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[गो. प्र. चिन्तामरिह
व्रत रहित सम्यादृष्टिः सम्यक्त्वार्य है ।
चारित्र को पालने वाले यति चारितार्य हैं । कर्मयों के तीन भेद हैं.--:
सावध कार्य, अल्पसावध कार्य और असावध कार्य । सायंध कार्य के छह हैं
असि, मसि, कृषि, विद्या, शिल्प और वाणिज्य कार्य ।
तलवार, धनुव, वारण, छुरी, गदा आदि नाना प्रकार के आयधों को चलाने में चतुर असि कार्य हैं । प्राय व्यय प्रादि लिखने वाले अर्थात् मुनीम या क्लर्क मसि कर्मार्थ हैं । खेती करने वाले कृषि कार्य हैं । गरिंगत आदि बहत्तर कलाओं में प्रवीण विद्या कार्य हैं । निर्णेजक नाई प्रादि शिल्प कार्य हैं । धान्य, कपास, चन्दन, सुवर्ण आदि पदार्थों के व्यापार को करने वाले वाणिज्य कार्य हैं।
श्रावक अल्प सावध कार्य होते हैं और मुनि असावद्य कार्य हैं ।
इक्ष्वाकु आदि वंश में उत्पन्न होने वाले इक्ष्वाकुवंशी, भरत के पुत्र अर्क कीति के कुल में उत्पन्न होने वाले सूर्यवंशी, बाहुबली के पुत्र सोमयश के कुल में उत्पन्न होने बाले सोमवंशी, सोमप्रभ श्रेयांस के कुल में उत्पन्न होने वाले कुरुवंशी, अकम्पन महाराज के कुल में उत्पन्न होने वाले नाथवंशी, हरिकान्त राजा के कुल में उत्पन्न होने वाले हरिवंशी, यदुराजा के कुल में उत्पन्न होने वाले यादव, काश्यप राजा के कुल में उत्पन्न होने वाले उग्रवंशी कहलाते हैं ।
कौशल, गुजरात, सौराष्ट्र, मालव, काश्मीर प्रादि देशों में उत्पन्न होने वाले क्षेत्रार्य कहलाते हैं। म्लेच्छ दो प्रकार के होते हैं
अन्त:पज और कर्मभूमिज । - लवरण समुद्र में आठों दिशाओं में पाठ द्वीप हैं । इन द्वीपों के अन्तराल में भी पाठ द्वीप हैं । हिमवान पर्वत के दोनों पाश्वों में दो द्वीप हैं। शिखरी पर्वत के दोनों पाश्वों में दो द्वीप है । और दोनों विजयार्द्ध पर्वतों के दोनों पार्यो में चार द्वीप हैं । इस प्रकार लवण समुद्र में चौबीस द्वीप हैं। इनको कुभोग भूमि कहते हैं।
चारों दिशाओं में जो चार द्वीप हैं, वे समुद्र की वेदी से पांच सौ योजन की दूरी पर हैं। इनका विस्तार सौ योजन है। चारों विदिशामो के चार द्वीप और
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