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अध्याय : आठवाँ 1 मानस्तम्भों में पाए जाते हैं । त्रिलोकसार में भी कहा है - 'सौधर्मद्विके तो मानस्तंभौ भरतरावततीर्थकर प्रतिबद्धो स्तायाम् ।' सानत्कुमार महेन्द्र स्वर्ग के मानस्तम्भों में पूर्वापर विदेह के तीर्थंकरों के भूषण रहते हैं। (त्रिलोकसार गाथा ५२२, ५२२) पांडकशिला से देवेन्द्र का प्रभु के साथ अयोध्या नगर में प्रागमन--
सुदर वास्त्राभूषणों से प्रभु को समलंकृत कर सुरराज ने अपने अंतःकरण के उज्ज्वल भावों को श्रेष्ठ स्तुति के रूप में व्यक्त किया । पश्चात् वैभव सहित वे देव देवेन्द्र ऐरावत हाथी पर प्रभु को विराजमान कर अयोध्यापुरी पाए । इन्द्र ने महाराज नाभिराज के सर्वतोभद्र महाप्रासाद में प्रवेश कर श्रीगृह के आंगन में भगवान को सिंहासन पर विराजमान किया । महाराज नाभिराज उसे प्रिय दर्शन भगदान को प्रेम से विस्तृत नेत्रयुक्त हो तथा रोमांचयुक्त होकर देखने लगे। इस समय जनक-जननी को प्रभु का दर्शन कर जो सुख प्राप्त हुआ, वह कौन बता सकता है ? तीर्थकर के जन्म से जब जगत् भर के जीवों को अपार आनन्द हुआ, तब उनके ही माता-पिता के श्रानन्द की सीमा बताने की कौन धृष्टता करेगा ? धर्मशर्माभ्युदय में लिखा है---
उत्संगभारोप्य समंगजं मृपः परिस्वजन्मीलित लोचनो बभौ। अंततिनिक्षिप्य सुखं वयुग हे कपाठयोः संघट्यन्निवद्वयम् ।।१५।
पिता ने अपने अंग से उत्पन्न अंगज अर्थात् पुत्र को गोद में लिया तथा प्रालिंगन किया। उस समय उनके दोनों नेत्र बंद हो गए थे । इन्द्र ने जब प्रभु का प्रथम बार दर्शन किया था, तब तो वह सहस्र नेत्रधारी बना था, किन्तु यहां त्रिलोकीनाथ के पिता ने मनुष्य को सहज प्राप्त चक्षुयुगल का उपयोग न ले उनको भी बंद कर लिया था, इसका क्या समाधान है ? इस शंका के समाधान हेतु महाकवि के पद्य का उत्तरार्ध ध्यान देने योग्य है । पिता ने भगवान के दर्शन जनित सुख को शरीर रूपी भवन के भीतर रखकर नेत्र रूपी कपाट खुमल को बंद कर लिया, जिससे वह हर्ष बाहर न चला जाय । कितनी मधुर तथा आनन्ददायी उत्प्रेक्षा है।
एक नरभव धारण करने के पश्चात् शीघ्र ही सिद्ध भगवान बनकर भगवान के साथ में सिद्धालय में निवास करने के सौभाग्य वाले इन्द्र की भक्ति विवेक तथा सद्विचार से परिपूर्ण थी। भगवान को पिता के कर कमलों में सौंपने के पश्चात् सुरराज भगवान की परिचर्या के हेतु समान रूप तथा वेष धारण करने वाले देव कुमारों को निश्चित कर स्वर्ग को चले गए।