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[ गो. प्र. चिन्तामणि
fair at गीत गाना, रोना, घर को झाडू देकर साफ करना और हिंसामय क्रिया करना निषिद्ध है । आर्यिका क्षमा प्रार्जव आदि गुणों से युक्त होती है । जाति कीति में पूज्यनीय होती है । निर्विकार वस्त्र धारण करती है । अपने शरीर में जिनके ममत्व नहीं है ।
चरंति ये चार चरित्र संपदः,
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पदं समाचार मिमं यमीशिनः ।
समाश्रयं तेsभ्युदय प्रमोदिनः
परां श्रियं ते कृति लोक नंदिनः ॥१॥
सज्जन पुरुषों को आनन्दकारक यशस्वी मुनि और आर्यिका चारित्र रूपी संपदा की स्थानभूत इस समाचार विधि का जो पूर्णरूप से पालन करते है, वे स्वर्ग सम्पदा का अनुभव कर मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त करते हैं ।
* पहि*
क्षुतृट् शीत मलोष्ण दंशमशकेर्या रोगशय्यावृण, स्पर्श क्लेशवधान लाभमरति निर्देर्शनं स्त्रीक्लमम् । प्रशाज्ञान भवौ सनाग्न्यशयनान् सत्कार याञ्चानिष चोद्भूतांश्च परीषहान् विजयते यो वोर्यचर्यो यति ॥९९२॥
१. भूख, २, प्यास, ३. शीत, ४. उष्ण, ५. दंशमशक, ६. नास्त्य, ७. श्ररति, . स्त्री, ६. चर्या, १०, निषद्या, ११. शय्या, १२. आक्रोश, १३. बंध, १४. याचना, १५. अलाभ, १६. रोग, १७. तृणस्पर्श, १८. मल १६. सत्कार पुरस्कार, २०. प्रज्ञा, २१. अज्ञान, और २२. प्रदर्शन इन कारणों से उत्पन्न परिषहों को जो जीतता है, वह
यतिराज वीर्याचारवान है ।
क्षुधा परिषह-
- क्षुत्तीक्ष्णानशनादि जाक्षतिकरं स्वज्ञेय बोक्षाक्षम, स्वान्तं भ्रान्ततरं करोति बलवत्प्राणान्प्रणोन्मुखान् । यादीनन जनेऽफलाऽसि सफला त्यागात्तपः पुष्टये, तस्या नृत्यमृताशनेन शममं कुर्वन्वती क्षुज्जयः ॥३॥