________________
४१८ ]
1. गो. प्र. चिन्तामणि
तपस्वी घोर अन्धकार से पूरित पर्वत की गुफा के प्रदेश में सोये हुये सुख पूर्वक व्यतीत करते हैं, वे शयन परिषद् जयी होते हैं ।
तृणस्पर्श परिषह-
श्रान्तः सन् श्रुतं भावनाऽनशन सद् ध्यानाऽध्व यानादिभिः । स्लोकं कालमति श्रमापहृतये शय्यानिषधे भजन् ॥ शुद्धोवरणपत्र संस्तरशिला पट्ट तत्पोडन: 1 कंड्यादिसहो भवेदिह तृश्वस्पर्शाची संप
श्रुत की भावना, उपवास, समीचीन ध्यान और मार्ग में गमनादि के कारणों सेक्लान्त संयमी अतिश्रम को दूर करने के लिए शुद्ध पृथ्वी, तृण पत्र, संस्तर और शिलापट्ट पर स्तोक काल तक शयनासन करते हैं । उस समय तृण आदि से शरीर में खुजाल उत्पन्न होती है, उसको आनंदित होकर सहन करते हैं, मन में खेद खिन्न नहीं होते हैं। वे तृण स्पर्श परिषह जयी कहलाते हैं । वध परिवह-
ve: पूर्व भवापकार कलनातज्जन्म वैरात्वलैः । म्लेच्छनिष्करुणैरकारण गुण द्वेषैश्च पापात्मक : 11 देहच्छेदनभेदनादि विधिता यो मार्यमाणोऽप्यलं । देहात्मात्मविभेद वेदन भवक्षांतिधातिक्षमी ॥१००३॥
पूर्व भव के अपकार के जान लेने से अथवा उस जन्म सम्बन्धी वैर भाव से रुष्ट हुये शत्रुओं के द्वारा अथवा निष्कारण गुणों में द्वेष रखने वाले, पापी, निर्दयी म्लेच्छों के द्वारा शरीर के छेदन, भेदन, मारण, ताडन आदि करने पर भी जो शरीर और आत्मा के भेद विज्ञान से उत्पन्न श्रात्मानुभव के सामर्थ्य से वेद खिन्न नहीं होता है, क्षमाशील वह साधु वध परिषह जयी कहलाता है ।
लाभ परिषह
हो २ देह १. सहायतां तव समुद्दिश्यैवपोध्यो मया । gat मतपसो गृहावलिमतो भ्रान्त्वाप्यनाप्तेऽशने ॥ दोषः कोपि न विद्यते भम पुनलोभादलाभक्षमा । तां पूसि प्रतनोत्यतः प्रियतमेवैवेत्यलाभक्षमा || १००४ ॥ ॥