SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 568
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अध्याय : छठवां ] [ ४७६ जाता है । ये तीर्थंकर अरहन्त भगवान् चौदहवें गुणस्थान में प्रवेश करते हैं ! प्रश्न :-चौदहवें गुरणस्थान का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-जिनकी योगों की प्रवृत्ति दूर हो जाती है, उन्हें प्रयोग केवली कहते हैं । यह जीव इस गुणस्थान में 'अ, इ, उ, ऋ, लु' इन पांच लघु अक्षरों के उच्चारण में जितना काल लगता है, उतने ही काल तक ठहरता है। अनन्तर शुक्ल ध्यान के चतुर्थ पाद के प्रभाव से सत्ता में स्थित पिचासी प्रकृतियों का क्षय कर एक समय में सिद्ध क्षेत्र में पहुंच जाता है। . (हरिवंशपुराण, पेज नं० ६४७, जिमसेन स्वामी) NADADADADADANA ADDAWANNAD DAAAAAAAAADUSTAJAD बन रस्नेषु मोशीष बन्दनेषु यथा मतम्। .. मरिणषु बेडूयं यथा शेयं तथा ध्यानं व्रतादिषु ॥ जिस प्रकार बहुमूल्य रत्नों में बज (हीरा) रत्न सर्वोत्तम कहा जाता है, चन्दनों में मलयागिरि चन्दन सुवासित-शीतल एवं महत्वपूर्ण जाना जाता है, मणियों में भैडूर्यमणि को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, उसी प्रकार व्रत,, संयम, शील, चरित्र, तपादि अनुष्ठानों में ध्यान सर्वोत्तम और महत्त्वपूर्ण हैं । यह साधुओं का प्राण है। कहा भी है---"दह्यतेऽनन्त कर्मारिए ध्यानाग्निना क्षणात् ।" अर्थात् ध्यान रूपी अग्नि से अनन्त भवों में संत्रित किये कर्मभुज क्षणभर में रूई के ढेर के समान जलकर भस्म हो जाते हैं। प्राचार्य कहते हैं "ध्यान प्राणाः मुनीश्वराणां ।" अर्थात् ध्यान मात्र ही साधुओं का जीवन है। .. प्रात्मदर्शन का एक मात्र ध्यान ही उपाय है। WWWXWWWWWUSV MEUWAWALA SOANAXMAANDAMAAVAASASAYANG
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy