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________________ । [ गो. प्र. चिन्तामणि प्राय: संहनने स्त्रिभिस्त्रिभिरू ऐतोऽन्त्यैः स नाऽस्मिन्पुनः । चिन्सातबहिरंग. कारण सरिणर्या हि कार्यद्विपः ॥१०२५।। ध्याता, ध्यान, ध्येय और ध्यान का फल चार अंग हैं । उन चारों में सद् और असत् ध्यान होता है, आदि तीन-तीन उन - उत्तम संहननों से युक्त भ्याता होता है । अन्तिम संहननों से वह ध्यान नहीं होता है। क्योंकि पुनः इस चिन्ता अंतरंग बहिरंग कारण रूप मार्ग में कार्यरूपी हाथी प्रेरित करने योग्य है । संक्षेप से ध्यान का लक्षण--- एकस्मिन् विषयेऽग्रमान नम भूदस्या मतेरित्यसा, वेकाना विषयोपयोग निरता चिता निरोधोऽचला। वस्था स्यानिजगोचराचलमनो मानं तदन्तर्मुह, विस्थान मतीवयुर्धरतया नाऽतः परं तिष्ठति ॥१०२६॥ इस मति को एक विषय में एकाग्रता होती है, इस प्रकार यह एकाग्रता विषयों में उपयोग की लीनता चिता का निरोध अचल अवस्था अपने गोचर अचल मन ध्यान है, वह ध्यान अन्तर्मुहर्तावस्था वाला होता है, अत्यन्त दुर्धर होने से इसके आगे यह ध्यान नही रहता है। मिश्यात्योरुतमस्तिरस्कृत सुदृरज्ञानोऽधिक कोषवान्, स्तब्धः सत्स्वपि वंचनांचित मसिलुब्धः परार्थेष्वपि । दुलेश्यापशमाशयश्च भवति ध्याताऽशुभ ध्यानयोः, ध्येयं ध्यान विशेष लक्षण विनिर्देशक्षणे लक्ष्यते ॥१०२७॥ मिथ्यात्व रूपी महान अन्धकार से तिरस्कृत है, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यकचारित्र जिसका ऐसा प्रत्यन्त क्रोधी मुर्ख, सत्पदार्थों में भी वंचनमति पर धन का लोलुपी, दुर्लेश्या के वशीभूत हुअा, प्रारणी, मार्त रौद्र ध्यान का ध्याता होता है । अशुग ध्यान का ध्येय का ध्यान, विशेष लक्षण के वर्णन करने के क्षण में कहेंगे। मार्तध्यानों के चार भेद और स्वरूप--- जीवा जीव कलत्र पुत्र कनकाऽगारादिकावाल्मनः, ' प्रेम प्रीतिवशात्मसात्कृत बहिः संगाद्वियोगोदमे । क्लेशेनेष्ट वियोग जार्तमचलं तच्चिन्तन में कथ न स्यादिष्ट वियोग इत्यपि सदा भन्दस्य दुःकर्मणः ॥१०२८।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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