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________________ ३२४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणिं तापं तस्य निरस्य दुस्तरंतरं जातं द्विजाद शुः स्वास्थातो नियतं विहारपरं कुर्वन्मुनीन्द्रोत्तमः ॥ १०१६।। ज्योतिष शास्त्र में कथित लक्षणों से वा ग्रहों के बलाबल के क्षीणत्व देखने . से अथवा केवल प्रश्न चूडामरिंग में कथित दग्ध श्रभिघूमित प्रादि प्रश्नोत्तरों से अपनी आयु को बारह वर्ष प्रमाण या हीन जानकर रत्नत्रय से अलंकृत धीर श्री मुमुक्षु - आचार्य, अपने धर्मानुराग से पालित अपने वृद्ध रोगी, नवीन दीक्षित महोपवासी, शिक्षित आदि से समन्वित संघ के भार को अपने में महान् स्नेह रखने वाले शिष्यों में आरोपित करता है । तदन्तर अपने संघ की रक्षा करने में चतुर नूतन प्राचार्य को और सर्व संघ को बुलाकर उनके गुरु के वियोग से उत्पन्न चेतोगत दुःख को, अपने वचन रूपी अमृत वर्षा की धारा से शांत करता है । तदनन्तर मैं यहां ठहरूमा इस प्रकार के संकल्प से रहित होकर अनियत विहार करता है वह श्रेष्ठ मुनीन्द्र कहलाता है । प्रक्ष्यन्ते बहुदेश संश्रयवशात्संवेगिदाधाप्तयस्तीर्थाधीश्वर केवलोद्गममहीं निर्वाखभूम्यादयः । स्थैर्य धैर्य विरागतादिषु गुणेष्वाचार्यवर्येऽक्षाद्विद्यावित्तसमागमादधिगमो नूत्नार्थस्य च ।।१०२०। बहुदेश के संश्रय के यश से संवेग यादि की प्राप्ति तीर्थाधीश्वर केबलोद्गम दर्शन होते हैं । प्राचार्यवर्य के अवलोकन से क्षरण मात्र में धीरता वीतरागादि गुणों में स्थिरता और ज्ञान शास्त्रियों के समागम से नूतन अर्थ भूमि निर्वाणभूमि, आदि के के समूह का ज्ञान होता है । सद्भू बहुसूरि भक्ति क्षेत्रं पात्रमपीक्ष्यते युतंक्षामादि दोषोन्भिलं, परित्यागस्य निःसंता । सर्वस्मिन्नपि चेतनेतर बहित्संगे स्वशिष्यादिके, गर्भस्थापचयः परीषजयः सल्लेखना श्रोतमा ||१०२१॥ बहुसूरि की भक्ति युक्त, क्रोधादि दोषों से रहित, योग्य राजा जिसमें हो ऐसा क्षेत्र पात्र शरीर के परित्याग की निःसंगता, सर्वचेतन, अचेतन, बहिरंग परिग्रह Area frofer में भी गर्व का अभाव परिषहों पर विजय होने पर उत्तम सल्लेखना देखी जाती हैं । ------
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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