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अध्याय : पांचवां ]
सम्यक्काय कषाय कार्यकरणं सल्लेखनाद्या वरैः .
चतुष्टयं रस परिस्यारी
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स्तयाब्वद्वयम् । मँसदद्दल - ..
• सौवीरान रसोज्झनैरभिषवान्नेनान्द बाह्य मैन्दतपोभिरुग्रनियमैरब्दार्थ
भली प्रकार कार्य और कषायों को कुश
करना सल्लेखना है । उसमें उत्कृष्ट योगों के द्वारा चार वर्ष पर्यन्त रस परित्याग के द्वारा चार वर्ष व्यतीत करना इसके are दो वर्ष कांजी आहार और रस त्याग के द्वारा एक वर्ष वृष्यं अन्न के सेवने से यह उससे श्रधा वर्ष बाह्य मन्द मन्द तप के द्वारा आधा वर्ष उग्र नियमों के द्वारा शरीर को कृश करना प्रथम काय सल्लेखना है ।
कालं कालं च वैशमशनं पानं प्रकृत्यादिकं, arrai freeफानिलः विजयतेर्न स्याद्यया विक्रिया । reforfarer तोक्त विधिभिर्बाह्य स्तपः प्रक्रमराचार्यानुमतैः समाधिफल दरेषांग सल्लेखना ||१०२३||
जिससे वात, पित्त और कफ से अपने ज्ञान में विकृति नहीं हो ऐसे काल, शरीर, बल, देश, श्रन्न, पान और प्रकृति आदि को जान करके प्राचार्य के द्वारा अनुगत समाधि रूप कल के देने वाले पूर्व कथित विधि से बाह्य तप के द्वारा विद्वानों को यह काय सल्लेखना करनी चाहिये ।
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मंगार्दनम ||१०२२॥
eqध्यान प्रकरैः कषाय विषया सहलेखना श्रपसीस्वेष्टानिष्ट वियोग योगयुगजे. बाधा निदानोभये ।
इत्यस्य चतुविधस्य विजयो हिंसामृषास्तेयस
रक्षानन्द विभेदतोऽशुभकृतो ध्यानस्य रोद्रस्य च ।। १०२४ ||
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धर्म और शुवल ध्यान के द्वारा इष्ट वियोग, अनिष्ट संयोग, पीड़ा चितवन और निदान बंध नामक चार प्रकार के प्रार्तध्यान पर विजय और हिसानंद, भूषानंद स्तेयानन्द एवं परिग्रहानन्द इन चार प्रकार के रौद्र ध्यान पर विजय प्राप्त करना कषाय को कृश करने वाली उत्तम सल्लेखना है ।
ध्यातृध्यान विचित्य चिंतन कलान्यंगाति चत्वारितैः, स्याद् ध्यानं सदसत्व तत्र भवति ध्यातोसमैरन्वितः ।
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