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________________ SHA amera p अध्याय सातवां : लोक वर्णन . . arna । नरकों का वर्णन और नरकों के नाम रन शर्करा वालुका पर धूम तमो महातमः प्रभा भूमयो .. घनाम्बुवाताकाश प्रतिष्ठाः सप्ताधोऽधः ॥११६०॥ '... " रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, वालुका प्रभा, पङ्क प्रभा, धूम प्रभा, तमः प्रभा और महातमः प्रभा, ये सात नरक क्रम से नीचे-नीचे स्थित हैं। ये कमशः घनोदधिवात वलय, घनबात बलय और तनुवात वलय से बेष्टित हैं और तीनों वात वलय आकाश के आश्रित हैं। रत्नप्रभा सहित भूमि रत्नप्रभा है, इसमें मन्द अन्धकार है । शर्कराप्रभा सहित भूमि शर्कराप्रभा है, इसमें बहुत कम तेज है । वालुका प्रभा भूमि अन्धकार प्राय है। आगे की भूमियाँ उत्तरोत्तर अन्धकारमय ही हैं । बालुका प्रभा के स्थान में बालिका प्रभा भी पाठ देखा जाता है । महातमः प्रभा का तगस्तम: प्रभा यह दूसरा नाम है । ये वातवलय नरकों के नीचे भी हैं। धनोदधिवात वलय गोमूत्र के रंग के समान है। धनवात मूग के रंग का है। तनुवात वलय अनेक रंग का है। तीनों बातवलय क्रमश: लोक के नीचे के भाग में तथा सप्तम पृथिवी के अन्तिम भाग तक एक बाजू में बीस-बीस हजार योजन मोटे हैं। सप्तम पृथिवी के अन्त में क्रमशः सात, पाँच और चार योजन मोटे हैं । फिर क्रमशः घटते हुए मध्यलोक में पांच, चार और तीन योजन मोटे रह जाते हैं । फिर क्रमशः बढ़कर ब्रह्मलोक के पास सात; पांच और चार योजन मोटे हो जाते हैं। पुनः क्रमशः घटकर लोक के • अन्तिम भाग में पांच, चार और तीन योजन रह जाते हैं । लोक शिखर पर दो कोस, एक कोस तथा सवा चार सौ धनुष कम एक कोस प्रमाण मोटे हैं। प्रश्न :--लरकों का विस्तार किस प्रकार है ? उत्तर :- प्रथम पृथिवी एक लाख अस्सी हजार योजन मोटी है । इसके तीन भाम हैं-.१. खर भाग, २. पङ्क भाग और ३. अब्बहुल भाग । खर भाग का विस्तार सोलह हजार योजन, पङ्ग भाग का चौरासी हजार योजन और अब्बहल भाग का अंस्सी हजार योजन है । खर भाग के ऊपर और नीचे एक-एक हजार योजन RAM
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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