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________________ अध्याय : सातवां ]: ६. फल चारण-फल को बिना छुए फल पर गमन करना । ... पुष्प शारामा .....पुर को बिला हुए पुष्प पर गमन करना । ८. बीज चारणत्व-बीज को बिना छुए बीज पर गमन करना । ६. तन्तु चारणत्व-तन्तु को विना छुए तन्तु पर गमन करना । पैरों के उत्क्षेपण (उठाना और रखना) के बिना प्रकाश में गमन करना, पर्यङ्कासन से आकाश में गमन करना, ऊपर को स्थित होकर आकाश में गमन करना, अथवा सामान्य रूप से बैठकर आकाश में गमन करना आकाशगामित्व है । अणिमा आदि के भेद से विक्रिया ऋद्धि अनेक प्रकार की है। प्रतिमा- शरीर को सूक्ष्म बना लेना अथवा (कमलनालं) में भी प्रवेश करके चक्रवर्ती के परिवार को विभूति को बना लेना अंरिणमा है। महिमा-शरीर को बड़ा बना लेता महिमा है। लधिमा-शरीर को छोटा बना लेना लधिमा है । गरिमा शरीर को भारी बना लेना मरिमा है । प्राप्ति-भूमि पर रहते हुए भी अंगुलि के अग्रभाग से मेंरू की शिखर, चन्द्र, सूर्य आदि को स्पर्श करने की शक्ति का नाम प्राप्ति ऋद्धि है । प्राकाम्य-~-जल में भूमि की तरह चलना और भूमि पर जल की तरह गमन करना, अथवा जाति, क्रिया, गुरा द्रव्य सैन्य प्रादि का बनाना प्राकाम्य है। ईशित्व-तीन लोक के प्रभुत्व को पाना ईशित्व है । वशित्व--सम्पूर्ण प्राणियों को वश में करने की शक्ति का नाम वशित्व है। अप्रतीधात--पर्वत पर भी प्रकाश की तरह गमन करना, अनेक रूपों का बनाना अप्रतिधात है। कामरूपीत्व-मूर्त और अमूर्त अनेक प्राकारों का बनाना कामरूपित्व है । अन्तर्धान-रूप को अदष्ट बना लेना । तप ऋद्धिक सास भेद हैं.... १. घोर तप, २. महा तप, ३. उग्र तप, ४. दीप्त तप, ५. तप्त तप, ६. घोर गुण ब्रह्मचारिता, ७. घोर पराक्रमता । घोर तप---सिंह, व्याध, चीता, स्वायद आदि दृष्ट प्राणियों से युक्त गिरिकंदरा
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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