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अध्याय : पाँच ]
जातस्यास्यति जातोद्भटभटकटकस्योरु धैर्यस्तथा यः, सोऽयंस्याद्वर्य वीर्याचरण चरणजुतो वीर लक्ष्मी निलासः ।।१०१५॥ जैसे देश काल से अपने सेना का भली प्रकार विचार कर संजा, शत्रु समूह का जीतने वाला होता है उसी प्रकार महान् धैर्य वाला जो यति भी अपने कर्मोदय से उत्पन्न इस बाइस प्रकार के परिषह रूपी वीर भट को सैन्य का जीतने वाला होता है वह यह उत्कृष्ट वीर्याचार के आचरण से विख्यात कोति वाला वीर की लक्ष्मी का निवास होता है ।
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परिषहों का घोर उदय आने पर और आयु क्षीण होती दिखने पर मुनिराज ध्यान करते हैं, और परिषहों को जीतकर समाधि करते हैं । उसका वर्णन -
दीक्षा पीठिक योदितेन विधिना शिक्षां गृहीत्वा समाचारेणानुमतो गणेन गरिस्पना प्राप्तश्च सत्सूरिताम् । भूलो व्यपगत व्यापद गरणं सद्गणं,
रक्षन् यः समयं नयत्यतितरां धन्यः स मान्यो सुनिः ।। १०१६।।
पीठिका के द्वारा afer for से दीक्षा और शिक्षा को ग्रहण करके समाचार समूह से स्वीकृत और सूरि के द्वारा सत्य सूरिपने को प्राप्त छत्तीस गुण के भूषण से युक्त, नष्ट हो गये हैं प्रपत्तियों के समूह जिसके ऐसे अपने संघ को रक्षा करता हुआ जो काल को व्यतीत करता है वह माननीय मुनि अत्यन्त धन्य है ।
ज्योतिः शास्त्र विनूल जातक मतान्नानानिमित्तक्षरगात् terrear चय गृहावलि बल क्षीणत्व सं क्षणात् । प्रश्नस्याक्षर लक्ष क्षरण वशात्कालागमात्स्वायुधोमानं द्वादश वर्ष संमित मतो होनं च निश्वित्य सः ॥ १०१७ || पश्चाच्चारुतरात्मसंस्करणधी धोरो मुमुक्षुणी प्रीत्या पालित मात्मनात्मनि महात्स्नेहानुबंधे महत् । वृन्दं तुम्बिलरोगिसुतष: शैक्षावि भिक्ष्यन्वितं प्रारोप्यात्मभर वरं गधरे सत्तलक्ष्मीधरे ॥ १०१८॥ रक्षादक्षतमं गरणस्थ गखिनं सर्वगणं चादराचाय प्रियवाक् चयाभूत रसासारेख चेलोगतम् ।