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[ गो. प्र. चिन्तामणि
अर्थात् - जिस समय इन्द्र ने बालजिनेन्द्र का अभिषेक किया, उस समय नासिका में जल का प्रवेश होने से बालजिनेन्द्र को छींक आ गई। इससे मेरू पर्वत कंपित हो गया और इन्द्र आदिक देव गण तृण के समान सहसा गिर पड़े। जिनेश्वर के स्वाभाविक अपरिमित बल हैं ।
यह प्रभाव देखकर इन्द्र ने प्रभु का नाम 'वीर रखा था । पद्मपुराण का यह कथन भी ध्यान देने योग्य हैपादांगुष्ठेन यो
मेरुमनायासेनाकम्पयत् ।
सेभे नाम महावीर इति नाकालयाधिपात् ॥। १५८८ ॥
अर्थात् भगवान वर्धमान प्रभु ने बिना परिश्रम के पैर के अंगुष्ठ के द्वारा मेरु को कंपित कर दिया था, इसलिए देवेन्द्र ने उनका नाम 'महावीर' रखा था । यथार्थ में तीन लोक में जिन भगवान की सामर्थ्य के समान दूसरे की शक्ति नहीं होती है। मेरु शिखर पर किया गया महाभिषेक भगवान् जिनेन्द्र की बाल्य अवस्था में भी अपार सामर्थ्य को प्रकट करता है ।
इस प्रसंग में रत्नाकर कवि का यह कथन स्मरण योग्य है- 'हे रत्नाकराarrer ! देवेन्द्र पकी सेवा में अपने ऐरावत हाथी को अर्पण कर गौरव को प्राप्त करता है । वह अपनी इन्द्राणी से आपके गुणगान कराता है । आपके अभिषेक के लिए देवताओं की सेना के साथ शक्ति पूर्वक सेवा करता है | श्रद्धापूर्वक छत्र धारण करता है, नृत्य करता है । पालकी उठाता है। जब इन्द्र की ऐसी मार्दव भावपूर्ण पररणति है,
तब कीट को अहंकार धारण करना कहां तक उचित है ? ( रत्नाकर शतक पद्य - १ )
प्रश्न : --- बाल भगवान के वस्त्राभूषण कहां से श्राते हैं ?
उत्तर : -- तीर्थंकर भगवान के वस्त्राभूषण श्रेष्ठ रीति से त्रिलोक चूड़ामणि जितेन्द्र का जन्माभिषेक होने के पश्चात् इन्द्राणी ने बालजिनेन्द्र को विविध आभूषणों तथा वस्त्रादि से समलंकृत किया । भरत तथा ऐरावत क्षेत्र के तीर्थंकरों के उपभोग में ग्राने वाले रत्नमय आभूषण सौधर्म तथा ईशान स्वर्ग में विद्यमान रत्नमय सीकों में लटकते हुये उत्तम रत्नमय करंडको अर्थात् पिटारों में रहते हैं । तिलोयपत्ति में इन पिटारों के विषय में लिखा है, 'सक्कादि पूजखिज्जा' अर्थात् ये इन्द्रादि के पूजनीय हैं। 'प्रादिहि' अर्थात् अनादि निधन हैं 'महारम्मा' अर्थात् महारमरणीय हैं ।' (अध्याय गाथा ४०३ भाग दूसरा ) के रत्नमय पिटारे वज्रमय द्वादश वारायुक्त