SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 494
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अध्याय : पांचवां : [ ४०५ हुए नाम और प्रतिक्रमणादि को पूछकर तीन दिन तक शयन अासनादि में आचरण की परीक्षा करके चारित्र की शुद्धि को निश्चय कर गुरु उसके प्राचार्य की सम्मति से अपनी शक्ति को कहकर व्याख्यान प्रादि में कहे गये श्रुत को पढ़े। विनय से अपने इष्ट को पढ़ना यह सूत्रसंश्रय है। सर्व प्रथम प्राचार्य आगन्तुक मुनि के रहने के स्थान और गुरु के कुल को पूछे तथा तुमको दीक्षा लिये कितने दिन हुए हैं, तुमने प्रतिक्रमरण कहां-कहां किये हैं, तुम्हारे गुरु का क्या नाम है आदि सभी क्रिया पूछकर तीन दिन तक उसकी सामायिक आदि क्रियाओं का निरीक्षण करे। पीछे सूक्ष्म दृष्टि से उसके चारित्र और गुरु की शुद्धि का निर्णय करे, तथा आगन्तुक नती भी तीन दिन नूतन संघ के प्राचार्य वा संघस्थ साधुओं की चारित्र शुद्धि व कुल शुद्धि का निर्णय करे । तदनन्तर प्राचार्य की अनुमति से व्याख्यानादि में कथित श्रुत का अध्ययन करे । इस प्रकार विनय पूर्वक उस संघ में जाकर विधि पूर्वक प्राचार्य के समीप शास्त्रों का अध्ययन करना सुत्रसंश्रय है। विस्तार समाचार विधि- . सविस्तार समाचारनैक भेदोऽध वण्यंते । . उदाहरण मात्रेण विश्व को वस्तुभीश्वरः ।।६४७१३ रात्रि दिवं यनिवार्य यत्कर्माचर्यते वरम् । तविस्तार समाचार इति येन जिनोदितः ॥१४॥ विस्तार सहित समाचार के अनेक भेद हैं। इस ग्रन्थ में उदाहरण मात्र से वर्णन किया जाता है, क्योंकि सम्पूर्ण समाचार विधि को कहने के लिए कौन समर्थ है ? जिसके द्वारा साधुनों में, प्रायिकानों में जो श्रेष्ठ क्रिया रात दिन पाचरण की जाती है, इस प्रकार जिनेन्द्र भगवान द्वारा कथित विस्तार समाचार है। पूर्व में संक्षेप समाचार विधि कही है। इस समय उसके भेद वाले विस्तार समाचार विधि का उदाहरण मात्र कथन करते हैं। क्योंकि सम्पूर्ण समाचार विधि का कथन करने के लिए कौन समर्थ है ? मुनि आर्थिकामों को जो रात्रि और देवसिक क्रिया जिनेन्द्र ने कही है, वह विस्तार समाचार विधि है। क्रियाकलापमल्पाल्प सूत्राण्याचार वर्सनम् । पठदेथ पुराणानि निकलो स्थिति कीर्तनम् ।।६४६॥ -AAMSA NCTED
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy