________________
४२२
[ गो. प्र. चिन्तामणि मैं सप के द्वारा, श्वत के द्वारा विख्यात हूँ, यतियों में मैं ही ज्येष्ठ हूं. भक्ति से मेरा कोई भी पुरस्कार प्रशंसा नमस्कार नहीं करता है इस प्रकार जो मान कषाय से उत्पन्न ग्लानि को नहीं प्राप्त होता है, वह विचार करता है कि मेरे दोष नहीं है गुण होते हैं सत्कार करने पर गुण नहीं दोष होते हैं, वह मुनि सत्कार से उत्पन्न अति को जीतने वाला होता है। याचा विजय परिषह
प्राज्यं राज्य मुदस्य शाश्वत पद प्राप्त्यै तपोवृहरणे, बेहो हेतुरयं हि भुक्त्यनुगता चास्य स्थितिस्तस्कुतः। भिक्षाय भ्रमणं हियः पदमिदं यस्मान्महार्यास्पद, नीच वृत्तिरनिन्दितेति विचरन याञ्चाजयः स्यान्मुनि ॥१०१६॥
. शाश्वत पद की प्राप्ति के लिए उत्कृष्ट राज्य को छोड़कर तप की वृद्धि में यह शरीर कारण है और इस शरीर की स्थिति भक्ति के अनुसार है इसलिए भिक्षा ' के लिए भ्रमण करना लज्जा का स्थान कैसे हैं ? क्योंकि भिक्षा के लिये भ्रमण महार्थों
का प्रास्पद है इस प्रकार नम्रवृत्ति बाला अनिन्दित चर्चा करने वाला मुनि याचना परिषह जयी होता है। विद्या परिषह
सर्वाशाश महान्धकार पुरुजाऽऽयामा त्रियामां यमी, योग र्योगमयत्यवार्यमहिमाऽऽभोगै महर्स यथा। क्षेत्र स्त्रीजन पश्व बध रहिते हृय निषास्थितः, सन्नत्युन निशाचराप्रतिहतध्यानो निषद्याजयी ।।१०१४॥
स्त्रीजन, पशु, नपुसक आदि दोषों से रहित मनोज्ञ क्षेत्र में अति उन निशा. घरों के द्वारा अप्रतिहत ध्यानी निषधा से स्थित अवार्य महिमा वाला जो संयमी सर्व दिशाओं को भक्षण करने वाले महान्धकार से व्याप्त दीर्घ रात्रियों को जैसे मुहर्त के समय विस्तरित योग के द्वारा व्यतीत करता है, वह निषद्या जयी होता है । परिवह विजय का फल . .....
देशं कालं स्वकीय... बलमपि नृपतिः सम्यगालोच्य यद, :..: छद्रातस्य जेता भवति यति रपि स्वीयकर्मोदयेन ।