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मल परिषह
[ गो. प्र. चिन्तामणि
प्राणाघात विभतितस्तनुरति स्वागाच्च भोगा स्पृहः, स्नानोद्वर्तन लेपनादि विगमात् प्रस्वेद पांसूदितं । लोकानिष्ट मनिष्ट मात्मवपुषः पामादि मूलं मलं, मात्र त्राण featurदि वृजिनं जेतुं मलक्लेश जित् ॥६६॥
जो संयमी प्राणियों के विघात से भयभीत है, जिसका शरीर के प्रति ममत्व नहीं है, इसलिये प्राणियों के विघातक स्नान, विलेपन नहीं करने वाले साधु के शरीर में पसीना व धूल से मल उत्पन्न हो जाता है, जिससे शरीर में खुजाल उत्पन्न होती है, लौकिक जन को जो अनिष्ट हैं, देखने में अमनोश है ऐसे मल को पाप भीरू साधु पापको नाश करने के लिए शरीर रक्षक कवच के समान धारण करता है, वह मल परिषह जयी कहलाता है ।
उस परिषह
ग्रीष्मे goraशेष देहि निकरे मार्तण्ड चंडांशुभिः, संतप्तात्तनुस्तृषानशन रुक् क्लेशादि जातोष्णनम् । शोष स्वेद विदाह खेदमशवशे नाप्तं पुराऽपिस्मरत्
मुक्त्यै निज भाव भावनरतिः स्यादुष्य जिष्णु तो ॥७॥
प्राणियों के शरीर को ग्रीष्मकाल में कृश करने वाले सारे प्राणी तीक्ष्ण सूर्य के किरणों से संतप्त हो रहे हैं, तृषा, उपवास, विहार, रोग, क्लेशादि से उत्पन्न उष्णता से तालु शुष्क हो रहा है, सारे शरीर में पसीना निकल रहा है, शरीर में दाह उत्पन्न हो रहा तो भी व्रती साधु खेद खिन्नता को प्राप्त नहीं होकर प्रात्म भावना में लीन रहता है, वह ऊष्ण परिषह जयी होता है ।
दंशमशक परीषह----
शून्यागारदरी गुहादि शुचिनि स्थाने विविक्ते स्थितः, dreniger at दंशमशकारचंड तुडैः कृताः । स्वमिति परदेह जातिमिवतां यो मन्यमानो मुनिः, निःसंग स सुख व दंशमशक क्लेशं क्षमी त तुम: Healt
जो शून्य गृह पर्वत की कन्दरा, गुफा, वृक्ष के कोटर में रहकर तीक्ष्ण खटमल कीट, मच्छर, देश मशकादिका के द्वारा उत्पन्न हुई अपने शरीर के पीड़ा को