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________________ अध्याय : पाठवां । उस समय की विभूति का दर्शन करके अनेक मिथ्यादृष्टि देवों ने इन्द्र को प्रमाण रूप मानकर सम्यक्त्व भाव को प्राप्त किया था। ज्योतिषी मण्डल का उल्लंघन- महापुराण में लिखा है 'मेरु पर्वत पर्यन्त नील मरिणयों से निर्मित सोपान पंक्ति ऐसी शोभायमान हो रही थी, मानों नील वर्ण दिखने वाले नामउल में भक्तिवश सीढ़ियों रूप परिणमन कर लिया हो। . समस्त देव समाज ज्योतिष पटल को उल्लंघन कर जब ऊपर बढ़ा । तब वे देव तारापों से समलंकृत गगन मण्डल को ऐसा सोचते थे मानों यह कुमुदिनियों से शोभायमान सरोबर ही हो । ज्योतिष पटल में ७६० योजन पर ताराओं का सद्भाव है। ताराओं के आगे है योजन ऊंचाई पर केतु (अरिष्टं) का विमान है । केतु के आगे १ योजन ऊंचाई पर सूर्य का , सूर्य ७६ , राहू का , राहु , १ चन्द्र कार ॥ ३ नक्षत्रों का , नक्षत्रों ३ दुध का बुध , ३ शुक्र का , गुरु का , मंगल.का , मंगल , ४ शनैश्चर का , इस प्रकार समतल भूमि (चित्रा भूमि) से ७६० योजन ऊंचाई पर ११० योजन में ज्योतिषी देवों का आवास है । ये ज्योतिषी देव मेरु पर्वत से ११११ योजन दूर रहकर मेरु की परिक्रमा करते हैं । जब जिमनाथ को लेकर देव और देवेन्द्र समुदाय ज्योतिर्लोक के समीप से जा रहा था, उस समय के दृश्य को ध्यान में रखकर कवि अहंदास एक मधुर उत्प्रेक्षा करते हैं... मुग्धाप्सराः कापि चकार सर्वानुत्फुल्लवनान् किलधूप चूर्णम् । .. रथाग्रवासिन्यरुपेक्षिपंति हसतियांगारचयस्य बुब्स्या ॥१५८२॥ किसी भोली अप्सरा ने सूर्य सारथि को अंमार की राशि-समझ कर उस पर . . ... anita M
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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