________________
अध्याय : सातवां }
. [ ५०५ और उत्तर दिशा में भी इसी तरह का दूसरा इष्वाकार नामक पर्वत है । प्रत्येक पर्वत चार लाख योजन लम्बे हैं। दोनों इष्वाकार पर्वतों से धातकी खण्ड के दो भाग हो गये हैं-एक पूर्व घातकी खण्ड और दूसरा अपर धातकी खण्ड । प्रत्येक भाग के मध्य में एकएक मेरु है । पूर्व दिशा में पूर्व मेरु और पश्चिम दिशा में अपर मेरु है। प्रत्येक मेरु सम्बन्धी भरत आदि सात क्षोत्र और हिमवन् प्रादि छह पर्वत हैं। इस प्रकार धातकी खुण्ड में क्षोत्र और पर्वतों की संख्या जम्बू द्वीप से दूनी हैं । जम्बू द्वीप में हिमवान् आदि पर्वतों का जो विस्तार है उससे दूना विस्तार धातकी खंड के हिमवान आदि पर्वतों का है, लेकिन ऊँचाई और गहराई अबूद्वी के समान ही है। इसी तरह विजयार्द्ध पर्वत और वृत्तवेदाढ्य पर्वतों की संख्या भी जम्बू द्वीप के समान है। धातकी खंड में हिमवान् आदि पर्वत चक्र के सारे के समान हैं और क्षेत्र प्रारों के छिद्र के आकार
पुष्कर द्वीप का वर्णन--
पुष्कराः छ ॥११९३६ : पुष्कर द्वीप के पद्ध' भाग में भी सब रचना जम्बू द्वीप से दूनी है।
धातकी खंड द्वीप के समान पुष्करार्ध में भी दक्षिण से उत्तर तक लम्बे और आठ लाख योजन विस्तृत दो इष्वाकार पर्वत हैं। इस कारण पुष्कराद्ध के दो भाग हो गये हैं। दोनों भागों में दो मेरु पर्वत है--एक पूर्व मेरू और दूसरा अपर मेरु । प्रत्येक मेरु सम्बन्धी भरत आदि सात क्षेत्र और हिमवान् प्रादि छह पर्वत हैं । पुष्कराध द्वीप में सारी रचना धातकी खंड द्वीप के समान ही है । विशेषता यह है कि पुष्कराई के हिमवान आदि पर्वतों का विस्तार धातकी खंड के हिमवान आदि पर्वतों के विस्तार से दूना है । पुष्कर द्वीप के मध्य में गोलाकार मानुषोत्तर पति है, अतः इस पर्वत से विभक्त होने के कारण इसका नाम पुष्करा पड़ा। प्राधे पुष्कर द्वीप में ही मनुष्य हैं, अतः पुष्कराद्ध का ही वर्णन यहाँ किया गया है। मनुष्य क्षेत्र की सीमा---
प्राङ्मानुषोत्तरात्मनुष्यः ।।११६४॥ .. . .. ..
मानुषोत्तर पर्वत के पहले ही मनुष्य होते हैं, प्रागे नहीं मानुषोत्तर पर्वत के बाहर विद्याधर और ऋद्धि प्राप्त मुनि भी नहीं जाते हैं। मनुष्य क्षेत्र के अस भी बाहर नहीं जाते हैं । पुष्कराद्ध की नदियां भी मानुषोत्तर के बाहर नहीं बहती हैं।
--
ministratininentama
DETED
n
i