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[गो. प्र. चिन्तामणि हैं, उस धनादि की इच्छा से क्षुभित मति है, महान अति को देने वाला निदान नामक आर्तध्यान है, यह खेद की बात है। ..
ग्लान्य द् गमशोक शोष जडता मांग कंपोकता, निःश्वास स्वर भंग कार्ण्य कृशतामौनाऽभिवीक्षामूति । . प्रस्वेदाऽनिमिषेपास्थिति . रुजायाञ्चामृषोक्तयादयः, स्पष्टाः स्वस्य परस्य वार्तजनितास्तज्झापकाः कायिकाः ।।१०३२।।
ग्लानि, अश्रुओं का निकालना, शोक, रोष, जड़ता, मूर्छा, अंग की कंपन, दीर्घ निश्वास, स्वर भंग, कृष्ण, कृशता, मौन, बार-बार देखना, मृत्यु, बार-बार पसीना आना, अनिमिषेण से देखना, अस्थिरता रोग, याचना, असत्य भाषरण आदि अपने और पर के प्रार्तध्यान की ज्ञापक अथवा पार्तध्यान में जनित काय की चेष्टा स्पष्ट देखी जाती है।
अतिर्दुःख मय जात जनितं स्यादातमतौ भवं, पापादान निदान मात्र सिचयं यद्रजः संश्रयम् । मिथ्यावृष्टि गुणादिषड् गुरणपदं येन प्रमादास्पदं,, धुलेश्यात्रयज सुदुःखजनक तिर्यम्मति प्रापकम् ।।१०३३॥
असाला वेदनीय. से उत्पन्न दुःख अति है, अति में होने वाला आर्त होता है, जिस प्रकार गीला वस्त्र रज से संश्रय का कारण है, उसी प्रकार प्रार्तध्यान पाप के पादान का कारण है, जिससे मिथ्यात्वादि षट् गुणस्थान होते हैं, प्रमाद का स्थान है, दुःस्व का जनक है और तिर्यंच गति का प्रापक है । रौद्रध्यान भेद, और उनके लक्षरण--
हिंसानन्दम सात कारण गुरणे हिसारुचिर्देहिनां, भेवच्छेद विधारणासुहररूपश्च तरुणः। शेषेष्याधुदितैरसत्यवचनरम्यस्य हान्या मृषा, नंदं रौद्र मसात सन्सति पदे मिथ्याप्रलापे रुचिः ॥१०३४।।
भेद, च्छेद, विदारण, प्राणहरण आदि के द्वारा अन्य भी उन दारुण असाता कारणों के समूह के द्वारा प्राणियों की हिंसा में रूचि करना, हिंसानन्द नामक प्रथम रौद्र ध्यान है, शेष ईा प्रादि से कधित असत्य वचनों के द्वारा दूसरे की हानि के लिए असाता की सन्तति के स्थान मिथ्या प्रलाप में संचि रखना मुषानन्द नामक द्वितीय रौद्रध्यान हैं।
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