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________________ अध्याय: पांचवां 1 [ ४२७ अपने जीव, जीव, स्त्री, पुत्र, सुवर्ण घरादि से प्रेम और प्रीति के वश से ग्राम सात्कृत बहिरंग परिग्रह के वियोग से हो जाने पर क्लेश से मेरा इष्ट वियोग fret प्रकार नहीं होवे इस प्रकार भन्द कर्म का प्रचल चितवन करना इष्ट वियोग में उत्पन्न मध्यान है । क्रूरैर्व्यन्तर और दरि मनुजे व्यर्लिम मैरापदि प्राप्तायां गरलाविकैश्च महती तनाशचिन्ताऽऽपदा । संयोगो न भवे सदा कथमिति क्लेशातिनुन्नं मनः, श्चात ध्यान मनिष्ट योग जनितं जातंदुरस्तंनरः ॥ १०३११४ क्रूर व्यन्तर, चौर, वैरी मनुष्य, व्याल, मृग, विष भादि पदार्थों के द्वारा आपत्ति आने पर उस प्रापत्ति के नाश की चिन्ता उत्पन्न होती है । मेरे श्रनिष्ट पदार्थों का संयोग न हो। इस प्रकार की चिन्ता से चित्त निरखर आकुलित रहता है वह पापों का कारण भूत अनिष्ट संयोग नाम द्वितीय श्रार्त्तध्यान है । बाधासंजन तात निहित स्वान्तं नितान्तस्थिरं, ताद्विश्व परिवहन्मम कदर विश्लेषण इत्यंगिनः । दीनस्यास्त विशिष्ट वस्तु विषय ज्ञानस्य न स्यात्कथं, 'क्लेशात्या सम जातु संगम इति विष्टं च तस्त्यात्मनः ।। १०३०॥ ती विश्वपरावह से मेरा वियोग कब होता अथवा क्लेशों के समूह का मेरे कभी भी संयोग नहीं होवे इस प्रकार अस्त हो गया है, विशिष्ट वस्तु विषय का विज्ञान जिसका ऐसे दीन प्रारणी का मन क्लेशित होता है । और दुःख में क्षिप्त मन अत्यन्त स्थिर रहता है, वह रोग से उत्पन्न आर्त्तध्यान में निहित ध्यान होता है । नानोपायचयेन मोच चरितं भ्रन्त्विा विशालामिला, माभोलं मकराकरं च बहुशो तुच्छोच्या पाप्य यत् । प्राप्यं तुण्यवता जनेन कनकं कान्तं च कान्तादिकं, कांक्षा क्षुभिता मतिर्वत् निधानार्थं महातिप्रदम् ।। १०३१ ॥ नाना प्रकार के उपायों के समूह के द्वारा नीच आचरणों के द्वारा विशाल पृथ्वी पर भ्रमण करके और बहुत बार तुच्छ इच्छा से भयंकर समुद्र को प्राप्त करके गुणवान मानव के द्वारा प्राप्त करने योग्य जो सुवर्ण और मनोश कान्ता आदि
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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