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________________ अध्याय : पांचवां । [ ४१३ एक देश रत्नत्रय से स्त्रियों को मुक्ति की प्राप्ति होती है, तो पुरुषों की नग्नता व्यर्थ है, अर्थात् पुरुषों को भी नग्न नहीं होना चाहिये । उनको भी वस्त्र सहित मुक्ति हो जायेगी । तथा एक देश रत्नत्रय तो तिथंचों को भी है, इसलिये उनको तो मुक्ति हो जानी चाहिये ।। मुक्तिश्चेदस्ति कि नासा प्रतिमाः स्तवनान्यपि । . . . क्रियन्ते पूज्याश्चेत्तासां मुक्सेत्तो मलाजुलिः ॥६६॥ यदि उन स्त्रियों को मुक्ति होती है तो उनकी प्रतिमा और स्तोत्र क्यों नहीं है । यदि कहो कि वह पूज्य है तो सत्य है । मुक्ति के लिये तिलांजलि दे दी । अर्थात् पुज्य होने मात्र से मुक्ति की पात्र नहीं हैं। . . . . . .... देशवतान्विसैस्तासा मारोप्यन्ते बुधस्ततः । ............ महायतानि सज्जाति सप्त्यर्थ मपचारतः ॥१८॥ यद्यपि स्त्रियां पूर्ण महावत को धारण नहीं कर सकती है, तथापि उनकी सज्जाति को प्रकट करने के लिये प्राचार्य, प्राविकानों में देश के साथ उपचार से महायतों का प्रारोपण करते हैं, अर्थात् प्रायिकाओं के वास्तविकता से तो देश संयम है, क्योंकि इनके पांचवां गुण स्थान है, परन्तु उपचार से महावत कहे जाते हैं। ऋतौ स्नात्वा तु सुर्येह्नि शुद्धयंत्यरस भुक्तयः । कृत्वा विरात्र मेकान्तरं वा सज्जयसंयुत्ताः ॥८॥ मासिक धर्म में आर्यिका तीन दिन तक एक स्थान बैठकर अन्तर्जल्प से णमोकार मन्त्र का जाप करती है, नीरस भोजन का एक दिन बाद पाहार करती है और चतुर्थ दिन स्नान करके शुद्ध होती है। गानाक्रन्दन सन्मार्जनाचवद्य क्रियोझिलाः । जातिकोयंञ्चिताचाराश्चायोक्षान्स्यार्जवान्विताः ॥६६॥ अविकार वस्त्र वेषाः स्वकीय कायेऽपि निःस्पृहा नित्यम् । पठन परिवर्तनाऽऽख्यानादि अत भावनानिरताः ॥६६॥ गीत, आक्रन्दन सन्मार्जन आदि सावध क्रियाओं से रहित जाति कीति से . पूजनीय है, चारित्र जिन्हों का ऐसे क्षमा और आर्जव से युक्त निविकार वस्त्रधारी अपने शरीर में भी निस्पृह निरन्तर पठन, परिवर्तन व्याख्यानादि श्रुत भावना में रत श्रेष्ठ प्रायिका होती है । .. -na- apmaper-Mere
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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