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मो. प्र. चिन्तामरिण
स्त्री परिषह----
जेता चित्त भवस्त्रयस्य जगतां यासामपांगेषुभिः । । ताभिमत्तनितम्बिनोभिरभितः संलोभ्यमानोऽपि यः॥ तत्फल्गुत्वभवस्य मैति विकृति तं वयं न्दिर। वन्दे स्यात्तिजयं जयन्त मखिलानर्थ कृतार्थ यति ॥१.००७।।
जिन स्त्रियों के कटाक्ष रूपी बारणों के द्वारा कामदेव तीन जगत का जीतने वाला हुआ था। उन वनितानों के द्वारा चारों तरफ से संलोभ्यमान होकर भी जो उन कटाक्षों को निस्सार समझकर विकृति भाव को प्राप्त नहीं होता है । उस श्रेष्ठ धैर्यधारी कुत कृत्य अखिल अनर्थों को जीतने वाले स्त्री परिषह जयी साधु को मैं नमस्कार करता हूँ। प्रज्ञा परिषह---
प्रत्यक्षाक्रम विश्वयस्तु विषय ज्ञानात्मनः स्वात्मनो। गर्वः सर्वमत तज्ञ इति यः प्राप्त परोक्षस ।। सर्वस्मिन्नपि नो तनोति हृदये लज्जां स कि तामिति । प्रशोत्कर्ष मदापनोदनपरः प्रज्ञासि जित्तस्ववित् ।।१००८॥
वास्तविक में आत्मा प्रत्यक्ष एवं युगपत् सर्व पदार्थों का जानने वाला है, उसके परोक्ष श्रुत के जान लेने पर मैं सर्व मत का ज्ञाता हूं। यह जानता हुआ भी हृदय में अनिर्वचनीय लज्जा को प्राप्त होता है। यह प्रज्ञा के उत्कर्ष के मद को अपनोदन करने में तत्पर तत्त्वज्ञानी प्रज्ञा परिषह जयी होता है । अज्ञान परिवह
ज्ञान ध्यानरत्ता मतिर्ममतपस्तीतून चोत्पद्यते । ज्ञानं पूर्णमयं जरः पशुरिति श्रोतुं वचोऽहं क्षमः ॥ .. नेत्यज्ञान परिषह स सहते प्रव्यक्त वस्तु स्थितिः । यः कार्य भवति स्वहेतु युगले सत्येव नेत्यन्यथा ।।१००६॥
मेरी बुद्धि ज्ञान ध्यान में लीन है, मैं तीन तपस्वी हूं, तथापि मुझे पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है, यह पशु है, मुर्ख है, अज्ञानी है, इस प्रकार के बचनों को सुनने के लिए मैं समर्थ नहीं हूं, इस प्रकार की अज्ञान परिषह को भो अंतरंग बहिरंग कारणों