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________________ naaandoravariandebastrawporavinatanjummmmentsunncouTRENDRENEDIC अध्याय : सातवा ] अन्तराल के पाठ द्वीप समुद्र की बेदी से साढे पांच सौ योजन की दूरी पर हैं, उनका विस्तार पचास योजन है । पर्वतों के अन्त में जो आठ द्वीप हैं. वे समुद्र की वेदी से छह सौ योजन की दूरी पर हैं। इनका विस्तार पच्चीस योजन है। पूर्व दिशा के द्वीप में एक पर वाले मनुष्य होते हैं । दक्षिण दिशा के द्वीप में मनुष्य शृङ्ग (सींग) सहित होते हैं । पश्चिम दिशा के द्वीप में पूंछ वाले मनुष्य होते हैं । उत्तर दिशा के द्वीप में गे मनुष्य होते हैं । आग्नेय दिशा में शश (खरहा) के समान कान वाले और नैऋत्य दिशा में शकुली के समान कान वाले मनुष्य होते हैं। वायव्य दिशा में मनुष्यों के कान इतने बड़े होते हैं कि वे उनको मोड़ सकते हैं । ऐशान दिशा में मनुष्यों के लम्बे कान होते हैं । पूर्व और आग्नेय के अन्तराल में अश्व के समान मुख वाले, प्राग्नेय और दक्षिरण के अन्तराल में सिंह के समान मुख वालं. दक्षिण और नंऋत्य के अन्तराल में भषण-कुत्ते के समान मुखवाले, नैऋत्य और पश्चिम के अन्तराल में गर्यर (उल्लू) के समान मुखवाले, पश्चिम और वायव्य के अन्तराल में शूकर समान मुखवाले, वायव्य और उत्तर के अन्तराल में व्याघ्र के समान मुख वाले, उत्तर और ऐशान के अन्तराल में काक के समान मुख वाले और ऐशान और पूर्व के अन्तराल में कपि बन्दर) के समान मुख वाले मनष्य होते हैं। हिमवान् पर्वत के पूर्व पार्श्व में मछली के समान मुख वाले और पश्चिम पार्श्व में काले मुख वाले, शिखरी पर्वत के पूर्व पार्श्व में मेध के समान भुख वाले और पश्चिम पापर्व में विद्युत् के, दक्षिण दिशा के विजयाद्ध के पूर्व पार्श्व में गाय के समान मुख वाले और पश्चिम पार्श्व में मेष के समान मुख वाले और उत्तर दिशा में विजयार्द्ध के पूर्व पार्श्व में हाथी के समान सुख वाले और पश्चिम पार्श्व में दर्पण के समान मुख वाले मनुष्य होते हैं। एक पैर वाले मनुष्य मिट्टी खाते हैं और गुहाओं में रहते हैं । अन्य मनुष्य वृक्षों के नीचे रहते हैं और फल-पुष्प खाते है । इनकी आयु एक पल्य और शरीर की ऊंचाई दो हजार घनुष है । उक्त चौबीस द्वीप लवण समुद्र के भीतर हैं। इसी प्रकार लवण समुद्र के बाहर भी चौबीस द्वीप हैं । लवरण समुद्र के कालोद समुद्र सम्बन्धी की अंडतालीस द्वीप हैं । सब मिलाकर छियानवे म्लेच्छ द्वीप होते हैं । ये सब द्वीप जल से एक योजन ATHAANA ADHAAma n d नात PROINMaantwo
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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