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________________ ४१० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि मुनिनेकेन नो वाच्यमेकार्या यदि पृच्छति । गुरणमुख्यां पुरस्कृत्य पृष्टं ब्रूयात् तदीक्षितम् १९७०॥ यदि अकेली आर्यिका अकेले मुनि को कोई बात पूछे तो मुनि को उत्तर नहीं देना चाहिये । यदि अपनी गरिंगनी को साथ लेकर आबे और कोई बात पूछे तो उत्तर देना चाहिये । मालालापं कयाश्चर्याजनैः साद्ध यमो त्यजेत् । तदाश्रयेऽशनं स्थानं व्याख्यानं शयनादिकम् ।।१७१॥ मापिकाओं के साथ वार्तालाप करना, उनके स्थान में बैठना, प्रवास करना, व्याख्यान देना, सोना, ये सब साधुओं को नहीं करना चाहिये। मुनिनकाकिनकान्ते म स्थातव्यं कदाचन । योषिअनागमे काले समाचार यशोथिना ||९७२॥ सदाचार और यश के इच्छुक मुनियों को स्त्रियों के आगमन के समय एकान्त में एकाकी कभी भी नहीं रहना चाहिये । नामाऽप्यानन्दनिध्यन्दि स्त्रीति लोचन गोचरम् ।। तदंगमंगज स्फारशरोग्रं न करोति किम् १९७३॥ स्त्री इस प्रकार का नाम भी प्रानंदामृत को हर्षाने वाला है । तो फिर दृष्टिगोचर हुआ स्त्री का शरीर क्या कामोत्पाद नहीं होगा, अवश्य ही होगा इसलिये उसकी संगति नहीं करना चाहिए । स्त्रीणां दर्शनमादरेक्षसमतो धार्तेष्ट वार्ता मनाङ, नमोक्तिर्नसिनर्मरत्युनगवाक शृंगार सारं वचः।। रवान्तस्योल्लसनं धृतेः क्षिसि रति प्रीतिमते भ्रान्तिता । तस्यां च स्मरवीर विशिख धातस्य लक्षः क्षरणात् ॥६७४॥ पूर्व में (पुरुष) स्त्रियों को सामान्य रूप से देखता है, पुनः आदर पूर्वक देखता है, तदन्तर इष्ट वार्तालाप करता है, थोड़ी-थोड़ी हंसी मजाक सहित बोलता है, तदन्तर नमस्कार, प्रेम सहित अनुगमन एवं उसके अनुसार अति प्रेम गार के वचनादि बोलता है जिससे उसका मित्त उल्लसित हो जाता है, धैर्य नष्ट हो जाता है, मति भ्रमित हो जाती है इस प्रकार एक क्षण में वह काम बारणों से पीड़ित हो जाता है। जTLE
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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