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अध्याय : सातवां ]
रस ऋद्धि के छह भेद हैं
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श्रास्यविष --- किसी दृष्टिगत प्राणी को मर जानो' ऐसा कहने पर उस प्राणी का तत्क्षण ही मररण हो जाय इस प्रकार की सामर्थ्य का नाम मास्यवि अथवा वाग्विष है ।
effer - किसी क्रुद्ध मुनि के द्वारा किसी प्राणी के जाने पर उस प्राणी का उसी समय मरण हो जाय इस प्रकार की सामर्थ्य का नाम दृष्टिविष है 1.
क्षेत्र ऋद्धि के दो भेद हैं
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क्षीरस्त्रावी - नीरस भोजन भी जिन मुनियों के हाथ में आने पर क्षीर के समान स्वादयुक्त हो जाता है अथवा जिनके वचन क्षीर के समान संतोष देने वाले होते हैं, वे क्षीरस्त्रावी कहलाते हैं ।
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nearera - नीरस भोजन भी जिन मुनियों के हाथ में आने पर मधु के स्वाद को देने वाला हो जाता है और जिनके वचन श्रोताओं को मधु के समान लगते हैं, वे मुनि मध्वास्त्रावी हैं ।
eferस्त्रावी - नीरस भोजन भी जिनके हाथ में आने पर घृत के स्वाद युक्त हो जाता है और जिनके वचन श्रोताओं को घृतके स्वाद जैसे लगते हैं, ये मुनि सपिरास्वावी हैं ।
अमृतास्त्राबो- जिनके हस्तगत भोजन अमृत के समान हो जाता है और जिनके वचन अमृत जैसे लगते हैं, वे मुनि अमृतास्त्रावी हैं ।
अक्षी महान ऋद्धि और अक्षीण ग्रालय ऋद्धि ।
किसी मुनि को किसी घर में भोजन करने पर उस घर में चक्रवर्ती के परिवार को भोजन कराने पर भी अन्न की कमी न होने की सामर्थ्य का नाम अक्षीण महान ऋद्धि है ।
ऋद्धि रहित श्रार्यों के पांच ह हैं
frat मुनि को किसी मन्दिर में निवास करने पर उस स्थान में समस्त देव, मनुष्य और तिर्यों को परस्पर बाधा रहित निवास करने की शक्ति का नाम अक्षरालय ऋद्धि है ।
१. सम्यक्त्वार्थ, २. चारित्रार्य, ३. कर्मार्य, ४. जात्वार्य और ५. क्षेत्रार्य ।