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अध्याय : पांचवां ।
[ ४११ चिर प्रजिसः सूरिः स्थविर: श्रु तपारगः । तपस्वीति यतो नास्ति पणना विषमायुधे ॥७॥
काम के उत्पन्न होने में प्राचार्य चिर दीक्षित, स्थविर, श्रु तपारगामी आदि की गरगना नहीं है । अर्थात् चिर दीक्षित, तपस्वी, श्रुतपारगामी त्यागी भी काम के वशीभूत हो जाते हैं।
विधवी लिंगनी कन्यां स्वैरिणी गरियकादिकाः । प्रासअन्नचिराद्भिक्षुर पवादक मन्दिरम् ।।६७६॥
कन्या, विधवा, रानी वा विलासिनी, स्वेच्छाचारिणी, दीक्षा धारण करने वाली ऐसी स्त्रियों से क्षण मात्र भी वार्तालाप करता हुआ मुनिराज भी लोक निदा का पात्र होता है।
संवृतांगोऽतिगंभीरो जिताखिल परिषहः । शाक चारित्रवान सूरिरायणां मितभाषणः ।।९७७॥
इन्द्रिय विजयी, अतिगंभीर, परिवह जयो, मितभाषी, सम्यग्ज्ञान और उत्कृष्ट चारित्र शील साधु ही प्रायिकाओं का प्राचार्य हो सकता।
प्राज्ञाभंगादिदोषाहः करोति यदि सूरिताम् । मदोदयाद्गुरखवातेनतेन रहितो यतिः ॥६ ॥
जो मुनि पूर्व कथित गुरण सहित नहीं है और मान कषाय के वशीभूत होकर आर्यिकारों का प्राचार्यपना करता है तो प्राज्ञा का भंग. निदा, गणपोवरण, गच्छ आदि विराधना होती है ।
लज्जाविनयवैराग्यसाचारादि भूषिते । प्रार्यानाते समाचारः संयतोष्विव किन्स्विह ॥१७॥
लज्जा, विनय, वैराग्य, सदाचार प्रादि से भूषित आर्यिकानों के समूह में समाचार विधि संयतों के समान ही है, किन्तु (परन्तु) इसमें कुछ अन्तर है। "
जो समाचार विधि संयमियों की कही है वही समाचार विधि प्रायिकामो की है परन्तु प्रतापन योगादि कुछ विधि प्रायिकाओं के नहीं है । सायिकानों का वर्णन
याद्याः समं वर्सत्यार्या महस्था संकराश्रये। तगृहानति दूराति समीपेऽवध जिते ॥७८०॥
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