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. [ गो. प्र. चिन्तामणि उदीच्ये ऐरावतजास्तीर्थरांचतुनिकाय देवाधिपाः सपरिवाराः महत्याविभूत्या क्षीरो. दवारिपरिपूर्णररष्टाधिकसहस्त्रकनककलशै र भिषिचंति (पृष्ठ-१२७)
तिलोयपण्ाति में लिखा है कि पांडुकशिला में सूर्य के समान प्रकाशमान उन्नतसिंहासन है। सिहासन के छोनों पात्र में निवारत्नों से रचे गये भद्रासन विद्यमान हैं, जिनेन्द्र भगवान को मध्यसिंहासन पर विराजमान करते हैं । सौधर्मेन्द्र दक्षिण पीठ पर और ईशान इन्द्र उत्तर पीठ पर अवस्थित होते हैं (अ. ४ गाथा १८२२ से १८२६)
प्रश्न-जन्माभिषेक का वर्णन कैसा है ?
उत्तर--पांडुक शिला पर भगवान का अभिषेक--अब सौधर्मेन्द्र मेरु पर्वत के शिखर पर जिनेन्द्र भगवान के साथ पहुँच गये । महापुराण में कहा है कि सुरन्द्र ने बड़े प्रेम से गिरिराज सुमेरु की प्रदक्षिणा की और पांडुकवन में ईसान दिशा में स्थित पांडुक शिला पर भगवान् को पूर्व मुख विराजमान किया । सभी देवगण जन्मोत्सव द्वारा जन्म सफल' करने के हेतु पांडुकशिला को घेर कर बैठ गये । देवों की सेना आकाश रूपी आंगन को व्याप्त कर ठहर गई । देव दुन्दुभि बज रही थी। अप्सराएं नत्यगान में निमग्न थीं । अत्यन्त प्रशान्त, भव्य तथा प्रमोद परिपूर्ण वातावरण था । बहुत से देव क्षीर सागर का जल लाने के लिये कमर बांधकर सुवर्णमय कलशों को लेकर श्रेणीबद्ध होकर खड़े हो रहे थे। जो स्वयं पवित्र हैं, और जिसमें दुग्ध सदृश स्वछन्द सलिल है, भगवान के शरीर का स्पर्श करने के लिये ऐसे क्षीर सागर जल के सिवाय अन्य जल योग्य नहीं है ऐसा विचार कर ही देवों ने पंचम क्षीर सागर के जल से पंचगमति को प्राप्त होने वाले जिनेन्द्र के अभिषेक करने का निश्चय किया था। .
प्रश्न :-क्षीरसागर की विशेषता का वर्णन किस प्रकार है ?
उत्तर :-क्षीर सामर की विशेषता के विषय में त्रिलोकसार का यह कथन ध्यान देने योग्य है---
जलयरजीवा लवणे कालेयंतिम सयंभुरमणेय । कम्ममहीपहिबद्ध सहि सेसे अलयरा जीवा ॥१५८७।।
अर्थात्--लवण समुद्र, कालोदधि समुद्र, अन्तिम स्वयंभूरमरण समुद्र ये कर्मभूमि से सम्बद्ध हैं । इन समुद्रों में जलचर जीव पाए जाते हैं। शेष समुद्रों में जलचर जीव नहीं हैं।