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[ गो. प्र. चिन्तामणि . . प्रमृज्य कर्तरीस्पर्शात्माष्टांगान्यवनीमपि ।
पश्वर्दशय्ययाऽनभ्य सपिच्छांबुलि भालक ॥५६॥
अनाकूल होकर सुख पूर्वक बैठे हुए आचार्य के सन्मुख एक हाथ दूर गवासन से बैठकर, पिच्छि सहित अंजुलि को मस्तक पर रखकर पूर्व में प्राचार्य को सूचित करे, कि गुरुदेव मैं वन्दना करता हूँ", तदन्तर अपने आठों अंगों को स्पर्श करे, भूमि आदि को पिछी से मार्जन करे तथा पिच्छि सहित अंजुलि को मस्तक पर रखकर, मवासन से अंगों को झुका कर भक्तिपूर्वक प्राचार्य को नमोऽस्तु करे । मुनियों के नमस्कार करने पर प्राचार्य क्या करें?
विगौर वादि दोषेण सपिच्छांजुलि शालिना। सदज सूर्याऽऽचारण कर्तध्यं प्रतिवेदनम् ॥६॥
जब मुनिराज प्राचार्य को नन्दना करते हैं तत सज्जन कमल वन दिवाकर प्राचार्य, ऋद्धि गौरव, रस गौरव, ज्ञान गौरव से रहित होकर हाथ में पिच्छि लेकर नमोस्तु कहकर प्रतिवन्दना करे ।।
ये दोषाविषिरणोऽन्येषां सद्गरणावर्णवर्णनाः। तपस्विनोऽपि पाश्वंस्था ये च बंद्या न ते यतेः ।।६६१॥ "
जो मुनि दूसरों के दोषों का कथन करता है तथा उनके सद्गुणों का आच्छादन करता है अथवा जो पार्श्वस्थ मुनि हैं, वे साधुओं के द्वारा वन्दनीय नहीं हैं।
पुरो गुरुणां स्थातव्यं न यथेष्टककोपयम् । तानापच्छेद्वचस्तेसा प्रतिच्छेत्तत्परो भवेत् ।।६३२॥
गुरु के सामने बैठना नहीं चाहिए, प्राचार्य को कुपित नहीं करते हुए अपनी इच्छा को पूछे तथा उनकी बात को तत्पर होकर स्वीकार करे।
हस्तद्वयेन दातव्यं ज्येष्ठेभ्यः पुस्तकादिकम् ।
तत्तछेयं करद्वन्तु नादेयं विनयानतः ॥९६३॥ ___ अपने गुरु आदि को विनयपूर्वक दोनों हाथों से पुस्तक देना चाहिए और उनके द्वारा दी हुई पुस्तक प्रादि को भी महान आदर से दोनों हाथों से ही ग्रहण करना चाहिये।
नमोऽस्विति नतिः शस्ता समस्तमतसंमता। कर्मक्षयः समाधितेस्स्वित्यार्याजने “नते ॥६६॥
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