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[ गो. प्र. चिन्तामणि
रूप जल से लाभ प्राप्त करेगी । इसी से केवलज्ञान की उल्लेखनीय महत्वपूर्ण बातों में सौ योजन भूमि में पृथ्वी धान्यादि से हरी भरी हो जाती है । भगवान का हृदय संपूर्ण जीवों को सुख देने के लिए जननी के तुल्य है । समन्तभद्र स्वामी ने भगवान पार्श्वनाथ स्तवन में उन्हें 'मातेव बालस्य हितानुशास्ता' बालक के लिए कल्याणकारी अनुशासनकर्त्री माता के समान होने के कारण माता तुल्य कहा है । प्राणी मात्र के दुःख दूर करने की भावना तथा उसके योग्य सामर्थ्य और साधन सामग्री समन्वित मातृतस्क जिनेन्द्र के शरीर में रुधिर का होना होकर की
उत्कृष्ट कारुणिक वृत्ति तथा महत्ता का परिचायक प्रतीत होता है ।
शरीर संबंधी विद्या में प्रवीण लोगों का कहना है कि महान बुद्धिमान, सदाचारी, कुलीनतादि संपन्न व्यक्तियों के रक्त में रक्तवर्णीय परमाणु पुंज के स्थान में धवलवरणीय परमाणु पुंज विशेष पाये जाते हैं । आज के असदाचार प्रचुर युग के शरीर शास्त्रज्ञ वर्तमान युग के होनावरण मानवों के रक्त को शोधकर उपरोक्त विचार पूर्ण सामग्री प्रस्तुत करता है । यदि यह कथन सत्य है, तो तीर्थंकर भगवान के शरीर के रुधिर की धवलता को स्थूलरूप से समझने में सहायता प्राप्त होती है ।
एक बात और है भगवान् ग्रारम्भ से ही सभी भोगों के प्रति आसक्ति रहित लालिमा हैं, अतएव विरक्त आत्मा का रक्त यदि विरक्त अर्थात् विगत रक्तापना, शून्यता से संयुक्त हुआ हो तो इसमें माश्वर्य की कोई बात नहीं है । विरक्तों के आरध्य देव का देह सचमुच में विरक्त परमाणुत्रों से ही निर्मित मानना पूर्ण संगठन है । सरागी जगत के लोगों का शरीर विषयों में प्रतुरक्त होने से क्यों न रक्त वर्ण का होगा 1
भगवान का रोम-रोम विषयों से विरक्त था । इतना ही नहीं उनकी वाणी विरक्तता अर्थात् वीतरागता का सदा सिंहनाद करती थी । मौन स्थिति में उनके शरीर से ऐसे परमाणु बाहर जाते थे, जिससे उज्जवल ज्योति जगे, इसी अलौकिकता के कारण सौधर्म इन्द्र सदा प्रभु के चरणों की शरण ग्रहण करता है। भगवान के हृदय में, विचार में, जीवन में जैसी विरक्तता थी, वैसी ही उनके रुधिर में विरक्तता थी । इन्द्र भी चाहता था कि प्रभु को अंतः बाह्य विद्यमान विरक्तता मुझे भी प्राप्त हो जाए। वैसे देवों के शरीर में भी विश्वतता है, किन्तु ग्रांतरिक विरक्तता के बिना