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अध्याय : पांचवां ]
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अत्यन्त तीक्षण उपवास आदि से उत्पन्न क्षुधा इन्द्रियों के समूह को अपने ज्ञेय विषय के जानने में असमर्थ कर देती है । चित्त को श्रान्त कर देती है । बलवत्प्राणों को प्रयाण के सन्मुख कर देती है । अर्थात् क्षुधा से व्याकुल मानव की इन्द्रियां अपने कार्य से विमुख हो जाती है। मनः आकुल व्याकुल हो जाता है। मत्यु सन्मुख या जाती है । इस क्षुधा को अन्न के आधीन रखने वाले मानव जीत नहीं सकते हैं । उस से क्षुधा को जो आहार का त्याग कर धृतिरूपी अमृत के अशन से शमन करते हैं, वही साधु क्षुधा परिषह जयी होते हैं। तृषा परिषह
चंडश्चंडकरः स्थलस्थितययः संचारिणः प्रागिनः, भ्रष्टप्लुष्ट तनु स्तनोति नितरां यस्मिस्तपे तापने । तस्मिन् स्निग्ध विरुद्ध भोजन रुजाजतापावि पुष्यतृषा, त्यक्ते निःस्पृहतामूलेन कृतधीपाति तृष्णाजयः ।।६६४॥
जिस ग्रीष्मकाल में तीक्षा सूर्य की किरणों से तालाब नदी शुष्क हो जाते है, जलचर, स्थलचर, नभश्चर, जीवो का शरीर दग्ध हो जाता है, उस ग्रीष्म ऋतु में स्निग्ध, रूक्ष, प्रकृति विरुद्ध, आहार से वा रोगादि से उत्पन्न ध्यास को पुण्यात्मा, पवित्र बुद्धि के धारक यतीश्वर परित्यक्त वस्तु में स्पृहा का त्याग कर समतामृत के पान से बुझाते हैं. वे तृषा परिषहजयी होते हैं। शीत परिषह---
प्रोत्कम्पा हिम भीमशीत पवन स्पर्श प्रभिमांगिनो, यस्मिन्यान्यति शोत खेद मशाः प्रालयकालेऽगिनः । तस्मिन्नस्मरतः पुरा प्रियतमाश्लेशादि जात सुखं, योगागार मिरस्तशीत विकृते निर्वास सस्तज्जय HRE५||
जिस शीतकाल में शरीर में कम्पन उत्पन्न करने काली शीतल वायु के स्पर्श से शरीर के अवयव फट जाते हैं, तथापि पूर्वकाल में अनुभूत यनिता जन्य सुखों को स्मरण नहीं करते हुये दिगम्बर साधु धीर वीर होकर शुभ ध्यानरूपी घर में निवास करके शीत की बाधा का निवारण करते हैं अर्थात् शांत बाधा से पाकुलित नहीं होते हैं, वे शीत परिषह जयी होते हैं ।
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