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________________ ६५६ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिय ३० तीर्थङ्करों को सहज प्राप्त जन्म काल के दस प्रतिशय गुण१. सौरव्य -- प्रत्यन्त सुन्दर शरीर होना । २. सौरभ --- अत्यन्त सुगन्धित शरीर होना । ३. निःस्वेदत्व - पसीना रहित शरीर होना । ४. निर्मलत्व --- मल-मूत्र रहित निर्मल शरीर होना । ५. प्रियहितवादित्व - मधुर हित-मित प्रिय वचन बोलना | ६. अमित वीर्यता --- अनन्त बल-वीर्य होना । ७. क्षोरगौर रुधिरत्व --- दूध के समान धवन रुधिर होना । ८. सौलक्षण्य - शरीर पर १००८ उत्तम लक्षणों का धारण करना । ६. समचतुरस्त्र संथान --- उत्तम आकार का शरीर होना । १०. वजू वृषभनाराच संहनन - वज्रमय शरीर होना । ये दश स्वाभाविक अतिशय तीर्थंकरों के जन्म ग्रहण से ही उत्पन्न हो जाते हैं । 'एवं त्थियरा जम्ममहरणादि उत्पवयं इस प्रकार तिलोघपति में लिखा है । (देखो भाग १ ० ४ गाथा ८६६-६६८ ) प्रश्न : ---तीर्थंकरों के छाल्यकाल में श्राहार है, परन्तु नीहार नहीं है, क्या काररण है ? उत्तर :- तीर्थंकर भगवान के केवलज्ञान होने के पूर्व कबलाहार अर्थात् प्रन्न1. कहा भी हैपान ग्रहण होते हुए भी नीहार अर्थात् मलमूत्र नहीं होता तित्थयरा - तधियरा हलहरचक्की इ-वासुदेवाहि । वासुभोगभूमि प्रहारो रात्थि सीहारो ॥। १४६० ॥ प्रर्थात् मस् तीर्थंकर, उनके माता, पिता, बलदेव, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण तथा समस्त भोग भूमिया जीवों के श्राहार है, परन्तु नीहार नहीं है । 3 इस गमवाय के पीछे यह वैज्ञानिक सत्य निहित है, कि तीर्थकर प्रादि विशिष्ट श्रात्मानों की जठराग्नि इस जाति की होती है, कि उसमें डाली गई वस्तु रस, रुधिर आदि रूप में परिणत हो जाती है । तत्त्व नहीं बचता है, जो व्यर्थ होने के कारण मलमूत्र रूप से निकाल दिया जाय ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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