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________________ अध्याय : पाठवां । इससे यह विशेष बात दृष्टि में प्राती है कि क्षीर सागर का जल जलचर जीवों से रहित होने के कारण विशेषता धारण करता है । अभिषेक जल लाने से स्वर्ग निर्मित कलश पाठ योजन गहरे, उदर में चार मोजन तथा मुख पर एक योजन चौड़े । 'मुक्ता फलांचितग्रीवा: चन्दनद्रवचिताः' अर्थात् दे घिसे हुये चन्दन से चर्चित थे तथा उनके कंठ भाग मुक्ताओं से अलंकृत थे । सौधर्मेन्द्र ने अभिषेक के लिये प्रथम कलश उठाया । ईशानेन्द्र ने सघन चंदन से चर्चित दूसरा भरा हुआ कलश उठाया । और जय जय शब्द करते हुये सौधर्मेन्द्र ने प्रभु के मस्तक पर प्रथम ही जल धारा छोड़ी, उस समय करोड़ों देवों ने भी जय जयकार के शब्दों द्वारा महान कोलाहल किया । भगवान का रक्त धदल वर्ण का था । क्षीर सागर का जल भी उसी वर्ण का है । अतएवं उस जल द्वारा जिनेन्द्र देव का अभिषेक बड़ा सुन्दर प्रतीत होता था । प्रश्न :- भगवान की शक्ति कैसी है ? उत्तर :- तीर्थकर भगवान के अतुल बल का प्रदर्शन--भगवान में अतुल बल था। विशाल कलशों से गिरी हुई जलधारा से बाल जिनेन्द्र को रंचमात्र भी बाधा नहीं होती थी। यह देख अनेक देवगण विस्मय में निमग्न हो गये थे । महावीर भगवान का जब मेरु पर इन्द्रकृत अभिषेक सम्पन्न होने को था, उस समय सुरेन्द्र के चित्त में एक शंका उत्पन्न हुई थी कि भगवान का शरीर छोटा है, कहीं बड़े-बड़े कलशों के द्वारा किया जाने वाला महान अभिषेक प्रभु के अत्यन्त सुकुमार शरीर को संताप उत्पन्न न करे । भगवान ने अवधिज्ञान से इस बात को समझ कर इन्द्र के संदेह को दूर करने के लिये अपने पैर के अंगूठे के द्वारा उस महान गिरिराज को हिला दिया था, उससे 'प्रभावित होकर इन्द्र ने वर्धमान तीर्थकर का नाम 'वीर' रखा था। प्राचार्य प्रभाचन्द्र ने वृहत्प्रतिक्रमण की संस्कृत टीका में उपरोक्त कथन इन शब्दों में स्पष्ट किया है, 'जन्माभिषेके च लघुशरीरदर्शनादाशांकितवृत्तेरिद्रस्म स्वसामर्थ्यख्यापनार्थ पादांगुष्ठेन मेरु संचालनादिन्द्रेण 'वीर' इति नामकृतम्' (पृष्ठ १६ प्रतिक्रमणग्रन्थत्रयी)। वर्धमान चरित्र में उक्त प्रसंग का इस प्रकार निरूपण किया है... तस्मिन् तदा शुवतिकंपितशैलराजे घोरणाविष्ट सलिलात्पृथुकेऽप्यास्त्रम् । इन्द्रादयस्तृणमिवैकपदे निपेतुः वीर्यनिसगंजमनन्तमहो जिधानां ।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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