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सिद्धांत तर्क भंगां गवाह्यादेशार्थ देशनम् ।
[ यो चितामशि
शक्त्यनुसारेण भक्त्या मोक्षैक कांक्षया ॥५०॥ -
इसके बाद अपनी शक्ति के अनुसार भक्ति पूर्वक मोक्ष की द्वितीय आकांक्षा से रत्नत्रयधारी क्रियाकलाप को अल्पाल्प सूत्रों को आचरण वर्णन करने वाले शास्त्रों को, पुराणों को, स्थिति कीर्तन तर्कशास्त्र अंगबाह्य, अंगप्रविष्ट का कथन करने वाले सिद्धान्त ग्रन्थों को पढ़े ।
क्रियाकलाप जिसमें श्रावक और मुनियों fare का वर्णन हो अल्पाल्प सूत्र - जिसमें अल्प अक्षर हों और बहुत विषय का वर्णन हो । आचार वर्णन - जिसमें गृहस्थ और मुनियों के चरित्र का वर्णन हो । पुराण - जिसमें त्रेसठ शलाका पुरुषों का वन हो । स्थिति कीर्तन - जिसमें मोहनीय ग्रादि सारे कर्मों की सर्व प्रकृतियों का धन्य उत्कृष्ट स्थिति का वर्णन हो । सिद्धान्त ग्रन्थ- षट्संड आदि सिद्धान्त ग्रन्थ जिनमें गुणस्थान, मार्गशा, जीव समास, पर्याप्त, प्राण, संज्ञा, उपयोग आदि सारे सिद्धान्तों का वर्णन हो । प्रमाण, नय के द्वारा जिसमें वस्तु की सिद्धि की जाती है वह तर्क शास्त्र हैं । गणधर के द्वारा पदों में रचित बारह अंग हैं । दश वैकालिक आदि अंग बाह्यग्रन्थ हैं। साधु अपनी शक्ति के अनुसार द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की शुद्धिपूर्वक उन शास्त्रों का अध्ययन करे ।
efarara afterरणां शरणं शरणं सताम् । महत्व सत्य गांभीर्य वैर्यादि गुण भूषणः ॥५१॥ चिर प्रव्रजितो दांतः प्रव्यक्त समय स्थितिः ।
दया वात्सल्य साकल्यः शांतोऽयं गणितोचितः ॥५२॥
समीचीन चारित्रों की रक्षा करने वाला, शरणभूत श्रेष्ठ श्रद्धान वाला, महानता, सत्व, गम्भीरता, धैर्यादि गुणों से भूषित, चिरकाल का दीक्षित, इन्द्रियविजयी, लोकस्थिति का ज्ञाता, दया, वात्सल्यादि से परिपूर्ण, क्षमाशील यह साधु प्राचार्य पद के योग्य है ।
सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र का धारी, सत्वधारी, गम्भीर, वीर, वीर, इन्द्रियविजयी, क्षमाशील, लोक व्यवहारक साधु ही आचार्य पद के योग्य होता है । इति सूर्यपिताचार्यपदः सन् संघसम्मतः । प्रायश्वितादिशास्त्राणि रहस्याति पठदेथ ॥५३॥