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. जब मनुष्य के क्षेत्र के बाहर मत कोई तिर्यंच या देव मनुष्य क्षेत्र में प्राता है तो मनुष्य गत्यानुपूर्वी नाम कर्म का उदय होने से मानुषोत्तर के बाहर भी उसको उपचार से मनुष्य कह सकते हैं । दंड, कपाट, प्रतर और लोक पूरण समुद्धात के समय भी मानुषोत्तर से बाहर मनुष्य जाता है। मनुष्यों के भेद-~
आर्या म्लेच्छाश्व ॥११६५।। मनुष्यो के दो भेद हैं-आर्य और म्लेच्छ ।
जो गुरणों से सहित हों अथवा मुणवान् लोग जिनकी सेवा करें, उन्हें प्राय कहते हैं । जो निर्लज्जता पूर्वक चाहे जो कुछ बोलते हैं, वे म्लेच्छ हैं।
आर्यो के दो भेद-ऋद्धि प्राप्त आर्य और ऋद्धि रहित आर्य । ऋद्धि प्राप्त अायों के ऋद्धियों के भेद से पाठ भेद हैं। पाठ ऋद्धियों के नाम--बुद्धि, क्रिया, विक्रिया, तप, बल, औषध, रस और क्षोत्र।
. बुष्टि ऋजिर टाइटेड हैं। १. अवधिज्ञानी, २. मनः पर्ययज्ञानी, ३: केवलज्ञानी, ४. बीज बुद्धि वाले, ५. कोष्ठ बुद्धि वाले, ६. साम्भियश्रोत्री, ७. पदानुसारी १. दूर से स्पर्श करने में समर्थ, १. दूर से रसास्वाद करने में समर्थ, १०. दूर से गंध ग्रहण करने से समर्थ, ११. दूर से सुनने में समर्थ, १२ दूर से देखने में समर्थ, १३. दश पूर्व के ज्ञाता, १४. चौवह पूर्व के ज्ञाता, १५, पाठ महानिमित्तों के जानने वाले, १६. प्रत्येक बुद्ध, १७. वाद विवाद करने वाले और १८. प्रज्ञाश्रमरण । एक बीजाक्षर का ज्ञान होने से समस्त शास्त्र का ज्ञाता हो जाने को बीज बुद्धि कहते हैं । धान्यागर में संग्रहीत विविध धान्यों की तरह जिस बुद्धि में सुने हुये वर्ण आदि का बहुत काल तक विनाश नहीं होता है, वह कोष्ठ बुद्धि हैं। क्रिया ऋद्धि दो प्रकार की है-जंघादि चारणत्व और अाकाश गामित्व । जंघादि चारणत्व के नौ भेद हैं-~
१. जंधाचारणत्व--भूमि से चार अंगुल ऊपर आकाश में गमन करना। २. श्रेणियारणत्व---विद्याधरों की श्रेणि पर्यन्त आकाश में गथन करना । ३. अग्निशिखा चारणत्व-~-अग्नि की ज्याला के ऊपर गमन करना । ४. जल चारसत्व-जल को विना छुये जल पर गमन करना। ५. पत्र प्रारणत्व–पत्ते को बिना छुए पत्ते पर गमन करना ।
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