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________________ अध्याय : पांचवा ] [ ४१६ हे शरीर! तू मेरे तप की वृद्धि का कारण है, इसलिए मैं योग्य आहारादि के द्वारा तेरा पोषरण करने के लिए घरों की पंक्ति में भ्रमण करता हूँ । यदि भ्रमरण करने पर भी प्राहार की प्राप्ति नहीं होती है, तो मेरा कोई दोष नहीं है । आहार की प्राप्ति की अपेक्षा आहार की प्राप्ति मेरे तप की विशेष वृद्धि करती है, इसलिए आहार की प्राप्ति ही मुझे प्रियतम है। ऐसा विचार करके आहार की प्राप्ति में जो आनन्द मानता है, वह संयमी अलाभ परिषह जयी होता है। अरति परिषह-- दुरिन्द्रिय वृन्द रोग निकर क्रूरादि बाधोत्करैः। : प्रोद्भूता मरति व्रतोत्कर परित्राणे गुणोत्पोषणे ॥ मक्ष क्षीरपतरां करोत्यरतिजिद्वौरः स बंद्यः सतां । यो दंडत्रय दंडनाहितमातः सत्य प्रतिको प्रती ॥१००५॥ जो संयमी अमनोज्ञ इन्द्रियों के विषय से, रोग प्रादि से उत्पन्न होने से, क्रूर पशु प्रादि की बाधाओं के समूह से उत्पन्न अरति को अपने व्रतों की रक्षा करने में एवं गुरण समूह को पुष्ट करने के लिए क्षीण कर देता है, मानसिक जुगुप्सा उत्पन्न नहीं होने देता है, वह सन, वचन, काय, का विजयी सत्य प्रतिज्ञ, धीर, वीर, अरति परिषह जयी संयमी सत्पुरुषों के द्वारा वंदनीय होता है। प्रदर्शन परिषद वर्ण्यते बहवस्सपोऽतिशयजाः सप्तद्धि पूजादयः ।। प्राप्ताः पूर्वतपोधनरिति वचोमात्रं तदद्यापियत् ।। तत्वज्ञस्य ममापि तेषु नहि कोऽपोत्यात संगोलिता। चेतोवृत्तिरहक परिषहजयः सम्यक्त्व संशुद्धितः ॥१००६॥ पूर्वकाल में तपोधनों ने बहुत से तपो अतिशय से उत्पन्न सप्त ऋद्धियां प्राप्त की हैं, ऐसा आज भी शास्त्रों में सुना जाता है। परन्तु मुझे तो यह वार्ता सत्य प्रतीत नहीं होती है । क्योंकि मैं तत्त्वज्ञानी इतना उत्कृष्ट तपश्चरण करता हूँ, परन्तु मुझे तो एक भी ऋद्धि प्राप्त नहीं हुई है। इस प्रकार मानसिक अश्रद्धा उत्पन्न नहीं होना ही सम्यक्त्व की निर्मलता है और इसी से योगी प्रदर्शन परिषह जयी होता है।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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