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________________ India अध्याय : पांचवां ] [ ४०६ धर्मद्धिः शुभं शांतिरस्त्यिस्याशरोरगरिणि । पापक्षयोऽस्तिवति प्राजश्चाण्डालादि दीयताम् ।।६६५।। दिगम्बर साधुः परस्पर में नमोऽस्तु ऐसा व्यवहार करें। यदि दिगम्बर साधु को प्रायिका नमस्कार करे तो तेरा कर्मक्षय हो, तुम्हारी समाधि हो ऐसा आशीर्वाद दे तथा जिन धर्मावलम्बी गृहस्थ के नमस्कार करने पर तेरे धर्म की वृद्धि हो, तुम्हारा कल्याण हो, शांति हो, मन प्रसन्न हो इत्यादि आशीर्वाद देना चाहिये तश्रा चांडालादि के नमस्कार करने पर तेरा पापक्षय हो ऐसा आशीर्वाद देना चाहिये । मान्यः सदर्शनी शानी होनोऽप्यपरसद गुणः। वरं रत्नमनिष्पनशोभं कि नाध्यंहति ॥६६६।। जो मुनि अपर-उत्तर गुणादि सद्गुणों से सम्पन्न नहीं है परन्तु सम्यग्दृष्टि है, ज्ञानी है तो वह श्रेष्ठ है, वंदनीय है। क्योंकि श्रेष्ठ रत्न यदि संस्कार आदि से रहित है तो भी बहुमूल्य होता है। उक्तिः कार्या सहाचार्यः कार्यार्थ शेषयोगिभिः । न मिथ्याष्टिभिर्भाच्या पात्रकः स्वजनश्चसा ।।६६७॥ .. : मुनि उन आचार्यों के साथ वार्तालाप करे । शेष मुनिजनों के साथ कोई विशेष हो तो बार्तालाप करे । मिथ्यादृष्टियों के साथ कभी भी वार्तालाप नहीं करे। जिनधर्मावलम्बी श्रावकों के साथ कभी किसी कार्यवश बात करे और निष्प्रयोजन कभी वार्तालाप न करे । स्पृष्टे कपालिचांडाल पुष्पवल्याति के ससि । ... .. जपेदुपोषितो मंत्रं प्रागुप्लुत्याशु दंडवत् ॥६६॥ यदि कपालिक, चांडाल, पुष्पवती (मासिक धर्मवाली) स्त्री का स्पर्श हो हो जावे तो शीघ्र ही दंडवत् स्नान करे और उपवास करके गणमोकार मंत्र का जाप्य करे । संस्तरावासयोः प्रेक्षा कार्या कल्यास्तकालयोः । प्रकाशे सूरिभिः साधं वृत्तिश्चावश्यकादिषु ॥६६६ सूर्य के अस्त और उदयकाल में प्रकाश में संस्तर और श्रावासादि का निरीक्षण करना चाहिये तथा सामायिक आदि प्रावश्यक क्रिया आचार्य के साथ करनी दाहिये ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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