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अध्याय : पाठवां ]
[ ६५६ बाह्य विरक्तता शव का शृंगार मात्र है। परम प्रौदारिक शरीर धारी होकर अंतः बाह्य विरक्तता के धारक तीर्थकर ही होते हैं। सरागी शासन में इस विरक्ता की कल्पना नहीं हो सकती; यह बात तो वीतरागी शासन में ही बताई जा सकती है। वैभव शून्य मानव वैभव के शिखर पर स्थित श्रेष्ठ प्रात्मानों की कल्पना भी नहीं कर सकता है।
भगवान में प्रारम्भ से ही विरक्तता है, इसका प्राधार यह है कि वे भगवान् जब माता के गर्भ में आने के समय से लेकर अाठ वर्ष की अवस्था के होते है, तो वह भगवान सत्पुरुषों के योग्य देश संयम को ग्रहण करते हैं । प्रादिपुराण में लिखा है :--
स्वायुराद्यष्टवर्षेभ्यः सर्वेषां परतो भवेत् । उदिताष्टकषायाणां तीर्थेशां देशसंयमः ॥१५६२।।
सब तीर्थङ्करों के अपनी आयु के प्रारम्भ से आठ वर्ष के आगे से देशसंयम होता है, क्योंकि उनके प्रत्याख्यानावरण तथा संज्वलन कषायें उदयावस्था को प्राप्त है । यदि प्रत्याख्यानावरण कषाय का उदय न हो तो वे महाव्रती बन जाते ।
सतोऽस्य भोगवस्तूनां साकल्येपि जितात्मनः । वृत्तिनियमितकाभूदसंख्येय गुरण निर्जरा ॥१५६३॥
यद्यपि इन जिनेन्द्र देव के योग्य वस्तुओं की परिपूर्णता थी, तथापि वे जितात्मा थे, और उनकी प्रवृत्ति नियमित रूप से ही होती थी, इससे असंख्यात गुरणी कर्मों को निर्जरा होती थी। प्रश्न :-तीर्थरों के शरीर पर रहने वाले १००८ सुलक्षणों की
नामावली क्या है ? उत्तर :- भगवान का जीवन अंतः बाह्य सौन्दर्य का अपूर्व केन्द्र था । सामुद्रिक शास्त्र की दृष्टि से भी भगवान का पौद्गलिक शरीर १००८ लक्षणों से समलंकृत होने के कारण अत्यन्त महत्वपूर्ण धा, महापुराण में लिखा है कि भगवान के शरीर में, १ श्री वृक्ष (मारियल का वृक्ष-बिल्ववृक्ष), २. शंख, ३. कमल, ४. स्वस्तिक (साथिया), ५. अंकुश, ६. तोरण, ७. चमर, ८. श्वेत-छत्र (धवल छत्र), ६. सिंहासन (सिंह-पीठ), १०. ध्वजा (पताका), ११. मीन युगल (दो मोन), १२. दो कुभ, १३. कच्छप (कर्म), १४. चक्र, १५. समुद्र, १६. सरोवर,