________________
श्रध्याय: पांचवां ]
[ ४२१
के मिलने पर ही कार्य होता है, अन्यथा नहीं, इस प्रकार वस्तु की स्थिति को जानने वाला सहन करता है, वह मज्ञान परिषह को जीतने वाला होता है । नाग्न्य परिषह-
भूषा वेष fanirrer free त्यागात्प्रशस्ताकृते । बालस्येव मनोज जात विकृतिश्वितस्य लज्जेतिताम् ॥ हित्वा मातृसमान मेव सकलं कान्ताजन पश्यतः । पूज्यो नाग्न्य परिषहस्य विजयस्तत्वज्ञ ताप्तोदयः ॥ १०१०॥
जिनका शरीर, वेश भूषा, आदि विकार रहित है, जिनकी प्राकृति अत्यन्त atreenaraय है । मनोविकार से उत्पन्न हुई विकृति रूपी लज्जा को छोड़कर बालक के समान निर्भय और निर्विकार होते हैं । समस्त स्त्री समूह को माता के - उमान देखते हैं। नम रहते हुये भी किचित् मात्र भी मन में विकार नहीं है, वह साधु नग्न परिषह विजयी कहलाता है ।
आक्रोश परिवह
aff कर्णहृदt विदारण करान् क्र राशयः प्रेरिता । नाक्रोशान् घनगर्ज तर्जन खरान् शृण्वन्न शृण्वनि ॥ शायुत्तम संपदापि सहितः शान्ताशयश्विन्तयन् । यो बाल्यं वलसंकुलस्य शयनः क्लेश क्षमी तं स्तुवे ||१०११॥ जो संयमी क और हृदय के विदारक क्रूर चिल बालों के द्वारा प्रेरित अत्यन्त तीक्ष्ण, आक्रोशकारी वचनों को सुन करके भी नहीं सुनने वाले के समान होता है तथा जो उत्तम शक्ति रूपी सम्पदा से सहित होते हुए भी शान्त चित्त बाला संयमी उन दुष्ट वचन कारी दुष्टों की मूर्खता का चितवन करता हुमा, आक्रोश परिषह को सहन करता है, उसको हम स्तुति करते हैं । सरकार पुरस्कार परिवह
:
7
यातोऽहं तपसा तेन च पुरस्कारं प्रशंसा नति भक्त्या मे न करोति कोऽपि यतिषु ज्येष्ठोऽहमेवेति यः । ग्लानि मानतां न याति स मुनिः सत्कार जातिजित् दोषा मे न गुणा भवन्ति न गुणा दोषाः स्युरित्यन्यन्तः ॥१०१२ ।।