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________________ अध्याय : सातवा ] [ ४८१ छोड़कर शेष भाग में तथा पंक भाग में भवनवासी और व्यन्तर देव रहते हैं, और अजल के भाग में नारकी रहते हैं । द्वितीय आदि पृथिवियों का विस्तार क्रम से ३२, २३, २४, २०, १६ और ६ हजार योजन है। सातों नरकों के प्रस्तारों की संख्या क्रम से १३, ११, ६, ७, ५, ३ और १ है । प्रथम नरक में १३ और सप्तम नरक में केवल एक प्रस्तार है । सातों नरकों के रूतुनाम इस प्रकार हैं १. धम्मा, २. वंशा, ३. शैला या मेधा, ४. अञ्जना, ५. अरिष्टा, ६. मघवी और ७. माधवी । सातों नरकों में बिलों को संख्या तासु त्रिंशत्यचविशति पञ्चदश दशत्रिपञ्चोनेक नरक शत सहस्त्राणि पञ्च चैव यथाक्रमम् ।।११६१॥ उन प्रथम आदि नरकों में क्रम से तीस लाख, पच्चीस लाख, पन्द्रह लाख, दस लाख, तीन लाख, पांच कम एक लाख और पांच बिल हैं। सम्पूर्ण बिलों को संख्या चौरासी लाख है। नारकियों का वर्णन नारकोनित्या शुभतर लेश्या परिणाम देहवेदना विक्रियाः ॥११६२।। नारकी जीव सदा ही अशुभतर लेश्या, परिणाम, देह, वेदना और विक्रिया वाले होते हैं । उनके कृष्ण, नील और कापोत ये तीन अशुभ लेश्यायें होती हैं। प्रथम और द्वितीय नरक में कापोत लेश्या होती है । तृतीय नरक के उपरिभाग में कापोत और अधोभाय में नील लेश्या है । चतुर्थ नरक में नील लेश्या है। पञ्चम नरक में ऊपर नील और नीचे कृष्ण लेनया है । छठवें और सातवें नरक में कृष्ण और परम कृष्ण लेश्या है। उक्त वर्णन द्रव्य लेश्यामों का है, जो अायुपर्यन्त रहती हैं। भावलेश्याएँ अन्तर्मुहूर्त में बदलती रहती है, अतः उनका वर्णन नहीं किया गया। . स्पर्ण, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द को परिणाम कहते हैं । शरीर को देह कहते हैं । अशुभ नाम कर्म के उदय से नारकियों के परिणाम और शरीर अशुभतर । प्रथम नरक में नारकियों के शरीर की ऊँचाई सात धनुष, तीन धनुष, तीन हाथ और छह अंगुल हैं। प्रामे के नरको में कम से दुगनी-दुगनी ऊँचाई होती गई है, michadaily
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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