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अध्याय : आठवां ।
मेरु के ऊपर जो पांडुक बन है, उस वन में ईशान दिशा में सुवर्ण वर्णवाली पांडुक शिला है । यह शिला १०० योजन लम्बी ५० योजन चौड़ी और ८ योजन ऊंची होते हुये अर्ध चन्द्रमा के समान आकार वाली है । उस पर भरत क्षेत्रोत्पन्न तीर्थकर का अभिषेक होता ।
आग्नेय दिशा में रजत (चांदी) वर्णवाली पांडुक शिला ऊपर निर्दिष्ट पांडक शिला के समान है । उस पर पश्चिम विदेह के तीर्थंकर का अभिषेक होता है।
नैत्रत्य दिशा में तप्तसुवर्ण वर्गवाली रक्तशिला ऊपर निर्दिष्ट शिला के समान है । उस पर ऐरावत क्षेत्र के तीर्थ करों का अभिषेक होता है।
वायव्य दिशा में रक्तवर्स (लाल) वाली रक्तकम्बला ऊपर निर्दिष्ट शिला के समान है, उस पर पूर्व विदेह के तीर्थ करों का अभिषेक होता है । यह कथन त्रिलोकसार ग्रन्थ में किया हैं .
पांक-पांडकंबल-रक्ता तथा रक्तकंबलास्याः शिलाः । ईशानात् कांचन हत्य-तपनीय-रुधिरनिभाः ॥१५८४॥ भरतापरवियेहैरावतपूर्व विदेह जिन निबद्धाः । पूर्वापरदक्षिरसोत्तरदीर्घा अस्थिरस्थिरभूमि मुखाः ।।१५८५॥ मध्ये सिंहासनं जिनस्य दक्षिणतंतु सौधर्म । उत्तरमीशानेन्द्र भद्रासनमिहत्रयं वृत्तम् ॥१५८६॥ सत्वार्थ राजवातिक में यह कश्चन पाया है कि-- 'तस्यां प्राच्यां दिशि पांडुकशिला' अर्थात् पूर्व दिशा में पांडुकशिला है। "अपाच्या पांडुकबलाशिला' अर्थात् दक्षिण दिशा में पांडुकम्बला शिला है। 'प्रतीच्या रक्तकम्बलशिला' अर्थात् पश्चिम दिशा में रक्तकम्बला शिला है। 'उदीच्या प्रतिरक्तकम्बला' अर्थात् उत्तर में अतिरक्तकम्बल शिला है ।
अकलंक स्वामी ने यह भी लिखा है कि पूर्व दिशा के सिंहासन पर पूर्व विदेह वाले तीर्थ करों का, दक्षिण दिशा में भरत बाले तीर्थ करों का, पश्चिम दिशा में पश्चिम विदेहोत्पन्न तीर्थ करों का तथा उत्तर के सिंहासन पर ऐरावत क्षेत्रोत्पन्न तीर्थ करों का चारों निकाय के देवेन्द्र' सपरिवार तथा महाविभूति पूर्वक क्षीरोदधि जल से भरे १००८ कलशों से अभिषेक करते हैं।
पौरस्त्ये सिंहासने पूर्वविदेजान्, अपाच्ये भरसजान्, प्रतीच्ये अपरविदेहमान,