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________________ ४७८ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि कार्य करने वाले, शूद्र, पाखण्डी, नपुसक, विकलांग, विकलेन्द्रिय तथा भ्रान्त चित्त के धारक मनुष्य बाहर ही प्रदक्षिणा देते रहते हैं । सुरेन्द्र, असुरेन्द्र तथा नरेन्द्र श्रादि उत्तम पुरुष छत्र, चमर और भृमार आदि को जयांगण में छोड़ प्राप्तजनों के साथ हाथ जोड़कर भीतर प्रवेश करते हैं । मणिमय मुकटों को धारण करने वाले वे सब, भीतर प्रवेश कर विधिपूर्वक प्रणाम करते हैं और चक्रपीठ पर प्रारूढ होकर भगवान् जिनेन्द्र की तीन-बार प्रदक्षिणा देते हैं । इच्छानुसार अपनी शक्ति और दिभव के अनुकूल सामग्री से पूजा करते हुये अपने नाम का उल्लेख कर नमस्कार करते हैं। तदनन्तर जिन्होंने अपनी अंजलिया मा से इमा रखी हैं और रोमांचों के जिनका भाव प्रकट हो रहा है, ऐसे वे सब अपनी-अपनी सीढ़ियों से नीचे उत्तर कर सभाओं में यथास्थान बैठते हैं। - जिस प्रकार सूर्य के सम्मुख खिला हुमा कमलों का समूह सुशोभित होता है, उसी प्रकार जिनेन्द्र भगवान् रूपी सूर्य के सम्मुख वह गणरूपी द्वादश सभा रूपी कमलों का समूह सुशोभित हो रहा था । जिस प्रकार नदी समुद्र को भरने में समर्थ नहीं है, उसी प्रकार सब ओर से समवशरण में प्रवेश करती हुई वह सेना उसे भरने में समर्थ नहीं थी । यहाँ बाहर निकलता, पाता, प्रवेश करता, दर्शन करता, प्रदक्षिणा देता, सन्तुष्ट होता, भगवान् को प्रणाम करता और उनकी स्तुति करता हुआ सज्जनों का समूह सदा विद्यमान रहता है। . समवशरण के भीतर भगवान् के प्रभाव से न मोह रहता है, न रागद्वेष उत्पन्न होते हैं, न उत्कण्ठा, रति एवं भात्सर्यभाव रहते हैं, न अंगड़ाई और जमुहाई आती है, न नींद आती है, न तन्द्रा सताती है, न बलेश होता है, न भूख लगती है, न प्यास का दुख होता है और न सदा समस्त दिन कभी अन्य समस्त प्रकार का अमंगल ही होता है। बाह्य विभूति के अद्वितीय स्थान समवशरण भूमि में जब अन्तरंग आत्मा की पवित्रता से युक्त भगवान् विराजमान होते हैं, तब बारह सभाओं का समूह अपने तृषित नेत्रों से उनके अमृत रूप सौन्दर्य सागर का पान करता है। इस प्रकार समोशरण का रचनाक्रम कहा । तीर्थकर प्रभु की आयु थोड़ी रह जाती है, तब अहंत भगवान् योग निरोध करते हैं, समवशरण का विघटन हो
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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