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________________ अध्याय : पाठवां ] [ ६५७ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि जब जठराग्नि मन्द होती है, तब मनुष्य के द्वारा गृहीत वस्तु से सार तत्त्व शरीर को नहीं प्राप्त होता है और प्रायः खाई मई सामन्त्री बाहर निकाल दी जाती है । इससे खूब खाते हुये भी व्यक्ति क्षीण होता जाता है। ठीक इसके विपरीत स्थिति उक्त महान् पुरुषों की होती है। शरीर में प्राप्त समस्त सामग्री का समुदाय रुविरादि रूप में परिणत हो जाता है । प्रश्न :-तार्थंकर की माता रजस्वला नहीं होती है। क्या कारण है ? उत्तर :--जिन माता के शरीर में मल मूत्र नहीं होता है, तो यह सहज प्रश्न उत्पन्न हुआ करता है कि जिन माता रजस्वला होती है या नहीं ? इस शंका के निवारण निमित्त महापुरण का यह श्लोक ध्यान देने योग्य है---- सम्मता नाभिराजस्य पुष्पवत्यरजस्वला। तदा वसुन्धरा भेजे जिनमातुरनुक्तियां ॥१५६१॥ भगवान के गर्भावतरण के समय वह पृथ्वी भगवान की माता मरुदेवी का अनुकरण करती थी, क्योंकि माता मरदेवी महाराज नाभिराज को जिस प्रकार प्रिय थी, उसी प्रकार वह पृथ्वी भी प्रिय थी। माता पुष्पवती होकर भी रजस्वला नहीं होती थी, इसी प्रकार पृथ्वी भी रजस्वला अर्थात् धूलि युक्त न होकर पुष्पों से सुशोभित होने के कारण पुष्पवती थी। प्रश्न :-तीर्थङ्कर के शरीर में श्वेत रक्त होने का रहस्य क्या है ? उत्तर :- भगवान के शरीर में श्वेत आकार धारण करने वाला रुधिर होता है। इस विषय में यह बात गम्भीरता पूर्वक विचारणीय है कि माता के शरीर में अपने पुत्र के लिए स्नेह होने से क्षण भर में उसके स्तन में दुग्ध आ जाता है। रुक्मिणी ने प्रभुम्न को देखा था । जननी हृदय में नैसगिक स्नेह भाव उत्पन्न होने से उसके स्तनों में दुग्ध आ गया था । इस शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक व्यवस्था को ध्यान में रखने से यह बात अनुमान करना सम्यक् प्रतीत होती है कि जिनेन्द्र भगवान के रोम रोम में समस्त जीवों के प्रति सच्ची कहाणा, दया तथा प्रेम के बीज परिपूर्ण हैं । तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध करते समय दर्शन विशुद्धि भावना भाई गई थी। दूसरों शब्दों में उसका यह रहस्य है कि भगवान के विश्व प्रेम के वृक्ष का बीज बोया था, जो वृद्धि को प्राप्त हुआ है और केवलज्ञान काल में अपने कल द्वारा समस्त जगत को सुख तथा शान्ति प्रदान करेगा। एकेन्द्रिय बनस्पति तक प्रभु के विश्व प्रेम की भावना
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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