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________________ ४०४ } [ गो. प्र. चिन्तामणि प्रवीण। बकरा-देर में समझने वाले तथा कामी। जौक-दोषग्राही। अन्य कुछ श्रोताओं के उदाहरण, सैकड़ों छेदयुक्त घड़े या फूटे घड़े-इस कान सुना उस कान निकाल दिया । पशु-किसी का जोर पड़ा तो कुछ सुन समझ लिया। सर्प-कुटिल । शिला-प्रभावशाली से दिये जा सकते हैं । इस प्रकार संसार के सभी श्रोता चौदह प्रकार के होते हैं। जो विवेकी श्रोता सांसारिक भोगविलास रूपी फलों की स्वप्न में भी इच्छा नहीं करता तथा मोक्ष लक्ष्मी की प्राप्ति करने का अडिग तथा अकम्प निर्णय करके प्राणिमात्र के लिए कल्याणकारी जिन धर्म की विशाल कथा को सुनता है, उस मनुष्य के सब ही पापों का निःसन्देह समूल नाश हो जाता है। मोहादिना निषिद्धस्य श्रीलमन्तमतेरपि । सति प्राशे विनीतेऽस्मिन् यो व्याख्याति नराधमः ॥६४२॥ भिन्न रत्नत्रयो यान पात्रोऽसौ भूरि गौरवात् । विधृत बोधिः संसार वारि राशौ निमज्जति ॥६४३॥ जो नीच इस विनीत शिष्य के होने पर भी मोहादि के कारण विद्वानों के द्वारा निषिद्ध मन्दमति श्रोता को भी उपदेश देता है । नष्ट हो गया है रत्नत्रयरूपी यान पात्र जिसका और नष्ट हो गया है ज्ञान जिसका ऐसा वह प्राचार्य महान् गौरव होने से संसार रूपी समुद्र में डूब जाता है। जो प्राचार्य विद्वानों के द्वारा निषिद्ध श्रोता को धर्म का उपदेश देता है, अध्ययन कराता है, उसकी रत्नत्रय रूपी नौका नष्ट हो जाती है और वह संसार समुद्र में डूब जाता है। . . . . सूत्र संश्रय का लक्षण संचित्येति स्थित स्थानं तपः काल मुरुकुलम् । . पृष्ट्वा श्रुतं नाम एवं प्रलिकमरणादिकम् ॥६४४॥ शयनासनयनादौ प्रेक्ष्य वृतं धिनत्रयम् । निश्चित्य गुरुश्चारित्र शुद्धि तत्सरिसम्मतः ॥१४॥ स्वशक्ति मुक्त्या व्याख्या तद्वयाख्यातं पठेन्द्रले। स्वस्पेष्टं प्रश्रयादेतत्पठनं सूत्र संश्रयः ॥४६॥ इस प्रकार विचार कर रहने के स्थान काल सप गुरु कुल श्रु त अपने सुने im - - mindian
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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