________________
५०८ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि आदि स्थानों में और भयानक श्मशानों में तीन तप, शीत आदि की बाधा होने पर भी घोर उपसर्गों का सहना घोर तप है ।
महातप--पक्ष, मास, छह मास और एक वर्ष का उपवास करना महातप है। एक वर्ष के उपरान्त पारणा होती है और केवलज्ञान भी हो जाता है। इसलिये एक वर्ष से अधिक उपवास नहीं होता है । . .. उन तप-पञ्चमी को, अष्टमी को और चतुर्दशी को उपवास करना और दो या तीन बार आहार न मिलने पर तीन, चार अथवा पांच उपवास करना उग्र
।
--
R-5DIALORimiVEENiremaduERIANIMIMARATHomammar
... ..... दीप्त तप- शरीर से बारह सूर्यों जैसी कान्ति का निकलना दीप्त तप है ।
हत तपःो गए लोहपिणन पर गिरी हुई. जल की बूंद की तरह आहार ग्रहण करते हों आहार का पता न लगना अर्थात् आहार का पच जाना तप्त तप है।
घोर गुरण प्रहाचारिता-सिंह, व्याघ्र आदि क्रूर प्राणियों से सेवित होना घोर गुण ब्रह्मचारिता है।
घोर पराकमता---मुनियों को देखकर भूत, प्रेत, राक्षस, शाकिनी आदि का घर जाना घोर पराक्रमता है।
बल ऋद्धि---इसके तीन भेद हैं--मनोबल, वचनबल, कावबल ।
मनोबलअन्तर्मुहूर्त में सम्पूर्ण श्रुत को चिन्तन करने की सामर्थ्य का नाम मनोबल है।
वचन बल-अन्तर्मुहूर्त में सम्पूर्ण श्रुत को पाठ करने की शक्ति का नाम वचनबल है।
काय बल--एक मास चार मास, छह मास और १ वर्ष तक भी कायोत्सर्ग करने की शक्ति होना अथवा अंगुली के अग्र भाग से तीनों लोकों को उठाकर दुसरी जगह रखने की सामर्थ्य का होना काय बल है।
औषध ऋद्धि--पाठ प्रकार की है। जिन मुनियों को निम्न पाठों बातों के द्वारा प्राणियों के रोग नष्ट हो जाते हैं, वे मुनि औषद्ध ऋद्धि के धारी होते हैं। .
१. बिट् (मत) लेपन, २: मल का एक देश छूना, ३. अपक्व आहार का स्पर्श, ४. सम्पूर्ण अंगों के मल का स्पर्श, ५. निष्ठीवन का स्पर्श, ६. दन्त, केश, नख मुत्र आदि का स्पर्श, ७. कृपादृष्टि से अवलोकन और कृपा से दातों का दिखाना ।
ARI
inmen:
ACinitivir
uinine-
Naram