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[ गो. प्र. चिन्तामणि
जो संयमी जनों के आवास से रहित हो, श्रावकों के घर से अत्यन्त दूर भी नहीं और अत्यन्त समीप भी नहीं हो, सर्व साध से रहित हो. ऐसे स्थान में दो तीन यादि आर्यिका मिलकर रहें। अकेली नहीं रहे । आायिकाओं को अकेली रहना आगम में निषिद्ध है ।
जैने नगतिविधार्थं महान् ।
अन्योन्य परिरक्षानुकूलवृत्ति परायणाः ॥ १ ॥
जब आर्यिकायें आहार के लिए जाती है, तब वृद्ध श्रार्थिकाश्रों से अन्तरित परस्पर में एक दूसरे की रक्षा करती हुई दो तीन मिलकर मौन पूर्वक भ्रमण करती हैं। आहार के समय भी अकेली श्राविका नहीं जाती है, दो तीन साथ में जावें । श्राविकाओं का कर्त्तव्य है कि यह परस्पर अनुकूल वृत्ति तथा रक्षा करने में तत्पर रहें ।
श्रन्यदश्य गन्तव्यं धर्म कार्ये गृहेस्ति चेत् !
मरिणन्यादेशतो याति द्वयाद्याः सार्धं व चान्यथा ॥८२॥
यदि श्रावक घर में भिक्षा के काल से अन्यकाल में अवश्य जाने योग्य धर्मकार्य हो तो गणिती के प्रदेश से दो आदि के साथ जाती है, अन्यथा नहीं जाती है ।
नमन्ति सूर्यपाध्याय साधनार्या यथाक्रमम ।
पचषट्सप्त हस्तान्त राजस्थाः पशुशय्याः ॥८३॥ श्रधिकायें आचार्यों को और साधुओं को सात हाथ दूर से
करती हैं।
पांच हाथ दूर से, उपाध्याय को छह हाथ दूर से गवासन से वंदना, आलोचना, अध्ययन, स्तुति
संहननत्रयम् ।
कर्मभूद्रव्या नाद्यं वस्त्रदानाच्चारित्र च तासां मुक्तिकथा वृथा ।। ६८४||
कर्म भूमि स्त्रियों के बज्र वृषभनाराच, वज्रनाराच और नाराच ये आदि के तीन संहनन नहीं होते हैं । इनसे वस्त्रों का पूर्ण त्याग नहीं होता है, इसलिये चरित्र भी पूर्ण नहीं है, उन स्त्रियों को मुक्ति होती हैं। ऐसा कहना तो निष्प्रयोजन है । यदि त्रिरत्नमात्रेण ता पुस नग्नता बुया ।
तिरश्वामपि दुर्गारा निर्वाणाप्तिलिगिता ॥६८॥