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________________ ६५० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि धूप चूर्ण डाल कर सबको हास्य युक्त कर दिया था । सुमेरु की ओर जिनेन्द्र देव को लेकर जाता हुआ समस्त सुर समाज ऐसी श्राशंका उत्पन्न करता था; मानो जिनेन्द्र के समवशरण के समान व स्वर्ग भी भगवान के साथ-साथ विहार कर रहा है । प्रश्न-- - सुमेरु पर्वत और पांडुक शिला का वर्णन किस प्रकार है ? उत्तर - सुमेरु पर्वत और पांडुक शिला - जम्बूद्वीप सम्बन्धी मेरु का नाम सुदर्शन मेरा है | उस की नींव एक हजार योजन प्रमाण है । इस मेरु के नीचे भद्रशालवन है । ५०० योजन ऊंचाई पर नन्दन वन है । पश्चात् ६२५०० योजन की ऊंचाई पर सौमनस वन है । वहां से ३६ हजार योजन ऊंचाई पर पांडुक वन है । इन चारों वनों में चारों दिशाओं में एक-एक प्रकृत्रिम चैत्यालय है । एक मेरु सम्बन्धी चारों वनों के सोलह चैत्यालय हैं । विजय, अचल, मंदर तथा विद्युन्माली नाम के चार मेरु के सोलह-सोलह जिनालय मिलकर पांच मेरु सम्बन्धी ८० जिनालय श्रागम में कहे गये हैं । इन अकृत्रिम जिनालयों में अत्यन्त वैभव पूर्ण जीवित जिनधर्म समान मनोश १०८ प्रतिबिम्ब शोभायमान होते हैं । राजवार्तिक में लिखा है । 'प्रत् प्रतिमा अनाद्यनिधना प्रष्टशत संख्या वर्णनातीत विभवाः मूर्ता इव जिनधर्मा विराजन्ते (पृष्ठ - १२६) यह मेरु पर्वत नीचे से ६१ हजार योजन पर्यन्त नाना रत्न युक्त है । उसके ऊपर यह सुवर्णव संयुक्त हैं । त्रिलोकसार में कहा है- नानारत्नविचित्रः एकषष्टिसहस्त्र केषु प्रथमतः । ततउपरि मेरुः सुवर्णवर्णान्वितः भवति ।। १५८३ ॥ मेरु सम्बन्धी जिनालयों की देव, विद्याधर तथा चारण ऋद्धिधारी मुनीश्वर वन्दना करके ग्राम निर्मलता प्राप्त करते हैं । इस सुबर्ण मेरु की ४० योजन ऊंची चूलिका कही गई हैं । उस चूलिका से बालाग्रभाग प्रमाण दूरी पर प्रथम स्वर्ग का ऋविमान या जाता है। इस एक लाख योजन ऊंचे मेरु के नीचे से अधोलोक प्रारंभ होता है । मेरु प्रसारण मध्य लोक माना गया है । यही बात राजवंर्तिक में इस प्रकार वरिणत है- 'मेहरयं त्रयाणां लोकानां यानदंड: । तस्याधस्तादधोलोकः । चूलिकामूलादूर्ध्व-मूर्ध्वलोकः मध्यमप्रमाणस्तिर्य विस्तीर्ण स्तिर्यग्लोकः । एवं च कृत्वाऽत्यर्थनिर्वचनं food | ataai मिनातीति मेरुरिति' (पृष्ठ - २७१ )
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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