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________________ - - - - अध्याग : कावा [ ४७७ और वे ऐसे जान पड़ते थे मानो उन्हीं के समान दूसरे तिर्यच हो । भावार्थ-तिर्यच अपनी स्वाभाविक कुटिलता को छोड़कर तदाकार होने पर भी ऐसे लगते थे जैसे ये वे न हों, दूसरे ही हों । इस प्रकार द्वादशांग के गुणों के समान बारह सभानों-सम्बन्धी बारह गए प्रदक्षिणा रूप से भगवान् की उपासना करते थे। भगवान् अर्हन्त, अपने सिंहासन की शोभा से दूसरों में न पाये जाने वाले परमेष्ठीपना को स्थापित कर रहे थे । क्रमपूर्वक ढोरे जाने पर देवोपनीत चमरों से महेशिता को तीन चन्द्रमा के समान कान्ति को धारण करने वाले छत्रत्रय से तीन लोक के स्वामित्व को संसार के प्रान्तरिक अन्धकार को नष्ट करने वाले भामण्डल से कान्ति की अधिकता को सब ऋतुओं के फूलों से युक्त अशोक वृक्ष के द्वारा अन्य समस्त जीवों के शोक दूर करने की सामर्थ्य को पुष्पवृष्टि रूप पूजा के द्वारा पूज्यता को अभयोत्पत्ति की घोषणा करने वाली दिव्य धुनी से. जयलक्ष्मी की सर्वहितकारिता को और आनन्ददायी मंगलमय वादित्रों के नाद से साधुजनों की चित्त को आनंदित करने की सामर्थ्य को प्रकट कर रहे थे। जो आत्मा के प्राधीन हों उन्हें प्रतिहार कहते हैं, इस प्रकार प्रात्माधीन गुरगों से उत्पन्न अष्ट महा प्रातिहार्यों से भगवान अर्हन्त सुशोभित हो रहे थे । आत्मोत्थ समस्त विभूति को धारण करने वाले भगवान् सर्वलोकातिवर्ती दीप्ति से लोगों का कल्यारण करने के लिये समोशरण में विराजमान हुये। उस समयं देव लोग घोषणा के साथ यह कहकर जीवों का आह्वान कर रहे थे कि हे आत्महित के इच्छुक भव्य जनो ! सम्पूर्ण विकसित प्रात्मा को धारण करने वाले केवली भगवान् यहाँ विराजमान हैं। शीघ्रता से यहां आओ, प्राग्रो और इन्हें नमस्कार करो । इस प्रकार उन देवों ने आह्वान किया तब शीघ्र ही मनुष्य, देव और असुर वैभव के साथ सब ओर से समवशरमा में पाने लगे। समवसरण के दृष्टिगोचर होते ही वे मानांगरण में खड़े हो सबसे पहले हाथ जोड़ मस्तक से लगाकर वाहनों से नीचे उतरते हैं । तदनन्तर वाहन आदि परिग्रह को बाहर छोड़कर विशिष्ट राज्य-चिह्नों से युक्त हो मान पीठ की प्रदक्षिणा देते हैं । प्रदक्षिणा के बाद सबसे पहले मानस्तम्भ को नमस्कार करते हैं, सदनन्तर हृदय में उत्तम भक्ति को धारण करते हुये उत्तम पुरुष भीतर प्रवेश करते हैं और पापी, विरुद्ध
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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