेगा और कौन भगवान की दिव्यध्वनि को झेलेगा । कर्म भूमि के प्रारम्भ की अवस्था को दृष्टि में रखने वाले के समक्ष सम्पूर्ण परिस्थिति का चित्र उपस्थित हो जायेगा । इस प्रसंग में महापुराण से एक महत्वपूर्ण प्रकाश प्राप्त होता
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श्रध्याय आठवां 1
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है। उससे सर्व प्रकार की कठिनताएँ सहज ही सुलझ जायेगी । जिस प्रकार वैशाख सुदी दशमी को महावीर भगवान को केवलज्ञान हो जाने पर ६६ दिन तक दिव्यध्वनि उत्पन्न नहीं हुई थी, यद्यपि सर्व सामग्री का समुदाय वहाँ विद्यमान था । जय धवला टीका में कहा है कि उस समय गरणधर देवरूप कारण का प्रभाव था, 'गरिशाभावादी' (१० ७६) ।
द्वारा केवल्य ज्ञान लक्ष्मी
गरधर देव की उपलब्धि होने पर श्रावण कृष्ण प्रतिपदा को प्रभात बेला में वीर जिनेन्द्र की दिव्य ध्वनि खिरी थी । इससे भी कठिन परिस्थिति उस कर्म भूमि के प्रारम्भ काल में थी, जब भगवान यादिनाथ ने तपश्चर्या प्राप्त की थी । यदि लोक धर्म तत्व के ज्ञाता होते तो मुनि छह माह तक आहार प्राप्ति के निमित्त क्यों भटकना पड़ता स्थिति मन में विविध शंकाओं को उत्पन्न करती है ।
अवस्था में भगवान को ? इस प्रकार की कठिन
यह
महापुराणकार कहते हैं कि भरत महाराज को धर्माधिकारी पुरुष समाचार प्राप्त हुआ कि आदिनाथ भगवान को केवल ज्ञान उत्पन्न हुआ है, आयुध शाला के रक्षक से ज्ञात हुआ कि प्रायुध शाला में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ है तथा कंचुकी से ज्ञात हुआ कि राज भवन में पुत्र उत्पन्न हुआ है ।
धर्मास्थाद् गुरुकैवल्यं चक्रमायुधपालतः ।
गुरोः कैवल्यसंभूति सूति च सुतचक्रयोः । ११५३७।।
भरतेश्वर ने पहले धर्म पुरुषार्थ की आराधना करना कल्याणदायी सोच, 'कार्येषु प्राविधेयं तद्धयं श्रेयनुबंधि यत् । (८) इससे भरत महाराज सपरिवार पुरिमतालपुर जाने को उद्यत हुये । तिलोयपति में लिखा है कि फाल्गुण कृष्ण एकादशी के पूर्वान्ह काल मे उत्तराषाढ़ नक्षत्र के रहते हुये प्रादिनाथ भगवान को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था ( ४-६७६ ) प्रभु के समवशरण की भूमि सूर्य मंडल के समान गोल इन्द्रनील मणिमयी तथा बारह योजन प्रमाण विस्तार वाली थी । केवल ज्ञान उत्पन्न होते ही भगवान का परम श्रदारिक शरीर पृथ्वी से पांच हजार धनुष ऊंचाई पर चला गया था । भरत महाराज ने सुवर्ण निर्मित बीस हजार सीढ़ियों पर से शीघ्र ही समवशरण में प्रवेश किया था ।
पुण्यशाली महाराज भरत ने पद्मासन से विराजमान उन अन्तरयामी श्रादिनाथ
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Emaghwani
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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रभु की प्रदक्षिणा दी । श्रेष्ठ सामग्री से उन देवाधिदेव की अत्यन्त भक्ति पूर्वक पूजा की। पूजा के उपरान्त उनको प्रणाम किया और उनका मंगलास्तवन करते हुए कहा
त्वं शभुः शंभवः शंयुः शंवक्षः शंकरों हरः। .. हरि मोहासुरारिश्च तमोरिभव्यभास्करः ।।१५३८॥
हे भगवान आप ही शम्भु हैं, संभव हैं, शंयु अर्थात् सुखी हैं, शंवद अर्थात् सुख या शान्ति का उपदेश देने वाले हैं, शंकर अर्थात् शांति के करने वाले हैं, हर हैं, मोह रूपी असुर के शत्रु हैं, हरि हैं, अज्ञानरूप अन्धकार के अरि हैं और भव्य जीवों के लिये उत्तम सूर्य हैं।
भरतेश्वर जिनेन्द्र देव के गुणस्तवन के शिवाय नाम कीर्तन को भी प्रात्म निर्मलता का कारण मानले हुए कहते हैं---
तदास्तां ते गुण स्तोत्रं नाम मात्रं च कौतितम् । . पुनाति मस्ततो देव स्वनामोद्देशतः श्रिताः ॥१५३९।।
हे देव ! आपके गुणों का स्तोत्र करना तो दूर रहा, आपका उच्चारण किया हुआ नाम भी हम लोगों को पवित्र कर देता है, अतएव हम आपका नाम लेकर ही अापकी शरण को प्राप्त होते हैं । भरत चक्रवर्ती के निमित्त से भगवान की दिव्य ध्वनि
वृषभात्मज भरतेश्वर जगत् पिता वृषभ जिनेश्वर की स्तुति के उपरान्त श्री मंडप में जाकर अपने योग्य सभा में जा बैठे। पश्चात् विनय पूर्वक भरतराज ने जिनराज की प्रार्थना की
भगवान बोद्ध मिजामि कीदृशस्तत्वविरतरः । मार्गो मार्गफलं चापि कीदृग तत्वविदांवर ॥१५४०।।
हे भगवन् ! तत्त्वों का स्पष्ट स्वरूप किस प्रकार है ? मार्ग तथा मार्ग फल. कैसा है? हे तत्त्वज्ञों में श्रेष्ठ देव ! मैं आपसे यह सब सुनना चाहता हूँ।
भाग्यशाली भक्त भव्य शिरोमणी भरतराज के प्रश्न के उत्तर में भगवान ने समस्त सप्त लत्वों का, रत्नत्रम मार्ग तथा उसके फलस्वरूप निर्वाण प्रादि का अपनी दिव्य वाणी के द्वारा निरूपण किया। सर्वज्ञ, वीतराग तथा परम हितोपदेशी
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अध्याय : आठवां ]
जिनेन्द्र देव की वाणी की महिमा का कौन वर्णन कर सकता है ? सम्राट भरत ने भगवान के श्रीमुख से मुनि दीक्षा लेते समय सांत्वना के शब्द सुने थे, उसके पश्चात् अब फिर प्रभु की प्रिय मधुर तथा शांतिदायिनी बारसी सुनने में आई । समवशरण में विद्यमान भव्य जीवों को प्रवर्णनीय आनन्द तथा प्रकाश की उपलब्धि हुई । चिर पिपासित चातक के मुख में मेघ बिन्दु पड़कर जैसी प्रसन्नता उत्पन्न करती है, ऐसी ही प्रसन्नता प्रभु की वाणी को सुनकर, समवशरण के भव्य जीवों को प्राप्त हुई थी। प्रभु की वाणी का सम्राट भरत पर क्या प्रभाव पड़ा ? इस पर महापुराणकार इस प्रकार प्रकाश डालते हैं
ततः सम्यकत्वशुद्धि च व्रतशुद्धि पुष्कलाम् । निष्कलात् भरतो भेजे परमानन्दमुद्रहन् ॥१५४१॥
भगवान की दिव्य देशना को सुनकर सम्राट भरत ने परम आनन्द को प्राप्त होते हुए सम्यक्त्व शुद्धि तथा यतों के विषय में परम विशुद्धता प्राप्त की।
भरत महाराज ने भगवान की अराधना कर सम्यग्दर्शन रूप मुख्य मरिण सहित व्रत और शीलों से समलंकृत निर्मल माला अपने कंठ में धारण की, जो मुक्ति श्री के कंठहार के समान लगती थी। अर्थात् भरत महाराज ने बारह व्रतों द्वारा अपना जीवन अलंकृत किया था । इस कारण वे सम्राट भरत सुसंस्कृत मरिण के समान दैदीप्यान होते थे।
___भगवान की दिव्य वाणी सुनकर बारहवें कोठे में स्थित पशुओं, पक्षियों के मध्य में स्थित मयूरों को बड़ा हर्ष हुआ, क्योंकि जिनेन्द्र की मधुर वाणी उन मयूरों को अत्यन्त प्रिय मेघ की ध्वनि समान सुनाई पड़ी थी। महाकवि जिनसेन स्वामी कहते हैं
दिव्यध्वनिमनुसत्य जलद-स्तनितोपमम् ।। अशोक-विटपारकाः सस्वनु-दिव्यबर्हिगः ॥१५४२॥
मेघ की गर्जना के समान भगवान की दिव्यध्वनि को सुनकर अशोक वृक्ष की शाखाओं पर स्थित दिव्य मयूर भी प्रानन्द से मानों शब्द करने लग गये थे। ।
प्रश्न--ऋषभनाथ तीर्थजूर के प्रथम गणधर वृषभसेन थे क्या ? • उत्तर-~~भगवान की दिव्य देशना से भरत महाराज के छोटे भाई पुरिमसाल पुर. (वर्तमान प्रवाग) के स्वामी वृषभसेंन की आत्मा अत्यधिक प्रभावित हुई । वृषभ
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७०४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि पिता की कल्याणमयी आज्ञा को ही मानों शिरोधार्य करते हुये वृषभ पुत्र ने मोक्ष के साक्षात् मार्ग स्वरूप महाव्रतों को अंगीकार कर मुनि पदवी प्राप्त की और सप्तऋद्धि से शोभायमान होकर प्रथम गणधर पद की प्रतिष्ठा प्राप्त की। उनके विषय में महापुराणकार के शब्द ये हैं...
योऽसौ पुरिमसालेशो, भरसस्यानुजः कृती। प्राज्ञः शूरः शुचि धीरो, धौरेयो मानशालिनाम् ॥१५४३॥ श्रीमान् वृशभसेनाख्यः प्रज्ञापारमिसो वशी। स सम्बुध्य गुरोः पाश्वे दीक्षित्वाऽभूद् गणाधिपः ।।१५४४॥
उसी समय कुरुवंश के शिरोमणि, महाराज थे यांस, महाराज सोमप्रभ तथा अन्य राजाओं ने मुनिदीक्षा धारण कर वृषभसेन स्वामी के समान गणनायकों के पद प्राप्त किये।
जिस सर्व परिग्रहत्याग वृत्ति को सिंहवृत्ति मानकर शृगाल स्वभाव वाले जीव उरा करते हैं, उस पदबी को निर्भय होकर धारण करने में लोगों का साहस वृद्धिंगत हो रहा था। भारत महाराज की छोटी बहन ब्राह्मी ने कुमारी अवस्था में ही वैराग्य भाव जागृत हो जाने से प्रायिका की श्रेष्ठ पदवी प्राप्त की। - गुरुदेव के अनुग्रह से कुमारी ब्राह्मी ने दीक्षा लेकर आर्यिकानों के मध्य परिणनी का पद प्राप्त किया था। प्रायिका ब्राह्मी की देवतानों ने पूजा की थी।
___ बाहुबलि कुमार की सगी बहिन कुमारी सुन्दरी ने भी बहिन ब्राह्मी के. समान जिन दीक्षा धारण कर नारी जाति को गौरवान्वित किया था । उस समय श्रुत कीर्ति नामक गृहस्थ ने श्राक्कों के उच्च व्रत ग्रहण किये थे । यह देशवती श्रावकों में प्रमुख था।
भरत के भाई अनन्तवीर्य कुमार ने भी भगवान से मुनि दीक्षा लेकर अपूर्व विशुद्धता प्राप्त की इस युग में केवल ज्ञान प्राप्त करके मोक्ष जाने वाले पूज्य पुरुषों में । अनन्तवीर्य भगवान का सर्वोपरि स्थान है । कहा भी है
संबोऽनंसवीर्यश्च, गुरोः संप्राप्तदोक्षणः । सुरवातपूविरग्रिमो मोक्षवत्तामभूत् ॥१५४५।।
कुमार अनन्तवीर्य ने प्रतिबोध को प्राप्त करने के पश्चात् भगवान से दीक्षा ली । देवों के द्वारा पूजा प्राप्त की ! वे अन्तवीर्य इस अवसपिणी काल में मोक्ष
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अध्याय : आठवां ]
[ ७०५ जाने वाले में अग्रणी हये है।
भगवान के साथ दीक्षा लेने वाले तथा पश्चात् भ्रष्ट हुये समस्त राजाओं ने भगवान की वाणी को सुनकर अपने मिथ्यात्व का परित्याग कर जनेश्वरी दीक्षा धारण की । मरीचिकुमार का संसार भ्रमण अभी समाप्त नहीं हुआ था, अतः उस मरीचिकुमार ने मिथ्यामार्ग प्राश्रय नहीं छोड़ा। कहा भी है---
मरीचिवाः सर्वेऽपि, तापसास्तपसि स्थिता। भट्टारकान्ते संध्य, महाप्रावाज्येऽवस्थिताः ।।१५४६॥
मरीचिकुमार को छोड़कर शेष सभी कुलिगी साधुओं ने भट्टारक ऋषभदेव के समीप प्रति बोध को प्राप्त कर महाशाज्य अर्थात् पञ्च महाव्रतों की दीक्षा ग्रहण की।
भरत महाराज सदृश महान ज्ञानी के छोटे भाई, छोटी बहिन कुमारी श्राह्मी आदि ने दीक्षा ली, किन्तु भरत महाराज अयोध्या को लौट गये और दिग्विजय आदि संसारिक चिंताओं में संलग्न हो गये, क्योंकि उनके परिग्रह परित्याग की पुण्य बेला अभी समीप नहीं आई थी। जब काललब्धि का योग मिला, तो दीक्षा लेकर भारत सम्राट शीघ्र ही ज्ञान साम्राज्य के स्वामी बन गये । मुनि पदवी लेने के पश्चात उन्हें फिर पारणा करने तक का भी प्रसंग नहीं प्राप्त हुआ । उत्तर पुराण का यह कथन कितना अर्थ पूर्ण है
आदितीर्थकृतो ज्येष्ठ पुत्रो राजसु षोडश । ज्यायांश्चक्री मुहूर्तेन मुक्तो यं कस्तुलांवजेत् ॥१५४७।।
आदिनाथ तीर्थंकर के ज्येष्ठ पुत्र, सोलहवें मनु प्रथम चक्रवर्ती भरत महाराज ने अन्तर्मुहुर्त के अन्तर ही केदल्य ज्ञान प्राप्त किया था। उनकी बराबरी संसार में कौन कर सकता है ?
प्रश्न-तीर्थङ्कर भगवान में लक्ष्मी और सरस्वती की मैत्री किस प्रकार
पाई जाती है ? .. उत्तर- संसार में यह बात प्रसिद्ध है कि सरस्वती और लक्ष्मी में इतना विरोध है कि किसी भी पुरुष में दोनों का एक साथ निवास नहीं पाया जाता है।
तीर्थकर भगवान में इन दोनों की मैत्री स्पष्ट नयन गोचर होती है । समन्तभद्र स्वामी : ने पद्मप्रभ भगवान के स्तवन में कहा है कि जिनेन्द्र देव ने सरस्वती तथा पद्मा अर्थात
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७०६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि लक्ष्मी को मुक्ति श्री के अभिमुख होने के पहले धारण किया था । 'बभार पद्मा च सरानी च भवान पुरस्तात् प्रतिमुक्तिलक्ष्याः'
प्रश्न ---अचेल अवस्था या दिगम्बरत्व क्या है ?
उत्तर-विविध धर्मों के साहित्य में जो अचेल या दिगम्बरत्व के पोषक वाक्य मिलते हैं, उसका कारण यह प्रतीत होता है, कि इन समस्त देशों के विद्वानों दिगम्बर अवस्था में जिनेन्द्र देव के अवश्य दर्शन किये थे। प्रचर शीत परिपूर्ण तथा हिमाच्छदित देशों के साहित्य में भी दिगम्बर वृत्ति के प्रति आदरपूर्ण भाव प्रदर्शन का असली रहस्य. यह रहा है कि सभी तीर्थकर मुनि अवस्था में निर्ग्रन्थ थे, श्वेताम्बरों की मान्यतानुसार निग्रंन्यपने का दिगम्बर पन से रहित अर्थ करना असंगत है, क्योंकि वस्त्रों के होते हुये श्रेष्ठ अहिंसा वृत्ति का पालन करना असंभव है । वस्त्रादि के प्रति मुर्छारूप अन्तरंग परिग्रह भाव तो रहेगा ही, साथ ही द्रव्य हिंसा का भी दोष नहीं टाला जा सकता है । वस्त्रों को स्वच्छ करते समय सलत अनन्त जलकायिक जीवों का विनाश भी प्रावश्यम्भावी है। ..
प्रश्नयोग निरोध के बाद समवशरणादि की क्या स्थिति है ?
उत्तर--भगवान आदिनाथ को सिद्धालय प्राप्त करने में जब चौदह दिन शेष रह गये तब प्रभु श्रादिनाथ कैलाशगिरि पर आ गये । कैलाश पर्वत पर प्रभु पद्मासन से विराजमान हुये। जिस दिन योग निरोध कर भगवान. अष्टापद अर्थात् कैलाश पर्वत पर विराजमान हुये, उसी दिन भारत चक्रवर्ती ने स्वप्न में देखा कि
तदाभरतराजेन्द्रो महामंदरभूधरं । . आप्राम्भारं व्यलोकिष्ट स्वप्ने दैर्येण संस्थितं ॥१५४८॥
महा मंदराचल अर्थात् सुमेरु पर्वत वृद्धि को प्राप्त होता हुआ प्रभाकर पृथ्वी अर्थात् सिद्ध लोक तक पहुँच गया है ।
युवराज अर्क कीति ने स्वप्न में देखा, एक महौषधि का वृक्ष स्वर्ग से आया था । मनुष्यों का जन्म-रोग नष्ट कर वह पुनः स्वर्ग में चला गया। गृहपति रत्न ने देखा कि एक कल्पद्रुम स्वर्ग प्राप्ति के लिये समुद्यत है । चक्रवर्ती के प्रमुख मंत्री ने देखा कि एक रत्नों का दीपक जीवों को ज्ञानरत्न देने के पश्चात् आकाश में जाने के : लिये उद्यत हो रहा है । सेनापति ने देखा, कि एक सिंह वज्र के पिंजरे को तोड़कर कैलाश पर्वत को उल्लंघन करने के लिये तैयार हुआ। भरत चक्रवर्ती के पुत्र अर्क . .
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अध्याय : आठवां }
! ७०७ कीति ने देखा कि त्रिलोक को प्रकाश करता हुआ तारकेश्वर अर्थात् चन्द्रमा ताराओं सहित जा रहा है, चक्रवर्ती की पट्टरानी सुभद्रा का स्वप्न था कि ऋषभ देव भगवान की रानी यशस्वती और • सुनन्दा के साथ, शक्र अर्थात् इन्द्र की मनः प्रिया अर्थात महादेवी (इन्द्रागी). बहुत कालपर्यन्त शोक कर रही है । इन स्वप्नों का फल पुरोहित ने यह बताया कि ये समस्त स्वप्न यह सूचित करते हैं कि भगवान वृषभ देव समस्त कामों का निर्मूल नाश कर अनेक मुनियों के साथ मोक्ष पधारेंगे ।
इतने में प्रानन्द नाम के व्यक्ति ने चक्रवर्ती भरतेश्वर को भगवान ऋषभ का सर्ववृतांत बताया कि
ध्यनौ भगवतो दिव्ये संहृते मुकुलीभवत् । कराम्बुजा सभा जाता पूष्णीय सरसोत्यसौ ।।१५४६॥
भगवान की दिव्य ध्वनि का खिरना अब बन्द हो गया है, इससे जैसे सूर्य के अस्त के समय सरोवर के कमल मुकुलित हो जाते हैं, उसी प्रकार सब सभा हाथ जोड़े हुये मुकुलित (उदास) हो रही है।
___ इस समाचार को सुनते ही भरत चक्रवर्ती तत्काल कैलाश पर्वत पर पहुंचे । उन प्रभु की तीन परिक्रमा करके स्तुति की। .. महामहमहापूजां भक्त्या निर्वर्तयन्स्वयं ।
चतु दश दिनान्येवं भगवंत भसेवात ॥१५५०॥
चक्रवर्ती भरत ने महामह नाम की महान पूजा भक्ति भाघ पूर्वक स्वयं की तथा चौदह दिन तक भगवान की सेवा भक्ति की।
यहां यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि सर्व सामग्री का सन्निधान होते हुये भी प्रादिनाथ. जिनेन्द्र की लोक कल्याण निमित्त बिरने वाली दिव्यवाणी वन्द हो गई, क्योंकि क्षरण-क्षरण में विशेष विशुद्धता को प्राप्त करने वाले इन प्रभु की शुद्धोपयोग रूप अग्नि अत्यधिक प्रज्वलित हो गई है और अब उसमें अधातिया को को भी स्याहा (भस्म करने की तैयारी प्रात्म यज्ञ के कत्ल जिनेन्द्र ने की है। प्रारम्भ में निर्दयता पूर्वक पाप कर्मों को नष्ट किया था और अब शुभ भावों द्वारा बांधी गई पुण्य प्रकृतियों का की शुभ भाव रूपी तीक्ष्ण सलवार के द्वारा ध्वंस का कार्य शीघ्र आरम्भ होने वाला है। संसार के जीवों की अपेक्षा प्रिय और पूज्य मानी गई तीर्थंकर प्रकृति अब इन वीतराग प्रभु को सर्वथा क्षय योग्य लगती है, क्योंकि ऐसा कोई
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७०८ ]
। गो. प्र. चिन्तामणि भी कर्म का उदय नहीं है, जो सिद्ध पदवी के प्राप्त करने में विघ्न रूप न हो। पंचाध्यायी में लिखा है
· नहि कर्मोदयः कश्चित्, जन्तो यः स्यात् सुखावहः । सर्वस्य कर्मशास्त्र, लक्षण्यात् स्वरूपतः ॥१५५१॥
ऐसा कोई कर्भ का उदय नहीं है जो प्रात्मा को आनन्द प्रदान करे, क्योंकि सभी कर्मों का उदय आत्म स्वरूप से विपरीत स्वभाव वाला है ।
इस कथन के प्रकाश में बह बात सिद्ध होती है कि स्वभाव परिणति की उपलब्धि में बाधक तथा विभाव परिरपति के साधक कारण सभी कर्म त्यागने योग्य हैं। सुवर्ण वर्ण के सर्प द्वारा कृत दंश प्राप्त व्यक्ति उसी प्रकार मृत्यु के मुख में प्रोस करता है, जिस प्रकार श्याम सर्पराज के द्वारा काटा गया व्यक्ति भी प्राणों का त्याग करता है । इसलिये शुद्धोपयोगी ऋषिराज ऋषभदेव तीर्थङ्कर ने दिव्य उपदेश देना बन्द कर दिया है ! उन्हें जितना कहना था, वह सब कह चुके । अन्य जीवों के उपकार के लिये यदि भगवान लगे रहें तो बे सिद्ध वधू के स्वामी नहीं बन सकेंगे । इसलिये अब भगवान पूरी निर्मलता सम्यादन के श्रेष्ठ उद्योग में संलग्न हैं । अन्य तीर्थकारों के योग निरोध का समय एक माह तक प्रागम में कहा गया है, इतना विशेष है कि वर्धमान भगवान ने जीवन के दो दिन शेष रहने पर योग्य निरोध प्रारम्भ किया था। यही बात निर्वाण भक्ति में इस प्रकार कही है--- प्रायश्चतुर्दश दिने विनिवृत्तयोगः,
षष्ठेन निष्ठित कृति जनवर्धमानः । शेषा विधूत घनकम निबद्धपाशा,
मासेन ते यतिवरास्त्वभवन्धियोगाः ॥१५५२॥ ऋषभाय भगवान ने मन-वचन-काय के योगनिरोध का कार्य चौदह दिन पूर्व किया था तथा वर्धमान जिनमे दो दिन पूर्व योगनिरोध किया था, घनकर्म राशि के बंधन को दूर करने वाले बाईस तीर्थंकरों ने एक माह पूर्व मन-वचन-काय की बाह्य क्रिया का निरोध प्रारम्भ किया था । ... प्रश्न :..-केवली के कौनसा ध्यान रहता है ?
- उत्तर :---शुक्ल ध्यान का तृतीय भेद उस समय होता है, जब ग्रायु कर्म के क्षय के लिये अंतर्मुहूर्त काल शेष रहता है । अतएव प्रश्न होता है कि पाठ वर्ष से कुछ
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प्रध्याय : आठवां ]
[ ७०६ अधिक काल में केवली बनकर एक कोटि पूर्वकाल में से किचित् न्यून काल छोड़कर शेषकाल पर्यन्त केवली के कौनसा ध्यान रहता है ?
परमार्थ दृष्टि से 'एकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानं' यह ध्यान का लक्षण सर्वज्ञ भगवान में नहीं पाया जाता है। आत्म स्वरूप में प्रतिष्ठित होते हुए भी ज्ञानावर के क्षय होने से वे त्रिकालत भी हैं, पर उम्तो पास का कथन किस प्रकार सिद्ध होगा? चिन्ता का भी उनके अभाव है । 'चिन्ता अंतः करणवृत्तिः' अंतः करण अर्थात् क्षयोपशमात्मक भावमन की विशेषवृत्ति चिन्ता है । केवली के क्षायिक केवलज्ञान होने से क्षयोपशमरूप चित्तवृत्ति का सद्भाव भी नहीं है, तब उस चित्तवृत्ति का विरोध कैसे बनेगा ? इस अपेक्षा से केवली भगवान के ध्यान नहीं है। प्रश्न :-(इस पर शंका उत्पन्न होती है कि) श्रागम में केवली के दो शुक्ल
ध्यान क्यों कहे गये हैं ? उत्तर :- केवली भगवान के उपचार से ध्यान कहे गए हैं । राजवार्तिक में "एकादशजिने' सूत्र की टीका में प्रकलक स्वामी लिखते हैं 'केवली भगवान में ग्यारह परिषह उपचार से पाये जाते हैं । इस विषय के स्पष्टीकरण हेतु प्राचार्य लिखते हैं -
__ "यथा निरवशेष निरस्त-झानावरण परिपूर्ण ज्ञाने एकाग्रचिता निरोधाभावेऽपि कर्मरजो-विधूनन फल संभवात् ध्यानोपचारः तथा क्षुधादि-वेदनाभाव परीषहाऽभावेऽपि वेदनीय कर्मोदय द्रव्य परीषहसद्भावात् एकादश जिते संतीति उपचारो युक्तः" । (पृष्ठ ३३०) जिस प्रकार ज्ञानावरण कर्म के परिपूर्ण क्षय होने से केवलज्ञान के उत्पन्न होने पर एकाग्रचिता निरोधरूप ध्यान के अभाव होने पर भी कर्मरज के विनाशरूप फल को देखकर ध्यान का उपचार किया जाता है, उसी प्रकार क्षुधा, तृषादि की वेदना रूप भाव परीषह के प्रभाव होते हुए भी वेदनीय कर्मोदय द्रव्यरूप कारणात्मक परीषह के सद्भाव होने से जिन भगवान में एकादश (स्यारह) परिषह होते हैं, ऐसा उपचार किया जाता है ।
उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि केवली भगवान के प्रायुकर्म की अंतर्मुहूर्त प्रमाण स्थिति शेष रहने के पूर्वध्यान का सदभाव नहीं कहा गया है, इसी कारण धवला टीका में सयोगी जिनके विषय में लिखा है. 'सयोगी केवली ए किंचि कम्म खवेदि' (पृ० २२३ भाग १) सयोग केवली किसी कर्म का क्षय नहीं करते हैं। कर्म के क्षपण कार्य का अभाव रहने से सयोगी जिनके ध्यान का अभाव है। इतना
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७१० }
[ गो. प्र. चिन्तामणि विशेष है कि प्रयोग केवली होने के पूर्व सयोगी जिन अधातिया कर्मों की स्थिति के असंख्यात भागों को नष्ट करते हैं तथा अशुभ कमों के अनुभाग को नष्ट करते हैं, उस समय उनके सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति शुक्ल ध्यान की योग्यता उत्पन्न होती है । . प्रश्न :- समुद्घातविधि क्या है ?
उत्तर :-समुद्घात विधि-हरिवंश पुराण में लिखा है 'जिस समय केवली की आयु अंतर्मुहूर्त मात्र रह जाती है और गोत्र जादि तीन अधातियां कर्मों की स्थिति भी आयु के बराबर रहती है, उस समय सूक्ष्म क्रिमा प्रतिपाति नाम का तीसरा शुक्ल ध्यान होता है और यह मन-वचन-काय की स्थूल क्रिया के माश होने पर उस समय होता है, जब स्वभाव से ही काय सम्बन्धी सूक्ष्म क्रिया का अवलंबन होता है।
अंतर्मुहूर्त शेषायुः स यदा भवतोश्वरः। . तत्त ल्यस्थितिमोत्रावित्रितयश्च लदा पुनः ॥१५५३॥
म वाडा मनोयोग काययोगं च बादरं । प्रहाप्यालख्य सूक्ष्मं तु काययोग स्वभावतः ॥१५५४॥ तृतीयं शुक्ल सामान्यात् प्रथमं तु विशेषतः । सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति ध्यानमाध्यातुमर्हति ।।१५५५।।
तत्वार्थ राजवासिक में अकलंक स्वामी ने लिखा है, जब सयोग केवली की आयु अंतर्मुहुर्त प्रमाण रहती है और शेष वेदनीय, नास तथा गोत्र इन कर्मों की स्थिति अधिक रहती है, उस समय प्रात्मोपयोग के अतिशय सहित साम्यभाव समन्वित विशेष परिणाम युक्त, संवर वाला, शीघ्र कर्मक्षय करने में समर्थ, योगी शेष कर्मरूपी रज के विनाश करने की शक्ति से अलंकृत स्वभाव से दंड, कपाट, प्रतर तथा लोकपूरण समुद्धात रूप आत्म प्रदेशों का चार समय में विस्तार करके पश्चात् उतने ही समयों में विस्तृत प्रात्म प्रदेशों को संकुचित करता हुआ चारों कर्मों की स्थिति विशेष को एक बराबर करके पूर्व शरीर बराबर परिमारण को धारण करके सूक्ष्म काय योग को धारण करता हुआ सूक्ष्मक्रिया प्रतिपाति नाम के धान को करता है । मूल ग्रन्थ के शब्द इस प्रकार हैं
· यदा पुनरंतर्मुहूर्त-शेषायुष्कस्ततोऽधित स्थिति विशेष कर्मश्रयो भवति योगी, तदात्मोपयोगातिशयस्य सामायिक सहायस्य विशिष्टकरणस्य महासंवरस्य लघुकर्मपरिपरिवाचनस्य ,शेषकर्म-रेणु-परिशातन शक्ति-स्वभाव्यात् दंड-कपाट:प्रतरलोकपूरणानि
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अध्याय : आठयाँ ]
[ ७११ स्वात्मप्रदेश विसर्परगतश्चतुभिः समयैः कृत्वापुनरपि तावद्भिरेव समयः समुपहत. प्रदेशविसर्पणः समीकृत-स्थिति विशेष कर्मचतुष्टयः पूर्व-शरीर परिमारणो भूत्वा सूक्ष्मकाय योगेन सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यानं ध्यायति (पृष्ठ ३५६ अध्याय ६ सूत्र ४४) ।
__ महापुराण में लिखा है--
सहि योगनिरोधार्थमुद्यतः केवली जिनः । .. समुद्घात-विधि पूर्वमाविष्कुर्यान्लिसर्गतः ॥१५५६॥
स्नातक केवली. जिन भगवान जब योगों का निरोध करने के लिये तत्पर होते हैं, तब वे उसके पूर्व ही स्वभाव से समुद्धात की विधि करते हैं। . .
समुद्घात विधि का स्पष्टीकरण इस प्रकार है- पहले समय में केवली के आत्म प्रदेश चौदह राजू ऊँचे दंड के प्रकार होते हैं। दूसरे समय में कपाट अर्थात् दरवाजे के किवाड़ आकार को धारण करते हैं । तृतीय समय में प्रतर रूप होते है । चौथे समय में समस्त लोक में व्याप्त हो जाते हैं। इस प्रकार वे जिनेन्द्र देव चार समय में समस्त लोकाकाश को व्याप्त कर स्थित होते हैं।
इस प्रसंग में यह बात ध्यान देने योग्य है कि ब्रह्मवादी ब्रह्मा को सम्पूर्ण जगत में व्याप्त मानते हैं । जैन दृष्टि से उनका कथन सयोगी जिन के लोक पूरणे समुद्घात काल में सत्यचरितार्थ होता है, क्योंकि लोक पूरण समुद्धात की अवस्था में जिनेन्द्र परमात्मा के आत्मप्रदेश समस्त लोक में विस्तार स्वभाववश व्याप्त होते हैं।
ब्रह्मबादी सदा बह्म को लोक व्यापी कहता है, इससे उसका कथन अयथार्थ हो जाता है।
लोकपूरण समुदधात् के अनन्तर आत्मप्रदेश पुनः प्रतररूपता को दूसरे समय में धारण करते हैं। तीसरे समय में कपाटरूप होते हैं तथा चौथे समय में दंडरूप । होते हैं और शरीराकार हो जाते हैं। इस समुद्घात् क्रिया के करने में विस्तार में चार समय तथा संकोच में चार समय अर्थात् समस्त पाठ समय लगते हैं। लोक· पुरण समुद्घात के समय प्रात्मा के प्रदेश सिद्धालय का स्पर्श करते हैं, नरक की भूमि
का भी स्पर्श करते हैं तथा उन आकाश प्रदेशों का भी स्पर्श करते हैं, जिनका पञ्च परावर्तन रूप संसार में परिभ्रमण करते समय इस जोव ने चौरासी लक्ष योनियों को धारण कर अपने शरीर की निवास भूमि बनाया था । अनन्तानन्त जीवों के भीतर
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७१२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिंग भी यह योगी समा जाता है । इस कार्य के द्वारा सयोगी जिन अधातिया कर्मों की स्थिति में विषमता दूर करके उनको प्रायुकर्म के बराबर शीघ्र बनाते हैं । जिस प्रकार गीले वस्त्र को ऊंचा, नीना, आड़ा, तिरछा करके हिलाने से वह शीघ्र सूख जाता है, उसी प्रकार की इस क्रिया द्वारा योगी अधातिया कर्मों की स्थिति तथा अशुभ कर्मों की अनुभाग शक्ति का खंडन करते हैं ।
इस समुद्धात क्रिया के विषय में यह कल्पना करना अनुचित नहीं है कि समता भाव के स्वामी जिनेन्द्र देव सदा के लिये अपने घर सिद्धालय में जा रहे हैं, इससे वे सब जीवों से और विरोध छोड़कर बिना संकोच छोटे बड़े सबसे भेंट करते हुए तथा मिलते हुये मोक्ष जाने को तैयार हो रहे हैं । महापुराण में लिखा है--
तत्राघातिस्थिते र्भागान संख्येयानिहत्य सौ। अनुभागस्थ चानंतान् भागानशुभकर्मणाम् ।।१५५७॥
उस समय वे भगवान अधातिया कर्मों की स्थिति के असंख्यात भागों को बिनष्ट करते हैं। इसी प्रकार अशुभ कर्मों के अनुभाग के अनन्त भागों को नष्ट करते हैं।
. इसके पश्चात अन्तर्मुहूर्त में योगरूपी प्रास्त्रब का विरोध करते हुये काय योग के आश्रय से वचनयोग तथा मनोयोग को सूक्ष्म करते हैं, और फिर काययोग को भी सूक्ष्म करके उसके आश्रय से होने वाले सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति नामक तीसरे शुक्ल ध्यान का चितवन करते हैं।
. इस प्रसंग में यह बात ध्यान देने योग्य है कि क्षीणकषाय गुणास्थानवर्ती निर्ग्रन्थ ने एकत्व-वितर्क-अविचार रूप द्वितीय शुक्ल ध्यान के द्वारा केवलज्ञान की विभूति प्राप्त की थी। राजवातिककार ने केवली भगवान के लिये इन विशेषणों का प्रयोग किया है 'एकस्य-वितर्क शुक्ल ध्यान वैश्वानर-निर्दग्ध धातिकर्मेन्धनः, प्रज्वलित केवलज्ञान गभस्तिमंडलः' (रा० वा० पृ० ३५६) अर्थात् एकत्व वितर्क नामक शुक्ल ध्यान रूप अग्नि के द्वारा धातिया कर्म रूपी ईन्धन का नाश करने वाले तथा प्रज्वलित केवलज्ञान रूपी सूर्य से युक्त केवली भगवान हैं।
___ इस अवस्था बाली सभी प्रात्माएं समुद्घात करती हैं, ऐसा प्राचार्य यतिवृषभ का अभिप्राय' है । धवल टीका में लिखा है, “यति वृषभोपदेशात् सर्वधाति कर्मणां क्षीणकषाय चरम · समये स्थितेः ‘साम्याभावात् सर्वेऽपि कृतसमुद्धाताः सन्तो
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अध्याय : पाठवां ] निवृतिमुपठौकन्ते" प्राचार्य यति वृषभ के उपदेशानुसार क्षीणकषाय गुणस्थान के चरम समय में सम्पूर्ण अघातिया कमों की स्थिति में समानता का अभाव होने से सभी केवली समुद्धात पूर्वक ही मोक्ष प्राप्त करते हैं ।
आगे यह भी कथन किया गया है "येषामाचार्याणां लोकव्यापि-केवलिधु विशति-संख्या नियमस्तेषां मतेश कविसमुयातन्ति, चिन्न समुद्घातथान्त । के न समुद्घातयन्ति ? येषां संसृतिव्यक्तिः कर्मस्थित्याः समाना, ते न समुद्धातयन्ति, शेषाः समुद्धातयन्ति" (पृ० ३०२ भाग १) जिन प्राचार्यों ने लोक पूररण समुद्घात करने वाले केवलियों की संख्या नियम रूप से बीस मानी है, उनके अभिप्रायानुसार कोई जीव समुद्घात करते हैं, और कोई समुद्धात नहीं करते हैं । कौन प्रात्माएं समुद्धात नहीं करती हैं ? जिनकी संमृत्ति की व्यक्ति अर्थात् संसार में रहने का काल जिसे आयु कर्म के नाम से कहते हैं, अर्थात् जिनका नाम, गोत्र तथा वेदनीय कर्मों की स्थिति आयु कर्म की स्थिति के समान हैं, वे केवली समुद्घात नहीं करते हैं, शेष केवली समुद्घात करते हैं। सिद्ध परमात्मा
समुच्छिन्न-क्रिया-निर्वात अथवा व्युपरत क्रिया-निवृत्ति ध्यान के होने पर प्रारणापान अर्थात् श्वासोच्छ्वास का गमनामन कार्य रुक जाता है । समस्त कार्य, अचन तथा मनोयोग के निमित्त से सम्पूर्ण आत्मा प्रदेशों का परिस्पन्दन बन्द हो जाता है । उस ध्यान के होने पर परिपूर्ण संवर होता है । उस समय १८ हजार शील के भेदों का पूर्ण स्वामित्व प्राप्त हो जाता है । ८४ लाख उत्तर गुणों की पूर्णता प्राप्त होती है । सम्यग्दर्शन का श्रेष्ठ परमावगाढ़ सम्यक्त्व तो तेरहवें मुरणस्थान में प्राप्त हो गया था । ज्ञानावरमा का क्षय होने से सम्यग्ज्ञान की भी पूर्णता हो चुकी थी, फिर किंचित् न्यून एक कोटि पूर्व वर्ष प्रमाण तक निर्माण अवस्था की उपलब्धि न होने का कारण पूर्ण चरित्र में कुछ कमी है । अयोगी जिन होते ही वह तीन गुप्तियों का स्वामी हो जाता है। उस त्रिगुप्ति के प्रसाद से अयोगी जिन के उपांत्य समय में अर्थात् अंत के दो समयों में से प्रथम समय में साता-असाता वेदनीय में से अनुदय रूप एक वेदनीय की प्रकृति, देवगति, औदारिक, वैक्रियक, आहारक, लैजस, कामरिण ये पांच शरीर, पांच संघात, पांच बन्धन, तीन प्रांगोपांग, छह संहनत, छह संस्थान, पांच वर्ण, पांच रस, पाठ स्पर्श, दो गन्ध, देवगत्यानुपूयं, अगुरुलघु, उच्छवास, परघात,
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गो. प्र. चिन्तामणि उपघात, विहायोगति युगल, प्रत्येक, अपर्याप्त, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग स्वरयुगल, अनादेय, अयश कीर्ति, निर्माण तथा नीच गोत्र इन ७२ प्रकृतियों का नाश
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- अंत समय में वेदनीय की बची हुई एक प्रकृति, मनुष्यगति, मनुष्यायु तथा मनुष्यगत्यानुपूर्वी, पंचेन्द्रियजाति, त्रस, बादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, उच्चगोत्र, यशस्कीर्ति ये बारह तथा तेरहवीं तीर्थङ्कर प्रकृति का भी क्षय करके अ, इ, उ, ऋ, ल इन पांच लघु अक्षरों के उच्चारण में लगने वाले अल्प काल के भीतर वह अयोगी जिन प्रात्मा विकास की चरम अवस्था सिद्ध पदवी को प्राप्त करता है । मुनि दीक्षा के समय इन तीर्थङ्कर भगवान ने सिद्धों को प्रमाण किया था । अब वे स्वयं सिद्ध परमात्मा बन गए । ये सिद्ध परमात्मा समस्त विभाव से मुक्त हो गये हैं, तथा समयसार रूप परिणत हो गए हैं।
___महापुराण में लिखा है कि ऋषभदेव भगवान ने माघ कृष्णा चतुदर्शी के दिन सूर्योदय की प्रभात बेला में पूर्वाभिमुख होकर' प्राप्तपल्यंकः' पल्यकासन को धारण कर कर्मों का नाश किया था----
शरीरत्रितयापाये प्राप्य सिद्धत्व पर्यायं । निजाष्टगुणसंपूर्णः क्षरणवाप्त-तनुवातकः ॥१५५८।।
ऋषभनाथ भगवान औदारिक, तेजस तथा कार्भाग इन तीनों शरीरों का नाशकर, प्रात्मा के अष्ट गुणों से परिपूर्ण सिद्धत्व पर्याय प्राप्त करके क्षण मात्र में लोक के अग्र भाग में पहूँचकर तनु वातवलय को प्राप्त हुये।
अब ये तीर्थकर भगवान सिद्ध परमात्मा बन जाने से समस्त विकल्पों से विमुक्त हो गये हैं । ज्ञान नेत्रों से इनका दर्शन करने पर जो स्वरूप ज्ञात होता है, उसे महापुराण में इन शब्दों द्वारा व्यक्त किया गया है।
नित्यो निरंजन: किचिनो देहादमूर्ति भाक् । स्थितः स्वसुखसादभूतः पश्यन्विश्वममारतम् ॥१५५६।।
अब ये सिद्ध भगवान नित्य, निरजन, अन्तिम शरीर से किंचित न्यूनाकार युक्त, अमूर्त, आत्मा से उत्पन्न स्वाभाविक आनन्द का रस पान करने वाले सम्पूर्ण विश्व का निरन्तर अवलोकन करने वाले हो गये !
प्रश्न-तीर्थङ्करों के अनुपम सामथ्र्य का स्थूल दृष्टान्त क्या है ?
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अध्याय आठवा ]
[ ७१५
उत्तर-- तीर्थकरों की अनुपम सामर्थ्य की कल्पना करना शक्य नहीं है, फिर भी स्थूल दृष्टान्स द्वारा समझाते हैं, सब पशु समूह में सबसे बड़ा बलशाली प्राणी हाथी है, ऐसा लोग समझते हैं, परन्तु हजारों हाथियों का बल एक सिंह में होता है, और हजारों सिंहों का बल एक शरभ ( शार्दूल ) में होता है। हजारों शरभों का बल एक बलदेव में होता है, दो बलदेवों की शक्ति एक अर्धचकी में रहती है । दो अर्धचक्रियों का बल एक चक्रवर्ती में होता है । एक हजार चक्रवर्तियों का बल एक इन्द्र में होता है । असंख्य इन्द्रों के बल से भी अधिक शक्ति एक तीर्थकर में होती हैं । वातस्व में तीर्थकर के जन्म से ही अतुल बल तथा अप्रतिमवीर्यता नामक एक अतिशय गुण होता है । उस बल की तुलना नहीं हो सकती है ।
प्रश्न- निर्धारण अर्थात् मोक्ष कल्याणक क्या है ?
उत्तर - तीर्थंकर प्रभु अपने केवलज्ञान से तीन लोक के सम्पूर्ण चराचर पदार्थों को जानकर सब भव्य जीवों को हितकारी उपदेश देते हैं । संसार से भवभीत भव्य जनों को मोक्ष मार्ग की ओर उन्मुख कर देते हैं । इस तरह उपदेश देते हुये तीसरे शुक्ल ध्यान को प्रारंभ करके जब वे तेरहवें गुरास्थान से चौदहवें गुणस्थान में आते हैं, तब वहां पर चार अघातिया कर्मों की ७२ और १३ प्रकृतियों का नाश करके अन्त्य समय में अ इ उ ऋ लृ इन पांच श्रल्प प्राण अक्षरों के उच्चारण करने में जितना समय लगता है, उतने समय में वे तीर्थंकर भगवान मोक्ष चले जाते हैं ।
उस समय चारों निकाय के देव स्वर्ग से आकर भगवान के शरीर का दाह संस्कार करते हैं । और वह दाहस्थान पवित्र हुआ समझकर उस स्थान की वह देव पूजा करते हैं । उस पूजा उत्सव को निर्माण किंवा मोक्ष कल्याणक कहते हैं ।
उत्तर पुराण में लिखा है कि भगवान शांतिनाथ के मोक्ष होने पर देवों ने याकर उनके शरीर का अन्तिम संस्कार तथा पूजा की थी। कहा भी हैचतुविधामराः सेवाः निस्तखारूडभक्तयः ।
कृत्यांत्येष्टि तदागत्य स्वं स्वभावासमाधयन ।। १५६० ।।
बड़ी भक्ति को धारण करने वाले आलस्य रहित इन्द्रों सहित चारों निकाय के देव आये और अन्त्येष्टि अर्थात् उन भगवान की अन्तिम पूजा कर अपने-अपने स्थानों को चले गये ।
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७१६ ]
शरीरं भर्तु रस्येति परार्ध्य-शिविकापिकलं । . अग्नीन्वं रत्न- भासि-प्रोत ग-मुकुटोद्भवेन ॥ १५६१॥ चन्दनागुरु- कर्पूर-पारी-काश्मीरजादिभिः। घृत क्षीरादिभिश्वाप्तवृद्धिना हय्यभोजिना ।।१५६२॥ जगद्त्रयस्य सौगन्ध्यं संपाद्याभूतपूर्वकं । तदाकारोपमर्देन पर्यायान्तरमानयन् ।। १५.६३।।
[ गो. प्र. चिन्तामणि
उस समय निर्वाण कल्याण की पूजा की इच्छा करते हुये सब देव वहां स्वर्ग से आये । उन्होंने पवित्र, उत्कृष्ट, मोक्ष के साधन, स्वच्छ तथा निर्मल भगवान के शरीर को उत्कृष्ट मूल्यवाली पालकी में विराजमान किया । तदन्तर अग्निकुमार नाम के भवनवासी देवों के इन्द्र के रत्नों की कांति से देदीप्यमान अत्यन्त उत्कृष्ट मुकुट से उत्पन्न की गई, चन्दन, अगर, कपूर, केशरादि सुगन्धित पदार्थों से तथा घृत, क्षीरादि के द्वारा वृद्धि को प्राप्त अग्नि से त्रिभुवन में अभूतपूर्व सुगन्ध की व्याप्त करते हुये उस प्रभु के शरीर को अग्नि संस्कार द्वारा भस्मरूप पर्यायान्तर को प्राप्त करा दिया !
चिताग्निकुण्डस्य तस्यदक्षिणग्भागेऽभूद्गराभूतः
पुष्पादिभिस्तथा ।
संस्क्रियानलः ।।१५६४॥
तस्यापरस्मिन् दिग्भागे शेष - केवल कायमः ।
एवं वन्हित्रयं भूभाववस्थाप्यामरेश्वराः ॥ १५६५॥
देवों ने गन्ध, पुष्पादि द्रव्यों से उस अग्निकुण्ड की पूजा की । उस अग्नि कुन्ड के दाहिनी ओर गणधर देवों की अंतिम संस्कार वाली गावरानि स्थापित की केवलियों की अंतिम संस्कार वाली प्रति पृथ्वी पर तीन प्रकार की प्रतियों की
और उस अग्नि कुण्ड के बायें भाग में शेष की स्थापना की। इस प्रकार देवेन्द्रों ने स्थापना की ।
aateen समादाय
पंचकल्याणभागिनः ।
वयं चैवं भवामेति स्वललाटे भुजये ।।१५६६॥ कण्ठे हृदय देशे च तेन संस्पृश्य भक्तितः । तपवित्रतमं मत्वा धर्मराग- रसाहिताः ।। १५६७।।
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अध्याय : आठवां ।
तदनन्तर देवों तथा देवेन्द्रों ने भक्ति पूर्वक पंचकल्याणक प्राप्त जिनेन्द्र के देहदाह से उत्पन्न भस्म को लेकर हम भी ऐसे हों यही विचार करते हुये, उस भस्म को अपने मस्तक, भुजा बुगल, कंठ तथा छाती में लगाई। उन्होंने उस भस्म को अत्यन्त पवित्र मानी । तथा धर्म के रस में वे देव इन्द्र निमग्न हो गये।
जिनेन्द्र भगवान ने सचमुच में मृत्यु के कारण रूप प्रायु कर्म का क्षय करके अन्वर्थ रूप में समर पद प्राप्त किया है। देवतानों को मृत्यु के वशीभूत होते हुमे भी . नाम निक्षेप से अमर कहते हैं। इसी से उन अमरों तथा उनके इन्द्रों में भस्म को अपने अंगों में लगाकर यह भावना की कि हम नार के अमर न रहकर सचमुच में ऋषभ नाथ भगवान के समान अमर होवे ।
देवेन्द्रादि के द्वारा कृत निवारण कल्याण की लोकोत्तर पूजा को 'अंत्येष्टि' संस्कार कहते हैं। अन्य लोगों में मरण प्राप्त व्यक्तियों के देह दाह को 'अंत्येष्टि' क्रिया कहने की पद्धति पाई जाती है । इस अर्थ शून्य शब्द का अन्य सम्प्रदायों में प्रयोग जैन धर्म के प्रभाव को सूचित करता है । निवारा कल्याणक में शरीर की प्रतिम पूजा अग्नि संस्कार प्रादि की महत्ता स्वतः सिद्ध है, किन्तु पशु-पक्षियों की भांति मरने वालों के शरीर की पूजा की कल्पना करना विवेक-हीनता का परिणाम है।
महावीर भगवान का पावानगर के उद्यान से कायोत्सर्ग आसन से मोक्ष होने परं देवों द्वारा कैलाश गिरि पर किए गए प्रभु के शरीरं संस्कार के सदृश पावानगर के उद्यान में भगवान महावीर के शरीर का दाह संस्कार सम्पन्न हुआ था। पूज्यपाद स्वामी ने निर्वाण भक्ति में लिखा है
परिनित जिनेन्द्र ज्ञात्वा विबुधा ह्यथाशु चागम्य । . . . . . देवतरु-रक्तचन्दन कालागरु-सुरभि-गोशीः ॥१५६८।। अग्नीन्द्राग्जिनदेहं मुकुटानल-सुरभिधूप-वरमाल्यः । अभ्यर्थ गणधरानपि गताविवं स्वं च वनभवनाः ॥१५६६।।
महावीर भगवान के मोक्ष कल्याणाक का संवाद अवगत कर देव लोग शीघ्र ही पावानगर के उद्यान में आये। उन्होंने जिनेश्वर के देह की पूजा की। तथा देवदारु, रक्तचन्दन, कृष्णगरु सुगन्धित गोशीरचन्दन के द्वारा और अग्निकुमार देवों के इन्द्र के मुकुट से उत्पन्न अग्नि तथा सुगन्धित धूप तथा श्रेष्ठ पुष्पों द्वारा भगवान महावीर के
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७१८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि शरीर का दाह संस्कार किया । गणधरों की भी पूजा भक्ति करने के पश्चात् कल्पवासी, ज्योतिषी, व्यन्तर तथा भवनवासी देव अपने-अपने स्थान चले गये ।
अशग कविकृत वर्धमान चारित्र में भी भगवान महावीर के अन्तिम शरीर के दाह संस्कार का इस प्रकार कथन आया है
अग्नीद्रमौलिवररत्नविनिर्गतेनौ । कपूर-लोह-हरिचन्दन सारकाष्ठः ॥ संक्षुभिते सपदि वातकुमार नाथः ।। इन्द्रा मुद्रा जिनपते जयः शरीरं ॥१५७०॥
अग्निकुमारों के इन्द्रों के मुकुट के उत्कृष्ट रत्न से उत्पन्न अग्नि, जो कपूर, लोभान, हरिचन्दन, देवदारु आदि साररूप काष्ठों से तथा वायुकुमारों के इन्द्रों द्वारा शीघ्र ही प्रज्वलित की गई थी, उस अग्नि में इन्द्रों ने प्रभु महावीर के शरीर का सहर्ष दाह संस्कार किया।
हरिवंशपुराण में नेमिनाथ भगवान के परिनिर्वाण पर की गई पूजादि का भी इस प्रकार कथन किया गया है---
परिनिर्वाण कल्याणपूजामत्य शरीरमाम् । चतुर्विधसुराः जैनों चकः शक्रपुरोगमाः ॥१५७१॥
जब नेमिनाथ का निर्वाण हो चुका, तब इन्द्र और चारों प्रकार के देवों ने. जिनेन्द्र देव के अंतिम शरीर सम्बन्धी निर्वाण कल्याणक की पूजा की। : गंध-पुष्पादिभिदिव्यैः पूजितास्तनवः क्षणात् ।
जिनस्य द्योतयंत्यो द्यां विलीना विधु तो यथा ॥१५७२३॥
जिस प्रकार विद्युत देखते-देखते शीघ्र विलय को प्राप्त हो जाती है, उसी प्रकार गन्ध, पुष्पादि दिव्य पदार्थों से पूजित भगवान का शरीर क्षण भर में दृष्टि के अगोचर हो गया।
स्वभावोऽयं जिनादीनां शरीरपरमाणवः ।
मुंचति स्कंधतामते क्षरणास् क्षरणरूचामिव ।।१५७३।। . यह स्वभाव है. कि जिन भगवाल के शरीर के परमाणु अन्त समय में स्कंधः' रूपता का परित्याग करते हैं और बिजली के समान तत्काल विलय को प्राप्त होते हैं । . . . . . . .
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अध्याय : प्राठवां ]
[ ७१६ हरिवंशपुराण में यह भी कहा है
ऊर्जयंतगिरौ वज्री बरपालिख्यपावनां । लोके सिद्धि शिला चक्क जिमलक्षणालंकृतां ॥१५७४।।
गिरनार पर्वत पर इन्द्र ने परम पवित्र 'सिद्ध शिला' निर्मापी (रची) तथा उसमें जिनेन्द्र के चिन्ह वच द्वारा अंकित किये।
स्वामी संमंत भद्र ने स्वयंभू स्तोत्र में भी यह बात कही है कि गिरनार पर्वत पर इन्द्र के निर्वाण प्राप्त जिनेन्द्र नेमिनाथ के चिन्ह अंकित किये थे। यहां हरिवंश पुराग से यह बात विशेष ज्ञात होती है कि इन्द्र एक विशेष शिला-सिद्ध की रचना करके उस पर जिनेन्द्र के निर्वाण सूचक चिन्हों का निर्माण करता है। परम्परा से प्राप्त चरण-चिन्हों को निरिह भूमि में अवस्थिति देखने से यह अनुमान किया जा सकता है कि इन्द्र ने मुक्ति प्राप्त करने वाले भगवान के स्मारक रूप में चरण चिन्हों की स्थापना का कार्य किया होगा । सिद्ध भट्टारक किस को कहते हैं
. भगवान जिनेन्द्र ने समस्त कर्मों का नाश करके असिद्धत्वरूप प्रौदयिक भाव से रहित सिद्ध पर्याय को मुक्त होने पर प्राप्त किया है । प्रयोग केवली की अवस्था में भी असिद्धत्व भाव था। राजवातिक में कहा है, 'कर्मोदय-सामान्यापेक्षा, प्रसिद्धः । सयोग केवल्य योग केवलिनोरघातिकर्मोदयापेक्षः' (पृ०७६) ।
कर्मोदय सामान्य की अपेक्षा से यह असिद्धत्वभाव होता है । सयोग केवली तथा प्रयोग केवली के भी अधातिया कर्मोदय की अपेक्षा यह असिद्धत्व भाव माना
सम्पूर्ण जगत को पुरुषाकृति के समान माना जाता है, उसमें सिद्ध परमेष्ठी को त्रिभुवन के मस्तक पर अवस्थित मुकुट समान कहा है । कहा भी है, "तिहुयण-सिर सेहरया सिद्धा भडारया पसीयंतु' त्रिलोक के शिखर पर मुकुट समान विराजमान सिद्ध भट्टारक प्रसन्न होवें । (धवला टीका वेदना खण्ड) अष्टमभूमि
अतन्तानन्त सिद्ध भगवानों ने ध्र.क, अचल तथा अनुपम गति को प्राप्त कर जिस स्थान को अपने चिर निवास योग्य बनाया है, उसके विषय में तिलोयपण्यत्ति में
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७२० ।
[ मो. प्र. चिन्तामणि इस प्रकार कथन किया गया है--'सर्वार्थसिद्धि इन्द्रक विमान के ध्वज दण्ड से बारह योजन मात्र ऊपर जाकर आठवीं पृथ्वी स्थित है। उसके उपरिम और अधस्तन तल में से प्रत्येक विस्तार पूर्व पश्चिम में रूप (एक) से रहित एक राजू है। वेत्रासन के समान वहं पृथ्वी उत्तर दक्षिण भाग में कुछ कम सात राजु लम्बी तथा पाठ योजन बाहुल्यवाली है...स्विच सत्तरभार दिहा विचूया. सत्तरज्जूप्रो (८-६५४) । यह पृथ्वी धनोदधि, धनवात और तनुवात इन तीन बात नामक वायुओं से वेष्टित है ।।
प्रश्न :-सिद्धालय में निगोदिया जीव भी रहते हैं, इसका क्या रहस्य है ?
उत्तर :-सिद्ध लोक में सभी सिद्धं जीवों का ही निवास है, ऐसा सामान्यतया लोक में समझा जाता है, किन्तु आगम के प्रकाश में यह भी ज्ञात होता है कि अनन्तान्त सूक्ष्म निगोदिया जीव सर्वत्र लोक में भरे हैं, अतः वे सिद्धालय में भी भरे हुये हैं । इससे यह सोचना कि उन निगोदिया जीवों को कुछ विशेष सुख की प्राप्ति होती होगी, अनुचित है, क्योंकि प्रत्येक जीव सुख-दुःख का संवेदन अपने-अपने कर्मोदय के अनुसार करता है । इस नियम के अनुसार निगोदिया जींद कर्माष्टक के उदय जन्य कष्टों के समुद्र में डूबे रहते हैं और उसी आकाश के क्षेत्र में विद्यमान केवल आत्म प्रदेश वाले सिद्ध भगवान आत्मोत्पन्न परम शुद्ध निराबाध आनन्द का अनुभव करते हैं।
द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा निगोदिया जीव भी सिद्धों के समान कहे जाते हैं, किन्तु परमागम में जिनेन्द्र देव ने पर्याय दृष्टि का भी प्रतिपादन किया है, उसकी अपेक्षा दोनों का अंतर स्पष्ट है। भूल से एकान्त पक्ष की विकार युक्त दृष्टि के कारण मूढजन सर्वथा सब संसारी जीवों को सिद्धों के समान समझ बैठते हैं। और धर्माचरण में प्रमादी बन जाते हैं । स्याद्वाद दृष्टि का प्राश्रय लिए बिना यथार्थ रहस्य ज्ञात नहीं हो पाता है। . . प्रश्न :--सिद्ध भगवान और वीतरागता--कोई यह सोच सकता है कि
भगवान में अनंतज्ञान है, अनन्त शक्ति है और भो अनन्त गरण उनमें विद्यमान हैं। यदि वे दुःखी जीवों के हितार्थ कुछ कृपा करें
तो संसारी जोवों को बड़ी शांति मिलेगी ? उत्तर :---वस्तु का स्वभाव हमारी कल्पना के अनुसार नहीं बदलता है। पदार्थों के स्वभाव को आगम में स्वाश्रित कहा है। बीज के दग्ध हो जाने पर पुनः अंकुरोत्पादन कार्य कहीं हो सकता है, इसी प्रकार कर्म के बीज रूप राग द्वेष भावों का .
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अध्याय : पाठवां ]
[ ७२१ सर्वथा क्षय हो जाने से पुनः लोक कल्याणार्थ प्रवृत्ति के प्रेरक कर्मों का भी प्रभाव हो गया है । अब वे वीतराग हो गये हैं । प्रश्न :--प्राचार्य अकलंक देव ने राजवार्तिक में एक सुन्दर चर्चा की है।
शंकाकार कहता है, 'स्थात् एतत् ध्यसनाणंचे निमग्न जमवशेषं जानतः पश्यतश्च कारूण्यमुत्पद्यते । संपूर्ण जगत् को दुःख के सागर में निमग्न जानते तथा देखते हुये सिद्ध भगवान के करुणाभाव उत्पन्न होता होगा । शंका का भाव यह है कि अन्य सरागी, सम्प्रदाय में उनका माना गया काल्पनिक रागद्वेष, मोहादि सम्पन्न परमात्मा जीयों के हितार्थ संसार में प्राता है। ऐसा ही सिद्ध भगवान करते होंगे, यह शंकाकार का भाव है। इस दृष्टि से प्रेरित होकर उपरोक्त पान के पत्रात वह कहता है, 'ततश्चबंधः' जब भगवान के मन में करुणाभाव उत्पन्न होगा तो वे बन्ध
को भी प्राप्त होंगे? उत्तर :- सत्र कि कारणं ? सस्त्रिय-परिक्षयात् भक्ति-स्नेह-कृपा-स्पृहादीना राग विकल्पत्वाद्वीतरामे न ते संतीति (पृ. ३६२, ३६३-१०-४) ऐसा नहीं है, कारण भगवान के सर्व कर्मों का पास्त्रव बन्द हो गया है । भक्ति, स्नेह, कृपा, इच्छा आदि सब रागभाव के ही भेद हैं । वीतराग प्रभु में उन भावों का सद्भाव नहीं है।
प्रश्न :-~-यदि भगवान कुछ काल पर्यंत मोक्ष में रहकर पुनः संसार में प्रा
__ जायें, तो इसमें क्या बाधा है ?
उत्तर :--गभीर चितन से पता चलेगा कि अपने ज्ञान द्वारा जब परमात्मा जानते हैं कि मैं राग, द्वेष, मोहादि शत्रुओं के द्वारा अनंत दुःख भोग चुका है, तब वे सर्वज्ञ, समर्थित तथा प्रात्मानन्द का रसपान करने वाले परमात्मायें पाप-पक में बने का विचार करेंगे ? अपनी भूल के कारण पंजर बद्ध बुद्धिमान पक्षी भी एक बार पिंजरे से छूटकर स्वतन्त्रता का उपभोग छोड़कर पुनः पिंजरे में आने का क्यों प्रयत्न करेगर ? तब निर्विकार, वीतराग सर्वज्ञ-परमात्मा: अपनी स्वतन्त्रता को छोड़कर पुनः माता के गर्भ में आकर अत्यन्त मलिन मानव शरीर धारण करने की कल्पना भी नहीं करेगा । ऐसी कल्पना मनोविज्ञान तथा स्वस्थ विचार धारा के पूर्णतया विरुद्ध होगी।
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७२२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि . प्रश्न :---सिद्ध पर्याय प्राप्त करने पर वे भगवान अनन्त काल पर्यंत क्या
___ कार्य करते हैं ? .. उत्तर :- भगवान अब कृतकृत्य हो चके हैं। उन्हें संसार का कोई काम करना बाकी नहीं रहा है। सर्वज्ञ होने से संसार का चिर काल तक चलने वाला विविध रसमय नाटक उनके सदा ज्ञान गोचर होता रहता है। उनं सर्वज्ञ के समान ही शुद्धोपयोग वाला तथा अनन्त गुरग वाला जीव विभाव का प्राश्रय लेकर चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता हुआ अनन्त प्रकार अभिनय करता है। विश्व के रंग मंच पर चलने वाले इस महानाटक का महाप्रभु निर्विकार भाव से प्रेक्षण करते हुये अपनी आत्मानुभूति का रस पान करते रहते हैं ।
एक बात और है-सिद्ध भगवान योगोन्द्रों के भी परम पाराध्य हैं । समाधि के परम अनुरागी योगी जन कहते हैं 1 जितना महान तथा उच्च योगी होगा, उसकी समाधि भी उतनी उच्च प्रकार की होगी । योगी यदि सर्वोच्च हो, तो उसकी समाधि भी श्रेष्ठ रहेगी। सिद्ध भगवान परम समाधि में सर्वदा निमग्न रहते हैं। उनकी आत्म समाधि कभीभी भंग नहीं होती है, क्योंकि अब उन सिद्धों के क्षुधा, तृषादि की व्यथा का क्षय हो गया है। शरीर भी नष्ट हो चुका है। अब दे सिद्ध ज्ञान शरीरी बन गए हैं । इस शुद्ध प्रात्म समाधि में उन्हें अनंत तथा अक्षय श्रानन्द प्राप्त होता है। उस समाधि में निमग्न रहने से उनकी बहिखी वृत्ति की कभी भी कल्पना नहीं की जा सकती है।
जब तक ऋषभनाथ भगवान सयोगी तथा अयोगी जिन थे, तब तक वे सकल-परमात्मा थे। उनके भव्यत्व नाम का पारिणामिक भाव था। जिस क्षण वे सिद्ध भगवान हुये, उसी समय वे निकल-परमात्मा हो गये । भव्यत्व भाव भी दूर हो गया । अभव्य तो वे थे ही नहीं, भव्यपना विद्यमान था, वह भी दूर हो गया, इससे वे अभव्य-भव्य के विकल्प से भी मुक्त हो गये हैं । कैलाश मिरि से एक समय में ही ऋजुगति द्वारा गमन करके भगवान ऋषभदेव सिद्ध भूमि में पहुँच गये हैं । वहां वे अनन्त सिद्धों के समूह में सम्मिलित हो गये हैं । उनका व्यक्तित्व नष्ट नहीं होता है। वेदान्ती मानते हैं, ब्रह्म दर्शन के पश्चात् जीव परम ब्रह्म में विलीन होकर स्वयं के. अस्तित्व से शून्य हो जाता है। सर्वज्ञ प्रणीत परमागम कहता है कि कभी भी सत्.'
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अध्याय : आठवां }
[ ७२३
का नाश नहीं होता है। अतएव सिद्ध-भगवान स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल तथा स्वभाव में सदा अवस्थित रहते हैं
प्रश्न : - क्या एक ब्रह्म की कल्पना अपरसार्थ है ?
उत्तर : - इस प्रसंग में एक बात ध्यान देने की है कि सिद्ध-भगवान आपस
में सभी समान हैं । अनन्त प्रकार के जो संसारी जीवों के कर्मकृत भेद पाये जाते हैं । उनका वहाँ अभाव है। सभी सिद्ध-परमात्मा एक से हैं, एक नहीं हैं । उनमें परस्पर में सादृश्य है, एकत्व नहीं है । अन्य सम्प्रदाय मुक्ति प्राप्त करने वालों का ब्रह्म में fate होना मानकर एक ब्रह्म कहते हैं । स्याद्वाद शासन बताता है कि एक ब्रह्म की पर सुक्ति नहीं है, 'एक' के स्थान में एक सदृश अथवा एक-से कहना परमार्थ कथन हो जाता है ।
प्रश्न :- द्वैत- प्रद्धत किस प्रकार ?
उत्तर :--- सिद्धभूमि में पापात्माओं का भी साम्यवाद है । वहाँ रहने वाले अनन्तानन्त निगोदिया जीव दुःख तथा श्रात्म गुणों के ह्रास की अवस्था में सभी समानता धारण करते हैं। प्रत्येक प्राणी को जीवन में अपनी शक्ति भर सिद्धों के सदृश बनने का विशुद्ध भगीरथ प्रयत्न करना चाहिये ।
जब जीव कर्मों का नाश करके शुद्धावस्था युक्त निकल परमात्मा बन जाता है, तब उसकी अद्वैत अवस्था हो जाती है। आत्मा अपने एकत्व को प्राप्त करता है, और कर्मरूपी माया जाल से मुक्त हो जाता है । मुक्तात्मा की अपेक्षा वह अद्वैत अवस्था है । इस तत्व को जगत् भर में लगातार सभी को श्रद्वैत के भीतर समाविष्ट मानना एकान्त मान्यता है, जो असत्य के भूमि पर अवस्थित होने क्षण भर भी युक्ति तथा सद्विचार के समक्ष नहीं टिक सकती | सिद्ध भगवान बन्धन रूप त अवस्था से छूटकर आत्मा की अपेक्षा अद्वैत पदवी को प्राप्त हो गये हैं । इस प्रकार तस्याद्वाद शासन भी स्वीकार करता है। यह अद्वैत अन्य द्वत का विरोधक नहीं है । जो संहारक प्रत समस्त द्वैत के विनाश को केन्द्रबिन्दु बनाता है, वह तत्काल स्वयं क्षय को प्राप्त होता 1
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अनन्त गुण सम्पन्न होने के कारण सिद्ध-भगवान को अनन्त कहना उचित है । वर्तमान युग के कवि जिस अनन्त की ओर अपनी कल्पना को दौड़ाते हैं, उन कवियों का लक्ष्य यथार्थ में ये अनन्त गुणराशि के भंडार परम प्रभु हैं ।
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७२४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
प्रश्न :-निर्वाण भूमि कैसी है ?
उत्तर :-ऋषभनाथ भगवान कैलाश पर्वत पर मुक्त हुये, पश्चात् वे सिद्धालय में ऊर्ध्वगमन स्वभाववश पहुँचे। इस दृष्टि से प्रथम मुक्तिस्थल ऋषभनाथ भगवान की अपेक्षा कैलाश पर्वत है, वासुपूज्य भगवान की दृष्टि से चंपापुर है, नेमि जिनेन्द्र की अपेक्षा गिरनार अर्थात् ऊर्जयन्त गिरि है ! वर्धमान भगवान की अपेक्षा पावापुर है, और शेष बीस तीर्थंकरों की अपेक्षा सम्मेद शिखर निरिण स्थल है। निर्वाण कांड में कहा है :--
अष्टापदे वृषभश्चंपायां वासुपूज्य जिननाथः । ऊमयन्ते नेमि जिनः पावायां निवतो महावीरः ।।१५७५॥ विशतिस्तु जिनवरेन्द्राः अमरसुरवन्दिता धुतक्लेशाः ।
सम्मेदे गिरि शिखरे निरिणं गता नमस्लेभ्यः ॥१५७६।।
- सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर ज्ञात होगा कि केवलज्ञान होने के पश्चात् भगवान का परम प्रौदारिक शरीर पृथ्वी तल का स्पर्श किया होगा, यह विचार उचित नहीं है । भगवान का कर्मजाल से छूटने का असली स्थान वे आकाश के प्रदेश हैं; जिनको मुक्त होने के पूर्व उनके परम पवित्र देह ने स्पर्श किया था। तिलोयपणत्ति में क्षेत्रमंगल पर प्रकाश डालते हुए लिखा है :
एदस्स उदाहरण पावास-परूज्जयंत-चंपावी। पाहु-हत्यपहुदी पणुवोस-व्याहिय परग सयधरित ॥१५७७।। देह अवादि केवलरणारगावा -गयरबेसो था। सेदि-घणमेत्ति अप्पापदेसगद लोयपुरणा पुण्णा ॥१५७८।।
इस क्षेत्रमंगल के उदाहरण पावानगर, ऊर्जयन्त गिरि और चंपापुर आदि है। अथवा साढ़े तीन हाथ से लेकर पांच सौ पच्चीस धनुष प्रमारण शरीर में स्थित और केवलज्ञान से व्याप्त प्रकाश के प्रदेशों को क्षेत्रमंगल समझना चाहिये । अथवा जगत श्रेणी के घनमात्र अर्थात् लोक प्रमाण आत्मा के प्रदेशों से लोकपुरण समुद्धात. द्वारा पूरित सभी लोकों के प्रदेश भी क्षेत्रमंगल हैं। ।
स्वयंभू स्तोत्र में लिखा है कि उर्जयतगिरि से अरिष्ट नेमिजिनेन्द्र के मुक्त होने के पश्चात् इन्द्र ने गिरनार पर्वत पर चरण चिन्हों को अंकित किया था, जिससे , भगवान के निवारण स्थान की सदा पूजा की जा सके । कहा भी है :---
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अध्याय : पाठवां ]
ककुदं भुवः खचर-घोषिदुषित-शिखरैरलंकृतः । मेघपटल-परिवीततटस्तव लक्षणानि लिखिसानि धधिणा ॥१५७६।।
वह उर्जयन्त पर्वत पृथ्वी रूप बैल की ककुद के समान था। उसके शिखर विद्याधरों तथा विद्याधारियों से शोभायमान थे तथा उसका तट मेध पटल से घिरा रहता था। उस पर बनी अर्थात् इन्द्र ने अापके अर्थात् नेमिनाथ भगवान के चरण चिन्हों को उत्कीर्ण किया था।
इस कथन के अनुसार इन्द्र में अन्य तीर्थंकरों के निर्वाण क्षेत्रों पर भी भगवान के चरण चिन्हों की स्थापना की होगी, यह मानना उचित हैं।
जिस काल में भगवान ने मोक्ष प्राप्त किया था, वह समय समस्त पापमल के मलाने का कारण होने से कालमंगल माना गया था। प्रश्न :-- कर्मों के नाश का क्या अर्थ है ? सत् पदार्थ का कभी भी सर्वथा
क्षय नहीं होता है, तब भगवान ने समस्त कर्मों का क्षय किया, __इस कथन का क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :--- यह बात यथार्थ हैं कि सत् का. सर्वथा नाश नहीं होता है और न कमो असत् का उत्पाद ही होता है । समन्तभद्र स्वामी ने कहा है :- "नेवाऽसतो जन्म, सतो न नाशो' अर्थात् असत् का जन्म नहीं होता है तथा सत् का नाश भी नहीं होता है। कर्मों के नाश का अर्थ यह है कि प्रात्मा से उन कर्मों का सम्बन्ध छूट जाता है। उन कर्मों में रागादि विकार उत्पन्न करने की शक्ति दूर हो जाती है। वैसे पदार्थ की शक्ति का नाश नहीं होता है। यहां अभिप्राय यह है कि पुद्गल ने कर्मत्व पर्याय का त्याग कर दिया है। वह पुद्गल कर्म पर्याय के रूप में विद्यमान हैं । अन्य कषायवान् जोव के द्वारा उसे कर्म योग्य बनाने पर पुनः कर्म पर्याय रूप परिणत कर सकता है । मुक्त होने वाली आत्मा के साथ उस पुद्गल का अब कभी पुनः बन्ध नहीं होगा । कर्म क्षय का इतना ही मर्यादा पूर्ण अर्थ करना उचित है।
निर्वारा भूमि को निषिधिका कहा गया है । प्रतिक्रमण ग्रन्थत्रवी में गौतम गणधर मे लिखा है, 'मोत्थुदे खिसीधिये रामोत्थुदे अरहन्त, सिद्ध' (पृ० २०) निषोधिका को नमस्कार है। अरहन्तों को नमस्कार है। सिद्धों को नमस्कार है । संस्कृत टीका में प्राचार्य प्रभाचन्द्र ने निषीधिका के सत्रह अर्थ करते हुए, उसका अर्थ सिद्ध जीव, निर्वाण क्षेत्र, उनके द्वारा आश्रित आकाश के प्रदेश भी किया है, उन्होंने
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७२६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
यह गाथा भी उद्धृत की है :------ ... सिद्धाय सिद्ध भूमी सिद्धारण-समाहियो रगहो-देसो।
एयानो अण्णासो मिसीहीयानो सया बंदे ॥१५८०।। --- सिद्ध, सिद्धभूमि, सिद्धों के द्वारा आश्रित आकाश के प्रदेश आदि निषोधिकानों की मैं संदा वंदना करता हूँ।
इस मागम के प्रकाश में कैलाश गिरि अादि निर्वाण भूमियों का महत्व स्पष्ट होता है।
.... इससे 'निषीधिका या निषेधिका' पूज्य है, यह निर्विवाद है । निधिका शब्द को प्रतिनिधि शब्द कानड़ी भाषा में विशिदी' और मराठी में समाधि' कहने का प्रधान (प्रचार) है । दक्षिण भारत के महाराष्ट्र प्रांत में कोल्हापुर, कुभोज-बाहुबली पहाडी, नांदणी, शेउबाल, रायबाग, तेरदाल, भिलवड़ी, अर्कवाट इत्यादि अनेक गाँवों में निशिदीका हैं और दक्षिण कर्नाटक प्रान्त में श्रवण बेलगोला के चन्द्रागिरि पहाड़ पर भद्रबाहु स्वामी की निषाधिका है ! इस विषय का वर्णन रत्ननन्दीमुनि विरचित 'भद्रबाहु पुराण में लिखा है।
__ निषेधिका पूजा के सम्बन्ध में कुन्दकुन्दाचार्य: विरवित षट् प्राभृत ग्रन्थ की टीका में श्रुतसागर सुरी लिखते हैं कि :.....
देवहं सत्यहं मुणिवरहं जो विद्देसु करेइ । नियमि पाड हवेइ त में संसारू भभेइ ॥१५५१॥ देवेभ्यः शास्त्रेभ्यो मुनिवरेभ्यो यो विद्वषं करोति । नियमेन पापं भवति तस्य येन संसारे भ्राम्यति ।। योगीन्द्र देव ॥ .
टीका :-अस्यदोहकस्य भावः-देवशास्त्रगुरुगा प्रतिमासु निपीधिकादिषु च पुष्पादिभिः पूजादिषु लोका द्वषं कुर्वन्ति तेषां पापं भवति, तेन पापेन ते नरकादी पतंति इति ज्ञातव्यम् । श्री श्रुतसागर सूरि ।
भावार्थ :---देवशास्त्र गुरुओं की प्रतिमा और निषीधिका आदि स्थानों का पुष्पादिक से पूजन करने के लिए लोग द्वेष करते हैं, वे दुर्गति में जाते हैं।
. इस विषय में नेमिचन्द्र कृत प्रतिष्ठा तिलक शास्त्र में निपीधिका की यथोक्त
....
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अध्याय : आठवां ]
| ७२७ प्रतिष्ठा करके उसका पूजन करना चाहिए, इस विषय का वर्णन आया है :--
गह:--ऐदथुगीनाचायादिषु पुषाचार्यगुणस्य. सत्तां वीक्ष्य तत्पादुकाद्वयं अचार्यादिप्रतिष्ठावत् प्रतिष्ठापयेत् । प्रसिद्ध संन्यास मरण प्राप्त गुर्वादि निषेधिकां जिनगृहे निष्यि जिनप्रतिष्ठाकाले प्रतिष्ठाप्य क्षपकांगोज्झनभूमौ निवेशयेत् । अथवा बहिरेव निर्माप्य जिन प्रतिष्ठा समये नयनोन्मीलनं तद्रव्येण प्रापथ्य तत्र गत्वा शेश्वविधि स्वयमिन्द्रः कृत्वा संघ क्रियां कुर्यात् । अथवा क्षरांगोजनावनो आचार्यादि. प्रतिष्ठोक्तविधि सर्व समासतः कृत्वा वद्धमान स्वामिनिर्वाण काले निषेधिकां प्रतिष्ठापयेत् ।
उपर्युक्त प्राधार से वर्तमान में जहां-जहां निषीधिका हैं, वहां-वहां के श्रावक लोग उनकी निस्य नैमित्तिक, जो पूजा करते हैं, वह यथायोग्य होते हुए भी शास्त्रोक्त है।
प्रश्न :- मत्यु, मोक्ष और समाधि में क्या अन्तर है ?
उत्तर :---पौद्गलिक कर्मों का प्रात्मा से सम्बंध छूटने को द्रव्यमोक्ष कहते हैं । जिन परम विशुद्ध भावों द्वारा संकर तथा निर्जरा द्वारा कर्मों का क्षय होता है, उसे भाव मोक्ष कहते हैं। इस मोक्ष अवस्था में कर्म और जीव पृथक हो जाते हैं। बंध की अवस्था में कर्म ने जीवा को बांधा था और जीव ने कमरे को पकड़ लिया था । उस अवस्था में जीव और पुद्गल में विकार उत्पन्न होने से वैभाविक परिगमन हुआ करता था। मोक्ष होने पर जैसे जीव स्वतन्त्र हो जाता है, उसी प्रकार बंधन बद्ध कर्म परिणत पुद्गल भी स्वतन्त्र हो जाता है। जीव की स्वतंत्रता का फिर विनाश नहीं होता, किन्तु पुद्गल पुनः अशुद्ध पर्याय को प्राप्त कर अन्य संसारी जीवों में विकार उत्पन्न करता है । दोनों की स्वतंत्रता में इतना अंतर है।
भगवान के निर्धारण का दिन यथार्थ में प्राध्यात्मिक स्वाधीनता दिवस है। उस दिन मृत्यु की मृत्यु हुई है और पुरुषार्थी प्रात्मा ने श्रेष्ठ पुरुषार्थ को प्राप्त किया है। निर्वाण और मृत्यु में अन्तर है । भुज्यमान आयु कर्म के नष्ट होने के पूर्व ही अागामी भव की आयु का बंध होता रहता है। वर्तमान आयु का क्षय होने पर वर्तमान शरीर का परित्याग होता है । पश्चात् जीव पूर्व बद्ध आयु कर्म के अनुसार अन्य देह को धारण करता है। इस प्रकार मृत्यु का सम्बन्ध प्रगामी जीवन से बना रहता है । मोश्च में ऐसा नहीं होता है। परिनिर्वाण की अवस्था में आयुकर्म का
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७२८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि सर्वथा क्षय हो जाने से जन्म-मरण की शृखला समाप्त हो जाती है । इस पंचम काल में संहनन की हीनता के कारण मोक्ष के योग्य शुक्लध्यान नहीं बन सकता है, अतः मोक्ष के होने का वर्तमान काल में भरत क्षेत्र में प्रभाव है.।।
सतगी संप्रदायों में निर्माण का प्रांतरिक मर्म का प्रवबोधन होने से वे लोक प्रसिद्ध व्यक्ति की मृत्यु को भी परिनिर्वाण या महानिर्वाणा कह देते हैं । सम्पूर्ण परिग्रह को त्याग कर दिगम्बर मुद्राधारी श्रमरण बनने वाले व्यक्ति को रत्नत्रय की पूर्णता होने पर मोक्ष प्राप्त होता है । जो कुगुरू, रागी, द्वषी देवों तथा हिंसामय धर्म से अपने को उन्मुक्त नहीं कर पाये हैं, उनकी मृत्यु को निरिण मानना उचित नहीं है । तत्वज्ञानी ऐसी भ्रान्त धारणाओं के जाल से अपने को बचाता है ।
तत्वार्थ सार में एक सुन्दर शंका उत्पन्न कर उसका समाधान किया गया है।
स्यादेतदशरीरस्य . जसोनष्टाष्टकर्मणः । . . कथं भवति मुस्तस्य सुखमित्युत्तरंथ णु ॥१५८२॥
प्रत्येक निर्वाण दीक्षा लेने वाले श्रमण भगवान का स्मरण करते हुए यह कामना करते हैं, 'इच्छामि भंते! कम्मरखो। भगवान! मैं कर्मों के नाश की आकांक्षा करता हूँ। 'भते! समाहिमरणं जिणगुण संपत्ति होहु मज्झं प्रभो!' मुझे समाधिमरण प्राप्त हो तथा जिनेन्द्र गुण संपत्ति को प्राप्ति हो।
सत्रह प्रकार के भरणों में समाधि अर्थात् मनोगुप्ति, बचोगुप्त तथा कायगप्ति की पूर्णतापूर्वक शरीर का त्याग अयोगी जिन के पाया जाता है । उस मरण का नाम पंडित-पंडित मरण कहा है। मिथ्यात्वी जीवों का भरण 'बाल-बाल' मरण कहा है । 'पंडा यस्यास्ति असौ पंडितः' । जिसके पंडा का सद्भाव है, वह पंडित है । मूलाराधना में लिखा है----'पंडा हि रलत्रय--परिणता बुद्धिः' (पृष्ठ १०५)
रत्नत्रय धर्म के धारण करने में उपयुक्त बुद्धि पण्डा है। उस बुद्धि से अलंकृत व्यक्ति पंडित है, सच्चा पांडिल्य तो तब ही शोभायमान होता है, जब जीव हीनाचार. का त्याग कर विशुद्ध प्रवृत्ति द्वारा अपनी प्रात्मा को अलंकृत करता है। प्रागम में व्यवहार पंडित, ज्ञान पंडित तथा चारित्र से सम्पन्न होने के कारण पंडित-पंडित है। उनका शरीरान्त पंडित-पंडित मरण है । इसके पश्चात् उस आत्मा का भरण पुनः नहीं होता है । जिस शुद्धोपयोगी, ज्ञान चेतना का अमृतपान करने वाले को ऐसी समाधि
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अध्याय : आठवां ]
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प्राप्त है, उसको जिनेन्द्र की अष्टगुणरूप सम्पति की प्राप्ति होती है । ऐसी अवस्था की सदा अभिलाषा की जाती है। छह माह माठ समय में ६०८, छह सौ ग्राठ महान को प्रात्मगुणरूप विधियां प्राप्त होती है। जीवन में मोक्ष प्राप्ति से बढ़कर श्रेष्ठ क्षण नहीं हो सकता है । श्रतएव विचारवान् व्यक्ति की दृष्टि से निर्धारण कल्याणक का सर्वोपरि महत्व है। वह अवस्था आम गुणों का चितवन करते हुये जीवन को उज्ज्वल बनाने की प्रेरणा प्रदान करती है ।
मोक्ष प्राप्ति की महत्ता को सभी स्वीकार करते हैं, किन्तु अन्य जीवों के समाधिमरण को वे शोक का हेतु सोचते हैं । इस संबंध में हरिवंश पुराण से महत्व पूर्ण प्रकाश प्राप्त होता हैं । श्राचार्य कहते हैं
मिथ्यादृष्टेः सतो, जन्तोः मरणं शोचनाय हि ।
न तु वर्धनशुद्धस्य षमाधिमरलं शुचे ॥१५८३॥
fretreat जीव का मरण सत्पुरुषों के लिये शोक का कारण है, क्योंकि उस जीव ने अपनी आत्मा का कल्यास नहीं किया है, तथा विषयों में आसक्त होकर दुर्लभ नर जन्म बिता दिया । सम्यग्दर्शन से विशुद्ध आत्मा का समाधिमरण शोक का कारण नहीं है ।
प्रश्न :--- - सिद्धों के किस प्रकार का सुख माना जायेगा ?
अष्ट कर्मों के नाश करने वाले शरीर रहित मुक्तात्मा के कैसे सुख पाया जायेगा ?
शंकाकार का अभिप्राय यह है कि शरीर के होने पर सुखोपभोग के साधन इन्द्रियों द्वारा विदयों से श्रानंद की उपलब्धि होती थी । मुावस्था में शरीर का नाश हो जाने से सुख का सद्भाव कैसे माना जाये ?
उत्तर: - सुख का प्रयोग लोक में विषय, वेदना का अभाव, विपाक, मोक्ष इन चार ग्रंथों में आता है ।
लोके चतुविहार्थेषु सुख शब्दः प्रयुज्यते ।
faad draiser विपाके सोक्ष एव च ।। १५८४ | ३
'सुखं वायुः सुखं वन्हि:' यह पवन आनंददायी है ।
है। यहां विषय में सुख शब्द का प्रयोग हुआ है । दुख का अभाव होने पर पुरुष
यह प्रति अच्छी लगती
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[ गो. प्र. चिन्तामणि कहता है, 'सुखितोऽस्मि' में सुखी हैं। पुण्य कर्म साता वेदनीय के विपाक-उदय से इन्द्रिय तथा पदार्थ से उत्पन्न सुख प्राप्त होता है । श्रेष्ठ सुख की प्राप्ति, कर्मक्लेश का अभाव होने से, मोक्ष में होती है । मोक्ष के सुख के समान आज सानंद नहीं है. इससे उस मोक्ष के सुख को निरुपम कहा है । त्रिलोकसार में लिखा है
चक्कि-कुरु-फरिण-सुरेन्दे-अहमिन्दे जं सुह तिकालभवं । तत्तो असंतपुरिणदं सिद्धाणं खणसुहं होदि ।।१५८५।।
चक्रवर्ती, कुरु, नागेन्द्र, सुरेन्द्र, अहमिन्द्रों में जो क्रमशः अनंतगुणा सुख पाया जाता है, उनके सुखों को अनंत गुणित करने से जो सुख होता हैं; उतना सुख सिद्ध भगवान को क्षणमात्र में प्राप्त होता है।
सुख और दुःख की सूक्ष्मता पूर्वक मीमांसा की जाय, तो ज्ञात होगा कि सच्चासुख तथा शान्ति भोग में नहीं, त्याग में है। भोग से तृष्णा की वृद्धि होती जाती है । उससे अनाकुलता रूप सुख का नाश होता जाता है । इन्द्रिय जनित सुख का स्वरूप समझाते हुए प्राचार्य कहते हैं-तलवार को धार पर मधु लगा दिया जाय । उसको चाटते समय कुछ पानंद अवश्य प्राप्त होता है, किन्तु जीभ के कट जाने से अपार वेदना होती है।
विषय जनीत सुखों को दुःख कहने के बदले में सुखाभास नाम दिया जाता है । परमार्थ दृष्टि से यह सुखाभास दुःख ही है । पंचाध्यायी में वैषयिक सुख के विषय में कहा है--
ऐहिकं यत्सुखं नाम सर्व वैषयिकं स्मृतम् । नहि तत्सुखं सुखाभासं किन्तु दुःखमसंशयम् ।।१५८६॥ । वह इन्द्रियजन्य सुख सुखाभास है, यथार्थ में बह दुःख ही है ! शक-चक्रधरादीनां केवलं पुण्यशालिनाम् । तृष्णाबीजरतिम् तेषां सुखावाप्तिस्कुतस्तनी ॥१५८७॥ प्रश्न :-महापुण्यशाली इन्द्र, चक्रवर्ती आदि जीवों के तृष्णा के बीजरूप
रति अर्थात् प्रानन्द पाया जाता है। उनको सुख की प्राप्ति कैसे
उत्तर :- इन्द्रिय जनित सुख कर्मोदय के प्राधीन है। सिद्धों का सुख स्वाधीन है । इन्द्रिय जनित सुख अन्त सहित है, पाप का बीज है तथा दुःखों से मिश्रित
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अध्याय : पाठवां ]
[ ७३१ है । सिद्धावस्था का सौख्य अनंत है। वहाँ दुःख का लेश भी नहीं है । विनकारी कर्मों का पूर्ण क्षय हो चुका है। नियमसार में कहा है
रणदि कम्भ गोकम्म पनि चिता पेय अस्ट्रागि। रवि धम्मा--सुक्कझाणे सत्थेव होइ णिव्याणं ॥१५॥
सिद्ध भगवान के कर्म नोकर्म नहीं है, चिन्ता नहीं है। प्रात रौद्र ध्यान नहीं है । धर्मध्यान तथा शुक्ल ध्यान नहीं है। ऐसी अवस्था में ही निर्वाण है । पुनः कुन्द-कुन्द स्वामी कहते हैं
णियाणमेव सिद्धा सिद्धा रिणवारसमिदि समुट्ठिा। कम्मधिमुक्को प्रप्पा गच्छइ लोयागपज्जतं ॥१५८६॥
निर्वाण ही सिध्द है और सिध्द ही निर्धारण है, अर्थात् दोनों में अभिन्नता है। कर्मों से रहित आत्मा लोक के अग्न पर्यंत जाती है । प्रश्न :-भोजन पान आदि के द्वारा सुख प्राप्त होता है, यह संसारी प्राणी
का अनुभव है। अतएव सिद्धालय में सुख जनक सामग्री के प्रभाव
में सिद्ध परमात्मा के किस प्रकार सुख माना जायगा? उत्तर :--सिद्धभक्ति में लिखा है-भगवान ने क्षुधा तथा प्यास के कारणभूत असातावेदनीय कर्मो का नाश कर दिया है उस भूख की वेदना का क्षय हो जाने से असंख्य प्रकार के भोजन व्यंजन प्रादि पदार्थ व्यर्थ हो जाते हैं । क्षुधा की वेदना को दूर करने को संसारी जीव आहारादि ग्रहण करते हैं। उन सिद्धों के वेदना ही नहीं है, अतः औषधि रूप आहार की कोई भी उपयोगिता नहीं रहती है। अपवित्रता से सम्बन्ध न होने के कारण सुमंधित माला प्रादि की भी कोई आवश्यकता नहीं है। ग्लानि, निद्रा आदि के कारण दर्शनावरण तथा मोहनीयादि कर्मों का क्षय हो गया है, अतएव मदु शयन पासनादि की आवश्यकता नहीं है। भीषण रोम जनित पीड़ा का अभाव होने के कारण उस रोग के उपशमन हेतु ली जाने वाली प्रौषधि अनुपयोगी है । अथवा दृश्यमान जगत् को सूर्य के प्रकाश के रहने पर दीपक के प्रकाश का प्रयो
जन नहीं रहता है, इसी प्रकार सिद्ध भगवान के समस्त इच्छाओं का अभाव है, । इसलिये बाह्य इच्छापूर्ति करने वाली सामग्री की आवश्यकता नहीं है। मोह ज्वर से
Byindan
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{गो. प्र. चिन्तामणि पीडिट अपर के जीतों का पनभन मोह से रहित स्वस्थ अर्थात् आत्मस्वभाव में अवस्थित सिद्ध भगवान के विषय में लगाना अनुचित है। कहा भी है..
नार्थः क्षुस्तृदिनाशात् विविधरसयुतरन्नपानरशुच्या। नास्पृष्टे गन्धमाल्यार्महिमृदुशयनग्लानिनिद्राधभावात् ॥
आतंकातेरभावे तबुपशमनापजानर्थतावद् । दीपानर्थक्यवहां व्यपगततिमरे दृश्यमाने समस्ते ॥१५६०।।
अवर्णनीय, इन्द्रिय जनित सुख का अनुभव लेने वाले सर्वार्थ सिध्दि के अहमिन्द्र सदा यही अभिलाषा करते हैं कि किस प्रकार उनको शिब्दों का स्वाधीन तथा इंद्रियातीत अविनाशी सुख प्राप्त हो। सर्वार्थ सिध्दि के अहमिन्द्रों में पूर्णतया समानता रहने से पुण्यात्मानों का परिपूर्ण साम्यवाद' पाया जाता हैं, ऐसा ही साम्यवाद उनसे द्वादश योजन ऊंचाई पर विराजमान सिध्दों के मध्य पाया जाता है । यह अध्यात्मिक विभूतियों के मध्य स्थित साम्यवाद है । अहमिन्द्रों का साम्यवाद तंतीस सागर की आयु समाप्त होने पर तत्क्षण समाप्त हो जाता है अर्थात् वहाँ से चय होने पर अवस्थांतर-मनुष्य पर्याय में आना पड़ता है। सिध्दों के मध्य का समाजवाद अविनाशी है । सब आत्माएँ परिपूर्ण तथा स्वतंत्र हैं। एक दूसरे के परिणमन में न साधक हैं, न बाधक हैं।
संसार में शरीरान्त होने पर शोक करने की प्रणाली है, किन्तु यहां भगवान का देहान्त होते हुए भी आन्दोत्सव मनाया जा रहा है, कारण आज भगवान को चिरजीवन प्राप्त हुआ है। मृत्यु तो कर्मों की हुई है । आत्मा आज अपने निज भवन में जाकर अनन्त सिद्ध बन्धुओं के पावन परिवार में सम्मिलित हुआ है । आज प्रात्मा ने स्व राज्य रूप सार्थक स्वराज्य का स्वामित्व प्राप्त किया है, भगवान के अनन्त मानन्द लाभ की बेला में कौन विवेकी व्यथित होगा? इसी से देवों ने उस प्राध्यात्मिक महोत्सव की प्रतिष्ठा के अनुरूप प्रानन्द नाम का नाटक किया था । इस प्रानन्द नाटक के भीतर एक एक रहस्य का तत्व प्रतीत होता है । सच्चा आनन्द तो कर्मराशि के नष्ट होने से सिद्धों के उपयोग में प्राता है । संसारी जीव विषय भोग कर सुख का नकली नाटक सदा दिखाया करते हैं । सिद्धों के प्रानन्द' की कल्पना भी नहीं की सकती है । आचार्य रविषेश ने पद्मपुराण में बड़ी सुन्दर बात कही है--
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अध्याय आठवां ]
जनेभ्यः सुखिनो भूपाः भूपेभ्यश्चक्रवर्तिनः । चक्रिभ्यो व्यंतरास्तेभ्यः सुखिनो ज्योतिषोऽमराः ।। १५६१।। ज्योतियों भवनावासास्तेभ्यः करूपभुवः क्रमात् । ततो कावासास्ततोऽनुसर वासिनः ॥१५२॥
अनन्तानन्त गुरणतस्तेभ्यः सिद्धपदस्थिताः ।
[ ७३३
सुखं नापरमुत्कृष्टं विद्यते सिद्धसौख्यतः ।। १५६३॥
मनुष्यों की अपेक्षा राजा सुखी है, राजाओं की अपेक्षा चक्रवर्ती सुखी, चक्रवर्ती की अपेक्षा व्यंतर देव तथा व्यन्तरों की अपेक्षा ज्योतिषी देव सुखी है । ज्योतिषी देवों की अपेक्षा भवनवासी तथा भवनवासियों की अपेक्षा कल्पवासी सुखी हैं । कल्पवासियों की अपेक्षा ग्रैवेयकवासी तथा ग्रैवेयकवासियों की अपेक्षा विजय वैजयन्त, जयन्त, अपराजित तथा सर्वार्थसिद्धि यह पंच अनुत्तरवासी देव सुखी हैं। उनसे भी अनन्तानन्त गुणे सुख युक्त सिद्धपद को प्राप्त सिद्ध भगवान हैं । सिद्धों के सुख की अपेक्षा और उत्कृष्ट प्रानन्द नहीं है ।
सिद्धों के ऐसे आनन्द के समय अन्य संसारी जीव अपने को सुली समझते हैं । उनका सुख ऐसा ही अवास्तविक है, जैसे नाटक में नरेश का अभिनय करने वाले व्यक्ति का काल्पनिक राज्य का स्वामित्व भी यथार्थ है ।
प्रश्न --- सिद्ध भगवान लोक के अन्त तक जाकर क्यों ठहर जाते ? म का उगमन स्वभाव है । अनन्त शक्ति भी सिद्ध भगवान के पाई जाती है । ऐसी स्थिति में वे लोक के प्रग्रभाग तक जाकर क्यों ठहर जाते हैं ? उनके मन को रोकने को सामर्थ्य किसमें हो सकती है ?
उत्तर— वस्तु का स्वाभाव विचित्रतापूर्ण है । धर्म द्रव्य नाम के गमन में उदासीनता रूप से सहायता प्रदान करने वाले द्रव्य का लोकाग्र तक सद्भाव है । उस निमित्त कारण का जहां तक सद्भाब था, वहां तक मुक्त जीव गये और जहां उस द्रव्य
भाव हो गया, वहां अनन्त शक्ति वाले तथा ऊर्ध्वगमन सामर्थ्य सम्पन्न सिद्ध परमात्मा को भी रुक जाना पड़ता है। जैनतत्व व्यवस्था की यही तो अलौकिकता है कि तत्व के स्वरूप को बदलने की किसी में सामर्थ्य नहीं है । परमात्मा अपने निजतत्व का स्वामी हैं । अन्य द्रव्य के व्यवस्थित कार्यक्रम में उसका हस्तक्षेप नहीं रहता है । इस
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गो. प्र. चिन्तामणि प्रसंग के द्वारा उस एकांतवाद का भी निराकरण हो जाता है, जो लोग निमित्त कारण की पूर्णतया उपेक्षा करते हैं। स्वामी समन्तभद्र ने बाह्य तथा अभ्यंतर कारणों की पूर्णता को कार्य का साधक माना है । मोक्ष के लिए अन्तरंग अपरिग्रहत्व प्रावश्यक है, किन्तु इसके लिये बाह्य परिग्रह का परित्याग भी जरूरी है । बाहरी वस्त्रादि धारण करते हुए जीव प्रमत्तसंयत की श्रेणी में भी नहीं पहुँच सकता है । मोक्ष की बात तो निराली ही है ! निमित्त कारण तथा उपादान कारण अपनी-अपनी सीमा के भीतर उचित हैं। कोई निमित्त को हो उपादान का स्थान देता है, तो विषम परिस्थिति उत्पन्न हुए बिना न रहेगी। लोकान में सिद्ध परमात्मा की अवस्थिति यह सूचित करती है कि निमित्त कारण का भी उचित स्थान है । एकांत पक्ष को पकड़ना दुराग्रह है ! अागमभक्त को सत्याग्रही बनना चाहिये । असत्य का प्राग्रह करने से तत्वाज्ञान का प्रदीप बुझ जाता है। प्रश्न--मुक्तात्मा अमुक्त भी हैं। यहां शंका-सिद्ध भगवान मुक्ति लक्ष्मी के
स्वामी हो गये हैं, अब इनका मुक्ति श्री से कभी भी वियोग नहीं होगा, रसाए यदि इयर को सुपर ही नाटो हो, पाप भी स्याद्वादी के
स्थान में एकान्तवादिता के दोषी बन जाते हैं ?
उत्तर-~-भगवान को एकान्त रूप से मुक्त नहीं माना गया है। वे मुक्त भी हैं, अमुक्त भी हैं । मुक्तात्माओं को अमुक्त कहना आश्चर्य प्रद लगेगा, किन्तु तार्किक अकलंक देव का कथन पूर्णतया युक्तियुक्त तथा अविरोधी भी लगेगा। वे 'स्वरूप संबोधन' नाम की पंचविंशति पद्यात्मक रचना के मंगल पद्य में उक्त विषय में महत्वपूर्ण प्रकाश प्रदान करते हैं--
मुक्ताऽमुक्त करूपो यः कर्मभिः संविदादिना। . अक्षयं परमात्मानं ज्ञानमूर्ति नमामि तम् ।।१५६४३
मैं ज्ञानभूति अविनाशी परमात्मा को नमस्कार करता है, जो कर्मों से मुक्त हैं और ज्ञानादि गुणों से अमुक्त हैं अर्थात् युक्त हैं। इस प्रकार ज्ञानमूर्ति के परमामा कर्मों की अपेक्षा मुक्त हैं । झानादि गुणों की दृष्टि से अमुक्त भी हैं । स्याद्वाद ज्योति के प्रकाश में शंका रूपी तिमिर तत्काल दूर हो जाता है । इस मुक्तामुक्त रूप अवस्था की प्राप्ति के लिये. जीव को मोक्ष की अभिलाषा भी त्याज्य कही गई है। मुक्ति की अभिलाषा करने वाला मुमुक्षु माना जाता है । शुद्धोपयोग की अवस्था में यह जीव मुमुक्षु रहता है। शुद्धोपयोग की भूमि में प्रवेश करते समय 'मुमुक्षु' संज्ञा
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अध्याय : आठवां ]
[ ७३५ का भी परित्याग हो जाता है, कारण उस शुद्धि की ओर प्रगतिशील पुरुष को मोक्ष की भी अभिलाषा का परित्याग आवश्यक कहा गया है । यह कथन सापेक्ष है। प्रार. म्भिक अवस्था में भोगकांक्षा का त्याग करके मुक्ति की भावना तथा अभिलाषा के लिये प्रेरणा की जाती है, किन्तु पपचात् समर्थ आत्मा उस मिरिण की भी अभिलाषा का त्याग करता है । अकलंक देव ने उक्त रचना में लिखा है
मोक्षेऽपि यस्य नाकांक्षा स मोक्षमधिगच्छति ।
इत्युक्तत्वात् विनानेशी कांक्षा नसतानि मोजयेत् ॥१५६४॥ सिद्धों के विशेष गुण
इन सिद्धों के चार अनुजीवी गुण कहे गये हैं। जो घातिया कमों के विनाश से अरहन्त अवस्था में ही उत्पन्न होते हैं। ये गुरण भावात्मक कहे गये हैं । ज्ञानावरा के क्षय से केवलज्ञान, दर्शनावरसा के विनाश से केवल दर्शन, मोहनीय के उच्छेद से अविचलित सम्यक्त्व तथा अन्तराय के नाश द्वारा अनन्तवीर्य रूप मुरण-चतुष्टय प्राप्त होते हैं ।
अधातिया कमों के अभाव में चार प्रतिजीवी गुण उत्पन्न होते हैं । वेदनीय के विनाश से अव्याबाधत्व गुरण प्रगट होता है । गोत्र के नाश होने पर अगुरुलघु गुण प्राप्त होता है । नाम कर्म के अभाव में अवंगाहनत्व तथा प्रायु कर्म के (जिसे जगत् मृत्यु, यमराज आदि के नाम से पुकारता है। विनाश होने पर सूक्ष्मत्त्व यह चार प्रतिजीवी गुण प्रगट होते हैं। इन अनुजीवी तथा प्रतिजीवी गुणों से अलंकृतं यह सिद्ध पर्याय है ! इससे स्वभाव-द्रव्य-व्यंजन पर्याय भी कहते हैं । पालाप पद्धति में लिखा है 'स्वभाव-द्रव्य-व्यंजना-पर्यायाश्चरमशरीरात--किचित्-सिद्धपर्यायाः' (पृ.१६६)
सिद्ध परमेष्ठी की महत्ता को योगी लोग भली प्रकार जानते हैं । इससे महापुराणकार उनको ‘योगिनां गम्यः, योगियों के ज्ञान गोचर कहते हैं । जिनसेन स्वामी का यह कथन प्रत्येक मुमुक्षु के लिये ध्यान देने योग्य है
वीतरागोऽप्यसौ ध्येयौ भव्यामां भवविच्छिदे । विच्छिन्नबंधनस्थास्य तादृग्नैसगिको पुरसः ॥१५६६॥
मच्यात्माओं को संसार का विच्छेद करने के लिये वीतराग होते हुये भी इन सिद्धों का ध्यान करना चाहिये । कर्म बन्धन का विच्छेद वाले सिद्ध भगवान का यह नैसर्गिक गुण कहा गया है।
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७३६ } .
[ गो. प्र. चिन्तामणि ___ प्राचार्य का अभिप्राय यह है कि सिद्ध भगवान वीतराग हैं । वे स्वयं किसी को कुछ नहीं देते हैं, किन्तु उनका ध्यान करने से तथा उनके निर्मल गुणों का चितवन करने से आत्मा की मलिनता दूर होती है और यह मुक्ति के मार्ग में प्रगति को प्राप्त करती है । निरंजन निर्विकार तथा निराकार सिद्धों के ध्यान की रूपातीत नाम के धर्मध्यान में परिगणना की गई है।
___रूपालीत ध्यान से सिद्ध परमात्मा का किस प्रकार योगी चितवन करते हैं, यह ज्ञानार्णव में इस प्रकार कहा है-- . . . . .
व्योमाकारमनाकरं निष्पन्न शांतमच्युतम् । ...... .. चरमांगाकिचन्यूनं स्वप्रदेशैर्धनः स्थितम् ॥१५६७।।
लोकान-शिखरासीनं शिवीभूतमनामम् । . .. पुरुषाकार : मापनमप्यभूतं च चिन्तयेत् ।।१५६८।।
. आकाश के समान अमूर्त, पौद्गलिक आकार रहित, परिपूर्ण, शांत, अवि. नाशी, चरम देह से किंचित् न्यून, धनाकर' आत्म प्रदेशों से युक्त, लोकाय के शिखर पर अवस्थित, कल्याणमय, स्वस्थ, स्पर्शादि गुण रहित पुरुषाकार परमात्मा का ध्यान रूपातीत ध्यान में करें।
ध्यान के अभ्यासी के हितार्थ प्राचार्य शुभचन्द्र ने ज्ञानार्णव में यह महत्वपूर्ण कथन किया है--
अनुप्रेक्षाश्च धय॑स्य स्युः सदैव निबंधनम् । चित्तभूमौ स्थिरीकृत्य स्वस्वरूपं निरुपय ॥१५६६॥
हे साधु ! अनुप्रेक्षाओं का चितवन सदा धर्मध्यान का कारण है । अतएव अपनी मनोभूमि में द्वादश भावनाओं को स्थिर करो तथा अात्मस्वरूप का दर्शन करो। .
. ब्रह्मदेव सूरि का यह अनुभव भी प्रात्म ध्यान के प्रेमियों के ध्यान देने योग्य है--'यद्यपि प्राथमिकानां सविकल्पावस्थायां चित्त स्थिति-करणार्थ विषय-कषाय रूपदुर्ध्यान वंचनार्थं च जिनप्रतिमाक्षरादिकं ध्येयं भवतीति, तथापि निश्चयध्यानकाले स्वशुद्धात्मैव ध्येयः इति भावार्थः' (परमात्म प्रकाश दीका पृ. ३०२, पद्य २८६) पद्यपि सविकल्प अवस्था में प्रारम्भिक श्रेणी वालों के चित्त को स्थिर करने के लिये जिनप्रतिमा तथा जिनवाचक अक्षरादिक भी ध्यान करने के योग्य हैं, तथापि निश्चय ध्यान के समय शद्ध प्रात्मा ही ध्येय है।
संस्कार
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अध्याय : पाठवां ]
[ ७३७ जिनेन्द्र भगवान की मूर्ति के निमित्त से प्रात्मा का रागभाव सन्द होता है। परिणाम निर्मल होते हैं तथा सम्बग्दर्शन की प्राप्ति होती है।
प्रश्न :--सिअप्रतिमा फैसी होती है ?
उत्तर :-सिद्ध परमात्मा का ध्यान करने के लिए भी जिनेन्द्रदेव की प्रतिमा उपयोगी है। सिद्धप्रतिमा के स्वरूप पर प्राचार्य वसुनंदि सिद्धान्त चक्रवर्ती ने मूलाचार की टीका में इस प्रकार प्रकाश डाला है----'अष्टमहाप्रातिहार्य समन्विता अहत्प्रतिमा, तद्रहिता सिद्धप्रतिमा' । जो प्रतिमा अष्ट प्रातिहार्य समन्दित हो, वह अरहन्त भगवान की प्रतिमा है । अष्टप्रातिहार्य रहित प्रतिमा को सिद्ध प्रतिमा जानना चाहिये । इस विषय में यह कथन भी ध्यान देने योग्य है--'अथवा कृत्रिमा यास्ता अहत्प्रतिमाः, अकृत्रिमाः सिद्ध प्रतिमाः' (पृ० ३२ गाथा २५) अथवा सम्पूर्ण कृत्रिम जिनेन्द्र प्रतिमाएं अरहन्त प्रतिमा हैं । अकृत्रिम प्रतिमाओं को सिद्ध प्रतिमा कहा है।
इस प्राममधालो के होते हुए जो घातु विशेष में पुरुषाकार शून्य स्थान बनाकर उसके पीछे दपए को रखकर उसे सिद्ध प्रतिमा मानने की प्रवृत्ति विचारने योग्य है। इस प्रकार की मूर्ति का जब अागम में विधान नहीं है, तब पागम की प्राज्ञा को शिरोधार्य करने वाला सम्यादृष्टि अपना कलव्य और कल्याण स्वयं विचार कर सकता है । दक्षिण भारत के प्राचीन और महत्वपूर्ण जिन मन्दिरों में इस प्रकार की सिद्ध प्रतिमाएँ नहीं पाई जाती हैं, जैसी उत्तर प्रान्त में कहीं-कहीं देखी जाती है । आयम को प्रमाण मानने वाले सत्पुरुषों को परमागम में प्रतिपादित प्रवृत्तियों को ही प्रोत्साहन प्रदान करने का पूर्ण प्रयत्न करना चाहिये। - प्रश्न :--निर्वाणमुद्रा, अचेलभुद्रा या दिगम्बरमुद्रा का क्या स्वरूप है ?
उसर :--सिद्ध पद को प्राप्त करने के लिए सम्पूर्ण परिग्रह का त्याग कर वस्त्र रहित (अचेल) मुद्रा का धारण करना अत्यन्त आवश्यक है । यह दिगम्बर मुद्रा निर्वाण का कारण है, इसलिये इसे निर्धारणमुद्रा भी कहते हैं। दक्षिण भारत में दिगम्बर दीक्षा लेने वाले मुनिराज को 'निर्वाण स्वामी' कहने का सर्वत्र प्रचार है। ग्रजैन भी निर्वाशा स्वामी को जानते हैं। - सिद्धों का ध्यान परम कल्याणकारी है, इतना मात्र जानकर भोग तथा विषयों में निमग्न व्यक्ति कुछ क्षण बैठकर ध्यान करने का अभिनय करता है, तो इससे मनोरथ सिद्ध नहीं होगा । ध्यान के योग्य सामग्री का मूलाराधना टीका में इस प्रकार उल्लेख किया गया है
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७३८ ।
[ गो. प्र. चिन्तामणि संग-स्यागः कषायाणां निग्रहो व्रतधारणम् । मनोऽक्षारणां जयश्चेति सामग्री ध्यानजन्मनः ॥१६००॥
वस्त्रादि परिग्रह का त्याग, कषायों का निग्रह, व्रतों का धारण करना, मन तथा इन्द्रियों का वश में करमा गे सागरी कर ली हलाक्ति के लिये आवश्यक है।
'बाह्मचेलादिग्रंथत्यागोऽभ्यंतर परिग्रह त्यागमूलः'-बाह्य पदार्थ वस्त्रादि का परित्याग अंतरंग त्याग का मूल है । जैसे -- चावल के ऊपर लगी हुई मलिनता दूर करने के पूर्व में तंदुल का छिलका दूर करना आवश्यक है, तत्पश्चात् बावल की भीतर की मलिनता दूर की जा सकती है, इसी प्रकार बाह्य परिग्रह त्यागपूर्वक अंतरंग में निर्मलता प्राप्त करने की पात्रता प्राप्त होती है । जो बाह्म मलिनता को धारण करते हुए अंतरंग मलिनता को छोड़ ध्यान का आनन्द लेते हुए सिद्धों का ध्यान करना चाहते हैं तथा कर्मों की निर्जरा तथा संवर करने की मनोकामना करते हैं, वे जल का मंथन करके घृत प्राप्ति के उद्योग सदृश कार्य करते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वस्त्रादि के भार से जो मुक्त नहीं हो सकते हैं, उनकी मुक्ति की ओर यथार्थ में प्रवृत्ति नहीं होती है । जो देशसंयम धारण करते हुए दिगम्बरमुद्रा की लालसा रखता है, वह श्रावक मोक्षमार्गस्थ है । धीरे-धीरे वह अपनी प्रिय पदवी को प्राप्त कर सकेगा, किन्तु जो वस्त्र त्यामादि को व्यर्थ सोचते हैं, वे सकलंक श्रद्धावश अकलंक पदवी को स्वप्न में भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं । गंभीर विचारवाला अनुभवी सत्पुरुष पूर्वोक्त बात का महत्व शीघ्र समझेगा । दुराग्रही पुरुष के ऊपर परिग्रह के ममत्त्व का पिशाच सदा सवार रहने से वह अचेलअवस्था के सद्गुणों की कल्पना भी नहीं कर सकेगा।
मूलाराधना में कहा है -- भृकुटी चढाना प्रादि चिन्हों से जैसे - अंतरंग में क्रोधादि विकारों का सद्भाव सूचित होता है, इसी प्रकार बाह्य अचेलता से अंतर्मल दूर होते हैं। कहा भी है--
बाहिर करणविशुद्धि अभंतरकरणसोधणस्थाए । गह कुडयस्स सोधी सबका सतुत्थस्स कहुंचे ॥१६०१॥
बाह्य तप द्वारा अंतरंग में विशुद्धता आती है तथा जो धान्य सतुष है, उसका अंतर्मल नष्ट नहीं होता है । तुष शून्य धान्य ही शुद्ध किया जाता है ।
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अध्याय आठवां ]
[ ७३३.
उसे
इसी महत्त्व के कारण निर्वारण के हेतु दिगम्बर मुद्रा को श्रावश्यक मान, निर्वाण मुद्रा कहा गया है ।
प्रश्न :- - कैलास पर्वत ( अष्टापदगिरि) का स्वरूप क्या है
?
उत्तर : -- सिद्ध क्षेत्रों में सबसे पहले कैलास पर्वत बताया गया है । वहां से भगवान ऋषभदेव मोक्ष गए हैं। उत्तर पुराण में लिखा है कि भरत चक्रवर्ती ने उस पर्वत पर रत्नमय जिनालय बनवाये थे और अजितनाथ तीर्थङ्कर के समय सगर चक्रवर्ती के साठ हजार पुत्रों ने पर्वत के चारों ओर खाई का निर्माण किया था । कहा भी हैराजाऽप्याज्ञापिता यूयं केलासे भरतेशिना । गृहा कृता महारलेश्चतुर्विंशतिरहंताम् ॥१६०२ ॥
सेषां गंगा प्रकुर्वीध्वं परिखां परितो गिरिम् ।
इति तेऽपि तथाsकुर्वन दंडरत्नेन सत्वरम् ।।१६०३ ॥
चक्रवर्ती सगर ने अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि महाराज भरत ने कैलाश पर्वत पर महारत्नों से अरहन्त देव के चौबीस जिनालय बनवाए हैं। उस पर्वत के चारों ओर खाई के रूप में गंगा का प्रवाह बहा दो । यह सुनकर उन राजपुत्रों ने ausरत्न लेकर शीघ्र ही उस काम को पूर्ण कर दिया । अत्यन्त दुर्गम होने के कारण तथा मार्ग अज्ञात होने से वहां पहुंचना अशक्य हो गया है ।
प्रश्न :-- गंगा भागीरथ नदी का उद्गम कहां से है ?
उत्तर :--- गुणभद्र प्राचार्य ने यह भी कथन किया है कि राजा भागीरथ ने वैराग्य उत्पन्न होने पर वरदत्त पुत्र को राज्य लक्ष्मी देकर कैलाश पर्वत पर जाकर शिवगुप्त महामुनि के समीप निर्वाण दीक्षा ली और गंगा के किनारे ही प्रतिमायोग धारण किया। गंगा के तट से ही उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया था । इन्द्र ने आकर क्षीर सागर के जल से भगीरथ मुनि के चरणों का अभिषेक किया था, उस अभिषेक का जल गंगा में मिला | तब से ही वह गंगा संसार में तीर्थ रूप में पूज्य मानी जाती है । कहा भी है-
सुरेन्द्र सास्य दुग्धान्धिपयोभिरभिषेचनात् । मयोस्तत्प्रवाहस्य गंगायाः संगमे सति ॥१६०४॥ तदा प्रभृति तीर्थत्वं गंगाप्यस्मिन्नुपसंगता | कृत्योत्कृष्टं तपो गंगातटे निसि गतः ॥१६०५।।
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________________
TRAIासागरस
-
Modakarina
।
७४० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :-वैविक लोग भी कैलास पर्वत को पूज्य मानते हैं, क्यों ?
उत्तर :-वे हिमालय पर्वत के समीप जाकर कैलाश की यात्रा करते हैं। कैलास का जैसा वर्णन उत्तर पुराण में किया गया है, वैसी सामग्री का सद्भाव अब तक ज्ञात नहीं हो सका है । उसके विषय में यदा कदा कोई लेख भी छपे हैं, किन्तु उनके द्वारा ऐसी सामग्री नहीं मिली है, जिसके आधार पर उस तीर्थ की वंदना का लाभ उठाया जा सके । कैलास नाम के पर्वत का ज्ञान होने के साथ निर्वाण स्थल के सूचक कुछ जैन चिन्हों का सद्भाव ही उस तीर्थ के विषय में संदेह मुक्त कर सकेंगे। अब तक तो उसके विषय में पर्ण प्रजानकारी ही है।
प्रश्न :---सिद्ध भगवान का क्या संदेश है ?
उत्तर :-वृषभनाथ भगवान के समान सभी तीर्थंकरों का निर्वाण महोत्सव सम्पन्न हग्रा । वे सिद्ध भगवान अपनी ज्ञानमयी परिणति के द्वारा सभी जीवों को यह सचित करते हुये प्रतीत होते हैं 'अरे भव्य जीवों ! तुम विकारी भाव को शीघ्र छोड़ो और हमारे समान स्वराज्य के स्वामी बनो।' . मानों यह संदेश भरतेश्वर के अत्यन्त विरक्त मन में प्रवेश कर गया । एक दिन दर्पण में मुख देखते समय भारत महाराज की दृष्टि एक श्वेत केश पर पड़ी । उसे देख भरत को ऐसा लगा मानो मुक्ति पुरी से भगवान के द्वारा प्रेषित विशिष्ट संदेश-वाहक दूत हो पाया हो ।
चक्रवर्ती ने छहखंड प्रमाण पौद्गलिक साम्राज्य का स्याम करके शीघ्र ही दिगम्बर मुद्रा धारण की और शत्रुध्वंस कला में पारंगत योगी भरत ने अंतर्मुहूर्त में ही मोहासुर का विनाश करके सर्वज्ञता प्राप्त की। वृषभनाथ भगवान के समान भरत भगवान ने समस्त देशों में विहार कर जीवों का उद्धार किया तथा मोक्ष प्राप्त किया ।
___ पंच कल्याणक प्राप्त तीर्थंकरों की तथा अनंत सिद्धों की विशुद्ध आराधना रूप अमृत से परिपूर्ण यह भावना करनी चाहिये ।
जा गदी अरहन्तारणं रिपट्टि दहारणं च जा गदी। जा गदी बीदमोहारणं सा मे भवदु . सस्सदा ॥१६०॥
जो गति पर हन्तों की है, जो गति कृत कृत्य सिद्धों की है, जो गति वीत मोह जनों को है, वह गति मुझे सदा प्राप्त हो।
SNO
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________________
[अध्याय नौवां
वर्तमान कालीन २४ तीर्थंकर सम्बन्धी कई ज्ञातव्य
अर्थात्
जानने योग्य बातें
प्रकाशक:
कुन्थु-विजय ग्रन्थमाला समिति,
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________________
:
क्रमांक
१ श्री
२ अजितनाथ
४
६
७
न
६
१०
तीर्थंकरों के नाम
५ तिगा
११
2:
37
21
TE
41
संभवनाथ
2. पद्मप्रभु
21
17
अभिनन्दनाय
बर्तमान कालीन २४ तीर्थकुर सम्बन्धी कई ज्ञातव्य अर्थात् जानने योग्य बातें।
सुपार्श्वनाथ
चंद्रप्रभ
तीर्थकरों के पूर्व तीन भवान्तर
पिछले तीन भव का
द्वीपों के
चाम
13
#1
३
प्रभू बीरा तुझे हे
घातकी खंड
17
27
31
पुष्पदन्त
करावं दीर
गीतलनाथ भासकी ड
श्रेयांसनाथ
11
क्षेत्रों के
नाम
४
73
ܐ
3:
17
rr
dr
"
"
"
ir
1
देश या
प्रान्त
५
वरस
छन्द्र
मंगलrafa
पुष्कलावत
वत्स
सुन. च्छ
पुति
बरस
सुकच्छ
नगरी की सीमा
"
75
पूर्वविदे
नि
सीता नदी के उत्तर सुसीमा विमान
तटपर
उसर
12 दक्षिण
37
१. उत्तर
"7
दक्षिण
"
"
दक्षिण
उत्तर
दक्षि
3. उसर
"
37
"1
r
CJ
21
73
नमरी का नाम
ra
७
वहां के
नाम
प
ओमपुरी विपुल वाहन (क्षमा) रत्नसंचयपुर महाबल
यस
सुसीमा
अपराजित
सन्दि
शेपूचे (स)
रायपुर पचनाभि
पुरीकिनी
महापद्म
मोमा
पद्मगुरुम
क्षेत्रपुरी
नलिनम
वहां का राज वैभव rea
६
रामदेव का ओ तो चक्रवर्ती
११ अंग १४ पूर्व का
कि राजा ११ के पाठी थे। रङ्ग
सबका सुव सरीखा था। यह सब सिंहनिष्क्रीति यत के प्राचरण करने वाले एक are states संन्यास के धारक और स्वयं गामी थे ।
देता था।
बाकी सब
७४२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिए
Page #832
--------------------------------------------------------------------------
________________
अध्याय नौवां ]
,, दक्षिण ,
संचयपुर पयोत्तर
१२ , बासुपूज्य १३ ,, विमानलाध १४ ,, अनन्तनाथ
महानगर
पथरथ
, वत्सकावलि बात की लंड पूर्वमरत - ,, पश्चिम रम्बकावति
ऐरावत क्स
अरिष्टनर
असेच
१५ ,, धर्मनाथ
जम्बूद्वीप
पूर्व विदेह पुष्कलावति
। दक्षिस, महिलापुर दशरथ
(सुभद्रिका) " दृष्टिगह , पुरी किनी भेवरथ
१६., शास्तिनाथ
वरस
, उत्तर, सुसीमा
सिंहरथ
१५ , कुधुनाथ
सनपति
२-तीर्थकर ऋषभदेव को प्रादियाय, आदि ब्रह्म, पुष्पदन्त को सुविपिनाथ और महापौर को पर्थमान स्वामी, सन्मति, बीर, अतिवीर, महति महावीर भी कहते हैं और इन्द्र ने तीर्थ ट्टरों की १००८ नाम से स्तुति की है।
१८
परहनाय
दक्षिय, क्षेमपुरी
(क्षेमा) , दक्षिरा, बीतशोका
वत्स
वैश्रवण
२०, मुनिसुखरानाथ
भरत क्षेत्र
सम्पापुर श्री धर्मा
(हरिवर्म) • कौशाम्बी सिद्धार्थ
२१ , नमिनाथ
हस्तनागपुर सुप्रतिष्ठित
२२ । नेमिनाथ .
कौशल्य
२३ , पार्श्वनाथ
अयोध्या प्रानन्द (साकेता) छत्रपुर नन्द (छत्राकार) (नन्दव)
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________________
mailAGRANसम्मman
EPA
तीर्थंकरों का गर्भावतरण - गर्भ कल्याणक
३
कहां के पथकर तीर्थकर हुए, तीर्थकर की जन्मभूमि
मर्मावरण की तिथि इत्यादि
क्रमांक
वहाँ के गुरु का नाम स्वर्गादिकों के नाम |
| वहाँ कौन
देशकागाम
जन्मपुरी (नगर या पट्टन) ।
वंश का नाम | जनक (पिता) | जननी (भाता)
.
१ वयसेन
अहमिन्द्र
सर्वार्थ सिद्धि वि. वैजयन्त वि.
२ मरिन्दम
सपरिमहिहिम . जयन्त वि.
३ स्वयंप्रम ४ विमलवाहन ५ सीमंबर ६ पिहिताशय
ऊर्ध्व प्रैवेशक
वैजयन्त दि.
कौशल अयोध्या (साकेतपुर) इक्ष्वाकुयश नाभिराज मरुदेवी
विजयादेवी श्रावस्ति (श्रावन्ति) दराज (जितारि) सुषेणादेवी अयोध्या (साकेतपुर) , संवर (रूपयंवर) सिद्धार्था विनितापुर
मेधरथ (मेवप्रभ) सुमंगला कौशाम्बीपुर
धारणा राजा सुसीमा वाशीदेश वाराणसी (काशी) उग्रवंश सुप्रतिष्ठ पृथिवी कौशश चन्द्रपुरी
महासेन (महश्रेणी) लक्ष्मणा
(सूलशरण) . काकन्दीपुरी
सुपीवराजा जयरामा (रामा) मानवदेश मंद्रिलापुर
दरय राजा सुनन्दा देवी
० परिन्दम (मरहनंदन) मध्य प्रदेयक ८ युगंधर (श्रीधर) वैजयन्त वि.
[ मो. प्र. चिन्तामणि
६ सर्वजनानंद (मूर्तिहित) अपराजित वि. . १० अभयानंद (आनंद) पारण स्वर्ग
इन्द्र
Page #834
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________________
। १२ । १३ ।
१४
। १५ ।
१० । ११ ११. वनदन्त (अनन्त) अच्युत , १२ वनाभि (युगबर) महाशुक्र ., १३ सर्वगुप्त सहस्त्रार,
अध्याय : नौवां ]:
१४ स्वयंप्रभ (त्रिगुप्ता) अच्युत ,
अहमिन्द्र
१५ चित्तरक्ष सर्वार्थ सिद्धि वि. १६ विमलवाहन (धनरथ) १७ यतिवृषभ वन रथ
१८ संदर (परहनन्द) • १९ वरधर्म (श्रीनाम) अपराजित वि. २० सुनन्द (अनंतवीर्य). प्राणत स्वर्ग २१ . नन्द (महावल). . अपराजित वि.. २२ व्यतीतधोका (सुमंदर) जयन्त विमान २३ दामर (समुद्रदत्त) प्राखत स्वर्ग
कौशल सिंहपुरी
. विष्णुराज (विमल) विष्णुश्री (नन्दा) अंगदेश चम्पापुरी
असुपूज्य जवाबती (विजया) __. कषिल्य (कपिता) कृतवर्मा (कृतधर्मा) प्रार्यशामा
(मुरम्या ) अयोध्या (साकेतपुर) . सिंहसेन लक्ष्मीमती
(सर्वधना) रनपुरी कुरुवंश
सुप्रभा (सुत्रसा) मुटुरुजानल हस्तिनागपुर
विश्वसेन ऐरादेवी सुरसेन (सूर्य) श्रीदेवी (श्रीकांता)
सुदर्शन मित्रसेना (मित्रा) अंगदेश मिथिलापुर - इक्ष्वाकुवंश कृमराज(राजकुम) प्रभावती (रक्षता)
कुशापपुर यादववंश(हरि) सुमित्र । " सोभा (पपावती)
मिथिलापुर... - इक्ष्वाकुवंश विजयराज .... मिला (प्रा) समुद्रदेश शोरीपुर (द्वारका) यादववंश(हरि) समुद्र विजय शिवादेवी काशीदेश वाराणसी (काशी) उग्रवंश विश्वसेन (अयसेन) नामादेवी (बाह्मी) विवहदेश कुंडलपुर (वैशाली) नाथदंश सिद्धार्थराजा प्रियकारिणी
(विशलादेवी)
अहमिन्द्र
२४ प्रीष्टिल
, .
अच्युत (पुष्पोत्तर विमान)
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________________
तीर्थंकरों का जन्माभिषेक जन्मकल्याणक
जन्म तिथी-समयादि
क्रमांक
गर्भ तिथि | गर्भ समय
मात्र
जन्म तिथि | जन्म समय जन्म नक्षष | जम्म राशि | शरीर का घर्ण
शरीर की कमाई 1 (धनुष)
पे हुये सोने समान
वृषभ
४५०
.
सिंह
१ प्राषाढ़ , २ रात्रि का अंत उत्सरापाद
माभिजित समय
रोहिणी २ ज्येष्ठ कृ.१५
रोहिणी क्षेत्र कृ.६ - ज्येष्ठा ३ फाल्गुन का प्रातः समय मृगशीर्ष पीय यू.१० - चुनर्वसु ४ वैशाख शु. ६ रात्रि के पूर्व पुनर्वसु मार्ग शीर्ष शु. चन्द्रमायोग मा
समय ५ श्रावण शु.२ ., ममा पौष्य झु.२ यादियोम चित्रा ६ माघ कृ. ६ प्रातःसमय। चित्रा ईशाख कृ.१. पितृयोग थिशाखा ७ भाद्रपद शु.६ , विशाखा कातिक सु. १३ - अनुराधा
ज्येष्ठा ज्येष्ठ शु. १२ पनिलायोग मूला
मूला पौध्य कु. ११ -- पूर्वाषाढ १० चैत्र
पूर्वाषाढ़ मार्ग शीर्ष शु. ६. गेलंत्र योग अवता ११ ज्येष्ठ कृ.६
भण पौष्य कृ.१२ - शततारका . १२ आषाढ शु.६
शततारका फाल्गुन कृ. ११ -
कन्या बन्धूक पुष्प के समान रक्त २५० तुल्ला इन्द्रनील प्रना समान हरित २०० ध म पुग्द पुरुष के समान शुन्न १५० बनु
तपे हुये सोने के समान वर्भ ९० मकर
बंधूक पुष्प के समान रस्त ७० वर्ण (विद्वम वर्ण)
[ गो. प्र.चिन्तामणि
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________________
१८ |
१६ |
२० |
२१
। २२ | २३ |
२४ |
२५
। २६
अध्याय : नौवां ]
उसराभद्र १३
रेवती
मीन
सपे हुये सोने के समान
मरगी
कर्क
१३ ज्येष्ठ कु.१० प्रष्टभासिया उत्तराभाप्रपद पौध्य शु. ४ - १४ कातिक रु. १ रेवती ज्येष्ठ .१२ पुष्पयोग १५ वैशाख शु. १२ ॥
पौष शु. १३ - १६ भाद्रपद कृ. ७
भरणी ज्येष्ठ कृ. १४ प्रातःसमय १७ श्रावण कृ. १० कृतिका वंशाख शु. १ - १८ फाल्गुन शु.३ , रेवती मार्गशीर्ष
रोहिणी धूप अश्विनी मीन
१६ चैत्र शु. १
,
प्रश्चिमी
मार्ग शीर्ष
-
२० श्रावण कृ.२
श्रवण
चत्र इ. १०
-
म्बाती
मकर
प्रियंप्रमा-इन्द्रनीस
अश्विनी
२१ आश्वनि कृ.२ . २२ कार्तिक शु. ६ ,
भाषाड़ कृ. १० -- धावण शु.६ -
चित्रा मेष विशाखा कन्या
उत्सराबाद
सपे हुये सोने के समान १५ प्रियंगुप्रमा-पोर के कंठ के १. समान (श्याम वर्ण)
इन्द नील प्रभा-पान (हरित वर्ष) तपे हुये सोने के समान वर्ण ३
२३ वैशाख कृ. ३
,
विशाखा
__ पौध्य कृ. ११ अनित्ययोग
कुम्म
]
२४ प्रापाड़ शु. ६
,
उत्तरापार
पत्र शु. १३
-
उत्तरा फा. कन्या
62
Page #837
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________________
पार
..
पूर्ण आयु में से कुमारकालादिकाल प्रमारण
तीर्थकरों सांछन | कुमार काल| राजभोग काल प्रमाण । (चिन्ह) प्रमाण
रूपकाल में
पर्ण पाय | इथस्थावस्था कवनी अवस्थाका काल प्रमाण पूरा पाया
प्रमाण वर्षे कालयवस्था ।
वीक्षा तिथि
३०
+
१००० वर्ष १००० वर्ष कम-1 लाख वर्ष ६४ लास पूर्व चत्र कु. १ १२ वर्ष पूर्वाग + १२ वर्ष कम-,, ७२ १४, ४ . +१४ , - .. ६० , मार्गशीर्ष शु.३० १८, , +१८, -, ५० , पौष शु. १२ २०. १२ , +२... -,, ४० , जैशाख शु. ६ ६ महीना १६ . + ६ महीना कम *., मार्ग शीर्ष कृ. १०
१ वृषध (बल) २० लाख पुर्य ६३ सास पूर्व + २ मा (हाथी) २८ लाख पूर्व ५३ लाख पूर्व + १५र्याङ्ग ३ प्राय (थोड़ा) १५ ॥ ४ कपि (बन्दर) १२॥ ३६॥ , + ५ कोक (चकवा) १०, २६ , +१२ ,,
1. २१॥ , +१६ ,, ७ स्वस्तिक (साथिया) ५ , ४१ , +२०, ८ शशि (चन्द्रमा) २॥ ६॥ , +२४, ६ मकर (मगर) ५० हजार पूर्व ५० हजार पूर्व +२% १. कल्प वृक्ष २५ हजार पुर्व ५०, २१ गंडक (डा) २१ लाख वर्ष ४२ लाख वर्ण १२ हिप (सा) १८ लाख वर्ष राजभोग नहीं किया
(कुमार श्रमण)
६. वर्ण २० . +6 वर्ष कम -,, , ज्येष्ठ शु. १२ ३ महीना २४ । ३ महीना कम ., १० ४ वर्ष २५ , +४ वर्ण कम-, २ " मार्ग शीर्ष शु.. २ वर्ष ३ वर्ष कम २५००० वर्ष १ , पौध्य कृ. १२ २ वर्ष २ , २१००००० वर्ष ५४ लाख वर्ष फाल्गुन कृ. ११ १ वर्ष १, ५४००००० वर्ष ७२ लाख वर्ष , शु. १४
[ यो. प्र. चिन्तामणि
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________________
।
२७
२८
२९
१३ शूकर (सुअर)
१५ लाख वर्ण ३० लाख वर्ष
१४६६६६७ वर्ष ६० लाख वर्ग पौध शु.४
अध्याय : नौवां ]
१४ भन्सूफ (भालू)
!
१५ लाख ।
७४६६६,
३० लाख, ज्येष्ठ कु.१२
१५ वा
२५० हजार वर्ष ५ लाख बर्ष
२४६९६६ ., १० २४६५४ , १
, पौष्य कु. १ , ज्येष्ठ कु. ४
-१६ भूग (हिरण)
२५००० वर्ष
५० हजार वर्ष
१७ मेष (बकरा)
२३७५.० य
४७५०० हजार वर्ष
२३७३४ , १५ हजार वर्ष वैशाख शु. १
१६ मीन (मछली)
२१००० वर्ष
२०६८४ , ८४ .., मार्गशीर्ष शु. १०
१६ कुम्भ (कलश)
१०० ,
४२००० , राज नहीं किया (कुमार श्रमरण)
६ दिन
६ दिन वान-५४६००, ५५
,
११
२० कूर्म (कछवा)
७५००
१५ हजार वर्ड
११ महीना ११ महीना
कम-७५००, ३० वर्ष वर्ष कम-२५००, १०
२१ नीलकमल
वैशाम कु.१० पाषाढ़ कृ.१०
२२ मा
राज्य नहीं किया (कुमार धमण)
५६ दिन
५६ दिन कम--७०० , १
, श्रावण शु. ६
२३ नाग (सप)
४ महीना - ४ महीना कम-७०, १०० १२ वर्ष ३० वर्ष
७२
, पौष्य ऋ. १५ , कार्तिक कृ. १३
22]
२४ सिंह
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________________
RAMITRATORS
तीर्थंकरों के दीक्षा-परिनष्क्रमण-तपकल्याणक दीक्षा तिथि इत्यादि- दीयातपोजन-उद्यान दीक्षा के वृक्ष दीक्षा के समय
७५० ]
कमाक
दीक्षा समय
दीक्षा नक्षत्र
दीक्षा पालकी नगरों के बनों-उत्थानों
का नाम नाम के नाम ।
नक्षों
उपवास का कितने राजापों विक्षों को ऊंचाई वैराग्य का निमित्त नियम उतरने दीक्षा ली धनुष प्रमाण कारण । पु० से व ची।
हरिवंश पु.
___wj ५
६
७ । ३५ |
|
|
|
१
अपराह्न उसरापाडा लुदर्शन प्रयाम सिद्धार्थ-वन वट वृक्ष रोहस्थी सुप्रभा अयोध्या सहेतुक- सप्तच्छद
. सहसाम्र ज्येष्ठा सियार्था थावस्ति
शाल वृक्ष
६००० नीलांजना की मृत्यु ६ मास का चार हजार
उपवास ५४०० उल्कापात देखना षष्टममरू एक हजार
(बेला) ४००० मेघ पटल का नाश दो दिनका
पा
पुनर्वसु मघा
५ पूर्वान्ह
हस्तचित्रा अयोध्या उपोद्यान , , अभयकारी , सहेतुक , निबंधु
४२०० गंधर्व नगर का नाश ३६०० पूर्व भव का स्मरण तेला
तीन दिन का दो दिनका
॥
६ अपराह्न चित्रा
विशाला अनुराधा
"
निवृतकारी कौलवी मनोहर , "
सुमनोगति कात्रो सहेतुक , शिरीष विमला चन्द्रपुरी सर्दक , नागतरू सुर्यप्रभा कासम्ची पुष्पक मालवृक्ष शुक्रप्रभा भद्रिलापुर सहेतुक पलाश्च विमलपना सिंहनादपुर मनोहर लिन्दुक पुण्यमा चम्पापुर मोडोद्यान पाटलतरू
२४०० वन लक्ष्मी का नाश १८०० बिजली का देखना १२०० उल्का पास देखना १०८० हिम का नाश देखाना ६६० वन लक्ष्मी का नाच . ५४० पूर्वभव का स्मरण
[ गो, प्र. चिन्तामणि
,
पूर्वापराला ११ पूर्वान्ह १२ अपराह्न विशाखा
एक उपवास ६७६ ।।
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________________
|
|
३५ |
३६ |
३ |
१८ |
|
बम्घृक्ष
७२० मेघपटल का नाश ६०० उस्कापात देखना
बेला एक हजार तेला (बेला)
अध्याय : नौवां ]
पीपल
दीर्थपर्य नन्दीतरू
४६० पूर्वाभव का स्मरण
तिलक
१३ अपराई जसरामानपद देयदला कंपिला सहेतुक १४ , रेवशी सागरदत्ता अयोध्या -
नागदता रहनपुर शालवन १६ , भरणी सिद्धार्था हस्तिनागपुर --
कृतिका विजया , सहेतुक रेवती बैजयन्ति
। -१६ पूर्वाश्व अश्विनी जयन्ति मिथिलापुर श्वेतवन ২০ সন্তু গন্ধ হয় अपराजिता राजगही नीलवन
नील गुफा २१ अश्विनी उत्तरकुरु मिथितापुर चित्रवन-
४२०
आभ प्रशोक
३६० मेघपटल का नाश बेला ३०० बिजली का देखना बेला ३००(६०६) २४० पूर्वभव का स्मरण तेला (बेला) गक हजार
बकूल
१००
-
बेला
२२ पूर्वान्ह
सहसान चित्रा , देवकुर गिरनार .... विशाखा विमला वासखसी अश्ववन
मनोरमा उत्सरा चन्द्रप्रभा कुडलपुर जानवर
মগ্রন্থ वक्षलवृक्ष
१.२० प्राणी वध की वार्ता तेला(बेला) १०८ जातिस्मरण होना पष्टम भक्त
, ३००
२४ अपराह्न
भालवृक्ष
३२ धनुष
सेला ३० बेला
प्रकले (३००)
ke ]
थी शास्तिनाथ, कुबुनाथ, अरहनाथ ये सीन तीर्थकर चक्रवर्ती भी मए और कामदेव भी मए राज्य छोड़ फार वैराग्य दीक्षा) लिया और वासुपूज्य, नेमिनाथ, पाश्र्वनाथ और महावीर ये पांच तीर्थकर मार अवस्था में वैराग्य । (श्रमण) भए राज भी नहीं किया और विवाह भी नहीं किया और अन्य सोलह तीर्थंकरों ने महा मांडलिक, राका भये राम छाड़कर राम्य (दोक्षा) ली।
Page #841
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________________
क्रमांक
३
४
१ एक वर्ष के बाद
२ चौदे दिन
M
हूँ
"
प
है
१०
११
१२
किसने दिनों में कौन सा आदार लिये थे लिया या
तीन दिन के
बाब
13
21
"T 17
21
४४
"
31
"
12
2)
"
तीर्थंकरों के केवलज्ञान- ज्ञानकल्याणक
दान तीर्थ के प्रवर्तक दाताओं के द्वारा दीक्षा के बाद दिये गये आहारावि का विवरण
"
""
४५
इक्षुरस
देव के सिवाय बाकी सभी ने गो क्षीर
(गाय के दूध से बना हुआ क्षीरात्र | खीर] प्रयत् दूध के नाना
श्री
प्रकार के पकवान की
।
पारणा की थी
महार देने वाले दाल महाशयों के
.४६
पद्मदत्त
श्रवास राजा ( हरि-शाम )
wer [a] प्रयोच्या
सुरेन्द्रदत्त
इन्द्रवस
सोमदत्त
महेन्द्रदत्त
म
[ सोमदसराजा ] पुनर्वस [पुष्पराजा ]
जय
पारा किये हुये नगरों के नाम
नन्दन
[]
सौन्दर [सुनन्दनराज ]
[सुरेन्द्रनाथ राजा]]
४:७
हस्तिनापुर
श्रावfta
[ श्रावन्ति ]
अयोध्या
[ निशापुर ]
सोमन
[विजयपुरी]]
वर्धमान
[मंगलपुरी ] सोमखंड
[ पटलीडपुरी ]
नापुर
[ खंडपुर ] फीतपुर [ चिन्तहरपुर ] अरिष्टपुर सेयपुर) सिद्धार्थपुर [ श्ररिष्टपुर |
महापुर
[[सिद्धार्थपुर ].
४
१ पूर्वाङ्गकम
१ खास भू
도
१२
५१ ५२ एक लाख पूर्व यष्टमभक्त [३] फाल्गुन कृ. ११ पूर्वान्ह उत्तराषाढ
बेला [२] पौष्य शु. ११ म्रपराह्न रोहिणी
कार्तिक कृ. ४
मृगशिर
पुनर्वसु
१६
२०
२४
काल का प्रभास
२५
४८
५४
P
22
"
21
32
20
२५ हजार पूर्व
२१ साख वर्ष
केवल जान के पहले उपवास धाररंग का नियम
LA
נ:
"
37
"
3
"
"
तिथि
५०
पौय सु. १४
चैत्र शु. ११
चैत्र शु. ३०
फाल्गुन कृ.
६
समय
कार्तिक शु. २
पौष्य कृ. १४
..
17
11
नक्षत्र
"
मधा
Feren
विशाखा
अनुराधा
भूला
पूर्वाषाढ़
माघ कृ. १५ पूर्वान्ह श्रवण
माघ शु. २
अपरान्ह विशाखा
७५२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
Page #842
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________________
अध्याय: नौवां ]
१३ तीन दिन के
बेला [२]
माघ शु. ६
अपरान्ह उत्तराषाढ़
२५
॥
हस्तिनापुर
श्री ऋषभ देव के सिवाय बाकी समी ने गो क्षीर [गाय के दूध से बना हुमा क्षीराम [खीर] अर्थात् दूध के नाना प्रकार के पकवान की पारणा की थी।
विशाख
१५ लामा परी [जयकुमार [धाग्यवरपुर] . धाग्यसेन अयोध्या ७५० हजार वर्ष [विशावभूति] [धर्म मानपुर) धर्ममित्र पटना २५० , [सुमिय] सीमनसपुर] सुमित्र मन्दरपुर [प्रिय मित्र) [सौमनसपुर] अपराजित
२३७५० वर्ष [घरदाराजा] [मन्दिरपुर] नन्दी
पक्रपुर (गजपुर २१००० , अपराजित मन्दिरेन मिथिता ५४३ [विषयदत्त] [चक्रहरपुर] वृषभदत राजगृही
(मिथिलापुर] दत्त
औरपुर बरदस्त [संयोगपुर वरदत्त हारिका [चारुदत्त] [विखरपुर धान्यसेन गुलमलेट [धनदत्त] [द्वारावती नन्दन कुठलपुर ४२, [विश्वसेन
चैत्र कृ. १५ 1 रेवती सेला [३] पीष्म शु. ३० , पुष्य । बेला षष्ठोपचास
, भरणी चैषशु.३
कृतिका कार्तिक शु. १२ , रेवती मागं शीर्ष शु. ११, अश्विनी
वैशाख क. . पूर्वान्ह श्रवणा बेला [२] मार्गशीर्ष शु. ११ अपरान्ह अश्विनी अष्टम भक्त प्राशिवन शु.१ पूर्वान्ह चित्रा [३]
__व कृ. ४ . विज्ञाला
२३ चार दिन
२४ तीन दिन के
बेला [२]
वैपास शु. १० अपरान्ह हस्ता
[ ७५३
Page #843
--------------------------------------------------------------------------
________________
क्रमांक बन जायें के नाम
१
३
५
८
ε
१०
११
१२
*
ज्ञान के
""
उम्र बन
शुकदावन 'वट वृक्ष
(सर) सहेतुकबन
योजन वृक्ष (वृक्ष) प्रमाण
५४
73
तीर्थकरों के केवलज्ञान - ज्ञान कल्याणक
समवशरण का विस्तार
मनोहर बन
सहेतुकजन शिरीष
"
११०३ सप्त व शाल्मली ११
वैशाल
१००
शिव
१०
सर्वाथ बन
पुष्पक वन
मनोहर व far क्ष
भाग वृक्ष
अक्ष (बहेड़ा)
दाण
कदम्ब
५५
१२
おい
e
ए
H
獎
६३१
समवारय
कोस में तीर्थकर भगवान STRTIG श्रासन ५ভ
५६
祝月
४६
४४
생명수
४२
*
३८
३६
३४
३२
१०
२५
२६
समर में तब ही तीर्थकर भगवान पप्रासन से ही विराजमान होते हैं
मनदर में रहने वाले सात प्रकार के मुनीश्वरों का मंत्र और उनकी संख्या
सामान्य केवलियों की संस्था
५. ८८
२००००
२००००
१५०००
१६०००
१३०००
१२०००
११०००
८०००
७५०७
७०००
६५००
६०००
पूर्वपरियो की संख्या
५६
४१५०
शिक्षक दिपुलवि की मति ज्ञानियों संख्या । की संख्या
६०
४१५० १२७५०
३७५०
२१६०
२१५० १२६३००
२५०० २३००५०
२४००
२५४३५०
२३०० २६६०००
२०३० २४४९२०
४००० २१०४०० ८००० १५०० १५५५००
७५००
१४००
५१२००
७५००
विक्रिया अवज्ञानियों की श्रद्धियों को संख्या i संख्या
६२
| ६३
१२४५०
२०४०७
१२१५०
१६८००
१२६५०
१६०००
१०४०० १८४००
१०३०० १६०००
१५०
१३००
४६२०० ६००० १२०० ३६२००
६०००
२०६००
१०६००
१३०००
8003
१२०००
eYoo
१६००
११०००
१००००
१५३०० ६०००
co
ܘ7
८४००
७२००
११००० ६००० १०००० ५४००
७५४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरि
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--------------------------------------------------------------------------
________________
अध्याय : नौवां
सहेतुक वन
५५००
१३ १४ १५
जंबु (पाटल) पीपल वृक्ष सप्तश्वद नन्दीवृक्ष
६ ५॥ ५
२४ २२ २०
५५०० ५०००
११०० १५०० १००
३८५०० ३६५०० ४०७५०
५००० ४५००
१००० ४००० १००० ४३०० ७००३ ३६००
शाल्वन सहसान वन सहेतुक वन
Yeeo
तिलक
३२००
ग्रामवृक्ष ।
२८००
२०५५
२२००
समवशरण में सब ही तीर्थंकर भगवान पचासन से ही विराजमान होते हैं।
२॥
१८००
२० २१
प्रवेसबन अशोक नील वम कम्पक चित्रक पन बकुल गिरनार मेष भृग अश्क वन (काशी) देवरारु मनोहर शालवृक्ष (ऋडु कूला नदी)
१० ८
४३१५० ३५८३५ २९००० २१००० १०६०० ११७० १०६.०० ६.
२
५१०० २५०० ४३०० २६०० २२०० २२०० १५०० १६०० ११०० १५०० १००० १४०० १.० १३००
१५५० १२३० १००
१६०० - ४५० १५०० ४००
३५०
64 . ०००
.
७२०
३००
५००
ii. १५५८०० ३६९४० २०००५५५ १५४६०५ २२५९००१२७६००
[ ७५५
Grameen
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--------------------------------------------------------------------------
________________
स
मापन समापन समापन
गरधर
गगनी या प्रायिका
स
पाल संघी
कमांकवादियों की (को.
|१४) संख्या ।
से |
गुरुय गराधरों सब गावरों को
के नाम । संख्या
भुषण गरानियों । गणनीया मुख्य धावकोषाविकामा यक्षों
मंजिकाओं श्रोताओं की ।की । शाम की संभया के नाम संख्या संख्या नाम
१ १२७१०
४०००
बाह्मी
३ लाख ५ लाख गोमुख (वृषभ)
. महायों
१.०
००० २००००
३ १२००७
वृषभ सेव सिंह सेन चारूसेन (चारवत) १०५ सजनाभि (वयमर)१०३ धभर (अमर ) ११६ वजनभर (चमर) ११० बगदत्त (बली) १५
३५०००० मरत धात्म गुप्ता(प्रकूटजा)३३०००० सयभाव धर्मश्री
३३०००० सत्यवीर्य मेरुणा ३३०६०० मित्रभाव मनमानस ६०००० मित्रवीर्य रतिया (परु सेना) ४२०००० धर्मवीर्य मीन श्री
३०००० दानवीर्य
यक्षेश्वर तुम्मुर (तुम्बक)
५ १०४५० १२०००० ६ १६०० २३०००० ७ १६०००००००
दरमन्दी
है
६६००
१२०००० २००००३ १००००० ८४००० १२०००
दत्त (दर्भ) विदर्भ (नाग) मनगार
०
रुप श्री ३८०००० मधव
विजय (शाम) घोषवति ३८०००० युद्धवीर्य २ लाख ४ लाख अजित धारणा श्री (पारणा)३८०००० श्रीमन्दर , ब्रह्म श्वर(ब्रह्मा) धारणा १३००० विपिष्ट
शुमार (ईश्वर) वरसेना (सेना) १०६००३ द्विपिष्ट
॥ षण्मुख (कुमार)
.
०
सुधर्म (धर्म)
[ गो. प्र. चिन्तामणि
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--------------------------------------------------------------------------
________________
अध्याय नौवां ]
०
२ लाख ४ लाख पाताल (बहुमुख)
किनर (पाताल) " , किंपुरुष (किन्नर)
१३ ३६००६८००० मन्दार्थ (भन्दिर) ५५. पभ धी
३००० स्वयंभू १४ ३२०० ६६००० जवार्य (जय) ५. सर्व श्री १०८००६ पुरुषोत्तम ६४००० अरिष्ट सेन ४३ सुद्रता
६२४०० पुरुषवर ६२००७ चक्रायुध ३६ हरिषेरणा ६०३०० पुंडरीक १७ २. ०० स्वयं मु ३५ भाष धी (भाविता) ६०३५० दत्त १६०० ५०००० कुभायं (कुभु) ३० कूर्मश्री (पक्षिला)
३. कूर्मश्री (पशिला) ६०००० कुनाल १०००० विशाख २७ अमरसेना (बंधुसेना) ५५००० नारायण ३०. मल्ली
१८ पुष्पदत्ता ५२००२ सुगौम २०००० सुप्रभ (सोमक) , १७ भार्गव धी (मंगला) ४५००० अमितं जय १८००० दरदत्त ११ प श्री
४०००० उपसेन २३६० १६००० स्वयंमु
१० सुन्दोचना ३८००० अजित २४ ४.० १४००० गौतम (इन्द्रभूति) २२ चन्दना
३६००० श्रेरिएकरावा ११६३०० २३४००००।
५०५६२५०
१लाख ३लाख गंधर्व
, महेन्ट (यक्षेन्द्र)
कुबेर वरुण विद्युत्प्रभ (भृकुटी) सर्वान्ह (गोमद) धरमेन्द्र मातंग
। ७५७
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--------------------------------------------------------------------------
________________
meastsee
MisseuAINTAMANMOHometim
ateussemamaNAMAHARASHN
ATRASADS
तीर्थंकरों के निर्वाण-मोक्ष का कल्याणक
७५८ ]
क्रमांक
मोक्ष प्राप्ति की तिथि प्रादि-- निर्वाण क्षेत्र प्रायु के अन्त में
समय
नमर- निवारण क्षेत्र यक्षिणियों योग निरोध या विहार बंद होने के बाद मोक्ष की तिथि हरिबंश. नक्षत्र.. पर्वतादि - का विशिष्ट के नाम विहार कब बंद, समवशरण की स्थिति
| स्थान ! किया था ! कैसी रहती है?
- ७७ | ७ | ६
७६
१
माघ कृ. १४
पून्हि उत्तराषाढ कैलास पर्वत
-
च वरी १४ दिन पहले रोहिणी (अजिता एक मास पहले प्रशस्ति (नम्र) अन्य साला (दुरितारी).. पुस्षमत्ता (संसारी) मनोचेमा (मोहनी) काली (मालिनी) উলাল গালি महाकाली (भृकुटी) मानवी (यानु) मौरी (मोमघकी) गांधारी (विश्रुतमाली) ।
श्री तीर्थकर कवली भगवान प्रायु के अत समय जब बिहार बंद करके योग गिरोध करते हैं, तब एक ही स्थान में यथायोग्य झासम लगाकर निशचल रहते हैं। हलम बलम हा कार योग की क्रिया उपदेश रूप वचन योग की क्रिया सब बंद हो जाती हैं। उनका सभी पुण्य नाण होने से समवशरण को रचना नहीं रहती है। बारह प्रकार की सभा जब विधटित
होकर समा के सर जीव हाथ जोड़कर रहते है, प्रभु के पास रहने वाले . सब प्रमुख देवता चले जाते हैं । श्री ऋषभ नाथ भगवान के योग ।
रोहिणो सम्मेदशिखरजी सिद्धवर फूट ६ , मृगशिर
धवलदत्त कूट शु. ३ . पुनर्थस् , मानन्द कट ११ , मया
अविचन कूट कृ. ४ , विधा
मोहन कूट अनुराधा
সমাম কুর ज्येष्ठा
ललित कूट
सुप्रभ कुट आश्विन शु. ६ , पूर्वाषाढ़ , विद्युत्तम कूट
(बिदार कुट) श्रावण शु. ३० . धनिष्ठा
संकुल कूट
(संचल कूट) माद्रपद शु. १४ अपराह्न अश्विनी मंदारगिरी चम्पासाल वन
(चम्पापुरी) (मनोहर बन)
[ मो. प्र. चिन्तामणि
११ १२
Page #848
--------------------------------------------------------------------------
________________
। ७७ । ७८ | ७ |
62
T
४ । ७५ । १३ वैरोटी (विया) १ मास पहले
te
|
प्राया.६
अपरान्ह
अध्याय : नौवां ]
२४ घनन्तमति
(विज मसी)
मंत्र कु. १५
उत्तबार सम्भदशिखरजो सुबीरकूट
(सुवीरकुल स्ट) रेयसी ..
स्वयंप्रमफूट (स्वयंभू)
,
१५. मानसी (परिभृते)
ज्येष्ठ शु. ४
पुष्य
१६ महामानसी (कन्दप)
।
ज्येष्ठ कु. १४ अपरान्ह
भरणी
सुदतवरकूट (दत्तवर) कुन्दम (प्रभास-या विभ) जानवरकूट
१७ जय (धारिणी)
दैशाख शु. २
कृत्तिका
१५ विजया (काली)
मैत्र कृ. १५
प्रभात
रेवती
नाटककूट
निरोध करने के बाद चौदह दिनों तक भरक्ष नवती निरन्तर श्री मादिनाम भगवान की पूजा करते रहे । इस प्रकार आदि पुराण (महा पुराण) पर्व १७४ में लिखा है।
१६ अपराजिता (अनजान) ,,
फाल्गुन शु.५
अपरान्ह
भरती
सम्बलकूट
२० बरपिसो (पुगंधिनी) ।
काल्गुन कु. १२
.
श्रवणा
निरकूट
वैशाख कृ. १४ प्रभात
अश्विनी
त्रिधरकूट
२१ शनी
कुसुममा नहीं)
मापार स.७.
प्रदोष दित्रा
गिरनार (অলি)
२२ कुष्मांडी
२३ पावती
बावरण शु. ७
विशाखा
सम्मेदशिखरजो मुकर्णभद्रकूट
२४ सिद्धायनी
दो दिन पहले
कातिक कु. १५ प्रमात स्वाति
पावापुरी
पनसरोवर
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--------------------------------------------------------------------------
________________
SA
R
AWALE
तीर्थंकरों के साथ-साथ कितने जीव कौन-कौन सी गति को प्राप्त हुये हैं ?
कौन-कौन तीर्थंकरों के
| इस हैंडावसपिरणी काल कौन कौन से सौधर्म स्वर्ग से अनुत्तर विमानों में कितने कितने शिष्य तीर्थकरों के प्रत्येक तीर्थकाल में दोष सेदुषम सुषमा नामा क्रमांक | प्रासन से लेकर ऊर्व प्र. में कितने । (यतिगरा) कौन-कौन साथ-साथ जो अनुबन्ध केवली चौधे काल में जो जिन मोक्ष गये] तक कितने | गये उनकी । से समय में मोक्ष गये सिद्ध गये कितने-कितने हुए। धर्म का उच्छेद हुया था गये संस्था इसका खुलासा- .. उनकी संख्या
वह कहां तक रहा था?
1 उसका काल प्रमाणतीर्थकरों का संख्या
संख्या मोक्ष का समय
दूसरे मत
द
८७
I
.
६
०
पपासन कायोसासन २६००
२००००
२००००
७०१०० १००० १७०१०० १०००. २८.१०० १०००
०
.
२०१६००
.
MMVvvv
१२०० १२००० १२००० १२००० १२००० ११०००
.
श्री ऋषमनाथ भगवान से लेकर श्री शांतिनाथ तीर्थकर तक के सब तीर्थकरों के शिष्य (वतिगण) तीर्थकरों को केवल ज्ञान होने के पहले ही कौन कौन तीर्थंकरों के कितने-कितने शिष्यमण मोक्ष गये हैं, उनकी संख्या को प्राये कोष्टक ८६ में देखिये।
३१४००० २५५६००
३२४ ५००
सगंतररा।। . श्री पुष्पदन्त (सुविपिनाथ) तीर्थकर के समय से लेकर श्री धर्मनाथ तीर्थ कर के समय तक सात तीर्थ प्रवर्तनकाल में उम्छेद काल एक पल्य तक बढ़ता हुआ और पटता हुया नर्म तीर्थ विच्छेद रहा था। पल्लत रियादिचय पल्तचउत्युरणपादपरकालं ।।
सुविधीदुसतिभन्ते सो हो त्रिलोकसार में लिखा हैसविधिनाथ के तीर्थकाल में १/४ पाब पल्व का धर्म
शीतलनाथ के तीर्थकाल में १/२ प्राधा पल्य का खहिसद्धम्मो का विच्छेष हुमा था। विच्छेद हुमा था।
.
२१४०००
.
.
[गो. प्र. चिन्तामणि
०
१७६६०० १००० २०६०० ६५६०० १००० ५४६०० ६०१
०
७४००
१२
पचासन
११०००
Page #850
--------------------------------------------------------------------------
________________
अध्याय : नौवां
१३ कायोत्सर्यासन
५७००
११०००
५२३००
६००.
१००००
०
१००००
४२७००
३६००
१०००। केवल मान के बाद ४८४००
एक महीना तक १०००० मोक्ष कितने मोक्ष ४६०००
३२००
१०००
गये।
२८००
१००००
१०००
, दो ,
तीन ,
१७२०० । २८८.०
श्रेयांसनाथ के तीर्थकाल में ३/४ पौन पय तक धर्म का विच्छेद बासू पूज्य के १ पल्म का विमलनाथ के, ३/४ पौन पल्य का अनन्तनाथ के १/२, प्राधा पाय धर्मनाथ के, १/४ वाव प्रत्य इस प्रकार विच्छेय काल क्रम से पार पल्य से लेकर एक पल्य तक बढ़ता गया। और फिर पटता हुआ पाव पल्य तक रहा जिस समय धर्म का दिच्छेद होता है उस समय मुनि, प्राधिका, धावक, प्राविका कोई मी नहीं रहते हैं। दीक्षा के सम्मुख होने वालों का अभाव होता रहता है। इसलिये धनरूपी सूर्य
असंगत रहता है। १३७०
२४००
८८००
५००
२०००
१९२००
१०००
६२७
८८०० । छः , १८०० एक वर्ष तक १८०० , दो , १००० , सीन
पद्मासन
८००७
२३ कायोत्तमांसन १०००
५०००
,
छ:
॥
१०५८००
२७७८००
२४६४४००
११५२
Page #851
--------------------------------------------------------------------------
________________
R
a
warenesstomegamsheARAMATA
Parami
तीर्थंकरों के परस्पर जन्म काल का अन्तराल कालप्रमाण
कमहक
ऋषभनाथ का जम्म सुपमा दुषमा नामक तीसरे काल के अंत समय में जब ८४ लाख पूर्व + ३ वर्ष चार मास बाकी रहे तब हुभा। यजिननाथ
ऋषभ देव का जन्म होने के बाद ५० लाख करोड़ सागरोपम+१२ लाख पूर्व प्रमाण काल बीत जाने पर हुआ। ___ संभवनाथ अजितनाथ का २० लाख कोड़ा कोड़ी सागरोपम +१२ लाभ पूर्व अभिनन्दन
संभवनाथ का १० लाख करोड़ सागरोपम+ १० लाख पूर्ण सुमतिनाथ अमिनन्दन का
६ लाख करोड़ सागरोपम-१० बाय पूर्व पाप्रमनाथ सुमतिनाथ का ६० हजार करोड़ सागरोपम+१० लाख पूर्ण सुपार्श्वनाथ पद्मप्रभनाथ का
९ हजार करोड़ शायरोपम+१० लास पूर्व चन्द्रप्रभ
सुपायहाय का ९५० करोड सागरोपम+१० साल पूर्व पुष्पदन्त
चन्द्रप्रभ का १० करोड़ सागरोपम+दलारह लाख पूर्व शीतलनाथ
१ करोड सागरोपम+१ लाख पूर्व ११ श्रेयांसनाथ
भीतलताय का १ करोड सागरोपन+१ लाख पूर्व प्रभारत काल में से + १०० साभर+-१५०२६०००
वर्ण घटाने पर जो वाकी रहा उतना काल प्रमाण बीत जाने पर हया। १२ वासुपूष्य , वासनाश का , ५४ सागरोपार + १२ लाख वर्ष प्रमाण काल बोल जाने पर हुमा ।
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
Page #852
--------------------------------------------------------------------------
________________
१३ जिभवनाथ का जन्म वासुपूज्य का जन्म होने के बाद ३० सागरोपम+१२ लाख वर्ष प्रमाण काल बीत जाने पर हमा। अनन्तनाव विमलनाथ का
६ सागरोपम+३० लाख वर्ष धर्मनाय अनन्तनाथ का
४ सागरोपम+२० लाख वर्ष १६ शान्तिनाथ धर्मनाथ का
३ सागरोपम+६ लाख घर्ष
अध्याय : नौवा ]
शान्तिनाय का
१/२साथा परव ५ हजार बर्ड
१० ग्रहग्नाथ
कुन्भुनाथ का
,
१/४ पाब पल्प में से EEEEE८६००० वर्ष घटाने पर जो बाकी रहा उतमा कालप्रमाण बीत जाने पर प्रा।'
१६.
मल्लिनाथ
,
परहनाथ का
,
१००० करोड़ +२६००० वर्ष काल प्रमाण बीत जाने पर हुमा।
२०
मुनिसुव्रत
मल्लिनाथ का ..
५४२५००० वर्ष
२१
नमिनाव
,
मुनिसुव्रत का ,
'६२०००० वर्ग
२२
मिनाथ
नमिनाथ का ,
५०६००० वर्ण
२३ पार्श्वनाथ
नेमिनाथ का
,
८४६५० वर्ष
___ महाबीर
, पार्श्वनाथ का ,
२७६ वर्ण
प्रति दुधमा-सुषमा नामक चौथे काल के अन्त समय में जर ७५ वर्ष ८ मास १५ दिन बाकी रहे, तब महावीर स्वामी का जन्म हुमा।
Page #853
--------------------------------------------------------------------------
________________
[23
तीर्थंकरों के परस्पर मोक्ष काल का अंतराल कालप्रमारण
ऋषभनाथ जिमदेव सुषमा-बुपया नामक तीसरे काल के अन्त तमय में जब ३ वर्ष मास १५ दिन बाकी रहा तब नो गये। अजितनाथ ऋषभनाथ तीर्थकर के मोक्ष जाने के बाद ५० लाख करोड़ सागर प्रमाण बीत जाने पर मोक्ष गये ।
३०
"
संभवनाय अभिनन्दन
प्रतिनाथ , संश्ववनाथ
सुमतिनाथ पानमनाथ
, अभिनन्दन , सुमतिनाथ
१० हजार करोड़ सागर
७.
१०० करोड़ सागर
सुपएकनाथ पन्दपन पुष्पदन्त शीतलनाथ श्रेयांसनाथ
, पचन मनाथ , सुपाश्र्वनाथ
चन्द्रप्रभ , पुष्पदन्त , शीतलनाथ
३३७३६०६ सागरोपमकाल
१२
वासुपूज्य
श्रेयांसनाथ
५४ साख 8
[ गो. प्र. चिन्तामणि
Page #854
--------------------------------------------------------------------------
________________
बिमलानाय जिमदेव अमलनाथ धर्मनाथ
बासुगूज्य तीर्यकर के मोक्ष के बाद ३० लाख सागरापा काल प्रमाण बीत जाने पर मोक्ष गये। मिलनाथ अचन्हमाण
४
अध्याय : नौवां ]
१५.
शान्तिनाथ ___
धर्मनाथ
लास सागरौषम से-पौन पल्य घटाने पर जो बाकी रहेगा उतमा
प्रमाण बीत जाने पर मोक्ष गये।
शान्तिनाथ
पाषा पन्योपम काल प्रमाण बीत माने पर मोक्ष गये।
यरहनाथ
मल्लिनाथ
परदनाथ
३ पाय पल्प में से एक हजार करोड़ वर्ष घटाने पर जो बाकी रहा ४ उतमा काल प्रमाण बीत जाने पर मोक्ष गये। एक हजार करोड वर्ष काल प्रमाण बीत जाने पर मौज गये । ५४ लास ई
मुनिसुव्रत দমিনাখ मैमिनाथ पार्श्वनाथ
महिलनाथ मुनिसुव्रत ममिनाथ করিনাথ पाश्र्वनाथ
१३७५० वर्ष
२५० वर्ष
..
.
अथर्थात दुषमा सुषमी नामक चौधे काल के अन्म समय में जब ३ जहाँ ८ मास १५ दिन बाकी रहे, तब महापौर तीर्थकर भगवान मोक्ष गये।
eemAIMONIRA
H MIRana
Page #855
--------------------------------------------------------------------------
________________
Em
Pardee
eNRIman
COMMAMMARN
तीर्थंकरों का तीर्थप्रवर्तन काल (मोक्षमार्ग प्रवर्तनकाल) प्रमारण
७६६ ।
तीर्थकर का
तीर्थ प्रवर्तन काल
५० लाख करोड़ सागरोपस + १ पूर्वात प्रमाणकाल तक रहा
+
+
ऋषभ नाथ अजितनाथ संभवनाथ अभिनन्दन सुमतिनाथ पात्रम सुपाव नाव चन्द्रमा
१० हजार करोड़ सामरोफम
+
+
६०० करोड़ सागरोपम
+
+
पुष्पदन्त
२८ पूर्वाङ्ग + पस्य का चौथा भाग से हीन (कम) और ६ करोड सागरोपम से अधिक अर्थात् १६९ERSEE सागर और EEEEEEEEEEEEEEE ३/४ पल्प में से २२ पूर्वाङ्ग + एक लाख पूर्व बटाने पर जो धाकी रहेगा उतना काल प्रमाण समझना चाहिये।
१० शीतलनाथ
"
"
प्राधा पल्यापम और १०० सागर वग एक करोड़ साय रोगम प्रमाण काल से अतिरिक्त समझता चाहिये । अर्थात् ६६६६६६ सागर और ६६ECREEcle TEEEE१/२ पस्य इससे अतिरिक्त काल का प्रमाण ६६२६००० वर्ष कम २५००० पूर्ण है, ऐसा समझना चाहिये।
[ गो. प्र.चिन्तामणि
११
श्रेयांसनाथ
५४ सागरोपम+२१ लाख घरों में से ३/४ पल्प कम इतना भान ब्रमाण समझना चाहिये।
१२ वासुपूज्य
३० सागरोपम+५४ लाख वर्षों में से १ पल्प कम
Page #856
--------------------------------------------------------------------------
________________
विमलनाथ तीर्थकर का सीर्थ प्रवसनकाल सागरीषभ +१५ लाख वर्षों में से ३/४ पल्य कम इतना काल प्रभार समझना चाहिये।
अध्याय नौवा ]
अनन्तनाथ
धर्मनाथ
३
+२५.००००
१
/४ पल्प ,,
साहितासाथ
१/२ माथा पन्य १२५० वर्ष प्रमारा समझना चाहिये।
कुम्भुनाथ
१/४ पाच पल्म में से ६६६.८.६६७२५० वर्ष पाने पर जो बाकी रहेगा. उसना काल प्रमास सम्भमा ।
प्ररहमाथ
एक हजार करोड़ वर्षों में से . ३३६० बर्ष कम पर्यात् ५५६६६६१०० वर्ण काल प्रमास समझना।
मल्लिनाथ
५४४७४०० वर्ष काल प्रमाण समझना चाहिये।
३०.३० वर्ष
मुनिसुबल নাশা
५०१०३
पाश्र्वनाथ
२७ वर्ष,
२४
महावीर
२१०४२ वर्ष काल प्रमाण समझना अर्थात पंचम काल के यत समय में जब ई ई मांस और १५ बाकी रहेगा, तब तक महादीर भगवान का तीर्थ प्रयत काल रहेगा।
aur
I TUAmritvememewafaamananmarwasnama-
-
-
-
--
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________________
क्रमांक
१
보
७
५
C
१०
११
१२
१३
१४
१५
६३ शलाका पुरुष और नारद, हर कामदेव सम्बन्धी युगपत् अस्तित्वकाल सूचक की रचना
२४ तीर्थंकर
१ ऋषभनाथ
२ अजितनाथ
संभवनाथ
४ अभिनन्दन
३
७ सुपार्श्वनाथ
चन्द्रप्रभ
६. पुष्पवन्त
१० शीतलनाथ
११ धेयांसनाथ
१२ वासपूज्य
१३ विमलनाथ
१४ अनन्तनाथ
१५ धर्मनाथ
१२ चक्रवर्ती ९ वसिमद्र
१ भरत
२ सगर
१ विजय
२ अचल
३ सुधर्म
४ सुप्रभ
५ सुदर्शन
६ नारायण
१ विपिष्ट २ द्विपिष्ट
४ पुरुपो
प्रतिनारायण ६ नारद
१ मस्वग्रीव १ भीम
२ तारक
३ मेक
४ निर्णभु ५. मधुकंटम
२ महामीम ३)
४] महाराष
काल
११ रुद्र
१ भीम
२ बलि
३ शंभु
४ विश्वानल
५. सुप्रतिष्ठ
६ अवल ogethe
● प्रतिवर
६ जितनाभि
२४ काम देव
२ प्रजापति
३ श्रीधर
४ दर्जनभन
५ प्रसेन चन्द्र
६ चन्द्रव ७ अग्नि युक्त सनत्कुमार
६. वत्सराज
१० कलक प्रभ ११ मेघप्रम
७६८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
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________________
x३ भयवा
अध्यायः नौवां ]
४ सनत्कुमार १६ शान्तिनाथ ५ शान्तिनाघ १७ कुरघुनाथ १५ अरहनाथ ७ अरहनाथ
सुमीम
१२ शान्तिनाथ १३ कुन्भुनाथ
१४ अरहनाथ
६ नन्त्री
६ पुडरोक
प्रल्हाद
महाकाल
বিজলি
१६ मल्लिनाथ
१५ श्रीचन्द
*
७ नन्दीपित ७ वक्त
बलि
१५ नलराज
२६
२. मुनिसुव्रत
१० हरिए
२८
.
४
रामचन्द्र
लक्ष्मण
रावण
नरमुख
हनुमत
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________________
-
AFAIRADESH
NATION
%
[ ०००
६३ शलाका पुरुष और भारद, रुद्र, कामदेव सम्बन्धी युगपत् अस्तित्वकाल सूचक की रचना ।
२४ तीर्थंकर
|
बलिभद्र
है दसरायणप्रतिनारायण
नारद
१२
रुद्र
२४ कामदेव
२१ नमिनाथ
१९ बलिराम
0
११ जयसेन
.
२२ नेमिनाथ
नामनाथ
६ बदिराम
जरासंध
अधोमुख
२० वसुदेव
२३ पार्श्वनाथ १४ महावीर
११ महादेव
२१ प्रद्युम्न २१ भागकुमार २३ धीबंधर २४ जम्बूस्वामी
.
सूचना :-ऊपर की तालिका में दीवारों के नामों के भागे चक्रजी प्रादिकों के नाम लिखे हैं, वे तीर्थकरों के समय में हो गये हैं. ऐसा समझना चाहिये । और तीर्थंकरों के नाम कोष्ठक में अब ४ इस प्रकार का चिन्ह रहे और उसके प्रागे धिन चक्रवर्ती ग्रादिकों के नाम लिखे हो तो वे सब पहले और बाद के होने वाले तीर्थंकरों के अन्तराल काल में ही हुये हैं, ऐसा समझना चाहिये। तथा जिस कोष्ठक में जहां-वहां
इस प्रकार का चिन्ह हैं वहां-वहाँ उनका प्रभाव समभाना चाहिये।
[ गो. प्र. चिन्तामणि
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श्री महावीर के तीर्थ प्रवर्तनकाल से चली पायी हुई, प्राचार्य शिष्य और शास्त्र परिपाठी प्रादि का विवरण
कब हो गये।
कौन कितने । क्रमांक | प्राचार्य कौन कितने वीर नि. वीर नि. वर्ष तक
सालि |द्विस्ति विशेष । परम्परा, । ज्ञान के धारी । संवत से संबत तक शास्त्रों का संवत वाहन ईसवी सन [ उनके नाम ।
चार किया
विक्रम
अध्याय : नौवां ]
___२
| ५ ।
। ।
।
।
१०
अनुबंध-केवली ये
गौतमस्थानी गरखधर (इन्द्रगति सुधमः स्वामी अम्यूस्वामी
अनुबंध केवली थे ।
पूर्व में पूर्व में पूर्व में ४७०६०४ ५२६ ४५८ ५६२ ५१४ ४४६ ५८० ५०२
-
ये अंतिमअनबंध केवली ये:
-
४
विष्णदुनि (नन्दी) श्रुतकेयली
१२ भंग ३१४ पुर्व के ज्ञाता थे
श्रुत केवली ये, केवली के समान पदामों की प्ररूपण। करते थे 'चौदह पूर्वी' नाम से विख्यात थे।
१३
नन्दीगिष अपराजित गोवर्धन भद्रबाहु (प्रथम)
२२
११५
३५६ ३३७
४१० ४६२ ४७१ ३९३
m
ये अंतिम श्रुतकेयसी थे।
-
-
विशाखामार्य (विशालमुनि)
११ मंगव १० १६३ पूर्व के ज्ञाता थे
पदाथों का यथावत् सम्यक प्ररूपण करते हुये परम निन्थ मुनि कहलाते थे।
प्रौष्ठिलाचार्य দ্বিাৰা (नक्षत्र, क्षत्रियांक) जयसेनाचार्य (जन).
२६८ २७६
४३२ ३५४ .४१३ ३२५
-U
306
१२
२०६
२६२
३६६
३१
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________________
।
२
।
३
| ५ | ६ |
|
|
|
१७७२ ].
११ प्रमथ१० पूर्व के शास्त्रज्ञ थे।
२३०२४७१८२४१
७७१२९७
नायसेनाचार्य (जयनागयोगी- नाय) सिद्धावाचार्य
पदार्थों की यथावत् सम्यक् ग्ररुपणा करते हुये परम निर्गन्य मुनि कहलाते थे।
२४०
द६४
३१७ २७३ ३४०२६२
२०४
२०
२८२
२६७
३२०
२४२
३१७
३०७
२२६
(तिसेन) बिजयचार्य
(विज्ञवसेन) १७ बुद्धिषणाचार्य
(बुद्धिमान बुद्धितिय देवसेनाचार्य (प्रथम) (गंगदेवाचार्य) . धर्मसेनाचार्य (सुधर्म-बरसेन)
२३१
२८७ २००
३४५
नक्षत्राचार्य
२५
२२६
एकादाय शास्वाथे।
१८१
यै महामुनि महलाए हैं।
१०७
२४१
१६३
४२२
२२१
जयपालाचार्य (यशपालमुनि) पांडवाचार्य (पानि) भवसेनाचार्य (( तसेन) कंसाचार्य
(कस मट्टारको . २५. 'मुभाचार्य
४२३
२८२
१०४
१६८०
[ गो. प्र. चिन्तामरिम
दशांग शास्त्रज्ञ थे ११ अग १४ पूर्व एकदेश धारक शास्त्रज्ञ थे.
४६६
४४ ६
२
१३६ - ५८
..
..
..
-
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________________
२६ यशोभद्राचार्य दशांगशास्त्राये ४०५ ४७२१८४ १३०५२ ये महामुनि कहलाये हैं।
११ अंय १४ पूर्व के एक देशशरक
शास्त्रज्ञ थे। २७ (भदुबाहू द्वितीय)
४७५ ५१५ २३ २२११२ ३४ ये प्रतिम निमित ज्ञानी है २८ लोहाचार्य
अध्याय : नौवां ।
ईसवी सन् इनके समय में काज दीप से मुनि संघ
पक्षपात होकर संघ में चार भाव होगये।
२६
अहिवल्याचार्य
२८
६५.
३६
३६
एका अंग्रेग के एक देश ५६६ ५६३ शास्त्रज्ञ हुये हैं .
५६४९१४
३१
२१ १२३ १६ १४४ ० १६३ २० १६३
शशाके ६७ १ नन्दी संध १०८५ २ सेन संघ २६ १०७ सिंह संघ ५६. १३७ ४ देव संध
भाषनन्याचार्य परमेनाचार्य पुष्पदन्ताबार्य घुसवत्वापार्य सभन्दी प्राचार्य बीरनन्दी कनकनंदी, इन्द्रनन्दी - नेभिचन्द्र ,
६३४. ६६३
६६४ ६५ ये सब धवलादि सिद्धान के पाठी थे इसलिये के पांचों ही सिद्धांत .. चक्रवर्ती कहलाते थे,
श्री गौतम मुनिप्रभुसियों का काख का प्रमाण ६८३ वर्ष की है जो श्रुत-लोर्ष में घर मग काल को कारण है वह पैगामी २०२१७ वर्षों में काल दोष से खेद को प्राप्त हो जायेगा । ती भी इस अवधि में चातुर्वधर्य संब का जन्म होता रहेगा। परन्तु सब लोग प्रायः अविनीत, दुर्व दि. असूधक, सप्तमय पोर माह मद संयुक्त पत्य एवं गत्र सहित, कलहप्रिय, क्रोधी, होंगे।
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________________
T
HORS
TOUCHERRANGER
[209
न्याय: महापुरुष वर्तमान कालीन बारह चक्रवर्ती सम्बन्धी ज्ञातव्य बातें
मितियों
जन्मक
नाम पिछले सासरे। पिछले तीसरे कहां से आकर
मथ का नाम | भव का नाम चक्रवर्ती हुए । चक्रपती) 1 नाम
मगर
जन्मपूरी (राजधानी)
जननी शरीर की पारीर का (माता) ऊंचाई वर्ण
सुवर्ण
सर्वसिद्धि अयोध्या বিজয়গান
वयक श्रावस्ति (कौशलापुर . महेन्द्रस्वर्य हस्तिनागपुर (कौशलापुर) सर्वार्थसिरिम हस्तिनागपुर
४२
भरत पीठराजा पुष्ठरोकिनी
वित लेजराज पृथिवीपुर मधव शशिप्रभ पुंडरीकिनी सनत्कुमार अरुची, महापुरी शान्तिनाथ मेघराज पुरी किनी कुन्थुनाथ सिंहरण , रत्नसंचयपुर अरहनाथ बनपति , लेमपुर सुभौम कनकप्रभ । बन्यपुर पद्यनाथ बित्तसूप्रसस्न बीतशोकपुर (महावया)
हरिशेख महेन्द्रदत्त , विजय ११ 'जबसेन असीकान्त , राजपुर १२ ब्रह्मदत जंभूत ॥ काशीपुर
ऋषभदेव यशस्वति ४५० बिजय सुमंगला २५० सुमित्र भवति विजय सहदेवी विश्वन ऐरादेवी ४० सुरसेन श्री कान्त ३५ सुदर्शन मिथसेना ३० कीतिवीर्य तारादेवी २८ पनरथ मयूरी २२
जयग्तान्तर
अयोध्या हस्निायपुर (वराणसी)
ब्राह्मस्पर्म
[ गो. प्र. चिन्तामणी
महेन्द्र स्वर्ग कंपिलनगर (भोगपुर) ब्रह्मस्वयं कौशाम्बी पद्मयुगलस्वर्ग कंक्तिनगर (अयोध्या)
हरिकेस . विजय
ब्रह्मरम
विप्रा २० यशोवती १५ चलादेवी ..
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________________
क
लाटतातलामामामanbidihati
अध्याय : नौवां ।
[ ७७५ भविष्यकाल में अर्थात् उत्सपिरणो के दुषमा सुषमा नामा लोसरे काल में होने वाले
२४ तीर्थकरों के नाम प्राधि | भविष्यकाल में | इन तीर्थंकरों के । प्राय उत्सपिणी | उनके शरीर उनकी आयु अर्थात् उत्स- जीव पिछले काल के तीसरे | की ऊंचाई | कितने वर्ष पिरणी काल में | भव में कौन थे?] काल में कहां से कितनी की होगी ? होने वाले उनके
आकर तीर्थकर | होगी। चौबिस तीर्थंकरों नाम | के नाम
पहले नरक से
७ हाथ
११६
nAmasmirtelaxatistiaadiwasinilioenkaianimalwww
१. महापा श्रेरिपकराजा २. सरदेव
सुपार्श्व ३. सुपाव ४. स्वयंप्रभ प्रौरिष्ठल ५. सवत्मिभूत कृतसूर्य (कट)
(सर्वप्रभ) ६. देवपुत्र (देवसुत) क्षत्रिय - ७. कुलपुत्र पाविल (श्रेष्ठी)
(कुलसुत) .८. उदक (उदक) शंख
६. प्रौष्ठिल नन्द (नन्दन) १०. जयकीति सुनन्द ११. मुनिसुव्रत शशांक १२. अर (अप्तम.) सेवक १३.. निष्पाप . प्रेमक
(अपाप) १४. निष्कषाय अतोरण १५. विपुल रैवत
(विमल)
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७७६ ।
[ गो. प्र. चिन्तामणि
१६. निर्मल
१७. चित्र गुप्त १८. समाधि गुप्त १६. स्वयंभू
कृष्ण
तीसरे नरक से (वासुदेव.) सिरि (बलराम) भगलि विगलि (बागलि) द्वीपायन
२०. अनिवृत्तिक
(अनिवर्तक) २१. जय
मारावक (कनकदाद)
२२. विमल २३. देवपाल
सरूपदत्त (चारूपाद) सात्यकी पुत्र (रुद्र, महादेव)
SARAN
२४. अनन्तवीर्य
तीसरे नरक से ५००
धनुष
एक करोड़ पूर्व
इस प्रकार तिलोयपरणत्ति के चतुर्थ अधिकार (गाथा नंबर १५७८ से १५८६) में उल्लेख है । इसी तरह श्री गुणभद्राचार्य विरचितः उत्तर पुराण के श्लोक नम्बर ४०१ से ४७४ पर्व ७६ में लिखा है। १. श्री महावीर भगवान् जिस दिन मुक्त हुए उसी दिन गौतम स्वामी को
केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था । इसी तरह जिस दिन गोतम गराघर मोक्ष गए, उसी दिन सुधर्म स्वामी केवली हुये हैं और जिस दिन सुधर्म स्वामी को मोक्ष हुमा उसी दिन जम्बू स्वामी केवली भये । इसलिये इन तीनों को 'अनुबन्ध केवली' कहते हैं । जम्बू स्वामी अन्तिम अनुबन्ध केवली हैं। सामान्य केवली की अयेक्षा से श्रीधर नामक अन्तिम केवली कुन्टलगिरि से
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अध्याय : नौवां ।
[ ७७७ .. २. प्रथम भद्रबाहु अन्तिम श्रुतकेवली हो गये हैं। द्वितीय भद्रबाहु अन्तिम निमित्त
ज्ञानी हुए हैं। ३. सुपार्श्ववन्द नामा अन्तिम चारणमुनि हो गये हैं। ४. प्रज्ञाश्रमलों में वजयश नामा अन्तिम श्रमण हो गये हैं। ५, श्रुत नाम के मुनि अन्तिम श्रमण हो गये हैं।
विनय एवं सुशीलादि गुणसंपन्न श्री नाम के ऋषि हो गये हैं। मुकुटधारी राजाओं में जिन दीक्षा धारण करने वाले सम्राट चन्द्रगुप्त अन्तिम राजा हुए हैं। इनके पश्चात् कोई भी मुकुट धारी राजागरण जिन दीक्षा नहीं धारण करेंगे।
आगामी काल में कौन-कौन के जीव तीर्थंकर होंगे ? इस विषय में कई जगह कोई छोटी मोटी पुस्तक में और नाम देखने में
प्राये हैं। अट्टहरि राव पडिहरि चलक्कि घउक्को य एय बचलहो । सेरिणय समंतभद्दो तित्थय राहु तिमियमेव ॥१६०७॥
प्रथम तो यह गाथा ठीक नहीं और कौन से शास्त्र की है, इसका भी पता नहीं और इसका अर्थ भी ठीक नहीं जमता है। कारण 'त्रिपिष्ट' नाम का पहिला नारायण (हरि) का जीव श्री वर्धमान तीर्थंकर होकर मुक्त हुआ है। (देखो उत्तरपुराण पर्व ७४) और ८वा नारायण हरि लक्ष्मण का जीव आगे पुष्कराध द्वीप के विदेह क्षेत्र में जन्म लेने वाला है, ऐसा पद्मपुराण पर्व १०६ में लिखा है। इन दोनों नारायणों को घटाने से सात ही नारायण रह जाते हैं, परन्तु गाथा में 'अट्टहरि' लिखा है । और 'अश्वनीच' नाम का पहला प्रति नारायण (पडिहरि) का जीव इन प्रतिनारायणों में 'मृगध्वज' नाम का केवली होकर मुक्त हो चुका है। तब नव प्रतिनारायण कैसे संभव हैं ? और भी आदि अंत के चौबीस होनहार जीव अन्त के रुद्र पर्यंत चौथे काल में ही हो चुके हैं. फिर पांचवें काल में हुये समन्तभद्र · महाराज का जीव इन चौबिस में आना कैसे संभव है ? और समंतभद्र महाराज तीर्थंकर प्रकृति का बंध कब किये थे ? और भी अनेक युक्ति प्रयुक्ति से इस गाथा में कथित अर्थ नहीं जमता है । इसलिये तिलोयपणाति और उत्तरपुराण के कथनानुसार अर्थ का श्रद्धान करना चाहिये । इस विषय को पाठक समझ लें।
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________________
।
RSHAD
७७८ ]
[ गा. प्र. चिन्तामरिण भूतकाल के तीर्थंकरों के नाम-१. निर्वाण, २. सागर, ३. महासाधु, ४. विमलप्रभ, ५. श्रीधर, ६. सुदत्त, ७. अमलप्रभ, ८. उध्दर, ६. अंगिर, १०. सन्मति, ११. सिन्धु, १२. कुसुमौजली, १३. शिवगरण, १४. उत्साह, १५. ज्ञानेश्वर, १६. परमेश्वर, १७. विमलेश्वर, १८. यशोधर, १६. कृष्णमति २०. ज्ञानमति, २१. शुध्दमति, २२. श्रीभद्र, २३. अतिकांत, २४. शान्त ।।
जघन्येन जिनाधोशा भवन्ति विशतिप्रमाः । चक्राधिपाश्च सर्वत्र नदेवखचराचिताः ॥१६०८।।
अर्थात् अढाई द्वीप में तीर्थकरों की जघन्य संख्या बीस रहती है, इनके सिवाय देव, मनुष्य और विद्याधरों से पुज्य ऐसे चक्रवर्ती भी होते हैं ।
कौन से क्षेत्र की अपेक्षा कितने चक्रवर्ती कहे गये हैं.--
इन भरत और ऐरावत खंडों में कालानुसार एक-एक चक्रवर्ती होते रहते हैं । सना क्षेत्र में निवार्य खंट और पांच मलेच्छ खंड मिलकर ६ खंड होते हैं। उसी प्रकार ऐरावत क्षेत्र में भी छह खंड होते हैं। विदेह क्षेत्र में जो ३२ देश हैं, उन देशों में भरत क्षेत्र के समान छह-छह खंड होते हैं और उन देशों में एकएक चक्रवर्ती होते रहते हैं । मंच विदेह क्षेत्र की अपेक्षा एक समय में १६० तीर्थकर, सकल चक्रवर्ती तथा अर्ध चक्रवर्ती कहे गए हैं। पांच भरत तथा पाँच ऐरावत क्षेत्रों की अपेक्षा इनकी उत्कृष्ट संख्या १७० होती है। जघन्य से विदेहों की अपेक्षा कम से कम संख्या तीर्थंकरों, चक्रवतियों तथा अर्ध चक्रवर्तियों की बीस कही गई है। त्रिलोकसार में लिखा है
तित्थद्ध-सयल चक्की सद्विसयं पुखरेमध्यवरेण । बीसं बोसं सयले खेले ससरिसय बरदो ॥१६०६।।
चक्रवतियों की संख्या जो १२ कही है, वह भरत और ऐरावत क्षेत्रों की अपेक्षा से कही गई है । विदेह क्षेत्र में वे प्रायः सर्वत्र होते रहते हैं, वहां उत्कृष्ट' या जधन्य संख्या का नियम नहीं है ।
- चक्रवर्ती पद-नरक में से पाने वाले जीवों को कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता है, स्वर्ग से आने वाले जीवों को ही यह चक्रवर्ती पद प्राप्त होता है-ऐसा नियम है।
:
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________________
पूर्ण प्रायु में से कुमारकालादि काल प्रमाण
| कुंमारकाल क्रमांक
प्रमाण
| मांडलिक राजा काल प्रमाण
विजयकाल प्रमाण
चक्रवशिरव का काल
प्रमाण
___
संयम काल पुणं प्राय कौन कौन से तीर्थकर के
प्रभाग _काल प्रकरण : तीर्थकाल में हो गये
अध्याय वौवां ]
५
१
७७ लाख पूर्व
१००० वर्ष
६०००० व
८३ लाख पुर्व वृषभनाथ के तीर्थ काल
११ हजार वर्ष कम एक लाख पूर्व
६ लाख पूर्व ० , १२, ३६००० वर्ष ५०००० वर्ण
३००००. १००००,
२५००० वर्ण
५००००।
१००००,
२५००० ।
७२ ॥ अजितनाथ ॥
, धर्मनाथ और शान्तिनाथ के
यंतराल फाल में हो गये। ३ लाख वर्ष १ अाप स्वयं चक्रवर्ती थे। ६२०००
६०००० २४२०० २३१५० ।। २०६०० ।
२५०००, २३७५ ० .
१०००००, २५००० २३७५० २१०००
६००, ४०० "
२१००० ।। ५०००
६००००
५००,
३००
१८०८
अरहनाथ और मल्लिनाथ के अंतराल काल में हो गये। मल्लिनाथ और मुनिसुव्रत दुनिसहत और
३५०,
१०००० ,,
नमिनाथ
}
१२
२८ ,
नामिनाथ और मेमिनाथ नेमिनाथ और
५६,
१६,
६००
10
पार्श्वनाथ
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________________
७८० ]
भरत चक्रवर्ती का जन्म चैत्र कृष्ण
राशि का चन्द्र जब मीनलग्न में था तब हुआ था । to ब्राह्मण व अनादि से है ?
नहीं, भरत चक्रवर्ती ने ब्राह्मण वर्ण की स्थापना की थी। आदि पुराण पर्व ३८ में लिखा है-
तेषां कृतानि चिन्हानि सूत्रः पद्माह्वयासिषेः ।
उपाहारेकादशान्तकैः ( तेन ) ।। १६१०।।
अर्थात् भरत चक्रवर्ती ने 'पद्म' नाम की निधि से एक से लेकर ग्यारह तक ब्रह्मसूत्र देकर ब्राह्मण वर्ग की स्थापना की थी। इस तरह भरतेश्वर द्वारा चतुर्थ काल के प्रारम्भ में ब्राह्मण वर्ग को उत्पत्ति हुई है ।
पांचों विदेह क्षेत्र में ब्राह्मण वर्ण है या नहीं ? वहां कितने वर्ण हैं ?
अर्थात् — विदेह क्षेत्र में ब्राह्मण नहीं है। वहां क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये तीन ही वर्ण होते हैं ।
क्रमांक, ग्रागे कौनसी गति प्राप्त
की ?
१
१.
२.
३.
४.
५.
प्रजा वर्णत्रयोपेता जिनधर्मरता शुभा ।
व्रतशील तपोवृष्टि भूषिता न द्विजाः क्वचित् ॥ १६११ ॥
सिध्दान्तसार प्रदीप
७.
सिध्द (मुक्त) भये
[ गो. प्र. चिन्तामणि उत्तराषाढ़ नक्षत्र, ब्रह्मयोग, धनु
र
13
सौधर्म स्वर्ग गये सनत्कुमार स्वर्ग गये
सिध्द भये
Fr
77
भविष्यकाल में होने वाले अतीत काल के १२ सकल १२ चक्रवर्तियों के नाम चक्रवर्तियों के नाम
३
भरत
दीर्घदन्त
मुक्तदन्त
गूढदन्त
श्रीषे
श्रीभूति
श्रीकान्त
४
श्रीपेरण
पुण्डरीक
वज्रनाभ
वज्रदत्त
वज्रघोष
चारूदत्त
श्रीदत्त
P
Page #870
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________________
अध्याय : नौवा ]
[ ७८१
७वां नरक गये सिध्द भये
सुवर्णप्रभ भूवल्लभ
६. १०.
पद्य महापा चित्रवाहन विमलवाहन अरिष्ट सेन
धर्मसेन कीत्याँध
१२.
७वां नरक गये
प्रश्न :--भरतचक्रवर्ती का वृषभाचल पर अपनी प्रशस्ति लिखने पर विचार
कैसे रहे ? उत्तर :--.-महान् पुण्यात्मा चक्रवर्ती भरत क्षेत्र के छह खण्डों पर विजय प्राप्त करता है । वह पांच म्लेच्छ खंडों की विजय के लिए विजयार्थ पर्वत की ओर गमन करता है। यहाँ के राजानों को जीतकर चक्रवर्ती हिमवान पर्वत के समीप प्राता है, और इसके निकटवर्ती वृषभाचल पर्वत के दर्शनार्थ जाता है। यह सौ योजन ऊंचा तथा सौ योजन चौड़ा है। इस मनोहर पर्वत की शिला पर प्रत्येक विजेता चक्रवर्ती अपने गौरव को सूचित करने वाली प्रशस्ति लिखता है । चक्रवर्ती भरत जब वृषभाचल पर्वत के निकट पहुंचे, तब उन्होंने क्या किया, इस विषय में महापुराण का वर्णन महत्त्वपूर्ण है ! जिनसेन स्वामी लिखते हैं, "समस्त पृथ्वी को जीतने वाले भरत चक्रवर्ती ने अपने हाथ में काकिणी रत्न लेकर अपना नाम उस पर्वत पर लिखने का विचार किया, उस समय भरतराज ने उस पर्वत पर हजारों चक्रवर्ती राजाओं के नाम लिखे देखे :
तदा राजसहसाणां नामान्यवेक्षताधिराट् । (पर्व ३२-१४१)
असंख्यात करोड़ कलदों में जितने चक्रवर्ती राजा हुये थे, उनके नामों से . भरे हुये उस पर्वत को देखकर भरतेश्वर को बहुत प्राश्चर्य हुआ। इसे देखकर चक्रवर्ती का गर्व दूर हुया और उन्होंने निश्चय किया कि इस भरत क्षेत्र में एक मैं ही शासक नहीं हूँ, मेरे समान अनेक चक्रवर्ती शासक हो चुके हैं। जिस समय भरतेश्वर ने एक चक्रवर्ती के नाम की प्रशस्ति मिटाई थी, उस समय उसने निश्चय किया
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________________
७८२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण कि सारा संसार स्वार्थी है । अपनी प्रशस्ति में चक्रवर्ती ने लिखा था :-~
नप्ता श्री नाभिराजस्य पुत्रः श्रीवृषभेशिनः । षट् खंडमंडितामेनां यः स्म शास्त्यलिलां महीं ॥१६१२॥
जो नाभिराज का पौत्र है, श्री वृषभदेव का पुत्र है, जिस भरत ने छह खंडों से सुशोभित इस समस्त पृथ्वी का पालन किया है ।।
भत्वाऽसौ गत्वरी लक्ष्मी जित्वरः सर्वभूभृतां । जगद्विसत्यरी कोतिमतिष्ठिपदिहाचले ॥१६१३॥
जो समस्त राजनों की जीतने वाला है, ऐसे मुझ भरत ने लक्ष्मी को चंचल . समझकर विश्व में फोलने वाली कीर्ति को इस पर्वत पर स्थापित किया ।
इस प्रकार चक्रवर्ती ने अपना यश फैलाने वाली प्रशस्ति स्वयं अपने अक्षरों से लिखी थी, उस समय देवों ने चक्रवर्ती पर पुण्य वर्षा की थी । आकाश में दुन्दुभि बजी थी तथा देवताओं ने जय-जयकार किया था ।
इस वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस जगत में अमरिणत प्रतापी और पुण्यात्मा पुरुष हो चुके हैं। जिस तरह भरत महाराज ने एक चक्रवती का नाम अलग कर अपनी गौरव पूर्ण प्रशस्ति लिखी है । इस प्रकार भविष्य में कभी कोई चक्रवर्ती भरत महाराज का नाम भी मिटाये बिना न रहेगा । प्रत्येक जीव को मान कषाय छोड़कर मार्दव भाव को अपनाना चाहिए।
प्रश्न :- चक्रवतियों में भरतेश्वर का वैभव कैसा था ?
उत्तर :- व्यक्तिगत जीवन, परिवार प्रादि सब विशेष महत्त्वपूर्ण रहे हैं । प्रादिनाथ तीर्थकर के ज्येष्ठ पुत्र होने के साथ उनके द्वारा विद्या का अभ्यास करने का अद्भुत सौभाग्य था । इनके कुटुम्ब में अनेक व्यक्ति चरम शरीरी हुए हैं । आज जिन महावीर भगवान का भरत क्षेत्र में तीर्थ चल रहा है, उन वीर भगवान का जीव सम्राट भरत का पुत्र मरीचिकुमार के रूप में विद्यमान था । सम्राट के पुत्रों में विवर्धन आदि ६२३ राजकुमार अद्भुत चारित्र वाले थे। उन्होंने नित्य निगोद की अवस्था को छोड़कर कर्म भार हल्का होने से मनुष्य पर्याय प्राप्त की थी और आदिनाथ भगवान के समवशरण में धर्मोपदेश सुनकर रत्नश्रय से अलंकृत मुनि, पदवी को धारणकर अल्प समय में ही मोक्ष प्राप्त किता था । मूलाराधना टीका में इस विषय का इस प्रकार वर्णन किया गया है ।
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अध्याय : नौवां 1
। ७८३ अनादिकालं मिथ्यात्वोदयोद्रेकात् नित्यनिगोदपर्यायमनुभय भरतक्रिया: पुनः भूत्वा भद्र-विवर्धनादयस्त्रयोविंशत्यधिक्रनवशतसंख्या: पुरुदेवपादे श्रुत धर्मसारा: समारोपितरत्नत्रया: अल्पकालेनैव सिद्धाः" (पृ० ६६ मूलाराधना) ।
हरिवंश पुराण सर्ग १२ में भी उक्त बात का उल्लेख पाया है :अहष्टपूर्वतीर्थेशाः प्रविष्टाः समवस्थितिम् । कदाचिच्चकिरणा सार्धं विवर्धनपुरोगमाः ॥१६१४॥ क्लिष्टा स्थावरकायेष्वनाविमिथ्यात्व दृष्टयः। दृष्ट्वा भगवतो लक्ष्मी राजपुत्राः सुविस्मिताः ।।१६१५॥ अंतर्मुहूर्तकालेन प्रतिपन्नसुसंयमाः । त्रयोविशान्यहो चित्रं शतानि नभिर्बभुः ।।१६१६॥
भद्र-विवर्धन आदि राजपुत्रों का चारिन किस मानव के हृदय में प्रात्मविकास का प्रेम उत्पन्न न करेगा।
स्वयं भरतेश्वर का आध्यात्मिक जीवन मुमुक्षु वर्ग के लिए चमत्कार का जनक रहा है । चक्रवर्ती ने मुनि पदवी धारण करते समय केशों का लोच किया था, और तत्काल ही भरत, जो कुछ समय पूर्व लौकिक साम्राज्य के स्वामी थे, अब क्षण में केवल ज्ञान साम्राज्य के स्वामी हो गये । बत्तीस इन्द्रों ने भगवान भरत की पूजा की, मोक्ष मार्ग के दीपक केवली भरत ने बहुत समय तक इस पृथ्वी पर विहार कर कैलाश पर्वत से निर्वाण प्राप्त किया। निर्धारण दीक्षा लेने के अल्पकाल के पश्चात् उन्होंने सर्वज्ञता प्राप्त करने में सभी तीर्थंकरों की अपेक्षा अंदद्भुत विशेषता प्रदर्शित की। हरिवंशपुराण में भरत मुनिराज के विषय में ये पद्य महत्वपूर्ण हैं ।
पंचमुष्टिभिस्पाट्य ट्यत्बंधस्थितिः कयात् । लोचानन्तपमेवापद राजन श्रेणिक! केवलम् ।।१६१७॥ द्वात्रिशनिवशेन्द्रः स, कृतकेवलपूजनः । दीपको मोक्षमार्गस्य, विजहार चिरं महीं ॥१६१८।। प्रश्न :-हुंडाक्सपिरणी काल की अद्भुत घटनाएँ कौनसी हैं ?
उत्तर :- सप्त परम स्थानों में प्रतिपादित साम्राज्य पदवी के स्वामी होते हुए भी चक्रवर्ती भरतेश्वर का बाहुबलि स्वामी द्वारा पराजय होना आश्चर्य की वस्तु लगती है, किन्तु आगम में बताया है कि असंख्यात उत्सपिरणी अवसर्पिणी के पश्चात्
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७६४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
आने वाले डtaff काल में ही ऐसी अभूतपूर्व घटनाएँ होती हैं। जिन शासन के मध्य में विपरीत अनेक मतों की उत्पत्ति होता, वस्त्र धारण करके निंदनीय सग्रंथ गिधारी संप्रदाय का प्रादुर्भाव, जिनेन्द्र भगवान पर उपसर्ग होना, चक्रवर्ती का मान भंग, कुदेव, उनके मठ, उनकी मूर्ति आदि का होना, अनेक मिथ्या शास्त्रों का निर्वाण होना तथा भरत का बाहुबलि द्वारा मानभंग सदृश कार्य हुए हैं। कहा भी है जिनशासनमध्ये स्युः विपरीता मतान्तराः ।
atararaar निद्याः सग्रन्थाः संति लिंगिनः ॥१६१६॥ उपसर्गाद्रा, मानश्च चक्रिरणाम् ।
कुदेव - मठ - मूर्त्यांचा: शास्त्राणि श्रनेकशः ॥ १६२०॥ इस सम्बन्ध में यह भी गाथा प्रसिद्ध है।
हुंडा पोकाले खियमेण भवंति पंचपावंडाः । afteहरमा मंगो उवसगो जिणवरिवारणं ।। १६२१||
भरत बाहुबलि आदि का उपरोक्त वर्णन भूतपूर्व नैगमनय की अपेक्षा से किया जाता है | आज तो वे सभी समान श्रात्मगुणों से शोभायमान सिद्ध परमात्मा रूप में ईषत्प्रागभार नाम की अष्टम पृथ्वी पर विराजमान हैं। वह स्थान सर्वार्थसिद्धि से केवल द्वादश योजन दूरी पर स्थित है ।
प्रश्न :- चक्रवर्ती के चार प्रकार की राजविद्या कौनसी है ?
उत्तर :- - ( १ ) ग्रान्वीक्षिकी अपना स्वरूप जानना, अपना बल पहिचानना, अच्छा बुरा समझ लेना, सच्चा झूठा समझ लेना, रत्न परीक्षक जिस तरह रत्न की परीक्षा करता है, उसी तरह पहिचानना ।
(२) त्रयी - शास्त्रानुसार धर्म-अधर्म समझ कर, अधर्म छोड़ देना और धर्म में प्रवृत्ति करना ।
(३) बार्ता - अर्थ - अनर्थ को समझकर प्रजाजनों का रक्षण करना । (४) दंडनीय - दुष्ट दण्डनीयादि । (देखो महापुराणपर्व ४ )
प्रश्न :- चक्रवती के पांच इन्द्रियों का विषय बल स्वरूप कंसा है ? - ( १ ) स्पर्शवेन्द्रिय से ६ योजन तक का विषय जान लेते हैं । (२) रसनेन्द्रिय से
उत्तर :--
(३) पारणेन्द्रिय से
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अध्याय : नौवां ।
[ ७८५
(४) चक्षुरिन्तिम से ४३२६६ ७ अटे २३ पोजन तक देख सकते हैं।
(५) श्रोत्रेन्द्रिय से १२ योजन तक का शब्द सुनते हैं । चक्रवर्ती के ७ अंगवलों का स्वरूप--
१. स्वामी, २. अमात्य, ३. देश, ४. दुर्ग, ५. खजाना (कोश), ६. षडंग बल, ७. मित्र (सुहत्) इस प्रकार सात अंगवल होते हैं। चक्रवर्ती का षडंग (६ प्रकार का) बल--
१. ८४ लाख भद्र हाथी होते हैं, २. ८४ लाख रथ होते हैं, ३. १८ करोड़ जातिवंत (सुलक्षण ) घोड़े होते हैं, ४.८४ करोड वीर भट (पैदलसैनिक) होते हैं। ५. असंख्यात विद्याधर सैन्य होते हैं, इस प्रकार चक्रवर्ती का षडंगबल समझना चाहिये। चक्रवर्ती के दशांग भोग--
१. दिव्यपुर (पट्टण), २. दिव्यभाजन, ३. दिव्यभोजन, ४. दिव्यशटया, ५. दिव्यग्रासन, ६. दिव्यनाटक, . ७. दिव्यरत्न, ८. दिव्य निधि, ६. दिव्यसैन्य, १०. दिव्यवाहन इस प्रकार दशांग भोग होते हैं। चक्रवर्ती की नवनिधि और उनकी फलवान शक्ति
१. कालनिधि-ऋतु के अनुसार नानाविधि पदार्थ देने वाला होता है । २. महाकालनिधि-नानाविधभाजन पदार्थ देने वाला होता है। मारण्वक
आयुध पिंगल
आभरण नैसर्घ , मन्दिर ६.. पद्य
वस्त्र ७. पांडुककाल निधि नानाविध धान्य पदार्थ देने वाला होता है। . ८. शंख , वादित्र
. ६. सर्वरत्न (नानारत्न) निधि - नानाविधरत्न देने वाला होता है ।
ये सब निधिया नदीमुख में उत्पन्न होती रहती हैं। चक्रवती के १४ रत्न और उनको फलदान शक्ति
चक छत्रमसिदडो . मणिश्चर्म च काकिणों। गृह सेनापतिस्तक्षा पूरोधोऽश्वगजस्त्रियः ।।१६२२॥
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७८६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि १. अयोध्या-सेनापति रत्न-सेनानायक-आर्यखंड और उत्तम, मध्यम म्लेच्छखंड
सिवाय अन्य दिग्विष्टरों को जीतने वाला सेनापति रत्न । भद्रमुख हर्म्यपति-गृहपतिरत्न - भंडारी-राजमहल का व्यवहार चलाने वाला और हिसाब-किताब रखने वाला गृहपति रत्न होता है । बुद्धिसमुद्र-पुरोहितरत्न-सबको धर्म-कर्मानुष्ठान पूर्वक मार्गदर्शन कराने वाला
पुरोहित रत्न होता है। ___ कामवृष्टि-रथपति-तक्षकरत्न-उत्तम कारीगर-चक्रवर्ती के आलोचनानुसार
महल, मंदिर, प्रासाद आदि को तैयार करने वाला तक्षकरन । ५. सुभद्रा-सुति-स्त्रीरत्न चक्रवती के ६६ हजार स्त्रियों के सिवाय जो मुख्य
पट्टरानी होती है, वह ही स्त्रीरत्न है । विजयागिरि गजपतिरत्न-अरिनपों के गजघटाओं का विघटन करने वाला
गजरत्न होता है। ७. पवनंजय-प्रश्वरत्न--तिमिश्र गुफा के कपाट को विघटन करते समय १२ योजन
दौड़ने वाला अश्वरत्न होता है। इस प्रकार यह ७ सजीव रत्न कहलाते हैं। सुदर्शन-चतु-प्रायुध-बैरियों का संहार (अभाव) करने वाला चक्ररत्न होता है। सूर्यप्रभ-छत्ररत्न-आयुध--- सैन्यों के ऊपर आने वाली बाधाओं को दूर करने वाले छत्ररत्न होते हैं । भद्रमुख-असि-खंगरत्न-पायुध--चक्रवतियों के चित्तोत्सव को करने वाले असिरत्न होते हैं। प्रवृद्धवंग-दण्ड रत्न-पायुध---चक्रवतियों के सैन्य की जमीन को साफ कर देने वाला दण्डरल्न । चित्ताजननी-काकिणीरत्न---गुफा प्रादि में रहने वाले अंधकार के स्थानों में चन्द्रादित्यों के समान प्रकाश देने वाला काकिणीरत्न होता है। चूडामगिरत्न-रत्नविशेष:- इच्छित पदार्थ को देने वाला चूडामणि रत्न
चर्मरत्न--सैन्यादिकों को नद और नदी से सुरक्षित रीति से पार करा देने बाला चर्मरत्न होता है।
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अध्याय : नौवां ।
[ ७६७ इस प्रकार ७ अजीव रत्न कहलाते हैं। इनमें एक से लेकर पांच तक अजीव रत्न अपने-अपने नगरों में उत्पन्न होते हैं और ६ और ७ विजयार्थ पर्वत में उत्पन्न होते हैं । नम्बर ८ से ११ तक प्रायुधशाला में उत्पन्न होते हैं । नम्बर १२ से १४ तक के रत्न श्री देवी के मन्दिर में उत्पन्न होते हैं। इन १४ महारत्नों में प्रत्येक रत्न का रक्षण एक-एक हजार यक्ष देवता किया करते हैं । चक्रवर्ती के स्वामित्व का स्वरूप --
चक्रवर्ती का ३२ हजार राजाओं पर स्वामित्व होता है । उन राजाओं के लक्षण निम्न प्रकार समझना चाहिये।
नृपति-जो समस्त नर अर्थात् मनुष्यों का रक्षण करने वाला हो, वही नृप या नृपति कहलाता है।
भूप- समस्त पृथ्वी का जो रक्षक हैं, वह भूप या भूपति कहलाता है।
राजा-~जो समस्त प्रजा जनों को राजी रखने काला है, वही राजा कहलाता है। इन राजानों के छह गुण होते हैं
१. संधि-मिलाप (अपसात), २. विग्रह -युद्ध, ३. यान:- वाहन, ४. प्रासनमुक्काम, ५. संस्थान - वचनों की दृढ़ता (वाचनिक), ६.. पाश्रय = आधार इसके दो भेद होते है, जो अपने से प्रवल रहे उसका प्राश्रय लेना, और जो अपने प्राधीन रहे उसे आश्रय देना अति शरणागतों का प्रतिपालन करना । यही राजा के छह गुरग समझना चाहिये। राजाओं के कर्तव्य कर्म
१. प्रात्मपालन करना-अर्थात् राज्य करने वालों को प्रथम अपनी आत्मा का पालन करना चाहिये । अर्थात् स्वतः के प्रारी का रक्षा करना चाहिये ।
२. मतिपालन करना-अर्थात् अपनी बुद्धि निर्मल रखनी चाहिये । ३. कुल पालन करना--अर्थात् राजकुलाचारादि संभावना चाहिये ।
४ प्रजा-पालन करना- अर्थात् पुत्र के समान प्रजाजनों की रक्षा करनी चाहिये ।
शिष्टों का संरक्षण और दुष्टों का निग्रह करना चाहिये।
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THANE
[ गो. प्र. चिन्तामणि उपरोक्त गुण युक्त राजाओं की १८ श्रेणियां होती हैं, उनका स्वरूप----
१. सेनापति - सेना का नायक, २. गणपति ज्योतिषी पादिकों का नायक, ३. वरिणपति – व्यापारियों का नायक, ४. दण्डपति = समस्त सेना का नायक, ५. मंत्री--पंचांगमंत्र विषय में प्रवीण, ६. महत्तर =कुलवान अर्थात् कुल विशेष उच्चता, ७. तलवर-कोतवाल का स्वामी, ८. ब्राह्मण, ६. क्षत्रिय, १०. वैश्य, ११. शुद्र=इन चार वरों का स्वामी, १२. हाथी, १३. घोड़ा, १४. रथ, १५. पदाति -- इस चतुरंग बलों का स्वामी, १६. पुरोहित - प्रात्महित कार्य का अधिकारी, १७. अमात्य-देश का अधिकारी, १८. महामात्य - समस्त राज्य कार्यों का अधिकारी
। इस प्रकार जो १८ श्रेणियों का स्वामी है, वही 'राजा' है । और वही 'मुकुटधारी' हो सकता है । इसी तरह--- ..
जो पांच सौ मुकुटधारी राजाओं का स्वामी है, वह 'अधिराजा' कहलाता है। जो एक हजार
वह 'महाराजा' , जो दो हजार ,
वह 'मुकुटबद्ध' या 'अर्धमाड
लिक' कहलाता है। जो चार हजार ,
वह 'मांडलिक' कहलाता है । जो पाठ हजार .,
वह 'महामांडलिक , जो सोलह हजार ,
वह अधंचकी - जो ३२ हजार
वह 'सकल चक्रवर्ती , __ अर्थात् षट्खंड पृथ्वी का (भरत खंड का) अधिपति होता है। इस प्रकार श्रेणी बद्ध चक्रवर्ती का राज्य निराबाध चलता रहता है।
षट्लंड मंडित भरतखंड के एक-एक देश में रहने वाले अलग-अलग नामादिकों की संख्या और नामादि लक्षणग्रामादिकों की संख्या
ग्रामादिकों के नामादि लक्षण--
१. ग्राम ६६ करोड़ रहते हैं।
जिस गांव के चारों ओर दीवाल (कोट) होता है, उस गांव को 'ग्राम' कहते हैं। जो गांव के चारों ओर दीवान और चार दरबाजों से संयुक्त है उस गांव को नगर कहते हैं ।
२. नगर ७५ हजार रहते हैं।
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अध्याय : नौवां ]
३. स्वेट ७६ हजार रहते हैं ।
४. सर्वड २४ हजार रहते हैं ।
५, मडम्ब ४ हजार रहते हैं ।
६. पट्टण ४८ हजार रहते हैं ।
७. द्रोण ६६ हजार रहते हैं । ८. संवाहन ७४ हजार रहते हैं ।
8. दुर्गाटवी २८ हजार रहते हैं ।
[
नदी और पर्वतों से वेष्ठित रहने वाले गांव को 'खेट' कहते हैं ।
पर्वतों से वेष्ठित गांव को 'खर्वड' कहते हैं । हरेक पांच सौ ग्राम संयुक्त रहने वाले गांव की 'स्व' कहते हैं |
जहां रत्न उत्पन्न होते हैं, उस गाँव को 'पट्टा' कहते हैं ।
नदी से वेष्ठित हुए ग्राम को 'द्रोण' कहते हैं । उपसमुद्र के तट पर रहने वाले ग्राम को 'संवाहन' कहते हैं ।
पर्वतों पर रहने वाले गांवों को 'दुर्गावी' कहते हैं ।
एक-एक देश में एक-एक समुद्र रहता है। उन समुद्रों में टापू प्रर्थात् ५६ अन्तद्वीप हैं और जहां रत्न उत्पन्न होते हैं, ऐसे २६ हजार रत्नाकर (समुद्र) हैं, और रत्न बिक्री के स्थान भूत ऐसे ६०० प्रत्यन्तर कुक्षी हैं और ७०० प्रत्यन्तर कुक्षीवास हैं, और ८०० कक्षा हैं। भरत खंड के मुख-नगर (राजधानी) दोनों नदी (गंगा और सिन्धु महानदी ) के बीच में विद्यमान श्रार्य खंड में होता है । चक्रवर्ती के परिवारादि वैभवों का वन
१. चक्रवर्ती के एक पट्टरानी के सिवाय सौर १६ हजार स्त्रियां होती हैं । इनमें आर्य खंड की ३२ हजार राजकन्याएं होती हैं, ३२ हजार विद्याघर- राजकन्यायें और म्लेच्छ खंड की ३२ हजार राजकन्याएं होती हैं । इस प्रकार सब मिलकर ६६ हजार स्त्रियां होती हैं ।
२. चक्रवर्ती रात्रि के समय अपनी पट्टरानी के महल में ही रहते हैं परन्तु पट्टरानी के पुत्र, संतान नहीं होतीं है, वह बंध्या ही रहती है। इसकी शंखावर्त योनि होने से इस योनि में वंशोत्पत्ति नहीं होती है । चक्रवर्ती अपनी पृथक् विक्रिया की सहायता से अपने शरीर के अनेक रूप धारण कर सकते हैं, इसलिये उनकी अन्य स्त्रियों को पुत्रादिक होते रहते हैं ।
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७६० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
।
३. चक्रवती के पुत्र-पुत्रियां संख्यात हजार होते हैं । ३ करोड ५० हजार बन्धु
वर्ग (भाई बन्ध) होते हैं । ३६१ शरीर वैद्य ३६१ इतर वैद्य होते हैं । ३६० अङ्ग रक्षक होते हैं । २६० स्वयंपाकी (रसोई वाले) होते हैं।
और १४ रत्न होते हैं। ४. चक्रवर्ती पर ३२ यक्षदेव ३२ चामर दुराते रहते है । ५. बारह योजन तक सुनाई देने वाले २४ शंख २४ भेरी (नगाड़ा) २४
पटह (वाद्य विशेष) होते हैं । ६. ३२ हजार नाट्य शालायें और ३२ हजार संगीतशालायें होती हैं । ३२ हजार देश और उन प्रत्येक देश के ३२ हजार मुकुटधारी राजाओं पर स्वामित्व होता है। इसी तरह १५ हजार मात्रद देवों का स्वामी
और ८८ हजार म्लेच्छ राजाओं का स्वामी होता है। ७. एक आर्य खंड और पांच म्लेच्छ खंड इस प्रकार छह खंड पृथ्वी के
स्वामी रहते हैं । एक करोड़ 'हल' होते हैं, ३ करोड़ गो मण्डल अर्थात् गौ रहने के स्थान होते हैं। इससे सिद्ध होता है कि मौ तीन
करोड़ से ज्यादा ही होती है। ८. भरत चक्रवर्ती के एक करोड़ सोने के थाल थे, ऐसा कोई कहते हैं; परन्तु
वे दाल चावलादि धान पकाने के बर्तन थे । क्योंकि श्लोक में 'स्थाली' शब्द है, उसका अर्थ गगरी (बर्तन) ऐसा होता है, इसलिए वे थाली न रहकर बड़े-बड़े बर्तन थे ऐसा सिद्ध होता है। (देखो आदि-पुराण पर्व ३७)।
भरत चक्रवर्ती के १६ स्वप्न
RESED
स्वप्न दर्शन
स्वप्न का फल
१. तेईस सिंहों को देखा जो कि इस श्री महावीर स्वामी को छोड़कर बाकी पृथ्वी पर अकेले ही बिहार कर तेईस तीर्थंकरों के समय में दुष्ट नयों की
पर्वत के शिखर पर चढ़ गये थे। तथा मिथ्याशास्त्रों की उत्पत्ति नहीं होगी। २. अकेला सिंह का बच्चा देखा और श्री महावीर स्वामी के तीर्थ में परिग्रह को
Media
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अध्याय : नौवां ]
[ ७६१ उसके पीछे-पीछे चलते हुए हरिण धारण करने वाले बहुत से कुलिंगी वा अन्य देखे ।
भेषधारी हो जायेंगे । ३. बड़े हाथो के उठाने योग्य बोझ पंचकाल में साधु लोग तपश्चरण के समस्त
से जिसकी पीठ टूट गई है, ऐसे गुणों को धारण करने के लिये समर्थ नहीं घोड़े को देखा।
होंगे । मूलगुण और उत्तरगुरणों के पालन करने की प्रतिज्ञा लेकर भी कोई उनके पालन करने में पालस करने लगेंगे, कोई मल से संब गुणों को ही नष्ट कर देगे और कोई मन्दता वा उदासीनता धारण
करेंगे। ४. वृक्ष, लता तथा छोटे पौधों के सुखे आगे के (पंचम काल) लोग सदाचार को __ पत्तों को खाते हुए बहुत से बकरों छोड़कर दूराचारी हो जायेंगे ।
के समूह को देखा। ५. हाथी के कन्धे पर बैठे हुए बन्दर प्राचीन क्षत्रियों के वंश का नाश हो को देखा।
जायगा और फिर नीच कुल वाले इस
पृथ्वी का शासन वा पालन करेंगे। • ३. अनेक कौवा और पक्षी जिन्हें लोग जैन मुनियों को छोड़कर धर्म की __श्रास दे रहे हैं, ऐसे उल्लू को इच्छा से अन्य मतियों के साधुओं के समीप देखा।
जायेंगे। ७. बहुत से भूतों को नाचते हुए प्रजा के लोग नामकर्म आदि कारणों से देखा।
व्यन्तरों को देवता मानकर पूजा सेवा
आदि करेंगे। ८. जिसके बीच की जगह सूखी पड़ी यह धर्म प्रार्य क्षेत्र में न रहकर म्लेच्छ देश
है और किनारों पर चारों ओर के लोगों में रहेंगा । खूब पानी भरा हुआ है ऐसा । तालाब देखा । ६. धूल से मैली हो रही है, ऐसी पंचमकाल में मुनिलोग शुक्लध्यान, ऋद्धि
रत्नों की राशि को देखा। ग्रादि से विभूषित उत्तम नहीं होंगे।
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BALADEDNESAMEET
[ गो. प्र. चिन्तामणि १०. आदर सत्कार से जिसकी पूजा अवती ब्राह्मण गुरणी पात्रों के समान प्रादर
को जा रही है, ऐसा नैवेद्य खाता सत्कार पावेंगे ।
हुने कुत्ते को देखा। ११. शब्द करता हुने एक तरुण बैल लोग तरुण अवस्था में ही मुनिपद धारण - को बिहार करते हुये देखा। करेंगे वृद्धावस्था में धारण नहीं करेंगे। १२. सफेद परिमंडल (चारों ओर पंचमकाल में मुनियों के अवधिज्ञान और
गोल सफेद रेखा) से घिरा हुआ मनःपर्यय ज्ञान उत्पन्न नहीं होंगे।
है, ऐसा चन्द्रमा देखा। १३. जिन्होंने आपस में मित्रता की है पंचमकाल ने मुनि लोग साथ-साथ रहेंगे
(परस्पर मिलकर जा रहें हैं) एकाविहारी (अकेले विहार करने वाले) तथा उनकी शोभा नष्ट हो रही नहीं होंगे।
है, ऐसे दो बल देखे । . १४. सूर्य को बादलों से ढका हुआ पंचमकाल में प्रायः केवल ज्ञानरूप सूर्य का देखा।
उदय नहीं होगा। १५. छाया रहित सूखा वृथा देवा पुष और विनों के समाचार प्रायः भ्रष्ट
हो जायेंगे। १३. पुराने पतों के समूह को देखा। महा प्रौषधियों का रस अर्थात् गुण नष्ट,
हो जायेगा ।
-कातालानगरमility
7-
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ACTRESERE
इस स्वप्नों को इस प्रकार फल देने वाले और दूर अर्थात् प्रामाभी पंचम काल में फल देने वाले जानना । इस प्रकार वर्णन महापुराण एवं ४१ में लिखा है । ६. नारायण--इनको वासुदेव, केशव, गोविन्द हरि ऐसा भी कहते हैं
नारायणों के पूर्व के तीन भवनारायरणों के नाम पिछले तीसरे भव के वहां की नगरियों वहां के गुरुत्रों के
वहां के नाम के नाम नाम
SSAY
ANTA
ANTAR UNIA
१. विषिष्ट (त्रिपृष्ट) विश्वनन्दी
.
हस्तिनागपुर . .
संभूत
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अध्याय : नौवां ]
[ ७६३
सुभद्र यसुदर्शन श्रेयांस
भूतिसंग
२ द्विपिष्ट (द्वियुष्ट) . पर्वत
अयोध्या ३ स्वयंभू
धनमित्र
श्रावस्ति ४ पुरुषोत्तम
सागरदत्त
कौशाम्बी ५ नरसिंह (पुरुषसिंह) विकट
पोदनपुर ६ पुंडरीक (पुरुषवर) प्रियमित्र
शैलनगर ७ दत्त (पुरुषदत्त) . मानचेष्टित सिंहपुर ८ लक्ष्मण
पुनर्वसु
कौशाम्बी
गंगादेवी (निर्णामिक) हस्तिनागपुर इसके शेष बिन्दु पृष्ठ ७६५-६६ पर हैं।
वसुभूति धोपसेन परांभोधि द्रुमसेन
प्रतिनारायण-इनको प्रतिवासुदेव, प्रतिशत्रु और प्रतिहरि ऐसा भी कहते हैं।
क्रमांक । प्रतिनारायणों के
नाम
राजधानी का
नाम
शरीर की ऊं. | प्रायु प्रमाण ! (धनुष)
वर्ष
-प्रश्वग्रीव
तारक
अलकापुर विजपुर नन्दनपुर
marianmantra+
मेरक
८४ लाख ७२ लाख ६० लाख ३० लाख १० लाख
निशंभु प्रल्हाद (प्रहरण) मधुकैटभ बली
हरिपुर सिंहपुर पृथ्वीपुर -
६.
NENRITEकामा-
सूर्यपुर .
.
३२ ,
लंका राजगुही .. . . १०१
६.
जरासंधं
,
मामmREPenscreetm.
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७६४ ]
कौन-कौन से तीर्थकाल में हुए ।
नारायणों का जो काल है, वही इन प्रतिनारायणों का समझना
चाहिये ।
आगे कौन सी गति प्राप्त की है ?
सूचना-६ प्रतिनारायाण
४.
७ नरक गये।
६ वें
77
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५. व
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३.
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[ गो. प्र चिन्तामरिए
भविष्यत्काल में होने अतीत काल के वाले प्रतिनारायणों के नाम
६ प्रतिवासु देवों के नाम
५
..
श्री कंठ
हरिकंठ
नीलकंठ
अवकंठ
सुकंठ
शिखिकंठ
अस्वग्रीव
हयग्रीव
मयूरग्रीव
€
निशुभ
विद्युत्प्रभ
धनरसिक
मनोवेग
चित्रवेग
यह प्रतिनारायण पद नरक में से आने वाले जीवों का भी प्राप्त नहीं हो सकता है
२.
ये सब ही प्रतिनारायण अधोगामी अर्थात् अधोलोक जाने वाले होते हैं । इनमें जरासंध भूमि गोचरी थे, बाकी सब विद्याधर थे ।
रावण की लंका कहाँ है ? वर्तमान सिंहलद्वीप को बहुत से लोक 'लंका' म है, परन्तु इसे रावण की लंका नहीं समझना चाहिये । लवणोदधि समुद्र में सात सौ योजन लम्बा चौड़ा एक 'राक्षस' नाम का द्वीप है, उस द्वीप के मध्य भाग में मै पर्वत के समान 'fafe कूट' अथवा 'चित्रकूटाचल' नाम का एक पर्वत हैं । वह पर्वत योजन ऊँचा और ५० योजन सम्बा चौड़ा है। उस पर्वत पर ३० योजन प्रमाण 'लंका' नाम की नगरी अत्यन्त
दृढ़रथ
वज्र जंघ
विद्युदन्ड
प्रल्हाद
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________________
पिछले भव के स्वगों के नाम कहां से आए
P
महागुक्र स्वर्ग पौदनापुर.
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31
राजधान
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सहस्त्रार
ब्रहा..
चक्रपुर
कुमायपुर
महेन्द्र सौधर्म मिथिलापुर सनत्कुमार स्वर्ग अयोध्या
महाशुक्र "
मथुरा
"
प्रजापति
द्वारकापुर ब्रह्मभूत ferornपुर रौद्रनन्द
सौम
प्रख्यात
"
0
जनक (पिता)
5
सभी नारायण
शिवाकर
दशरथ
वसुदेव
जननी, (माता)
€
भृगावती
'माधवी
पृथिवी
सीता
श्रम्बिका
लक्ष्मी
केशिनी
सुमित्रा
देवकी
शरीर की
ऊंचाई
(धनुष )
१०.
५०
७०
なる
४५
२६
२२
जन्म भूमि
१६
१०
प्रर्धचक्री होते हैं
कुमार काल मांडलिकराजा विजय कान वर्ण वर्ष- वर्ण
११
२५०००
२५०००
१२५००.
७००
३००
२५०
२००
१००
१६
१२
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२५०००
१२५००
१३००.
१२५०
२५०
५०
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५६
१३
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१००
६०
८०
७०
६०
५०
४०
५
अपूर्ण आयुकाल पदानियों राज्य म प्रमाण के नाम
वर्ष
काल प्रमा वृष
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१५
१२००० १२
१००० १
८३४६००० ८४ लाख व सुमद्रा
'७१४१६०० ७२
रुपिणी
५६७४६१०. ६०
भवा
२६६७६२०.३०
६६०३५० १०
६४४४० ६५ हजार,
३२००० ३२
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१५
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मनोहरा
" आनन्दवती
प्रभावती
रुक्मिणी
सुनेवा
विमलसुन्दरी
अध्याय नौवां ]
[ ७६५
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________________
७६६ }
[ गो. प्र.चिन्तामणि सुन्दर है । पद्मपुराण में कहा है कि भीम, महाभीम नाम के यक्षों ने 'मेघनाद' विद्याधर से कहा था कि हम लंकापुरी प्रापको देते हैं । आप वहां सुख से रहना । यही आगम कथित रावण को 'लंका' समझनी चाहिये । लंकामें
लंका नाम से प्रसिद्ध अन्य स्थान भी हो सकते हैं। ५. इन पर सदाकाल १६ चमर हुरते रहते हैं । ६. रावण को 'राक्षस' समझना अज्ञान है । वे विद्याधर थे 'राक्षस' नामक द्वीप
में रहते थे। इसी तरह रावण को 'दशकंठ' समझना भी अज्ञान है ।
।
LOAD
कौन-कौन से तीर्थकरों के तीर्शकाल में हुए है?
आगे कौन सी गति प्राप्त की है ?
.
भविष्यकाल में होने| अतीत काल के वाले नारायणों | नारायणों
के नाम के नाम:
20
था।
काकुत्स्थ वरभद्र
..
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७ में नरक गये . नन्दी
नन्दीमित्र नन्दीषण नन्दीभूति
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बलदेवों का जो तीर्थकाल है, वही नारायणों का तीर्थकाल समझना
चाहिये।
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संश्लिष्ट वरवीर शत्रु जय दमितारि प्रियदत्त विमलवाहन
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महाबल अतिबल त्रिपृष्ट द्विपृष्ट
४ थी भूमि , ३ री भूनि ,
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सूचना-६ नारायण सम्बन्धी--- .. १. यह नारायण पद नरक में से आने वाले जीवों को कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता ... है, ऐसा नियम है।
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________________
अध्याय : नौवां ]
[ ७६७ २. ये सब ही नारायण अधोगामी अर्थात् 'रत्नप्रभा आदि भूमियों में जाने वाले
३. इन पर सदाकाल १६. चमर ढुरते रहते हैं। ४. इनके सात प्रकार के प्रायुध अर्थात महारत्म होते हैं
(१) सुनन्दक का नाम का खड्ग (२) पांचजन्य नाम का शंख । (३) शाङ्ग नाम का धनुष (४) सुदर्शन नाम का चक्र (५) कौस्तुभ नाम का मरिण
(६) अमोघा नाम की शक्ति । (७) कौमुदी नाम की गदा होती है । ५. राजा शिशुपाल ने कृष्ण नाम के नारायण को रुक्मिणी का हरण करते समय
एक सौ गालियां दी। तदन्तर कृष्ण ने उनको मारा । इस प्रकार हरिवंश पुराण
में वर्णन आया है । ६, 'त्रिपिष्ट' नाम का पहला नारायण (हरि) का जीव 'वर्धमान' तीर्थीकर होकर __ मुक्त हुआ है । इस प्रकार उतर पुराण पर्व ७४ में लिखा है। ७. 'लक्ष्मण नाम का ८ वां नारायण (हरि) का जीध पुष्करार्द्ध द्वीप के विदेह क्षेत्र
में जन्म लेने वाला है। इस प्रकार पद्मपुरागर पर्व १०६ में लिखा है । ८, कोटिशिला या कोटिकशिला पाठ योजन लम्बी चौडी और एक योजन ऊँची होती है । इसको सिद्ध शिला भी कहते हैं---
नाभिगिरिशिरोदेशे शिला योजनमुत्थिता। . अष्टयोजनविस्तीरसिध्वस्थानं मुनीशिनाम् ॥ इस कोटि शिला को हर एक नारायण (हरि) अपनी भुमाओं से उठाते हैं।
कौन नारायण ने कहां तक उठाई थी उसका वर्णन(१) विपृष्ट महापुरुष ने वह शिला मस्तक के ऊपर जहां तक कि भुजा पहुँचती है,
वहां तक उठायी थी। (२) द्विपृष्ट ,
वह शिला मस्तक तफ उठाई थी। (३) स्वयंभू
कंठ तक , (४) पुरुषोत्तम ,
.. .... - वक्षस्थल तक ॥ (५) पुरुषसिंह ,
हृदय तक ........ (६) पुंडरीक ,
कमर तक ,
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________________
७६ ]
[गो. प्र. चिन्तामणि . (७) दत्तक
जंघा तक (८) लक्ष्मण
, घोटे तक , (६) कृष्ण
, चार अंगुल ऊँचे तक उठाई थी। इस प्रकार हरिवंश पुराण के वेपनवें सर्ग में लिखा है।
नारद--
क्र. | नारदों के नाम
विशेष
भीम
१ नारायणों का जो तीर्थकाल है, वही इनका समझना । महाभीम २ यह नारद पद नरक में से पाने वाले जीवों को कभी
य नारट पट में - रौद्र (रुद्र) . . भी प्राप्त नहीं हो सकता है . . . महारौद्र ३ सब ही नारद अधोगामी अर्थात् अधोलोक जाने वाले काल
होते हैं । महाकाल . ४ सब ही कलहप्रिय होते हैं और धर्म विषय में भी रत दुर्मस्व .. होते हैं, सब ही भव्य होने से परंपरा से मुक्तिगामी होते नरमुख
हैं । वर्तमान में सभी हिंसा दोष से अधोलोक जाते हैं। अधोमुख ५ इनके शरीर की ऊँचाई, आयु आदि के विषय में सामग्री
उपलब्धि नहीं हो सकने से नहीं दे सके हैं।
। आमाको भूमिका ___ क्षमावान ही वीर है, क्षमावान हो घोर
क्षमा-खड्ग हो हाथ में हरे हृदय की पीर ॥ क्षमा ढाल.हो हाथ में, साहस की तलवारशत्रु मित्र हो जायगा, कौन करेगा चार ॥
%
CENTRVATSAPNESS
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________________
९ बलदेव-इनको बलभद्र, रामचन्द्र, राम ऐसा भी कहते हैं
बलभद्रों के पूर्व के तीन भवान्तर-- जन्मभूमि--
अध्याय : नौवां ]
शिरीर की
पिछले तीसरेपिचले तीसरे |
वहां के उनके पिछले भव के. क्रमांक / बलदेवों के नाम भर के नगर भय का नाम
गरुनों के स्वादिकों के राजधानी
दक्षिा
जनक (पित्तजननी ।
के नाम ।
(धनुष)
सुधर्म [
मृगांक श्रुतिफीति
विजय पुडरीकिती बास अतार अनुसरविमान पौदनापुर प्रजापति भद्राभोजा सुवर्णकुम प्रचल पृथिवी मारुतदेय
वारकापुरी ब्रह्ममूत सुभद्रा सरयकीर्ति स] मानंदपुरी नन्दीमित्र सुभ्रत
हस्तिनागपुर रौद्रनन्द . सुवेषा सुधर्म मन्तपुरी महाबस वृषभ सहस्त्रार स्वर्ग
सौम सुदर्शना बीतशोका पुरुषर्षभ प्रजापाल
चक्रपुर प्रख्यात सुप्रभा
(खगपुर) ६ नन्दीषण विजयपुर सुदर्शन
" कुशाग्रपुर . विजया सुमित्र [प्रानंद] नन्दोमित्र मुसीमा सुवर सुधर्म ब्रह्मस्वर्ग मिथिलापुर मियाकर बैजयन्ती भवनश्रुत
क्षेमर श्री रामचन्द्र आरत , अयोध्या यशरथ अपराजित सुक्त ६ बलिराम हस्तिनागपुरः शंख - विद्रम महाशुक्र स्वर्ग मथुरा . वसुदेव रोहिणी सिद्धार्थ पभ
शौरीपर। १ यह बलदेव पद नरक से पाने वाले जीवों को नहीं प्राप्त होता है। २ सब ही बलदेव ऊगामी अर्थात स्वर्ग और मोक्ष जाने वाले होते हैं। ३ बलदेवों के पांच रस्त अर्थात प्रायुध होते हैं।
[१] [रत्नमाला) हार] [२] लागल अपराजित हल [३] मूसल [३] स्यनन्दन [दिब्ध गदा कोई रथ भी कहते हैं । [५1 रिक-ये पांच रन क्रीड़ा मात्र से शवों का मान मर्दन करने काले वलदेवों के होते हैं।
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________________
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आयु प्रमाण
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१
८७ लाख वर्ष पांसनाथ के तीर्थकाल मण पंचगिरी थे
में हुए
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७३७
बल देव का वर्णन -
१७
१२
६१२
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३६७
विमलनाथ
३७
अनन्तनाथ
धर्मनाथ
५.
१७ 39
६ ६७ हजार वर्ष अरहनाथ और मल्लिनाथ
के अन्तराल काल में हुए।
:
कौन-कौन से तीर्थकरों निवल क्षेत्रों के के वीर्यकाल में हुए
नाम
हैं ।
.
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32.
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18:
33
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मुन
और महिषनाथ
के अन्तराल काल में हुए
नेमिनाथ के तीयं काल में हुये है ।
गजपंचाविरि
मुनिसुव्रत और नमिनाथ तुंगीगिरी के अंतरात काल में हुए।
-
आने फोन मी गती प्राप्त
की
१५
सिद्धगये
सिद्ध भये
स्वर्ग ये
[ गो. प्र. चिन्तामरिग
afroयस्काल में होने वाले
६ बलदेव के नाम
१६
चंद्र
महाचन्द्र
वरसन्द्र
वरचन्द्र
सिंह
हरिचन्द्र
श्रीच
: पूर्णचन्द्र
शुभचन्द्र
अतीत काल केट बल
देव के
नाम
१७
श्री कान्त
hafer
बरबुद्धि
मनोरथ
दयामूर्ति
विपुलकीत
प्रभाकर
संजयन्य
जमन्त
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अध्याय नौवां ]
काल प्रमाण
क्रमांक
रुद्रों के नाम
| पूर्व पात्र में से कुमार कालादि | शरीर की ऊंचाई. कुमार काल
प्रमाण प्रगान
संयमकास प्रभारण
नागे कौन । तर भंग काल | पुर्ण आयु कौन कौन से तीर्थंकरों से गति
प्रमाणकास प्रमाण के तीर्थ काल में हो प्राप्त की
१ भीम (महावली)
५००
२७६६६६६ पूर्ण २७६६६६८ पूर्व
२ बली जिसशत्र)
४५०
२७६६६६६ पूर्व ८६ लाख पूर्व ऋषभनाथ के
तीर्यकाल में हो गये २३६६६६. १ , अजितनाथ ६६६६६ .. . , पुष्पदन्त ।
३३३३३१ , शीतलनाथ २८ लाख दार्थ ८४ लाख वर्ष बांसनाथ
नरक गये , ,
२३६६६६६, २३६६६६८, ६६६६६, ६६६६८,
३३३३३, ३३३३४ ॥ २८ लाख वर्ष २० लाख वर्ण
४ विश्वानल (वैश्वानर) १० .५ सुप्रतिष्ठ ६ अचल (बल)
१६६६६६६ वर्ष १६६६६६८ वर्ण १६६६६६६ वर्ष ५०
८ अजितघर है जितनाभि(प्रजितनाभि) २८ १० पीठ
२४ ११ महादेव (सात्यकी ७ हाथ
" विमलनाथ
अनन्तनाथ , धर्मनाथ । शान्तिनाथ वर्ण महावीर
३३३३३३, ३३३३३३४ । ३३३३३३ ।
, ३४ , २ .
१० ६७
, ,
पुत्र-स्थाप)
३ री भूमि
१ यह रुद्र पर नरक से आने वाले जीवों को कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता है, पैसा नियम है। २ सब ही रुद्र अधोगामी अर्थात अधोलोक जाने वाले होते हैं।
[८०१
Durawastimanumanusereesmanmaan-meani
-man
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अध्याय दसवां : कामदेवमहापुरुष और विदेह क्षेत्र का वर्णन
पुण्य कर्म के उदय से अत्यंत सुन्दर रूप धारण करने वाला जितेन्द्रिय सत्पुरुष कामदेव पदवी का धारक होता है। त्रिलोक पज्ञप्ति में लिखा है-
काले जिवरा चवीसाणं हवन्ति चउवीसा | ते बाहुब्बलिमुहा कंदप्पा जिरू वमायरा ॥
*
प्रर्थात्--- चौबीस तीर्थकरों के काल में चौबीस कामदेव होते हैं । इनका सौन्दर्य अनुपम होता है । परन्तु इस हुन्डावासपिणी काल के दोष से कामदेव पदवी प्राप्त महापुरुषों में भगवान शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ तथा अरहनाथ तीर्थंकरों का कथन आगम में आया है।
कामदेवों का वर्णन पढ़ते समय किसी के मन में यह शंका उत्पन्न हो सकती हैं कि जितेन्द्र भगवान ने काम को जीता था, इसलिये सहस्त्र नाम पाठ में उन्हें जितकामारि: कहा है-
"जितो जितकामारिरमितऽमितशासनः जित क्रोधो जितमित्रो जिसनलेशो जितान्तकः" ७-२
प्रश्न : -- वैदिक पुराणों में कथा
आई है कि शिवजी ने अपने सोसरे नेत्र से काम को जलाया था, इसलिये इस विषय का समाधान श्रावश्यक हैं कि कामदेव का यथार्थ स्वरूप क्या है ?
उत्तरः--काम शब्द द्वारा लोक जीव के विकारी भावों को ग्रहण किया जाता
है । यह विकार मन में उत्पन्न होने से काम को मनसिज, मनोज, मनोभू आदि नामों से जन पुकारते हैं । इस कामभाव के कारण पुरुष स्त्री शरीर के प्रति उसी प्रकार आकर्षित होकर विनाश को प्राप्त करता है, जिस प्रकार प्रकाश प्रेमी पतंगा दीपक की जोति में होकर जल जाता है। जिनेन्द्र भगवान ने अपने आत्मबल और समाधि की प्रचंड अग्नि में उस काम विकार को सदा के लिये स्वाहा कर दिया । जिसके इशारे पर देव, दान, मानव, पक्षी, पशु आदि जीव नाचा करते हैं । वैदिक पुराणों
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अध्याय : दसवां ]
CINE
तथा अन्य धर्म के ग्रन्थों में इस बात की कथाएं हैं कि काम ने अपने हथियार कामिनी के द्वारा उनके धर्म में माने गये भगवान ब्रह्मा मादि की तपस्या का छेद कर किस प्रकार की दुर्गति की है । इस काम को मन्मथ भी कहते हैं। दधि मन्थन करने वाले काष्ठ यंत्र के संचालन द्वारा जैसे दधि का मन्थन होता है, उसी प्रकार काम पिशाच द्वारा भी पीड़ित पुरुष की मानसिक स्थिति होती है। अतएव इस काम वासना का क्षय करने के कारण जिनेन्द्र भगवान को जितकामारि कहा है। अनंत प्राणियों को अपने वश में करने वाले काम का नाश करने से जिनेन्द्र भगवान में अनंत शाक्ति का सद्भाव भी शास्त्रकारों ने सूचित किया है।
महादेव ने अपने तृतीय नेत्र द्वारा कामदेव को नष्ट कर दिया है, यह पौराणिक कथन वैज्ञानिक सत्य शून्य है । यदि शम्भु ने काम को जीत लिया या जला दिया तो फिर अपने आधे अंग में प्रिय पत्नी पार्वती को स्थान देने का और अर्व नारीश्वर नाम प्राप्त करने का क्या प्रयोजन है । शंभु के शरीर में काम के विनाश से उत्पन्न भस्म का लगाना विनोदस्पद है । जबकि विष्णु अपनी प्रिय वनिता से क्षण भर भी वियोग सहने की क्षमता शून्य है।
महाकवि धनंजय ने विवापहार स्तोत्र में ऋषभ जिनेन्द्र को काय का विनाशक स्वीकार किया है । कवि के शब्द हैं--
स्मरः सुदग्धो भवसैव तस्मिन्नुद्ध लितात्मा प्रावि शंभुः ।
अशेत दोपहतोऽपि विष्णुः किं गृह्यते येन भवानजागः ।।१६२२॥ इसका हिन्दी पद्य में इस प्रकार भाव समझाया गया है
कामदेव का किया भस्म जगत्राता थे ही, लीनी भस्म लपेटि नाम शंभु निजदेही। सोतो होय अचेत विष्णु वनिता करि हार्यो, तुमौं काम न ग्रह श्राप घट सदा उजारयों ।।१६२३॥
वैदिक संत भर्तृहरि ने अपने वैराग्य शतक में भोगियों में मुख्य रूप से अपनी प्रियतमा को शरीर में निरन्तर धारण करने वाले शंभु का उदाहरण दिया है और स्त्री संसर्ग का सदा के लिये याग करने वाले जिनेन्द्र वीतराग का विशेष रूप से उल्लेख किया है।
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सम
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८०४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि जैन ग्रामम ग्रन्थों के एक सौ उनहत्तर विशिष्ट महापुरुषों में २४ व्यक्तियों को कामदेव पदवी का धारक बताया है। जिनकी अलौकिक मूति उनके काम विजेतापने तथा वीतराग के उज्ज्वल भावों को प्रभावक रूप में व्यक्त करती हुई थमण बेलगोला के विध्यगिरि पर शोभायमान होती है, उन बाहुबलि भगवान का चौबीस काम. देवों में प्राद्य स्थान है, हनुमानजी की भी कामदेवों में गणना की जाती है, महाराज श्रीकृष्ण नारायण के पुत्र प्रद्युम्न की भी कामदेवों में गणना की जाती है। कामदेव यदवी के धारक, जिनदेव तथा जिन शासन के परम भक्त होते हैं । इनका अनुपम सौन्दर्य रमणी वर्ग के मन को मुग्ध करता है । सौन्दर्य के सिन्धु होते हुये भी इनकी मनोवृत्ति गृहस्थ जीवन में परनारी के प्रति मातृत्व की आदर्श भावना से अलंकृत रहती है।
अनगार धर्मामृत में लिखा है कि अनेक रूपवती सुन्दरियां जिनके सौन्दर्य से आकर्षित होकर उनकी आकांक्षा करें, किन्तु जो जितेन्द्रिय सत्पुरुष अपने को निर्विकार रखें ऐसा जितेन्द्रिय महा-मना मानव कामदेव के नाम से जैन महापुरुषों की सूची में शोभायमान होता है।
प्रथम कामदेव बाहुबलि स्वामी ने मुनि दीक्षा धारण करके एक वर्ष का उपवास किया था । कहा जाता है कि वे अंगूठे के बल पर खड़े रहे, क्योंकि उनके मन में इस बात का खेद था कि वे भरत की भूमि पर खड़े हुये हैं । बाहुबलि जैसे विचारवान व्यक्ति के मन में इस प्रकार की शल्य विचित्र सी दिखती है।
इस विषय में महापुराणकार जिनसेन स्वामी ने इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला है । उन्होंने लिखा है "बाहुबलि ने एक वर्ष का उपवास धारण किया था । जिस दिन वह एक वर्ष का उपवास पुरा हुआ उसी दिन भरत ने पाकर उनकी पूजा की । उसी समय उन्हें अविनाशी केवलज्ञान रूपी परमज्योति प्राप्त हुई । युद्ध के समय मेरे द्वारा भरतेश्वर को क्लेश पहुंचा है । इस प्रकार का प्रेम बाहुबलि के हृदय में बैठा हुआ था, इसलिये उस केवल ज्ञान ने भरत द्वारा पूजा की अपेक्षा की थी।
___भावार्थ-भरत को मुझसे कष्ट पहुंचा है, यह प्रेम का भाव बाहुबलि स्वामी के हृदय में था । वह भरत के पूजा करते ही निकल गया और उस प्रेम रूप भाव के निकलते ही उन्हें केवलज्ञान प्रगट हो गया । महापुराणकार के शब्द ये हैं---
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अध्याय : दसवा ]
। ८०५ संक्लिष्टों भरताधीशः सोऽस्मत्त इति यत्किल । हृद्यस्य हार्द सेनासीत्तत्पूजाऽपेक्षि फेवलं ॥१६२४॥
भरतेश्वर ने केवलज्ञान उत्पन्न होने के पहले जो बाहुबलि की पूजा की थी, वह अपने अपराध नाश करने के लिये की थी और केवलज्ञान उत्पन्न होने के बाद जी पूजा की थी, वह केवलज्ञान उत्पन्न होने का मानन्द मनाने के लिये की थी। ..
चक्रवर्ती ने जो बाहुबलि केवली की पूजा रत्नमयी की थी, उसका महाकवि ने इस प्रकार वर्णन किया है "भरतेश्वर ने रत्नों का अर्घ चढाया था । गंगा के जल की जलधारा दी थी। रत्नों को ज्योति के दीपक चढ़ाये थे। भोतियों से अक्षत की पूजा की थी, अमृत के पिंड का नैवेद्य चढ़ाया था । मलयागिरि चंदन की धूप चढ़ाई थी, पारिजात आदि देव वृक्षों के फूलों से पुष्पप्जा की थी।
सरत्ना निधयः सर्वे फलस्थाने नियोजिताः । पूजां रत्नमयोमित्थं रत्नेशो निरवर्तयत् ।।१६२५॥
फलों की जगह चवावर्ती भरत ने सब रत्न और निधियां चढ़ा दी थीं । इस प्रकार उन रत्नों के स्वामी भरतेश्वर ने रत्नमयी पूजा की थी।
जिनसेन स्यामी मे जो समाधान किया है, वह पागम का कथन होने से भान्य है ही, साथ में पूर्णतया मनोवैज्ञानिक भी है । इस पूजा द्वारा भरतेश्वर की उज्ज्वल, उदास तथा उत्कृष्ट गुरुभक्ति स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है ।।
चौबीस कामदेवों में हनुमानजी का भी नाम पाता है। कामदेव अपने शरीर सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध रहते हैं । इस पर यह शंका उत्पन्न होती है कि जगत में हनुमान का आकार बन्दर का माना गया है । उसके श्रेष्ठ सौन्दर्य की कल्पना विचित सी लगती है । यथार्थ रहस्य क्या है ?
हिन्दू पुराणों में राम भक्त हनुमान को वानर स्वीकार किया है । जैन ग्रन्थों में ऐसा कथन नहीं है । हिन्दू ग्रन्थ हनुमान को पवन अर्थात वायु का पुत्र कहते हैं । जैन शास्त्रों में ऐसी तर्क तथा युक्ति विरोधी मान्यता को तनिक भी स्थान नहीं है । महाराज पवनंजय विद्याधरों के राजा थे । उनको पुरुष पर्याय वाला माना है । उनके पुण्यवान, प्रतापी तथा चरम शरीरी पुत्र का नाम हनुमान था। उनकी ध्वजा में वानर का चिन्ह था। इससे उनको 'कपिध्वज' माना है। इन दानर चिन्ह के कारण
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८०६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
विद्याधरों के लिये वानर शब्द का व्यवहार बल पड़ा। यही कथन पद्मपुराण पर्व १६
आया है ---
शब्दोऽस्यत्र प्रयोगवान् ।
यष्टिः कुलकरस्तथा ।। १६२६॥
श्रयं तु व्यक्त एवास्ति
यष्टि हस्तो यथा तथा वानर चिन्हेन छत्रादि विनिवेशिना :
विद्याधरा गता ख्याति वानरा इति विष्टये ।।१६२७॥
यह बात स्पष्ट है कि एक शब्द का दूसरे स्थान पर भी प्रयोग होता है । रखने वाले पुरुष को यष्टि कहते हैं, इसी प्रकार कुत रखने वाले को कुन्त कहते हैं । इसी प्रकार छत्रादि में विद्याधर लोगों की जगत में वानर रूप से प्रसिद्धि
यष्टि अर्थात् लाठी को हाथ में अर्थात् भाले को हाथ में विद्यमान वानर चिन्ह के कारण हुई
ग्रन्थ का यह पद भी महत्त्वपूर्ण है
एवं वानरकेतुनां वंशे
संस्थात विवजिताः ।
errettः कर्मभिः प्राप्ताः स्वर्ग मोक्षं च मानवाः ।।१६२८ ॥
इन वानर ध्वजा वालों के वंश में उत्पन्न होने वाले असंख्य मानवों ने अपने उद्योग के द्वारा स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्त किया है ।
इससे हनुमान के faar में शंका को रंचमात्र भी स्थान नहीं रहता है । महान् पुण्यात्मा, बलशाली, ज्ञानवान हनुमान विद्याओं के स्वामी पुरुषरत्न थे । उसकी ध्वजा में वानर का चिन्ह था। आज भी भिन्न-भिन्न राष्ट्रों के ध्वजचिन्ह अनेक प्रकार के रहते हैं । उन चिन्हों के कारण उन राष्ट्रों को चिन्हात्मक स्वीकार करने पर बड़ा अनर्थ हो जायेगा। भारत का झंडा तिरंगा है। इससे भारतवासी को कोई तीन रंग वाला मानने लगे, तो जैसे उसे अज्ञानी कहेंगे। उसी प्रकार कपि का ध्वज होने के . कारण हनुमान को कपि मानकर वैसा श्रद्धान न करना होगा ।
हिन्दू पुराणों की दृष्टि और सर्वज्ञ ज्ञान से प्रकाशित जैन दृष्टि में बहुत अन्तर है । उदाहरणार्थ द्रौपदी का पंचभर्तारी मानना । जहां सती सीता को एक रामचन्द्र को ही पतिदेव स्वीकार करने के कारण स्तुति की गई है, वहां द्रौपदी को पांच व्यक्तियों की पत्नी कहना महान ग्रपवादपूर्ण वाणी हैं । शील तथा सदाचार के faपरीत है ।
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अध्याय : दसवां ]
हरिवंश पुराण में कहा है कि पूर्व जन्म के स्नेह से द्रपद राजा की पुत्री द्रौपदी ने अर्जुन को हो पति स्वीकार किया था। द्रौपदी के पंच भर्तारी रूप से अावाद का कारण पूर्व जन्म का निदान बंध रहा है । द्रौपदी ने अपने पुर्वभव में बहुत प्रत पालन किये थे । उसकी दृष्टि वसंतसेना वेश्या पर पड़ी जो अनेक कामी व्यक्तियों से घिरी हुई थी । उसे देखकर द्रौपदी के जीव ने बसंतसेना के समान सौभाग्य की मनोकामना की थी उसके फलस्वरूप द्रौपदी को सती होते हुये भी पंचभर्तारी रूप का अपवाद प्राप्त हुआ । हरिवंश पुराण के ये वाक्य ध्यान देने योग्य हैं
वसंतसेनां गणिकां कामुकैः परिवेष्टिता । दृष्ट्वा वन-विहारेऽसावेकदा तोडनोखतां ॥१६२६॥ निदानमकरोत् क्लिष्टा दुर्यशः प्राप्तिकारणम् । सौभाग्यमोदृशं मेऽन्ये जम्मन्यस्स्विति सादरा ॥१६३०॥
अतएव द्रौपदी को सीता की तरह सती मानना चाहिये । सीता जिस प्रकार रामचन्द्र की रानी थी, इसी प्रकार द्रौपदी अर्जुन की रानी थी। सती स्त्री का अपवाद महान पाप का कारण है, अतएव सती द्रौपदी को पंचभारी मानने की कल्पना भी पाप का कारण होगी।
हिन्दू परम्परा में भी द्रौपदी की अहिल्या, सीता, लारा, मंदोदरी के साथ पंचमहापतिव्रताओं में गणना की जाती है
अहिल्या द्रौपदी सीता तारा मंदोदरी सथा। पंचसाध्वीं स्मरेन्नित्य महापातकनाशिनीम् ।।१६३१॥
२४. कामदेव महापुरुष नं० कामदेवों के नाम ... कौन से तीर्थकाल कौन सी गति
निवारण क्षेत्र में हुए ? प्राप्त की?
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सिद्ध भए
पोदनपुर
बाहुबलि प्रजापति श्रीधर दर्शनभद्र
ऋषभनाथ अजित संभवनाथ अभिनन्दन
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८०८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
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in-
सुमतिनाथ पद्मप्रभ सुपार्श्वनाथ
सिद्धवरकूट
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११
पुष्पदन्त. शीतलनाथ श्रेयांसनाथ शान्तिनाथ कुन्थुनाथ अरहनाथ
सम्मेदशिखर
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प्रसेनचन्द्र चन्द्रवर्ण अग्निमुख. सनत्कुमार वत्सराज . कनकप्रभ
मेघप्रभ १२ शान्तिनाथ
कुन्थुनाथ अरहनाथ विजयराज श्रीचन्द्र नलराज हनुमन्त
बलिराज २० वसुदेव २१ प्रधुम्न २२ नागकुमार
जीवन्धर २४ जम्बूस्वामी
सिद्धवरकूट
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मल्लिनाथ
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तुगगिरि
मुनिसुव्रत तमिनाथ নাবিলা
सिद्धवरकूट
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पार्श्वनाथ महावीर
ऊर्जयन्तगिरि कैलास पर्वत सिद्धवरकूट जन्बुवन
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विदेह क्षेत्र का स्वरूप :---
श्री अकलंक स्वामी ने राजवार्तिक अध्याय ३ पृ० १२२ में लिखा है :-'तत्र हि मुनियो देहोच्छेदार्थ यतमानाः विदेहत्वमास्वंदति' वहां मुनिगण देहत्यागार्थ उद्योग करते हुये देहरहितपना अर्थात् सिद्ध पद प्राप्त करते हैं।
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[ ८०१
अध्याय : दसवां ] प्रश्न :-तनु च भरतैरावतयोरपि विदेहाः ? ऐसी स्थिति में भरत और
ऐरावत भी विदेह कहे जायेंगे, क्योंकि वहां से सिद्ध पर प्राप्त
होता है। उत्तर :--- 'सत्यं संति कदाचिनतु सर्व कालं, तर तु सततं धर्मोच्छेदाभावाद् विदेहाः संति, प्रकर्षापेक्षोविदेहव्यपदेशः ।
ठीक है भरत ऐरावत से सर्वकाल मोक्ष नहीं होता है। किन्तु दुखमा मुखमा काल में ही विदेहता होती है । विदेह क्षेत्र में कभी भी धर्म का उच्छेद नहीं होता है, अतः अधिकता की अपेक्षा उस क्षेत्र को विदेह कहा गया है ।
विदेह क्षेत्र के तीर्थंकर केवलियों के कल्याणक :
पूर्व पश्चिम दोनों विदेह क्षेत्रों में अर्थात् पंच मेरु सम्बन्धी १६० विदेह क्षेत्रों में होने वाले तीर्थंकरों के लिए ऐसा नियम नहीं है कि जैसा भरत और ऐरावत क्षेत्र के तीर्थकर पंचकल्याणक वाले होते हैं, वहां तीर्थकर प्रकृति का बंध करने वाला व्यक्ति यदि चरम शरीरी हो अर्थात् उसी भव से मोक्ष प्राप्त करने वाला हो और गृहस्थ अवस्था में रहते हुए उसने तीर्थकर प्रकृति का बंध कर लिया हो तो उसके तीन कल्यारक (तप, शान और मोक्ष) होते हैं। और जिसने मुनि होकर तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया हो तो उसके दो कल्याणक (ज्ञान और मोक्ष) होते हैं। यदि वह चरम शरीरी नहीं होगा अर्थात् जिसने पहले भव में तीर्थकर प्रकृति का बंध किया है, तो वह गर्भ जन्मादि पंच कल्याणकों का स्वामी होगा। यहाँ दोनों प्रकार के महापुरुष होते हैं । किन्हीं के पांचों कल्याणक होते हैं और किन्हीं के कम भी
होते हैं।
त्रिलोकसार में लिखा है कि विदेह क्षेत्र में सदा केवली भगवान, शलाका पुरुष, ऋद्धिधारी मुनीश्वरों की विपुल संख्या पायी जाती है, इससे वहां दुभिक्ष, ईति, भौति, कुदेव तथा मिथ्यालिंगी और उनके पूजक मिथ्यामतियों का प्रभाव रहता है । उक्तं च :--
देसा दुभिक्खोदी-मारि-कुदेव वलिगिमवहीरणा । भरिदा सदावि केवलि-सलाम-पुरिसिद्धि-साहूहि ॥१६३२॥ ,
गोम्मटसार कर्मकांड गाथा ५०६ की जीव प्रबोधिनी संस्कृत टीका में लिखा है, 'तीर्थबंधप्रारंभश्चर मांगासंयत देशसंयतयोस्तदा कल्याणानि निष्क्रमणादीनि
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११० ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिणं पीरिण, प्रमत्ता प्रमत्ता प्रमत्तयोस्तदा ज्ञाननिर्वाणे द्वे प्राग्भवे तदा गर्भावतारादीनि पंचेत्यबसेयं (पृ० ७०८) अर्थात् चरमंशरीरी असंयत द्वारा जन्म तीर्थंकर प्रकृति के बंध का प्रारम्भ होता है, तब उनके तप, ज्ञान तथा निर्धारण ये तीन कल्याणक होते हैं । प्रमत्त गुणस्थान वाले चरम शरीरी व्यक्तियों द्वारा जब तीर्थकर प्रकृति का बंध प्रारम्भ किया जाता है । तब उनके ज्ञान कल्याणक तथा मोक्ष कल्याणक, ये दो होते हैं । जब पूर्व भव में तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया जाता है, तो पांचों कल्याणक होते है।
भरत तथा ऐराक्त में पंच कल्याणक वाले ही तीर्थंकर होते हैं । उपरोक्त शास्त्राधार से यह बात निराबाध सिद्ध होती है। जिन तीर्थंकरों के तीन या दो कल्याणक होते हैं, उनके दस जन्मातिशय होंगे या नहीं, यह विचारणीय बात है। तर्क की दृष्टि से उनके अहंत अवस्था में ३६ गुरा मानना होगा। यदि इसके विरोध में पागम की वाणी मिले तो तदनुसार ही श्रद्धा करना उचित है। सामान्य केवली के भी ३६ गुण मानना ठीक जंचता है। हमें स्पष्ट रूप से प्रागम का आधार नहीं मिला।
विदेह क्षेत्र में मोक्ष के योग्य संहननादि समुचित सामग्री की सदा उपलब्धि होने से वहां मोक्ष का मार्ग सतत चलता रहता है । अतएव मुमुक्षु मानव में ऐसी इच्छा का उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि इस दुषमा काल की कीडा भूमि में पाप प्रचुर पंचम काल युक्त भरत क्षेत्र से निकलकर तीर्थकर केवली आदि के बिहार से पुनीत विदेह में जाकर यह जीव आत्मा का कल्याण करे। इसका क्या उपाय है ? यदि सम्यक्त्व की उपलब्धि हेतु है. तो बात बड़ी कठिन है, कारण सम्यक्त्व की चर्चा चाहे जितनी की जाय और जो चाहे करे, उस सम्यक्त्व रत्ल के स्वामी उस क्षेत्र में दो चार अर्थात् अंगुलियों पर गिनने लायक कहे गये हैं।
समाधान :- उक्त शंका का निराकरण इस गाथा द्वारा होता है, जो बताती है, कि इस काल में भरत क्षेत्र से १२३ भद्रं परिणाम वाले यहां से पूर्व विदेह में जावेंगे, और नौमे वर्ष में केवलज्ञान को प्राप्त करके केवली भगवान होंगे । सिद्धान्त सार की वह गाथा इस प्रकार है :
जीवा सय तेईसा पंचमकाले य भष्परिणामा । उपाइ पुष्यविवेहे नवमइयरसे दु केवली होदि ।।१६३३१६
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अध्याय : दसवां ]
यहां से विदेह जाने वाले जीव के सम्यक्त्व का अभाव आवश्यक है । यदि सम्यक्त्वी जीव है, तो वह मरणकर देव पर्याय को प्राप्त करेजा, कारण यहां नरकायु की बंधव्युच्छिति प्रथम गुणस्थान में होती है। सासादन गुणस्थान में तिर्यंचायु के साथ मनुष्यायु की बंधव्युच्छित्ति हो जाने से अविरत सम्यक्त्वी जीव देवायु का ही यहां से बंध करेगा। गोम्मटसार कर्मकांड की गाथा ११० तथा १०८ में बताया है कि मनुष्यों तथा तिर्यंचों के वनवृषमनाराच सहनन प्रादीरिक शरीरं प्रौदारिक श्रांगोपांग मनुष्यायु, मनुष्यगति तथा मनुष्यगत्यानुपूर्वी इन छह प्रकृतियों की बंधव्युच्छिति चौथे गुणस्थान के बदले दूसरे गुरणस्थान में होती है । कहा भी है :
उरिम छहं च छिदी सासरगसम्मे हये रिणयमा ।।
ऐसी स्थिति में सम्यक्त्वी मनुष्य आगामी देवायु का बंध करेगा । विदेह में जाने वाला मनुष्य सम्यक्त्व सहित मरण नहीं करेगा। ऐसी कर्म सिद्धान्त की व्यवस्था होने से धार्मिक व्यक्तियों के मन में भक्ति, प्रत, संयम की ओर विशेष अनुराग उत्पन्न होना चाहिये। कारण यह किसे मालूम है कि भरत से विदेह जाने वाले भद्र परिणामी १२३ जीवों में किसको स्थान प्राप्त होता है। तत्व की बात यह है कि काल की कलुषता का आश्रय लेकर अकर्मण्यता को नहीं अपनाना चाहिये तथा विषयों का दास न बनकर प्रात्मकल्याण के लिए बुद्धि तथा विवेक पूर्वक उद्योग करते रहना चाहिये । पुरुषार्थी नररल ही जयश्री को वरण करते हैं । प्रमादी का भविष्य सदा अंधकार में रहता है।
इस गाथा के भाव को स्मरण रखते हुए विचारवान मानव को प्रात्म हितार्थ उद्योग करना चाहिये । इसी से क्षपकराज प्राचार्य शांतिसागर महाराज ने अपनी मंगलवारणी में कहा था, वत्स! डरो मत-'बाबलो भीऊ नका ।'
वर्तमान के विदेह क्षेत्रस्थ विशति तीर्थंकरों के नाम चिन्हादि :--
नं. तीर्थंकरों के नाम चिन्ह पिता का नाम माता का नाम नगरी के नाम
१. सीमन्धर २. युगमन्धर ३. बाहु
वृषभ श्रेयांस हाथी मुदृढ़रथ मृग सुग्रीव
सत्यदेवी पुंडरीकिरणी · सुतारा सुसीमा विजया अयोध्या
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८१२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
४. सुवा
कपिल निशाटिल ५. सुजात (संजातक) सूरज देवसेन ६. स्वयंप्रन
चन्द्रमा मित्रभूत ७. ऋषभानन
हरि कीरत ८. अनन्तवीर्य
गज मेघ ६. सुरप्रभ (सूर्यप्रभ) सूर्य नागराय १०. विशालकीति चन्द्रमा विजमुराय ११. बज्रधर
शंख पद्मरथ १२. चन्द्रानन
वृषभ वाल्मीकि १३. भद्रबाहु (चन्द्रवाह) पथ देवनन्दो १४. भुजंगम
चन्द्रमा महाबल १५. ईश्वर
सूर्य गलसेन १६. नेमप्रभ (नमि वृषम बोरोन १७. वीरसेन
ऐरावत भोपाल भुवपाल १८. महाभद्र
चन्द्रमा देवराज १६. देवयश (यशकीति) साथिया श्रवभूत २०. अजितवीर्य
पा सुबोध
सुनन्दा अलकापुरी सेना विजया सुमंगला सुषीमा वीरसेना अयोध्या सुमंगला विजया भद्रा पुडरीकिरणी विजया सुसीमा सरस्वतो पुण्डरीकिरणी पद्मावती विनीता सुरेणुका विजया महिमा सुसीमा ज्वाला अयोध्या सेना पुण्डरीकिणी सुभानुमति विजया उमादेवी सुसीमा गंगादेवी अयोध्या कनका अयोध्या
प्रश्न--जिनालय से मानस्तंभ कितना बड़ा होना चाहिये ?
उसर-मानस्तम्भ मूल नायक प्रतिभा से १२ गुणा बड़ा बनाना चाहिये । किसी प्राचार्य के मत से जिनालय से १ हाथ ऊंचा होना चाहिये। ....
प्रश्न--पyषस किसे कहते हैं ?
उत्तर--उषन्ते. दह्यन्ते पापकर्मारिण यस्मिन् तत् पर्युषणम् । जो पाप कर्मों को नष्ट करता है, जलाता है, उसे पर्दूषण कहते हैं ।
प्रश्न-अरहंत भगवान की दिव्यध्वनि कितनी बार खिरती है ? उचर-प्ररहन्त भगवान् की दिव्यध्वनि निकाल --प्रातः, मध्याह्न और
रासा
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अध्याय : दसवा ] सायंकाल स्वभाव से ६-६ घड़ी खिरती है। किन्तु धवला और तिलोयपत्ति में त्रिकाल के अतिरिक्त चतुर्थ समय में नहीं खिरती है । और 6-6 घड़ी वाणी खिरती है, ऐसा लिखा है । यह भगवान महावीर और हुण्डावसर्पिणीकालापेक्षा है । बाकी तीर्थंकरों की दिव्यध्वनि अर्धरात्रि को भी खिरती है। अर्थात् चार बार भी खिरती है।
पुवण्हे मज्भपणे अधरण्हे मज्झि माये रत्तिए । छन्छग्धडियारिणग्गदिश्व भुगी कहइ सुतत्थे ॥१६३४॥ . प्रश्न-जीवस पर्याय पाकर पुनः निगोद में कितने काल में चला
जाता है ? उत्तर--नित्यनिगोद से निकल कर बस पर्याय पाकर १६ कोटि पूर्व २ हजार सागर वर्ष प्रमाण. समय में जीव या तो मोक्ष प्राप्त कर लेता है, अन्यथा पुनः निगोद राशि में चला जाता है ।
प्रश्न-~-परिपतदशा जीव को कितने गुणस्थान तक है ?
उत्तर--८ वें गुणस्थान तक जीव की परिगत दशा है और श्रेणी प्रारोहरण के बाद अपरिगत दशा है ।
प्रश्न--समुद्र के जल की वृद्धि च हानि किसप्रकार होती है ?.
उत्तर-समुद्र का जल अमावस्या के दिन ११ हजार योजन समतल से ऊपर उठता है, और परिणमा के दिन १६ हजार योजन उठता है । उस समय बेलंधर जाति के देव उसे समरूप बना देते हैं ।
प्रश्न-~-शुभ या अशुभ तेजस का प्रभाव कितनी भूमि प्रमाण होता है ?
उत्तर-शुभ तेजस ४८ कोश लम्बाई और ३६ कोश चौड़ाई में सुभिक्ष करता है और अशुस तेजस का भी उतना ही प्रसारण है।
प्रश्न--षष्टमकाल के अन्तिम समय में क्या-क्या शाश्यत रहेगा?
उत्तर-षष्टम काल के अन्तिम समय में प्रलय होगा, उस प्रलय के समय में भरत क्षेत्र की सब वस्तुएं नष्ट हो जायेगी जीव भी सब नष्ट हो जायेंगे । उस समय देव और विद्याधर लोक जाकर ७२ जोड़े मनुष्यों के और तिर्यञ्चों को उठाकर विजयाई की गुफाओं में रख देंगे । षष्ठ काल के प्रारम्भ में फिर जब प्रलय का' उपद्रव शांत हो जायगा, तब फिर से उन मनुष्यों को और तिर्यंचों को विजयार्द्ध की मुफाओं
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८१४ ]
[ गौ. प्र. चिन्तामणि में से लाकर भरत क्षेत्र में रखेंगे। अयोध्या के स्थान पर सदा शाश्वतिक रहने वाला कमल को देखकर इन्द्र फिर से अयोध्या की स्थापना करता है और शिखर जी के स्थान पर क्रमुकाकार (सुपारी २४ टोकों को देखकर वहां शिखर जी पहाड़ की इन्द्र रचना करता है । ये कमल और सुपारी के आकार अयोध्या के स्थान पर और शिखर जी के स्थान पर रहते हैं। मिताभूमि पर रहते हैं, में विन्द कभी नष्ट नहीं होते हैं । नित्य और शाश्वतिक हैं।
प्रश्न-राजु का प्रमाण कितना है ?
उत्तर-एक प्रांख की टिमकार का जितना काल है, उतने समय में एक देव असंख्यात योजन जाता है, ऐसी तीव्र गति की चाल चलने वाला देव यदि ६ माह तक लगातार चलता ही रहे, जहाँ छः माह पूर्ण होंगे, उतना १ राजु का प्रमाण है।
प्रश्न--सप्तम नरक की लम्बाई और चौड़ाई का क्या प्रमाण है ?
उत्तर-स्वयम्भू रमरा समुद्र के पूर्व किनारे पर से तथा पश्चिम, उत्तर, दक्षिण किनारों से अलग-अलग रस्सी लटकाई जायेगी तो प्रत्येक का किनारा क्रमश: उस सप्तम भूमि के रीर व महारोर व ग्रादि ४ बिलों के ठीक बीचों बीच पड़ेगी।
प्रश्न-शिखर जी पहाड़ को कोतने लाख व्यन्तर देव सेवा करते हैं ?
उत्तर- सम्मेदाचल की दश लाख व्यन्तर देव सेवा करते हैं और उन व्यन्तरो का अधिपति महाप्रभूत नाम का इन्द्र है, सो भी शिखर जी का रक्षक है ।
__ 'शिखर महात्म्य' प्रश्न- तीन सौ श्रेसठ पाखण्ड़ों का क्रस क्या है ?
उत्तर-८४ क्रियावादी, मिथ्यादृष्टि १८० प्रक्रियावादी, ६७ प्रज्ञानवादी, ३२ बैनयिक, ये सब मीलाकर ३६३ पाखण्ड हो जाते हैं ।।
प्रश्न--६ महिने ८ समय में कितने जीव मोक्ष जाते हैं ?
उत्तर-अतीत काल के जितने समय हैं, उनको ५६२ से गुरणा करना, उसमें ६ माह और ८ समय का भाग देना जो गणित आवे उतने जीव मोक्ष जा सकते हैं। कम से कम ६०८ जीव मोक्ष जाते हैं।
अतीत समय अनन्तानन्त x ५६२:६ माह ८ समय:- अनन्तानन्त ।।
६ माह ८ समय के अनन्त समय भी माने जाय तो अनन्तानन्त : ५६२ होंगे।
तिलोय प. मा. नं. २६०७
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अध्याय : दसवां ।
[ २१५ प्रश्न :--पांच पैताले कौनसे हैं ?
उत्तर :-..--१. प्रथम स्वर्ग का ऋजुविमान, २. प्रथम नरक का सोमंतकपाथडा, ३. ढाइद्वीप, ४. सिद्धशिला, ५. सिद्धक्षेत्र । .. प्रश्न :-वेक्षक सम्यक्त्व को ६६ को स्थिति किस प्रकार होती है ?
उत्तरः ---सौधर्म द्वी सागरो, शुक्र षोडस सागराः, शतारे अष्टादश सागराः अष्टम ग्रेवेयके त्रिंशत्सागराः एवं षट्षष्टि सागराः । ।
अथवा--सोधर्म द्विरूत्पन्नस्य चत्वारः सागराः सनत्कुमारे सप्तसागराः ब्रह्मरिण दशसागरा: लान्तवे चतुर्दशसागराः नववर्गवेयेकेषु एकत्रिंशत्सागराः एवं षटषष्टिसागरा: । अन्त्य सागर शेषे मनुष्यायु हीनं क्रियते तेन षटषष्टि सागराः साधिकान भवन्ति ।
तत्वार्थ वृत्ति पृ. १२ प्रश्न :--क्या इन्द्र के पहले इन्द्राणी मोक्ष जाती है ?
उत्तर :- हां इन्द्र के पहले इन्द्राणी मोक्ष जाती है और एक नहीं कई मोक्ष चली जाती हैं, तब इन्द्र का नम्बर प्राता है । क्योंकि इन्द्र की आयुष्य तो सागरों की रहती है और इन्द्राणियों की आयु पल्यों की रहती है।
प्रश्न :--एक इन्द्र के काल में कितनी इन्द्रारिणयां मोक्ष जाती हैं ?
उत्तर :-- इन्द्र की आयु का प्रमाण कुछ अधिक दो सागर प्रमाण है और इन्द्राणी की आयु पांच पल्य की होती है। अतः एक इन्द्र के काल में चालीस नील इन्द्राणियां मोक्ष जाती हैं,
.:. १ सागर प्रमाण में १० कोटा-कोटी पल्य
२ , , , १०x२, ४-२०,०००००००००००००००५ =४०००००००००००००० नील इन्द्रारिणयां मुक्त होगी। प्रश्न :--जब इतनी इन्द्रापियां मुक्त होती हैं, फिर कितने लोकपाल मोक्ष
जाते हैं ? उत्तर :-.ये लोकपाल भी भगवान के समवशरण में सभा की व्यवस्था करते हैं, इसलिये ये भी एक भवावतारी होते हैं--
दिशा-पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तर नाम--- सोम---यम-~-चरूणा-कुबेर आयु-२॥ पल्य--२॥ पल्य--२॥ पल्य-३ पल्य
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। गो. प्र. चिन्तामणि ___. सोम और यम २० नील अर्थात् जितने समय में एक इन्द्र मुक्त होगा उतने ही काल में ५० नील सोम. और ८० नील यम और वरुण ७२ नील ७२ खरब ७२ अरब ७२ करोड ७२ लक्ष ७२ हजार ७२३ मोक्ष जायेंगे ये उपरोक्त दरूणों की संख्या है । कुबेर ६६ नील ६६ खरब ६६ अरब ६६ करोड ६६ लाख ६६ हजार, .६६६ मोक्ष चले जायेंगे।
प्रश्न :-७२ कलाएं कौनसी हैं ?
उत्तर :-१. लिखित, २. पठित, ३. गणित, ४. वैद्यक, ५. नृत्य, ६. वक्तव्यं, ७. वाथा, ८. वचन, ६. नाटक, १०. अलंकार, ११. दर्शन, १२. ध्यान, १३. धर्मकथा, १४. अथकला, १५. काम, १६. बाटकला, १७. वृद्धिकला, १८. सोचक, १६. व्यापारकला, २०. नेपथ्य, २१. विलास, २२, नीति २३, शकुन, २४. क्रीडन, २५. वितन्यात, १५. हत्तताप, २ मा र कुसुगामला, २६. इन्द्रजाल, ३० विनयकला, (य) ३१. स्नेह, ३२, पानक, ३३. संजोगक, ३४. हास्य, ३५. सौभाग्य, ३६. प्रयोग, ३७. गंधर्व, ३८. वस्तु. ३६. वाणिज, ४०. रत्न, ४१. पात्र, ४२. देशक, ४३. भावक, ४४ विधाक, ४५. विनय, ४६. अग्नु, ४७. दाध, ४८: समस्त, ४६, वर्ण, ५०, हस्ति, ५१. अष्टक, ५२ पुरूष, ५३. नारी, ५४. भोज्य, ५५, पक्ष, ५६. भूमि, ५७. लेष, ५८ कष्ट, ५६. वृष, ६०. छद्म, ६१. सह्य, ६२. हरल, ६३. उत्तर, ६४. प्रत्युत्तर, ६५. शरीर, ६६. सत्त्व, ६७. साध, ६८. धैर्य, ६६ पत्रछेद ७० चित्र, ७१. भारणा, ७२. इर्या ।
प्रश्न :--मनुष्य के ३२ लक्षण कौनसे हैं ?
उत्तर :-१. प्रमारणं, २. सुकृतं, ३. रूपं, ४. कुलं, ५. शील, ६. पराक्रम, ७. सत्यं ८. शौचं, ६. मनभ्यास, १०. बुद्धिमान, ११. सुवित्तक्षरण, १२. शास्त्रज्ञानेन, . १३. सम्पूर्णी, १४. परदारजित, १५. प्राप्तभाव, १६. सदातुष्टो, १७. विद्वान,
१८. मधुरभाषी, १६. सज्जनता, २०. स्वल्पकामी, २१. श्रीमाश्वर, २२. गुणविभूषित, २३. पितृभक्त, २४. मातृभक्त, २५. गुरुभक्त, २६. परोपकारी, २७. दाता, २८. भोक्ता, २६ जितेन्द्रिय, ३०. सदा धर्मरत, ३१. नित्य भगवत पूजक, ३२. स्वल्पाहारी स्वल्पनीद्रा।
प्रश्न :-पंचमकाल में ५२ वस्तु विपरित होंगी वे कौनसी हैं ? उत्तर :-१. राजा लोभी, २. मित्र विश्वासघाती, ३. अर्थलोभी पुत्र,
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अध्याय : दसवां ]
[ ८१७
निपेक्षी बंधुभाई, ६. असंतुष्ट मंत्री, ७ विद्यावंत दारिद्री, ८. जारजात् सुखी, ६. पाखंडी जिन शासनी, १०. यतीक्रोधी, ११. प्रजाहीन नगरी, १२. व्याधीपीडीतदेही, १३. सर्वकलावान गंवार (मुर्ख) १४. गीतादिक डुम, १५. सुभट कायर १६. क्षमावान निर्दयी, १७ बलवान शूद्र, १८ भीलतुरक, १६. अचिति मृत्यु, २० अनंग ज्ञान काम चेष्टा, २१ स्वल्पमेध २२ वाचाचूक मनुष्य, २३. स्थान भ्रष्ट राजा, २४ अशुद्ध पाठ २५. कुटिल दया, २६. अहंकारी मूर्ख, २७. संज्ञालोपी ब्राह्मण, २५ माता ठगोरी, २६. दुर्जन स्नेही ३०. सज्जन विरोधी, ३१. आप ही स्वयं के गुणगान करे, ३२. परनिन्दा करे, ३३ वेश्यासलज, ३४. कुलवंती निरलज्ज, ३५. अफलवृक्ष, ३६. वैश्यजाति कपटी, ३७. कुमारी कन्या चंचल, ३८. नीच राजा, ३६. नीच प्रधान, ४०. तामसी भट्टारक, ४१. दयाहीने तपोधन, ४२. नीचरत स्त्री, ४३. बुद्धिहीन मंत्री, ४४. गजहीन राजा, ४५ आशाहीन दासी, ४६. विवेकहीन राजपुत्र, ४७. विवेक पुलिदशुद्र, ४८. कृषिकजन दुखी, ४६. पुरुष सुख ५०. अकाल में वर्षा, ५१. ऋतु विपरीत, ५२. संसार चलित ।
प्रश्न :- पुरुष के षोडषशृंगार कौन से हैं ?
उत्तर :--१ स्नान, २. तिलक, ३. प्रधान, ४. पटम्बा, ५. कुदल ब्यौरा, ६. कर्म करावे, ७. सुन्दरपाद, ८. सुहाग, ६. सुवीर, १०. शरीर सुवासित चंदन लगावे, ११. अंगुठी धारण करना, १२ मुजरी, १३. खंग धारण, १४. कटारो, १५. विनति, विद्याशील वंत, बोल ये १६ श्रृंगार हैं ।
प्रश्न :----युवती के सोलह श्रृंगार कौन है ?
उत्तर :- १. मंजन, २ अंजन, ३ चन्दन, ४, वीर, ५. दोडकेए कंकरण, ६. कुण्डल, ७ जोरीफुल की माला, ८ तिलक, ६. बोल, १० अलक की भोंरी, ११, धमके घुघरी १२. चमके डुलरी, १३, नकबेसर, १४ नेदूर १५, कचु, १६, डोरी ।
प्रश्न :- क्या उपचार महावती प्राधिका को क्षायिक सस्यत्व हो सकता है ?
उत्तर :-- क्षायिक सम्यक्त्वं तु असंयतादि चतुर्गुरेण स्थान मनुष्याणां प्रसंयत देश संयतोपचार महाव्रत मानुषीनां च कर्मभूमि वेदक सम्यग्दृष्टि नामेव केवल श्रुत
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।
Haries
सावी
८१८ ।
| गो. प्र. चिन्तामरिंग केवलि द्वयं श्रीपदोयांते सप्त प्रवत्ति निरवशेष क्षये भवति ।
जीवकाण्ड बडी टीका का पृष्ट ११४१ बहुरी असंयतादिक चारि गुणस्थान वर्तीक जे मनुष्य, बहुरि असंयत देश संयंत गुणस्थानवर्ती उपचार महाव्रत जिनके पाइये हैं एसी प्रार्या स्त्री ते कर्म भूमि में उपजी एसे वेदक सम्यक्त्वी होय हैं, तीन ही के केवली श्रुत केवली दोनों में से किसी के (पाद) चरणमूल में सात प्रकृतियों का सर्वथा क्षय होने से क्षायिक सम्यक्त्व होता है।
प्रश्न :--सूक्ष्म बादर निमोद जीवों की प्रायु का प्रमाण क्या है ?
उत्तर :-नित्यनिगोद इतरनिगोद सूक्ष्म बादर सबको आयु अंतर्मुहूर्त मात्र है । और पृथिवी काय, जलकाय, तेजकाय, वायुकाय के जीव की भी आयु अन्तर्मुहूर्त हैं अंतोमुहूत्तमाऊ साहारण सव्वसुरमाणं इति उक्तत्त्वादिति ।।
चर्चा समाधान नं. ६६ वी. पृष्ट नं. ८४ प्रत्येक और साधारण २ ही नामकर्म है। तीसरा सप्रतिष्ठित नामकर्म और मानना पड़ेगा।
प्रश्न :- चौदह विद्याएं कौनसी हैं ?
उत्तर:-चारों अनुयोग, ५. शिक्षा कल्प, ६. व्याकरण ७. छन्द द. अलंकार, ६. ज्योतिष, १०. निरूक्त ११ इतिहास १२. पुराण, १३. मीमांसा, १४. न्याय ।
. लौकिक विद्याएं १. ब्रह्मा, २. चातुरी, ३, बाल, ४. वाहन, ५. देशना, ६. बाह, ७. जल, ८. रसायन, ६. मान, १०. संगीत, · ११. व्याकरण, १३. वेद, १३. ज्योतिष, १४. वैद्यक .
प्रश्न :- क्या स्त्री भी जीनेन्द्रदेव का पूजाभिषेक करने को अधिकारी है ?
उत्तर :--भगवान बाहुबलि का नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती के सानिध्य में चामुडराय का मान खंडीत करने के लिये गुलिकाय नाम की स्त्री बुडिया ने दूध का अभिषेक किया, यह प्रत्यक्ष प्रमाण है, उस गुलिकाय स्त्री की मूति श्रवण बेल मुल में गोम्मटेश्वर की मूर्ति के सामने बनी है । सहस्त्राब्धि महोत्सव में होने वाला भगवान के अभिषेक को यहां आने वाली करीब सभी माता और बहनों ने किया था। इससे
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साक्षात मुलीका जी द्वारा कीर का अभिषेक करने पर ही अभिषेकको प्रति चामुण्डराय का मान खंडन, सिद्धान्त चक्रवर्ती श्री मुनिराज
नेमकी के सामने का
दविधिसाम्
हाराज
श्री १०८ वरपराचार्य कुम्भु सागर जी महाराज श्री १०५ वि.र.ग. प्रा. विजयमतोषी माताजी
श्री सिद्धा चक्रवर्ती द्वारा प्रतिष्ठित भगवान गोमटेश्वर का अभिषेक. दुध से करने वाली दालीका भी अपने हाथ में दूध का लोटा लेकर सड़ हैं। भाका भिषेक करने के लिये और मंत्री चामुण्डराय का मान मंडित करने के लिये दूध का अभिषेक घर स्वी अभिषेक का प्रत्यक्ष प्रमाण मूर्त रूप में साक्षात मिति चक्रवर्ती के सामने की घटना चित्र अपल पहाड़ पर का भगवान मोमटेश्वर के सामने
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अध्याय : दसवा ]
[ ८१६ प्रमाणित होता है कि महिलाए भी भगवान का अभिषेक कर सकती है। ये अभिषेक बड़े-बड़े प्राचार्यों के और एलाचार्य सिद्धान्त चकवर्ती विद्यानन्दजी महाराज व बड़े-बड़े भट्टारकों के व बड़े बड़े विद्वानों और श्रीमंतों के सामने हुआ था और महिलाओं ने भी किया था। कर्नाटक के मुख्यमंत्री और उनकी श्रीमती ने भी भगवान का अभिषेक किया था । पूर्व प्राचायों कृत शास्त्रों में भी प्रमाण मिलते हैं, इन्द्राणी ने भी जिनेन्द्रदेव का अभिषेक किया था।
ततः सुरपति स्त्रियोजिन भुपेत्य शच्यादयः । सुगंधित नु पूर्वकै मदुकरा समुद्वर्तनं ।। प्र चक्र रषिंचनं शुभपयोसिरुवर्धटैः । पयोधर भर निजे रि व समंसमा वजितैः ॥१६३५॥
हरिवंशपुराण, सर्ग अष्टात्रिंशः संपादक, डा. पं. पनालालजी साहित्याचार्य
सुमेरू पर्वत पर इन्द्र के अभिषेक करने के साथ इन्द्राणों ने भी घड़ों से भगबान का अभिषेक किया।
गृहीत मंध पुष्पादि प्रार्चनाः स परिच्छवा। . प्रकबा जगाम मैषाप्रातरेय जिनालयम् ॥ त्रिःपरोल्य ततःस्तुत्वा जिनांश्च चतुराशया। संस्नात्वा पूजायित्वा च प्रयाता यति संसयि ॥१६३६।।
गुरण भद्राचार्य, जिनदत्त चरित्र सर्ग १ अर्थकदासुता सा च सुधी मदन सुन्दरी। कृत्वा पंचामृतः स्नान जिनानां सुख कोटिदम् ॥१६३७॥
श्रीपाल चरित्र, बृहन्नेमिचंद्रकृत सदा वृषभसेना छ प्राप्य राज्ञी पदं महत् । दिव्या भोगान्प्रभुजाना पूर्व पुण्य प्रसावतः ॥१६३८।।.. पूजयंती जगत्पूज्यान जिनान् स्वर्गपवर्गवान् । दिव्यरष्ट महाद्रव्यैः स्नपनादिभिरूज्वलः ॥१६३६।।
मा. कथाकोष, तीसरा भाग पृष्ठ ४२१ इसी प्रकार संस्कृत श्लोकों से सिद्ध होता है कि इन्द्राणी और मदन सुन्दरी और वृषभसेनादि स्त्रियों ने भगवान जिनेन्द्र देव का अभिषेक किया था।
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८२० ]
[ गोः प्र. चिन्तामरिण
पूर्वस्माता तुलिप्तापि घोत वस्त्रान्विता परम् । षोडशाभरणोपेता स्याद्वधूः पूजयेज्ञ्जिनम् ॥१६४० ॥ सती atraditar faनयादि समन्विता । एकाग्रचित्ता प्रयजेज्जिनान् सम्यक्त्वमंडिता ।। १६४१॥
उमास्वामी श्री. पृ. ६३-६४
भावार्थ :-- स्त्रियों में कि जो स्त्री शील मंडित हो, विनयगुण को धारण करती है, सम्यक्त्व मंडित हो, जिनचित्त. प्रत्यन्त चंचल न हो ऐसी स्त्रियां स्नान कर धौत वस्त्र पहन कर शरीर पर लगाकर पहन कर भगवान जिनेन्द्र देव का अभिषेक पूजा कर सकती हैं। श्रावक और श्राविका दोनों को after rate है किसी भी शास्त्रों में निषेध नहीं आया । करना और न करना यह अपने पर निर्भर है कोई स्त्री अभिषेक करे तो दोष नहीं है, क्योंकि पुराणों में जैसी मैना सुन्दरी, अंजना यादि स्त्रियों ने किया । प्रात्मा छद्मस्थ के प्रत्यक्ष
उवदेसेणपरोक्संख्वं जह परिपादि ।
unfe सहेबाधित्यदि जीवोदिट्ठोयगादो य ।।१६४२ ।।
समयसार जयसेन. १९८ देखकर वह जाना जाता
जैसे किसी का परोक्ष रूप उदेश द्वारा तथा लिखा
है, वैसे ही यह जीव वचनों के द्वारा कहा जाता है तथा मन के द्वारा ग्रहण किया जाता है | मानों प्रत्यक्ष देखा गया व जाना गया है ।
तैसे असंयतं सम्यग्दृष्टि के वितराग भाव रूप मोक्षमार्ग का श्रद्धान भया, ता वा उपचार ते मोक्षं मार्गी कहिये, परमार्थ तं वीतराग भाव रूप परिणमै मोक्ष मार्ग होस । मोक्ष मार्ग प्रकाशक ६-४६३
प्रश्न : - क्या सम्यक्त्व अनुमान का विषय है ?
उत्तर :- पञ्चलब्धि का स्वरूप भली भांति : जाना होइ तो आपको समयदृष्टि का अनुमान भी न करें। कोई ऐसा भी कहे हैं, निश्चय करि भगवान सो मेरे सम्यक्त्व है, यह भी श्रद्धान मिथ्या है। यांत सम्यक्त्व अनुमान का विषय नाहीं ।
भूदरदास, चर्चा. १६.
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अध्याय : दसवा ]
[ २२१ सप्तम गुणस्थान का स्वरूप---
संजलगरगोकसायाणुछ प्रो मंदो जवा तदा होधि ।
अपमत्तेमुणो तेराय अपमत्तो संजदो होदि ॥१६४३॥ परम्परा से शुद्धोपयोग-----
___ असंयत सम्यग्दृष्टि-श्रावक-प्रमत्त संयतेषु पारम्पर्येण शुद्धोपयोग उपर्यपरि सारतम्येन शुभोपयोगो वर्तते । .
- व. द्रव्य. ३४.६४ चौथे, पांचवें; छठवें गुणस्थान में परंपरा से शुद्धोपयोग का साधक शुभोपयोग उत्तरोत्तर तारतम्यरूप वृद्धि हुए शुभ परिणामों रूप होता है।
निरतः कास्ननिवृतत्तौ भवतिमतिः समयसार भूतोयम् । यात्वेक देशविरतिनिरतस्तस्यामुपासको भवति ॥१६४४॥
सर्वथा स्व को आरम्भ भावना से निवृत्त रखना यह महाव्रत हैं। और महावत समयसार रूप है । एक देश निवृत होना अणुव्रत है इसमें भथ्यात्मा श्रावक समयसार का उपासक रहता है।
जो कात्सर्न निवृत्ति में मन, वचन, काय से हिंसा भरा, कोपी आदि के त्याग करने रूप निवृत्ति में लवलीन रहता है-तन्मय बना रहता है ऐसा वह यनि मुनि समयसार स्वरूप होता है । और जो इन पूर्वोक्त ५ पापों से एकदेश निवृत-स्याग रूपनिरत्त-लगा रहता है. वह उपासक देशविरति श्रावक-पाराधक का उपासक कहलाता है।
१. परभरा- उत्तरोत्तर क्रम से प्राप्त होना । परम्परा प्राप्त है ।
पारम्पर्यम [परम्पार + ण्यज्] इस परम्परा को प्रमाण मानना चाहिये ।
२. तारतम्य -- [तरतम + ण्यज्) क्रमांकन, सापेक्ष महत्व, अंतर । क्या प्रमत्त अप्रमत्त गुणस्थान में पाठों ही कर्मों का बंध होता है ?
चत्तारि पयडी ठारपाणि तिपि भुजगार अप्पपराणि । मूलपयडीसु एवं अवडिओ चउसुरणादयो ।।१६४५।।
पञ्संग्रह २४१ तथाहि--प्रमत्त प्रमत्तो वा अष्टौ कर्माणि बन्धन अपूर्व करणेऽनिवृतिकरणे च घटितः सन् आयुविना सप्त कर्माणि बन्धति ।।
विशेषार्थ :-- उक्त अर्थ का स्पष्टी करण इस प्रकार है । मिथ्यात्वं गुणस्थान से लेकर प्रमत्त अप्रमत्त गुणस्थान तक के जीव ज्ञाना बरणामादि पाठों ही कर्मों
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26.1
पान
८२२ ]
(गो. प्र. चिन्तामणि का बन्ध करते हैं । अपूर्व करण और अनिवृत्ति करण गुणस्थान वाले जीव आयु के मिना शेष सात कमो का दंभ करते हैं । शुद्धोपयोग का लक्षण
सुविविदपदस्थ जुत्तो-संजम-तय-संजुत्तोविगद रागो। . समणो समसुह दुक्खो, भरिणदो शुद्धो २ प्रायोति ॥१६४६।।
प्र. सा. ११४ पंचारित. १४२ मू० ५६५ जो यति स्व द्रव्यं और पर द्रव्ध को, सूत्रार्थ को भली भांति जानता है । जो भव्यात्मा प्रति पुरुष संयम और तप युक्त है। तथा जो बीतराग भाव से लबालब भरपूर है एवं सुख-दुःख, जिन्होंने समान मान रखा है, ऐसे श्रमण तपस्वी को परमागम में शुद्धोपयोगी कहा गया है।
प्रथरि रूपाध्यायो द्वावे तो हेलुतः समो। साधु साधुरिवारमनी शुद्धो शुद्धोपयोगिनौ ६१७४७॥
पंचाध्यायी २१६६४ अन्तरंग कारण की अपेक्षा विचार करने पर प्राचार्य और उपाध्याय ये दोनों ही समान हैं, साधु के समान प्रात्मज्ञ हैं, शुद्ध हैं और शुद्धोपयोग वाले हैं।
बहुरी जे मुख्यपने से निर्विकल्प स्वरूपाचरण विष ही निमग्न हैं । मो.प्र. २१५ भाव सामायिक का स्वरूपभाव सामायिकं सर्व जीयेषु मैत्री भावोऽशुभ परिणाम वर्जन वा ।
____ अनगारधर्मामृत टीका ८३१६ संसार के सभी जीवों पर मैत्री भाव रखना, अशुभ परिणति का त्याग कर शुभ एवं शुद्ध परिणति में रमण करना भाव सामायिक है।
सममेकत्वेन प्रात्मनि अयः प्रागमनपरद्रव्यभ्यो निवृत्य उपयोगयेस्य आत्मनि प्रवृत्तिः समयः । .मात्मा विषयोपयोग इत्यर्थः ......... अथवा समसमेराग द्वेषा भ्यामनुपहते मध्यस्थे प्रात्मनि अयः उपयोगस्य प्रत्तिः समायः स प्रयोजनमस्येति सामायिकम् ।
__गोम्मट्टसार, जीवकांड टीका गाथा ३६८८ __पर द्रव्यों से निवृत्ति होकर साधक को ज्ञान चेतना जब प्रात्म-स्वरूप में प्रवृत्त होती है, तभी भाव सामायिक होती है। राग द्वेष से रहित मध्यस्थ भावापन प्रात्मा सम कहलाता है, उस सम में गमन करना ही भाव समायिक है।
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अध्याय : दसवां 1
[ ८२३ प्रश्न :- क्या प्रमस मुरणस्थान में स्वरूपाचरण चारित्र होता है ?
उत्तर :---बहुरि इस मिथ्या चारित्र विष स्वरूपाचरण चारित्र का अभाव हैं । तातों याको नाम प्रचारित्र भी कहिए । बहुरि यहां परिणाम मिटै नाही, अथवा विरक्त नाहीं ताते याही का नाम असंयम कहिए हैं । वा अविरत-अविरत कहिये हैं, जातें पांच इन्द्रिय अर मन के विषयन विषै बहुरि पंचस्थावर अर वस · को हिंसा विर्ष, स्वछन्द न होय । अर इनिके त्यागरूप भाव न होय सोई असंयम वा अविरत बारह प्रकार का कह या है, सो कषाय भाव भए ऐसे कार्य होय हैं । तातै मिथ्या चारित्र का का नाम असंयम व अविरति जानना । बहुरी इस ही का नाम अविरत जानना । जाते हिंसा झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह इन पाप कार्यनि विर्षे प्रवृत्ति का नाम अव्रत है। सो इनका मूल कारण प्रमत्त योग कहा है। प्रमत योग है सौ कषाय मय है तातें मिथ्या चारित्र को प्रनत भी कहिये हैं ऐसे मिथ्या चारिन का स्वरूप कहा ।
मोक्ष मार्ग प्र. 4. टोडरमल ४१२३३-३४ बहुरि जे मुख्यपनै तो निर्विकल्प स्वरूपाचरण विषै हो निमग्न हैं ।
मोक्ष. मार्ग प्र. ११५ तप तपै द्वादश धरै वृषदशरत्न अय सेवे सका। मुनि साथमें वा एक विचरै चहैं नही भवसुख कदा ॥ यों हैं सकलसंयम चरित्र, सुनिए स्वरूपचरण अय। जिस होत प्रगट प्रापनी मिधिमिटपरकोप्रवृसि सब ॥
छहढाला ६७ बारह प्रकार के तपों को जो सदा तपते हैं, दश प्रकार के धर्मों को जो सदा धारण करते हैं, और रतन त्रय का सदा सेवन करने हैं, मुनियों के साथ व एकाकि विहार करते हैं और संसारिक सुखों की चाहना नहीं करते हैं, ऐसे मुनिराजों का यह सकल संयम है । अब निश्चय चारित्र कहते हैं अर्थात सकल संयंभ धारण करने के बाद प्रकट होने के अनन्तर स्वरूपाचरण चारित्र प्रगट होता है । और इसके प्रकट होने पर आत्मनिधि प्रकट होती है। और पर में जो जीव की प्रवृत्ति होती है वह मिट जातीहै।
१ मिच्छत्तस दु उदो जीवस्स प्रसद्हागतं । २ अण्णास्सदु उदयो जं जीवाणं अतच्चउवलद्धी । ३ उदो असंजमस्सदु जं जीवाणं हवेदि अविरमणं ।।
समयसार । १३२।।
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८२४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
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१ जीब के तत्व का अश्रद्धान है, वह मिथ्यात्व का उदय है। २ जीव के विपरीत ज्ञान है, वह अज्ञान का उदय है। ३ जीव का प्रत्याग रूप भाव है वह असंयम का उदय है। (जो है सकल संयम चरित सुनिये स्वरूपाचरण अब)
पं. दौलतराम जी स्वरूपाचरण चारित्र सप्तम गुणस्थान का नाम है। प्रात्मनो दर्शने दृष्टि ज्ञान छ योगिनः । स्वरूपाचरणे प्रोक्तं, चारित्रं विश्व वशिभिः ॥
धर्मसंग्रह श्रावकाचार १०११३७ सर्वज्ञ देव ने योगी पुरुषों का आत्मदर्शन (श्रद्धान) सम्यग्दर्शन आत्मज्ञानसम्यरज्ञान और स्वरूपाचारण चारित्र में रमण को सम्यक चारित्र कहा है।
कार्माधान किया रोधः स्वरूपा चरणं च यत् । .. धर्मः शुद्धोपयोगः स्यात् सैव चारित्र संज्ञकः ३-१६४८॥
पंचाध्यायी २१७६३ कर्मों के ग्रहण करने की क्रिया का रुक जाना ही स्वरूपाचरण है, वही धर्म है, वही शुध्दपयोग है और चारित्र है।
"चारिस खलुधम्मो"
प्रा. कुन्द. प्रवचनसार "स्वरूपे चरणं चारित्रम्"
आ. अमृत चन्द्र स्वरूप में चरण करना, रमरण करना सो चारित्र है।
वस्तु शुद्धद्रव्य शक्तिरूप शुद्ध परिणामिक परम भाव लक्षण पर निश्चय , मोक्षः है । स च पूर्वमेव जीवे तिष्ठतीदानी भविष्यतीत्येवं न।
वृ. द्रव्यसंग्रह, गा. .५७/पृ २१४ अर्थ-जो शुद्ध द्रव्य की शक्ति रूप पारिणामिक परम भावरूप लक्षण का धारक, परम निश्चय मोक्ष है, वह तो जीव में पहले ही विद्यमान है । वह परम निश्चय मोक्ष जीव में अब होगा ऐसा नहीं है।
तातें आत्मज्ञान शून्य भागमज्ञान भी कार्यकारी नाहीं । या प्रकार सम्यग्ज्ञान
HAMANET
MOTIONARY
MORNDINATOR
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अन्याय : दसवां ।
[८२५ के अर्थी जैन शास्त्रनि का अभ्यास करौं हैं, तो भी याकै सम्यग्ज्ञान नाहीं । ...
मोक्ष मार्ग. प्र. ७/३४६ मोक्षुत्रितहि जोइया मोक्खरण चितिउ होई। जेग रिसबद्ध जीवउ मोक्खु करे सइ सोइ ॥१६४६॥
परमात्म प्रकाश २/२२८ तं वगुण विशुद्ध जिरण सम्मत्तं सुमुक्खठारणाय । जं चरदिपाण जुत्त परमं । सम्मत्त चारित ॥१६५०।।
प्रा. कुन्दकुन्द ; चरि. पा. २/८ "सं चेवगुरण विशुद्ध तच्चेव सम्यक्त्वं गुरण विशुद्ध', नि: शङ्कितादिभि रष्टगुरणे विशुद्ध निर्मलं । जिरण सम्मत्तं सम्यवत्वं जगत्पति श्रीमद्भगवदर्हत् सर्वज्ञ . वीतरागस्य सम्बन्धिनी श्रद्धा रुद्रादि श्रद्धा न रहितं जिन सम्यक्त्वमुच्यते ।
निशंकित आदि पाठ गुणों से विशुद्ध-निर्मल सम्यस्त्व ही जगत्पति भगवान अर्हत्सर्वत्र-वीतराग सम्बन्धिनी श्रद्धान रूप होता है अर्थात् रागी आदि के श्रद्धान से रहित होता है । वही जिन सम्यक्त्व कहा है और जो सम्यग्ज्ञान सहित आचरण है, वह प्रथम सम्यक्त्व-सम्यक् चारित्र है ।
जिगरमाण विट्टि सुद्ध, पढमं सम्मत्त चरणं चारित । विदियं संजम चरणं, जिगणारण सदेसियं सं पि ॥१६५॥
__ चारित्र पर श्रा कुन्दकुन्द जिनेन्द्र के ज्ञान और उसकी श्रद्धा से शुद्ध प्रथम सम्यकत्वाचरण चारित्र होता है और दुसरा संयमाचरण चारित्र होता है ऐसा जिनेन्द्र देव ने कहा है। स्वरूप में रमण करना स्वरूपाचरण चारित्र है। स्वरूप में रमण करने की स्थिति को ही शुद्धोपयोग कहते हैं, उसे ही निश्चय चारित्र कहा गया है। प्रवचनसार की गा ५ की टीका में-तात्पर्य वृत्ति में जयसेन स्वामी ने कहा है। ... ..
___मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र गुण स्थान गये, 'तारतम्येनाशुभोपयोगः तदनन्तरं मसंयत सम्यग्यदृष्टि, देशविरत, प्रमतसंयत गुणस्थान अये तारतम्ये नः शुभोपयोगः तदनन्तरमप्रमश्रादि क्षीण कषायान्त गुरणस्थान षट्के तारतम्येन शुभदोपयोगः, तदा नन्तरं स योग्य योगी जिन गुणस्थान द्वये शुध्दोपयोगः फलमिति ।
... प्राचार्य श्री इस कथन से पं. दौलतरामजी के कथन का सामंजस्य बैठ जाता
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५२६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि है, कविवर ने मुनियों की क्रियाओं अर्थात् सराग चारित्र का वर्णन करके सातवें और उससे आगे के गुणस्थानों के वीतराग बारिवरूप स्वरूपाचरण के कथन की यहां प्रतिज्ञा की है।
प्रवचनसार गाथा ११ की तात्पर्य वृत्ति टीका में चारित्र के दो भेद बताये हैं. १ अपहत संयम २ उपेक्षा संयम । इन्हें ही संराग और वीतराग चारित्र अथवा शुभोपयोग और शुध्दोपयोम कहा है ! स्वरूपाचरण चारित्र शुध्दोपयोग ही है और वह सातवें गुणस्थान से प्रारम्भ होकर प्रामे आगे के गुणस्थानों में तारतम्य से निर्मल होता गया है । सो वहां ही स्वरूपाचरण चारित्र होता है। नीचे के गुण स्थानों में नहीं होता । चतुर्थ गुणस्थानों में सम्यक्त्वाचरण होता है । श्रास्मा ही तीर्थ है
तित्थहुदेउलिदेउजिणु सत्वविकोई भरोइ । बेहादेउलि जो भुगइ सो बुह कोयिहवेई ॥१६५२॥
तत्त्वसार ४३. नियमसार ६२ तीर्थ स्थान में व देवालय में श्री जिनेन्द्र देव हैं, ऐसा सब कोई कहते हैं परन्तु जो अपने शरीर रूपी मन्दिर में आत्म देव को पहिचानता है, वह कोई एक पण्डित है।
मूढा देवलि देउरवि सिलि लिप्पइ चित्ति । देहा देवलि देउ जिम सो बुज्झहि समचित्ति ॥१६५३।।
योगसार ४४ है मुढ देव देवालय में नहीं हैं, वह शिला में अथवा लिप्त चित्राकृति में भी नहीं है । देव जिनेन्द्र परमात्मा तो देह देवालय में है-विद्यमान हैं, उन्हें समचित वृत्ति से ही जाना जाता है । निमित्त की प्रबलता
वंसम मोहक्खबरणा पट्टधगो कम्मभूमि जो मणुसो। . . तित्थयर पायमूले केवल सुद केवलि मुले ॥१६५४॥
... लब्धिसार ११० __ जो मनुष्य कर्मभूमि में उत्पन्न हुआ है, तीर्थंकर केवली अन्य केवली के अथवा श्रुत केवली के पादमूल में रहता है, वहीं दर्गनं मोहनीय की क्षपणा का प्रार
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अध्याय : दसवां ।
[ १२७ म्भक होता है, क्योंकि दूसरी जगह ऐसी परिणामों की विशुध्दता नहीं हो सकती है। . शुद्धनय से प्रास्मा का स्वरूपः
जो पस्साब अप्पारण प्रबद्ध पुट्ट प्ररणरणयं णियदं । अविसेसमजुत्तं तं सुद्धरण्यं विधारणाहि ।।१६५॥ जो पस्सदि अप्पारणं प्रबद्धपुढे' प्ररणरणमविसेसं । अपदेस सुत्त मग्नं पस्सदि जिरण सासणं सव्वं ॥१६५६॥
समयसार१४/१५ अ, १ प्रश्न - यहां कोई कहे - शास्त्रनिर्ष आत्मा को कर्म नो कम से भिन्न प्रबद्ध
__ स्पष्ट कहा है सो कैसे कह्या है ?
उत्तर-~-सम्बन्ध अनेक प्रकार हैं, तहां तादात्म्य सम्बन्ध अपेक्षा आत्मा को कर्म नो कर्म से भिन्न कहा है। तहां द्रध्य पलटि करि एक नाहिं होय जाय है और इस ही अपेक्षा अबध्द अस्पृष्ट कहा है। बहुरिनिमितनैमित्तिक सम्बन्ध अपेक्षा बन्धन है उनके निमित्त से प्रात्मा अनेक अवस्था धरै हैं। तातै सर्वथा निबन्ध प्रापको मानना मिथ्यादृष्टि है।
मोक्षमार्ग प्र.५/२६१ शुद्धनयादेशात्त पयोगस्वभावस्यश्मनोऽप्रदेशत्वं ।
___ ग्रा, अकलकदेल, तत्वार्थवार्तिक ५/८/२० शुध्दनय की अपेक्षा उपयोग स्वभावी अात्मा अप्रदेशी है, क्षेत्र की अपेक्षा आत्मा असंख्यात प्रदेशी है । द्रव्य की अपेक्षा अप्रदेशी अखण्ड है।। व्यवहार नब भी कार्यकारी--
प्रदीप वदिति झेया व्यवहार नया श्रया । प्राधाराध्यतार्थानां निश्चयात्तद योगतः ॥१६५७॥
श्लोक वार्तिक ५/१६/२ निश्चय नय से सम्पूर्ण पदार्थ अपने-अपने शुध्द स्वरूप में अवस्थित हैं, न कोई किसी का आधार है और न कोई किसी का प्राधेय है, हा व्यवहार नय से
आधार व्यवस्था हो रही है, वस्त्र के समान जीव स्वकीय प्रदेशों का संकीच या विस्तार हो जाने से लोकाकाश से अनेक अवगाहतानों के अनुसार माथित हो
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५२८
[ गा. प्र. चिन्तामणि जो बहु जीवाणुरगहकारी यवहारणो सो चेव समस्ति । दथ्योति मरणावधारिय, गोदम थेरेरण मंगलं तस्थ कर्द ।।
- प्रा. वीरसेन स्वामी, जय धवला व्यवहार नय बहुजीबार्नुग्रहकारी है और वही-निश्चय से आश्रय किये जाने योग्य है, ऐसा मन में अवधारण करके ही गौतम देव ने महाकम्मपडि की प्रादि मंगलाचरण किया है। .. प्रश्न--यहां कोई कहे, शुभ भावनि से पाप की निर्जरा हो है पुण्य का बंध
· · हो है, शुद्ध भावनि ते दोउनि को निर्जरा हो है ऐसा क्यों न कहो ?
उत्तर- मोक्षमार्ग विर्षे स्थिति का तो घटना सर्व ही प्रकृतिनि का होय । वहां धुण्य पाप का विशेष है ही नाहीं पर अनुभाग का घटना तो पुण्य प्रकृतिनिका शुध्दोपयोग से भी होता नाहीं। उपरि उपरि पुण्य प्रकृतिनिकै अनुभाग का तीद बंध उदय हो हैं । पर पाप प्रकृति के परमाणु पसटि. शुभ प्रकृति रूप होच, ऐसा संक्रमण शुभ शुध्द दोऊ भाव होते होय । तातै पूर्वोक्त नियम संभव नाहीं । विशुध्दता हो के अनुसारी नियम संभव है।
· मोक्ष मार्ग प्र. पं टो ७४३४१ . मिथ्यादृष्टे वस्तु गजस्नानवत् बंध पूर्विका भवति । तेन कारणमिथ्या दृष्ट्यपेक्षया सम्यग्दृष्टि बन्धक इति । ..
समयसार २६८ प्रारम तत्त्व का विचार भव्य जीवों को
अहम्प्रत्यय वेद्यस्वाज्जीब स्यास्तित्वमन्ययात् । एकोदरिद्र एकोहि श्रीमान इसि च कर्मरणमः ॥ .
पंचाध्यायो ।।१६५८।। इस शरीर में "मैं हूँ, मैं हूँ'' इस प्रकार की जो अनुभूति या ज्ञान होता है, उस ज्ञान से जाना जाता है कि शरीर के भीतर जीव रूप एक शक्ति विशेष है, वह स्वतन्त्र है अथवा मानसिक' प्रत्यय जन्य अहं तयां अवबोध प्रात्मास्तित्व का परिचायक है। इसी प्रकार कोई दरिद्र, कोई श्रीमान्, कोई सर्वाङ्ग और कोई विकलाङ्ग दृष्टि गत होते हैं, वे सर्व कर्म का बोध कराते हैं।
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अध्याय : दसवां ]
[ ५२६
स्वसंवेदनतः सिद्ध. सदात्मा वाद्य वजितात् । ..
सस्य मादि विवर्तात्मन्यात्मन्य नु पसितः ।।१६५६।। ...आस्मा स्वतः स्व संवेदन से सिद्ध है, इसमें कोई भी प्रत्यक्षादि प्रमाणों से बाधा नहीं पा सकती है। पाल्मा को पृथ्वी आदि की पर्याय मनाने से चिद रूप आत्मा को सिद्धो नहीं हो सकती. अर्थात स्व. संवेदन ज्ञान नहीं हो सकेगा। ऐसा होने पर घट-पटादिवत् प्रात्मा जड रूप हो जायेगी, परन्तु यह प्रत्यक्ष बाधित है । इसलिए ताकिक शिरोमरिण प्रा. विद्यानंद स्वामी ...... .
श्लोक वातिक. गा. १०२ स्वसंवेदनमप्यस्य बहिः करण वर्जनात् । अहंकार पदं स्पष्टम बाधमनु मूर्ययते ॥१६६०।।.
बाह्य पञ्चेन्द्रियों से परे “मैं मैं" इस प्रकार बाधा रहित प्रतीति विशद रूप से स्वसंवेदन प्रत्यक्ष इस अन्तरंग यात्मा का अनुभव कराता है ।
सर्वोहि अात्मास्तित्त्वं प्रत्येति न नाहमस्मीति । यदि हि नात्मत्व प्रसिद्धिः स्यात् सवों लोको माहम स्मीति प्रतीयात्
(इ. स. १/१/१/ पर शांकर भाष्य) अहमिति प्रत्यगात्मनि भावात् पराभावादर्थान्तर प्रत्यक्ष ॥१४॥
(अ. ३ आ. २) __ "मैं हूँ इस प्रकार स्वात्मा में अनुभूति होना और पर पदार्थ में न होना, यह प्रात्मा का मानसिक प्रत्यक्ष है।"
"मैं हूँ" यह प्रत्येक मनुष्य को होने वाली प्रतीति ही प्रात्मा के अस्तित्व का सर्वोत्तम प्रमाण है।
लोकमान्यतिलक (दे. सू. शा. भ. ३३, ५३, ५४, गीता १४/४, पारं न याति मेधाऽस्य न मनो नेन्द्रियाणि वा। म गति स्तंत्र शास्त्रारणा, विदुषां न तपस्विनाम् ।।१६६१॥
उस आत्या का पार बुद्धि, मन, इन्द्रियां नहीं पा सकती और शास्त्र भी यथार्थ रूप से वर्णन नहीं कर सकते. इसी प्रकार विद्वान और तपस्वी भी उसका पार नहीं पा सकते हैं।
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८३० ]
[ गो. प्र. चिन्तामरि
अस्थात्मा तु स्वतः सिद्धः स्वानु भूत्यte गोचरः ।
ज्ञान,
दर्शन,
रूपोऽयं
परमानन्द मन्दिरम् ॥१६६२॥
१. आत्मा है वह स्वतः सिद्ध है, २. स्वानुभूत्यैक गम्य है, ३. ज्ञान दर्शन स्वरूप है और मानों ४ परमानन्द का साक्षात् मन्दिर है ।
प्रियो देहात् प्रियाः पुत्रात् प्रियो मातुः पितुस्तथा ।
पत्युः प्रियः प्रियो नार्या मित्रात् भ्रातुः प्रियः प्रियः ॥१६६३॥ न शोयोऽयं न मेयोऽयं ज्ञेयोमेयोस्तथैव च ।
ज्ञातारं न जानीयात् द्रष्टारं लोकयेत् किम् ।।१६६४ ।। श्रस्य नेत्रमेव वा ।
प्रारण एव च ।।१६६५।।
मनसः स मनोज्ञेयः प्रारंगस्य यह आत्मा श्रोत्र का श्रोत्र और चक्षु का चक्षु है, क्योंकि श्रोत्र स्वयं सुनने में वक्षु देखने में असमर्थ हैं। ये आत्मा के कारण ही विषयों को ग्रहण करते हैं । इसी प्रकार यह मन का मन और प्राणों का यह (आत्मा) प्राण है। अर्थात् सभी इन्द्रियामा द्वारा प्रवृत्त होती हैं ।
तात्मकः सत्यं निर्विकल्पो निरामयः ।
fafaशेष निराकारो निरालम्बी निराकुलः ।।१६६६॥ शरण्योऽयं वरेण्योऽयं सुरभ्योऽयञ्च योगिनाम् ।
सर्वथा कल्पनातीतः सर्व शक्ति समन्वितः ॥१६६७॥r
यह ग्रात्मा द्वैताद्वैतात्मक है, सत्य स्वरूप है, निविकल्प और निरामय रूप
है, निविशेष है, निराकार है, निरालम्ब है, निराकुल है ।
यह आत्मा शरण्य है, वरेण्य है तथा योगियों के लिए परम रम्य है । यह कल्पनातीत और सर्वशक्तिमान है ।
तं विद्यात् सर्व भावेन सर्वयत्नेन चाप्नुयात् ।
atra चिन्तनं कुर्यात् "निजानन्द" निजात्मनि ।। १६६८।। सर्वभावों और प्रयत्नों से इस श्रात्मा को जानना चाहिये । रवि होदि अप्पमतो सयमसो जाणजोदु जो भावो । जो सो दु सो क्षेत्र ॥। १६६६॥ एवं भांति सुद्ध णादो
समयसार प्रा. कुन्द कुन्द
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...Mammm.
अध्याय : दसवां ।
[ ८३१ जो एक ज्ञायक भाव है, यह अपने आप से सिद्ध है, किसी से उत्पन्न नहीं हुना है । उस भाव से तो अनादि सत्ता रूप है और कभी उस ज्योति का विनाश नहीं होता, इसलिए अनन्त है, नित्य उद्योत रूप है, इस कारण क्षणिक नहीं है । ऐसी स्पष्ट प्रकाशमान ज्योति है, वह संसार की अवस्था में अनादि बंध पर्याय की निरूपणा (अपेक्षा) से कर्मरूप पुद्गल द्रव्य सहित दूध, जल की तरह होने पर भी द्रव्य के स्वभाव की अपेक्षा से देखा जाय तब तो जिसका गिटना कठिन है, ऐसे कषायों के उदय की विचित्रता से प्रवृत्त हुए पुण्य पाप के उत्पन्न करने वाले समस्त अनेक रूप शुभ अशुभ भाव के स्वभाव से परिणमन नहीं करती है। ज्ञायक भाव से जड़भावरूप नहीं होती। इसलिए प्रमत्त भी नहीं है और प्रगत नहीं है, यही . मस्त अन्य द्रव्यों के भावों से भिन्न रूप में सेवित हुआ 'शुद्ध' ऐसा कहा जाता है। और इसका ज्ञेयाकार होने से ज्ञायकत्व प्रसिद्ध है। जैसे दाहने योग्य जो दाह्य ईंधन यद्यपि उसके आकार अग्नि होती है। इसलिए अग्नि को दहन कहते हैं, तो भी अन्नि तो अग्नि ही है । ईंधन अग्नि नहीं है । उसी तरह ज्ञेय रूप आप नहीं है, आप तो ज्ञायक रूप ही है । इस तरह उस ज्ञेय के द्वारा की हुई भी इस आत्मा के अशुद्धता नहीं है, क्योंकि ज्ञेयाकार अवस्था में भी ज्ञायक भाव द्वारा जाना गया जो अपना ज्ञायकत्व वहीं स्वरूप प्रकाशन की जानने की अवस्था में भी ज्ञायकरूप ही है, ज्ञेय रूप नहीं हुमा । क्योंकि अभेद विवक्षा से कर्ता तो आप शायक और अपने को कर्म जाना---ये दोनों एक आप ही है, अन्य नहीं है । जैसे दीपक घटपटादि को प्रकाशित करता है, उनके प्रकाशने की अवस्था में भी दीपक ही है। वही अपनी ज्योति लौं के प्रकाशने की अवस्था में भी दीपक ही है, कुछ दूसरा नहीं है ।
भावार्थ-अशुद्धता परद्रव्य से संयोग से आती है । वहां मूल द्रव्य तो अन्य द्रव्य रूप होता ही नहीं । कुछ पर द्रव्य के निमित से अवस्था मलिन हो जाती है । उस जगह द्रव्यदृष्टि से तो द्रव्य जो है वही है और पर्याय दृष्टि से देखा जाय तब वह मलिन ही दिखता है । उसी तरह प्रात्मा का स्वभाव ज्ञायकत्व मात्र ही है, और उसकी अवस्था पुद्गल कर्म के निर्मित से रागादि रूप मलिन है, वह पर्याय है । उसकी दृष्टि से देखा जाये तब मलिन ही दीखता है। और द्रव्यदृष्टि से देखा जाय, तब ज्ञायकत्व तो ज्ञायकत्व ही है, कुछ जडत्व नहीं हुमा । यहां पर द्रव्य दृष्टि को प्रधान कर कहा है। जो प्रमत्त अप्रमत्त का भेद है, वह तो पर द्रदय की संयोगजनित पर्याय है.
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
यह अशुद्धता द्रव्यदृष्टि में. गौरंग है । द्रव्यदष्टि शुद्ध है, इसलिए आत्मा ज्ञायक है, इस कारण से प्रमत्त अप्रमत्त नहीं कहा जाता । 'ज्ञायक' ऐसा नाम भी ज्ञेय के जानने से कहा जाता है, क्योंकि ज्ञेय का प्रतिबिम्ब जब झलकता है, तब वैसा ही अनुभव में आता है । सो यह भी अशुद्धता इसके नहीं कही जा सकती, क्योंकि जैसे ज्ञेय ज्ञान में प्रतिभासित हुआ, वैसे ज्ञायक का ही अनुभव करने पर ज्ञायक ही है, यह मैं जानने वाला हूं, सो मैं ही हूं, दूसरा कोई नहीं है-- ऐसा अपना अपने से अभेद रूपं अनुभव हुआ, तब उस जानने रूप क्रिया का कर्ता पाप ही है और जिसको जाना सो कर्म भी
आप ही है। ऐसे एक ज्ञायकत्व मात्र आप शुद्ध है, यह शुद्धनय का विषय है । अन्य पर संयोगजनित भेद हैं, वे सब भेद अशुद्ध द्रव्याथिकनय के विषय हैं । शुद्ध द्रव्य की दृष्टि में यह भी पर्यायाथिक ही हैं, इसलिए व्यवहार नय ही है-ऐसा आशय जानना । यहां ऐसां भी जानना कि जिनमत का कथन स्यावाद रूप है, इसलिए शुद्धता और अशुद्धता दोनों वस्तु के धर्म हैं; अशुध्दनय को सर्वथा असत्यार्थ नहीं मानना । जो वस्तु धर्म है, वह वस्तु का सत्व है, परद्रव्य के संयोग से ही हुआ भेद है। यहां अशुध्द नय को हेय कहा है, उस अशुध्द नय का विषय संसार कहा है। जिसमें आत्मा क्लेश भोगता है। जब प्रात्मा पर द्रव्य से भिन्न तब संसार मिटे और तभी क्लेश मिटे, इस तरह दुःस्त्र मेटने के लिए शुध्दनय का प्रधान उपदेश है । और अशुध्दनय को असत्यार्थ कहने से ऐसा नहीं समझना कि यह बस्तु धर्म सर्वथा ही नहीं, प्रकाश के फूल की तरह असत् है। ऐसे सर्वथा एकान्त समझने से मिथ्यात्व होता है । इसलिए स्याद्वाद का शरण लेकर शुध्दनय का पालंबन करना चाहिये, स्वरूप की प्राप्ति होने के पश्चात् शुध्दनय का भी प्रालंबन नहीं रहता । जो वस्तु स्वरूप है, वह है-यह प्रमाण दृष्टि है, इसका फल वीतरागता है, ऐसा निश्चय करना योग्य है। यहां पर जो 'प्रमत्त अप्रमत नहीं है। ऐसा कहा है, वह गुणस्थान की परिपाटी में छठे गुरणस्थान तक तो प्रमत कहा जाता है और सातवें से लेकर अप्रमत्त है । सो ये सभी गुण-स्थान प्रशुध्दनय के कथन में है, शुध्दनय से प्रात्मा ज्ञायक ही है। .
कुन्दकुन्दाचार्य-समयसार, गा. नं. ६ का अर्थ शुद्धोपयोगी का लक्षण
सुधिदिद पदस्थ जुत्तो, संजम, लय, संजसो विगदरागो। समरणोसम सुह दुक्खो, भरिणको शुद्धो व प्रोगोति ।।१६७०॥
NAYASAHARANPrammeme--
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अध्याय : दसवां ]
प्रा. कुन्द कुन्द, मूलाचार, ५१६४/प्र. सा. १४ पृ. १४२ जो यति स्वद्रव्य और परद्रव्य को, सुत्रार्थ को अच्छी तरह से जानता है । जो भव्यात्मा यति पुरुष संयम और तप युक्त है तथा जो वीतराग भाव से लबालब भरपूर है एवं सुख व दुःख जिन्होंने समान मान रक्खा है। ऐसे श्रमण को परमागम में शुद्धोपयोगी कहा है। एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय पर्यंत जीव मात्र के प्रति समता भाव रखना मैत्री है। "प्रगकंपासुद्ध बोगो विय पुण्गास्स पासव द्वारं ।
शिवार्य. भगवति. पा. १६२४ अणुकम्पा और शुद्धोपयोग पुग्यास्त्र के द्वार हैं । "पृष्गास्मासव भूदा अणकम्पा शुद्ध एव उबोगो" ॥१६७१॥ .
___ मू. ५/४८ जयवधवल ५२ पृ. ५३ शुध्दोपयोग और अनुकम्पा भी निश्चय से पुण्यास्त्रव के कारण हैं।
अणुकम्पा हृदय क्षेत्र की वह पवित्र गङ्गा है, जो अमृत रस से भरपुर है । सामायिक का सच्चा अधिकारी वही है, जो अनुकम्पा के रस से अपने समस्त हृदय विकारों का प्रक्षालन कर लेता है । "प्रत्र शुध्दोपयोगाभिमुखस्य शिक्षण मुक्तम्"
नियमसार गा, १४८ यहां शुध्दोपयोगाभिमुख जीव को शिक्षा कही है। "राग'ष रहित परिणाम सो शुध्दोपयोग” ।
मोक्ष मार्ग प ८/४२० द्रव्यानुयोगविर्षे प्रात्म परिणाम निकी मुख्यता करि निरूपण कीजिये हैं।
असंयतसम्यग्दृष्टि-भावक-प्रमत संयतेषु पारम्पर्येण शुध्दोपयोग साधक, उपर्यु परितार तम्येन शुभोपयोगो वर्तते.
वृ. द्र. सं. ३४/५ १४ चौथे, पांचवें और छठे गुणस्थान में पारम्पर्यग-परम्परा से शध्दोपयोग का साधक शुभोपयोग उत्तरोत्तर वृश्दिरुप तारतम्य रुप से शुभ परिणाम होते हैं।
सम्मं विदिर पदस्थाचत्ता उहि बहिस्थमज्भत्थं । . विसयेसु सार सत्ता में सुत्ति रिपट्ठिा ॥१६७२।।
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हो. चिन्तामणि जो सम्यक् रूप से पदार्थों को जानते हैं और बाह्य तथा अन्तरंग परिग्रह को छोड़कर पांचों इन्द्रियों के विषयों में अनासक्त है, उन शुध्दात्माओं को शुध्दोपयोगी कहा है।
कर्माधान क्रिया रोधः स्वरूया चरखं च यत् । धर्मः शुद्धोपयोगः स्यात् सैष चारित्र संज्ञकः ॥१६७३।।
कर्मों के ग्रहण करने की क्रिया का रुक जाना ही स्वरूपाचरण है, वहीं धर्म है । वही शुध्दोपयोग है और वहीं चारित्र है।
प्रश्न :-शुद्धोपयोग और अशुद्धोपयोग का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-सकल विमल केवल ज्ञान दर्शन द्वयं शुध्दोपयोगः, मतिज्ञानादि रूपो विकलोऽशुध्दोपयोग इति द्विविधोपयोगः। अव्यक्त सुख दुःखानुभव रूपा कर्मफल चेतना, तथैव भतिज्ञानादि, मनपर्थयः पर्यन्तम शुध्दोपयोग इति । स्वेहा पूर्वेष्टा निर्विकल्प रूपण विशेष राम द्वेष परिणमनं कर्म चेतना, केवल ज्ञान रूपा शुध्द चेतना इत्युक्त लक्षणोपयोगश्चेतना च यत्र नास्ति स भवत्य जीव इति विज्ञेयः ।
वहद द्रव्य सं. गा. १५ पृ. ५० पूर्णनिर्मल केवलशान, केवलदर्शन ये दोनों शुद्ध उपयोग हैं और मतिज्ञान प्रादि रूप विकल-अशुध्द--उपयोग है, इस तरह उपयोग दो प्रकार का है । अव्यक्त सुख दुःखानुभव स्वरूप कर्मफल चेतना है । तथा मतिज्ञान प्रादि मन: पर्यय तक चारों ज्ञान रूप अशुद्ध उपयोग तथा निज चेष्टा पूर्वक, इष्ट, अनिष्ट, विकल्प रूप से विशेष राम द्वष रूप जो परिणाम हैं, वह "कर्भ चेतना" है। केवल ज्ञान "शुद्ध चेतना" है । इस तरह पूर्वोक्त लक्षण वाला उपयोग तथा चेतनायें जिसमें नहीं है, वह "अजीव" है, ऐसा जानना चाहिए। शुद्धोपयोग निर्विकल्प है.---
शुद्धस्यात्मोपयोयः स्वयं स्यात् ज्ञान चेतना । निर्विकल्पः स एवार्थदर्था संक्रान्त सङ्गते ।।१६७४।।
शुद्धात्मानुभव रुप जो उपयोगात्मक "ज्ञान चेतना" है, वह भी वास्तव में निर्विकल्पक ही है । क्योंकि जितने काल तक शुद्धात्मानुभव होता है, उतने काल तक ही उपयोगात्मक ज्ञान चेतना है (यह भी वास्तव में) कहलाती है । और उस काल में शुद्धात्मा से हटकर दूसरे पदार्थो की ओर ज्ञान जाता नहीं है, इसलिए उस समय
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अध्याय: दसवां ]
संक्रान्ति के न होने से उपयोगात्मक ज्ञान को भी निर्विकल्पक कहा गया है ।
पूजा ।
द्रव्य पूजा
प्रश्न : श्रावकों को जिनाभिषेक व जिनपूजा किसप्रकार करना
--
चाहिये?
उत्तर :- पूजा चार प्रकार की है, द्रव्य पूजा, क्षेत्र पूजा, काल पूजा, भाव
नव्वेरपय दव्वस्य जा पूजा जागदव्यपूजा सा ।
दरण मंथ - सलिलाइन भरिए कार्यव्वा ।।१६७५।।
[ ८३५
जलादि द्रव्य से प्रतिमादि द्रव्य की जो पूजा की जाती है, उसे द्रव्य पूजा जानना चाहिये । वह द्रव्य से अर्थात् जल-गंध प्रादि पूर्व में कहे गये पदार्थ समूह से ( पूजन सामग्री से ) करनी चाहिये ।
तिविहा बव्वेपूजा सच्चित्ताविस मिस्स भएन । पञ्चक्ख जिलाई सचित्तपूजा जहाजोगं ॥१६७६॥ तेस व सरीराणं वन्दसुदस्स वि श्रचितपूजा सा! atrator कोरइणान्वा मिस्सपूजा सा ॥१६७७॥
द्रव्य पूजा तीन प्रकार की है- सचित, प्रति और मिश्र । प्रत्यक्ष उपस्थित जिनेन्द्र भगवान् और गुरु यादि का यथायोग्य पूजन करना सो सचित्त पूजा है । उनके अर्थात् जिन तीर्थंकर आदि के शरीर की और द्रव्यश्रुत अर्थात् कागज आदि पर fafe बद्ध शास्त्र की जो पूजा की जाती है, वह अचित्त पूजा है । और जो दोनों का पूजन किया जाता है वह मिश्र पूजा है ।
क्षेत्र पूजा-
जिस जम्मर-रिपक्खमणेराजुप्पत्तीए तित्थमिहेसु शिसिहोसुरयेत पूजा पुच्वविहाणेण कायन्वा
।।१६७६।।
जिन भगवान् की जन्म कल्याणक भूमि, दीक्षा भूमि, ज्ञानकल्याणक भूमि, निर्वाण भूमि आदि स्थानों की, तीर्थ, चिन्ह स्थान और निषिधिका स्थानों की पूर्वोक्त fafa से पूजा करना यह क्षेत्र पूजा है ।
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८३६ ]
काल पूजा
[ गो. प्र. चिन्तामणि
गम्भावयार-जम्भाहितेय - क्खिख खास-रिवारणं । जम्हि दिरणे संबाद जिरपण्हवणंतद्दिणो कुज्जा ॥१६७९ ॥ इच्छारस सप्पि-दहि-खीर-गंध-जलपुष्णा विविहल से हि पिसि गंगाह कायम् ॥
:
1
दीस रविवसे तहा अण् उचियपव्वेसु । अंकोरइ जितमहिमं विष्णेया काल पूजा सा 11
जिस दिन तीर्थंकरों के गर्भावतार जन्माभिषेक, निष्क्रमण कल्याणक, ज्ञान कल्याणक और निर्वाण कल्याणक हुए हैं, उस दिन इक्षुरस, घृतं दधि, क्षीर, गंध और जल से परिपूर्ण विविध अर्थात् अनेक प्रकार के कलशों से जिन भगवान् का अभिषेक करे तथा संगीत, नाटक आदि के द्वारा जिन गुणगान करते हुए रात्रिजागरण करना चाहिये। इसी प्रकार नन्दीश्वर पर्व के दिनों में तथा अन्य भी उचित दिनों में जिन महिमा की जाती है, वह कालं पूजा है ।
भाव पूजा
परम भक्ति के साथ जिनेन्द्र भगवान के अनन्त चतुष्टय आदि गुणों का कीर्तन करके जो त्रिकाल वंदना को जाती है, उसे निश्चय से भाव पूजा जानना चाहिये । अथवा पंच णमोकार पदों के द्वारा अपनी शक्ति के अनुसार जाप अथवा स्तोत्र अर्थात् गुणगान करने को भाव पूजा जानना चाहिये । अथवा चार प्रकार का ध्यान करना भी भाव पूजा है ।
श्रष्ट द्रव्य से पूजा---
माहिऊपसिसिरकर किरपरिगयर धवलरयर्यागारं ।
मोत्ति - पवाल- मरय सुवण-मणि खचिय वरकं ।। १६८० ॥ ॥ समवत्त- कुसुम कुवलय रजविजर सुरहि-विमल - जलभरियं । विविज्जियो तिष्णिधारा ॥१६८१।।
जिणचरण कमलपुर
मोती, प्रवाल, मरकत, सुवर्ण और मणियों से जटित श्रेष्ठ कण्ठ वाले, शतपत्र (रक्त कमल ) के पराम से पिंजरित एवं सुरभित विमल जल से भरे हुए शिशिर कर ( चन्द्रमा की किरणों के समूह से भी प्रति धवल रजत (चांदी) के भुगार ( भारी ) को लेकर जिन भगवान् के चरण कमलों के समाने तीन धाराएँ छोडना चाहिए ।
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अध्याय : दसवा ]
[ ८३७ कापूर-कुकुमायरू-तुरूक्कमीसेरख चंदरणरसेरण । वरबहलपरिमला मोय बासियासा समूहेस. ।।१६८२॥ वासाणु मागसंपत्त भुइय मत्तालिराव मुहलेण । सुरमउडधिटु बलरणं भत्तीएसमलहिज्जजिणं ।।१६८३॥
कपूर, कुम्कुम, अगर, तगर से मिश्रित, सर्व श्रेष्ठ विपुल परिमल (सुगन्ध) के आमोद से आशा समूह अर्थात् दशो दिशाओं को आवासित करने वाले और सुगन्धि के मार्ग के अनुकरण से आये हुए प्रमुदित एवं मत्त भ्रमरों के शब्दों से मुखरित, चंदन रस के द्वारा, (निरन्तर नमस्कार किये जाने के कारण) सुरों के मुकुटों से जिनके चरण घिस गये हैं । ऐसे श्री जिनेन्द्र को भक्ति से विलेपन करे।
ससिकतखंड विमलेहि विमल अलसित्त अइसुयहि । । जिरणपडिमपइट्ठयज्जिय विशुद्ध पुष्णं कुरेहि व ॥१६८४॥ वरकमालसालितंडल नदि सुशि दोह सयलेहि । मणुय-सुरासुर महियं पुज्जिज्ज जिणि दपय जुपलं ॥१६८५॥ .
चन्द्र कान्त मणि के खंड समान निर्मल तथा विमल (स्वच्छ) जल से धोये हुए और अति सुगन्धि, मानो जिन प्रतिमा की प्रतिष्ठा से उपार्जन किये गये विशुद्ध पुण्य के अंकुर हो हो, ऐसे अखंड और लंबे उत्तम कलमी और शालिघान्य से उत्पन्न तन्दुलों के समूह से मनुष्य, सुर और असुरों के द्वारा पूजित श्री जिनेन्द्र के चरण युगल को पूजे।
मालइ-कयंब कणयारि-चक्यासोय-उल-तिलएहि । मंदार-णायचंपय-पउमुप्पल-सिटु वारेहिं ॥१६८६।। कणवर मल्लियाहिं कचरणार-मचकुदकिकराहि । सुरवणज जूहिया-पारिजातय-जासवरण-टगरेहि ॥१६८७॥ सोवण्ण-रूप्पि-मेहिय-मुत्तदामेहि- बहुधियध्येहि । जिरणापय-पंकय जुपलं पुजिज्जरिंच सयमाहि ॥१६५८।।
मालती, कदम्ब, कर्णकार (कर), चंपक, अशोक, बकुल, तिलक, मन्दार, नाग, चम्पकपा (लाल कमल), उत्पल (नीलकमल), सिंदुबार (वृक्षविशेष या निर्गुण्डी) काबोर (कर) मल्लिका, कचनार, मचकुन्द, किकरात् (अशोक वृक्ष), देवों के नन्दन
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S
३८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि वन में उत्पन्न होने वाले कल्पवृक्ष, जुही, पारिजातक, जयाकुसुम और तगर (आदि उत्तम वृक्षों से उत्पन्न ) पुष्पों से तथा सुर्वण चांदी से निर्मित फूलों से और नाना प्रकार के मुक्ता फलों की मालाओं के द्वारा सौ जाति के इन्द्रों से पूजित जिनेन्द्र के पद पंकज युगल को पूजे ।
हि-दुद्ध-सपिमिस्सेहिकमल afg- विजरोहिय रूपय सुवण्ण-कैसाइथालिणिएहि विविह भक्तेहि ।
पुज्जं विस्थारिज्जो भत्तीए जिणिदयपुर श्री ।। १६६०।।
चांदी, सोना और आदि की थालियों में रते हुए दही, दूध और घी में मिले हुए नाना प्रकार के चांवलों के भात से त्रेसठ प्रकार के व्यंजनों से तथा नाना प्रकार की जाति वाले पकवानों से और विविध भक्ष्य पदार्थों से भक्ति के साथ जिनेन्द्रचरणों के सामने पूजा को विस्तारे अर्थात् नैवेध से पूजन करे ।
भत्तेहबहुप्यारेहि । बहुविकण एहिं ।। १६८९ ।।
पोहाभियक्तेहिघूमरहि एहि ।
मंदं चल मंदाणि लव से खच्चंत प्रचहि ॥१६६१॥ tree महत्व दूर मवसारियंधयारेदि ।
जिण चरणकमलपुरो कुज्जिरयां सुभप्तीए । १६६२।।
अपने प्रभा समूह से अमित ( गणित ) सूर्यो के समान तेज वाले अथवा अपने प्रभा पुञ्ज से सूर्य के तेज को भी तिरस्कृत या निराकृत करने वाले धूम-रहित तथा धीरे-धीरे चलती हुई मन्द वायु के वश से नाचती हुई शिखात्रों वाले और मेघ पटल रूप, कर्म समूह के समान दूर भगाया है, अन्धकार को जिन्होंने ऐसे दीपकों से परम भक्ति के साथ जिन चरण कमलों के प्रागे पूजन की रचना करे अर्थात् दीप से पूजन करे ।
काला रूह चंदह कप्पूर सिल्हारसाइदव्वेहिं । शिष्यख धूम वसोहि परिमलाय त्तियालीहि ।।१६६३|| उगसिहादेसिय सन्ग- मोक्ख मगेहि बहल धूमेह
धूविज्ज जिरिंदपयार विव जुयलं सुरिदणुयं ॥। १६६४।। कालागरु, अम्बर, चन्द्रक, कर्पूर, शिलारस ( शिलाजीत ) श्रादि सुगंधित द्रव्यों से बनी हुई, जिसकी सुगन्ध से लुब्ध होकर भ्रमर आ रहे हैं तथा जिसकी ऊँची
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अध्याय : दसवां ।
[ ८३६ शिखा मानो स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग ही दिखा रही है और जिसमें से बहुत-सा धुआं निकल रहा है, ऐसी धूप को बत्तियों से देवेन्द्रों से पजित श्री जिनेन्द्र के पादारविंदयुगल को धूपित करे अर्थात् उक्त प्रकार की धूप से पूजन करे।
जंबीर-मोच-दाडिम-कवित्थ-परणस-सालिएरेहि । हिताल-ताल-खज्जूर-रिंगबु नारंग-चारेहिं ॥१६६५॥ पूईफस-तिबु-मामलय-जंबु-विल्लाइ मुराहि मिठेहि।। जिरणपयपुर प्रो रयर्स फलेहि कुज्जा सुपक्केहि ॥१६६६॥
जंबीर (नीबू विशेष), मोच (केला), दाडिम (अनार), कपित्थ (कवीट या कैंथा), पनस, नारियल, हिताल, ताल, खजूर, निम्बु, नारंगी, अचार (चरोंजी), पूगीफल (सुपारी), तेन्दु, आंवला, जामुन, बिल्वफल आदि अनेक प्रकार के सुगंधित, मिष्ट और सुपक्व फलों से जिन-चरणों के आगे रचना करे अर्थात् पूजन करे ।
अधिह मंगलाणिय बहुविह पूजो वयरवन्वारिण । धूवदहणाइ तहा जिगपूयत्यं वितीरिज्जा ।।१६६७॥
पाठ प्रकार के मंगल-द्रव्य और अनेक प्रकार के उपकरण द्रव्य तथा धूपदहन (धूपायन ) आदि जिन-पूजन के लिये वितरण करे। .
वसुनन्दी श्रावकाचार, वसु. प्राचार्य, पृ. १२६ सोम देव सुरि, उपासकाध्ययन, रविषेणाचार्यकृत, पद्मपुराण, भावसंग्रह गुणभद्राचार्य कृत, पूज्यपादाचार्य कृत अभिषेक पाठों में पूरा वर्णन, पंचामृताभिषेक और अष्टद्रव्यार्चना का वर्णन मिलता है, वहां से देखें । ये मूलसंध के प्राचार्य वसुनन्दी सैद्धान्तिक देव हैं, प्रामाणिक प्राचार्य हैं । इन्हि का मंतव्य हमने यहां दिया है । आगे और भी विशेष वर्णन करेंगे। प्रश्न :-मुनिराज ओ केशलोंच करते हैं, सो कहां-कहां का केश लोंच करते
हैं और कहां-कहां का नहीं ? उत्तर :- मुनिराज शिर, दाड़ी, मूछ के केश उखाडते हैं। कोख और नीचे लिग बृषरण के केश नहीं उखाड़ते हैं। कांख और लिंग वृषरण के केशों की रक्षा करते हैं । ऐसी आम्नाय है, मुनियों को लोंच करना इसी प्रकार कहा है । चारित्रासार में लिखा है।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि "शिरःमुखस्मश्रुलोचोप्रधकेशरक्षणमिति" इसी प्रकार इन्द्रनंदी सिद्धान्त चक्रवर्ती ने नीतिसार में लिखा है। "अचेलत्वं शीर्षकूर्चलोचोऽधः केशधारणमिति" इस प्रकार जानना । । प्रश्न :----मुनिराज के लोच की विधि तो जानी, परन्तु तीर्थकर भगवान
दीक्षा समय जो पंचमुष्टी-लोच करते हैं। सो किस प्रकार करते
उत्तर :---. 'तीर्थकर भगवान मुनियों के समान लोंच नहीं करते, क्योंकि उनके दाढ़ी, मूछ होते ही नहीं है । तीशंकर भगवान तो सदा सोलह वर्ष की अवस्था वाले पुरुष के समान (बिना दाढ़ी मूंछ के) अपने रूप से सुशोभित रहते हैं। इसलिये भगवान जो पंचमुष्ठी लोच करते हैं । सो केवल शिर का ही पंचमुष्यिों का लोच करते हैं । यदि ऐसा नहीं माना जायेगा तो मुनिराज के समान तीर्थंकरों का केशलोंच बन ही नहीं सकेगा, क्योंकि उनके दाढ़ी मूछ के केश लोंच करने योग्य होते ही नहीं हैं । फिर भला उनक लांच की संभावना हो हो कैसे सकती है ? लिखा भी है--
देवाणि-रसारया विय भोगभवा किकजिणवीरंदारण। सम्वे केसव रामा कामा विरिणकुचिया हुति ॥१६६८।।
अर्थात् चतुर्णिकाय के देव, नारकी जीव, भोग भूमियां चक्रवर्ती तीर्थकर नारायण, बलभद्र और कामदेवों के मुख पर दाढ़ी मूंछों के बाल नहीं होते हैं ।
. .भावार्थ-इन सबके हमेशा नवयौवन, अवस्था बनी रहती है । नारकी जीवों को छोड़कर बाकी के ऊपर लिखे सभी जीवों के केवल शिर के बाल होते हैं। सो भी १६ वर्ष वाले पुण्य पुरुष के समान सुशोभित रहते हैं । अन्य साधारण पुरुषों के समान न तो विशेष उत्पन्न होते हैं और न विशेष बढ़ते हैं । केवल शोभारूप उत्पन्न होते हैं । और शोभा रूप ही बढ़ते हैं, इसलिये ऊपर लिखे जीवों के क्षौरकर्म (बाल कर्म) नहीं होता है । अर्थात् तीर्थंकरादि बाल नहीं बनवाते, क्योंकि वे इतने बढ़ते ही नहीं है। इसके सिवाय एक और बात यह भी है. कि यदि तीर्थंकरों के मुख पर बाढ़ी, मूंछ के बाल माने जाये तो उनकी प्रतिमा में दाढ़ी, मूछ के बाल मानने पड़ेंगे परन्तु । ऐसा है नहीं, इसलिये तीर्थकरों के दाढ़ी, मुंछ का अभाव ही है । जिन प्रतिमा में दाढ़ी, मूंछ के बालों के साथ भौह के बालों का भी निषेध है। लिखा
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अध्याय : दसवां ]
[ ८४१ केषादिरोमहीनांग श्मश्र रेखाविजितम् । सिथतं प्रलंवितहस्तं श्रीवत्सादयं दिगम्बरम् ॥१६६६॥ प्रश्न :-कोटिशिला से एक करोड़ मुनिराज मोक्ष पधारे हैं। उस कोटि
शिला को नारायण उठाते हैं । सो वह कोटिशिला किस जगह है ? उत्तर :---यह कोटिशिला नाभिगिरि पर्वत के मस्तक पर हैं । वह एक योजन ऊँची और पाठ योजन चौड़ी है तथा अनेक मुनिराजों का वह सिद्धस्थान है । ऐसी कोटिशिला को हमारा नमस्कार हो । यही बात सोमसेन कृत पद्मपुराण में २२खें अधिकार में लिखी है.--
रावरसेन पुरा पृष्टोऽनंतवीर्यो मुनीश्वरः । प्रात्मनो मरणं कस्य हस्ते देव ! भविष्यति ॥१७००१॥ तेनोक्तं सिद्धशिला यः उद्धरेत्स्वपरक्रमात् । स एव हन्यते त्वां हि चक ण चामुना दृढम् ॥१७०१॥ एतच्छुकत्वाह लक्ष्मीश उद्धरिष्यति नान्यथा । सप्तस्येऽथ विमानस्थास्ती शिला प्रतिनिर्गताः॥१७०२।। जांबूनदश्च सुग्रीवो नलनोलौ विराषितः । इत्यादि बहयो बीरा रात्री प्राप्ताश्च गह्वरम् ।।१७०३।। नाभिगिरि शिरोदेशे शिला योजनमुत्थिता । अष्टयोजन विस्तीर्ण सिद्धस्थान मुनौशिनाम् ॥१७०४॥ सत्रावतीर्य ते सर्वैः सा शिला पूजिता परम् । गंधाक्षतादिभिः पुष्पैः सुरासुरैश्च सेविता ।।१९७० ५।।
इत्यादि और भी वर्णन है। जांबूनद और विद्याधर उसी रात को लक्ष्मण को विमान में बैठाकर कोटिशिला के समीप ले गये थे, इससे सिद्ध होता है कि कोटिशिला नाभिगिरि नामक पर्वत के मस्तक पर ही है। कितने ही लोग कोटिशिला को तारंगा आदि अन्य क्षेत्रस्थान में मानते हैं, सो भ्रम हैं ।
प्रश्न :- मुनिराज बिना पिछी के चले या नहीं ?
उत्तर :- यदि मुनिराज किसी जगह परबस होकर बिना मयूर पिछी के गमन करें तो फिर वे उसका प्रायश्चित्त लेकर शुद्धि करते हैं। बिना पिछी के गमन करने पर बिना प्रायश्चित्त लिये मुनिराज कही नहीं रहते हैं । बिना पिछी के गमन
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८४२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि करने का प्रायश्चित्त इस प्रकार है । यदि मुनिराज बिना पिछी के सात पेंड गमन करे तो एक कायोत्सर्ग धारण कर शुद्ध होवे । यदि एक कोश चले तो एक उपवास कर शुद्ध होवे यही बात चारितासार में लिखी है.----
सप्तपादेषु नि:पिच्छः कार्योत्सर्गाद्विशुद्धयति । गव्यूति गमने शुद्धिमुपवासं समश्नुते ॥१७०६॥
कितने ही लोग मुनीश्वरों का स्वरूप पिछी कमण्डलु से रहित मानते हैं । परन्तु उनका यह मानना मिथ्या है । जो मुनीश्वरों का स्वरूप पिछी रहित मानते हैं। वे जिनमत से बाह्य हैं, ये लोग जिनमार्ग में भेद उत्पन्न करने वाले हैं। यही बात नीतिसार में लिखी है
कियत्यपि ततोऽतीते काले श्वेताम्बरोऽभवत् । द्राविड़ो यापनीयश्च केकीसंघश्च मानतः ॥१७०७॥ केकोपिच्छः श्वेतवासो द्राविडो यापनीयकः । निपिच्छश्चेति पंचैते जैनाभासाः प्रकीर्तिताः ॥१७०८।।
इससे सिद्ध होता है कि जो मुनियों को पिछी रहित मानते हैं, वे जैनाभासी हैं, साक्षात् जैनी नहीं हैं । इसलिये पिछी कमण्डलु के बिना मुनि का स्वरूप बन ही नहीं सकता। प्रश्न :-श्री मुनिराज कारण मिलने पर जल में प्रवेश करे या नहीं तथा
नाव प्रावि पानी की सवारी में बैठे या नहीं ? उत्तर :-जो महाव्रती मुनि अपने वा परके लिये जल में प्रवेश करें अथवा नाव में बैठकर पार उतरे तो वे उसका प्रायश्चित्त लेते हैं। वह प्रायश्चित्त इस प्रकार है । यदि मुनि ४ अंगुल जल में प्रवेश करें तो एक कायोत्सर्ग धारण करें, यदि घुटने तक जल में प्रवेश करें तो एक उपवास धारण करें। यदि घुटने से ४-४ अंगुल अधिक जल में प्रवेश करें तो दूना-दूंना उपवास करें। यदि १६ धनुष पर्यंत जल में प्रवेश करे तो कायोत्सर्ग उपवास आदि उससे भी अधिक करें। यदि अपने व दुसरे के लिये नाव में बैठकर पार उतरें तो ज्ञानी और अनेक कलाओं के जानकार वा समय के जानकार श्राचार्य यथायोग्य थोडा बा बहुत प्रायश्चित्त देखें यही बात श्री इन्द्रनंदी विरचित नन्थ में लिखी है
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अध्याय : दसवाँ )
[ ८४३ जानुबन्धे तनूत्सर्गः क्षमणं चतुरंगुले । द्विगुणाः द्विगुणास्तस्मादुपदासा स्युरम्भसि ।।१७०६।। रंडः षोडशभिर्मेये भवन्त्येते जलेजसा । कायोत्सगोपकासाः स्युर्जा काम ततोऽधिका ११७१०।। स्वपरर्थे प्रयुक्तश्च नावाः सरणे सति । स्वल्पं वा बहु वा दद्यात् ज्ञात कालाविको गरगो ॥१७११॥ प्रश्न :--लंका नाम को नगरी कौन से समुद्र में है ?
उत्तर :--लका लवणोदधि समुद्र में है । वहां पर ७०० योजन लंबा चौड़ा एक राक्षस नाम काजीप है। उस द्वीप में मेरु पर्वत के समान विचित्रीकूट नाम का पर्वत है । वह नौ योजन ऊँचा है । ५० योजन लम्बा है । उस पर शत्रु प्रवेश नहीं कर सकते, परन्तु जो वहां पहुंच जाये उसे वहां पर अच्छी शरण मिल जाती है ! वह पर्यंत अनेक वनों की शोभा से सुसोभित है । उस पर्वत पर ३० योजन के प्रमाग में लंका नाम की नगरी है । जो कि बहुत ही सुन्दर है । यही बात श्री अजितगाथ के समवशरण में भीम महाभोम नाम के यक्षों ने मेघनाद नाम के विद्याधरों के राजा से कही थी । "हम तुम्हें ऐसी लंकापुरी देते हैं । यहां तुम सुख से रहना" ऐसा पद्मपुराण में लिखा है । देखी श्री रविषेरणाचार्य विरचित पद्मपुराग पर्वत पांचवें में---
खेचराभंक धन्योसि यस्त्वं शरणमागतः । सर्वज्ञमजितं नाथं तुष्टावावामतस्तव ॥१७१२॥ शृणु संप्रति से स्वास्थ्यं यथा भवति सर्वतः । तं प्रकारं प्रवक्ष्याव: पालनीयस्त्वमाययोः ॥१७१३।। संत्यत्र लवसाम्भोधा वण्युग्राहसंकटे । अत्यंतदुर्गमारभ्या . . महाद्वीपाः सहस्त्रंशः ॥१७१४।। क्वचिस्क्रीडति गंधवीः किन्नराणां अवचिद्गणाः। क्वचिच्च यक्ष संघाता: क्वचित्किपुरुषामराः ॥१७१५॥ तत्र मध्येऽस्ति सद्वीपो रक्षसा कोडमक्षमः । योजनानां शतान्येष सर्वतः सप्त कीर्तितः ॥१७१६॥ तमध्ये मेरुवाति त्रिकूटाख्यो महागिरिः । अत्यन्त दुःख प्रवेशोऽयं शरण्यः सद्गुहागहैः ॥१७१७।।
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६४४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
शिखरं तस्य शैलेन्द्र योजनानि नवोतुंगं नानारस्त प्रभाजाल छन्नहेम महातदम् । fararatafroean कल्पद्रुम समाकुलम् ॥१७१६॥ त्रिशद्योजन मानाद्यः सर्वतस्तस्य राक्षसी । संकेति नगरी भांति रत्नर्जाबूनदालया ॥ १७२० ।। मनोहारिभिरुद्यानः सरोभिश्च सवारिजैः । महद्भिश्चेत्यमेश्च सा महेन्द्र पुरीसमा ।।१७२१॥
यही बात श्री सोमसेन विरचित द्वितीय पद्मपुराण में तीसरे अधिकार में
लिखी है ।
चूडाकारं मनोहरम् । पंचाशविपुलत्थतः ॥ १७१८ ॥
ae ateyitrrent स्थितौ तौ राक्षसाथियों संतुष्टौ मेघवाहाख्यं वदतौ धर्मवत्सल ।।१७२२॥ gtitsfer aajniभौधौ राक्षसं नामतो वरं । योजनानां शतसप्त विस्तीर्णः स मनोहरः || १७२३॥ तन्मध्ये त्रिकुटाभिष्यः पर्वतोऽस्ति निधानमृत् योजनानां नवोलुंगः पंचाशद्विस्तमो मतः ॥ १७२४॥ तत्र लंकापुरी भाति त्रिशद्योजन विस्तरात ।
दास्यामः पुरीं तां त्वं स्थित्वा तप्तसुखी भव । १७२५ ॥
इस प्रकार कथन किया है । इससे लंका लवणोदधि में ही जाननी चाहिये । उपसमुद्र में नहीं है ।
प्रश्न :- जो गृहस्थ न तो अरहन्तदेव की पूजा करता है और न पात्रदान देता है, वह किस योग्य है ?
उत्तर :-- जो गृहस्थ न तो भगवान अरहन्तदेव के चरण कमलों की पूजा करता है और न मुनिराजों के लिये शक्तिपूर्वक दान देता है । उस गृहस्थपद के लिये किसी गहरे जल में प्रवेश कर बहुत शीघ्र जलांजलि देना चाहिये । वह गृहस्थ इसी योग्य है । यही बात श्रीपद्मनंदी स्वामी ने पद्मनंदी पंचविशतिका में दूसरे अधिकार में कही हैं
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अध्याय : दसवा ] पूजा न रेज्जिनयतेः पद पंकजेषु,
दानं न संयतजनाय च भक्तिपूर्वम् । नों दीयते किमु ततः सदनस्थिताय,
___ शोघ्र जलांजलिरगावजलं प्रविश्य ।।१७२६॥ .. . प्रश्न :-श्रावकों को सदा प्रातःकाल उठकर सबसे पहले क्या करना चाहिये ?
उत्तर :--श्रावकों को प्रातःकाल उठकर शौच आदि क्रियात्रों से निवृत्त होकर प्रथम ही अरहन्तदेव और निग्रन्थ गुरु का दर्शन करना चाहिये । फिर भक्तिपूर्वक वेदना व उपासना कर धर्मशास्त्रों का स्वाध्याय करना चाहिये पीछे गहस्थ सम्बन्धी अन्य कार्य करना चाहिये । ..
भावार्थ :- जिन दर्शनादि कार्य कर फिर अन्य कार्य करना यह नियम पर-परा से इसी प्रकार का प्राया है। वही बात श्री पद्मनंदी पंचविशंतिका के छठे अधिकार में लिखी है.-- . . . . .
. प्राप्तस्वाय. कसं व्यं देवतागुरुदर्शनम् । . भक्त्या तद्वंदना कार्या धर्मश्च तिकपासकः ॥१७२७॥.. पश्चादन्यानि कार्याणि कर्तव्यानि यतो बुधैः ।। धर्मार्थ काममोक्षासामावौ धर्मः प्रकीर्तितः ॥१७२८॥ :
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों में सबसे पहले धर्म ही कहा है । इसलिये सबसे पहले देवगुरु का दर्शन कर पीछे अन्य कार्य करना चाहिये। प्रश्न :-ऊपर यह बताया जा चुका है कि प्रतिप्ति सबसे पहले देवदर्शन
करना चाहिये देवदर्शन करने के पहले अन्य कार्य नहीं करना चाहिये । परन्तु देवदर्शन किये बिना ही जो भोजनादि कर लेते हैं, उनके लिये शास्त्रों में क्या कहा है. तथा उन्हें कैसा समझना
चाहिये ? . उत्तर :-जिस गांव ब शहर में भगवान अरहन्तदेव का जिनालय हो और वहां पर रहने वाला श्रावक श्रावक होकर भी यदि बिना भगवान के दर्शन किये भोजन करें तो उनको जनशास्त्रों में मिथादृष्टि कहा है । उनको जैनधर्म का श्रद्धान करने चाला कभी नहीं कहना चाहिये । जनशास्त्रों में उनको धर्मभृष्ट बतलाया है। लिखा
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८४६ ]
[ मो. प्र. चिन्तामणि चेयाले जिहठाणे सायय अहिट भोयरसं कुरगई।। सो सुख मिथ्याइट्ठी भट्ठी जिन सासरणे समये ॥१७२६॥ प्रश्न : सामान्य केवली के गंधकुटी में गणधर होते हैं या नहीं ?
उkit: सामान्य के के भी गणधर होते हैं । यह बात सुदर्शन चारित्र के आठवें परिच्छेद में कही है -
दिध्येन ध्वनिना देवस्तदा सन्मार्गवृत्तये। धर्मतसादि विश्वार्थानवाचेति गरणान्प्रति ।।
बिमा गणधर के दिव्यध्वनि नहीं खिरती है। इसलिये जिस प्रकार श्री महावीर स्वामी के गौतम गणधर थे, उसी प्रकार सामान्य केवली के भी गणधर
होते हैं।
प्रश्न--सामान्य केवली भगवान की गंधकुटी में मानस्तंभ होता है या
नहीं, तीर्थर केवली भगवान के तो समवशरण में होता ही है ?
उत्तर-सामान्य केवली भगवान की गन्धकुटी में भी मानस्तम्भ होता है । यह बात सुदर्शन चरित्र में लिखी हैं।
प्रायौ शक्रोपदेशेन हेमरत्नादिराशिभिः । इंदे गंकुटीरूपं कैवल्यास्थानमंधनम् ॥१७३०॥ ध्वज सिंहासनच्छत्र चामरावि विभूषितम् । शास्त्रोक्त घरांनोपेतं मानस्तम्भाद्यलकृतम् ॥१७३१॥ जगज्जन्तूपकाराय केवलज्ञान भागिनः । परं निर्मापयामास यक्षराट् धर्मसिद्धये ॥१७३२१ प्रश्न-तीर्थकर केवली भगवान के केवलज्ञान उत्पन्न होने के बाद गणधरों
की केलियों को विक्रिया ऋद्धि को धारण करने वालों की गणना, जो शास्त्रों में बतलाई है। वह समवशरण में रहने वालों को है अथवा उनके समय की है अर्थात् अनन्तर होने वाले तीर्थपुर के
उत्पन्न होने तक की है ? उत्तर-यह मणना समवशरण में रहने वालों की है। श्री ऋषभदेव के समवशरण में जितने मुनि प्रादि वर्तमान थे, उन्ही की संख्या बताई है, वे मुनिराज आदि सब विहार' समय में भी साथ ही रहते हैं । सो ही श्री रविणाचार्य विरचित
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अध्याय : दसवां ]
[ ८४७ पद्मपुराण में चौथे पर्व में लिखी है--
तस्यासीग्दणपालानामशोसिश्रुत्तरा। सहस्त्राणि च तायन्ति साधूनां सुतपोभृताम् ।१७३३।। अत्यन्त शुद्धचित्तास्ते रविचन्नसमप्रभाः। एभिः परिवृताः सर्वेजिना विहरते महीम् ॥१७३४।।
इससे सिद्ध होता है कि गणधर आदि सब सुनियों की गणना समय शरण में रहने वालों की ही समझना चाहिये । समवशरगा की स्थिति से आगे पीछे के मुनि इस संख्या से बाहर है। वे इस संख्या में शालिल नहीं है । जिस प्रकार श्री वृषभ देव के समवशरण में रहने वाले की संख्या बतलाई, उसी प्रकार श्री अजितनाथ से लेकर श्री महावीर पर्यन्त समस्त तीर्थङ्करों की समझ लेना चाहिये। प्रश्न- इस पञ्चमकाल के इस वर्तमान समय में होने वाले मुनिराज किस क्षेत्र
में ठहरें ? वन, उपवन, गुफा, पर्वत, नदी के किनारे स्मशान प्रादि में ही निवास करें अथवा और किसी भी जगह अपनी स्थिति
रक्खें?
उत्तर-इस पंचमकाल में वर्तमान समय में होने मुनियों की स्थिति श्री मन्दिरजी में ही बतलाई है । यह यात श्री पद्मनदी पंचविशतिका के छठे अधिकार में लिखी है
सम्प्रत्यत्र कलौ काले जिनगेहे मुनिस्थितिः । धर्मस्य दानमित्येषां श्रावका मूलकारणम् ॥१७३५॥ धर्म का दान देने के लिये एक श्रावक ही मूल कारण है।
भावार्थ--इस वर्तमान समय में श्रावक ही धर्म सुनने के पात्र है । इसलिये मुनिराजों की स्थिति जिनालय में होने से ही श्रावक को लाभ पहुंच सकता है । श्री इन्द्रनंदी ने नीतिसार में भी लिखा है
काले कलो बने बासो वर्जनीयौ मुनिश्वरै । स्थोपेत च जिनागार प्रामादिषु विशेषतः ।१७३६॥ प्रश्न-जनमत में जप करने की माला को मरिणयों की गिनती १०.५ है।
सो इसका क्या कारण है ? . उत्तर--संसारी जीव हमेशा प्रमाद और कषाय के अधीन रहते हैं तथा
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=४८ ]
[ गरे. प्र. चिन्तामरि
स स्थावरों के भेद से १२ प्रकार के जीवों की मन वचन काय कृत कारित अनुमोदना के द्वारा १०८ भेदरूप पाचों पापों का ग्राश्रव और बंध करते रहते हैं । उन सबकी निवृत्ति के लिये १०= मणियों की माला बनाई गई है। ग्राश्रव बंध के वे १०८ भेद निम्न प्रकार समझना चाहिये ।
पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, वनस्पतिकायिक, नित्यनिगोद, इतर निगोद, द्विन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरीन्द्रिय असैनी पंचेन्द्रिय, सैनी पंचेन्द्रिय इस प्रकार जीवों के बारह भेद होते हैं । इन १२ प्रकार के जीवों के मन से, वचन से तथा काय से हिंसादिक पाप होते हैं । जो ३६ प्रकार के हो जाते हैं । तथा ३६ प्रकार के पाप स्वयं करने दूसरों से कराने और करते हुखों की प्रनुमोदना के भेदों से १०८ प्रकार के हो जाते हैं । ५२३ x ३० १०० १ सा लगते रहते हैं । उनका नाश करने के लिये १०८ मणियों की माला है । एक मरिण पर एक-एक ग्रामोकार मन्त्र का जाप कर एक-एक पाप का नाश करना चाहिये और इस प्रकार सब पापों का नाश कर डालना चाहिये, सो ही लिखा है
पृथ्वी पानोय तेजः पवनसुताः स्थावराः पंचकायाः । नित्याभित्यो निगोदौ युगल शिखि चतुः संस संज्ञित्रसाः स्युः || एते प्रोक्ता जिनें द्वावश परिणिता वाङ्मनः कायभेदः । स्वान्यैः कारितार्थं त्रिभिरपि गुणिताश्चाष्ट भूम्येक संख्या ।।१७३७॥ -
इस प्रकार माला में १०८ मगियों के होने का कारण है । इसके सिवाय एक कारण और भी है और वह इस प्रकार है- कोई भी पाप रूप कार्य किया जाता है । उसमें सारंभ, समारम्भ और प्रारम्भ ऐसे तीन भेद पड़ते हैं। किसी भी हिसा श्रादि पाप के संकल्प करने को उसके प्रयत्न के प्रवेश करने को सारम्भ कहते हैं । उसी पाप कार्य के कारणों का संग्रह करना साधन की सब सामग्री इकट्ठी करना समारंभ है । और उस कार्य को प्रारंभ कर देना आरंभ है ।
इसका उदाहरण इस प्रकार है । किसी ने एक मकान बनाने का विचार किया उसमें संकल्प किया कि इस तरह का मकान बनाऊंगा उसमें इस प्रकार के घर कमरे आदि बनवाऊंगा इसे प्रकार के संकल्प की सारंभ कहते हैं। सारम्भ में किसी काम का बाह्य आरम्भ नहीं होता केवल विचार या उस काम को करने का श्रावेश होता है । सारम्भ के बाद उस मकान को बनवाने के लिये कारीगर ईट चूना पत्थर कुदाली फावड़ा
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अध्याय : दसवां ।
[ ८४६
आदि साधनों का संग्रह करना समारंभ है । समारंभ में काम का प्रारम्भ नहीं होता है । केवल कारण सामग्नी इकट्ठी होती है । तदनन्तर उस विचारे हुये काम को प्रारम्भ कर देना, जैसे जिस मकान को बनाने का संकल्प किया था । उसके लिये नींव भरना, दीवाल खड़ी करना आदि कार्यों का प्रारम्भ कर देना प्रारम्भ है । इसी प्रकार सब कामों के दृष्टान्त समझ लेना चाहिये । ये सारम्भ, समारम्भ और प्रारम्भ तीनों ही मन से किये जाते हैं । तीनों ही बचन से किये जाते हैं और तीनों ही काय से किये जाते हैं । इस प्रकार ये तीनों योगों से होते हैं । ऐसे उनके ये नौ भेद हो जाते हैं। नौ प्रकार के सारंभ आदिक स्वयं किये जाते हैं । और दूसरे से कराये जाते हैं। और दूसरे करते हुये की अनुमोदना की जाती है। इस प्रकार कृत कारित अनुमोदना के भेद से २८ भेद हो जाते हैं । ये २७ भेद क्रोध से होते हैं। मान से और लोभ से होते हैं। इस प्रकार चारों कषायों से गुणा करने से १०८ भेद हो जाते हैं । इन १०८ भेदों से जीव को हिंसादि पाप लगते हैं । सो ही मोक्ष शास्त्र में लिखा है---
प्राद्य सरंभ समारंभारं भारंभयोग कृत कारितानुमतकषाय विशेष स्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चकशः।
इन १०८ पापों की निवृत्ति के लिये. १०८ मरिणयों से णमोकार मन्त्र की अथवा पंचपरमेष्ठी के वाचक अत्य मन्त्रों की जाप तीनों समय करना चाहिये । इनके सिवाय पापों के १०८ भेद और प्रकार से भी हैं । यथा--हिंसादिक सब पाप, क्रोध, मान, माया, लोभ इन चार कषायों से होते हैं । कृत, कारित, अनुमोदना से होते हैं। मन, वचन, काय इन तीनों से होते हैं । तथा भूतकाल, वर्तमानकाल, भविष्यकाल इन सोनों काल सम्बन्धी होते हैं । इन सबको मुरणा कर देने से १०८ भेद हो जाते हैं।
भावार्थ-क्रोध, मान, माया, लोभ इन चारों कषायों से काययोग के द्वारा स्वयं किये हुये भूतकाल सम्बन्धी पाप । इन्हीं चारों कषायों से काययोग के द्वारा दूसरों से कराये हुये भूतकाल सम्बन्धी पाप, तथा इन्हीं कषायों से काय योग के द्वारा अनुमोदना किये हुये भूतकाल सम्बन्धी पाप, इस प्रकार भूतकाल सम्बन्धी पाप १२ प्रकार के हुटो, इसी प्रकार भूतकाल सम्बन्धी १२ प्रकार के पाप वचनयोग द्वारा तथा १२ प्रकार के मनोयोग द्वारा होते हैं । इस प्रकार ३६ प्रकार के भूतकाल सम्बन्धी पाप, ३६ प्रकार वलेमान काल संबन्धी पाप और ३६ प्रकार भविष्यत्काल सम्बन्धी
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८५० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि पाप होते हैं। इस प्रकार १०८ भेद हो जाते हैं। सो ही धर्मरसिक शास्त्र में लिखा है।
हिंसा तत्र कृता पूर्व करोति च करिष्यति । मनोवचनकायैश्च ते तु त्रिगुरिणता नव ।।१७३८॥ पुनः कृतं स्वयं कारितानुमोदगुणाहताः । सप्लविशति ते भेदा कषायगुणितांश्च तान् ।।१७३६।।
"अष्टोतरशतं ज्ञेयं प्रसत्यादिषु तादृशम्:". इन १०८ पापों को दूर करने के लिये १०८ मरिणयों की माला कही गई है। एक-एक पाप के आश्रद वा बन्ध को नाश करने के लिये एक मन्त्र का जाप करना कहा है । इस प्रकार प्रातःकाल, मध्यान्हकाल और सन्ध्याकाल तीनों समय तीन सौ चौबीस जाप कर पापों को दूर करना चाहियो, तीनों समय जाप करने वालों के लिये तो पाप और धर्म की समानता रहती है । यदि तीन-तीन बार से भी अधिक जप करें या तीन माला से अधिक जप करें तो उसका फल अधिक होता है । यदि तीनों समय की ३ मालाओं से कम जाप करे तो पाप बन्ध रहता है। इसलिये प्रतिदिन ३२४ जाप करने से पूर्व संचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं, ऐसा समझकर णमोकार मन्त्र का जप प्रतिदिन तीनों बार एक एक माला जाप अवश्य करना चाहिये।
प्रश्न-जाप करते समय माला को किस प्रकार जपना चाहिये ?
उत्तर--जाप करते समय मन को तो श्री अरहन्त देव के ध्यान में लगाना चाहिये, अपने बायें हाथ को अपनी गोदी में रखना चाहिये ज्ञान सुद्रा धारण करना चाहिये, अपने दायों हाथ के अंगूटे पर माला रखनी चाहिये । तदनन्तर उस ज्ञानी पुरुष को अंगूठे और अंगूठे के पास वाली उंगली से निर्मल जाप की माला को लेकर जाप करना चाहिये । सो ही धर्म रसिक ग्रंथ में लिखा है।
समं ध्याने मनः कृत्वा मध्यदेशेषु निश्चलम् । ज्ञानमुद्रांकितो भूत्वा स्वांके तु बाम हस्तकम् ॥१७४०॥ अंगुष्ठ सर्जनीभ्यां तु सत्यहस्तेन निर्मलाम् । जपमाला समादाय अपं कुर्याद्विलक्षणः ॥१६४१॥
यह जप करने की विधि लिखी, इसके सिवाय जो कोई मनुष्य अपने हृदय में उद्वेग वा चंचलता रखता हा जाप करता है । अथवा माला के मेरुदण्ड को
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अध्यायः दसवां 11
[ ८५१ उल्लंघन कर जप करता है अथवा जो उंगुली के नख के अग्रभाग से जप करता है वह सब निष्फल होता है । लिखा भी है---
व्यग्रचित्तेन यज्जप्तं यज्जप्तं भेकलंघने । नखानाच यज्जत तज्जतं निकल भवत् ।।
इस प्रकरण में माला के भेद इस प्रकार समझाना चाहिये, क्रियाकोश में लिखा है--
प्रथमफटिकमरिण मोती माल सोना रूपा सुरंग प्रवाल । जीधा पोता रेशम जान कमलबीज फुनि सूत वखान ॥
यह नवभांति जाप के भेद भजिये जिनवर, तजि मनखेद ॥१७५४॥ दूसरी जगह भी लिखा है---
सूत्तस्य जाप्यमालायाः सदा जापःसुखावहः । दाध मुदस्थि काष्ठानाम क्षमालाऽफलप्रदा ॥ सुवर्ण रौप्यविन्दुममोक्तिका जपमालिकाः ।। उपवाससहस्त्राणां फलं यच्छन्ति जापतः ॥१७५४॥
अर्थात् सूत को माला सदा सुख देने वाली है। अग्नि के द्वारा पकी हुई मिट्टी, हड्डी, लकड़ी और रुद्राक्ष आदि की मालायें कुछ देने वाली नहीं है, ये मालायें अयोग्य हैं, ग्रहण करने योग्य नहीं है । अर्थात् इनसे जप नहीं करना चाहिये तथा सोना, चांदी, मूंगा और मोती की माला हजारों उपवासों का फल देने वाली है। इनकी मालाओं के द्वारा जप करने से हजारों उपवासों का फल मिलता है ।
इस प्रकार मालाओं का फल बतलाया है। प्रश्न :--जाप करते समय एमोकार मंत्र का उच्चारण किस प्रकार करना
चाहिये ? उत्तर-एक णमोकार मन्त्र का उच्चारण ३ श्वाच्छोश्वास में करना चाहिये। उसकी विधि इस प्रकार है-श्वास को खींचते समय "गमों परहंतार" यह पद पढ़ना चाहिये । फिर श्वास को छोड़ते समय "मो सिद्धाणं" यह पद पढ़ना चाहिये। श्वास को खींचते समय "रगमो आयरियागं" पढ़ना चाहिये । फिर श्वास छोड़ते समय "रणमो उज्झायाणे" पढ़ना चाहिये । श्वास को खींचते समय "मो लोए" पढना
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५५२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि चाहिये। फिर छोड़ते समय "सव्व साहरा" पढ़ना चाहिये । इस प्रकार तीन श्वाच्छो. श्वास में एक बार का णमोकार मन्त्र का जप हुआ, जाप करते समय इसी प्रकार शुद्ध उच्चारण करना चाहिये । धर्मरसिक में लिखा भी है--
नमस्कारपदान् पंच जपेद्यथावकाशकम् । अष्टोत्तर शतं चामिष्टा विशतिक तथा ॥१७५५॥ दिद्वयकपर विश्रामा उश्वासा सप्तविंशतिः । सर्व पाप क्षयं याति जप्ते पंचनमस्कृते ॥१७५६॥
अर्थात् समय मिलने पर णमोकार मन्त्र को १०८ बार जपे अथवा ५४ बार जप करे अथवा २८ बार जप करे। एक-एक श्वास में श्वास और उन्छास दोनों में दो-दो पद विश्राम देकर जपे। इस प्रकार २७ श्वाच्छोश्वास द्वारा ६ बार नमस्कार मन्त्र का जाप करें। इस प्रकार जप करने से समस्त-समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं । यहां पर जो २७ श्वास बतलाये हैं। सो एक कायोत्सर्ग में बार नमस्कार मन्त्र जपने को अपेक्षा से बतलाये हैं। इस प्रकार इस मन्त्र को वाचक, उपासु और मानस इन ३ प्रकार से अपनी शक्ति के अनुसार पढ़ना चाहिये, जपना चाहिये । प्रश्न :-नमस्कार मन्त्र पढ़ने के जो वाचिक, उपांसु और मानस ये ३ भेद
बतलाये सो इनका स्वरूप क्या है ? उत्तर :--स्वर के तीन भेद है उदात्त, अनुदात्त और स्वरित 1 जिसमें इन तीनों का उच्चारण स्पष्ट हो। ऐसे मंत्रों के अक्षर, पद और शब्दों को स्पष्ट और शुद्ध रीति से उच्चारण करना और इस प्रकार उच्चारण करना जिसको सब सुन लें, उसको वाचिक कहते हैं। तथा जिसमें उदात्त, अनुदात्त और स्वरित के भेद से अक्षर, पद, शब्दों का उच्चारण शुद्ध तथा स्पष्ट हो, परन्तु उस उच्चारण को कोई दूसरा सुन न सके, उसको उपांसु कहते हैं । वाचिक व उपांसु में सुनने, न सुनने का हो अन्तर है । वाचिक जप को सब सुन सकते हैं और उपांसु जप को पास बैठने वाला भी नहीं सुन सकता तथा अपने मन को एकाग्र कर अपने ही मन के द्वारा चिन्तवन करना और वह चिन्तवन इस प्रकार करना, जिसमें मन्त्रों की जो अक्षरमाला है, मन्त्रों में जो अक्षरों का समुदाय है, उसके अक्षर पद और शब्द सब शुद्ध तथा स्पष्ट चिन्तवन करने में पा जायें, ऐसे जप को मानसिक जप कहते हैं।
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अध्याय : दसवां ]
[ ८५३ ___इसका फल इस प्रकार है---मानसिक जप समस्त कार्यों की सिद्धि के लिए किया जाता है, उपांसु जप पुत्र-प्राप्ति के लिए किया जाता है और वाचिक धन-लाभ के लिए किया जाता है । वाचिक का फल एक गुना है, उपांसु का फल सौगुना है और मानसिक जप का फल एक हजार गुना है । ऐसा. श्री जिनसेनाचार्य ने कहा है
धाचिकास्य उपांशुश्च मानसस्त्रि विधः स्मृतः । त्रयाणां जपमालानां स्याच्छे ष्ठोझा सरोतरः ॥१७५७॥ यदुस्थनीचस्वरितः शब्दः स्पष्टपदाक्षरः । मन्त्रमुच्चारयेद्वाचा जपो रोयः स बाधिकः ॥१७५८॥ शनरुच्चारयेन्मन्त्रं मन्चमोष्ठी प्रचालयेत् । अपररश्रतः किंचित्स उपांसुर्जपः स्मृतः ॥१७५६॥ विधाय चाक्षर श्रेण्यावरप्तर्ग पदात्पदम् । शब्दार्थ चिन्तनं भूयः कथ्यते मानसो जपः ।।१७६०॥ मानसः सिद्धिकाम्यानां पुत्रकाम उपांशुकः । वाधिको धनलाभाय प्रशस्तो जप ईरितः ॥१७६१॥ वाधिकस्त्वेक एक्स्वायुपांशु शत उच्यते । सहस्र मानसं प्रोक्तं जिनसेनादि सूरिभिः ॥१७६२॥ प्राचार्यों ने गमोकार मंत्र आदि मंत्रों के जपने की विधि इस प्रकार बतलाई
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प्रश्न :--ऊपर के जो जप से भेद बतलाये हैं, वे किस प्रासन पर बैठकर
करमा चाहिये ? उत्तर :-सफेद वस्त्र प्रासन पर तथा हल्दी से रंगे हुये वस्त्र के प्रासन पर व सबसे उत्तम काल वस्त्र के आसन पर वा डाभ के आसन पर बैठकर जप करना चाहिये मोकार मंत्र का व अन्य मन्त्रों का जप करने के लिये अथवा भगवान अरहंतदेव की पूजा करने के लिये ऊपर लिखे चार प्रकार के आसनों में से किसी एक प्रासन पर बैठकर जप वा पूजा करने का विधान प्राचार्यों ने बतलाया है । इसके सिवाय
और भी अनेक प्रकार के आसन हैं । परन्तु उन पर बैठकर कभी भी जप व पूजा नहीं करनी चाहिये । जो मनुष्य इन ऊपर लिखे ४ आसनों के सिवाय अन्य आसनों पर बैठकर पूजा व अप करता है । उसका फल उसके लिये बहुत बुरा होता है । जैसे जो
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८५४ ]
। गो. प्र. चिन्तामणि
बांस के आसन पर बैठकर पूजा व जप करता है उसके दरिद्रता बनी रहती है। जो पाषाण की शिला आदि पर बैठकर पूजा व जप करता है। उसके रोग की पीडा बनी रहती है। जो पृथ्वी पर बैठकर पूजा व जप करता है। उसके सदा दुर्भाग्य (भाग्य हीनता वा बदनसीबी) बना रहता है। उसका सौभाग्य कभी नहीं रहता । जो तृण व घास के आसन पर बैठकर पूजा व जप करता है। उसके यश की हानि होती है अर्थात् उसके सदा अपकीर्ति बनी रहती है । जो पत्तों के बने हुये प्रासन पर बैठकर जप करते हैं उनका चित्तः सदा विभ्रमरूप अथवा डावांडोल रहता है । अर्थात् उसका चित्त इधर उधर हैं। फिरता रहता है। स्थिर नहीं रहा जो अजिन अर्थात् हिरण के चमड़े मृगछाला बाध के चमड़े श्रादि प्रासनों पर बैठकर जप करते हैं । उनके ज्ञान का नाश हो जाता है । जो कंवल, कनात, चकमा आदि ऊन के बने हुये श्रासनों पर बैठकर जप व पूजा करता है उसका पाप सदा बढ़ता ही रहता है । जो नीले रंग के वस्त्र प्रासन पर बैठकर पूजा व जप करता है। वह अधिक दुःख भोगला है। जो हरे वस्त्र के आसन पर बैठकर पूजा व जप करता है उसका सदा मान भंग होता रहता है । इस प्रकार दोष वाले प्रासन बतलाये इन दोष वाले आसनों को छोड़कर पहले लिखे हुये चार आसन ही ग्रहण करना चाहिये इन चार आसनों पर बैठकर पूजा व जप करने से शुभ फल होता है । और बह इस प्रकार होता है सफेद वस्त्र के प्रासन पर बैठकर पूजा व जप करने से यश की वृद्धि होती है। हल्दी रंग के वस्त्र के आसन पर बैठकर पूजा व जप करने से हर्ष की वृद्धि होती है। लाल वस्त्र का आसन सबसे श्रेष्ठ है। तथा डाभ का प्रासन सब कार्यों की सिद्धि करने वाला और सबसे उत्तम है । कहने का अभिप्राय यह है कि सब आसनों में डाभ का आसन सबसे श्रेष्ठ है, सो ही धर्मरसिक नामक ग्रंथ में लिखा है--..
वंशासने दरिद्रः स्यात्पाषाणे घ्याधिपीडितः । । धरण्या दुःख संभूति : दौर्भाग्यं दाककासने ॥१७६३।। तृणासने यशोहानिः पल्लथे चित्तविभ्रमः । प्रसिने ज्ञाननाशः स्यात्कवले पापबर्द्धनम् ॥१७६४॥ नीले वस्त्र पर बुःखं हरिते मानभंगता । श्वेतवस्त्रे यशोवृद्धिः दरिद्रः हर्षवर्द्धनम् ॥१७६५।।
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अध्याय : दसवां ]
[ ८५५ रक्तवस्त्रं परं श्रेष्ठं प्राणायामविधों ततः। सर्वेषां धर्म सिद्धयर्थं दर्भाषनं तु बोत्तमम् ।।१७६६॥
इसके सिवाय हरिवंश पुराण में लिखा है कि श्री कृष्ण ने समुद्र के किनारे तेला स्थापन कर डाभ के आसन पर बैठकर अपने कार्य की सिद्धी की। तथा प्रादि पुराण में जो गर्भान्वय आदि क्रियायें लिखी है। उनमें भी डाभ के आसन का ही विशेष वर्णन लिखा है। इससे सिद्ध होता है कि डाभ का आसन ही सबसे उत्तम है।
प्रश्न :---ऊपर लिखे मंत्र का जप किस तरह करना चाहिये ।
उत्तरः ---अपने घर में जप करने का फल एक गुरणा है। बन में जप करने का फल सौ गुणा है । यदि पवित्र बाग में या किसी वन में जप करे तो उसका फल हजार मुरगा । यदि जिन मन्दिर में जप करे तो उसका फल करोड़ गुणा है। यदि भगवान जिनेन्द्र देव के समीप जप करे तो अंनत गुणा फल है । यही बात धर्मरसिक नाम के ग्रंथ में लिखी है
गहे अपफलं प्रोक्तं बने शतगुणं भवेत् । ... पुण्यारामे सधारण्ये सहस्त्रगुरिगतं मतम् ॥१७६७।। पर्वते यशसहस्त्र नद्यां लक्षभुवाहृतम् । . कोटि देवालये प्राहुरनन्तं जिन सन्निधौ ।।१७६८।।
इससे सिद्ध होता है कि घर, वन, बाम आदि जगहों से भगवान जिनराज के निकट जप करने से अन्नतगुरणा फल प्राप्त होता है।
जप करने का विधान इस प्रकार हैं---मोक्ष की प्राप्ति के लिये अंगूठे से जपना चाहिये । औपचारिक कार्यों में तर्जनी उगुली से (अंगूठे के पास वाली अंगुली) जपना चाहिये । धन और सुख की प्राप्ति के लिये. मध्यमा व बीच की उगुली से जप करना चाहिये, शांति कर्म में किसी ग्रह व उपद्रव को शांत करने के लिये अनामिका उंगुली से (बीच की उगुली के पास बाली) चाहिये तथा अाह्वानन करने के लिये कनिष्ठा उंगुली (सबसे छोटी उंगुली ) से जपना चाहिये, शत्रु को नाश करने के लिये तर्जनी उंगुली से धन संपदा के लिये मध्यंमा से, शांति के लिये अनामिका से
और और सभी कार्यों की सिद्धि के लिये कनिष्ठा से जपना चाहिये। इस प्रकार अलगअलग उगुलियों से जप करने का फल बतलाया है । लिखा भी है
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८५६ ]
अंगुष्ठ जपो मोक्षाय उपचारे तु तर्जनी, शान्यर्थं तु अनामिका
अंगुष्ठ जापो मोक्षाप उपचारे तु तर्जनी, मध्यमा धriterra कनिष्ठा सर्वसिद्धिदा ।।१७६६ ।।
[गो. प्र. चिन्तामरि
इस प्रकार यह जप करने की विधि बतलाई है सो समयानुसार इस विधि
^ के अनुसार जप करना चाहिये ।
यदि जप करते समय किसी कारण से विघ्न श्री जाय तो उसका प्रायश्चित किस प्रकार करना चाहिये ?
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स्नान कर धोती दुपट्टा ये दो वस्त्र पहनकर सदाचार पूर्वक जप करने के लिये . बैठना चाहिये और उस समय इन बातों का त्याग कर देना चाहिये जो अपने व्रतों से भ्रष्ठ हो गया है उसका तथा शुद्र का देखना, इन दोनों के साथ बात करना, इन दोनों के बचन सुनना, छींक लेना, अधोवायु निस्सरण, जंभाई लेना, यदि जप करते समय से ऊपर लिखी बातें हो जाय तो उसी समय जप छोड़ देना चाहिये । और फिर आचमन और षडंग छह अंगों से सुशोभित प्राणायाम कर बाकी बचे हुये जप को अच्छी तरह करना चाहिये । यदि आचमन और प्राणायाम न हो सके तो भगवान जिनेन्द्रदेव के दर्शन कर पीछे जप करना चाहिये । जप के ऐसे विघ्नों की शुद्धि वा प्राणायाम से होती है । यदि श्राचमन प्राणायाम न बन सके तो भगवान के दर्शन कर शुद्धि कर लेनी चाहिये | विघ्न आ जाने पर बिना शुद्धि किये जप नहीं करना चाहिये । सो ही धर्मरसिक में लिखा है-
व्रतच्युतान्त्यजातीना दर्शने भाषणे श्रुते ।
सुतेऽधवातगमने जंभये जप मुत्सृजेत ॥। १७७०॥ प्राप्तावाम्यते तेषां प्राणायाम षडंगकम् |
कृत्वा सम्यक् जपेच्छेषं यद्वा जिनादिदर्शनम् ।।१७७१ ।।
इससे सिद्ध होता है कि ठीक अधोवात यादि विघ्न या जाने पर प्राणायाम आचमन वा जिनदर्शन कर फिर बाकी का जप पूर्ण करना चाहिये | जो श्रावक जप करते समय प्रमादी होकर ऊंघते हैं । नींद का भोका लेते हैं अथवा बार-बार उवासी लेते हैं अथवा और किसी प्रकार का प्रमाद करते है । उनका जप करना न करने के समान है ।
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अध्याय : दसवां ]
[ ८५७ मोक्षमार्ग अनादि काल से है। संसारराशि के जीव अनादिकाल से संसार का नाश कर मोक्ष प्राप्त करते पा रहे हैं। वर्तमान में भी विदेहक्षेत्र से जाते हैं। तथा आगे भी अनंतकाल तक जाते रहेंगे, परन्तु फिर भी सिद्ध राशि बढ़ती नहीं और निगोद राशि घटती नहीं सिद्ध राशि और निगोद राशि वैसी की वैसी ही अनंतानंतरूप बनी रहती है । सो यह कहना किस प्रकार सिद्ध हो सकता है क्योंकि जो पदार्थ जहाँ से निकलता है वहां घटना चाहिये और जहाँ जाता है वहां बड़ना चाहिये। इस हिसाब से सिद्ध राशि बढ़नी चाहिये और निगोद राशि घटनी चाहिये ।
इस संसार में निगोद राशि असंख्यात लोक प्रमाण है और एक-एक निगोद राशि में अनंतानंत निगोदियां जीव निवास करते हैं । उन अनंतानंत जीवों में से. यदि किसी जीव ने शाहर मापन का मालिक हो तो वह जीव वहां से निकलकर द्विन्द्रीय आदि बस पर्याय में आकर. उत्पन्न होता है । उस निगोद राशि में से जितने जीव निकलकर उस पर्याय धारण कर संसार को. व्यवहार राशि में आते हैं। उतने ही जीव व्यवहार राशि से निकलकर समस्त कर्मों का नाश कर मोक्ष चले जाते हैं । इस प्रकार व्यवहार राशि उतनी की उतनी ही बनी रहती है । इस प्रकार जैनशास्त्रों में भगवान जिनेन्द्रदेव ने कहा है । सो सर्वथा निःसन्देह. हैं । इसका उदाहरण देकर समझाते हैं । जैसे- पद्मद्रह प्रादि छहों द्रहों से गंगा सिंधु आदि चौदह नदियां निकलती है । तथा अनादिकाल से उन द्रहों में से पानी निकलता रहता है । और समुद्रों में पड़ता रहता है । तो भी वहाँ का पानी घटता नहीं दश, बीस, चालीस योजन महरा बना ही रहता है । भूत, भविष्यत् वर्तमान किसी भी काल में उन द्रहों का पानी नहीं घटता तथा समुद्र का जब कभी बढ़ता नहीं समुद्र की मर्यादा भी अनादिकाल से अनंतकाल तक जैसे की तैसे बनी ही रहती हैं । अथवा आकाश से जल की वर्षा होती है । और वह सब समुद्र में जाती है। तो भी प्रकाश में जल घटता नहीं और समुद्र में बढ़ता नहीं इस प्रकार और भी उदाहरण हैं। यम नियम का अर्थ---
. अपने जीवन पर्यन्त पापों का त्याग करना यम है.। और एक मुहर्स, एक दिन, एक महिना, २ महिना वर्ष दो वर्ष प्रादिकाल की मर्यादा लेकर पापों का त्याग करना सो नियम है । सो ही रत्नकरण्ड श्रावकाचार में लिखा है.......
नियमापरमितकालो यावज्जीवं यमो ध्रियसे । : ........... .. ...
...
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८५८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिय
इसका भी अभिप्राय यह है कि महामुनियों के यमरूप त्याग की मुख्यता है । नियंस रूप त्याग की गौता है तथा श्रावकों के नियम रूप त्याग की मुख्यता है और यमरूप त्याग की गौरता है ।
उपवास का लक्षण ---
उपवास धारण करने वाले भव्यजीव उपवास धारण करने के समय से लेकर पहर तक, १२ पहर तक अथवा सोलह पहर तक क्रोध मान माया, लोभ रूप इन चारों कषायों का सर्वथा त्याग कर देते हैं । स्पर्शन, रसना, घ्रारण, चक्षु, श्रोत इन पांचों इन्द्रियों के स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द इन विषयों का सर्वथा त्याग कर देते हैं और स्वाद्य, स्वाद्य, अवलेह पान इन चारों प्रकार के श्राहारों का सर्वथा त्याग कर देते हैं इन सबके त्याग करने को उपवास कहते हैं । जो लोग क्रोधादि कषायों का त्याग किये बिना ही केवल भोजन पानादिक का त्याग कर देते हैं और उसको उपवास कहते हैं, सो मिथ्या है। जैनधर्म के अनुसार यह उपवास नहीं किन्तु लंघन कहलाता है । सो ही स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षा में लिखा है -
उपवास कुवंतो प्रारम्भ जोकरेदि मोहायो ।
सो हिदेहं सोसदिप भाए कम्मसेपि ॥ १७७२ ॥
इसकी टीका में लिखा है
कषायविषयाहारत्यागो यत्र विधोयते ।
उपवासः स विज्ञेयशेषं लंघनकं विदुः ।।
इसके सिद्ध होता है कि कषाय इन्द्रियों के विषय और सब तरह के प्रारम्भ और चारों प्रकार के प्रहारों का त्याग करना ही उपवास है । और यदि किसी के ऊपर लिखे अनुसार उपवास करने की शक्ति न हो तो वह बीच में जल पी लेवे तो उसको कैसा फल लगता है ?
पहली बात तो यह है कि उपवास तो ऊपर लिखे अनुसार ही करना चाहिये । यदि कोई हीनशक्ति वाला कोई उपवास के दिन जल पी ले तो उसके आठवां भाग नष्ट हो जाता हैं । यह बात प्रश्नोत्तरोपाकाचार नाम के ग्रन्थ में प्रवास के कथन करते समय लिखी है-
arraria हीयेत भागश्चाष्टमों नृणाम् ।
उपवासस्य तस्मान्तीरं त्यजेत्सुधीः ॥१७७३॥
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अध्याय : दसवां ]
है ६५९ पंचोपचारी पूजा का स्वरूप-- .
... आह्वाहन, स्थापन, सन्निधिकरण, पुजा और विसर्जन ये पांच पूजा के उपचार या अंग कहलाते हैं । इनका स्वरूप इस प्रकार है--जो अरहन्तदेव आदि की पूजा के समय मंत्र पढ़कर उनका आह्वाहन करना उसके लिये पुष्प अक्षत प्रादि स्थापन करना सो पहला अाह्वानन नाम का उपचार है। आह्वानन के बाद मंत्र पढ़कर तथा पुष्प अक्षत आदि के द्वारा उन पूज्य अरहतादि को अपने समीप करना सो समिधिकरण नाम का तीसरा उपवार है।
तदनंतर जल चन्दन अक्षत पूष्प नैवेद्य दीप धूप फल अर्धदि से मंत्र पूर्वक प्राध्य पारि की पूजा करना सो चौथा पूजा नाम का उपचार है । तथा पूजा करने के बाद स्तुति जप वंदना आदि करके मंत्र पढ़कर और पुष्प अक्षत आदि क्षेपण कर उनका विसर्जन करना सो विसर्जन नाम का पाँचमा उपचार है । इस प्रकार पंचोपचारी पुजा का स्वरूप जानना सोही लिखा है......
ॐही अर्हन् श्री परमब्रह्मन् अत्रावतरावतर संवौषट् । इति माह्वाननम् ।। ॐ ह्रीं अर्हन् श्री परमब्रह्मन् अत्र तिष्ठ ः ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं अर्हन् श्री परमब्रह्मन् अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् इति सन्निधापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री परमब्रह्मरणे अनंतानंत ज्ञानशक्तये अष्टादशदोषरहिताय बट चत्वारिंशद गुर विराजमानाय महत्परमेष्ठिने जलं निर्धामीति स्वाहा । ..........
__ इस प्रकार चन्दन, अक्षन, पुष्प नैवेद्य धूप फल अर्घ प्राद्रि द्रव्य चढ़ाते समय बोला जाता है तथा विसर्जन करते समय यह पढ़ा जाता है---
ॐ म्हों ग्रहन श्री परमब्रह्मन् स्वस्थान् गच्छ-गच्छ जः जः जः ।
इस प्रकार पंचोपचारी पूजा का स्वरूप. “पूजासार' तथा प्रतिष्ठा पाठ और जिनसंहिता आदि समस्त पूजाओं के पाठों में लिखा है । इसलिये शास्त्र गुरु प्रादि की पूजा भी इसी रीति से समझनी चाहिये, अर्थात इनकी पड़ा भी पंचोपचारी करनी चाहिये।
___ कदाचित् यहां पर कोई यह पूछे कि पंचोपचार के शब्द किस-किस धातु से बने हैं । इसका उत्तर यह है कि आह्वानन शब्द बज् धातु से बना है हम धातु का अर्थ अाह्वानन वा बुलाना है । स्थापन शब्द स्था धातु से बना है स्था धातु का अर्थ गतिनिवृत्ति वा टहरना है । उसका पंचमी वा लोट का मध्यम पुरुष का एकवचन
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८६० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि तिष्ठ बनता है । सम्पूर्वक निपूर्वक धि धातु का अर्थ निकट होता है । यज् धातु का अर्थ पूजा करना है । इसी से याग वा इज्या बनता है । जिसका अर्थ पूजा करना है । तथा जः इस बीजाक्षर का अर्थ गमन करना है अथवा गच्छ शब्द गम् धातु से बना है और उसका अर्थ भी जाना है। इस प्रकार इन पांचों उपधारों के वाचक शब्दों का धात्वर्थ धातु से बना हुआ अर्थ बतलाया । प्रश्न :-ग्रहस्थ के द्वारा होने वाली भगवान श्रहंत देव की पूजा में छह
कियायें सुनी जाती है सो कौन-कौन हैं ? . उत्तर :- सबसे पहले जलादिक पंचामृत से भगवान अरहंत देव का स्नपन वा अभिषेक करना सो पहली क्रिया है। अभिषेक के बाद पहले कही हुई विधि के अनुसार पंचोपचारी पूजा करना सो दूसरी क्रिया है । पूजा के बाद उनका स्तोत्र पाठ करना, सो तीसरी क्रिया है। स्तुति के बाद इनके वाचक मंत्रों के द्वारा १०८ बार जप करना सो चौथी क्रिया है। तदनंतर कायोत्सर्ग धारण कर उनका ध्यान सो पांचवी क्रिया है। शास्त्रों के द्वारा ५ प्रकार का स्वाध्याय करना सो छठी क्रिया है। इस प्रकार पूर्वाचार्यो में देवसेना (देवपूजा करने के लिए गृहस्थों को छह क्रियानों के करने का उपदेश दिया है। सो हो यशस्तिलक नाम: के महाकाव्य में लिखा है'स्नपनं पूजनं स्तोत्रं जपं श्रुतिश्रवम् क्रिया षडुदिताः सद्भिःदेवसेवासु गेहिनाम्" प्रश्न :--पाठों कर्मों को नाश कर सिद्ध भगवान निरन्तर सिद्धालय में
विराजमान रहते हैं। सो वह सिद्धालय लोक के अग्रभाग पर
..है या वातवलय के भीतर है या वातवलय के ऊपर है ? . उत्तर .-यह तीनों लोक धनवात धनोदधिवात और तनुवात ऐसे तीन वातवलयों से घिरा हुआ है । - इन तीनों वातबलयों में से तीसरे लनुवांतबलय में पैंतालीस लाख योजन प्रमाण सिद्धालय सुशोभित है। वहां पर सिद्ध परमेष्ठी विराजमान रहते हैं। पंचमंगल भाषा में भी लिखा है। "लोक शिखर तनुवातवलय में संठया ।" इस प्रकार और भी जैन शास्त्रों में लिखा है। .... प्रश्न :-इस जीव का ऊर्ध्वगमन स्वभाव है परन्तु मुक्त जीव वातवलय
में लोक के अन्त तक आते हैं, आगे नहीं जाते, सो इसका पया कारमा है, वे यहीं तक क्यों रह जाते हैं ?
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अध्याय : दसवां ]
[ ८६१ उत्तर :- इस लोक के मर्यादा बातवलय के अन्त तक ही है, आगे अलोका. काश है । अलोकाकाश में केवल शून्य रूप प्राकाश के सिवाय और कोई पदार्थ नहीं है । जीव पुद्गल धर्म अधर्म काल इन पांचों द्रव्यों का अभाव जिस प्रकाश में हो उसको अलोकाकाश कहते हैं । तथा यमन करने में सहायक होने की शक्ति धर्मास्तिकाय में है और अलोकाकाश में धर्मास्तिकाय नहीं है। इसलिए धर्मास्तिकाय का अभाव होने से प्रागे अलोकाकाश में अर्ध्वगमन नहीं होता। अतएव मुक्त जीव की स्थिति लोक के अन्त पर्यंत ही रहता है, साही तत्वार्थ सूत्र में लिखा है, "धर्मास्तिकायाभावात्" अर्थात् धर्मास्तिकाय का अभाव होने से प्रागे सिद्धों का गमन नहीं होता। प्रश्न :-मुनिराज एकाग्रचित्त होकर ध्यान करते हैं, सो उस ध्यान की
स्थिति कितनी है? उत्तर :- शरीरादिक बाह्य पर पदार्थों के चित्तवन कर निरोध कर अपनी आत्मा के स्वरूप में एकाग्रता का चितवन शुद्ध ध्यान है। वह धर्मध्यान शक्लध्यान. के भेद से दो प्रकार का है, वह बनवृषभनाराच, वज्रनाराच भौर नाराच इन तीनों उत्तम संहननों को धारण करने वाले जीवों के होता है । इनमें भी वनवृषभनाराच नाम के प्रथम संहनन को धारण करने वाले जीवों के वह ध्यान अन्तर्मुहूर्त तक रहता है, इससे अधिक नहीं ठहर सकता है सो ही तत्वार्थ सूत्र में लिखा है- . उत्तम संहननस्यैकाग्रचिता निरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात ।।अध्याय ६ सूत्र २७।।
प्रश्न :--जैन धर्म में चार आश्रम स्थापन किये गये हैं, सो वे कौन-कौन हैं
. . और उनका स्वरूप क्या है ? .. . . . . . उत्तर :-उपासकाध्ययन नाम के सातवें अंग में पाश्रम चार प्रकार के वतलाये हैं । ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और भिक्षुक । आश्रमों के ये भेद क्रियाओं के भेद से होते हैं, सो ही प्रश्नोत्तर श्रावकाचार में लिखा है--ब्रह्मचारी मही, वानप्रस्थो भिक्षुक सत्तमः । चत्वारो ये क्रिया भेदादुक्ता वर्णवदाश्रमाः । इन चार प्रकार के चरणश्रिमों में से पहले ब्रह्मचारी के पांच भेद हैं---उपनय ब्रह्मचारी, अवलंब ब्रम्हचारी, प्रदीक्षित अम्हचारी, गूढ ब्रम्हचारी और नैष्ठिक अम्हचारी। इनके अन्त में ब्रम्हचारी शब्द सबके साथ लगा हुआ है। इनका विशेष स्वरूप इस प्रकार है जो श्रावकाचार सूत्र का विचार करे, विद्याभ्यास करने में सदा तत्पर रहे और गृहस्थ
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८६२ ]
[ गा. प्र. चिन्तामरिग धर्म में (गृहस्थों के द्वारा करने व धार्मिक नियमों में) शिपुरण हो उसको उपनय ब्रम्हचारी कहते हैं। जो जब तक विवाह न करे, तब तक क्षुल्लक अवस्था धारण करे, सदा जैन शास्त्रों का अध्ययन करे। अध्ययन समाप्त कर पीछे पारिणग्रहण करे, . उसको अवलंब ब्रम्हचारी कहते हैं । जो बिना दीक्षा लिए ही व्रताचरण करने में लीन हो, जैन शास्त्रों के अभ्यास में तत्पर हो और समस्त शास्त्रों को पढ़कर फिर पारिणग्रहण करे अर्थात् "शास्त्रों का अभ्यास पुर्ण हुए बिना विवाह नहीं करूंगा।" ऐसा नियम लेकर बिना दीक्षा लिए ही जो व्रतों के प्राचरण में प्रवृत्ति करे, उसको अदीक्षित व्रम्हचारी कहते हैं। बालक अवस्था से ही जैन शास्त्रों के अभ्यास करने में जिसका प्रेम हो और जो शास्त्रों को पढ़ चुकने के बाद माता पिता के हठ से विवाह करे ।
भावार्थ :-"जो स्वयं विवाह न करे किन्तु दूसरे के हठ से जिसको विवाह करना पड़े, उसको गढ़ ब्रह्मचारी कहते हैं। तथा जी जीवन पर्यंत समस्त स्त्री मात्र का त्याग कर देवे और एक वस्त्र मात्र परिग्रह के बिना बाकी सबका त्याग कर देवे सो नैष्ठिक ब्रम्हचारी है। इस प्रकार इनका स्वरुप है। यह बम्हचर्य अवस्था सातवीं प्रतिमा से लेकर ग्यारहवीं प्रतिमा तक समझना चाहिए। आये गृहस्थ का दूसरा वर्णाश्रम लिखते हैं।
___ जो त्रिकाल बंदना तथा पूजा आदि छह कर्मों के करने में तत्पर हो जो विषय कषाय और हिंसादिक पापों का त्यागी हो, जो स्वात्मरस का (अपने शुद्ध प्रात्मा के प्रानन्द रस का) भोगी हो, जो दयालु हो उसको गृहस्थ कहते हैं, अभिप्राय यह है कि अणुव्रत गुणव्रत शिक्षाबत इन बारह व्रतों को पालन करने वाला हो उसको गृहस्थ कहते हैं । जो ग्यारह प्रतिमाओं को पालन करता हो, जो ध्यान और अध्ययन करने में सदा तत्पर हो, अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ इन चारों कपायों से रहित हो उसको वानप्रस्थ कहते हैं। तथा जो हिंसा आदि समस्त पापों का जीवन पर्यंत के लिए त्यागी हो, पंच महादत प्रादि अठाईस मूलगुणों को धारण करने वाला हो, धर्मध्यान में लीन हो, ध्यानी हो, मौन धारण करने वाला हो और तपस्वी हो उसको भिक्षुक कहते हैं।
भावार्थ :--महामुनियों को भिक्षुक कहते हैं। इस प्रकार चारों वरणश्रिमों का स्वरूप जनना । सो ही धर्मरसिक नाम के शास्त्र में लिखा है- .
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अध्याय : दसवां ]
[ ८६३ उपनयावलंबी चादीक्षितौ गूढनैष्टिनाः। श्रावकाध्ययने प्रोक्ताः पंचधा ब्रह्मचारिणः ॥१७७३॥ श्रावकाचार सूत्राणां विचाराभ्यासतस्परः । गृहस्थ धर्म शक्ताश्चोपनय ब्रह्मचारिकः ॥१७७४।। स्थित्वा क्षुल्लक रूपेण कृत्वाभ्यास सदागमे । कुर्याद्विधाहक सांत्रावलंबनाचारिकः ॥१७७५।। बिना दीक्षा व्रताशक्तः शास्त्राध्ययन तत्परः । पठित्वोद्वाहं यः कुर्यात्सोऽदोक्षाब्रह्मचारिकः ।।१७७६॥ पाबाल्यच्छास्त्र सम्प्राप्तिः पित्रादीनां हठात्युनः । पठित्योद्वाहं यः कुर्यात्स गूढ ब्रह्मचारिक: १७७७।। संध्याध्ययन पूजादि कर्मसु तत्परो महान् । स्यागी भोगी दयालुश्च स गृहस्थः प्रकीर्तितः ॥१७७६।। प्रतिमेकादशधारी ध्यानाध्ययन सत्परः ।. प्राक् कषाय विदूरस्थो वानप्रस्थः प्रशस्यते ॥१७७६।। सर्व संग परित्यक्तो धर्मध्यान परायणः । । ध्यानी मौनी तपोनिष्ठः संज्ञानी भिक्षुरुच्यते ।।१७८०॥ . .
इसके सिवाय इन चारों आश्रमों का इसी प्रकार का कथन धर्मामृत श्रावकाचार में, स्वामिकातिकेयानुप्रेक्षा श्रीशुभचन्द्राचार्य कृत उसकी संस्कृत टीका में तथा और भी अनेक शास्त्रों में लिखा है उनमें से इनका विशेष स्वरूप समझ लेना चाहिये । प्रश्न- सात समुद्धातों में से केवली समुखात केवली भगवान के होता है, सो
वह किस गुरणस्थान में होता है।
उत्तर-~जिसकी आयु छह महीने बाकी हो और बाकी के वेदनीय नाम गोत्र इन तीनों कर्मों की स्थिति छह महीने से अधिक हो ऐसे मनुष्य को केवलज्ञान उत्पन्न हो तो वह केवलि समुद्धात करता है । ऐसे केदलियों के सिवाय और केवली समुद्धात करें भी तथा न भी करें।
भावार्थ---जिनकी आयु छह महीने की बाकी रहने पर केवलज्ञान का उत्पन्न हुया; ऐसे केवली तो नियम से समुद्धात करते ही हैं। ऐसे केवलियों के सिवाय अन्य
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८६४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
केवलियों का समुदात करने का नियम नहीं है ।
जब तेरहवें सयोग केवली नाम के गुणस्थान की स्थिति अन्तर्मुहूर्त बाकी रह जाती है, तब दंडकवाद, प्रतर, पूर्व प्रवर मात्र ऐसे आठ समय में समुदात कर तेरहवें गुण स्थान के अन्तिम समय में अघातिया कर्मों की स्थिति योग निरोधक आयु के बराबर करते हैं फिर कर्मों का नाश करते हुए चौदहवें गुणस्थान के अन्त में मोक्ष प्राप्त करते हैं सो ही वसुनन्दी श्रावकाचार में लिखा हैछम्मा साउग सेसे उध्पां अस्स केवल शापं । सो कुणइ समुग्धायं इदसे पुरण होय वा भखिज्जो ॥१७८॥ तोमुहुत्त सेसा उगम दण्डं कवाड परं च
जइय पूरणमथ कबाड़ दंड नियत सुयमाणं च ॥ १७८२॥
एवं पयेसप सरणं संवरणं कुणइ श्रट्ट समयेहि ।
हो हिति जोइ चरिमे धाइ कम्मारिख सरिसारिए । १७८३॥
इस प्रकार और भी वर्णन है इससे कहना पड़ता है कि जो जीव चौदहवें गुणस्थान में समुध्दात मानते हैं और आठवें समय में मुक्ति जाना बतलाते हैं, के सूखें हैं, वे शास्त्री नहीं हैं ।
:
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प्रश्न --- श्री fat में चौबीसी प्रतिमानों में अगल बगल दोनों थोर श्री देवी अर्थात् लक्ष्मी और सरस्वती मूर्ति रहती है तथा जिनमूर्ति के पास यक्ष यक्षिणी की मूर्ति रहती है; सो यह बात है जिन प्ररहन्त देव की प्रतिमाओं के पास पक्षादिक की व सरस्वती श्रादि की मूर्ति हो उनको नमस्कार करना चाहिये या नहीं, उनकी पूजा करमी. चाहिये या नहीं तथा जिनेन्द्र देव की प्रतिमा के ग्रगल-बगल यक्षादिकों को मूर्ति शास्त्रोक्त है या किसी ने मन से कल्पना कर बनवा दी है ?
उत्तर - भगवान अरहन्त देव की प्रतिमा के साथ-साथ यक्षादिक की मूर्तियां अनादिकाल से चली आ रही हैं और अनन्त काल तक रहेंगी। यह कोई मन की कल्पना नहीं हैं, किंतु शास्त्रोक्त है । शास्वत वा अनादिकाल से अनन्तकाल तक रहते Part कृत्रिम जिन प्रतिमाओं में भी इन चिन्हों के रहने का वर्णन है तथा की ग्राम्नाय के अनुसार ही कृत्रिम प्रतिमाएं बनाई जाती है ।
कृत्रिम प्रतिमा
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अध्याय : दसवां }
[ ८६५
इसलिये कृत्रिम प्रतिमाओं में भी ये चिन्ह प्रवश्य होने चाहिये । किसी-किसी जिन मंदिर में अब भी यक्षादिकों की मूर्ति सहित लगभग दो, दो हजार वर्ष पहले की जिन प्रतिमाएं विराजमान हैं, वे भला अपूज्य कैसे हो सकती हैं ।
कृत्रिम जिन प्रतिमानों के साथ-साथ यक्षादिक वा लक्ष्मी सरस्वती की प्रतिमाओं का निर्णय श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती विरचित त्रिलोकसार में है । तथा जिafia का कथन करते समय लिखा है । यथा
दस ताल मारग लक्खण भरिया पेवंत इव वदन्ता वा । पुरु जिण तुङ्गा पढ़िमा रमणमया भट्ट श्रहियसया ।११७८) १८४॥ चमर करणाम जक्खग बत्तीसं मिहुणगेहि पुहजुत्ता सरिसीए : पंत्तीए गव्भगिहे सुट्ठ सोहति ।।१७८५।। - सिरिदेवी सुद्देवी सव्वान्ह सरणकुमार जक्खाणं । varfar जिनपासे मंगल मंदुबिहमेवि होदी ।। १७८६॥
इस प्रकार लिखा है इसका भावार्थ यह है कि उस गर्भगृह में ( श्रीमंडप में ) एक सौ आठ प्रतिमाएँ विराजमान हैं । वे प्रतिमाएँ दस ताल (धनुष) ऊँची हैं । एक-एक प्रतिमा के दोनों ओर बत्तीस-बत्तीस यक्ष चमर लिये खड़े हैं तथा उन जिन प्रतिमाओं के दोनों प्रोर श्रीदेवी और सरस्वतीदेवी ये दोनों देवियों स्त्री का रूप धारण कर खड़ी हैं, सर्वाल्हाद और सनत्कुमार नाम के यक्षदेव अपने स्वरूप के अनुसार खड़े हैं । उन प्रतिमायों के आगे आठ गुने अष्टमंगल द्रव्यं रक्खे हैं । ये अष्ट मंगलद्रव्य प्रत्येक प्रतिमा के सामने अलग-अलग हैं। इन सब विभूतियों से शोभायमान उन प्रतिमाओं को इन्द्रादिक सम्यग्दृष्टि जीव पूजा करते हैं और वंदना करते हैं ।
ऐसा त्रिलोकसार में लिखा है---
सुमुहूर्ते
नक्षत्रे वाद्यवैभव संयुतः
प्रसिद्ध पुण्यदेशेषु नदीमगवनेषु च ॥ १७८७ सुस्निग्धां कठिनां सुस्पर्शा सुस्वरां शिलाम् । समानीय जिनेन्द्रस्म विवं कार्य सुशिल्पिभिः ॥१७८॥ surfers at ai मश्र रेखा विजतम् । स्थितं प्रलंबितं हस्तं श्रीवत्सादयं दिगम्बरम् ।।१७८६ ॥
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८६६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि पल्यंकासनं वा कुर्याछिल्मि शास्त्रानुसारतः । निरायुधं राजतं या पैसतं काश्यजं तथा ॥१७६०॥ प्रवालं मौक्तिकं चैव वैडूर्यादिसुरत्नजम् । चित्र तथा लेप्यं कूचिच्चनजं मतम् ॥१७६१॥ प्रातिहार्याष्टकोपेतं संपूरषियवं शुभम् । भावरूपानुविद्धांग करयेतु विबमहतः ।।१७६२।। प्रातिहाविना शुद्ध सिद्धबिम्बमपीरशम् । सूरीणां पाठकानां च साधूनां यथागमम् ॥१७९३॥ वामे च यक्षी बिभ्राणं दक्षिणे यक्षमत्तमम् । नवग्रहानधो भागे मध्ये च क्षेत्रपालकम् ॥१७६४॥ Karni देवतानां सर्वालंकार भूषितम् । स्ववाहनावलोपेतं कुर्यास्सर्वाग सुन्दरम् ।।१७६५।।
यह रीति प्रकृत्रिम प्रतिमाओं को अपेक्षाओं की अपेक्षा अनादि निधन है तथा परम्परा करके भी योग्य है।
... जो लोग धारणेन्द्र पद्मावती सहित (फरणा सहित} श्री पार्श्वनाथ को प्रतिमा से अरुचि करते हैं, वे ठीक नहीं है । जो रीति शास्त्रोक्त है और परम्परा से चली आ रही है, उसमें संदेह नहीं करना चाहिये । जो रीति केवल मन की कल्पना से चलाई गई हो उसमें अत्रि करना ठीक है । प्राचीन जीतनी अर्हन्त प्रतिमायें हैं, वे अष्ट प्रातिहार्य और यक्षयक्षि सहित ही हैं, देवगढ़, सेरोनजी, खजराहो, पपोराजी, थोबनजी, बुदीचंदेरी आदि भारत में कला संस्कृति के केन्द्र हैं, वहां पर जो भी प्रतिमा अरहन्त भगवान की हैं. वह सब इसी प्रकार ही हैं, वर्तमान में सबसे प्राचीन क्षेत्र खारवेल महाराजा के समय का है जो खंडगीरि उदयनीर के नाम से प्रसिद्ध हैं और आगम में भी इसी प्रकार की प्रतिमा बनाने का विधान है सो आगमोक्त ही है।
प्रश्न :- क्या इन देवी-देवताओं की पूजा अर्चना भी करना चाहिये ?
उत्तर :- इन देवी-देवताओं की पूजा अर्चना इनके पद के अनुसार करनी चाहिये, वीतराग भगवान की तरह इनकी पूजा अर्चना नहीं करना चाहिये, क्योंकि ये देव चतुर्थगुणस्थानवर्ती हैं। इनकी पूजा सत्कारादि भी इनी के पद के योग्यतानुसार करना चाहिये । सोमदेव सूरी ने इसीलिये अपने उपासकाध्ययन में लिखा । सम्यग्दृष्टि
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अध्याय : दसवां ]
[ ८६७ श्रावक को यज्ञांस देकर, उनका सन्मानादिक करना चाहिये। यतो यज्ञांस दानेन् माननीया सुदृष्टिभिः ॥१७६६।।।
सोमदेव उपवासकाध्ययन इसमें ऐसा करने में एक अपेक्षा है। श्रावक अपने इस लोक की सिद्धि के याने भोगों के लिये ऐसा करता है, जैसे विद्याधर लोग अथवा चक्रवर्ती आदि लोक करते हैं। विद्याधर लोग विद्याओं व मंत्रों की सिद्धि के लिये जो भी विद्या अथवा मन्त्रों के अधिष्ठाता देव अथवा देवी हैं, उनका पहले पूजा सत्कारादि करके फिर उन मन्त्रों को सिद्ध करते हैं । तब ही ये विद्याएं उनको सिद्ध होती हैं और उनके कार्य की सिद्धि करती है, अगर ये ऐसा नहीं करते तो उनको कभी विद्याएं सिद्ध नहीं हो सकतो। ऐसा नियम है जिससे हमको कार्य कराना हो उसका सत्कारादि करना चाहिए।
तद्भच मोक्षगामी नमी विनमि, कुभकरण, मेघनाद, विभिषरणादिक अनेक राजा जो सम्यक दृष्टि थे, उन्होंने भी ऐसा किया भोगों की प्राप्ति के लिये । देखिये प्रकरण आदिपुराण नमि विनाम को धरणेन्द्र के द्वारा राज्य देते समय उपदेश । धरमेन्द्र ने कहा कि ये महाविद्याएं यहां के लोगों को इनकी इच्छानुसार फल दिया करती हैं । यहां विद्याधरों को जो महाप्रज्ञप्ति आदि विद्याएँ सिद्ध होती हैं, वे इन्हें कामधेनु के समान यथेष्ट फल देती रहती हैं वे विद्याएं दो प्रकार की हैं---
कुल जात्याश्रिता विद्यास्तपो विद्याश्चता द्विधाः । कुलाम्नाया गतः पूर्वायले नाराधिताः पराः ॥१७९७॥ तासामाराधनोपायः सिद्धायतन संनिधौ । अन्यत्र वाशुचौ देशे द्विपाद्रि पुलिनादिके ॥१७६८।। सं पूज्य शुचि घेषण विधादेव प्रताश्रितः । महोपवास राराध्या नित्यान पुरः सरैः ।।१७६६॥ सिद्धियम्ति विधिनानेन महाविद्या न भोजुषाम् । पुरश्चरण . नित्यार्चा - जपहोमाधनुक्रमात् ॥१८०० सिद्धविध स्ततः सिद्ध प्रतिमार्थनं पूर्वकम् । विद्या फलानि भोग्यानि वियद गमन चुन्धुभिः ॥१८०१॥ .
आदिपुराण पर्व १६ पृष्ठ ४२० संपा. पं. पन्नालाल साहित्याचार्य, सागर
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८६८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि 'एक तो ऐसी विद्यायें हैं जो कुल ( पितापक्ष ) अथवा जाति (मातृपक्ष ) के आश्रित हैं और दूसरी वे हैं जो तपस्या से सिद्ध की जाती है। इनमें से पहली प्रकार की विद्यायें कुल परम्परा से ही प्राप्त हो जाती है । और दूसरे प्रकार की विद्यायें यत्नपूर्वक आराधना करने से प्राप्त होती हैं । जो विद्यायें श्राराधना से प्राप्त होती हैं उनकी आराधना का उपाय यह है कि सिद्धायतन के पास या द्वीप पर्वत या नदी के किनारें श्रादि किसी अन्य पवित्र स्थान में पवित्र वेषधारण कर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुये विद्या के अधिष्ठातृ देव-देवी की पूजा करे तथा नित्यपूजा पूर्व महोपवास धारण कर उन विद्याओं की आराधना करे इस विधि से तथा नित्य पूजा जप होम आदि अनुष्ठान करने से विद्याधरी की वे महाविद्याय सिद्ध हो जाती हैं। जिन्हें विद्यायें सिद्ध हो गई हैं ऐसे प्रकाशगामी विद्याधर लोग पहले सिद्ध भगवान की प्रतिमा की पूजा करते हैं और फिर विद्याओं के फल का उपभोग करते हैं ।
इस प्रकार धरणेन्द्र के द्वारा प्रदत्त राज्य पाकर और विद्या सिद्ध करने का उपाय जानकर दोनों कुमार अत्यन्त ग्रानन्दित हुये धरोन्द्र भी अपना कार्य पूरा हुआ सम अपने पाताल लोक को लौट गया ।
पश्चात् उन दोनों कुमारों ने विधिपूर्वक अनेक विद्यार्थी सिद्ध की और विद्या में बड़े-बड़े पुरुषों के साथ मिलकर अपने अभिलषित अर्थ को सिद्ध किया, दे दोनों कुमार विद्याओं के श्राश्रय से प्राप्त तथा छहों ऋतुयों के सुख देने वाले भोगों को भोगने लगे ।
निमि और नमि तद्भव मोक्षगामी जीवों ने भी विद्यायें सिद्ध की निम्न श्लोक से प्रमाणित है कि सम्यक्त्व भी आवश्यकतानुसार विद्यायें सिद्ध कर अपने atter जीवन की सफलता प्राप्त करते थे ।
fafeteriमानयन्तौ ।
farartefa विद्यावृद्ध : सममभि मतामर्थं सिद्धि प्रसिद्धिम् ॥ १८०२॥ famratara पडतु सुखदान्निविशन्तौ च भोगान् ।
तौ तत्रादौ स्थितिम भजतां खेचरैः संविभक्ताम् ।।१८०३||
० जिनसेro प्रादिपुराण पर्व १६ पृष्ठ ४४३
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....
अध्याय : दसवां .
उपरोक्त कथन से प्रमारिणत हुआ कि तद्भव मोक्षगामी जीव भी इह लोक सिद्धि के लिये विद्याएं सिद्ध करते थे और जब जो विद्यार्य सिद्ध करती होती. उस विद्या के अधिष्ठाता देव या देवी की पूजा विनय आदर सम्मान भी करना.पड़ता था । वर्तमान समय में अगर कोई सदगृहस्थ किसी मंत्र विद्या का सहारा लेकर अपने ऐहिक कार्य की सिद्धि कर लेता है तो क्या वह जीव अभव्य या मिश्यादृष्टि की कोटि में आ जायेगा ? नहीं आयेगा, क्योंकि उसका हेतु विद्या सिद्धि करने का है । और उन विद्याओं के सहारे से अपने पर पाया संकट धर्मसंकट अथवा दूसरों पर प्राया संकट दूर करने का है। ..
.. ___ वर्तमान में कुछ पंडित लोग अथवा विशेष प्रागमाभ्यास शून्य साधु लोग कहते हैं कि मंत्र विद्या वा यंत्र विद्या का प्रयोग करना कराना सहारा लेना मिथ्यात्व है क्योंकि प्रत्येक मंत्र विद्या का अधिष्ठाता देव होता है और उस देव का पूजन अर्चन करना आवश्यक होता है। सम्यदृष्टि बोतरागदेव को छोड़कर अन्य किसी को नहीं पूजता है।
यहां प्रश्न है कि उपरोक्त कथन में नामि विनमि राजकुमार क्या मिथ्यादृष्टि थे अथवा अभय थे, जो उन्होंने विद्याऐं सिद्ध की और उनके अधिष्ठाता देव की पूजा अर्चा की, क्या जिनसेन स्वामिजी ने प्रादिपुराण में प्रसद् निरुपण किया है ? विद्वान विचार करें।
हमें प्राचार्यों के मन्तव्यों की और ध्यान देना चाहिये पंडितों के मंतव्यों की ओर नहीं, कुछ गृहस्थ पंडितों ने अपनी परम्परा का पोषण करने के लिये ही निषेध किया है ।
प्रागे विरनन्दी स्वामी एक स्त्रोत बनाने के पहले शासन देव के विषय में अपना मन्तव्य लिखते हैं ?
"स्त्रोत को प्रारम्भ में शंका समाधान करने हुये लिखते हैं....
काव्यं श्रीमद्गीति न तुच महत: "सूरे" लपस्विनोऽस्मिन् स्तवकरणे कथं सम्यक्त्व शुद्धि जातेती प्रश्ने प्रत्युत्तरमार मोक्ष मार्ग प्रत्युद्यतस्य सम्यक्त्वस्य सहितस्य तपस्विनो मुनेः सम्यक्त्वधनिका जांतास्त्वनतिमोत्रमार्गाहेत्वेन तस्य समुधमो न तस्य तु मित्त्यमत्कारकारी चितापेक्षा श्रावकारणां यथोपदिष्ट धाभिलषित-समीहित
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८७०. }
[ गो. प्र. चिन्तामणि सिध्दधर्थमन्त्र लौकिक मिथ्यात्वाऽमोहार्थ जिनधर्म समुद्योतनाथ श्रावकाभिप्रायेण पक्षिरणामपि समुत्पत्यनन्तर दृष्टनात् सम्यमत्वानां यथालब्ध स्वकीय नियोगी सेवायसराणां सत्यकायधत्वं समुचितं (न) तु इयं देवी मोक्ष मार्ग फल दायकेति बुद्धचासत्कारार्हत्वं तस्य तु व्यवहार विधौ सोपदेश निराकरणम् किं तदा पंच नमस्कार सेवन तथा तीर्थकर यक्ष क्षय महार निजिर उन विधानं समुपदिशत्येव न तु स्वयमाराधकाः "स्यात्" न तु विराधक: "स्यात्" कथं पार्श्व प्रतिमादेरुपरिदृष्टत्वादनादि-निधनरचनेमिति तथा चरणादो इष्टत्वादपि चिंतामण्यादेः कथं निरपेक्षत्वं तथा सर्वेषां संहिता शास्त्राणां प्रतिष्ठाशास्त्राणां शिल्पशास्त्राणां प्रायश्चित्तशास्त्राणाम् नादरो भवति ? तदसत्कारे तथा यशस्तिलक देवसेनकृत भावसंग्रह वामदेव वृत्त वसुनन्दी श्रावकाचार महापुराण लघुसकलकीर्ति प्रादि शास्त्राणां भट्टारक शुभचन्द्र कृत शास्त्राणां व्रत कथा को शादीनाम् नादरो भवति तेन सत्कारहत्वं समुचितं एतत्सत्कारे प्रथमानुयोगोपदिष्ट दानं फलादिकारसापेक्ष्य-पद्मावत्यादि कथा भंगोऽपि यथास्यात्तथा संमतभद्र-पात्रकेशरी अकलंकाद्युपसर्गविध्नमपि स्यादनतमेव तथा सकलकीतिना श्रीपालस्त्री शीलरक्षार्थ सर्वा जिनशासन रक्षिका नानाविद्योपसर्ग रक्षार्थ सर्वा जिनशासन रक्षिका नानाविधोपसर्ग कुर्वत्यः धवलं प्रति “समामता" एतत्कथानक मुक्त तदायं मृतमेव स्यात् "तथाचाकृत्रिमचैत्यालय विन्यासे सर्वान्हं सनतकुमार श्री देवी श्रुतदेवीत्यादि यक्षिणी यक्षक्रिया सोऽपि त्रिलोकसारे नेमिचन्द्रः रक्तं सोऽपि त्यलीक एव स्यादित्यत्ः शतधा मिथ्यादृष्टिनां जिनधर्म विराधकानां 'वाक्य' खण्डनं दृष्टवा नादिकालीन यक्षिणि यक्ष विन्यासं तथाराधन विधानं "योग्यमेव" सेव्यं न तु व्याप्यं तथा परमार्थ देवता जिनदेवः सः सत्यदेवः क्रियादेवश्चक्र छगादिक यज्ञविधानं व्यवहार देवता रक्षा देवता कुलदेवता पद्यावत्यादिरित्यादि कथनमपि पंचधा विवर्ण चारेषु दृष्टं कथमुदितो भास्करोप्यनुदितः समुदीयंते"
इस संस्कृत उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है कि शासन देवी देवताओं को अर्हत समान मानकर अभिलाषा से स्तवन पूजन आराधना की जायेगी तो अवश्य सम्यक्त्व की हानि होगी। वह मिथ्यात्व होगा अनन्त संसार का कारण होगा, धर्म की महिमा दिखाने के लिये संसारिक जीवन सुखी बनाने के लिये धर्मोद्योत करने के लिये शासन देवी देवना का प्रादर पूजा स्तवन करना दोष नहीं। इसमें मिथ्यात्व और मढ़ता नहीं है । अपितु सम्यक्त्व का पोषरण है । मानलो यदि मिथ्यादृष्टि भूत-प्रेत व्यन्तर
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अध्याय : दसवां ]
[ ८७१
सता रहा है। जिससे धर्मध्यान में बाधा आती है। तब मुनिराज व साधु उसके निराकरणार्थ उपाय बतलाकर उसकी रक्षा करते हैं। साथ ही नमस्कार मन्त्र की आराधना करने का आदेश देते हैं। तब वह मिथ्यात्व नहीं । यदि मिथ्यात्व समझा जायगा तो "जैनसंहितायें" प्रतिष्ठाशास्त्र शिल्पशास्त्र प्रायश्वित्त शास्त्र तिरस्कृत हो हो जायेंगे अनादररंगीय हो जायेंगे । ऐसा समझने पर यशस्तिलक चम्पू देवसेन द्वारा रचित भावसंग्रह वामदेव रचित शास्त्र वसुनन्दी श्रावकाचार महापुरास लघुसकलकीर्ति शुभचन्द्र भट्टारक कृतास्त्र कथा कोष प्रवादरणीय हो जायेंगे । प्रथमानुयोग कथा पुराण सभी झूठे हो जायेंगे किन्तु ऐसा नहीं है । सभी कथायें, चमत्कार एवं घटनाऐं सत्य और जिन प्रणीत हैं । अकृत्रिम जिन चैत्यालयों में अकृत्रिम जिनबिम्ब यक्ष यक्षिणी सहित है । यह त्रिलोकसार में श्री नेमीचन्द्राचार्य ने लिखा है - मिथ्यादृष्टि देवों के निषेध के लिये सम्यग्दृष्टि देवों की पूजा सत्कार योग्य ही है । ताकि • सत्य देवाराधना निर्विध्न हो ।
[ जयपुर से हस्तलिखित डायरी, पं. कन्हैयालाल जी से प्राप्त ] ra चक्रवर्ती क्षायिक सम्यकदृष्टि किंचित भोगों की इच्छा पूर्ति के लिये चरत्न और अस्त्रों की पूजा करता है ।
इसके बाद और देखिये पट खण्डाधिपति की आयुधशाला में चक्ररत्न उत्पन्न होता है । वह चक्ररत्न जो अजीब है, उसकी भी चक्रवर्ती प्रष्टद्रव्य से पूजा करता है । श्रथ चक्रधरः पूर्जा चक्रस्य विधिवत् व्यधात् ।
सुतोत्पत्ति श्रीमानभ्यनन्ददतु क्रमात् ॥
श्रथान्तर श्रीमान् चक्रवर्ती भरत महाराज ने विधि पूर्वक चक्ररत्न की पूजा
की और फिर अनुक्रम से पुत्र उत्पन्न होने का आनन्द मनाया |
आदिपुराण प २६ पृष्ठ नं. १ जिनस्वामी कृत
भरत चक्रवर्ती ने मगध देव को जीतने के लिये भी मन्त्र तन्त्रों का सहारा लिया था, क्षायिक सम्यग्दृष्टि होकर भी ।
अधिवासित्जैत्रास्त्रः स त्रिरात्र मुपोषिषान् ।
मन्त्रस्मृति पूजामा सूचितत्योपगः शुचिः ॥१८०॥
जिसने मन्त्र तन्त्रों से विजय के शस्त्रों का संस्कार किया है । तीन दिन
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उपवास किया हो, मन्त्र के स्मरण से जिसकी श्रात्मा पवित्र हैं ।
स्त्रों की पूजा का प्रमाण ---
[ गो. प्र. चिन्तामरिश
आदिपुराण पर्व २८ पृष्ठ ३, द्वितीय भाग
पुरोहित सरवस्तत्र कृती
वयः ।
अध्यशेत शुचि शरयांदि व्यास्त्राभ्यधि वासयनः ।। १८०४ ।।
वहां उन्होंने पुरोहित के साथ-साथ उपवासकर और दिव्य प्रस्त्रों की पूजा
डा की पवित्र शय्या पर शयन किया। यहां प्रश्न होता है कि भरत चक्रवर्ती को अस्त्रों की पूजा करना क्या आवश्यक थी ? क्या वह मिथ्यात्वी था ? नहीं किन्तु यह व्यवहार है ! उसको इस प्रकार का करना ही पड़ता है जिनसे काम लेना है, उनका आदर सत्कार करना परमावश्यक है। चाहे वह क्षायिक सम्यग्दृष्टि क्यों न हो । आदिपुराण पर्व ३२ पृष्ठ ११६, उत्तरार्द्ध द्वि. खण्ड
इत्यादि अनेक प्राचायों के मन्तब्य आगम में लिखे हुए हैं । सो सम्यग्दृष्टि श्रावक को उनके पद के योग्य उनका सन्मान करना ही चाहिये। अगर उनसे . बि.सी को द्वेष है तो सम्मान नहीं तो अपमान भी नहीं करना चाहिये । हमारे यहां द्वादशांगश्रुत में दसवां विद्यानुवाद पूर्व है, उस विद्यानुवाद पूर्व में, महाविद्या और काही वर्णन है और देव देवियों से ही सम्बन्धित वर्णन है और इन विद्याओं को सम्यग्दृष्टि श्रावक या मिथ्यादृष्टि जीव दोनों ही भोगों के लिये सिद्ध करते हैं -- ऐसा श्रागम का वचन है !.
हां, ये विद्याएं निर्व्रन्थ भावलिंगी मुनि सिद्ध नहीं करते। इन साधुओं को विद्यानुवाद पूर्व का पाठ करते समय स्वतः सिद्ध हो जाती हैं। लेकिन वीतरागी साधु को भोगों की इच्छा नहीं रहती, इसलिए उन स्वत: सिद्ध हुई विद्यात्रों को कह देते हैं कि हमें तुमसे कोई कार्य नहीं है । अगर धर्म-प्रभावनार्थ, धर्म-रक्षणार्थ • कोई साधु निःस्वार्थ भाव से मन्त्रविद्याओं का सहारा लेता है, तो कोई दोष नहीं है । प्रभावना च प्रभाव्यते मार्गोऽनयेति प्रभावना, बाद, पूजा, व्याख्यान, मन्त्र, तन्त्रादिभिः सम्यगुपदेशै मिथ्यादृष्टि रोधं कृत्वाहं प्रणित शासनोद्योतनम् ।
मूलाचार प्रा. कुन्द. टी. पृ. १७४
जिसके द्वारा मार्ग को प्रभावशील किया जाता है, वह प्रभावना है । बाद, 'शास्त्र, पूजा, सिद्धचक्रविधानं महोत्सव प्रादि, दान, श्राहार, औषधि, अभय, व्याख्यान,
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अध्याय : दसयां ]
[ ८७३ मन्त्र तन्त्रादिक से और इनके समीचीन उपदेश से मिथ्यादृष्टि के प्रभाव को रोक कर अहंन्त भगवान-कथित जैन शासन का उद्योत करना प्रभावना है । - विजयोदया--मन्ताभि ओग को दुग भूई कम्म मन्त्राभियोग क्रियां, कुतु हलोपदर्शन नियां, बालादीनां रक्षार्थ भूति कर्म च । ययुंज दे करोति यः । अभियोग भावरण कुणइ । अभियोग्या भावनां करोति । किं सर्व एव मन्त्राभियोगादी प्रवृत्तो नेत्याह, इढि रस साद हेदुं मन्ताभियोग को दुग भूई कम्म जो पउंजदे सो अभियोगभावरण कुणइ । द्रव्यलाभस्य, मृष्टाशनस्य, सुखस्य वा हेतुं मन्त्राथभियोग कर्म प्रयुक्ते यः स एव अभियोग्य भावनां करोति । तेन यः स्वस्य परस्य वा सायुरादि परिज्ञानार्थ मन्त्राभियोगं कुर्वन, धर्मप्रभावनार्थ कौतुकं उपदर्शयन् वैयावृत्यं वा प्रवर्तयामीति उद्यत: ज्ञान दर्शन चारित्र परिणामादर वर्तनान्नदुष्यतीतिभावः । ..
कुमारी वगैरह में भूत का आवेश उत्पन्न करना, अकाल में बुष्टि करके दिखाना ऐसे हारचर्य का प्रयोग करना जैसे प्रभावस्या के दिन आकाश में लोगों को चन्द्र दिलाना इत्यादि, किसी स्त्री या पुरुष को वश करना, उच्चारण करना, इत्यादि बालकादिकों का रक्षण करने के लिए भूति कर्म मंत्र प्रयोग करना अथवा भूतों की क्रीडा दिखाना ये सब क्रियायें यदि अपना ऐश्वर्य दिखाने के लिये अथवा सम्पदा दिखाने के लिये, मिष्टाहार के लिये किंवा इन्द्रिय जनित सुख के लिये यदि मुनि करेगा तो उसकी यह अभियोग्य भावना कही जायेगी, इस भावना के प्रभाव से जीव का जन्म वाहन जाती के देवों में हो जाता है, यदि कोई मुनि निज की अथवा दूसरों की आयु वगैरह जानने के लिये मंत्रप्रयोग करेगा, धर्मप्रभावना के लिये यदि वह कौतुक कारक अकाल वृष्ट धादिक दिखावेगा अथवा इन मंत्रादिकों से मैं मुनि का वैयावृत्य करू गा, ऐसा अभिप्राय मन में धारण कर यदि वह कौतुकादि करेगा तो दर्शन, ज्ञान, चारित्र परिणामों में आदर से प्रवृत्ति करने वाला होने से दूधरणीय नहीं है।
भगवती आराधना (मूला, रा.) पृ. ४०० गा. नं० १५२ किसी साधू की समाधि कब होगी, इसको जानने के लिये संघाधिपति प्राचार्य क्षपक की समाधि ज्ञान करने के लिए देवता को पूछते हैं---
खवयस्सुव संपण्णरस तस्स प्राराधणा अविक्खेव ।। विध्यणणिमित्तण य पडिलेहदि अप्पमतों सो ॥१८०५॥
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८७४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि पाराधनागतं क्षेमं क्षपकस्य समीयुषः । । दिव्येन निःप्रमादोऽसौ निमित्तेन परीक्षसे ॥१८०६॥
खवगस्स झपकस्य, उपसंपण्यास अत्मांतिकमुपाश्रितस्य । तस्स तस्य । याराहरणा अविक्खेवं पाराधनाया अविक्षेपं । पडि लेहदि परीक्षते । कः ? सो स सूरिनिर्यापकः । अप्पमत्तो अप्रमत्तः । केरण दिवेण देवतोपदेशेन । रिममित्तेरण निमित्तेण वा इयमेका परीक्षा।
हमारे संघ के इस क्षपक ने समाधि के लिए आश्रय लिया है, इसकी समाधि निर्विघ्न समाप्त होगी या नहीं, इस विषय का भी आचार्य देवता के उपदेश से अथवा शुभाशुभ निमित्तों से निर्णय कर लेते हैं। यह भी एक परीक्षा है ! साधु की आलोचना आचार्य कहां सुनें
अरहंत सिद्ध सागर पउसरं रवीरंपुष्फ फल भरियं । उज्जारा भवरण तोरण पासादं गागजक्ख घरं ॥१८०७॥ जिनेन्द्र यक्ष नागादि मंदिरं चारू तोरणम् । सारः स्वच्छ पयः पूर्ण पद्मिनी फंड मंउितम् ॥१०॥
पागजखघरं । नागानां यक्षाणां च गृहं । अर्हन्त का मन्दिर, सिद्धों का मन्दिर, अर्हन्त और सिद्धों की जहां प्रतिमा है, ऐसे पर्वतादिक, समुद्र के समीप का प्रदेश, जहां क्षीर वृक्ष हैं, जहां पुष्प और फलों से लदे हुए वृक्ष हैं ऐसे स्थान, उद्यान तोरणद्वार सहित मकान, नागदेवता मन्दिर, यक्ष मन्दिर ये सब स्थान क्षपक की पालोचना सुनने के योग्य हैं।
भगवति प्रा. (म.प्रा.) प्रा. शिवकोटि (शिवार्य) । उपरोक्त विवरण से ये मालूम पड़ता है कि दिगम्बराचार्य भी इन विद्या, मन्त्रों व देवता का सहारा लेते थे विशेष कार्य के लिये, और आलोचना भी यक्षों के मन्दिरों में जाकर सुनते थे । अगर ये यक्ष मिथ्यादृष्टि होते तो इनसे क्यों पूछते अथवा इनके मन्दिर में प्राचार्य लोग क्यों जाते, मिथ्यादृष्टिों के मन्दिर में जाना ही हमारे यहां निषेध है अथवा मन से, वचन से, काय से मिथ्यादृष्टि देवों को मान्यता देना अनायतन सेवा है। अनायतन रोवने वाला कभी सम्यग्दृष्टि नहीं हो सकता। इससे सिद्ध होता है कि ये देवी देवता सम्यग्दृष्टि ही हैं और इनकी योग्यतानुसार इन देवीदेवताओं का सन्मानादि करना ही चाहिए । वीतराग भगवान की पूजा-पञ्चोपचारी
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अध्यायः दसवां ]
[ ८७५ है और देवी-देवताओं की पूजा षोडशोपचारी है । पूजा-पूजा में भी अन्तर है । विवेक से कार्य करे तो कोई दोष नहीं ।
अष्टविध द्रव्यार्चना करने से क्या फल मिलता है अलग-अलग
द्रव्य से पूजा करने का क्या फल है। और जिन मंदिर बनाना, . , मूर्ति स्थापन करना और पूजा करना, ऐसा करने वालों को क्या
फल मिलता है ? कुत्थु भरिदलभेत्ते जिणभवरणे जो ठवेइ जिणपडिमं । सरिसबमेतं पि लहेइ सो खरो तित्ययर पुण्यं ॥१८०६॥
जो पुरण जिगिदमवरणं समुण्यं परिहि-तोरणसमगं । रिम संEसं को सक्कर बीएसयलं ॥१८१०॥
जो मनुष्य कुथुरी (धनिया) के दलमात्र अर्थात पत्र बराबर जिनभवन बनवाकर उसमें सरसों के बराबर भी जिनप्रतिमा को स्थापन करता है । वह तीर्थकर पद पाने के योग्य पुण्य कोई प्राप्त करता है । तब जो कोई प्रति उन्नन और परिधि, तोरण आदि से संयुक्त जिनेन्द्र भवन बनवाता है । उसका समस्त फल वर्णन करने के लिये कौन समर्थ हो सकता है ?
जलधारारिखक्खेबेस पावमल सोहरणे हवे णियमं । चंदणलेवेस खरो जावर सोहग्गसंपण्यो ॥१८११॥
पूजन के समय नियम से जिन भगवान के आगे जलधारा को छोड़ने से पाप रूपी मैल का संशोधन होता है। चंदनरस के लेप से मनुष्य सौभाग्य से सम्पन्न होता है ।
जायइ अक्खयरिणहि-रयसामित्रो अक्सएहि अक्खोहो। अक्खीगलद्धिजुत्तो अक्खयसोक्खं छ पावे ॥१८१२॥
अक्षतों से पूजा करने वाला मनुष्य अक्षय नौ निधि और १४ रत्नों का स्वामी चक्रवर्ती होता है । सदा अक्षोभ अर्थात रोग शोक रहित निर्भय रहता है अक्षीण लब्धि से सम्पन्न होता है और अन्त में अक्षय मोक्ष सुख को पाता है।
कुसुमेहि कुसेसथवयणु तरुणीजरणयण कुसमवरमाला। . ववएपच्चियदेहो जयइ कुसुमाउहो । धेव ॥१८१३।।
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८७६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
पुष्पों से पूजा करने वाला मनुष्य कमल के समान सुन्दर मुख वाला तरुणी जनों के नयनों से और पुष्पों की उत्तम मालाओं के समूह से देवाला कामदेव होता है।
जायइ णिविज्जवाणेण सतिगो कंति-लेय संपण्यो ।
लावरण जलहि वेला तरंग संपाविय सरीरो ॥१८१४ ॥
नैवेद्य के चढाने से मनुष्य शक्तिमान, कांति और तेज से सम्पन्न और सौन्दर्य रूपी समुद्र की वेला (तट) वर्ती तरंगों से संप्लावित शरीर वाला अर्थात् प्रतिसुन्दर होता है ।
atar atवियासेजी दव्वा तस्य सम्भावो ।
सवभावजय केवलपईवसेएण होइ परो ।।१८१५॥
दीपों से पूजा करने वाला मनुष्य सद्भावों के योग से उत्पन्न हुये केवलज्ञान रूपी प्रदीप के तेज से समस्त जीवद्रव्यादि तत्वों के रहस्य को प्रकाशित करने वाला wer hamarat होता है ।
धूवेण सिसिटयरघवनकित्तिघवलियजयत्तश्रो पुरिसो ।
जायद
फलैहि संपत्त परमशिवारा सोक्खफलो ।।१८१६॥
धूप से पूजा करने वाला मनुष्य चन्द्रमा के समान धवल कीर्ति से जगत्त्रय को धवल करने वाला अर्थात् त्रैलोक्यव्यापी यश वाला होता है। फलों से पूजा करने वाला मनुष्य परम निर्वाण का सुखरूप फल पाने वाला होता है ।
घंटाहि घंट सद्दाउलेसु पवरच्छुराणमम्भम्मि ।
intss सुरसंघायसेवियो वर विमाणेषु ॥१८१७॥
जिनमन्दिर में घंटा समर्पण करने वाला पुरुष घंटाओं के शब्दों से आकुल अर्थात् व्याप्त श्रेष्ठ विमानों में सुर-समूह से सेवित होकर प्रवर अप्सराओं के मध्य में क्रीडा करता है |
छत्तेहि एयछस भुंजर पुहवी सवसपरिहोलो 1 सामरदा तहा विज्जिज्जइ चमरविहेदि ॥१८१८ ॥
छत्र प्रदान करने से मनुष्य शत्रुरहित होकर पृथ्वी को एक छत्र भोगता है । तथा कमरों के दान से चमरों के समूहों द्वारा परिवीजित किया जाता है अर्थात् उसके ऊपर चमर दोरे जाते हैं ।
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अध्याय : दसया ।
[८७७ अहिसेयफलेण एरो हिसिधिज्जइ सुदंशरणस्सुरि। . . ... खीरोय जलेण सुरिंदप्पमुह देहि भत्तोए ॥१८१६॥
जिन भगवान के अभिषेक करने के फल से मनुष्य सुदर्शन मेरु के उपर क्षीरसागर के जल से सुरेन्द्र प्रमुख देवों के द्वारा भक्ति के साथ अभिषिक्त किया जाता
विजय पडाएहि गरो संगाम मुहेतु विजइयो होइ। छक्खंड विजयरसाहो गिप्पडिवक्खो जसस्सो ॥१८२०॥
जिन मंदिर में विजयपताकाओं के देने से मनुष्य संग्राम के मध्य विजयी होता है । तथा षट् खण्डरूप भारत. वर्ष का निष्प्रतिपक्ष स्वामी और यशस्वी होता है।
कि अंपिएक बहुरणा तीसु वि लोएसु कि पि जं सोक्खं । पूजा फलेग सवं पाधिज्जइ खस्थि संवेहो ॥१८२१॥
अधिक कहने से क्या लाभ है ? तीनों ही लोकों में जो कुछ भी सुख है। वह सब पूजा के फल से प्राप्त होता है इसमें कोई संदेह नहीं है।
यहां ऐसा विशेष और जानना जो जिनेन्द्र के पूजन से समस्त च्यार प्रकार के देव तो कल्प वृक्षतितै उपजे गन्ध, पुष्प, फलादि सामग्री करि पूजन करै है अर सौधर्म इन्द्रादिक सम्यग्दृष्टि देव हैं, ते तो जिनेन्द्र की भक्ति पूजन स्तवन करके ही अपनी देव पर्याय कू सफल माने पर मनुष्यनि में चक्रवर्ती नारायण बल भद्रादिक राजेंद्र हैं हैं, ते मोतीनिके प्रक्षत रत्ननिके पुष्प फल दीपकादिक तथा अमृत पिंडादिकरि जिनेन्द्र का पूजन स्तवन नृत्य गानादिककरि महापुण्य उपार्जन कर है । पर अन्य मनुष्यनि में हूँ जिनके पुण्य के उदयतें सम्यक उपदेश के महणते जिनेन्द्र के प्राराधन में भवित उत्पन्न होय ते समस्त जातिः कुल के धारक यथायोग्य पूजन कर हैं।
__समस्त ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र अपना-अपना सामर्थ्य अपना-अपना ज्ञान कुल बुद्धि सम्पदा संगति देशकाल के योग्य अनेक स्त्री पुरुष नपुसक धनाढ्य निर्धन सरोग नीरोग जिनेन्द्र का पाराधन करें हैं । केई ग्रामनिवासी हैं। केई नगर निवासी हैं केई बन निवासी हैं। केई अति छोटे ग्राम में बसने वाले हैं। जिनमें केई तो अति उज्जवल अष्ट प्रकार सामग्री यनाय पूजन के पाठ पढिकरि पूजन करें हैं, केई कोरा सूका जब गेहूँ, मका, बाजरा, उडद, भूग, मोठ इत्यादिक धान्य की मूठी ल्याय
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८७८ ]
[ गहे. प्र. चिन्तामणि जिनेन्द को चढावै हैं कोई रोटी चढावें हैं, केई रावड़ी चढाव है, केई अपनी बाडीत पुष्प ल्याय चहावै हैं केई नाना प्रकार के हरित फल चढाचे है केई दाल भात अनेक व्यंजन चढवे हैं । केई नाना मेवा चढ़ाव हैं। कई मोतीनिके अक्षत माणिक निके दीपक सुवर्ण रूपानिक तथा पंच प्रकार रत्ननिकरि जड़े पुष्प फलादि चढावै हैं केई दुग्ध केई दही कई घृत चढाव हैं । केई नाना प्रकार के घेवर, ला, पेड़ा, बरफी, पूड़ी, पूर्वा इत्यादिक चढावे हैं । केई वदना मात्र ही करें हैं, केई स्तवन गीत नृत्य वादित्र ही करें हैं । केई अस्पयेशूद्रादिक मन्दिर के बाह्य ही रहि मन्दिर के शिखर की तथा शिखरनि में जिनेन्द्र के पतिदिन का ही दर्णन बन्दना करें हैं।
एस जैसा ज्ञान जैसी संगति जैसी सामर्थ्य जैसी धन सम्पदा जैसी शक्ति तिस प्रमाण देशकाल के योग्य जिनेन्द्र का आराधक अनेक मनुष्य हैं । ते वीतराग का दर्शन स्तवन पूजन बन्दनाकरि भावनि के अनुकूल उत्तम मध्यम जघन्य पुण्य का उपार्जन करें हैं । यो जिनेन्द्र का धर्म जाति कुल के आधीन नाहीं, वन सम्पदा के आधीन नाहीं बाह्य क्रिया के आधीन नाहीं हैं, बाह्य क्रिया के प्राधीन नाहीं है । अपने परिणामनिकी विशुद्धता के अनुकूल फल है । कोऊ धनाढय पुरुष अभिमानी होय यश का इच्छुक होय मोतीनि के अक्षत मारिणकानि के दीपक रत्नसुवर्ण के पुष्प निकरि पूजन कर हैं अनेक वादित्र नृत्यगान करि बड़ी प्रभावना करै हैं तोहू अल्प पुण्य उपार्जन करै वा अल्प हू नाहीं करै केवल कर्म का बन्ध ही करै हैं कषायनि के अनुकूल बन्ध होय है । केई अपने भावनि की विशुद्धतात अति भक्ति रूप हुआ कोऊ एक जल फलादिक करि या अन्तमात्र करि वा स्तवन मात्र करि महापुण्य उपार्जन करै हैं तथा अनेक भवनि के संचय किये पाप कर्म की निर्जरा करै हैं, धनकरि पुण्य मोल नाहीं आवे हैं। जे निर्वाछिक है मन्दकषायी, ख्याति लाभ पूजादिक कू नाहीं बांछा करता केवल परमेष्ठी का गुणों में अनुरागी हैं तिनके जिनपूजन अतिशय रूप फलकू फले हैं।
अब यहां जिन पूजन सचित्त द्रव्यनि लें. हु पर अचित्त द्रव्यान ते ह पागम में क ह्या है, जे सचित्त के दोषतें भयभीत हैं, यत्नाचारी हैं, ते तो प्रासुक जल गन्ध अक्षत कू चन्दन कुकुमादिक तें लिप्त करि सुगंध रङ्गीन में पुष्पनिका संकल्प. करि पुष्पनि त पूजे हैं तथा पागम में कहे सुवर्ण के पुष्प वा रूपा के पुष्प तथा रत्न, जडित सुवर्ग के पुष्प तथा लवंगादिक अनेक मनोहर पुष्पनि करि पूजन करें हैं अरु प्रासुक ही बहुं प्रारम्भादिक रहित प्रमाणीक नैवेद्य करि पूजन कर हैं । बहुरि रत्ननि के दीपक वा सुवर्ण ।
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अध्याय : दसवाँ ।
रूपामयदीपकनि करि पूजन करें हैं तथा सचिक्करण द्रव्यनिके केसर के रङ्गादित दीप का संकल्प करि पूजन करै हैं तथा चन्दन अगरादिक क चढ़ावे हैं तथा बादाम, जायफल, पूगीफलादिक अवधि शुद्ध प्रासुक फलनित - पूजन करें हैं एस तो.अचित्त द्रव्यनि करि पूजन करै हैं।
बहुरी जे सचित्त. द्रध्यनि तें पूजन करें हैं ते जल गन्ध अक्षतादि उज्वल द्रव्यनि करि पूजन करें हैं अर चमेली चंपक, कपक, कमल, सोन जाई इत्यादिक सचित्त पुष्पनि से पूजन कर हैं, घृत का दीपक तथा कपूरादिक दापनि करि प्रारति उलार हैं अर सचित्त आम्र, केला, दाडिमादिक फल करि पूजन कर हैं धूपार्थान में धूपदहन करै हैं एसे हैं सचित्त द्रव्वनि करि हूं पूजन करिये हैं ।
दोऊ प्रकार प्रागम की आज्ञा प्रमाण सत्तातनमार्ग है, अपने भावनिके प्राधीन पुण्य बन्ध के कारण हैं।
रत्न करंड श्रावकर. टीका. पं. सदासुखजी, श्लोक नं. ११६ प्रश्न :--सिद्ध परमेष्ठि की अवगाहना अंतिम शरीर से कुछ कम बतलाई ! है सो कितनी कम होती है ? . . .
उत्तर :--जिस शरीर से केवली भगवान मुक्त होते हैं उसका तीसरा भाग कम हो जाता है । दो भाग प्रमाण सिद्धों की अवगाहना होती है जैसे तीन धनुष के वाले मनुष्य की अवगाहन सिद्ध अवस्था में जाकर दो धनुष की अवगाहना के समान रह जाती है । सो ही सिद्धांत सार प्रदीपक में लिखा है---
गतसिस्थायमूषायां प्राकाशाकार धारिणः । प्राक्कायायाम विस्तार विभागो न प्रदेशकाः ॥१८२२॥ लोकोत्तमशरण्याश्च विश्वमंगलकारकाः । अनंतकाल मात्मानो तिष्ठन्त्यंतातियाः सदा ॥१८२३॥ इशे सिद्धा मया ध्येया बंद्या विश्वमुनीश्वरैः । . स्तुताश्च मम कर्वन्तु स्वर्गात स्वपुरसैः समम् ॥१८२४।। त्रिलोक प्रज्ञप्ति में भी लिखा है---- देहे भावा हाल चरमभवे जस्स जारि संठाएं। तत्तो तिभागहीणं नुग्गहरसा सव्वसिद्धाणं ।।१८२५॥
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८८० ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण . इस प्रकार जिनागम में लिखा गया है. ...
जो जीय केवल नख, केश रहित सिद्धों की अवगाहना मानते हैं, सो भ्रम है। इसलिये ऊपर लिखे अनुसार श्रद्धान करना योग्य है। प्रश्न :--भगवान तीर्थकर जब गर्भ में प्राते हैं, उस दिन से छह महीने
बाद ही जन्म होने के तक अर्थात् पंद्रह महीने तक कुबेर इन्द्र की प्राज्ञा से रत्नों को वर्षा करता है । सो प्रतिदिन कितनी बार
करता है और कौन-कौन समय करता है ? उत्तर :-- वह रत्नों की वर्षा भगवान के माता पिता के घर चार बार होती हैं, सवेरे, दोपहर को, सायंकाल को और आधि रात के समय । तथा एक-एक बार में साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा होती है। इस प्रकार पंद्रह महीने तक बराबर होती रहती है । सो ही लिखा है
पुत्वण्हे मन्झण्हे अवरव्हे मज्झिमायरयणीये। प्राठ्ठय कोडीओ रयणाणं घरिसेऊ ॥१८२६॥ .. इस प्रकार प्रतिदिन चारों समय में चौदह करोड़ रत्न बरसते हैं । प्रश्न -- केवली भगवान की दिव्यध्वनि नियम से तीन बार खिरतो है, ऐसा ... सुनते हैं, सो क्या ये बात ठीक है ?
उत्तर---केवली भगवान की दिव्यध्वनि प्रतिदिन चार बार खिरती है । प्रातःकाल, मध्यान्हकाल, सायंकाल और अर्द्धरात्रि इन चारों समय में छह-छह घड़ी तक दिव्यध्वनि खिरती है। इन चार समय के सिवाय पदवीधर और महापुण्यवान पुरुषों के प्रश्न पर दूसरे समय भी खिरती है ! इससे सिद्ध होता है कि चार समय तो नियम से खिरती है तथा इनके सिवाय भी यथेष्ट कारण मिलने पर खिरती है सो हो लिखा है--- . . . . . . . . .
पुष्यण्हे माझण्हे अबरण्हे मज्झमाय रयणीये । अस्छ घड़ीये रिणमाइ दिव्यधुली जिगारिदारणं ।।१८२७॥ प्रश्न-स्वयंभूरमरण समुद्र में रहने वाला सलिसिथ नाम का मत्स्य अपने
शरीर से तो कुछ हिंसा प्रादि पाप करता ही नहीं है । केवल हिंसा करने के पाप को मन से चिन्तवन करता रहता है और उसी
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अध्याय : दसवां ।
[ ८८१ मानसिक पाप से (हिसा किये बिना ही) वह सात नरक जाता है जो उसको बाह्य हिंसा करने के बिना ही पाप किस प्रकार लग
जाता है ?
उत्तर--तुम्हारा कहना तब सत्य हो सकता है जब कि पाप केवल शरीर से ही लगते हों परन्तु पाप तो मन वचन काय तीनों योगों से बराबर लगते हैं, मोक्षशास्त्र में लिखा है, "प्रमत्त योगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा' अर्थात् कषायों के उत्पन्न होने पर प्रारणों का व्यपरोपण व घात होना हिसा है । इसी वचन के अनुसार उसे सातवें नरक में जाना पड़ा। इसी सूत्र की श्रुत सागरी टीका में एक श्लोक भी लिखा है.--. . .
स्वमेवात्मनात्मानं हिनस्त्यात्मा कषायवान् । पर्व प्राण्यन्तराणां तु पश्चात्स्यावा नवा वयः ॥१५२६।।
अर्थात्-कषाय करने वाला आत्मा अपने कषाय से पहले तो अपने प्रात्मा की हिंसा करता है क्रोधादिक कषाय के द्वारा अपने प्रात्मा के गुणों का घात करता है । उस अपनी हिंसा के बाद जिसकी हिंसा बन्द करना चाहता है उसको हिंसा हो भी जाय अथवा उसके तीन पुण्य से न भी हो तथापि अपने प्रात्मा की हिंसा करने के पाप से जो कर्म बंध होता है उसके फल से नरक जाना पड़ता है। यही कारण है कि सालिसिथ नाम का मत्स्य दूससे की हिंसा किये बिना ही केवल मानसिक पाप के फल से नरक जाता है । मानसिक पाप का ऐसा ही महात्म्य है, इसलिये भव्य जीवों को चाहिये कि वे मन के संकल्पं विकल्पों से उत्पन्न होने वाले व्यर्थ के पापों से सदा बचते रहें । उसी श्रुतसागरी टीका में और भी लिखा है---
अघ्नन्नपि भवेत्पापी ननन्नपि न पापभाक् ।
परिणाम विशेषेण यथा धोवरकर्षकौ ॥१८२६।। . इससे सिद्ध होता है कि कर्मबन्ध का मुख्य कारण जीवों के परिणाम ही हैं। प्रश्न- चौदहवें कुलकर राजा नाभिराय की रानी मरुदेवी का विवाह हा
था कि नहीं? . . .. ... ....... .. .. .. . - उत्तर--राजा नाभिराय और राती मरुदेवी का विवाह इन्द्र ने किया है सो ही महापुराण के बारहवें अधिकार में लिखा है
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८५२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि तस्याः किल समुद्धाहे सुरराजेन नोदिताः । सुरोत्तमा महाभूत्या चक्र : कल्यास कौतुकम् ।।१६३०॥ इससे सिद्ध होता है कि वे घुगलिया नहीं थे, किन्तु उनका विवाह हुआ था। यहां कोई प्रश्न करे किस बुगलिया स्त्री से विवाह हुआ था ?
किसी की स्त्री से विवाह नहीं सुना था किंतु कन्या से हुआ था । इसका भी कारण यह है कि तेरहवें कुलकर के ही समय से युगलिया होना बन्द हो गया था । अर्थात् तेरहवें कुलकर के सामने ही जुदे-जुटे पुत्र-पुत्री होने लगे थे। तब उसके पिता अमितमति ने विवाह करने की रीति चलाई। इससे सिद्ध होता है कि नाभिराजा और मरुदेवी अलग-अलग जन्मे थे और उनका विवाह हुआ था । सिद्धान्तसार दीपक में लिखा है
कल्पाष्ट लक्ष कोटयैकभागे बर्ते मे तसः । प्रियगुकांतिमत्कायो जज्ञे भनुः प्रसेनजित् ।।१८३१॥ ............स्तस्यामितगतिः पिता । वर कन्यकया साद्ध विवाहो विधिना व्यधात् ॥१८३२॥ कुलवृद्धि करायत्रोत्पन्नः स युगलं विना । तदा प्रभृतिः युग्मानामुत्पन्नो नियम गतः ॥१८३३॥
इससे सिद्ध होता है कि तेरहवें कुलकर के समय में ही पुत्री पुत्र अलग-अलग होने लगे थे और इन्द्र ने उनका विवाह किया था उस समय कुलकरों के सिवाय सबका नाम आर्य था ! इसीलिये मरुदेवी के पिता का नाम नहीं लिखा है। प्रश्न--युग के प्रारम्भ में अर्थात् कर्मभूमि या चतुर्थकाल के प्रारम्भ में
अयोध्या की रचना किसने की थी ?
उत्तर-श्री ऋषभदेव के गर्भ में पाने के पहले अयोध्या नगरी की रचना इन्द्र ने की थी तथा. और अन्य जगह के रहने वाले पुरुषों को बुलाबुलाकर वहां बसाया था । सो ही महापुराण में लिखा है--
इतस्ततश्च विक्षिप्तान अनीयानीय मानवान् । पुरी निवेष यामा सुविन्यासविविधैः सुराः ।।१८३४।। .. इससे सिद्ध होता है, अयोध्यापुरी की रचना युग के प्रादि. में इन्द्र ने
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RA-मा
TORS nine
SINESS
MARATHI
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अध्याय : दसवां ।
[ २८३ प्रश्न-स्नान के कौन-कौन भेद हैं ?
उत्तर-स्नान के पांच भेद हैं, पादस्नान (पैर धोना), जानुस्नान (धुटने से नीचे का भाग धोना), कटिस्नान (कमर से नीचे का भाग धोना), ग्रीवास्नान (गले से नीचे का भाग धोना). शिरस्नान (मस्तक सक स्नान करना) इन पांच स्नानों में से जैसा दोष हो वैसा ही स्नान करना चाहिये । सो ही त्रिवचार में लिखा है--
पान जानुकटि ग्रीवाशिरः पर्यन्स संश्रयम् । स्नान पंचविधं ज्ञेयं यथा दोष शरीरिणाम् ॥१८३५।। इस प्रकार पांच प्रकार का स्तान जानना । प्रश्न- इस अवपिरणी काल में मनुष्यों की प्रायु घटती जाती है सो किस
प्रकार घटती है?
उत्तर-श्री महावीर स्वामी के मुक्त होते समय मनुष्यों की उत्कृष्ट प्रायु एक सौ बीस वर्ष थी ! इसमें से एक-एक हजार वर्ष पीछे पांच-पांच वर्ष की घटती होती है, सो ही सिद्धान्तसार में लिखा है----
वस्साराणां सहस्त्रेषु गतेषु न्यूनता प्रजेत् । पंचवर्षाणि शतंचाद्धं घेदितव्यं जिनापमे ११८३६॥
इससे सिद्ध होता है कि एक-एक हजार वर्ष में पांच-पांच वर्ष कम होते जाते हैं ! यह पंचमकाल इक्कीस हजार वर्ष का है, इसलिये छठे काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की उत्कृष्ट अायु पन्द्रह वर्ष की रहेगी । शेष एक सौ पांच वर्ष की घट जायेगी। इसका भी खुलासा यह है कि एक हजार वर्ष में पाँच वर्ष घटते हैं, इसलिये दो सौ वर्ष में एक वर्ण घटता है । सौ वर्ष में छह महीने की प्रायु घटती है । छह महीने के एक सौ अस्सी दिन हुए और १०८०० घड़ियां हुई। इनमें सौ का भाग देने से एक वर्ष में १०८ धड़ियां अथवा १ दिन ४८ घड़ियां घटीं । एक महीने में ६ घड़ियां घटीं । ६० पल की एक घड़ी होती है सौ ६ घड़ियों की ५४० पल हुए। इनमें तीस का भाग देने से एक दिन में १७ पल की घटती होती है । इस प्रकार प्रायु के घटने का खुलासा समझ लेना चाहिये ।। प्रश्न :-इस पंचमकाल में उत्पन्न हुए जीव मरकर विदेह क्षेत्र में उत्पन्न
होकर मोक्ष जा सकते हैं या नहीं अर्थात् ऐसे एक भयावतारी जीव हैं या नहीं हैं.?
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८८४
[ गो. प्रः चिन्तामणि
ARTERSTATES
उत्तर :- इक्कीस हजार वर्ष का यह पंचमकाल है । इसमें एक सौ तेईस भद्र परिणामी भव्यजीव यहां की आयु पूर्ण कर विदेह क्षेत्र में जन्म लेंगे तथा नौ वर्ष की आयु में जिन दीक्षा लेकर केवलज्ञान. उत्पन्न कर नौ वर्ष कम एक करोड़ पूर्वकाल पर्यंत विहार कर मुक्त हो जायेंगे, ऐसा सिद्धान्तसार में वर्णन किया है -
जीवा सय तेईसा पंचमकाले य भद्दपरिखामा । उत्पाई पुटव विवेहे मवमश्वर से दु केवली होदि ॥१८३७॥
इसका भी अलग-अलग खलासा इस प्रकार है पंचमकाल के इक्कीस हजार वर्ष हैं। उनके सात भाग करना सो एक-एक भाग तीन-तीन हजार वर्ष का हुआ। प्रथम के तीन हजार वर्ष के पहले भाग में यहां के ६४ जीव प्रायु पूर्ण कर विदेह क्षेत्र में उत्पन्न होकर केवली होंगे, दुसरे भाग में ३२ जीव, तीसरे भाग में बारह जीव, चौथे भाग में आठ जीव, पांचवें भाग में ४ जीद, छठवें भाग में २ जीव और सातवें भाग में एक जीव अपनी आयु पूर्ण कर विदेह क्षेत्र में उत्पन्न होकर केवली होंगे । इन सब जीवों की संख्या एक सौ तेईस होती है, अर्थात् एक सौ तेईस जीव इस पंचमकाल में उत्पन्न हुए एक भवावतारी समभाना चाहिए । प्रश्न :- स्वर्गलोक में सभ्यष्टि जीव सथा मिश्याइष्टि जीव उत्पन्न होते
हैं, सो वहां पर दोनों को आयु समान है अथवा होनाधिक है ? । उत्तर :--जिसके स्वर्ग में हो मिथ्यात्वरूपी शत्रु के नाश होने से सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति हुई है, उसको सम्यग्दृष्टि देव कहते है । उसके आयु कर्म की जितनी स्थिति है, उसमें सभ्यग्दर्शन के प्रभाव से घातायुष्क की अपेक्षा आधा सागर आयु की स्थिति बढ़ जाती है । यह वृद्धि भी सहस्त्रार स्वर्ग तक (बारहवें स्वर्ग तक) होती है । इसी प्रकार जिस जीव के सम्यग्दर्शन का घात हो जाय और मिथ्यात्व का उदय हो जाय तो उस देव की आयु कर्म की स्थिति में से प्राधे सागर की आयु घट जाती है ? यही बात सिद्धान्त सार में पन्द्रहवीं संधि में लिम्बी है.---
सम्यक्त्वस्य देवस्य सागरार्द्ध हि बर्द्धते। प्रायः यावत्सहस्त्रारं मिथ्यात्वारी विधातनात् ।।१८३॥ ... मिथ्यात्वागत देवस्य सम्यक्त्वरत्न नाशनात् । होयते सागराद्धीयुरिति स्थितिश्च नाकिनाम् ॥१८३६॥
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AM
अध्याय : दसवां
। ८८५ त्रिलोकसार में भी लिखा है--- . सम्मे घादेऊरणं सायरदलमहियमा सहस्सारा। जलहिदलम्डवराऊ पडलं पडिजारिस हारिपचयं ॥१८४०॥ प्रश्न :---यहां पर कोई प्रश्न करें कि बारहवें स्वर्ग के ऊपर के देवों के
क्यों नहीं घटती-बढ़ती ? उत्तर :-बारहवें स्वर्ग से ऊपर के स्वर्गों में जिनलिंग के सिवाय अन्य लिंग को धारण करने वाले मिथ्यादृष्टियों का गमन नहीं होता अर्थात् अन्य लिंगी मरकर बारहवें स्वर्ग से ऊपर उत्पन्न नहीं होते । बारहवें स्वर्ग से ऊपर जिन लिंग को धारण करने वाले ही उत्पन्न होते हैं । तथा बारहवें स्वर्ग से ऊपर न तो सम्यक्त्व का नाश होता है और न मिथ्यात्व की उत्पत्ति होती है। इसीलिये बारहवें स्वर्ग से ऊपर मायु के घटने-बढ़ने का नियम नहीं है। प्रश्न :--प्रायु के दो भेव हैं, निधित और निःकांचित सो इनमें से किस
मायु वाले को स्थिति घटती बढ़ती है ? उत्तर :-निधित आयु वाले की स्थिति ही घटती-बढ़ती है, जैसे--खदिरशाल नाम के भील को आयु बढ़ गई थी और राजा श्रेणिक को घट गई थी। प्रश्न :--स्वर्ग के देवों की होनाधिक आयु का स्वरूप तो ऊपर लिखे
अनुसार समझा परन्तु भवनवासी व्यंतर ज्योतिष्क देवों की प्रायु
के घटने बढ़ने की विधि किस प्रकार है ? उत्तर :--भवनवासी व्यन्तर और ज्योतिष्क इन तीनों प्रकार के देवों में जो जीव उत्पन्न होते हैं, वे सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के बिना थोड़ा सा प्रत तप करने के पुण्य से उत्पन्न होते हैं। इनमें से भवनवासी देवों के तो सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होने से आधे सागर की आयु बढ़ जाती है तथा मिथ्यात्व के उदय होने से प्राधे सागर अायु घट जाती है । इसी प्रकार ज्योतिषी और व्यंतर देवों के सम्यादर्शन के उत्पन्न होने से आधे पल्य की आयु बढ़ जाती है और मिथ्यात्व का उदय होने से आधे पल्य की प्रायु घट जाती है । तथा सब जगह सब देवों के मिथ्यात्व रूपी विष के बमन करने से तथा सम्यग्दर्शन रूपी अमृत के पीने के अतिशय से प्रायु बढ़ती है सो ही सिद्धांत सार दीपक की पंद्रहवीं संधि में लिखा है.---
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८८६ ]
। गो. प्र. चिन्तामणि ज्योतिर्भवन भौमेषु सम्यक्त्व प्राप्ति लोगिनाम् । किंचिद् व्रत तप: पुण्यादुत्पद्यते भवाध्वमाः ॥१८४१॥ सम्यक्त्व प्राप्ति धर्माणां स्वायुर्भवन वासिनाम् । सागराद्ध च बद्धत मिथ्यात्व शत्रु घातमात् ।।१८४२।। ज्योतिष्क व्यंतरागां चामः पल्याई प्रवद्धते । मिथ्यात्वारि विनाशेन सम्यक्त्वमणि लाभतः ।।१८४३॥ सर्वत्र विश्वदेवानां मिथ्यात्वदु विषोज्झनात् । सम्यक्त्वामृत पानेन स्वायुः रद्धतेतराम् ॥१८४४॥ त्रिलोकसार में भी लिखा है--- उवाहिदलं पल भवरणे वितरदुगे कमेरराहियं । सम्म मिच्छे धादे पल्लासंखं तु सम्वत्थं ॥१८४५॥
इस प्रकार चतुरिणकाय के देवों की आयु की वृद्धि हानि का स्वरूप सम्बग्दर्शन तथा मिथ्यात्व के गहात्म्य से समझ लेना चाहिये अर्थात् सम्यग्दर्शन के महात्म्य से ग्रायू बढ़ जाती है और मिथ्यात्व के प्रभाव से पट जाती है। प्रश्न :---चतुरिंणकाय देवों की आयु जब छह महीने शेष रह जाती है, तब
उनका तेज घट जाता है तथा उनके कंठ की माला मुरझा जाती है जिससे वे अपनी निकट पाने वाली मृत्यु को समझ लेते हैं,
ऐसा कहते हैं सो सम्यग्दृष्टि की माला मुर्भाती है या नहीं ? उत्तर :--माला आदि के मुझाने का चिन्ह मिथ्यादृष्टि के ही होता है। सम्यग्दृष्टि के नहीं होता । मिथ्यादृष्टि अपनी मृत्यु के चिन्हों को देखकर रोते हैं तथा अत्यन्त दुःखी होते हैं, सम्यग्दृष्टि के यह दुःख नहीं होता है, सो ही जंबुचरित्र को सोसरी संधि में लिखा है।
विद्वन्माली सुरस्यादो कथ्यते कथिताधुना । प्रत्यक्षं पश्य भार्याभिश्चतुभिः सहितं हितम् ॥१८४६॥ सम्यक्त्व सहितास्यास्य तेजस्तुच्छं न जायते । माला न झायते कंठे स्थिर चित्तस्य कहिचित् ।।१८४७।। सप्तमे दिवसेऽथासौ श्रु त्या भूत्वा च मानुषः । चरमांगी तपो धोरं ग्रहीष्यति जिनोदितम् ॥१८४॥
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अध्याय : दसवा ]
[ ८८७
प्रश्न :- जो लोग पैरों में जता पहने हए भगवान के मंदिर में प्रवेश करते
हैं अथवा लकड़ी की खड़ाऊ पहिनकर जिन मंदिर में जाते हैं,
जनको कसा पाप लगता है ? उत्तर :--जो लोग पैरों में जूता पहने भगवान के मंदिर में प्रवेश करते हैं, वे सात जन्म तक कोढ़ी होते हैं मार के २ जना लेते हैं और जो लोग खड़ाऊँ पहिन कर जिन मंदिर में जाते हैं, वे बढ़ई के घर जन्म लेकर सात जन्म तक कोढ़ रोय से पीड़ित होते हैं । सो ही लिखा है----
पादचस्य रुढा ये वदति श्री जिनालये । सप्त जन्म भवेत्कुष्ठी चौरीगर्भ सम्भवः ॥१८४६।। पादुकाभ्यां समागत्य ये वदंति जिनालये । सप्त जन्म भवेत्कुष्ठी बाढी का गर्भ सम्भवः ।।१८५०।। ऐसा जानकर ऊपर लिख कार्य कभी नहीं करने चाहिये । प्रश्न :-सातिशय अप्रमत नाम के सातवें गुणस्थान के अंतिम भाग से
महामुनिराज उपशम श्रेणी तथा क्षपक श्रेसी माउते हैं । इनमें से उपशम श्रेपो वाला यहां से लेकर ग्यारहवें गुणस्थान तक जाता है तथा फिर ग्यारहवें से नीचे गिरता है । सो इसमें प्रश्न यह है कि वे मुनिराज इस प्रकार अधिक से अधिक कितनी बार उपशम थेरणी चढ़ते हैं, कितने जन्म तक संयम धारण करते हैं और कितने समय में मोक्ष प्राप्त करते हैं अथवा उन्हें मोक्ष प्राप्त
होती है या नहीं? उत्तर :- अधिक से अधिक चार बार उपशम श्रेणी चढ़ते हैं। जो मुनिराज क्षपक श्रेणी चढ़ते हैं, दे केवलज्ञान - पर्यंत. चढ़ते ही चल जाते हैं, क्षपक श्रेणी वाले मुनि कभी निचले गुणस्थान में नहीं गिरते तथा उपशम श्रेणी बाले जीव अधिक से अधिक बत्तीस बार संयम को. पालकर पीछे नियम से मोक्ष प्राप्त करते हैं । सो ही स्वामी कातिकेयानुप्रेक्षा की टीका में लिखा है--
अत्तारिवार मुखसमसेणी समारहधि रहिदकम् । सो बत्तीसं वाराई संजममुवलहिय सिध्यागादि ॥१८५१॥
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[म. प्र. चिन्तामणि देवगति में तो संयमी
पती ही जन्म समझना चाहिये इनमें भी ही नहीं, इसलिये मनुष्य पर्याय में ही संयम समझ लेना चाहिये । प्रश्न :-- - मुनिराज के आहार के समय का प्रमाण क्या है ? उत्तर :- तीन मुहूर्त दिन बढ़ जाने के बाद से लेकर अब तक तीन मुहूर्त दिन बाकी रहे तब तक के मध्य के समय में मुनिराज अपने नित्य कार्यों से निवृत्त - होकर अंतराय और दोषों को टालकर एक बार योग्य ग्राहार लेते हैं ।
भावार्थ - प्रातःकाल तीन मुहूर्त तक प्रहार नहीं लेते। शाम को तीन आगे नहीं लेते। मध्य के समय में सामायिक के सो ही श्री बटुकेर स्वामी विरवित मूलाचार के
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मुहूर्त दिन बाकी रहने तक लेते हैं, समय को टालकर आहार लेते हैं । ree frore में लिखा है
उदयत्थम काले गालीतियवज्जियम्हि मज्झन्हि । एकहि हु अ लिए वा मुहुसकालेयभसं सु ॥। १६५२॥ उदयास्तमनयोः कालयोः नालीत्रिक वजते मध्ये मुहूर्तकाले एकभक्त तु ।।१८५३३
एकस्मिन् द्वयोः त्रिषु वा मूलाचार प्रदीप में लिखा है
विज्ञेयोशन कालोत्र संत्यज्य घटिकाश्रयम् ।
मध्ये व योगिनां भानूदयास्तमन कालयोः ॥१८५४॥
यह जो तीन मुहूर्तकाल सुबह शाम छोड़ने का बतलाया है, वह उत्कृष्टकाल है, मध्यकाल दो मुहूर्त और अन्यकाल एक मुहूर्त सुबह शाम छोड़ने का समझना चाहिये । सो ही मूलाचार प्रदीपक में लिखा है -
तस्यैवाशन कालस्य मध्ये प्रोत्कृष्टतो जिनः ।
freeter मतो योग्यो मुहूतेक प्रमाखकः ॥। १८५५ ।।
योगिनां द्विमुहूर्त प्रमाणो मध्यमोवचदः | जघन्यस्त्रिमुहूर्तप्रभो भिक्षाकाल उदाहृतः ॥१८५६ ॥
प्रश्न :------ - पुलाक आदि मुमिराज के पांच भेद हैं, उनके कौन-कौन सा गुणस्थान है ?
उत्तर :- पुलाक और बकुण इन दो मुनियों के छठा और सातवां गुणस्थान होता है | कुशील नाम के मुनि के आठवें पूर्व करण नाम के गुणस्थान से लेकर
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अध्याय : दसवां ]
[ cre
उपशांत मोह नाम के गरणस्थान तक चार गुणस्थानं होते हैं । निर्यथ नाम के मुनि के बारहवा क्षीण मोह नाम का गुणस्थान होता है तथा स्नातक के तेरहवां सयोगी केवली और चौदहवां योगी केवली गुणस्थाने होता है। इस प्रकार पुलाक बकुश कुशील निग्रंथ और स्नातक इन पांचों प्रकार के मुनियों के गुणस्थान छटे से लेकर चौदहवें तक हैं । इन सब मुनियों की संख्या ढाई द्वीप भर में अधिक से अधिक तीन कम नौ करोड़ ग्रर्थात् EEEEEE७ रहती है, उन सबको हमारा नमस्कार हो । सो ही प्राचार्य सकल कीर्ति विरचित सिद्धान्तसार में लिखा है-षष्ठ सप्तमयो यस्ते गुणस्थान द्वयोर्मुनी ।
विज्ञेया शास्त्ररीत्या च पुलाक बकुशाविह ॥१८५७॥ अपूर्वा शान्तेषु गुणस्थानेषु ये स्थिताः ।
प्रोक्तास्ते मुनिभिनित्यं कुशीलाह्वय धारिणः ॥ १८५८ ॥ श्रीमोह गुणस्थाने यस्तिष्ठेन्मुनिसत्तमः । ज्ञातोय भवभिः सर्वेनिग्रंथो हि प्रशांतधीः ॥१८५॥ योगायोग गुणस्थानो वसन्ति यतयः खलु ।
ये मताः स्नातकास्ते च लोकालोक प्रकाशकाः ॥ १८६० ।। सर्वेषां यतिनां संख्यास्त्रिऊना नवकोट्यः ।
कथिताः श्री जिनैः सर्वैस्तेषां नित्यं नमोस्तु ते ।। १८६१ ॥
प्रश्न :- एक दिन रात में तथा एक महीने में वा एक वर्ष में पुरुष के feat tereोच्छ्वास घाते-जाते हैं ?
उत्तर:- एक मुहूर्त के तीन हजार सात सौ तिहत्तर श्वासोच्छ्वास होते हैं
तथा एक दिन-रात के तीस मुहूर्त होते हैं । इस हिसाब से एक दिन-रात के एक लाख तेरह हजार एक सौ नब्बे श्वासोच्छ्वास हुए। सो ही लिखा है ---
एकं च सय सहस् उस्सासमा तु तेरससहस्साणं ।
ऊu care प्रहिया दिवसणिसोहति विष्णेया ।। १८६२ ।।
इसी हिसाब से एक महीने के तेतीस लाख पिचानवे हजार लात सौ प्रवासोच्छ्वास होते हैं । सो लिखा है
मासे far उस्सा सा लक्खा तेतीस सय सहस्सारणं ।
सत्त सवाइ जारिउ कहिया हैं पुन्न सास्साहि ।। १८६३ ॥
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HTRAIAS
८६० ]
{ गो. प्र. चिन्तामणि इनको बारह से गुणा कर देने से एक वर्ष के श्वासोच्छ्वासों की संख्या चार करोड़ सात लाख अडतालीस हजार चार सौ होती है सो ही लिखा है ।
चत्तारी कोडी प्रो लक्खा सत्सेव होति पायथा ।. अड़तालीस सहस्सा चारिसया होति बरिसेश ॥१८६४॥
इनको सौ का मुसा कर देने से सौ वर्ष के चार अरब सात करोड़ अडतालीस श्वासोच्छ्वास होते हैं सो ही लिखा है--
चत्तोरिया कोडिसया कोडिय सत लक्ख अडियाला । चत्तारीस सहस्सा सासा सत होति वरिसेग ।।१८६५॥
इस प्रकार श्वासोच्छवास का प्रमाग गोमट्टसार आदि जैन सिद्धांत में लिखा है।
प्रश्न :-गर्भज जीयों में मनुष्य को उत्पत्ति किस प्रकार होती है ?
उत्तर :--पुरुष स्त्री के संयोग होने पर स्त्री के गर्भ रहता है, सो पिता के वीर्य और माता के रूधिर के मिलने से माता के गर्भाशय में जीव आकर उत्पन्न होता है। वह अनुक्रम से बढ़ता है और फिर जन्म लेता है । इसका विशेष वर्णन इस प्रकार है-योनि के भीतर गर्भाशय में माता पिता के रजोवीर्य के इकट्टे होने पर जीव आकर उत्पन्न होता है। तदनंतर एक रात्रि में उसका कल्वल बनता है। फिर पाच रात में वह कल्वल बुद्बुदा के प्राकार में परिणत हो जाता है। फिर पंद्रह दिन में वह बुबुदा अंडे के रूप में बन जाता है, एक महीने बाद उस अंडे में मस्तक बनने का अंकर उत्पन्न हो जाता है। दो महीने बाद हृदय बनता है। तीसरे महीने में पेट बनता है, चौथे महीने में हाथ पैर बनते हैं पांचवे महीने में हाथ पैर की उंगलियां और मख निकलते हैं, छठे महीने में बाल और नेत्रों की दृष्टि प्रगट होती है, सातवें महीने में शरीर का सब याकार तैयार हो जाता है, आठवें महीने में ज्यों का स्यों बना रहकर बढ़ता है, नौवें व दशवे महीने में उस माता के गर्भाशय से वायु के द्वारा बाहर निकलता है, इसी को जन्म कहते हैं सो हो लिखा है भगवती प्रा. शिव. ।
कल्वलं कैकराण पंचराग बुदबुवाः । पक्षकेरणांडकं चैव मासेन च शिरांकुरः ॥१८६६।। - उरो मासद्वयं यावत् विभिश्चय तथोवरम् । ... शाखाश्चतुभिर्मासश्च नखांगुलिश्च पंचमे ॥१८६७॥
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अध्याय : दसवां ।
[ ८६१ रोमदृष्टी च षष्ठे च सर्वेऽवयवाः सप्तमे । नवमे दशमे वापि वायुनाऽसौ बहि भवेत् ॥१८६८॥ इस प्रकार मनुष्य की उत्पत्ति समझना चाहिये। प्रश्न :---ऊपर मनुष्यों की उत्पत्ति कही है, परंतु मनुष्यों में तीन भेद हैं
पुरुष, स्त्री और नपुंसक सो एक हो गर्भ में तीन अवस्थाएं कैसे
हो जाती है ? उत्तर :--जिस समय पिता का बीर्य अधिक होता है और माता का रज उस वीर्य से कम होता है तथा उस जीव के पुरुष बेद नाम कर्म का उदय होता है उस समय पुरुष उत्पन्न होता है । तथा जिस समय माता का रज अधिक होता हो पिता का वीर्य उस रज से कम हो और उस जीव के स्त्री वेद नाम कर्म का उदय रहता है, उस समय कन्या उत्पन्न होती है । तथा माता पिता का रजो बीर्य समान हो जीव के नपुसक नाम कर्म का उदय हो तो नपुसक उत्पन्न होता है सो ही लिखा है- ,
शुकस्याधिकतो बालः कन्धा शोपित गौरवात् । शुक्र शोरिणतयोः साम्ये पंडत्यं तस्य जायते ॥१८६९॥ पितुः शुक्काच्च मातुश्च शोषिताग भैसम्भवः । स्वकर्म परिणामेन जीवोल्पत्तिरिष्यते ॥१८७०॥ इस प्रकार पुरुष, स्त्री, नपुसक की उत्पत्ति होती है ।
यहां कोई प्रश्न करे कि एक स्त्री के दो बालक किस प्रकार होते हैं ? तो इसका उत्तर यह है कि यदि चतुर्थ स्नान की रात्रि में वह स्त्री पुरुष से दो बार संभोग करे तो उसके दो बालक उत्पन्न होते हैं । सो ही भाव प्रकाश नाम के आयुर्वेद शास्त्र में लिखा है
युग्माषु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु ।
तथा अन्य शास्त्रों में अन्य प्रकार भी इसका वर्णन किया है। वह इस प्रकार है- जो रात्रि में संभोग समय परस्पर की हवा के घात से रजो वीर्य का पिंड अलगअलग दो जगह हो जाय और उसमें दो जीव आ जाय तथा वे दोनों ही वृद्धि को प्राप्त होते रहें तो दो बालक उत्पन्न होते हैं । सो ही चिकित्सिक में लिखा है --- .
परस्परामिलाघातात् प्रभिने फलिले द्विधा । तनु प्रवृद्ध तद् युग्मे युग्मं तस्मात्प्रजायते ॥१८७१॥
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"'
८६]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
ऐer are rea
लिखा है
प्रश्न :- मनुष्य की उत्पत्ति तो समझ में श्रा मई, परंतु इस मनुष्य के शरीर में क्या-क्या पदार्थ हैं ?
उत्तर :--- मनुष्य के शरीर में से जो पदार्थ हैं, उन्हें संक्षेप से लिखते हैं । माता-पिता के संयोग होने के बाद वह रजोवीर्य का पिंड दश दिन में तो कलिल रूप होता है । उसके बाद दश दिन में कलुषी रूप श्राकार होता है । फिर दश दिन में कलुषी रूप श्राकार स्थिर होता है। यहां तक एक महीना हुआ। इसके बाद दश दिन में बुदबुदा होता है । फिर दश दिन में घनाकार होता है । फिर दश दिन बाद माँस की पेशी बनने लगती है । इस कम से दूसरे महीने में पढगल पूर्ण होता है । तदनंतर चर्म तख रोम अंग उपांग आदि अनुक्रम से ग्राठ महीने तक पहले कहे अनुसार उत्पन्न होते रहते हैं और फिर नौवें दशवें महीने में वह जन्म लेता है ।
इस शरीर में शिर, मुख, दाढी, सब शरीर के केश, बीस नख, बत्तीस दांत, मी, नाड़ी यदि सिरा नसें शुक्र ये सब पिता के गुणों से उत्पन्न होते हैं सो लिखा है
2
केशाः स्मश्रु च लोमानि नखा दंता शिरस्तथा ।
धमन्यः स्त्रावयः शुक्रमेतानि पितृजानि हि ।।१८७२ ।।
तथा मांस, रुधिर, मज्जा, मेदा, कलेजा, प्लीहा, अंतडी, नाभि, हृदय, गुदा ये सब माता के गुणों से उत्पन्न होते हैं, सो लिखा है
hier मज्ज मेदांसि यकृत्प्लीहांत्र नाभयः 1
हृदयं च गुदं चापि भवत्येतानि मातृतः ॥११८७३ ॥
ऐसा fafefree भाव प्रकाश में शारीरिक सम्बन्ध में लिखा है । आगे शरीर का विशेष स्वरूप कहते हैं, पहले कहे हुए इस प्रदारिक शरीर में ३०० हड्डियां हैं, ३०० संधियां हैं, ६०० स्नायु हैं, जो कि तंतु के आकार हैं, ७०० सिरा हैं, ५०० मांस की पेशियां हैं, ४ शिरा जाल है, १६ कडरा हैं, ६ कंडमूल हैं. ७ त्वचा हैं, ७ कलेजा हैं, अस्सी लाख करोड़ रोमों की संख्या है, आमाशय में रहने वाली आंतों की पष्ठी १६, कुषिताश्रय ७, स्थूल ३, मर्मस्थान १०७ हैं, जहां पर चोट लगने से यह जीव जीवित नहीं रह सकता है। तथा ८ व्रमुख हैं जो नित्य कुथित वस्तुत्रों से बहते रहते हैं ।
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अध्याय : दसवां ]
[८६३ इस शरीर में मस्तक तो अपनी अंजुलि प्रमाण है, मेदा नाम की धातू दंडांजलि प्रमाण है, मज्जा नाम की धातु अपनी स्वांजलि प्रमाण है, वीर्य स्वांजलि प्रमाण है, बसा धातु तीन निजांजलि मात्र है, पित्त भी तीन स्वांजलि प्रमाण है, श्लेष्मा भी तीन स्वांजलि प्रमाण है, पाठ सेर रुधिर है, सूत्र नाम का उपधातु १६ सेर है, भिष्टा चौबीस हैं, नख बीस हैं, दांत बत्तीस हैं, इनके सिवाय कृमि, कीट निगोद आदि जीवों से यह शरीर भरा हुआ है, सात धातुओं के नाम ये हैं---रस, रूधिर, मांस, मेदा, हाड, मज्जा, शुक इन धातुओं से भरा हुआ यह शरीर है। ऐसा समझकर इस शरीर से ममत्व छोड़ देना चाहिये और अपने चैतन्य स्वरूप का विचारकर इस संसार शरीर से विरक्त हो जाना चाहिये । यह सब कथन श्री शिव कोटि मुनि कृत भगवती प्राराधना में लिखा है सो वहां से विचार लेना।
यहां कोई प्रश्न करे कि मनुष्य के शरीर की उत्पत्ति जो पहले कही थी, उससे यह कथन मिला नहीं सो यह विपरीतता क्यों है ?
समाधान--विपरीतता नहीं है, किंतु सामान्य और विशेष कथन हैं । प्रश्न :-तीर्थङ्कर गृहस्थाश्रम में अपने अवधिज्ञान को विचारे या नहीं ?
उत्तर :--एक बार बीसवें तीर्थकर मुनीसुन्नतनाथ गृहस्थाश्रम में ही अपने पुत्र के साथ सभा में विराजमान थे । वहां पर पट्टहस्ती का (मुख्य हाथी का) प्रसंग
आ गया था । उस समय भगवान ने अपने अधिज्ञान के द्वारा सब सभासदों को उस पट्ट हस्ती का वृतान्त कहा था 1 सो ही श्री सोमसेन कृत लघु पापुराण में बारहवीं सन्धि में लिखा है---
पट्ट हस्ती तदा मुक्तः भुक्ति करोति दुःखदाम् । तदृष्ट्वाधिनेवर जिनः प्राह जनान् प्रति ॥१८७४।।
इससे सिद्ध होता है कि तीर्थङ्कर गृहस्थ अवस्था में अवधिज्ञान को जोड़ते हैं। अवधिज्ञान के विचारने का (जोड़ने का निषेध नहीं है। प्रश्न :---देवों की जाति में दुर्गति जाति के देव सुने जाते हैं, सो क्या देवों में
भी दुर्गति है? उसर :---जो अन्य लिंगी. सिध्या तपश्चरण कर देवगलि में मिथ्यादष्टि देव होते हैं । वे देव बड़ी-बड़ी ऋद्धियों को धारण करने वाले सम्यग्दृष्टि देवों के यहां
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(गो. प्र. चिन्तामणि काम करने वाले अभियोग्य जाति के देव होते हैं अर्थात् वे दास के समान काम करते हैं, गीत गाते हैं, नृत्य करते हैं, बाजे बजाते हैं, और वाहन का (सवारी का) रूप धारण करते हैं। इनके सिवाय कितने ही कुदेव किल्विष जाति के भी हैं। ये सब जीव दुर्गति के ही कहलाते हैं तथा आयु पूरी कर स्वर्ग से चयकर तिर्यच्च गति में पृथ्वी जल अग्नि वायुकायिक बनस्पति तथा प्रसकायिक पशु पक्षी होते हैं। सो ही रविषेरणा'नार्य विरचित पदा पुराण के चौथे पर्व में लिखा है
यथाप्यूद्ध वं तपः शक्तया ब्रजेयुः परोंलगिनः । तथापि किंकरा भूत्वा ते देवान् समुपासते ॥१८७५।। देवदुर्गति दुःखानि प्राप्य कर्मवशात्ततः। स्वर्गाश्च्युत्वा पुनस्तिर्यग्योनिमायान्ति दुःखिनः।।१८७६॥
इस प्रकार भगवान ऋमरमेड ने अपनी दिना स्थति के द्वारा बतलाया है। इससे सिद्ध होता है कि ऐसे देव स्वर्ग में भी दुःख देखकर मरने के बाद तिर्यञ्चगति में जन्म धारण करते हैं। यही कथन वट्टकेर स्वामी ने चारों गतियों का वर्णन करते समय भूलाचार में लिखा है
फंदप्पमाभिजोग्ग किन्विसं संमोहमासुरत्तं च। ता देव दुग्गईओ मरणाम्भि विराहिए होंति ।।१८७७॥ कंदर्प पाभियोग्यं किल्विषंस्थमोहत्वंप्रासुरत्वं च । साः देवदुर्गतयः मरणे विराधिते भवंति ॥१८७८।।
इस प्रकार लिखा है सो यह सब मिथ्यात्व का फल है। इसका भी विशेष वर्णन इस प्रकार है- कंदर्प, आभियोग्य, किल्विष, असुर ये देवों में उत्पन्न होते हैं । जो जीव अंत समय में समाधिमरण के बिना दुर्बुद्धि सहित मरण करते हैं, वे ही ऊपर लिखे नीच देवों में उत्पन्न होते हैं । इसका भी अलग-अलग खुलासा इस प्रकार है-- जो योगी होकर भी असत्य वचन बोलते हैं, हंसी ठट्ठा करते हैं, राग बढ़ाने वाले वचन कहते हैं, कामदेव के अशी भूत होकर कामसेवन में लीन रहते हैं और कामदेव को उत्तेजित करने वाली क्रियाएँ करते रहते हैं ऐसे खोटे योगी मरकर कंदर्य जाति के देव होते हैं । सो वहां भी वे काम-क्रिया को बढ़ाने वाले कार्य ही किया करते हैं तथा जो यंत्र, तंत्र, मंत्र आदि कार्यों को अधिकता के साथ करते हैं जो ज्योतिष वैद्यक आदि
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अध्याय : दसयां ]
। ८६५ अशुभ कार्यों को करते हैं, जो संघ वा चैत्यालय की हंसी करते हैं, अनेक प्रकार की चेष्टायें करते हैं, जो धर्मात्मानों की अविनब करते हैं. जो मायाचारी हैं और किल्दिष अर्थात् पाप कमों मे लीन रहते हैं, ऐसे पुरुष मरकर देवगति में नीच योनि में अर्थात् किल्विष जाति के देवों में उत्पन्न होते हैं । जो जीव कुमार्ग. या शास्त्र विरुद्ध मार्ग का उपदेश देते हैं, जो जिनमार्ग का नाश करने में लगे रहते है, जो सम्यग्दर्शन से सदा विपरीत चलते हैं, जो स्वयं सम्यग्दर्शन रहित हैं, महा मिथ्यात्वी हैं, जो मिथ्यात्व, मायाचारी और मोह से सदा मोहित रहते हैं तथा मोह से सदा पीडित रहते हैं ऐसे जीव मरकर भंडाभरण जाति में उत्पन्न होते हैं । जो यति होकर भी क्षुद्र, क्रोधी, दुष्ट, हिंसक, मायाचारी, दुर्जन हैं तथा जो तप और चारित्र में परम्परा से बैर बांधते चले आ रहे हैं, जिनके परिणाम सदा संक्लेशरूप रहते हैं और जो सदा निदान करते रहते हैं ऐसे जीव मरकर रौद्र परिणामों को धारण करने वाले असुर कुमार जाति के देवों में असुर होते हैं सोही मूलाचार प्रदीपक में समाधिमरण के प्रकरण में मरण के सत्रह भेदों में कहा है ।
कादर्षमाभियोग्यं च कैल्वियं किल्विषापरम् । स्वमोहत्वं तथवासुर स्वमत्वैः कुलक्षणः ॥१८७६।। सम्पमा दुद्धियो मृत्वा गच्छति देवदुर्गतीः । कंदवा इति प्रोक्ता नीचयोनि भवा दिवि ॥१८॥ असत्यं यो सुवन् हास्यसराग पचनादिकान् । कंदर्पोहोपका लोके कंदर्प रति रञ्जितः ॥१८८१॥ कदर्प संति देवा ये नाग्नाचार्याः सुरालये। कंदर्प कर्मभिस्तेषु इत्पद्यते शतशमः ॥१८८२॥ मंत्र तंत्राविकारिण यो विधत्ते बहूनि च । ज्योतिष्क मेष जादोनि परकार्याशुभानि च ॥१८८३॥ हास्य कुतूहलादीनि संघ चैत्यालयस्य च । आगमस्याविनितोय अत्यनीकः सुमिरणाम् ॥१५४॥ मायाधिकिल्विषाक्रांत: किल्वियादिकुकर्मभिः । स किल्विषसुरो नीचो भवेत्किल्विषजातिषु ॥१८८५॥ उम्मार्ग देशको योत्र जिन मार्ग विनाशकः । सन्मार्गा द्विपरीतः स दृष्टि होनः कुमार्गगः ॥१८८६॥
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[ गो. प्र.चिन्तामणि मिथ्यामायादिमोहानां मोहयन मोहपीडितः । जायते स स्वमोहेषु मंडाभरण जातिषु ।।१८८७॥ क्रोधी क्षुद्रः खलो मारी मायावी दुर्जनो यतिः । युक्तोनु बद्ध वैरेण तपश्चरित्र कर्मसु ॥१८८८।। संक्लिष्टः सनिदानो य उत्पधन्ते स कर्मणाम् ।
रौद्रासुर कुमारेषु ॥ इत्यादि लिखा है। प्रश्न :--ब्रह्मचर्य व्रत की नौ बाड़ हैं तथा अठारह हजार भेद हैं सो
__ कौन-कौन हैं ? उत्तरः --(१) स्त्री के साथ निवास नहीं करना । (२) स्त्री के रूप तथा शृगार को विकार भावों से नहीं देखना ।
(३) स्त्रियों से भाषा नहीं करना उनके मधुर वचनों को रागभावों से नहीं सुनना !
(४) पहले भोगी हुई स्त्रियों का स्मरणा नहीं करना ।
(५) काम को उद्दीपन करने वाले पदार्थ जैसे घी, दूध, मिश्री, लड्डू, मेवा, भांग, विष, उपविष, मादक (नशा उत्पन्न करने वाले) और पौष्टिक पदार्थ पारा आदि धातु, उपधातु, सोने, चांदी, मोती आदि की भस्म, रस रसायन, बलवान और वीर्य बढ़ाने वाली औषधियां तथा अन्य प्रकार के गरिष्ठ भोजन नहीं करना ।
(६) स्त्रियों के शृगार सम्बन्धी शास्त्रों को न पढ़ना, न सुनना।
(७) स्त्रियों के आसन पर नहीं बैठना तथा उनकी शय्या पर नहीं सोना ।
(८) काम कथा न कहना, न सुनना । (६) भोजन पान आदि के द्वारा पेट को पूरा नहीं भरना ।
इस प्रकार ब्रह्मचर्य की नी बाड़ हैं, सो ये सब ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये हैं । जिस प्रकार चावल गेहूं प्रादि अन्नों के खेतों में उनकी रक्षा के लिये चारों पोर कांटों की बाड़ लगा देते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये ये ऊपर
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अध्याय : दरावां ।
[ ८९७ लिखी नौ बाड हैं । जिस प्रकार बिना बाड के खेत नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार इन नौ बाडों के बिना शील का भंग हो जाता है।
___ अब प्रागे अठारह हजार शीलों के भेदों को लिखते हैं । चैतन्य रूप स्त्रियों के ३ भेद हैं, मनुष्यणी, देवांगना और तिर्यचनी । तथा अचेतन स्त्री का एक भेद है काठ, पत्थर तथा चित्रा में किसी स्त्री का रूप बनाना अचेतन स्त्री है। इस प्रकार स्त्रियों के चार भेद होते हैं । इनका त्याग मन वचन काय से तथा कृत कारित अनुमोदना से किया जाता है सो स्त्रियों के ४ भेदों को मन वचन'काय की ३ संख्या से गरणा करने से १२ भेद होते हैं और इन बारह को कृत कारित अनुमोदना की संख्या ३ से गुणा करने से ३६ भेद होते हैं । ये ३६ प्रकार के भेद पांचों इन्द्रियों से त्याग किये जाते हैं, इसलिये स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण (श्रोत्र) इन इन्द्रियों की संख्या ५ से गुणा करने से १८० भेद हो जाते हैं । इन १८० भेदों को दश प्रकार के संस्कारों से त्याग किया जाता है, इसलिये १८० को १० से गुरणा करने से १८०० भेद हो जाते हैं । उन १० संस्कारों के नाम ये हैं । स्नान, उवटन प्रादि लगाना, शृगार करना, राग बढाने वाले कार्य करना, हंसी विनोद आदि रूप से क्रीडा करना, संगीत वाद्य (गाना बजाना) विषय सेवन का संकल्प करना, दर्पण में मुख देखना, शरीर की शोभा बढाना, पहले भोगी हुई स्त्रियों का स्मरण करना और मन में चिंता की प्रवृत्ति करना ये दश संस्कार कहे जाते हैं। तथा इन १८०० भेदों का त्याग काम के दश प्रकार के वेगों से भी किया जाता है, इसलिये १८०० को १० से गुरगा कर देने से १८००० भेद हो जाते हैं । काम के १० वेग ये हैं---
१. स्त्री के मिलने की चिता होना, २. स्त्री के देखने की इच्छा होना, ३. दीर्घ श्वासोच्छ्वास लेना (लंबी सांस लेना), ४. उन्मत्त हो जाना, ५. अपने प्राणों में भी संदेह करना, ६. वीर्यपात हो जाना, ७. दुःख वा पीडित होना ८. काम ज्वर वा दाह होना, ६. अन्न में अरुचि होना, १०. मूर्छा आना ये दश काम के वेग कहलाते हैं। इनसे गुरगा कर देने से १८००० भेद हुए।
इसके सिवाय इस शील के और प्रकार से भी - १६००० भेद हो जाते हैं जिनसे शीलांग रथ बन जाता है । उन्हीं को आगे लिखते हैं।
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८६८ }
[ गो. प्र. चिन्तामणि रत्नाकर में लिखा हैजेणो करंति मरणसा णिज्जिय पाहार सणि सो इंदी, पुढवीकायारंभा खंति जुनाते मुरगी बंवे ।।१८८६॥
अर्थात् मन पंचन काय, कृत कारित अनुमोदना, चार संज्ञा, पांच इन्द्रियां, पृथ्वीकाय आदि दश प्रकार के जीवों के प्रारम्भ और उत्तम क्षमा प्रादि दश प्रकार के धर्म, इनसे परस्पर गुरखा होने से १८००० भेद हो जाते हैं, इन १८००० भेदों से बने हुए शील रूपी रथ को जलाने वाले महामुनिराज होते हैं, इसलिये ऐसे मुनिराज को हम नमस्कार करते हैं। अब प्रागे शीलांग रथ की रचना लिखते हैं
:
मन रमावश्यागताय त्यागा ।६०००।६०००। ६०००
शील के १८००० भेद जो पहले प्रकार से बतलाये हैं उनके नष्ट तथा उद्दिष्ट द्वारा प्रत्येक भेद
का यंत्र
कारित | अनुमत त्याग कृतः
| त्याग २०
२०००। २०००
त्याग
भय त्याम
मैथुन परिग्रह स्थान | त्याग
त्याम
५००
श्रोत | चक्ष । घ्राण रसना इन्द्रिय इन्दिय । इन्द्रिय इन्दिर पनिद्रिय स्था त्याग त्याग श्याग त्याग १००।१२० १०.१००
यसैज्ञी। संजी
वनस्पतिपच्चीकाय| अाकाय तेजस्कायो बायकाय काय इन्द्रिय ते इन्द्रिया चतु-पचेन्द्रिय पदिय भारम्भ | चारमा प्रारम्भ | प्रारम्म [ मारम प्रारम्भ प्रारम्भ रिदिया। आरम्भ प्रारम्भ त्याग | साग । स्याम | त्याग ! वाम । स्थाग। त्यामरंभ त्याग त्याय! त्याम
१४
१०
उत्तम
उत्तम | उत्तम 1 मार्दन | अर्जच
१०
उत्सम मोच
उत्तम उत्तम राम संवम उत्तम तप त्याग प्राबिन बहाचर्य
MarwALLA
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.. अध्याय : दसवा ]
[ ८६६
कृत
अनुमोदन
शील के १८००० भेदों में से नष्ट तथा उद्दिष्ट द्वारा
प्रत्येक भेद को निकालने का यन्त्र
मन
वचन
काय
P
भरहार
मैथुन | परिग्रह
स्पर्णन । रसना प्राण
७२
१०८
प्रसंशो। संझी प्रश्वीकाय अकाय | तेजस्काय वाचुकाय काय | वे इंद्रिय | तेइन्द्रिय कौन्द्रिय पंचेन्द्रिय पंचेन्द्रिय
० १ ३६० । ५४०७२०९०० १०८० | १२६० ! १४४० - १६२०
क्षना ] सर्दव आर्जव । पौम ० १८०० ३६०० ५४००
सत्य | संयम रुप । स्थाय किचन्य ब्रह्मचर्य। ७२००१००० १०६० | १२६०४१४४०
१६२००
इस प्रकार शीलांग रथ की रचना का यन्त्र जानना प्रागे इसी को स्पष्ट करने के लिये शील के १८००० भेद लिखते हैं। किसी स्त्री का त्याग मन वचन काय से तथा कृत कारित अनुमोदना से किया जाता है । सो इनको परस्पर गुणा करने से नौ भेद होते हैं । तथा चारों संज्ञाओं से त्याग किया जाता है, सो चार से गुरणा करने से ३६ भेद होते हैं । तथा इत ३६ का पांचों इन्द्रियों से त्याग किया जाता है सो इनको पांच से गुणा करने से १८० भेद होते हैं तथा इन १८० का त्याग पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अस्निकायिक, वायुकायिक, वनस्पति कायिक, दो इन्द्रिय, ते इन्द्रिय, चौ इन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय, संजी पंचेन्द्रिय इन दस प्रकार के जीवों के प्रारम्भ से किया जाता है, इसलिये १८०० भेद होते हैं । तथा इन सबका त्याग. उत्तम क्षमा प्रादि दश धर्मों के साथ-साथ धारण किया जाता है । इसलिये १८०० को १० से गगा करने पर १८००० मेंद हो जाते हैं ।
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१०० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
तिचिनी मनुध्वणी देवांगना अचेतन
चार प्रकार की स्त्रियां
मन
।
काथ
योगों से त्याग
| कारित अनुमोदना
कृत कारित अनुमोदना से
पईन । रसना
घ्राण वक्षु
श्रोत १४४
१०८
इन्द्रियों से
स्ना०
१०
राम० हंसी । सुभीत विषय ! दपंख ! शो० । स्मः | सिक ३६०। ५४ ७२००० १०८।१२६० ! १४४०] १६२०
मिलाप देखना । सस उन्मत्त प्राण संदेह वीर्यपात दुस दाह | अरुचि | मूळ
१८०० ३६०० ।५.५००।७२००१००० | १०००/१२६००१४४०० १६२००
इनके सिवाय और प्रकार से भी १८००० भेद होते हैं । अचेतन स्त्रियां तीन प्रकार हैं--काठ की बनी, पत्थर की बनी और रंग की बनी । इनका त्याग मन, वचन से किया जाता है तथा कृत कारित अनमोदना से किया जाता है। सो तीन को मन, वचन से गुस्सा करने से ६ तथा कृत कारित अनुमोदना से गुणा करने से १८ भेद होते हैं । इनका त्याग पांचों इन्द्रियों से किया जाता है सो ५ से गुणा करने से ६० भेद हो जाते हैं। इन १० का त्याग दोनों द्रव्यभावेन्द्रियों से किया जाता है, सो २ से गुणा करने से १८० भेद हो होते हैं। इन १८० का त्याग चारों कषायों से किया जाता है, इसलिये ४ से गुणा करने से ७२० भेद हो जाते हैं। ये अचेतन स्त्रियों के त्याग के भेद हुए । तथा चेतन स्त्रियां ३ प्रकार की हैं-मनुष्यणी, देवी, तिर्यंचनी । इनका त्याग मन, वचन, काय से तथा कृत कारित अनुमोदना से इन ७ से किया जाता है इसलिये ७ से गुणा करने से २७ भेद होते हैं । इवको पांच द्रव्येन्द्रिय और
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अध्याय : दसवां ]
[ १०१ पांच भावेन्द्रियों से त्याग किया जाता है इसलिये १० गुणा करने से २७० भेद होते हैं। इनका त्याग चार संज्ञानों से किया जाता है सो २७० को ४ से गुरणा करने से १०८० भेद होते हैं। इनका त्याग १६ कषायों से किया जाता है, इसलिये १६ से गुणा करने से १७२८० सत्रह हजार दो सौ अस्सी भेद होते हैं । ये चेतन स्त्रियों के त्याग के भेद है, इनमें प्रचेतन स्त्रियों के त्याग ७२० भेद से मिलाने से.१८००० भेद हो जाते हैं।
ये सब भेद स्वामी कातिकयानुप्रेक्षा. को टीका से लिखे हैं । तथा एक ही कथन को दो बार लिखा है । सो स्पष्टता के लिये लिखा है।
प्रश्न----यह जीव संसार में एक अन्तर्मुहूर्त में भव के उत्कृष्ट जन्म-मरण
कितने करता है ?
उत्तर--यह संसारी आत्मा कम से कम एक श्वास के अठारहवें भाग आयु पाता है तथा अपर्याप्त नाम कर्म के उदय से एकेन्द्रियादि सत्रह स्थानों में एक अन्तमुहूर्त समय में छियासठ हजार तीन सौ छत्तीस बार जन्म-मरण करता है, सा हा स्वामी कातिकेयानुप्रीक्षा में लिखा है----
उस्सासद्वारसमे भागे जो मरदि ग य समारणेदि ।
एका वि य पज्जत्ति लखीय पुरषो हवे सो दु ॥१८६०॥ .. सो ही गोम्भट्टसार में लिखा है--
तिष्णिसया छत्तीसा छावट्टी सहस्सगाणि मरणारिण । अन्तोमुत्तकाले तावदिया चेव खुद्दभवा ।।१८६१॥
इसका विशेष स्वरूप इस प्रकार है-दो इन्द्रिय के ८० भव, ते इन्द्रिय के ६०, चौ इन्द्रिय के ४०, पंचेन्द्रिय के २४ । इन पंचेन्द्रिय के २४ भवों में भी तीन भाग हैं। तहां मनुष्यों में लध्यपर्याप्त के भव ८, संनी पंचेन्द्रियं लब्ध्यपर्याप्ति के ८ भव तथा असंज्ञी पंचेन्द्रिय लध्यापयर्यास्त के ८ भव इस प्रकार अस जीवों के सब मिलाकर २०४ जन्म-मरण होते हैं । तथा पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और साधारण वनस्पति कायिक इन पांचों के स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दस भेद होते हैं । तथा प्रत्येक बनस्पति का एक स्थूल ही भेद होता है । इसके दो भेद नहीं होते । ये सब ग्यारह भेद होते हैं, इनमें प्रत्येक के छह हजार बारह जन्म-मरण होते हैं, इसलिये ग्यारह प्रकार के स्थावर जीवों के जन्म-मरण के छयासठ हजार एक सो
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६०२ ]
। गो. प्र. चिन्तामरिग वतीस जन्म-मरण होते हैं। इनमें पहले के अस जीवों के छह स्थानों के २०४ जन्म मरण मिला देने से सब मिलकर ६६३३६ भेद हो जाते हैं । ये सब संसारी जीवों के क्षुद्र भव हैं । सो ही गोम्मट्टसार में लिखा है--
सीदीसट्ठीताल वियलं चउवीस होति पंचक्खे । छावट्टि च सहस्सा सयं च वत्तीस मेयरखे ॥१८६२।। पुढवीगामरिणमारद साहारण थूल सुहमपलया। एदेसु अघुरणेया इक्केक्के वारकं छक्कं ॥१८६३॥
इस प्रकार एक श्वास के अठारहवें भाग आयु के प्रमाण से एक अन्तर्मुहर्त में सत्रह स्थानों में यह संसारी जीव मिथ्यात्व के उदय. से सर्वोत्कृष्ट क्षुद्रभव ६६३३६ धारण करता है। प्रश्न---लवरसोयधि, कालोदधि और अन्त के स्वयंभूरमण समुद्र के जल का
स्वाद तो खारे जल के समान है, परन्तु बाकी के असंख्यात समुद्रों
के जल का स्वाद कैसा है ? उत्तर-ऊपर कहे हुए तीन समुद्रों के सिवाय बाकी के असंख्यात समुद्रों के जल का स्वाद ईख के रस के समान मीठा और स्वादिष्ट है । प्रश्न- ईख के रस के समान भीठा जल तो इक्षुवर समुद्र का है, परन्तु यहाँ
पर सब समुद्रों का जल ऐसा भीठा कैसे कहा ? तथा क्षीरोदधि समुद्र का जल तथा घृतोदधि समुन्न का अल जुदे तरह का ही
बतलाया है, इसलिये सबका एक सा स्वाद कैसे कहा ?
उत्तर-क्षीरोदधि तथा धृतोदधि आदि समुद्रों के जल का स्वाद नहीं बतलाया है, किन्तु उसका वर्ण बतलाया है । स्वाद तो सबका ही ईख के समान मीठा है । सोही त्रिलोकसार में लिखा है
लवणं वारुणि तिय मिदि काल दुर्गतिलयंभुरमणमिदि । पत्तेय अलसुवादा अबसेसा होति इच्छुरसा ॥१८६४॥ यही बात मूलाचार के बारहवें अधिकार में लिखी है--- पले घरसा चत्तारि सायरा तिगिरण होति उदयरसा। अवसेसा य समुद्धा रखोदरसा होति गायम्वा ॥१८६५॥
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कर
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अध्याय : दसवां ]
[ १०३ यहां पर क्षीद्र शब्द का अर्थ इक्षु दा ईख का है । सिद्धांतसार प्रदीपक में भी लिखा है--
कालोदे पुष्कराम्भोधौ स्वयंभूरमरणार्णवे । केवलं जलसुस्थादं जलौधं च भवेत्सदा ॥१८६६॥ . क्षीराब्धौ क्षीरसुस्वादुं सनेसांभो भवेन्महत । घृतस्वादसमस्निग्धं जलं स्याघृतवारिधी ।।१८९७॥ एतेभ्यः सपूर्वाधिभ्यः परें संख्यात सागराः । भवंतीक्षुरसस्वाद समाना मधुराः शुभाः ॥१६॥ प्रश्न-भवनवासी ब्यंतर और ज्योतिष्क ये तीन प्रकार के देव भवनत्रिक
कहलाते हैं, ये तीनों प्रकार के देव अपनी शक्ति के द्वारा ऊपर की
ओर कहाँ तक गमत कर सकते हैं, तीर्थङ्कर के जन्माभिषेक के समय पांडकशिला तक तो ये देव जाते हो हैं, परन्तु इसके ऊपर जा सकसे
या नहीं ?
उत्तर- ऊपर लिखे हुए ये तीनों प्रकार के देव अपनी इच्छा से सौधर्म स्वर्ग तक गमन कर सकते हैं। सौधर्म स्वर्ग से ऊपर वे अपनी इच्छा से गमन नहीं कर सकते, यदि स्वर्गों में रहने वाले देव इनको प्राकर ले जाय तो उनके ले जाये गये जा सकते हैं । परन्तु इस प्रकार ले जाये गये भी सोलहवें अच्युत स्वर्ग तक ही जा सकते हैं, सो भी अपनी शक्ति से नहीं तथा सोलहवें स्वर्ग से पाये दूसरे देवों के द्वारा ले जाने पर भी जा सकते । यह नियम हैं, सो ही सिद्धान्तसार दीपक में चौदहवीं सन्धि में लिखा है--
कियामात्रोधिस्तेषामघोलोकेऽपि जायते । भावना व्यंतरा ज्यतिका गच्छन्ति स्वयं क्वचित ।। १८६६।। तृतीयक्षिति पर्यन्तमधोलोके स्वकार्यतः । सौधर्मशान कल्पांतमूर्यलोके निजेच्छया ॥१६००॥ तेऽपि सर्व सुरैनीता भावनाद्यास्त्रयोऽनराः । षोडश स्वर्गपर्यंतं प्रीया धांति सुखाप्तये ॥१६०१॥
देव लोम तीर्थंकरों के जन्म के समय में आते हैं सो मुनिमुक्त के जन्म समय में चार प्रकार के देव पाये थे उनमें से भवनवासी, व्यन्सर, ज्योतिष्क प्रादि सब
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.....
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....
.
....................
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--.-.
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[ गो. प्र. चिन्तामरिंगदेव पहले सौधर्म इन्द्र वाले कर मार इकट्ठे हुए थे, फिर वहां से सब मिलकर भगवान की जन्मपुरी में आये थे ऐसा सोमसेनकृत लघु पद्मपुराण के ग्यारहवें अधिकार में मिला है...
सेन्द्राश्च व्यंसराः सर्वेभवनवासिनस्तथा। ज्योतिषाः सपरिवारा नाना यानश्च संयुताः ।।१९०२॥ सौधर्मेन्द्र गहे द्वारं संप्राप्ता विभवान्विताः ।। तथा षोडश स्वर्गस्थ देयास्तत्र समागताः ॥१६०३॥
इस प्रकार वर्णन है । इससे भी सिद्ध होता है कि भवनत्रिक पहले स्वर्ग तक जा सकते हैं। ... प्रश्न:-- इस समय इस पांचवें काल में रत्नत्रय को धारण करने वाले मुनि
अपने उत्कृष्ट भावों से स्वर्गलोक में जाते हैं सो कौन से स्वर्ग तक
जा सकते हैं ? उत्तर:--पांचवें काल के भाव लिंगी और रत्नत्रय को धारण करने वाले मुनि इन्द्र पदवी पाते हैं तथा पांचवें ब्रह्मलोक स्वर्ग में लोकांतिक देवों की पदवी को पाते हैं तथा वहां से प्राकर मनुष्य होकर मोक्ष जाते हैं, इससे सिद्ध होता है कि पांचवें काल के मुनि पांचवें स्वर्ग तक जाते हैं. । सो ही मोक्षप्राभूत में लिखा है--
अज्जवि तिरयण सुद्धा अप्पा झाए विलहई इन्दत । लोयन्तिय देवत्तं तत्थ धुश्रा सिव्वुदि जति ॥१६०४॥
इससे यह भी सिद्ध होता है कि पांचवें काल में भी जीवों को ऐसी ही शक्ति होती है । प्रश्नः-- भगवान के समवशरण में जो मानस्तम्भ प्रादि होते हैं, उनकी
ऊंचाई का प्रमाण किस प्रकार है ?
उत्तरः-समवशरण के मानस्तम्भ, ध्वजास्तम्भ, चैत्यवृक्ष, सिद्धार्थवृक्ष, स्तूप, तोरण, कोट, गृह, वनवेदिका, वन, पर्वत आदि को अंचाई भगवान तीर्थंकर की "ऊंचाई से बारह गुरणी होती है।
___ भावार्थ- भगवान के शरीर की जितनी ऊंचाई होती है, उससे बारह.गुणी इन सवक्री समझ लेना चाहिये । सो ही सकलकीर्ति विरचित्त प्रादि पुराण में लिखा
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अध्याय : दसवां ]
Trade Enter घेत्य सिद्धार्थपादपाः । स्तूपाः सतोरणा: मेहाः प्राकारा वनवेदिकाः ।।१६०५ ॥ बनायो बुधैः प्रोक्ता उत्सेधेन द्विषगुखाः । fraiगोत्से धतrasi देर्व्यानुरूप विस्तरः ॥ १०६॥ पार्श्व पुराण में भी लिखा है -
मानस्तम्भाश्च प्राकाराः सिद्धार्थ चेत्य पादपाः । 'सतोरणा: गृहाः स्तम्भाः केतवो वनवेदिकाः ।। १६०७।। प्रोक्तास्तीर्थ कस्ले धात्तु मेन द्विषड्गुणाः ।
[ ६०५
इस प्रकार जानना ।
प्रश्न :- चतुर्गति निगोद दो प्रकार है-एक नित्य निगोद और एक इतर निगोद, इन दोनों निगोदों में क्या अन्तर है ?
उत्तर :- जो अनादिकाल से एकेन्द्रिय कर्म के उदय से सदा स्थावर गति में ही जन्म-सरण करते रहें तथा जो भूत भविष्यत् वर्तमान किसी भी काल में भी दो इन्द्रिय प्रादि स पर्याय धारण न करें। जिनकी स्थावर गति का न आदि है, न अन्त है, सदा अनन्त काय के आश्रित जन्म-मरण धारण करते रहें, ऐसे जीवों को नित्यनिगोदिया जीव कहते हैं । इसीलिए इस गति को नित्य गति अथवा शाश्वत गति ऐसा सार्थक नाम कहा है। तीव्र पाप कर्म के उदय से अनन्तानन्त जीव इस नित्यनिगोद में सदा रहते हैं । सो ही सिद्धान्तसार में लिखा हैसत्वं न प्रपद्यन्ते कालेन त्रितयेऽपि ये ।
ज्ञेया नित्यनिगोदास्ते भूरि पाप वंशी कृताः ॥ १०८ ॥ श्री गोमट्टसार में भी लिखा है
जत्थि अरणन्ता जीवा जेहि रंग पतो तसा परिणामो भावकलंक सपउरा सिगोदवासं न मुञ्चन्ति ॥ १०६ ॥
तथा जिससे निकलकर त्रस गति को प्राप्त करे अथवा त्रस गति पाकर फिर जिस निगोद में जाय, उसको इतर निगोद कहते हैं ।
इस प्रकार निगोद दो प्रकार के हैं । निगोद शब्द की निरुक्ति इस प्रकार है---जो अपने शरीर के श्रंग रूपी क्षेत्र में रहने के लिए अनन्तानन्त जीवों को जगह देवे, उसको निगोद कहते हैं । नि-नियतं गां. ( गो शब्द का द्वितीया का एकवचन )
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६०६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि भूमि क्षेत्र अनन्तानन्त जीवानां द-ददातीति निगोदभ् । निगोदं शरीरं येषां ते निगोद शरीराः । अर्थात-नि का अर्थ नियत है, गो शब्द का अर्थ क्षेत्र वा निवास स्थान है और द शब्द का अर्थ देना है। जो नियम से अपने शरीर में अनन्तानन्त जीवों को उत्पन्न होने के लिए क्षेत्र देवे, उसको निगोंद कहते हैं और ऐसे शरीर को निगोद शरीर कहते हैं।
प्रश्न :--जिन भगवान का गंधोदक कहां-कहां लगाना चहिये ?
उत्तर :-यह कहना ठीक नहीं है, यह कहना कपोलकल्पित और अज्ञान भरा हुआ है, क्योंकि श्री ऋषभदेव के जन्याभिषेक के गंधोदक का जल इन्द्रादिक सब देदों ने अपने मस्तक से लगाया तथा मेरु पर्वत के ऊपर उस गन्धोदक के जल का प्रवाह नदियों के समान बह निकला। इस बहते हुए जल में देवों ने स्नान किया वह जल लेकर परस्पर एक दूसरे के ऊपर डाला ।
भावार्य- उस जल में परस्पर जलक्रीड़ा की और उस गन्धोदक के जल को लेकर स्वर्ग में भेजा। ऐसा वर्णन शास्त्रों में लिखा है- देखो भगबज्जिनसोनाचार्य प्रणीत आदि पुराण के दशवें पर्व में -
कृतं गंधोदकरित्यभिषेकं सुरोत्तमाः । जगतां शांतये शांति घोषयामासुरुच्चकै ॥१६१०।। प्रचारतमांगेषु चक : साग संगतम् । स्वर्गस्योपायनं चक्र स्तगंधांबु दिवौकसः ।।१६११॥ गंधाधुस्नपनस्यति जयकोलाहलैः सममम् । व्यातुक्षीममराः चक : सचूरगंधवारिभिः ॥१९१२॥ लब्धयादि पुराण में भी यही बात लिखी है - तगंधांबु प्रवंधोच्चैकस मागेषु भक्तिकाः। निधाय सर्वगात्रेषु स्वर्गस्योपायनं व्यधुः ॥१६१३।। गंधोदकाभिषेकात विधायेति सुरेश्वराः। गंधोदकं च वन्दित्वा पूतं शुध्य जिनेशिनः ॥१४॥ व्यातुक्षी निर्मला स्रक : जयकोलाहलः समम् । . पुरितैः कलशः भक्ल्या सचूर्णध पारिभिः ॥१६१५३० .
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___ अध्याय : दसवां ]
[६०७ इसके सिवाय नमान पावताय के जन्म समय में भी इसी प्रकार का कथन है, सोही पार्श्वपुराण में लिखा है--
इत्थं गंधोदकः कृत्याभिषेक सुरनायकाः । शांति ते घोषयामासुरुच्च चाध शांतये ॥१९१६॥ चक्र : शिरसि भाले च नेत्रे सर्याम पुद्गले । स्थस्योपायनं पूतं तद्गंधांबु सुरास्त्रियः ॥१९१७॥ गंधांबुस्नपनस्याते जयनंदादि सत्स्वरैः । न्यातुक्षीम मराश्चन : सचूर्णगधवारिभिः ।।१६१८॥ इसलिये ऊपर लिखा हुआ लोगों का कहना अप्रत्य है।
तथा गर्भान्वय ग्रादि क्रियाओं में जो बालक की केशवाप (मुडन वा केश उत्तरवाना) क्रिया है, उसमें पहले देव शास्त्र गुरु की पूजा होती है, फिर बालक का मस्तक गंधोदक से भिगोयर जाता है, फिर केश उतारे जाते हैं, तदनंतर गंधोदक से ही बालक का स्नान कराया जाता है। ऐसा श्री जिनसेन स्वामी ने यादि पुराण के अडतीसवे पर्व में लिखा है----
केशवापस्तु केशानी शुभेहि व्यपरोपणम् । क्षौरेष कर्मणा देवगुरु पूजा पुरस्सरम् ||१६१६॥ गंधोदकादितान कृत्वा केशान् शेषाकृतोचितान् । . मोडयमस्य विधेयं स्यात्सचूलं धान्योचितम् ॥ स्नपनोदक धौतांगमनुलिप्सं सभूषणम् । प्रणमध्य मुनीन् पश्चाब् योजये धुलाशिषा ॥१६१२॥
इसके सिवान जब राजा श्रीपाल कोटी भट' कोढं रोग से पीडित हो गये थे और उनके साथ के सात सौ योद्धा भी कोंढ रोग से पीडित हो गये थे, तब श्रीपाल की रानी मैना सुन्दरी ने भगवान का गंधोदक लेकर उनके समस्त शरीर पर सींचा था और उसके सींचने से उन सबका कोढ रोग दूर हो गाया था । ऐसा कथन श्रीपाल चरित्र आदि शास्त्रों में लिखा है।
गंधोदक की महिमा जैन शास्त्रों में लिखी है, इसलिये इसमें संदेह नहीं करना चाहिये । तथा बिना समझे शास्त्र विरुद्ध वचन नहीं बोलना चाहिये। जो इस प्रकार कहते हैं, वह उनकी कबोल कल्पना है ।
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९०८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
प्रश्न :- कौन सी प्रतिमा प्रतिष्ठा योग्य नहीं है, अर्थात् कैसी प्रतिमा की प्रतिष्ठा नहीं करनी चाहिये । तथा कैसी प्रतिमा प्रतिष्ठा करने योग्य है ?
उत्तर :-- - व्यंगित प्रतिमा ( जिसके अंग उपांग खंडित हैं) जर्जरी भूत प्रतिमा ( बहुत प्राचीन जो खिरती हो, जीर्ण-शीर्ण हो ) जिस प्रतिमा की प्रतिष्ठा पहले हो चुकी हो, जो दुबारा बनाई गई हो अर्थात् जिसके अंग भंग हो गये हो और फिर गडकर बनवाई गई हो और जिन प्रतिमांत्रों में संदेह हो ऐसी जिन प्रतिमाएँ प्रतिष्ठा करने योग्य नहीं है तथा जिस प्रतिमा की नाक, मुख, नेत्र, हृदय, नाभिमंडल यादि अंग भंग हो गये हों वह भी पूजा करने योग्य नहीं है । सो ही प्रतिष्ठा शास्त्र में लिखा है-
व्यंमित जर्जरां चैव पूर्व मेव प्रतिष्ठिताम् । पुनर्घटित संदिग्ध प्रतिमां मो प्रतिष्ठयेत् ॥१६११॥ नासा मुखे तथा नेत्र हृदये नाभि मंडले |
स्थानेषु तेषु प्रतिमां नैव पूजयेत् ॥ ११२ ॥
यहां पर फिर से बनाई गई प्रतिमा की प्रतिष्ठा का जो निषेध किया है । उसका अभिप्राय यह है कि जिस प्रतिमा के उपांग खंडित हो गये हों और फिर सुधार कर वह दुबारा बनाई गई हो तो ऐसी प्रतिमा की प्रतिष्ठा नहीं करानी चाहिये । तथा जो प्रतिमा शिल्पशास्त्रों में कहे हुए लक्षणों से सुशोभित हो और सांगोपांग हो ऐसी प्रतिमा की प्रतिष्ठा करना योग्य है । सो ही प्रतिष्ठापाठ में लिखा है
यद्विम्बं लक्ष र्युक्तं शिल्पि शास्त्र निवेदितम् ।
सांगोपांगं यथा युक्त या पूजनीयं प्रतिष्ठितम् ।। १६१३ ।।
प्रश्न :- जो प्रतिमा पूर्व प्रतिष्ठित है, उसका यदि उपांग ( उंगली आदि) खंडित हो जाय प्रथवा मस्तक होन हो जाय तो उसकी पूजा स्तुति का विधान किस प्रकार है ?
उत्तर :- जिस प्रतिमा की उंगली का अग्रभाग अथवा कुछ कान का भाग after हो तथा वह प्रतिमा पूर्व प्रतिष्ठित हो और अतिशय सहित हो तो वह प्रतिमा पूज्य है, ऐसी प्रतिमा की पूजा स्तुति नमस्कार श्रादि करने में अपने बुरे भाव नहीं
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अध्याय : दसवां ] करने चाहिये । यदि ऐसी प्रतिमा अतिशय रहित हो तो वह पूज्य नहीं है। तथा जो प्रतिमा मस्तक हीन हो तो उसको जलाशय में क्षेपण कर देना चाहिये । मस्तक हीन हो तो प्रतिमा को चैत्यालय में नहीं रखना चाहिये इस प्रकार नरेंद्र सेन कृत प्रतिष्ठा दीपक में लिखा है । यथा--
जीर्ण चालिशयोपेतं तदध्यंगमपि पूजयेत । शिरोहीनं न पूज्यं स्याग्निक्षेप्यं तन्नदादिषु ।।१९१४॥
इस प्रकार जानना । यदि इसका विशेष स्वरूप जानना हो तो जिन संहिता प्रतिष्ठा पाठ सरस्वती कल्प पूजासार शिल्पशास्त्र आदि ग्रंथों से जान लेना चाहिये । प्रश्न :-इस पंथम काल में भरत क्षेत्र में साक्षात् केवलशानी नहीं है, फिर
भला उनको किस प्रकार मानना चाहिये और उनकी पूजा भक्ति किस प्रकार करनी चाहिये। उनकी प्रतिमा की स्थापना निक्षेप..
रूप है, साक्षात् नहीं है ? . उत्तर :--- केवली भगवान की वाणी का पठन-पाठन करने वाले प्राचार्य हैं, इसलिये प्राचार्य को मानना व उनकी पूजा भक्ति आदि करना साक्षात् केवली को मानने और उनकी पूजा भक्ति करने के समान है, क्योंकि जिसने केवली प्रणीत शास्त्रों पठन-पाठन करने वाले मान लिये तो उसने साक्षात् केवली भी मान लिये । इस पंचमकाल में श्री महावीर स्वामी के पीछे जिन सूत्रों के पठन-पाठन करने वाले और रत्नत्रय को धारण करने वाले अनेक बड़े-बड़े प्राचार्य हुए हैं, उनके वचनों की आज्ञा. मानना ही केवली भगवान को मानना है। सो ही श्री पद्मनन्दी विरचित पद्मनंदी पंच- विशतिका में लिखा है-~
संप्रत्यस्ति न केवली किल कलौत्रैलोक्यचूणामणिस्तहमः । परमासतेऽत्र भरत क्षेत्र जगद्धोतिका ॥ सद्रत्नत्रय धारिखो . यतिवरास्तासां... समालवनं । . तत्पूजा जिनवाचि पूजनमतः . सामाज्जिनः पूजितः ॥१६१४॥
इससे सिद्ध होता है कि प्राचार्यों को मानने में उनकी पूजा. भक्ति करने में और उनके वचनों की आज्ञा मानने में कोई संदेह नहीं करना चाहिये । जो पुरुष प्राचार्यों की प्राज्ञा मानने में संदेह करते हैं, वे केवली भगवान का अविनय करते हैं।
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६१० ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
-गृहस्थ लोग जो अपने जिन घर प्रतिमा रखते हैं, उसकी मर्यादा ग्यारह अथवा बारह अंगुल प्रमाण है। बारह अंगुल से ऊंची प्रतिमा जिन मंदिर में ही स्थापन करनी चाहिये, यह बात प्रसिद्ध है, परंतु ग्यारह अंगुल में भी एक दो तीन चार आदि अंगुलों की प्रतिमा के प्रमाण का क्या फल है ?
प्रश्न :
उत्तर :- - जो गृहस्थ अपने घर जिन-प्रतिमा को रक्खें तो अत्यंत योग्य और ऊँचे स्थान पर रखना चाहिये। आगे प्रतिमा की ऊँचाई का अलग-अलग फल बतलाते हैं - एक अंगुल की प्रतिमा पूजा करने वाले के लिये श्रेष्ठ है । दो अंगुल की प्रतिमा वन नाश करने वाली है। तीन अंगुल ऊँची प्रतिमा वृद्धि को उत्पन्न करती है । चार ऊँची प्रतिमा पीड़ा उत्पन्न करती है। पांच अंगुल की प्रतिमा सुख की वृद्धि करती है। छह अंगुल की प्रतिमा उद्वेग करती है। सात अंगुल की प्रतिमा गायों की वृद्धि करती है । आठ अंगुल की प्रतिमा हानि करती है। नौ अंगुले की प्रतिमा पूजा करने के लिये हो तो पुत्रों को वृद्धि करती है । दश अंगुल ऊंची प्रतिमा धन का नाश करती है । ग्यारह अंगुल को प्रतिमा गृहस्यों के समस्त काम और अर्थ की सिद्धि करने वाली होती है। इससे अधिक ऊंची प्रतिमा गृहस्थी को अपने घर नहीं रखनी चाहिये । हाँ, जिन मन्दिर में विराजमान करने में कोई हानि नहीं है । इस प्रकार एक से लेकर स्यारह अंगुल प्रमाण प्रतिमा शुभाशुभ फल वतलाया । इनमें भी जो शुभ प्रतिमाएँ हैं, यदि उनकी नाक, मुख, नेत्र, हृदय, नाभि आदि स्थान खंडित हो जायं, तो घर में रखकर नहीं पूजना चाहिये। ऐसा दीक्षाकल्प में लिखा है---
Re: संप्रवक्ष्यामि गृहबिम्बस्य लक्षणम् । एकांगुलं भवेच्छेष्ठं ध्यगुलं धनाशनम् ॥१६१५॥३ त्र्यंगुले जायते वृद्धि: पोडा स्पाक्चतुरंगुले | पंचामुले तु बृद्धिः स्याबुद्धगस्तु डंगुले ॥ ११६॥ सप्तगु गर्वावृद्धिः हानिरष्टांगुले मता । नयांले पुत्रवृद्धि धननाशो दशांगुले ॥११७॥ एकादशांगुले बिम्बं सर्वकामर्थ साधनम् । एतत्प्रमाण मारयात मतरुद्धर्व न फारयेत् ॥१६१८ ॥
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अध्याय: दसवी
[ ६११ नासामुखे तथा नेत्र हृदय नाभि मंडले । स्थानेषु व्यंगितांगेषु प्रतिमां नैव पूजयेत् ॥१६१९॥ प्रश्न :--तीसरे मिश्र नाम के गुणस्थान में मरण नहीं है और न अन्य गति
की प्रायु का बंध ही होता है । तब फिर वह तीसरे गुणस्थान वाला जीव गतिबंध के बिना अन्यगति में किस प्रकार गमन
करता है ? उत्तर :--सम्यक् मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से तीसरे मिश्र नाम के गणस्थान में रहने वाले जीव ने पहले या तो मिथ्यात्व के साथ प्रायु का बंध किया होगा या सम्यक्त्व के साथ आयु का बंध किया होगा । यदि मिथ्यात्व के साथ प्रायु का बंध किया हो तो वह मिथ्यात्व गुणस्थान में जाकर मरण करता है यदि उसने सम्यक्त्व के साथ प्रायू का बंध किया हो तो वह चौथे शास्थान में जाकर मरण करता है।
भावार्थ :-~-जो पहले सम्यक्दर्शन के साथ आयुबंध किया है, तो चौथे गुणस्थान में मरा कर शुभ गति प्राप्त करता है । यदि उसने मिथ्यात्व गुणस्थान में बंध किया हो तो वह मिथ्यात्व में ही मरण कर शुभ गति में उत्पन्न होता है, ऐसा श्री मोमट्टसार में प्ररूपणाधिकार के गुरणस्थानाधिकार में लिखा है, यथा
सो संजमण गिण्हति देसजमं दार बंधदे श्राऊ । सम्म वा मिच्छ वा पडिवज्जिय मरदि पियमेण ॥१९२०।। समस्त मित्थ परिणामेसु अहि पाउगं पुराबद्ध । तहि मरणं मरणं तसमुग्धादो विवरण सम्मि १११९२१॥ प्रश्न :-प्रमत्त नाम के छ8 गुणस्थानवर्ती मुनियों के प्राहारक शरीर
होता है । चैत्य बंदना करने, यात्रा करने का पदार्थों के निर्णय करने के लिये मस्तक से एक हाथ प्रमारग श्वेत पुरुषाकार प्रवेश निकलते हैं, केवली के दर्शन कर अथवा पात्रादि का अपना कार्य कर फिर वहीं प्राकर प्रवेश कर जाते हैं, ऐसे इस माहारक शरीर
को उत्कृष्ट जघन्य स्थिति कितनी है ? उत्तर :-ग्राहारक शरीर की जघन्य तथा उत्कृष्ठ स्थिति अन्तर्मुहर्त हैं । तथा म हारक शरीर पर्याप्ति की पूर्णता होने पर अाहारक योग काले छठे गुणस्थान
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[ गो. प्र. चिन्तामणि वर्ती साधु की आहारक काय योग के समय में यदि पादुका अंश हो जाय तो उनका मरण भी हो जाता है, सो हो गोम्मटसार में मांगाधिकार के अन्तर्गत योग मार्गणाधिकार में लिखा है.- . . . . . . . . ... ... ... .. .:.., अंटवाधादी अंतोमुत्तकालदिदीः जहंण्णिादरे । .. पज्जत्तीसंपुणे मरणंपि कदाचिः । संभवई ॥१९२२॥
प्रश्न :-ऊपर श्राहारक शरीर का काल अंसमुहूर्त बतलाया उस समय वह . . . साधु अपने औदारिक शरीर से. गमन प्रागमन प्रादि क्रिया करे
या नहीं और यदि उसके विक्रिया ऋद्धि भी हो तो उस ऋद्धि के
शरीर को विनिया रूप चेष्टा कर सकता है या नहीं ? उत्तरः-प्रमत्त संयमो मुनिराज के एक काल में एक साथ ही वैक्रियिक काययोग की क्रिया में आहारक. योग की क्रिया नहीं होती। इससे सिद्ध होता है कि आहारक योग के समय प्रौदारिक वैक्रियिक शरीर से गमनागमनादिक क्रियाओं का नियम से अभाव रहता है, एक काल में दो क्रियाएं नहीं होती। सोही गोम्मटसार में योग भार्गसाधिकार में लिखा है----
धेमुध्विय आहारय किरिया ण समं पमत्त विरदम्हि ।
जोगो वि एकक काले एक्के य होदि पियमेरा ॥१६२३।। .. प्रश्न :--प्रौदारिक बक्रियक माहारक तेजस और कार्मण को उत्कृष्ट तथा
___ 'जघन्य स्थिति कितनी कितनी है ?
उसर :--ौतारिक शरीर की जघन्य स्थिति एक श्वास के अठारवें भाग है. । इसका वर्णन पहले लिख चुके हैं । वैक्रियिक की जघन्य स्थिति देव नारकियों की अपेक्षा दश हजार वर्ष है । सोही मोक्षशास्त्र में लिखा है--
दशवर्ष सहस्त्राणि प्रथमायाम् भवनेषु च व्यतराणां । तस्वार्थ सूत्र । अध्याय ४, सूत्र संख्या ३६-३७-३८ ।
तथा आहारक की जघन्य वा उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त है जो ऊपर लिख चुके हैं। तेजस की जघन्य स्थिति, कार्मरण की जघन्य स्थिति अन्य गति के गमन की अपेक्षा एक, दो, तीन समय है । सो ही मोक्ष शास्त्र में लिखा है--
एक द्वी श्रीन वानाहारकः । अध्याय २ सूत्र संख्या ३० ।
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अध्याय : दसवां ]
[ ६१३ इस प्रकार इनकी जघन्य स्थिति बतलाई। अब आगे इन पांचों शरीरों की उत्कृष्ट स्थिति बतलाते हैं । भोग भूमियों को अपेक्षा । . ..... . .
____ औदारिकों की बंध रूप उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य है। देव नारकियों की अपेक्षा वैक्रियिक की तैतीस सांगर है। आहारक की अंतमुहूर्त है। तेजस. शरीर की छयासठ सागर है । कार्माण शरोर की उत्कृष्ट स्थिति सामान्य रीति से सत्तर कोडीकोडी सागर है तथा विशेष रीति से ज्ञातावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अंतराय की तीस कोडा कोडी सागर है, नाम, गोत्र की बीस कोडा कोडी सागर है। सो ही मोम्मटसार में लिखा है
पल्लतियं उबहीण तेत्तीसं तो मुहस उवहीणं । - छादि कम्भट्ठिदि बंधुकस्सद्दिी ताणं ॥१९२४॥ प्रश्न :-चारों हो गति वाले जोधों के वर्तमान को अपनी प्रायु में अन्य .. गति श्रायु अंध किस-किस काल में होता है, और किस-किस गति
__ की आयु का बंध होता है ?
उत्तर :-- देवगति और नरकगति के. जीवों की आयु. जब अधिक से अधिक छह महीने की रह जाती है, तब दे मनुष्य अथवा तिर्यञ्चः प्रायु का बंध करते हैं। . ... भावार्थ ::-देबों की आयु जब छह महीने की रह जाती है, तब वे मिथ्यात्व के उदय से होने वाले अपने अपने परिणामों से पृथ्वीकायिक, जलकायिक, वनस्पतिकायिक, मनुष्य और पशु इन पांच प्रकार की गतियों में से किसी भी एक गति के लिए आयु बंध कर लेते हैं। इसी प्रकार नारकी जीव मनुष्य अथवा तिर्यञ्चगति की प्राय का बंध करते हैं, सातवी पृथ्वी के नारकी जीव केवल-एक तिर्यञ्च गति का ही श्रायु बंध करते हैं । सातवें नरक के जीवः मनुष्य: गति का बंधः नहीं करते। मनुष्य तथा तिर्यञ्च गति वाले जोब जब अपनी वर्तमान आयु का तीसरा भाग रह जाता है। तब वे अपने-अपने भावों के अनुसार चारों हो पातियों में से किसी एक गति का वायु बंध कर सकते हैं । भागभूमियों के मनुष्य तिर्यग्न्च भी अपनी प्रायु के छह महीने बाकी रहने पर देवगति का ही प्रायु बंध करते हैं । एकद्रिय, दो इंद्रिय, ते इंद्रिय, चौ इंद्रिय जीय मनुष्य का तिर्थञ्च गति की आयु का बन्ध करते हैं। इनमें भी तेजस्काय और बायु काय के एकद्रिय जीव तिर्यञ्च प्रायु · का ही बन्धः करते हैं। ये दोनों ही
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६१४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
प्रकार के एकेंद्रिय जीव मनुष्यगति की आयु का बन्ध नहीं कर सकते। ऐसा श्री गोम्मट्टसार के कर्मकांडाधिकार में लिखा है
सुरगिरथा परतिरिथं छम्मासवसिद्धिगे सगाउस्स । परतिरया सम्याउ' तिभागसेसम्म उक्करसं ।।१६२५॥
मावा म्बन्धन्ति ।
इमिला सरतिरयं तेजदुगा सत्तगा तिरियं ॥१६२६ ॥
षोडशकारण, दशलक्षशिक, रत्नत्रय तथा पंचमी आदि अनेक प्रकार के व्रत जैनशास्त्रों में बतलाये हैं तथा उन व्रतों को विधिपूर्वक पूर्ण कर लेने पर प्रतिष्ठा पूर्वक उद्यापन करने की आज्ञा व्रतकथा कोष श्रादि अनेक शास्त्रों में बतलाई है । परन्तु यदि किसी पुरुष से उसके उद्यापन की विधि प्रतिष्ठा पूर्वक न बन सके लो उसके अभाव में शांतिक कार्य करना चाहिये । अर्थात् शांतिचक्र का पाठ कर अभिषेक पूर्वक उस व्रत के उद्यापन की विधि करनी चाहिये - ऐसा मार्ग है। यही बात श्रनन्तव्रत की उद्यापन विधि में अनन्तव्रत की कथा में आचार्य पद्मनन्दी ने लिखी है
श्रभावे तु प्रतिष्ठायाः शांतिकं कार्यमंजसा ।
तथा जिस पुरुष की इतनी भी शक्ति न हो अर्थात् वह न तो शांतिक कर्म कर सके और न उद्यापन की विधि ही कर सके, तो उसे अपने व्रत विधिपूर्वक दूने समय तक करना चाहिये। जैसे सोलह कारण सोलह वर्ष तक किये जाते हैं सो उसे बत्तीस वर्ष तक करना चाहिये । पीछे अपनी शक्ति के अनुसार पूजनादिक विधान कर व्रतों का विसर्जन करे । सो ही अनन्त व्रत की कथा में लिखा है
प्रभावे तु प्रतिष्ठाया: शांतिकं कार्यमंजसा ।
सस्याभावे कर्तव्यं द्विगुणं तद्विधानकम् ।।१६२७॥
यही बात श्री वसुनन्दी सिद्धांत चक्रवर्ती विरचित श्रावकाचार में कायक्लेशाधिकार में लिखी है
उज्जवर विहिरतरह काउजड़ कोवि अत्यपरिहोगी । तो far कार्यव्त्रा उववासविहारा पयते ॥१६२८ इसकी टीका में लिखा है
उद्यापन विधि न समर्थः कर्तु यदि कोपि अर्थ हीनः । तहि द्विगुणं कर्तव्यं उपवासादि विधान प्रयत्नेन ||
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अध्याय : दसवां ]
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अर्थात यदि कोई धनहीन हो और व्रतों के उद्यापन की विधि न करे उसे उपवास आदि संपूर्ण विधान प्रयत्नपूर्वक दूने करना चाहिये । ऐसा शास्त्रों में लिखा है सो देख लेना । यदि जिन प्रतिष्ठापूर्वक उद्यापन करने की शक्ति न हो तो उन व्रतों से अरुचि नहीं करनी चाहिये । अपनी शक्ति के अनुसार तप को बढ़ाने के लिये अपने अनेक प्रतों को विधिपूर्वक दूने कर लेना चाहिये । इन व्रतों का अलग-अलग फल बतकथा कोष आदि अनेक शास्त्रों में लिखा है, वहां से जान लेना चाहिये । तप के भेदों में अनेक व्रत हैं, सो कर्मों की निर्जरा के लिये हैं। इसलिये इनसे अरुचि नहीं करना चाहिये । सो ही मोक्षशास्त्र में लिखा है---
"तपसा निर्जरा च" अध्याय ६ सत्र सं. ३ अर्थात् तप से संबर भी होता है, कर्मों की निर्जरा भी होती है । प्रश्न :-ऊपर लिखे हुए व्रतों में से कोई मनुष्य कुछ प्रत ले लेवे और कुछ
दिन तक उनका पालन करे फिर अशुभ कर्म के उदय से किसी कारण को पाकर व्रत गल जाय, छूट जाय तो उसका क्या प्राय
श्चित है और दुबारा उसको पालन करने की विधि क्या है ? उसर-- जो कोई अती पुरुष विधि पूर्वक व्रत को लेवे और फिर रोग, शोक बा अन्य किसी कारण से व्रत की मर्यादा में एक दो आदि कुछ उपवास बाकी रह जाय तथा ऐसी हालत में वह ब्रत छुट जाय, भ्रष्ट हो जाय तो फिर उसी प्रती को चाहिये कि यह फिर प्रारम्भ से उस व्रत को करे अर्थात् उस व्रत के लिये जो पहले व्रत उपवास किये थे, वे सब व्रत भंग के पाप की निवृत्ति के लिये प्रायश्चित में चले गये, अब फिर उसे प्रारम्भ से ही व्रत धारण करना चाहिये । ऐसा अनुक्रम है, सो ही वसुनन्दी श्रावकाचार में लिखा है--
जद अन्तरम्मिकारणवसेस एको व दोब अवधासो । रण क उत्तो मूलामो पुरषो वि सा होइ कायवो ॥१९२६॥ इसकी टीका इस प्रकार है -- यद्यन्तर काले कारणवशेन कोऽपि वा द्वयोपवासाः । न कृताः हिमूलात् पुनरपि सा विधिभवति तत्कर्तध्या ।। अर्थात् यदि बीच में किसी कारण से एक वा दो उपवास न किये हों तो
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[ गो, प्र. चिन्तामणि प्रारम्भ से ही उसकी विधि करनी चाहिये। यदि वह ऐसा न करे तो उसे महापापी समझना चाहिये।
प्रश्न :--प्रत भंग करने से महापाप लिखा है, सो वह कौनसा महापाप . .. लगता है ? ... उत्तर:-जो कोई जीव अपने गुरु से यम वा नियम रूप कोई व्रत ले लेवे और फिर चरित्रमोहनीय कर्म के उदय से उस व्रत को भंग कर देवे वह पुरुषं एक हजार जिन मन्दिरों के भङ्ग करने के समान पाप का भागी होता है । इसके समान और कोई पाप नहीं है । इसीलिये उसको महापापी कहते हैं । सो ही श्री श्रुतसागर प्रशीत व्रतकथाकोष में सप्त परमस्थान व्रत की कथा कहते समय लिखा है -
गुरुन् प्रतिभुवः कृत्वा भवत्येकं धृत वतम् । . सहस्त्रकूट जैनेन्द्र सबभताछ भागलम् ॥१६३०॥
इसलिये व्रत भङ्ग करने का प्रायश्चित अवश्य कर लेना चाहिये । प्रश्न :- पूजा करने वाला पूजन के लिये वस्त्र किस प्रकार धारण करता
उत्तर-जो भव्य पुरुष शांतिक और पौष्टिक के लिये भगवान की पूजा करता है, उसे सफेद वस्त्र पहिनकर पूजा करनी चाहिये यदि वह शत्रु पर विजय के लिये भगवान की पूजा करता है तो उसे श्याम बा काले वस्त्र पहिनकर घूजा करनी चाहिये । यदि वह कल्याण के लिये पूजा करता है तो लाल वस्त्र पहिनना चाहिये यदि वह किसी राजा आदि के भय को दूर करने के लिये पूजा करता है तो उसे हरे वस्त्र पहिनकर पूजा करनी चाहिये । यदि यह ध्यान आदि प्राप्ति के लिये पूजा करता है तो उसे पीले वस्त्र पहिनना चाहिये । और यदि वह किसी कार्य की सिद्धि के लिये पूजा करता है तो उसे पांचों रंग के वस्त्र पहिनने चाहिये । सो ही लिखा है -
शांतौ श्वेतं जये श्यामं रक्तं भये हरित् । धोतं ध्यानादिसलामे पंचवर्ण तु सिद्धये ॥१८३१॥
इस प्रकार अलग-अलग कामना की सिद्धि के लिये अलग-अलग पांचों वर्णो के वस्त्र बतलाये हैं। यदि इन पांचों वणों के वस्त्रों में भी कोई अयोग्यता के दोष श्रा जायं तो वह वस्त्र छोड़ देना चाहिये और दूसरा नवीन वस्त्र धारण करना चाहिये ।
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प्रश्न : - त्रिकाल पूजा की विधि क्या है ?
उत्तर -- चतुर भव्य जीवों को नियमपूर्वक तीनों समय भगवान की पूजा करनी चाहिये । उसकी विधि इस प्रकार है कि सबसे पहिले लिखी हुई विभि के अनुसार स्नानादिक कर भगवान की पूजा करनी चाहिये । उसको विधि इस प्रकार है- - प्रथम प्रातःकाल भगवान का जलाभिषेक करना चाहिये, फिर चन्दन केशर में कपूर मिलाकर भगवान के चरण कमलों की अर्चना करनी चाहिये यह प्रातःकाल की पूजा है । फिर दोपहर के समय नेक प्रकार के सुगन्धित और मनोग्य पुष्पों से भगवान की पूजा करनी चाहिये यह मध्यान्ह पूजा कहलाती है । तदन्तर शाम के समय दीप और धूप से पूजा करनी चाहिये ।
अध्याय : दसवां ]
भावार्थ - - प्रातःकाल तो चन्दन से पूजा करनी चाहिये । मध्यान्ह समय में पुष्पों से पूजा करना चाहिये और सायंकाल को दीपक से आरती उतारकर दीन से पूजा करनी चाहिये और सुगन्धित चन्दन अति शुभ द्रव्यों की बनी हुई धूप को अग्नि में दहनकर धूप से पूजा करनी चाहिये। यह त्रिकाल पूजा की रीति है । सो ही श्री उमास्वामी विरचित श्रावकाचार में लिखा है-
श्री चन्दनं विना नेव पूजां कुर्यात्कदाचन ।
प्रभाते घनसारस्य पूजा कार्या विचक्षणः ॥१६३२॥ मध्याह्न कुसुमं : पूजा संध्यायां दीप धूप थुक् । इस प्रकार त्रिकाल की जाती है वह वह विशेष का कुछ नियम नहीं है । सकती है ।
पूजा की रीति लिखी हैं। प्रथा प्रष्ट द्रव्य से जो पूजा पूजा है । इस अष्ट द्रव्य की पूजा को त्रिकाल में करने यह पूजा तो जिस समय की जाय उसी समय में हो
प्रश्न :-- सायंकाल को जो दीप धूप की पूजा की जाती है उसकी विधि क्या है ?"
:
उत्तर:- पूजन करने वाले पुरुष को पूजा करते समय भगवान के बाई श्रीर
धूपदान रखकर उसमें रखी हुई अग्नि में मंत्र पूर्वक धूप चढ़ाकर भगवान की पूजा
करनी चाहिये । तथा दीपक जलाकर भगवान के सामने मंत्र पूर्वक भारती उतारकर पीछे भगवान को दाहिनी ओर उस दीपक को रख देना चाहिए। यह पूजा का नियमसब जगह है, सो हो उमा स्वामी विरचित श्रावकाचर में लिखा है-
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६१८ j
[ मो. प्र. चिन्तामणि
वामांगे भुपदाहस्य दीप पूजा च सन्मुखी । अहंतो दक्षिणे भागे दोपस्य च निवेशनम् ।।१९३३॥ पूजा की ऐसी आम्नाय है, सो इसी प्रकार करना चाहिये । प्रश्न :- भगवान की पूजा में कैसे पुष्प चढ़ाना चाहिये तथा कैसे नहीं
चढ़ाना उत्तर :-भगवान की पूजा में जल थल प्रादि के सार सुगंधित और मनोज्ञ ऐसे कमल गुलाब आदि अनेक प्रकार के जैन शास्त्रों में कहे हुए पुष्प चढ़ाना चाहिये तथा जो पुष्प हाथ से गिर गए हों, जमीन पर पड़ गए हों, जो किसी के पैर से छू गये हों, किसी के मस्तक पर रखे हों, मलिन और अपवित्र वस्त्र में रखे गये हों, नाभि के नीचे प्रदेश से छू गया हो, जो यवन (मुसलमान) आदि दुष्ट जनों के द्वारा स्पर्श किये - गये हों और जो कीडों से दूषित हों ऐसे पुष्प कभी नहीं चढ़ाना चाहिये, इसके सिवाय पुष्पों के दो तीन भाग कभी नहीं चढ़ाना चाहिये।
भावार्थ-मोतिया, मोगरा, कुद आदि के पुष्पों में दो तीन चार पुष्प निकलते हैं, सो उनको अलग-अलग नहीं करना चाहिये । जैसा का वैसा ही चढ़ाना चाहिये पूजा के लिये फूलों की कलियां कभी नहीं निकालनी चाहिये अर्थात् पूजा में कलियां नहीं चाहिये । पूरा पुष्प ही बढ़ाना चाहिये । जो लोग चंपा और कमल के फूलों की कलियां अलग-अलग कर निकाल लेते हैं, अर्थात् उनको प्रफुल्लित कर लेते हैं, अथवा उनकी पंखुड़िया अलग-अलग निकाल लेते हैं, उनको जीव हिंसा के समान फल लगा करता है । इसलिये पुष्पों को अलग-अलग छिन्न भिन्न कर वा कलियां निकालकर नहीं चढ़ाना चाहिये । सो ही उमास्वामी विरचित श्रावकाचार में लिखा है--
हस्लात्प्रस्खलित क्षितौ निपतितं. लग्नक्कचित्पादयोः । पन्मूख ढेल वंगतं घृतं कुयसने नाभेरथो यद् धृतम् ।।१९३४॥ स्पृष्टं दुष्ट जनधनरभिहितं यदूषितं कीटकैः । त्याज्यं तत्कसुमं पदंति विबुधाः भवत्या जिनः पूज्यते ॥१९३५॥ नैव पुष्पं द्विधा कुर्यान्न छिन्नकलिकामपि । वंषकोत्पल भेदेन जीव हिंसा समं फलम् ।
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अध्याय : दसवां ]
[ ६१६ ऐसा शास्त्रों का मत है। इसी प्रकार जल फल आदि आठों द्रव्य में से जो अयोग्य हो सो पूजा में नहीं लेना चाहिये । विवेकी पुरुषों को योग्य द्रध्य से ही पूजा करनी चाहिये।
प्रश्न :--अपर लिखे हुए पुष्प किस प्रकार चढ़ाना चाहिये ? उत्तर :-लौकिक शास्त्रों में ऐसा लिखा है-- पुष्पं चोद नवं देश प्रदेश को गुलम् ! .. · फलं च सन्मुखं देयं यथोत्पलं समर्पयेत् ।।१६३६।।
अर्थात् – पूजा में पुष्प तो ऊपर की ओर मुख कर चढ़ाना चाहिये । उसकी डोंडी नीचे की ओर रहनी चाहिये, नागवेल के पान आदि पत्रो को अधोमुखी चढ़ाना चाहिये । उसको प्रनी नीचे रहे और डंठल ऊपर-ऊपर को हो । तथा फल सामने चढ़ाना चाहिये। पुष्प पत्र और फल जैसे वृक्ष पर लगते. हैं उसी प्रकार उनको चढ़ाना चाहिये । यह नियम पुष्पमाला अथवा पुष्पांजलि के लिये नहीं है । पुष्पमाला और पुष्पांजलि में जिस प्रकार बन सके उसी प्रकार चढ़ाना चाहिये । प्रश्न :-पहले जो अष्टांग और पश्वशायि नमस्कार करना लिखा है, तो
इनका स्वरूप क्या है ? उत्तर :--अपने दोनों हाथ दो पैर एक मस्तक एक छाती और दोनों कपोल इस प्रकार पाठों अंगों को भूमि से स्पर्शते हुए नमस्कार करना सो अष्टांग नमस्कार
भावार्थ-पहले पृथ्वी पर दंड समान नीचे की ओर मुह कर सीधा सो जाना, जिससे दोनों पैर मस्तक छाती दोनों हाथ भूमि से लग जाय फिर क्रम में दांये बांये कपोलों को लगाना भूमि से स्पर्श करना । इस प्रकार नमस्कार करने को अष्टांग नमस्कार कहते हैं । सरे ही लिखा है ----
हस्तौ पादौ शिरश्चोरः कपोलयुगलं तथा । अष्टांगानि नमस्कारे प्रोक्तानि श्री जिनागसे ॥१६३७॥
दोनों हाथ दोनों पैर और मस्तक इन पांचों अंगों को भूमि में स्पर्शते हुए नमस्कार करना पंचांग नमस्कार है । सो ही लिखा है
मस्तकं जानुयुग्मं च पंचोपानि करौ नतो।
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६२० ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिणः पश्चद्धशायि नमस्कार का स्वरूप. इस प्रकार है। पशु गाय को कहते हैं । गाय के समान प्राधा सोना जिससे पीछे के आधे अंग तो खडे रहें और आगे का प्राधा अंग अति दोनों पैर और मस्तक पृथ्वी पर नम जाय । पैरों के दोनों घुटनों से नमकर गर्दन से मस्तक को नीचा करना पश्व शायि नमस्कार है.। . . . .
भावार्थ-खड़े पैरों से बैठकर दोनों हाथों को कोनी से नवाकर तथा पृथ्वी पर रखकर अपना मस्तक झुकाना सो पश्वद्धशायि नमस्कार है। सो ही लिखा है
अत्र प्रोक्तानि पश्वर्द्ध शयनं. पशुवन्मतम् । .....
इस प्रकार नमस्कार के तीन भेद हैं, सो जैसा अपने से बन सके, वैसा भावपूर्वक देव शास्त्र गुरु को नमस्कार करना चाहिये।
इनमें से स्त्रियों के लिये अष्टांग और पंचांग का अधिकार नहीं है। उनको केवल पश्वर्द्धशायि नमस्कार करने का अधिकार है। पुरुषों को तीनों प्रकार के नमस्कार करने का अधिकार है । यह बात मूलाचार में प्रायिकाओं को वंदना करते समय समयाख्याधिकार में लिखी है
पंच छह सत्त हत्थे सूरो अज्झावगोय साधूय । ... परि हरि ऊरपज्जागो गवासरगरणेव वंदति ॥१९३८॥
इसका अर्थ एक सौ ग्यारहवीं चर्चा में लिखा है । जब प्राजिका भी गवासन से ही प्राचार्यादिक को बंदना करती हैं, तो फिर अन्य स्त्रियां अष्टांग वा पंचांग नमस्कार किस प्रकार कर सकती हैं ? उनके लिये अष्टांम वा पंचांग नमस्कार करना अयोग्य है। इसलिये नहीं करना चाहिये ।
प्रश्न :---पूजा करते समय किसी के हाथ से जिन प्रतिमा पृथ्वी पर गिर
___ जावें तो उसका प्रायश्चित क्या है ?
उत्तर :- जो पूजा करते समय जिन मूति पृथ्वी पर गिर पड़े तो पूजा करने वाले को उस मूर्ति का शुद्ध जल तथा गंधोदक पर्यंत भरे हुए एक सौ प्रांठ कलशों से मंत्र पूर्वक भगवान का अभिषेक करना चाहिये ! फिर पूजा कर एक सौ पाठ मूल मंत्रों से पाहूति देकर फिर वहीं विराजमान कर देना चाहिये । ऐसा इसका प्रायश्चित है । सो ही जिनसंहिता में आठवें अधिकार में लिखा है
पतिते जिनबिम्बेऽष्ट्रशतेन स्नापयेद् घटः । अष्टोत्तर शतं कुर्यान्मूल मन्त्रण चाहतीः ।।१६३६॥
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अध्याय: दसवां ]
{ ε२१
इस प्रकार मूर्ति के गिर पड़ने पर बहुत से लोग बिना समझे केवल अपने मन से ही किसी सचित्त वस्तु के खाने का त्याग कर देते हैं वा उपवास एकासन आदि कर लेते हैं, वा करा देते है, सो शास्त्र की विधि से विपरीत है ।
प्रश्न :- पूजा करते समय मंत्र पूर्वक नैवेद्य आदि चढ़ाने में किसी के हाथ से वह नैवेद्यादि पृथ्वी प्रादि अन्य क्षेत्र में गिर जाय पूजा के स्थान में न चढ़ाया जा सके बीच में ही गिर जाय तो क्या कहना चाहिये ?
उत्तर :- पूजा करते समय मंत्र पढ़कर द्रव्य चढ़ाना चाहिये । यदि वह द्रव्य ate में ही गिर जाय तो उसे छोड़ देना चाहिये। फिर जो द्रव्य गिरा हैं, उसी द्रव्य को लेकर और उसी मंत्र को पढ़कर एक सौ आठ बार आहुति देनी चाहिये अर्थात् अक्षत गिरा हो तो अक्षत का मंत्र पढ़कर अक्षत की एक सौ आठ ग्राहुति देनी चाहिये । यदि पुष्प गिरा हो तो पुष्प की एक सौ आठ श्राहुति देनी चाहिये ।
इस प्रकार जलादिक आठों द्रव्यों में से जो द्रव्य गिरा हो, उसी का मंत्र पढ़कर एक सौ आठ प्राहुति देनी चाहिये। फिर बाकी की पूजा पूर्ण करनी चाहिये । यही इसका प्रायश्चित है । सो ही संहिता के बारहवें अधिकार में लिखा हैप्रपति बलिपिडस्य जिन मन्त्र मन्त्रवित्
अष्टोत्तर शतं कुर्यादाहूतीस्तद्विधिक्रमात् ॥१४०॥
प्रश्न : --- यदि कोई हीन जाति का प्रस्पृश्य मनुष्य निबंध का स्पर्श कर लेवे तो उस मूर्ति का क्या करना चाहिये ?
उत्तर :- जो जिनबिंब गिर जाने का प्रायश्चित है, वही प्रायश्चित अस्पृश्य - मनुष्य के द्वारा जिनबिंब के स्पर्श कर लेने पर करना चाहिये । प्रर्थात् उस मूर्ति का
एक सौ आठ कलशों से अभिषेक कर पूजा कर मूल मंत्र से एक सौ आठ आहुति देनी चाहिये फिर उसको वहीं विराजमान कर देना चाहिये । सो ही पूजासार में लिखा हैअस्पृश्य जनसस्पर्शेप्येवमेव जिनेशिनाम् ।
प्रश्न : --- यदि किसी के हाथ से प्रतिमा का भंग हो जाय तो क्या करना
चाहिये ?
उत्तर:- यदि किसी के हाथ से जिन प्रतिमा भंग हो जाय तो उसी तीर्थंकर की अन्य प्रतिमा का एक हजार आठ शुद्धजल के कलशों से तथा पंचामृत से मंत्र
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६२२ ]
[ मो. प्र. चिन्तामणि पूर्वक महाभिषेक करना चाहिये। फिर एक सौ आठ बार मूल मंत्र से प्राइति क्षेनी चाहिये । तथा उस भग्न हुये प्रतिबिंब को किसी अगाध जल में विराजमान कर देना चाहिये ऐसा करने से वह दोष दूर होता है और शांति होती है। सो हि जिनसंहिता में लिखा है... स्तापयेदंग भंगेष्ट सहस्त्र रस जिनेश्वरम् ।
होमं वा पातंवरकुर्याद् भग्नं चांगं सुसेवयेत् ।।१६४१।। ततो जलधि वासादि प्रतिष्ठापन माचरेत् ।। प्रश्न :---जैन मत में गृहस्थों के सूतक पातक के विचार को विधि क्या है ?
उत्तर :--सुतक दो प्रकार का है जो गृहस्थ के घर पुत्र पुत्री आदि का जन्म हो तो दश दिन का सूतक है यदि मरण हो तो बारह दिन का सूतक है । जिस घर में वा जिस क्षेत्र में प्रसुति हो उसका सूतक एक महिने का है । यह सूतक जिसके घर जन्म हो उसको लगता है । जो उसके गोत्र वाले हैं, उनको पांच दिन का सूतक लगता
यदि प्रसूति में ही बालक का मरणा हो जाय तो अथवा देशांतर में किसी का मरण हो जाय या किसी संग्राम में मरग हो जाय अथवा समाधिमरण से प्राग छोड़े हो तो इन सबका सूतक एक दिन का है।
_ .धोड़ी, गाय, भैस, दासी प्रादि की प्रसूति यदि अपने घर में वा आंगन में हो तो उसका सूतक एक दिन का लगता है, यदि गाय, भैस आदि की प्रसूति घर में न हो घर के बाहर किसी क्षेत्र में वा बगीचे में हो तो उसका सूतक नहीं लगता।
. जिस गृहस्थ के यहां पुत्रादिक का जन्म हुअा है, उसको बारह दिन पीछे भग- .... वान अरहंतदेव का अभिषेक, जिनपूजा और पात्रदान देना चाहिये, तब उसकी शुद्धि होती है अन्यथा शुद्धि नहीं होती।
यदि दासी दास वा कन्या की प्रसूति वा मरणा अपने घर हो तो उस गृहस्थ को तीन दिन का सूतक लगता है । वह प्रसूति या मरण अपने घर हुआ है, इसलिये दोष लगता है। . यदि किसी गृहस्थ के स्त्री के गर्भ का स्त्राव हो जाय वा पात (गर्भ पात) '.:: : हो जाय तो जितने महीने का वह गर्भ हो उतने ही दिन का सूतक लगता है, इस
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अध्याय : दसवां ]
[ ६२३ प्रकार समुदाय रूप से सूतक का वर्णन है, उसमें भी थोडा सा विशेष यह है कि क्षत्रियों को पांच दिन का सूतक है, ब्राह्मणों को दश दिन का है, वैश्य को बारह दिन का सूतक है और शूद्र को पन्द्रह दिन का सूतक है । सो ही प्रायश्चित ग्रन्थ में लिखा है--
परस दश वारण रिणयमा पारस होइ तहय दिवसे हि। स्वत्तिय वंभा विस्सा सुदा हि कमेण सुद्धति ॥१९४२।। इस अनुक्रम से सूतक जानना चाहिये। ..
___ लौकिक में जो सती होती है, उसके बाद घर के स्वामी को उसकी हत्या का पाप छह महीन तक रहता है। छह महीने बाद प्रायश्चित लेकर शुद्ध होता है। जिसके घर में कोई सती हो गई हो, उसको छह महिने पहले प्रायश्चित्त देकर शुद्ध नहीं करना चाहिये ।
यदि कोई अपघात से नर जाय तो उसके बाद घर के स्वामी को था योग्य प्रायश्चित देना चाहिये।
भैंस का दूध प्रसूति के दिन से पन्द्रह दिन पीछे शुद्ध होता है । गाय का दूध प्रसूति के दिन से दश दिन बाद शुद्ध होता है । बकरी का दूध प्रसूति के दिन से आठ दिन बाद शुद्ध होता है, इन सबका दूध ऊपर लिखे दिनों से पहले शुद्ध नहीं होता ।
इस प्रकार गृहस्थों को संक्षेप से सूतक का विचार समझ लेना चाहिये । सो मलाचार की टीका में लिखा है---
सूतक वृद्धि हानिभ्यां दिनानि दश द्वादश । प्रसूतिकास्थानं मासकं दिदानि पंच मोत्रिणाम् ॥१६४३॥ प्रसूतौ च मते बाले देशांतले मृते रणे । सन्यासे मरणे चैव दिनक सूप्तकं भवेत् ॥१६४४॥ अश्वी च महिषी चेटी प्रसूता गौ हांगरणे। सूतकं दिनमेकं स्यात् गृहबाह्य न सूतकम् ॥१४॥ पुत्रादि सूलके जाते गते द्वादश के दिने । जिनभिषेक पूजाभ्यां पात्रदानेन शुद्धयति ॥१९४६॥ दासो दासस्तथा कन्या आयते मरणे यदि । विरात्रि सुतकं ज्ञेयं गृहमध्ये तु भूषणम् ॥१६४७।।
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१२४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि यदि गर्भ-विपतिः स्यात् स्त्रावणं सापि योषितः । याघन्मासं स्थितो गर्भस्तावद्दिनानि सूतकम् ॥१९४८॥ पंचाहान् सूतक क्षत्रे दशाहान् ब्राह्मणे विदुः । द्वादशाहान् च वैश्ये हि शूद्र पक्षक सूसकम् ॥१९४६।। सतीनां सूतक हत्यापापं षण्मासकं भवेत् । अन्येषामपहल्यानां ययापापं प्रणाशयेत् ॥१९५०॥ . महिण्याः पक्षक क्षीरं मोक्षीरं च दिनं दश। .. अष्टमे दिवसेजायाः क्षीरं शुद्धं न चान्यथा ॥१६५१॥ इस प्रकार सूतक का सामान्य वर्णन समझना चाहिए । प्रश्न :-गोत्री को सूतक किस प्रकार पालना चाहिए ?
उत्तर :-यदि मोत्री चौथी पीढ़ी तक का हो तो उसको दस रात तक सूतक लगता है, पांचवीं पीढ़ी वाले को छह रात का सूतक लगता है। छठी पीढ़ी वाले को चार दिन का सूतक लगता है, चार दिन बाद वह शुद्ध होता है । सातवीं पीढ़ी वाला तीन दिन बाद शुद्ध होता है । आठवीं पीढ़ी काले को एक दिन रात का सूतक है, पीछे वह शुद्ध है। नौवीं पीढ़ी वाले को दोपहर का सूतक है तथा दसवीं पीढ़ी वाले को स्नान करने मात्र का सूतक है। इसके बाद शुद्ध है। इस प्रकार गोत्र का सूतक समझना चाहिए । सो ही मूलाचार की टीका में लिखा है
चतुर्थे वशरात्रिः स्यात् षट्रात्रिः पुन्सि पञ्चमे। षष्ठे चतुरहः शुद्धिः सप्तमे दिनत्रयम् ॥१६५२।। अष्टमे पुम्स्य हो रात्रिः नवमे प्रहर द्वयम् । धशमे स्नानमात्रं स्यालेसद् गोत्रस्य सूतकम् ॥१६५३॥
इस प्रकार गोत्री के सूतक का विचार है। दूसरी तीसरी पीढ़ी का सूतक पहली पीढ़ी के समान है। बाद में सूतक के दिन घटते जाते हैं। ऐसा समझ लेना चाहिए। प्रश्न :--मुनि को अपने गुरु आदि के मरने का सूतक किस प्रकार है ?
तथा राजा के घर मृत्यु आदि का सूतक किस प्रकार है ? उत्तर : ---मुनि तो एक कायोत्सर्ग कर लेने पर क्षण भर में ही शुद्ध हो जाते हैं । तथा राजा के पांच दिन का सूतक लगता है । सो ही प्रायश्चित शास्त्र में लिखा है----
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[ ६२५
प्रश्न : --- गृहस्थों के घर स्त्रियां रजस्वला होती हैं, उनके योग्य प्रयोग्य ware की fafe fकस प्रकार है ?
अध्याय : दसवां ]
उत्तर :- इसका विधान भाषा के क्रिया कोश आदि शास्त्रों में लिखा है । तथापि यहाँ पर कुछ विस्तार और विशेषता के साथ लिखते हैं-जो स्त्रियां रजस्वला होती हैं, सो प्रकृतिरूप से तथा विकृति रूप से ऐसे दो प्रकार से होती हैं । जो स्वभाव से ही प्रत्येक महीने योनि मार्ग से रुधिर का स्राव होता है, वह प्रकृतिरूप होता है । जो समय में ही अर्थात् महीने के भीतर ही रजःस्राव होता है, उसको विकृतिरूप कहते हैं, वह दूषित नहीं है, उसके होने पर केवल स्नानमात्र से शुद्धि होती है । उसका सूतक नहीं होता । यदि पचास वर्ष के बाद पचास वर्ष की अवस्था से ऊपर रज:स्राव हो तो उसकी शुद्धि स्नानमात्र से ही है । अभिप्राय यह है कि जो रजःलाब महीने से पहले होता है, वह विकार रूप है और रोग से होता है । स्त्रियों के प्रदर आदि अनेक रोग होते हैं, उन्हीं से होता है । इसी प्रकार रजोधर्म का समय पचास वर्ष तक है । उसके बाद जो रजोधर्म हो तो वह रजःस्वलां के समान सदोष नहीं है, उसकी शुद्धि स्नान मात्र से ही होती है । जो बारह वर्ष की अवस्था से लेकर पचास वर्ष तक प्रति मास रजोधर्म होता है, वह काल रजोधर्म है । इसके बाद अकाल रूप कहा जाता है, इस प्रकार इसके दो भेद हैं ।
आगे इसका विशेष वन लिखते हैं। जिस दिन स्त्री के रज का अवलोकन हो, उस दिन से लेकर तीन दिन तक मशौच है । यदि उस दिन आधी रात तक रजोदर्शन हो तो भी पहला दिन समझना चाहिये । श्रागे इसी का खुलासा लिखते हैं । रात्रि के तीन भाग करना चाहिये । इसमें से पहला और दूसरा भाग तो उसी दिन में ना चाहिये और पिछला एक भाग दूसरे दिन की गिनती में लेना चाहिये । ऐसी आम्नाय हैं ।
यदि ऋतुकाल के बाद फिर वही स्त्री अठारह दिन पहले ही रजस्वला हो जाय तो वह केवल स्नान मात्र से ही शुद्ध हो जाती है। उसको तीन दिन का शौच नहीं लगता है। यदि कोई स्त्री अत्यंत यौवनवती हो और वह रजःस्वला होने के दिन से सोलह दिन पहले फिर रजःस्वला हो जाय तो वह स्नान करने मात्र से शुद्ध हो जाती है । इसका भी स्पष्ट अभिप्राय यह है कि रजस्वला होने के बाद फिर वही स्त्री रजस्वला होने के दिन से यदि अठारह दिन पहले फिर रजस्वला हो जाय तो
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[ गो. प्र. चिन्तामरिंग वह स्नान करने मात्र से शुद्ध हो जाती है। यदि उसके अठारहवें दिन रजोधर्म हो तो . उसको दो दिन का सूतक पालन करना चाहिये यदि उसके उन्नीसवें दिन रजोधर्म हो तो उसको तीन दिन तक सूतक पालन करना चाहिये । तब वह शुद्ध होती है । यदि रजस्वला होने के बाद चौथे दिन स्नान कर ले और फिर रजस्वला हो जाय तो फिर वह अठारह दिन तक शुद्ध नहीं होती अर्थात् उसे अठारह दिन तक सूतक पालन करना चाहिये । सो ही त्रिवर्णाचार के तेरहवें परिच्छेद में लिखा है
रजः पुष्पं ऋतुश्चेति नामाग्यस्यैव लोकप्तः । द्विविधं तत्तु नारीणां प्रकृतं विकृतं भवेत् ।।१९५४॥ .. .. ... .... तत्प्रकृतं यत्तु स्त्रीणां मासे मासे स्वभावतः । अकाले द्रव्य रोगाद्य-द्र कात्तु विकृतं मतम् ।।१६५५॥ प्रकाले घेदि स्त्रीणां -सद्रजो नैव दुष्यति । पंचाशद्वर्षादूध्वं तु. अकाल इति भाषितः ॥१६५६॥ . . रओ या दर्शनास्त्रीणां अशौचं दिवसत्रयम् । कालजे चाद्धरात्राचेत् पूर्व सस्कस्थचिभ्मसम् ॥१६५७॥ राः कुर्यात्रिमागं तु द्वौ भागौ पूर्ववासरे । ऋतौ सूते मृते चैव ज्ञेयोऽन्त्यः स परेहनि ॥१६५८।। ऋतुकाले व्यतीते तु यदि नारी रजस्वला । तत्र स्नानेन शुद्धिः स्यादष्टादशविनात्पुरा ॥१९५६॥ दिनाच्चेषोडशाद|क् नारी या चाति यौवना। पुनः रजस्थलापि स्याछुद्धिः स्नान के वन ॥१९६०॥ रजस्वलायाः पुनरेव चेद्रज़ः प्रारदृश्यतेऽष्टादश वासराच्छुत्रः । अष्टावशाहि यदि छेद दिनद्वयादेकोनविंशे त्रिदिनातत. परम् ॥१६६१॥ रजस्वला यदि स्मात्वा पुनरेव रजस्वला । अष्टादशदिनादक शुचित्वं न निगद्यते ॥१९६२॥ प्रागे रजस्वला स्त्री के प्राचरण आदि के योग्य अयोग्य की विधि लिखते हैं। . . .
यदि कोई स्त्री अपने समय पर रजस्वला हुई तो उसको तीन दिन तक ब्रह्मचर्य पूर्वक रात्रि में किसी एकांत-स्थान में जहां मनुष्यों का संचार न हो ऐसी जगह डाभ के आसन पर सोना चाहिये ! उसको खाट, पलंग, शय्या, वस्त्र, रूई का.बिछोना
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अध्याय : दसवां ]
[ ६२७
तथा ऊन का बिछोना आदि का स्पर्श न करना चाहिये । तीन दिन तक उसको धर्म को बात करनी चाहिये। जिस प्रकार मालती माध्वी वा कुन्द श्रादि की बेल संकुचित रूप से रहती है, उसी प्रकार संकुचित होकर प्राण धारण कर रहना चाहिये । तीन दिन तक शीलव्रत पालना चाहिये, दूध, दही, घी, छाछ आदि गरे रस का त्याग करना चाहिये। एक बार रूखा न खाना चाहिये । उसको नेत्रों में काजल, चंजन आदि कुछ नहीं डालना चाहियें। उबटन करना, तेल लगाना, पुष्प माला पहनना, गंध लगाना यदि गार के सब साधनों का त्याग कर देना चाहिये। तीन दिन तक उसको अपने देव, गुरू, राजा और अपने कुल देवता का रूप दर्पण में भी नहीं देखना चाहिये तथा न इनसे किसी प्रकार का संभाषण करना चाहिये । इन स्त्रियों को तीन दिन तक किसी वृक्ष के नीचे अथवा पलंग पर नहीं सोना चाहिये तथा दिन में भी नहीं सोना चाहिये । उसे अपने मन में पंच णमोकार मंत्र का स्मरण करना चाहिये। उसका उच्चारण नहीं करना चाहिये । केवल मन में चितवन करना चाहिये । अपने हाथ में वा पतल ● में भोजन करना चाहिये। किसी भी धातु के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिये । यदि वह किसी तांबे, पीतल आदि के पात्र में भोजन करें तो उस पात्र को अग्नि से
शुद्ध करना चाहिये। चौथे दिन गोसर्ग काल के बाद से लेकर छह घड़ी पर्यंत गोसर्ग काल कहा जाता है। स्त्री अपने पति के और भोजन बनाने के सेवा तथा होम कार्य में वह पांचवे दिन हैं—
स्नान करना चाहिये । प्रातःकाल चौथे दिन स्नान के बाद वह लिये शुद्ध समझी जाती है । देव पूजा, गुरु शुद्ध होती हैं । सो ही त्रिवर्णाचार में लिखा
काले ऋतुमती नारी कुशासने स्वपेप्सती । एकांत स्थान के स्वस्था अनदर्शनजता ।। १६६३॥ nagar वा देव धर्म वार्ता विजिता । मालती माध्वो वल्लीकु ददिति काकरा ।।१६६४॥ create दिन श्रीरिण चैक भक्तं विगोरसम् । अंजनाभ्यंगस्नान गंध मंडन वजिता ।। १६६५। "देवं गुरुं नृपं स्वस्य रूपं च वर्पणेs पिवा । न पश्येत्कुलदेवं च नैव भाषेत तैः समम् ।।१९६६ ।।
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६२८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि वृक्षमूले स्वपेन्नैव खट्वा शय्यासनं तथा । मंत्र पंचनमस्कारं जिन स्मृति स्मरेद् हदि ॥१६६७॥ अंजतावश्नीयात्पर्ण पात्र लाने व पैत्तले। .. भुक्त्वा चेत्कांश्योपात्र शुद्धयति तस्तुवन्हिना॥१९६८॥ चतुर्थे निवसे स्नायात् प्रातः गोसर्गतः परम् ।। पूर्वाह्न घटिका षट्कं गोसर्ग इति भाषितः ।।१६६६॥ शुद्धा भतुश्चतुल्लि भोजने रंधनेऽपि वा। , देव पूजा गुरू पास्ति होम सेवासु पंचमे ॥१९७०।।
रजस्वला स्त्रियों के प्राचरण इस प्रकार बतलाये हैं। जो स्त्रियां रजोधर्म के तीन दिन में अंजन लगाती हैं, उवटन करती हैं, पुष्पमाला पहनती हैं, गंध लगाती - हैं, तेल मर्दन करती हैं, और ऊंचे स्वर से बोलती हैं. उनका गर्भ सदोष और विकृत रूप हो जाता है।
स्त्रियों को ऋतुस्त्राव के तीन दिन तक ब्रह्मचर्य पूर्वक डाभ के आसन पर सोना चाहिये । आंसू बहाना, नाखून काटना, उबटन लगाना, तेल लगाना, गंव लगाना, आंखों में अंजन लगाना, पानी में डूबकर स्नान करना, दिन में सोना, दौडना, बहुत ऊंचे स्वर से किसी को आवाज देकर बुलाना, ऐसे ही ऊंचे शब्द सुनना, हंसना, अधिक बकवाद करना, कूदना, पीसना, अधिक बोझ उठाना, पृथ्वी खोदना, फैल फूटकर (बहुत सी जगह घेरकर) बैठना वा सोना तथा ऐसे ही अयोग्य कार्य तीन दिन नहीं करना चाहिये। अपने पति को भी न देखना चाहिये । हाथ में रखकर अथवा मिट्टी के सकोरा में व पत्तलों में रखकर रूखा अन्न भोजन करना चाहिये।
यदि कोई स्त्री अपनी अजानकारी से वा उसमें लोलुपता के कारण अथवा दैवयोग से ऊपर लिखे कार्यों को करती है, तो उसके अनेक प्रकार के दोष उत्पन्न हो जाते हैं। यदि कोई स्त्री इन ऋतु के तीन दिन में रोती है, तो उसके गर्भ के बालक के (जो बालक आगे गर्भ में आवेगा) उसके नेत्र विकृत हो जाते हैं। अंधा हो जाता है, धुंधला हो जाता है । अांख में फूला हो जाता है वा. कारणा ऐंचाताना हो जाता है। अथवा वह ढेर हो जाता है। उसकी आंखों से पानी बहता रहता है, उसकी अखि लाल हो जाती हैं वा बिल्ली की . सी अांखें हो जाती है । इस प्रकार उस बालक के नेत्रों में अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाते हैं । यदि कोई स्त्री इन तीन दिनों
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अध्याय : दसवां ]
[ ६२६ में नाखून काटती है, तो उसके बालक के नाखूनों में विकार हो जाता है । उस बालक के नाखून फटे टूटे सूखे, काले, हरे, टेड़े और देखने में बुरे हो जाते हैं। यदि वह स्त्री इन तीन दिनों में उबटन करती है वा तेल लगाती है, उसके बालक के अठारह प्रकार के कोढ रोगों में से कोई सा भी कोढ़ रोग हो जाता हैं। यदि वह इन तीन दिनों में गंध लगावे वा जल में डूबकर स्नान करे तो वह बालक दुराचारी व्यसनी होता है। यदि वह आंखों में अंजन लगा तो उसके बालक को नेत्र नाद सहित हो जाते हैं । दिन में सोने से वह बालक रात दिन सोने वाला होता है । अथवा सदा ऊघने बाला बालक . होता है । जो स्त्री इन तीन दिनों में दौड़ती है, उसका बालक चंचल होता है, उत्पाती उपद्रवी होता है ! ऊचे स्वर से बोलने से या सुनने से उसका बालक बहिरा होता है । जो स्त्री इन दिनों में हंसती है, उसके बालक के तालु, जीभ, होठ काले पड़ जाते हैं । इन तीन दिनों में अधिक बोलने से उस स्त्री के प्रलापी बालक होता है । जो झूठा हो चालाक हो उसको प्रलापी कहते हैं ! 'प्रलापोनृतभाषणम्' भूठ बोलना का नाम प्रलाप है । जो स्त्री रजोधर्म के समय में परिश्रम करती है, उसके उन्मत्त उन्माद रोगवाला वा बाबला पुत्र होता है । जो स्त्री उन दिनों में पृथ्वी खोदती है, उसके दुष्ट बालक होता है । जो चौड़े में सोती है, उसके उन्मत्त बालक होता है। इस प्रकार अयोग्यता से अनेक दोष उत्पन्न होते हैं । इसलिये ये अयोग्य कार्य नहीं करना चाहिये । विवेक पूर्वक रहना चाहिये । यह कथन जैन शास्त्रों का नहीं, किंतु लटकन मिश्र के पुत्र भाव मिश्र के बनाये हुए भाव प्रकाश नाम के वैद्यक शास्त्र में लिखा है, यहां प्रकरण समझकर लिख दिया है । यथा--
प्रज्ञानाद्वा प्रमादादा लोल्याता दैवतश्च वा । साचेत्कुर्यानिषिद्धानि गर्ने दोषास्तदाप्नुयात् ॥१६७१॥ एसस्या रोदनाद् गर्भो भवेद्विकृत लोचनः । नखच्छेदेत कुनखी कुष्ठी स्वभ्यंगसो भवेत् ॥१९७२२॥ अनुलेपासथा स्नानाद दुःशोलो जननादरक । स्थापिशीलोविवास्वापापाच्चंचल स्यात्प्रधावनात्॥१९७३॥ प्रत्युच्च शब्द अषणाधिरः खलु जापते । तालुदंतीष्ठ जिह्वासु श्यामो हसनतो भवेत् ॥१६७४।।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रलापी भूरि कथनादुन्मत्तस्तु परिश्रमात् । खलोति भूमि खननादुन्मत्तो वात सेवनात् ॥१६५५।।
इस प्रकार अयोग्य कर्मों के करने के दोष बतलाये हैं, सो इनका त्याग करना । ही उचित है। .... ..
जो कोई अनाचारी इनका दोष नहीं मानते । कितने ही लोग स्पर्श कर लेने पर भी स्नान नहीं करते । कितने ही लोग दूसरे तीसरे दिन स्नान कराकर उसके हाथ से किये हुए संब तरह के भोजन खा लेते हैं । कोई-कोई लोग उन्हीं दिनों में कुशील सेवन भी करते हैं, परन्तु ऐसे लोग महाप्रधी कहलाते हैं। ऐसे लोग स्पर्श करने योग्य. भी नहीं है। इसका कारण यह है कि रजोधर्म वाली स्त्री की पहले दिन चांडाली संज्ञा हैं, दूसरे दिन ब्रह्माधातिनी संज्ञा है, तीसरे दिन रज की संज्ञा है । और चौथे दिन शुद्ध होती है । यथा
प्रथमेऽहनि चांडाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी । तृतीये रज को प्रोक्त चतुर्थेऽहनि शुद्धयति ॥१९७६।।
इसलिये स्त्री चौधे ही दिन शुद्ध होती है । जो स्त्री पुरुष गामिनी है, वह जीवन पर्यन्त अशुद्ध रहती है । व्यभिचारिणी स्त्री स्नानादिक कर लेने पर भी शुद्ध नहीं होती। वह परपुरुष का त्यागकर देने मात्र से ही शुद्ध हो सकती है । सो ही लिखा है--
त्रिपक्षं जायते सूता ऋतुधात्री दिनत्रयम् । परजनरता नारी यावज्जीवं न शुद्धयति ।।१६७७॥
कितने ही अधर्मी इन तीन दिनों में भी सामायिक प्रतिक्रमण तथा शास्त्र के स्पर्श आदि कार्यों को करते हैं, ऐसे लोग उससे होने वाले अविनय और महापाप को नहीं मानते । यदि कोई इन कामों के करने के लिये निषेध करता है, तो उत्तर देते हैं, कि इस शरीर में शुद्ध पदार्थ है ही क्या ? इसमें से नव द्वार सदा बहते रहते हैं, यदि किसी के गोठ वा फोड़ा हो जाता है और वह पककर फूट जाता है उसी प्रकार स्त्रियों का यह मासिक धर्म है। इस प्रकार कहकर वे लोग मानते नहीं, परन्तु ऐसे लोग प्राज्ञाबाह्य ते महापातकी अनाचारी हैं।
रजस्वला स्त्रियों के स्पर्श-अस्पर्श का, उसकी भूमि की शुद्धि का तथा संभाषण आदि
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अध्याय : दसवां ]
[ ६३१ के दोषों का और उनके शुद्ध करने का वर्णन विशेषकर प्रायश्चित शास्त्रों से जान लेना चाहिये। यहां संक्षेप में लिखा है ।
कितने ही लोग अपनी लक्ष्मी के मद में प्राकर रजस्वला स्त्रियों को भूमि पर नहीं सोने देते, किंतु उन्हें पलंग पर सुलाते हैं । यदि कोई इसका निषेध करता है तो अपनी राजनीति का अभिमान करते हुये नहीं मानते हैं, किंतु उसी तरह चलते हैं परन्तु ऐसे लोग बड़े अधर्मी गिने जाते हैं। जो मुनि होकर घोड़े पर चड़े, जो स्त्री रजस्वला अवस्था में ही पलंग पर बैठे या सोवे तथा जो गृहस्थ शास्त्र सभा में बैठकर बाते करे ऐसे पुरुषों को देखकर ही दस्त्र लाहित ना करना चाहि ।
____भावार्थ :--जब ऐसे लोगों को देखकर ही देखने वालों को वस्त्र सहित स्नान करना पड़ता है तो फिर उन लोगों के पाप की तो बात ही क्या है अर्थात् वे बहुत भारी दोष के भागी होती हैं, सो ही लिखा है--
अश्वारूढं यतिं दृष्ट्या खट्वारूढां रजस्वलाम्। .. शास्त्र स्थाने गहवतन् सचेल स्नान माचरेत् ॥१९७८।। प्रश्न :--यदि रजस्वला स्त्री के पास बालक हो तो उसके स्पर्शास्पर्श को
• शुद्धि किस प्रकार है? उत्तर :---यदि कोई बालक मोह से रजस्वला स्त्री के पास सोवे बैठे वा रहे तो सोलह बार स्नान करने से उसकी शुद्धि होती है, यदि कोई दुध पीने वाला बालक दूध पीने के लिये उसका स्पर्श करे तो जल के छोटे देने मात्र से ही उसकी शुद्धि हो जाति है । ऐसे छोटे बालक को स्नान करने का अधिकार नहीं है। सो ही त्रिवर्णाचार में लिखा है--
सया सह तद्वालस्तु अधष्ट स्नामेन शुद्धयति । तो स्पर्शन् स्तनपायी वा प्रोक्षणे नेवशुद्धयति ।।१६७६॥
कदाचित् कोई यहां पर लौंटा देने का संदेह करे तो इसका उत्तर यह है कि प्रायश्चित शास्त्रों में और भी कितने ही पदार्थ बतलाये हैं, जिनमें स्पर्श का दोष नहीं माना जाता । जैसे मक्खी, हवा, गाय, सुवर्ण, अग्ति महानदी, नाव, पाथोदक और सिंहासन अस्पर्य नहीं होते ऐसा विद्वानों का कहना है--
मक्षिका मारतो गावः स्वर्णमग्नि महानदी। नादः पायोधक पीठं नास्पृश्यं बोच्यते युश्चैः ॥१६८०॥ .
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६३२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :-ऊपर लिखे अनुसार गहस्थ का यथायोग्य पाचरण तो मालूम
हुआ, परन्तु यदि रजस्वला स्त्री रोगिरणी हो अशक्त हो, उसको
स्नानादि किस प्रकार कराना चाहिए ? उत्तर:----यदि कोई स्त्री रोग वा शोक से अशक्त हो वा बुढापे से अशक्त हो और रजस्वला हो जाय तो उसकी शुद्धि इस प्रकार करनी चाहिये कि चौथे दिन कोई निरोग सशक्त स्त्री उसे स्पर्श करे फिर स्नान करे, फिर स्पर्श करे फिर स्नान करे। इस प्रकार वह दश बार उसको स्पर्श करे तो यह स्त्री शुद्ध हो जाती है । अंत में रजस्वला के वस्त्रों को बदलवाकर दश वा बारह बार आचमन कर तथा स्नान कर लेने से वह नीरोग स्त्री भी शुद्ध हो जाती है रोगिणी रजस्वला स्त्री की शुद्धि का यह क्रम है । सो ही त्रिवणकर में लिया है.
आतुरे तु समुत्पन्न दशवारमनातुरा। स्नास्वा स्नात्वास्पर्शदेनामातुरा शुद्धिमाप्नुायत् ॥१९८१॥ जराभिभूता या नारी रजसा चेत्परिप्लुता । कथं तस्य भवच्छौच्यं शुद्धिः स्थास्केन कर्मणा ।।१९८२॥ चतुर्थेहनि संप्राप्ते स्पर्शदन्या तु तां स्त्रियम् । सा च सचैव ग्रामा यः स्पर्शस्नात्वा पुनः पुनः ।।१६८३॥ दश द्वादश वा कृत्वा ह्याचमनं पुनः पुनः । अंत्ये च वाससा त्यागं स्नात्वा शुद्धा भवेतु सा ॥१९८४॥ प्रश्न :-जिन बेघों की आयु जितने सामरों की है, उनका मानसिक आहार
उतने ही हजार वर्ष बाद होता है । तथा उनका श्वासोच्छ्वास उतने ही पक्ष बांद होता है । यह कथन प्रसिद्ध है परन्तु जिन देवों की प्रायु पल्यों की है, उनके आहार और श्वासोच्छ्वास का क्या
नियम है ? उत्तर :- भवनवासियों में उत्कृष्ट प्रायु असुरकुमार देवों की है। सो उनके मानसिक आहार एक हजार वर्ष से अधिक समय बाद होता है तथा सूर्य, चन्द्रमा प्रादि ज्योतिषी देवों के सागरोपम के अंशों के हिसाब से अलग-अलग है । और बाकी के जो
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अध्याय : दसवां ]
[ ६३३
नौ प्रकार के भवनवासी समस्त देवांगनाओं के मानसिक प्रहार का समय इसी क्रम से समझना चाहिये । सो ही लिखा है
प्रसुतित्तिसु सासाहारा पक्खं समासहस्संतु । सुमुहत दिरणार तेरस वारस बलूरंग
॥१६८५ ।।
भावार्थ -- असुर कुमारनि के एक पक्ष भये एक बार उच्छ्वास होता है, हजार वर्ष गये एक बार हार होता है। बहूरि नागकुमार आदि तीन जाति विष साढा बारा मुहूर्त भये उच्छ्वास हो है, साढ़ा बारा दिन गये श्राहार हो है । बहुरि दिक्कुमार आदि तीन जाति विर्षे साढ़ा सात मुहूर्त भये उच्छवास होवै सादा सात दिन गये प्रहार हो हैं ।
भवावासादीणं गोजर पाया गरगच्चणादिधरा !
भोमा हास्सासा साहिय परणबिरण महलाय ।।१६८६ ।।
बहुरि व्यंतरनि के प्रहार किंछू अधिक एक हजार वर्ष पीछे होता है, कुछ अधिक पांच मुहूर्त भये जानना ।
ज्योतिष्कों का आहार कुछ अधिक एक हजार वर्ष पीछे होता है । कुछ अधिक का परिमाण अंतर्मुहूर्त अधिक लेना चाहिये । जैसा मूलाचार में लिखा हैउक्कस्सेरणाहारो वाससहस्साहिए भवणाणं ।
जोदिसियारां पुण भिष्णमुहुत्त फेदि सेक्कस १६८७॥
. इसी प्रकार ज्योतिषियों का भिन्न मुहूर्त अधिक एक पक्ष के उच्छ्वास होता है, जैसे-
उक्कणुच्छासो पक्खेणाविएण होइ भवरणासं ।
महत्तपत्त तहा जो सियांगारण भोमारा ।।१६८८ ।।
प्रश्न :--- -दंडक में लिखा है कि तीसरे नरक से निकलकर कोई जीव तीर्थंकर भी होते हैं, सो यह वर्शन किस प्रकार है ?
उत्तर :-- बलदेव, वासुदेव और चक्रवर्ती ये जीव नरक से निकलकर कभी नहीं होते । स्वर्गलोक से भाने वाले जीवों को ही यह पद प्राप्त होता है । इसका भी कारण यह है कि यह पदवी बिना संयम के प्राप्त नहीं होती तथा संयम सहित मरण करने वाला जीव नरक में जाता नहीं । इसलिए इस पदवियों को पाने वाला स्वर्ग से ही आता है । सो ही मूलाचार में लिखा है-
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Ramnam Ratopam
६३४ ]
[ मो. प्र. चिन्तामणि ___णिरएहि णिग्गदाणं प्रारमंतर भवेहि रिणयमा छ ।
बलदेव वासुदेव तणं च तह चक्कवट्टीणं ॥१६८६||
यह सिम है कि योनि से निकर बार, बलभद्र वासुदेव और चक्रवर्ती की पदवी प्राप्त नहीं होती।
सो हो सिद्धांतसार दीपिका में लिखा है-- निर्मस्य नरकान्जीया चक्रश बल केशवाः । । तच्छत्रवो न जायन्ते चयन्त्यंते यतो दिवात् ।।१९६०॥ त्रिलोकसार में भी लिखा है-- हिपरयचरो मस्थि हरिबल चक्को। इस प्रकार लिखा है। प्रश्न :-यहां पर कदाचित कोई यह पूछे कि वेसठ शलाका पुरुष कहां
से पाकर उत्पन्न हो सकते हैं और कहाँ-कहाँ से आकर उत्पन्न
नहीं होते, इस का खुलासा किस प्रकार है ? उत्तर :--मनुष्य तथा तिर्यञ्चगति से आकर तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण और बलभद्र नहीं होते। स्वर्ग व नरक . इन दो गतियों से ही आकर उत्पन्न होते हैं, सो ही मूलाचार में लिखा----
मारण स तिरियाय वहा सलाम पुरिसाण होति खलु पियमा । - तेसि अरणंतर भवे भरिणरजं. णिन्थुलुदीगमणं ॥१९६१॥ प्रश्न :-जो शलाका पुरुष देवगति से आकर होते हैं, वे किन किन देवों
को जातियों से आकर होते हैं, और किन किन निकायों से नहीं
उत्तर :---भवनवासी व्यंतर ज्योतिषी इन तीनों निकायों के देव तो आकर शलाका पुरुष होते नहीं तथा सोलह स्वर्ग, नी बेयक, नौ अनुदिश और पंच पंचोत्तर के देव पाकर तीर्थ कर श्रादि. शलाका पुरुष हो सकते हैं, ऐसा नियम है । सो ही मूलाचार में लिखा है--
प्राजोदिसिचि देवा सलाग सुरिसा प.होति ते णियमा । तेसि अणंतर भवे भयारिण णिबुदी गमरसं ॥१९६२॥ त्रिलोकसार में लिखा है. . . . . .
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अध्याय : दसवां. ]
[ ६३५ परतिरियगदो हितो भवतियादो च रिणगया ओंवा । रए लहंते ते पदवि ते वाटिसलाग पुरिसाणं ।।१६६३।।
स्वर्गलोक में भी कल्पवासी तथा कल्पातीत देवों में भी कितने ही जीव आकर इन पदवियों को पाते है और बहुत से जीव नहीं पाते । उनका क्रम इस प्रकार हैं । अनुदिश वा अनुत्तर विमानवासी कल्पातीत देव वहां से आकर बलभद्र तीर्थ कर चक्रवर्ती पद पाते हैं, किन्तु वहां से देवों में से आकर बासुदेव नहीं होते। यह नियम है ।
सो ही मूलाचार में लिखा है-- णिन्धुदिगमणे रामत्तणे य तिस्थयर चक्कट्टित्त । अणुविसंणुत्तरवासी तदो चुदा होंति भयपिज्जा ।।१९६४॥ ऐसा शलाका पुरुषों के होने का नियम है । : ... प्रश्न :----कौन किस किस गति से प्राकर मनुष्य हो सकता है तथा किस
किस गति से आकर नही हो सकता ? उत्तर---अग्निकाय और वायुकाय इन दोनों के सूक्ष्म तथा स्थूल जीव पाकर मनुष्य भव धारण नहीं करते, ऐसा नियम है बाकी, के समस्त गतियों के जीव आकर मनुष्य हो सकते हैं । सो हो भूलाचार में लिखा है--
सटोपि तेडकाया सव्वे तह बाउकाइया जीवा। ण लहंति माणुसतं रिपयमाद् अखंतर भवेहि ॥१६६५॥ दण्डक भाषा में भी लिखा हैतेजकाय अरु वायुकाय । इन दिन और सबै नर थाय । प्रश्न :-अन्यमत के तापसी परिवामक प्राधि तप करते हैं, वे मरकर ऊपर
स्वर्ग में कहां तक जा सकते हैं? उत्तर--नसंख्यात वर्ष की प्रायु वाले जीव अर्थात् कुभोग भूमि के मनुष्य वा तिर्यञ्च मरने के बाद अपने मिथ्यात्व रूप भावों से भवनवासी 'व्यंतर ज्योतिष्क इन तीनों ही जाति के देवों में उत्पन्न होते हैं। वे भागे वैमानिक देवों में उत्पन्न नहीं हो सकते । इसी प्रकार जो उत्कृष्ट भावों को धारण करने वाले हिंसा पूर्वक पंचाग्नि प्रादि तप धारण करने वाले और कंदमूल भक्षण करने वाले तपस्वी मरने के बाद अपने अज्ञान तप के फल से भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिष्क और कल्पवासी देवों तक
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१३६ ]
[गो. प्र. चिन्तामणि सोलहवें स्वर्ग तक उत्पन्न हो सकते हैं, आगे कल्पातीत देवों में उत्पन्न नहीं होते, सो ही मूलाचार में लिखा है
संखादी दाऊरणं मरणयतिरिक्खारण मिच्छभावेरस । उववादो जोदिसिए सक्करतं तसाई तु१६.६७
तथा अन्य मती परिवाजक लोग अपने शुभ भावों से. मरकर भवनवासियों से लेकर बारहवें सहस्त्रार स्वर्ग तक उत्पन्न हो सकते हैं। आगे नहीं जा सकते । सो ही लिखा है---
परियाजगए रिणयमा उक्करसं होदि वंभलोगाम्हि । उपकस्य सहस्सार ति होदि या आजीवगाण तहा ॥१६६७॥ भाषा में लिखा है। . . प्रश्न :--सुना जाता है कि एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक के जीच सब
तीनों लोकों में सब जगह भरे हुए हैं, सो क्या यह बाल ठीक है? उत्तर-~-यह बात ठीक नहीं है, इसमें इतना विशेष है कि पृथ्वीकायिक अपकायिक, तेजस्कायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक तथा नित्यनिगोद इतरनिगोद के समस्त एकेंद्रिय जीव ऊध्र्वलोक, मध्यलोक, अधोलोक समस्त तीनों लोकों में भरे हुए हैं, तथा पंचेन्द्रिय जीव नारकी मनुष्य तिर्यञ्च आदि. संत्री जीव तीनों लोकों में रहने वाली असनाडी में भरे हुए हैं और दो इन्द्रिय, ते इन्द्रिय, चौइन्द्रिय असंज्ञी पशु और मनुष्य गति के पंचेन्द्रिय जीव मध्यलोक में ही उत्पन्न होते हैं । ये जीव दुसरी जगह उत्पन्न नहीं होते । नरक स्वर्ग तथा सिद्धस्थान में ये जीव उत्पन्न नहीं होते, मध्यलोक में ही उत्पन्न होते हैं । सो ही मूलाचार में लिखा है
एइंखियाय पंचे दियाय उसमह सिरयलोएसु । सयल विलिदिया पुरण जीवातिरियं हि लोयं हि ॥१६९८॥ स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा में भी लिखा है-- वितिचक्खा जीवा हवंति नियमेरस कम्मभूमीसु । चरिमे दीबे अद्ध चरिमसम्मुद्देसु सध्येसु ॥१६६६॥ प्रश्न :-तीर्थकर प्रादिक पदवीधर पुरुषों पर जो चमर ढलाये जाते हैं, . उनका प्रमाण क्या है ? .. : उत्तर----श्री तीर्थकर केवली भगवान के तो सदा चौसठ चमर ढुलते रहते
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अध्याय : दसवां ]
[ ६३७ हैं। चक्रवर्ती के बसीस ठुलते हैं, नारायण के सोलह, महामंडलेश्वर के पाठ, अधिराज के चार और महाराज के दो चमर ढुलते हैं । सो ही लिखा है--
तीर्थकराणामिति चामराणि चत्वारि षष्ठ्यात्यधिकानि नित्यं । अद्विमानानि भवन्ति तानि चक्रेश्वराद्याबदसौ सुराजा ।।२०००। प्रश्न :-स्वयंभूरमरण द्वोप और समुद्र के पशु पक्षियों को प्रायु उत्कृष्ट है,
परन्तु यहां के पशु पक्षियों को कितनी है ? : उत्तर--नेबला, चूहे. धूस, बाघ, चीते, कबूतर, कुत्ते और सुअर आदि पशूनों की आयु भगवान परहंत देव ने बारह वर्ष की बतलाई है तथा इसी प्रकार अन्य पशुओं की भी यथा योग्य हीन या अधिक समझ लेनी चाहिये । सोही त्रिलोकप्रज्ञप्ति में लिखा है--
नकुलानां मूषकानां घूषकानां तथैव च । व्याघ्रचित्र कपोसानां मंडलाना जिजीवितम् । शुकराणां तथैवात्र संवत्सरारमा द्विषट् मतम् ॥२००१॥ प्रश्न :-भारत में लिखा है--मध का पीना, मांस का खाना, रात्रि
भोजन करना, कंदमूल खाना आदि क्या अन्य धर्मावलम्बियों के
शास्त्रों में भी निषिद्ध है ? उत्तर ----भारत में लिखा है—मद्य का पिना, मांस भक्षण करना, रात्रि में अन्न पान लेह्य स्वाद्य आदि चारों प्रकार के आहार का भक्षरण करना, कंदमूल खाना महा पाप है । जो कोई पुरुष इसका सेवन करता है; उसको तीर्थ यात्रा जप आदि सब व्यर्थ होता है, उनके यहाँ ६८ तीर्थ माने हैं, सो जो पुरुष मांस, मद्य, रात्रि भोजन, कंदमूल आदि का सेवन करते हैं, उनकी ६८ तीर्थों की यात्रा व्यर्थ होती है । राम, कृष्ण, परमेश्वर आदि का जए सब व्यर्थ होता है । गायत्री मंत्र का जप भी सब व्यर्थ होता है । तथा चान्द्रायण व्रत तथा और भी बत, तथा पंचाग्नि आदि अनेक प्रकार के कष्ट देने वाले तप सब व्यर्थ हो जाते हैं । सो ही भारत में लिखा है
मद्यमांसाशनं रात्रौ भोजनं कन्धभक्षणम् ।। ये फुर्वन्ति वृथा तेषां तीर्थयात्रा जपस्तपः ।।२००२॥
उसी में आगे लिखा है कि मद्य-मांस भक्षण करने वाले वा रात्रि भोजन करने वालों के एकादशी व्रत का उपवास करना, नारायण के मन्दिर में जागरण
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६३८ ]
। गो. प्र. चिन्तामणि करना, पुष्कर की यात्रा करना और चान्द्रायण तप करना आदि सब व्यर्थ हो जाता । है । जब तक वह मध-मांसादिक का त्याग नहीं करता, तब तक उसको जप-तप, बतउपवास आदि का कोई फल नहीं मिलता। मद्य-मांसादिक का त्याग करने से ही इनका फल मिल सकता है । सो हो भारत में लिखा है--
वृथा एकादशो प्रोक्ता वृथा जागरणं हरेः । तथा च पुष्करी यात्रा वृथा चन्द्रायणं तपः ॥२००३॥
मनुस्मृति में लिखा है--जो कोई जीवों की हिंसा करता है, उसके न तो ध्यान हो सकता है, न स्नान से शुद्धि हो सकती है, न वह दान दे सकता है; लथा न वह मुन क्रिया कर सकता है : हि करने वाले के इन सब बातों का अभाव हो जाता है । यदि वह इन क्रियाओं को कर भी डाले तो भी जीवघात करने से उसका सब किया हुआ निष्फल हो जाता है । सो ही मनुस्मृति में लिखा है--
न च ध्यान न च स्नानं न यानं न च सस्क्रियाः ।
सर्वे ते निष्फलं यान्ति जीव हिंसा करोति यः ॥२००४॥ ' भारत में लिखा है-जो प्राणी बकरा, हिरण, सांभर, गीदड़, सुअर आदि पशुओं का घात करता है, वह उस पाप के फल से उस पशु के शरीर में जितने रोम हैं, उतने ही हजार वर्ष तक अग्नि में पकाया जाता है, यथा---
यावन्ति पशुरोमाणि पशुगात्रेषु भो नरः ।
सावर्ष सहस्त्राणि पश्यन्ते पशुघातकाः ॥२००५॥ ... भारत में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि विष्ठा के कीड़े को और स्वर्ग में रहने वाले इन्द्र को दोनों को जीवित रहने की आकांक्षा एक सो है । दोनों के जीवित रहने को इच्छा में कोई कमी नहीं है । इन्द्र महासुखी है, सो उसे तो जीवित रहने की इच्छा सदा लगी ही रहती है। परन्तु विष्ठा का कीड़ा भी मरना नहीं चाहता, दुःखी होने पर भी वहीं रहना चाहता है। इससे सिद्ध होता है कि उसको भी जीवित रहने की इच्छा लगी हुई है। इसी प्रकार मरने का भय दोनों को एक सा है। दोनों ही मरने से उरते हैं, मरने में सभी को समान दुःख होता है। इसलिए जिस प्रकार अपने प्राण मुझे प्यारे लगते हैं, उसी प्रकार अन्य प्राणियों को भी अपने अपने प्राण प्रिय लगते हैं । यही समझकर बुद्धिमान पुरुषों को घोर और भयंकर ऐसा प्राणियों का वध कभी नहीं करना चाहिए। उपदेश बुद्धिमानों को ही दिया जाता है । मूर्ख और
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अध्याय : दसवां ]
[ ६३६ अज्ञानी पुरुष तो किसी को मानता ही नहीं है, इसलिए उसको कहना ही व्यर्थ है । सोही भारत में लिखा है--
अमेध्यमध्ये . कोटस्य सुरेन्द्रस्य सुरालये। समाना जीविताकांक्षा समं मृत्युभयं द्वयोः ।।२००६।। यथा ममप्रियाः प्रारणास्तथा चान्यस्य देहिनः। इति मत्वा न कर्तव्यो घोर प्रारिणवधो बुधैः ।।२००७।।
इसी प्रकार मार्कंडेय पुराण में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि हे अर्जुन ! इस पृथिवी में भी मैं हूँ । समस्त अग्नि, वायु, वनस्पति आदि में भी मैं हूँ और तीनों लोकों में समस्त प्राणियों में भी मैं हूँ। मैं सर्वमत वा सब जगह, सब पदार्थों में, सब जीवों में रहने वाला हूँ। इसलिये सब जीवों में मुझे समझकर जो जीव की हिंसा नहीं करते, उनकी मैं रक्षा करता हूँ। जो जीवों की हिंसा करते हैं, उनका क्षय होता है । यह मार्कंडेय पुराण में लिखा है । यथा
पृथिव्यामव्यहं पार्थ सग्निौ च जलेप्यहम् । वनस्पति गतोप्यहं सर्वभूतगतोप्यहम् ॥२००८।। यो मां सर्वएतं ज्ञात्वा न हिसंति कदाचन । सस्याहं न प्रणस्यामि स मे न प्रणस्यति ॥२००६।।
शिव धर्म में लिखा है कि मांस में, मद्य में, शहद में और मक्खन में उसी वर्ण के (माम, मक्खन वा शहद के रंग के) असंख्यात असंख्यात जीव हर समय उत्पन्न होते रहते हैं । यथा
. मय मांसे मधुनि च नवनीते बहिर्न ते । उत्पद्यन्ते असंख्यातास्तद्वरस्तित्र जन्तवः ॥२०१०॥
इस प्रकार मास में महा दोष हैं। पहले तो यह जीवों की हिंसा से उत्पन्न होता है । तथा फिर उसमें अनेक दोष हैं, यही समझकर धर्मात्मा पुरुष हिंसा का और मांस भक्षण का सर्वथा त्याग कर देते हैं।
जो जीव स्वयं मांस नहीं खाते, परंतु दूसरों को उपदेश देते हैं; यह राजाओं का धर्म है । शिकार खेलना राजाओं का धर्म है। उसके लिये मुहूर्त देते हैं सो हिंसा करना वा उसके लिये उपदेश देना या कारण सामग्री मिलाना सब एक हैं। जो लोग
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[ गो. प्र. चिन्तामरिण इन निंद्य कार्यों का उपदेश देते हैं, वे धर्म के नाश करने वाले पाप को बढ़ाने वाले, इंद्रियों के लंपटी अधर्मी और महापतित हैं । ऐसा समझना चाहिये। प्रश्न:- यदि मांस में ऐसा दोष है तो श्राद्ध में मांस खिलाने का विधान
क्यों लिखा है। स्मृति शास्त्र में लिखा है "मछली का मांस खिलाने से पितर लोग दो महीने तक तुप्त रहते हैं। हिरण के मांस से तीन महीने तक रहते हैं । भेड के मांस से चार महीने तक तृप्स रहते हैं, पक्षियों के मांस से पांच महीने तक, बकरे के मांस से छह महीने सक, कबूतर के मांस से सात महीने तक, एण जाति के हिरण के मांस से पाठ महीने तक, रोख नाम के हिरण से नौ महीने तक, सूअर तथा भैंस के मांस से दश महीने तक, खरगोश और कच्छप के मांस से ग्यारह महीने तक और गाय के दूध की खीर खिलाने से बारह महीने तक पितर लोग तृप्त रहते हैं। सोही लिखा है-- द्वौ मासौ मत्स्यमांसन मिासा हारमोन का औरभ्रेण तु चत्वारः शाकुनेन तु पंच वै ॥२०११॥ षट्मासाः छाममांसेन पार्वतेन तु सप्त वै । अष्टावरणस्य मांसेन रौरवेण नथैव तत् ।।२०१२।। दशमासास्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः । शशकूर्मस्य मांसेम मासा एकादशैव च ॥२०१३॥ संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन दै।
इस प्रकार श्राद्ध में मांस का विधान लिखा है, सो क्यों लिखा है ?
उत्तर :-जो लोग इस प्रकार मांस का विधान करते हैं, वे चाहे श्राद्ध करने वाले जैन गृहस्थ हों, चाहे श्राद्ध करने वाले प्राचार्य हों अथवा तृप्त होने वाले पितर हों; वे सब राक्षस बा भोल समझने चाहिए। क्योंकि मांस का विधान करना राक्षसों का काम है। दूसरी बात यह है कि यदि मांस के विधान का ही दृढ़ विश्वास किया जायगा, तो श्राद्ध अधिकार में जो तिल, चावल, जल, शर्करा, घी, दूध, मधु, दही आदि का पिण्ड करना कैसे बतलाया ? देखो श्राद्ध कल्प में कहा भी है--
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अध्याय : दसवां 1
[ ६४१
तिलान्नं चैव पानीयं शर्कराज्यं पयस्तथा ।
मधु दना समायुक्तः अष्टांगः पिंड उच्यते ॥२०१४ ||
इस प्रकार जो अष्टांग पिण्ड बतलाया है, वह सब व्यर्थ हो जायगा । श्रागे तुम्हारे बहां लिखा है --
farara चोत्तरे भागे मांस भक्षो न दोषभाक् ।
अर्थात् विध्याचल के उत्तर भाग में मांस भक्षण करने वाला दोषी नहीं गिना जाता । इस प्रकार कहकर बहुत से शक्ति के उपासक कान्यकुब्ज, समोडिया, सर्वरिया पुरविया आदि ब्राह्मण मछली बकरा आदि का माँस भक्षण करते हैं । परन्तु उनका यह कहना और करना सब मिथ्या है। क्योंकि मांस कुछ पृथिवी जल से तो उत्पन्न होता ही नहीं है थवा फलों के समान वृक्षों पर लगता नहीं है । वह जंगम जीवों के घात करने से होता है । इस प्रकार जंगम जीवों के बात करने से उत्पन्न हुए मांस को भक्षण करने वाले लोगों के भला जीव दया किस प्रकार पल सकती है, क्योंकि श्राद्धादिक में मांस का काम पडता ही है । इसलिए कहना चाहिए कि इस प्रकार कहने वाले वा मानने वाले बड़े ही अधर्मी हैं ।
आगे जो लोग यह कहते हैं कि क्षत्रियों के कुल में यह परम्परा से मांस भक्षण वा शिकार खेलना चला आया है तथा उनमें से कितने ही इन्द्रियों के लंपटी, विषय कषायों को पुष्ट करने वाले, महाकामी, अधोगति के जाने वाले, भ्रष्ट, महापापी हैं, लोग शास्त्रों में भी मांस भक्षण की पुष्टि करते हैं, धर्म मानकर हिंसा की या मांस भक्षण की पुष्टि करते हैं, परन्तु ऐसे लोग महा-दुर्बुद्धि और महा-मिथ्यादृष्टि हैं । ऐसी बुद्धि वालों के उत्तम बुद्धि कभी नहीं हो सकती ।
ऐसे लोग ऊपर लिखे शास्त्रों को कहकर अपने मिथ्याधर्म की पुष्टि करते हैं परन्तु पहली बात तो यह है कि श्राद्ध कर्म कुछ मोक्ष देने वाला नहीं है । यह तो स्वार्थी लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए चलाया है । इसलिए वह कभी प्रमाण रूप नहीं हो सकता । कदाचित् यह कहा जाय कि हमारे वेद में लिखा है सो भी ठीक नहीं है । क्योंकि जो जीव हिंसा का उपदेश दे, वह वेद कभी नहीं कहा जा सकता । उसे तो वेधक-जीवों का घात करने वाला कहना चाहिए । भला जो "यज्ञार्थ पशवः सृष्टा:" अर्थात् पशुओं को यज्ञ में होम के लिए ही उत्पन्न किया है, इस महा हिंसा की पुष्टि
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६४२ ]
- गो. प्र. विसाभार करते हैं, वे महाहिंसक, महापाप रूप धातक शास्त्रों के समान समझे जाते हैं । इसलिए उनको वेध वा वेधक कहना चाहिए ।
यहां पर कदाचित् कोई वेद को मानने वाला यह कहे कि "यज्ञ में पशुओं को होमना हमारे वेद में लिखा है । सो मंत्रों की आहूतियों से होमना. बतलाया है । इसी प्रकार देवता को बलिदान देने के लिए होम के अन्त में वध करना भी होम के लिए है । अथवा उस देवता के लिए है, इसलिए ऐसी हिसा में हिंसा का पाप नहीं लगता है। ऐसे यज्ञों को जो करता है अथवा कराता है अथवा जो बकरा, भैंसा, घोड़ा, मनुष्य आदि जीव होमे जाते हैं, वे सब स्वर्ग में जाते हैं, इसलिए ही यज्ञ में जीव होमने का निषेध नहीं है, किन्तु कर्तव्य है ऐसा वेद कहता है, इस प्रकार वेद मानने वाले का कहना नहा हिंसा के दोष को उत्पन्न करता है, क्योंकि यदि वेद यह कहता है कि मंत्रपूर्वक जीवों का होम करने से पाप नहीं लमता" तो वेद का यह कहना मुसलमानों के कहने के समान हुअा। क्योंकि मुसलमान भी यह कहते हैं कि हमारे कुराग की लिगका जीव के ऊपर पडनी चाहिए और उसको शस्त्र से मारकर उसका मांस भक्षरण करना चाहिए । इस प्रकार जीव मारने और उसका मांस भक्षण करने में कोई दोष या पाप नहीं है । लिबका पढ़ लेने के बाद जो जीव मारा जाता है वह सीधा विहिश्त (स्वर्ग) में जाता है । इस प्रकार वेद का कहना और मुसलमानों का कहना समान ही हुआ। वेद मानने वाले गाय को अच्छी मानते हैं और मुसलमान सुअर को अच्छी मानते हैं, बस इतना ही दोनों में अन्तर दिखाई पड़ता है। हिंसा करना दोनों का बराबर है । दोनों ही समान हिंसक है।
यहां पर कदाचित् कोई यह कहे कि पहले लोग ऐसे समर्थ होते थे, वे जीवों को होम भी देते थे और फिर उनको मन्त्र पढ़कर जीवित भी कर देते थे । सो उनका कहना भी मिथ्या है। क्योंकि यदि वे इतने समर्थ थे तो फिर उन्होंने अपने कुटुम्ब को मरने से क्यों नहीं बचाया ? अपने सब कुटुम्ब को अमर क्यों नहीं बना दिया? परन्तु आज तक किसी ने अपने कुटुम्ब को अमर नहीं बनाया, इससे सिद्ध होता हैं कि उनका इस प्रकार कहना सब मिथ्या है। जो जीव यज्ञ में होमे जाते हैं, वे सब सीधे स्वर्ग चले जाते हैं, यदि यह बात सच है तो फिर उन लोगों ने अपने कुटुम्ब को हो यज्ञ में क्यों नहीं दिया, जिससे उनका सन्न कुटुम्ब स्वर्ग चला जाता परन्तु अपने कुटुम्ब
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अध्याय : दसवां ]
[ ६४३ को कोई नहीं होता। इससे मालूम होता है कि होम करना ..सब स्वार्थ और जिव्हालंपटता के लिए है।
___ इसके सिवाय एक बात विचार करने की यह है कि यदि मांसभक्षण योग्य होता तो भारत आदि तुम्हारे ही शास्त्रों में मांस को अत्यंत निंद्य और त्याग करने योग्य क्यों बतलाया जाता है ? जैसा कि पहले भारत का प्रमाण देकर लिख चुके हैं। तथा यहां फिर भी प्रसंग पा गया है इसलिये प्रसंगानुसार कुछ और भी भी लिखते हैं । आपके धर्म शास्त्र में लिखा है
मांसाशिनो न पात्राः स्युन मास दानमुत्तमम् । तत्पित्राणां कथं तृप्त्य. भुक्तं मांसाशिभिर्भवेत् ॥२०१५॥ पुत्र गापित दानने पितरः स्वर्गमाप्नुयुः । तहि तत्कृतपापेन तेपि गच्छंलि दुर्गसिम् ॥२०१६॥ कि जाप्य होम नियमस्तीर्थ स्थानेन भारत । यदि मांसानि खादन्ति सर्वमेव निरर्थकम् ॥२०१७॥
जो मांस भक्षी हैं, वे कभी पात्र हो नहीं सकते। कितने ही लोग कहते हैं कि हम ब्राह्मण हैं इसलिये दान के पात्र हो सकते हैं । इसी प्रकार मांस का दान भी दान नहीं कहा जा सकता। ऐसी हालत में उन पितरों की तृप्ति कैसे हो सकती है ? कदाचित् ब्राह्मणों को मांस खिलाने से पितर लोग तृप्त हो जाय तो फिर यह भी मानना पड़ेगा कि वे पितर लोग भी मांस भक्षी हैं । यदि अपने पुत्र के द्वारा दान देने से यदि पितर लोगों को स्वर्ग की प्राप्ति होता है तो फिर पुत्र ने जो मांस दान के लिये जीवों का वध किया वा कराया, मांस पिंड दिया तथा मांस का भक्षण किया उसके पाप से पितरों को दुर्गति की भी प्राप्ति होनी चाहिये । हे भारत ! जो जीव मांस भक्षण करते हैं, वे चाहे जितना राम कृष्ण आदि का नाम उच्चारण कर जप करें चाहे जितना होम करें, चाहे जितने नियम करें, चाहे जितनी तीर्थ यात्रा करें और चाहे जितने तीर्थ स्नान करें परन्तु उनका सब करना व्यर्थ है, मिथ्या है। इस प्रकार धर्म शास्त्र और पुराणों में केवल मांस भक्षरण के ही अनेक दोष बतलाये हैं। भारत के शांति पर्व में लिखा है
न देयानि न ग्राह्यारिस षड्वस्तूति पंडितः । अग्निर्मधु विषं.शस्त्रं मा मांसं तथैव च ॥२०१८॥
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[ गो. प्र. चिन्तामणि अर्थ-विचारशील पंडितों को अग्नि, शहद, विष, शस्त्र, मद्य और मांस ये छह वस्तुएँ न तो किसी को देनी चाहिये, न किसी से लेनी चाहिये । जब इस छहों पदार्थों का लेन देन भो निषिद्ध बतलाया है, तब फिर मांस भक्षण करना वा कराना किस प्रकार संभव हो सकता हैं। फिर भी जो मानते हैं, सो सब मिथ्या है। इसके सिवाय भी भारत के शांति पर्व में लिखा है
एकतश्चतुरो थेदा ब्रह्मचर्य च एकतः । एकतः सर्वपापानि मद्यमांसं च एकातः ॥२०१६।। न गंगा न च केदारं न प्रयागं न पुरस्करम् । न च ज्ञानं न च ध्यान न सपो जपभक्तयः ।।२०२०॥ मवान महावरण पूना न्द्र गुरौ नुतिम् तस्यैव निष्फलं यान्ति यस्तु मांसं प्रलादत्ति ।।२०२१॥ तिलसर्षपमानं च यो मांसं . भक्षयेवरः ।
स याति नरकं घोरं यावञ्चन्द्र दिवाकरौ ॥२०२२॥ . . जिस प्रकार एक ओर चारों वेद हैं और एक अोर ब्रह्मचर्य है, उसी प्रकार एक और संसार भर के समस्त पाप हैं और एक ओर मद्य मांस का सेवन है।
भावार्थ----ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अर्थवेद ये चार वेद हैं । सो चोरों ही वेद तो एक ओर हैं और स्त्री मात्र का त्याग करने रूप'ब्रह्मचर्य एक ओर है, इनमें में चारों वेदों से शील व्रत की महिमा अधिक है, जिस प्रकार चारों वेदों से ब्रह्मचर्य की महिमा अधिक है उसी प्रकार संसार भर के समस्त पापों से मद्य मांस सेवन का पाप अधिक है। इससे सिद्ध होता है कि मद्य मांस सेवन करने से सबसे अधिक पाप होता है।
इसी प्रकार जो मांस भक्षण करते हैं, उनके न तो गंगा है, न केदार है, न प्रयाग है, न पुष्कर है, न ज्ञान है, न ध्यान है, न जय है, न तप है, न भक्ति है, न दान है, न होम हैं, न ज्ञान है, न वंदना है । अर्थात् मांस भक्षण करने वाले की सब क्रियायें व्यथें हैं, उसके किये हुये समरत पुण्यकार्य भी व्यर्थ हो जाते हैं-- निष्फल हो जाते हैं । • इस प्रकार महादोष से भरे हुयें मांस को जो तिल वा सरसों मात्र भी खाता है । वह जब तक आकाश में सूर्य चन्द्रमा रहेंगे तब तक घोर नरक में सड़ता रहेंगा, इस प्रकार
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अध्याय: दसवां ]
मांस खाने का फल महा निद्य और नीच बतलाया है । भारत में लिखा है- श्री कृष्ण पांडवों से कहते हैंस्नानोपभोग रहितः पूजालंकार वजितः । मधुमास तिवृत्तश्च गुणवान् तिथिभवेत् ।।२०२३॥
अर्थ --- जिसने शहद और मांस का त्याग कर दिया है, वह चाहे स्नान उपभोग रहित हो और चाहे तिलक आदि पूजा से अलंकारों से रहित हो तो भी वह गुणवान् प्रतिथि माना जाता है । बहुत से लोग स्नान, आचमन, संध्या, तर्पण, तिलक कंठी आदि का अभिमान करते हैं परन्तु उन्हें सोचना चाहिये कि सबसे मुख्य शहद और मांस का त्याग है। जिसने शहद और मांस का त्याग नहीं किया है, उसके स्नान आचमन आदि का कोई मूल्य नहीं है। मांस शहद का त्याग किये बिना केवल स्नानादिक करने में कोई गुण नहीं है। शहद और मांस का त्याग करना सबसे श्रेष्ठ हैं । शक्ति के उपासकों को वा अन्य शहद मांस खाने वालों को यह उपदेश बहुत अच्छी तरह समझ लेना चाहिये ।
[ ६४५
कितने ही भेषमात्र को धारण करने वाले वैरागी शहद और मांस का भक्षण करते हैं और शहद मांस की खाते हुये भी अपने में ब्राह्मणपना मानते हैं सो भी मिथ्या है। क्योंकि शहद और मांस का खाना ब्राह्मण का लक्षण नहीं है। किंतु चांडाल का लक्षण है । सो ही महाभारत के शांति पर्व में लिखा है
मद्य मांस मधु त्यागी पंचोदुम्बरद्रमः | निशाहार परित्यक्तः एतद्ब्राह्मण लक्षणम् ॥२०२४ ॥ सत्यं नास्ति तपो नास्ति चेंद्रियनिग्रहः ।
सर्वभूतदया नास्ति एतच्चांडाल लक्षणम् ॥। १०२५ ।।
अर्थ - जिसके मद्य, मांस और शहद के भक्षण करने का त्याग हो, बड़ फल, पिपल फल, गूलर, पाकर, अंजीर इन पांचों उदुम्बर फलों का त्याग हो और जिसके रात्रि में भोजन करने का त्याग हो, वही ब्राह्मण है । ब्राह्मण के ये ही लक्षण है, इन लक्षणों के बिना केवल अपने आप ब्राह्मण बनने वाले कभी ब्राह्मण नहीं हो सकते । जिसमें ऊपर लिखे ब्राह्मण के लक्षण हों और जो सम्यग्दर्शन से सुशोभित हों वही ब्राह्मण मानने योग्य समझा जाता है। जिसके मद्य मांसादिक का त्याग न हो, न सत्य भाषण करता हो, न तपश्चरण करता हो, न इन्द्रियों का निग्रह करता हो और जो
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[ गो. प्र. चिन्तामणि समस्त प्राणियों की दया भी पालन न करता हो वह ब्राह्मरण नहीं किंतु चांडाल कहा जाता है। क्योंकि ये चांडाल के लक्षण हैं। मद्य मांसादि का सेवन करने वाला की ब्राह्मण नहीं हो सकता।
यदि यह बात है तो धर्म की उत्पत्ति किस प्रकार है? ऐसा प्रश्न अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा है । सो ही भारत के शांति पर्व में
लिखा हैकथमुस्पयते धर्मः कथं धर्म विवर्धते । कथं च स्थाप्यते धर्मो कथ धर्मो विनश्यति ॥२०२६॥
अर्थ---अर्जुन पूछते हैं कि हे भगवन ! धर्म किस प्रकार उत्पन्न होता है किन-किन कारणों से बढ़ता है, किस प्रकार ठहरता है और किस प्रकार नाश को प्राप्त होता है, इनका उत्तर जो श्री कृष्ण ने दिया है वह इस प्रकार है। जैसा कि भारत में लिखा है
सत्येनोत्पद्यते धर्मों दयावान वद्धते । क्षमया स्थाप्यते धर्मों कोध लोभाद्विनपूयति ॥२०२७॥
अर्थ- सत्य व्रत से धर्म उत्पन्न होता, दया पालन करने और दान देने से बढता है, समस्त जीवों पर क्षमा भाव धारण करने से धर्म की स्थिरता रहती है तथा क्रोध और लोभ से धर्म का नाश होता है।
इसके आगे फिर श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कह रहे हैं, जैसा कि भारत में लिखा
तस्य व्यर्थाणिकर्माणि सर्वे यज्ञाश्च भारत । सर्वे तीर्थाभिषेकाश्च यः कुर्यात्प्राणिनां वधः ॥ अहिंसा सत्यमस्तेयं त्यागो मैथुनयर्जनम् । एतेषु पंच सूक्तेषु सर्वे धर्माः प्रतिष्ठिताः ॥२०२८।। अहिंसा लक्षणो धर्मः अधर्मः प्राणिनां वधः। . तस्माद्धर्माधिना लोके कसंध्या प्राणिनां दया ॥२०२६॥ ध्र वं प्राणिमधे यशो मास्ति यज्ञ हिंसकः । सर्वसस्व हिससव सवा यज्ञो युधिष्ठिर ॥२०३०॥
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अध्याय : दसवां ]
[ ६४७ अर्थ- जो प्राणियों का वध करता है, उसकी सब क्रियाएँ, संब यज्ञ और सब तीर्थों पर किये हुए अभिषेक व्यर्थ हैं । क्योंकि हिंसा असत्य परिग्रह का त्याग और मैथुन करने का त्याग वा ब्रह्मचर्य का पालन करना इन पांचों में ही सब धर्मों का समावेश हो जाता है। इस संसार में अहिंसा वा किसी प्रकार की हिंसा न करना ही धर्म है और प्राणियों का वध करना ही अधर्म है, इसलिये धर्मात्मा लोगों को समस्त प्राणियों पर दया अवश्य पालन करनी चाहिये । जो यज्ञ प्राणियों का वध करने से होता है, वह कभी यज्ञ नहीं कहा जा सकता है क्योंकि प्राणियों का वध करने वाला हिंसक समझा जाता है। और हे युधिष्ठिर ! - यज्ञ वही कहलाता है, जिसमें समस्त प्राणियों पर दया पालन की जाय, किसी भी प्राणी की हिंसा न की जाय । इसी भारत के शांति पर्व में लिखा है- . ...
इन्द्रियाणि पशन करवा वेदों कत्वा तपोयीम् । अहिंसामाहुति . . कुर्याच्चात्मयज्ञं यजामहे ॥२०३१॥
अर्थ :--पांचों इन्द्रियां ही होम करने की सामग्नी बनाना चाहिये, तपश्चररण को वेदी बनाना चाहिये और अहिंसा की आहुति देनी चाहिये । इस प्रकार आत्मयज्ञ सदा करते रहना चाहिये ।
___इस संसार में देखो बलिदान लेने वाले देवता भी कैसे निर्दयी हैं, जो हाथी, घोड़े, सिंह आदि का बलि तो नहीं लेते, किन्तु केवल बकरे का होम बतलाते हैं । सो ठीक ही है । देव भी दुर्बलों का ही घात करता है, सो ही लिखा है
अश्वं नैव गज नेव सिंहो मैध च नैवच । प्रजापुत्रं बलि पद्यात् देवो बुर्बल घातकः ।।२०३२।।
जो देवता बलिदान चाहते हैं, वे देवता भी निर्दयी समझना चाहिये और उनका कर्ता भी महापापी समझना चाहिये । लिखा भी है
यज्ञं कृत्वा पशून हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम् । सोष गम्यते स्वर्गेन्नरके केन गम्यते ॥२०३३॥
अर्थात् -- यश करने वाले यज्ञ में अनेक पशुओं को मारकर और रुधिर की कीचड़ भरकर यदि स्वर्ग चले जाते हैं, तो फिर मरक में किन-किन कामों के करने से जायेंगे?
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[ गो. प्र. चिन्तामरि
भावार्थ :-- ये सब काम तो नरक में जाने के कारण हैं, यदि इनको स्वर्ग का कारण मान लिया जायगा लो फिर नरक का कारण संसार में कुछ मिलेगा हो नहीं अथवा श्रहिंसा सत्य श्रादि को नरक का कारण मानना पड़ेगा, परन्तु ऐसा हो नहीं सकता, इसलिए यज्ञादिक की कल्पना सब व्यर्थ है। भारत के शांति पर्व में कृष्ण अर्जुन के संवाद के समय लिखा है कि लोभी, मायाचारी, कपटी और इन्द्रियों के विषय भोगों के लोलुपी मनुष्यों ने केवल अपने स्वार्थ लिए जीवों की हिंसा में धर्म माना है, सो उनकी यह वितरीतता है । सो ही लिखा है
लोभ मायाभि भूतानां नराणां हरिणाच *
एषां प्राणिवधे धर्मो विपरीतता भवन्ति ते ॥२०३४ ॥ ॥
भारत में दया और हिंसा का स्वरूप दिखलाते हुए लिखा हैहिंसा सर्वभूतानां सर्वशैः प्रतिभासिता ।
इदं हि मूलं धर्मस्य शेषं तस्यैव विस्तरः ||२०३५॥
उद्यतं Rearrator faaादमयविव्हलाः ।
जीवाः कम्पति संत्रस्ताः नास्ति मृत्युसमं भयम् ।।२०३६||
अर्थः- समस्त जीवों की दया पालना, सबकी रक्षा करना हिंसा है । यही सब धर्मों का मूल है। बाकी सब इसी का विस्तार है ।
. भावार्थ -- जिस प्रकार वृक्ष के टिकने का मुख्य कारण जड़ है। जड़ होने पर उसकी शाखायें प्रतिशाखायें होती हैं और शाखायें प्रादि होने पर उन पर फल
लगते हैं । उसी प्रकार धर्म रूपी वृक्ष की जड़ वा मूल दया है। दया के सहारे ही यह धर्म रूपी वृक्ष टिका है। बाकी सत्य अचौर्य ब्रह्मचर्य आदि सब इसी दया रूप मूल की शाखायें हैं तथा त्याग, व्रत, जप, तप, संयम, उपवास. तोर्थ यात्रा दान आदि भी सब इस दया धर्म की शाखायें हैं । इस प्रकार यह दया धर्म सर्वोत्तम धर्म है । ऐसा सर्वश देव ने कहा है । हिंसा इससे विपरीत है । देखो जिस समय चंड कर्मों को करने वाला, दुष्टबुद्धि को धारण करने वाला हिंसा के भाव रूप रोद्र परिणामों से प्रत्यन्त भयानक, महापतित अधम नीच भ्रष्टाचारी कोई घातक वा शिकारी पुरुष पशु-पक्षियों को देखकर उनके मारने के लिए उन पर शस्त्र उठाता है हुए शस्त्र को देखकर अपने मरने के भय से वह पशु वा प्राप्त होता है, अत्यन्त विह्वल हो जाता है, घबडा जाता है, उसका शरीर कंपने लगता
उस समय उस चमचमाते पक्षी अत्यन्त विषाद को
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अध्याय : दसर्वा ]
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है तथा यह बहुत ही भयभीत हो जाता है। सो ठीक ही है, क्योंकि इस संसार में मृत्यु के समान और कोई भय नहीं है । ऐसी हिंसा को न जाने लोग किस प्रकार करते हैं। भारत में लिखा है--
कंटकेनापि बिद्धस्य महती वेदना भवेत् । वक्रतासिशक्त्या . छिद्यमानस्य किं पुनः ॥२०३७॥
अर्थ :--यदि अपने पैर आदि शरीर में कहीं कांटा भी लग जाय तो उससे बड़ी भारी वेदना वा दुःख होता है फिर भला अन्य जीवों पर चक्र, भाला, बरछा, तलवार, शक्ति सीर, गोली आदि अनेक प्रकार के शस्त्रों के प्रहार करने पर छिदते वा मरते हुए उन जीवों को कितना दुःख होता होगा । : अपने शरीर में कांटे का भी महादुःख होता है और उस कांटे से बचने के लिए जूता पहनते हैं वा और अनेक उपाय करते हैं परन्तु वे ही लोग अन्य जीवों पर शस्त्रों का प्रहार करते हए उनके शरीर में अनेक धाव करते हुए उनको मार डालते हैं यह कितना बड़ा अन्याय है । ऐसे लोग शिकारी व व्याध कहे जाते हैं। उनके बटन क्षेत्र मानि भी प्रदा विकराल गौर पाप रूप दिखाई पड़ते हैं।
भारत में लिखा है-श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कियो दधारकचन मेरु कृत्स्ना चापि वसुन्धराम् । एकोऽपि जोषितं दद्यात् न च तुल्यं युधिष्ठिर ।।२०३८॥ ..
अर्थ :---श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे युधिष्ठिर ! किसी पुरुष ने मेरु पर्वत के समान सुवर्ण दान दिया तथा समस्त द्वीपों की समस्त पृथ्वी दान दे दी। किसी. दूसरे मनुष्य ने किसी एक जीव को अभयदान दिया अर्थात् उसे मरने से बचाया, उसे जीवनदान दिया; तो उस सुवर्णदान वा पृथ्वी दान देने वाले का पुण्य जीवदान देने वाले के पुण्य के समान नहीं होता। . ... . .
भावार्थ--उस सुवर्णदान वा समस्त पृथ्वीदान से भी एक जीव के अभयदान का पुण्य बहुत अधिक है। संसार में अभयदान के समान और कोई पुण्य नहीं है अथवा कोई दान नहीं है । . जो लोग अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए. जीवहिंसा की पुष्टि करते हैं, वे अत्यन्त दुष्ट और नीच हैं। भारत में लिखा है--
यो यत्र जायते जन्तुः स तत्र रमते चिरम् । ततः सर्वेषु भूतेषु मयां कुर्वन्ति साधकः ॥२०३६।।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि अर्थात्--यह जीव जहां जन्म लेता है, वहीं रम जाता है, क्रीडा करने लगता है, वहीं सुख मानता है और वहां ही बहुत दिन तक रहकर जीना चाहता है । इसीलिये सज्जन पुरुष वा उत्तम मनुष्य समस्त प्राणियों पर दया पालन करते हैं । भारत में लिखा है--
यस्य चितं द्रवी भूतं कृपया सर्वजन्तुषु । सस्य ज्ञानं च मोक्षं च कि जटा भस्म चाम्बरैः ।।२०४०॥
जिसका हृदय समस्त प्राणियों में होने वाली दया के द्वारा द्रवीभूत है, कोमल है, उसी को झान की प्राप्ति होती है और उसी को मोक्ष की प्राप्ति होती है । ज्ञान और मोक्ष के लिये जटाओं का बढ़ाना, शरीर में भस्म लगाना तथा मेरु आदि के रंगे हुए वस्त्रों को धारण करना सब व्यर्थ हैं। बिना दया के केवल भेष धारण . करना स्वांग है, उस भेष से मोक्ष नहीं मिल सकता । वह भेष केवल लोभ के लिए है।
यदि जीवों के य करने में, जीमों को हिरने में अर्थ है और जीवों का घात करने वाले वा मांस भक्षण करने वाले पुरुष स्वर्ग में जाते हैं, तो फिर संसार का त्याग करने वाले व्रती, संयमी, तपस्वी वा अनेक यम नियमों को धारण करने वाले पुरुषों को स्वर्ग लोक की प्राप्ति कभी नहीं होनी चाहिये। ऐसे तपस्वियों को फिर नरक की प्राप्ति होनी चाहिये परन्तु ऐसा होता नहीं है । भागवत में लिखा है--
यदि प्रापिषधे धर्मः स्वर्गश्च खलु जायते । संसार मोचकानां तु कुतः स्वर्गाभिधीयते ॥२०४१॥
इससे सिद्ध होता है कि जीवों की हिंसा करने वाले मांस भक्षण करने वाले वा और भी सप्त व्यसनों का सेवन करने वाले जीव ही नरक में जाते हैं। लिखा
घसं च मासं च सुरां च वेश्यां पापद्धखोरोपरदार सेवाम् ।
सेबन्ति सप्तव्यसनानि लोकाः धोरातिधोरे नरके प्रयान्ति ॥२०४२॥ .. अर्थ-जूया खेलना, मांस भक्षण करना, मध पान करना, वेश्यासेवन करना, शिकार खेलना, चोरी करना और परस्त्री सेवन करना ये सात व्यसन कहलाते हैं । जो पुरुष इन सातों व्यसनों का वा इनमें से किसी भी व्यसन का सेवन करते हैं, वे धोर से भी महाघोर नरक में जाते हैं । इन व्यसनों के सेवन करने का ऐसे ही नरक में जाना ही फल है।
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कोई कोई कहते है कि हम तो तीर्थों पर स्नान करके अथवा और कोई पुण्य कार्य करके इन व्यसनों से उत्पन्न हुए पापों को धो डालते हैं, सो उनका यह कहना भी ठीक नहीं है। क्योंकि इसका उत्तर पहले अनेक श्लोकों का प्रमाण देकर अच्छी तरह बतला चुके हैं। प्रसंगानुसार थोड़ा सा यहां भी लिखते हैं। भारत में लिखा है--
मदो भार सहस्त्रेण जलकुम्भ शतेन च । न शुद्धन्ति दुराचाराः तीर्थस्नान शतैरपि ॥२०४३।। काम रागमदोन्मसाः स्त्रीणां ये वशतिनः । न ते जलेन शुद्धयन्ति स्नाम तीर्थ शतैरपि ॥२०४४॥
अर्थ:----जो पुरुष दुराचारी है, वह अपनी शुद्धता के लिए यदि हजार भार प्रमाण मिट्टी अपने हाथ-पैर आदि सारे शरीर पे लगाये और फिर मंगा, यमुना, सरस्वती प्रादि नदियों के पवित्र जल के सैकड़ों घड़े भरकर स्नान करे, तो भी वह शुद्ध नहीं होता। दुराचारी सैकड़ों तीर्थ स्नानों से भी शुद्ध नहीं हो सकते । इसी प्रकार जो लोग काम के राम से मदोन्मत्त हो रहे हैं और जो सदा स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं, वे पुरुष न तो जल से ही शुद्ध होते हैं और न सैकड़ों तीर्थ स्नानों से मुंद्ध होते हैं । दुराचारी लोगों को ऐसा ही महापाप लगता है, जो तीर्थों के स्नान से भी नहीं छूट सकता । फिर भला वह पाप दूसरी जगह कहां छूट सकता है ? अर्थात् वह पाप कहीं नहीं छूट सकता।
शारंगधर संहिता में लिखा है-- .. कर्षाभ्यामर्द्ध पसं ज्ञेयं सुक्तिरष्टमिका तथा । सूक्तिभ्यां च पलं ज्ञेयं मुष्टिरानं चतुथिका ॥२०४५।।
दश मासे का एक कर्ष होता है। लिखा भी है.---"कर्षस्तु दशमासकः", दो कर्ष का एक पैसा होता है । दो पैसे का एक टका होता है। यहां टका कहने से टका भर तौल समझना चाहिये । इस प्रकार चालीस मासे का एक टका भर तौल समझना चाहिये । प्रागे उसी शारंगधर में लिखा है
पलानां द्विसहस्त्रं तु भारः एकः प्रकीर्तितः ।
अर्थात् ---दो हजार पलों का एक भार होता है। इस प्रकार के एक हजार भार मिट्टी से तथा गंगा आदि तीर्थों के सैकड़ों घड़े जल से भी मांसाहारी कभी शुद्ध नहीं हो सकता । यही बात पहले पर्व में लिखी है
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६५२
[ गो. प्र. चिन्तामणि विसं रागादिसक्लिष्टमलोक बचनै मुखम् । जीवं हिंसाभिः कायोयं गंगा तस्य परान्सुखी ॥२०४६॥
अर्थ :--जिसका चित्त राग, द्वेष, मोह, मद, काम आदि से मलीन है, मुख मिथ्या वचनों से झूठ बोलने से मलीन है और जीवों की हिंसा करने से जिसका शरीर मलीन है। उसके लिए गंगा भी प्रतिकूल हो जाती है । मंगा ऐसे पुरुषों के सन्मुख कभी नहीं हो सकती। ऐसे पापियों को नहीं मिल सकती अर्थात् ऐसे पापियों के पाप तीर्थों में भी कट नहीं सकते ।
कोई-कोई तीर्थों में स्नान करने मात्र से ही समस्त पापों का छुट जाना मानते हैं तथा शुभ गतियों का होना मानते हैं, सो भी ठीक नहीं है । क्योंकि यदि तीर्थों में स्नान करने मात्र से जीव तिर जाय, पापों से छूट जाए, तो फिर गंगा आदि तीर्थों के जल में रहने वाले मछली, मेढक, मगरमच्छ, कछुवा आदि जलचर जीव सब । ही मुक्त हो जाना चाहिये। सब ही के पाप छूट जाना चाहिये । परन्तु ऐसा होता नहीं है । लिखा भी है... . . यद्यबुस्नानतो देही कृतपापाद्विमुच्यते । ... मुक्ति यांति सदा सर्वे जीवास्तोयसमुद्भवाः ॥२०४७॥
__ वेद व्यास ने अठारह पुराण बनाये हैं। परन्तु उन सबका सार केवल दो वचनों में लिखा है । जीवों को अभयदान देने से तथा अन्य प्रकार से पर जीवों का उपकार करने से पुण्य होता है तथा अन्य जीवों को पीड़ा देने से पाप होता है । बस सब पुराणों में ये ही दो वचन सार हैं और बाकी सब निःसार हैं। सो ही लिखा है--
अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।..' परोपकारः पुण्याय पापाय परपीड़नम् ।।२०४८॥
• इस प्रकार और भी अनेक पुराणों में जीवों की हिंसा करने में और मांस भक्षा करने में अनेक दोष बतलाये हैं। तथा स्थान-स्थान पर इनके त्याग करने का उपदेश दिया है। इसलिए सत्पुरुषों को इन दोनों का त्याग कर देना ही उचित है। जो निर्दयी, शूद्रों के समान विषयों के लंपटी, महापापों के द्वारा अधोगति को जाने वाले धमों का नाश करने वाले और पापों को बढ़ाने वाले लोग अनेक प्रकार की बात बनाकर जीव हिंसा करने मांस भक्षण करने, मद्य पान करने, शहद खाने तथा
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अध्याय: दसवां ]
[ ६५३
और भी महापापों का श्राचरण करने में ग्रानन्द मानते हैं और धर्म की हंसी करते हैं, वे महा अशुभ कर्मों का बंध कर नरकादि कुगतियों में चिरकाल तक परिभ्रमण करते रहते हैं ।
प्रश्न : --- मुनिराज पोंछी रखते हैं सो उसमें ऐसा कौन सा गुरण है, जो वे सामयिक, वंदना देव दर्शन करने में चलते बैठते सब कामों में उसको अपने पास रखते हैं। तथा उसके वियोग में प्रायश्चित लेते हैं, सो क्या बात है ?
उत्तर :- पोंछी में पांच गुण होने चाहिए। जो धूल और पसीने को दूर करे, जो कोमल हो, जो चिकनी हो और जो छोटी वा हल्की हो। ये पांच गुण पीछी में होने चाहिये। ऐसी पींछी से जीवों को अभयदान मिलता है । यह उसमें सबसे उत्तम गुण है । ऐसा भगवान अरहंत देव ने कहा है । यदि पीछी न हो तो साधु जनों की ईर्ष्या समिति का नाश हो जाता है। तथा स्थूल सूक्ष्म यादि अनेक जीवों का घात होता है। जिससे उन मुनियों का मुनि पद ही भ्रष्ट हो जाता है। इसीलिए पछी के वियोग में मुनिराज प्रायश्चित लेते हैं, सो ही सकलकीर्ति धर्मप्रश्नोत्तर में लिखा है
अथ पिच्छिका गुणाः रजः स्वेदाग्रहणद्वयम् ।
मार्दवं सुकुमालत्वं लघुत्वं सद्गुणा इमे ॥२०४६ ॥ पंज ज्ञेयास्तथा मेया निर्भयादि गुणोत्तमाः । मयूरपिच्छ जाताया: पिच्छिकाया जिनोदिताः ॥३२०५०।। समितिस्तां विना नश्येत्साधूनां कार्य साधने । स्थूल सूक्ष्मादि हिंसाद्या व्यर्थ जन्मदोक्षणम् ॥३२०५१
इस पंचमकाल के दोष से कितने ही ऐसे मुनि बन गये हैं, जो पींछी नहीं रखते और अपने को मुनि मानते हैं, परन्तु वास्तव में वे मुनि नहीं हैं। शास्त्रों में उनको जैनाभासी (जैनी तो नहीं है, परन्तु जैनियों के समान दिखाई पड़ते हैं ) बतलाया है । सो ही नीतिसार में लिखा है
कियत्यापि गते काले ततः श्वेताम्बरोऽभवत् । द्राविडो यापनीयश्च केकीसंघश्च मानसः ॥२०५२।।
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६५४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण
के ferves: श्वेतासो द्राविडी पापनीयकः । निःपिच्छचेति पचेते जैनाभासाः प्रकीर्तिताः ॥२०५३।। स्वस्वमत्यनुसारेण शिद्धान्त व्यभिचारिणः ।
प्रश्न :- भगवान तीर्थंकर के जन्माभिषेक के समय अपने-अपने इन्द्रों सहित चारों निकायों के देव प्राते हैं । उस समय इन्द्र को सवारी के इन्द्र को सात प्रकार की सेना चलती है । वह सातों प्रकार सो वह सेना तीर्थंकर भी किसी के गुर
की सेना मुखानुवाद करती चलती है । भगवान के ही गुण गाती है या और माती है ?
उत्तर :- सातों ही प्रकार की सेना नृत्य करती हुई चलती है ! उनमें से प्रथम सेना के देव, विद्याधर कामदेव और राजाधिराजों के चरित्र और गुण गाते हुए गमन करते हैं । दूसरी सेना के देव अर्द्ध मंडलीक सकल मंडलीक और महामंडलीक राजाओं के चरित्र और गुण गाते हुए तथा नृत्य करते हुए गमन करते हैं । तीसरी सेना के देव बलभद्र, नारायण और प्रतिनारायणों के बल वीर्य गुण श्रादि का वा उनके जीवन चरित्र का वर्णन करते हुए तथा नृत्य करते हुए गमन करते हैं । चौथी सेना के देव चक्रवर्ती की विभूति तथा बल वीर्य आदि का गुण वर्णन करते हुए चलते हैं । पांचवी सेना के देव लोकपाल जाति के देवों का गुणानुवाद तथा उसी भव से मोक्ष जाने वाले वरमशरीरी मुनियों का गुणानुवाद करते हुए चलते हैं । की सेना के देव गणधर देव तथा ऋद्धिवारी मुनियों के गुण और यश का वर्णन करते हुए चलते हैं । सातवीं सेना के देव श्री तीर्थंकर के छियालीस गुणों का वा उनके जीवन चरित्र का वर्णन करते हुए, गाते, नृत्य करते हुए गमन करते हैं । सो ही सिद्धान्त सार दीपक में लिखा है
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प्रथमे नर्तकीनी के विद्याधर कामदेव राजाधिराजना चरित्रेण नदन्तोऽमराः गच्छन्ति । द्वितीये सकलाई महामंडलीकानां वरचरित्रेण नर्तनं कुर्वन्तः सुराश्च । तृतीये बलभद्र वासुदेव प्रतिवासुदेवानां वीर्यादिगुण निबंद्ध चरित्रेण नृत्यतो देवाः मच्छति । चतुर्थे चक्रवर्तिनां विभूति वीर्यादिगुस निबद्ध चरित्रेण महनर्तनं भजन्तोमराश्च । पंचमे चमरांगय तिलोकपाल सुरेन्द्राणां गुणरचित चरित्रेण नटन्तो निर्जराश्च । षष्ठे गणधर देवानां ऋद्धि ज्ञानादि गुणोत्पन्न वरचरित्रेण परं नृत्यं
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अध्याय : दसवां ]
[ ६५५ कुर्थाणः सुराः यान्ति । सप्तमे नर्तकानी के तीर्थकराणां चतुस्त्रिशदतिशयाष्ट प्रातिहार्यानन्त ज्ञानादि गुण रचित चरित्रेण तद्गुणरागरसोत्कटाः माकिनः प्रवरं नर्तनं प्रकुर्वन्तो गच्छन्ति ।
प्रश्न :-वे देव किस स्वर से गाते हैं ?
उत्तर :-खड्ग, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पचम, धैवत, निषाद ये सात स्वर हैं। इनमें से एक-एक सेना, एक-एक स्वर से गाती है तथा अनुक्रम से माती है । सो ही सिद्धान्तसार दीपक में लिखा है- .
प्रायनी के खड्ग स्वरेण जिनेन्द्र गुणान् गायन्तः, द्वितीये ऋषभस्वरेण च गानं कुर्वन्तः, तृतीये मांधार नादेन गायन्तो गंधर्वा गच्छति ।
चतुर्थे मध्यमध्वनिना जन्माभिषेक संबन्धि गीतान् गायन्तः, पंचमे पंचमस्वरेण पानं कुर्वाणः, षष्ठे धैवतध्वनिना च गायन्त:, सप्तमे निषाद घोषणकलं गीतमानं कुर्वन्तो गंधर्वा व्रजन्ति । प्रश्न :-सातों हो : नरकों में कोई महापापो जीव अलग-अलग नरकों में
उत्कृष्टता कर कितनी-कितनी बार जन्म धारण करता है ? उत्तर :- पहले धम्मा नाम के नरक में उत्कृष्टताकर असंज्ञी जीव जाता है । सो वह अधिक से अधिक अाठ बार जाकर जन्म लेता है । दूसरे वंशा नाम के नरक में सरीसृत अर्थात् सर्प (फरणा रहित जाति का जोडी डू जाति का सर्प) को आदि लेकर महापाप के उदय से अधिक से अधिक सात बार जन्म धारण करते हैं। तीसरे मेधा नाम के नरक में दुष्ट पक्षी भ्रादि जीव उत्कृष्ट पाप के उदय से छह बार जाकर जन्म लेते हैं। चौथे अंजना नाम के नरक में सादिक तिर्यच महापाप के उदय से पांच बार जन्म लेते हैं। पांचवें अरिष्टा नाम के नरक में सिंहादिफ जीव अधिक से अधिक चार बार जन्म लेते हैं। छठवें मघवी नाम के नरक में मनुष्यरणी (स्त्री) अधिक से अधिक तीन बार जन्म लेती है। सातवें माघवी नाम के नरक में मनुष्यादिक जीव अधिक से अधिक दो बार जन्म लेते हैं ।
___ इस प्रकार ये जीव मिथ्यात्वादिक महापाप कर्मों से तथा हिंसादिक पापों से से उत्पन्न हुए कर्मों के उदय से नरकों में उत्कृष्ट जन्मों को धारण करते हैं.। तथा वहां पर सागरों पर्यंत की आयु तक छेदन, भेदन, शूलारोपण, ताडन पीडन, आदि के महादुःख भोगते हैं । उन दुःखों को भगवान सर्वज्ञ देव ही जानते हैं। इसलिये भव्य
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६५६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण जीवों को मिथ्यात्वादिक महापापों का त्याग कर देना चाहिये । सम्यग्दर्शन धारण करना चाहिये तथा अपने आत्मा का कल्याण करने के लिये अहिंसा आदि श्रतों को धारण करना चाहिये। प्रश्न :--यहां पर नरकों में जाने को जो संख्या लिखी है, सो जीव नरकों
से निकलकर अन्य जन्मों को धारण करते हैं, फिर नरकामें जाता
है। सो नरक से निकलकर किन-किन. गत्तियों में जन्म लेसा है ? उसर :--नरक गति से निकलकर मनुष्य और तिर्यञ्च गति ही प्राप्त होती है । मनुष्य का तिर्यञ्च गति को पाकर बाकी बचे हुए पहले के पाप कर्म के उदय से वा उस उस भव में किये हुये पाप कर्मों के उदय से. फिर नरक में जाता है । सातवें नरक से निकलकर तिर्यञ्च ही होता है । सो सिद्धान्तसार में लिखा है--
उत्कृष्टेन स्वसंतत्या सोऽसंजी प्रथमावनी । अष्टधारान् क्रमाद् गच्छेत्सरोसपोतिपापतः ॥२०५४।। सप्तवारान् द्वितीयायां तृतीयाया वयो अजेस् । पवारांश्च चतुष्पा हि पचवारान् भुजंगमः ॥२०५५।। पंचम्यां च चतुर्वारान याति सिंहो निरंतरम् । षष्ठयां यापिदिगवारान् सप्तम्यां वारद्वयं पुमान् ॥२०५६।। एवभ्रेभ्यो निर्गता एते तिर्यग्नरगतिहये । कर्मभूमिषु जायते गर्भजाः संजिनः स्फुटम् ।।२०५७।। प्रश्न :----स्वर्ग के विमान प्रकाश में किसके प्राधार से स्थित हैं ?
उत्तर :--सौ धर्म स्वर्ग से लेकर सहस्त्रार तक बारह स्वर्गों के विमान जल और पवन के आधार से हैं । तथा प्रानत स्वर्ग से लेकर बाकी के स्वर्ग, नौ ग्रेवेयक, नौ अनुदिश और पांचों पंचोत्तरों के समस्त विमान बिना किसी आधार के निराधार अपने आप स्थिर हैं । सो ही सिद्धांतसार दीपक के प्रथम अध्याय में लिखा है--
जलवातद्वया धोरणय योनि मनोहराः । प्रगान्ताधिकल्पाना चतुर्वा विमानकः ॥२०५८।। ग्रे वेयकादि पंचानुसरान्तानां भवन्ति ते। . निराधारास्त्रयोविशागू सहस्त्रप्रमाः स्वयम् ॥२०५६॥
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अध्याय: दसवां ]
प्रश्न : --- यह लोक किसके प्राधार से है ?
उत्तर :-- यह लोक घनोदधिवात, धन्रवात और तनुवात के श्राधार से है । अर्थात् यह लोक धनोदधि नाम की घनी भूत वायु से घिरा है। उसी के आधार पर ठहरा हुआ है, चोदधिवायु बनवायु के आधार सेहैं, धनवायु तनुवायु के आधार से है और तनुवायु श्राकाश के आधार से है तथा आकाश स्वयं अपने आधार से है, सो ही सिद्धांतसार में पहले अधिकार में लिखा है
घनोदधि नाerre तनुवात इमे त्रयः ।
सर्वतो लोकमावेष्ट्य निस्यास्तिष्ठति वायवः ॥। २०६० ॥ gaerat टीका में भी लिखा है---
artefa जगत्प्राणः सर्वलोकस्य वेष्ठन ।
घनप्रभजनो नाम
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द्वितीयस्तदनंतरम् ॥२०६१।
तनुयात उपयस्य त्रैलोक्याधार शक्तिमान् । वाता एते स्थिति स्तेषां कथ्यमानानि शम्यतं ॥२०६२।।
प्रश्न :- चतुरिंगकाय के देवों में महा ऋद्धियों धारण करने वाले इन्द्रादिक देव अपनी आयु पूरी कर किस-किस गति को प्राप्त होते हैं ?
उत्तर :- सौधर्म इन्द्र सम्यग्दर्शन प्राप्त होने के प्रभाव से उसकी महादेवी इन्द्राणी, समस्त दक्षिण दिशा के इन्द्र चारों लोकपाल समस्त लौकान्तिक देव और सवार्थ सिद्धि के श्रहमिन्द्र अपनी श्रायु के क्षय होने पर वहां से चयकर महा पुण्याधिकारी मनुष्य भव धारण करते हैं। वहां पर वे पुरुष ही होते हैं। संसार के सुखों को भोगकर मुनिव्रत धारण कर तथा तपश्चरण कर केवलज्ञान पाकर मोक्ष जाते हैं। - अर्थात् ऊपर लिखे हुए सौधर्म इन्द्रादिक देव एक भवावतारी जीव हैं । एक मनुष्य भव धारण करके ही मोक्ष जाते हैं ।
दिशों के देव पांचों पंचोत्तरों के देव वहां से चयकर नारायण प्रतिनारायण पद को कभी नहीं पाते हैं । इस प्रकार तिर्यञ्च मनुष्य और भवनत्रिक के देव अपनी भायु के क्षय होने पर वहां से चयकर शलाका पुरुष कभी नहीं होते अर्थात् Patar तीर्थंकर बारह, चक्रवर्ती, नौ-नारायण, नौ बल भद्र और नौ प्रतिनारायण इन त्रेसठ शलाका पुरुषों की पदवी को कभी प्राप्त नहीं होते तथा विजयादिक विमानों में रहने वाले अहमिन्द्र तथा अनुदिशों के ग्रहमिन्द्र मनुष्य भव धारण कर मोक्ष जाते
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६५८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि हैं । अर्थात् वहां से चयकर मनुष्य होकर फिर विजयादिक में जन्म लेकर फिर मनुष्य होकर मुक्त होते है । सो ही मोक्षशास्त्र में लिखा है--
विजयादिषु द्विचरमाः ।। यही सब सिद्धांतसार प्रदीपक के पंद्रहवें अधिकार में लिखा है---- सौधर्मेन्द्रस्य दृष्ट्याप्ता महादेव्यो दिवश्च्युताः । सर्वे च दक्षिणेन्द्रा हि चत्वारो लोकपालकाः ॥२०६३॥ सर्वे 'लोकांतिका विश्वे सर्वार्थसिद्धि जामराः । निर्धारणं तपसा यान्ति संप्राप्य नृभवं शुभम् ॥२०६४॥ नयानुत्तरजा देवाः पंचानुत्तर वासिनः । सतश्च्युत्वा न जायते वासुदेवा न तद्विषः ।।२०६५॥ तिर्यञ्चो मानवाः सर्वे भावनादि निजामराः । शलाकाः पुरुषाः जातु न भवन्त्यमराचिता ॥२०६६।। विजयादि विभानेभ्योऽहमिन्द्रा गत्य भूतलम् । मयंजन्मद्वयं प्राप्य ध्रुवं गच्छन्ति निर्वृत्तिम् ।।२०६७।। प्रश्न- इस मध्यलोक में जंबूद्वीप से लेकर स्वयंभूरमण समुद्र तक काल चक्र
का बर्ताव किस प्रकार है अर्थात् सुखमा-सुखमा प्रादि छह कालों
में से कौन-कौन काल कहां बसता है ?
उत्तर :---डाई द्वीप के पंचमेरु सम्बन्धी पांचों भरत क्षेत्र और ; पांचों ऐरावत क्षेत्रों में अनुक्रम से उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के छहों कालों का बर्ताव रहता है अर्थात् अवसापिणी काल का पहला दूसरा तीसरा चौथा पांचवां छठा तथा उत्सपिरणी काल का छठा, पांचथां, चौथा, तीसरा, दूसरा, पहला इस प्रकार इन दशों क्षेत्रों में काल चक्र बराबर फिरता रहता है तथा इन्हीं कालों के द्वारा उनमें वृद्धि ह्रास सदा होता रहता है । इसी प्रकार समस्त विजयार्द्ध पर्वतों पर तथा प्रत्येक क्षेत्र के पांचों म्लेच्छ खंडों में सदा चौथा काल रहता है। उसमें भी इतना अन्तर है कि विदेह क्षेत्र के विजयादों को छोड़कर बाकी के भरत ऐरावत सम्बन्धी दशों विजयाओं में चतुर्थकाल होनाधिक रूप से रहता है । अर्थात् उनमें तीर्थ करों की आयु . काय की समान होनाधिकता होती रहती है। पहले तीर्थ कर के समय पांच सौ धनुष का पारीर और एक करोड़ पूर्व की आयु वाले विद्याधर होते हैं । तथा अन्तिम तीर्थ
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अध्याय : दसवां ]
[ ६५६ कर के समय एक धनुष का शरीर और एक सौ बीस वर्ष की आयु बाले विद्याधर होते हैं । बाकी के विदेह क्षेत्र सम्बन्धी एक सौ साठ विजयार्द्ध निवासी विद्याथरों की प्रायु काय उत्कृष्ट श्री सीमंधर स्वामी के समान सदा रहती है। वहां की प्रायु काय हीनाधिक नहीं होती।
विदेह क्षेत्र की एक सौ साठ नगरियों में तथा पंच मेरु सम्बन्धी दश कनकाचल पर्वतों पर सदा मोक्ष मार्ग का प्रवर्तक चौथा काल रहता है अर्थात् इन क्षेत्रों में कभी दूसरा काल नहीं बदलता सदा चौथा काल ही रहता है। पांचों मेरु पर्वत की दक्षिरण उत्तर दिशा की ओर जो देवकूर और उत्तरकुरु की दश भूमियां हैं, जिनमें सदा उत्कृष्ट भोगभूमि रहती है, उसमें संदा पहला काल ही रहता है। पांचों मेरु सम्बन्धी पांचों हरिक्षेत्रों में तथा पांचों रम्यक क्षेत्रों में समा मध्यम भोग भूमि रहती है और सदा दूसरा काल रहता है। इसी प्रकार पांचों हैमवत क्षेत्रों में और पांचों हैरण्यवत क्षेत्रों में सदा जघन्य भोगभूमि रहती है । और सदा तीसरा काल रहता है । मानुषोत्तर पर्वत से आगे नागेन्द्र नाम के पर्वत तक मध्य के असंख्यात द्वीप समुद्रों में सदा जघन्य भोग भूमि की रचना के समान तीसरा काल रहता है । नागेन्द्र पर्वत से भागे स्त्रयंभूरण नाम के अंत के द्वीप के प्राधे क्षेत्र में सदा पांचवां काल रहता है। इस प्रकार मध्य लोक में काल की किरन का स्वरूप है । सो ही सिद्धान्तसार दीपक के नौवें अधिकार में लिखा है--
भरतरावतक्षेत्रेषु सर्वेषु द्विपंचसु । द्विषटकालाः प्रवर्तन्ते वृद्धि ह्रासयुताः सदा ॥२०६८॥ विजयाद्ध नगेश्वत्र म्लेक्षखडेषु पंचसु । चतुर्थकाल एवास्ति शास्वतो निरुपद्रवः ॥२०६६।। कितु चतुर्थकालस्य यदा स्माद्भरतादिषु । श्रायुः काय सुखादीनां वृद्धिः ह्रासाश्च जन्मिनाम् ॥२०७०॥ तवा तेल समः कालो वृद्धि हासयुतो भवेत् । रूप्यादिम्लेच्छ खण्डेषु शेषकालश्च न पवचित् ॥२०७१।। पूर्वापर विदेहेषु द्विपंच स्वर्ण पर्वते । । चतुर्थकाल एवैको मोक्षमार्ग प्रवर्तकः ॥२०७२।।
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६६० }
[ गो. प्र. चिन्तामणि देवोत्तर कुरुष्वेव द्विपंच . भोगभूमिषु । दक्षिणोत्तरयो मेरौ प्रथमः काल कजितः ॥२०७३।। हरिरम्य · वर्षेषु · मध्यमा भोगभूमिषु । वृद्धि हासातिगः कालो द्वितीयो मध्यमो मतः ॥२०७४। हैमवताख्य हैरण्य . वत्क्षेत्रेषु द्विपंचसु.. । तृतीयः शाश्वतः कालो जघन्य भोग भूमिशु ॥२०७५।। तिर्यग्द्वीपेष्ब संख्येषु मानुषोत्तर पर्वतात् । बाह्यस्थेष्वन्तरे स्थेषु नागेन्द्र शलतः स्फुटम् ।।२०७६॥ । जघन्य भोग भूभाग स्थिति युक्त षु वर्तते । जघन्य भोग भूकर्ता नित्यकाल स्तृतीयकः ॥२०७७॥ नागेन्द्र पर्वताद्वाह्य स्वयंभूरणार्णवे । स्वयंभूरमण द्वीपाद्ध कालः पंचमोऽव्ययः ॥२०७८।। इस प्रकार काल का निर्णय है । प्रश्न :-- मौनव्रत से भोजन न करना सदोष बतलाया सो मौन कहां-कहां
धारण करना चाहिये ? उत्तर :--लघुशंका (पेशाब करते समय), दीर्घशंका जाते समय (शौच जाते समय), स्नान करते समय, पंच परमेष्ठी की पूजन करते समय, स्त्री संभोग करते समय, भोजन करते समय और सामायिक आदि. जप वा ध्यान करते समय इन सात स्थानों में मौन धारण करना चाहिये । सो ही लिखा है-.
हवनं मूत्ररखं स्नानं पूजनं परमेष्ठिनाम् । भोजनं सुरस्तोत्रं कुर्यान्मान समन्वितः ॥२०७४।।
इन सात स्थानों में मौन धारण करना चाहिये इनके सिवायं जहां पर बचन बोलने से राग वा द्वेष उत्पन्न होता हो, वहां पर भी मौन धारण करना योग्य है। लिखा भी है
दोषवादे च मौनम् । इस प्रकार आठ स्थानों में मौन धारण करना चाहिये । । प्रश्न :-छठे काल में मनुष्य कैसे होंगे तथा उनका व्यवहार कैसा होगा? उत्तर-छठे काल का नाम दुःखमा-दुःखमा है । वह इक्कीस हजार वर्ष का
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अश्याय : दसवां ।
है, उसके प्रारम्भ में मनुष्य धुएं के रंग के होंगे दो हाथ ऊचे होंगे । बन्दरों के समान नग्न होंगे । उनको उत्कृष्ट आयु २० वर्ष होगी । एक दिन में अनेक बार भोजन करेंगे मांस भक्षी होंगे। उनके निवास बिलों में होंगे। उस समय नगर, पुर, गांव आदि की रचना नहीं रहेगी। उनका स्वभाव दुष्ट होगा । नरक वा तिर्यञ्च गति से आये हुए ही वहां पर उत्पन्न होते हैं। अपनी माता भगिनी पुत्री आदि स्त्रियों के साथ ही पशुओं के समान काम सेवन करेंगे। तथा अपनी आयु के अन्त में मरकर तिर्यञ्च वा नरक में ही उत्पन्न होंगे । इस प्रकार छठे दुःखमा-दुःखमा काल में दुराचारी, महापापी मनुष्य होंगे और वे घोर दुःखों के भोगने वाले होंगे । उस समय बादलों में पानी नहीं रहेगा, पृथ्वी के वृक्षादिक वनस्पतियों में कोई रस स्वाद नहीं रहेगा। मनुष्य स्त्रियां सब निराश्रय रोगी उस छठे काल के अन्त में मनुष्य की ऊंचाई एक हाथ की होगी । वे बहुत कुरुप होंगे । उस समय उत्कृष्ट श्रायु सोलह वर्ष को होगी । तथा शीत ऊष्ण की बाधा से वे बहुत ही पीडित. होंगे सो ही सिद्धान्तसार दीपक के नौवें अधिकार में लिखा है
अस्थायी मार्गाभा गर जस्तोः । शाखामृगोपमा नग्ना वर्षविशतिजीविनः ॥२०१०।। मांसाचाहारिणोनेक वाराशिनो दिन प्रति । बिलादिधासिनो दुष्टा आयान्ति दुर्गति द्वयात् ॥२०५१॥ मात्राविकाम सेवांधास्तिर्यक् नरक गामिनः । भविष्यन्ति दुराचाराः पापिनो दुख भोमिनः ॥२०८२॥ तस्मिन्काले शुभातीते मेघाः स्वच्छ जला प्रदाः । स्वादु वृक्षोज्झिता पृथ्वी निराश्रया नरास्त्रियः ॥२०६३॥ कालस्यान्ते करकोच्चदेहा नरा कुरूपिरणः । उत्कृष्ट षोडशाब्दा घुष्काः शीतोष्णादिपोडिसाः ॥२०६४॥ प्रश्न :--एक दिन के दीक्षित मुनिराज को सौ वर्ष की दीक्षित भी अजिका
नमस्कार करे या नहीं ? उसर :--एक दिन के दीक्षित मुनिराज को सौ वर्ष की दीक्षित अंजिका अथवा अजिकाओं की गुर्वाणी गरिण अजिका भी नमस्कार करती है, इसका कारण यह
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[ गो. प्र. चिन्तामणि है कि एक दिन दीक्षित मुनिराज महाव्रती हैं और अजिका महाव्रती नहीं है, उसके उपचार से महानत हैं, साक्षात् नहीं हैं । इसलिये तुरत पाक्षित मुनि को अधिक दिनों की दीक्षित अजिका भी प्राकर नमस्कार करती है । सो ही नीतिसार में लिखा है--
महत्तराययिकाभिवंदते भक्ति भाविता। अधदीक्षितमप्याशुवतिनं शान्त मानसम् ॥२०१५॥
इसीलिये कहा है कि मोक्षाधिकारी स्त्री नहीं हैं और पुरुष है, स्त्री प्रायिका कितनी भी तपश्चर्या करे तो भी मोक्ष नहीं होता है ।
चर्चासागर से पं. वपा. प्रश्न :--वर्तमान समय में निश्चय एकान्त मत का प्रचार किसने किया?
उत्तर :--एक स्थानकवासी साधु अपने साधुपद में था। स्थानकवासी समाज ने मिलकर अपने समाज से उस साधु को अपमानित सा निकाल दिया ! वहां से वह सोनगढ़ आये और कितने ही दिन वहां रहे। उसके बाद दिगम्बर आम्नाय में कुछ पंथों के झगड़ों को देखकर दिगम्बर आम्नाय में आये और मात्र प्राचार्य कुन्दकुन्द के साहित्य को लेकर, ऊपर से दिगम्बर अाम्नाय का चोला पहनकर एकान्त निश्चय मिथ्यात्व का प्रचार किया। प्रचार के लिये लोगों से द्रव्य एकत्रित करना शरू किया। अपने मत की प्रथम स्थापना. सोनगढ कहान पंथ के नाम से प्रसिद्ध किया। निश्चय एकान्त का लोगों को प्रवचन देना शुरू किया, प्राचार्य कुन्दकुन्द के समयसार को माध्यम बनाकर । अपने को आध्यात्मिक योगी प्रसिद्ध किया।
दिगम्बर अाम्नाय के कुछ श्रीमन्त सेठ लोग जाकर मिल गये और लोगों को रुपया दे देकर अपने पंथ में मिलाने लगे। कुछ दिगम्बर पण्डित लोग भी द्रव्य के लोभ से सोनमढ़ जाकर कहानजी स्वामी के पंथ का प्रचार करने लगे। इस काल में चारों तरफ इसी का बोलबाला हुअा। जब तक लोगों को मालुम नहीं पड़ा, तब तक खुब प्रचार हुआ । जब लोगों को कमी का पता चला तो दिगम्बर प्रास्नाय के लोगों ने विरोध शुरू किया। अब जो उस पंथ के समर्थक लोग थे, वे ही विरोध करने लगे।
प्रश्न :-विरोध किस कारण से हुआ ?
उत्तर :--अपने को तीर्थङ्कर बताना, सद्गुरु बताना, अपने को विदेह क्षेत्र से पाया बताना, ४ जीव विदेह क्षेत्र से पाये बताना । जिस समय कुन्दकुन्द स्वामी
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अध्याय : दसवां ] सीमन्धर भगवान के समवशरण में गये, तब अपने को (कहानजी), चम्पा बहन को, शान्ता बहन को, खेमजी भाई को साक्षात् सीमन्धर भगवान के समवशरण में मौजूद बताना, कुन्दकुन्द स्वामी से अपना साक्षात्कार बताना। मैं पागे जाकर तीर्थङ्कर होऊँगा, ऐसा बताना । चम्पा बहन को जाति स्मरण है, ऐसा बताना । आदि अनेक विपरीत बातों से विरोध हुप्रा । प्रश्न :--निश्चय एकान्त मिथ्यात्व सोनगढ़ पंथ में सिद्धान्त विरुद्ध क्या
क्या है ? उत्तर :-पुण्यात्रव की कोई क्रिया नहीं करना चाहिये, पाप की तरह पुण्य भी हेय है । उपादान रहे तो निमित्त स्वतः पा जाता है, इत्यादि कहना।
जो कुछ है सो निमय ही है, व्यवहार का भोक्षमार्ग में कोई कार्य नहीं होता, इसलिये व्यवहार हेय है कहना ।
बत, संयम, त्याग, तप, दान, पूजादि नहीं करना चाहिये, मात्र प्रात्मा का ध्यान करने से कल्याण होगा, ऐसा एकान्त से कहना ।
एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, ऐसा एकांत से कहना।
मोक्षमार्ग में निमित्तों का कोई कार्य नहीं, मात्र उपादान से ही कार्य की सिद्धि कहना ।
पञ्चम काल में कोई भावलिगी मुनि नहीं होते, होते तो द्रव्यलिगी ही होते हैं, ऐसा कहना !
जो कुछ होना है सो होकर ही रहेगा, पुरुषार्थ से कोई कार्य नहीं होता, ऐसा नियतिवाद को एकान्त से मानना ।
क्रमबद्ध पर्याय को मानना ।
मात्र आचार्य कुन्दकुन्द के शास्त्रों को ही महत्त्व देना, अन्य प्राचार्यों के शास्त्रों को नहीं मानना ।
शुभोपयोग की कोई क्रिया नहीं करनी चाहिये, उससे संसार बढ़ता है। जिनवाणी को परस्त्री कहना।
एकान्त से प्रात्मा को त्रिकाल शुद्ध मानना । मोक्ष जाने में पर्याय का कोई महत्व नहीं है, ऐसा कहना । आत्मा का कभी नाश नहीं होता, जो लोग दया धर्म को मुख्य कहते हैं, वे
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[ गो. प्र. चिन्तामणि अज्ञानी हैं, ऐसा कहना इत्यादि अनेक विपरीत मान्यताओं का प्रचार किया। .: कुछ मूर्ख अज्ञानी पण्डितों ने उसको खूब बढ़ावा दिया । कानजी ने अपने जीवन में किसी गुरु को नमस्कार नहीं किया, बल्कि गुरुषों की खूब निन्दा की और अपने लोगों से निन्दा कराई।
प्रश्न :-इसका फल क्या हुया ?
उत्तर :----अनन्त संसार और वर्तमान पर्याय में खूनी कैंसर रोग से ग्रसित हुए । अन्त में बम्बई जसलोक अस्पताल में प्रार्तध्यान से प्राण छोड़े और दुर्गति को प्राप्त हुए। अन्त समय में रंगमोकार मन्त्र भी किसी ने नहीं सुनाया और किसी भी तरह स्वामीजी बच जायं, उसके लिये नाना प्रकार की अशुद्ध दवाइयों का प्रयोग, अशुद्ध इजेशनों का प्रयोग, नाक आदि में नलियों का प्रयोग किया गया, तो भी नहीं बचे।
क्या यही समाधि है ? इसी प्रकार समाधि होती है ? साधारण श्रावक भी अन्त समय में समाधिपूर्वक मरण करता है, लेकिन कानजी स्वामी ४० साल तक अात्मा-आत्मा कहते रहे और मरण हुआ दुर्गति से। इन्होंने तो अन्तिम समय में समाधि भी नहीं की और मरण के बाद भी इनके भक्तों ने ३ दिन तक स्वामीजी की लाश को पड़ी रखी। उनके शव में असंख्यात जीवराशि की उत्पत्ति हो गई और फिर तीसरे दिन असंख्यात जीवराशि के साथ उनके शव को आग में डालकर जला दिया । यह दशा है एकान्त निश्चय मिथ्यादृष्टियों की और आत्मार्थियों की अहिंसा । अपने को मुमुक्षु कहलाने वाले सन्त ने अपने जीवन के अन्त में क्या पाया ? इसका थोड़ा सा भी कभी विचार नहीं किया । न अन्त समय में भावलिंगी मुनि ही बने, न समस्त परिग्रहों का ही त्याग किया, न अंत समय में आहार-पानी का ही त्याग किया।
प्रश्न :---क्या ये स्वामीजी दिगम्बर मुनि थे ?
उत्तर :-नहीं, ये तो न दिगम्बर मुनि थे और न श्वेताम्बर साधु ही रहे । ये तो अतोभ्रष्ट-ततोभ्रष्ट रहे ।
प्रश्न :--सोनगढ़ से निकलने वाला साहित्य कैसा है ?
उत्तर :- सोनगढ़ से निकलने वाला साहित्य ही निश्चय एकान्त मिथ्यात्व, का पोषण करने वाला है। सब साहित्य में विकार भरा हुआ है। जो भी उस साहित्य को पढ़ते हैं, वे सब एकान्ती बनकर आत्मा-प्रात्मा कहते हैं और दान
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अध्याय : दसवां में
पूजादिक सब क्रियानी को छोड़ बैठते हैं। दिगम्बर साधुनों के निन्दक बन जाते हैं । इन लोगों ने पूर्वाचार्यों कृत शास्त्रों को हटा-हटाकर कई मन्दिरों में अपना साहित्य भर दिया है। ये लोग प्रथमानुयोग, चरसानुयोग, करणानुयोग को नहीं मानते हैं और द्रव्यानुयोग के अनुसार ही स्वयं चलते और दूसरों को चलने का उपदेश करते हैं। इनका साहित्य दिगम्बर परम्परा से विरुद्ध है और पूर्वाचायों की लेखनी से विपरीत है। मात्र ईसाइयों की तरह पैसे के बल से अपना प्रचार कर रहे हैं। इसलिए इस सिद्धान्त का दिगम्बर परम्परा में कोई महत्व नहीं है । ये भी एक तरह के दिगम्बरा
प्रश्न :---जिनेन्द्र भगवान का नय चक्र कैसा होता है। मीथ्यात्विों
के लिए? उत्तर :-अत्यन्त निशित धारं दुरासदं जिननरस्य नय चक्रम् ।
खण्डयति धार्यमाणं मूर्धानं झटिति विग्यानाम् ।।२०१६॥ यह जिनेश्वर का स्यावाद चक्र (नयचक्र) महान कष्ट से प्राप्त होता है । इस चक्र की धार अत्यन्त पैनी होती है। इसको धारण करने वाला अत्यन्त शीघ्र मिथ्याज्ञान के अहंकार युक्त व्यक्तियों के मस्तक को विदीर्ण कर देता है। अर्थात् यह उनके मिथ्याज्ञान का क्षय कर देता है ।
संसार में ३६३ प्रकार की मिथ्या मान्यताओं वाले मूढ़ जीव अविवेक तथा मिथ्यात्व से प्रेरित हो अपनी प्रात्मा को कुगति में डालते हैं। तथा दूसरे भी अभोग प्राणियों को वे कुपथ में लगाते हैं। वे "अन्धे मुरु-लालची चेला". दोनों नरक में "ठेलम ठेला" यह कहावत चरितार्थ करते हैं।
एकांतवाद की महामारी जैन समाज में फैल रही है । और समाज का अहित कर रही है । एकांतवादी वर्ग को स्याद्वाद चक्र की शक्ति को स्मरण कर विवेक से काम करना चाहिए। मिथ्यात्वी के पतन की बात उनके ध्यान में रहनी चाहिए।
__ . एकांतवादी लोग अनेक प्रकार की कपोल कल्पित आगम बाधित बातों का प्रचार कर मिध्या ज्ञान की ओर जनसाधारण के मन को मोड़ा करते हैं । हमने कुछ प्रश्नों का उल्लेख कर उस सम्बन्ध में आगम की दृष्टि समाधान रूप में प्रस्तुत की है । जैनधर्म के रहस्य को समझने के लिए स्याद्वाद दृष्टि का अवलम्बन लेना
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[ गो. प्र. चिन्तामणि बुद्धिमत्ता है । वही सच्चा मार्ग है। एकांत पक्ष कुगतिप्रद है। यह जिनेश्वर का स्याद्वाद चक्र एकान्तवाद का नाश करता है।
शंका :-कानजी पंथी मंडली में अनेक अद्भुत बातें प्रचलित होती रहती हैं। वहां कहा जाता है कि कुन्दकुन्द स्वामी विदेह गये थे तथा सीमंधर तीर्थंकर की दिव्य वाणी सुनने के पश्चात् समयसार रूप श्रेष्ठ शास्त्र उन्होंने बनाया । इससे एकांतवादी वर्ग उस महाशास्त्र को ही अपनी सर्वोच्च निधि मानते हैं। तथा अन्य शास्त्रों के प्रति हीनता की भावना रखा करते हैं।
समीक्षा :–कुन्दकुन्द स्वामी विदेह गए या नहीं। इस चर्चा से यहां प्रयोजन नहीं है। प्राचीन शिलालेखों में कुदकुद स्वामी की तरह पूज्यपाद स्वामी के विदेह गमन की चर्चा है। श्रवणवेल गोल के १०२ नं. के शिला लेख में पूज्यपाद स्वामी के बारे में कहा है । "देवयूजित!" वे देव पूजित थे ।
विदेह-जिनदर्शन पूतगात्र :--विदेह के जिनेश्वर के दर्शन से उनका शरीर पवित्र हो चुका था, अप्रतिमौषद्धि :-लोकोत्तर औषधि ऋद्धि से वे युक्त थे । यत्पाद धौतजल स्पर्शात कालायसं किस सक्ष कनक, वकार को करण के सालिन से प्राप्त जल के स्पर्श द्वारा लोहा स्वयं हो जाता था, इससे यह प्रतीत होता है । उस पुरातन युग में विशेष सिद्धि सम्पन्न अनेक साधु रत्न हो गये हैं। जिनका हमें पता नहीं है । पूज्यपाद स्वामी की श्रेष्ठ श्रुत सम्प्रति का बोध उनको अध्यात्मिक रचना इष्टोपदेश समाधि शतक के सिवाय सर्वार्थसिद्धि, जैनेन्द्र व्याकरण आदि से होता है। अतः विदेह गमन करने से प्राप्त महत्ता कुदकुद स्वामी के समान- पूज्यपाद महर्षि को भी प्राप्त होती है। और उनकी रचनाओं को भी विशिष्टता ध्यान में पाती है। यह बात विशेष चिन्तनीय है कि समयसार यदि विदेह यात्रा के पश्चात् रचित होता तो. कदक द स्वामी उस प्रथ को सुतकेवली भरणीय अर्थान्त श्रत केवली कथित न कहते । उन्होंने समयसार के मंगलाचरण में कहा है :
"वोच्छामि समय पाहुड मिणमो सुय केवली भरिणयं ।।११
मैं (कुदकुद) भुत केवली (भद्रवाहुगुरु) कथित समयसार को कहता हूँ। केवली शब्द के पूर्व में "थत" शब्द सर्वज्ञ केवली का निराकरण करता है। जैसे । घोड़ा शब्द के पूर्व यदि सफेद विशेषण लगा हो तो उससे श्याम वर्गीय अश्व का । निराकरण हो जाता है। परोक्षज्ञानी व तकेवली प्रत्यक्षज्ञानी केवली से भिन्न हैं।
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अध्याय : दसवां ]
[ १६७ शंका :-कुदकुद स्वामी ने छन्दशास्त्र को कठिनतावश अ सकेवली शब्द
का उपयोग किया ? समाधान :-यदि काव्य शास्त्र की कठिनाई थी, तो वे केवलि सुयकेवली भरिणय शब्द का प्रयोग कह सकते थे। नियमसार के मंगलाचरण के अनुसार वे उपरोक्त रूप में कह सकते थे। नियमसार में उन्होंने कहा है :
"वोच्छामि नियमसारं केवलि सुयकेवलि भरिणदं"
इससे इस बात की असत्यता स्पष्ट हो जाती है । जो कानजी महोदय कहा करते हैं कि समयसार साक्षात् तीर्थकर की वाणी सुनने के बाद रचा गया है । सम्यक् चिंतन इस कथन को झूठा प्रमाणित करता है ।
कानजी पंथी पत्र "प्रात्मधर्म' में छपा था कि कुदकुद स्वामी विदेह गये थे। तब कानजी "राजकुमार" की पर्याय में समवसरण में थे, (विदेह में शरीर की ऊँचाई ५०० धनुष होती है । अतः वे राजकुमार उतने ही उकच शरीर के रहे होंगे) समवशरण में अनेक अंगपूर्व के ज्ञाता, अनेक ऋद्धिधारी महामुनि आदि भी ये कि राजकुमार की कुदकुद स्वामी पर ही विशेष दृष्टि रही पाई । "आत्मधर्म" पत्र कहता है । "कुदकुद प्राचार्य बहां आठ दिन ठहरे थे।
समीक्षा:-साक्षात तीर्थकर का सानिध्य पाकर भरत क्षेत्र से विदेह जैसे सुदूरवर्ती प्रदेशों में पहुँचकर केवल पाठ दिन पर्यंत वहां आवास कर कुदकुद स्वामी का शीघ्र भरत क्षेत्र को वापिस लौट पाने का कथन यह ध्वनित करता है कि कानजी बाबा की बात सत्य की कसौटी पर कसने लायक नहीं है । कसौटी पर सोना कसा जाता है । टीन का टुकड़ा नहीं। कोई भी समझदार आदमी सोच सकता है । कि श्रेष्ठ प्रात्म कल्याण के साधन को पाकर विवेकी व्यक्ति अधिक से अधिक काल यापन कर स्वहित संपादन करता है। दक्षिण भारत के यात्रा करने वाले साधु जब शिखरजी पहुँचते है। तो वे वहां अधिक से अधिक समय देने का प्रयत्न करते हैं । संघ के संचालक का गृहस्थ होने के कारण कदाचित शिखरजी में अधिक रुकना सम्भव भी न हो किन्तु विदेह में रुकने में कोई भी बाधा नहीं थी। करण कोई संघ संचालक नहीं था। मुनीश्वर होने से कोई लौकिक झंझट भी नहीं हो सकती।
गहरा माया जाल :- यदि कानजी बाबा को विदेह में अपनी राजकुमार
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[ गो. प्र. चिन्तामणि पर्याय, चंपाबहिन आदि का उनकी स्त्री होना स्मरण है । तो यह भी तो स्मरण होगा ff froraft की भाषा प्राकृत अपभ्रंश थी या वह अनक्षरी थी ? कितने बार दिव्यध्वनि खिरती थी, मुख्य प्रश्नकर्ता गृहस्थ का क्या नाम था ? मुख्य गणधर कौन थे ? face के लोगों की ऊंचाई भोजन आदि के बारे में भी जातिस्मरण उद्बोधन करा देता । इस विषय में वे चुप हैं । श्रतः जाति स्मरण आदि की बात शत-प्रतिशत असत्य तथा कल्पना जाल मात्र है।
तीर्थंकर सीमंधर भगवान की दिव्यध्वनि को सुनकर श्रात्म ज्ञान प्राप्त करने वाला सम्यक्त्वी नियम से स्वर्ग जाता कारण अविरत गुणस्थानवर्ती सम्यक्त्वी मनुष्य मरण कर स्वर्ग ही जाता है । यदि उसने आयु बंध नहीं किया है । मनुध्यायु का बंधक मानव मरकर भोगभूमि का मनुष्य होता । तथा सौराष्ट्र में जन्म धारण नहीं
करता ।
यह बात भी विचारणीय है कि विदेह में दीर्घायु मनुष्य होते हैं । जिनकी एक कोटि पूर्व प्रमाण श्रायु श्रागम में कही है । श्राचर्य है कि दो हजार वर्ष के भीतर ही तथा कथित राजकुमार ( वर्तमान स्वामीजी ) विदेह से यहां मररणकर कैसे आ गये ? शिष्या चंपाबेन का भी शीघ्र मरगा विदेह में कैसे हो गया ? यह याद है क्या ?
यह भी सोचना चाहिये कि तीर्थंकर के चरणों के समीप तत्त्वज्ञान रूप श्रमृतपान करने वाला जन्म से सम्यत्वहीन परिवार में कैसे उत्पन्न हुआ और कैसे बहुत समय तक मिथ्या साधु बनकर उस जीव ने धर्म के विपरीत प्रचार किया ? यदि पूर्व के ऊच्च संस्कार होते तो वह व्यक्ति इन्द्रियों की दासता को छोड़कर हीन प्रवृत्ति त्यागरूप सदाचार को अवश्य ग्रहण करता ।
उदाहरणार्थ प्राचार्य शांतिसागर महाराज पूर्व भव के ऊच्च संस्कारी थे । इससे बचपन से ही उनके मन में वैराग्य के भाव विद्यमान थे और वे दीक्षा लेकर मुनि बनना चाहते थे । यद्यपि अपने पिता श्री भीममौड़ा पाटील के कहने से बहुत समय तक गृह त्याग नहीं कर सके थे ।
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कानजी पंथी वर्ग में मिथ्या बातें प्रचारित की जाती है । जिससे उनके पथ का अधिक प्रचार हो ।
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अध्याय : दसवां 1
[ ६६९ आत्म धर्म के कानजी (८७वीं) जयंती अंक में अनेक असत्य बातों का वर्णन पढ़कर आश्चर्य होता है कि अपने मिथ्या प्रेरित पक्ष को पुष्ट करने के लिये किस प्रकार माया तथा असत्य का आश्रय लेते हैं । कानजी अपने भक्तों से कहते हैं मेरा यह भव तीर्थकर प्रकृति का बंध होगा" साक्षात् तीर्थकर भगवान के समवशरण में चंपा बहिन ने यह बात सुनी है। गुरुदेव ने चंपा बहिन से कहा बहिन यह हकीकत सत्य है । मुझे भी कई बार ऐसा भास होता था उसका स्पष्ट हल नहीं मिलता था ।
उसका अर्थ समझ में पाया कि मैं तीर्थकर का जीव हैं।
वे अपने जीवन के बारे में बताते हैं । १७ वर्ष की उमर में रामलीला देखकर उनके हृदय में वैराग्य की मस्ती चढ़ गई। विक्रय संवत् १९७८ में ज्येष्ठ कृष्णा अष्टमी के दिन स्वाध्याय कर के वे लेटे तो ओंकार ध्वनि का नाद व साढ़े बारह करोड़ बाजों की ध्वनि का स्मरण हुआ । पृष्ठ १८ । "तीर्थंकर के साथ" लेख में एक भक्त इस प्रकार स्तुति करता है । उनका वर्तमान जीवन देखों, तो चैयन्य भगवान की भनक से भरा है । उनका भावी जीवन देखो तो भगवान से सम्बन्धित । यदि हम ज्ञान को मात्र चार भव तक लम्बाकर देख सके तो हमें गुरुदेव के बदले में साक्षात् "सूर्य" के समान तेजस्वी तीर्थंकर के दर्शन होते हैं (पृष्ठ २४) एक अविवेकमति भवत लिखता है । "अनन्त तीर्थकर हो गये, मगर अपने दो गुरुदेव श्री सबसे अधिक है।" पृष्ठ ४२ । प्राजकर अनेक व्यक्ति स्वयं को भगवान कहकर अपनी पूजा करवा
यदि पाठक गहराई से सोचे तो उपरोक्त बातें मोह रूपी मदिरा पीने वालों के सदृश हैं। मिथ्यात्व का प्राश्रय लेने वाला, मिथ्यात्व का प्रचार करने वाला एकांतवादी का प्रागामी भव अंधकार पूर्ण ज्ञात होता है । इस प्रसंग में महापुराण का यह कथन वस्तु स्थिति को समझने में विशेष लाभप्रद रहेगा । भगवान ऋषभदेव दशभव पूर्व महाबल नाम के राजा थे उनके ४ मंत्री थे प्रागम पक्ष का समर्थक स्वयंबद्ध मंत्री कुछ ऊच्चभव धारण कर मोक्ष गये । मिथ्यात्व का समर्थन करने वाले महामति और सभिन्नमति मंत्री द्वय निगोद में गये। शतमति मिथ्यात्व के परिपाक से नरक गया। "गत: शतमतिः श्वभ्र मिथ्यात्व परिपाकतः ।" (१०-८) इस संबंध में महाकवि जिनसेन स्वामी कहते हैं---
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६७.]
[गो. प्र. चिन्तामणि समस्यंधे निमज्जति सज्ज्ञान द्वषिणो नरा। प्राप्तापलं मतीज्ञानं बुधान्यस्येदं प्रतारतम् ॥२०८७११ सम्यग्ज्ञान के द्वेषी व्यक्ति नरक रूपी माढ़ अंधकार में निमग्न होते हैं ।
इसलिये बुद्धिमान पुरुषों को प्राप्त प्रतिपादित सम्यग्ज्ञान का सदा अभ्यास करना चाहिये । दश कोडा-कोडी सागर के अवपिसही काल में भरत क्षेत्र से अगरिणत मुनि मोक्ष गये किन्तु २४ ही आत्माओं ने तीर्थंकर प्रकृतिरूप महान पुण्य का बंधकर रत्नत्रय की समाराधना कर मोक्ष प्राप्त किया, कुन्द-कुन्द स्वामी के तीर्शकर होने का उल्लेख नहीं है। केवल मोक्ष जायेंगे। यह भी ज्ञान नहीं है। किन्तु मिथ्यात्व की मदिरा पान करने वाले पिलाने वाले मोक्ष जायेंगे और अगले भव में तीर्थंकर प्रकृति का बंध करेंगे । यह कथन असत्य की पराकाष्ठा हैं वे भव्य है । या अभव्य है। यह सर्वज्ञ देव ही बता सकेंगे । मिथ्या गार्ग प्रचारक राजा वसु के पतन के प्रकाश में इस समस्या का सच्चा समाधान मिलेगा।
निश्चयनय रुप पवित्र दृष्टि को धारण करने वाली प्रात्मा मोक्ष
जाती है । समयसार में कहा हैपिच्छप शयासिदा पुण मुरिगणो पावति शिवारणं ।
॥२७२३॥ निश्चयनय का माश्रय लेने वाले मुनिमरण निर्वाण प्राप्त करते हैं । निश्चयनय प्रात्मा को शुद्ध मानता है । अबद्ध मानता है। व्यवहार दृष्टि अपरमभाव वालों। के कहो है । परमभाव वाले शुक्लध्यानी निश्चय दृष्टि का अवलम्बन ले सिद्ध पदवी पाते हैं । हम कानजी पंथी निश्चनय की चर्चा करते हैं। उसका निरूपण करने वाले परम पागम रूप समयसार को पढ़ते हैं। आप भी तो निश्चयनय को हमारे समान पूज्य मानते हैं । समयसार ग्रंथ को भी ग्रंथराज स्वीकार करते हो। तब आप हमारे विरुद्ध हो हल्ला क्यों मचाते हो ?
___ यह बात पूर्ण सत्य है कि निश्चयनय की दृष्टि मोक्ष प्रद है। किन्तु यह सत्य भी आपको शिरोधार्य करना चाहिये कि निश्चय दृष्ठि के पूर्व व्यवहार नय की भी आवश्यकता है। शक्ति की अपेक्षा आप प्रात्मा को शुद्ध, प्रबद्ध कहते हैं । इसमें कोई आपत्ती नहीं है । किन्तु आप अपनी वर्तनान अशुद्ध , बद्ध संसारी गर्याय को
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अध्याय : दसवां ]
[६७१ अस्वीकार करते हैं । अतः आपकी मान्यता स्याद्वाद दृष्टि से बाधित होती है। हम सबका यह प्रत्यक्ष अनुभव है कि हम अल्पज्ञानी है । ज्ञान का एक अंश हमारे पास है । अज्ञान के सागर में हम डूबे हैं। हमारी शक्ति बहुत कम है। अनंत शक्ति का पता नहीं है । दुःखों से प्राक्रांत होने से यह हम कैसे कह दे कि हम सिद्ध भगवान के समान अव्याबाध अनन्त सुख भोगते हैं ? सर्वज्ञोक्त मागम पर विश्वास कर हम यह मानते हैं कि यदि हमारे ४ धातिया कर्मों का क्षय कर दिया तो हम अनंत ज्ञानी
आदि बन सकते है। अभी अनंत ज्ञानी महीं हैं शक्ति और व्यक्ति अर्थात् शक्ति का व्यक्त हो जाना इसमें अंतर है। आगम में कहा है सिद्ध भगवान के लोक के अग्रभाग में सिद्ध शिला के ऊपर विराजमान है। यदि हम संसार पर्याय सहित न होते, तो हम भी सिद्धों के समीप अशरीरी होकर निवास करते है
प्रागम सच्चे ज्ञान का केन्द्र है। वह जीव को संसारी और मुक्त दो प्रकार का मानता है। निश्चय दृष्टि संसार की बद्ध दशा का मुख्यता से निरुपण करती है । नियमसार में कुन्द-कुन्द स्वामी ने कहा है-----
सम्वे सिद्ध महावा सुद्धरण्या संसिदी जोया।
शुद्ध नय से सभी संसारी जीव सिद्ध स्वरूप हैं । व्यवहार नय की अपेक्षा जीव शुद्ध तथा अशुद्ध दो प्रकार के माने गये हैं । एकांत पक्ष सत्य शासन के विपरीत होता है और स्यावाद विरोधी है ।
यह एक दृष्टि है। दूसरी दृष्टि और है कि संसारी जीव शरीर युक्त है। मुक्त जीव शरीर रहित है । पंचास्तिकाय में कुन्द-कुन्द स्वामो यह भी कहते है ।
जीवा संसारत्था णिवादा चेदरणप्परगा दुबिहा ।। उवयोग वि य ही देहप्पवीचारा ॥२०७॥ ..
जीव दो प्रकार के हैं-एक संसारी, दुसरा सिद्ध । दोनों चैतन्य रूप हैं, उपयोग अर्थात् मानोपयोग, दर्शनोपयोग सहित है। देह सहित संसारी हैं। देह रहित
.
.
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टीकाकार अमृतचन्द्र सूरि ने लिखा हैजीवाः हि द्विविधाः संसारस्था अशुद्ध निबंताः शुद्धाश्च । कानजी पंथी कथन अनेकांत दृष्टि का प्रतिनिधित्व नहीं करने से सत्यशासन
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६७२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि के विपरीत हो जाता है। वह स्याद्वाद विरोधी है । समन्वय दृष्टि से पूर्ण सत्य का परिज्ञान होता है । बुद्ध ने वस्तु को अनित्य माना है । यह सत्यांश है । वह वस्तु के नित्य पक्ष को अस्वीकार करता है । इससे वह सत्य कथन भी असत्य हो जाता है । इसी प्रकार कानजी पंथ में व्यवहार को सर्वथा मिथ्या मानकर निश्चय पक्ष को ही मान्यता दी जाती है। इससे वह कथन स्याद्वाद विद्या के प्रकाश में असत्य हो जाता है ।
__ मनुष्य के दो नेत्र होते हैं। सीधी आँख फूटी हो तो वह काना है । बाई प्रांख फूटी हो तो वह भी काना होगा। जो नय व्यवहार पक्ष को ही सत्य मानकर निश्चय पक्ष को अस्वीकार करेगा, वह मिथ्यात्वी है । इसी प्रकार जो निश्चय को सत्य मान कर व्यवहारनय को मिथ्या मानेगा, वह भी मिथ्यात्वी है।
एकांत निश्चय को पकड़कर हम मोक्ष से दूर हो जायेंगे। कुन्द-कुन्द स्वामी की यह बात ध्यान देने योग्य है कि निश्चयनय भगवान को सर्वज्ञ नहीं मानता और यदि व्यवहारनय का कथन मिथ्या है तो सर्वश का लोप हो जायेगा तथा सम्पूर्ण जिनागम प्राप्त दारणी नहीं रहेगा ।
जारादि पस्सति सव्वं वबहारणयेग केवली भसवं। केवलवाणी जाणदि पस्सदि पियमेण अप्पारणं ॥२०॥
नियमसार--१७० केवली भगवान व्यवहारनय से सर्व पदार्थों को जानते हैं देखते हैं किन्तु निश्चयनय से केवली भगवान अपनी आत्मा को देखते हैं। इस प्रकार निश्चयनय सर्वज्ञ को अस्वीकार करता है।
स्थाद्वाद दृष्टि दोनों कथन सत्य हैं केवली भगवान सर्वज्ञ हैं। प्रात्मज्ञ भी हैं । एकांतवादी के द्वारा समस्या उलझ जाती है ।
विशेष बात :--यह बात ध्यान देने योग्य है। नियमसार में कहा है निश्चय दृष्टि से पुद्गल का परमाणु शुद्ध द्रश्य है ! उस दृष्टि में स्कन्ध का कोई स्थान नहीं है। व्यवहार की दृष्टि से स्कन्ध का सद्भाव माना गया है। यदि व्यवहार दृष्टि को अप्रमाण तथा झूठा माना जाय तो शून्यवाद प्रा जायेगा, कारण निश्चय दृष्टि से स्कंध का अभाव है और स्कन्ध का अभाव मानने पर उसके कारण रूप परमाणु का भी प्रभाव हो जायेगा: अतः सर्व झंझटों से बचने के लिए दोनों नयों की वास्तविकता स्वीकार करनी चाहिये।
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अध्याय : दसवां ]
[ ६७३ शंका :--कुछ भी कहो हमें तो निश्चय की कथनी में मजा आता है। व्यवहार
नय की बात हमें नहीं रुचती। निश्चयनय का पक्ष लेने से
- हमारी प्रात्मा का उत्थान होगा?
समाधान :-यह बहुत बड़ा भ्रम है। किसी भी दृष्टि के एकांत पक्ष से मोक्ष तो कदापि नहीं मिलेगा, यह सत्य हैं। पंचास्तिकाय की अन्तिम गाथा १७२ की टीका में अमृतचन्द्र सुरि ने कहा है। केवल व्यवहार दृष्टि वाला सत्कायों के करने के कारण दुर्गति से बचकर ऊच्चगति में जाकर सुखी रहेगा। निश्चयपक्ष का एकांतवादी अपने को पूर्ण शुद्ध समझ बैठे हैं । त्याग संयम सदाचार का उनको दृष्टि में कोई मूल्य नहीं होने से वे प्रभात की कादम्बरी (मदिरा) पान के फलस्वरूप "केवलपापमेव बध्नाति" केवल पाप का ही बंध करते हैं। इससे वे कुगति में जाकर दुःख भोगते हैं। सदाचार की बड़ी महत्ता है। यदि सम्यक्त्व रहित जीव भी हीनाचार का त्याग करता है, तो सदाचार के प्रभाव से वह नरक पशु पर्याय में नहीं जाता है । सकेला सम्यक्त्य' मोल नहीं देता है ! . . .
प्रवचनसार में कुदकुद स्वामी ने कहा है :सदहमारणो अत्थे प्रसंजयो का परिणदि ॥२३७।। तत्व श्रद्धान हो जाने पर भी असंयमी व्यक्ति मोक्ष नहीं पाता ।
चारित्र का चमत्कार :--कानंजी पंथी मंडली को यह बात नहीं भूलना चाहिए कि सम्यक्त्व से अकेला काम नहीं बनेगा। भरतेश्वर ने अन्तर्मुहूर्त में केवल ज्ञान प्राप्त किया था, यह सम्यक्त्वचारित्र का चमत्कार था। वे क्षायिक सम्यक्त्वी होने से गृहस्थावस्था में भी ज्ञानी थे, किन्तु उनके केवलज्ञान नहीं हुआ। जब परिग्रह त्याग करके उन्होंने शुक्ल ध्यान रूप चारित्र का आश्रय लिया तब कैवल्य का प्रकार उन्हें प्राप्त हो गया । अन्तर्मुहूर्त में कैवल्य प्रदान करने की क्षमता सम्यक्चारित्र में ही है । कहा भी है :
अनंत सुख सम्पन्न येनारमा क्षणावपि ।
नमस्तस्मै पवित्राय पारिनाय पुनः पुनः ॥२०८६॥ __यह आत्मा क्षरण मात्र में जिसके कारण अनंत सुख को प्राप्त होता है । उस पवित्र चारित्र (यथाख्यात चारित्र) को बारम्बार नमस्कार हो ।
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६७४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
शंका :-- ब्राश्चर्य है । आत्मार्थी सत्पुरुष पूज्य कानजी महाराज को स्वामी कहे जाने पर आप लोग ऐतराज करते हैं ? ऐसे ही हम लोगों को मुमुक्ष कहे जाने पर आप लोग प्राक्षेप क्यों करते हैं ?
समाधान :- " स्वामी" शब्द मालिक का पर्यायवाची है । दिगम्बर जैन धर्म में परिग्रह त्यागी इन्द्रियों को वश करने वाले मुनि को स्वामी कहा जाता है । स्वामी इन्द्रियों का दास नहीं होता है । जिसे इन्द्रियों ने अपना गुलाम बना लिया है। उसे स्वामी कहना ऐसी ही बात है जैसे दरिद्र व्यक्ति के पुत्र का नाम करोड़ीमल रखना अथवा सूरदास को नैनसुख नाम प्रदान करना । जब कानजी स्वयं अपने को व्रती संयमी कहते हैं । तब इन्द्रियों के सेवकों को उनको स्वामी अर्थात् इन्द्रियों का विजेता कहना उचित नहीं है । वैसे आपको अधिकार है। आप एक दूरी झोपड़ी को शौक से राजमहल कहे, मुमुक्षु का रहस्य "मुमुक्षु" शब्द का प्रयोग समंतभद्र स्वामी ने ऋषभनाथ भगवान के स्तन में किया है। जब उन्होंने नीलांजना के नृत्यं को देखकर विषयों से विरक्त हो, राज्य का परित्याग किया था । श्राशाधरजी ने सागार धर्मामृत में उस गृहस्थ के लिए भी मुमुक्षु शब्द का उपयोग किया है । जो हृदय में मुनि बनने की सच्ची कामना करता है । 'देशविरतिः खलु सर्व विरति लालसा ।" जहां जीवन संयम को सुवास से सम्पन्न न हो तथा विषय भोगों से छूटने के बदले में उसके जाल मे फंसने का ही निरन्तर काम चले वहां मुमुक्षु शब्द का उपयोग अद्भुत लगता है । यह हिंसक को दयासागर कहने सदृश वचन हैं । मुमुक्षु शब्द के चार भेद हो सकते हैं नाम, स्थापना, द्रव्य तथा भाव रूप से चतुविध मुमुक्षु हैं । व्रत नियम शून्य तथा सदाचार विरोधी व्यक्ति यदि श्रपने को मुमुक्षु कहते हैं, तो वे नाम मात्र के मुमुक्षु हैं। किसी वस्तु में मुमुक्षु की स्थापना करना, स्थापना मुमुक्षु है । जो व्यक्ति परिग्रह पिशाच के चक्कर से छूटकर जीवन में साधुत्व की भावना करते हैं, वे द्रव्य मुमुक्षु हैं । परिग्रह त्यागकर आत्म प्रकाश से जिनकी आत्मा अलंकृत है, वे भाव मुमुक्षु हैं ।
एक कमजोर आदमी है, जो बिना सहारे के बड़ा तक नहीं हो सकता, उसे पहलवान कहने सदृश संयम से डरने वालों तथा संयमी से भयखाने वालों को मुमुक्षु कहना | शब्द का गलत प्रयोग देखकर ऐतराज करना न्यायोचित बात है । इसमें विद्वेष नहीं है । इसके भीतर पवित्र सत्य विद्यमान है ।
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अध्यायः : दसवां ]
[ ६७५ शंका :-~-हमारे बारे में यह कहा जाता है कि हम लोग मुनि को नहीं
मानते । हम मुमुक्षु णमोकार मंत्र पढ़ते समय "रणमो लोए सन्च साहूण" पाठ पढ़कर सभी सच्चे भावलिमी मुनीश्वरों को प्रणाम करते हैं । वर्तमान मुनि धलिगी हैं; अतः हम उनको प्राराध्य नहीं मानते, कारण हमारे परम पूज्य कुदकुद भगवान ने 'दसरण पाहुड' में कहा है "दसरण होतो शिवो" (२) सम्यग्दर्शन
हीन व्यक्ति को नमस्कार नहीं करना चाहिये ? समाधान :-अंतरंग भावों का परिज्ञान केवली भगवान को होता है तथा मनः पर्यय ज्ञानी महर्षि मनोगत बात को जानते हैं। गृहस्थ के श्रु तज्ञान में दूसरे के सम्यक्त्व है या नहीं, इसको जानने की क्षमता नहीं है। मुनि जीवन के आधारभूत महाबत, दिगम्बर मुद्रा आदि को देखकर मुनिराज को प्रणाम करने का आगम में कथन है। जिनेश्वरी मुद्रा धारण करने वाले, नकली मुनि बनने वाले देव से सम्यक्त्वी उदयन ने धुणा नहीं की तथा उनको सच्चा साधु मान परिचर्या की । इससे सम्यकत्व के निविचिकित्सा अंग पालने वालों में राजा उद्दायन का उदाहरण दिया जाता है।
आदिनाथ भगवान पूर्व भव में ब्रजजंघ राजा थे । उनके सम्यक्त्व उत्पन्न नहीं हुआ था। उन्होंने अपनी श्रीमती रानी (जो आगे भत्र में महादानी राजा श्रेयांस हुई) के साथ चारण ऋद्धिधारी भावलिंगी मुनि युगल को आहार दिया था, जिससे पंचाश्चर्य हए थे।
उदायन राजा के कथानक में दाता सम्यक्त्वी था, पात्र सम्यक्त्वी नहीं था। मुनि मुद्रा का सम्यक्त्वी राजा ने सम्मान किया। इस प्रकार अाज भी अपने को सम्यक्त्वी मानने वाला यदि जिन मुद्राधारी साधु को आहार देता है, तो उसके सम्यक्त्वी पने पर संकट का पहाड़ नहीं टूटेगा। ..
वज्रजंघ राजा का कथानक यह बताता है, कि भावलिंगी ऋद्धि मुनि युगल ने द्रव्यलिंगी गृहस्थ के द्वारा प्रदत्त श्राहार लिया था। राजा ब्रजजंघ के सम्यक्त्व नहीं था, ऐसा महापुराण में कहा है। श्रावक का प्राचार व्यवहार, धर्मातुसार होना चाहिए। उसके अन्तरंग भाव के आधार पर लोक व्यवस्था नहीं बनती । उपशम तथा क्षयोपशम सम्यक्त्व प्रसंख्यात बार उत्पन्न होते हैं। ऐसा पागम है ।
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६७६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
इस काल में क्षायिक सम्यग्दर्शन नहीं होता है। इस कारण दातार या पात्र के भावों में अनेक बार सामस्व का पाना तथा जाना संभव है, इस बात को सीमंधर स्वामी सदृश महाज्ञानी जान सकते हैं। भरत क्षेत्र में उत्पन्न इस काल का व्यक्ति नहीं जान सकता। ऐसी स्थिति में आहार दान का क्या हाल होगा ? दातार का सम्यक्त्व अंतरंग से चल गया, तो दातार पाहार लेना बन्द कर देगा ? ऐसी व्यर्थ की झंझटों में स्वयं को डालना पाल्म कल्याण करने वाले विवेकी को उचित नहीं है।
चौथे काल की बात है । वारिषेण मुनि ने द्रश्यलिंगी मुनि पुष्पजल को अपने साथ रखकर बड़ो कुशलता पूर्वक उनको सच्चा मुनि बनाया था। इस कारण स्थिति करण नामक सम्यक्त्व के अंग में वारिषेण मुनि मान्य कहे गए हैं । द्रव्यलिंगी पुष्पजल मुनि को धार्मिक जन अाहार देते थे।
सुन्दर लाई-नन --कालिपी, गिी की जटिल समस्या का सुन्दर समाधान आशावर जी ने. सांगारधर्मामृत में इस प्रकार किया है.-~-पाधारणादि को प्रतिमाओं में जिनाकार होने से स्थापना निक्षेप द्वारा उन्हें जैसा पूजा जाता है तथा पूजक स्थहित सम्पादन करता है, उसी प्रकार वर्तमान में दिगम्बर मुनि मुद्राधारी साधु में पूर्वकालीन मुनियों की स्थापना कर आराधना करनी चाहिये । सागारधर्मामृत के शब्द इस प्रकार हैं
विन्यस्यैदं युगीनेषु प्रतिमाषु जिनानिय । भक्त्या पूर्व मुनीनचेत् कुतः श्रेयोति विनाम ।।
कुंद कुंद स्वामी ने दर्शन पाहुड में मार्मिक बात कही है---जो सहजोत्पन्न अर्यात दिगम्बर रूप को देखकर ईष्यविश आदर नहीं करता, वह संयम युक्त होता हुआ भी मिथ्यात्वी है । वह उपयोगी गाथा इस प्रकार है---
सहजुष्पण्णं रूवं दट्टे जो मण्णए रण मच्छरियो । सो संजम पडिवण्यो मिच्छा इट्ठी हवा एसो ॥२०६०॥
आगम कहता है पञ्चमकाल के अन्त तक अर्थात् आज से १८५०० वर्ष बाद तक भी दिगम्बर मुद्राधारी मुनि होंगे । वे अन्तिम मुनि समाधि सहित मरण करेंगे। उनको अवधिज्ञान प्राप्त होगा, ऐसा त्रिलोकसार तथा तिलोयपण्यत्ति में कहा है।
स्मरणीय---हमारे प्रात्मार्थी मुमुक्षु भाइयों को कुन्दकुन्द महर्षि के इन वचनों को विचारपूर्वक ध्यान से पढ़ना चाहिये, "असंजद ग वन्दे' ( २६ )- असंयमी की
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अध्याय : दसवां ] वन्दना न करे । कान की बाबा स्वयं को असमी कहते थे। वे अपने जीवन में संयम को आने भी नहीं देते थे । उनका वन्दनारूप कार्य सम्यक्त्व का पोषक है या विधातक है ? यह बात कान जो पयो प्रवक्ताओं तथा भक्तों को न्यायबुद्धि से सोचनी चाहिये।
कुन्दकुन्द स्वामी असंयमी को वन्दना का अपात्र कहते हैं और हमारे सोनगढ़ पंथी उनको गुरु नहीं, “सद्गुरुदेव", "जैनधर्म के प्रवर्तक" कहते हैं । कुछ भक्तजन उन कानजी बाबा के चरणों की छाप कपड़े में लगवाकर उसको पूजते हैं। कानजी बाबा को अन्धो भक्ति अद्भुत काम करातो हैं । एक कानजी पन्थी प्रचारक भगवान के अभिषेक प्राप्त जल को गन्धोदक न कहकर मन्दोदक--गन्दा पानी कहते थे और स्वयं कानजो बाबा के पैरों को धोने से प्राप्त यथार्थ में गन्दे पानी को अधिक मान देते थे। अद्भुत स्थिति है । भीलनी गजमुक्ता को फेंक देती है और गुजा (गोंगची) को बड़े प्रेम से अपनाती है । मिथ्यात्व का उदय बड़ी विचित्र बातें कराता है । कानजी पन्थी वर्ग को बाल ब्रहावारी उच्च तपस्वी दिगम्बर मुनि भी अनादर योग्य लगते हैं और उन्हें असंयमी व्यक्ति अधिक अच्छा लगता है । यह बुनि मिथ्यात्वी की होती है।
दिगम्बर मुनि विद्वेषी-सन् १६५६ की बात है । कुम्भोज बाहुबली पाश्रम में आत्मार्थी नामधारी सत्पुरुष छह-सात सौ यात्री ठहरे थे । वहां से करीब दो किलोमीटर पर सत्तानवे वर्षीय मुनि १०८ वर्धमानसागर महाराज (जो प्राचार्य शांतिसागर महाराज के ज्येष्ठ बन्धु थे) मन्दिरजी में थे ! बाहुबली प्राश्रम वालों ने कहा था, "स्वामीजी ! यहां समीप में महान् प्राध्यात्मिक मुनिराज वर्धमानसागर महाराज का दर्शन कीजिये ।" मुनि-विद्वेषी हृदय होने से उन लोगों ने उस जिन मन्दिर का ही दर्शन नहीं किया। साक्षात् मुनि को देखकर उनका अनादर करना और कल्पनागत मुनि को प्रणाम की बातें करना यह स्पष्ट करता है कि यथार्थ में उनके दिल में दिगम्बर मुनि के प्रति अान्तरिक विद्वेष विद्यमान था । परिग्रहधारी की पूजा और अपरिग्रहीं महान् योगियों का निरादर आन्तरिक दूषित मनोदशा को स्पष्ट करते हैं । इससे असली सम्यग्दृष्टि और मिथ्यात्वी का रूप पूर्णतया समझा जा सकता है। एक नीतिकार कहता है--
सर्प उस्यो तब जानिये, रुचि कर नीम चचाय । कर्म इस्यो सब जानिये, जिनवाणी न सुहाय ॥२०६१।।
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९७८ }
[ गो. प्र.चिन्तामणि
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दूषित भाय-एक विचारक व्यक्ति ने कहा था, "कानजी भक्तों द्वारा दिगंबर जैनों के गुरु के विरुद्ध प्रचार करने का प्रान्तरिक अभिप्राय दिगम्बर आम्नाय और संस्कृति पर भीतर से प्रहार करना है । लड़-झगड़कर यह काम नहीं होगा। पीटा विष है, जो संस्कृति के प्राणहरणार्थ खिलाया जा रहा है।"
दिल्ली के एक जौहरी जैन भाई ने मजेदार बात कही थी कि कानजो पंथी या अन्य भक्त सोनगढ़ के संयम-शून्य बाबा के पास आकर आज्ञा-प्रधानी बनते हैं और दिगम्बर जैन सच्चे वीतरागी मुनियों के पास परीक्षा प्रधानी बनने की बात करते हैं। ये लोग दूरवीक्षण यन्त्र (Telescope) द्वारा पानी के कीड़े देखना चाहते हैं और सूक्ष्मदीक्षरण यन्त्र (Microscope) द्वारा नक्षत्रों का दर्शन करने की इच्छा करते हैं । फल यह होता है कि वे अविवेकवश वस्तु के यथार्थ रहस्य से वंचित होते हैं।
एक बार प्राचार्य सम्राट महावीरकोर्ति महाराज के पास कुछ अध्यात्मपंथी पहुंचे थे। दि. मुनियों के विरुद्ध उनसे घंटों बहस की, विद्वान साधु की एक भी बात उनके हृदय में नहीं घुसी। इसका एक कारण है ये लोग अपनी अपनी सुनाने की कला में प्रवीण हैं, दूसरे की सुनने की आदत नहीं है। इसी कारण इनके उपदेशों में शंकाकारों को उत्तर नहीं दिया जाता, और ये दूसरे पक्ष के प्रवचनों में प्रश्न करने को तत्पर होकर सभा भंग करने का प्रयत्न करते हैं । एक प्रांत के मुख्य मंत्री बहिरे थे जब काम की बात होती थी, तब वे कान में श्रवण यंत्र लगाकर बातें सुना करते थे, और जब मतलब की बात नहीं रहती थी, तब उस श्रवण यंत्र को दूर रखकर अभिनय करते थे।
महावीर कीति महाराज ने उन प्रश्नकर्तामों से अन्त में पूछा मुनि की परीक्षा करना चाहते हो । बताओं साधुओं के २८ मूलगुरण कौन कौन हैं ? वे चुप हो गये और वहां से चले गये । यह दुर्भाग्य की बात है कि निरंतर साधु निन्दा का उपदेश-सुनते सुनते एकांतवादी इस जमाने में भी अपूर्व व्यक्त्वि सम्पन्न महापुरुष के अंत सौन्दर्य को सोचने में असमर्थ हो जाते हैं ।।
उदाहरणार्थ कोल्हापुर के समीपवर्ती गलतमा स्थान के मुनि सिद्धसेन महाराज का जीवन बड़ा सौरभ पूर्ण तथा पवित्रता समलंकृत है। गृहस्थावस्था में वे मैसूर विधान सभा के यशस्वी सदस्य थे। धन धान्यादि से सम्पन्न थे । वे अंग्रेजी में। सुन्दर भाषण देते थे । पचासों प्रतिष्ठायें उन्होंने बिना भेट लिये कराई । महान्
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अध्याय : दसवां ]
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शास्त्रज्ञ मुनि होते हुये अहंकार का लेश भी उनमें नहीं देखा जाता, जनवरी १९७६ में शिखरजी यात्रा से लौटते हुये वे सिवनी पधारे थे ।
"उनके बारे में 'आचार्य कल्प' शब्द का प्रयोग जब मैंने (पंडित सुमेरचंद जी दिवाकर ने ) किया तब उन्होंने मुझसे कहा "Pandit ji I am an infant only. Dont Praise me highly”-- पंण्तिजी, मैं तो बच्चे के समान रूप हूँ | मेरी बड़ी स्तुति नहीं कीजिये । पचहत्तर वर्ष के होते हुये भी वे मूलाचार प्रतिपादित मुनि अवस्था के frent का बड़ी सावधानी से पालन कर रहे थे। ऐसी अनेक विभूतियों के होते हुये भी एकांतवादी चश्मे वाले उन महापुरुषों को प्रणाम नहीं करते । अहंकार और अविवेक वश ये उनके सत्समागम से अपने जीवन की विशुद्धि नहीं मनाते ।
पंचमकाल में मुनि बनने वालों महापुरुषों में महान् आत्मबल तथा जितेन्द्रि पना है । भाव संग्रह में प्राचार्य देवसेन ने कहा है- चौथे काल में हजार वर्ष तपस्या करने पर जो फल मिलता था, वह इस काल में हीन संहनन होते हुए एक वर्ष की तपस्या द्वारा प्राप्त होता है । वह गाया इस प्रकार है-
बरिस सहस्सेण पुरा जं कम्मं हमइ तेण काग्रेस ।
सं संपइ वरिसे हूं गिज्जरयई हीरणसंहाणे ।। २०६२।।
शास्त्र में देव, गुरु तथा शास्त्र की श्रद्धा को सम्यक्त्व कहा है। उस सम्यक्त्व के अंग रूप साधु परमेष्ठी के विरुद्ध होकर तथा जनमानस को विकृत बनाने से कितना अधिक स्व तथा पर का ग्रकल्याण होता है, यह एकांती वर्ग नहीं सोचता । इस प्रसंग में बौद्ध ग्रन्थ धम्मपद की यह सूक्ति मननीय है-
पापोपि पस्सदि भद्र यान पापं न या व पच्चति पापं अथ पापो पापानि जब तक पाप का फल नहीं मिलता है,
तब तक पापी को पाप कर्म भला कब दिखाई देता है ? किन्तु जब पाप का फल मिलता है, तब उसको पाप दिखता है । भद्रोपि पस्सदि पापं याव भद्रं न पचति । यदा च पति भद्रं श्रथ भद्रो जब तक भद्र कार्य का फल नहीं लगता है, किन्तु जब उस सत्कार्य का फल प्राप्त को अच्छे रूप में देखता है ।
भद्रानि परसति ||२०१३||
प्राप्त होता है, तब तक वह अच्छा नहीं होता है, तब वह व्यक्ति पुण्य कार्य
पश्वति । पस्सति ||
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१८० ।
... [ गो. प्र. चिन्तामरिण
मुनि निदकों को यह बात कही भूतन साहि कि प्राधिक सोयाबी बनने पर भी राजा श्रीशिक द्वारा यशोधर महाराज के गले में मरा सर्प डालने से उपार्जित पाप का पूर्ण रूप से क्षय नहीं हो पाया, और आगामी तीर्थकर होने वाले उन धोगिक राजा के जीव को वर्तमान में नरक पर्याय में अपार कष्ट भोगना पड़ रहा है । अतः . अहंकार को त्यागकर एकांतवादी वर्ग को विवेक से काम लेना चाहिये । मुनि निन्दा को महापाप कहा गया है । .. प्रश्न :- हम वीतरागता को धर्म मानते हैं, अतः दया, दान हमारी दृष्टि
में धर्म कार्य नहीं हैं। शरीर जड़ है। उसके द्वारा किये जाने वाले उपवासादि जड़ किया हैं। मोक्ष प्राप्ति के लिये प्रांतरिक वीतरागता चाहिये । निश्चयनय हमारा कहता है, मोक्ष के लिए बाहरी वेष से कोई प्रयोजन नहीं है। कषाय आदि का त्याग यदि श्वेताम्बरधारी करता है या वह पीताम्बर बाला या दिगम्बर है तो वह मोक्ष जाता है । इस विषय में हमें कुद-कुद स्वामी का ही अभिप्राय मान्य है, कारण जिनागम के मर्म को स्वामी कुंद-कुब तथा अमृतचन्द्र प्राचार्य के बाद अध्यात्म योगी
सत्पुरुष सम्चे जैन धर्म के प्रवर्तक श्री कानजी जान पाये हैं ? उत्तर :----कुद-कुद स्वामी ने कहा है कि द्वादशांग श्रु तज्ञान तथा प्राचार्य परम्परा से प्राप्त आगम पूज्य तथा मान्य है। उन्होंने दिगम्बर ऋषि प्रसीत परम्परा को आदरणीय कहा है।
उन्होंने रयणसार में कहा है-- पुथ्वं जिणेहि भरिणयं जहट्ठियं गणहरोहि विस्थरियं । पुब्वाइरियकमेणं जं तं बोलेइ सद्दिष्टि ।।२०६४॥ मदिसुद सारण बलेण दु सच्छदं बोलए. जिणुत्तमिति । जो सो होइ कुदिट्ठीण होइ जिए. मम्गलगलो ॥२०६५॥
पूर्व में जिस प्रकार सर्व जिनेन्द्र ने कथन किया तथा गणधरदेव ने जिसका द्वादशांग रूप से विस्तार किया, उस पूर्वाचार्य परम्परा से प्रागत कथन के अनुसार जो बोलता है, वह सम्यग्दृष्टि है ।
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श्रध्याव: दसवां ]
[ 85 १
जो मतिज्ञान, श्रुतज्ञान के अहंकारवश जिनवाणी की उपेक्षा कर स्वच्छंद जैसा मन में श्राया वैसा बोलता है, वह जिनमार्ग में संलग्न रहते हुए भी मिथ्यादृष्टि हो जाता है ।
इस कथन द्वारा कुंद--कुद स्वामी आचार्य परम्परा से श्रागत समस्त ऋषि प्रणीत आगम को ( समंतभद्र, अकलंक, जिनसेन आदि की वाणी ) जो ज्ञान के अहंकार से युक्त हो न मानकर स्वच्छंद प्रलाप करता है, वह मिथ्यादृष्टि है | कानजी मत में समस्त जिनागम का अनादर कर केवल समयसार अथवा कुद-कुद वाणी को ही मानने की प्रणाली है, वह मिथ्यावादी मार्ग है ऐसा महर्षि कुद-कुंद ने पूर्वोक्त गाथा युगल में स्पष्ट किया है ।
उपवास आदि अनावश्यक है; दान पूजादि के कारण मोक्ष नहीं मिलता, इत्यादि एकान्त कथन कुंद कुंद वाणी के द्वारा भी खण्डित होता है ।
मार्मिक देशना - वे कहते हैं, जो गृहस्थ, गृहस्थी के जंजाल में रहकर आरंभ परिग्रह में फंसने से पाप का अर्जन करता है, तथा उस दोष प्रक्षालन हेतु दया, दानादि कार्य नहीं करता है, वह संसार में परिभ्रमण करता है । दया दानादि सत्प्रवृत्तियों में लगने वाला सम्यग्ज्ञानी जीव मोक्ष जाता है । ऐसा अभिप्रायः द्वादशानुप्रक्षा में कुंदकुंद स्वामी ने व्यक्त किया है
पापबुद्धीए ।
पुस्तकलत णिमित्तं ग्रन्थं श्रज्जयदि परिहरदि दया दाणं जो पाप भाव युक्त हो
सो जीबो भभदि संसारे १२०६६।।
(आर्त रौद्र ध्यान को धारण कर ) दया तथा दान का परित्यागकर पुत्र स्त्री के लिये धन का संचय करता है, वह जीव संसार में भ्रमण करता है । अर्थात् दया, दान न करने वाला गृहस्थ मोक्ष नहीं पाता, ऐसा प्रभिप्राय स्पष्ट | इस कथन से दया, दान के विरुद्ध कानजी पंथी एकांतवादी प्ररुपा खण्डित हो जाती है ।
जो एकांतवादी पाप त्याग के मार्ग को अस्वीकार करके ऊँची-ऊँची बातें शुक्ल ध्यान, शुद्धोपयोगी, निश्चयतय आदि की किया करते हैं, उनकी क्या गति होगी, यह कुन्दकुन्द महर्षि की मंगलवारणी बताती है---
जसे कुइ पाथ विसयणिमित्तं च प्रहरिणसं जीवो । मोहंधसार सहियो तेस दु परिषदि संसारे ॥२०६७।
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९८२ ]
[ गो. प्र. चितिन्मणि जो मोहान्धकार युक्त गृहस्थ विषयों की पूर्ति हेतु बुद्धि पूर्वक प्रयत्न करता हुमा निरन्तर पाप कार्यों को करता है, अर्थात् पाप त्याग रूप पुण्य कार्यों से दूर भागता है, वह निंद्य कार्यों के फलस्वरूप संसार में पतित दशा को पाता है ।
पंचमकाल में धर्मध्यान रूप शुभोपयोग बड़े प्रयत्न द्वारा प्राप्त होता है। इस काल में शुरल ध्यान रूप शुद्धोपयोग नहीं होता, यह बात मोक्ष पाहुड में कही गयी है
भरहे दुस्समकाले धम्मज्झाणं हवेइ साहुस्स । तं अप्प सहावठिदे रगहु मण सो वि अण्णारणी ॥२०६८।।
प्रात्मा स्वरूप में लीन साधु के इस पंचमकाल में भरत क्षेत्र में धर्म ध्यान होता है, यह बात जो नहीं मानता वह अज्ञानी (मिथ्यात्वी) है। धर्मध्यान को भावपाहुड की 'सुधम्म'--गाथा ७६ में शुभ भाव कहा है । एकांतवादी अशुभ भाव के विषय में मौन धारण कर शुभ भाव धर्मकान, को इस बात में समलव है की अभद्र शब्दों में निंदा करता है, उसे कुन्द-कुन्द स्वामी कथित लोकातुप्रेक्षा का वर्णन ध्यान में लाना चाहिये । वे कहते हैं
प्रसुहेण रिवरय तिरियं सुह उपजोगेण दिविज गर-सोक्खं । सुद्धेरा लहइ सिद्धि एवं लोयं विचितिमो ॥२०६६॥
प्रार्तध्यान, रौद्रध्यान रूप अशुभ भाव से नारकी तथा पशु की पर्याय, धर्म ध्यान रूप शुभ भाव से देव तथा पर पर्याय के सुख मिलते हैं ।
शुक्ल ध्यान रूप शुद्ध भाव (जो पंचमकाल में नहीं हो सकता) से मोक्ष मिलता है, ऐसा लोक का चितवन करे ।
इस कथन द्वारा कुन्द-कुन्द स्वामी यह सूचित करते हैं कि इस काल में मोक्ष नहीं है, अतएव अशुभ भाव द्वारा पशु नारकी बनने के स्थान में शुभ भाव को स्वीकार करके देव, मानवपर्याय के सुखों को प्राप्त करना उपयुक्त होगा।
Some-this is better than nothing. शून्य की अपेक्षा अल्प उपलब्धि ठीक है। इतना ही नहीं, हिंसा, झूट, चोरी, कुशील, परिग्रह की तीव लालसा कृष्णादि लेश्याओं के अधीन हो कुत्सित पाचरण और क्रूर कर्मों द्वारा कुगति की अपार विपत्ति की अपेक्षा सम्यक्त्व सहित देवादि की भी अवस्था बहुत अच्छी है, जहां से चयकर
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अध्याय : दसवां ] सम्यक्त्वी जीव भर पर्याय धारण कर तपश्चर्या करते हुये कर्म क्षय करता है।
आगम की आज्ञानुसार दिगम्बर मुद्रा धारण करना, शीत, उष्ण आदि २२ परिषहों को सहन करना, उपवास करना आदि को एकांतवादी जड़ शरीर की क्रिया करते हुए इन्द्रियों और विषयों की गुलामी द्वारा मोक्ष रूपी पात्म स्वातन्त्र्य को पाने का स्वप्न देखते हैं । उसे जगाते हुए कुन्द कुन्द स्वामी ने मोक्ष पाहुड में कहा है
विगंथ मोहमुक्का बावीस परीसहा जियकसाया । पायारंभविमुक्का हे गहिया मोक्यमामि ॥२१००॥
जो परिग्रह रहित निर्ग्रन्थ हैं, बाह्य जगत के प्रति मोहमुक्त हैं, शीत, उष्णादि कठोर बाईस परीषह सहन कर तप द्वारा कर्मों की निर्जरा करते हैं, तथा हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुन एवं परिग्रह रूप पाप के कारणों का त्याग करते हैं अर्थात् जिनके जीवन में सत्य, अहिंसा, अचौर्य, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह की समाराधना प्रति ष्ठित हैं, वे मोक्ष मार्ग में संलग्न माने गये हैं ।
__ प्राचार्य श्री यह भी कहते हैं, देव तथा गुरु की भक्ति से युक्त आत्म ध्यानी सच्चरित्र व्यक्ति भोक्ष मार्ग में प्रवृत्त है । एकांतवादी पूजा आदि को राग भाव कहकर निंदनीय कहा करते हैं । सर्वज्ञ परम्परा से प्राप्त मोक्ष पाहुड के इस कथन पर श्रद्धा करने वाला व्यक्ति मोक्षमार्गी होता है---
देवगुरुवं भत्ता रिपक्वेय परंपरा विचितिता। . भाणरया सुचरिसा ते गहिया मोक्स ममामि ।।२१०१॥
जो वीतराग अरहंत भगवान, दिगम्बर गुरु के भक्त हैं, संसार शरीर तथा भोगों से विरभत हैं, ध्यान करने में निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं और जिनका प्राचरण निर्मल हैं, वे मोक्ष मार्ग में स्थित हैं ।
प्रभादो की दृष्टि---लोक में ऐसे लोग गिला करते हैं, जो दूसरे का द्रव्य देने की बात भी नहीं सुनते, किन्तु अपनी रकम वसूल करने में जघन्य उपयोग करते हैं; इसी प्रकार की परम्परा एकांतवादी वर्ग में देखी जाती है। साधु के जीवन में क्या त्रुटि है, इसे वे ही द ढकर तथा उसे बड़ा रूप देकर दुनिया में ढोल पीटते हैं और स्वयं के पतितजीवन के बारे में कहते हैं कि संयम पर्याय हम में अपने आप पर जायेगी, पुरुषार्थ की जरूरल नहीं है ।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि ___ 'जो जो देखी वीतराम ने सो सो होसी वीरा रे।' ये लोग लेन-देन, व्यापार, विषय सेवन में बुद्धि पूर्वक प्रयत्न करते हैं तथा वहां भगवान के ज्ञान का बहाना नहीं बनाते । उन्हें अपने मन में यह सोचना उचित होगा--
क्या क्या देखो वीतराग ने तू क्या जाने बीरा रे। वीतराग की वाणी द्वारा, दूर कानो र गोरा है।
अध्यात्म वागी का अभिप्राय था कि जीव रक्षा करो, इसीलिये तो मुनिराज पिच्छी रखते हैं, नहीं तो क्या वह शोभा के लिये है ? भावों में भी प्रमाद पने को न आने दो, क्योंकि मलिन विचारों के द्वारा जोक कमों के बन्धन में बद्ध होता है। उसका रहस्य न समझकर अध्यात्मवादी कहते हैं; शरीर आत्मा से भिन्न है । शरीर घात करने से पाप नहीं होता । इनको समयसार शास्त्र के रचनाकार भाव पाहुड ग्रन्थ में अपना मंतव्य इस प्रकार स्पष्ट करते हुए सचेत करते हैं
परिणवहेहि महाजस चउरासो-लक्ख-जोरिणहि मन्झम्मि । उपजत भरसो पत्तोसि रिपरंतरं दुक्खं ।।२१०३॥
हे महायशस्वी साधु ! जीव बध महापाप है, उसे करने वाला ८४ लाख योनियों में जन्म मरण पाता हुआ निरन्तर दुःख भोगता है।
यहाँ जीव वध को बुरा कहा है ।
चेतावनी-जो कानजी पन्थी समुदाय तीस वर्षों से भी अधिक काल अध्यात्म शास्त्र का ही मनन, प्रचार करते हुये कहता है, हमारा मन त्याग की ओर नहीं जाता है, उसको आध्यात्मिक प्रहरी के रूप में. कुन्द कुद स्वामी भाव पाहुड में इस प्रकार सचेत करते हैं---
उत्थयाइ जा ण जरो रोयम्मी जा सा डहइ देहडि । इन्द्रिय बलं रण वियलइ ताव. लुमं कुणहि अपहियं ।।२१०४॥
जब तक बुढ़ापे का प्राक्रमरण नहीं होता, रोग-रूपी अग्नि देह-रूपी झोपड़ी को भस्म नहीं करती तथा इन्द्रियों की शवित क्षय को प्राप्त नहीं होती है. तब तक। आत्मा का हित करों ! (असमर्थ होने पर क्या करोगे ?) प्रश्न :---इस प्रसंग में यह प्रश्न उठता है आत्म धर्म हम पढ़ते हैं । प्रात्मा
को ही अपने शिविरों में, कक्षाओं में चर्चा करते हैं। अब हमें
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अध्याय : दसवां }
[६८५ और क्या धर्म करना चाहिये ? उत्तर :- सम्यग्दर्शन की प्राप्ति तो मोक्ष रूपी परम विज्ञान मन्दिर की प्रवेशिका शाला सदृश है । प्रागे विशारद की शिक्षार्थ श्रावक की एकादश प्रतिमायें हैं। तथा अंतिम कक्षा का कोर्स दश धर्मों का पूर्ण पालन है । कुन्द-कुन्द स्वामी ने श्रावकों की प्रतिमाओं को तथा मुनियों के उत्तम क्षमादिक को धर्म संज्ञा प्रदान की है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अणुवल पालना या महाव्रत पालना धर्म से जीवन को समलंकृत करना है । धर्मानुप्रेक्षा में कुन्द-कुन्द स्वामी कहते हैं
एकारस दशभेयं धम्म सम्मत्त पुब्वयं भरिणयं । सागार-गारगाणं उत्तम सुह संपजु-तेहिं ।।२१०।।
उत्तम मोक्ष सुखं वाले जिन भगवान ने कहा है सम्यक्त्व पूर्वक एकादश प्रतिमा रूप श्रावक का धर्म है । तथा उत्तम क्षमादि दशविध श्रमण धर्म है। प्राचार्य देव कहते हैं---
साक्ष्य धम्मं चत्ता यदि धम्ने जो हुवा जोयो । सो र य वजदि मोक्खं इदि चितये णिचं ॥२१०६॥
जो जीव श्रावक धर्म को त्यागकर मुनि के धर्म में स्थित होता है । वह मोक्ष से वंचित नहीं होता (यति धर्म पालन द्वारा वह मुक्त होता है ।) इसका सदा धर्म भावना में चितवन करे । यहाँ प्रतादि को धर्म कहा गया है। . प्रश्न :--एक समय सुन्दर प्राध्यात्मिक चर्चा चल रही थी, मैने प्राचार्य
१०८ आचार्य शांतिसागर जी महाराज जी से पूछा था, "प्रात्मा की खूब चर्चा करते हुये भी जो व्यक्ति सामान्य श्रावकाचार को
प्रतिज्ञा रूप से नहीं पालन करते, उसका भविष्य कैसा है ?.... उत्तर :--आचार्य श्री ने श्रेणिक. राजा का उल्लेख करते हुये कहा था। क्षायिक सम्यक्त्वी होते हुये भी नरक अायु बांध लेने के कारण वह आत्मा ब्रत न ले सकी, इसी प्रकार संयम विमुख व्यक्तियों का स्वरूप समझना चाहिये, . इसके अनंतर उन्होंने कहा था जिसकी जैसी होनहार होती है उसके अनुसार ही उस जीव की बुद्धि हो जाया करती है ।
प्रमादी एकांतवादी को महर्षि कुद-कुंद चेतावनी देते हुए कहते हैं
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६८६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
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रुवं प्रारोगं जोवरणं बलं तेजं ।
सोहणं लावण्लं सुर धबूमिद सस्सयं प हबे ॥१२१०७॥ सम्पूर्ण इन्द्रियों की परिपूर्णता, नीरोगता, यौवन, बल, तेज, सौभाग्य तथा लावण्य इन्द्रधनुष के समान देर तक टिकने वाले नहीं हैं। आचार्य कुंद-कुंद ने यह कहा है
कालाई लद्धीए अप्पा परमाध्पयो हवदि ||२४|| ( मोक्ष पाहुड)
काल लब्धि आदि के प्राप्त होने पर आत्मा परम आत्मा होता है । चक्रवर्ती भरत के पुत्र होते हुये श्रेष्ठ प्राध्यात्मिक वातावरण में रहने वाले मरीचिकुमार को सम्यक्त्व की ज्योति नहीं मिली । किंचित् न्यून कोडा - कोडी सागर काल बीतने पर सर्व प्रकार की विपरीत सामग्री होते हुये यम सदृश क्रूर सिंह की पर्याय में चारण मुनि युगलं की वाणी सुनकर उसे श्रधिगमज सम्यक्त्व का लाभ हुआ तथा दशव भव उस जीव ने महावीर भगवान होकर मोक्ष प्राप्त किया । अतः यह स्पष्ट है कि श्रध्यात्मवादी कहने से तथा प्रात्मा सम्बन्धी ग्रन्थ को सदा साथ में रखने मात्र से atra की प्राप्ति काललब्धि के अभाव में असम्भव है ।
कालब्धि आदि कब आए, यह पता नहीं चलता । ऐसी स्थिति में क्या कर्तव्य रह जाता है ? दो रास्ते हैं । मोक्ष तो मिलता नहीं । विषय-भोग की गुलाबी पथ पकड़ा, तो दुःख पूर्ण पशु तथा नारकी की पर्याय मिलेगी। यदि सम्य
व रहित होते हुए भी चोरी, व्यभिचार, बेईमानी आदि विश्व विनिन्दित कुकृत्यों को छोड़कर सज्जन पुरुषोचित सदाचार का रास्ता अपना लिया तो स्वर्ग में उत्पत्ति होगी तथा विदेह जाकर तीर्थकर के साक्षात् दर्शन दिव्यध्वनि सुनने का सौभाग्य तथा नंदीश्वर वंदना आदि अनेक सुयोग प्राप्त होंगे। चरम शरीरी न होने से मरण तो अवश्य होगा । यदि कुद-कुद मुनीन्द्र की कथनी के अनुसार पापाचार का त्याग तथा सदाचार का पालन किया, तो विपत्ति से बचा जा सकेगा। यदि इन्द्रियों की गुलामी और घृणित शरीर की सेवा करते-करते पतन को कौन टाल सकता है ? श्रेणिक महाराज के नरक पतन को क्या है | ?
प्राणों का त्याग हुआ, तो कुगति के भगवान महावीर का साक्षात् सानिध्य यदि न रोक सका, व अन्य लोगों की तो बात ही
शंका-समयसार में कहा है। शास्त्र अचेतन है, वह ज्ञान रूप नहीं है
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अध्याय : इन ]
[ ९८७ "संत्थं पारणं ण हवाई जह्मा सत्थं रण जागए कि चि ॥३६॥
समयसार गाथा ३७२ में कहा है एक द्रव्य अन्य द्रव्यों में गुणोत्पादक नहीं होता । "अणदविएण प्रादवियस्स ए कीरए गुणुगानो" इस कारण कानजी कहते हैं, शास्त्र को परस्त्री तुल्य त्याज्य समझना चाहिये।
समाधान-शास्त्र के पठन स्वाध्याय तथा उपदेश से जीव सुपथ में लगते हैं। यह प्रत्यक्ष अनुभव गोचर बात है, कानजी पंथ अपने प्राचार के लिये अपने ढ़ग का साहित्य छपाता है, वितरण करता है। यह कारण स्पष्ट सूचित करता है कि एक द्रव्य के द्वारा दूसरे का कुछ नहीं होता, यह कथन एकांत रूप नहीं है । समयसार में कुन्द कुन्द स्वामी ने एक दृष्टि से कथन किया है उसके सिवाय उन्होंने दूसरी दृष्टि को भी ध्यान में रखकर रयणसार में लिखा है
इदि सज्जरंग पुज्ज रयरसार गंथं पिडालसो पिच्छ । जो पढ़ई सुरगइ भावइ सो पावई सासयं ठाणं ॥२१०८।।
इस प्रकार सत्पुरुषों के द्वारा वंदनीय इस रयनसार ग्रंथ को जो प्रातस्य छोड़कर पढ़ता है, सुनता है, भावना करता है, वह अविनाशी पद को पाता है । यही बात भाव पाहुड में अन्त में उन्होंने लिखी है---
इथ भाव पाहुड मिणं सव्वं बुद्ध हि देसियं सम्म । जो पढइ सुगइ भावइ पावइ सो अविचलं ठाणं ॥२१०६।। मोक्ष पाहुड के अन्त की गाथा भी उपयोगी है-- एवं जिरण पत्तं मोक्खस्सय पाहुड सुभत्तीए। जो पढइ सुरगइ, भावइ सो पायइ सासयं सोक्खं ।।२११०॥
कुन्द-कुन्द स्वामी स्वयं कहते हैं कि उनके द्वारा रचित उपरोक्त ग्रंथ को जो पढ़ता है, सुमता है तथा भावना करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है ।
अतः जिनवाणी को परस्त्री कहकर हेय मानना, एक द्रव्य से दूसरे का सर्वथा हित नहीं होता, अादि कथन कुन्द-कुन्द स्वामी के कथन द्वारा बाधित होता है। विवेकी व्यक्ति एकांत पक्ष को नहीं पनड़ता । एकांत पक्ष का प्राग्रह सम्यक्त्वी नहीं करता है।
यह बात विचारणीय है कि कुन्द-कुन्द स्वामी का सीमंघर भगवान की दिव्य
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[ गो. प्र. चिन्तामणि ध्यनि रूप पुद्गल द्रव्य से स्वहित न होता, तो वे महर्षि विदेह क्यों जाते? अतः कथंचित् एक द्रव्य दूसरे का उपकारी होता है, कथंचित् नहीं होता ; ऐसा स्याद्वाद पक्ष उचित तथा उपकारी है। प्रश्न :--पुण्य के विषय में यह बात गले नहीं उतरती कि वह प्रात्मा
का शत्रु रूप कर्म है, वह मोक्षार्थी के लिये कैसे उपकारी हो
सकेगा? .. . • उत्तर :--अनेकांत के प्रकाश में समाधान खोजना चाहिये। पुण्योदय से प्राप्त सामग्री का उपयोग चतुर व्यक्ति स्व' परहित के साधनों में करता है । क्रूर तथा दुष्ट व्यक्ति उस साधन सामग्री का उपयोग विषयः कषायों के पोषण में करता है । इस प्रसंग में यह पद्य उपयोगी है- ..
विद्या विवादाय धनं मवाय शक्तिः परेषां परपीड़नाय । खलस्य साधोः विपरीत मेतानाय दानाय च रक्षणाय ॥२१११॥
दुर्जन विद्या का उपयोग विवाद में, धन का अहंकार पोषण में तथा शक्ति का उपयोग दारों को काट प्रदान करने में करता है। सत्पुरुष विद्या का ज्ञान कार्य में, धन का पात्र दान में तथा शक्ति का असमयों के रक्षण कार्य में उपयोग करता है।
मिथ्यादृष्टि पुण्योदय से प्राप्त सामग्री को पापानुबन्धी क्रियाओं में लगाता है । जैसे के बहुत धन सम्पत्ति हो गई, और उसने कसाई खाना खोल दिया, मांस विक्रय, मद्य विक्रयादि का बड़े रूप में काम शुरू कर दिया, हीन प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन हेतु सम्पत्ति का उपयोग किया । उसके फल स्वरूप वह अपने संचित पुण्य का क्षयकर पाप के सागर में डूबता है।
यदि वह धन वैभवं आदि सम्यग्दृष्टि विवेकी सत्पुरुष को प्राप्त हुआ, तो वह उसके द्वारा रत्नत्रय के अंगरूप कार्यों का संरक्षण, संवर्धन, जीव हितादि का कार्य सम्पन्न करता है । इससे वह घातिया कर्मरूप पाप का क्षय करता हुआ तथा अन्त में उस वैभव मात्र का त्यागकर भगवान शांतिनाथ के समान स्वदोष शान्ति द्वारा शाश्वतिक शांतिपूर्ण पद को पाता है । जिस व्यक्ति के पास धन मादकता पैदा करता है, उस व्यक्ति का हाल निन्दनीय कहा जाता है।
__इस कारण पुण्य के विषय में स्याद्वाद दृष्टि का उपयोग जरूरी है । श्रीषण राजा ने सत्पात्र दान दिया था, उससे उसके अपार. पुण्य वृद्धि होती गई, तथा उसने
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अध्याय : दसवां ]
[ ६८६ वैभव का सत्कार्यों में उपयोग किया। अन्त में वह आत्मा भगवान शांतिनाथ तीर्थकर होकर मोक्ष धाम में विराजमान हो गई ।।
__ मार्मिक विचार-इस प्रसंग में एक बात ईमानदारी से हृदय पर हाथ रखकर विचारने की है। एकांतवादी वर्ग अपना सारा दिन "हाय धन, हाय पैसा" से प्रेरित हो पुण्य रूपी वृक्ष के फल को संग्रह करना चाहता है और कहता है हमें पुण्य नहीं चाहिए । कोई आम के शौकिन सज्जन आम तो खाना चाहें और आम के वृक्ष से घृणा करें, तो उनकी यह चेष्टा समझदारों को मनोविनोदप्रद है। यदि ग्राम का वृक्ष नहीं चाहिये, तो उसके फलों का भी त्याग करो, तब विवेक की बात समझी जाये ।
तीर्थकर भगवान दीक्षा लेते समय पुण्य से प्राप्त फल रूप सामग्री का जीर्ण कपड़े के समान त्याग करते हैं और अंतरंग बहिरंग रूप से अपरिग्रही बनते हैं, तब वें पाप का क्षय करते हुए पुण्य का भी नाश कर सिद्ध पदवी पाले हैं। अतः विवेक के प्रकाश में तत्व पर दृष्टि डालना समझदारी की बात है।
एकांत पक्ष वालों का सच्चा हित स्याद्वाद चक्र का शरण ग्रहण करने में है। स्यावाद का शरण लेने वाला ही मोक्ष पाता है ।
बनारसीदास ने स्याद्वाद दृष्टि के विषय में नाटक समयसार में मार्मिक शब्द लिखे हैं
समुझे न ज्ञान कहे करम किए सो मोक्ष । ऐसे जीव विकल मिष्यात की गहल में । ज्ञान पक्ष गहे, कहे पातमा प्रबंध सदा में। घरते सुछन्द, तेउ डूबे हैं चहल में ।।। जथायोग करम करें, ते ममता न धरे। . रहें सावधान, ध्यान की टहल में। सेई भवसागर के ऊपर ह तरै जीव । जिन्हें को निवास स्यादवाद के महल में ॥ .
सामान्य पथ-आत्महित साधना जिनका ध्येय हैं, वे शास्त्र का उपयुक्त और उपयोगी अंश ग्रहण कर जीवन शोधन के कार्य में प्रयत्नरत रहा करते हैं। समन्वय दृष्टि वाला साधक शास्त्र के अर्थ को उसके प्रसंग, प्रकरण आदि को ध्यान में रखकर
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[ मो. प्र. चिन्तामणि वस्तुस्वरूप को मन में प्रतिष्ठित करता है। अध्यात्म दृष्टि और व्यवहार दृष्टि का समन्वय न होने पर शास्त्र जीवन को उन्मत नहीं बनाता है। इस विषय को स्पष्ट करने के लिए कुछ उदाहरण यहां दिये जाते हैं।
.. अध्यात्म दृष्टि की मुख्यता से कहा जाता है, आत्मा अविनाशी है, आत्मा की मृत्यु नहीं होती। पूज्यपाद ऋषिराज ने इष्टोपदेश में कहा है "न मे मृत्युः कुतो भीतिः ।" इस दृष्टि वाले सत्पुरुष को यह आर्षवाणी भी स्मरण में रहनी चाहिए "समाति मरणं होहु मज्झ" मेरे समाधिमरण हो। पंचमकाल में शरीरी मानव का जन्म नहीं होता है । उसकी मृत्यु अवश्य होगी । न मे मृत्युः का पाठ पढ़ने-पढ़ाने वाले महर्षि पूज्यपाद को समाधिमरण पर भी ध्यान देना आवश्यक समझा। उन्होने भगवान से प्रार्थना की है, "प्राण प्रयाण क्षरणे त्वन्नाम-प्रतिबद्ध वर्ण पड़ने कण्ठस्त्वकुष्ठो मम" प्रारा प्रयास काल में जिनेश्वर के नाम स्मरण करते समय मेरा कण्ठ अवरुद्ध न हो। विवेकी साधक समाधिमरण को ध्यान रखता है तथा मेरो प्रात्मा की मृत्यु नहीं है, . इस सत्य पर भी अपनी दृष्टि रखता है।
प्रध्यात्मदृष्टि कहती है, आत्मा ही आत्मा का है, "प्रात्मैव गुरुरात्मनः" समाधि-शतक में लिखा हैं---
नयत्यात्मान मात्मैव जन्य निर्वाण मेव वा। गुरुरात्मात्मन स्तस्मानान्योरिस परमार्थतः ॥२११२॥
आत्मा ही आत्मा को संसार में तथा निर्वाण में ले जाता है, इससे परमार्थ से आत्मा का गुरु आत्मा है, अन्य गुरु नहीं हैं।
इस दुष्टि के साथ व्यवहारं दृष्टि भी साधक को अपनानी चाहिये, ताकि वह उसके जीवन निर्माण करने में पथ प्रदर्शक प्राचार्यादि को अपनी श्रद्धा तथा विनय का केन्द्र बनावे । बोध पाहुड में कुन्द-कुद स्वाभी अपने गुरु द्वादशांग के वेत्ता भद्रबाहु श्रुतकेवली को इस प्रकार स्मरण करते हैं ----
बारस अंग चिया चउरस पुटध-विडल विस्थररणं । सुयसारिण भद्दबाहू गमय-गुरु-भयवयो जय ॥२११३॥ द्वादशांग विज्ञानः चतुर्दश पूर्वांग विपुल विस्तारः। श्रु लजानी भद्रबाहुः गमगुरुः भगवान् जयतु ॥२११४।।
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अध्याय : दसवां ]
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चौदह पूर्वागरूप विपुल विस्तार सहित द्वादशांग के ज्ञानी गुरु श्रुतशानी भगवान भद्रबाहु जयवंत हों ।
गुरु के द्वारा जीव का महान हित होता है, यह सत्य कृतज्ञ शिष्य के सदा ध्यान में कहिए । पद्य प्रसिद्ध है---
शलाकया ।
प्रज्ञान- तिमिरान्धानां ज्ञानांजन चक्षु रुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः ॥। २११५ ॥ ॥ गुरु वंदनीय हैं, जिन्होंने ज्ञानांजन युक्त सलाई के द्वारा श्रज्ञानांधकार से ग्रं शिष्यों के नेत्रों को उन्मीलित किया - रोग विमुक्त बनाया । समोकार मंत्र में आचार्य, उपाध्याय परमेष्ठी को स्मरण करते हुए गुरु की वंदना की जाती है । विवेकी व्यक्ति परमार्थ दृष्टि तथा व्यवहार दृष्टि युगल को हित साधक मानता है-
अध्यात्म दृष्टि तीर्थ वंदना, देवारावना, गुरु वंदना का निषेध करती हुई, आत्म देव की आराधना को हितकारी बताती है । परमात्म प्रकाश में लिखा है-अणु जि तित्थु मजा हि जिय प्रष्णु जु गुरु उ म सेवि । अण्णु जि देउ म चिति तु प्रथा विमल मुवि ।।२११६ ॥ हे जीव, अपनी आत्मा को छोड़कर किसी अन्य तीर्थ को मत जा, किसी या गुरु की सेवा मत कर तथा किसी अन्य देव की श्राराधना मत कर।
इसको पढ़ने वाला एकान्त वादी भोगासक्त व्यक्ति अपने प्रमादी जीवन को पुष्ट करना चाहता है । वह तीर्थ बन्दना, गुरु सेवा तथा मन्दिर जाना, पूजा करना आदि को अनुपयोगी मानला हुआ उपरोक्त शास्त्र की आज्ञा को समक्ष रखता है । वह पूज्यवाद स्वामी के इस कथन को अपने स्वेच्छाचरण का अवलंबन बनता है-
यः परमात्मा स एवाहं योहं स परमस्ततः ।
श्रहमेव भयो पास्यो नान्यः कश्चिदिति स्थितिः ॥२११७॥
जो परमात्मा है, वह मैं हूं, जो मैं हूँ, वह परम आत्मा है, अतः मैं अपने द्वारा उपास्य हूँ, अन्य कोई श्राराधना योग्य नहीं है, ऐसी यथार्थ स्थिति है ।
इस अभेद भक्ति रूप श्रेष्ठ स्थिति को श्रेष्ठ दिगम्बर श्रमण ही प्राप्त कर सकते हैं, उस स्थिति को साध्य बनाने वाला देव पूजा, गुरु भक्ति, साधनों का प्राश्रय से अपने रागादि विकारों से अत्यन्त मलिन
तीर्थ यात्रा यादि जीवन को स्वच्छ
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[ गो. प्र. चिन्तामरिण बनाता हुआ मोक्ष पथ में प्रगति करता है । प्राचार्य कुन्द-कुन्द मे भाव पाहुड में कहा .
जिरणवर घरपंच रूह एमति जे परम भत्ति-राए ।
से जम्मवेलि मूलं खरणंति पर भाव संस्थेष ॥२११८॥ जिनेश्वर के चरण कमलों को जो उच्च भक्ति युक्त अनुराग भाव से प्रणाम करते हैं, वे जन्म रूप बेलि के मूल को निर्मल परिणाम रूप शस्त्र से काट डालते हैं। देव, गुरु, तीर्थ प्रादि का सम्पर्क पाकर मोही मानव मानसिक मलिनता से छूटता है तथा ऐसे विशिष्ट प्रानंद को प्राप्त करता है, जो भोग जन्य सुखों की अपेक्षा अत्यन्त उच्च कोटि का होता है । वीतराग की हृदय से भक्ति जनित प्रानन्द लोकोत्तर होता है। मोक्ष पुरुषार्थ सिद्धि के लिये आत्मा को अपनी शक्ति का अपव्यय रोककर स्वयं में केन्द्रित होना आवश्यक है। इससे परोपकार में समय व्यतीत करने वाले श्रमरा को इष्टोपदेश में आचार्य कहते हैं---
परोपकृति मुत्सृज्य स्वोपकार परोभव । . . ... उपकुर्वन्परस्याशः दृश्यमानस्य लोकवत् ॥२११६॥
प्रात्मन् ! अन्य का उपकार रूप कार्य त्याग करके प्रात्मा के उपकार कार्य में तत्पर हो । आत्मा से भिन्न शरीर आदि दृश्यमान वस्तुओं का हित संपादन कार्य में अपना काल व्यतीत करते हुए तुम अज्ञानी जगत का अनुकरण करते हो।
__इस कथन की ओट में कोई करुणामयी प्रवृत्तियों से विमुख होकर तथा संकीर्ण दुष्टि को अपनायें, उसे आचार्य कहते हैं, प्रारम्भ में तुम्हारा जीवन अपने से हीन स्थिति में पड़े हुए व्यक्तियों को ऊंचे उठाने में व्यतीत होना चाहिये । असमर्थ की सेवा सत्कर्म है। विवेकशील गृहस्थ के लिए दान देकर परोपकाररत रहना प्राश्यक है । व्यवहार दृष्टि के प्रकाश में वे ही प्राचार्य पूज्यपाद कहते हैं
ज्ञानवान् शानदानेन निर्भयोऽभयदानतः । अन्नदानात्मुखी नित्यं निर्व्याधि भैषजाद्भवेत् ॥२१२०॥
यह जीव दूसरों को ज्ञान दान करने से ज्ञानवान्, अभय दान देने से . अभय पूर्ण स्थिति युक्त होता है, अन्न दान से सदा सुखी रहता है तथा औषधि का दम करने से व्याधिरहित होता है। अतः सदा दान देना उचित हैं। इस
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अध्याय : दसवां ]
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तर्क संगत व्यवहार दृष्टि का निरादर कर विषयासक्ति पूर्ण स्वार्थी जीवन व्यतीत कर अपने को महान अध्यात्मवादी मानना अविवेकी का कार्य है । परोपकारी बनना गृहस्थ जीवन के लिये आवश्यक है। तपोवनवासी श्रेष्ठ श्रमणों की अपेक्षा स्वोपकार की दृष्टि को मुख्य माना गया है ।
तत्त्वग्राही निश्चय दृष्टि कहती है एक ही-खदान से निकले एक संगमरमर को चट्टान का एक अंश मूर्ति बनकर भगवान शांतिनाथ कहा जाता है और उस पाषाण का दूसरा अंश मन्दिर की सीढ़ी माना जाता है । यह भेद हमें मान्य नहीं है। हमारी निश्चय दृष्टि में दोनों पाषाण समान है।
इस दृष्टि को एकान्त सत्य समन्वितः स्वीकार करने पर गड़बड़ी हो जायगी । व्यवहारनय से प्रकाश प्राप्त स्याद्वादी कहेगा, खदान में उस पाषाण में भेद नहीं था, किन्तु जब मूर्तिकार ने पाषाण को तीर्थकर की मूर्ति का प्राकार दिया, प्रतिष्ठा विधि द्वारा उसकी प्राण-प्रतिष्ठा हो गई, लब साधक की विवेक पूर्ण दृष्टि . उस मूर्ति को भगवान मानकर विनय करने को प्रेरित करती है । उस दृष्टि से सीढ़ी के पार से उसी समानता का पक्ष अब उपयोगी नहीं रहेगा । अकेला अध्यात्मवाद चक्कर में डाल देगा, भगवान गोम्मटेश्वर की मूर्ति को वह पाषाण की मूर्ति मानेगा, भगवान बाहुबली की नहीं । ऐसा मानने से जीवन शोधन हेतु कुछ भी तत्त्व हाथ न लगेगा। व्यवहार दृष्टि से बाहुबली साक्षात् मूर्तिमान हैं, ऐसा मानकर आराधना करने से स्वहित संपादन होगा, अतः समन्वय पथ श्रेयस्कर एवं शांति प्रदाता है । शंका :-- स्याद्वाव पक्ष वाला निश्चय तथा व्यवहार दृष्टियों को उपयोगी,
उपकारी, हितकारी तथा श्रेयोपथ मानता है। वह एकान्त से अध्यात्म पक्ष मानने वाले को क्यों विरोध करता है ? ऐसा
करना क्या सस्य तत्व का विरोध नहीं है ? ... . समाधान :- एकान्त पक्ष वाला जब सत्य का विकृत, विकारी, हानिकारी रूप उपस्थित करता है, तब सत्यवाही दृष्टि वाले का आवश्यक कर्तव्य हो जाता है कि सत्य पक्ष के रक्षण हेतु एकान्त दृष्टि से होने वाली हानि पर प्रकाश डाले । जैनागम जब बौद्ध तत्वज्ञानी को एकान्त क्षणिक पक्ष का पोषण करते हुए पाता है, तब उसका कर्तव्य हो जाता है कि वह पददलित किये जाने वाले नित्य पक्ष को
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
ध्यान में रखकर माक्रान्त एकांतवादी को न्याय का सही रास्ता बताये। यही न्याय निश्चयनय और व्यवहार नय पक्ष को विस्मरण करने वाले एकान्तवादी चिन्तक के विषय में लगाना चाहिये । एकान्तवादी सत्य को विकृत करता है । स्याद्वादवादी सत्य के सच्चे सौन्दर्य को प्रकाशित करता है। इसलिये समन्वय पथ ही न्याय मार्ग है । एकान्त पथ सत्य पद का विनाशक है; मिथ्यात्व है तथा संसार सागर में जीव को डुबाने वाला है । यह काल कूट विष से भी भयंकर है ।।
स्याद्वाद चक्र, पं. सु. दि. जो जीव अपने को सम्यग्दृष्टि मान कर अहंकार करते हैं और अपने को निरबंध मानते हैं, सो क्या ठीक है ? सम्यग्दृष्टिः स्वयमवमहं आतु बंधो न मे स्या। वित्युत्तानोत्पुलक वदना रागिरणोप्याचरंतु ।। प्रालंबता समिति परतां ते यतोऽद्यापि पापा ।
प्रात्मानात्माव गम विरहात्संति सम्यक्त्वरिक्ता ।।२१२१।।. ___ जो पर द्रव्य में राग द्वेष मोह से संयुक्त हैं और अपने को ऐसा मानते हैं कि मैं सम्यग्दृष्टि के बंध होना नहीं कहा है। ऐसा मानकर जिनका मुख गर्व सहित ऊँचा हुआ है । तथा हर्ष सहित रोमांच रूप हुआ है, वे जीव महाव्रतादि प्राचरण करे तथा वचन विहार पाहार की क्रिया में यत्न से प्रवर्तने की उत्कृष्टता को भी अब अवलम्बन करे तो भी पापी मिथ्याष्टि ही हैं, क्योंकि प्रात्मा और अमात्मा के ज्ञान से रहित हैं, इसलिये सम्यक्त्य से शून्य हैं। - जो अपने को सम्यादृष्टि माने और परद्रव्य से राग करे तो उसके सम्यक्त्व
कैसा?
- व्रतसमिति पालें तो भी आप पर के ज्ञान के बिना पापी ही हैं, तथा अपने बंध नहीं होना मानकर स्वच्छंद प्रवलें तो कैसा सम्यग्दृष्टि ? क्योंकि चारित्र मोह के राग से जब तक यथास्यात चारित्र न हो तब तक बंध तो होता ही है । जब तक राग रहता है, तब तक सम्यग्दृष्टि अपनी निदा (गर्हा) करता ही रहता है, ज्ञान होने मात्र से तो बंध से छूटता नहीं, ज्ञान होने के बाद उसी में लीन रूप शुद्धोपयोग रूप चरित्र से बंधन कटता है । इसलिए राग होने पर बंध का न होना मानकर स्वच्छंद
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अध्याय : दसवां ]
[ ६६५ होना तो मिथ्यादृष्टिपना ही है। यहां कोई पूछे कि व्रत समिति तो शुभ कार्य हैं, उनको पालने पर भी पापी क्यों कहा ?
___ उसका समाधान -सिद्धान्त में मिथ्यात्व को ही पाप कहा है, जहां तक मिथ्यात्व रहता है, वहां तक शुभ अशुभ सभी क्रियाओं को अध्यात्म में परमार्थ से पाप ही कहा है और व्यवहारनय की प्रधानता में व्यवहारी जीवों को अशुभ से छुड़ाकर शुभ को लगाने की किसी तरह पुण्य भी कहा है । स्याद्वादमत में कोई विरोध नहीं है ! फिर कोई पूछे कि परद्रव्य से जब तक राग रहे तब तक मिथ्यादृष्टि कहा है. सो इसको हम नहीं समझे, क्योंकि अविरत सम्यग्दृष्टि आदि के चरित्र मोह के उदय से रागादिभाव होते हैं, उसके सभ्यत्व किस तरह कहा है ?
. उसका समाधान----यहां मिथ्यात्व सहित अनंतानुबंधी का राग प्रधान करके कहा है, क्योंकि अपने और पर के ज्ञान श्रद्धान के बिना परद्रव्य में तथा उसके निमित्त से हुये भावों में प्रात्मबुद्धि हो तथा प्रीति अप्रीति हो तब समझता कि इसके भेदज्ञान नहीं हुआ। मुनि पद लेकर व्रत समिति भी पालता है, वहां पर जीवों की रक्षा तथा शरीर सम्बन्धी यत्न से प्रवर्तना, अपने शुभ भाव होना इत्यादि परद्रव्य संबंधी भावों से अपना मोक्ष होना माने और पर जीवों का घात होना, प्रयत्नाचार रूप प्रवर्तना अपना अशुभ भाव होना इत्यादि परद्रव्यों की क्रिया से ही अपने में बंध माने तब तक जानना कि इसके अपना और पर का ज्ञान नहीं हुअा, क्योंकि बंध मोक्ष तो अपने भावों से था, परद्रध्य तो निमित्त मात्र था, उसमें विपर्यय माना, इसलिए परद्रव्य से ही भला बुरा मान रागद्वेष करता है, तब तक सम्यग्दृष्टि नहीं है । और जब तक चारित्र मोह के रागादिक रहते हैं, उनको तथा उनसे प्रेरित परद्रव्य संबंधी शुभाशुभ क्रिया में प्रवृत्तियों को ऐसा मानता है कि यह कर्म का जोर है, इससे निवृत होने से ही मेरा भला है, उनको रोग के समान जानता है, पोड़ा सही नहीं जाती, तब उनका इलाज करने रूप प्रवर्तता है, तो भी इसके उनसे राग नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जो राम मानें उसके राग कैसा ? उसके मेटने का ही उपाय करता है, सो मेटना भी अपने ही ज्ञान परिणामरूप परिणमन से मानता है। इस तरह परमार्थ अध्यात्मदृष्टि से यहां व्याख्यान जानना ! मिथ्यात्व के बिना चारित्र मोह संबंधी उदय के परिणाम को यहां राग नहीं कहा, इसलिए सम्यग्दृष्टि के ज्ञान वैराग्यशक्ति का होना अवश्य कहा है । मिथ्यात्व सहित राग को ही रांग कहा गया है, वह सम्यग्दृष्टि
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६६६ ]
| गो. प्र. चिन्तामणि के नहीं है, और जिसके मिथ्यात्व सहित राग है वह सम्यग्दृष्टि नहीं है । उस भेद को सम्यग्दृष्टि ही जानता है। मिथ्यादृष्टि का अध्यात्म शास्त्र में प्रथम तो प्रवेश ही नहीं है और जो प्रवेश करे तो उलटा समझता है, व्यवहार को सर्वधा छोड़ भ्रष्ट हो जाता है, अथवा निश्चय को अच्छी तरह नहीं जानकर व्यवहार से ही मोक्ष मानता है, परमार्थ तत्व में मूढ है । इसलिए यथार्थ स्याद्वादनय द्वारा सत्यार्थ समझने से ही सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है।
समयसार क. पृ. २६७६ ।। गाथा नं. २००, आचार्य श्रमृत. प्रश्न :--स्वसंवेदन के साथ प्राध्यात्मिक ग्रन्थों में विसराग विशेषण क्यों
लगाया जाता है ? स्वसंवेदन जाने वीतराम विशेषणं किमर्थ
मितिपूर्वपक्ष ? . उत्तर :----"विषयानुभव रूप स्वसंवेदन ज्ञानं सरागमपि दृश्यते तनिषेधार्थमित्यभिप्रायः ।" . ... .. . .
जो स्वसंवेदन अर्थात् अपने कर अपने को अनुभवना इसमें वीतराग विशेषण क्यों कहा? क्योंकि जो स्वसंवेदन ज्ञान होवेगा, वह तो रागरहित होवेगा ही। इसका समाधान श्री गुरु ने किया कि विषयों के आस्वादन से भी उन वस्तुओं के स्वरूप का जानपना होता है, परन्तु राग भाव कर दूषित है, इसलिये निज रस का आस्वाद नहीं है, और बीतराग दशा में स्वरूप का यथार्थ ज्ञान होता है, प्राकुलता रहित होता है। तथा स्वसंबेदन ज्ञान प्रथम अवस्था में चौथे, पांचवे गुणस्थान वाले गृहस्थ के भी होता है । वहां पर सराग देखने में आता है, इसलिए रागसहित अवस्था के निषेध के लिये वीतराग स्वसंवेदन ज्ञान ऐसा कहा है। रागभाव है, वह कषायरूप है. इस कारण जब तक मिथ्यादृष्टि के अनंतानुबंधी कषाय है, तब तक तो बहिरात्मा है, उसके तो स्वसंवेदन ज्ञान अर्थात् सम्यकज्ञान सर्वथा ही नहीं है, व्रत और चतुर्थ गुरणस्थान में सम्यग्दष्टि के मिथ्यात्व तथा अनंतानुबंधी के अभाव होने से सम्यग्ज्ञान तो हो गया, परन्तु कषाय की तीन चौकड़ी बाकी रहने से द्वितीया के चन्द्रमा के समान विशेष प्रकाश नहीं होता, और श्रावक के पांचवें गुरणस्थान में दो चौकड़ी का अभाव है, इसलिये राग भाव कुछ कम हुमा, वीतराग भाव बढ़ गया, इस कारण स्वसवेदन ज्ञान भी प्रबल हुआ, परन्तु दो चौकड़ी के रहने से मुनि के समान प्रकाश नहीं हुआ । मुनि के तीन चौकड़ी का अभाव है, इसलिये राग भाव तो निर्बल हो
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अध्याय : दसवां ] गया, तथा वीतराग भाव प्रबल हुआ, वहां पर स्वसंवेदन ज्ञान का अधिक प्रकाश हुअा, परन्तु चौथी चौकड़ी बाकी है, इसलिए छठे गुणस्थान वाले मुनि सरागसंयमी : हैं, वीतराग संयमी के जैसा प्रकाश नहीं है । सातवें गुणस्थान में चौथी चौकड़ी मदः . हो हाही है, वहां पर प्रहार विहार क्रिया नहीं होती, ध्यान में प्रारुद रहते हैं, सातवें से छठे गुणस्थान में प्राबें, तब वहां पर आहारादि क्रिया है, इसी प्रकार छट्ठा सातवां करते रहते हैं, वह पर अंतर्मुहूर्त काल है । पाठवें गुरणस्थान में चौथी चौकड़ी, अत्यन्त मन्द हो जाती है, वहां राग भाव की अत्यन्त क्षीणता होती है, वीतराग भाद पुष्ट होता है, स्वसंवेदन शान का विशेष प्रकाश होता है। शेणी मांडने से शुक्ल ध्यान उत्पन्न होता है।
श्रेणी के दो भेद हैं, एक क्षपक दूसरी उपशम, क्षपक श्रेणी वाले तो उसी भव में केवलज्ञान पाकर मुक्त हो जाते हैं, और उपशम वाले पाठवें नवमें दशमें से ग्यारहवां स्पर्शकर पीछे मूड़ जाते हैं, सो कुछ-एक भव भी धारण करते हैं, तथा क्षपक याले आठ से नवमें गुरणस्थान में प्राप्त होते हैं, वहां कषायों का सर्वथा नाश होता है, एक सज्वलनलोभ रह जाता है, अन्य सबका अभाव होने से वीतराग भाव अति प्रबल हो जाता है, इसलिए स्वसंवेदन ज्ञान का बहुत ज्यादा प्रकाश होता है, परन्तु एक संज्वलन लोभ बाकी रहने से वहां सराग नारित्र ही कहा जाता है । दशवें गुरण स्थान में सूक्ष्म लोभ भी नहीं रहता, तब मोह की अट्ठाईस प्रकृतियों के नष्ट हो जाने से वीतराग चारित्र की सिद्धि हो जाती है । दसवें से बारहवें में जाते हैं, · ग्यारहवें गुगास्थान का स्पर्श नहीं करते, वहां निमोह वीतरागी के शुक्ल ध्यान का दूसरा पाया (भेद) प्रगट होता है, यथाख्यात चारित्र हो जाता है ।
बारहवें के अंत में ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अंतराय, इन तीनों का विनाश. कर डाला, मोह का नाश पहले हो ही चुका था, तब चारों धालिया कर्मों के नष्ट हो जाने से तेरहवें मुरणस्थान में केवल ज्ञान प्रगट होता है, वहां पर ही शुद्ध परमात्मा होता है, अर्थात् उसके ज्ञान का पूर्ण प्रकाश हो जाता है, निःकषाय है । चौथे गुणस्थान से लेकर बारहवें गुणस्थान तक तो अंतरात्मा है। उसके गुणस्थान प्रति चढ़ती हुई शुद्धता है, और पूर्ण शुद्धता परमात्मा के है, यह सारांश समझना ।
: परमात्मप्रकाश, प्रा. योगी १. नं. १६ गा. १२
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[गो. प्र. चिन्तामणि जो मोक्ष में अधिक गुणों का समूह नहीं होता तो मोक्ष को तीन लोक अपने मस्तक पर क्यों रखता?
अणु जइ जगह दि अहिययरू गुण-गणु तासु ण होह। . सो तहलोउ वि कि धरइ रिणय-सिर उपरि सोइ ॥२१२२॥ .
आगे बतलाते हैं---जो मोक्ष में अधिक मुरणों का समूह नहीं होता, तो मोक्ष को तीन लोक अपने मस्तक पर क्यों रखता ? 'अन्य' फिर 'यदि' जो "जगत अधि" । सब लोक से भी 'अधिकतरः' बहुत ज्यादा 'गुणगणा:' गुणों का समूह 'तस्य' उस मोक्ष में न भवति' नहीं होता ततः' तो 'त्रिलोकः अपि' तीनों ही लोक 'निजशिरसि' अपने मस्तक के 'उपरि' ऊपर तमेव' उसी मोक्ष को कि धरति' क्यों रखते ?
भावार्थ :--मोक्ष लोक के शिखर 'अग्रभाग' पर है, सो सब लोकों से मोक्ष में बहुत ज्यादा गुण हैं, इसीलिए उसको लोक अपने सिर पर रखता है, कोई किसी को अपने सिर पर रखता है, वह अपने से अधिक गुणवाला जानकर ही रखता है। यदि क्षायिक-सम्यक्त्व केवल दर्शनादि अनंत गुण मोक्ष में न होते, तो मोक्ष सबके सिर पर न होता, मोक्ष के ऊपर अन्य कोई स्थान नहीं है। सबके ऊपर मोक्ष ही है और मोक्ष के आगे अनंत अलोक है । वह शून्य है, वहां कोई स्थान नहीं है । वह अनंत अलोक भी सिद्धों के ज्ञान में भास रहा है। यहां पर मोक्ष में अनंत गुणों को स्थापन करने से मिथ्यादृष्टियों का खंडन किया । कोई मिथ्यादृष्टि वैशेषिकादि ऐसा कहते हैं कि जो बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, संस्कार इन नव गुणों के अभाव रूप मोक्ष है ! उनका निषेध किया? क्योंकि इन्द्रियजनित बुद्धि का तो अभाव है । परन्तु केवल बुद्धि अर्थात् केवलझान का प्रभाव नहीं है। इन्द्रियों से उत्पन्न सुख का अभाव है। लेकिन अतीन्द्रिय सुख की पूर्णता है। दुःख इच्छा द्वेष यत्न इन विभाव रूप गुणों का तो अभाव ही है। केवल रूप परिणमन है । व्यवहार-धर्म का अभाव ही है और वस्तु का स्वभाव रूप धर्म वह ही है ! अधर्म का तो अभाव ठीक ही है और पर द्रव्यरूप-संस्कार सर्वथा नहीं है । स्वभाव संस्कार ही हैं। जो मढ़ इन गुरणों का प्रभाव मानते हैं। वे वृथा बकते हैं ! मोक्ष तो अनंत मुरारूप हैं । इस तरह निर्मुरावादियों का निषेध किया तथा बौद्धमति जीव के अभाव को मोक्ष कहते हैं । ये मोक्ष ऐसा मानते हैं. कि जैसे दीपक का निर्माण (बुझना) उसी तरह, जीव का अभाव वही मोक्ष है। ऐसी बौद्ध की श्रद्धा का भी तिरस्कार किया, क्योंकि जो जीव का ही प्रभाव हो गया तो मोक्ष किसको हुना ? जीव का शुद्ध होना वह मोक्ष है।
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अध्याय : दसवां ]
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प्रभाव कहना वृथा है । सांख्य दर्शन वाले ऐसा कहते हैं कि जो एकदम सोने की water है, वही मोक्ष है । जिस जगह न सुख है, न ज्ञान है ऐसी प्रतीति का निवारण किया ऐसा कहते हैं कि जहां से मुक्त हुआ वहीं पर ही तिष्ठता है ऊपर को गमन नहीं करता ऐसे नैयायिक के कथन का लोक शिखर पर तिष्ठता है । इस aar से निषेध किया, जहां बंधन से छूटता है, वहां वह नहीं रहता, यह प्रत्यक्ष देखने में आता है । जैसे :-- कैदी जब कैद से छूटता है । तब बंदीगृह से छूटकर अपने घर की तरफ गमन करता है । वह निजघर निर्धारण ही है । जैन-मार्ग में इन्द्रियजनित ज्ञान जो कि मति, श्रुत, अवधि मन:पर्यय है उनका अभाव माना है । और अतीन्द्रिय रूप जो केवल ज्ञान है । वह वस्तु का स्वभाव है । उसका प्रभाव आत्मा में नहीं हो सकता है। स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द रूप इन पांच इन्द्रिय विषयों कर उत्पन्न हुए सुख का तो प्रभाव ही है। लेकिन प्रतीन्द्रिय सुख जो निराकुल परमानंद है । उसका प्रभाव नहीं है । कर्मजनित जो इन्द्रादिक दश प्रारण अर्थात् ५ इन्द्रियां मन वचन काय या श्वाच्छोश्वास इन दश प्रारणों का भी प्रभाव है । ज्ञानादि निज प्राणों का अभाव नहीं है । जीव की शुद्धता का प्रभाव है। शुद्धपने का अभाव नहीं यह निश्चय से जानना |
प्रश्न :- अगर जो मोक्ष उत्तम सुख नहीं दे, तो सिद्ध उसे निरंतर क्यों सेवन करें ?
मुक्खु न होइ ।
उत्तर :- उत्तम सुक्खु र देइ जर उस तो कि सलु कि कालु जिय सिद्ध वि सेर्वाह सोइ ।।२१२३ ।। आगे कहते हैं कि जो मोक्ष उत्तम सुख नहीं दे तो सिद्ध उसे निरंतर क्यों सेवन करें ? 'यदि' जो 'उत्तम सुख' उत्तम अविनाशी सुख को 'न ददाति' नहीं देवे तो 'मोक्षः उत्तमः ' मोक्ष उत्तम भी 'न भवति' नहीं हो सकता, उत्तम सुख देता है । इसीलिए मोक्ष सबसे उत्तम है। जो मोक्ष में परमानंद नहीं होता 'ततः' तो 'जीव' हे जीव 'सिद्धा अपि सिद्ध परमेष्ठी भी 'सकलमपि कालं' सदा काल 'तमेव' उसी मोक्ष को 'कि सेवते' क्यों सेवन करते ? कभी भी न सेवते ।
भावार्थ--- वह मोक्ष प्रखंड सुख देता है, इसीलिये उसे सिद्ध महाराज सेवते हैं । मोक्ष परम आल्हादरूप है, अविश्वर है । मन और इन्द्रियों से रहित है, इसीलिये उसे सदाकाल सिद्धसेवते हैं । केवलज्ञानादि गुण सहित सिद्ध भगवान् निरंतर निर्वाण में ही निवास करते हैं । ऐसा निश्चित है । सिद्धों का सुख दूसरी जगह भी ऐसा कहा
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[ गो. प्र. चिन्तामणि है। "प्रात्मोपादान" इत्यादि इसका अभिप्राय यह है कि इस अध्यात्मशान' से सिद्धों के जो परमसुख हुआ है। बह कैसा है? कि अपनी-अपनी जो उपादान शक्ति है, उसी से उत्पन्न हुआ है । पर की सहायता से नहीं है स्वयं (आप ही) अतिशयरूप है। सब बाधाओं से रहित है, निराबाध है, विस्तीर्ण है, घटती बढती से रहित है, विषय 'विकार से रहित है। भेदभाव से रहित है, निर्द्वन्द है, जहां पर वस्तु की अपेक्षा ही नहीं है, अनुपम है । अमन है अपार है, जिसका प्रमारण नहीं सदा काल शाश्वत है। महा उत्कृष्ट है, अनंत सारता लिये हुये है, ऐसा परमसुख सिद्धों के है । अन्य के नहीं है । यहाँ तात्पर्य यह है कि हमेशा मोक्ष का ही सुख अभिलाषा' करने योग्य है। और संसार पर्याय 'सब हेय हैं। क्या सभी पुरुषों के मोक्ष ही ध्याय पोय हैं ?
तिहयरिण जीवह अप्यि रवि सोक्सह कारणु कोई । भुक्खु मुएविणु सक्कु पर तेषवि विसहि सोर ।।२१२४॥
अब तीन लोक में मोक्ष के सिवाय अन्य कोई भी परम सुख का कारण नहीं ..है। ऐसा निश्चय करते हैं
.. 'त्रिभुवने' तीन लोक में 'जीवाना' जीवों को 'मोक्ष मुक्त्वा मोक्ष के सिवाय 'किमपि' कोई भी वस्तु 'सुखस्य कारणं' सुख का कारण . 'नैव' नहीं है । 'अस्ति' है। एक सुख का कारण मोक्ष ही है । 'तेन' इस कारण तू 'परं एक त एव' नियम से एक मोक्ष का ही विचितय' चितवन कर , जिसे कि महा मुनि भी चितवन करते हैं। . ... भावार्थ :--श्री योगींद्राचार्य प्रभाकर भट्ट से कहते हैं कि वत्स, मोक्ष के . सिवाय अन्य सुख का. कारण नहीं है। और आत्म--ध्यान के सिवाय अन्य मोक्ष का कारण नहीं है । इसलिये तू बीतराग निर्विकल्प समाधि में ठहर कर निज शुद्धात्म स्वभाव को ही ध्या। यह श्री गुरु ने आज्ञा की। तब प्रभाकर भट्ट ने विनती की, हे भगवान तुमने निरंतर भतीद्रिय मोक्ष सुख का वर्णन किया है सो ये जगत के प्राणी अतीन्द्रिय सुख को जानते ही नहीं है । इन्द्रिय सुख को ही मानते हैं । तब गुरू ने कहा कि हे प्रभाकर भट्ट कोई एक पुरुष जिसका चित्त व्याकुलता रहित है । और पंचेन्द्रिय . के भोगों से रहित अकेला स्थित है, उस समय किसी पुरुष ने पूछा तब उसने कहा कि सुख से तिष्ठ रहे हैं उस समय विषय सेवनादि सुख तो है ही नहीं, उसने यह न्यो । कहा कि हम सुखी हैं ।
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अध्याय : दसवां ]
[ १००१
व्याकुलता रहित का है । सुख का
इसलिये यह मालूम होता है सुख नाम मूल निर्व्याकुलपना है वह froriकुल अवस्था
श्रात्मा में ही है । विषय सेवन में नहीं भोजनादि जिव्हा इन्द्रिय का विषय भी उस समय नहीं है। स्त्री सेवनादि स्पर्श
का विषय नहीं है । और गंध माल्यादिक नाक का भी विषय भी नहीं है। दिव्य स्त्रियों का रूप अवलोकनादि नेत्र का भी विषय नहीं है । और कानों का मनोज्ञ गीत वादित्रादि शब्द विषय भी नहीं है । इसलिये जानते हैं कि सुख आत्मा में ही है । ऐसा तू निश्चय कर, जो एकोदेश विषय व्यापार से रहित है । उनके एकदेश स्थिरता का सुख है । तो वीतराग निवकल्प स्वसंवेदन ज्ञानियों के समस्त पंचइन्द्रियों के विषय और मन के विकल्प जालों की रूकावट होने पर विशेषता से निर्व्याकुल सुख उपजता है । इसलिये ये दो बातें तो प्रत्यक्ष ही दृष्टि गत हैं। जो पुरुष निरोग और चिंता रहित है । उनके विषय सामग्री के बिना ही सुख शासता है और जो महा मुनि शुद्धोपयोग अवस्था में ध्यानारूद हैं उनके निर्व्याकुलता प्रगट ही दीख रही है । वे इन्द्रादिक देवों से भी अधिक सुखी हैं । इस कारण जब संसार अवस्था में ही सुख का मूल निर्व्याकुलता दीखती है । तो सिद्धों के सुख की बात ही क्या है ? यद्यपि वे सिद्ध दृष्टिगोचर नहीं हैं, तो भी अनुमान कर ऐसा जाना जाता है कि सिद्धों के भावकर्म, द्रव्यकर्म, तो कर्म नहीं तथा विषयों की प्रवृत्ति नहीं है, कोई भी द्रिय आत्मीक सुख ही है ! वही सुख उपादेय है चारों गतियों की पर्याये हैं उनमें कदापि सुख नहीं है। सुख तो सिद्धों के है या महामुनीश्वरों के सुख का लेश मात्र देखा जाता है । दूसरे के जगत की विषय वासनाओं में सुख नहीं है - ऐसा ही कथन श्री प्रवचनसार में किया है । "अइसय" इत्यादि । सारांश यह है कि जो शुद्धोपयोगकर प्रसिद्ध ऐसे श्री सिद्ध परमेष्ठि हैं, उनके ग्रतीन्द्रि सुख है, वह सर्वोत्कृष्ट है और ग्रात्मजनित है तथा विषय-वासना से रहित हैं अनुपम है जिसके समान सुख तीन लोक में भी नहीं है, जिसका पर नहीं ऐसा बाधा रहित सुख सिद्धों के है ।
विकल्प जाल नहीं हैं, केवल प्रतीअन्य सुख सब दुःखरूप ही हैं जो
आ. योगीन्दु देव परमात्म प्रकाश श्रध्याय २, गा. ६-७-६
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अध्याय ग्यारहवां अनेकान्त एवं स्याद्वाद
अनेकान्त की वृष्टि में भाग्य एवं पुरषार्थ का स्वरूप
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त
परमागमस्य बोजं निषिद्धजात्यन्ध सिन्धुर विधानम् ।
सकल नय विलसितानां विरोधमथनं नामान्यनेकान्तम् ॥२१२५॥
विश्व की समस्त वस्तु श्रनेकान्त स्वरूप होने के कारण उसको प्रतिपादन करने वाली वाणी भी अनेकान्त स्वरूप ही होना चाहिए ? यह सिद्धान्त नहीं है कि "प्रतिपादन करने वाली वाणी अनेकान्त स्वरूप है, इस कारण वस्तु श्रनेकान्तात्मक है ।" अनेकान्त का अर्थ "अनेके अन्ताः धर्माः यस्यासौ स अनेकान्तः " ( अनेक + अन्त ), जिसमें अनेक अन्त अर्थात् धर्म पायें जाते हैं । उसे अनेकान्तामक कहते हैं। समस्त वस्तुएँ अनेकान्त स्वरूप हैं इसलिये वस्तु अनेकान्त मय है | Who have many characteristics that is cailed 'Anekant' that means Substances. 'जिनेके अनेक धर्म (स्वभाव ) है, उसको अनेकान्त कहते हैं अर्थात् वस्तु) में यह अनेक धर्मात्मकपना किसी ने कभी प्रवेश नहीं करा दिया। यह वस्तु का स्वरूप होने से अनादि से स्वतः सिद्ध है |
“यदीयं स्वयमर्थेभ्यो रोचते तत्र के वयम् " -- यदि यह अनेक धर्मरूपता वस्तु को स्वयं पसन्द है, ( उसमें है, वस्तु स्वयं राजी है) तो हम बीम में अराजी (नहीं मानने वाला) कौन ? जो अस्ति रूप है, वह अनेकान्तात्मक है एवं वही वस्तु अर्थ क्रिया कारी बन सकती है
जं वच्यु ग्रयत तं चित्र कज्जं करेदि रिrयमेण । कज्जकरं दीस लोए ॥२२५॥ बहुधम्म जुदं अस्थ
स्वा. कीर्ति क्योंकि लोक भी कार्य की
अर्थ -- जो वस्तु श्रनेकान्त रूप है, वही नियम से कार्यकारी है, में बहुत धर्मयुक्त पदार्थ ही देखा जाता है । "सिद्धिरने कान्तात्" किसी सिद्धि अनेकान्त से ही हो सकती है ।
उपरोक्त प्रमाण से सिद्ध हुआ कि प्रत्येक सत् श्रनन्त धर्मात्मक है, अनन्त afree प्रमेय को (ज्ञेय) प्रमाण का विषय करने के लिये (ज्ञान करने के लिये )
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अध्याय : ग्यारहवां ]
[ १००३ अनन्त प्रमेयत्व पना (ज्ञान पना) आवश्यक है। यदि अनन्त ज्ञान है, तो एक समय समस्त ज्ञेय पदार्थों को एक साथ जान सकते हैं, केवल ज्ञान में अनन्त ज्ञायकत्व पना है। इस कारण अनन्त धर्मात्मक वस्तु युगपत् ज्ञान का विषय हो जाती है, किन्तु ज्ञात पदार्थ का प्रतिपादन करने के लिये जिसका माध्याम (Medium ) लिया जाता है। उस शब्द रूप वचनों में अनन्त धर्मों की युगपत प्रतिपादन करने की शक्ति नहीं होने के कारण वह वस्तु का आंशिक प्रतिपादन करता है। जैसे किसी व्यक्ति के पास १० मीटर वस्त्र है, उस व्यक्ति ने उस वस्त्र को नापना चाहा । यदि उसके पास १० मीटर वाला मापदण्ड हो तो वह एक साथ वस्त्र को भाप सकता है, किन्तु उसके पास १ मीटर वाला मापदण्ड है इस कारण उसको १० बार नापना पड़ता है। वह एक या दो मीटर माप करते हुये यह नहीं सोचता है कि जो मैं वर्तमान में १ मीटर परिणाम रूप वस्त्र माप कर रहा हूँ, वस्त्र उतना नहीं है किन्तु वह जानता है कि बस्त्र जितना लम्बा है उतना ही है किन्तु मैं वर्तमान में १ मीटर लम्बा वस्त्र को माप रहा हूँ, इस प्रकार
इस रूप से ज्ञान का विषय होने पर भी पूर्ण रूप से वचनों के अगोचर है। अनेकान्तात्मक वस्तु को निर्दिष्ट-यथार्थ रूप से कथन करने वाले कथन को (भाषा को) अनेकान्तवाद, अनेक धर्म वाद या स्याद्वाद कहते हैं। "अनेकान्तात्मक अर्थ कथनं स्थाद्वादः' -अनेकान्तात्मक-अनेक धर्म (स्स्वभाव ) विशिष्ट वस्तु का कथन करना स्याद्वाद है। The meaning of the word 'Anekantvada' The word Anekantvada' consists of three woris; Aneka 'Anta' and Vada. 'Aneka' means many. 'Anta' signifies attributes and Vada' means description. The whole word means the description of many fold attributes.
- "स्याद्वाद" -- (स्यात् +वाद) स्यात्-किसी निश्चित अपेक्षा से अनेक धर्म समूह को विषय करने वाला । इस शब्द द्वारा अनेकान्त और सम्यक् एकान्त का बोध कराने वाला । वाद-कथन । स्याद्वाद वस्तु के यथार्थ रूप का निश्चय करने के कारण स्याद्वाद अर्थ यथार्थ कथन है । Syadvada consists of two words; syat and Vada.' This syat suggests. The existence of infirite attributes a tlough the expression asserts about a particularattributes Syat' suggerts the from a particular stand-pont the trut reveals it self in a particular form. From other view-point the same substartum appears to possess other attributes.
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[ गो. प्र. चिन्तामणि वस्तु अनेक स्वभावात्मक होने के कारण पूर्ण रूप से वचनों के अगोचर होने परं भी वस्तु को सर्व प्रवक्तव्य कहना भी असद्वाद है। क्योंकि इस दशा में "श्रवक्तव्य" यह वचन भी नहीं बोल सकेंगे जैसे कि मौनव्रती "मैं मौनव्रती हूं" यह शब्द भी नहीं बोल सकता है और भी जैसे कोई व्यक्ति कह रहा है कि मैं आपकी बात नहीं सुन रहा हूं क्योंकि "मैं गाढ़ निद्रा में सोया हूँ" इस प्रकारं वस्तु अव्यक्तव्य नहीं है । उसका कथन गौरण मुख्य रूप से होता है । “अर्पितनापित सिद्ध:":- धर्मान्तर विवक्षा प्रापित प्राधान्यमर्पित अनेकात्मकस्य वस्तुनः प्रयोजनक्शात् पर-३ मा विनर विवक्षय प्रापित प्राधन्यम् अर्थस्यमर्पितमुपनीतमिति यावत् । गौण और मुख्य विवक्षा से एक ही वस्तु में नित्यत्व और अनित्यत्व धर्म सिद्ध है इस प्रकार अनेक धर्म भी प्रयोजनवश अनेकान्त वस्तु के जिस धर्म की विवक्षा होती है या विवक्षित जिस धर्म को प्रधानता मिलती है उसे अर्पित कहते हैं। तद्विपरीतमनर्पितम्। प्रयोजन भावात् सतोऽप्यविवक्षा भवति इत्युपसर्जमो भूतमनर्पितमित्युच्यते जिन धर्मों के विद्यमान रहने पर भी विवक्षा नहीं होती, उन्हें 'अनर्पित' कहते हैं ।
"Substances are endowed with an infinite nuber of attributes. When we describe a substance we can do so by adopting one pojat of vi at a time so giving prominece to a fewattributes However it does not mean that other attributes are of no purpose to us at that time.”
. वर्तमान युग वैज्ञानिक युग है। इस युग में प्रत्येक कार्य वैज्ञानिक सिद्धात ( Scientific theory ) के अनुसार विश्लेषण किया जाता है । परीक्षा प्रधानी व्यक्ति वैज्ञानिक कार्यकारण भाव के अनुसार प्रत्येक विषय को परीक्षा करके में उसको ग्रहण करता है । वर्तमान युग के आधुनिकता रूपी रंग के चश्मा धारण करने वाले व्यक्ति अाधुनिकता में जो कुछ हो रहा है। भले वह नैतिक पतन का कारण हो, किम्वा,
आध्यात्मिकता का प्रध्वंसक हो, अहिंसा का घातक हो, जन गण का अहितकारी हो, विश्व का विध्वसंक हो, प्रेम, भातृत्व वात्सल्य का लोप करने वाला हो, समाज में धर्म में, साधर्मी में भेद डालने वाला हो तो भी उसको सहर्ष ग्रहण करता है।
उसका यह कार्य अपाततः रमरणीय होने पर भी उसका कल किपाक फल भक्षण के समान विपाक मधुर नहीं होगा और 'विषकुम्भ पयोमुख' के समान अन्तः ।
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अध्याय : ग्यारहवां ]
[ १००५ निसार एवं फल भयावह होगा । वर्तमान वैज्ञानिक जगत को वास्तविक प्रकाश प्रदान करने वाले, महान समन्वय वादी, मरिणतज्ञ, निस्पक्षी महामना प्राइन्ष्टिन ( Einstein) के "सापेक्षवाद" (The theory of Relativity) "स्याद्वाद" का ही अनुकरण है ।
____The analogue, in modern science, of the theory of syadvada is the Einstein's famous theory of Relativity.
Relativity describes the fact that the old laws of physics were not universally true they are true only in the limited sphere of inaccurate obs. ervation; they were merely relative. What the rathematicians have done is to derive formulas which shall be universally true for all conditions of space and matter and motions and lime.
According to Eninstein, we can know the truth, but not real truth or absolute truth. We can only know the relative truth; the real truth is known only to the universal Observer. Universal observer of Einstein is noen else but the Almighty [Sarvaina omniscient) with infinitepowers of knowledge and bliss.
प्राइष्टिन के सापेक्षवाद के अनुसार हम सब जो जानते हैं वह संपूर्ण सत्य (Absolute truth ) नहीं है, किन्तु सापेक्षिक सत्य है (retative truth) सम्पूर्ण सत्य सर्वदर्श सर्वज्ञ के द्वारा ही जाना जाता है प्राचीन पदार्थ विज्ञान का जो सिद्धान्त है वह वास्तविक सत्य नहीं है, बहुत कुछ क्षेत्रों में प्रांशिक सत्य है । जो सिद्धात गरिणत के हिसाब से प्रदेश ( Space ) पदार्थ { Matter) क्रिया ( Motions) एवं समय के ( Time ) के सापेक्ष से है वह सत्य है वह प्रत्येक बस्तु का क्रिया गति, दिशा, स्थिति आकार आदि सापेक्ष मानते हैं।
___lf we want to know are the theorier of Science absolu truths ? No, they are not science is a serier of approximation to the truth, at no stage do we claim to have reached finality; any theory is liable to revision in the liget to new facts.
विज्ञान सम्पूर्ण सत्य नहीं है, यह सत्य की खोज एक क्रम है। किसी भी परिस्थिति में हम नहीं कह सकते हैं कि विज्ञान पूर्वसः सत्य है, दर्शन शास्त्र के आवलम्बन से विज्ञान खोज [discover] करता है । दर्शन शास्त्र का विषय मूर्तिक
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१००६]
[ मो. प्र. चिन्तामणि अमर्तिक दोनों पदार्थ हैं जबकि विज्ञान का विषय केवल मतिक है।
The scripture of phyilosophy described all with out form and possessed of form substances when the science described only possessed of form substances. So it is true that philosophy is the father of the science.
दर्शन विज्ञान का जनक है । दर्शन का क्षेत्र व्यापक एवं विज्ञान का व्याप्य है। इस प्रकार महान् , परम गम्भीर, जिसका अमोघ चिन्ह (विजय पताका) स्याद्वाद है। इसी प्रकार प्रोकायो प्रमोकास में माल स्मरण से मैं जो अनादि कालीन पर समय रूपी देव राज्य में परिभ्रमण कर रहा हूँ वहां से दैव एवं पुरुषार्थ के द्वारा स्वसमय रूपी पुरुषार्थ राज्य में स्वतंत्र से निवास करू यह काम है ।
श्रीमत्यम्म गम्भीर स्वाद्वार मोघलाञ्छनम् । जीयात् त्रैलोक्यनाथस्य, शासन जिनशासनम् ।।२१२६॥
अनादि काल से अनेकता स्वरूपी आत्मा परम पुरुषार्थ के अवलम्बन से रहित होकर अशुभ शुभ पुरुषार्थ के कारण देव रूपी चक्रवर्ती के साम्राज्य में पराधीन होकर भाकुलता का अनुभव कर रहा है । अत्यन्त सुदूर अनादि काल से परम पुरुषार्थ के अभाव से दैव की अधिनता में रहते-रहते एवं उसका ही कार्य करते-करते अपने को भूल बैठा है।
सुद परिचिचा भूदा समस्त वि काम भोग बंध कहा। एयत्तस्सुवलम्भो रगवरि ग सुलभो वित्तस्स ॥२१२७॥
The discourse relating to sence-enjoy ment and karmic bondage is heard understood and experienced by all the mudane souls. But realisation of absoulute one ness with its own nature free from attechment is not easy of attainment.
___ लोगों को काम भोग विषयक बंध की कथा तो सुनने में, परिचय में एवं अनुभव में बार बार पायी हुई है, इसलिये सुलभ है। किन्तु केवल भिन्न प्रात्मा का एकपना होना कभी न सुना, न परिचय में आया और न अनुभव में आपा, इसलिये एक यही सुलभ नहीं है ।
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अध्याय : ग्यारहवां]
[१००७ वर्तमान हम देव एवं पुरुषार्थ का वैभव एवं शक्ति का पर्यालोचन करेंगे जिनों का साम्राज्य संसार एवं मोक्ष है।
यत्प्राग्जन्मनि संचितं तनुभृता कर्माशुभं वा शुभं, तवं सददीरमादनभवन वखं सखं वागतम. कुर्याधः शुभमेष: सोऽप्यभिमतो घस्तूभयोपिछत्तये; सर्वारम्भ में परिग्रह ग्रहपरित्यागी स वन्द्यः सताम् ॥२१२।।
जीव ने पूर्वभव में जिस पाप या पुण्य कर्म का संचय किया, वह देव है। बह देव दो प्रकार का है (१) पाप देव (२) पुण्य दैव ! इन दोनों देव का सृष्टि करने वाला जो कर्ता है वह यथाक्रम (१) असत् पुरुषार्थ (२) शुभ पुरुषार्थ शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य | Virtuous activity is the cause of merit (Punya) and wicked activity is the cause of demerit (Papa) उसकी उदीरणा से अर्थात् पाप देव एवं पुण्य देव का शासन काल में दोनों देव को अनुभव करता हुआ, जो.बुद्धिमान शुभ को ही करता है अर्थात शुभ पुरुषार्थ को करता है, पाप पुरुषार्थ का त्याग करता है वह ही प्रशंसा योग्य है। किन्तु जो (३) परम पुरुषार्थी दोनों देव को ही नष्ट करने के लिये समस्त दैव का (अनुग्रह एवं कृतज्ञता (प्रारम्भ व परिग्रह) रूपी पराधीनता को त्याग करके परमपुरुषार्थ रूप स्वाधीन स्वराज्य में रमण करता है वह तो सबन पुरुषों के लिये बन्दनीय है।
___ यह महा पराक्रमी धूर्त, मूर्ख (जड़) दैव विभिन्न राज्य में विभिन्न नाम धारण करके पुरुषों के ऊपर शासन करता है।
विधि स्रष्टा विधाता च देवं कर्म पुराकृतम् । ईश्वरश्चेति पर्याया विज्ञेया कर्मवेधसः ॥२१२६॥
विधिः, सृष्टा, विधाता, देव, कर्म, पुराकृतम्, ईश्वर, कर्म आदि अनेक नामों को धारण करने वाला यह जड देव है । यह देव है । यह देव मुर्ख (जड) होकर भी संसार में एक जगाधिप शासन करने की शक्ति प्रशिक्षित, आलसी पुरुषार्थ विमुख पुरुषों से प्राप्त हुआ।
जीव परिणामहेदु कम्मत्तं पुग्गल परिमति । पुग्गलकम्मणिमित्तं तहेब जीवो वि परिगमः । स. सा६०।
Material molecules are trans formed in to Karmas by reason of the mündárie soul's thought-activity; Similarly the mundane soul-is trans
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[ गो. प्र. चिन्तामणि
formed (in to its impure thought-activity) by reason of operation of Karmic matter.
जीव परिणाम को निमित्त मात्र करके पुद्गल कर्म भाव से परिगमन करते हैं, पुद्गल कर्म को निमित्त मात्र कर जीव भी परिणमन करता है । इसी प्रकार देव को शक्ति प्रदान करने वाला पुरुष (परम पुरुषार्थ हीन पुरुष) है और उस शक्ति के अनुशासन में शासित होने वाला पुरुष है । जब पुरुष उसको शक्ति प्रदान करता हैं, तब दैव विभिन्न रूप धारण करके विभिन्न कार्य करता हैं । . ..
जह पुरि सेरगाहाले पहिलो परिमादि मावनिह। मंसवसारहिरादि भावे उदयरगि संजुत्तो ॥२१३०॥
As the food taken by a man is modified in many way, in the form of flesh, nerver, blood, etc., by reason of the digestive heat of the human system. That like the molecules of the Karmic mater modified in many, in the form of eight kinds of Karma by impure thought activity of the mundane soul.
· जैसे पुरुष द्वारा ग्रहण किया गया आहार वह उदराग्नि से युक्त हुश्रा अनेक-अनेक प्रकार मांस रस रुधिर आदि भावों रूप परिणमता है, उसी प्रकार कर्म पुद्गल भी जीवों के रागादि भावों को प्राप्त करके ४ प्रकार अथवा अनेक प्रकार देव रूप से परिणमन करता है ।
जिस प्रकार अतितुच्छ धूलि मन्त्र शक्ति युक्त होकर अनेक प्राश्चर्यजनक कार्य करती हैं, उसी प्रकार कर्मरूपी धूलि भी रागद्वेष शक्ति से युक्त होकर अनेक
आश्चर्य जनक कार्य करती है, जिस प्रकार हल्दी एवं चूना मिलकर अपना रूप त्याग करके लाल रंग हो जाते हैं, और उस अवस्था में दोनों का पृथक्-पृथक् सत्ता स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर नहीं होती है, उसी प्रकार पुरुष एवं दैव की अवस्था होती है।
अविज्ञातस्थानो व्यपगततनुः पापमलिनः, खलो राह स्विश शसकरा क्रान्त भुवनम् ।.:.. स्फुरन्तं स्विन्त किल गिलति हा कष्टम परः, . परिप्राप्ते काले विलसति विधौ को हि बलवान ॥२१३१॥ प्रात्मानुशासनं
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अध्याय : ग्यारहवां ]
[ १००६ जिस प्रकार एक हजार (किरण) प्रकाश से विश्व पर आक्रमण करने वाला अतिशय प्रतापी सूर्य भी समय आने पर (ग्रहण के समय) जिसका स्थान अज्ञात है, जो शरीर से रहित है, जो पाप से मलिन है यह दुष्ट राहु कवलित करता है; तो भी प्रतापशाली सूर्य भी राहु के आक्रमण से प्रात्मरक्षा नहीं कर सकता है, उसी प्रकार कितना भी बलवान् पुरुष क्यों न हो, किन्तु वह भी काल से अपनी रक्षा नहीं कर सकता है। ठीक है-समयानुसार देव उदय आने पर दूसरा कौन बलवान होमा ?
जिस प्रकार कूटनी हस्तीनी की भोग इच्छा रूपी कुपुरुषार्थ के कारण महा प्रताप शाली स्वाधीन विचरण करने वाला गजराज भी जंगली दुष्ट पापियों के द्वारा पराधीन होकर उन्हीं को ही अपना स्वामी एवं पालन पोषण करने वाला एवं सर्वेसर्वा मानकर उन्हीं की ही सेवा करने लग जाता है, उसी प्रकार पुरुष भी अपना कुपुरुषार्थ के कारण देव के प्राधिन होकर देव को ही सर्वेसर्वा मान बैठता है।
दइयमेव परं मपणे धिप्पउरुसमस्ययं । .. . .. .
एसो सालसमुत्तुगो कष्णो हराइ संगरे ॥२१३२॥ . .. . __ मैं केवल देव (भाग्य) को ही उत्तम मानता हूँ, निरर्थक पुरुषार्थ को धिक्कार हो, देखो कि किले के समान ऊचा जो बह कर्ण नामा राजा सो युद्ध में मारा गया । जो एकान्ततः भाग्य से ही कार्य सिद्ध मानते हैं. उस का भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता .
देवावेवार्थ सिद्धिश्चेद् वैवं पौरुषतः कथम् । दैवतश्चेद निमोक्षः पौरुषं निष्फलं भवेत् ।।२१३३॥
अन्वय-देवादेव अर्थसिद्धिः चेत् (तदा) पौरुषतः देवं कयं (स्यात्) देवतः चेत् अनिमोक्षः पौरुष (च) निष्फलं भवेत् । ..
देव (भाग्य) से ही एकान्ततः कार्य की सिद्धि (सुख, दुःख, ज्ञान, अज्ञान, . कार्य की सफलता, निष्फलता) अंगीकार किया जाय तो प्रश्न यह उठता है कि भाग्य कैसे बना? क्योंकि "स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा, फलं तदीयं लभते शुभाशुभम्।"
"What ever Karaas you have performed pereviously, you experience their fruits, whether good or evil.”
यह जीव पूर्व में जो शुभ या अशुभ पुरुषार्थ किया था, उसका फलस्वरूप वह पुरुषार्थ का परिपाक रूप शुभ अशुभ रूप भाय को उपभोग करता है । अर्थात्
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१०१० ]
भूत का पुरुषार्थ वर्तमान से परिणमन करता है, वैसा पायेंगे;
[ गो. प्र. चिन्तामणि
का भाग्य एवं वर्तमान का पुरुषार्थं भविष्यत का भाग्य रूप जैसे बीज से वृक्ष एवं वृक्ष से बीज की तरह । जैसा बोयेंगे
As we sow So we reap. पुरुषार्थ एवं भाग्य में कारण कार्य भाव है । साधारण सकल जन्तुषु वृद्धि नाशशौ, जन्मान्तराजित शुभाशुभ कर्म योगात् । धीमान् स यः सुगति साधन वृद्धि नाशः, तद्वत्याद्विगत धीर परोऽभ्यधायी ॥ २१३४॥
समस्त प्राणियों में समान रूप से पूर्व जन्म में संचित किये
एवं
पाप भाग्य के उदय से प्रायु शरीर एवं धन-सम्पत्ति आदि की वृद्धि और उनका नाश होता । यदि इस प्रकार कहा जाय कि देव की सिद्धि पूर्व देव से ही होती है अर्थात् पहले २ के भाग्य से ही आगे २ का भाग्य बनता चला जाता है, तब तो इस प्रकार से भाग्य की परम्परा चलती रहने से कभी भी किसी को मोक्ष नहीं हो सकेगा और जो इस भाग्य परंपरा से चलता रहता है, वह " तद्वयत्ययाद्विगत धीर परोऽभ्यधायी " दुर्गंति ( भाग्य ) के साधन भूत वृद्धि माश को ( पुरुषार्थ को ) श्रपमाने से निर्बुदिव कहा जाता है । जो अभव्य एवं दूरान्दूर भव्य हैं, जिन्ह को कभी भी मोक्ष जाना नहीं है, वह अनादि पूर्व परंपरा देव से अनन्त परंपरा देव ग्राधीन रहकर भाग्य की अता से स्वाधीन कभी नहीं हो सकता है। किन्तु इससे विपरीत "श्रीमान स यः सुगति साधन वृद्धि नाशः सुगति अर्थात् मोक्ष की सिद्धि करने और वृद्धि एवं भाग्य का नाश करने के लिए पुरुषार्थ को अपनाता है बुद्धिमान, भव्य पुरुषार्थ है, उसका भाग्य अनादि एवं शान्त है । यदि देव से ही कुछ मान लिया जायेगा, तो भाग्य की उत्पत्ति रोकने के लिए जो पुरुषार्थ किया जाता है, वह भी निष्फल हो जायेगा । यदि पुरुषार्थ की सफलता निमित्त है ऐसा कहा जाय तो पुरुषार्थ से ही भाग्य का विनाश होता है । इससे मोक्ष की प्रसिद्धि होने से पुरुषार्थ सफलित हो जावेगा, सो इस प्रकार का कथन "देवादेव सर्वः भवति इति या प्रतिज्ञा सा हीयते" देव से ही सब कुछ होता है, इस कथन का निवारण हो जाता है, क्योंकि इस कथन से पुरुषार्थ भी कार्यकारी
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अध्याय : ग्यारहवा ]
[ १०१६ साबित हो जाता है, यदि ऐसा कोई भाग्य की कृतज्ञता प्रदर्शन करने के लिए मानेगा तो "मोक्ष का कारण भूत जो पुरुषार्थ होता है। वह भी तो भाग्य कारण होता हैं" अतः परम्परा से ऐसा सम्बन्ध होने से मुक्ति भी देव के कारण है। तब तो स्याद्वाद अनेकांतवाद होने से सत्य हुआ जो कि बस्तु स्थिति है।
समादिठ्ठी पुष्णं रख होई संसार कारणं णियमा। मोक्खस्स होइ है जहवि रिगयाणं ण सो कुणई ॥२१३।।
द्रव्यसंग्रह। सम्यक्त्वी का (शुभ पुरुषार्थी) भाग्य का कारण नहीं होता है । यदि वह निदान (भाग्य के अधीन में रहने की इच्छा) नहीं करता है, तो वह भाग्य परम्परा से मोक्ष का हेतु होता है। कारण
येनांशेन सुदृष्टि स्तनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । पेनांशेन तु राग स्तेनाशे नास्य बन्धनं भवति ।।२१३६।।
जितने अंश में सम्यक्त्वपना (पुरुषार्थ) है, उतने अंश में भाग्य की पराधीनता (बन्धन) नहीं है और जितने अंश में मिथ्यात्व (असत् पुरुषार्थ) है, उतने अंश में भाग्याधीन (बन्धन) है।
शुभाशुभे पुण्यपापे, सुखे दुःखे च षट् त्रयम् । हितमाद्य मनुष्यंटेयं शेषत्रम् माहितम् ॥२१३७॥ तत्राप्यय परिस्याज्यं शेषौ न स्त: स्वतः स्वम् । शुभं च शुद्ध त्यक्त्वान्तते प्राप्नोति परमं पदम् ।।२१३८॥
शुभ और अशुभ, पुण्य और पाप तथा सुख और दुःख में से आत्मा के लिए हितकारक होने से आदि के तीन शुभ, पुण्य एवं सुख आचरण के योग्य हैं। शेष तीन-~अशुभ, पाप और दुःख-अहित कारक होने से छोड़ने के योग्य हैं । शुभ, पण्य और सुख में से शुभ पुरुषार्थ का परित्याग करना चाहिए। तब शुभ पुरुषार्थ से उत्पन्न होने वाला पुण्य सुभान्य एवं उसका कार्य सुख (सांसारिक सुख) ये दोनों स्वयं ही नहीं रहेंगे । इस प्रकार शुभ पुरुषार्थ को त्याग करके परम पुरुषार्थ में रमण करने से अन्त में पुरुष अपना पुरुषार्थ सिद्धि (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है।
भाग्य परम्परा से मोक्ष का कारण होने से व्यवहार से (एक दष्टि से) मोक्ष का कारण माना जाता है, किन्तु एकान्ततः भाग्य ही मोक्ष का कारण मानने
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१०१२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि पर मोक्ष रूपी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि भाग्य के अभाव रूप कारण से एवं परम पुरुषार्थ रूप कारण के सदभाव होने पर मोक्ष रूपी कार्य सिद्ध होता है।
यस्य पुण्यं च पापत्र निष्फलं. गलति स्वयम् । . स योगी तस्य निर्वाणं न तस्य पुनरास्त्रवः ।।..
. He whose meirit and demerit (Karmas). Exhoust themselves with out beariog fruit, is a true ascetic. He will never bave the karmię inflow and will attain liberation.
जिस वीतराग के पुण्य एवं पाप दोनो भाग्य फलदान के बिना स्वयं अविपाक निर्जरा स्वरूप से निर्जीण होते हैं, वह योगी (पुरुषार्थी) कहा जाता है और उसके भाग्य की पराधीनता छूट जाती है, स्वाधीनता (मोक्ष प्राप्त हो जाता है, किन्तु प्राश्रव (भाग्य की सृष्टि) नहीं होती है । ....... ..परम पुरुषार्थी पुरुष "प्रत्यक्षे प्रीयवादिनं परोक्षे कार्य हन्तारं", संसार में इन्द्रिय सय दुल देने जाना रोड झणी कार्य को नष्ट करने वाला सुभाग्य को भी "त्यजेत्येतत् बन्धु विषकुम्भ पयोमुख", न्याय के अनुसार (बाह्य में सुख एवं अन्तरंग में दुःख देने वाला) त्याग करता है। प्रत्यक्ष मोक्ष रूपी कार्य के भाग्य प्रतिबन्धक कारण है।
कम्ममसुहं कुसोलं सुहकम्मं चावि जाण सुसीलं । कह तं होदि सुसीलं जं संसारं पवेसेति ॥२१३६।।
Know bad Karmas to be demerit and good Karmas at he merit. How can that be merit arious which causes the soul at wander in the cycly of existences. . . अशुभ कर्म तो पाप स्वभाव (दुष्ट) और शुभ कर्म पुण्य स्वभाव (भद्र) है ऐसा जगत् जानता है। परन्तु वास्तविक जो पुरुष को संसार में प्रवेश कराता है वह भाग्य शुभ या उपकारी कैसे हो सकता है। अतः सिद्ध हुा-"बन्ध हेत्वा भाव निर्जराभ्यां कृत्स्न कम विप्रमोक्षो मोक्षः ।" मो, शा. १०-२.
Owing to the absrdce of tee cause of bondage and with functioning of the dissociation of karmas, the annihilation of Karmas is libera tion, . -
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अध्याय ग्यारहवां ]
[ २०१३
मिथ्यादर्शनादि बन्धहेतुत्रों के अभाव से नूतन ( कम ) भाग्य का आना रुक जाता है । कारण के प्रभाव से कार्य का अभाव होता ही है। निर्जरा के कारण ( पुरुषार्थ से ) संचित भाग्य ( कर्मों का ) विनाश संपूर्ण रूप से युगपत् क्षय हो जाने से मोक्ष हो जाता है ।
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परम पुरुषार्थ के द्वारा पुरुष समस्त विकल्पों (भाग्य) को नष्ट करके परम पुरुषार्थ ( आप में ) में लीन होकर अचित्य अनन्त सुख का अनुभव करता है । सर्व निराकृत्य विकल्प जालं, संसारकान्तार निपात् हेतुम् ।
विवक्तमात्मन मवेक्षमाणो, निलोयसे त्वं परमात्म तत्वे ॥ २१४० ॥
In order to destory the drery world-forest, liberate. Thy self from all trammels of delusion. Realise Thy salf as distinc, and be engrosssed in the Highesit-self,
नदि कालिन एक छाप भाग्य का पराजय करके कृतकृत्य होकर स्वाधीन स्वराज्य में विचरण करता है . ( पुरुष + अर्थ ) पुरुष का प्रयोजन मोक्ष ही पुरुषार्थ आता है।
सर्व विक्ततीर्णं यदा स चैतन्य
लमाप्नोति ।
भवति तथा कृत कृत्यः सश्यक पुरुषार्थ सिद्धमापन्नः ॥ २१४१ ॥
जिस समय परम पुरुषार्थ की सिद्धि को प्राप्त वह भारयाधीन (शुद्ध) आत्मा सम्पूर्ण विभावों ( शुभ अशुभ भाग्य से ) मुक्त होकर अपने सुदृढ़ निष्कम्प चैतन्य स्वरूप को प्राप्त होता है, तब यह पुरुष कृतकृत्य (स्वाधीन) होता है । .
जिस परमपुरुषार्थ द्वारा पुरुष ने अपने स्वराज्य को प्राप्त किया, उसका उपाय हुआ, भाग्य की सत्ता ( अधीनता) का अस्वीकार एवं अपनी सत्ता (स्वाधीनता) का स्वीकार | अपनी सत्ता के ऊपर विश्वास, अपनी सत्ता की ज्ञान एवं अपनी सत्ता के अनुसार आचरण करना ही परम पुरुषार्थ सिद्धयुपाय है ।
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विपरीताभिनिवेशं निरस्य सम्यव्यवस्य: निजतत्वं । तस्मादविचलन स एव पुरुषार्थ सिद्धियुपायोऽयं ॥ २१४२ ॥
विपरीत श्रद्धान- आग्य जनित पर्याय को आत्मा मान लेने ( भाग्य में ही अपनी सत्ता का विश्वास ) रूप विश्वास को नष्ट करने के लिये अपना स्वतत्त्व सत्ता
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१०१४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि का विश्वास (सम्यग्दर्शन); भाग्य से उत्पन्न पर्यायों से भिन्न अपनी शुद्ध सत्ता का यथावत् ज्ञान. सम्यग्ज्ञान एवं भाग्य कृत पर्यायों के आधीनता से मुक्ति पाकर अपने परमपुरुषाकार में स्थिर हो जाना सभ्याचारित्र है इन तीनों का समुदाय ही पुरुषार्थसिद्धयुपाय है।
दसणारणारण चरित्तासि सेविदध्याणि सास लिया। तारिण पुण जारण तिरिवि ,अप्पारणं चैव णिच्छयदो ॥२१४३॥
Right belief, right knowledge and right conduct should always De pursued by a saint always. Know all these three, again, to be the sou! it self from the real standpoint,
पुरुषार्थियों को (साधुओं के ) निरन्तर सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र को ही पुरुषार्थ में लाने योग्य हैं और वे तीन हैं, तो वास्तव में (निश्चय नय से) एक पुरुष (आत्मा) ही जानो।
___ "Self-reverence, self-knowlede, self contral. These three alone jead life to soureign power."
सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्षमार्गः ।
सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र तीनों का समुदाय रूप परम पुरुषार्थ ही मोक्ष का मार्ग व उपाय है ।
इस प्रकार बीज अंकुर न्यायवत् अनादि के अनन्त असत् पुरुषार्थ एवं भाग्य की परंपरा को परम पुरुषार्थ रूपी अग्नि से जलाकर भस्म कर देने के कारण जिस प्रकार अनादि परंपरा से चले आऐ बीज को दाघ कर देने से फिर उस बीज से, अनन्त काल बीत जाने पर भी अंकुर नहीं हो सकता; उसी प्रकार भाग्य को दग्ध करने के बाद उस भाग्य से भाग्यांकुर (संसार) पैदा नहीं हो सकता है ।
दग्धे बोजे यथात्यन्तं प्रादुर्भवति . नांकुर । कर्म बीजे तथा दाधे न रोहति भयांकुर ॥२१४४॥
जिन पुरुष ने पुरुषार्थ के द्वारा अपना स्वाधीन राज्य प्राप्त करके अनन्त सुख के भोक्ता बने, उन महापुरुषों ने भाग्याधीन असत्पुरुषार्थी के दीनता को देखकर अत्यन्त
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अध्याय : स्यारहवां ]
[ १०१५ करुणा विह्वल होकर, परमपुरुषार्थ करने के लिये आश्वासन एवं विश्वास दिलाकर सम्बोधन कर रहे हैं
अयि! कथमपि मत्वा तत्त्वकौतुहली सन् । अनुभव भव भूतः पार्श्ववत्ती मुहूर्तम् ॥ पृथगय विलसन्तं स्वं समालोक्य येन । त्यजसि झमिति मा साकमेकत्व मोहम् ॥२१४५॥
अरे हे भाग्याधीन पुरुष! तू अनादि काल से भाग्य की सत्ता में अपनी संत्ता मानकर उसकी अधीनता को त्यागकर अपनी स्वाधीनता का सुख कभी भी अनुभव नहीं किया, किसी भी प्रकार से, कुतूहल मात्र से भी स्वयं को स्वतंत्र जानने की इच्छा करके साल दो साल को ? नहीं । एक दो माह को ? नहीं । सप्ताह दो सप्ताह को? नहीं । दिन दो को? नहीं मात्र एक मुहर्त को(४८ मि.)लिए ही सही भाग्य से स्वाधीन हो जा । तथा भाग्य से भिन्न जिसका विलास है ऐसे अपनी प्रात्मा को देखकर उसका तद्रप में अनुभव कर। ऐसा करने पर भाग्य के साथ जो तेरे एकत्व पने का विश्वास उसको तु शीघ्र ही छोड़ देगा। .
अनेकान्त रूपी अस्त्र के द्वारा परम पुरुषार्थी ने सर्वग्रासी भाग्य से जिस किस सरह मुक्ति दिलाकर यह घोषणा की थी कि जीव भाग्य से पृथक् है स्वतन्त्र है । परन्तु जिस पक्षी की चिरकाल से पिंजरे में परतंत्र रहने के कारण सहज उड़ने की शक्ति कुंठित हो गई है, उस पिंजरे से बाहर भी निकाल दीजिये तो वह पिंजरे की ओर ही झपटता है । इसी तरह यह जीव अनादि से परतंत्र होने के कारण अपने मूल स्वातंत्र्य पुरुषार्थ को भूला हा है और भय से भयभीत होकर कभी काललब्धि का, कभी नियती का नहीं तो कभी स्वभाव प्रादि का शारखागत होने के लिये उद्विग्न प्रातुर हो उठता है और अनेकान्तमयी पुरुषार्थ को करने के लिये प्रालसी होकर अनेकान्त को. दूधरण देता है और 'अनेकान्त' को भी अपनी पराधीनता की वृद्धि करने के लिये 'एकान्त' बना लेता है।
प्राग्रही बात निनीषति युक्ति तत्र यत्र मतिरस्य निविष्टा । .. पक्षपात रहितस्य तु युक्ति यंत्र तत्र मतिरेति निवेशम् ॥२१४६०
- एकान्ती (दुराग्रही) मनुष्य ने जो पक्ष निश्चित कर रखा है, वह युक्ति को उसी और ले जाना चाहता है। किन्तु जो अनेकान्ती (अदुराग्रही) निष्पक्ष दृष्टि से
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१०१६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिश विचार करना चाहता है, वह युक्ति का अनुसरण करके उसके ऊपर विचार करता हैं और तदनुसार वस्तु स्वरूप का निश्चय करता है । अनेकान्त रूपी सूर्य के प्रकाश में एकान्ती उल्लू को नहीं दिखाई देने के कारण दिन को रात्रि मानता है और सूर्य की निन्दा करता है, इसी प्रकार दुर्भाग्य केक्कड़ा शासन में जिसका सर्वस्व एवं स्वाधीनता हरण हो जाने के कारण एकान्त से संसार कान्तार में निवास करने वाले एकान्ती को अनेकान्तमयी प्रकाश भी अन्धकारमय (एकान्तमय ) दिखाई देता है एवं एकान्तमयी अन्यकार भी प्रकाशित दिखाई पड़ता है ।
"ही बत तिनीषति युक्ति तंत्र यत्र मतिरस्य निविष्टा" के अनुसार ग्रनेकान्त को भी 'अपने को भाग्य के अधीनता के समय की मर्यादा की वृद्धि करने के लिये एकान्तरूप से ग्रहण करता है, जिस प्रकार एक एकान्ती आध्यात्मिक वादी निम्नोक्त नीति श्लोक पढ़कर अपने आचरण को अनीतिमय करके इहलोक परलोक में दुःखी होता है ।
मातृबत परदारेषु परद्रव्येषु लोवष्ठत् ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पंडितः ।।२१४७॥
'मातृवत् परदारेषु यः पश्यति स पंडितः । परस्त्री को अपनी मां की तरह देखने वाला पंडित है
अतः बालक जिस प्रकार अपनी मां का स्तनपान करता है, उसकी मां के पास सोता है यदि क्रिया करता है उसी प्रकार मैं भी परस्त्री के साथ व्यवहार करके अपनी प्रांसुरी इच्छा को पूर्ति करूँगा और यदि पकड़ा जाऊंगा तो शास्त्र का प्रमाण दे दूँगा, इस प्रकार 'पर द्रव्येषु लोष्ठवत् ग्रात्मवत् सर्व भूतेषु' का अर्थ अपनी स्वार्थ सिद्धि के अनुसार संयोजना करके श्लोक को मुखस्थ कर लिया । एक दिन अपने पड़ोसी के घर दूर ग्राम से एक सुन्दरी नवयुवती मेहमान आई । उस नवयुवती को देखकर अपना आसुरी प्रकृति को वश में नहीं कर पाया । वह अपनी इच्छा को पूर्ण करने के लिये टाइम देखने लगा। उस समय गर्मी के दिन थे । इस लिये सब कोई हवा के लिये रात्रि में बाहर सो गए। वह नवयुवती स्त्री भी बाहर सो गई । अन्धेरी रात्रि में रात के दो बजे समस्त ग्राम सुनसान हो गया । किन्तु harat उल्लू को अमावस्या की रात्रि में भी नवयुवती ही दिखाई दे रही थी । सुयोग पाकर अपनी प्रासुरी इच्छा की पूर्ति करने लगा | जब उस स्त्री को थोड़ी नींद
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अध्याय : ग्यारहवा ]
[ १०१७ खुलने लगी तो वह वहां से भाग कर छुप-छुप कर पा गया। उस ने सोचा था कि छाती पर हाथ रखकर सो गई होगी। सो ऐसा कुछ हो गया । इधर धूर्त कामाग्नि में जब एक बार घृत डल गया उसकी कामाग्नि और अत्यन्त प्रज्वलित हो उठी । दूसरे दिन रात को भी पूर्व कथित दुष्ट चेष्टा करने लगा। वह स्त्री भी पूर्व रात की घटना से कुछ शंकित एवं सावधान थी। उस स्त्री ने दुष्ट को पकड़ लिया एवं हल्ला करने लगी। आसपास के. अनेक लोगों ने पाकर व्यभिचारी को पकड़कर बांध लिया है, राजा के दरबार का समय होने पर असत् पुरुष को लेकर दरबार में गये । असत् पुरुष का दुराचार के विषय में न्याय चला।
___ न्यायधीश... (अत्तत् प. सी) सुम प्रतिसा, शपथ करो कि मैं जो कहूँगा. सब सत्य कहूँगा।
असत् पुरुष-क्या कभी सम्यग्दृष्टि अनेकान्तवादी असत्य कह सकता है ? न्याया-तुमने इस प्रकार अन्याय क्यों किया?
असल--"मातृवत् परदारेषु यः पश्यति सः पण्डितः" क्या इसी प्रकार आचरण करना अन्याय है ? . . स्याया--तुमने उस स्त्री के साथ किस प्रकार माचरण किया?
असत्----जिस प्रकार अपनी सन्तान अपनी मां का स्तनपान करती है, पास में शयनादि क्रिया करता है, उसी प्रकार मैंने किया। मैंने सोचा एक नयी मां आई है उसके प्रति मैं माँ का व्यवहार नहीं करूँगा तो अन्याय होगा। इसलिये मैने मेरा कर्तव्य किया।
न्याया-तुमने उसके साथ अब्रह्मचारीपना क्यों किया ? पुरिसित्थियाहियालासी इत्थीकम्मं च पुरिसमहिलसदि। . एसा पायरिय परंपरागदा एरिसी दु सुदी ॥२१४८॥
पुरुष वेद कर्म स्त्री की अभिलाषा करता है और स्त्री वेद कर्म पुरुष की अभिलाषा करता है, यह आचार्य परम्परा से प्राई हुई ऐसी श्रुति है। मेरा पुरुष वेद कर्म का उदय सिर्फ बाह्य निमित्त मात्र था, वह स्त्री थी । निश्चय से अब्रह्मचारी का दोष नहीं हो सकता ! . .. . ..
धात्री . बालासतीनाथ पधिनी . दलवारिचात् । दग्धरज्जुबदाभासिति भुजानोऽपि न पापभाक् ।।२१४६॥
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१०१८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामरिण जिस प्रकार बालक का धाय में, व्यभिचारिणी स्त्री में पुरुष का, पद्म पत्र पर जलबिन्दु की तरह लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव भोग करते हुये भी निर्लिप्त रहते हैं । जली हुई रस्सी के समान पाप का भागी नहीं होता, किन्तु निर्जरा का निमित्त होता I
उपभोगमिन्दियेह दयाराम वेदरणाभिवराणं
जं कुणादि सम्मदिट्ठी तं सव्वं सिमर. सम्यग्दृष्टि जीव इन्द्रियों के द्वारा श्रवेतन और चेतन द्रव्य का जो उपभोग करता है, वह सब निर्जरा का निमित्त है। इसलिये सम्यग्दृष्टि जीव जितना अधिक से afe after क्रम से वेतन खाद्य खाद्य परथन, स्वधन, धार्मिक क्षेत्र का धन, चेतन - स्वस्त्री, परस्त्री, वेश्या श्रादि का सेवन करेगा उतना अधिक से अधिक मुरित क्रम से निर्जरा का निमित्त होगा इसलिये तो भरत चक्रवर्ती अन्तमुहूर्त में विज्ञान धनरूप समयसार रूप अध्यात्म ज्योति को प्राप्त कर लिया था ।
न्याया सम्यग्दृष्टिः स्वयमथमहं जातु बंधो न मे स्यात् । segardingent atना रागिपोप्याचरंतुः ॥
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बंता समिति परता ते यतोऽद्यापि पापाः । rican faरहात्सति सम्यक्त्वरिक्ताः ॥ २१५१ ।।
मैं स्वयं सम्यग्दृष्टि हूं । अतएव मेरे कर्म बन्ध कदाचित भी नहीं होता ऐसा विचार कर राग से रंगे मिथ्यादृष्टि जीव ऊपर दृष्टि उठाकर तथा मुंह फुलाकर भी व्रत आचरण करें तथा पंच समिति आदि रूप क्रियायों का आलम्बन करें तथापि आत्मा तथा अनात्मा के भेद विज्ञान के अभाव में तू सम्यग्दर्शन से होन ही हैं । इसलिए इस अवस्था में भी पापी ही है" जब महाव्रत पालन करने वाला भी उन्मत्त होकर अपने को सम्यग्दृष्टि मानकर "सम्यग्दृष्टि विषय भोगते भी बन्धक नहीं है" ऐसा आगम है ऐसी व्याख्या करते हुए अपने को कर्म बन्ध से रहित माने तो वह मिथ्यादृष्टि है और अन्तरंग बहिरंग परिग्रह सहित स्वच्छन्द आचरण करने वाला व्यभिचारी हो कर सम्यग्दृष्टि अपने श्राप बनकर "पर स्त्री सेवने से भी कर्म बन्ध नहीं होता, परंतु निर्जरा होती है, इस प्रकार महान दण्ड का पात्र बनने का वचन कह रहा है । सम्यग्दृष्टि जिस प्रकार आत्मानुभव की ज्ञान तथा संसार शरीर एवं भोगों के त्याग करने रूप शक्ति रूप लक्षण के अभाव से लक्षभूत सम्यग्दर्शन तुम में नहीं । "व्यतिकीर्ण वस्तु व्यावृत्ति हेतु लक्षणं ।" "परस्पर व्यतिकरे सति येनान्यत्वं लक्ष्यले
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अध्याय : ग्यारहवा ]
[ १०१६ तल्लक्षणं ।" परस्पर मिली हुई अनेक वस्तुओं से किसी एक वस्तु को अलग करने रूप हेतु को लक्षण कहते हैं । सम्यग्दृष्टि का जो लक्षण है, वह तुमको मालूम नहीं एवं तुम में पाया नहीं जाता 1
सम्यग्दृष्टि का लक्षण सुन-- सभ्यग्दृष्टेर्भवति नियतं ज्ञान वैराग्य शक्तिः । स्वं वस्तुत्वं कलयितुमयं स्वान्य रूपाप्ति मुक्त्या । यस्माद् ज्ञात्वा व्यतिकर मिदं तस्वतः स्व परं च । - स्वस्मिन्नास्ते विरमप्ति परात् सर्वतो राग योगात् ।।२१५२।।
सम्यग्दृष्टि के स्वसंवित्ति रूप ज्ञान एवं संसार शरीर, भोगों का त्याग करने रूप वैराग्य शक्ति सुनिश्चय से प्राप्त होती ही है । अतएव स्वरूप की प्राप्ति तथा अपने से भिन्न जितना रागादिक जो पररूप उनके त्याग से निज वस्तु की प्राप्ति करने के लिए स्व तथा पर इनको यथार्थ में भिन्न २ जानकर निज में ही अपनी स्थिति को बनाता है तथा पर के संयोग से होने वाली समस्त रागादि परणति से विरक्त होता है । "तुम्हारे अन्दर सम्यग्दृष्टि के व्यवहार में पाया जाने वाला सदाचार नैतिकाचार रूप अनात्मरूप लक्षण नहीं पाया जाता, तब निश्चय में पाये जाने वाला ज्ञान वैराग्य रूप प्रात्मभूत लक्षण किस प्रकार सम्भव हो सकता है, किन्तु जो असदाचारी स्वच्छन्दी, मनमाना आचरगा करने वाला कभी भी सम्यग्दृष्टि नहीं हो सकता। जिस प्रकार जिसने अनन्त बार मुनिनत धारण कर लिया, वह अभव्य हो सकता है, किन्तु जिसने बाह्य में कपड़ा त्याग नहीं किया वह कभी भी प्रमत्त गुरगस्थानवाला मुनि नहीं हो सकता तो मोक्ष जाने की बात क्या? जिसका व्यवहार चारित्र ज्ञानादि है, वह अभव्य भी हो सकता है। जिसने निश्चय नय को प्राप्त कर लिया उसने व्यवहार नय को प्राप्त कर ही लिया, किन्तु जिसने व्यवहार नय को प्राप्त नहीं किया। वह कभी भी निश्चय नय को प्राप्त नहीं कर सकता। जिस प्रकार जिसने केवलज्ञान प्राप्त किया उसने समस्त ज्ञान प्राप्त कर लिया। किन्तु जिसने मतिज्ञान को ही अभी तक प्राप्त नहीं किया, वह केवल ज्ञान को किस प्रकार प्राप्त कर सकता । इसी प्रकार जिसने निश्चय नय के यथार्थ स्वरूप को नहीं जानकर उसको ही अर्थात् निश्चय श्रद्धान को अंगीकार किया है, वह मूर्ख बाह्यक्रिया में प्रालसी है और बाह्य क्रिया रूप याचरण को नष्ट करता है।
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[ गो. प्र. चिन्तामणि निश्मयमबुद्धयमानो चो निश्चय तस्तमेव संश्रयते । नाशयति करण चरणं स बहिः करणालसो बालः ॥२१५३॥ विषयो सुख का लालची, सुन अध्यात्मवाद । स्याग धर्म को त्याग करे विषयानुराम ॥२१५४॥
प्रात्मानुभव एवं सम्यग्दर्शन का तादात्म्य संबंध है । सम्यग्दर्शन के पश्चात् समस्त पदार्थों का सम्यक् परिज्ञान होने के कारण अन्य वस्तु से स्वयं को पृथक करने की सम्यक् चेष्टा करता है । इसलिये जिस जिस अंश में अन्य विषयादिसे स्वयं को पृथक् का विश्वास, ज्ञान एवं चेष्टा है उस २ अंश में
क हीं है अन्य समस्त अंश में बन्धन है।
येनांशेन सुदृष्टि स्तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति । येनांशेन तु राग स्तेनाशेनाल्य बन्धनं भवति ॥२१५५।।
यह हुआ अबंध का कार्यकारण भाव, इससे अन्य जितना अनध्यावसायादि है, वह सब बंध का कार्यकारण भाव है। अन्यथा संसार मोक्ष का कार्यकारण भाव लोप हो जायेगा; सिद्ध जीव विषयानुभोगी नहीं होने के कारण संसार में परिभ्रमण करेंगे।
यथा-यथा न रोंचते, विषयाः सलभा अपि । तथा तथा समायाति, संवितो तत्तवमुत्तमम् ॥२१५६॥
As even those objects of pleasure which are easly obtainable become increasingly intoleralie, in the same measure does the glorious self come into one's enjoy ment!
ज्यों-ज्यों सुलभ से प्राप्त होने वाले विषय भोग प्रासक्ति रूप रूचिकर प्रतीत नहीं होते त्यों-त्यों स्वात्म 'संवेदन में निजात्मानुभवन की परिणति वृद्धि को प्राप्त होती रहती है। इससे विपरीत मिथ्यात्व कार्य है, जो कि तुम्हारा कार्य है ! . ..
असत पु...-पाप अनेकान्तवाद को जानते हैं इसलिये मेरे ऊपर दोषारोपण कर रहे हैं। मैं इस को कपिने से नहीं करता हूं उस कार्य के समय में ज्ञापक निमित्त उपस्थित होता ही हूँ और सूचना करता है कि उपादान अभी अपनी शक्ति ने अनुसार परिणमन कर रहा है, उस परिगमन का कौन निवारण कर सकता है।
जं जस्स जम्मि देसे जेण बिहारण अम्मि कालम्मि । गाणं जिरपेण णियदं जम्म प्रहर मरणं था ॥२१५७।।
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अध्याय : ग्यारहवां ]
तं तव तfम्म देसे लेख विहाणेण तम्मि कालस्मि । - को सक्क वाले इदो वा ग्रह जिरिंदो या ।।२१५८ ॥
जिस जीव का जिस देश और जिस काल में जिस विधि से जन्म अथवा
नियत जाना है । उसका
मरण ( उपलक्ष से अन्यान्य समस्त कार्य) जिनेन्द्र देव ने उस देश और उस काल में जन्म अथवा मरण उस विधि से इन्द्र हो अथवा स्वयं जिनेन्द्र देव हो उसे चलायमान कौन कर सकता है ?
[ १०२१
नियम से होता है । चाहे
उस उपादान रूपी स्त्री की उन्ही के प्रांगन में, रात्री समय में मेरा बाह्य व्यवहारीक ज्ञापक निमित्त के उपस्थिति मात्र से व्यभिचार रूप कार्य होना था । उपरोक्त प्रकार होने का सर्वज्ञ ने नियत रूप से जाना था इसको निवारण करने के लिये इन्द्र अथवा स्वयं सर्वज्ञ अनन्त शक्तिवान जिनेन्द्र भी निवारण नहीं कर सकते हैं तो मैं उसको निवारण करने रूप प्रनध्यवसाय का कर्ता होकर कर्म को क्यों बांधता ? यदि यह कार्य हो भी गया तो प्रधीर, पश्चाताप लज्यान्वित क्यों हूंगा ? .
जो जो देखी वीतराग ने सो-सो होसी घीरा रे । अनहोनी कहूं हो है नहीं का हूगां प्रधोरा रे ।।२१५६॥
इस प्रकार वीतराग भगवान के
ज्ञान पहिले से निश्चित रूप में नियत रूप में क्रमबद्ध पर्याय के अनुसार होने का झलका था, जिससे कि होकर ही रहा । यदि पहिले से नहीं अलका हुआ होता, तो यह घटना नहीं होती । श्रतएव वीतराग भगवान दोषी हैं, मैं प्रमेकान्ती हूँ, मेरा जीवन ही अनेकान्त मय है । वर्तमान उपादान के ऊपर विचार करिये । व्यभिचार रूप क्रिया का कार्य उस स्त्री में हुआ । अतः वह स्त्री हुई उपादान “उपादान के कार्य के समय में निमित्त स्वयमेव उपस्थित होता हो है, "इस सिद्धान्त के अनुसार उस अन्धकारमयी रात्रि के दो बजे के समय उस स्त्री की उपादान कार्य को ज्ञापक निमित्त होने को कोई न कोई पुरुष को उपस्थित होने का कष्ट करना पड़ता था और बाद में बतमान मेरी जो दशा है, इसी प्रकार होता । यह सब नहीं हो इसलिए मैं कष्ट करके ज्ञापक निमित्त रूप से उपस्थित हो गया था और यह सब उपादान के योग्यता के अनुसार ही हुआ। जिस प्रकार उपादान रूपी मिट्टी का घड़ा रूप बनने की योग्यता होती है तब कुम्हार कुदाल, चाक आदि ज्ञापक उदासीन निमित्त उपस्थित हो ही जाता है और मिट्टी हो उस घट का
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१०२२ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि उपादान कारण होने से कर्ता है, इसी प्रकार व्यभिचार क्रिया में कर्त्ता वह स्त्री है और उसके निमित्त से मेरे को जो कष्ट हुना, समय नष्ट हुआ, इतना मेरा स्वसमय नष्ट करके आप लोक को प्राध्यात्मिक अनेकान्त ज्योति को प्रदान किया, इन सबका दंड उस व्यभिचारिणी स्त्री को देना चाहिए और मेरे स्वदार संतोष ब्रह्मचारी अणुव्रत में दोष लगाकर पापिनी बनी उसके लिए मेरे से प्राकरः क्षमा याचना करें एवं प्रायश्चित लेकर पाप का प्रक्षालन करें।
जरा वर्तमान, देश, काल, विधान के अनुसार विचार अनेकान्त दृष्टि से करिये । उन्हीं के आंगन में रात्रि के समय में उस स्त्री की सोना और मेरा उपस्थित होना एवं स्त्रीलिंग, पुल्लिग संयोग रूपी विधान से कार्य होने से कथचित् रात्रि दो बजे का दोष कथंचित, उस प्रांगन का दोष, कंथचित उस विधान का दोष है। वस्तुतः इन लोगों को सम्मिलित होकर मेरे को बाधने का उपादान इन लोगों में था, अतः यह कार्य हुआ । इसलिए यह सब लोक का दोष है । यदि निश्चय से विचार करें तो आपको यहां वर्तमान समय में न्यायाधीश होकर समाधान करने का उपादान रहने के कारण यह सब अनर्थ हुआ। अतः आप ही दण्ड के भागी हैं । आप अपना दोष नहीं देखकर मेरे दोष की समीक्षा कर रहे हैं। सम्यग्दृष्टि का कार्य तो अपना दोष देखना, दूसरे का दोष ढंकना और यह उपगुहन अंग है । न्याया-जत्तु जदा जेरण जहा जस्स च रिणयमेख होदि तत्तु तदा ।
तेरा सस्स तहा हवे इदि वादो पियति बादो दो ॥२१६०।।
जो जिस समय जिससे जैसे जिसके नियम से होता है, वह उस समय उससे . . . वैसे उसके ही होता है ----ऐसा नियम से सब वस्तु को मानना उसे नियतिवाद कहते हैं, जो कि एकान्त होने से मिथ्या है। तूने एकान्त नियति याद का आश्रय लेकर अपना दोष नियति के ऊपर डाला है। तू विषयान्ध होने के कारण महान्ध है इसलिए तुझको अनेकान्तमय प्रकाश में भी नहीं दिखाई दे रहा है।
अन्धादयं महानन्धो विषया-धो कृतेक्षरणः ।। चक्षुणान्धो न जानाति विषयान्धो न केनचित् ॥२१६१॥
तू वीतराग · सर्वज्ञता की आड़ लेकर अपने दोष छिपा रहा है। दिनकर का जब उदय होता है, उल्लू को मालुम होता है कि वर्तमान रात्रि कर का उदय हो
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अध्याय : ग्यारहवां ]
[ १०२३ एक चन्द्रमुखी नवयुवती के मुख पर जब कालिक लग गई, तब वह दर्पण में अपना मुख देखी तो बहुत कुरूप दिखाई पड़ी। वह सोची कि दर्पण में मेरा चेहरा कुरूप दिखाई देना था, इसलिए मेरे मुख पर कालीक लगी, एवं कुरूप हो गयी । इस प्रकार दिखाई देने का उपादान दर्पण में होने के कारण यह सब निमित्त अपने आप हो गया। इस प्रकार सोचकर क्रोध से दर्पण को नीचे पटक दिया तो दर्पण पैर में लगा एवं पांव कट गया । इस प्रकार तुम्हारा न्याय है। भगवान निश्चय से अपनी आत्मा को ही जानता देखता है । व्यवहार से सर्व पदार्थों को जानतें देखते हैं । आत्मा का प्रात्यन्तिक निर्मलता के कारण दर्षगा की तरह अन्य वस्तु झलकती हैं।
जाणदि पस्सदि सव्वं व्यवहार गएण केवली भगवं । केवलरणारपो जारसदि पस्सदि रिणयमेण अप्पारसं ॥२१६२॥
जिस प्रकार केवली अनन्तानंत को जानने मात्र से उसको शान्त नहीं कर देते. उसी प्रकार त्रिकालवर्ती समस्त पदार्थों को जानने मात्र से भगवान उन सब पदार्थों का नियन्त्रण कर्ता वा पर्यायों को क्रमबद्ध से व्यान्ध' करके नियत समय में भेजने ( Suppaly ) वाला नहीं। अतः पदार्थ जिस पर्याय रूप परिणमन करता है, उस पर्याय का वह कर्ता होने के कारण वह उसका फल भोगने वाला है।
जह सिप्पियो दु चेझैं कुन्वदि हवदि य तहा अण्णो सो। सह जीवो बि व कम्म कुब्धदि हदि य असणे सो ॥२१६३॥ जह चेलू कुन्वंतो दु सिपिनो बिचक्खिदो होदि । तत्तो सिया अणणो तह चेठेतो दुहि जीवो. ॥२१६४॥ रागो दोसो मोह जीयस्सेव य अरणपणपरिणामा। .
राग, द्वेष, मोह जीव का हो अनन्य परिणाम है.1 जैसे स्वर्गकरादि शिल्पी कुण्डलादि ऐसे बनाऊंगा, इस प्रकार मन में चेष्टा करता है तथा उस चेष्टा से बह तन्मय हो जाता है । उसी प्रकार जीव भी रागादि भाव कम करता है और वह उस भाव कर्म से तन्मय हो जाता है। जैसे स्वर्णकरादि शिल्पी चेष्टा करता हुआ नित्य दुःखी होता है और उस दुःख से अनन्य होता है, उसी प्रकार जोक हर्ष-विषाद, राग अन्याय व्यभिचार रूप चेष्टा करता हुआ दुःखो होता है और उस दुःख से यह अनन्य है । अतः तुमने व्यभिचार करने का विचार किया फिर उस क्रिया को किया
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१०२४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि दोनों अवस्था में तन्मय होने के कारण वर्तमान तुमको दण्ड रूप में भी तन्मय होना पड़ेगा।
तुमने जो निर्जीव एवं स्थानान्तरित क्रिया से रहित काल को जो दोष लगाया, वह भी तुम्हारी पूर्तता का परिचायक है। जैसे एक व्यक्ति ने अपनी शत्रुता के प्रतिशोध लेने की इच्छा से अपने शत्रु के घर को जला दिया। पकड़ा गया, तब कहता है कि मैं दोषी नहीं हूँ। आकाश दोषी है क्योंकि प्राकाश यदि अग्नि को अवकाश (जगत) नहीं देता तब अग्नि किस प्रकार उसका घर जला सकती थी ? तुम लोग पक्षपात करने से तुम लोग दण्ड के पात्र हो, क्योंकि प्राकाश बड़ा होने के कारण उसको दण्ड नहीं दे सकते हो, मैं छोटा होने के कारण मेरे को दण्ड देने का विचार कर रहे हो। ठीक है-- “सबै सहायक सबलके दुर्बल कोउ न सहाय ।
पवन बुझावत दीपक आग देत जलाय ।" तुम्हार कालवाद एकान्त होने से मिथ्या है। कालो सब जरणयदि कालो सवं विरणस्सदे भदं । जागत्ति हि सुत्त सुदि म सक्कदे वंचित् कालो ॥२१६५॥
काल ही सबको उत्पन्न करता है और काल ही सबका नाश करता है, सोते हुए प्राणियों में काल ही जागता है, ऐसे काल के उगने को कौन समर्थ हो सकता है ? इस प्रकार काल से ही सबको मानना यह कालवाद जो एकान्त होने से मिथ्या है। इस प्रकार तुमने दोष किया, फिर दोष को छिपाने के लिये मायाचार, असत्य अनेकान्तमयी जिनवारणी का अपवाद निर्दोषियों में दोषारोपण प्रादि अनेक गहित पाप किया एवं जिन धर्म में कलंक लगाया। तम दण्ड के भाजन हो।
राजा--(अत्यन्त गंभीर एवं तेजस्वी भाषा में) अरे मूर्ख ! तू यह नहीं समझता कि अहिंसा जिसका प्रारण है, ऐसे जैनी; धर्य को लोप करने वाले को नैतिकाचार को ध्वंस करने वाले को, प्राध्यात्मिकता के परदा में शिथिलाचार को फैलाने वाले को 'might is right" को घोषणा करने वालों को दमन करके धर्म के नाम से अधर्म के प्रचार को लोप नहीं कर सकता । तू यह भी नहीं समझता कि उत्तम क्षमादि भृषरण से विभूषित जैनी कायर, दुर्बल, दीन होते हैं। तू यह भी नहीं समझता कि अनेकान्तबादी कंचित् धर्म का लोप करने वालों को सहायता भी करते हैं और कथञ्चित् दण्ड भी देते हैं। वे तुम्हारे जैसे बगुला भगत नहीं होते हैं, वह तो राज एवं गरुड (हंस) जैसे होते हैं यदि एक भी जैनी है और सारा विश्व यदि धर्म
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अध्याय : ग्यारहवां ]
[ १०२५
के विरुद्ध उसके सम्मुख कुछ क्रिया करेंगे तो वह सारे विश्व के विरुद्ध भी पदाक्षेप लेने के लिये कभी पीछे हटेगा ही नहीं । ( सिपाहियों के प्रति ) इस धूर्त को काला मुँह करके गधे के ऊपर बैठाकर मेरे राज्य के बाहर कर दो क्योंकि यदि एक भी इस प्रकार धर्म के नाम पर धर्म का प्रचार करने वाला राज्य में रहेगा तो अनेक भोले प्राणी कुमार्गगामी हो जायेंगे एवं धर्म का नाम सुनकर जनगरण में एक घृणा की भाव पैदा हो जायेगा । अन्य क्षेत्र में ग्रधर्म करने वालों से धर्म क्षेत्र में अधर्म करने वालों का पाप अधिक होता है । अन्य क्षेत्र कृतं पाप धर्मक्षेत्रे विनश्यति ।
धर्मक्षेत्रे कृतं पापं वज्रलेपी भविष्यति ॥२१६६॥
जब इस प्रकार अनेकान्तमयी अमोघ अस्त्र के द्वारा परमपुरुषार्थी ने श्रनादि कालीन एक छाप भाग्य को पराजय कर ग्रपना स्वाधीन राज्य प्राप्त किया, तब एकान्ती पुरुषार्थ गर्जना करके कहता है कि
आलसड्ढी freच्छाहों पलं किचि र भुजदे ।
eneraीराव पाणं वा पउरसेण विणा ण हि ।।२१६७११
जो आलस्य कर सहित हा उद्यन करने में उत्साह रहित हो, वह कुछ हो ७था उच भी फल नहीं भोग सकता । जैसे स्तनों का दूध पीना, बिना पुरुषार्थ के कभी नहीं बन सकता। इसी प्रकार पुरुषार्थ से एकान्ततः सब कार्य की सिद्धि होती है, ऐसा मानता पुरुषार्थवाद है जो कि एकान्त होने से मिथ्या है। क्योंकि पुरुषार्थं करते हुए भी प्रत्येक कार्य की सिद्धि नहीं देखी जाती है ।
पौरुषादेव सिद्धिश्चेत् पौरुषं दैवतः कथम् ।
पौरुषाच्चेदमोठा स्यात्सर्य प्राणिषु पौरुषम् ॥२१६८॥
अन्वय---चेत् पौरुषात् एव सिद्धिः तदा देवतः पौरुषं कथं स्यात् पौरुष सात् चेत् तहि सर्व प्राणिषु पौरुषं प्रमोघं स्यात् ।
यदि पुरुषार्थ से ही अर्थ की सिद्धि होती है, ऐसा माना जाय तो देव से जो पुरुषार्थ की सिद्धि होती हुई देखी जाती है, उसका निर्वाह कैसे हो सकेगा । यदि इस प्रकार समाधान किया जायेगा कि पुरुषार्थ की सिद्धि पुरुषार्थ से ही होती है, देव से नहीं, सो इस प्रकार की मान्यता में सर्व प्राणियों का पुरुषार्थं सफल ही होने का प्रसंग प्राप्त होता है । वर्तमान पुरुषार्थ भी पूर्व देव की अनुरूप होता है ।
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[ गो. प्र. चिन्तामरिण तादशी जायते बुद्धि. व्यवसायश्च सादृशः । ___ सहायास्तादृशाः सन्ति यादृशी भवितव्यता ॥२१६६॥
जैसी भवितव्यता (भाग्य) होती है, उसी तरह की बुद्धि हो जाती है, उसी प्रकार का व्यवसाय (पुरुषार्थ) होने लगता है, सहायक भी उसी तरह के मिल जाते हैं । इस प्रकार भाग्य द्वारा बुद्धि पुरषार्थ का निर्माण सिद्धि होता है । "पुग्मलकम्ममित्त तहेव जीवों विपरिणमइ ।" भाग्य के निमित्त पाकर जीव भी भाग्य के अनुरूप परिणमन करता है। केवल भाग्य के अनुरूप परिगमन नहीं करता वरं अनादि से जीव भाग्य के अधीनता में रहकर अपना जन्म मत अधिकार एवं अनन्त शक्ति रूप अशुजीबी गुण को भी धाति कर्म के विनिमय में भाग्य को बंधक देकर दीन होकर संसार रूपी राज्य में 'द्वार २ देहि २' करके अनादि से परिभ्रमण कर रहा है। किन्तु अभी तक उसको पेट भर खाने के लिये सुखी रोटी. भी प्राप्त नहीं हुई। मिष्ठान्न, घृतान्न, Vitimeine, tonic आदि कहां प्राप्त होगा ? जिससे वह शक्तिशाली होकर भाग्य के साथ युद्ध करें। . . . . .
सो सव्यपारसदारसी कम्मरयेण रिएएगावच्छण्यो । संसार समावण्णो ण विजारादि सम्वदो. सव्वं ॥२१७०॥
पुरुष सर्वज्ञ और सर्वदर्शी है किन्तु अपने भाग्य रूपी मिट्टी से आच्छादित होने के कारण संसार को प्राप्त हुप्रा है। वह समस्त पदार्थों को सब प्रकार से नहीं जानता।
जब भाग्य का एकछत्राधिपति शासन चलता है, उस समय उन्हीं के शासन के अन्तर्भूत कौन ऐसे पुरुष हैं, उन्हीं के आदेश के अनुसार नहीं चलें।
पुरा गर्भादिन्द्रो मुकुलितकरः किंकर इद, स्वयं स्राष्टा सुष्टेः पतिरथ निधीनां निअसुतः । क्षधित्वा षण्मासान स किल परप्याड जगती, महो केनाप्यस्मिन् विलसितमलभ्यं हसविधेः ॥२१७॥
जिस आदिनाथ भगवान के गर्भ में आने के पूर्व छह महीने से ही इन्द्र दास के समान हाथ जोड़े हुए सेवा में तत्पर रहा, जो स्वयं ही सृष्टि की रचना करने वाले थे अर्थात् कर्मभूमि की संस्थापन करने वाले थे, एवं जिसका पुत्र भरत निधियों के स्वामी अर्थात् चक्रवर्ती था; जो स्वयं चार ज्ञान का स्वामी, बज्रवृषभ नाराचसंहनन
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[ १०२७
अध्याय ग्यारहवां ]
का धारी था और जो महान् पुरुषार्थी थे, ऐसे प्रादिनाथ तीर्थंकर जैसे महापुरुष भी भाग्य का अनुग्रह नहीं होने के कारण बुभुक्षित होकर छह महीने तक पृथ्वी पर घूमे यह श्राश्चर्य की बात है । ठीक ही है- भाग्य के राज्य में कोई भी प्राणी दुष्ट भाग्य के विधान को लांघने में समर्थ नहीं है । ऐसा महान् पुरुषार्थी भी आहार के लिये छह महीना तक पुरुषार्थ करते हुये भी बिना भाग्य के कार्य सिद्धि कर नहीं पाये जो कि भाग्य के अनुग्रह से एक बेला में प्राप्त कर सकते थे, तब अन्य पुरुष की बात ही क्या ?
जब भाग्य के राज्य में परिस्थिति कालोन राष्ट्रपति शासन रूप निकाचित कारण लागू रहता तब उस शासन को कौन ऐसे पुरुष हैं, जो उस कार्यकम को लोटा सा भी देर पर कर सकते हैं। "उदयावल्यां निक्षेप्तु' संक्रमयितुमुत्कर्षयितुमपकर्षयितु चा शक्यं तसिकाचित नाम भवति ।" जिस कर्म की उदीरणा, संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षण ये चारों ही अवस्थायें नहीं हो सके उसे निकाचितकरण कहते हैं । इस प्रकार भाग्य को परिवर्तन करने में पुरुषार्थं असमर्थ होता है । जिस प्रकार एकान्ततः भाग्य से कार्य सिद्धि नहीं होती, उसी प्रकार एकान्ततः पुरुषार्थ से भी कार्य की सिद्धि नहीं होती 'सामग्री जनिका कार्यस्य नैकं कारणम्' अर्थात् सामग्री मात्र से कार्य होता है एक कारण से नहीं यह सिद्धान्त है, अनुभव सिद्ध है, वैज्ञानिक कार्यकारण व्यवस्था है ।
जब देव एवं पुरुषार्थ दोनों पक्ष की जय हुयी तब एक एकान्ती कहता है कि कुछ कार्य देव से ही होते हैं और कुछ कार्य पुरषार्थ से ही होते हैं । इस प्रकार पृथक् पृथक् कार्यों की अपेक्षा से भाग्यं एवं पुरुषार्थ की अनेकान्त की मान्यता बन जायेगी सो यह भी एकान्त होने से मिथ्या है ।
fateral भयैकात्स्यं स्याद्वाद न्याय विद्विषाम् । श्रवाच्यकान्युक्ति वायमिति युज्यते ॥ २१७२ ॥
अन्वय --- स्याद्वाद न्याय विद्वषां विरोधात् उभयैकात्म्यं न । ग्रवाच्यतैकान्ते 'श्रवाच्य' इत्यपि उक्ति न भुज्यते ।
स्याद्वादरूप नीति से विरुद्ध रखने वालों का देव और पुरुष का एकात्म पक्ष परस्पर में विरुद्ध होने से नहीं बनता हैं । इसी तरह इन दोनों का प्रवक्तव्य एकान्त
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१०२८ ]
[ भी: प्र. चिन्तामणि पक्ष भी घटित नहीं होता है । क्योंकि इस पक्ष में 'अवाच्य' ऐसे शब्द का भी प्रयोग करना नहीं बन सकता है।
.: कुछ कार्य देव से होते हैं और कुछ कार्य पुरषार्थ से होते हैं, इस प्रकार पृथक पृथक् कार्यों की अपेक्षा से देव और पुरुषार्थ की मान्यता बन जायेगी, सो यह बात ठीक नहीं है। जब देव का. एकान्त पक्ष और पुरुषार्थ का एकान्त पक्ष जब परस्पर में सर्वथा विरुद्ध पड़ता है, तो इसी कारण से पृथक् पृथक् कार्यों की अपेक्षा इन दोनों बातों को (पक्षों को) स्वीकार करना स्वयं विस्तादि दोषों को प्राह्वान करते हैं। बिना पुरुषार्थ के देव लंगड़ा है और बिना देव के पुरुषार्थ पंगु है, अतः ये दोनों पक्ष सर्वथा परस्पर की निरपेक्षता में कैसे निर्दोष रूप में संभावित हो सकते हैं, क्योंकि निरपेक्ष अवस्था में इनका अस्तित्व ही नहीं बनता है । दैव पुरुषार्थ का, पुरुषाथ देव का निर्माण कर्ता है । इसी तरह इन दोनों की सर्वथा अवाच्यता स्वीकार करने पर ये प्रवाच्य हैं। इस प्रकार का निद शात्मक बंचन उसमें नहीं बन सकता । है। अन्यथा अवाच्य मानने का प्रसंग प्राप्त होता है। इसलिए इन दोनों को यदि मान्य करना है तो स्याद्वादनीति का ही अवलम्बन करना चाहिये कारण कि उसके अवलम्बन किये बिना इनका सदभाव ही सिद्ध नहीं हो सकता है।
. जब अनेकान्तवादी ने एकान्त भाग्य से किम्वा एकान्त पुरुषार्थ से किम्बा पृथक् २ भाग्य एवं पुरुषार्थ से कार्य सिद्धि का निषेद्ध कर दिया तब एकान्तियों ने परास्त होकर, अपमानित भरे क्रोध से कहने लगे कि हे ! समय सुयोगवादी, लुढकपंथी, संयवादी, अनेकान्तवादी तुम महान् मुर्ख एवं स्वार्थी हो! जिस समय जिस पक्ष की जीत होती है उस समय तुम उस पक्ष का पक्ष लेते हो पराजय पक्ष को अपमानित करने से तुम पक्षपाती भी हो । वर्तमान पक्षपात छोड़कर तुम बताओ कि कार्य सिद्धि किस प्रकार होती है।
सब अनेकान्तवादी अत्यन्त गंभीर एवं मधुर स्वर में कहने लगा कि सुन-- दूषयेत् प्रज्ञ एवोच्चैः स्याद्वादं नतु पण्डितः । अज्ञप्रसापे सुज्ञानां न द्वेषः करणेवं तु ॥२१७३॥
अशलन ही स्याद्वाद पर महान दोधारोपण करते हैं विज्ञ लोग नहीं, . अज्ञानियों के प्रलाप पर सुधी पुरुष रोषन कर करुणा करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यह अज्ञता का कार्य है न कि उस पुरुष का । इसलिये अज्ञं करुणा के पात्र हैं । यदि
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अध्याय : ग्यारहवां
[ १०२६ करुणा करके उसका अज्ञान दूर नहीं किया जायेगा वह दुर्गति का पात्र बन जायेगा। तुमने जो अनेकान्तवादी को दोष लगाया यह तुम्हारा दोष नहीं है तुम्हारी प्रज्ञता का द्योतक सार्थक शब्द है । स्यात् शुरद संशयात्मक, भ्रम जलक, शायद, सम्भव प्रादि का सुचक नहीं है । किन्तु "सर्वथात्वनिषेधकोऽनेकान्तता द्योतकः कथञ्चिदर्थे स्थाच्छन्दो निपातः"-स्थात् शब्द निपात है। वह सर्वथापने का निषेधक अनेकान्तपने का द्योतक, कथञ्चित अर्थ वाला है। मैं तुम लोगों के प्रति दया करके भाग्य एवं पुरुषार्थ के यथार्थ स्वरूप का वर्णन के पहले तुम लोगों के वचन क्यों मिथ्या है ? यह बता देता हूं, क्योंकि "विन जाने ते दोष गुरगन को कैसे तजिये गहिये" ।
सच्छंददिद्विहि वियपियारिण तेष्टि जुत्तारिण सयाणि सिणि। . पाखंडिणं वाउल कारणारिस अण्णणिबिसारिण हरंति ताणि ॥२१७४॥
आप लोगों का श्रद्धान अर्थात् विश्वास वृषभ जैसे स्वछन्द अर्थात् अपने मनमाना है जो कि पाखंडी जीवों को व्याकुलता उत्पन्न करने वाला और अज्ञानी जीवों के चित्त को हरने वाला है ।
पर समयारणं वयण मिच्छं खलु होइ सम्बहा वयणा । जेणारणं पूर्ण वयरणं सम्मं न कहंधिव मरणादो १३२१७५।.
तुम लोगों के वचन 'सर्वथा कहने से नियम से असत्य होते हैं और जैन मत के वचन 'कथंचित्' बोलने से सत्य हैं। क्योंकि वह अनन्त धर्मस्वरूप वस्तु को 'कथञ्चित् वचन कहता है, इससे सत्य है । बयोंकि एक वचन से वस्तु का एक धर्म ही कहा जाता है। यदि कोई सर्वथा कहे कि वस्त का स्वरूप है तो बाकी के धर्मों के प्रभाव को प्रसंग होने से वह भी झूठा कहलायेगा ! इस प्रकार एकान्त में दोष है अनेकान्त में गुण हैं भाग्य एवं पुरुषार्थ की स्थाद्वाद नीति से समबन्य---
अबुद्धि पूर्वापेक्षायामिष्टानिष्टं , स्वदेवतः ।। बुद्धि पूर्वव्यपेक्षाया मिष्टानिष्ट स्वपौरुषात् ।।२१७६॥
अन्वय----अबुद्धि पूर्वा पेक्षायां इष्टानिष्टं स्वदेवतः, बुद्धि पूर्व व्यपेक्षाया इप्टानिष्ट स्वपौरुषात् भवति ।
अबुद्धि पूर्वक हुए कार्य की अपेक्षा से इष्ट अनिष्ट कार्य अपने देव से हुए हैं । ऐसा माना जाता है, तथा जो कार्य बुद्धि पूर्वक किये जाते हैं, उस अपेक्षा से इष्ट और । अनिष्ट कार्य अपने पुरुषार्थ से हुए हैं ऐसा माना जाता है।
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१०३० ।
[ गो, प्र. चिन्तामणि है जो कार्य अनुकूल हो या प्रतिकूल हो. यदि वह अतर्कितोपस्थित है अर्थात् उस २ कार्य को करने का विचार रहित (अबुद्धि पूर्वक) है तो ऐसी स्थिति में वहीं पुरषार्थ की गौणता एवं भाग्य की प्रधानता मानी जायेगी अर्थात् इस स्थिति में जो कार्य होता है उसको भाग्य कृत कहेंगे । बुद्धि पूर्वक जो भी कार्य है और उसमें जो सफलता मिलती है, उस समय वहां पुरुषार्थ प्रधान एवं दैव गौण माना जाता है। इस स्थिति में जो कार्य होता है. उसको पुरुषार्थ से हुआ कहेंगे इस तरह अबुद्धिपूर्वक जीव. को जो सुख दुःखादिक होते हैं वह देव की प्रधानता से होते हैं तथा बुद्धिपूर्वक जो लाभ अलाभ, श्रादि जीव को होते हैं पुरुषार्थ की प्रधानता से होते हैं । इस प्रकार दोनों की प्रधानता एवं भासता से ही कार्य पनसा है .. अनुकूल देव और अनुकूल पुरुषार्थ, प्रतिकूल देव और प्रतिकूल पुरुषार्थ होने पर भी एक मुख्य और एक गौरा रहता है । . ... .. . ... . ..
एकनाकर्षन्ती म्लथयान्तो वस्तुतत्व . मितरेण । अन्तेनः जयति जैनोमन्थान नेत्र मिव गोपी ॥२१७७॥
जिस तरह ग्वालिनी मक्खन बनाने रूप कार्य की सिद्धि के लिये दही के हांडि में मथानी चलाती हैं और उसकी रस्सी को जिस प्रकार एक हाथ से अपनी ओर खींचती है, उस समय दूसरा हाथ शिथिल कर देती है और फिर जब दूसरे से अपनी ओर खींचती है, तब पहिला शिथिल करती है; एक. को खींचने पर दूसरे को सर्वथा छोड़ नहीं देती। यदि सर्वथा छोड़ देगी तो मक्खन निकलने की बात तो दूर
रहे उसी को एक हांडि या खप्पर रूप में परिणाम हो जायेंगे । मक्खन तो खा नहीं २ सकेगी वरं सब दहि जमिन खा लेगी । जिस समय दाहिने हाथ की अोर रस्सी को
खींचती है उस समय उस प्रोर की रस्सी ज्यादा सक्रिय रहती है एवं बाये हाथ को रस्सी शिथिल रहती है, किन्तु निष्क्रिय नहीं रहती । यदि निष्क्रिय रहती तो उस ओर की रस्सी को भावश्यकता को छोड़ देना चाहिये किन्तु सर्वथा छोड़ने पर कार्य नहीं होता । इसी प्रकार भाग्य कृत में पुरुषार्थ शिथिल एवं पुरुषार्थ कृत में भाग्य शिथिल रहता है। पूर्ण निष्क्रिय या अभाव नहीं रहता । इसी प्रकार स्यावाद कथन भी सौग मुख्य की अपेक्षा से है। जब भास्य बलशाली रहता है तब वह अपना प्रभाव दिखाता है एवं जब पुरुषार्थ बलशाली रहता है, तब वह अपना प्रभाव दिलाये बिना नहीं रहता है ।
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अध्याय : ग्यारहवा ]
[ १०३.१ कर्म कर्म हिताबन्धि, जोको जोहित स्पृहः । स्व स्व प्रभाव यस्त्वे, स्वार्थ को वा न वाञ्छति ॥२१७६॥
Karma works in its own cause that means karma; produces karina the soul works for its own good, that is to say fight against the karmic Power, Who is there in there in the world that wiil not work for his own good when he has the power to do so? :
कर्म-कर्म का हित चाहते हैं। जीव-जीव का हित चाहता है। जीव कभी बलवान होता तो कभी कर्म बलवान हो जाता है। इस तरह दोनों का अनादि से ही बैर चला पा रहा हैं। बलवान् भाग्य जब उदय में आता है तब जीव में मिथ्यात्व आदि भाव को पैदा कर अपनी संतान को पुष्ट कर जीध को अपने अधीन कर लेता है । जो अनादि काल से एकेन्द्रिय जीव निगोद राशि में पड़ जाते है भाग्य की तीन यातना सह रहे हैं, वे बेचारे क्या पुरुषार्थ करेंगे ? 'जब तक एकेन्द्रिय से असंझी . पंचेन्द्रिय तक पर्याय को धारण करते रहते हैं, तब तक शुभ पुरुषार्थ भी नहीं कर सकते हैं संज्ञी पर्याप्तक पंचेन्द्रिय जीव भी जब तक भाग्य तीन बंध, उदय, संत्व रहता उसको भी शुभं पुरुषार्थ करने की योग्यता नहीं होती। जिन कर्मों की स्थिति अंतः कोडा-कोडी सागर से अधिक होती है, उसके प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन की प्राप्ति सम्भव नहीं जो कि शुभ पुरुषार्थ को प्राथमिक अवस्था है । किन्तु जिनके बन्ध को प्राप्त होने वाले कर्मों की स्थिति अन्त कोडा-कोडो सागर प्रमाण प्राप्त होती है और सत्ता में स्थित कर्मों की स्थिति संख्यात हजार सागर कम अन्तः कोडा-कोडी सागर शेष रह जाती है वही प्रथमोपशम सम्यक्त्व प्राप्त कर सकते हैं और जब तक सम्यक्त्व प्राप्त नहीं होता तब तक मोक्ष के लिये कुछ भी पुरुषार्थ . नहीं हो सकता। अतः पुरुषार्थ भी सदैव भाग्य की सहायता चाहता रहता है सिर्फ उदय के समय में ही भाग्य अपना प्रभाव दिखाता है ऐसी बात नहीं किन्तु सत्ता एवं निर्जरा के बाद भी अपना प्रभाव डालता है । यदि बद्धमान नरक तिर्यञ्च प्रायु है, तब वह जीव अणुनत वा महावत धारण नहीं कर सकता। सातवें नरक से प्राया हुआ जीव मोक्ष नहीं जा सकता है।. .
. व्यवहार में भी दैनन्दिन अनुभव सिद्ध दैव पुरुषार्थ का कार्य वाणिज्य में, शिक्षा क्षेत्र में, कृषि आदि में देखने में आते हैं। समान पुरुषार्थ करने वालों में भी
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१०३.२ ।
[गो. प्र. चिन्तामरिण कोई सफलता प्राप्त करता है तो अन्य कोई निष्फलता को प्राप्त होता है । एक जीव ने पुण्य से न्याय रूप पुरुषार्थ से सम्पदा प्राप्त को किन्तु सम्पदा सुख देने वाली तभी हो सकती है यदि पुण्य का उदय है. तो पुण्य के उदय नहीं रहने पर सम्पदा सुख नहीं दे सकती है। अतः पुण्य संसार सुख का कारण है उससे सम्पदादिक प्राप्त होता है किन्तु यह एवंागत हनि. पुण्य से ही सम्पदा प्राप्त हों और पुरुषार्थ से नहीं हो या पुरुषार्थ से ही हो देव से न हो किन्तुं दोनों में से एक की गौणता एवं मुख्यता पर अवलम्बित है।
देव पुरुषार्थ की संप्त भंगी-- १. स्यात् भाग्यकृत---अबुद्धि पूर्वक की अपेक्षा से। . २. स्थात् पुरुषार्थ कृत---बुद्धि पूर्वक की अपेक्षा से । ३. स्यात् भाग्य पुरुषार्थ कृत-क्रम से अबुद्धि पूर्वक और बुद्धि पूर्वक की .
अपेक्षा से। ४. स्यात् अववतव्य---युगपत् दोनों विवक्षाओं को नहीं कह सकने की
अपेक्षा । ५. स्यात् भाग्यकृत् प्रवक्तव्य -- अबुद्धि पूर्वक की और युगपत् न कह सकने ' की विवक्षा से। ६. स्यात् पुरुषार्थकृत अवक्तव्य-बुद्धि पूर्वक की और युगपत् न कह सकने
की विवक्षा से। ७. स्यात् भाग्य पुरुषार्थ कृत अवक्तव्य-~- क्रम से. अबुद्धि पूर्वक एवं युगपत्
न कह सकने की अपेक्षा से ।
इस प्रकार देव एवं पुरुषार्थ परस्पर सापेक्ष है। अनादि से भाग्य शक्ति शाली है । काल लब्धि पाकर जब जीव शक्तिशाली होता है तब वह भाग्य की शक्ति को धीरे २ अपने पुरुषार्थ के बल पर नाश करते हुये शेष में संपूर्ण रूप से भाग्य को नाश करके अपना विजय वैजयन्ति मनन्त काल के लिये लोकाय में फैरा देता है । हम सभी उस मण्डे के नीचे प्रतिज्ञा बद्ध हुये कि जब तक उस झण्डा को प्राप्त नहीं कर सकते तब तक चीर शत्रु भाग्य के साथ युद्ध करने में पीछे नहीं हटे । "पिछे हटे नाहीं वीर
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अध्याय ग्यारहवां ]...
[ १०३३
की जात के, न मरे वह कभी परान प्रांत ।" क्योंकि संसार में परिभ्रमण करने के लिये एवं भव्य के लिये भाग्य प्रधान है पुरुषार्थ गौरा है, किन्तु मोक्ष प्राप्ति के लिये भव्य के लिये पुरुषार्थं प्रधान एवं भाग्य गौण है । --श्री कनकनंदी सुनि
सुरम्य है ये नगरी महान गांव श्रवण बेलगुल नाम । बाहुबलिप्रभू ति महान विद्यगोरिपर्वत पर जान ॥ १३॥ संवत दो हजार उनहाल अक्षय तृतीया दिवस महान । पूरण फीतो ग्रंथ ये जान, गौमट प्रश्नोत्तर है नाम ||२|| श्रीजम कर के बन्दोपाय मुतिपुरी की मुझ को चाह । इक पद की नहीं चाह, मिले निजातम गुण भंडार ॥३॥ जिन वारणी सरस्वती नमों निर्मलगुणा भंडार । मैं तेरा शरणा गहु हो जाउ भवपार ॥४॥ श्रादि महावीर fariगुरु: प्रमानों वारं वार । सन्मति हो तुम गुरु महा भवसे कर दो पार ॥५॥
श्री मूलसड नन्थास्नाये, सरस्वतीगच्छे, बलात्कार, श्री कुन्दकुन्दा चार्यान्वये श्री आचार्य श्रादि सागरः, तच्छिष्य आचार्य कोल काल सर्वज्ञः प्रष्टविश भाषा विज्ञो महावीर कोलिः तच्छिल्येण श्री गणधराचार्य कुम्यसागरेण "गोम्मट प्रश्नोत्तर चितामणि" नामधेयो ग्रन्थः कर्नाटक प्रदेशेऽतिशय क्षेत्रे श्रवणबेलगोलं नाम नमरे भण्डार बसति जियालये चतुविशति सोर्थङ्कर पादमूले स्थित्वा संवत् २०३८, वीर निर्वाणस्य २५०७ तमे वर्षे वैशाख मासे शुक्लपक्षे अक्षय तृतीयायां बुध बासरे, रोहिणी नक्षत्रे वृष लग्ने प्रारब्धः सं० संवत् २०३६ वीर निर्धारण संवत् २५०८ तमे वैशाखमासे शुक्ल पक्षऽक्षय तृतीयायां सोम वासरे, रोहिणी नक्षत्रे, वृषभलग्ने सप्तपञ्चा शच्चरणी तुङ्गस्थ श्री बाहुबलि नश्चररपार बिन्ये ऽयं समाप्ति मतः ।
ॐ शांति
ॐ शांति
शुभं भूयात् ॐ शांति
ॐ शांति
ॐ शांति
ॐ शांति
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________________ निशान देवेन्द्र नाचाय क्रमांक अध सरल मंगल देशना संस्थान . ज 1. मनुष्य जन्म अत्यन्त दुर्लभ है, यदि तुमने इस में धर्म की / __ कमाई नहीं की तो आगामी भव में दुःख भोगना होगा / 2. जिनेन्द्र भगवान की वाणी में अविचलित श्रद्धा धारण करो। पागम की श्रद्धा से जीवों का अनन्त कल्याण हुआ है। 3. तुम शरीर से भिन्न चेतनापुंज प्रात्मा हो / जिनसे शरीर का हित होता है, उनसे प्रात्मा का कल्याण नहीं होता / सदा अपने स्वरूप का विचार करना चाहिये / प्रात्म: चितन के बिना मोक्ष नहीं मिलेगा / 4. संयम धारण करके डरो मत ! यह संयम तुम्हारे लिये सच्चा कल्याण-प्रदाता है। . 5. धर्म का मूल सत्य और अहिंसा है। इस धर्म के द्वारा . सच्ची और अबिनाशी शान्ति मिलेगी। परम पूज्य प्राचार्य रत्न श्री 108 शांतिसागरजी महाराज .