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अध्याय पांचवां ]
स्तेयानन्द मवाप्य यत्परधन वंद्यावि निद्य हित, रादित्वमवाप्तुमुत्सुकतरं चेतश्च संस्तद्भवेत् । स्वं संरक्ष्य विपक्षदूरमुदिता तोषोग्रता या तुसं, रक्षानन्दमपि स्वबस्तु निखिलं निवेरि कुर्वे इति ॥१०३५|| उन वन्द्यादि निन्दनीय चेष्टाओं के द्वारा दूसरे के धन को प्राप्त करके त्व को प्राप्त करने के लिये उत्सुकतर चित्त है, वह स्तेयानन्द होता हैं, धन की रक्षा करने जो विपक्ष के दूर करने में हर्षित होकर उग्र सन्तोष है, वह संरक्षानन्द नामक रौद्रध्यान है, मैं सारी अपनी वस्तु को को वैर रहित करता हूं. इस प्रकार के विचार का नाम भी संरक्षानन्द रौद्रध्यान हैं ।
प्रक्षापट मानारुणता दातश्च देहे महान्, हेरger fevretriकुटयः शक्ति प्रशंसात्मनः ।
स्वेद स्वाधर निष्ठुर ग्रह करा घातगिकपादयः, arrier careasts विषयास्तद्रोद्रभावोद्भवाः ।। १०३६ ॥
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इन्द्रिय के विकलता आंख मुख का रक्त होना शरीर में महान दाह, शस्त्र का उत्क्षेपण, faver वचन बोलना, भृकुटिका चढ़ना अपनी शक्ति की प्रशंसा पसीना माना, अपने अधरों को निष्ठुरता से ग्रहण, हाथों का घात अंग का कम्पन यादि होना स्व और पर के दृष्टिगोचर होने वाले उस रौद्र भाव से उत्पन्न कायिक चिह्न हैं ।
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रुदः क्रूरतराशयो गत क्यो रौद्र रुद्र भवं,
धर्म यथोरधूलिनिलयं
कुकर्मालयम् । पंचस्वादिगुणेषु तीव्रतर सरकृष्णा त्रिलेश्योद्गतं,
प्रोद्य तीव्रराति नारक गति प्राप्रोनिनिमित्तं मनम् ||१०३७॥
क्रूर चित्तवाला दया रहित भाव रुद्र है, निश्चय से रौद्र में होने वाला परिणाम रौद्र ध्यान है, जैसे प्रार्द्र चमड़ा महान धूलि का स्थान होता हैं, उसी प्रकार कुकर्मों का स्थान है, पांच मिथ्यात्व प्रादि गुलस्थानों में तीव्रतर कृष्णादि तीन अशुभ लेश्या से उत्पन्न तीव्रतर गति से नारक गति प्राप्ति का निमित्त माना है । शुभ ध्यान का लक्षण ----
ध्याताsपेसजनो
गीत वितताऽऽतोद्याविकोलाहले, स्थाने स्थावरजंगमांगि रहिते पूते नितांतं समे ।