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________________ अध्याय : पांचवां ] [ ४०७ इस प्रकार शास्त्रों का अध्ययन कर लेने पर संघ की सम्मति से प्राचार्य के द्वारा अर्पित किया गया है आचार्य पद जिसको, ऐसा साधु रहस्यभूत प्रायश्चित आदि शास्त्रों को पढ़े। पूर्व में गुरु के समीप पुराण, सिद्धान्त आदि शास्त्रों का अध्ययन करे । तदनन्तर आचार्य के द्वारा आचार्य पत्र अर्पण करने के बाद रहस्यभूत प्रायश्चित ग्रंथों का अध्ययन करें । यः शिष्यत्वमकृत्वैव सूरितां कर्तु मोहते । सः स्यादुत्मार्ग गस्तोपो वाऽशिक्षित तरंगमः ॥५४॥ जो साधु शिष्यत्व को स्वीकार नहीं करके आचार्यत्व प्राप्त करने की चेष्टा करना चाहता है, वह अशिक्षित घोड़े के समान तीक्ष्ण उन्मार्गगामी हो जाता है । सर्व सत्व गुरिक्लेशनिषु णेषु करोश्वलम् । मंत्री प्रमोद कारुण्य माध्यस्थ्यानि वथाक्रमम् ॥५५॥ साधुओं को सर्व जीवों के साथ मैत्री भाव, गुणीजनों के साथ प्रमोद भाव, दुःखी दीन जनों के प्रति कारुण्य भाव तथा दुर्जन, क्रूर, कुमार्गगामी के प्रति माध्यस्थ भाव रखना चाहिए । जिनान् सिद्धान् गणाधीशानुपाच्याञ्जगद्गुरुन् । साधून् धर्मं जगच्चर्मकरं वन्देत् तेतरान् ॥ १५६ ॥ दिगम्बर साधु रिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, सर्व साधु, जिन धर्म, जिनबिम्ब और जिन शास्त्रों को ही नमस्कार करें। इनके सिवाय अन्य लोगों को ( पाखण्डियों को ) नमस्कार नहीं करें । क्षुधात भयजृम्भेष्टार्थारभस्खलने बुधैः । शयने विस्मयादौ व स्मर्तव्यो वृजिनो जिनः ॥६५७॥ बुद्धिमानों को भूख प्यास, दुःख, भय में और जंभाई आदि के आने पर, अपने इष्ट कार्य में स्खलित हो जाने पर शयन में तथा विस्मयादि के हो जाने पर जिनेन्द्र भगवान का स्मरण करना चाहिए । प्राचार्यादिक को वंदना करने का क्रम--- सुखेनासीनभव्य सूरि वंदेत् सम्मुखम् । safaa विज्ञाप्य हस्तमत्रांतर स्थितिः ॥७५८ ॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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