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________________ ----CINE-DAN अध्याय : पांचवां ] [ ४१७ दूसरे के शरीर में उत्पन्न हुई पीड़ा के समान समझता है, वह निष्परिगस्, सुखी दिगम्बर साधु दंशमशक परिषह जयी कहलाता है । उसको मैं नमस्कार करता हूं। चर्या परिषह शार्दूलमिलितेच्छ भल्ल भुज गामोगेभयकास्पदे । ...... गन्धाद्विरदोत्करे करिरिपु कोई कनीडे बने । स्वरं कण्टक कर्करादि परुषेयत्रारण पावश्चरन् । एकः सिंह इवासिभीति विजयी व्रज्यात्तिजित्संयमी MREE जो शार्दूल, व्याघ्र, चीता, रीछ, सर्प आदि से भरा हुआ है, भयास्पद है, गन्ध से मदोन्मत्त हुये, गजराजों के क्रीडा का स्थान है, ककर, पत्थर, कण्टक प्रादि से व्याप्त है, ऐसे वन में सिंह के समान निर्भय होकर अत्राग पाद (जूता रहित) पैरों से भ्रमण करने वाले मुनि चर्या परिषहजयी होते हैं । रोग परिषह कण्ड्यागलगण्ड पाडवक्थु प्रन्थिज्वश्लीपद । ...... . श्लेष्मोदुम्बर कुष्ठ. पधन . श्वासादि रोगावतः ।। भिक्षुः क्षीरा , बलोऽपि भेषज सुहृन्मंत्रानपेक्षः :क्षमी। दुस्कारि विनिमिताति विजयी स्याद् व्याधियार्धाजयः ॥१०००। खुजाल, गंडमाल, पांडु रोग, दाह, ग्रन्थि, ज्वर, श्लीपद, कफ, उदुम्बर, कुष्ठ, वायु, श्वास आदि रोग से पीड़ित, क्षीण शक्ति वाला भी क्षमा शील साधु भैषज, मित्र और मन्त्रों की अपेक्षा नहीं करता है और दुष्कर्म रूपी शत्रु के द्वारा निर्मित रोगों पर विजय प्राप्त करने वाला साधु व्याधि परिषहजयी होता है। शयन परिषहजय---- झंझा वातहतात कौशिक शिवा फेत्कार घोर स्वरां। शंपा कर रवां स्फुरद चितडिज्जिह्वां क्षया राक्षसीम् ॥ पो ता दाग गमयस्यसौ शयन जाता घास जिद्धारधीः । . ध्वान्तात्यन्तकराल • भूधर बरी देशे प्रसुप्तः क्षरणं ॥१००१॥ जहां वर्षा सहित भयंकर वायु से पीड़ित होकर उल्लू और माल चीत्कार कर रहे हैं, वह तो जिसके शब्द हैं, शंपा जिसके क्रूर दाँत हैं; स्फुरायमान कांति वाली विद्युत जिसकी जिह्वा है, ऐसी विकराल रात्रि रूपी राक्षसिनी को धीर बुद्धि वाले -SeaternimauaiमनाताmmasumammysionNande eNH-MIREMEinmarwarettrumetrintmePA220% D AMADIHariOSANONIPAT
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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